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गठबंधन की गांठ

नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की बागडोर सौंप देने पर कभी उस की साथी रही कई पार्टियों का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से हट जाना आश्चर्य की बात न होगी. बिहार के नीतीश कुमार ने तो नाता तोड़ ही लिया है. हालिया उपचुनाव में महाराजगंज की सीट पर लालू यादव के उम्मीदवार की जीत के बावजूद उन्होंने अपना गुस्सा दिखा दिया.

जयललिता अभी भारतीय जनता पार्टी का साथ दे रही हैं पर चुनावों के नजदीक उन्हें एहसास हो जाएगा कि न केवल मुसलिम, दलित व अति पिछड़े भी नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व और विरोधियों को सबक सिखाने की रणनीति का कोई स्वागत न करेंगे.

1998 के बाद भारतीय जनता पार्टी को जो सफलता मिली उस का बड़ा कारण बाबरी मसजिद का ढहाना नहीं था, कांग्रेस के नेतृत्व का ढह जाना था. 1991 में प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव नेता की मिट्टी के नहीं बने थे. वे वैसे ही प्रदेशीय नेता थे जैसे नरेंद्र मोदी हैं और कांग्रेस की रगरग की उन्हें कोई पहचान न थी. उन्होंने कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया तो भारतीय जनता पार्टी को ही नहीं कई और पार्टियों को पैर जमाने का मौका मिल गया.

जो पार्टी 1984 में 400 सीटें जीती थी और अगले चुनाव में उस को हार का सामना करना पड़ा तो उस की वजह थी विश्वनाथ प्रताप सिंह की साजिश और राजीव गांधी का नौसिखियापन. पर 2004 तक सोनिया गांधी ने सिद्ध कर दिया कि विषम स्थितियों में लड़ने की उन की क्षमता अन्य किसी नेता से ज्यादा है, नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा.

यह बात राज्यों के दूसरी पार्टियों के नेता समझते हैं और इसीलिए पूर्णबहुमत न होने के बावजूद 2004 से 2009 और 2009 से अब तक कांग्रेस राज भी करती रही व रिश्वतखोरी भी करती रही. अन्ना हजारे की मुहिम भी उसे न हिला पाई.

नरेंद्र मोदी के खाते में केवल 2002 के हिंदू-मुसलिम दंगे हैं जिन से कट्टर हिंदू बेहद खुश हैं और आज ढोल बजा रहे हैं पर आम भारतीय शंकित व भयभीत है. प्रकाश सिंह बादल को छोड़ कर कोई नरेंद्र मोदी से खुश नजर नहीं आ रहा पर यह नहीं भूलना चाहिए कि 1947 से 1990 तक हुए सिख-हिंदू विवाद में भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी टाइप नेता ही अकालियों का विरोध करते रहे हैं.

राजनीति कोई सीधीसपाट सड़क नहीं है. इस में घेरे और घेरों में?घेरे होते हैं. नरेंद्र मोदी अपने दंभी व ‘मैं ही सही हूं’ वाले व्यवहार से एनडीए समर्थित पार्टियों को साथ ले चल सकेंगे, असंभव लगता है. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी कट्टर होते हुए भी कम से कम सौम्य तो थे. कोई आश्चर्य नहीं कि बिहार के नीतीश कुमार के तलाक के बाद और पार्टियों ने भी इस की तैयारी करनी शुरू कर दी हो.

 

विरोधाभासों की नौकरी

कुछ समय पहले एक सर्वेक्षण आया था कि उड्डयन जैसे क्षेत्र में भी युवाओं को रोजगार के लिए परेशान होना पड़ रहा है. देश या विदेश में भारी खर्च कर के युवा पायलट या चालक दल का सदस्य बनने के लिए ठोकरें खा रहा है लेकिन उसे रोजगार नसीब नहीं हो रहा. सरकारी विमानन कंपनी से ज्यादा पाने के चक्कर में निजी क्षेत्र में गए अनुभवी पायलट भी परेशान हैं. इस खबर को देख कर लगा कि किसी भी क्षेत्र में जाइए, नौकरी का बड़ा संकट है. लेकिन यदि आप में काबिलीयत है तो सफलता हाथ पकड़ कर मंजिल तक ले जाएगी और फिर सारी सुविधाएं दे कर शर्त भी रखेगी कि यही नौकरी करनी पड़ेगी.

नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने भी आजकल यही नीति अपना ली है. उस की दिक्कत है कि केबिन क्रू यानी चालक दल के सदस्य बिना पूर्व सूचना के इस्तीफा दे देते हैं. इस तरह की स्थिति में एअरलाइंस के लिए यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने का संकट पैदा हो जाता था. कंपनी की अंतिम समय में उड़ान तक रद्द करनी पड़ती थी जिस से यात्रियों को भी दिक्कत होती.

प्राधिकरण के लिए कर्मचारियों का यह रुख जनहित के विरुद्ध है और कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही करने वाला कदम है. कई विदेशी एअरलाइंस के साथ भारतीय एअरलाइंस का कड़ा कंपीटिशन चल रहा है और आखिरी क्षण में यदि चालक दल के सदस्य के त्यागपत्र के कारण उड़ान रद्द होती है तो कंपनी की परेशानी बढ़ जाती है. इस तरह की संकटकारक स्थिति से निबटने के लिए प्राधिकरण को फिलहाल एक बड़ा कदम यही सूझा है कि अब पूर्व सूचना दिए बिना कोई क्रू सदस्य इस्तीफा नहीं देगा. इस्तीफा देने के लिए उसे कम से कम 3 महीने पहले सूचना देनी होगी. इस तरह की लगाम कसने से स्थिति कितनी नियंत्रित होगी, यह तो समय ही बताएगा लेकिन इस से साफ हो गया है कि कंपनी और कर्मचारियों का एकदूसरे के लिए विशेष महत्त्व है और उन्हें परस्पर सहयोग के जरिए ही आगे बढ़ना चाहिए.

