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Hindi Social Story : वह सांवली लड़की – कैसे बनाई चांदनी ने अपनी पहचान ?

Hindi Social Story : रंग पक्का सांवला और नाम हो चांदनी, तो क्या सोचेंगे आप? यही न कि नाम और रूपरंग में कोई तालमेल नहीं. जिस दिन चांदनी ने उस कालेज में बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया, उसी दिन से छात्रों के जेहन में यह बात कौंधने लगी. किसी की आंखों में व्यंग्य होता, किसी की मुसकराहट में, कोई ऐसे हायहैलो करता कि उस में भी व्यंग्य जरूर झलकता था.

चांदनी सब समझती थी. मगर वह इन सब से बेखबर केवल एक हलकी सी मुसकान बिखेरती हुई सीधे अपनी क्लास में चली जाती. केवल नाम और रंग ही होता तो कोई बात नहीं थी, वह तो ठेठ एक कसबाई लड़की नजर आती थी. किसी छोटेमोटे कसबे से इंटर पास कर आई हुई. बड़े शहर के उस कालेज के आधुनिक रूपरंग में ढले हुए छात्रछात्राओं को भला उस की शालीनता क्या नजर आती.

हां, 5-7 दिन में ही पूरी क्लास ने यह जरूर जान लिया था कि वह मेधावी भी है. बोर्ड परीक्षा की मैरिट लिस्ट में अपना स्थान बनाने वाली लड़की. इस बात की गवाही हर टीचर का चेहरा देने लगता, जो उस का प्रोजैक्ट देखते. वे कभी प्रोजैक्ट की फाइल देखते, तो कभी चांदनी का चेहरा. रंगनाथ क्लास का मुंहफट छात्र था. एक दिन वह चांदनी से पूछ बैठा, ‘‘मैडम, क्या हमें बताएंगी कि आप कौन सी चक्की का आटा खाती हैं?’’

चांदनी कुछ नहीं बोली. बस, चुपचाप उसे देख भर लिया. तभी नीलम के मुंह से भी निकला, ’’हां, हां, जरूर बताना ताकि हम भी उसे खा कर अपने दिमाग को तरोताजा रख सकें.’’ रंगनाथ और नीलम की ये फबतियां सुन पूरी क्लास ठहाका मार कर हंसने लगी. लेकिन चांदनी के चेहरे का सौम्यभाव इस से जरा भी प्रभावित नहीं हुआ. वह मुसकरा कर केवल इतना बोली, ‘‘हां, हां, क्यों नहीं बताऊंगी, जरूर बताऊंगी,’’ फिर उस का ध्यान अपनी कौपी पर चला गया.

चांदनी गर्ल्स होस्टल में रहती थी. वह छुट्टी का दिन था. लड़कियां होस्टल के मैदान में वौलीबौल खेल रही थीं. कुछ हरी घास पर बैठी गपशप कर रही थीं, तो कुछ मिलने आए अपने परिजनों से बातचीत में व्यस्त थीं. साथ आए बच्चे हरीहरी घास पर लोटपोट हो रहे थे. वहीं कौरीडोर में एक किनारे कुरसी पर बैठी होस्टल वार्डन रीना मैडम सारे दृश्य देख रही थीं. उन के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी. इन सारे दृश्यों को देखते हुए भी उन की आंखें जैसे कहीं और खोई हुई थीं. उन का हमेशा प्रसन्न रहने वाला चेहरा, इस वक्त चिंता में डूबा हुआ था. कौरीडोर में लड़कियां इधर से उधर भागदौड़ मचाए हुए थीं. मगर शायद किसी का भी ध्यान रीना मैडम पर नहीं गया. अगर गया भी हो तो किसी ने उन के चेहरे की उदासी के बारे में पूछने की जरूरत नहीं समझी. अचानक रीना मैडम के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा. उन्होंने सिर उठा कर देखा, वह चांदनी थी, ‘‘कहां खोई हुई हैं, मैडम? आप की तबीयत तो ठीक है न,’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. मैं ठीक हूं चांदनी,’’ रीना मैडम बोलीं. ‘‘नहीं मैडम. कुछ तो है. छिपाइए मत, आप का चेहरा बता रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं.’’

रीना मैडम की आंखें नम हो आईं. चांदनी के शब्दों में न जाने कैसा अपनापन था कि उन से बताए बिना नहीं रहा गया. वे अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को आंचल से पोंछती हुई भरे गले से बोलीं, ‘‘चांदनी, कुछ देर पहले ही मेरे घर से फोन आया है कि मेरे बेटे की तबीयत ठीक नहीं है. वह मुझे बहुत याद कर रहा है. मैं कुछ समय के लिए उसे यहां लाना चाहती हूं. लेकिन यहां मैं हर समय तो उस के पास रह नहीं सकती. घर से कोई और आ नहीं सकता. ऐसे में कौन रहेगा, उस के पास?’’ ‘‘बस, इतनी सी बात के लिए आप परेशान हैं. मैडम, बस समझ लीजिए कि आप की प्रौब्लम दूर हो गई. उदासी और चिंता को दूर भगाइए. घर जा कर बच्चे को ले आइए.’’

‘‘मगर कैसे?’’ ‘‘मैं हूं न यहां,’’ चांदनी बोली.

रीना मैडम ने उस का हाथ पकड़ लिया. वे चकित हो कर उसे देखती भर रहीं. उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ. क्या होस्टल की एक सामान्य छात्रा इतना आत्मीय भाव प्रकट कर सकती है. आज ऐसा पहली बार हुआ था, पर चांदनी की आंखों से झांकती निश्छलता कह रही थी, ‘हां, मैडम, यह सच है. मुझे हर किसी के दर्द और चिंता की पहचान हो जाती है.’ रीना मैडम की आंखों में एक बार फिर आंसू छलक आए. ‘‘न…न…न… मैडम, आप की ये आंखें आंसू बहाने के लिए नहीं हैं. जो मैं ने कहा है उसे कीजिए,’’ चांदनी इस बार स्वयं अपने रूमाल से उन के आंसू पोंछती हुई बोली.

धीरेधीरे साल बीत गया. चांदनी बीए द्वितीय वर्ष में पहुंच गई. वह टैलेंटेड तो थी ही, उस के व्यवहार ने भी अब तक कालेज में उस की अपनी एक अलग पहचान बना दी थी. मगर रंगनाथ जैसे साहबजादों को अभी भी यह सब चांदनी का एक ढोंग मात्र लगता था. अब भी वे मौका मिलने पर उस पर व्यंग्य करने से नहीं चूकते थे.

नया सत्र शुरू होते ही हमेशा की तरह इस बार भी अपनीअपनी कक्षाओं में प्रथम आए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित करने की घोषणा हुई. इस में उन छात्रछात्राओं को अपने अभिभावकों को भी साथ लाने के लिए कहा जाता था. चांदनी अपनी कक्षा में प्रथम आई थी. रंगनाथ के लिए चांदनी पर फबती कसने का यह अच्छा मौका था. उस ने अपने दोस्तों से कहा, ‘‘चलो, अच्छा है. इस बार हमें भी मैडम के मम्मीपापा के दर्शन हो जाएंगे.’’

मम्मीपापा, ‘‘अरे, बेवकूफ, मैडम तो गांव से आई हैं. वहां मम्मीपापा कहां होते हैं,’’ एक दोस्त बोला. ‘‘फिर?’’ रंगनाथ ने पूछा.

‘‘अपनी अम्मां और बापू को ले कर आएंगी मैडम,’’ दोस्त के इस जुमले पर पूरी मित्रमंडली खिलखिला पड़ी. ‘‘चलो, तब तो यह भी देख लेंगे कि मखमल की चादर पर टाट का पैबंद कैसा नजर आता है,’’ रंगनाथ इस पर भी चुटकी लेने से नहीं चूका.

समारोह के दिन प्राचार्य और स्टाफ के साथ शहर के कुछ गण्यमान्य लोग भी स्टेज पर बैठे हुए थे. प्राचार्य ने सब लोगों के स्वागत की औपचारिकता पूरी करने के बाद एकएक कर सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को स्टेज पर बुलाना शुरू किया. चांदनी का नाम लेते ही पूरे कालेज की नजरें उधर उठ गईं. चांदनी एक अधेड़ उम्र की औरत का हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हुई धीरेधीरे स्टेज की ओर बढ़ रही थी. वह एक सामान्य हिंदुस्तानी महिला जैसी थी. वहां उपस्थित दर्जनों सजीसंवरी शहरी महिलाओं से बिलकुल अलग. मगर सलीके से पहनी सफेद साड़ी, खिचड़ी हुए बालों के बीच सिंदूरविहीन मांग, थकी हुई दृष्टि के बावजूद सजग आंखें, चेहरे पर झलकता उस का आत्मविश्वास. लेकिन साधारण होते हुए भी उन के व्यक्तित्व में गजब का आकर्षण था. वह चांदनी की मां थी. वहां उपस्थित अभिभावकों में पहली ऐसी मां थीं, जिन्हें कोई छात्र अपने साथ स्टेज पर ले गया.

उन के स्टेज पर पहुंचते ही प्राचार्य ने खड़े हो कर उन का स्वागत किया. फिर एक कुरसी मंगा कर उन्हें बैठाया. अब आगे चांदनी को बोलना था. उस ने थोड़े से नपेतुले शब्दों में बताया, ‘‘ये मेरी मां हैं. गांव में रहती हैं. पिताजी के देहांत के बाद मुझे कभी उन की कमी महसूस नहीं होने दी. इन्होंने मां और पिता दोनों की जगह ले ली. मुझे पढ़ाने के इन के इरादों में जरा भी कमी नहीं आई. आज मैं जो आप लोगों के बीच हूं वह इन्हीं की बदौलत है. ‘‘काफी समय पहले मेरे कुछ मित्रों ने पूछा था कि मैं कौन सी चक्की का आटा खाती हूं. मैं ने उन से वादा किया था कि समय आने पर आप को जरूर बताऊंगी. आज वह वादा पूरा करने का समय आ गया है. मैं अपने उन प्रिय मित्रों को बताना चाहूंगी कि वह चक्की है, मेरी मां. तमाम मुश्किलों और तकलीफों में पिस कर भी इन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया. इन का प्रोत्साहन पा कर ही मैं आगे बढ़ी हूं. मेरा आज का मुकाम, आप के सामने है. इस से भी बड़े मुकाम को मैं हासिल करना चाहती हूं. उस के लिए मुझे आप की शुभकामनाएं चाहिए.’’

