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दलितों को मिला मोक्ष?

इस देश में आस्था एक नशा, वहम और बीमारी की तरह धर्मांध लोगों की नसों में उतर चुकी है. इसी आस्था का जानलेवा जहर मध्य प्रदेश के रतनगढ़ में उस समय कई लोगों की जान ले गया, जब दलितों का बड़ा जत्था मोक्ष की आस में भगदड़ में रौंदा गया. अंधविश्वासी दलितों को कैसा मोक्ष मिला, पढि़ए भारत भूषण श्रीवास्तव की रिपोर्ट में.

मध्य रेलवे के 2 बड़े जंक्शनों, ग्वालियर व झांसी के बीच स्थित दतिया रेलवे स्टेशन पर काफी कम रेलें रुकती हैं. मध्य प्रदेश के सब से छोटे और पिछड़े 5 जिलों में एक जिला दतिया भी है. यहां के लोग अपने शहर को बड़े फख्र से मिनी वृंदावन भी कहते हैं, क्योंकि शहर में इफरात से मंदिर हैं. दतिया से संबंध रखती एक और दिलचस्प बात स्थानीय लोगों का फोन पर हैलो की जगह ‘जय माई की’ संबोधन इस्तेमाल करना है.

यह माई यानी देवी शहर के बीचोंबीच बने मंदिर पीताम्बरा शक्ति पीठ में विराजती है जहां कोई न कोई तांत्रिक अनुष्ठान बारहों महीने चलता रहता है. रसूखदार नेता, अभिनेता, उद्योगपति, व्यापारी और खिलाड़ी भी पीताम्बरा के दर्शन के लिए खासतौर से आते हैं और महंगे अनुष्ठान करवाते हैं. कहा जाता है कि इस सिद्ध क्षेत्र में अनुष्ठान करवाने से मनोरथ पूरे होते हैं.

पीताम्बरा पीठ के बारे में यहां के लोग बगैर किसी हिचक के स्वीकारते हैं कि यह वीआईपी लोगों यानी पैसे वालों के लिए है. दरिद्रों और शूद्रों के मनोरथ पूरे करने के लिए दतिया से 55 किलोमीटर दूर जंगल में बना है रतनगढ़ देवी का मंदिर, जहां 13 अक्तूबर को पुल पर मची भगदड़ में लगभग 200 श्रद्धालु मारे गए.

भेदभाव की आस्था

रामनवमी के दिन रतनगढ़ के मुकाबले पीताम्बरा पीठ में जुटी भीड़ यानी श्रद्धालुओं की संख्या न के बराबर ही कही जाएगी. इस के बाद भी पीताम्बरा पीठ में सुरक्षा और शांति के मद्देनजर 100 पुलिसकर्मी तैनात थे. इस के उलट रतनगढ़, जहां लगभग 4 लाख श्रद्धालु थे, को महज दर्जनभर जवान दिए गए थे.

यह भेदभाव क्यों? इस का जवाब बेहद साफ है कि रतनगढ़ आने वाले श्रद्धालु छोटी जाति के थे जिन की जानमाल की परवा न पहले कभी की गई थी न आज की जाती है. पर दोनों ही मंदिरों में जुटी भीड़ हिंदुओं की बताई जाती है, नीची और ऊंची जाति का एक शाश्वत फर्क यहां से शुरू होता है या फिर यहां आ कर खत्म होता है, यह तय कर पाना मुश्किल है.

रतनगढ़ हादसे में मरने वाले शतप्रतिशत लोग चूंकि दलित, आदिवासी समुदाय के थे जिन्हें फख्र से आज भी गंवार, चमार और अछूत कहा जाता है, इसलिए उन की मौत पर हायहाय न के बराबर हुई, मानो आदमी नहीं, बरसाती कीड़ेमकोड़े मरे हों.

रतनगढ़ में इस भीड़ का घिरना अपनेआप में शक पैदा करने वाली बात क्यों और कैसे है, इस के पहले यह जान लेना जरूरी है कि हादसा क्या था, कैसे हुआ और इस के असल जिम्मेदार लोग कौन होते हैं.

क्या था हादसा

दूसरे धार्मिक हादसों के मुकाबले रतनगढ़ का हादसा कतई पेचीदा नहीं है. 13 अक्तूबर को लाखों की भीड़ यहां उमड़ी थी. अधिकांश श्रद्धालु बुंदेलखंड, चंबल आदि इलाकों से यहां देवीदर्शन के लिए आ रहे थे. वाहनों की लंबी कतार दतिया से ही दिखनी शुरू हो गई थी. पैदल चल कर आने वालों की तादाद भी कम नहीं थी.

रतनगढ़ पहुंचने के लिए यहां बहने वाली सिंधु नदी पर बने पुल से हो कर जाना पड़ता है, जो मंदिर से 2 किलोमीटर पहले पड़ता है. जब यह पुल नहीं बना था तब साल 2006 में भी पानी के तेज बहाव में काफी श्रद्धालु बह कर मर गए थे.

इस पुल पर यातायात नियंत्रण के कोई इंतजाम नहीं किए गए थे. 2 अधिकारी और 4 कर्मचारी पुल की निगरानी के नाम पर उमड़ते सैलाब को देखते अपने को कोस रहे थे कि बुरे फंसे, त्योहार के दिन भी ड्यूटी बजानी पड़ती है, इन्हें क्या जरूरत धर्मकर्म की, इस से इन की जाति और गति तो सुधरने से रही.

सेवढ़ा अनुभाग के तहत आने वाले इस इलाके का नजारा नवमी ही नहीं पूरे नवरात्रों में देखने लायक होता है. सिर पर माता के नाम की लपेटी गई लाल चुनरिया सुबह 8 बजे कफन बन गई जब 2 वाहनों की टक्कर में पुल पर जाम लग गया. वहां मौजूद नाममात्र की पुलिस ने भीड़ को तितरबितर करने के लिए अपने विवेक, जो हाथ में पकड़े डंडे में था, से काम लिया और उदारतापूर्वक बेवक्त ड्यूटी बजाने की अपनी भड़ास श्रद्धालुओं पर निकाली. इस गैरजरूरी और अघोषित लाठीचार्ज से भी काम न बना तो अफवाह यह उड़ा दी गई कि पुल टूट रहा है.

भक्ति का भूत मौत के डर के चलते गायब हुआ तो देखते ही देखते पुल श्रद्धालुओं की भीड़ से पट गया. लोग एकदूसरे को धकियातेकुचलते दौड़ने लगे. इस भगदड़ में बूढ़ों, बच्चों व औरतों की शामत ज्यादा आई जो कमजोरी के कारण पैरों तले रौंदे गए. अधिकांश लोगों को जान बचाने के लिए पुल से नीचे कूदना मुफीद लगा, कइयों ने हाथ में आए कपड़े और औरतों के शरीर से खींची गई साडि़यों की रस्सी बना कर पुल से उतर कर अपनी जान बचाई. भगदड़ का क्षेत्र महज 2 किलोमीटर तक रहा जहां 1 घंटे में 200 लोग मर चुके थे.

मंत्रीजी का आगमन

पुलिस ने लाठीचार्ज क्यों और किस के आदेश पर किया इस पर इसी विभाग के एक सब इंस्पैक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘हमें खबर मिली थी कि मंत्रीजी व उन के घर वाले आने वाले हैं, इसलिए जरूरी था? कि उन्हें रास्ता साफ मिले. लिहाजा, पुलिस ने भीड़ छांटने की कोशिशभर की थी.’

मंत्रीजी यानी पंडित नरोत्तम मिश्रा, जो राज्य के स्वास्थ्य मंत्री हैं, भारतीय जनता पार्टी के इस इलाके के ही नहीं, बल्कि राज्य के भी वे कद्दावर नेता हैं और दतिया विधानसभा सीट से इस बार भाजपा के उम्मीदवार भी हैं. शायद ही नहीं बल्कि तय है कि रतनगढ़ आने वाले वे दूसरे ब्राह्मण रहे होेंगे. वरना अछूतों के नाम कर दिए गए इस जंगल में बने मंदिर में ब्राह्मण तो दूर, ऊंची जाति का कोई भी जाना गंवारा नहीं करता.

वजह जो भी रही हो, भगदड़ मची, लोग दबेकुचले मरे, हल्ला मचा तो पूरा देश थर्रा उठा कि हे भगवान, यह क्या हो गया, एक और हादसा धर्मस्थल पर हो गया.

16 अक्तूबर तक लाशें गिनी जा रही थीं. सिंधु नदी इक्कादुक्का लाशें उगल रही थी. सुबह 10 बजे जब हम  रतनगढ़ पहुंचे तो कुछ अधिकारी वहां मुस्तैदी

से मीडियाकर्मियों को बड़े गर्व से बता रहे थे कि यह भीड़ तो कुछ भी नहीं, असल भीड़ तो दीवाली के बाद दूज के दिन इकट्ठी होगी. लग यों रहा था मानो हम देश के लगभग बीचोंबीच स्थित शहर दतिया के रतनगढ़ देवी मंदिर में नहीं बल्कि किसी सरहद पर हों जहां शत्रुसेना हमला करने वाली हो और चंद मुलाजिम सैनिकों की तरह देश की लाज बचाने के लिए अपनी जान कुरबान कर देंगे.

दरअसल, सरकार ऐसे हादसों के तुरंत बाद किए जाने वाले अपने 2 प्रिय काम कर चुकी थी. पहला, मुआवजे की घोषणा का और दूसरा, अधिकारी- कर्मचारियों को बर्खास्त करने का. चूंकि मध्य प्रदेश में भी 25 नवंबर को मतदान होना है इसलिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ये दोनों काम निर्वाचन आयोग की अनुमति से करने पड़े. तीसरी रस्म एक जांच आयोग गठित करने की भी अदा की गई.

एकसदस्यीय यह जांच आयोग कई बिंदुओं पर जांच करेगा, जिस में यह बिंदु शामिल नहीं है कि वे लोग कौन हैं जो गांवगांव जा कर धर्म का, चमत्कारों का प्रचार कर देहातियों को धर्मस्थलों पर आने के लिए उकसाते हैं और इस के पीछे उन की मंशा क्या रहती है.

