story in hindi
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13 दिसंबर को संसद में हुई सुरक्षा में चूक के मसले पर लोकसभा और राज्यसभा के सांसद सदन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे. सांसदों का कहना था कि गृहमंत्री टीवी पर बयान दे सकते हैं तो सदन में क्यों नहीं? सांसदों का यह विरोध सरकार को पंसद नहीं आया और उस ने लोकसभा व राज्यसभा से कुल 78 सांसदों को निलंबित कर दिया है. निलंबित सांसदों में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, तृणमल कांग्रेस के सौगत राय, डीएमके के टी आर बालू, दयानिधि मारन समेत लोकसभा के कुल 33 सांसद हैं. वहीं राज्यसभा से जयराम रमेश, प्रमोद तिवारी, के सी वेणुगोपाल, इमरान प्रतापगढ़ी, रणदीप सिंह सुरजेवाला, मोहम्मद नदीमुल हक समेत 45 सांसद शामिल हैं.
2001 के संसद हमले के दिन 13 दिसंबर को 2 लोगो ने लोकसभा के अंदर और 2 ने बाहर प्रदर्शन किया था. उस के बाद से विपक्ष लगातार सुरक्षा में हुई उस चूक को ले कर सरकार से जवाब मांग रहा था. इस को ले कर 14 दिसंबर को लोकसभा से कुल 13 सांसद निलंबित किए गए थे. संसद के शीतकालीन सत्र में अब तक कुल मिला कर 92 सांसदों को निलंबित किया जा चुका है. विपक्षी सांसदों ने यह आरोप भी लगाया कि जब जब संसद की सुरक्षा से खिलवाड़ होता है, सत्ता में भाजपा सरकार ही होती है. 2001 में अटल सरकार थी, 2023 में मोदी सरकार है.
विपक्ष के कुल सांसदों में से आधे के करीब निलंबित किए जा चुके है. इसे मोदी सरकार का संसद और लोकतंत्र पर हमला माना जा रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है, ‘निरंकुश मोदी सरकार सासंदों को निलंबित कर के सभी लोकतांत्रिक मानदंडों को कूड़ेदान में फेंक रही है. विपक्ष रहित संसद के साथ मोदी सरकार लोकतंत्र की आवाज को दबा रही है. देश को एक पार्टी राज की तरफ ले जाया जा रहा है.’
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने कहा है, ‘भाजपा के पास सदन चलाने का नैतिक अधिकार नहीं है. अगर मोदी सरकार सभी सांसदों को निलंबित कर देगी तो सांसद अपनी आवाज कैसे उठाएंगे? वो 3 महत्त्वपूर्ण विधेयक पास कर रहे हैं. विधेयक पर विपक्ष के सांसद बहस करें, यह लोकतंत्र में एक व्यवस्था होती है. भाजपा इस व्यवस्था को खत्म करना चाहती है. विपक्ष को पूरी तरह निलंबित करने के बाद भाजपा के पास सदन चलाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है.’
सही बात तो यह है कि देश स्तर पर नीतियां अब नहीं बनती हैं. नीतियों को बनाने में विधायक और सांसदों की भूमिका खत्म हो गई है. नीतियों को बनाने में ब्यूरोक्रेसी हावी हो गई है जिस ने हर जगह पर पीएमओ बना लिए हैं. ऐसे में सांसद या विधायक सदन में रहें या न रहें, इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. सत्ता में बैठे लोग यह भूल जाते हैं कि विपक्ष का महत्त्व भी सरकार जैसा ही होता है. संविधान में यह अधिकार विपक्ष को अधिकार दिया गया है कि वह अपनी असहमति दर्ज करा सके. विधयेक बिना सदन में चर्चा के पारित न हो. जब सदन से सारे सांसद निलंबित कर दिए जाएंगे तो इन विधेयक पर चर्चा कैसे होगी?
सरकार की यह जिम्मेदारी है कि सदन चले. विपक्ष बहस में हिस्सा ले. विधेयक बिना चर्चा के पारित न हों. इसीलिये वह विपक्ष के साथ बातचीत कर के उन को सदन में हिस्सा लेने वाला महौल बनाती थी. अटल सरकार में यह जिम्मेदारी मनोहर जोशी निभाते थे. 2014 से 2019 तक सुमित्रा महाजन ने इस जिम्मेदारी को उठाया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला इस तरह का माहौल बनाने में सफल नहीं हो रहे हैं. इस की वजह यह है कि सरकार के कामकाज और व्यवहार पर पीएमओ हावी है. वह जिस तरह के निर्देश देता है, उसी के मुताबिक काम होता है.
पीएमओ के रूप में ब्यूरोक्रेसी हावी
ब्यूरोक्रेसी के इस तरह से दखल देने से सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीति व्यवहार खत्म हो जाता है. वह सत्ता और विपक्ष की जगह पर एकदूसरे के दुश्मन जैसे बन कर एकदूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं. यहां एक पार्टी सत्ता चलाने का मतलब पीएमओ द्वारा सत्ता चलाना हो गया है. अब भाजपा में सुषमा स्वराज जैसी नेताओं की कमी है जो हाईकमान के सामने गलत कामों का विरोध कर सकें. एक तरह से सरकार मोदी सरकार नहीं चला रही, ब्यूरोक्रेसी सरकार चला रही है, जो पूरी तरह से निष्ठुर हो कर काम कर रही है. उस के लिए विपक्ष के चुने गए प्रतिनिधियों का कोई मतलब नहीं रह गया है.
ब्यूरोक्रेसी सरकार की छवि को पूरी तरह से खराब कर देती है. नेता यह भूल जाते हैं कि वोट मांगने ब्यूरोक्रेसी जनता के पास नहीं जाती. ऐसे में जब नेता वोट मांगने जाएंगे, जनता उन से सवाल पूछ सकती है. ब्यूरोक्रेसी इस तरह से काम करती है कि वह जिस लकीर पर चले, नेता उसी पर चले. जैसे, चीटिंया एक लाइन में चलती हैं. चींटिंयो की अगुआई रानी चींटी करती है. ब्यूरोक्रेसी के पीछे जो लाइन चलती है उस में कोई रानी चींटी यानी उन का कोई अगुआ नहीं होता है. ऐसे में असफलता की जिम्मेदारी सभी नेताओं की होती है.
मोदी सरकार ने जब अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए अदालत के आदेशानुसार ट्रस्ट बनाया तो नृपेंद्र मिश्रा को इस का चेयरमैन बना दिया. नृपेंद्र मिश्रा रिटायर सीनियर आईएएस अफसर हैं. 2014 से 2019 तक वे मोदी सरकार के प्रमुख सचिव थे. उन को पदमभूषण सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. वही अब राम मंदिर निर्माण के सारे फैसले ले रहे हैं. मंदिर निर्माण आंदोलन में शामिल रहे बाकी नेता उन के आदेश को मानने का बाध्य हैं.
रिटायर होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव का कार्यकाल लगातार बढ़ाया जाता रहा है. दुर्गा शंकर मिश्रा का कार्यकाल मुख्य सचिव के रूप में रिटायर होने के बाद भी 2021 और 2022 में बढ़ाया जा चुका है. 31 दिसंबर, 2023 को यह कार्यकाल खत्म हो रहा है. लोग कयास लगा रहे हैं कि तीसरी बार यह कार्यकाल बढ़ेगा या नहीं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को रिटायर अफसर चला रहे हैं. इस तरह से सरकार ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर है. ब्यूरोक्रेसी के फैसले चुने गए जनप्रतिनिधियों के फैसलों से अलग होते हैं.
संसद की सुरक्षा में चूक हुई है. गृहमंत्री अमित शाह की नाकामियों को छिपाने के लिए विपक्षी सांसदों को निलंबित किया जा रहा है. विपक्ष के सांसदों का कहना है कि जब उन की बात सुनी नहीं जा रही है तो उन के पास सदन में नारेबाजी करने और तख्तियां दिखाने के अलावा रास्ता नहीं बचता है. निलंबित होने वाले सांसदों में किसी एक पार्टी के ही सांसद नहीं हैं. इन में अधिकतर इंडिया ब्लौक के सदस्य हैं. 3 राज्यों में चुनावी हार के बाद भी इन की अगुआई कांग्रेस ही कर रही है.
संसद में इस तरह से विरोध करना कोई नई बात नहीं है. जब गैरभाजपा की सरकार होती थी तो इसी तरह से भाजपा के सांसद शोरशराबा करते थे. तब इस तरह से सांसदों को निलंबित नहीं किया जाता था. संसद की सुरक्षा में चूक एक बहुत बड़ा मुद्दा है. विपक्ष के सांसदों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस मुददे पर सरकार को बात रखने पर मजबूर करें. सांसदों का निलंबन तानाशाही की तरफ बढता हुआ कदम है.
अफ़सोस तो इस बात का भी होना चाहिए कि देश में खबरों के माने और दायरा बहुत समेट कर रख दिए गए हैं. उस से भी बड़ा अफ़सोस यह कि खुद को बुद्धिजीवी समझने का दावा करने वाले अधिकतर लोगों ने मान लिया है कि खबर का मतलब होता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण, इंडिया गठबंधन की उठापटक, देश में कितनी जाति के मुख्यमंत्री और नेता हैं, इस के बाद अपराध, क्रिकेट और फ़िल्में. और ज्यादा हुआ तो यह कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने यह या वह फैसला दिया.
ऐसी खबरों से न तो तर्कक्षमता निखरती है और न ही ज्ञान में कोई बढ़ोतरी होती है. सरकार का प्रचार ही जब मीडिया का मकसद रह जाए तो कहा जा सकता है कि हम दिमागी तौर पर गुलाम बना कर रख दिए गए हैं और इस पर कोई एतराज भी किसी को नहीं है. ज्यादा नहीं कोई 2 महीने पहले एक खबर आ कर दम तोड़ गई थी कि केंद्र सरकार 9 वर्षों की अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए आईएएस अधिकारियों को रथ प्रभारी के तौर पर तैनात करने की तयारी में हैं. वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए गए इस पत्र का मसौदा काफी लंबाचौड़ा है जिस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई थी.
कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स पर यह कहते अपनी जिम्मेदारी पूरी हुई मान ली थी कि सिविल सर्वैन्ट्स को चुनाव में जाने वाली सरकार के लिए राजनीतिक प्रचार करने का आदेश कैसे दिया जा सकता है. भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने इस पर सरकार का बचाव किया था. लेकिन वह तर्क आधारित और संवैधानिक न हो कर कांग्रेस की आलोचना तक सिमट कर रह गया था.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे ने जरूर तुक की बात कही थी कि सरकार की रथ प्रभारी बनाने की योजना केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम 1964 का स्पष्ट उल्लंघन है जो निर्देश देता है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेगा. खड़गे ने आगाह करते हुए यह भी कहा था कि अगर विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को वर्तमान सरकार की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए नियुक्त किया जा रहा है तो हमारे देश का शासन अगले 6 महीनों के लिए ठप हो जाएगा. लोकतंत्र की धज्जियां कैसे खुलेआम उड़ाई जा रही हैं, इसे समझने के लिए भाजपा आईटी सैल के प्रमुख अमित मालवीय का सोशल मीडिया पर यह कहना पर्याप्त था कि नौकरशाहों का कर्तव्य है कि वे लोगों की सेवा करें, जैसा निर्वाचित सरकार उचित समझे.
मामला गंभीर था जिस से यह साबित हुआ था कि सरकार की मंशा ब्यूरोक्रेट्स को खुद से सहमत करने की और अपनी विचारधारा के लिहाज से हांकने की भी है और इस में वह अब तक कामयाब भी रही है. क्योंकि कोई चैनल इस पर डिबेट नहीं करता, दैनिक स्तंभ लिखने वाले नैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान का रायता लुढ़का रहे हैं. वे अब खुशवंत सिंह होने के बजाय शिव खेड़ा होने लगे हैं. वे इस बात का जिक्र करने से भी परहेज करते हैं कि केंद्र तो केंद्र, भाजपाशासित राज्य सरकारों पर तक पीएमओ के आईएएस अधिकारियों का शिकंजा कसता जा रहा है.
ऐसे में क्या आप यह उम्मीद करते हैं कि पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी को 22 जनवरी को अयोध्या आने से रोका जाना महज एक राजनीतिक फैसला है. राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने एक पत्रकार वार्त्ता आयोजित कर कहा कि भाजपा के इन दोनों वरिष्ठ नेताओं से मैं ने कहा कि आप दोनों बुजुर्ग हैं, इसलिए स्वास्थ्य व उम्र को देखते राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा में न आएं. बकौल चंपत राय, दोनों ने इसे मान भी लिया.
थोड़ीबहुत नानुकुर मुरली मनोहर जोशी ने की लेकिन चंपत राय ने उन से कहा, ‘गुरुजी मत आइए. आप की उम्र और सर्दी… आप ने अभी घुटने भी बदलवाए हैं.’ चंपत राय ने एक तथाकथित दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए यह भी बताया कि कैसे 5 अगस्त को राम मंदिर आंदोलन के सहनायकों में से एक कल्याण सिंह शिलान्यस के दिन आने के लिए अड़ गए थे और उन्हें चालाकी दिखाते ऐन वक्त पर आने से रोक दिया गया. घर के बुजुर्गों को इसी तरह रोका जाता है.
आडवाणी और जोशी की यह त्रासदी ही है कि उन्हें आज से कोई 30-32 साल पहले भी अयोध्या जाने से रोकने की कोशिश या साजिश हुई थी. तब उन का रास्ता रोकने वाले लालू और मुलायम यादव जैसे लोग थे लेकिन आज तो अपने वाले ही नहीं चाह रहे कि वे अपने लगाए पेड़ का फल चखें. उस दौर में भी रास्ता आईएएस अफसरों की सलाह पर ही रोका गया था और आज भी ऐसा ही लग रहा है क्योंकि चंपत राय कोई इतनी बड़ी हस्ती नहीं हैं कि बिना मोदी आज्ञा और पीएमओ के फरमान के यह अहम फैसला ले पाएं. यह स्क्रिप्ट किस ने लिखी, यह शायद ही कभी पता चले पर क्यों लिखी, यह हर कोई समझ रहा है.
प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘बूढ़ी काकी’ की तर्ज पर इन दोनों की बेरहम अनदेखी और उन्हें आने से रोकने का इकलौता मकसद यह है कि सिर्फ नरेंद्र मोदी ही दिखें. लालकृष्ण आडवाणी न होते तो आज भी राम मंदिर एक सपना बन कर ही रह जाता. उन्होंने जो किया उसे देश जानता है.
आज जो हो रहा है उसे भी देश समझ रहा है कि सवाल नरेंद्र मोदी की इमेज का है. अगर आडवाणी और जोशी आए तो मंदिर आंदोलन के अगुआ होने के नाते मीडिया और देश के हिंदुओं का ध्यान उन्हीं की तरफ रहेगा. तब लोग यह भी पूछ और सोच सकते हैं कि मुख्य यजमान आडवाणी जी क्यों नहीं जबकि सारा कियाधरा तो उन्हीं का है.
अगर भाजपा एक परिवार है तो उस में बुजुर्गो की इतनी उपेक्षा क्यों कि उन्हें एक अति शुभ कार्य का साक्षी भी नहीं बनने दिया जा रहा जबकि सनातनी संस्कार तो यह कहते हैं कि घर के बुजुर्ग ही सर्वेसर्वा होते हैं, वे तो प्रभुतुल्य होते हैं. यह और बात है कि चंपत राय ने 4 दिनों पहले ही नरेंद्र मोदी को विष्णु अवतार माना है. रही बात अस्वस्थता और उम्र की, तो वह किसी के गले नहीं उतर रही. इन दोनों ने ही इस बाबत अपने से कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है. ऐसे में चंपत राय, जो मुद्दत से इन की खैरखबर लेने नहीं गए, को कैसे जादू के जोर से पता चल गया कि ये आने की स्थिति में नहीं.
90 के दौर के किशोर और युवा हिंदू जो जान जोखिम में डाल कर अयोध्या गए थे वे इस पर क्या सोचते हैं, यह कहना भी मुश्किल है. उन्होंने भाजपा के बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण दिनों में आडवाणी का जलवा देखा है जो उन्होंने खुद हासिल किया था. वही पीढ़ी नरेंद्र मोदी युग भी देख रही है जिस में इन की कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी नहीं. ये लोग सोशल मीडिया पर हिंदुत्व से ताल्लुक रखती सच्चीझूठी पोस्ट फौरवर्ड करने के आसान काम करने भर को रह गए हैं. ये कुछ बोल भी नहीं सकते क्योंकि जब सुनी नींव रखने वालों की नहीं जा रही तो इन की हैसियत क्या.
सुनी सिर्फ उन आईएएस अधिकारियों की जा रही है जो सरकार की दिशा और दशा तय कर रहे हैं, जो विकसित भारत संकल्प यात्रा के रथी बना दिए गए हैं. दौर हमेशा से अर्जुनों का रहा है. ये एकलव्य तो अंगूठा दान करने को जन्मे हैं. दौर नृपेंद्र मिश्रा जैसे आईएएस अधिकारियों का है जो राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष की हैसियत से अयोध्या के नए ऋषिमुनि बन बैठे हैं जिन्होंने 92 के आंदोलन में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया वे परचून और भजिये की दुकान पर बैठे या दूसरे छोटेमोटे कामों से गुजर करते उस दौर के संस्मरण सुना रहे हैं.
ज्यादती कईयों के साथ हो रही है और यही क्रूरता ही धर्म का सच है.
बिना शादी किए पतिपत्नी की तरह साथ रह रहे जोड़ों यानी लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर्स को शादीशुदा जोड़ों की तरह अधिकार नहीं मिलते हैं. कई मामलों में ऐसे जोड़ों को शादीशुदा जोड़ों के मुकाबले कानूनी तौर पर कम अधिकार मिलते हैं. खासतौर पर उन के बच्चों की कस्टडी के मामले में अनिश्चितता रहती है.
एक महिला शादी के एक साल बाद ही अपने पति से अलग हो गई और अपने बौयफ्रैंड के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी. इसी दौरान वह प्रैग्नैंट भी हो गई. खास बात यह कि उस ने अब तक अपने पति से तलाक नहीं लिया था. यानी, कानूनी तौर पर वह शादीशुदा थी और पति से अलग अपने पुरुषमित्र के साथ रह रही थी.
अस्पताल में उस ने एक बच्चे को जन्म दिया. बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में पिता के नाम के तौर पर उस के पति का नाम दर्ज हो गया जबकि बायोलौजिकल पिता उस का लिवइन पार्टनर था. कुछ समय बाद महिला ने पति से तलाक ले लिया. अब उस ने बर्थ सर्टिफिकेट पर बच्चे के पिता के तौर पर अपने लिवइन पार्टनर का नाम डलवाना चाहा.
यह मामला नवी मुंबई का है. वहां की महानगर पालिका ने पिता का नाम बदलने से इनकार कर दिया. मैजिस्ट्रेट कोर्ट में भी महिला की याचिका खारिज हो गई तो वह मुंबई हाईकोर्ट पहुंची. 8 अगस्त, 2023 को जस्टिस एस बी शुक्रे व जस्टिस राजेश पाटिल की बैंच के सामने याचिका पर सुनवाई हुई और आगे की डेट दी गई. इस तरह पूर्व पति की जगह बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट में लिवइन पार्टनर का नाम डलवाने के लिए वह लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रही है.