चांदनी के चुप होते ही पूरा हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. प्राचार्य ने स्वयं उठ कर उस की मां को स्टेज की सीढि़यों से नीचे उतरने के लिए सहारा दिया. रंगनाथ और उस के दोस्तों को आज पहली बार एहसास हुआ कि उस सांवली लड़की का नाम ही चांदनी नहीं है बल्कि उस के भीतर चांदनी सा उजला एक दिल भी है. बाहर निकलते ही चांदनी को बधाई देने वाला पहला व्यक्ति रंगनाथ ही था, दोनों हाथ जोड़े और आंखों में क्षमायाचना लिए हुए, चांदनी ने गद्गद हो कर उस के जुड़े हुए हाथों को थाम लिया. Hindi Social Story :

Real Vs Fake Eggs : असली-नकली का फंडा, पोल्ट्री फार्म का अंडा

Real Vs Fake Eggs : लेखक – डॉ. आलोक खरे – भारत में अंडे के आहार को ले कर जब-तब बहस चलती रहती है. अंडा आखिर है क्या? खाने और न खाने वालों के अपने मत हैं. बावजूद इसके, अंडा आज भी अपनी जगह पर न सिर्फ कायम है बल्कि बड़ी मात्रा में खाया भी जाता है.

अंडा खाने वाले खाते ही हैं, चटकारे ले कर. अंडा करी हो, भुरजी हो, अंडा सलाद हो. सभी को स्वादिष्ठ लगता है. इसे अकेले ही उबाला, तला, भूना जा सकता है. यह किसी बड़े व्यंजन का हिस्सा हो सकता है- आमलेट, सलाद, बेकन, पनीर, हरी मिर्च, काली मिर्च और नमक के साथ.  लेकिन कुछ लोग खाते-खाते भी इल्जाम लगाएंगे कि असली अंडा तो देसी मुर्गी का होता है. पोल्ट्री फार्म का अंडा तो नकली होता है. दवाएं, एंटीबौयोक, हार्मोंस वगैरह मुर्गियों को दे कर उत्पादन किया जाता है. गाड़ी ले कर शहर में देशी अंडा ढूंढ़ते रहेंगे लेकिन पड़ोस की दुकान में सस्ता अंडा मिल रहा है, उसे मशीन से निकाला हुआ समझ कर नहीं लेंगे. यह समझ-समझ का फर्क है. मुझे समझते हुए एक समय निकल गया कि दोनों में कोई फर्क नहीं होता. दोनों बराबर हैं. अंतर है तो सिर्फ उत्पादन क्षमता का. यह आनुवंशिकता का कमाल है जो वैज्ञानिकों ने मुर्गियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाई है ताकि मुर्गी पालन करने वाले किसानों को आर्थिक लाभ मिल सके. इसलिए आप तो अंडे के व्यंजन खाते रहो. आप को बराबर मात्रा में पोषक तत्व मिलते रहेंगे.

इस से सस्ता प्रोटीन आहार कहां मिलेगा. 60 ग्राम के अंडे में 6 ग्राम प्रोटीन. इस प्रोटीन का जैव मूल्य लगभग 94 प्रतिशत है. इस से अधिक 100 प्रतिशत जैव मूल्य सिर्फ मां के दूध में ही होता है.  प्रतिदिन आप के शरीर के प्रति किलोग्राम वजन के हिसाब से एक ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है और पोल्ट्री फार्म का अंडा लगभग एक रुपए प्रति एक ग्राम प्रोटीन के बराबर कीमत में बाजार में मिलता है. इतनी सरल गणित में आप अपने परिवार के सदस्यों को सस्ता प्रोटीन आहार दे सकते हैं. इस से महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर हो सकता है. समाज में गलतफहमी की वजह से अंडा रंगभेद का भी शिकार होता है. पोल्ट्री फार्म का अंडा सफेद रंग का और देसी मुर्गी का अंडा भूरे रंग का होता है. लोग सिर्फ रंग के आधार पर अंडे में ताकतवर और नकली का निर्णय दे देते हैं. जबकि असलियत यह कि यह रंगभेद सिर्फ अंडे के छिलके का है. अंदर से दोनों में पाए जाने वाले तत्त्व तो बराबर होते हैं.

पीला भाग है ज्यादा फायदेमंद

जिम जाने वाले, बॉडी बिल्डिंग वाले अंडे का सिर्फ सफेद हिस्सा खाते हैं और पीला भाग फेंक देते हैं जबकि अंडे के सफेद और पीले, दोनों में ही लगभग  3-3 ग्राम प्रोटीन होता है. अंडे का सफेद भाग मुख्य रूप से प्रोटीन का स्रोत होता है जबकि पीले भाग में प्रोटीन के साथ-साथ, विटामिन सी को छोड़ कर सभी विटामिन (जैसे ए, डी, ई, के), खनिज (आयरन, जिंक), वसा, ओमेगा-3 फैटी एसिड, कोलीन और ज़ेक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं. असलियत में अंडे का पावर हाउस तो पीला भाग ही होता है. हमेशा पूरा अंडा खाना चाहिए क्योंकि इस से आप को सभी आवश्यक पोषक तत्त्व एक साथ मिल जाते हैं.

हृदय रोगी अंडा खाने से परहेज करते हैं क्योंकि इस में पाए जाने वाले कोलेस्ट्रॉल पर बहुत विवाद है. असलियत यह है कि अंडे में कुल 186 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है जो अपने शरीर के लिए अच्छा होता है और हृदय की बीमारी का खतरा कम करता है. उल्लेखनीय है कि हमारा शरीर 2,000 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल बनाता है और अच्छे व बुरे कोलेस्ट्रॉल का अनुपात हृदय को प्रभावित करता है.

लोग गर्मी के मौसम में अंडा खाने से परहेज करते हैं. उन का मानना है कि अंडा गरम होता है जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से अंडे में ठंडा या गर्म जैसा कोई तत्त्व नहीं होता. यह सिर्फ गलतफहमी है. अंडे के बारे में यही वाद-विवाद होता है कि यह शाकाहारी भोजन है या मांसाहारी. हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि आमलेट बनाने के लिए फ्राई पैन में अंडा फोड़ा हो और अंदर से चूजा निकल आया हो. देशी मुरगी का अंडा जरूर मांसाहारी हो सकता है क्योंकि देसी मुर्गी में निषेचन होता रहता है और भ्रूण का विकास हो कर अंडे से चूजा निकलता है लेकिन पोल्ट्री फार्म में पाली जा रही मुर्गियों में ऐसी कोई संभावना नहीं होती क्योंकि उन में निषेचन नहीं करवाया जाता और न ही अंडे में कोई भ्रूण (या कोई भी जीव) होता है. इस में किसी भी प्रकार की कोई जीव-हत्या नहीं होती. सो, यह कैसे मांसाहारी भोजन हो सकता है? पोल्ट्री फार्म की मुर्गियों में आनुवंशिक रूप से अधिक से अधिक अंडा उत्पादन की क्षमता विकसित की गई है. लगभग प्रतिदिन ओव्यूलेशन होता है और अगले 24 घंटे बाद अंडा बन कर बाहर आ जाता है. यह आनुवंशिकी का कमाल है.

फिजूल है विवाद

लोग अंडा उत्पादन की आनुवंशिकी पर ध्यान तो नहीं दे सके लेकिन अफवाह पर जरूर ध्यान देने लग जाते हैं. वर्ष 2008 में महाराष्ट्र में देश का पहला बर्ड फ्लू का प्रकोप हुआ तो लोगों ने तुरंत प्रभाव से अंडा खाना छोड़ दिया. फिर वर्ष 2019 में कोविड की महामारी आई तो शरारती तत्त्वों ने सोशल मीडिया पर अंडे को कोविड प्रकोप का जिम्मेदार घोषित कर दिया. धीरे-धीरे यह दुष्प्रचार मांसाहार बनाम शाकाहार में बदल गया. वर्ष 2021 में कौओं में फ्लू के प्रकोप की खबर आई तो फिर अंडे पर कहर टूटा. फिर से अंडा खाना बंद कर दिया. आदिवासी लोककथाओं में वर्णन है कि किसी गांव में अकाल, महामारी परिस्थितियों में ओझ द्वारा किसी विधवा या बूढ़ी महिला को जिम्मेदार ठहराते हुए डायन घोषित कर दिया जाता था. यहां तक कि उस की हत्या तक कर दी जाती थी. जब भी कोई रोग प्रकोप होता है तो कमोबेश यही स्थिति पोल्ट्री फार्म के अंडों की हो जाती है. अंडों के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो जाता है. वास्तविकता यह है कि कोविड जैसे वायरल प्रकोप में अपने शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए पोल्ट्री फार्म का अंडा एक औषधि के रूप में सामने आया है. ऐसे समय में प्रोटीन युक्त भोजन लेने की आवश्यकता होती है. वायरस को पहचानने और उसे निष्क्रिय करने के लिए अपना शरीर इम्यूग्लोबिलिन्स यानी कि एंटीबॉडीज बनाता है जो प्रोटीन से बनते हैं.

पोल्ट्री फार्म के अंडे में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन होता है और शरीर के लिए अति आवश्यक सभी 9 अमीनो एसिड होते हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए आवश्यक जिंक, सेलेनियम, कोबाल्ट, आयरन, कोलीन क्लोराइड जैसे खनिज तत्व और विटामिन ए, डी, ई, बी-6, बी-12 आदि भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.

पोल्ट्री फार्म के अंडे के बारे में कितनी भी गलतफहमियां हों, इस के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया हो, भ्रामक जानकारी दी जा रही हो लेकिन यह कभी नहीं टूटा और अंडा उत्पादन करने वाले किसान भी जिजीविषा से भरे हुए डटे रहते हैं. किसी का समर्थन मिले या न मिले. अपने देश में अंडा उत्पादन साल-दर-साल 7-8 प्रतिशत की विकास दर से आगे बढ़ रहा है. पोल्ट्री फार्म के अंडे के बारे में बात करते-करते मशहूर शायर मोहसिन नकवी का एक शेर याद आ गया-  ‘‘मोहसिन तुम बदनाम बहुत हो जैसे हो फिर भी अच्छे हो.’’ Real Vs Fake Eggs :

Family Bonding Game : कैरम – अपनों से जुड़ने का अनोखा खेल

Family Bonding Game : कैरम सही मायनों में फैमिली गेम है जहां न सिर्फ खेलने वाला एंटरटेन होता है बल्कि जो खिलाड़ियों को खेलते देख रहा होता है वह भी एंटरटेन हो रहा होता है.

कोरोना काल ने पूरे भारत को घरों में कैद कर दिया था. इस का एक फायदा यह हुआ था कि जिन घरों में सालों से कैरम अंधेरे वाले उमस-भरे स्टोर में धूल फांक रहे थे, वे अब बाहर ताजा हवा में सांसें लेने लगे थे. उन्हें झाड़-पोंछ कर स्टूल पर रख दिया गया था. उस स्टूल के इर्द-गिर्द 4 कुर्सियां सजा दी गई थीं.

