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Social Story In Hindi : पीड़ा – एक सिपाही के उलझनों की कहानी

Social Story In Hindi : “ब्याह के बाद वो अपनी ससुराल के तलवे चाटेगा”, बड़े भाई ने कहा.

‘‘ससुराल के तलवे क्यों चाटूंगा, मैं भारतीय सेना का सैनिक हूं. मुझे देश के किसी भी कोने में सैप्रेट फैमिली क्वार्टर अथोराइज हैं. यह उन को मिलता है जिन की पोस्टिंग बौर्डर पर होती है और वे गलती से घर वालों पर विश्वास कर के अपनी बीवी व बच्चों को घर में छोड़ने का जुल्म करते हैं. जैसे मैं ने राजी और बच्चे को यहां छोड़ने का जुल्म किया. फैमिली क्वार्टर का अलौटमैंट लैटर है मेरी जेब में. अभी मिलिट्री की गाड़ी आ रही है, हम यहां से चले जाएंगे.’’

‘‘घर का खर्चा कैसे चलेगा?’’ मां ने कहा था.

‘‘यह आप को पहले सोचना चाहिए था. सबकुछ आप ने अपनी बेटी और दामाद को दे दिया है. मैं आप का अकेला बेटा नहीं हूं. और बेटे भी हैं. आप ने क्या किया, यह आप जानती हैं. पिताजी ने आप को सबकुछ दिया था. 2 मकान एक गांव में, एक शहर में. शहर का मकान घरों के बीच में था. बैंकबैलेंस था. बुजुर्गों की जमीनें थीं.

‘‘आप के पास इतना कुछ था कि आप को किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं थी. छोटा भी बड़े आराम से पढ़ जाता. आप न केवल खुद लुटीं बल्कि अपने सारे बेटों को भी कंगाल कर दिया. 10 हजार रुपए के बदले आप ने सब को गुलाम बना दिया, सब का बेड़ा गर्क कर दिया.’’

‘‘मैं ने तो वह किया जो सब ने कहा.’’

‘‘सब में कौनकौन आता है? यह बेटी, दामाद और बड़ा भाई. दामाद तो बाहर का आदमी था. आप नहीं जानती थीं, इन दोनों ने अपने जीवन में क्या किया था?

‘‘हमारे परिवार की बरबादी तब से शुरू हो गई थी जब मैं 7वीं में पढ़ता था. गली की लड़की के लिए सब से बड़े भाई ने 2 बार अफीम खाई और पागलखाने चला गया था. लड़की के घर वालों से पिटा भी था. पिताजी को पागलखाने में दाखिले के लिए चंडीगड़ जा कर सीएम औफिस से परमिशन लानी पड़ी थी. आप जानती थीं, फिर भी उसे पढ़ने को डाला और पैसा बरबाद किया था.

‘‘यह आप की बेटी संगीत सीखना चाहती थी. उस के विपरीत लेडी हैल्थ विजिटर के कोर्स में दाखिला लिया और पूरा नहीं किया था. पैसा बरबाद किया. यह जो बड़ा भाई सामने बैठा है, इस ने जीवन में क्या किया? जीवनभर अपने को, अपनी बीवी को और अपने बच्चों को धोखा देता रहा है. जितना नुकसान इस ने परिवार को पहुंचाया है और किसी ने नहीं पहुंचाया. आप इस की बातों के झंसे में आ गईं.

‘‘ये श्रीमानजी, पहले नेवी में गए थे. वहीं रहते तो चीफ पैटी अफसर बन कर रिटायर होते और अच्छी पैंशन मिलती. नेवी में दाढ़ीमूछ इकट्ठी रखने का आदेश है. ये अड़ गए कि हमारे कस्टम हैं कि मूंछ रखनी है, दाढ़ी नहीं रखनी है. इंटरनल होने वाले पेपर ठीक से नहीं दिए, उन्होंने निकाल दिया. काहे की दाढ़ी, काहे की मूंछ, काहे का कस्टम. सच बात यह थी, ट्रेनिंग की सख्ती नहीं सह पाए ये. परिवार ने फिर इन का साथ दिया.

‘‘इस धोखेबाज आदमी को पढ़ने के लिए डाला. पढ़ा फिर भी नहीं था. घर में झगड़ा किया, फिर फौज में चले गए. वहां बीमार हुए, मैडिकल बोर्ड से आउट हो कर घर आ गए.

‘‘मैट्रिक में फर्स्ट डिविजन थे. एक्स सर्विसमैन कोटे से इन को पंजाब सरकार में फूड सबइंस्पैक्टर की नौकरी मिली थी. वहीं रहते तो उस विभाग के सब से ऊंचे पद तक जाते. इस ने यह कह कर वह नौकरी छोड़ दी थी कि यह ईमानदारी का महकमा नहीं है. एक बेईमान और धोखेबाज आदमी ईमानदारी की बात कर रहा था.

‘‘आप को इस आदमी की वृत्ति की फिर भी समझ नहीं आई थी? किस मोह के झंसे में आ गई थीं? मां तो सब के बारे में सोचती है. हम सब इसलिए पढ़ नहीं पाए कि सारा पैसा इन तीनों पर खर्च हो गया था. रहीसही कसर बेटी और दामाद ने पूरी कर दी.

‘‘दामादजी कह रहे थे, उन के पास 10 हजार रुपए नहीं हैं. लोन लेना पड़ेगा. लोन तब मिलेगा जब जमीन उन के नाम होगी.

‘‘रजिस्ट्री नहीं करवानी थी न. कम से कम पैसा तो आप के पास रहता था. सब धोखेबाजी थी. कोई लोनवोन नहीं लेना था. केवल जमीन हथियानी थी. पैसा इन के पास था, वही दिया. पूछो इन से, सामने बैठे हैं.

‘‘भाईसाहब, आप को तो पता था. आप तो जानते थे, कानून क्या होता है? आप ने 6 साल अपनी बीवी से तलाक का मुकदमा लड़ा था. आप को नहीं पता था कि जमीन उस की होती है जिस के नाम से उस की रजिस्ट्री हुई हो.

‘‘समझते के अनुसार जो पैसा घर में दिया जाना चाहिए था, वह मुकदमे में बरबाद कर दिया. समझते के लिए कंपनी बनाई, ‘ यूनाइटेड स्टैंड, डीवाइटेड फौल.’ माई फुट. बलि का बकरा बना मैं, भलोल समझ कर लूटते रहे.’’

‘‘आप को अपना दिमाग इस्तेमाल करना चाहिए था?’’

‘‘सही कहा आप ने. आप ने अपना दिमाग इस्तेमाल किया था न, क्या हुआ? बच्चे कहां हैं और बीवी कहां है? अगर और भाइयों की तरह उस मकान का हिस्सा आप को बेच दिया होता तो आज वे सड़क पर होते. आप गांव के मकान को भी बेच कर डकार गए होते. काश, मैं ने अपना दिमाग इस्तेमाल किया होता.

‘‘पिताजी के मरने के बाद मैं ने अपना पैसा संभाल कर रखा होता और किसी तरह का सहयोग न करता या हम में से किसी एक ने भी अपना दिमाग इस्तेमाल किया होता तो शहर वाला मकान न बिकता. किसी एक ने भी पावर औफ अटौर्नी न दी होती तो कम से कम 3 भाई अपनाअपना पोर्शन बना कर वहां सैटल हो जाते. खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी. फायदा, बेईमानों और धोखेबाजों को मिला.

‘‘हमारे घर में केवल 2 शादियां अच्छी हुई थीं. एक सब से बड़े भाई की. दूसरे, इस लुटेरी बहन की. शादी से पहले या शादी के बाद उस भाई ने घर में सहयोग नहीं किया. शादी करते ही वे घर से अलग हो गए थे. अच्छा किया था, वे आप सब की धोखेबाजियों में तो नहीं आए. बस, एक जगह धोखा खा गए थे, आप को पावर औफ अटौर्नी दे कर. दोनों शादियां भी पिताजी ने अपने हाथों से कर दीं. नहीं तो कोई और लुटेरा लूट कर ले जाता.

‘‘हम बाकियों की शादी मंदिरों में, गुरुद्वारों में करना चाहते थे. दहेज से नफरत थी, ऐसा नहीं था बल्कि कुछ पास में था ही नहीं. अच्छी शादी करने की हमारी औकात नहीं रह गई थी. बाकियों की शादी किस तरह हुई, आप जानती हैं. मैं ने 2 महीने की छुट्टियों के पैसे से शादी की थी. छोटे ने यहीं आपस में वरमाला पहन ली थी. सब के सब लड़की वाले गर्जी थे. कइयों की ज्यादा लड़कियां थीं, इसलिए झंसे में आए. कई पिताजी नाम के कारण फंसे.

‘‘मैं शन्नो को साथ ले कर गया. आप को पैसे दे कर गया था, पीछे से कोई दिक्कत न हो. यहां भी गलती की. वहां हम तेल की रोटियां खाते रहे. जब वह लौट कर आई तो पेट से थी. आप ने क्या कहा था, मां? ‘बड़ी आई थी, वह इसी तरह पेट से थी. लड़की हुई थी. यह भी लड़कियों के घर से आई है, लड़की जनेगी. वंश आगे बढ़ेगा भला.’ इस से आप के चेहरे पर थोड़ी सी भी खुशी नहीं थी. आप को लगातार 12 साल से आ रहे पैसों के बंद होने की चिंता थी.

‘‘शन्नो, इस बहन के पांव को छूने के लिए झकी तो इस ने आशीर्वाद देने के बजाय आगे से ठुड मारा. आप भी तो वहीं थी, मां. अगर मां जाई बहन ऐसी होती है तो ऐसी बहन को दूर से तौबा.

‘‘अपने जीवन में मुझे 1,000 रुपए की जरूरत पड़ी थी. इस बहन ने पैसे तो दिए, साथ में, 11 पेज का लैटर लिखा था. जिस में गालियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं था. आप कहें तो वह लैटर फेसबुक पर डालूं.

‘‘ये श्रीमानजी, हमारे जीजा, पिताजी के मरने के बाद हम ने इन को पिताजी का दर्जा दिया था. मैं ने खुद कहते सुना था कि जमीन तो मैं ने अपने नाम करवा ली है, आंएगे साले मेरे पास ही. आप कहें तो मेरे मोबाइल में की गई वह रिकौर्डिंग है, सुनाऊं. लो, सुन लो, किसी तरह का भ्रम मन में नहीं रहना चाहिए. जीजू, कुछ शर्म आई. बेशर्मों को क्या शर्म आएगी?

‘‘मां, शन्नो के मेहनतकश बाप ने अपनी लाड़ली बेटी को जीवन में काम आने वाली हर चीज दी. हर बाप देता है. आप जानती हैं, मांबाप पंजाब में अपनी बेटी को फुलकारी क्यों देते हैं? आप ने भी तो दी थी. बेटी जीवनभर उसे संभाल कर रखती है, इसलिए देते हैं. अगर उस की बेटी की मौत हो जाए और वे समय पर पहुंच न पाएं तो मायके की ओर से चादर के रूप में डाली जाती है वह. वह फुलकारी गांव कैसे पहुंच गई? शन्नो कह रही थी कि उस का एक पर्पल कलर का सिल्क का नाइट सूट था, वह भी गायब है. 101 नाड़े दिए थे, रेशमी रंगदार नाड़े, अपनी लाड़ली को ताकि जीवनभर नाड़े मांगने की जरूरत न पड़े. वे भी नहीं हैं.’’

‘‘नाइट सूट और नाड़े मैं ले गई थी. शालू को नाइट सूट बहुत पसंद था,’’ बहन ने कहा.

‘‘वह भी चोरी कर के, बिना किसी को बताए. दहेज से नफरत करने वाले दहेज चोरी कर के ले गए. पसंद था तो अपने पैसे से खरीदतीं, पहले कम लूटा है?’’

‘‘मैं ने मां को बताया था.’’

‘‘मां का सामान था. आप के दहेज का सामान आप की सास या और कोई ले जाता तो आप उस को छोड़तीं? खा जातीं उसे. जिस का सामान था, उस से पूछना गवारा नहीं समझ? मां, आप ने शन्नो को बताना तो दूर, मुझे भी नहीं बताया था. कई बातें लिखती थीं कि काका, यह हो गया है, वह कर दिया है. यह इसलिए नहीं बताया कि चोरी किया जा रहा था. दहेज का सारा सामान टूटी पेटी में कैसे चला गया? उस की नई पेटी में गेहूं कैसे डाल दिया और सामान टूटी हुई पेटी में क्यों व कैसे? सब के सब बेईमान और धोखेबाज हो.’’

‘‘बाहर गेहूं खराब हो रहा था तेजिंदर.’’

‘‘खराब हो रहा था, खराब होने देते. नई पेटी लानी थी.’’

‘‘उस के लिए पैसे नहीं थे.’’

‘‘आप ने सबकुछ अपनी बेटी को दे दिया. हर जगह इस ने हिस्सेदारी ली है. मां का खयाल रखने की जिम्मेदारी इस की भी है. अब आप की बेटी आप को खाने से ले कर कपड़ेलत्ते तक, सब देगी. अगर ऐसी होती है मां, ऐसे होते हैं बहनभाई तो नहीं चाहिए ऐसे भाईबहन. इस भाई के पास पैसे नहीं थे, यह नई पेटी ले आता.

‘‘मेरे पास आज भी छोटे भाई का वह लैटर फाइल में पड़ा है जिस में उस ने लिखा था कि आप भाभी और बच्चे को बचा लो. भाई आप की तनख्वाह से घर का खर्चा चलाता है और अपनी तनख्वाह बचाता है. भाभी सूख कर कांटा हो गई है. बच्चे को दूध मिलता है तो भाभी को नहीं मिलता. दूध नहीं पिएगी तो बच्चे के लिए दूध कैसे आएगा. वह बीमार भी रहने लगी है.