लिवइन रिलेशनशिप यानी ‘बिन फेरे हम तेरे’ का रिश्ता जहां 2 बालिग बिना शादी किए एक छत के नीचे पतिपत्नी की तरह रोमांटिक रिलेशनशिप में रहते हों. लिवइन रिलेशन में पार्टनर भले ही पतिपत्नी की तरह रहते हैं लेकिन दोनों शादी के बंधन से नहीं बंधे होते. शादी के लिहाज से एकदूसरे के प्रति कानूनी जिम्मेदारियों से वे मुक्त होते हैं. कानूनी भाषा में इस रिश्ते को ‘नेचर औफ मैरिज’ के रूप में समझा गया है. लिवइन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को भारत में कानूनी रूप से जायज माना जाता है लेकिन समाज की नजरों में न ही इस रिश्ते को इज़्ज़त मिली है और न ही उन से होने वाले बच्चों को. इस रिश्ते से जन्मे बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में पिता के नाम को ले कर भी सवाल उठते हैं.
किसी भी पुरुष या महिला के लिए बिना शादी किए किसी के साथ फिजिकल रिलेशन में रहना कानून के हिसाब से गलत नहीं है मतलब गैरकानूनी नहीं है. चाहे वह शादीशुदा है, तलाकशुदा है या अविवाहित है, वह लिवइन रिलेशनशिप में रह सकता है. इसे अपराध नहीं कह सकते हैं.
लेकिन लिवइन रिलेशनशिप को ले कर देश में स्पष्ट कानून नहीं है. इस तरह की रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. उन्हें कानून से समुचित संरक्षण नहीं मिलता. साथ ही, बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले भी कौम्प्लिकेटेड हो जाते हैं. क्योंकि लिवइन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों से निबटने के लिए अलग से कोई कानून नहीं है. हालांकि अदालतें समयसमय पर इस से जुड़े मामलों पर अहम फैसले सुनाती रहती हैं लेकिन कई दफा वे अलगअलग होते हैं.
लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े शादीशुदा जोड़ों को मिले कई अधिकारों से वंचित रहते हैं. लिवइन पार्टनर का एकदूसरे की संपत्ति में उन का अधिकार या उत्तराधिकार नहीं हो सकता लेकिन शादी के मामले में ऐसा नहीं होता. लिवइन पार्टनर अगर अलग होते हैं तो वो मैंटीनैंस का दावा नहीं कर सकते. हालांकि, लिवइन रिलेशन से पैदा हुए बच्चे को उसी तरह के कानूनी अधिकार हासिल हैं जो शादीशुदा कपल के बच्चे के होते हैं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिवइन में रेप से जुड़े एक केस में अपने हालिया फैसले में इस कौन्सेप्ट पर ही सवाल उठाया था. मामला लिवइन रिलेशन में एक साल तक रहे जोड़े का था. महिला पार्टनर ने पुरुष पार्टनर पर रेप का आरोप लगाया था. वह प्रैग्नैंट हो गई थी. 1 सितंबर को दिए अपने आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जानवरों की तरह हर मौसम में पार्टनर बदलने का चलन एक सभ्य और स्वस्थ समाज की निशानी नहीं हो सकता. हाईकोर्ट ने कहा कि शादी में जो सुरक्षा, सामाजिक स्वीकृति और स्थायित्व मिलता है वह लिवइन रिलेशनशिप में कभी नहीं मिल सकता. हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देते हुए लिवइन रिलेशन को ले कर कई कठोर टिप्पणियां कीं.
जून 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिवइन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को शादीशुदा जोड़े के बच्चों की तरह ही प्रौपर्टी से ले कर उत्तराधिकार तक के अधिकार मिलेंगे. शर्त यह है कि लिवइन रिलेशन लंबा हो और इस तरह का न हो कि जब चाहा, साथ रहने लगे और जब चाहा, अलग हो गए.
संपत्ति के अधिकारों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने भारत माता और अन्य बनाम विजया रंगनाथन एंड एसोसिएट्स के मामले में एक फैसला ही सुनाया था. फैसला यह था कि 2 लोगों के लिवइन संबंध से पैदा होने वाले बच्चों को उन के मातापिता की संपत्ति में उत्तराधिकारी माना जा सकता है. कानून की नजर में भी उन्हें एक वैध उत्तराधिकारी माना जा सकता है.
लिवइन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे की कस्टडी एक जरूरी लीगल बैरियर है. स्पष्ट कानूनों के न होने की वजह से यह रिश्ता शादी के मुकाबले ज्यादा कौम्प्लिकेटेड हो जाता है. लिवइन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे के लिए कस्टडी के मैटर को उसी तरह से डील किया जाता है जैसे कि शादी के केस में कुछ स्पेसिफिक कानूनों के न होने पर किया जाता है.
कानपुर के बेगमपुरवा में 3 नाबालिग बच्चों ने कुत्ते के 4 नन्हे पिल्लों को ज़िंदा जला दिया. बच्चो की उम्र 8-9 साल के बीच थी. क्षेत्र के एक पार्क में एक फीमेल डौग ने 4 बच्चों को जन्म दिया था. स्थानीय लोगों ने पिल्लों को ठंड से बचाने के लिए जूट की बोरी और कार्ड बोर्ड आदि से एक छोटा सा घर उन के लिए बना दिया था, जिस में वे दुबके रहते थे. बच्चों ने उन के इस घर में भूसा भर कर उस में आग लगा दी, जिस में चारों पिल्ले तड़पतड़प कर मर गए. उन की दर्दनाक आवाज सुन कर स्थानीय लोग जमा होने लगे तो पिल्लों की मौत का मज़ा ले रहे बच्चे डर कर भागने लगे, लेकिन लोगों ने उन में से एक को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया.
जानवरों के लिए काम करने वाली सामाजिक संस्था ‘उम्मीद एक किरण’ ने किदवई नगर थाने में इस मामले में तहरीर दी. मामला पशु क्रूरता अधिनियम के तहत 428 और 429 की धारा का था. जिस में से धारा 428 में 2 साल की सजा का प्रावधान है, जबकि धारा 429 में 5 साल की सजा है. इस मामले में आरोपी को थाने से ही जमानत मिल जाती है, लेकिन इस मामले में चूंकि बच्चे माइनर थे इसलिए बच्चों को पुलिस ने अरेस्ट नहीं किया.
गौरतलब है कि बचपन सब से संवेदनशील अवस्था है. जीवों के प्रति प्रेम सब से ज्यादा बचपन में ही उमड़ता है. बड़ों के मुकाबले बच्चे कुत्ते, बिल्ली, तोते आदि पालने में और उन के साथ खेलने में सब से ज्यादा खुशी महसूस करते हैं. उन से बिछोह भी उन को बर्दाश्त नहीं होता. मगर यह घटना संकेत करती है कि बच्चों की मानसिकता और संवेदनशीलता के स्तर में बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा है, जिस पर मातापिता, टीचर्स या अन्य लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है. बच्चों में क्रूरता बढ़ रही है. अपराध की प्रवृत्ति बहुत कम उम्र में पैदा हो रही है. जिस को अगर अनदेखा किया गया तो आने वाला समय देश और समाज के लिए खतरनाक होगा.
बच्चों की ऐसी क्रूर और उग्र मानसिकता का जिम्मेदार कौन है? क्या सोशल मीडिया? आज हर बच्चे के हाथ में स्मार्ट फ़ोन है. यूट्यूब पर वह बहुत सी ऐसी चीज़ें देख रहा है जो उस के भोले मन पर बुरा प्रभाव छोड़ती हैं. क्या टीवी चैनल बच्चों के व्यवहार पर प्रभाव डाल रहे हैं? दो दशक पहले तक क्राइम सीरियल या पारिवारिक नोकझोंक वाले सीरियल देर रात दिखाए जाते थे जब बच्चे सो चुके होते थे. लेकिन अब सारे दिन ऐसे सीरियल टीवी चैनलों पर जारी रहे हैं. जो सीरियल चल रहे हैं उन में एकदूसरे की खिलाफ साजिश, मारधाड़, गालीगलौच और मौत का तांडव चल रहा है.
शक्तिमान, स्पाइडर मैन आदि सीरियल भी हिंसा को ही पोषित करते हैं और कुछ नहीं. इन के अलावा ऐतिहासिक सीरियल भी कमोबेश हिंसक विचारों को ही बढ़ाते हैं. उन्हें देख कर बच्चो के मन में भी ऐसे ही हीरो बनने की इच्छा बलवती हो जाती है. उन्हें यही लगता है कि कोई जरा सा भी सिर उठाए तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए. इस तरह आराम से जिंदगी जी जा सकती है.
इस के अलावा न्यूज चैनलों में भी दुनिया में चल रही लड़ाइयों के दृश्य परोसे जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा और इजराइल का भींषण युद्ध, बमों के धमाके, घायल चीखतेमरते लोग, गिरती इमारतों के भयावह दृश्य. कोई अच्छी खबर, कोई आशावादी बात, कोई अविष्कार, कोई सकारात्मक बात कहीं नहीं हो रही है. बच्चे इन न्यूज चैनलों और सीरियलों को देखते हैं. इन का बुरा प्रभाव भी उन के दिमाग पर पड़ रहा है.
कभीकभी घरपरिवार अथवा समाज से मिलने वाले तिरस्कार से बच्चे कुंठाग्रस्त हो कर भी इस प्रकार हिंसा के मार्ग पर चल पड़ते हैं. यहां बदले की भावना प्रमुख कारण होती है. ऐसे बच्चों को प्यार व दुलार की आवश्यकता होती है.