सबकुछ गांव में ही रखा है

अब तक गांव का गरीब और कमजोर रोजगार की तलाश में शहरों में?भटकता था और रोजीरोटी का जुगाड़ होने के बाद बेहतर भविष्य के लिए शहरों में ही पूरी तरह पलायन कर जाता था. लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है. ‘इतिहास स्वयं को दोहराता है’ वाली कहावत सच होती दिखाई दे रही है. जीवन को आसान और आरामदायक बनाने के नाम पर शहरों को बरबाद कर चुकी धुरंधर कार निर्माता कंपनियां अब गांव की तरफ रुख कर रही हैं. उन का यह रुख चालाकीभरा है. वे गांव को सिर्फ कमाई के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश में हैं. ये कंपनियां गांव में आम आदमी को रोजगार देने नहीं जा रही हैं बल्कि गांव की संपन्नता का दोहन करने के लिए वहां पहुंचने की रणनीति बना रही हैं. इन के कारखाने शहरों और महानगरों में ही रहेंगे, लेकिन बाजार गांव होगा.

कार निर्माता कंपनियों का कहना है कि गांव में संपन्नता है. संयुक्त परिवार की परंपरा है और अच्छा बाजार भी है इसलिए कसबों व?छोटे शहरों में?डेरा डाल कर उन तक पहुंचना है. महानगरों में कारों की बिक्री का आंकड़ा कुछ कमजोर हो रहा है लेकिन गांव में 2011 में कारों की बिक्री 15 फीसदी बढ़ी है. वर्ष 2012 में यह 17 प्रतिशत रही और 2014 तक इस के 20 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है. तेजी से बढ़ रहे ग्रामीण बाजार को कंपनियां भुनाना चाहती हैं और लगभग हर मौडल की कार गांव तक पहुंचाना चाहती हैं.

 

कमजोर अर्थव्यवस्था में भी बाजार आसमान पर

शेयर बाजार में मई में उछाल का दौर रहा. सूचकांक थोड़ाबहुत उतारचढ़ाव के बीच भी लगभग तेजी पर ही रहा. अफवाहों के कारण कुछ दिन जरूर हलके रहे लेकिन ज्यादा समय तक बाजार में तेजी का ही रुख रहा. 8 मई को बीएसई का सूचकांक इस वर्ष दूसरी बार 20 हजार अंक के?स्तर को पार कर गया. इस से पहले ऐसा 18 जनवरी को हुआ.

बाजार में मजबूती का रुख रहा बढ़त का सिलसिला थमा नहीं और 16 मई को यह लगातार 3 दिन की बढ़त के बाद 28 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. इस दिन बाजार ने भले ही मामूली 34 अंक की बढ़त हासिल की थी लेकिन यह स्तर बाजार को लंबे समय बाद मिला है जिस से निवेशकों के चेहरों पर खुशी थी.

इस से पहले 29 अक्तूबर, 2007 को बाजार पहली बार 20 हजार अंक के पार पहुंचा था और फिर 8 जनवरी, 2008 को यह 21 हजार के स्तर को भी पार कर गया?था. फिर मंदी का दौर शुरू हुआ और बाजार ने लोगों को खूब छकाया.

बाजार कमजोर अर्थव्यवस्था के बावजूद ऊंचाई पर है और ब्याज दरें भी बढ़ नहीं रही हैं लेकिन शेयर सूचकांक चढ़ रहा है. विश्लेषकों को यह ट्रैंड समझ नहीं आ रहा है. उन का कहना है कि यह स्थिति स्थायित्व प्रदान करने वाली नहीं है. हालांकि कुछ जानकार कहते हैं कि कुछ माह तक बाजार में रौनक का यही माहौल बना रहेगा. ब्याज दरों में कटौती होती है तो भी सूचकांक हलका नहीं पड़ेगा. बाजार की तेजी की एक वजह कंपनियों के सकारात्मक परिणाम भी बताए जा रहे हैं.

 

आप के पत्र

सरित प्रवाह, मई (द्वितीय) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘कानून के हाथ’ बहुत ही सटीक है. इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट यानी अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय अब सही शक्ल लेने लगा है और नरेंद्र मोदी जैसे शासकों की नींद हराम कर सकता है, जो आज भी अपने गुनाहों के लिए अफसोस जाहिर करना तो दूर उन के सहारे अपना नया रास्ता खोज रहे हैं. आज एक ऐसे शासक का बहुमत के सहारे भी राज करना खतरे से खाली नहीं है जो नरसंहार के लिए जिम्मेदार है.

इस तरह के कानून का हमेशा स्वागत होगा जिस में जनता की भलाई छिपी हो. वैसे भी यह सत्य है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं. अपराधी ने अगर अपराध किया है तो उसे दंड मिलना ही है. अब सरकारें अपनी जनता के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, यह खुशी की बात है कि अब जनता के प्रति अपराध एक हद तक ही किए जा सकते हैं.

सदियों से राजा जमीन, पैसे या धर्म के कारण लाखों की जान ले कर तालियां पिटवाते रहे हैं, हर देश की फौज का काम अपने आदमियों को मारना रहा है, मगर इस कानून के अमल में आने से ऐसे लोग बच नहीं सकेंगे. अगर पिछले 28 साल के दंगों के मामले फिर खुल जाएं तो आश्चर्य नहीं. ये वे घाव हैं जो समय के चलते भी नहीं भरते, न्याय की पट्टी ही उन्हें ठीक कर सकती है. हां, लकीरें फिर भी रह जाती हैं, चोट पर भी, दिलों पर भी.

 कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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आप की टिप्पणी ‘कानून के हाथ’ पढ़ी. बहुत अच्छी लगी. नए कानून के तहत 2 देशों के शासकों को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दंडित किए जाने से मानवजाति का भविष्य और उज्ज्वल दिखाई देने लगा है. अब बहुमत से चुन कर आए शासक भी नरसंहार करने के बाद बच नहीं पाएंगे. अभी तक यह बहाना था कि हमें जनता ने चुना है इसलिए हमारे अपराध क्षम्य हैं.

इस कानून के हाथ को और मजबूती मिलनी चाहिए ताकि वह अधिक से अधिक फैसलों के द्वारा मानवजाति को?न्याय दे सके.

माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)

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आप की टिप्पणी ‘मोदी पर भ्रम’ में आप ने मोदी की बड़ी तीखी आलोचना कर डाली है. पढ़ कर ऐसा लगा मानो मोदी से आप की व्यक्तिगत  दुश्मनी हो. एक तरफ तो आप ने उन्हें कृष्ण बना डाला है और दूसरी ओर हिटलर. जबकि कृष्ण एक रचनात्मक पहल है और हिटलर एक विध्वंसक, विघटनकारी. विचारों का ऐसा विरोधाभास क्यों?

देश के अगले प्रधानमंत्री के मंथन के बीच केवल मोदी ही हैं जो ताल ठोक कर दबंगई से देश सुधारने और बदलने की बात कर रहे हैं. बाकी प्रधानमंत्री पद की दौड़ के दावेदार तो मेमने की तरह मिमिया ही रहे हैं. हाल ही में ‘देश का प्रधानमंत्री कौन’ के लिए जनमत संग्रह कराए जाने पर मोदी को 55 प्रतिशत मत हासिल हुए जबकि आडवाणी को 10 प्रतिशत, राहुल गांधी को 15 प्रतिशत, सुषमा स्वराज को

10 प्रतिशत और पी चिदंबरम को 15 प्रतिशत मत ही प्राप्त हुए. वैसे भी अब तो भारतीय जनता पार्टी ने मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया है और पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता हुआ दिखाई दे रहा है.

विजय यादव, जबलपुर (म.प्र.)

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आप की टिप्पणी ‘लालच का फेर’, अच्छी लगी. कोलकाता की सारदा चिटफंड कंपनी ने भोलेभाले गरीब लोगों के करोड़ों रुपए डकार लिए. गरीब लोग मेहनत कर के पैसा कमाते हैं और मोटे ब्याज के लालच में या एजेंटों द्वारा सब्जबाग दिखाए जाने के चलते वे अपना पैसा गंवा बैठते हैं.

देश में वर्षों से ऐसी चिटफंड कंपनियां सरकारों की नाक तले बेखौफ हो कर लूट का धंधा कर रही हैं. सरकार तो लीपापोती करती है, जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है. आप ने सही लिखा है कि लोग खुद जागरूक नहीं होंगे तो वे लुटते ही रहेंगे, क्योंकि व्यवस्था ही कुछ ऐसी है.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (म.प्र.)

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संपादकीय टिप्पणी ‘लालच का फेर’ बहुत अच्छी लगी. लालच एक तरफ तो सारदा चिटफंड की तरह अनपढ़, मजदूर, बेसमझ, गरीब को और गरीब बना रहा है तो दूसरी ओर वही पैसे का लालच पढ़ेलिखों को, अच्छा पैसा कमाने वालों को, समझदार लोगों को, करोड़पतियों को तरहतरह के घोटालों (जिन में क्रिकेट की स्पौट फिक्सिंग भी शामिल है) के जरिए और ज्यादा अमीर बना रहा है.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

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दरिंदगी का रूप

मई (द्वितीय) अंक में ‘गुडि़या रेप केस : शर्मसार होती इंसानियत’ रिपोर्ट पढ़ी. कुछ ही दिन पहले एक और शर्मनाक खबर अखबारों में पढ़ने को मिली थी कि दक्षिण में 80 साल की वृद्धा का रेप किया गया. यानी 5 साल की बच्ची व 80 साल की वृद्धा पर ऐसे कृत्य करने वाला इंसान नहीं दरिंदा ही कहा जाएगा.

टी सी डी गाडेगावलिया, नई दिल्ली

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लूट का धंधा

मई (द्वितीय) अंक में ‘चिटफंड का धंधा, छोटी लूटों का मोटा फंदा’ शीर्षक से प्रकाशित अग्रलेख पढ़ा. सब से बड़ी विडंबना यह है कि पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह घपलेघोटाले उजागर हो रहे हैं, उस से देश में चिंता का वातावरण बन गया है. इस में हाल ही में चिटफंड कंपनियों द्वारा की गई धोखाधड़ी की कड़ी और जुड़ गई है.

ये घोटालेबाज राजनीतिक पार्टियों के समर्थन के बगैर नहीं पनप सकते. गरीब और जरूरतमंद लोग यह सोच कर निवेश करते हैं कि वे भी थोड़ा मुनाफा कमा लें, लेकिन वे बेवकूफ बनाए जाते हैं.

आजकल बैंकों व डाकघरों में अल्पबचत योजना में मिलने वाली ब्याज दर घटती जा रही है. शासन चाहे तो ऐसी योजना बनाए जिस में कम से कम गरीबों को अतिरिक्त बोनस जरूर मिले. ताकि वे चिटफंडों में निवेश न कर अपने पैसे का सुरक्षित व फायदेमंद निवेश कर सकें. अब समय आ गया है कि देश में बढ़ रहे आर्थिक अपराध को रोकने के लिए नए सिरे से सोचा जाए. केंद्र सरकार को समय के साथ हो रहे बदलाव के तहत ऐसा कानून बनाना होगा कि कोई उस के चंगुल से छूट न पाए. तभी लूट का यह सिलसिला थम सकेगा.

प्रकाश दर्पे, इंदौर (म.प्र.)

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प्रेरणादायक लेख

मई (द्वितीय) अंक में प्रकाशित ‘देहदान : परिजनों की आपत्ति पर सरकार सख्त’ लेख पढ़ा. यह प्रेरणादायक, सराहनीय व सजग करने वाला ठोस कदम है. सरकार के साथसाथ धार्मिक व सामाजिक संगठनों को भी सहयोगी बनना चाहिए क्योंकि उन का समाज पर अधिक प्रभाव है.

ऐसे कदम सामाजिक सहयोग के बिना सफलता नहीं पा सकते. समय की पुकार है कि दकियानूसी, रूढि़वादिता, अर्थहीन, उद्देश्यहीन मान्यताओं से निकल कर मानवहित में देहदान कर विशिष्ट व्यक्ति बनें.

डा. एस के गौड़

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शमशाद बेगम का परिवार

मई (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘शमशाद बेगम : छोड़ गईं बाबुल का घर’ बहुत रोचक व तथ्यपरक लगा. लेख में शमशाद बेगम के पति व परिवार के बारे में जानकारी नहीं दी गई है. यह नहीं बताया गया कि शमशाद बेगम ने एक हिंदू गणपत लाल बट्टो से विवाह किया था. वे पति की मृत्यु के बाद अपनी इकलौती बेटी ऊषा और दामाद कर्नल योगेश रत्रा व नातीनातिनी के साथ मुंबई में अंतिम दिनों तक रहीं.