अंधश्रद्धा

हादसे के बाद भी श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी रहा, मानो 2 दिन पहले कुछ हुआ ही न हो. जो हुआ वह भाग्य और दैवीय प्रकोप था. श्रद्धालुओं का ऐसा मानना था. ये श्रद्धालु रोजाना की तरह जत्थों में आते रहे और वही ‘जय माता दी’, ‘चलो बुलावा आया है’ सरीखे नारे लगा रहे थे. अब तक 13 अक्तूबर को मारे गए व घायलों की सूची भी प्रशासन ने जारी कर दी थी जिस में एक भी सवर्ण का नाम या उपनाम नहीं था.

हादसे पर कुदरती तौर पर राजनीति हुई. कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधा कि पुलिस वालों द्वारा ट्रैक्टरट्रौलियों के दाखिले के एवज में 200 रुपए की घूस लिए जाने की वजह से हादसा हुआ तो शिवराज सिंह चौहान सकपकाए से यही कह पाए कि हादसा चूंकि दुखद है इसलिए इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए.

ध्यान खींचने वाली बात सिर्फ बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने कही कि सरकार मृतकों व घायलों को दी जाने वाली मुआवजा राशि बढ़ाए. मायावती की दिलचस्पी मध्य प्रदेश के इस धर्मस्थल के हादसे में बेवजह नहीं है. हकीकत में मृतकों में उत्तर प्रदेश के लोग भी बराबरी से थे और सभी दलित थे. रतनगढ़, सेवड़ा विधानसभा क्षेत्र में आता है जहां से पिछली दफा बसपा जीती थी. उस के उम्मीदवार राधेलाल बघेल को यहां के दलित तबके ने हाथोंहाथ लिया था. बसपा इस दफा भी इस सीट से उम्मीद लगाए बैठी है.

यह राजनीति कतई उल्लेखनीय नहीं होती अगर इस में हिंदूवादी संगठनों की कोई भूमिका न होती. इस इलाके की हर एक सीट पर मजबूती से सभी को टक्कर दे रहे बहुजन संघर्ष दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष फूलसिंह बरैया का कहना है, ‘‘आरएसएस के लोग दूरदराज के इलाकों में त्रिशूल और धार्मिक साहित्य सामग्री बांटते रहते हैं. इन का मकसद अपनी दुकानदारी चलाए रखना है. अब ये दलितों को उन के हिंदू होने का एहसास कराते गांवगांव घूमते देवीदेवताओं की बातें करते हैं.’’

बरैया की बात में दम इस लिहाज से है कि ज्यादा नहीं अब से कोई 15-20 साल पहले तक अछूतों यानी दलितों का मंदिर में प्रवेश वर्जित था. 15-17 सालों में चमत्कार कैसे हो गया कि दलित और आदिवासी अचानक भारी तादाद में मंदिरों की तरफ भागने लगे.

धर्म के नाम पर वोटबैंक

अब से 12 साल पहले कांग्रेसी नेता और मध्य प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री महेंद्र बौद्ध ने एक भव्य और खर्चीला यज्ञ इस इलाके में करवाया था जिस की खूबी यह थी कि इस में मौजूद अधिकांश लोग दलित तबके के थे. खुद बौद्ध भी इसी समुदाय के थे. इसलिए भीड़ देख उत्साहित थे कि अब उन का वोटबैंक भाजपा की तरह, धर्म के नाम पर ही सही, पक्का हो गया.

पर हुआ उलटा. चमत्कारी तरीके से दलित वोटबैंक भाजपा के खाते में चला गया. यज्ञहवन की आहुतियों का जो रास्ता महेंद्र बौद्ध ने दिखाया था उसे हिंदूवादी संगठनों ने इस कदर हथियाया कि दलित खुद को गर्व से हिंदू कहने लगा. मुमकिन है कि आरएसएस को दलितप्रेम की प्रेरणा इसी आयोजन से मिली.

इसी दौरान, संघ ने हिंदुओं के धर्म पर दोबारा बवाल मचाना शुरू किया, प्रचार यह किया गया कि क्रिश्चियन मिशनरियां हमारे भोलेभाले आदिवासी भाइयों को जबरन या लालच दे कर ईसाई बना रही हैं. हम उन की वापसी हिंदू धर्म में करेंगे और उन का शुद्धिकरण भी करेंगे. छत्तीसगढ़ में दिलीप सिंह जूदेव जैसे जमीनी नेताओं ने तो संघ के सहयोग से बाकायदा इस बाबत धर्मवापसी की मुहिम भी चलाई थी.

चंबल के भिंड, मुरैना, दतिया और विंध्य के रीवा, सतना जिलों में बसपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए दलितों पर डोरे डाले गए. प्रचार यह किया गया कि अब दलितों के लिए भी मंदिरों के दरवाजे खुले हैं और वे तनमनधन से धर्मकर्म कर सकते हैं. इस में वेदपुराण, ब्राह्मण और पंडे बाधा नहीं बनेंगे बल्कि उन का हृदय से स्वागत करेंगे.

यह स्वागत साल दर साल नवरात्रि के दिनों में खासतौर से देखने में आया. दलित और आदिवासी बाहुल्य इलाकों से पैदल चल कर मंदिर आनेजाने वाले श्रद्धालुओं के स्वागतसत्कार के लिए जगहजगह फलाहार और स्वल्पाहार के स्टौल सजाए जाने लगे. भगवा झंडे और तंबू तले बैठ कर 9 दिन व्रत करता भूखाप्यासा दलित सागूदाने की खिचड़ी खाने मात्र से कथित तौर पर खुद को महज धर्म के आधार पर मुख्यधारा में शामिल समझने लगा. और इसे, बराबरी समझ ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करने लगा.

पुराना धंधा, नए ग्राहक

90 का दशक धर्म और पंडिताई के लिहाज से भी बदलाव का रहा जो किसी को नजर नहीं आया. हुआ यह कि ऊंची जाति वालों के बच्चे तकनीकी शिक्षा की डिगरी ले कर बड़े शहरों में जा कर नौकरी करने लगे जिस की मार कारोबारी पंडे बरदाश्त नहीं कर पाए. खुद ब्राह्मणों के अलावा क्षत्रिय, बनियों और कायस्थों की पूरी पीढ़ी महानगरों में आ कर बसने लगी तो शहरी पुरोहित और देहाती पंडे भुखमरी की कगार पर आ कर खुद के आरक्षण की मांग करने लगे. इन की बड़ी तकलीफ यह भी थी कि जिन घरों में साल में 4 दफा उन्हें धार्मिक समारोहों में बुलाया जाता था वहां 4 साल में 1 दफा भी बुलावा आना बंद हो गया.

सवर्णों की कंप्यूटरी पीढ़ी अपने बच्चों का मुंडन जैसा अनिवार्य धार्मिकसंस्कार भी करवाने से कतराने लगी. इस से ज्यादा चिंता की बात यह थी कि वह अपने बापदादों की तरह पूर्णिमा, अमावस्या और हिंदू पंचांग भी भूलने लगी. 14-16 घंटे नौकरी करती इस पीढ़ी को समझ आ गया कि धर्म के नाम पर लुटने से कोई फायदा नहीं, न ही ज्यादा बच्चे पैदा करना फायदे की बात है. इसी दौरान, सवर्ण लड़कियां भी तेजी से नौकरियों में जाने लगीं जिन्हें धर्मकर्म और कर्मकांडों से कोई खास लगाव नहीं रहा.

इस घाटे की पूर्ति करने के लिए धर्म के दुकानदारों का ध्यान पिछड़े वर्ग की तरफ गया. जल्द ही पंडे उन के यहां जा कर पूजापाठ करने लगे और एवज में खासी दक्षिणा भी पाने लगे पर हैरतअंगेज तरीके से पिछड़ों ने सवर्णों के मुकाबले ज्यादा और जल्द तरक्की की. उन के बच्चे भी सवर्णों की तरह पढ़ कर महानगरों की तरफ भागने लगे.

ऐसे में हिंदूवादियों को झख मार कर वंचित तबके के लोगों को ग्राहक बनाना पड़ा. उस वर्ग के लोगों को धर्म की घुट्टी पिलाई जाने लगी. जिसे कल तक दुत्कारा जाता था, छोटी जाति में उस के जन्म को पूर्वजन्म के पापों का फल कहा जाता था, वेदों में उसे सेवक कहा गया है, इस तरह का प्रचार कम किया गया बल्कि उस के माथे पर तिलक लगाया जाने लगा. ऐसा सिर्फ पैसों के लिए किया गया. इस से न तो छुआछूत बंद हुई न ही दलित अत्याचार कम हुए.

इस का असर हुआ और वाकई चमत्कारी ढंग से हुआ. सदियों से सवर्णों से पिटता और दुत्कारा जाता रहा एक बड़ा वर्ग खुद को हिंदू महसूस करने लगा, शर्त दक्षिणा चढ़ाने, भीड़ बढ़ाने पूजापाठ करने और व्रत करने की थी. वह यह सब करने लगा. आज दलितों का उत्साह रतनगढ़ देवी जैसे मंदिरों में हर कहीं देखा जा सकता है.

देवीदेवताओं के चमत्कारी किस्से जोर पकड़ने लगे, इसे हिंदूवादी संगठनों ने आस्था का सैलाब कह कर प्रचारित किया. आरएसएस जैसे कट्टरवादी संगठनों का फायदा यह था कि दलित उन के जरिए भाजपा से जुड़ने लगे और पंडों के पांव भी छूने लगे. भगवा सरकारों ने इस के एवज में जम कर रेवडि़यां संघ और उस के अनुयायी संगठनों को बांटीं.

एक मिसाल भोपाल की है, जहां के एक पौश और व्यावसायिक इलाके एमपी नगर में वनवासी कल्याण परिषद का दफ्तर करोड़ों की जमीन पर बना है. वहां एक आदिवासी मंदिर भी बना दिया गया है.