‘‘आप की यह बेटी कहती थी, बूढ़े, पढ़ने वाले और बच्चे को दूध मिलना चाहिए, जवानों को दूध की क्या जरूरत है. मैं इसी टैंशन में बीमार हुआ और हैलिकौप्टर से अस्पताल में शिफ्ट किया गया था. अगर मुझे इस तरह शिफ्ट न किया जाता तो आज मैं जीवित न होता. छोटे का वह पत्र आज भी मेरे पास है. कहें तो फेसबुक में डालूं पर आप जैसे बेशर्म लोगों को क्या फर्क पड़ेगा, क्या फर्क पड़ता है.

‘‘मां, मैं आप से क्या कहूं. शर्म भी आती है. आप ने तो जीवन में कभी अंडरगारमैंट पहने नहीं. घर में बहुएं भी ऐसे ही घूमें? आप घर की बड़ी थीं. आप को इतनी समझ नहीं थी कि बहुओं की अपनी भी जरूरतें होती हैं. क्यों आप ने इस के लिए पैसे नहीं दिए थे? पैसे की कमी कैसे पड़ी थी? क्यों आप ने मेरी तनख्वाह की तरह भाई से पैसे नहीं मांगे. समझता तो यही था कि सभी अपनी तनख्वाहें आप को देंगे? कोई नहीं देता था तो आप ने मुझे क्यों नहीं लिखा? मुझ से गलती यह हुई कि मैं सारे पैसे आप को भेजता रहा कि आप शन्नो का खयाल रखेंगी पर मेरा यह वहम निकला.

‘‘मैं ने हर महीने शन्नो को 500 रुपए महीना देने की बात की थी. ये सब जो बैठे हुए हैं, इन सभी ने विरोध किया था कि घर की सभी बहुओं को 500 रुपए महीना मिलना चाहिए. क्या मेरी परिस्थितियों और इन की परिस्थितियों में फर्क नहीं था? ये सब अपनी बीवियों का खयाल रखने के लिए साथ में थे. मैं तो दूर था. शन्नो अपने मन की बात केवल पत्रों से लिखती थी, मोबाइल उस के पास नहीं था. जब तक पत्र मुझ तक पहुंचता तब तक पीछे बहुतकुछ घट जाता. अगर अमृतसर में शन्नो तक पैसे ही पहुंचाने थे तो मेरे पास कई साधन थे. मैं तो आप के हाथों से दिलाना चाहता था, आप का मान बढ़ता. लेकिन आप ने क्या किया? शन्नो और मेरे बच्चे का सत्यानाश ही कर दिया. आप सब बेईमान और धोखेबाज हो.

‘‘काश, मैं ने आप पर विश्वास न किया होता. फैमिली क्वार्टर लिया होता और यह नौकरी करती. अब ऐसा ही होगा. आप सब की वहां एंट्री बंद. मैं गेट पर और स्टेशन हैडक्वार्टर में लिख कर दे जाऊंगा कि इन लागों को कैंपस में एंटरी न दी जाए. ये किसी समय भी मेरी फैमिली को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

‘‘शन्नो, तुम्हें मां ने सोने की 2 चूडि़यां दी थीं न. वे वापस दे दो. मैं तुम्हें नई चूडि़यां बनवा कर दूंगा. जब हम सारे रिश्तेनाते ही तोड़ कर जा रहे हैं या इन्होंने रिश्ते बनाने योग्य संबंध ही नहीं रखे हैं तो ये चूडि़यां कैसी?’’

‘‘जा, शन्नो जिस तरह से तुम ने मेरा पुत्र छुड़ाया है, तुम्हारा पुत्र भी छूटे,’’ मां ने कहा.

‘‘वाह मां, वाह, अपनी गलितयां मानने के बजाय मुझे और शन्नो को बद्दुआएं दे रही हो?’’

‘‘मैं तुम्हें कभी राखी, भैया दूज नहीं भेजूंगी. आज से सब बंद,’’ बहन ने अपनी चुभती आवाज में कहा.

‘‘आप भेजोगे तो तब जब मैं संबंध रखूंगा. देख लो मां, मैं यहां से कुछ नहीं ले जा रहा हूं. शन्नो भी केवल अपना सामान ले जा रही है जो उस के पिताजी ने दिया था,’’ मैं ने कहा.

गाड़ी आई, 2 जवान भी साथ में थे. सारा सामान लोड किया और चल दिए. शन्नो और मुन्ना मेरे साथ आगे बैठ गए. कुछ सामान बाहर खराब होते देख मैं ने पहले ही अपनी ससुराल में छोड़ दिया था. मैं ने ड्राइवर को बताया. ड्राइवर ने गाड़ी हौल बाजार की ओर मोड़ दी. वहां से सब लोड करने के बाद पापाजी हमारे साथ हो लिए. वे देखना चाहते थे कि अब उन की बेटी कहां रहेगी. वह जगह सुरक्षित होगी या नहीं.

किला गोविंदगढ़ के अंदर बड़े मैदान को चारों तरफ दीवार से घेर कर बहुत सुंदर मल्टी स्टोरी नए क्वार्टर बनाए गए थे. मुझे ए बलौक में क्वार्टर नंबर 29 अलौट किया गया था. गेट पर खड़े गार्ड को अपना अलौटमैंट लैटर दिखाया. उस ने मुझे गार्ड रूम में गार्ड कमांडर के पास भेज दिया. रजिस्टर में पर्टीकुलर्स नोट किए और पीछे लगे बड़े बोर्ड पर मेरे क्वार्टर नंबर के आगे मेरे नाम की पर्ची चिपका दी. गार्ड को गेट खोलने के लिए आदेश दिया. गार्ड रूम के सामने बड़ा मैदान था. मैदान खत्म होते ही ब्लौक शुरू हो जाते थे.

पहले ब्लौक में ही मुझे क्वार्टर अलौट हुआ था. मैं सुबह ही क्वार्टर का चार्ज ले कर अपना ताला लगा गया था. ताला खोला और दोनों जवानों ने सारा सामान उतार दिया. वे जाने लगे तो मैं ने उन की मेहनत के लिए रम की बोतल दी. वे खुश हो कर चले गए.

सामान उतरने के बीच पापाजी ने सारा क्वार्टर देख लिया. चेहरे से वे बहुत खुश दिखाई दे रहे थे.

‘‘क्वार्टर बहुत शानदार है. बस, यही है कि शन्नो यहां अकेली कैसे रहेगी?’’

‘‘पापाजी, यहां केवल औरतें और बच्चे रहते हैं. सुरक्षा का पूरा प्रबंध है. यहां अंदर आने के लिए केवल एक ही गेट है. जहां 24 घंटे राइफल ले कर गार्ड खड़े हैं. बिना पूछे कोई अंदर आ नहीं सकता. वही अंदर आते हैं जिन को क्वार्टर अलौट हैं या कोई ऐसा रिश्तेदार जो अकेली औरत के साथ रात को रुकेगा. उस के लिए भी स्टेशन हैडक्वार्टर फोटो वाला पहचानपत्र इशू करता है. वैसे, मीनू रात को यहां पर रुका करेगी, उस की मम्मी से बात हो गई थी. कल स्टेशन हैडक्वार्टर जा उस के लिए पहचानपत्र ले आऊंगा,’’ मैं ने कहा.

‘‘पापाजी, सारा दिन मैं फैक्टरी में रहूंगी और मुन्ना आप के पास. मीनू फैक्टरी जाने के लिए वहीं मम्मी के पास आ जाया करेगी जैसे पहले आती थी. वहीं से हम दोनों फैक्टरी चली जाया करेंगी और आते समय मुन्ना को ले कर मैं यहां आ जाया करूंगी,’’ शन्नो ने कहा.

‘‘वह तो अच्छा है. हमारे पास रौनक हो जाएगी. दिल लगा रहेगा. सब मिल कर संभाल लेंगे. इस के अलावा भी घर की बहुत सी चीजें होती हैं जो रोजरोज लानी पड़ती हैं,’’ पापाजी ने कहा.

‘‘पापाजी, यहां सब मिलेगा. दूध और सब्जी के लिए गेट के बाहर मदर डेरी के बूथ हैं. पैसों के लिए बैंक का एटीएम है. कैंटीन की गाड़ी आएगी, राशन की गाड़ी आएगी. बच्चों के स्कूल जाने के लिए स्कूल बसें आती हैं. गेट पर सब की टाइमिंग लिखी हुई है. अपनेअपने समय पर आती रहेंगी.

‘‘इमरजैंसी में किसी चीज की जरूरत पड़ती है तो वे सामने बनिया कैंटीन है, उस में सबकुछ मिल जाएगा. सेना का कोई काम रामभरोसे नहीं होता है. वह गार्ड रूम के साथ एक कमरा है, वह एमआई रूम है. वहां सुबह 9 बजे से ले कर 1 बजे तक सेना का डाक्टर बैठता है, कोई बीमार होता है तो दवाइयां दी जातीं हैं. 24 घंटे एंबुलैंस खड़ी रहती है. कोई सीरियस हो जाता है तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाता है,’’ मैं ने पापाजी से कहा, ‘‘बस, गलती यह हो गई थी कि मैं ने घर वालों पर विश्वास किया. जब पता चला, बहुत नुकसान हो चुका था.’’

‘‘कोई बात नहीं. देर आए, दुरुस्त आए. मुन्ना की चिंता न करें. उस की देखभाल हो जाएगी. शन्नो का भी खयाल रखा जाएगा.’’

‘‘पापाजी, मुन्ना को मैं सुबह आप के पास छोड़ जाया करूंगी और आते वक्त ले आया करूंगी. सब्जी रामबाग सब्जी मंडी से ले आया करूंगी. नहीं तो यहां मिल जाया करेगी. कोई मुश्किल नहीं होगी. फिर आप सब तो हैं खयाल रखने के लिए.’’

पापाजी संतुष्ट हो कर घर गए. मैं और शन्नो क्वार्टर सैट करने में लग गए. किचन सैट हुआ तो बाकी सैट करना मुश्किल नहीं था. सब ठीक हुआ तो दोपहर के खाने की चिंता हुई. मुन्ना दूध पी कर सो गया था.

‘‘सामने वैज कैंटीन है. वहां खाने के लिए कुछनकुछ मिल जाएगा,’’ मैं ने कहा.

कैंटीन में 100 रुपए की थाली लंच की मिल रही थी. मैं ने 2 थाली के पैसे दिए और वेटर से कहा, ‘‘मेरे साथ आओ, सामने ए ब्लौक में जाना है.’’

लंच के बाद कुछ घर का सामान लेना था. शन्नो के बिना यह हो नहीं सकता था, इसलिए मुन्ना को भी साथ ले लिया. मुन्ना को शन्नो के मायके छोड़ कर बाजार चले गए. सारा सामान ले कर वापस आए तो रात के 9 बज गए थे. खाना तैयार था. क्वार्टर में जा कर रात को खाना कहां बनाएंगे, इसलिए यहीं खाना श्रेष्ठ समझ. स्कूटर पर सारा सामान ले जाना संभव नहीं था. जरूरी सामान लिया और वापस क्वार्टर पर आ गए. रास्ते से सुबह के लिए दूध ले लिया.

दूसरे रोज मीनू के लिए स्टेशन हैडक्वार्टर से यहां रहने का पहचानपत्र ले आया. मीनू शन्नो की पक्की सहेली थी. इतनी पक्की कि उसी ने हमारा रिश्ता भी करवाया था. दोनों फैक्ट्री में साथ काम करती थीं. मीनू, मेरी बूआ की जेठ की लड़की थी. इस नाते वह मेरी बहन लगती थी पर वह मुझे जीजू कहती थी.

छुट्टी खत्म होने पर यूनिट वापस जाने लगा तो मन में बहुत टीस थी, पीड़ा थी. समय पर निर्णय न लेने की पीड़ा थी. जवानों को मैं ने कई बार बैरक के कोनों में रोते देखा था. शायद वे भी मेरी जैसी परिस्थितियों में मन की पीड़ा को आंसुओं में बहाते थे. कई तो अपनी पत्नी, बच्चों को किन्हीं कारणों से अपने साथ रख ही नहीं पाते हैं. किसी को घर संभालना है तो किसी को जमीन.

वे अपनी फैमिली सैप्रेट क्वार्टरों में भी नहीं रख पाते हैं. उन की और उन के बीवीबच्चों की पीड़ा अलग है. हर छत की अपनी पीड़ा होती है और हर पीड़ा का निदान नहीं होता है. सैनिक सम्मेलनों में चाहे हमें समझया जाता है, फैमिली का मतलब है, पत्नी और बच्चे. कोई जवान मांबाप का अकेला बेटा है तो मांबाप भी फैमिली में आते हैं. सेना, उन की दवाइयों आदि का भी खर्चा उठाती है. पर थोड़े से बदलाव के साथ पीड़ा उन का पीछा नहीं छोड़ती है.

सारी सुविधाएं होने पर भी अपनी फैमिली को साथ न रख पाना पीड़ादायक है. जवान अपनी ड्यूटी को ले कर कभी पीडि़त नहीं हुए. वे अपनों के कारण पीडि़त होते हैं. समस्या भयंकर है पर इस का हल केवल यही है कि वे पत्नी और बच्चों का पुख्ता प्रबंध कर के बौर्डर ड्यूटी पर जाएं. जब पीस एरिया में हों तो अपने साथ रखें. Social Story In Hindi :

Family Story in Hindi : सुखद बयार – शर्मिला क्यों आई थी मोना के घर ?