डा. सुगंधा गुप्ता कहती हैं, “आमतौर पर, जो बच्चे जानवरों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, उन्होंने या तो खुद दुर्व्यवहार देखा है या अनुभव किया है. किसी जानवर के विरुद्ध की गई हिंसा का प्रत्येक कार्य इस बात का संकेत है कि व्यक्ति पाशविकता की तरफ बढ़ रहा है और वह भविष्य में अपराधी बन सकता है, समाज को बड़ा नुकसान भी पहुंचा सकता है. 1970 के दशक से अब तक क्राइम के क्षेत्र में जो अनुसंधान हुए हैं, उस में बचपन में जानवरों के प्रति क्रूरता को बाद में अपराध, हिंसा और आपराधिक व्यवहार में बदलते देखा गया है. पशुओं के प्रति क्रूरता को चेतावनी संकेत के रूप में रिपोर्ट किया गया है. ज्यादातर हिंसक अपराध में अपराधियों के प्रोफाइल में पशु क्रूरता का इतिहास है. आंकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा देखने वाले 30 प्रतिशत बच्चे अपने छोटे भाईबहनों या पालतू जानवरों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं.”
बच्चों की हिंसक वृत्ति पर लगाम लगाना बहुत आवश्यक है. घर में मातापिता को चाहिए कि हिंसा से भरपूर कार्टून के स्थान पर बच्चो को संस्कार देने वाले कार्यक्रम देखने के लिए प्रोत्साहित करें. मारधाड़ वाले सीरियल कम से कम समय के लिए देखने दें. उन्हें बारबार समझाएं कि हिंसा से किसी का भला नहीं होता बल्कि नुकसान होता है. मिलजुल कर भाईचारे से रहने के लिए शिक्षित करें. स्कूल या खेल के लिए जाते समय चौकस रहें कि बच्चे ऐसा कोई हिंसा करने वाला हथियार अपने साथ न ले जाएं.
विद्यालय में टीचर्स को भी चाहिए कि किसी बच्चे में हिंसक प्रवृत्ति पनपती दिखाई दे, तो फौरन उन के मितापिता तथा स्कूल अथौरिटी को सूचित करें ताकि इस मनोवृत्ति पर समय रहते लगाम लगाई जा सके. समयसमय पर बच्चों की काउंसलिंग कराने से भी उस के मन में आए कुंठा अथवा एग्रेसिव भावों को नियंत्रित किया जा सकता है.
इतवार 17 दिसंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में लाखों की भीड़ के सामने लच्छेदार भाषण देते लोकसभा चुनाव की दुंदुभी फूंक रहे थे ठीक उसी वक्त में कोलकाता से कांग्रेसी दिग्गज पी चिदम्बरम भी भाजपा की ही तारीफों में कसीदे गढ़ते कह रहे थे कि हवा उस के पक्ष में है और भाजपा हर चुनाव को आखिरी चुनाव समझते लड़ती है.
पूर्व वित्तमंत्री की मंशा हालांकि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को आगाह करने की थी लेकिन तरीका उन का ठीक वैसा ही था जैसे कोई पिता अपने आलसी और सुस्त बेटे को जिम जाने के फायदे न गिना कर पडौसी के लड़के के सिक्स पेक और सेहत की मिसाल देने लगे.
लोकतंत्र में नेता विपक्षी नेताओं की तारीफ करें यह कोई नई बात नहीं है. इंदिरा गांधी के दौर में जनसंघ सहित कई गैर कांग्रेसी नेता उन के प्रशसंक थे. इन में अटलबिहारी बाजपेयी का नाम उल्लेखनीय है लेकिन उन्होंने कभी कांग्रेस की नीतियोंरीतियों और खूबियों की तारीफ नहीं की.
आजकल उल्टा हो रहा है नरेंद्र मोदी की तारीफ करने से बचने कांग्रेसी नेता भाजपा के चुनावी प्रबंधन की तारीफ करने लगे हैं जबकि उन्हें इस की आलोचना करना चाहिए कि भाजपा धर्म के नाम पर वोट मांग कर लोकतंत्र की गरिमा और खूबसूरती खत्म कर रही है जो अंतत देश के लिए नुकसानदेह है.
काशी में बोले मोदी
चिदंबरम ने हालांकि यह भी कहा कि हवाएं दिशाएं बदल भी देती हैं लेकिन इस के लिए भगवान भरोसे बैठ जाना कोई बुद्धिमानी या तुक की बात तो नहीं. यह हवा जिस की पीड़ा उन के मुंह से निकली कैसे भाजपा अपने पक्ष में मोड़े हुए है इस के लिए वाराणसी में मोदी ने क्या कुछ कहा उस पर एक नजर डाले तो स्पष्ट होता है कि अब धर्म के साथ साथ भाजपा एक नया काम यह कर रही है कि जिन लोगों को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से लाभ मिला है उन के मुंह से विज्ञापन करवा रही है.
मसलन – मुझे प्रधानमंत्री आवास योजना में घर मिला जिस से मेरी गरीबी दूर हो गई. स्कूल कौलेजों में पढ़ रहे मेरे बच्चों में आत्मविश्वास आ गया अब वे दोस्तों के सामने इस बात पर शर्मिंदा नहीं होते कि वे झोपड़े या कच्चे घर में रहते हैं.
मसलन – मैं एक गरीब महिला हूं मुझे उज्ज्वला योजना में गेस सिलेंडर मिला जिस से मेरी गरीबी दूर हो गई मुझे लकड़ियों के धुंए से मुक्ति मिल गई.
मसलन – मैं गरीब हूं और अपना इलाज नहीं करा सकता था लेकिन आयुष्मान कार्ड बनने से मेरा लाखों का इलाज होता है इस से अब मैं गरीब नहीं रहा मेरा औपरेशन हुआ अब मैं फिर से काम कर सकता हूं. यह कार्ड नहीं होता तो जिंदगी जैसेतैसे गुजार लेता.
यह ब्रांडिंग ठीक वैसी ही है जैसी देर रात टीवी के विज्ञापनों में दिखाई जाती है कि पहले मैं बहुत दुबला और कमजोर था फिर मुझे फलां प्रोडक्ट मिल गया अब मैं बहुत ताकतवर हूं और `कुछ भी कर सकता हूं. मेरी कमजोरी दूर हो गई है और इस से मेरी परफार्मेंस सुधरी है अब मैं बहुत खुश हूं.
तो बकौल मोदीजी देश में सब खुश हैं, खुशहाल हैं क्योंकि उन की जरूरतें सरकारी योजनाओं से पूरी हो रही हैं. 80 करोड़ भूखों को सरकार अन्न दान कर रही है. बेघरों को दान में आवास दिया जा रहा है और बाकी बचे लोगों जिन्हें रोटी, कपड़ा और मकान की भी जरूरत नहीं उन के दुख दर्द दूर करने राम मंदिर लगभग बन चुका है. वहां भीड़ हो तो मथुरा, काशी ये लोग आ सकते हैं नहीं तो प्रयागराज, उज्जैन, हरिद्वार, ऋषिकेश, गया, बैजनाथ और चारों धाम सहित मंदिरों की लम्बी श्रृंखला है. जिसे जहां सहूलियत हो दक्षिणा चढ़ा कर मानसिक संतुष्टि और सुख सम्पत्ति की गारंटी ले सकता है लेकिन इस के लिए जरुरी है कि वोट भाजपा को ही दिया जाए.
जिन्हें विष्णु के क्षीर सागर में होने न होने पर शक हो वे चाहें तो सीधे नरेन्द्र मोदी को भी पूज सकते हैं क्योंकि अयोध्या के एक ताजे बुलेटिन में उन्हें विष्णु अवतार घोषित कर दिया गया है. राम जन्म भूमि ट्रस्ट के सचिव चम्पत राय ने मोदी के काशी दौरे के बाद यह पाताल वाणी की है.
मुमकिन है ऊपर कहीं से उन्हें यह निर्देश मिला हो कि अभी कल्कि अवतार में विलम्ब है इसलिए नरेंद्र मोदी को ही विष्णु अवतार घोषित कर दिया जाए. बाद की खाना पूर्तियां वक्त रहते होती रहेंगी. हालफिलहाल तो नरेंद्र मोदी 22 जनबरी को मानव रूप में ही विष्णु अवतार के दर्शन करेंगे.
कितना सच कितना झूठ
वाराणसी में नरेंद्र मोदी ने सरकार की उपलब्धियां गिनाते चाहा यही है कि लोग योजनाओं का लाभ लें और वोटों की दक्षिणा भाजपा को दें. अब यह और बात है कि वे और दूसरे भाजपाई जितना और जैसे गिनाते हैं उतने का दसवा हिस्सा ही आमजन को मिलता है. मिसाल आयुष्मान कार्ड की लें तो भाषणों से तो लगता ऐसा है कि सभी लोग इस का फायदा उठा रहे हैं लेकिन हकीकत कुछ और है.
स्वास्थ मंत्रालय ने 17 दिसम्बर को ही आंकड़े जारी कर बताया है कि आयुष्मान योजना की पात्रता तो 33 करोड़ लोगों को है लेकिन अभी तक सिर्फ 3 करोड़ लोगों को ही ये कार्ड जारी किए गए हैं. इन में से भी लगभग आधे उत्तर प्रदेश के लाभार्थी हैं. कम काम में ज्यादा हल्ला कैसे मचाया जाता है भाजपा को इस में मास्टरी हासिल हो चुकी है.
मोदीजी 4 करोड़ परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना से लाभान्वित बता चुके हैं यानी एक परिवार में 4 सदस्य भी माने जाएं तो 16 करोड़ लोगों को छत मिल चुकी है. आयुष्मान की तरह यह दावा और आंकड़ा भी शक के दायरे में है.