मगर यह सोचना सरासर बेवकूफी की बात है कि इस से छुआछूत, भेदभाव और जातिगत तिरस्कार बंद हो गए, फर्क सिर्फ इतना आया कि इन नवागंतुक हिंदुओं से धर्म की कीमत वसूली जाने लगी. पंडों को नोट मिले, भाजपा को वोट और आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को ताकत मिली जिस के बल पर उस ने नरेंद्र मोदी जैसे मनुवादी हिंदू नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवा डाला.

आरएसएस को तगड़ा पैसा, जमीनें और सहूलियतें भाजपा से मिलती हैं. वह भी एक तरह की दक्षिणा ही है. आरएसएस की पैरवी से भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में सत्ता मिलने लगी. उत्तर प्रदेश के हालात भिन्न रहे क्योंकि यहां के जातिगत समीकरण बसपा संस्थापक कांशीराम 80 के दशक से ही बदलने में कामयाब होने लगे थे. राम मंदिर के एक धक्के के बाद भाजपा औंधेमुंह वहां गिरी और कांशीराम की बोई फसल मायावती अभी तक काट रही हैं.

दलित अगर हिंदू माना जाने लगा है तो बसपा और मायावती कमजोर क्यों नहीं हो रहे, इस सवाल का जवाब भी बेहद साफ है कि अभी भी दलित समुदाय पूर्व के सवर्ण अत्याचार को भूला नहीं है और अपनी इकलौती दलित नेता को मजबूत बनाए रखने के लिए बसपा को वोट देता रहता है. मायावती और मुलायम सिंह यादव दोनों की गिनती मनुवाद के विरोधियों में होती है. मुलायम सिंह अपनी सहूलियत के मुताबिक पैंतरा बदलते रहते हैं और प्रधानमंत्री पद के लिए कभी भी, किसी से भी कोई भी, कैसा भी समझौता कर सकते हैं. मौका मिला तो मायावती भी ऐसा करने से हिचकिचाएंगी नहीं और दुहाई दलित और उस के हितों को ही देंगी.

इन राजनीतिक समीकरणों का सामाजिक हालात से गहरा नाता है. अकेले रतनगढ़ में नहीं बल्कि देश के सभी, खासतौर से पश्चिम, मध्य और उत्तरी राज्यों में इस नवरात्रि पर गरीबों, जो हकीकत में दलित हैं, ने जम कर महंगी झांकियां लगाईं और अपनी बस्तियों में भंडारे आयोजित किए. अपने स्तर पर गरबा कर धर्म का मजा सवर्णों की तरह लूटा. फर्क इतना था कि दलितों के गरबे खुले मैदानों में हुए और सवर्णों के भव्य पंडालों व महंगे होटलों में.

हिंदू धर्म के ठेकेदारों और दुकानदारों को यह बात भी समझ आ गई कि दलित आदिवासियों को बहलाने के लिए चमत्कारों के छोटेमोटे किस्सेकहानी काफी हैं जो कभी सवर्णों को फंसाने के लिए इस्तेमाल किए जाते थे. अब सवर्ण ब्रैंडेड बाबा पालनेमानने लगे हैं. धर्म को दर्शन और आध्यात्म से जोड़ते हुए लुटने के ठौरठिकाने और तरीके उन्होंने बदल लिए हैं.

रतनगढ़ देवी मंदिर में दीवाली के बाद दूज पर लाखों दलित इकट्ठा होते हैं. मान्यता यह है कि किसी को सांप काट ले तो तुरंत रतनगढ़ देवी का नाम ले कर काटे गए स्थान पर पट्टी बांध लो, जान बच जाएगी.

दरअसल, इस नशे,  बीमारी और वहम का कोई इलाज नहीं है जिसे आस्था कह कर प्रचारित किया जा रहा है. वह हकीकत में अंधविश्वास है. और दलितों को जकड़े रखने के लिए यह जरूरी भी है ताकि वे शिक्षित न हो पाएं, पैसा लुटाते रहें, भीड़ बढ़ाते रहें. और मुद्दे की बात यह कि आज भी वे बड़ी जाति वालों के घर के सामने से गुजरें तो जूतियां पैरों से उतार कर सिर पर रख लें.

यह दृश्य आज भी देहातों में आम है पर रतनगढ़ जैसे मंदिरों में नहीं, जहां हिंदूवादी संगठनों के उकसावे में आ कर लाखों दलित उन्मादियों की तरह टूट पड़ते हैं, भगदड़ मचती है तो मारे जाते हैं. इस पर तरस खाने वाली बात प्रचार का करना है कि यह तो मोक्ष है, देवी की मरजी है जिस पर किसी का जोर नहीं.

इस पूरे खेल, जिसे साजिश कहा जाना बेहतर होगा, में चिंता की इकलौती बात दलित आदिवासियों की बदहाली व पिछड़ापन है जिस पर अब हिंदू मिशनरियां अपनी रोटी सेंक रही हैं. पूजापाठ और यज्ञहवन से तरक्की होती तो 40 फीसदी यह आबादी तो दूर की बात है, देश का भला तो कभी का हो गया होता.

भारतीय बाजारों में चीन का डिजिटल हमला

देश के बाजारों में चीन के डिजिटल हमले ने व्यापारिक असंतुलन पैदा कर दिया है. तकनीकी सामान की आड़ में चीन के भारतीय बाजार पर अघोषित कब्जे और पिछले दशक से वर्तमान व्यापारिक असंतुलन तक चीन की आर्थिक नीतियों का विश्लेषण कर रहे हैं अरविंद कुमार सेन.

वर्ष 2005 की बात है. उस समय चीन के प्रधानमंत्री रहे वेन जियाबाओ ने भारत आने का ऐलान किया था. जवाहरलाल नेहरू के जमाने में आए चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई की यात्रा के तकरीबन साढे़ 4 दशक बाद कोई चीनी प्रधानमंत्री भारत आ रहा था. 1962 की लड़ाई के बाद भारत और चीन ने आपसी रिश्ते तोड़ लिए थे. जाहिर है, लंबा अरसा गुजरने के बाद बीजिंग की ओर से वेन जियाबाओ का आना अहम बात थी. मगर वेन जियाबाओ ने भारत पहुंचने से पहले ही धमाका कर दिया. बीजिंग की तरफ से कहा गया कि चीनी प्रधानमंत्री भारत की राजधानी नई दिल्ली जाने के बजाय सब से पहले बेंगलुरु जाएंगे.

भारत की सिलीकन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु में देश की नामी आईटी कंपनियों के मुख्यालय हैं. 1990 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की अगुआई आईटी सैक्टर की कंपनियों ने की है और बेंगलुरु इस नए भारत का गढ़ है. मतलब, बेंगलुरु जा कर वेन जियाबाओ कोई संदेश देना चाह रहे थे. वह संदेश मिला नई दिल्ली में, जब भारत में चीन के राजदूत ने कहा कि भारत के मामले में चीन के लिए बाउंड्री (भारत-चीन विवादित सीमा) के बी के बजाय बिजनैस का बी ज्यादा अहमियत रखता है.

संदेश साफ था, 21वीं सदी में भारतीय बाजार को हथियाने के लिए चीन सैन्य नीति की बजाय कारोबारी नीति पर काम कर रहा था. वेन जियाबाओ का कहना था कि भारत व चीन को अपनी विवादित सीमा का मसला अलग रख कर कारोबारी रिश्तों में मेलजोल बढ़ाना चाहिए. भारत ने चीन के इस तर्क को स्वीकार कर लिया. दोनों देशों ने अपनेअपने घरेलू बाजार एकदूसरे के लिए खोल दिए और आपसी कारोबार कुलांचें भरने लगा.

1990 में दोनों देश के बीच आपसी कारोबार शून्य था मगर अब यह 70 अरब डौलर का आंकड़ा पार कर गया है. कारोबार के लिहाज से यह बहुत बड़ी रकम है लेकिन इस का फायदा केवल चीन को ही मिलता है क्योंकि दोनों देशों का कारोबारी घाटा भी रिकौर्ड 30 अरब डौलर की ऊंचाई पर पहुंचा हुआ है.

यह कारोबारी घाटा भारत के खाते में झुका हुआ है. यानी भारत, चीन से आयात ज्यादा करता है, निर्यात कम करता है. सूई से ले कर वाहनों तक और खिलौनों से ले कर लैपटौप तक हर सामान चीन से आ रहा है.

कैसे किया कब्जा

आधुनिक विश्व का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस देश का मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर आला दरजे का है उसी ने दुनिया पर राज किया है. 1945 से पहले ब्रिटेन के कारखानों से निकला सामान दुनियाभर के बाजारों पर राज करता था. 1945 के बाद अमेरिका दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बना. वहीं, 1980 के दशक में जापान ने यह ताज अपने सिर रख लिया. 1990 में दक्षिण कोरिया, चीन और जरमनी दुनिया की फैक्टरी में तबदील हो गए. कोरियन और जरमन कंपनियों के उत्पादों ने अपनी हाई क्वालिटी के दम पर पूरी दुनिया में धाक जमाई है. मगर हाई क्वालिटी का सामान महंगी कीमत पर मिलता है.

दूसरी ओर, चीनी सामान ने बड़ी कंपनियों की पहुंच से बाहर छूट चुके गरीब और कम आमदनी वाले लोगों को निशाना बनाया. चीनी सामान की दूसरी खासीयत है कि यह तकनीक के साथ तालमेल बनाए रखता है. आप चीनी कंपनियों के सहारे हर नई तकनीक का मजा महज 4 से 5 हजार की मामूली सी रकम में उठा सकते हैं. अगर 3 महीने बाद आप को अपना हैंडसैट बदलना है तो भी आप की जेब को दर्द नहीं होगा क्योंकि हैंडसैट की कीमत महज 4 हजार रुपए के भीतर ही है. यही बात लैपटौप, टैबलेट से ले कर कैमरे और एलसीडी टीवी जैसे तमाम इलैक्ट्रौनिक गैजेट्स पर लागू होती है. साइंस में हो रही रिसर्च ने टैक्नोलौजी की लाइफ कम कर दी है और यह चीज चीनी कंपनियों के पक्ष में काम कर रही है.

चीन की अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर की हिस्सेदारी 30 फीसदी से ऊपर है जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर महज 16 फीसदी योगदान देता है. सीधा मतलब है कि चीन की फैक्टरियां बड़े पैमाने पर इलैक्ट्रौनिक गैजेट्स का उत्पादन कर रही हैं.