कहने का मतलब यह है कि आम भारतीय घरों में अपनी पहचान खो रहा कैरम खेल फिर से जिंदा हो गया था. यह एक ऐसा इंडोर गेम है जो बहुत कम जगह घेरता है और मनोरंजन का सस्ता साधन होने के अलावा खिलाड़ी को कैसे फोकस्ड रहना है, यह भी सिखाता है.

दिलचस्प है खेल

जब हम मनोरंजन की बात करते हैं तो हमें कैरम के इर्द-गिर्द वे 4 मासूम बच्चे बैठे नजर आते हैं जिन के लिए एक काली गोटी निकालने (पॉकेट करने) का मतलब होता है 10 नंबर अपने खाते में जोड़ना और एक सफेद गोटी लेने का मतलब है 20 नंबर अपनी झोली में डालना. लाल गोटी (रानी या क्वीन) के सीधे 50 नंबर.

बच्चों के इस खेल में कैरम कितना बड़ा या छोटा है, इस की कोई परवाह नहीं करता और नियम भी ज्यादा मायने नहीं रखते क्योंकि बच्चों को तो कैरम खेलने के बहाने जोड़ने व घटाने की प्रैक्टिस कराई जाती है. इस बहाने बच्चों में एक गुण और विकसित होता है- अपनी बारी का इंतजार करना और पार्टनर को यह बताना कि कौन सी गोटी लेना आसान होगा. थोड़ी-बहुत चीटिंग भी इस में जायज मानी जाती है.

ऐसा माना जाता है कि जब हम इस खेल में खो जाते हैं तो यह हमारे ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखता है. इस से हमारा ध्यान काबू में रहता है और यह सामाजिक कौशल को बढ़ाने का बेहतरीन साधन बन जाता है.

यही वजह है कि कैरम परिवार व दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताने का एक तरीका ही नहीं है, बल्कि यह हमें रणनीति बनाने में भी मददगार साबित होता है, क्योंकि आप को अपने खेलने की कला का तो अंदाजा होता ही है, साथ ही, आप को यह भी पता करना होता है कि प्रतिद्वंद्वी अपनी चालों की योजना किस तरह बना रहा है.

चैंपियन खिलाड़ी वही होता है जो एक स्ट्राइक में अपनी एक गोटी पॉकेट करे, दूसरी को आसान करे और मुमकिन हो तो प्रतिद्वंद्वी की गोटी को मुश्किल बना दे. जो ऐसा करने में कामयाब होता है वह तालियों का हकदार बनता है.

यह खेल उंगलियों और अंगूठे का सटीक तालमेल ही नहीं है, बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि किस ताकत से हमें स्ट्राइक करना है और हमारा निशाना और एंगल कितना परफेक्ट होना चाहिए.

इस खेल का सब से खास मनोवैज्ञानिक पहलू यह है कि हम अपने पार्टनर की बात या सलाह पर गौर करते हैं. उस की बताई गई चाल पर यकीन करते हैं. यही आपसी तालमेल हमें प्रैक्टिकल दुनिया की समस्याओं को सुलझाने में कारगर साबित होता है और जब सामने आप का दोस्त या परिवार वाला बैठा होता है तो आप दोनों की बॉन्डिंग अलग लेवल की हो जाती है.

तभी तो कहते हैं कि किसी भी तरह के बोर्ड गेम (कैरम बोर्ड इसी श्रेणी में आता है) को खेलने से शरीर में फील गुड हार्मोन ‘एंडोर्फिन’ बनता है, जो हमें कुदरती रूप से खुशी देता है. चूंकि यह खेल मनोरंजन का साधन भी होता है तो हार-जीत में लगने वाले ठहाके और शिकायतें हमारे दिमाग को बैलेंस करते हैं.

लिहाजा, यह जरूरी नहीं है कि कैरम खेलने के लिए कोरोना जैसी किसी आपदा का इंतजार किया जाए. यह बेहद ही सस्ता खेल है और जगह भी ज्यादा नहीं घेरता है. तो फिर देर किस बात की, आप भी अपनों के साथ प्लाईवुड लकड़ी से बने इस चौकोर बोर्ड के इर्द-गिर्द बैठ जाएं. Family Bonding Game :

Hindi Family Story : संकर्षण – आशीष की पत्नी ने किस के बच्चे को जन्म दिया ?

Hindi Family Story : अपने बचपन के मित्र गगन के यहां से लौटते हुए मेरे पति बारबार एक ही प्रश्न किए जा रहे थे, ‘‘अरे देखो न संकर्षण की शक्लसूरत, व्यवहार सब कुछ गगन से कितना मिलताजुलता है. लगता है जैसे उस का डुप्लिकेट हो. बस नाक तुम्हारी तरह है. मेरा तो जैसे उसे कुछ मिला ही नहीं.’’

‘‘मिला क्यों नहीं है? बुद्धि तुम्हारी तरह ही है. तुम्हारी ही तरह जहीन है.’’

‘‘हां, वह तो है, पर फिर भी शक्लसूरत और आदतें कुछ तो मिलनी चाहिए थीं.’’

‘‘शक्लसूरत और आदतें तो इनसान के अपनेअपने परिवेश के अनुसार बनती हैं और हो सकता है उस के गर्भ में आने के बाद से ही मैं ने उसे गगन भाई साहब को देने का मन बना लिया था. इसी कारण उन जैसी शक्लसूरत हो गई हो.’’

‘‘हां, तुम ठीक कहती हो, पर यार तुम बहुत महान हो. खुशीखुशी अपना बच्चा गगन की झोली में डाल दिया.’’

‘‘क्या करूं? मुझ से उन लोगों की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी. गगन भाई साहब और श्रुति भाभी को हम लोगों ने कोई गैर नहीं समझा. आप के लंदन रहने के दौरान हमारे पिताजी और हमारे बच्चों का कितना ध्यान रखा.’’

‘‘हां, यह बात तो है. गगन और भाभीजी के साथ कभी पराएपन का बोध नहीं हुआ. फिर भी एक मां के लिए अपनी संतान किसी और को दे देना बड़े जीवट का काम है. मेरा तो आज भी मन कर रहा था कि उसे अपने साथ लेते चलूं.’’

‘‘कैसी बात करते हैं आप? देखा नहीं कैसे गगन भाई साहब और श्रुति भाभीजी की पूरी दुनिया उसी के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है.’’

‘‘सच कह रही हो और संकर्षण भी उन्हीं को अपने मातापिता समझता है. अपने असली मातापिता के बारे में जानता भी नहीं.’’

शुक्र है मेरे पति को किसी प्रकार का शक नहीं हुआ वरना मैं तो डर ही गई थी कि कहीं यह राज उन पर उजागर न हो जाए कि संकर्षण के पिता वास्तव में गगन ही हैं. आज 17 वर्षों के वैवाहिक जीवन में यही एक ऐसा राज है जिसे मैं ने अपने पति से छिपा कर रखा है और शायद अंतिम भी. इस रहस्य को हम परिस्थितिवश हुई गलती की संज्ञा तो दे सकते हैं, पर अपराध की कतई नहीं. फिर भी जानती हूं इस रहस्य से परदा उठने पर 2 परिवार तबाह हो जाएंगे, इसलिए इस रहस्य को सीने में दबाए रखे हूं.

गगन इन के बचपन के मित्र हैं. गगन जहां दुबलेपतले, शांत और कुछकुछ पढ़ने में कमजोर थे वहीं मेरे पति गुस्सैल, कदकाठी के अच्छे और जहीन थे. घर का परिवेश भी दोनों का नितांत भिन्न था. गगन एक गरीब परिवार से संबंध रखते थे और मेरे पति उच्च मध्यवर्गीय परिवार से. इतनी भिन्नताएं होते हुए भी दोनों की दोस्ती मिसाल देने लायक थी. गगन को कोई भूल से भी कुछ कह देता तो उस की खैर नहीं होती. वहीं मेरे पति आशीष की कही हुई हर बात गगन के लिए ब्रह्मवाक्य से कम नहीं होती.

धीरेधीरे समय बीता और मेरे पति का आईएएस में चयन हो गया और गगन ने अपना छोटामोटा बिजनैस शुरू किया, जिस में हमारे ससुर ने भी आर्थिक सहयोग दिया. मेरी सास की मृत्यु मेरे पति के पढ़ते समय ही हो गई थी. उस समय गगन की मां ने ही मेरे पति को मां का प्यार दिया और ससुर भी कभी गगन को अपने परिवार से अलग नहीं समझते थे और कहते थे कि कुदरत ने उन्हें 2 बेटे दिए हैं. एक आशीष और दूसरा गगन.

संयोग देखो कि दोनों के विवाह के बाद जब मैं और श्रुति आईं तो भी उन दोनों के परिवार में किसी प्रकार का भी अलगाव न आया. मेरी और श्रुति की अच्छी बनती थी. हालांकि जब भी लोग हम चारों की मित्रता को देखते तो कहते कि यह मैत्री भी शायद कुदरत का चमत्कार है, जहां 2 भिन्न परिवेश और भिन्न सोच वाले व्यक्ति अभिन्न हो गए थे. मुझे पति के तबादलों के कारण कई शहरों में रहना पड़ा. ऐसे में ससुर अकेले पड़ गए थे. उन्हें अपना शहर छोड़ कर यों शहरशहर भटकना गंवारा न था. ऐसे में गगन और उन की पत्नी ही उन का पूरा खयाल रखते, बेटेबहू की कमी महसूस न होने देते.

समय बीतता रहा. जहां मैं 2 बच्चों की मां बन गई, वहीं गगन की पत्नी को कई बार गर्भ तो ठहरा पर गर्भपात हो गया. डाक्टर का कहना था कि उन की पत्नी की कोख में कुछ ऐसी गड़बड़ी है कि वह गर्भ पनपने ही नहीं देती. हर बार गर्भपात के बाद दोनों पतिपत्नी बहुत मायूस हो जाते. गगन की पत्नी श्रुति का तो और भी बुरा हाल हो जाता. एक तो गर्भपात की कमजोरी और दूसरा मानसिक अवसाद. दिन पर दिन उन का स्वास्थ्य गिरने लगा. डाक्टर ने सलाह दी कि अब खुद के बच्चे के बारे में भूल जाएं. या तो कोई बच्चा गोद ले लें या किराए की कोख का प्रबंध कर लें वरना पत्नी के जीवन पर संकट आ सकता है.