Family Story in Hindi : मोना ने फ्लोरेसेंट यलो कलर का सूट पहना और मां की तसवीर देख कर मुसकरा दी.

‘अच्छी लग रही हूं न, मम्मी?’ तसवीर में मां के मुसकराते चेहरे को देख, पूरी तरह आश्वस्त हो कर वह नीचे बैठक में आ गई. मम्मी के अचानक देहांत के 2 दिनों बाद उस की बचपन की सहेली शर्मिला अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए आने वाली थी.

नियत समय पर मोना घर के गेट पर ही खड़ी हो कर उस की प्रतीक्षा करने लगी. तभी एक गाड़ी आ कर रुकी. उस में से शर्मिला उतरी और  दौड़ कर, रोते हुए, मोना के गले लग गई, बोली, “मोना, यह अचानक… कैसे चली गईं आंटी?”

मोना ने मुसकराते हुए कहा, “मम्मी कहीं नहीं गईं हैं, यहीं तो हैं, तू अंदर चल.

“यह देख, ये रहीं मम्मी, घर के एकएक कोने में, दीवार पर सजी इन पेंटिंग्स में, इन बेलबूटों में, स्वतंत्रता की इस मूर्ति में, ये जो सबकुछ मम्मी ने अपने हाथों से बनाया है, इन के स्पर्श में, बाहर गार्डन के हर पौधे में, सभी तरफ तो हैं मम्मी.”

यह कह तो दिया मोना ने, हालांकि, उस की आंखें भीतर का दर्द बखूबी बयां कर रही थीं. तभी उस की ममेरी बहन चायनाश्ता ले कर आ गई, बोली, “अरे मोना, ऐसे वक्त में यह सब…”

शर्मिला हैरान थी.

“हां सोनिया, मम्मी ने मुझ से पहले ही वचन ले लिया था कि, ‘मेरे जाने के बाद तू रोने मत बैठ जाना. इस घर में हमेशा रौनक रही है और मेरे बाद भी रहनी चाहिए, इस की ज़िम्मेदारी तेरी है. कोई मेहमान घर से भूखा न जाए, इस बात का खास ख़याल रखना. पापा से हलकाफुलका मज़ाक करते रहना ताकि उन्हें मेरी कमी न खले. और  संस्कारों के नाम पर किए जाने वाले काम विधिविधान से नहीं बल्कि हंसतेखाते करना और ध्यान रहे, वातावरण बोझिल न हो. जीवन और मृत्यु अकाट्य सत्य हैं. तुम लोग खुश रहोगे, तभी मैं खुश रह पाऊंगी,” मोना ने यह सब कहा और चाय का कप पकड़ा दिया.

शर्मिला अवाक् थी. वास्तव में उस घर में मनहूसियत नहीं, बल्कि एक विशिष्ट अनुभूति हो रही थी. फूलों  और  खुशबू से सारा घर महक रहा था. मोना के पापा, सौम्य मुसकान के साथ, आंटी की तसवीर को निहार रहे थे और हलकाहलका संगीत बज रहा था.

मृत्यु पर रिवाजों का यह बदलाव वास्तव में सुखद बयार सा प्रतीत हो रहा था. Family Story in Hindi :

Social Interest : पति झगड़ालू हैं जिससे मैं बहुत परेशान रहती हूं

Social Interest :

माता पिता के निधन के बाद पैतृक घर मेरे भाई के पास है.

मैं शादीशुदा हूं और दूसरे शहर में रहती हूं. कुछ महीने पहले मैं ने भाई से कहा कि मुझे भी अपने हिस्से का हक मिलना चाहिए, क्योंकि माता पिता की संपत्ति हम दोनों की है लेकिन वह नाराज हो गया. कहने लगा, ‘तू तो अब ससुराल की है, तेरा इस घर से क्या लेना देना.’

उस दिन के बाद से उस ने मुसे बात तक नहीं की. मैं तो लालच में हूं, विवाद चाहती हूं, बस चाहती हूं कि वह मुझे भी बराबरी का सम्मान दे. क्या मैं अपने अधिकार की मांग कर के गलत कर रही हूं?

आप की भावनाएं बिल्कुल जायज हैं. संपत्ति पर आप का पूरा अधिकार है और कानून भी यही कहता है कि बेटा और बेटी दोनों समान हिस्सेदार होते हैं लेकिन दुख की बात यह है कि हमारे समाज में अभी भी काफी लोग बेटियों के अधिकार को दिल से स्वीकार नहीं करते. आप ने जो कहा, वह गलत नहीं है पर रिश्ते की कड़वाहट को बढ़ने देना भी सही नहीं. शांति से संवाद करें. अपने भाई को यह जताएं कि, ‘मेरा मकसद झगड़ा नहीं, बराबरी का सम्मान है.’ कानूनी सलाह लें पर भावनात्मक पुल बनाए रखें. यदि भाई नहीं मानता तो आप अपने अधिकार के लिए कानूनी कदम उठा सकती हैं, लेकिन कोशिश करें कि बात अदालत तक न पहुंचे. समझते का रास्ता खुला रखें.

*

मैं 2 साल से एक मकान में किराएदार के तौर पर रहता हूं.

जब मैंने मकान लिया था तब मालिक बहुत अच्छे लगते थे, बोले कि, ‘तुम अच्छे परिवार से हो, निश्चिंत रहो.’ लेकिन कुछ महीनों से उन का व्यवहार बदल गया है.

हर दूसरे दिन दरवाजा खटखटा कर पूछते हैं किबिजली का बिल भर दिया?’ याकब शादी करोगे?’

मेरे आने जाने पर भी नजर रखते हैं, मेहमान आने पर नाराज हो जाते हैं, और अब कह रहे हैं किघर खाली कर दो, मुझे अपने रिश्तेदार को रखना है.’

मैं समय पर किराया देता हूं, कोई गलत काम नहीं करता, फिर भी ऐसा व्यवहार क्यों? क्या मकान मालिक को इतना अधिकार है कि वह जब चाहे किराएदार को निकाल दे?

आप की परेशानी बिल्कुल वाजिब है. अकसर मकान मालिक ‘अपना घर’ कह कर किराएदार पर जरूरत से ज्यादा निगरानी करने लगते हैं, जबकि किराए पर देने के बाद वह स्थान किराएदार की अस्थायी संपत्ति बन जाता है. यानी, उसे वहां सम्मान पूर्वक और निजता के साथ रहने का अधिकार है. शांतिपूर्वक संवाद  करें. एक दिन समय निकाल कर मकान मालिक से शांति से बात करें. किरायेदारी अनुबंध देखें. अगर लिखित एग्रीमेंट है तो उस में घर खाली करने की शर्तें और नोटिस अवधि (आमतौर पर 30 दिन या 60 दिन) देखिए. कानूनी सुरक्षा जानें. किरायेदारी अधिनियम के तहत, मालिक बिना वैध कारण के किराएदार को नहीं निकाल सकता. जब तक किराया समय पर दिया जा रहा है और अनुबंध की शर्तें पूरी की जा रही हैं, किराएदार को संरक्षण प्राप्त है.

विनम्र रहें, पर दृढ़ भी. मकान मालिक का सम्मान बनाए रखें, लेकिन अपने अधिकारों से पीछे न हटें.

*

मेरे पति झगड़ालू हैं जिस से मैं बहुत परेशान रहती हूं.

शादी के 12 साल बाद भी पति से तालमेल नहीं बैठा. वे बेहद झगड़ालू हैं. पहले सास ससुर साथ थे, उन्होंने भी कभी कोशिश नहीं की कि पति सही हो जाएं. वे तो बड़े बेटे बहू के ही पक्षधर हैं.

हर रोज रोती हूं पर इस का उन पर कोई असर नहीं होता. 2 साल से अलग हैं तब भी वैसे ही हैं और मेरे मां बाप को अपशब्द बोलते हैं. मुझ को कहते हैं कि घर में बैठे बैठे मुफ्त में रोटी तोड़ रही हूं. उन के इस तरह के तीखे शब्द मुझे तोड़ देते हैं, हमारे विचार बिलकुल नहीं मिलते हैं. आप ही बताइए मैं क्या करूं?

लगता तो यह है कि पति से ज्यादा आप को सलाह की जरूरत है. पति की कोई कमी तो आप ने नहीं लिखी पर अपनी कमियां बता गईं. आप के कारण पति को अपने परिवार से अलग होना पड़ा. आप की सास ससुर से भी नहीं बनी. आप जेठ जेठानी से चिढ़ती रहीं. आप को घर का काम करना आफत लगता है. आप हर बात में अपने माता पिता का नाम लेना शुरू कर देती हैं. आप को लगता है आप श्रेष्ठ हैं, बाकी सब हेय. आप का यह गुमान भी है कि आप की सोच ऊंची है और दूसरों को आप से सहमत होना चाहिए.

आप को सलाह यही है कि आप ये सब छोड़िए. आप का स्वभाव बदला नहीं कि आप अपने आप बदल जाएंगी. याद रखिए कि पति से झगड़ना आसान है पर दूसरा पति या घर पाना और ज्यादा मुश्किल है.

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मुझे भाभी की बहन से प्रेम है और शादी करना चाहता हूं.

लेकिन पहले मैं अपना करियर बनाना चाहता हूं. दिक्कत यह है कि वह मुझे बार बार फोन करने की जिद करती है. ऐसे में मैं दिन रात फोन पर लगा रहूंगा तो कैरियर नहीं बना पाऊंगा. मैं क्या करूं?

यदि आप दोनों बालिग हैं तो शादी करने में कोई अड़चन नहीं आएगी. यह अच्छी बात है कि आप पहले करियर के बारे में सोच रहे हैं. रही बात हमेशा फोन करने की तो उसे समझाने की कोशिश करें कि पहले करियर बनेगा तभी हमारी शादी संभव है. – कंचन

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पता : कंचन, सरिता ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55.

समस्या हमें एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए मैसेज/औडियो भी कर सकते हैं.

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Social Interest : दिसंबर फर्स्ट इश्यू में “आपके अनुभव व पत्र”

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सराहनीय अंक

नवंबर (प्रथम) 2025 अंक पढ़ा. इस में प्रकाशित सभी लेख सामान्य थे परंतु कहानियां एक से बढ़ कर एक थीं. स्थायी स्तंभ ‘इन्हें आजमाइए’, ‘पाठकों की समस्याएं’ दिल पर अमिट छाप छोड़ गए. इतने अच्छे अंक के लिए संपादन मंडल को साधुवाद.

                हरज्ञान सिंह सुथार हमसफर 

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निठारी कांड का दोषी कौन?

निठारी कांड के दोनों अभियुक्त मनिंदर सिंह पंढेर और उस का नौकर सुरेंद्र कोली देश की अदालत द्वारा रिहा कर दिए गए हैं और देश के वे लोग जो निठारी कांड की कू्ररता, भयावहता को याद कर आज भी सिहर उठते हैं, वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि यह कैसी जांच और यह कैसा न्याय है?

क्या ये सब सिर्फ इसलिए तो नहीं हो रहा कि वे सब बच्चे, जिन की हड्डियां, कंकाल पंढेर के घर के नाले में मिले थे, गरीब बस्ती वालों के बच्चे थे और पंढेर एक बहुत बड़ा आदमी है जो अपने रसूख से छूट गया और उस ने अपने साथी को भी छुड़वा लिया. वरना जब सुरेंद्र कोली अपना अपराध कुबूल कर चुका था तो न्यायालय उसे सुबूतों के अभाव की बात कर कैसे बरी कर सकता है?

यह सब बहुत ही दुखद है और भारतीय न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भयंकर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है. सवाल यह भी है कि यदि कोली और पंढेर दोनों ही निर्दोष थे तो निठारी कांड का दोषी कौन था और सीबीआई इतने वर्षों से कौन सी छानबीन कर रही थी, पर यहां तो प्रश्न करना ऐसा है जैसे भैंस के आगे बीन बजाना. ‘अंधेर नगरी और चौपट राजा’ वाली व्यवस्था में बस चुनाव होते हैं, वोट डलते हैं, सरकारें बनतीबिगड़ती हैं और लोकतंत्र की जयजयकार होती है. – गीता यादवेंदु

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एक गुजारिश

मैं लोकप्रिय पत्रिका ‘सरिता’ का विगत कई वर्षों से नियमित पाठक हूं. इस में प्रकाशित समस्त कहानियां व लेख बेहद रुचिकर होने के साथसाथ नवीन जानकारी से परिपूर्ण होते हैं. अंधविश्वास व पाखंडवाद की पोल खोलते लेख समाज को एक नई दिशा देने का काम करते हैं.

पिछले एक अंक में भारतीय सिनेमा के सुप्रसिद्ध अभिनेता राजेश खन्ना पर केंद्रित प्रकाशित लेख के माध्यम से राजेश खन्ना के जीवन से जुड़ी अनेक अनसुलझी बातें पता चलीं. उपरोक्त लेख प्रकाशित करने के लिए संपादक महोदय का हृदय से आभार और कोटिकोटि धन्यवाद.

कृपया आगामी अंक में कादर खान, प्राण और अमरीश पुरी जैसे दिग्गज व नामचीन कलाकारों के जीवन पर भी लेख के माध्यम से प्रकाश डालने की कृपा करें. – विमल वर्मा

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बच्चों के मुख से :

बहुत दिनों बाद मैं अपनी बेटी के घर फरीदाबाद गई थी. हम वहां जा कर बैठे ही थे कि मेरी 7 वर्षीया धेवती, जो बहुत ही बातूनी और होशियार है, मुझ से बोली, ‘‘नानी, मेरे हाथ पर नोचो.’’

मैं ने कहा, ‘क्यों?’