चीनी सरकार ने पूरे देश में स्पैशल इकोनौमिक जोन बना कर मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को टैक्स में छूट दे कर उन्हें बेहद कम दामों पर जमीन मुहैया करवाई है. 1980 के दशक से ही चीनी सरकार ने शिक्षा और हैल्थ सैक्टर में खासा निवेश किया है. चीनी सरकार इन दोनों बुनियादी सैक्टरों पर भारत से लगभग तीनगुना ज्यादा पैसा खर्च करती है. जाहिर है, चीन में बड़े पैमाने पर स्किल्ड लेबरफोर्स कम दामों पर उपलब्ध है. रिसर्च ऐंड डैवलपमैंट यानी आर ऐंड डी पर चीन मोटी रकम खर्च करता है, लिहाजा, नई तकनीक ईजाद करने की लागत भी कम आती है.

एक गैजेट को तैयार करने में लगने वाली हर तरह की इनपुट कौस्ट पर चीनी सरकार ने नकेल कस रखी है, इसलिए आउटपुट कौस्ट यानी किसी गैजेट का मूल्य भी कम रहता है. चीन का सब से बड़ा हथियार करैंसी डिवैल्युएशन (मुद्रा अवमूल्यन) है, जिस के जरिए चीनी सरकार ने जानबूझ कर अपने देश की मुद्रा युआन की कीमत कम कर रखी है जिस का सीधा फायदा दूसरे देशों को निर्यात करने वाली चीनी कंपनियों को मिलेगा.

दरअसल, 1995 में विश्व व्यापार संगठन यानी डब्लूटीओ के दबाव में भारत जैसे कई विकासशील देशों ने चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए किए हैं. एफटीए के बाद दो देश एकदूसरे के बाजारों में सामानों की आवाजाही पर इंपोर्ट ड्यूटी नहीं लगाते हैं. ऐसे में चीन के शंघाई शहर की फैक्टरी में बना सामान उसी कीमत पर नई दिल्ली या लखनऊ में बेचना संभव है. चीन का मैन्युफैक्चरिंग सैक्टर मजबूत है, लिहाजा, वह एफटीए के बाद मिलने वाले खुले बाजार का फायदा उठाने के लिए बेहतर पोजीशन में रहा है. भारत ही नहीं, दुनिया के आका अमेरिका के बाजार को भी चीनी कंपनियों ने अपने सस्ते सामान से पाट रखा है.

क्या कायम रहेगा चीनी जलवा

चीन से मिल रहे संकेतों को आधार मानें तो यह तय है कि चीन का दबदबा ढलान की ओर है. चीनी सामान को सस्ता बनाने वाला सब से बड़ा फैक्टर चीनी करैंसी युआन की कम कीमत यानी करैंसी डिवैल्युएशन है. मगर अब चीन की इस चाल पर सवाल उठने खड़े हो गए हैं.

अमेरिका की अगुआई में यूरोपियन यूनियन ने चीन पर युआन की कीमत में इजाफा करने का दबाव बना रखा है. वहीं कम पगार पर काम करने वाले चीनी मजदूरों के वेतन बढ़ोत्तरी की मांग को ले कर निकट भविष्य में हड़ताल पर जाने की खबरें भी छनछन कर आ रही हैं.

लंदन से छपने वाली मशहूर पत्रिका द इकोनौमिस्ट ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि कम पगार के कारण चीन में मजदूरों का गुस्सा धीरेधीरे चरम स्थिति की तरफ जा रहा है और किसी भी वक्त विस्फोटक रूप ले सकता है. उधर, अफ्रीका और पश्चिमी एशिया की राजनीतिक अस्थिरता के कारण पैट्रोलियम समेत कई चीजों के दामों में इजाफा हो गया है, लिहाजा, कम कीमत पर इलैक्ट्रौनिक गैजेट्स का निर्माण करना मुश्किल होता जा रहा है.

चीनी कंपनियों के सस्ते गैजेट्स की बाढ़ से निबटने के लिए बड़ी कंपनियों ने भी कम कीमत वाले गैजेट्स बनाने शुरू कर दिए हैं. मसलन, पिछले दिनों महंगे फोन बनाने वाली अमेरिका की एप्पल कंपनी ने भारत जैसे विकासशील देशों के उपभोक्ताओं के लिए अपने मशहूर मोबाइल हैंडसैट आईफोन का सस्ता संस्करण महज 5 हजार रुपए की कीमत में लौंच कर दिया है. सस्ती गैजेट्स लाने की यह होड़ केवल मोबाइल कंपनियों में ही नहीं है, एसी से ले कर कार बनाने वाली कंपनियां भी कम कीमत के प्रौडक्ट लौंच करने के इस दंगल में कूद चुकी हैं. नतीजा, सस्ते गैजेट्स के दम पर दुनियाभर का बाजार हथियाने वाली चीनी कंपनियों के साम्राज्य को जोरदार चुनौती मिलनी शुरू हो चुकी है.

सब चीन का माल है

अगर आप एप्पल का आईमैक लैपटौप खरीद कर इस इल्म में हैं कि आप ने अमेरिकी कंपनी का प्रौडक्ट खरीदा है तो आप गलत हैं. आप ने लैपटौप तो चीनी खरीदा है केवल उस की ब्रैंडिंग अमेरिकी है. दरअसल, चीनी कंपनियों के सस्ते माल से मुकाबला करने के लिए दुनियाभर की बड़ी कंपनियों ने अपने गैजेट्स की लागत कम करने के लिए चीन में ही अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगा लिए हैं. आप के गैजेट पर किसी अमेरिकी, जापानी या कोरियन कंपनी का ब्रैंड नेम तो हो सकता है लेकिन उस के भीतर कलपुरजों पर मेड इन चाइना ही लिखा होगा.

चीन के दम पर छा गए

पुरानी कहावत है कि कई दफा दुश्मन को मात देने के लिए उसी की शैली में लड़ना पड़ता है. अमेरिका, जापान और यहां तक कि भारत की कई कंपनियों ने इस गुर को बखूबी समझ लिया है. मिसाल के तौर पर माइक्रोमैक्स का उदाहरण लीजिए. 5 साल पहले इस भारतीय कंपनी को कोई नहीं जानता था. 2008 में माइक्रोमैक्स ने चीनी कंपनियों के साथ सस्ते मोबाइल हैंडसैटों के निर्माण और आपूर्ति पर करार किया. माइक्रोमैक्स ने चीन में कम दामों पर बने मोबाइल हैंडसैटों को भारत ला कर अपने ब्रैंड के नाम से बेचना शुरू कर दिया. गैजेट चीन का था, केवल उस की ब्रैंडिंग और ठप्पा भारतीय कंपनी के नाम से था. नतीजा हिला देने वाला है.

भारत की इस अदनी सी कंपनी माइक्रोमैक्स ने भारतीय मोबाइल बाजार पर कब्जा किए बैठी यूरोपीय देश फिनलैंड की कंपनी नोकिया को जबरदस्त शिकस्त दी थी. एप्पल जैसी दिग्गज कंपनियां भी अब माइक्रोमैक्स के रास्ते पर चल पड़ी हैं. ये कंपनियां अपने गैजेट्स ठेके पर चीनी कंपनियों से बनवा रही हैं और ब्रैंडिंग के बाद अपना ठप्पा लगा कर दुनियाभर में बेच रही हैं.

चीन का दर्द

चीनी कंपनियों का कहना है कि बेकार ही उन पर दुनिया के बाजार पर एकाधिकार करने की तोहमत लगाई जा रही है. चीनी सरकार का तर्क है कि ब्रिटेन, अमेरिका और जापान ने भी शुरुआती दिनों में अपनी घरेलू कंपनियों को सहारा देने के लिए अपनी मुद्राओं की कीमतों में जानबूझ कर कमी की थी. अगर जापान सोनी और पैनासोनिक को खड़ा करने के लिए अपनी करैंसी की कीमत कम कर सकता है तो यही काम हुवाई और लेनोवा को खड़ा करने के लिए चीन क्यों नहीं कर सकता है? चीनी सरकार अपनी कंपनियों को सहारा देने के लिए युआन की कीमत कम रखने की बात पर अडिग है.

चीनी कंपनियों का तर्क है कि चीन में किसी भी गैजेट की फाइनल असैंबलिंग होती है लेकिन उस के निर्माण में काम आने वाले कलपुरजे पूरी दुनिया से मंगाए जाते हैं. चूंकि चीन में लागत कम है, लिहाजा, लैपटौप की फाइनल असैंबलिंग चीनी मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में की जाती है और इस के तैयार होने के बाद बौडी पर मेड इन चाइना का ठप्पा लगा दिया जाता है. ऐसे में ग्लोबल मार्केट पर चीनी कब्जे की बातें आधारहीन हैं.

वहीं, वास्तविकता यह भी है कि किसी गैजेट में काम आने वाला सामान और तकनीक सप्लाई करने वाले देश भी बिक्री से मिलने वाला मुनाफा लेते हैं, चीन को तो केवल फाइनल असैंबलिंग से हासिल होने वाला मार्जिन ही मिलता है. फाइनल असैंबलिंग के बाद गैजेट चीन से बाहर निकलता है तो वह चीनी सरकार के व्यापार खाते में दर्ज हो जाता है. वास्तव में उस गैजेट की बिक्री का असली फायदा किसी जरमन या जापानी कंपनी को मिलेगा. सतही तौर पर यह कारोबारी घाटा चीन का मुनाफा लगता है लेकिन धरातल पर ऐसा नहीं है. बहरहाल, ‘मेड इन चाइना’ ने भारत के मैन्युफैक्चर सैक्टर को बुरी तरह हिला कर रख दिया है. 

सियासी उठापटक में फंसा आदिवासी

झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता, लचर विस्थापन और ढुलमुल पुनर्वास नीतियों के चलते आदिवासियों का जीवन दूभर हो गया है. दानेदाने को मुहताज इन आदिवासियों को जीवनयापन की आधारभूत सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम प्रशासन से सिवा परेशानियों के कुछ भी हासिल नहीं हुआ. क्या है पूरा मामला, बता रहे हैं बीरेंद्र बरियार.