उज्ज्वला योजना में सिलेंडर बंटे जरुर है लेकिन हकीकत यह है कि बड़ी तादाद में महिलाएं दोबारा सिलेंडर भरवा ही नहीं पाई क्योंकि वे गरीब हैं और उन के पास हजार रूपए गैस सिलेंडर खरीदने को नहीं. इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान के चिथड़े किसी भी शहर कसबे या गांव में उड़ते देखे जा सकते हैं जहां शौचालयों में कुत्तों ने डेरा डाला हुआ है या वटीन के वे डब्बे गायब ही हो चुके हैं. महिलाएं पहले की तरह लोटा या बोतल ले जाते दिख जाती हैं.
कांग्रेस खामोश क्यों
चिदंबरम जैसे नेता इन दावों और आंकड़ों का पोस्टमार्टम करे तो जो हकीकत सामने आएगी वह जरुर हवा का रुख कांग्रेस की तरफ मुड़ सकता है, इस के साथसाथ उसे यह भी लोगों को बताते रहना होगा कि दरअसल में धर्म से रोजगार नहीं मिलने वाला उस के लिए तो खुद लोगों को मेहनत करना पड़ेगी. अभी कांग्रेसी यह बात यदा कदा कह जरुर रहे हैं लेकिन खुद इस बात को ले कर शंकित हैं कि लोग इसे स्वीकारेंगे और समझेंगे या नहीं.
सियासी बाजार में बिलाशक झूठ बेचना आसान है लेकिन सच बेचना उस से भी ज्यादा आसान काम है. धर्म स्थलों से समस्याएं हल नहीं होतीं और रोजगार नहीं मिलता यह जनता भी जानती और समझती है लेकिन उस की शंका कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को ले कर यह है कि वे उसे भरोसा नहीं दिला पा रहे कि धर्म की राजनीति से हट कर यह काम कैसे होगा या हो भी सकता है.
इसी असमंजस का लाभ नरेंद्र मोदी और भाजपा उठा रहे हैं इसीलिए हवा उन के पक्ष में है और तो और उन्हें विष्णु अवतार घोषित करने पर आमजनों की धार्मिक भावनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता वे इस बात पर आहत नहीं होती कि सरासर एक आदमी को भगवान बनाया जा रहा है जिस पर किसी को कोई एतराज नहीं.
दरअसल में धर्म के डर जो सदियों से हिंदुओं के दिलोदिमाग में बैठा हुआ है को भगवा गैंग ने कुछ इस तरह होव्वा बनाया है कि लोग उस के मकड़जाल से निकलने में डरने लगे हैं. कांग्रेसियों और इंडिया गठबंधन नास्तिक कहलाने से डरते हैं और उन में से अधिकतर नास्तिक हैं भी नहीं फिर भी मात खा रहे हैं तो इस की वजह भाजपा का बिछाया धर्म जाल है जिसे काटने जोखिम तो विपक्ष को उठाना पड़ेगा नहीं तो योजनाओं के लाभार्थी पैसा और वोट दोनों लुटाते खुद भी लुटते रहेंगे.
नरेंद्र मोदी अब अस्पताल और स्कूल बनाने की बात कभी कभार ही करते हैं क्योंकि शिक्षा और इलाज दोनों महंगे होते जा रहे हैं. विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गांधी ने इस मुद्दे को उठाने की कोशिश राजस्थान से की थी लेकिन कांग्रेसियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया था कि कैसे इसे जनता के सामने पेश करें कि हकीकत उन्हें समझ आए. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर विपक्ष को आधेअधूरे नहीं बल्कि पूरे मन से इसे उठाना होगा तभी हवा उन की तरफ चलेगी.
मुंबई हमलों का गुनाहगार और मोस्ट वांटेड आतंकवादी दाऊद इब्राहिम के बारे में यह खबर है कि पाकिस्तान के कराची शहर, जहां बीते कई सालों से उस ने अपना सुरक्षित ठिकाना बना रखा था, में उस के बंगले में ही उसे जहर दे कर मारने की कोशिश की गई है.
सोशल मीडिया के हवाले से कहा जा रहा है कि कराची में दाऊद को एक अस्पताल में भरती कराया गया है. उस की हालत नाजुक है और डाक्टर्स की टीम उस के इलाज में जुटी है. हालांकि, उसे सामान्य रूप से बीमार होने की बात कह कर अस्पताल में भरती कराया गया है.
गौरतलब है कि इस से पहले भी दावा किया गया था कि दाऊद कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है. पिछले दिनों चर्चा थी कि गैंग्रीन के कारण कराची के एक अस्पताल में उस के पैर की 2 उंगलियां काट दी गई थीं. हालांकि, इस बात की भी पुष्टि नहीं हो पाई थी.
मोस्ट वांटेड आतंकवादी और डी-कंपनी का प्रमुख दाऊद इब्राहिम भारत का भगोड़ा है. वह 1993 के मुंबई बम विस्फोटों का मास्टरमाइंड है, जिस में 250 से अधिक लोगों की जान चली गई और हजारों लोग घायल हो गए. इस के बाद ही उसे भारत का मोस्ट वांटेड आतंकवादी घोषित किया गया था. तब से उस ने पाकिस्तान में शरण ले रखी है. भारत ने कई बार इस के सुबूत भी पेश किए. हालांकि, पाकिस्तान लगातार उस की देश में मौजूदगी से इनकार करता रहा है.
आखिर किस ने ऐसा किया है? वे कौन सी शक्तियां हो सकती हैं जो दाऊद को उस के घर के भीतर जहर दे सकती हैं? इस के पीछे खुद पाकिस्तान की कोई एजेंसी है या फिर भारत और अमेरिका में से किसी का हाथ है? दाऊद इब्राहिम को जहर दिए जाने की बात सामने आने के बाद इसे कुछ लोग बीते करीब 2 वर्षों के दौरान मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों से जोड़ रहे हैं. इन में रियाज अहमद, शाहिद लतीफ, ख्वाजा शाहिद और अबु हंजाला के नाम शामिल हैं. उन में से कुछ को जहर दे कर भी मारा गया है.
पाकिस्तान में छिपे ये सभी आतंकवादी भारत की मोस्ट वांटेड लिस्ट में थे. दाऊद भी भारत के लिए मोस्ट वाटेंड हैं और उस को भी जहर देने की बात सामने आई है तो मामले को दूसरे आतंकियों की मौत से जोड़ा जा रहा है.
दाऊद इब्राहिम (67) 1993 के मुंबई बम हमले का आरोपी है. अमेरिका ने भी उसे आतंकी घोषित कर रखा है. मुंबई ब्लास्ट के बाद दाऊद भारत से भाग गया था. भारत की खुफिया एजेंसियां दाऊद के ठिकाने के साथसाथ उस की आवाज तक हासिल कर चुकी हैं.
खुफिया एजेंसियां पाकिस्तान में उस के उन ठिकानों तक भी पहुंचीं, जिन्हें वह अब तक दुनिया भर से छिपाता रहा है. ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब दाऊद की आवाज के आधार पर भारत की एजेंसियां इस नतीजे पर पहुंची थीं कि दाऊद कराची में ही है और वहीं से अपना गैरकानूनी कारोबार चला रहा है.
अन्य देशों में छिपे बैठे भारत के दुश्मन चुनचुन कर मारे जा रहे हैं. कुछ दिनों पहले कनाडा ने भारत पर यह आक्षेप लगाया कि अलगाववादी नेता हरदीप सिंह निज्जर, जो एक कनाडाई है, की ह्त्या भारत ने करवाई है.
भारत और कनाडा के बीच काफी अच्छी दोस्ती थी, लेकिन अब अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले ने माहौल पूरी तरह से बदल कर रख दिया है. दोनों देशों के रिश्तों में तनाव चरम पर है.
जी20 सम्मेलन में भी भारत और कनाडा के बीच आई दरार साफ नजर आई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा में सिख अलगाववादियों के ‘आंदोलन’ और भारतीय राजनयिकों के खिलाफ हिंसा को उकसाने वाली घटनाओं को ले कर नाराजगी जताई थी, जिस पर कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो ने जवाब दिया था कि भारत कनाडा की घरेलू राजनीति में दखल न दे.
जी20 समिट के बाद जस्टिन ट्रूडो 12 सितंबर को कनाडा वापस गए और जैसे ही वे अपने देश पहुंचे, वहां से खबर आई कि कनाडा ने भारत के साथ ट्रेड मिशन को रोक दिया है. दरअसल, कनाडा में बसे सिखों को ट्रूडो अपने साथ ले कर चलना चाहते हैं, इसीलिए वे खालिस्तानियों का भी खुल कर समर्थन कर रहे हैं.
खालिस्तान समर्थकों ने निज्जर की हत्या के खिलाफ कनाडा के टोरंटो और लंदन, मेलबर्न सहित सैन फ्रांसिस्को जैसे कई शहरों में प्रदर्शन किए. खालिस्तान का समर्थन करने वाले निज्जर पहले ऐसे अलगाववादी नहीं हैं जिन की हत्या की गई है, भारत सरकार की ओर से आतंकवादी घोषित किए गए परमजीत सिंह पंजवाड़ की भी मई में लाहौर में हत्या कर दी गई थी.
बिहार के बेगूसराय के सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का कहना है कि- ‘हिंदुओं को साजिश के तहत ‘हलाल’ मीट खिलाया जा रहा है, जिस से उन का धर्म भ्रष्ट हो रहा है.’ उन्होंने हिंदू समुदाय के लोगों से अपील की कि वे लोग ‘हलाल’ मीट न खाएं. जो भी हिंदू मीट खाते हैं वे ‘झटका’ मीट खाएं.
गिरिराज सिंह ने कहा कि वे खुद भी ‘झटका’ मीट खाते हैं. इस के साथ ही उन्होंने कहा कि इन दिनों मंदिरों में बलिप्रथा पर रोक लगाने की साजिश की जा रही है, जबकि यह बलिप्रथा हिंदू धर्म का अहम हिस्सा है.