वह बोली, नानी, ‘‘प्लीज मुझे नोचो, प्लीज मुझे नोचो.’’

उस के बारबार कहने पर मैं ने उस के हाथ पर धीरे से नोच दिया. वह तपाक से बोली, ‘‘आप सच में यहां आई हो. मुझे लगा मैं कोई सपना तो नहीं देख रही हूं.’’

उसके मुख से इतनी बड़ी बात सुन कर मैं दंग रह गई और अपने प्रति उस की खुशी देख कर मेरी खुशी का भी ठिकाना नहीं रहा. – सूरतवती भटनागर

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मेरा बेटा 7 साल का है, बहुत ही चंचल है. एक दिन उस की मौसी नींद से उठी तो बोली, ‘‘अरे, तुम लोगों ने मुझे अभी क्यों जगा दिया, मैं सपना देख रही थी जिस में घर के सभी लोगों के साथ मैं गाना गाते हुए पिकनिक पर जा रही हूं. मेरी फिर से सोने की इच्छा है.’’

इस पर बेटा बोला, ‘‘मौसी, क्या सपने में पिकनिक का खाना खाने जा रही हो?’’

उस की इस मासूमियत पर सब लोग देर तक हंसते रहे. – मायारानी श्रीवास्तव

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गरमी का मौसम था. धूप बहुत तेज थी. टीवी पर एक ऐड आ रहा था जिस में सूरज पाइप द्वारा एक बच्चे की शक्ति चूस लेता है और वह अशक्त हो कर घर पहुंचता है. उस बच्चे की मां उसे ग्लूकौन डी पीने के लिए देती है.

मेरी 4 वर्षीया भांजी प्रिशा आई हुई थी. मैं ने उस से कहा, ‘‘बाहर गरमी बहुत ज्यादा है. तुम बाहर गईं तो तुम्हारा भी यही हाल हो जाएगा.’’

उस ने बड़े भोलेपन से पूछा, ‘‘ऐसा हाल होने के बाद मुझे जूस पीने को मिलेगा?’’

उस की बात सुन कर घर के सभी सदस्य मुसकरा दिए. – जया मालू

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वर्ष 2008 में इंदौर में हुए सांप्रदायिक दंगों के कारण शहर में 4-5 दिनों तक अनिश्चिमकालीन कर्फ्यू लगा था. इस कारण मेरी 7 वर्षीया छोटी नाती सौम्या (बेटे की लड़की) घर से बाहर अपने साथियों के साथ कहीं घूमनेफिरने नहीं जा सकी.

कर्फ्यू से परेशान हो कर वह भोलेपन से बोली, ‘‘कभी ऐसा भी कर्फ्यू लगना चाहिए जिस में सब पुलिस वाले घरों के अंदर बंद रहें और बाकी लोग हम सब घर से बाहर रहें.

उस की भोली बातें सुन कर हम सब जोर से हंस पड़े. – वैजनाथ सुखटनकर

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Love Story In Hindi : अतीत के झरोखे – क्या दो प्रेमियों की हो पाई शादी ?

Love Story In Hindi : राधा और अविनाश न्यूयौर्क एअरपोर्ट से ज्योंही बाहर निकले आकाश उन से लिपट गया. इतने दिनों के बाद बेटे को देख कर दोनों की आंखें भर आईं. तभी उन के सामने एक गाड़ी आ कर रुकी. आकाश ने उन का सामान डिक्की में रखा और उन दोनों को बैठने को कह आगे जा बैठा.

जूही ने पीछे मुड़ कर अपनी मोहिनी मुसकान बिखेरते हुए उन दोनों का आंखों से ही अभिवादन किया तो राधा को ऐसा लगा मानों कोई परी धरती पर उतर आई हो. राधा ने मन ही मन बेटे के पसंद की दाद दी. करीब घंटे भर की ड्राइव के बाद गाड़ी एक अपार्टमैंट के सामने रुकी. उतरते ही जूही का उन दोनों का पैर छू कर प्रणाम करना राधा का मन मोह गया. बड़े प्यार से उन्होंने जूही को गले लगा लिया. आकाश का 1 कमरे का घर अच्छा ही लगा उन्हें. जूही और आकाश दोनों मिल कर सामान अंदर ले आए. जब वे दोनों फ्रैश हो गए, तो जूही चाय बना लाई. चाय पीते हुए राधा जूही को निहारती रहीं. लंच कर अविनाश और राधा सो गए.

‘‘उठिए न मम्मी… आप के उठने का इंतजार कर के जूही चली गई.’’

उठने की इच्छा न होते हुए भी राधा को उठना पड़ा. फिर बड़े दुलार से बेटे का माथा सहलाती हुई बोलीं, ‘‘अरे, चिंता क्यों कर रहा है? मुझे और तेरे पापा को तेरी जूही बहुत पसंद है… सब कुछ अपने जैसा ही तो है उस में… अमेरिका में भी तुम ने अपनी बिरादरी की लड़की ढूंढ़ी यही क्या कम है हमारे लिए? अब जल्दी से उस के परिवार वालों से मिलवा दे. जब यहीं पर शादी करनी है, तो फिर इंतजार क्यों?’’

राधा की बातों से आकाश उत्साहित हो उठा. बोला, ‘‘उस के परिवार में केवल उस के पापा हैं. अपनी मां को तो वह बचपन में ही खो चुकी है. उस के पापा ने फिर शादी नहीं की. जूही को उस की नानी ने ही पाला है. उस के पापा चाहते हैं कि शादी के बाद हम उन्हीं के साथ रहें. लेकिन मैं ने इनकार कर दिया. जिस घर में हम शिफ्ट करने वाले हैं वह उसी एरिया में है. कल चल कर देख लीजिएगा.’’

बेटे की बातों से राधा भावविभोर हो रही थीं. उन के अमेरिका आने से पहले आकाश की पसंद को ले कर सभी ने उन्हें कितना भड़काया था. आकाश तो वैसा ही है… कहीं कोई बदलाव नहीं है उस में… दूसरों की खुशी देख कर लोग जलते भी तो हैं. ऐसे भी आकाश स्कूल से ले कर इंजीनियरिंग करने तक टौप ही तो करता रहा था. आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका आ रहा था तो भी लोगों को कितनी जलन हुई थी. शादी के बाद जूही को ले कर जब इंडिया जाऊंगी तो उस के रूपरंग को देख कर सभी ईर्ष्या करेंगे, ऐसा सोचते ही राधा मुसकरा उठीं.

‘‘क्या सोच कर मुसकरा रही हैं मां?’’ आकाश के पूछने पर राधा वर्तमान में लौट आईं.

‘‘कुछ भी तो नहीं रे… सब कुछ ठीक हो जाए तो सियाटल से अनीता और आदित्य भी आ जाएंगे… सारा इंतजाम कर के मैं आई ही हूं,’’ राधा बोलीं.

आकाश ने फोन पर ही जूही को बता दिया कि वह मम्मी को बहुत पसंद है. दूसरे दिन सवेरे ही जूही पहुंच गई. देखते ही राधा ने उसे गले लगा लिया. फिर उस के घर के बारे में पूछने लगीं.

जूही भी उन से कुछ खुल गई. उस ने उन से पूछा, ‘‘आकाश की तरह क्या मैं भी आप दोनों को मम्मीपापा कह सकती हूं?’’

राधा खुशी से बोलीं, ‘‘क्यों नहीं? अब आकाश से तुम अलग थोड़े ही हो,’’ कुछ ही दिनों की बात है जब तुम भी पूरी तरह से हमारी हो जाओगी.’’

राधा की बात पर जूही ने शरमा कर सिर झुका लिया. ‘‘अच्छा तो मम्मीजी आप लोग पापा और नानी से मिलने कब चल रहे हैं? वे दोनों आप से मिलने के लिए उत्सुक हैं.’’ फिर अगले दिन का करार ले कर ही जूही मानी. दूसरे दिन सुबह से ही राधा को जूही के घर जाने के लिए जरूरत से ज्यादा उत्साहित देख कर अविनाश उन से छेड़खानी कर रहे थे. इसी बीच जूही गाड़ी ले कर आ गई. तैयार हो कर राधा और अविनाश कमरे से बाहर निकले. ‘एक युवा बेटे की मां भी इस उम्र में इतनी कमनीय हो सकती है?’ सोच जूही मुसकरा उठी. रास्ते में सड़क के दोनों ओर की प्राकृतिक सुंदरता देख कर राधा मुग्ध हो उठीं कि सच में अमेरिका परियों और फूलों का देश है.

1 घंटे के बाद फूलों से सजे एक बड़े से घर के सामने गाड़ी रुकी तो उतरते ही एक बड़ी उम्र की संभ्रांत महिला ने सौम्य मुसकान के साथ उन का स्वागत किया, जो जूही की नानी थीं. लिविंगरूम में जूही के पापा अविनाश के पास आ कर बैठ गए. राधा की ओर मुड़े ही थे कि वे चौंक  गए और उन के अभिवादन में उठे हाथ हवा में झूल गए. उधर राधा के जुड़े हाथ भी उन की गोद में गिर गए, जिसे अविनाश के सिवा और कोई न देख सका. राधा के चेहरे पर स्तब्धता थी. सारी खुशियां काफूर हो गई थीं. उन की महीनों की चहचहाट पर अचानक चुप्पी का कुहरा छा गया था. वे असहज हो कर सिर को इधरउधर घुमाते हुए अपनी हथेलियों को मसल रही थीं.

जूही की नानी ही बोले जा रही थीं. माहौल गरम हो गया था जिसे सहज बनाने का अविनाश अपनी ओर से पूरा प्रयास कर रहे थे. लंच के समय भी अनमनी सी राधा को देख कर आकाश और जूही हैरान थे कि अचानक इन्हें क्या हो गया? आखिर जूही की नानी ने राधा को टोक ही दिया, ‘‘क्या बात है राधाजी, क्या मैं और आशीष आप को पसंद नहीं आए? हमें देखते ही चुप हो गईं… छोडि़ए, आप को हमारी जूही तो पसंद है न?’’

यह सुनते ही राधा सकुचा तो गईं, लेकिन बड़े ही रूखे शब्दों में कहा, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है… अचानक सिरदर्द होने लगा.’’

‘‘कुछ भी कहिए, लेकिन अमेरिका में जन्म लेने के बावजूद जूही की परवरिश बेमिसाल है. इस का सारा श्रेय आप लोगों को जाता है. जूही हम दोनों को बहुत पसंद है… शायद इंडिया में भी हम आकाश के लिए ऐसी लड़की नहीं ढूंढ़ पाते… क्यों राधा ठीक कहा न मैं ने?’’

राधा ने उन की बातें अनसुनी कर दीं. अविनाश की बातों से आशीष थोड़ा मुखर हो उठे. बोले, ‘‘तो अब बताइए कि कैसे आगे का कार्यक्रम रखा जाए?’’

जवाब में राधा ने कहा, ‘‘हम आप को सूचित कर देंगे… अब हम चलना चाहेंगे. आकाश, उठो और टैक्सी बुलाओ… मुझे मानहट्टन होते हुए जाना है… क्यों न हम नीति से मिलते चलें. मामा मामी के आने से वह भी बड़ी उत्साहित है. इन सब बातों के लिए जूही को तकलीफ देना ठीक नहीं है.’’

राधा की बातों से सभी चौंक गए.  ‘‘इस में तकलीफ जैसी कोई बात नहीं है,’’ आशीषजी बोले, ‘‘अविनाशजी, अगर आप की इजाजत हो तो 2 मिनट मैं अकेले में आप की पत्नीजी से कुछ बातें करना चाहूंगा… जूही जब मात्र 10 साल की थी तभी उस की मां गुजर गईं. अपने कुछ किए गलत कामों का प्रायश्चित्त करने के लिए सभी के आग्रह करने के बावजूद मैं ने दूसरी शादी नहीं की… मैं ने अकेले ही मांबाप दोनों का प्यार, संस्कार दे कर उसे पाला है… जब तक मैं राधाजी की सहमति से पूर्ण संतुष्ट नहीं हो जाता इस रिश्ते के लिए स्वयं को कैसे तैयार कर पाऊंगा?

जवाब में अविनाश का हंसना ही सहमति दे गया. फिर आशीषजी और राधा को छोड़ कर बाकी सभी बाहर निकल गए. आशीष राधा के समक्ष जा कर खड़े हो गए और फिर भर आए गले से बोले, ‘‘राधा, तुम से छल करने वाला, तुम्हें रुसवा करने वाला तुम्हारे सामाने खड़ा है… जो भी सजा दोगी मुझे मंजूर होगी… मेरी बेटी का कोई कुसूर नहीं है इस में… तुम से मेरी यही प्रार्थना है कि जूही और आकाश को कभी अलग नहीं करना वरना दोनों टूट जाएंगे. एकदूसरे के बगैर वे जी नहीं पाएंगे… सभी की खुशियां अब तुम्हारे हाथ में हैं. जूही ही तुम लोगों को छोड़ने जाएगी. इतनी ही देर में उस का चेहरा उदास हो कर कुम्हला गया है,’’ कह कर आशीष बाहर निकल आए और फिर जूही को इन सब के साथ जाने को कहा तो जूही और आकाश के मुरझाए चेहरे खिल उठे. पूरा रास्ता राधा आंखें बंद किए चुप रहीं. लौटने के बाद भी वे अनमनी सी लेट गईं, जबकि बाहर से आ कर बिना चेंज किए बैड पर जाना उन्हें कतई पसंद नहीं था.