रांची के पास सिल्ली में रहने वाली मजदूर रंगीली भगत गुस्से में कहती है, ‘‘आदिवासी जान दे देगा पर जंगल और जमीन नहीं छोड़ेगा. आदिवासियों के राज्य में आदिवासियों की जमीन और जंगल को उजाड़ कर तरक्की हो ही नहीं सकती. उद्योग लगाने के नाम पर आदिवासियों को हटाया जाता है, पर न उन्हें मुआवजा मिलता है न ही उद्योग लगता है.’’

पिछले 13 सालों से झारखंड में नई पुनर्वास नीति बनाने की जद्दोजहद में आदिवासियों और उन की जमीनों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. उन के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश के नाम पर उन के जख्मों को कुरेदा ही जाता है. यही वजह है कि देश की कुल खनिज संपदा का 40 फीसदी झारखंड में होने के बाद भी सूबे में न उद्योग लगने में तेजी आई, न आदिवासियों को उन का हक मिल सका और न ही सूबे की खास तरक्की हो सकी.

सूबे की कोरबा जनजाति की हालत को देख कर आदिवासियों की बदहाली का अंदाजा लगाया जा सकता है. यह जनजाति फाकाकशी में जीती है, जंगली फल, चिडि़या, चूहा, घूस, खरगोश खा कर गुजारा करती है. पीने के लायक पानी के लिए इस जनजाति के लोगों को मीलों भटकना पड़ता है.

हरखू बताता है कि उन लोगों का समूचा दिन खाने और पीने की चीजों के जुगाड़ करने में ही निकल जाता है. कोरबा जनजाति के ज्यादातर लोग महुआ की शराब और चावल खा कर गुजारा करते हैं. जंगलों में घूमघूम कर फल, फूल, लकड़ी, चूहा आदि ढूंढ़ना उन का काम है. कुछेक लोग खेती, पशुपालन और मजदूरी करते हैं. बगैर हल, बैल, खाद, बीज और पानी के खेती कैसी होगी, इस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. महाजनों और सूदखोरों के चंगुल में फंस कर कई कोरबा बंधुआ मजदूर बन कर रह गए हैं.

आदिवासियों की जमीन के लिए पिछले कई सालों से आवाज उठा रही दयामनि बारला कहती हैं कि जनजातियों की तरक्की के लिए आजादी के बाद से ले कर अब तक किसी तरह की सरकारी योजनाओं का रत्तीभर हिस्सा भी उन तक नहीं पहुंच सका है. बीमार पड़ने पर कोरबा लोग तंत्रमंत्र और ओझागुनिया के चक्कर में फंस कर अपनी उपस्थिति को धीरेधीरे खत्म कर रहे हैं.

दरअसल, झारखंड की सियासी उठापटक और लचर विस्थापन और पुनर्वास नीति की वजह से नए उद्योगों के लगने की गति तेज नहीं हो पा रही है. वहीं, करीब साढ़े 3 लाख आदिवासी विस्थापन का दर्द झेलने को मजबूर हैं. आदिवासियों की तरक्की के नाम पर झारखंड राज्य बने 13 साल हो गए पर अब तक न औद्योगिक नीति बनी और न ही विस्थापन और पुनर्वास नीति ही आकार ले सकी.

रांची हाईकोर्ट के वकील अभय सिन्हा कहते हैं, ‘‘अलग झारखंड राज्य बनने के बाद से अब तक करीब 66 एमओयू पर दस्तखत हुए पर एक पर भी काम चालू नहीं हो सका. 13 सालों में सूबे के 9 मुख्यमंत्री आए पर आदिवासी और उन की समस्याएं जस की तस मुंह बाए खड़ी हैं.’’

झारखंड में आदिवासियों के लिए विस्थापन और पुनर्वास की समस्या नई नहीं है, वे सदियों से इस समस्या से जूझ रहे हैं. आदिवासियों के नाम पर अलग राज्य बनने के बाद भी इस समस्या को दूर करने का दावा और वादा किया गया था पर अलग राज्य बनने के बाद किसी भी सरकार के कान पर जूं तक न रेंगी.

झारखंड विस्थापन संघर्ष समिति के नेता चेतन भगत बताते हैं कि सूबे में अब तक 3 लाख से ज्यादा आदिवासी विस्थापित हो चुके हैं, इस में सब से ज्यादा विस्थापन खदानों की वजह से हुआ है. रोज नई खदानों में काम चालू होते रहे और आदिवासियों को जंगल व जमीन छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता रहा. बड़े बांधों और सिंचाई की योजनाओं की वजह से भी विस्थापन होता रहा. कुल विस्थापितों में से 70 फीसदी आदिवासी पुनर्वास के लिए दरदर भटक रहे हैं, जिन की सुनने वाला कोई नहीं है. आदिवासियों को उन के हाल पर छोड़ दिया गया है.

सुरेश कोरबा बताता है कि पहले उस के इलाके में 1 डिस्पैंसरी थी जहां दवा मिलती थी, पर 10-12 साल पहले वह भी बंद हो गई. कोरबा जनजाति के लोग इलाज के लिए ओझाओं के पास जाने को मजबूर हैं. इस तरह अपनी जमीन से उजड़ने के बाद कोरबा जनजाति मिटने के कगार पर पहुंच चुकी है और सरकार कान में तेल डाल कर सो रही है.

आदिवासियों का रोना यह है कि उन्हें उन की जमीन से उजाड़ भी दिया जाता है और वहां कोई योजना शुरू भी नहीं हो पाती है. रांची भू अर्जन महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक, जमीन का अधिग्रहण कर महकमे को दखलकब्जा दिला देने के बाद भी योजनाओं पर काम शुरू नहीं हो पाता है. जितने महकमों ने जमीनों का अधिग्रहण किया है, अगर उन के द्वारा काम चालू हो जाता तो सूबे का रंगरूप ही बदल जाता.

जुलाई 2009 तक करीब 2 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर कई महकमों को दखलकब्जा दिलाया जा चुका है, पर ज्यादातर पर काम चालू नहीं हो पाया है. इस से आदिवासियों में काफी गुस्सा है. आदिवासी भोलन उरांव कहता है कि न तो सरकार आदिवासियों को उन की जमीन से उजाड़ कर कारखाने ही लगा सकी है और न ही आदिवासियों को मुआवजा व नई जगह पर बसाने का ही काम कर पाई है. इस से आदिवासियों के इस राज्य को दोतरफा नुकसान हो रहा है.

सूबे में आदिवासियों के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संथालपरगना काश्तकारी अधिनियम-1949 और बिहार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम 1969 जैसे कानून बने हुए हैं और लागू भी हैं, लेकिन ये कानून काफी पुराने हो चुके हैं और आज की तारीख में बेकार साबित हो रहे हैं.

ये कानून आदिवासियों की परेशानियों को दूर नहीं कर रहे बल्कि उन के लिए रोज नई परेशानी खड़ी कर रहे हैं.

 

16 जुलाई, 2008 को झारखंड सरकार ने नई पुनर्वास नीति को मंजूरी तो दी पर वह फाइलों से अब तक बाहर नहीं निकल सकी है. हर नया मुख्यमंत्री शपथ लेने के तुरंत बाद ऐलान कर डालता है कि नई पुनर्वास नीति को कड़ाई से लागू किया जाएगा और जरूरत पड़ी तो उस में बदलाव भी किया जाएगा. हर नए मुख्यमंत्री और हर नए ऐलान के बाद आदिवासियों के मन में इंसाफ मिलने की उम्मीद तो जगती है, पर कुछ ही दिनों के बाद उन की उम्मीदें चकनाचूर हो जाती हैं.

घुसपैठ और जेल – तेल का खेल

अंतर्राष्ट्रीय सियासत में इन दिनों रूस का मुद्दा खासा चर्चा में है. पिछले दिनों पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था ‘ग्रीनपीस इंटरनैशनल’ के 30 कार्यकर्ताओं को समुद्री डकैती के आरोप में रूस ने गिरफ्तार किया तो दुनियाभर की सामाजिक व नामी हस्तियों ने उन्हें आजाद कराने की मुहिम छेड़ दी. कई मुल्कों में इस बाबत प्रदर्शन भी हो रहे हैं.

नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने भी उन्हें रिहा करने के लिए रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से गुहार लगाई. लेकिन रूस का रुख जरा कड़ा है. उस के मुताबिक सभी पर आर्कटिक तेल प्लेटफौर्म में घुसने के आरोप में मुकदमा चलेगा. रूस के अनुसार यह मामला चोरी और घुसपैठ का है वहीं पर्यावरण संस्था का कहना है कि उस के कार्यकर्ता ‘खतरनाक आर्कटिक तेल खनन’ के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे.

बहरहाल, मुल्क में तेल, घुसपैठ और रिहाई की यह कहानी कोई भी मोड़ ले लेकिन एक बात तो साफ है कि मुल्क चाहे कोई भी हो, सरकारें सच की आवाज को दबा नहीं सकती हैं.

जोड़तोड़ के दलदल मों फंसा हर दल

बिहार का सियासी माहौल इन दिनों जोड़तोड़ की राजनीति का शिकार है. अगले चुनावों के मद्देनजर राजद, जदयू, भाजपा और कांग्रेस जैसे दल बजाय खुद को मजबूत दावेदार बनाने के अन्य प्रतिस्पर्धी दलों के विधायकों को तोड़ कर उन्हें कमजोर बनाने की फिराक में ज्यादा हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में जोड़तोड़ का यह खेल चुनावी अखाड़े में कौन सा रंग दिखाएगा, पड़ताल कर रहे हैं बीरेंद्र बरियार ज्योति.

बिहार में हर दल में अजीब सी कुलबुलाहट मची हुई है. किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलने की बहती हवा के बीच हर दल खुद को मजबूत करने के बजाय दूसरे दलों को तोड़ने और उन्हें कमजोर करने की सियासत में लगा हुआ है. जनता दल (यूनाइटेड) यानी जदयू भाजपा विधायकों पर डोरे डाल रहा है तो भाजपा जदयू और राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों व नेताओं को पटाने में लगी हुई है.