सुनील कुमार चौबे, वाराणसी (उ.प्र.)

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सरिता का सरोकार

आज के इस दौर में जब पूरी दुनिया पैसे की दौड़ में अंधी है, सरिता ने अंधविश्वास के खिलाफ जो लड़ाई छेड़ रखी है उस के लिए कोटिकोटि धन्यवाद. सरिता पढ़ कर लगता है कोई तो है जो गर्त में जा रहे इस समाज के लिए कुछ कर रहा है.   

अनिल तिवारी 

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रजनीश का भ्रम

मई (प्रथम) अंक में प्रकाशित ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ में शीला ने रजनीश के पाखंड को उजागर किया है लेकिन कन्फर्म तब होगा जब विवेक नाम की अंगरेज सैके्रटरी रजनीश से अपने अंतरंग संबंधों को उजागर करे. प्रथम वैज्ञानिक समाजवादी होने के नाते मैं ने यह माना कि देशदुनिया में आज जो बड़े आदमी हैं, उन्हें सौ साल बाद कोई शायद ही याद करे जबकि रजनीश या ओशो छाए रह सकते हैं. उन से जब मिलने गया था तो सोचा शिष्टाचार के मुलम्मे में कू्रर प्रयोग कर रहा यह आदमी फ्रौड है या वास्तव में बुद्ध पुरुष. मैं ने रजनीश के पैर छुए और आंखों से पूछा कि पांव बुद्ध पुरुष की तरह ठंडे कहां हैं, वैसे भूरी आंखों में सागर की शांति जरूर थी. अंतत: मैं निर्णय न कर सका.     

अशीश कुमार चौधरी, दरभंगा (बिहार)

यह भी खूब रही

घटना मेरे बचपन की है जब प्रथम बार स्कूली शिक्षा के लिए मेरा दाखिला कक्षा 6 में हुआ था. स्कूल का सत्र शुरू हुए मात्र 12 दिन ही हुए थे.

इसी बीच एक दिन मेरी माताजी, जो (अब इस दुनिया में नहीं हैं) थोड़ाबहुत हिंदी पढ़ीलिखी थीं, मुझ से घर पर पढ़ाई करने के लिए कहने लगीं. जवाब में मेरा कहना था कि अभी तो मेरी किताबें भी बाजार से खरीद कर नहीं आई हैं तो मैं क्या पढ़ूं. इस पर वे समझाती हुई कहने लगीं कि क्लास में मास्टर साहब ने जो लिखवाया है वही याद कर लो.

मेरे द्वारा यह कहने पर कि क्लास टीचर ने तो अभी तक दैनिक टाइमटेबल ही लिखवाया है, वे जोर दे कर कहने लगीं कि इसी को अच्छी तरह याद कर लो.
माताजी का यह कहते ही वहां पर उपस्थित भैयाभाभी सहित सभी लोग खूब हंसे. माताजी को जब यह समझ आया तो उन का चेहरा देखने लायक था. बाद में वे भी हंसे बिना नहीं रह सकीं.
बी एस भटनागर, आगरा (उ.प्र.)

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भारतीय दूतावास, कुवैत में मेरा कार्यकाल समाप्त होने पर मुझे 1990 में स्थानांतरण होने पर भारतीय उच्चायोग, इस्लामाबाद जाना था. कुवैत में भारतीय समाज की एक संस्था ने मेरे विदाई समारोह में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया. इस प्रकार के कार्यक्रम आमतौर पर भारतीय दूतावास के औडिटोरियम में पूर्वानुमति से आयोजित होते थे. ‘सुर संगम’ नामक इस संस्था के निदेशक अनुमति के लिए दूतावास के सूचना अधिकारी के पास पहुंचे और उन से कहा, ‘‘एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए 19 जुलाई को दूतावास का औडिटोरियम चाहिए.’’

सूचना अधिकारी ने पूछा, ‘‘सांस्कृतिक कार्यक्रम किस खुशी में हो रहा है?’’

‘‘माथुर साहब के जाने की खुशी में,’’ सुर संगम के निदेशक के मुंह से यह बात एकदम निकली.
फिर अपनी बात का अर्थ समझ कर झेंपते हुए फौरन कहा, ‘‘दरअसल, माथुर साहब के सम्मान में विदाई समारोह के लिए.’’
दूतावास के सूचना अधिकारी ने जब यह बात हंसते हुए मुझे बताई तो मुझे भी हंसी आ गई.
सुरेश मल माथुर, जोधपुर (राजस्थान)

 

हमारा ग्वाला कुछ दिनों से दूध ठीक नहीं ला रहा था. एक दिन मैं ने उस से कहा, ‘‘आज तो दूध में बहुत पानी मिलाया लगता है.’’
इस पर वह बोला, ‘‘मेमसाहब, आप हर रोज सब्जी बनाती हो, कभी नमक कम तो कभी ज्यादा भी तो पड़ जाता है.’’

उस की बात सुन कर मुझे खूब हंसी आई.
निर्मल कांता गुप्ता, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

सफर सुहाना अनजाना

घटना बहुत पुरानी है. मैं किसी कार्यवश बदायूं गया. उसी दिन दोपहर में वहां दंगा हो जाने के कारण  72 घंटे का कर्फ्यू लग गया. आवागमन रुक गया. 4 दिन बाद पुलिसलाइन से कुछ गिनीचुनी बसें लोगों को मात्र बदायूं की सीमा पार करा रही थीं. उस बस में सवार हो कर सीमा तक पहुंचा. वहां एक छोटा सा कसबा था. रेलवे स्टेशन या बस अड्डे पहुंचने के लिए भी कोई सवारी नहीं मिल पा रही थी. माहौल में भय व सन्नाटा व्याप्त था. तभी एक बस आती दिखाई दी. बस की सीढि़यों पर खड़े हो कर सवारियों पर एक नजर डाली. सभी यात्री दूसरे संप्रदाय के थे.