इस के साथ ही गिरिराज सिंह ने कुर्बानी पर भी सवाल उठाए. मंत्री ने कहा कि अगर हिंदू के द्वारा दी जा रही बली अगर बली है तो फिर मुसलमान जो बकरों की कुर्बानी करते हैं, उस पर भी रोक लगनी चाहिए. सरकार को इस पर रोक लगानी चाहिए. उन्होंने बिहार की नीतीश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि वोट की राजनीति करने वाली सरकार ऐसा नहीं कर सकती.
गिरिराज सिंह ने अपने भाषण में आगे कहा कि कोई भी मुसलमान हिंदुओं के घर पर बना मीट नहीं खाएगा. लेकिन हिंदू लोग उन के घर बना ‘हलाल’ मीट खा लेते हैं जिस से हिंदुओं का धर्म भ्रष्ट हो रहा. उन्होंने कहा कि राज्य की नीतीश सरकार को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. उसे, बस, अपने वोटबैंक से मतलब है.
गिरिराज सिंह ने सड़क के किनारे मीट काटने पर भी एतराज जताते कहा कि सड़क के किनारे मीट काटने से आसपास गंदगी फैलती है. इस से साफसफाई पर असर पड़ता है. ऐसे में सड़क के किनारे खुले में मीट काटने पर बैन लगाना चाहिए.
गिरिराज सिंह हलाल मामले पर पहले भी कई सवाल उठा चुके हैं. कुछ दिनों पहले उन्होंने हलाल सामान को बैन करने की मांग की थी. गिरिराज केंद्र सरकार में मंत्री हैं. वे बिहार में केवल बयान दे सकते हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं, वे हलाल को ले कर गंभीर हैं. ‘हलाल प्रमाणपत्र’ देने वालों के खिलाफ अभियान चला कर उस को बंद कर रहे हैं.
खानपान को नियंत्रित न करें धर्म
खानपान इंसान का अपना अधिकार है. यह बात केवल संविधान की ही नहीं, मौलिक अधिकारों की भी है. धर्म हमेशा से ही खाने को नियंत्रित करता रहा है. ‘हलाल’ और ‘झटका’ दोनों ही शब्द मीट के खाने से जुड़े हैं. इन दोनों का ही मतलब जानवर काटने की विधि से जुड़ा है.
‘झटका’ में जानवर की गरदन एक बार में ही काट दी जाती है. ‘हलाल’ में जानवर की गरदन को धीरेधीरे काटा जाता है. ‘हलाल’ विधि से काटे गए जानवर का मांस खाना ही इसलाम धर्म के अनुसार सही माना जाता है. गैरमुसलिम ‘हलाल’ की जगह ‘झटका’ मीट खाने को सही मानते हैं.
‘हलाल’ के समर्थक कहते हैं कि ‘झटका’ मीट खाने में नुकसान करता है, क्योंकि एक झटके में जब गरदन काटी जाती है तो तमाम सारा ब्लड अंदर रह जाता है जो मीट खाने वाले को नुकसान करता है. जबकि ‘हलाल’ में ब्लड धीरेधीरे बहता है, तो बाहर निकल जाता है. इस से वह खाने वाले को नुकसान नहीं करता है.
‘झटका’ खाने वालों का तर्क है कि ‘हलाल’ विधि में जानवर तड़पतड़प कर मरता है, ऐसे में उस का मीट खाना सही नहीं होता. इस तरह से गैरमुसलिम ‘झटका’ विधि से काटे गए मीट को सही मानते हैं. शुरुआत से ही धर्म खाने को नियंत्रित करता रहा है.
बीफ के मीट को खाने और न खाने के पीछे भी धर्म का ही विवाद है. इस को ले कर झगड़े होते रहते हैं. भारत के ही तमाम उत्तरपूर्व राज्यों में बीफ खाया जाता है, जबकि दूसरे राज्यों में धार्मिक कारणों से बीफ खाने से मना किया जाता है.
इन राज्यों के मुसलिम भी अब बीफ खाना पसंद नहीं करते. मीट की बात तो छोड़िए, हमारे समाज में तो धर्म कई बार लहसुन और प्याज खाने पर भी प्रतिबंध लगाता है. जैन धर्म में लहसुन और प्याज खाने की मनाही है. दाल में छोंक लगाने के लिए लहसुन और प्याज की जगह पर जीरा का छोंक लगाया जाता है.
खाना मौलिक अधिकार है
खाना इंसान का मौलिक अधिकार है. यह रहनसहन और वातावरण पर निर्भर करता है. कई जगहों का वातावरण ऐसा होता है कि जहां बिना मीट खाए रहना संभव नहीं होता है. इस के लिए पहाड़ी इलाकों को देखा जा सकता है. वहां मीट खाना जरूरत होता है. इस के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती. रेगिस्तान के ऐसे इलाके जहां कोई फसल नहीं होती वहां भी बिना मीट खाए नहीं रहा जा सकता. जो जानवर वहां होता है वहां के लोग उस का मीट खाना पसंद करते हैं. जिन इलाकों में आनाज पैदा होता है वहां लोगों के पास औप्शन होते हैं. ऐसे में वे मीट खा भी सकते हैं और नहीं भी खा सकते.
किसी खाने पर धर्म और सरकार का प्रतिबंध मौलिक और मानवाधिकार का हनन करने वाला होता है. इस से किसी समाज और देश का भला नहीं हो सकता. धर्म का कट्टरपन जिन भी देशों में है वे बरबादी की राह पर चल रहे हैं. इजराइल, सीरिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देश इस के उदाहरण हैं.
धर्म के प्रतिबंध के बाद भी भारत इसलिए तरक्की कर रहा है क्योंकि यहां जनसंख्या अधिक है. जिस में से बहुत से भारतीय हिंदू मजदूर विदेशों में गैरधर्म के देशों में रह कर पैसा कमा रहे हैं और कमाई भारत में भेज रहे हैं. भारत सरकार इसी विदेशी करैंसी के बल पर फूल कर कुप्पा हो रही है कि हमारा विदेशी मुद्रा भंडार कितना फलफूल रहा है.
पाकिस्तान और बंगलादेश की तुलना करें तो कट्टरपन में बंगलादेश पाकिस्तान के पीछे हो गया है. बंगलादेश लगातार तरक्की की राह पर है. वहां का तैयार कपड़ा बड़ी तादाद में भारत के बाजारों में बिक रहा है. आज जो सस्ते किस्म का कपड़ा भारत में गरीबों की जरूरत को पूरा कर रहा है, वह बंगलादेश से ही बन कर आ रहा है. कट्टरपन पर चल रहा पाकिस्तान बंगलादेश से पिछड़ गया है.
भारत भी जिस तरह से धार्मिक कट्टरपन पर आगे बढ़ रहा है उस का नुकसान देश को उठाना पड़ेगा. गिरिराज सिंह जैसे लोग धार्मिक भावनाओं को उकसा कर वोट ले सकते हैं पर उन की इस तरह की नीतियों से देश पिछड़ जाएगा.
धर्म के कट्टरवादी लोग देश को जेल की तरह बनाना चाहते हैं, जहां खानेपीने का मैन्यू जेलर तय करता है. उसी तरह से कट्टरवादी यह चाहते हैं कि देश के लोग क्या खाएं, क्या पहनें यह वे तय करें. धार्मिक कट्टरपन समाज और इंसान को आगे नहीं बढ़ने देता. लोग क्या खाएं, यह तय करने का अधिकार उन का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है. धर्म और सरकार को इस में अड़ंगा नहीं डालना चाहिए.
जिस सुरक्षा व्यवस्था के साथ हाल ही मेंधर्म, धार्मिकता और पूरे ‘आडंबर’ के साथ नए ‘संसद भवन’ का उद्घाटन बड़ेबड़े तांत्रिक पंडितों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, वह सुरक्षा कवच कहां है कि संसद में घुसपैठ कांड हो गया. सच तो यह है कि वह सुरक्षा कवच पूरी तरह निरर्थक हो गया जिसे दुनिया ने अब देख लिया.
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर अगर ‘बाधा विनाशक’ कोई पूजापाठ-तंत्रमंत्र क्रिया की होती तो, शायद, संसद में इस तरह की घटना कभी हो ही न सकती थी. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस तरह के पूजापाठ, तंत्र, आडंबर से सुरक्षा को कोई फर्क नहीं पड़ता.
यह बात सही है कि प्रधानमंत्री ने देशदुनिया को यह दिखाने की प्रयास किया कि वे बहुत बड़े हिंदू धर्मवादी, चहेते प्रधानमंत्री हैं. वे राजनीतिक सफलता के लिए देशप्रदेश के भीतर अपने वोटबैंक को कामयाब बनाने में कहीं न कहीं सफल हो रहे हैं. जिस का प्रत्यक्ष उदाहरण है हाल में 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में से 3 राज्यों में मिली सफलता.
यह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है कि संसद में एक बार फिर 13 दिसंबर को संसद में हुए हमले के बरसी के दिन ही कांड हो गया. और सारी दुनिया में देश की सरकार व उस के द्वारा तैयार की गई देश की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लग गया.
13 दिसंबर, 2001 का यह वह दिन था जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय आतंकी घुसपैठ हुई थी और अब 13 दिसंबर, 2023 का वह दिन था जब भाजपा के बड़े चेहरे बन चुके नरेंद्र मोदी की सरकार है और संसद में घुसपैठ हो गई, भवन धुआंधुआं हो गया, अफरातफरी मच गई.
दरअसल, जहां वीवीआईपी स्थितियां हों, सुरक्षा के सारे मानकों का पालन किया जाता हो, जहां कोई परिंदा भी पर भी न मार सकता हो ऐसा माना जाता है, वहां सुरक्षा में सेंध एक बड़ा प्रश्न है, जिस का जवाब देश के गृहमंत्री को देना चाहिए, प्रधानमंत्री को स्वस्फूर्त देना चाहिए.