कांग्रेस नीतीश पर अपना जादू चलाने के बाद अपने असली रंग में आने लगी है और अगली लोकसभा व विधानसभा चुनावों को ले कर सीटों का मोलभाव करने के लिए दबाव बढ़ाने लगी है, जिस से जदयू की बेचैनी बढ़ रही है. लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा के मुखिया रामविलास पासवान कभी कांगे्रस तो कभी राजद से पींगें बढ़ाने की कवायद में कनफ्यूजन वाली हालत में हैं.

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में महज 4 विधायकों के बूते कांगे्रस ने हर दल की नाक में दम कर रखा है. मुसलमानों को पटाने व दूसरे दलों के मुसलिम प्रेम की हवा निकालने की जुगत में भाजपा में अंदरखाने शाहनवाज हुसैन को अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजैक्ट करने पर मंथन चल रहा है. शाहनवाज केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. वे इस समय सांसद व भाजपा प्रवक्ता हैं.

जदयू के एक बड़े नेता कहते हैं कि कांगे्रस पार्टी की दिलचस्पी खुद को नए सिरे से खड़ा करने और अपना जनाधार मजबूत करने से ज्यादा दूसरे दलों को तोड़ने, कमजोर करने और उन की जड़ें खोदने में होती है. बिहार में लालू यादव और रामविलास पासवान का बेड़ा गर्क करने के बाद उस का अगला मिशन है जदयू को मटियामेट करना.

नीतीश कुमार कांगे्रस के इस दांव और मायाजाल में फंस चुके हैं. कांगे्रस के बहकावे में उन्होंने भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता तो एक झटके में तोड़ लिया, पर अब उन्हें कांगे्रस का दांवपैंतरा समझ में आने लगा है. अब नीतीश की हालत सांपछछूंदर वाली हो गई है, न उन्हें कांगे्रस की यारी रास आ रही है न ही भाजपा से दूरी सहन हो पा रही है.

16 जून को भाजपा से नाता तोड़ने के बाद 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में जदयू के 118 विधायक रह गए हैं. यह आंकड़ा बहुमत से 4 कम है. कांग्रेस के 4, सीपीएम का 1 और 6 निर्दलीय विधायकों की मदद ले कर नीतीश ने अपनी लाज और ताज तो बचा लिया पर उन की सरकार पर हर समय खतरों के बादल मंडरा रहे हैं. पता नहीं कब किस बात पर चिढ़ कर कांगे्रसी और निर्दलीय विधायक उन की सरकार से समर्थन वापस ले लें.

इस खतरे को टालने के लिए नीतीश और उन के साथी भाजपा विधायकों पर लगातार डोरे डालने में लगे हुए हैं. जदयू के वरिष्ठ नेता का दावा है कि भाजपा के 5 विधायक जदयू में आने के लिए तैयार हैं. समस्तीपुर जिले के मोहिउद्दीन नगर के विधायक राणा गंगेश्वर सिंह पहले ही नीतीश की तारीफ के पुल बांध कर अपनी मंशा जता चुके हैं.

भाजपा विधायक दल के नेता सुशील कुमार मोदी गुस्से में कहते हैं कि नीतीश कुमार भाजपा के विधायकों को तोड़ने में लगे हुए हैं. वहीं, नीतीश कुमार अपने ऊपर लगाए गए इस आरोप को नकारते हुए कहते हैं कि उन्हें तोड़फोड़ की राजनीति नहीं आती है. अगर भाजपा का कोई विधायक उन की सरकार की तारीफ करता है तो इस में उन की क्या गलती है. यह तो भाजपा की समस्या है.

पिछले 16-17 अगस्त को बिहार भाजपा कार्यसमिति में नरेंद्र मोदी छाए रहे और पिछले साढ़े 7 सालों तक नीतीश सरकार में बने रहने वाली भाजपा नीतीश सरकार को हर मोरचे पर नाकाम रहने का ढिंढोरा पीट कर अपनी ही पोलपट्टी खोलने में लगी हुई है.

गठबंधन की जुगत

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे कहते हैं कि नीतीश सरकार अल्पमत में है और सरकार बचाने के लिए वह कांगे्रस से नापाक गठबंधन बना कर अपना असली चेहरा दिखा चुकी है. छपरा में मिड डे मील खा कर 23 बच्चों की मौत हो गई. नवादा, बेतिया, सासाराम और खगडि़या में सामाजिक भाईचारा बिगड़ने के हालात पैदा हो चुके हैं. इतना ही नहीं, बोधगया के महाबोधि टैंपल में सीरियल बम ब्लास्ट करने वाले अपराधी पकड़ से बाहर हैं. इन वारदातों ने नीतीश सरकार के सुशासन की पोल खोल दी है.

इस उठापटक के बीच राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के साले, पूर्व सांसद और कांगे्रसी नेता साधु यादव ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सियासी पारा चढ़ा दिया है. सियासी हलकों में हवा चल पड़ी है कि साधु भाजपा में शामिल होने की जुगत में लगे हुए हैं. इस से पहले राजद के एमएलसी नवल किशोर यादव ने नरेंद्र मोदी को देश का सब से लोकप्रिय नेता और ‘पीएम मैटेरियल’ बता कर बखेड़ा खड़ा किया था. उन के यह कहने के कुछ ही घंटे के बाद उन्हें राजद से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

लालू यादव की पार्टी के अंदर भी ऊहापोह वाली स्थिति है. पिछले 17 साल से 900 करोड़ रुपए के चारा घोटाले में लालू बुरी तरह से फंस चुके हैं और फिलहाल जेल में हैं. उन के जेल जाने के बाद पार्टी को बिखराव से बचाने की कवायद शुरू कर दी गई है. अपने बेटों, तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव को वे पहले ही सियासत के मैदान में उतार चुके हैं. राबड़ी देवी प्रदेश में अपनी पार्टी को मजबूत करने में जुट गई हैं.

बिहार के सियासी गलियारे में हवा है कि जदयू, कांगे्रस और राजद के बीच सियासी खिचड़ी पक रही है. भाजपा से अलग होने के बाद अपनी ताकत मजबूत करने और भाजपा को उस की औकात बताने के मकसद से नीतीश कुमार नया महागठबंधन बनाने की जुगत में लगे हुए हैं.

बिहार विधानसभा में विरोधी दल के नेता नंदकिशोर यादव कहते हैं कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद जदयू के अंदर खलबली मची हुई है और वह किसी भी सूरत में बिहार की सत्ता पर काबिज होने के लिए सामदामदंडभेद की नीति अपना रही है. वे कहते हैं कि नीतीश चाहे जो भी तिकड़म करें, अगले चुनाव में जनता उन्हें सबक सिखा देगी.

वहीं दूसरी ओर नीतीश, भाजपा और राजद को एक ही थैली के चट्टेबट्टे करार दे कर उन की खिल्ली उड़ाते हुए कहते हैं कि दोनों की सोच और काम करने का तरीका एक जैसा है. दोनों के बीच सियासी व चुनावी रिश्ता बनाने के लिए जोड़तोड़ चल रही है.

गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 16.49 फीसदी और जदयू को 22.58 फीसदी वोट मिले थे, वहीं राजद ने 18.84 फीसदी वोट हासिल कर दोनों दलों को कांटे की टक्कर दी थी. अगर राजद अगले चुनाव के लिए तगड़ी तैयारी करती है तो उसे काफी फायदा मिल सकता है. 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव और 2015 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के लिए हर दल ने सियासी शतरंज पर अपनेअपने मोहरे बिठाने शुरू कर दिए हैं. लोकसभा चुनाव के नतीजे बता देंगे कि भाजपा से नाता तोड़ कर नीतीश ने सही किया या गलत.

सियासी दलों की अपनी डफली अपना राग

कोई मोदी फैक्टर का सियासी राग अलाप रहा है तो कोई राहुल के जादू का दावा कर रहा है लेकिन आगामी 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए इन दोनों से इतर जनता का मुद्दा तो कुछ और ही है. क्या है इस बार का मुद्दा, बता रहे हैं जगदीश पंवार.

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है. जातीय समीकरणों से ले कर टिकटों के बंटवारे, नेताओं की आपसी खींचतान के बाद चुनावप्रचार चरम पर पहुंच रहा है. 11 नवंबर से 4 दिसंबर के बीच होने वाले चुनाव के इस माहौल को देख कर लगता है राजनीतिक दल जीवनमरण की जंग में कूद पड़े हैं. तरहतरह के तमाशे सामने आ रहे हैं.

लोकसभा चुनावों से महज 5 महीने पहले होने वाले इन चुनावों में 5 में से 4 राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने से इन्हें आम चुनावों के लिहाज से अहम माना जा रहा है. दोनों दलों की रणनीति लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा की जंग जीत कर माहौल अपने पक्ष में करने की है. राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव 2014 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है.

पांचों राज्यों के करीब 11 करोड़ मतदाताओं की कसौटी पर दोनों प्रमुख पार्टियां हैं. दिल्ली के अलावा इन राज्यों में और कोई तीसरा दल अधिक ताकतवर दिखाईर् नहीं देता. चुनावों में मोदी बनाम राहुल फैक्टर की चर्चा जरूर है मगर मतदाता उदासीन है.

मजे की बात यह है कि इस वक्त जब राज्यों और वहां के नागरिकों का भविष्य तय होने जा रहा है, ऐसे में देश साधुओं के सपने को सच होते देखने वाले मजमे में शामिल दिखाई पड़ता है, इस से बड़ी दुख और हैरानी की बात और क्या हो सकती है.इन 5 में से 3 राज्यों, राजस्थान, दिल्ली व मिजोरम में कांग्रेस और 2 राज्यों, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है.

मोदी और कलह

इस बार भाजपा ने अपनी वैतरणी गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंप दी है. पार्टी उन्हें चमत्कारी अवतार मान कर भरोसा किए बैठी है. मोदी की रैलियों में काफी भीड़ उमड़ रही है पर यह पक्का नहीं है कि यहां आने वाले लोग भाजपा को ही वोट देंगे.