मैं उलटे पांव उस बस से उतरने को हुआ. तभी एक सज्जन मेरी मुश्किल भांप गए. दंगे के माहौल में, विश्वास टूटने से दोनों वर्गों के लोग एकदूसरे को आशंकाभरी नजरों से देखते हैं.

वे कहने लगे, ‘‘मानवीय संवेदनाओं का कोई मजहब नहीं होता. अपनी स्वार्थपूर्ति करने वाले लोग ही भाईचारे का माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं. दंगाई सिर्फ दंगाई ही होते हैं.’’

उन की बातों से मेरा हौसला बंध गया. रास्तेभर बातें करते हम लोग बरेली बस अड्डे पर पहुंचे. हाथ मिला कर एकदूसरे से विदा ली.

इस तरह उन अनजान महोदय के कारण मेरा सफर सुहाना बन गया. आज भी स्मृतियों में उन का चेहरा घूम जाता है.
शशि, कानपुर (उ.प्र.)

मैंऔर मेरे पति 2 वर्ष पहले रेलयात्रा कर रहे थे. बीच में दिल्ली से गाड़ी बदलनी थी. हम सुबह 9 बजे ही दिल्ली पहुंच गए जबकि अगली गाड़ी 2 बजे आनी थी. लगभग सवा 2 बजे घोषणा हुई कि लुधियाना जाने वाली गाड़ी प्लेटफौर्म नंबर 5 पर आ रही है. हम दोनों सामान सहित प्लेटफौर्म तक पहुंचे. 2.30 बजे गाड़ी आई और हम भीड़ में जगह बनाते हुए गाड़ी में चढ़ गए. लग रहा था कि जैसे जंग जीत ली हो, पर कहां जनाब.

लगभग 20 मिनट तक गाड़ी प्लेटफौर्म पर रुकी रही. एकाएक लोगों की सुगबुगाहट से आभास हुआ कि यह वह गाड़ी नहीं है जिस में हमारा आरक्षण है. हमारी वाली गाड़ी सामने वाले प्लेटफौर्म पर खड़ी थी. किसी तरह हांफते हुए नीचे उतरे तो क्या देखते हैं कि सामने वाली गाड़ी प्लेटफौर्म छोड़ चुकी है, हमें दूर गार्ड हरी झंडी हिलाते हुए दिखाई दे रहा था.

इस तरह लगभग आधे दिन के इंतजार के बाद भी हमारी गाड़ी छूट गई थी.

बाद में हमें ज्ञात हुआ कि एक ही नाम की 2 गाडि़यां आमनेसामने आ जाने की वजह से ऐसा हुआ. कई लोगों की गाड़ी इस वजह से छूट गई थी. इस के बाद जब भी रेलयात्रा करते हैं, इस अनुभव को सदा याद करते हैं.
शिखा बजाज, लुधियाना (पंजाब)

हमारी बेडि़यां

हम लोग पढ़लिख कर अपने को काफी मौडर्न समझने लगते हैं. विकास की बातें करते नहीं अघाते, मगर जहां धर्म, कर्म, लोकपरलोक की बातें पंडेपुरोहितों द्वारा की जाती हैं वहां हम चारों खाने चित पड़ जाते हैं. पंडेपुरोहित हमारे सामने धर्मकर्म व सामाजिकता के नाम पर ऐसा जाल बुनते हैं कि हम उस में फंसते जाते हैं. उस समय हमारा सारा मौडर्निज्म कहीं चला जाता है.

पिछले साल हमारे एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई. उन की दसवीं व तेरहवीं के दिन पंडेपुरोहितों ने अन्न, कपड़ा व रुपए इतने ज्यादा उगाहे कि उन के परिवार सालभर बिना किसी मेहनत के मौज करेंगे. ये लोग धर्म के नाम पर हमें इतना भीरु बना देते हैं कि जो कुछ मांगते जाते हैं, हम देते चले जाते हैं. इस में अपनी बड़ाई के लिए?भी कुछ लोग अंधाधुंध खर्च करते हैं. पता नहीं कब हम इन

के चंगुल से नजात पाएंगे क्योंकि हमारे दिलोदिमाग पर अंधविश्वास डेरा डाले है.
कैलाश राम (उ.प्र.)

बहनोई की मौत के चलते हमें जनवरी में दिल्ली जाना पड़ा था. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी और मेरी बहन के घर कई और रिश्तेदार जमा थे. हम वैसे दिल्ली अकसर जाते रहते हैं और हमेशा अपनी बेटी के पास ही रहते हैं पर इस बार अफसोस का मामला था, इसलिए हम ने उस को मना कर दिया और सोचा कि जो भी होगा देखा जाएगा, बहन के पास ही ठहरते हैं. पर बेटीदामाद को कहां चैन, वे हमें आराम देना चाहते थे.

उन्हीं दिनों हमारी समधन यानी हमारी बेटी की सास भोपाल से उन के पास आई हुई थीं. अपने बेटेबहू को परेशान देख कर हमारी समधन ने उन से परेशानी का कारण पूछा. कारण पता लगने पर उन्होंने एकदम ही हल भी सुझा दिया और बोलीं, ‘‘इस में क्या है, उन को बोलो, सीधे यहीं आ जाएं और फिर नहानेधोने के बाद चले जाएं तो कोई बात नहीं है.’’ हमारे मना करने पर भी वे लोग नहीं माने और हमें अपने घर ले गए. मेरी बहन के घर पर भी हमारी बेटी ने अच्छी तरह समझा दिया था ताकि उन्हें बुरा न लगे.

हम दिल्ली 4 दिन रहे. रोज सबेरे तैयार हो कर दिनभर के लिए बहन के पास चले जाते और शाम को वापस आ जाते थे. बेटी, दामाद और समधन की सूझबूझ से हम ठंड से भी बचे रहे, बीमार भी नहीं पड़े और अफसोस में भी शामिल रहे. यह सही बात है कि पुरानी बातों को डर या अंधविश्वास की वजह से हम ने ही उन्हें बेडि़यां बना रखा है, चाहें तो उन्हें उतार फेंक सकते हैं और एक अच्छा प्रैक्टिकल जीवन व्यतीत कर सकते हैं.
ओ डी सिंह, वडोदरा (गुजरात)

मेरे पापा

जीवन का मेरा हर वह पल सुनहरा हो जाता है जिस में पापा मेरे साथ होते हैं. मध्यवर्गीय परिवार से होते हुए भी उन्होंने मेरी हर मांग को पूरा किया.
15 वर्ष की छोटी सी उम्र में मु झे किडनी की बीमारी हो गई जिस कारण मैं शारीरिक रूप से कमजोर हो गया और मेरी पढ़ाई रुक गई.