पर उन पतिपत्नी को डाक्टर की बात रास नहीं आई. गगन मुझ से कहते, ‘‘भाभी अब मैडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है. अगर कुछ कमी है तो क्या वह दवा से दूर हो सकती है. इस शहर के सब डाक्टर पागल हैं. मैं देश के सब से बड़े गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाऊंगा, देखिएगा हमारे घर भी अपने बच्चे की किलकारियां गूजेंगी.’’

और सच में उन्होंने देश के सब से मशहूर गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाया. उन्होंने आशा बंधाई कि टाइम लगेगा, पर सब कुछ ठीक हो जाएगा. इधर मेरे पति को डैपुटेशन पर 3 सालों के लिए लंदन जाना पड़ा. मैं नहीं जा सकी. बच्चे पढ़ने लायक हो गए थे और ससुर भी अस्वस्थ रहने लगे थे. अब उन्हें केवल गगन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था. आखिर हम पतिपत्नी का भी तो कोई उत्तरदायित्व था.

आशीष के लंदन प्रवास के दौरान ही ससुर की मृत्यु हो गई. किसी प्रकार कुछ दिनों की छुट्टी ले कर आशीष आए फिर चले गए. इधर गगन की पत्नी को पुन: गर्भ ठहरा. अब की बार हर प्रकार की सावधानी बरती गई. गगन अपनी पत्नी को जमीन पर पांव ही नहीं धरने देते. वैसे डाक्टर ने भी कंप्लीट बैड रैस्ट के लिए कह रखा था.

डाक्टर ने अल्ट्रासाउंड वगैरह करवाने को भी मन कर दिया था ताकि उस की रेज से भी गर्भ को नुकसान न पहुंचे. धीरेधीरे गर्भ पूरे समय का हो गया. गगन, उन की पत्नी और उन की मां का चेहरा बच्चे के आने की खुशी में पुलकित रहने लगा. प्रसन्नता मुझे भी कम न थी.

नियत समय में श्रुति को प्रसववेदना शुरू हो गई. लगता था सब कुछ सामान्य हो जाएगा. मैं भी अपने बच्चों को मां के पास छोड़ कर गगन के परिवार के साथ थी. आखिरकार इस मुश्किल घड़ी में मैं उन का साथ न देती तो कौन देता. पर 1 हफ्ते तक प्रसववेदना का कोई परिणाम न निकला. डाक्टर भी सामान्य डिलिवरी की प्रतीक्षा करतेकरते थक गई थीं.

अंत में उन्होंने औपरेशन का फैसला लिया और औपरेशन से जिस बच्चे ने जन्म लिया, वह भयानक शक्ल वाला 2 सिर और 3 हाथ का बालक था. जन्म लेते ही उस ने इतने जोर का रुदन किया कि सारी नर्सें उसे वहीं छोड़ कर डर कर भाग गईं.

डाक्टर ने यह खबर गगन को दी. गगन भी बच्चे को देख कर हैरान रह गए. यह तो अच्छा हुआ कि बच्चा आधे घंटे में ही इस दुनिया से चल दिया. गगन की पत्नी बेहोश थीं.

गगन जब बच्चे को दफना कर लौटे तो इतने थकेहारे, बेबस लग रहे थे कि पूछो मत.

गगन की मां ने मुझ से कहा, ‘‘सीमा तुम गगन को ले कर घर जाओ. बहुत परेशान है वह. थोड़ा आराम करेगा तो इस परेशानी से निकलेगा. मैं हौस्पिटल में रुकती हूं.’’

मैं ने विरोध भी किया, ‘‘आंटी, आप और गगन भाई साहब चले जाएं. मैं यहां रुकती हूं.’’

मगर गगन एकदम से उठ कर खड़े हो गए. बोले, ‘‘चलिए भाभी चलते हैं.’’

मैं और गगन कमरे में आ गए. कमरे में आ कर मैं ने गगन के ऊपर सांत्वना भरा हाथ रखा

भर था कि उन का इतनी देर का रोका सब्र का बांध टूट गया.

वे मेरी गोद में सिर रख कर फफकफफक कर रोने लगे, ‘‘मैं क्या करूं भाभी? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है. श्रुति जब होश में आएगी तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा? इस से अच्छा होता वह गर्भ में आया ही न होता… श्रुति क्या यह सदमा बरदाश्त कर पाएगी? मुझे उस की बड़ी फिक्र हो रही है. उस का सामना करने की हिम्मत मुझ में नहीं है. मैं कहीं चला जाऊंगा. भाभी आप ही उसे संभालिएगा.’’

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किन शब्दों में उन्हें सांत्वना दूं. केवल उन के बाल सहलाती रही. हम दोनों को ही उस मुद्रा में झपकी सी आ गई और उस दौरान कब प्रकृति और पुरुष का मिलन हो गया हम दोनों ही समझ न पाए. गगन अपराधबोध से भर उठे थे. अपराधबोध मुझे भी कम न था, क्योंकि जो कुछ भी हम दोनों के बीच हुआ था उसे न तो बलात्कार की संज्ञा दी जा सकती थी और न ही बेवफाई की. हम दोनों ही समानरूप से अपराधी थे… परिस्थितियों के षड्यंत्र का शिकार.

गगन अपनी पत्नी को ले कर दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले गए थे. आशीष को कुछ दिन बाद ही लंदन से लौटना था और हम लोगों को ले कर वापस जाना था, क्योंकि आशीष को वहां पर काफी अच्छी जौब मिल गई थी. उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था. मुझे देश और इतनी अच्छी नौकरी छोड़ कर विदेश जाना स्वीकार न था, पर आशीष पर तो पैसे और विदेश का भूत सवार था. आशीष आए तभी मुझे पता चला कि मैं फिर से मां बनने वाली हूं. मुझे अच्छी तरह से पता था कि यह बच्चा गगन का है.

आशीष को पता चला तो वे आश्चर्य में पड़ गए. बोले, ‘‘इतनी सावधानियों के बाद ऐसा कैसे हो सकता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अब हो गया है तो क्या करें?’’

आशीष बोले, ‘‘अबौर्शन करवा लो. अभी नए देश में खुद को और बच्चों को ऐडजस्ट करने में समय लगेगा. यह सब झमेला कैसे चल पाएगा?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं एक बात सोचती हूं. श्रुति भाभी बहुत दुखी हैं, डिप्रैशन में आ गई हैं, शायद अब उन का दूसरा बच्चा हो भी न? तो क्यों न हम इस बच्चे को उन लोगों को दे दें.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है? अपना बच्चा कोई कैसे दूसरे को दे सकता है?’’ आशीष बोले.

‘‘क्यों? वे लोग कोई गैर तो नहीं हैं… फिर तुम अबौर्शन कराने की बात कर रहे थे… कम से कम जीवित तो रहेगा और उन लोगों के जीवन में खुशियां भर देगा.’’

‘‘वह तो ठीक है,’’ आशीष ने हथियार डालते हुए कहा, ‘‘पर क्या गगन और भाभी इस के लिए मान जाएंगे?’’

‘‘चलिए, बात कर के देखते हैं.’’

जब हम लोगों ने गगन भाई साहब और श्रुति भाभी से इस संबंध में बात की तो वे विश्वास न कर सके.

गगन बोले, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है भाभी? आप अपना बच्चा हमें दे देंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारा और आप का बच्चा अलग थोड़े ही है.’’

मेरी इस बात पर गगन ने चौंक कर मेरी आंखों में देखा. मैं ने भी उन की आंखों में देखते हुए अपनी बात जारी रखी, ‘‘कृष्ण के भाई बलराम की कहानी जानते हैं न? उन्हें संकर्षण विधि द्वारा देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में प्रतिस्थापित कर दिया गया था तो यही समझिए कि यह आप लोगों का ही बच्चा है, केवल गर्भ में मेरे है. अगर बेटा होगा तो आप लोग नाम संकर्षण ही रखिएगा.’’

मगर न श्रुति को और न ही आशीष को इतनी पौराणिक कथाओं का ज्ञान था, केवल मैं और गगन ही इस अंतनिहित भाव को समझ सके. फिर मैं ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि आप लोग उसे पूरा प्यार देंगे.’’

बच्चे की कल्पना मात्र से गगन की पत्नी की आंखों में चमक आ गई. बोलीं, ‘‘सच भाभी क्या आप ऐसा कर पाएंगी?’’

‘‘क्यों नहीं? आप कोई गैर थोड़ी न हैं.’’

आपसी सहमति बनी कि मैं अभी आशीष के साथ नहीं जाऊंगी. बच्चे को जन्म देने पर उसे श्रुति को सौंप लंदन जाऊंगी. मैं ने ऐसा किया भी. बच्चे को हौस्पिटल से निकलते ही श्रुति की गोद में डाल दिया और आशीष के पास बच्चों के साथ लंदन चली गई.

तब से कई बार भारत आना हुआ पर मायके से ही हो कर लौट गई. डरती थी कहीं मेरा मातृत्व न जाग जाए. कभीकभी इस बात पर क्षोभ भी होता कि मैं ने बेकार ही अपने बच्चे को पराई गोद में डाल दिया. फिर लगता शायद मैं ने ठीक ही किया, नहीं तो उसे देख कर एक अपराधभाव मन में हमेशा बना रहता.

आशीष सारे तथ्यों से अनजान थे. तभी तो उन का पितृत्व जबतब अपने बच्चे से मिलने को बेचैन हो उठता. उन्हीं की जिद थी कि अब की बार गगनजी के यहां जाने का कार्यक्रम बना. संकर्षण से मिल कर आशीष की प्रतिक्रिया से मुझे तो डर ही लग गया था कि कहीं इस रहस्य से परदा न उठ जाए और 2 परिवारों की सुखशांति भंग हो जाए.

मगर आशीष के मुझ पर और गगन पर अटूट विश्वास ने उन की सोच की दिशा इस ओर नहीं मोड़ी वरना मैं फंस जाती, क्योंकि आज तक न तो मैं ने कभी उन से झूठ बोला है और न ही कोई बात छिपाई है, विश्वासघात तो दूर की बात है और इतना तो मैं आज भी मन से कह सकती हूं कि मैं ने और गगन ने न तो कोई विश्वासघात किया है और न ही कोई बेवफाई. गलती जरूर हुई है. पर हां यह बात छिपाने को विवश जरूर हूं, क्योंकि इस गलती का पता लगने पर

2 परिवार व्यर्थ में विघटन की कगार पर पहुंच जाएंगे. इसीलिए मैं इस विषय पर एकदम चुप हूं. Hindi Family Story :

Sydney Terror Attack : सिडनी में आतंकी हमला; धार्मिक कट्टरता फिर कटघरे में

Sydney Terror Attack : सिडनी में यहूदियों पर हुआ आतंकी हमला हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम धर्म को इंसानियत से ऊपर रख रहे हैं? अगर ऐसा नहीं, तो हार हमारी है, चाहे पीड़ित कोई भी समुदाय क्यों न हो.