अविनाश लिविंग रूम में बैठ कर टीवी देखते रहे. शाम हो गई थी. राधा उठ गई थीं. बोलीं, ‘‘सुनिए मैं सामने ही घूम रही हूं. आकाश आ जाए तो आप भी आ जाइएगा,’’ और फिर चप्पलें पहनते हुए सीढि़यां उतर गईं. बच्चों के पार्क में रखी बैंच पर जा बैठीं. आंखें बंद करते ही 32 साल से बंद अतीत चलचित्र की तरह आंखों के आगे घूम गया… बड़ी ही धूमधाम से राधा की मंगनी आशीष के साथ हुई थी. किसी फंक्शन में आशीष ने उन्हें देखा था और फिर उस की नजरों में बस गई थीं. मंगनी होने के बाद वे आशीष से कुछ ज्यादा ही खुल गई थीं. तब मोबाइल का जमाना नहीं था. सब के सो जाने के बाद धीरे से वे फोन को उठा कर अपने कमरे में ले जाती. और फिर शुरू होता प्यार भरी बातों का सिलसिला जो देर रात तक चलता. 2 महीने बाद ही शादी का मुहूर्त्त निकला था. इसी बीच अचानक आशीष को किसी प्रोजैक्ट वर्क के सिलसिले में 6 महीने के लिए न्यूयौर्क जाना पड़ा.

शादी नवंबर तक के लिए टल गई. वे मन मसोस कर रह गईं. लेकिन आशीष उज्ज्वल भविष्य के सपनों को आंखों में लिए अमेरिका के लिए रवाना हो गया. फिर राधा अपनी एम.एससी. की परीक्षा की तैयारी में लग गईं. आशीष फिर कभी नहीं लौटा. अमेरिका जाने पर आशीष एक गुजराती परिवार में पेइंगगैस्ट बन कर रहने लगे. अमेरिका उन्हें इतना भाया कि वह वहां से न लौटने का निश्चय कर किसी कीमत पर वहां रहने का जुगाड़ बैठाता रहा. यहां तक कि अपनी कंपनी की नौकरी भी छोड़ दी. सब से सरल उपाय यही था कि वह वहां की किसी नागरिकता प्राप्त लड़की से ब्याह कर ले. फिर आशीष ने उसी गुजराती परिवार की इकलौती लड़की से शादी कर ली. उस के इस धोखे से राधा टूट गई थी. उन्हें ब्याह नाम से चिढ़ सी हो गई थी.

फिर कुछ महीने बाद अविनाश के घर से आए रिश्ते के लिए न नहीं की. सब कुछ भुला अविनाश की पत्नी बन गईं. समय के साथ 2 बच्चों की मां भी बन गईं. दोनों बच्चों की अच्छी परवरिश की. पढ़नेलिखने में ही नहीं, बल्कि सारी गतिविधियों में दोनों बड़े काबिल निकले. बी.टैक करते ही बेटी की शादी सुयोग्य पात्र से कर दी. बेटी यहीं सियाट्टल में है. दोनों मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत हैं. बड़े अरमान के साथ बेटे की शादी का सपना आंखों में लिए यहां आई थीं. टैनिस टूरनामैंट में आकाश और जूही पार्टनर बने और विजयी हुए. ऐसे ही मिलतेजुलते दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे. आकाश ने फेसबुक पर मां यानी राधा से जूही का परिचय करा दिया था. राधा को जूही में कोई कमी नजर नहीं आई. इसलिए उन के रिश्ते पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी. अब तक के जीवन में सभी प्रमुख निर्णय राधा ही लेती आई थीं, तो अविनाश को क्यों ऐतराज होता? राधा की खुशी ही उन के लिए सर्वोपरि थी. चूंकि जूही की मां नहीं थी और उसे नानी ने ही पाला था और वे इंडिया आने में लाचार थे, इसलिए निर्णय यही हुआ था कि अगर सब कुछ ठीकठाक हुआ तो वहीं शादी कर देंगे. इस निर्णय से उन की बेटी और दामाद दोनों बहुत खुश हुए. जूही के पिता के परिवार के बारे में उन्होंने ज्यादा छानबीन नहीं की और यहीं धोखा खा गईं. कितना सुंदर सब कुछ हो रहा था कि इस मोड़ पर वे आशीष से टकरा गईं और बंद स्मृतियों के कपाट खुल कर उन्हें विचलित कर गए… बेटे से भी नहीं कह सकतीं कि इस स्वार्थी, धोखेबाज की बेटी के साथ रिश्ता न जोड़ो… सिर से पैर तक उस के प्यार में डूबा हुआ है. वह भी क्यों मानने लगा अपनी मां की बात. दर्द से फटते माथे को दोनों हाथों से थाम वे सिसक उठीं.

तभी अचानक कंधों पर किसी का स्पर्श पा कर मुड़ीं तो पीछे अविनाश को खड़ा पाया. राधा के हाथों को सहलाते हुए वे उन की बगल में बैठ गए और बड़े सधे स्वर में कहने लगे, ‘‘राधा, अंदर से तुम इतनी कमजोर हो, मैं ने कभी सोचा न था. इतनी छोटी बात को दिल से लगाए बैठी हो. कुछ सुना था और कुछ अनुमान लगा लिया. अरे, आशीष ने तुम्हारे साथ जो किया वह कोई नई बात थोड़े है. यह देश उसे सपनों की मंजिल लगा. जूही की सुंदरता से साफ पता चलता है कि उस की मां कितनी सुंदर रही होगी… वीजा, फिर नागरिकता, रहने को घर, सुंदर पत्नी, सारी सुखसुविधाएं जब उसे इतनी सहजता से मिल गईं तो वह क्या पागल था कि देश लौट आता सिर्फ इसलिए कि उस की मंगनी हुई है? फिर जीवन में सब कुछ होना पहले से ही निर्धारित रहता है तुम्हारी ही तो ऐसी सोच है. तुम्हें मेरी बनना था तो ये महाशय तुम्हें कैसे ले जाते? माना कि बहुत सारी सुखसुविधाएं तुम्हें नहीं दे पाया लेकिन मन में संचित सारे प्यार को अब तक उड़ेलता रहा हूं. अचानक कल से मम्मी को हो क्या गया है, पापा? आकाश का यह पूछना मुझे पसोपेश में डाल गया है. हो सकता है वह सब कुछ समझ भी रहा हो. इतना नासमझ भी तो नहीं है.’’

राधा की आंखों से बहते आंसुओं ने अविनाश को आगे और कुछ नहीं कहने दिया. कुछ देर बाद आंचल से अपने आंसुओं को पोंछती हुई राधा ने कहा, ‘‘मैं कल से सोच रही हूं कि अगर जूही का जैनेटिक्स भी अपने बाप जैसा हुआ तो यह हमारे बेटे को हम से छीन लेगी… कितनी निर्ममता से आशीष अपनों को भूल गया था… उसे देखने के लिए मांबाप की आंखें सारी उम्र तरसती रह गईं और वह घरजमाई बन कर रह गया. इस की बेटी ने कहीं मेरे सीधेसादे बेटे को घरजमाई बना लिया तो हम भी बेटे को देखने को तरसते रह जाएंगे.’’ राधा की बातें सुन कर अविनाश को हंसी आ गई. तभी आकाश भी उन दोनों को खोजते हुए वहां आ गया. सकुचाई हुई मम्मी और हंसते हुए पापा को देख कर प्रश्न भरी आंखों से उन्हें देखा. अविनाश अपनेआप को अब रोक नहीं सके और सारी बात बता दी.

इतना सुनना था कि आकाश छोटे बच्चे की तरह राधा से लिपट गया. बोला, ‘‘मम्मी, आप के लिए जूही तो क्या पूरी दुनिया को छोड़ सकता हूं… इतना ही जाना है आप ने अपने बेटे को? फिर आप दोनों को भी मेरे साथ ही रहना है… आप दोनों के लिए ही तो इतना बड़ा घर लिया है… ऐसे भी इंडिया में है ही कौन आप दोनों का…. एक घर ही तो है? आराम से अब मेरे पास रहें. बीचबीच में दीदी से भी मिलते रहें.’’ आकाश की बातों से राधा के सारे गिलेशिकवे दूर हो गए और फिर से 2 हफ्ते बाद ही बड़ी धूमधाम के साथ आकाश और जूही शादी के बंधन में बंध कर हनीमून के लिए स्विट्जरलैंड चले गए. 1 महीने बाद आने का वादा ले कर बेटी, दामाद एवं नाती सियाट्टल चले गए तो अविनाश ने भी हंसते हुए राधा से कहा, ‘‘क्यों न हम भी हनीमून मना लें… हमारी शादी के बाद तो हमारे साथ हमारे पूरे परिवार ने भी हनीमून मनाया था… याद तो होगा तुम्हें… तुम से मिलने को भी हम तरस कर रह जाते थे. अब बेटे ने विदेश में अवसर दिया है तो हम क्यों चूकें और फिर अभी हम इतने बूढ़े भी तो नहीं हुए हैं.’’ अविनाश की बातें सुन राधा मुसकरा दीं और फिर शरमा कर अविनाश से लिपटते हुए अपनी सहमति जता दी. Love Story In Hindi :

Hindi Social Story : चुनाव लड़ने का आनंद – क्यों जबरदस्ती मुस्कुराने लगा रोहरानंद ?

Hindi Social Story : रोहरानंद भी लोकतंत्र में हिस्सेदारी कर रहा है. अर्थात् चुनाव में एक प्रत्याशी बतौर मुश्के तान कर खड़ा हो गया है. शहर में अधिवक्ता संघ की सरगर्मी थी. दुर्भाग्य से रोहरानंद एडव्होकेट भी है. सोचा,संबंधों का रिनिवल हो जाएगा. लोग जो सक्रिय होते हैं उन्हें ही स्मरण रखते हैं, बाकी को यह बेदर्द जमाना भूल जाता है.

मैं भी एक ऐसा ही इंसान हूं , जिसे लोग नोटिस में ही नहीं लेते .चुनाव एक ऐसा मेला है, जिसमें शिरकत करने वाला रातों-रात चर्चा में आ जाता है.

यही अनमोल विचार,सोचते, गुनते  रोहरानंद ने नामांकन भरने का साहस पूर्ण निर्णय लिया और इस निर्णय को बरकरार रखने में बड़ी हिम्मत जुटाई.

इसका सिर्फ और सिर्फ एक कारण है, आपका साथी रोहरानंद दरअसल एकांतजीवी है. समस्या यह है कि  चुनाव लड़ने के खातिर आदमी में भदेसपन के साथ चंचल होने का गुण निरापद है.

तो, रोहरानंद ने साहस जुटाया और नामांकन पत्र खरीदा और यह सोच कर कि मेने नामांकन पत्र खरीद लिया है, भयभीत होने लगा .सोचा, मैं भला क्या चुनाव जीतूगां. बेकार है, छोड़ो यह धंधा  . फिर स्मरण आया बच्चू! भूल गया, तेरा उद्देश्य क्या है ? चुनाव तो तू क्या जीतेगा, तेरा उद्देश्य तो चुनावी वैतरणी में स्वयं को नामचीन बनाना है.

पाठकों ! दरअसल,रोहरानंद को यह प्रतीत होता है कि चुनाव लड़ने से आदमी को खुशी मिलती है .लोग चर्चा करते हैं… अरे! सुना, फलां भी चुनाव लड़ रहा है ? कोई कहता है- अच्छा !!

कोई कहता है- यार ! अध्यक्ष पद के कितने दावेदार हैं ?

प्रतिउत्तर में आठ-दस नाम गिनाए जाते हैं. शहर में आदमी चर्चा का सबब  बन जाता है. रोहरानंद को लगता है, क्या यह कम उपलब्धि है ?

पांच सौ रूपये में, सप्ताह भर चर्चा में रहना .अखबारों में छाये रहना, कम बड़ी विजय है ? सो, रोहरानंद ने डर को दूर भगाया और नामांकन पत्र भर ही दिया. सच, इसके साथ ही हृदय में ऐसे ऐसे विचार उठने लगे कि मत पूछिए.

एक मन कहता- रोहरानंद ! अगरचे तू जीत गया तो ?

मन में बैठा समझदार अंश कहता- रोहरानंद ! तू भला कैसे जीतेगा ? तू हारेगा यह तय है.

मन कहता- कम से कम चर्चा में तो रहेगा ? चल…फिर हृदय में भाव उठता- अगर नामांकन रद्द हो गया तो ? आखिर कुछ के नामांकन रद्द भी होते हैं . हो सकता है रोहरानंद तुम्हारा ही नामांकन रद्द हो जाए.

आंखों के सामने भय आकर खड़ा हो गया. मैंने अपने परम मित्र रामानंद के समक्ष अपनी चिंता को व्यक्त किया.

उन्होंने कहा- रोहरानंद ऐसा नहीं होगा ?

मैं- भला क्यों नहीं होगा ? हर चुनाव में कुछ नामांकन तो रद्द होते ही हैं.

रामानंद- होता होगा मगर अधिवक्ता का नामांकन भला कैसे रद्द होगा ? दूसरे चुनाव में लोग अधिवक्ताओं से नामांकन भरवाते हैं यह सोच कर कि अधिवक्ता ने भरा है ,अब अगर अधिवक्ताओं का नामांकन रद्द हो गया तो यह एक बड़ी खबर होगी.

रोहरानंद गंभीर हो गया . उसका चेहरा और भी सुर्ख हो चला था. वह मन ही मन सोच रहा था- अगर उसका नामांकन रद्द हो गया तो ? उसे उसकी संभावना सौ फीसदी लग रही थी .गला सूख रहा  था.

रामानंद ने अधिकारपूर्वक कहा- सच ! यह एक बड़ी खबर होगी . और यह छपना चाहिए कि जब वकील होकर अपना नामांकन नहीं भर सकते तो दूसरों का केस क्या लडेंगे.