मैं बुरी तरह से मानसिक अवसाद से घिर गया. तब पापा ने ही मु झे अवसाद से बाहर निकाला और अपनी बीमारी से लड़ने के लिए व फिर से पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. उन के इन शब्दों, ‘बेटा, हर इंसान के जीवन में संघर्ष होता है. शायद तुम्हारे जीवन में कुछ ज्यादा ही संघर्ष हो पर उन से घबराना नहीं बल्कि डट कर मुकाबला करना. तुम्हें अपनेआप को साबित करना है.’ ने मेरा मनोबल बढ़ाया. उन्हीं के कारण मैं ने अपनी बीमारी को सकारात्मक रूप में लेते हुए अपनी पढ़ाई शुरू की. हाईस्कूल, इंटर और फिर गे्रजुएशन कंप्लीट किया.

पर गे्रजुएशन के बाद मेरी हालत और बिगड़ी व आगे जीवित रहने के लिए डाक्टर ने ‘किडनी प्रत्यारोपण’ की सलाह दी. तब पापा ने ही 57 वर्ष की उम्र व उच्च रक्तचाप होते हुए भी अपनी एक किडनी दे कर मु झे फिर एक नया जीवनदान दिया.

औपरेशन के ठीक 1 माह बाद जब मैं पापा से मिला व हमारी नजरें एकदूसरे से मिलीं तब उमड़ते भावों, छलकते आंसू, असीम सुख की अनुभूति, सच्चे आनंद का जो एहसास हुआ उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.
तब पापा ने मु झे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की सलाह दी ताकि मैं किसी पर बो झ न बनूं. मैं कैरियर संवारने में लग गया और पापा मेरा आत्मविश्वास बढ़ाते रहते.
आज मैं पापा के प्यार, उन की सलाह, नसीहतों के साथ जीवन की नई चुनौतियों को पार करने व कैरियर बनाने में जुटा हूं.
सौरभ श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

मेरे पिताजी, जिन को हम अब्बा कहा करते थे, का सब काम अनुशासित था. वे समय के पाबंद थे. सब काम समय पर करो, यही उन का कहना रहता था. हम सब भाईबहन उन के ऋणी हैं कि उन्होंने हम सब को आत्मनिर्भर बनाया.

उन की सीख थी कि अपने से किसी को भी दुखपीड़ा न पहुंचाओ. हमेशा सच बोलो, अपनी गलती स्वीकार करो, बड़ों का आदर करो, दूसरों की यथासंभव मदद करो,  झूठ का सहारा मत लो. हमें अपने पापा की सीख पर गर्व है.

आज हम सब उन्हीं की प्रेरणा से आत्मनिर्भर हैं. अब हमारे बीच पापा नहीं हैं, फिर भी कोई दिन, कोई पल ऐसा नहीं जाता कि उन की याद न सताए.

कुसुम देव, सागर (म.प्र.)

आप के पत्र

सरित प्रवाह, मई (प्रथम) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘मोदी मिशन का सच’ अत्यंत रोचक, सामाजिक, सामयिक व हकीकत से लबरेज लगी. आप का यह कहना बिलकुल सही है कि चुनाव अगर भाषण से जीते जाते तो अटल बिहारी वाजपेयी 1971 में ही प्रधानमंत्री बन जाते और उन्हें 2004 की हार न देखनी पड़ती. उस समय ‘अतुल्य भारत’ का नारा भाजपा के सिर चढ़ कर बोल रहा था. पार्टी विश्वास से पूरी तरह लबरेज थी कि जीत उसी की होगी, मगर हुआ उलटा. कांगे्रस पार्टी भारी बहुमत से तो जीत हासिल नहीं कर सकी पर पिछले 9 सालों से कांग्रेस ही सरकार चला रही है, भले ही गठबंधन की सरकार हो.

भाजपा के नेता व गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया है और विकास का अपना नजरिया पेश कर रहे हैं. मोदी के विकास के हवाई प्रवचनों में जादू की कहानियां हैं. भाजपा की रामलीला में अभी तक तय ही नहीं हो पाया, राम कौन बनेगा. रामनाम जपने वाली इस पार्टी में राम के लिए महाभारत का माहौल दिख रहा है. दावेदार कई हैं पर वनवास के लिए नहीं, राजतिलक कराने के लिए आतुर हैं. लक्ष्मण, भरत, हनुमान बनने को कोई तैयार नहीं, अलबत्ता तवज्जुह न मिलने पर विभीषण और बातबात पर श्राप देने वाले व संन्यास की धमकी देने वाले जरूर दिखते हैं. प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की बेचैनी साफ देखी जा सकती है.

केवल भाषणों से लोगों का पेट नहीं भरता. देश चलाने के लिए चुनौतियों का सामना करने के लिए जज्बा चाहिए और नया नजरिया होना चाहिए. मोदी के दामन पर सांप्रदायिक नरसंहार के दाग हैं.

दिल्ली में मार्च व अप्रैल के भाषणों में मोदी ने कहीं भी इस बात पर अफसोस तक नहीं जताया कि उन के मुख्यमंत्री होने और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री होने के बावजूद सरकार की शह पर मुसलमान औरतों और बच्चों तक को मारा जाता रहा. नरेंद्र मोदी जिस विकास की बात कर रहे हैं उस का लाभ पहले उद्योगपतियों को मिलेगा. बरतन में अगर कहीं जला दूध बचा तो वह आम लोगों को मिलेगा.
कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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सरित प्रवाह के तहत प्रकाशित संपादकीय टिप्पणियां ‘मोदी मिशन का सच’ और ‘साडा हक’ समाज को सच से अवगत कराती हैं. लोगों की आंखें कड़वे सच को जान कर खुल जानी चाहिए. वास्तव में देश के कर्णधार कहलाए जाने वालों की मंशा सिर्फ सत्ता में बने रहना है और वे विकास के मसीहा बन कर लोगों को चिकनीचुपड़ी बातों से बहलाए रखते हैं.

‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी, रजनीश का भ्रमजाल’ और ‘राष्ट्रीय शिक्षा अभियान : अरबों स्वाहा, नतीजा सिफर’ लेख बहुत सटीक व तथ्यों पर आधारित हैं. सर्व शिक्षा अभियान ने तो स्कूली छात्रों का बेड़ा गर्क कर दिया है. भले ही सरकारी आंकड़े संपूर्ण साक्षरता का दावा कागजों में करते हों, हालत यह है कि कुछ बच्चों को साधारण गुणा, भाग या जमा के सवालों के साथ किताब भी पढ़नी नहीं आती है. शिक्षकों पर काम का बो झ इतना है कि वे बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. ऐसे में भावी राष्ट्र के निर्माता कहलाए जाने वाले छात्रों का भविष्य क्या होगा?
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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‘मृत्युदंड और समाज’ शीर्षक से प्रकाशित आप के विचार पढ़े, जो आपराधिक तत्त्वों को दिए जाने वाले दंड ‘मृत्युदंड’ के विरुद्ध ठीक उसी तरह लगे जैसे कोई मानवाधिकारी इस दंड के विरुद्ध सजायाफ्ता की वकालत कर रहा हो. दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति द्वारा बिना विलंब के निस्तारण तक पर आप ने सवाल उठा दिया कि इसी कारण इस दंड की मांग बढ़ने लगी है जबकि आप और हम सभी यह भलीभांति जानते हैं कि ‘मृत्युदंड’ राष्ट्रपति नहीं, बल्कि देश की अदालतें लंबीलंबी सुनवाइयों, प्र्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों, अपराधियों व आरोपियों तक की दलीलें सुनने के बाद भी गंभीर चिंतनमनन के उपरांत अपराध की गंभीरता को देखते हुए देती हैं. माननीय राष्ट्रपति तो उस के बाद ही संबंधित राज्य व मंत्रिमंडल की संस्तुति पर मोहर लगाते हैं.

वैसे तो यह एक शाश्वत सत्य ही है कि ‘जो तत्त्व बेगुनाहों को मारने पर ‘डांस’ तक कर के खुशी का इजहार करते हों या जिन्हें मरने वाले निर्दोषों पर दरिंदगी बरपाते या शांतिप्रिय जनता का नाजायज खून बहाने पर जरा भी रहम न आता हो, उन पर आखिर दया की भी जाए तो क्यों?’

आप का कहना कि समाज और सरकार अपराध तो रोक नहीं पाते, बल्कि वे मृत्युदंड दे कर अपनी खीज ही निकालते हैं, क्या ऐसे शैतान अब आप का यह संपादकीय पढ़ कर साधु बन पाएंगे? क्योंकि जिन जेलों में उन्हें सुधार हेतु भेजा जाता है वहां वे तत्त्व ‘कुत्ते की दुम’ समान इतने सीधे हो जाते हैं कि कालकोठरियों में बैठेबैठे ही ब्लेडबाजी, रंगदारी, हत्याएं करने या करवाने के षड्यंत्र या सुपारी किलरों तक के शर्मनाक कार्यों तक को और भी ज्यादा दुस्साहसिक तरीकों से अंजाम देने में जुट जाते हैं. इस पर भी अगर आप के मतानुसार उन्हें ‘फांसी के फंदों’ पर न लटकाया जाए तो आप, समाज, न्याय व देश के प्रशंसक उन्हें ‘फूलमालाओं’ से लाद कर देख लें. जवाब शायद तब भी यही मिलेगा-‘हम नहीं सुधरेंगे.’ क्योंकि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती है.
ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

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संपादकीय टिप्पणी ‘शिक्षा का आधार’ में शिक्षण संबंधी जिन समस्याओं और उन के समाधान का जो आप ने जिक्र किया

है वे उपयोगी और बढि़या समाज की स्थापना करने वाला है. प्राइमरी शिक्षा का बराबरीकरण करना बेहतरीन सुझाव है. लेकिन देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो उन्हें लागू नहीं करना चाहेगा क्योंकि इस से उस का स्वार्थ नहीं सधेगा. लिहाजा, ऊंचनीच का भेदभाव हमेशा के लिए बना रहेगा.

भले ही मुसलमान 700 साल और अंगरेज, फ्रांसीसी व पुर्तगाली 300 साल तक?भारत को कदमों तले दबाए रहे लेकिन बिना मेहनत के देश के अंदर दूसरी जातियों से?श्रेष्ठ बने रहने का फार्मूला न खोने पाए.

बच्चे बचपन में धर्म, जाति, भाषा और पैसों का भेदभाव न सीखें, इस से बेहतर और क्या हो सकता है? काश,?भारत ऐसे समाज की स्थापना करता.
माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)

प्रधानमंत्री कौन

मई (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘मोदी और राहुल : खोखले दावों के सौदागर’ में लेखक ने दोनों को प्रधानमंत्री बनने योग्य नहीं माना है. यह सच भी है कि दोनों नेताओं की पार्टियों के पास अब नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे दिग्गज, अनुभवी और कूटनीतिज्ञ नेता नहीं हैं. इसलिए प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदारों को सही दिशा और कूटनीति की सूझ नहीं मिल रही है.

आज की युवापीढ़ी को हिंदुत्व और मंदिरमसजिद की धर्मांधता से कुछ लेनादेना नहीं है. उसे तो ईमानदार प्रशासन और विकास चाहिए जिस से राजनीतिक व्यवस्था में हर तरह से बदलाव आ सके. देश में अगर कोई ज्यादा उपेक्षित, शोषित और ठगी का शिकार है तो वह है इस देश का आम नागरिक जिस से उस का वोट भी झूठे वादों के जरिए लूट लिया जाता है.

देश में राजनीति व्यापार बन गई है. सत्ता में शामिल सभी लूटमार में लगे हैं. नतीजा आज सामने है कि सत्ता छिन्नभिन्न है.