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बोंडी बीच पर हुए आतंकी हमले में 16 लोगों की मौत हुई है और 40 से ज्यादा लोग घायल हैं. यह हमला उस वक्त हुआ जब वहां यहूदी समुदाय का “हनुक्का” त्योहार मनाया जा रहा था. हनुक्का एक पारंपरिक यहूदी प्रकाश उत्सव है. जिसे बोंडी बीच पर “हनुका बाय द सी” नाम से मनाया जा रहा था. तभी यहां दो या शायद तीन हमलावरों ने आम लोगों पर गोलीबारी करनी शुरू कर दी. महिलाएं, बूढ़े, जवान और मासूम बच्चे उन की गोलियों का शिकार हो कर मौत की गोद में सो गए. हमला करने वाले दो आतंकी जिनमें से एक मारा गया और दूसरा घायल अवस्था में कस्टडी में है, आपस में बाप-बेटे थे.

साजिद (50 साल) और नवीद अकरम (24 साल) दोनों पाकिस्तानी मूल के थे और लम्बे समय से आस्ट्रेलिया में रह रहे थे. दोनों के पास ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता थी. एक आतंकी जो भागने में सफल हुआ उसके बारे में अभी कोई खबर नहीं है. ऑस्ट्रेलियाई पुलिस के मुताबिक साजिद के पास 6 बंदूकों के वैध लाइसेंस थे. ये सभी हथियार वह साथ ले कर आया था.

गौरतलब है कि पिछले कई महीने से ऑस्ट्रेलिया के यहूदी समुदाय के लोग यह शिकायत कर रहे थे कि वहां यहूदी-विरोधी घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं. इजरायल पर हमास के हमले के बाद से ही आस्ट्रेलिया में यहूदियों को अपने लिए खतरे का अहसास होना शुरू हो गया था. बीते एक साल में ऑस्ट्रेलिया में 1,600 से ज्यादा यहूदी-विरोधी घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें दर्जनों हमले और तोड़फोड़ की घटनाएं और सैकड़ों अपमानजनक या धमकी भरे मामले शामिल हैं.

7 अक्तूबर 2023 को इजराइल पर हमास के हमले के बाद जिस तरह निर्दोष फिलिस्तीनियों का खात्मा करने की नीयत से इजरायल सरकार ने फिलिस्तीन में खून की नदियां बहाईं, उस से अनेक देशों में यहूदियों के खिलाफ हमले, तोड़फोड़ और डरानेधमकाने जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. आस्ट्रेलिया में तो ऐसी घटनाएं तीन गुना बढ़ी हैं. पिछले साल सिडनी और मेलबर्न में यहूदियों के खिलाफ हमलों ने देश को हिला दिया था. इन शहरों में आस्ट्रेलिया की 85 फीसदी यहूदी आबादी रहती है. आम यहूदी नागरिकों पर इन हमलों ने ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक और क़ानून-प्रधान देश को झकझोर दिया है. ये घटनाएं किसी एक समुदाय के विरुद्ध अपराध भर नहीं हैं, बल्कि यह इंसानियत और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात हैं. सवाल यह भी है कि आखिर यहूदियों के प्रति इतनी नफरत क्यों है? और इस के लिए खुद यहूदी किसी हद तक ज़िम्मेदार हैं?

यहूदियों के ख़िलाफ़ नफ़रत कोई नई परिघटना नहीं है. यूरोप में मध्ययुग से ले कर आधुनिक काल तक यहूदियों को कभी “ईसा-विरोधी”, कभी “सूदख़ोर”, तो कभी “षड्यंत्रकारी” बताकर निशाना बनाया गया. प्लेग जैसी महामारियों से ले कर आर्थिक संकटों तक, हर असहजता का दोष यहूदियों पर मढ़ दिया गया. इस ऐतिहासिक अन्याय की चरम परिणति नाजी जर्मनी का होलोकास्ट था, जिसमें साठ लाख से अधिक यहूदियों की हत्या हुई. और इस सब के पीछे हर धर्म की संकीर्ण सोच जिम्मेदार है.

आज के दौर में यह नफ़रत नए रूप में सामने आती है. इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष, विशेष कर गाजा में होने वाली हिंसा ने दुनिया भर में भावनाएं भड़काई हैं. इजराइल सरकार की नीतियों के प्रति रोष कई जगहों पर यहूदियों के खिलाफ नफरत में बदल गया है, जबकि इजरायल की सरकार और दुनिया भर के यहूदी एक नहीं हैं. सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज किया है तो वहीं आधे-अधूरे वीडियो, भड़काऊ पोस्ट बिना किसी संदर्भ के फैलते रहते हैं. नतीजा यह कि कट्टरपंथी समूह, चाहे वे अति दक्षिणपंथी हों या धार्मिक उग्रवादी, इस माहौल का लाभ उठा कर यहूदियों को सामूहिक अपराधी के रूप में चित्रित करते हैं और अपने धर्म के ‘असुरी ज्ञान’ के प्रकाश में खून की होली खेलते हैं.

सिडनी की घटना यह उजागर करती है कि आधुनिक समाजों में धार्मिक पहचान को ले कर असहिष्णुता किस हद तक बढ़ चुकी है. सोशल मीडिया और उग्र राजनीतिक भाषणों ने नफरत को वैधता दी है. धार्मिक अफवाहों, आधे-अधूरे सच और षड्यंत्र सिद्धांत ने कम समझदार लोगों के मन में, जो संख्या में कहीं अधिक हैं, डर और गुस्सा भर दिया है, जो अंततः हिंसा के रूप में सामने आता है. सिडनी जैसे बहुसांस्कृतिक और शांत माने जाने वाले शहर में यहूदियों को निशाना बना कर किया गया आतंकी हमला पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है. ये बेहद खतरनाक है कि एक पिता इस्लामिक जिहाद के नाम पर अपने 24 साल के बेटे के साथ आतंकी हमला करने निकलता है. बोंडी बीच की तस्वीरें हमें इसी साल 22 अप्रैल को भारत में हुए पहलगाम आतंकी हमले की याद दिलाती हैं. उस हमले में भी आतंकियों ने धर्म पूछकर हिंदुओं को बेरहमी से मारा था. भारत के भीतरी क्षेत्रों में धर्म पूछ कर होने वाली मुसलमानों की मॉब लिंचिंग भी धर्म की ‘असुरी शक्तियों’ का तांडव है.

आतंकवाद का इतिहास बताता है कि उस का कोई एक धर्म नहीं है, बल्कि वह सभी धर्मों में निवास करता है. वह कभी इसलाम के नाम पर सामने आता है, कभी ईसाई पहचान के साथ, कभी यहूदी विरोध के रूप में और कभी किसी और धार्मिक या वैचारिक आवरण में. सिडनी की घटना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जहां यहूदियों को केवल उन की धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया. यह नफ़रत किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक स्तर पर फैलती  बीमारी है, जो असुरक्षा, डर और अफवाहों के सहारे पनपती है.

हालांकि दुनिया भर के यहूदी न तो एक जैसी राजनीति रखते हैं, न एक जैसे विचार. आस्ट्रेलिया, अमेरिका या भारत में रहने वाला आम यहूदी नागरिक न गाजा पर बम गिराता है, न वैश्विक नीतियों तय करता है. हां, परन्तु यह भी सच है कि कुछ यहूदी संगठन या प्रभावशाली लौबी समूह, विशेष कर पश्चिमी देशों में, इजराइली सरकार की हर कार्रवाई का बिना शर्त बचाव करते दिखाई देते हैं. इस से आलोचना और नफरत के बीच की रेखा धुंधली होती है. आलोचना का जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए, दमन से नहीं. और कुछ संगठनों या व्यक्तियों के रुख़ के कारण पूरे यहूदी समाज को निशाने पर लेना सरासर अन्याय है.

यहूदियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा सिर्फ यहूदियों की समस्या नहीं है. इतिहास गवाह है कि नफरत की आग एक बार भड़की तो वह किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती है. आज यहूदी निशाने पर हैं, कल कोई और हो सकता है. लोकतंत्र की परीक्षा यहीं होती है कि वह अल्पसंख्यकों को कितना सुरक्षित रख पाता है.

सिडनी में यहूदियों पर हुआ आतंकी हमला हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम धर्म को इंसानियत से ऊपर रख रहे हैं. अगर ऐसा नहीं, तो हार हमारी है, चाहे पीड़ित कोई भी समुदाय क्यों न हो. आतंक का जवाब इंसानी मूल्यों की मज़बूत पुनर्स्थापना है. यही एकमात्र रास्ता है जिस से भविष्य में ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है.

आस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह घटनाएं चेतावनी है कि बहुसंस्कृतिवाद सिर्फ़ नारा नहीं, रोजमर्रा की जिम्मेदारी है. कानून का सख्त पालन, घृणा अपराधों पर त्वरित कार्रवाई और शिक्षा के जरिये इतिहास की सही समझ पैदा करना ही सही रास्ता है. Sydney Terror Attack :

Terrorism In India : लाल किला धमाका; जारी हैं आतंकवादी हमले

Terrorism In India : 10 नवंबर की शाम दिल्ली में हुए आतंकी बम ब्लास्ट से पूरा देश दहल गया. धमाका लाल किले के नजदीक बने मेट्रो स्टेशन के पास हुआ. इस आतंकी हमले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

10 नवंबर की शाम 6.52 बजे दिल्ली स्थित लाल किले के पास मेट्रो स्टेशन के गेट न. 1 के सामने भीड़ भरी सड़क पर विस्फोटकों से भरी हुंडई आई-20 कार में हुआ धमाका इतना भयावह था कि उस के 100 मीटर के दायरे में आने वाले तमाम वाहनों के परखच्चे उड़ गए. सड़क पर गाड़ियां और अन्य वाहन धूं धूं कर जल उठे. लाल किले के समीप ट्रैफिक लाइट पर रुकने के बाद उस कार में अचानक विस्फोट हुआ था.

इस धमाके में 13 लोग मारे गए और 2 दर्जन से ज्यादा घायल हो कर अस्पताल में पड़े हैं. विस्फोट इतना जबरदस्त था कि आसपास के भवनों की खिड़कियां टूट गईं. पुलिस के मुताबिक उस कार में 3 लोग सवार थे जिन के शरीर के चिथड़े उड़ गए.