मोदी जहां भी जाते हैं, कांग्रेस सरकार की नाकामियां गिनाते हैं या फिर गांधी परिवार पर निशाना साधते हैं. मोदी रैलियों में विकास की बातें तो करते हैं पर वे विकास का कोई नया खाका देश के सामने पेश नहीं कर पाए हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद आने वाले इन चुनावों में मोदी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते.

ऊपर से हर राज्य में भाजपा आपसी कलह से जूझ रही है. मोदी के नाम पर न तो राज्य इकाइयों में नेताओं की कलह कम हो पा रही है और न ही कुरसी का मोह त्याग कर एकजुटता देखी जा रही.

क्या है असल मुद्दा

विधानसभा चुनावों में कोई लहर नहीं है. न कोई बड़ा मुद्दा है, न कोई मसला है. हमेशा की तरह महंगाई, मंदी, भ्रष्टाचार, असुरक्षा तथा अन्य स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे. 200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा में कांटे का मुकाबला माना जा रहा है. पिछले चुनावों में कांग्रेस 96 सीटें के साथ कुछ निर्दलीयों को शामिल कर सत्ता में आई थी. भाजपा को 78 सीटों के साथ सत्ता गंवानी पड़ी.

कांग्रेस की गहलोत सरकार पहले दिन से ही जनता की समस्याओं और प्रदेश के विकास की बात करती रही है, वह चाहे बाड़मेर में रिफाइनरी लगाने का काम हो, जयपुर मैट्रो ट्रेन शुरू कराना हो, मुफ्त चिकित्सा, किशनगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, सड़कें, बिजली, पानी, विधवा, बुजुर्गों को पैंशन बांटने जैसे काम हों. प्रदेश सरकार लोगों को खुश करने की पूरी कोशिश करती दिखाईर् दी है.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री पद की दावेदार वसुंधरा राजे सिंधिया कांग्रेस सरकार को घेर पाने में सफल नहीं दिख रहीं. पिछली बार सत्ता से हटने के बाद उन का विदेश प्रवास चर्चा में रहा. विधानसभा में उन की अनुपस्थिति को ले कर सवाल उठते रहे.

पिछले चुनावों में सरकारी कर्मचारियों की गहलोत सरकार से जरूर नाराजगी दिखी पर इस बार सरकार राज्य के लाखों कर्मचारियों और उन के परिवारजनों को खुश करने में जुटी देखी गई. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की छवि ईमानदार और जनता से जुड़े नेता के रूप में रही है लेकिन उन की सरकार के कई मंत्रियों व विधायकों पर भ्रष्टाचार, बेईमानी और यहां तक कि बलात्कार के आरोप भी लगते रहे.

कांग्रेस में जाट वोटों की नाराजगी कम करने के लिए केंद्र में उसी शीशराम ओला को फिर से मंत्री बना दिया गया जिन्हें कुछ समय पहले अधिक उम्र के चलते हटा दिया गया था. राज्य में जाट परंपरागत कांगे्रसी वोट माने जाते थे लेकिन अटल बिहारी सरकार ने राज्य के जाटों को ओबीसी में शामिल करा कर इस बिरादरी का झुकाव भाजपा की ओर मोड़ दिया. तब से कांग्रेस की हारजीत के लिए जाट मतदाता परेशानी का सबब बन गए. ओला के अलावा ब्राह्मण वोटों को लुभाने के लिए केंद्र में गिरिजा व्यास को भी मंत्री पद की शपथ दिलाई गई.

उधर, भाजपा में नेतृत्व को ले कर शुरू से ही कलह सामने आ गई थी. घनश्याम तिवाड़ी, रामदास अग्रवाल, नरपत सिंह राजवी, गुलाब चंद कटारिया जैसे बड़े नेता खुल कर वसुंधरा राजे सिंधिया की खिलाफत में उठ खड़े हुए.

वसुंधरा वर्ष 2003 से 2008 तक मुख्यमंत्री रहीं लेकिन उन का राज सामंती तौरतरीकों वाली महारानी जैसा माना गया. राजनीतिक तालमेल में कमी, पार्टी नेताओं से दूरी, सेज मामला, भू माफियाओं का तंत्र, गुर्जर आंदोलन में गोलीकांड जैसे कई ऐसे मामले थे जिन से वसुंधरा को काफी फजीहत झेलनी पड़ी.

एकजुट नहीं हैं नेता

विधानसभा की 230 सीटों वाले मध्य प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटा पाना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. हालांकि कुछ जमीन व बिल्ंिडग माफियाओं के कारण प्रदेश सरकार विपक्ष के निशाने पर रही. पूर्व वित्त राज्यमंत्री राघवजी की वजह से पार्टी को बदनामी झेलनी पड़ी.

उधर, मध्य प्रदेश में कांग्रेसी नेता एकजुट नहीं हैं. पार्टी ने युवा चेहरे के रूप में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य में चुनाव प्रचार अभियान का मुखिया बना कर नया नेतृत्व देने की पहल की गई है पर बाकी बड़े नेताओं में कमलनाथ, अजय सिंह और दिग्विजय सिंह की राहें अलगअलग हैं. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने 2003 में मुख्यमंत्री की कुरसी गंवाने के बाद

10 साल के संन्यास की घोषणा की थी. वे 10 साल इस वर्ष के अंत में खत्म हो रहे हैं पर वे राज्य की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप  नहीं करते दिख रहे. भाजपा को कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा मिलने की उम्मीद है. यहां पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 143, कांग्रेस को 71 सीटें मिली थीं.

बढ़ते दावेदार

दिल्ली में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है लेकिन इस बार भ्रष्टाचार आंदोलन से निकली ‘आम आदमी पार्टी’ भी तीसरे दावेदार के रूप में दिख रही है. भले ही वह सत्ता में न आ पाए लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों का खेल जरूर बिगाड़ देगी. आम आदमी पार्टी दोनों दलों के वोट काटने में कामयाब होगी. यहां लगातार 3 बार से कांग्रेस की सरकार है तो एमसीडी की सत्ता भाजपा के पास है.

कांग्रेस का प्रमुख चेहरा मुख्यमंत्री शीला दीक्षित हैं. कुल 70 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस 43 सीट जीत कर लगातार तीसरी बार सत्ता में आई. भाजपा 23 सीटों पर सीमित रह गई. बहुजन समाज पार्टी ने भी सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे लेकिन 2 सीटें ही जीत पाई थी.

भाजपा हरसंभव कांग्रेस से इस बार सत्ता हथियाना चाहती है पर आंतरिक कलह के चलते मतदाता उस पर भरोसा करने से कतरा रहे हैं. पार्टी में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार थे लेकिन अब डा. हर्षवर्धन पर भाजपा में सहमति बन गई है.

भाजपा के पास कांग्रेस को हराने का कोई ठोस मुद्दा नहीं नजर आ रहा. आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल शीला दीक्षित के खिलाफ लड़ने का ऐलान काफी पहले कर चुके थे पर उन के पास दिल्ली में कांग्रेस से सत्ता छीन कर बेहतर सरकार देने का अब तक कोई ब्लूप्रिंट नहीं है.

बदले से मिजाज

90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में पिछली बार भाजपा 50 सीटें जीत कर सत्ता में आई थी. कांग्रेस के पास 38 तथा 2 अन्य के हिस्से आईं. भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह की छवि साफसुथरी मानी जाती है. 2008 के चुनाव में उन की लोकप्रियता चरम पर थी. खासतौर से 2 रुपए किलो चावल ने छत्तीसगढ़ के गरीब आदिवासियों एवं दलितों के मन में उन के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा किया जिस का प्रदर्शन उन्होंने भाजपा के पक्ष में वोट दे कर किया. लेकिन जिन मुद्दों ने रमन सिंह को जिताया था, वे मुद्दे अब आकर्षण खो चुके हैं क्योंकि केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने इसे फीका कर दिया है.

रमन सरकार के लिए विपक्षी दलों की एकजुटता खतरा बन रही है. कुछ समय पहले भाजपा पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के तेवर से प्रसन्न थी क्योंकि आंतरिक कलह और जबरदस्त गुटबाजी से कांग्रेस के बिखरने के आसार दिखने लगे थे लेकिन जोगी के तीखे तेवर ढीले पड़े, पार्टी में बिखराव का संकट टल गया.

यहां भाजपा के सामने सत्ता विरोधी लहर का खतरा भी है.

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी कांग्रेस के बड़े नेता हैं. वे शुरू में अपनी ताकत दिखाने के लिए हाईकमान के लिए परेशानी पैदा करते रहे लेकिन पार्टी के लिए उन के खिलाफ कड़ा कदम उठाना मुश्किलों भरा होता. लिहाजा, उन्हें हर बार बरदाश्त किया जाता रहा. अब जोगी की जगह उन के बेटे अमित जोगी को मरवाही से टिकट दिया गया है तो उन की पत्नी रेणु जोगी को कोटा से प्रत्याशी बनाया गया है. जोगी को राज्य में प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

झूठे वादे और विकास  

मिजोरम में कांग्रेस के पी ललथनहवला की सरकार के सामने इस बार मिजो नैशनल फ्रंट की चुनौती है. यहां भाजपा का नामोनिशान नहीं है. पिछले विधानसभा चुनावों में कुल 40 सीटों में से कांग्रेस 32 सीटें जीती थी. कांग्रेस को इस बार यहां खाद्य सुरक्षा कानून लागू करना फायदेमंद लग रहा है पर स्थानीय समस्याओं पर सरकार के खिलाफ नाराजगी भारी पड़ सकती है.

अब यह तय हो चुका है कि राजनीतिक पार्टियों की पहले वाली सोच बदल रही है. मतदाताओं को हमेशा बेवकूफ समझने वाले दल संभल चुके हैं और वे झूठे वादे, झूठे आश्वासन और भावनात्मक मुद्दों से परहेज करते नजर आ रहे हैं. अब सब पार्टियों को लग रहा है कि विकास का मुद्दा सब पर भारी पड़ेगा इसलिए सब विकास का राग अलापने लगे हैं. हर दल के एजेंडे में विकास सर्वोपरि है. भले ही विकास के हवाईर् किले बांधे जा रहे हों पर बातें तो हो रही हैं.  हालांकि ‘पुरानी आदत जल्दी नहीं छूटती’ कहावत को भी पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि धर्म, जाति, वर्ग, धनबल, बाहुबल जैसे नुस्खे आजमाने की हरसंभव अंदर ही अंदर कोशिशें जारी हैं और अभी भी धर्म, जाति चुनावी हारजीत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. हर कोई विकास का राग तो गा रहा है पर राग बेसुरा सा है जिस में न ताल है न लय, न सुर है और न ही संगम.