ऐसे बिगड़े माहौल में प्रधानमंत्री पद का कोई दावेदार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, आतंकवाद व कौर्पोरेट की लूट जैसे ज्वलंत मुद्दों पर दबंगई के साथ सामने आ कर देश की जनता का विश्वास जीतता है तो उसे देश का प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. वहीं, देश का प्रधानमंत्री कोई महिला न हो क्योंकि उसे सुनाई तो सब देता है परंतु समझ में कुछ नहीं आता.
विजय यादव, जबलपुर (म.प्र.)

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अंधभक्ति

मई (प्रथम) में ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ की परत दर परत, सचाई लेख में उजागर की गई है. इसे पढ़ कर तथाकथित भगवानों के भक्तों की

आंखें खुलनी चाहिए. जो इन स्वार्थलोलुप, धनलोलुप ही नहीं बल्कि नारीलोलुप इंसानों तक को अपनी अंधभक्ति से न केवल देवता मानते हैं बल्कि उन को भगवान तक बना कर पूजने लगते हैं. मगर जो अतिविश्वास से पीडि़त हो कर ढोंगी भगवानों की भक्ति में लीन हो कर, अपने आगेपीछे की सोचनेसम झने की शक्ति तक खो देते हों, उन धर्मांध तत्त्वों की आंखें खुलेंगी कैसे? जिन इंसानों की मति ही मारी गई हो उन्हें तो शायद ही कोई सम झा पाए.

तथाकथित भगवानों के जिन भक्तों तक को सुबह के नाश्ते में कोई सुंदरी, लंच के बाद कोई दूसरी स्त्री और डिनर के साथ नई भोग्या (नारी) की चाहत हो, उन के पथप्रदर्शक की क्याक्या मांग या मंशा होती होगी? जो भगवान अपने भक्तों को भटका कर योग के नाम पर भोग में, प्रफुल्लता के बहाने नशे में  झोंक रहा हो और मौजमस्ती के स्वांग रच कर सामूहिक सैक्स हेतु प्रेरित कर रहा हो वह भगवान होगा कि शैतान? आश्चर्य तो तब होता है जब ऐसी गंभीर रिपोर्टों या शर्मनाक आरोपों का परदाफाश होने पर भी इन अंधभक्तों की आंखें नहीं खुलतीं.
टीसीडी गाडेगावलिया, करोल बाग (न.दि.)

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‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ लेख एकतरफा और सचाई से कोसों दूर लगा. वास्तव में जो लोग ओशो के विचारों से गहराई से परिचित नहीं हैं वे ही बेतुकी बातें लिखते हैं.

ओशो का जीवन संदेश, ध्यान और उन का जीवन उद्देश्य था मानव चेतना का उत्थान. उन्होंने कभी शिष्य बनाने की चेष्टा नहीं की. वे तो स्पष्ट रूप से कहते थे, मेरे विचार अच्छे लगें तो सुनो वरना यहां से खुशी से जा सकते हो. मु झे शिष्यों की भीड़ इकट्ठा करने का शौक नहीं है. आखिर में जो लिखा है वह उन के शिष्यों के आजूबाजू वालों की पहचान है उन की नहीं. उन की किताबों को अब भी पूरी तरह से सम झने वाले फालतू बातों पर ध्यान नहीं देते.
परेश अंतानी, राजकोट (गुज.)

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मई अंक पढ़ा. बकवास था. ओशो के बारे में अभी भी समाज में भ्रम है. ऐसे ही न छापें, पहले वास्तविकता जानें. आनंद शीला के ही स्टेटमैंट के आधार पर आप ने लेख छापा. और भी तो हैं, जिन से जानकारी ले सकते हैं. अगली बार आप चैतन्य कीर्ति, मां योग नीलम, मां अमृत साधना के स्टेटमैंट छापिए. वरना बात अधूरी ही रहेगी. सिक्के के दो पहलू होते हैं तो आप अब दूसरा पहलू भी छापिए.
चेतन संदीप

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लेख ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ बड़ा ही मनोरंजक और हास्यास्पद लगा. आश्चर्यजनक प्रसन्नता हुई कि ओशो आज भी जनमानस को इतना  झक झोर रहे हैं. शायद ओशो के विषय में लेखक ने जो पासपड़ोस में सुना है, उस के आधार पर अपने लेख की रचना कर डाली और मां आनंद शीला की लिखी एक पुस्तक के छिटपुट अंश इंटरनैट इत्यादि माध्यम से पढ़ कर वाक्यों और उद्धरणों का चुनाव कर लिया जबकि उन के लेख में ही दिए गए मां शीला के ही साक्षात्कार तक में कोई भी निंदा भाव नहीं दिखाई पड़ता.

शायद इस लेख के लेखक इतने तिलमिलाए हुए मूड में लेखरचना करने बैठे थे कि उन्होंने ‘प्रौपर होमवर्क’ भी नहीं किया. मैं उन से यह जरूर जानना चाहूंगा कि वे कितनी बार ओशो से मिले थे या वे कितनी बार पूना कम्यून या अमेरिका कम्यून में रहे थे, या कम से कम किसी ‘मैडिटेशन कैंप’ में सम्मिलित हुए हैं, जिस से उन्हें इन तथाकथित ‘सनसनीखेज खुलासों’ का पता चल गया या फिर कम से कम यही पता चले कि ओशो की उन्होंने कितनी किताबें पढ़ी हैं या प्रवचन सुने हैं या वीडियो ही देखे हैं.
आशीष, भदोही (उ.प्र.) द्य

नैतिकता का पतन

लेख ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ पढ़ा. बेबाक, निडर प्रकाशन के लिए बधाई. हम भारतीय किस हद तक अंधविश्वासी होते हैं, इस लेख से अनुमान लगाया जा सकता है. एक सामान्य व्यक्ति को हम भगवान की संज्ञा भी दे सकते हैं. उस के गुणोंअवगुणों का आकलन किए बिना, उसे गुरु मान लेना, हम लोगों की या भारतीय समाज की मान्यता जैसी रही है. इस सत्यकथा से हम सब लोगों को सबक लेना चाहिए. मु झे किसी विद्वान ने बताया कि यौनरोग (सिफलिस) जैसी विदेशी बीमारी, ऐसे ही बहुत से अरबपति साधुसंन्यासियों की कृपा से ही भारत में हुई है.
सत्यभान सारस्वत,  देहरादून (उत्तराखंड)

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