यह भारत पर हुआ एक और फिदायीन हमला था, जिस को आतंकी हमला घोषित करने में मोदी सरकार को 48 घंटे का समय लग गया जबकि पिछले पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर चलाने वाली मोदी सरकार ने कहा था कि अब यदि कोई आतंकी हमला भारत पर हुआ तो उसे युद्ध के रूप में देखा जाएगा और पाकिस्तान इस के लिए तैयार रहे.

हैरानी की बात यह है कि ‘चौकीदार’ सरकार के तमाम चौकन्नेपन के बाद भी भारत में आतंकवाद रुकने का नाम नहीं ले रहा और इस बार तो आतंकी कोई बाहर से आए लोग नहीं, बल्कि अपने ही देश के लोग है, जो पढ़े लिखे, डॉक्टर-इंजीनियर की डिग्री लिए हुए हैं और बाकायदा देश के अनेक संस्थानों में कार्यरत हैं.

घटना के बाद जो लोग पकड़े जा रहे हैं उन में कोई फरीदाबाद में डॉक्टर है, कोई कानपुर में, कोई जम्मू कश्मीर में तो कोई लखनऊ में. इन के घरों से भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार बरामद हुए हैं. हद तो यह है कि देश में सालों से चल रहे कई मेडिकल शिक्षण संस्थानों के नाम भी आतंकवाद की पैदावार तैयार करने में सामने आ रहा है.

पहलगाम में जब 26 सैलानियों को चुन चुन कर मारा गया था, तब आतंकवादियों ने साफ शब्दों में उन के परिवारों को धमकियां दी थीं पर यहां इस मामले में इन पंक्तियों को लिखे जाने तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि आखिर अल फतह विश्वविद्यालय से जुड़े आतंकियों का मकसद था क्या?

यह सवाल जरूरी इसलिए है कि आतंकवादियों की समझ का तो पता चले कि उन का गुस्सा केंद्र सरकार पर है, हिंदू संगठनों पर है, हिंदू जनता है या सिर्फ बेमतलब का जिहादी जुनून है कि बम विस्फोट करना आता है तो किसी को धमका दो.

तीन-तीन टन विस्फोटक और हथियार आतंकी डॉक्टरों के घरों से बरामद हुआ. आखिर इतना बड़ा जखीरा उन के घरों तक यह पहुंचा कैसे? वैसे मोदी सरकार तो आज तक उस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाई कि 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही बस पर हुए हमले में भारी मात्रा में प्रयुक्त विस्फोटक वहां तक कैसे पहुंचा? वहां निशाने पर कम से कम सैनिक तो थे, यहां लाल किले के विस्फोट में कौन निशाने पर था, पता नहीं.

देश में हुए हर आतंकी हमले में बेकुसूर गरीब जनता मारी जाती है और अनेक घायल हो कर लंबे समय तक अपने खर्चे पर अस्पताल में पड़े रहते हैं. लोगों के अंग भंग हो जाते हैं. कितनों के घर उजड़ जाते हैं. बच्चे अनाथ हो जाते हैं. औरतें विधवा हो जाती हैं. मां बाप अपने जिगर के टुकड़ों को खो कर हमेशा के लिए बेबस और हताशा की जिंदगी में कैद हो जाते हैं. आतंकी हमलों में मरने वाले हिंदू भी होते हैं और मुसलमान भी.

हिंदुओं को मारने की घटनाओं को तो एक बार समझा जा सकता है पर जामा मस्जिद और लाल किले के बीच की जगह-जगह मुसलमानों की संख्या हर समय ज्यादा रहती है, आखिर विस्फोट किस गुस्से में किया गया होगा क्योंकि इस बार के धमाके में भी हिंदू और मुसलमान दोनों कौमों के लोग मारे गए. मरने वालों में अधिकांश लोग अपने घर के अकेले कमाने वाले थे. वे जो किसी दुकान में काम करते थे, रिक्शा चलाते थे, ठेला खींचते थे या अपने घर जाने की राह में थे और लाल बत्ती पर रुके हुए थे.

28 साल के मोहसिन मलिक जो मूल रूप से मेरठ के रहने वाले थे, पिछले कुछ सालों से दिल्ली के सिविल लाइन्स में रह कर लाल किले के नजदीक ई-रिक्शा चलाया करते थे. जब ब्लास्ट हुआ, मोहसिन उस वाहन से चंद मीटर की दूरी पर खड़े थे. धमाके ने मोहसिन को कई फीट ऊपर उछाल दिया. उस का पूरा शरीर ?ालस कर काला पड़ गया. हाथ पैर चिथड़े हो कर शरीर से अलग हो गए. उस का चेहरा पहचानने लायक नहीं रह गया था.

पुलिस को उस का फोन जमीन पर पड़ा मिला तो उस से परिजनों को एलएनजेपी अस्पताल पहुंचने के लिए कहा गया. रात के साढ़े 12 बजे डॉक्टर ने इमरजेंसी वार्ड में मोहसिन की मौत की पुष्टि की. मोहसिन की बहन रोते हुए वार्ड के बाहर निकली. वह चीख रही थी, ‘‘मेरा भाई चला गया, अब उस के छोटे-छोटे बच्चों को कौन देखेगा. भाभी को कैसे बताऊंगी?’’ रोतेरोते वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. उस के साथ आए रिश्तेदार उस को संभालते हुए बाहर लाए.

दिनेश मिश्रा लाल किले के पास चावड़ी बाजार में शादी के कार्ड की दुकान पर काम करते थे. उम्र तकरीबन 35 साल थी. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के रहने वाले दिनेश पिछले 15 सालों से दिल्ली में गुजर बसर कर रहे थे. घर में उन की पत्नी और 3 छोटे बच्चे हैं. दिनेश मिश्रा धमाके में मारे गए. लाल किले के नजदीक विस्फोट की खबर सुन कर उन के भाई ने जब 8 बजे उन को फोन किया तब दिनेश का फोन उठा नहीं. वह भाई को लगातार फोन करता रहा. 11 बजे किसी और ने फोन उठाया और उस को लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में आने के लिए कहा. गुड्डू अस्पताल पहुंचा तो उस को मोर्चरी में भेज दिया गया जहां जमीन पर उस के भाई दिनेश मिश्रा की लाश पड़ी थी.

मोहम्मद जुम्मन लाल किला इलाके में रिक्शा चलाता था. बिहार के रहने वाले जुम्मन का पूरा शरीर जल कर काला पड़ गया था. मोर्चरी में काफी तलाशने के बाद उस की पत्नी ने जुम्मन के शरीर से चिपके कपड़े के कुछ टुकड़ों से उस की पहचान की. वह कहती है, ‘‘कोई भी लाश ऐसी नहीं थी कि देख कर कुछ पता चल सके. हम ने कपड़ों के कुछ टुकड़ों से अपने पति को पहचाना. उस का न सिर था, न पैर’ कह कर वह सिहर उठती है. जुम्मन की मौत से उस की पत्नी और 5 बच्चे गहरे सदमे में हैं.

आतंकवादी को क्या यह एहसास नहीं था कि इस के आसपास के वाहनों में हिंदू-मुस्लिम दोनों होंगे?

इसी तरह की कहानियां दूसरे शिकारों की हैं जिन की चर्चा पिछले दिनों मीडिया में जम कर हुई, जिन में संदीप अग्रवाल, लोकेश, अशोक कुमार, पंकज साहनी, जगदीश कटारिया शामिल हैं.

आतंकवाद की जड़ में धर्म

आज दुनिया का हर दूसरा देश आतंकवाद से त्रस्त है. यह एक वैश्विक संकट है और इस की जड़ है धर्म. हर धर्म अपने को दूसरे से श्रेष्ठ बताता है. श्रेष्ठ बने रहने के लिए वह दूसरे पर वार करता है, उसे डराता है, खौफ पैदा कर के अपने आगे झाकाने की कोशिश करता है. ईसाई, यहूदी, मुसलमान, हिंदू सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ घोषित करने की होड़ में सदियों से निर्दोष मनुष्यों का खून बहा रहे हैं. जितने भी देश धर्म को आगे रख कर चल रहे हैं, वहां दहशतगर्दी का बोलबाला है. औरतों पर जुल्म, बच्चों पर जुल्म और धर्म के खिलाफ बोलने वालों के सिर कलम करने की परंपरा है. चीन और जापान जैसे देशों से आतंकी हमलों की खबरें नहीं आतीं शायद इसलिए कि वे धर्म में नहीं, कर्म में विश्वास करते हैं.

धर्मतंत्र में फंसे लोग हमेशा ही मारकाट करेंगे क्योंकि उन की धर्म की पुस्तकों में यही सब भरा हुआ है.  दुनिया का कोई ऐसा धर्म या धर्मग्रंथ नहीं है जिस में खून खराबा का जिक्र न हो. कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो बिना मार-काट, बिना खून खराबे के अस्तित्व में आया हो. तो जिस की नींव ही कत्लोगारत पर रखी गई हो वह ऊपर से भले प्रेम सौहार्द व भाईचारे की बात करता रहे, असल में वह दूसरे धर्म संप्रदाय को तुच्छ मान कर खत्म करने की कुत्सित विचारधारा को ही आगे बढ़ाता है. आप धर्मग्रंथों में लिखे शब्दों में फेरबदल नहीं कर सकते. कुछ गलत लिखा है तो आप उस पर सवाल नहीं उठा सकते.

संविधान का सहारा

लोकतंत्र इस मायने में थोड़ा उदार है. संविधान की किताब में यदि किसी को कुछ गलत लगता है तो वह उसे अदालत में चुनौती दे सकता है. धर्मग्रंथ में लिखे हुए पर सवाल उठाना मना है. वह गलत भी है तो उस को बदला नहीं जा सकता. संविधान में बदलने की गुंजाइश होती है. सो, आतंकवाद से मुक्ति चाहिए तो धर्म का झंडाबरदार नहीं, बल्कि संविधान का पालनकर्ता बनना होगा.

सरकार अपने शासनकाल की सफलता के चाहे जितने ढोल क्यों न पीटे परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश की आम जनता इन दिनों अपने आप में जितनी बेचैनी महसूस कर रही है तथा स्वयं को जितना असहाय महसूस कर रही है, उतना विचलित समाज पहले कभी नहीं देखा गया.

जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, हरियाणा, राजस्थान तथा पूर्वोत्तर के कई राज्यों से लगातार आने वाले समाचार अपने आप में यह जानने के लिए काफी हैं कि देश में इस समय चारों ओर एक धुआं सा उठ रहा है. सत्तालोलुपता में हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई को ज्यादा से ज्यादा चौड़ा करने की मुहिम चल रही है और यह मुहिम धर्म का झंडा उठा कर ही पूरी की जा सकती है. संविधान तो सब को एक नजर से देखता है.