रोहरानंद जबरदस्ती मुस्कुराने लगा .मगर हृदय की गति तेज हो गई थी. कहा- हां ! इस पर विशेष बुलेटिन भी बनाया जा सकता है .लोकल न्यूज़ ऐसा कर सकते हैं . वकील के फुटेज दिखाए जाएंगे फिर व्हाईस होगी- यही है वह अधिवक्ता जिसने बडे जोर शोर से  नामांकन भरा था .दोस्तों ! इनका नामांकन त्रुटि पाए जाने पर रद्द हो गया… यह इनकी  योग्यता है….

रामानंद हंसने लगा .रोहरानंद ने कहा- मित्र ! हो सकता है जो वकील कभी एक रूपया किसी पत्रकार को नहीं देता ऐसी स्थिति में देने को मजबूर हो जाये. रामानंद पुनः हंसने लगा.

रोहरानंद- और जैसे ही वकील साहब कुछ रूपये पत्रकार को देंगे न्यूज़ रुक जाएगी.

रामानंद जो कि स्वयं भी वरिष्ठ पत्रकार है,मुंह में जीभ चुभलाने लगे थे .

रोहरानंद ने कहा- मित्र ! मानो पैसे लेने के बाद भी न्यूज़ प्रसारित हो गई तो ? पैसा भी गया और इज्जत भी.

खैर ! राम-राम कर वह दिन भी व्यतीत हुआ जब क्लियर हो गया कि रोहरानंद का नामांकन रद्द नहीं हुआ है. जान में जान आई .

मगर जैसा कि होता है एक समस्या गई दूसरी मुंह बाएं आकर खड़ी हो गई.

एक मित्र का फोन आया- भाई साहब ! आप भी चुनाव लड़ रहे हैं ?

रोहरानंद- हां, दुर्भाग्य से मेरा नामांकन रद्द नहीं हुआ, सो मैदान में हूं.

मित्र ने कहा- मैं आपकी मदद करूंगा.

रोहरानंद- हां, मैं आपकी मदद का इंतजार ही कर रहा हूं .क्या है मुझे लगता है मैं चुनाव बुरी तरह हार रहा हूं. मित्र ने आश्वस्त भाव से कहा- क्यों डरते हैं, में हू न. 25 वोट तो मैं दिलाऊंगा .

रोहरानंद के उदास चेहरे पर खुशी  विस्तारित हुई- ऐसा है तो भला मैं कहां हारने वाला . फिर तो मैं आसानी से जीत जाऊंगा.

मित्रों! रोहरानंद भारी असमंजस में दिन व्यतीत कर रहा है. एक मन कहता है- हारेगा .एक मन कहता जीतेगा  एक मन कहता अरे हार भी गया तो क्या ? क्योंकि तू कौन सा चुनाव जीत सका है .कौन सा चुनाव जीत सकता है ? तू तो बस खडा है क्या यही कम है… चुनाव अर्थात लोकतंत्र और चुनाव डेमोक्रेसी में भागीदारी का अपना आनंद है जिसमें भागीदारी करना ही तेरे लिए गर्व का विषय होना चाहिए. सो मित्रों ! आपका अदद दोस्त, यह रोहरानंद हारने के लिए एक चुनाव में शिरकत कर रहा है. Hindi Social Story :

Hindi Kahani : जोरू का गुलाम – मां और पत्नी के बीच पिसते पति की कहानी

Hindi Kahani : ‘‘अरे, ऋचा दीदी, यहां, इस समय?’’ सुदीप अचानक अपनी दीदी को देख हैरान रह गया.

‘‘सप्ताहभर की छुट्टी ले कर आई हूं. सोचा, घर बाद में जाऊंगी, पहले तुम से मिल लूं,’’ ऋचा ने गंभीर स्वर में कहा तो सुदीप को लगा, दीदी कुछ उखड़ीउखड़ी सी हैं.

‘‘कोई बात नहीं, दीदी, तुम कौन सा रोज यहां आती हो. जरा 5 मिनट बैठो, मैं आधे दिन की छुट्टी ले कर आता हूं. आज तुम्हें बढि़या चाइनीज भोजन कराऊंगा,’’ लाउंज में पड़े सोफों की तरफ संकेत कर सुदीप कार्यालय के अंदर चला गया.

ऋचा अपने ही विचारों में डूबी हुई थी कि अचानक ही सुदीप ने उस की तंद्रा भंग की, ‘‘चलें?’’

ऋचा चुपचाप उठ कर चल दी. उस की यह चुप्पी सुदीप को बड़ी अजीब लग रही थी. यह तो उस के स्वभाव के विरुद्ध था. जिजीविषा से भरपूर ऋचा बातबात पर ठहाके लगाती, चुटकुले सुनाती और हर देखीसुनी घटना को नमकमिर्च लगा कर सुनाती. फिर ऐसा क्या हो गया था कि वह बिलकुल गुमसुम हो गई थी?

‘‘सुदीप, मैं यहां चाइनीज खाने नहीं आई,’’ ऋचा ने हौले से कहा.

‘‘वह तो मैं देख ही रहा हूं, पर बात क्या है, अक्षय से झगड़ा हुआ है क्या? या फिर और कोई गंभीर समस्या आ खड़ी हुई है?’’ सुदीप की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

‘‘अक्षय और झगड़ा? क्या सभी को अपने जैसा समझ रखा है? पता है, अक्षय मेरा और अपनी मां का कितना खयाल रखता है, और मांजी, उन के व्यवहार से तो मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं उन की बेटी नहीं हूं,’’ ऋचा बोली.

‘‘सब जानता हूं. सच पूछो तो तुम्हारी खुशहाल गृहस्थी देख कर कभीकभी बड़ी ईर्ष्या होती है,’’ सुदीप उदास भाव से मुसकराया.

‘‘सुदीप, जीवन को खुशियोंभरा या दुखभरा बनाना अपने ही हाथ में है. सच पूछो तो मैं इसीलिए यहां आई हूं. कम से कम तुम से व प्रेरणा से मुझे ऐसी आशा न थी. आज सुबह मां ने फोन किया था. फोन पर ही वे कितना रोईं, कह रही थीं कि तुम अब विवाहपूर्व वाले सुदीप नहीं रह गए हो. प्रेरणा तुम्हें उंगलियों पर नचाती है. सनी, सोनाली और मां की तो तुम्हें कोई चिंता ही नहीं है,’’ ऋचा ने शिकायत की.

‘‘और क्या कह रही थीं?’’ सुदीप ने पूछा.

‘‘क्या कहेंगी बेचारी, इस आयु में पिताजी उन्हें छोड़ गए. 3 वर्षों में ही उन का क्या हाल हो गया है. सनी और सोनाली का भार उन के कंधों पर है और तुम उन से अलग रहने की बात सोच रहे हो,’’ ऋचा के स्वर में इतनी कड़वाहट थी कि सुदीप को लगा, इस आरोपप्रत्यारोप लगाने वाली युवती को वह जानता तक नहीं. उसे उम्मीद थी कि घर का और कोई सदस्य उसे समझे या न समझे, ऋचा अवश्य समझेगी, पर यहां तो पासा ही उलटा पड़ रहा था.

‘‘अब कहां खो गए, किसी बात का जवाब क्यों नहीं देते?’’ ऋचा झुंझला गई.

‘‘तुम ने मुझे जवाब देने योग्य रखा ही कहां है. मेरे मुंह खोलने से पहले ही तुम ने तो एकतरफा फैसला भी सुना डाला कि सारा दोष मेरा व प्रेरणा का ही है,’’ सुदीप तनिक नाराजगी से बोला.

‘‘ठीक है, फिर कुछ बोलते क्यों नहीं? तुम्हारा पक्ष सुनने के लिए ही मैं यहां आई हूं, वरना तुम से घर पर भी मिल सकती थी.’’

‘‘मैं कोई सफाई नहीं देना चाहता, न ही तुम से बीचबचाव की आशा रखता हूं. मैं केवल तुम से तटस्थता की उम्मीद करता हूं. मैं चाहूंगा कि तुम एक सप्ताह का अवकाश ले कर हमारे साथ आ कर रहो.’’

‘‘पता नहीं तुम मुझ से कैसी तटस्थता की आशा लगाए बैठे हो. मां, भाईबहन आंसू बहाएं तो मैं कैसे तटस्थ रहूंगी?’’ ऋचा झुंझला गई.

‘‘हमें अकेला छोड़ दो, ऋचा. हम अपनी समस्याएं खुद सुलझा सकते हैं,’’ सुदीप ने अनुनय की.

‘‘अब तुम्हारे लिए अपनी सगी बहन पराई हो गई? मां ठीक ही कर रही थीं कि तुम बहुत बदल गए हो. प्रेरणा सचमुच तुम्हें उंगलियों पर नचा रही है.’’

‘‘ऋचा दीदी, प्रेरणा तो तुम्हारी सहेली है, तुम्हीं ने उस से मेरे विवाह की वकालत की थी. पर आज तुम भी मां के सुर में सुर मिला रही हो.’’

‘‘यही तो रोना है, मैं ने सोचा था, वह मां को खुश रखेगी, हमारा घर खुशियों से भर जाएगा, पर हुआ उस का उलटा…’’

‘‘मैं कोई सफाई नहीं दूंगा, केवल एक प्रार्थना करूंगा कि तुम कुछ दिन हमारे साथ रहो, तभी तुम्हें वस्तुस्थिति का पता चलेगा.’’

‘‘ठीक है. यदि तुम जोर देते हो तो मैं अक्षय से बात करूंगी,’’ ऋचा उठ खड़ी हुई.

‘‘तो कब आ रही हो हमारे यहां रहने?’’ सुदीप ने बिल देते हुए प्रश्न किया.

‘‘तुम्हारे यहां?’’ ऋचा हंस दी, ‘‘तो अब वह घर मेरा नहीं रहा क्या?’’

‘‘मैं तुम्हें शब्दजाल में उलझा भी लूं तो क्या. सत्य तो यही है कि अब तुम्हारा घर, तुम्हारा नहीं है,’’ सुदीप भी हंस दिया.

लगभग सप्ताहभर बाद ऋचा को सूटकेस व बैग समेत आते देख छोटी बहन सोनाली दूर से ही चिल्लाई, ‘‘अरे दीदी, क्या जीजाजी से झगड़ा हो गया?’’

‘‘क्यों, बिना झगड़ा किए मैं अपने घर रहने नहीं आ सकती क्या? ले, नीनू को पकड़,’’ उस ने गोद में उठाए हुए अपने पुत्र की ओर संकेत किया.

सोनाली ने ऋचा की गोद से नीनू को लिया और बाहर की ओर भागी.

‘‘रुको, सोनाली, कहां जा रही हो?’’

‘‘अभी आ जाएगी, अपनी सहेलियों से नीनू को मिलवाएगी. उसे छोटे बच्चों से कितना प्यार है, तू तो जानती ही है,’’ मां ने ऋचा को गले लगाते हुए कहा.

‘‘लेकिन मां, अब सोनाली इतनी छोटी भी नहीं है जो इस तरह का व्यवहार करे.’’

‘‘चल, अंदर चल. इन छोटीछोटी बातों के लिए अपना खून मत जलाया कर. माना अभी सोनाली में बचपना है, एक बार विवाह हो गया तो अपनेआप जिम्मेदारी समझने लगेगी,’’ मां हाथ पकड़ कर ऋचा को अंदर लिवा ले गईं.

‘‘हां, विवाह की बात से याद आया, सोनाली कब तक बच्ची बनी रहेगी. नौकरी क्यों नहीं ढूंढ़ती. इस तरह विवाह में भी सहायता मिलेगी,’’ ऋचा बोली.

‘‘बहन का विवाह करना भैयाभाभी का कर्तव्य होता है, उन्हें क्यों नहीं समझाती? मेरी फूल सी बच्ची नौकरी कर के अपने लिए दहेज जुटाएगी?’’ मां बिफर उठीं.

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था. पर आजकल अधिकतर लड़कियां नौकरी करने लगी हैं. ससुराल वाले भी कमाऊ वधू चाहते हैं. इन की दूर के रिश्ते की मौसी का लड़का आशीष बैंक में काम करता है, पर उसे कमाऊ बीवी चाहिए. वैसे भी, इस में इतना नाराज होने की क्या बात है? सोनाली काम करेगी तो उसे ?इधरउधर घूमने का समय नहीं मिलेगा. फिर अपना भी कुछ पैसा जमा कर लेगी. तुम्हें याद है न मां, पिताजी ने पढ़ाई समाप्त करते ही मुझे नौकरी करने की सलाह दी थी. वे हमेशा लड़कियों के स्वावलंबी होने पर जोर देते थे,’’ ऋचा बोली.

‘‘अरे दीदी, कैसी बातें कर रही हो, जरा सी बच्ची के कंधों पर नौकरी का बोझ डालना चाहती हो?’’ तभी सुदीप का स्वर सुन कर ऋचा चौंक कर मुड़ी. प्रेरणा व सुदीप न जाने कितनी देर से पीछे खड़े थे. सुदीप के स्वर का व्यंग्य उस से छिपा न रह सका.

‘‘बड़ी देर कर दी तुम दोनों ने?’’ ऋचा बोली.

‘‘ये दोनों तो रोज ऐसे ही आते हैं, अंधेरा होने के बाद.’’

‘‘क्या करें, 6 साढ़े 6 तो बस से यहां तक पहुंचने में ही बज जाते हैं. फिर शिशुगृह से तन्मय को लेते हुए आते हैं, तो और 10-15 मिनट लग जाते हैं.’’

‘‘क्या? तन्मय को शिशुगृह में छोड़ कर जाती हो? घर में मां व सोनाली दोनों ही रहती हैं, क्या तुम्हें उन पर विश्वास नहीं है? जरा से बच्चे को परायों के भरोसे छोड़ जाती हो?’’