मगर संसद और सड़क दोनों ही मौन हैं और जब सांसद जवाब मांगते हैं तो उन पर निष्कासन की बिजली गिरा दी जाती है. इन स्थितियोंको किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं कहा जा सकता. एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में सबकुछ खुला होना चाहिए, पारदर्शिता होनी चाहिए. मोदी के सत्तासीन हो जाने के बाद 2014 से ही देश में उलटी गंगा बह रही है.
सुरक्षा चूक के बाद संसद की कार्यवाही रही हंगामेदार
विपक्षी सदस्यों ने सुबह 11 बजे से ही लोकसभा और राज्यसभा में अध्यक्षीय आसन के समीप आ कर प्रधानमंत्री के संसद में जवाब और गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ नारेबाजी की. परिणामस्वरूप,‘आसन’ की अवमानना और अनादर का आरोप लगाते हुए सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष के 14 सांसदों को मौजूदा शीतकालीन सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया.
इस में लोकसभा के 13 और राज्यसभा का एक सांसद शामिल हैं. लोकसभा में सांसदों के निलंबन का प्रस्ताव संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी व राज्यसभा में सदन के नेता पीयूष गोयल ने रखा, जिसे दोनों सदनों में ध्वनिमत से पारित किया गया. निलंबन के साथ ही संसद की कार्यवाही को स्थगित कर दिया गया. हालांकि, इस के बाद भी विपक्षी सांसद अध्यक्षीय आसन के पास आ कर कुछ देर तक हंगामा व नारेबाजी करते रहे.
14 सांसदों में लोकसभा के 13 और राज्यसभा के एक सांसद शामिल हैं. लोकसभा से निलंबित किए गए सांसदों में कांग्रेस के 9 सांसद, माकपा के 2, द्रमुक के एक और भाकपा के एक सासंद शामिल हैं.
सरकार ने संसद में कहा, “लोकसभा में बुधवार को सुरक्षा चूक की घटना के मामले में उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी गई है और विपक्ष को इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करनी चाहिए.”
लोकसभा की कार्यवाही एक बार के स्थगन के बाद अपराह्न 2 से जब शुरू हुई तो विपक्षी सदस्यों ने सदन में सुरक्षा की चूक संबंधी घटना पर नारेबाजी शुरू कर दी.
इसी बीच, संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी नोशी ने कहा, “हम सब सहमत हैं कि कल की दुर्भाग्यपूर्ण घटना सदस्यों की सुरक्षा के लिहाज से गंभीर थी.”
उन्होंने कहा,“लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घटना के तत्काल बाद सभी दलों के सदन के नेताओं की बैठक बुलाई और संसद की सुरक्षा को और पुख्ता करने के लिए सब के सुझाव सुने.”
जोशी ने कहा कि सांसदों के कुछ सुझावों को लागू किया जा चुका है और लोकसभा अध्यक्ष ने आज स्वयं कहा है कि सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए भविष्य में और भी कदम उठाए जाएंगे. मगर सब से बड़ी बात यह है कि सब की सुरक्षा को ले कर जिस तरह नरेंद्र मोदी सरकार को गंभीर होना चाहिए वह कहीं से भी दिखाई नहीं दे रहा है.
यह भी महत्त्वपूर्ण तथ्य कि नईनई बनी संसद के बिल्डिंग में हुई यह घटना संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर चुकी है और अगर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो आगामी समय में इस के दुष्परिणाम भी आ सकते हैं.
भारत में स्वास्थ्य समस्याओं के पीछे अनेक कारण होते हैं लेकिन हमारा पैदल न चलना एक बड़ा कारण है. पैदल न चलने के चलते हमें कई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है. इस बारे में स्वास्थ्य संबंधी जानकार क्या कहते हैं, जानें. चलने के विषय में तरहतरह की कहावतें प्रचलित हैं, जैसे कि ‘चलना ही जिंदगी है’, ‘चलने का नाम जिंदगी’, ‘जितना चलोगे उतना चलोगे’, ‘जीवन चलने का नाम’ आदि. एक जमाना था जब लोग हाट बाजार, रिश्तेदारों के यहां जाने, मेला देखने, कार्यालय अथवा विद्यालय जाने जैसे उद्देश्यों से 5-10 किलोमीटर पैदल ही चले जाया करते थे. आज भौतिक सुखसुविधाओं ने हमारा चलना लगभग बंद कर दिया है. छोटीछोटी दूरियां तय करने के लिए साइकिल, बाइक, यहां तक कि कार का सहारा लिया जाता है. महानगरों में अकसर देखा गया है कि लोग अपने पालतू कुत्तों को सुबहशाम दैनिक निवृत्ति के लिए भी मोटरकार या अन्य वाहनों का सहारा लेते हैं.
3 से 4 मंजिल वाले भवनों में आनेजाने के लिए सीढि़यों के बजाय लिफ्ट का उपयोग करना आम हो गया है. इन सुविधाओं ने हमारे दैनिक कार्यों को सुलभ तो बनाया है परंतु इस के साथसाथ हमारे स्वास्थ्य को बहुत प्रभावित किया है. अब तो शहरों में ही नहीं, गांवों में भी डायबिटीज यानी मधुमेह, मोटापा, पाचन संबंधी समस्याएं, कब्ज, अनिद्रा, थायराइड, हार्मोन का असंतुलन, तनाव, हाई ब्लडप्रैशर, हृदयरोग जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं आम हो गई हैं. पहले ये सभी स्वास्थ्य समस्याएं बड़ी उम्र के लोगों में देखी जाती थीं परंतु आरामतलबी और कार्यसंबंधी तनाव के कारण आज की युवा पीढ़ी भी इन समस्याओं से जू झ रही है. वैसे तो स्वास्थ्य समस्याओं के पीछे और भी कई कारण होते हैं परंतु हमारा नहीं चलना भी एक प्रमुख कारण है. चलना एक प्राकृतिक स्वास्थ्य बीमा यदि हम अपने दैनिक कार्यों में चलने को शामिल करते हैं तो हमारा हृदय बेहतर तरीके से कार्य करता है.
दिल का दौरा पड़ने का खतरा कम हो जाता है. शरीर के विभिन्न अंगों में रक्त वाहिकाओं के साथसाथ सूक्ष्म रक्त नलिकाओं, जिन्हें हम कैपिलरीज कहते हैं, के माध्यम से रक्त का संचरण बेहतर होता है. इस से अल्जाइमर रोग का खतरा कम हो जाता है, जीवन अवधि बढ़ जाती है और एक स्वस्थ जीवनयापन होता है. चलने के दौरान आए पसीने के माध्यम से शरीर के टौक्सिंस बाहर निकल जाते हैं. पैदल चलना हमारे रक्तचाप को नियंत्रण में रखता है, रात में बहुत अच्छी नींद आती है. नियमित पैदल चलना बड़ी आंत और स्तन कैंसर को रोकता है, हमारी हड्डियां मजबूत होती हैं, थकान कम होती है. इन के अलावा शारीरिक व मानसिक गतिविधियां बेहतर तरीके से संपन्न होती हैं. नियमितरूप से पैदल चलने के परिणामस्वरूप शरीर में अच्छे कोलैस्ट्रौल का स्तर बढ़ता है जबकि खराब कोलैस्ट्रौल कम होता है. रक्त शर्करा यानी रक्त में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रहता है.
शरीर का वजन भी नियंत्रित रहता है. मानसिक अवसाद यानी डिप्रैशन, चिंता और तनाव जैसी घातक स्थितियां नियंत्रित रहती हैं. हमारी मांसपेशियों की ताकत बेहतर होती है. हमारे जोड़ लचीले रहते हैं. आत्मविश्वास बढ़ता है. शरीर की इम्यूनिटी यानी प्रतिरक्षा शक्ति में सुधार आता है. पैदल चलना सभी आयु के लोगों और पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए बहुत ही लाभकारी होता है. हम पैदल चलते हैं तो नएनए लोगों के संपर्क में भी आते हैं. इस तरह हम कह सकते हैं कि नियमितरूप से पैदल चलना एक प्राकृतिक स्वास्थ्य बीमा से कम नहीं है. पैदल चलने की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कोई भी व्यक्ति किसी भी आयु में नियमितरूप से पैदल चलना आरंभ कर सकता है. चलने की शुरुआत करने से पहले 10 मिनट तक हलका व्यायाम किया जाना चाहिए. ध्यान रहे, यदि आसपास का परिवेश बहुत ठंडा हो या बहुत गरम, तो उन स्थितियों में पैदल चलने से बचना चाहिए. इन स्थितियों में चलने से पहले उपयुक्त कपड़े पहन कर शरीर को सुरक्षित रखना जरूरी होता है.
पैदल चलने का क्षेत्र निर्मल, हराभरा और प्रदूषण रहित होना चाहिए. आसपास तालाब, नदी, झरना या समुद्र का किनारा हो तो बेहतर होता है. 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को नियमितरूप से पैदल चलने की शुरुआत करने से पहले चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए, खासकर ऐसे लोगों को जो मधुमेह से पीडि़त हों. पैदल चलने के दौरान शरीर में ग्लूकोस की कमी होने जैसी स्थिति पैदा होती है जो एक गंभीर समस्या बन जाती है. सो, ऐसे व्यक्तियों को साथ में 200 मिलीलिटर पानी, 2 बिस्कुट और 10 ग्राम ग्लूकोस अपनी जेब में रख कर ही बाहर निकलना चाहिए. दमा की शिकायत वाले व्यक्तियों को पैदल सैर पर जाने पर साथ में इनहेलर्स रखना बहुत जरूरी होता है. इन के अलावा पैदल सैर पर जाने वाले व्यक्ति को आरामदेह जूते और कौटन के कपड़े पहनने चाहिए. ट्रेडमिल पर चलना कई बार घर के बाहर पैदल चलने के लिए मौसम अनुकूल नहीं होता. अत्यधिक सर्दी, गरमी अथवा बरसात के मौसम में घर के अंदर ट्रेडमिल पर चलना एक अच्छा विकल्प होता है.