अगर संविधान की राह पर चल कर इस लोकतंत्र को चलाया जा रहा होता तो आज जांच एजेंसियां धर्म के कारोबारियों के इशारे पर नाचने से बची रहतीं और देश की सुरक्षा का जो जिम्मा उन के कंधों पर है, उस काम को वे अपने पूरे अधिकार और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पूरा करतीं. अगर कानून का डर बनाए रखा जाता तो मजाल है कि कोई अपनी कार में विस्फोटक रख कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की हिम्मत भी कर पाता. मगर यहां कानून का खौफ किसे है?

गौरतलब है लाल किले वाली रोड पर आतंकी धमाके के एक दिन पहले ही दिल्ली से सटे फरीदाबाद में 2 अलग-अलग जगहों से 2,923 किलो विस्फोटक बरामद हुआ था. पहले फरीदाबाद के एक घर से 360 किलो विस्फोटक मिला, फिर दूसरे घर से 2,563 किलो विस्फोटक मिला. पहली कार्रवाई में एक डॉक्टर के घर से हथियार और 360 किलो विस्फोटक पदार्थ बरामद किया गया.

यह बरामदगी दिल्ली-एनसीआर पुलिस ने नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आ कर की. जिस के घर से यह बरामद हुआ वह एक डॉक्टर है. इस के बाद हुई दूसरी कार्रवाई में फरीदाबाद के एक अन्य घर से 2,563 किलो विस्फोटक बरामद किया गया. इस से पहले अनंतनाग के सरकारी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर आदिल के लॉकर से एक एके-47 राइफल बरामद हुई थी. आदिल की गिरफ्तारी के बाद एक दूसरे डॉक्टर को भी पकड़ा गया था. अभी यह छापेमारी चल ही रही थी कि लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 के पास हुए तेज धमाके ने देश को हिला कर रख दिया.

बड़ी बात यह है कि अब तक जिन्हें पकड़ा गया है उन में से एक भी घुसपैठिया नहीं है. सब यहीं पैदा हुए हैं और शायद सदियों से इसी इलाके में रह रहे हैं जो भारत में है. पढ़े-लिखे इन युवाओं को यह महारत तो होगी ही कि उन के इस काम की वजह से एक पूरी जमात को शक की निगाह से देखा जाएगा. फिर भी ऐसा किया गया, तो गुस्से को समझना भी होगा.

आतंकवादी घटना को अंजाम देने के लिए बड़ा जिगर चाहिए, बड़ी तैयारी की जरूरत होती है. इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार देश की राजधानी और उस से सटे राज्यों में आतंकी ले कर बैठे हुए थे. पता नहीं और कहां-कहां ऐसे जखीरे छिपा कर रखे गए हैं. यह काम करना आसान नहीं है.  सुरक्षा बलों की आंख में धूल झांक कर आतंकी इतनी बड़ी विस्फोटकों की खेप देश के भीतरी स्थानों तक आराम से पहुंचा देते हैं. कहीं कोई चेकिंग नहीं, कोई रोकटोक नहीं. जब तक कुछ खबर होती है और कहीं छापेमारी शुरू होती है, आतंकी किसी न किसी करतूत को अंजाम दे चुके होते हैं. जाहिर है, फरीदाबाद में छापेमारी के बाद जब 3 टन विस्फोटक जब्त होने की खबर बाहर आई तो अन्य जगहों पर छिपे बैठे आतंकियों ने स्थान बदलने शुरू कर दिए होंगे. पूरी आशंका है कि इसी कड़ी में लालकिले वाला विस्फोट हो गया हो या जानबूझ कर किया गया हो. यह भी हो सकता है जब पुलिस, इंटेलिजेंस और मीडिया का पूरा ध्यान इस घटना पर केंद्रित रहा हो, देश में छिपे बैठे आतंकियों ने स्थान भी बदल लिए हों और हथियार व बारूद भी दूसरी जगहों पर स्थानांतरित कर दिए हों. Terrorism In India :

Jassi Weds Jassi Movie Review : “पंजाबी शादी के इर्द गिर्द घूमती हिंदी फिल्म”

Jassi Weds Jassi Movie Review : पंजाबी शादी-ब्याहों में मौज-मस्ती खूब होती है. खाना-पीना तो तगड़ा होता ही है, कुड़ियां सज धज कर भंगड़ा करती हैं, बैंड वालों के साथ नाचती हैं. ‘आंख मारे, वो लड़की आंख मारे…’ वाली बातें तो इन शादियों में आम हैं. इन पंजाबी कुढि़यों के कपड़े तो देखो, लिश्कारे मारते हैं.

‘जस्सी वेड्स जस्सी’ पंजाबी शादी के इर्द गिर्द घूमती हिंदी फिल्म है. इस में 1990 के दशक के प्रेम पत्र, हास्य और दिलों को खुश करने वाले पल हैं. फिल्म कॉमेडी से भरी है. शादी में जहां मस्ती होगी, कौमेडी तो अपने आप शुरू हो जाती है.

एक अच्छे हास्य के लिए शोर शराबे की नहीं बल्कि अच्छी लेखनी, ईमानदार अभिनय और पसंदीदा कहानी की जरूरत होती है. यह फिल्म हमें उस जमाने की याद दिलाती है जब प्रेमी जोड़े छिप छिप कर आपस में मिलते थे. अपना प्यार प्रेम पत्रों के जरिए जाहिर करते थे. हद से हद बगीचों में गाने गा लिए जाते थे- ‘तू कितने बरस की, मैं 16 बरस की – तू कितने बरस का, मैं 17 बरस का…’, ‘मिल गए नैना अब की बरस न कहना…’ आदि. आज के सिनेमाई दौर में सिर्फ एक गुदगुदी मुस्कान-सी बन कर उभरती है यह फिल्म. फिल्म दर्शकों को 90 के दशक की याद दिलाती है. फिल्म की कहानी उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर की है.

कहानी जसप्रीत उर्फ जस्सी (हर्षवर्धन सिंह) की है जो एक निराश और हताश प्रेमी है, उसे सच्चे प्यार की तलाश है. उस की चाहत उसे जसमीत (रहमत रतन) तक ले जाती है. लेकिन उन के बीच आ जाता है एक और जस्सी यानी जसविंदर जस्सी (सिकंदर खेर). इस के बाद शुरू होती है गलतफहमियों का दौर. इसी दौरान जस्सी सहगल (रणवीर शौरी) और उस की पत्नी स्वीटी (ग्रुशा कपूर) से टकरा जाता है जो शादी से पहले ही ऊब चुके हैं. सब के जीवन में एक तूफान सा आ जाता है और यही दर्शकों को मजा देता है. कहानी त्रिकोणीय उलझन में फंस कर रह जाती है.

इस कहानी की पृष्ठभूमि 1996 की है. उस वक्त युवक युवतियां कैसेट सुनते थे, दोस्तों के साथ तंबोला खेलते थे. ये छोटे छोटे दृश्य उस टाइम की यादें ताजा करते हैं. ‘जस्सी वेड्स जस्सी’ भी दर्शकों को अपने बचपन या युवावस्था की याद दिलाती है.

फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. फिल्म का संगीत अच्छा है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Jassi Weds Jassi Movie Review :

Baramulla Movie Review : “आतंकवाद का इंटीरियर सिहरन पैदा करता है”

Baramulla Movie Review : यह एक सुपरनैचुरल क्राइम फिल्म है. ‘सुपर नैचुरल’ शब्द उन व्यक्तियों, वस्तुओं या घटनाओं के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें कुछ लोग वास्तविक मानते हैं हालांकि वे प्रकृति से परे होते हैं जैसे कि दिव्य, जादुई प्राणी आदि. इस फिल्म में कोई भूत प्रेत या डराने वाली चीजें नहीं हैं. आप को इस में थ्रिल मिलेगा. फिल्म देखते वक्त आप उत्सुक रहेंगे कि आगे क्या होने वाला है.

बारामूला कश्मीर घाटी का एक जिला है. यह कश्मीर घाटी के लिए एक प्रवेशद्वार रहा है. यहां जब-तब पाकिस्तानी आतंकवादियों की घुसपैठ होती रही है. यह शहर झेलम नदी के किनारे बसा है. निर्देशक आदित्य सुहास जांबले ने इस से पहले ‘आर्टिकल 370’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी उम्दा फिल्में बनाई हैं.

‘बारामूला’ कश्मीर की बर्फ से ढकी घाटियों में बनी एक रहस्यमय फिल्म है, जिस में डर भी है और इमोशंस भी. फिल्म में पुरानी यादें, कश्मीरी पंडितों का दर्द और अलौकिक घटनाएं एक साथ जोड़ते हैं.

कश्मीर की हसीन वादियां अपने दामन में कई जख्म समेटे हुए हैं. कश्मीरी बच्चों का पत्थरबाज बनना हो या कश्मीरी पंडितों का वहां से पलायन, ‘बारामूला’ इन्हीं जख्मों पर मरहम लगाती नजर आती है. घाटी में बच्चों का ब्रेनवाश कर के उन्हें आतंकवादी बनाने से ले कर इस फिल्म की कहानी 90 के दशक में पंडितों के कत्लेआम से जुड़ती है.

‘बारामूला’ की कहानी एक भूतपूर्व एमएलए के मासूम बेटे के गायब होने से शुरू होती है. इस केस को सुलझाने के लिए डीएसपी रिदवान शफी (मानव कौल) अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुम्बली), बेटी नूरी (अरिस्ता मेहता) और अयान (रोहन सिंह) के साथ बारामूला पहुंचता है. रिदवान के पड़ताल करते करते वहां कई और बच्चे गायब हो जाते हैं. वहीं जिस घर में रिदवान का परिवार रहता है वहां गुलनार और उस के बच्चों को अजीबोगरीब साए दिखते हैं. उन्हें उन सायों की परछाइयां भी दिखती है. अजीब आवाजें सुनाई पड़ती हैं, बच्चों का व्यवहार बदल जाता है मगर रिदवान इन सब पर विश्वास नहीं करता.

रिदवान और उस की बेटी के रिश्ते एक हादसे की वजह से सामान्य नहीं हैं. दिखाई देने वाले ये साए कौन हैं, बच्चों के गायब होने से उन का क्या कनेक्शन है, निर्देशक ने इस सब पर रहस्य का परदा डाला हुआ है. क्लाइमैक्स में जाकर रहस्य का पर्दाफाश होता है. क्लाइमैक्स का आधा घंटा असरदार है और झकझोरता है. अंत में रिदवान न सिर्फ अपनी खोई बेटी को ढूंढ़ निकालता है बल्कि बाकी बच्चों का पता भी लगा लेता है.