विकास हुआ है पर किस का विकास? कैसा विकास? क्या जनता की नजरों में वास्तविक विकास एक्सप्रैस वे, चमकदार सड़कें, पुलों का जाल, बड़ेबड़े मौल्स, नए हवाई अड्डे विकास हैं या फिर उस की रोजमर्रा से जुड़ी दिक्कतों को हमेशाहमेशा के लिए आसान बना देना.  सरकारों ने अपराधियों, माफियाओं, कौर्पोरेट जगत, नौकरशाही और धर्मों के फायदे की बात प्रमुखता से उठाने वालों का तो विकास किया लेकिन निचले पायदान पर रह रहे लोगों के विकास के नाम पर उन के लिए मात्र योजनाएं ही बनाई गईं. उन योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंचाया गया.

पिछले साल दिल्ली के जंतरमंतर से शुरू हुए भ्रष्टाचार आंदोलन के बाद यह बड़ा चुनाव हो रहा है. हर राजनीतिक दल तब देश के आक्रोश की जद में था. आज भी राजनीति में अपराध और भ्रष्टाचार व नेताओं की शहंशाहों जैसी जिंदगी से देश बुरी तरह खफा है.

राज्यों में मतदाताओं पर मोदी फैक्टर हावी रहेगा, पक्का भरोसा नहीं पर कांग्रेस में राहुल गांधी का जादू चल पाना मुश्किल लगता है. भाजपा और कांग्रेस दोनों द्वारा शासित राज्यों में मुख्यमंत्रियों के कामकाज ही हारजीत का निर्णय करेंगे.  बहरहाल, चुनावी ऊंट अंतत: किस करवट बैठेगा, यह भविष्य गर्त में है.

तेलंगाना की राजनीति

तेलंगाना के गठन पर बवाल खड़ा कर आंध्र प्रदेश के नेता जगन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू फालतू में राज्य की शक्ति और पैसा बरबाद कर रहे हैं. मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश के हाल के विभाजन और उस से पहले महाराष्ट्र, पंजाब, असम के विभाजनों से साबित हो गया है कि राज्यों के विभाजन से देश व राज्य को कोई विशेष लाभ न भी हो तो कम से कम नुकसान कुछ नहीं होता.

अगर किसी राज्य के कुछ लोग अलग राज्य पा कर अपनी स्वतंत्र नेतागीरी चलाना चाहते हैं और उन्हें जनता के काफी हिस्से का समर्थन भी मिल रहा है तो इस बात को तूल देना बुद्धिमानी नहीं है. अलग हुआ राज्य अलग राजधानी बनाता है और मंत्रियों के ठाटबाट रहते हैं. पर उस से पहले बड़े राज्य में मंत्री फिर भी उतने ही होते थे और उन के ठाटबाट भी वैसे ही होते थे. फर्क इतना है कि एक नया सचिवालय बनता है, एक नया विधानसभा भवन बनता है.

राज्य के विभाजन के बाद दोनों राज्यों के विधायकों की संख्या उतनी ही रहती है यानी मंत्रियों की संख्या भी नहीं बढ़ती. इस से मंत्रियों का तो नुकसान होता है क्योंकि उन का अधिकार क्षेत्र सीमित हो जाता है. छोटे राज्यों के मुख्यमंत्री तो बेचारे केंद्र सरकार के पास भीख का कटोरा लिए खड़े रहते हैं. उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने के लिए समय तक जल्दी नहीं मिलता.

मुख्यमंत्री की ऐसी कुरसी भी किस काम की पर यदि आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी तेलंगाना राज्य समिति के अंतर्गत राज्य की मांग कर रहे हैं और केंद्र सहमत है तो मान लेने में हर्ज क्या है? चंद्रबाबू नायडू, जगन रेड्डी आदि फालतू में जनता का समय बरबाद कर रहे हैं.

केंद्र इस में दोषी है तो सिर्फ इसलिए कि उस ने ढीलढाल बहुत की, अपने मुख्यमंत्री के रोबदाब के चक्कर में इस मामले को रबड़ की तरह खींच दिया. अब उस दोष की सजा भुगतने का समय आ गया है. कांगे्रस यदि सीमा और तेलंगाना क्षेत्रों, दोनों में चुनाव हार जाए तो बड़ी बात न होगी क्योंकि उस के खराब राजनीतिक मैनेजमैंट के कारण दोनों तरफ के लोग नाराज हो गए हैं. यह विभाजन तो खुशीखुशी, बिना आंसू बहाए हो सकता था.

कर्ज और कर्जदार

बैंकों से कर्ज ले कर मौज उड़ाना या उन पैसों को अनापशनाप उद्योगों व व्यापारों में लगाना हमारे देश में एक खेल है. जहां करोड़ों लोग अपनी गाढ़ी कमाई ऐसे बैंकों और फाइनैंस कंपनियों के हवाले कर देते हैं जो उसे हड़प कर डकार भी नहीं लेते, वहीं हजारों ऐसे शातिर भी हैं जो बैंकों को चूना लगाते हैं. इस में शक नहीं है कि बैंकों से कर्ज ले कर बरबाद करने वालों में ज्यादातर वे हैं जिन्होंने रिश्वत दे कर कर्ज प्राप्त किया था. वे सोचते हैं कि उद्योगधंधे तो रिश्वतखोरी और हेरफेर से चलते हैं. उन्हें कर्ज लिए पैसे को सही ढंग से इस्तेमाल करना आता ही नहीं.

बैंकों ने कर्ज न लौटाने वालों को शर्मिंदा करने के लिए अब उन के फोटो अखबारों में प्रकाशित कराने शुरू कर दिए हैं और इस पर सवाल उठ खड़े हुए हैं कि यह इजाजत उन्हें कानून से मिली है या नहीं. आमतौर पर वकीलों का मानना है कि जब तक अदालत का आदेश न हो इस प्रकार का विज्ञापन, जो कर्ज पाने वाले की मानहानि करे, प्रकाशित करना गलत है. 1-2 मामलों में अदालतों ने बैंकों को ऐसा करने से रोका भी है.

कर्ज लौटाना हर कर्जदार का फर्ज है. देश में 20 साल पहले चले कर्ज मेलों ने लोगों के मन में भर दिया था कि कर्ज लौटाना जरूरी नहीं. लाखों किसानों के कर्ज माफकिए गए हैं. लाखों को कर्ज लौटाने पर ब्याज में भारी छूट दी गई है. इस से माहौल बना है कि कर्ज ले कर घी पीने का सिद्धांत आज भी चल रहा है.

कर्ज लेने वाला पैसा ढंग से और संभल कर खर्च करे, यह जरूरी है. अगर उसे मालूम हो कि कर्ज लेने के बाद उसे न लौटाने पर अदालतों में वर्षों लगेंगे तो वह कर्ज के पैसे के बारे में कभी सतर्क नहीं होगा. इसलिए कर्ज न लौटा पाने वालों को शर्मिंदा करना गलत नहीं है.

अगर आज का कानून आड़े आएगा तो भी यह बात न रुकेगी क्योंकि कर्ज देते समय ही लंबी शर्तों में बैंक यह भी लिखवा लेंगे कि कर्ज न लौटा पाने की स्थिति में वे ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करा सकते हैं और तब मानहानि का कानून लागू नहीं हो पाएगा. कर्ज लेते समय कर्जदार की हिम्मत कभी न होगी कि वह इस शर्त पर आपत्ति करे. कर्ज ले कर गाडि़यों और भव्य मकानों में मौज मनाने वालों की दुनिया में कमी नहीं है.

 

भाजपा की रामलीला

ऐन चुनाव से 2 माह पहले दिल्ली में भावी मुख्यमंत्री के सवाल को उठा कर भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा ने अपने अनुशासन की पोलपट्टी खोल दी है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल महीनों से अपनेआप को नरेंद्र मोदी की तर्ज पर मुख्यमंत्री घोषित कर रहे थे कि संघ की ओर से पूर्व अध्यक्ष डा. हर्षवर्धन  आ खड़े हुए और दोनों का घमासान कांगे्रसभाजपा जैसा हो गया.

अब नेता का नाम तय हो गया पर यह साफ हो गया है कि ‘साफसुथरी पार्टी’ कितनी साफ है. भाजपा को आमतौर पर मध्यवर्ग के वोट मिलते हैं और यही मध्यवर्ग आजकल सरकारी कामकाज से नाराज हो कर अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ का समर्थक बन रहा है और निश्चित है कि यह वर्ग कांग्रेस को कम, भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा. ऐसे में चुनावों से कुछ ही सप्ताह पहले विजय गोयल के नेतृत्व पर सवाल उठा कर भाजपा के नेताओं ने अपने दिमागी दिवालिएपन की कलई खोल दी. यह सवाल असल में चुनावों के बाद उठाया जाना चाहिए था अगर पार्टी को पर्याप्त बहुमत मिलता.

दिल्ली का चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि यहां से केवल 7 सांसद चुने जाते हैं लेकिन यदि नरेंद्र मोदी का प्रभाव दिल्ली की राज्य इकाई पर भी नहीं है तो साफ है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बावजूद भाजपा की प्रदेश इकाइयों में आपसी फूट और खींचतान जारी है.

वैसे, यह बात नई नहीं है. जैसे राम का नाम लेने वाली भारतीय जनता पार्टी के आराध्य राम को भी ऐन सिंहासन पर बैठने वाले दिन अयोध्या की महल की राजनीति के कारण राजपाट न मिल कर वनवास मिला, रामलीला को बारबार दोहराना तो भाजपा का धर्म वैसे ही है.

 

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