प्रेरणा बिना कुछ कहे तन्मय को गोद में ले कर रसोईघर में जा घुसी.

‘‘मां, तुम इन लोगों से कुछ कहती क्यों नहीं, जरा से बच्चे को शिशुगृह में डाल रखा है.’’

‘‘मैं ने कहा है बेटी, मेरी दशा तो तुझ से छिपी नहीं है, हमेशा जोड़ों का दर्द, ऐसे में मुझ से तो तन्मय संभलता नहीं. सोनाली को तो तू जानती ही है, घर में टिकती ही कब है. कभी इस सहेली के यहां, तो कभी उस सहेली के यहां.’’

ऋचा कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध बैठी रही. उसे लगा, उस के सामने उस की मां नहीं, कोई और स्त्री बैठी है. उस की मां के हृदय में तो प्यार का अथाह समुद्र लहलहाता था. वह इतनी तंगदिल कैसे हो गई.

तभी प्रेरणा चाय बना लाई. तन्मय भी अपना दूध का गिलास ले कर वहीं आ गया. अचानक ही ऋचा को लगा कि उसे आए आधे घंटे से भी ऊपर हो गया है, पर किसी ने पानी को भी नहीं पूछा. शायद सब प्रेरणा की ही प्रतीक्षा कर रहे थे. सोनाली तो नीनू को ले कर ऐसी अदृश्य हुई कि अभी तक घर नहीं लौटी थी.

झटपट चाय पी कर प्रेरणा फिर रसोईघर में जा जुटी थी. ऋचा अपना कप रखने गई तो देखा, सिंक बरतनों से भरी पड़ी है और प्रेरणा जल्दीजल्दी बरतन साफ करने में लगी है.

‘‘यह क्या, आज कामवाली नहीं आई?’’ अनायास ही ऋचा के मुंह से निकला.

‘‘आजकल बड़े शहरों में आसानी से कामवाली कहां मिलती हैं. ऊपर से मांजी को किसी का काम पसंद भी नहीं आता. सुबह तो समय रहता ही नहीं, इसलिए सबकुछ शाम को ही निबटाना पड़ता है.’’

‘‘अच्छा, यह बता कि आज क्या पकेगा? मैं भोजन का प्रबंध करती हूं,’’ ऋचा ने कहा.

‘‘फ्रिज में देख लो, सब्जियां रखी हैं, जो खाना है, बना लेंगे.’’

‘‘क्या कहूं प्रेरणा, लगता है, मेरे आने से तो तेरा काम और बढ़ गया है.’’

‘‘कैसी बातें कर रही है? सुदीप की बहन होने के साथ ही तू मेरी सब से प्यारी सहेली भी है, यह कैसे भूल गई, पगली. इतने दिनों बाद तुझे मेरी याद आई है तो मुझे बुरा लगेगा?’’ अनजाने ही प्रेरणा की आंखें छलछला आईं.

फ्रिज से सब्जियां निकाल कर काटने के लिए ऋचा मां के पास जा बैठी.

‘‘अरे, यह क्या, 4 दिनों के लिए मेरी बेटी मायके क्या आ गई, तुरंत ही सब्जियां पकड़ा दीं,’’ मां का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘ओह मां, किसी ने पकड़ाई नहीं हैं, मैं खुद सब्जियां ले कर आई हूं. खाली ही तो बैठी हूं, बातें करते हुए कट जाएंगी,’’ ऋचा ने बात पूरी नहीं की थी कि सुदीप ने आ कर उस के हाथ से थाली ले ली और कुरसी खींच कर वहीं बैठ कर सब्जियां काटने लगा.

‘‘यह बैठा है न जोरू का गुलाम, यह सब्जी काट देगा, खाना बना लेगा, तन्मय को नहलाधुला भी देगा. दिनरात पत्नी के चारों तरफ चक्कर लगाता रहेगा,’’ मां का व्यंग्य सुन कर सुदीप का चेहरा कस गया.

वह कोई कड़वा उत्तर देता, इस से पहले ही ऋचा बोल पड़ी, ‘‘तो क्या हुआ, अपने घर का काम ही तो कर रहा है,’’ उस ने हंस कर वातावरण को हलका बनाने का प्रयत्न किया.

‘‘जो जिस काम का है, उसी को शोभा देता है. सुदीप को तो मैं ने उस के पैर तक दबाते देखा है.’’

‘‘उस दिन बेचारी दर्द से तड़प रही थी, तेज बुखार था,’’ सुदीप ने धीरे से कहा.

‘‘फिर भी पति, पत्नी की सेवा करे, तोबातोबा,’’ मां ने कानों पर हाथ

रखते हुए आंखें मूंद कर अपने भाव प्रकट किए.

‘‘मां, अब वह जमाना नहीं रहा, पतिपत्नी एक ही गाड़ी के 2 पहियों की तरह मिल कर गृहस्थी चलाते हैं.’’

‘‘सब जानती हूं, हम ने भी खूब गृहस्थी चलाई है. तुम 4 भाईबहनों को पाला है और मेरी सास तिनका उठा कर इधर से उधर नहीं रखती थीं.’’

‘‘इस में बुराई क्या है? अक्षय की मां तो घर व हमारा खूब खयाल रखती हैं.’’

‘‘ठीक है, रखती होंगी, पर मुझ से नहीं होता. पहले अपनी गृहस्थी में खटते रहे, अब बेटे की गृहस्थी में कोल्हू के बैल की तरह जुते रहें. हमें भी घूमनेफिरने, सैरसपाटे के लिए कुछ समय चाहिए कि नहीं? पर नहीं, बहूरानी का दिमाग सातवें आसमान पर रहता है, नौकरी जो करती हैं रानीजी,’’ मां ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘यदि नौकरी करने वाली लड़की पसंद नहीं थी तो विवाह से पहले आप ने पहली शर्त यही क्यों नहीं रखी थी?’’ ऋचा ने मां को समझाना चाहा.

‘‘इस में भी हमारा ही दोष है? अरे, एक क्या तेरी भाभी ही नौकरी करती है? आजकल तो सभी लड़कियां नौकरी करती हैं, साथ ही घर भी संभालती हैं,’’ मां भला कब हार मानने वाली थीं. ऋचा चुप रह गई. उसे लगा, मां को कुछ भी समझाना असंभव है.

दूसरे दिन सुबह ही ऋचा भी तैयार हो गई तो प्रेरणा के आश्चर्य की सीमा न रही, ‘‘यह क्या, आज ही जा रही हो?’’

‘‘सोचती हूं, तुम लोगों के साथ ही निकल जाऊंगी. फिर कल से औफिस चली जाऊंगी…क्यों व्यर्थ में छुट्टियां बरबाद करूं. सोनाली के विवाह में तो छुट्टियां लेनी ही पड़ेंगी,’’ वह बोली.

‘‘तुम कहो तो मैं भी 2 दिनों की छुट्टियां ले लूं? आई हो तो रुक जाओ.’’

‘‘नहीं, अगली बार जब 3-4 दिनों की छुट्टियां होंगी, तभी आऊंगी. इस तरह तुम्हें भी छुट्टियां नहीं लेनी पड़ेंगी.’’

‘‘बेचारी एक दिन के लिए आई, लेकिन मेरी बेटी काम में ही जुटी रही. रुक कर भी क्या करे, जब यहां भी स्वयं ही पका कर खाना है तो,’’ मां ऋचा को इतनी जल्दी जाते देख अपना ही रोना रो रही थीं.

‘अब जो होना है, सो हो. मैं आई थी सुदीप व प्रेरणा को समझाने, पर किस मुंह से समझाऊं. प्रेम व सद्भाव की ताली क्या भला एक हाथ से बजती है?’ ऋचा सोच रही थी.

‘‘अच्छा, दीदी,’’ सुदीप ने बस से उतर कर उस के पैर छुए. प्रेरणा पहले ही उतर गई थी.

‘‘सुदीप, मुझे नहीं लगता कि तुम्हें उपदेश देने का मुझे कोई हक है. फिर भी देखना, सनी की नौकरी व सोनाली के विवाह तक साथ निभा सको तो…’’ कहती हुई ऋचा मुड़ गई. पर उसे लगा, मन जैसे बहुत भारी हो आया है, कहीं थोड़ा एकांत मिल जाए तो फूटफूट कर रो ले. Hindi Kahani :

Best Social Story In Hindi : धंधा अपना अपना

Best Social Story In Hindi : ‘‘भक्तजनो,यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन तुम इन बेड़ियों को तोड़ दोगे उस दिन तुम मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाओगे,’’ स्वामी दिव्यानंद की ओजस्वी वाणी गूंज रही थी.

महानगर के सब से वातानुकूलित हाल में एक ऊंचे मंच पर स्वामीजी विराजमान थे. गेरुए रंग के रेशमी वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, माथे पर चंदन का तिलक और उंगलियों में जगमगा रही पुखराज की अंगूठियां उन के व्यक्तित्व को अनोखी गरिमा प्रदान कर रही थीं.

प्रचार करा गया था कि स्वामीजी को सिद्धि  प्राप्त है. जिस पर उन की कृपादृष्टि हो जाए उस के कष्ट दूर होते देर नहीं लगती. पूरे शहर में स्वामीजी के बड़ेबड़े पोस्टर लगे थे. दूरदूर के इलाकों से आए भक्तजन स्वामीजी की महिमा का बखान करते रहते. जन सैलाब उन के दर्शन करने के लिए उमड़ा पड़ा था.

सुबह, दोपहर, शाम स्वामीजी दिन में 3 बार भक्तों को दर्शन और प्रवचन देते थे. इस समय उन का अंतिम व्याख्यान चल रहा था. पूरा हाल रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी से जगमगा रहा था. मंच की सज्जा गुलाब के ताजे फूलों से की गई थी, जिन की खुशबू पूरे हाल में बिखरी थी.

स्वामीजी के चरणों में शीश झुका कर आशीर्वाद लेने वालों का तांता लगा था. आश्रम के स्वयंसेवक भी श्रद्धालुओं को अधिकाधिक चढ़ावा चढ़ा कर आशीर्वाद लेने के लिए प्रेरित कर रहे थे.

रात 9 बजे स्वामीजी का प्रवचन समाप्त हुआ. उन्होंने हाथ उठा कर भक्तों को आशीर्वाद दिया तो उन के जयघोष से पूरा हाल गुंजायमान हो उठा. मंदमंद मुसकराते हुए स्वामीजी उठे और आशीर्वाद की वर्षा करते हुए मंच के पीछे चले गए. उन के जाने के बाद धीरेधीरे हाल खाली हो गया. स्वामीजी के विश्वासपात्र शिष्यों श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंदजी महाराज ने स्वयंसेवकों को भी बाहर निकालने के बाद हाल का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

‘‘चलो भाई, आज की मजदूरी बटोरी जाए’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने अपने गेरुए कुरते की बांहें चढ़ाते हुए कहा.

‘‘दिन भर इन बेवकूफों का स्वागतसत्कार करतेकरते यह नश्वर शरीर थक कर चूरचूर हो गया है. अब इसे तत्काल उत्तम किस्म के विश्राम की आवश्यकता है. इसलिए सारी गिनती शीघ्र पूरी कर ली जाए,’’ सत्यानंदजी महाराज ने अंगड़ाई लेते हुए सहमति जताई.

‘‘जो आज्ञा महाराज, श्रद्धानंदजी महाराज ने मुसकराते हुए मंच के सामने लगे फूलों के ढेर को फर्श पर बिखरा दिया. फूलों के साथ भक्तजनों ने दिल खोल कर दक्षिणा भी अर्पित की थी. दोनों तेजी से उसे बटोरने लगे, किंतु उन की आंखों से लग रहा था कि उन्हें किसी और चीज की तलाश है.

श्रद्धानंदजी महाराज ने फूलों के ढेर को एक बार फिर उलटापुलटा तो उन की आंखें चमक उठीं. वे खुशी से चिल्लाए, ‘‘वह देखो मिल गया.’’

सामने लाल रंग के रेशमी कपड़े में लिपटी कोई वस्तु पड़ी थी. सत्यानंदजी महाराज ने लपक कर उसे उठा लिया. शीघ्रता से उन्होंने उस वस्त्र को खोला तो उस के भीतर 1 लाख रुपए की नई गड्डी चमक रही थी.

‘‘महाराज, आज फिर वह 1 लाख की गड्डी चढ़ा गया है,’’ सत्यानंदजी गड्डी ले कर दिव्यानंदजी के कक्ष की ओर लपके. श्रद्धानंदजी महाराज भी उन के पीछेपीछे दौड़े.

स्वामी दिव्यानंद शानदार महाराजा बैड पर लेटे हुए थे. आवाज सुनते ही वे उठ बैठे. उन्होंने एक लाख की गड्डी को ले कर उलटपुलट कर देखा. उस के असली होने का विश्वास होने पर उन्होंने पूछा, ‘‘कुछ पता चला कौन था वह?’’

‘‘स्वामीजी, हम ने बहुत कोशिश की, लेकिन पता ही नहीं चल पाया कि वह गड्डी कब और कौन चढ़ा गया,’’ सत्यानंद महाराज ने कहा.

‘‘तुम दोनों माल खाखा कर मुटा गए हो. एक आदमी 5 दिनों से रोज 1 लाख की गड्डी चढ़ा जाता है और तुम दोनों उस का पता नहीं लगा पा रहे हो,’’ स्वामीजी की आंखें लाल हो उठीं.