मध्यांतर से पहले फिल्म रोचक है, मध्यांतर के बाद यह भटकाने का काम करती है. कश्मीर पर अब तक बनी बाकी फिल्मों से यह काफी अलग है.

मानव कौल का किरदार इस माहौल में दर्शकों को उलझाए रखता है. कहानी में कश्मीर की दंतकथाओं में से निकले शैतानी किरदार पासिकदार को उठाया है. इस किरदार को कश्मीर की रियलिटी की कहानियों से बुना गया है. इस कहानी में पुलिस वालों के दर्द को भी बयां किया गया है. फिल्म का संपादन चुस्त है. सिनेमेटोग्राफी एक किरदार की तरह है. कश्मीर की वादियों और अंधेरे को कहानी से जोड़ा गया है. घर का इंटीरियर सिहरन पैदा करता है.

आदित्य सुहास जांबले का निर्देशन अच्छा है. निर्देशक ने अंत तक सस्पेंस बनाए रखा है. मानव कौल अपने किरदार में पूरी तरह फिट है. वह खुद बारामूला का निवासी है. भाषा सुम्बली ने गुलनार के किरदार में एक ऐसी औरत का किरदार निभाया है जो डरी हुई भी है और मजबूत भी. कहीं-कहीं कहानी धीमी हो जाती है. Baramulla Movie Review :

De De Pyaar De 2 Movie Review : “अब ऐसी फिल्में कम बन रहीं”

De De Pyaar De 2 Movie Review : वर्ष 2019 में ‘देदे प्यार दे’ के नाम से एक फिल्म आ चुकी है और अब इस फिल्म की सीक्वल ‘देदे प्यार दे 2’ आई है. इस बार कुछ कलाकार तो पहले भाग वाले हैं, कुछ को नया जोड़ा गया है. यह एक रोमांटिक कॉमेडी मूवी है, जो दर्शकों को मनोरंजन परोसती है. इस में फैमिली कॉमेडी है, उम्र के फासले हैं. यह फिल्म रिश्तों की भी बात करती है.

‘प्यार दे दे, हमें प्यार दे…’ वर्ष 1984 में आई फिल्म ‘शराबी’ का यह गाना खूब चला था. इसे अमिताभ बच्चन और जयाप्रदा पर फिल्माया गया था. मनचले यह गाना गा कर लड़कियों को छेड़ा करते थे. इस गाने को किशोर कुमार और आशा भोंसले ने गाया था.

बॉलीवुड में इस तरह की रोमांटिक फिल्में अब कम ही बन रही हैं. काफी समय बाद हिंदी सिनेमा में एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म देखने को मिली है जिस में अच्छा ह्यूमर है जो अश्लील नहीं है. एक जवान और कमसिन युवती अपने से दोगुने आदमी को अपना जीवनसाथी बनाने का फैसला कर ले तो उथलपुथल मचनी तय है. इसी गड़बड़झले को कॉमेडी, इमोशन और मनोरंजक तरीके से पेश किया गया है. यह फिल्म मध्यांतर से पहले तो दर्शकों को खूब हंसाती है मगर मध्यांतर के बाद लड़खड़ा जाती है.

फिल्म की कहानी आयशा (रकुल प्रीत सिंह) की है, जो 27 वर्ष की हो गई है. उसे 52 साल के तलाकशुदा एनआरआई इन्वेस्टर आशीष मेहरा (अजय देवगन) से प्यार हो जाता है. वह उस से शादी करना चाहती है लेकिन मुश्किल यह है कि माता पिता की रजामंदी कैसे हासिल की जाए. पहले पार्ट में आशीष मेहरा अपनी गर्लफ्रेंड को अपने परिवार वालों से मिलवाता है. उन्हें मनाने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है और काफी फनी सीन क्रिएट होते हैं.

अब इस इस के सेकंड पार्ट में उस की गर्लफ्रेंड आयशा आशीष को अपने परिवार से मिलवाने का फैसला करती है. मुश्किल यह है कि परिवार वाले मौडर्न और पढ़े लिखे हैं मगर उन के लिए उम्र से दोगुने से शादी की बात पचा पाना बेहद मुश्किल है. और चूंकि वे आधुनिक होने का क्लेम करते हैं तो इस बात को जगजाहिर भी नहीं करना चाहते.

आयशा अपनी भाभी किट्टू (इशिता दत्ता) की डिलीवरी का समय चुनती है ताकि इस खुशी के मौके पर उस की मम्मी (गौतमी कपूर) और पापा (आर माधवन) उस के रिश्ते के लिए हां कह दें. पहले तो परिवार वालों का रिएक्शन कुछ और था लेकिन आखिरकार वे उन दोनों की शादी के लिए राजी हो जाते हैं.

मतलब, यह लव स्टोरी आयशा के घर आ पहुंची है. शादी के लिए आशीष (अजय देवगन) को आयशा के परिवार की हां चाहिए. आर माधवन और गौतमी आयशा के पेरेंट्स हैं. अपनी बेटी के अफेयर से उन्हें कोई समस्या नहीं है, मगर क्या भारतीय समाज को यह मंजूर होगा?

फिल्म की यह कहानी प्रिडिक्टेबल है. एक ही विषय को घुमा फिरा कर 2 बार बनाना दर्शकों को बेवकूफ बनाने जैसा है. मगर विषय दिलचस्प जरूर है. तरुण जैन और लव रंजन ने ‘दे दे प्यार दे’ की कहानी को इस तरह लिखा है कि प्रोग्रेसिव पेरेंट्स के ईगो और मॉडर्न लव स्टोरी में टकराव दिखाया जा सके.

फिल्म शुरू होते ही जावेद जाफरी (जो पहली फिल्म में अजय देवगन के दोस्त बने हैं) मजेदार तरीके से पिछली फिल्म का रीकैप देता है. अजय देवगन की ही ‘सिंघम’ को कौमेडी के लिए यूज किया गया है. अजय देवगन की पत्नी काजोल कॉमेडी का हिस्सा है. जावेद जाफरी का बेटा मीजान जाफरी ऐसे लड़के की भूमिका में है जिसे आयशा को पटाने के लिए उस के पापा ने काम पर लगा रखा है. फिल्म यह बताने की कोशिश करती है कि प्यार आखिर है क्या. फिल्म उन्हें जरूर अच्छी लग सकती है जो जवान लड़कियों के साथ प्यार करने की हसरतें रखते हैं.

पूरी फिल्म में चटपटे संवाद हैं. फिल्म का नायक तो अजय देवगन है मगर माहौल आर माधवन ने बनाया है. आयशा की मां बनी गौतमी का काम भी बढ़िया है. अजय देवगन लवर की भूमिका में मैच्योर है.

फिल्म कहीं कहीं धीमी हो जाती है. क्लाइमैक्स भी धीमा है. किरदार कन्फ्यूज लगते हैं. रकुल प्रीत सिंह खूबसूरत लगी है. गाने फिल्म को स्लो करते हैं मगर सुनने में वे अच्छे हैं. कुछ सीन बेहद लंबे और गैरजरूरी हैं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. De De Pyaar De 2 Movie Review :

120 Bahadur Movie Review : “इमोशनल करती भारत-पाक युद्ध की कहानी”

120 Bahadur Movie Review : आजकल तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना के बादल दुनिया पर मंडरा रहे हैं. कई देश आपस में लड़ रहे हैं. परमाणु परीक्षण हो रहे हैं, खासकर अमेरिका और रूस में तो आपस में ठन गई है. पहले सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध हो रहा था मगर जब से अमेरिका में खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभाली है, तब से उस ने कई देशों को आपस में भिड़ा दिया है ताकि युद्ध चलता रहे और अमेरिका के हथियार लगातार बिकते रहें.

ऐसे दौर में वार फिल्में भी कुछ ज्यादा बनने लगी हैं. पहले कोई वार फिल्म कभी कभी ही देखने को मिलती थी. तब लोग देशभक्ति का गाना गुनगुनाया करते थे- ‘कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथिय’. 1964 में आई फिल्म ‘हकीकत’ का यह गाना आज भी गुनगुनाया जाता है.

उस के बाद ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘बौर्डर’ जैसी न जाने कितनी वार फिल्में बनीं और सराही गईं. फरहान अख्तर की ‘120 बहादुर’ फिल्म पर ‘बौर्डर’ फिल्म का प्रभाव साफ दिखता है. ‘बौर्डर’ फिल्म 1971 के युद्ध पर आधारित थी. इस फिल्म को देखने के लिए इतनी भीड़ थिएटरों में उमड़ी कि संभाले न संभल सकी. फिल्म ‘120 बहादुर’ लद्दाख के रेजांग ला दर्रे के पास हुए भारत चीन युद्ध पर बनी है.

1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान रेजांग ला दर्रे में चीनी सैनिकों ने एक भारतीय चौकी पर हमला कर दिया था. कठोर परिस्थितियों में भी भारतीय जवानों ने हार न मानी और चीनी सैनिकों का मुकाबला किया. कई चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था.

उस युद्ध के बाद लगभग 3 महीनों तक बर्फ की चादरों से ढके बंकर में 120 जवान दफ्न रहे थे. बाद में बर्फ पिघलने पर सेना के अन्य अधिकारियों के साथ साथ लोगों को भी पता चला कि रेजांगला के युद्ध में किस तरह 13 कुमाऊं रेजीमेंट के 120 सैनिकों ने भारत माता की रक्षा करते हुए अपनी जानें गंवाई. चीन के 500 सैनिक मारे गए. 1962 का यह युद्ध चीन की सबसे बड़ी क्षति मानी जाती है. चीन को भारत को आंखें दिखाने से पहले 1962 का युद्ध याद कर लेना चाहिए. आज के वार टाइम में यह एक एजेंडा फिल्म है और बिल्कुल सच्ची घटना है. फिल्म में बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी, लाजवाब सीन हैं. वीएफएक्स की क्वालिटी अच्छी है. ऐक्शन सीन अच्छे हैं. क्लाइमेक्स हिला कर रख देगा.

फरहान अख्तर 120 कलाकारों के साथ कमाल के लगे हैं. उस ने मेजर शैतान सिंह की भूमिका निभाई है. मगर उन की संवाद अदायगी अच्छी नहीं है. वहीं राशि खन्ना, विवान भटैना, अंकित सिवाय, अजिंक्य देव भी अहम रोल में हैं. फिल्म की कहानी अमिताभ बच्चन के मुंह से कहलवाई गई है जो कहीं-कहीं इमोशनल कर देती है. मध्यांतर से पहले कुछ हास्य के पल हैं. बैकग्राउंड में गूंजता भावनात्मक संगीत है. 120 Bahadur Movie Review :

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