ट्रेडमिल पर चलने से पहले उसे कैसे औपरेट करना है, इस की जानकारी सुनिश्चित की जानी चाहिए. यह भी जानना चाहिए कि इसे कैसे बंद किया जाए या इस की गति को कैसे बदला जाए. कैसे करें पैदल सैर सब से महत्त्वपूर्ण यह है कि मनमस्तिष्क में स्वस्थ रहने के लिए पैदल चलने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए. पहले 3 से 5 मिनट तक धीमे चलना चाहिए. उस के बाद चलने की गति बढ़ाएं और 12 से 15 मिनट तक उसी गति में चलें. फिर 3 से 5 मिनट चलने की गति कम करें और उस के बाद रुक जाएं. शुरुआत के 4 से 5 दिनों तक आप की पेशियों में दर्द हो सकता है लेकिन बाद में वह दूर हो जाएगा. पहले दिन सिर्फ 5 मिनट चलें. उस के बाद प्रत्येक तीसरे दिन 3-3 मिनट अधिक चलें. चलने की अवधि तब तक बढ़ाएं जब तक कि आप प्रत्येक दिन 30 मिनट न चलने लगें. यदि किसी प्रकार की असुविधा हो तो पैदल चलना बंद कर दें, आराम से बैठें और 2 घूंट पानी पिएं. बेहतर होगा पैदल चलने के समय आप के साथ कोई हो.
लेकिन तेज गति से चलने के दौरान बातें नहीं करें, बल्कि प्रकृति के सान्निध्य का आनंद लें. चलने की जगह समतल होनी चाहिए. परंतु मोटापासहित व्यक्तियों को बालूयुक्त मैदान पर चलना फायदेमंद होगा. संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित ‘द सैंटर्स फौर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवैंशन’ यानी सीडीसी की सिफारिश है कि सप्ताह में 150 मिनट या इस से अधिक औसत गति के साथ चलने अथवा 75 मिनट तेजी से चलने पर हमारा संपूर्ण स्वास्थ्य अच्छा रहता है और रोग के खतरे में कमी आ जाती है. इस दिशानिर्देश के आधार पर आप सप्ताह में 5 बार 30 मिनट पैदल चलने का कार्यक्रम बना सकते हैं. क्या सावधानियां बरतें हृदयगति दर की ऊपरी सीमा : 220 अंक में आप की आयु घटाने पर प्राप्त अंक आप की हृदयगति की ऊपरी सीमा होगी. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति की आयु 60 वर्ष है तो 220 में 60 घटाने पर प्राप्त 160 अंक व्यक्ति की हृदयगति दर की ऊपरी सीमा होगी. यदि आप की हृदयगति की ऊपरी सीमा 50 से 70 प्रतिशत तक पहुंचती है तो भी डरने की आवश्यकता नहीं.
मधुमेहग्रस्त या मोटापाग्रस्त कोई व्यक्ति यदि प्रतिदिन 40 से 45 मिनट थोड़ी तेजी से चले तो 3 से 4 महीने के भीतर बहुत अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं. चलने के दौरान क्या होता है 1-5 मिनट : जब आप तेज कदमों से चलते हैं तो कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करने वाले तंत्रिका रसायन तैयार होते हैं, जो शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं. हृदय की गति 70 से 100 बीट (स्पंदन) के बीच हो सकती है. इस स्थिति में चलने के लिए पेशियां तैयार रहेंगी. जोड़ों में सायनोवियल फ्लुएड नामक एक चिपचिपी सामग्री का स्राव होता है जो हमारे जोड़ों को लचीला बनाती है. जब हम आराम करते हैं तो प्रतिमिनट एक कैलोरी ऊर्जा इस्तेमाल होती है, इस स्थिति में प्रतिमिनट 5 कैलोरी इस्तेमाल होगी.
शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा वसा से प्राप्त होती है. 6-10 मिनट : इस अवधि में हृदय की गति 100 से 140 के बीच होगी. इस अवस्था में 6 कैलोरी प्रति?मिनट इस्तेमाल होती है. रक्त वाहिकाएं शिथिल होती हैं और उन में ल्यूमेन बढ़ जाता है. सभी कोशिकाओं में रक्त का संचरण बेहतर होता है, रक्त में औक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और रक्त संचरण बढ़ने के साथ सभी कोशिकाओं को पोषक तत्त्व बेहतर तरीके से मिलते हैं. 11-20 मिनट : इस अवधि में थकान के कारण तापमान बढ़ जाता है. पसीने के साथ टौक्सिंस अच्छी तरह से बाहर निकल जाते हैं. आप की श्वास प्रक्रिया तेज हो जाती है.
यदि आप 3 से 4 महीने तक प्रतिदिन 20 मिनट पैदल चलना जारी रखते हैं तो आप के फेफड़ों की क्षमता बढ़ जाती है. मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए एपीनेफ्रीन और ग्लुकागोन जैसे हार्मोन उत्पन्न होते हैं. 20-25 मिनट : इस अवस्था में आप अपने को फुर्तीला महसूस करते हैं. यदि कोई व्यक्ति 6 सप्ताह तक प्रतिदिन 25 मिनट पैदल चलता है और यह प्रक्रिया जीवनपर्यंत जारी रखता है तो मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक हार्मोन उत्पन्न होता है जिस से अवसाद, चिंता और तनाव की स्थितियां कम होती हैं. जैसेजैसे शरीर में कैलोरी जलती है वैसेवैसे इंसुलिन हार्मोन की प्रभावकारिता बढ़ जाती है. यदि आप 25 से 30 मिनट तक चलने के बाद रुक जाते हैं तो अगले एक घंटे तक आप के शरीर की कैलोरी जल जाती है. यह स्थिति मधुमेह, हाइपर थायराइड और मोटापा से पीडि़त व्यक्तियों के लिए वरदान होती है.
चलने के संबंध में भ्रांतियां लोगों का मानना है कि आयु बढ़ने के साथ व्यायाम करने की जरूरत नहीं पड़ती. यह सब से बड़ी भ्रांति है. वास्तव में वृद्ध लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं जिस के कारण उन्हें नियमितरूप से व्यायाम करने की जरूरत होती है. प्रतिदिन चलने के साथ उन की मांसपेशियों व जोड़ों में लचीलापन बना रहता है. आर्थ्राइटिस यानी संधिशोथ की विकास प्रक्रिया धीमी हो जाती है. परंतु उन लोगों को कड़े व्यायाम नहीं करने चाहिए. एक भ्रांति यह भी है कि व्यायाम करने से थकान हो जाती है. वास्तव में 6 सप्ताह तक प्रतिदिन 25 मिनट व्यायाम करने से थकान की समस्या कम हो जाती है. शरीर की फिटनैस बढ़ जाती है, वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है तथा अवसाद की स्थिति में गिरावट आती है. लोगों का यह भी मानना है कि व्यायाम करना समय का दुरुपयोग होता है. लेकिन ऐसा नहीं होता है.
वास्तव में अनेक स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के साथसाथ अस्पताल में भरती हो कर महंगा इलाज कराने तथा अपने घर एवं परिवार से दूर रहने से बचने के लिए यह एक वास्तविक निवेश होता है. पैदल सैर करने के लिए सुबह का समय शाम की अपेक्षा बेहतर होता है क्योंकि सुबह के परिवेश में प्रदूषण का स्तर कम होता है और हमारा शरीर 6 से 8 घंटे तक बिस्तर पर निष्क्रिय रहता है. वैसे स्वस्थ रहने के लिए हमें नियमित रूप से पैदल चलना चाहिए और व्यायाम करना चाहिए परंतु सप्ताह में 6 दिन 25 मिनट पैदल सैर करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है. मधुमेह, मोटापा और आर्थ्राइटिस से पीडि़त व्यक्तियों को सप्ताह में 6 दिन 30 से 40 मिनट पैदल चलना उन्हें स्वस्थ बनाए रखने के लिए बेहतर होता है. इन स्थितियों में पैदल चलने से बचें यदि किसी व्यक्ति के सीने में दर्द होने की शिकायत हो, सांस लेने में तकलीफ हो,
अधिक पसीना आता हो, थकान हो जाती हो, शारीरिक संतुलन बाधित हो तो इन स्थितियों में पैदल सैर करने की सलाह नहीं दी जाती. एक सुशिक्षित चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए. विश्व के अनेक भागों में पैदल सैर करने वाले लोगों के हजारों वर्गों पर संपन्न अध्ययनों से समाज में रोगभार को कम करने में बहुत अनुकूल परिणाम मिले हैं. आइए, हम पैदल चलें और विश्व से मधुमेह नामक घातक बीमारी को दूर भगाएं. द्य चलने से संबंधित सावधानियां भोजन ग्रहण करने के तुरंत बाद पैदल सैर नहीं करनी चाहिए. अच्छे परिणाम के लिए प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर नियमितरूप से पैदल चलना चाहिए.
मधुमेह से पीडि़त व्यक्तियों को अपने आहार पर नियंत्रण के साथ प्रतिदिन 40 मिनट पैदल सैर करना आवश्यक होता है. यदि कोई व्यक्ति नियमितरूप से प्रतिदिन 30 मिनट पैदल चलता है तो वह स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. पहले कम दूरी तक चलने की शुरुआत करें और फिर प्रत्येक तीसरे दिन 300 मीटर की दूरी बढ़ाएं. इस से शरीर के सभी अंगों के कार्य में सुधार आता है. नियमितरूप से पैदल चलने के परिणामस्वरूप मधुमेह सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मदद मिलती है.