‘‘क्षमा करें महाराज, हम ने पूरी कोशिश की…’’

‘‘क्या खाक कोशिश की,’’ स्वामीजी उस की बात काटते हुए गरजे, ‘‘तुम दोनों से कुछ नहीं होगा. अब हमें ही कुछ करना होगा,’’ इतना कह कर उन्होंने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाते हुए बोले, ‘‘हैलो निर्मलजी, मैं जिस मंच पर बैठता हूं उस के ऊपर आज रात में ही सीसी टीवी कैमरा लग जाना चाहिए.’’

‘‘लेकिन स्वामीजी, आप ही ने तो वहां कैमरा लगाने से मना किया था. बाकी सभी जगहों पर कैमरे लगे हुए हैं और उन की चकाचक रिकौर्डिंग हो रही है,’’ निर्मलजी की आवाज आई.

‘‘वत्स, यह सृष्टि परिवर्तनशील है. यहां कुछ भी स्थाई नहीं होता है,’’ स्वामीजी हलका सा हंसे फिर बोले, ‘‘तुम तो जानते हो कि मेरे निर्णय समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं. इसी कारण सफलता सदैव मेरे कदम चूमती है. तुम तो बस इतना बतलाओ कि यह काम कितनी देर में पूरा हो जाएगा. काम तुम्हारा और पैसा हमारा.’’

‘‘सूर्योदय से पहले आप की आज्ञा का पालन हो जाएगा,’’ निर्मलजी ने आश्वासन दिया. फिर झिझकते हुए बोले, ‘‘स्वामीजी कुछ जरूरी काम आ पड़ा है. अगर कुछ पैसे मिल जाते तो कृपा होती.’’

‘‘1 पैसे का भी भरोसा नहीं करते हो मुझ पर,’’ स्वामीजी ने कहा और फिर श्रद्धानंद की ओर मुड़ते हुए बोले, ‘‘निर्मलजी को अभी पैसे पहुंचा दो वरना उन्हें कोई दूसरा जरूरी काम याद आ जाएगा.’’

‘‘जो आज्ञा महाराज,’’ कह श्रद्धानंदजी महाराज सिर नवा कर चले गए.

निर्मलजी ने वादा निभाया. सूर्योदय से पहले स्वामीजी के मंच के ऊपर सीसी टीवी कैमरा लग गया. उधर उस भक्त ने भी अपनी रीति निभाई. आज फिर वह लाल वस्त्र में लिपटी 1 लाख की गड्डी स्वामीजी के चरणों में अर्पित कर गया था. श्रद्धानंद और दिव्यानंद आज भी उस भक्त का पता नहीं लगा पाए.

रात के 11 बजे स्वामीजी बड़ी तल्लीनता के साथ सीसी टीवी की रिकौर्डिंग देख रहे थे. अचानक एक दृश्य को देखते ही वे बोले, ‘‘इसे रिवाइंड करो.’’

श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग को रिवाइंड कर के चला दिया. स्वामीजी ने 2 बार और रिवाइंड करवाया. श्रद्धानंद को उस में कोई खास बात नजर नहीं आ रही थी, लेकिन स्वामीजी की आज्ञा का पालन जरूरी था.

‘‘रोकोरोको, यहीं पर रोको,’’ अचानक स्वामीजी चीखे, श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग तुरंत रोक दी.

‘‘जूम करो इसे,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी तो श्रद्धानंद ने जूम कर दिया.

‘‘यह रहा मेरा शिकार,’’ स्वामीजी ने सोफे से उठ कर स्क्रीन पर एक जगह उंगली रख दी. फिर बोले, ‘‘हलका सा रिवाइंड कर स्लो मोशन में चलाओ इसे.’’

श्रद्धानंद ने स्लो मोशन में रिकार्डिंग चला दी. रिकौर्डिंग में करीब 45 साल का एक व्यक्ति हाथों में फूलों का दोना लिए स्वामीजी के करीब आता दिखाई पड़ा. करीब आ कर उस ने फूलों को स्वामीजी के चरणों में अर्पित करने के बाद अपना शीश भी उन के चरणों में रख दिया. इसी के साथ उस ने अत्यंत शीघ्रता के साथ अपनी जेब से लाल रंग के वस्त्र में लिपटी गड्डी निकाली और फूलों के नीचे सरका दी. एक बार फिर शीश नवाने के बाद वह उठ कर तेजी से बाहर चला गया.

‘‘यह कोई तगड़ा आसामी मालूम पड़ता है. इस का चेहरा तुम दोनों ध्यान से देख लो. मुझे यह आदमी चाहिए… हर हालत में चाहिए,’’ स्वामीजी की आंखों में अनोखी चमक उभर आई.

‘‘आप चिंता मत करिए. कल हम लोग इसे हर हालत में पकड़ लाएंगे,’’ सत्यानंद ने आश्वस्त किया.

‘‘नहीं वत्स,’’ स्वामीजी अपना दायां हाथ उठा कर शांत स्वर में बोले, ‘‘वह मेरा अनन्य भक्त है. उसे पकड़ कर नहीं, बल्कि पूर्ण सम्मान के साथ लाना. स्मरण रहे कि उसे कोई कष्ट न होने पाए.’’

‘‘जो आज्ञा,’’ श्रद्धानंद और सत्यानंद ने शीश नवाया और कक्ष से बाहर चले गए.

अगले दिन उन दोनों की दृष्टि हर आनेजाने वाले भक्त के चेहरे पर टिकी थी. रात के करीब 8 बजे जब शरीर थक कर चूर होने लगा तब वह व्यक्ति आता दिखाई पड़ा.

‘‘देखो वह आ गया,’’ श्रद्धानंद ने सत्यानंद को कुहनी मारी.

‘‘लग तो यही रहा है. चलो उसे उधर ले कर चलते हैं,’’ सत्यानंद ने कहा.

‘‘अभी नहीं. पहले उसे गड्डी चढ़ा लेने दो ताकि सुनिश्चित हो जाए कि यह वही है जिस की हमें तलाश है,’’ श्रद्धानंद फुसफुसाए.

पिछले कल की तरह वह व्यक्ति आज भी मंच के करीब आया. फूल अर्पित करने के बाद उस ने स्वामीजी के चरणों में शीश नवाया, लाल रंग में लिपटी नोटों की गड्डी को चढ़ाने के बाद वह तेजी से उठ कर बाहर चल दिया.

‘‘मान्यवर, कृपया इधर आइए,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने उस के करीब आ कर सम्मानित स्वर में कहा.

‘‘क्यों?’’

‘‘स्वामीजी आप से भेंट करना चाहते हैं,’’ सत्यानंदजी महाराज ने बताया.

‘‘मुझ से? किसलिए?’’ वह व्यक्ति घबरा उठा.

‘‘वे आप की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हैं. इसलिए आप को साक्षात दर्शन दे कर आशीर्वाद देना चाहते हैं,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने बताया, ‘‘बड़ेबड़े मंत्री और अफसर स्वामीजी के दर्शनों के लिए लाइन लगा कर खड़े होते हैं. आप अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जो स्वामीजी ने आप को स्वयं मिलने के लिए बुलाया है. अब आप का भाग्योदय निश्चित है.’’

यह सुन उस व्यक्ति के चेहरे पर राहत के चिह्न उभर आए. श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंद महाराज ने उसे एक खूबसूरत कक्ष में बैठा दिया.

करीब आधा घंटे बाद स्वामीजी उस कक्ष में आए और अत्यंत शांत स्वर में बोले, ‘‘वत्स, तुम्हारे ललाट की रेखाएं बता रही हैं कि तुम्हें जीवन में बहुत बड़ी सफलता मिलने वाली है.’’

स्वामीजी की वाणी सुन वह व्यक्ति उन के चरणों में लेट गया. उस की आंखों से श्रद्धा सुमन बह निकले. स्वामीजी ने उसे अपने हाथों से पकड़ कर उठाया और फिर स्नेह भरे स्वर में बोले, ‘‘उठो वत्स, अश्रु बहाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक नया सवेरा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है.’’

‘‘स्वामीजी, आप के दर्शन पा कर मेरा जीवन धन्य हो गया,’’ वह व्यक्ति हाथ जोड़ कर बोला. भावातिरेक में उस की वाणी अवरुद्ध हो रही थी.

स्वामीजी ने उसे अपने साथ सोफे पर बैठाया और फिर बोले, ‘‘वत्स, एक प्रश्न पूछूं तो क्या उस का उत्तर सचसच दोगे?’’

‘‘आप आज्ञा करें तो उत्तर तो क्या आप के लिए प्राण भी देने के लिए तैयार हूं,’’ उस व्यक्ति ने कहा.

स्वामीजी ने अपनी दिव्यदृष्टि उस के चेहरे पर टिका दी फिर सीधे उस की आंखों में झांकते हुए बोले, ‘‘तुम प्रतिदिन 1 लाख रुपयों की गड्डी मेरे चरणों में क्यों चढ़ा रहे हो?’’

यह सुन उस व्यक्ति ने अपनी आंखें बंद कर लीं. उस के चेहरे पर छाए भावों को देख कर लग रहा था कि उस के भीतर भारी संघर्ष चल रहा है. चंद पलों बाद उस ने अपनी आंखें खोलीं और बोला, ‘‘स्वामीजी, मैं एक अरबपति आदमी था, लेकिन व्यापार में घाटा हो जाने के कारण मैं पूरी तरह बरबाद हो गया. सभी रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझ से मुंह मोड़ लिया था. एक दिन मुझे पता चला कि यूरोप में एक बंद फैक्टरी कौड़ियों के भाव बिक रही है. मेरी पत्नी आप की अनन्य भक्त है. उस की सलाह पर मैं ने अपना मकान और पत्नी के गहने बेच कर वह फैक्टरी खरीद ली. आप को उस फैक्टरी में 20% का साझेदार बना कर मैं ने उस फैक्टरी को दोबारा चलाना शुरू कर दिया. शुरुआती दिनों में काफी परेशानियां हुईं लेकिन आप के आशीर्वाद से पिछले सप्ताह से वह फैक्टरी फायदे में आ गई. इस समय उस से 5 लाख रुपये रोज का फायदा हो रहा है. इसलिए 20% के हिसाब से मैं रोज 1 लाख रुपए आप के चरणों में अर्पित कर देता हूं.’’

‘‘लेकिन तुम ने यह बात गुप्त क्यों रखी?’’ मुझे बता भी तो सकते थे? स्वामीजी ने पूछा.

‘‘मैं ने सुना है कि आप मोहमाया और लोभ से काफी ऊपर हैं. इसलिए आप को बता कर आप की साधना में विध्न डालने का साहस मैं नहीं कर सका.’’

‘‘वत्स, धन्य हो तुम. तुम जैसे ईमानदार व्यक्तियों के बल पर ही यह दुनिया चल रही है वरना अब तक अपने पाप के बोझ से यह रसातल में समा चुकी होती,’’ स्वामीजी ने गंभीर स्वर में सांस भरी फिर आशीर्वाद की मुद्रा में आते हुए बोले, ‘‘ईश्वर की कृपा दृष्टि तुम पर पड़ चुकी है. जल्द ही तुम्हें 5 लाख रुपए नहीं, बल्कि 5 करोड़ रोज का मुनाफा होने वाला है.’’

‘‘सत्य वचन महाराज,’’ उस व्यक्ति ने श्रद्धा से शीश झुकाया फिर बोला, ‘‘यूरोप में ही एक और बंद पड़ी खान का पता लगा है, मैं ने हिसाब लगाया है कि अगर उसे ठीक से चलाया जाए तो 5 करोड़ रुपए रोज तो नहीं लेकिन 5 करोड़ रुपए महीने का फायदा जरूर हो सकता है.’’

‘‘तो उस फैक्टरी को खरीद क्यों नहीं लेते?’’

‘‘खरीद तो लेता, लेकिन उस के लिए करीब 20 करोड़ रुपए चाहिए. मैं ने काफी भागदौड़ की, लेकिन फंड का इंतजाम नहीं हो पा रहा है. एक बार मुझे व्यापार में घाटा हो चुका है, इसलिए फाइनैंसर मुझ पर दांव लगाने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं,’’ उस व्यक्ति के स्वर में निराशा झलक उठी.

‘‘वत्स, फंड की चिंता मत करो. ऊपर वाले ने तुम्हें मेरी शरण में भेज दिया है, इसलिए अब सारी व्यवस्थाएं हो जाएंगी,’’ स्वामीजी मुसकराए.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम जैसे व्यक्तियों का दिया मेरे पास बहुत कुछ है. वह मेरे किसी काम का नहीं है. तुम उसे ले जाओ और फैक्टरी खरीद लो,’’ स्वामीजी ने कहा.

‘‘आप मुझे इतना रुपया दे देंगे?’’ उस व्यक्ति की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘‘अकारण नहीं दूंगा,’’ स्वामीजी मुसकराए, ‘‘मुझे अपने भक्तों के कल्याण के लिए बहुत सारे कार्य करने हैं. इस सब के लिए बहुत पैसा चाहिए. इसलिए इस पैसे से तुम फैक्टरी खरीद लो, लेकिन उस में 51 प्रतिशत शेयर मेरे होंगे.’’

‘‘आप धन्य हैं महाराज,’’ वह व्यक्ति एक बार फिर स्वामीजी के चरणों में लोट गया.

‘‘श्रद्धा और सत्या, तुम दोनों अभी इन के साथ इन के निवास पर जाओ.

साझेदारी के कागजात तुरंत बना लो ताकि फैक्टरी को जल्द से जल्दी खरीद लिया जाए,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी.

अगले ही दिन साझेदारी के कागजात तैयार हो गए. स्वामीजी ने हजारों भक्तों की चढ़ाई की कमाई अपने अनन्य भक्त को सौंप दी. वह भक्त फैक्टरी खरीदने यूरोप चला गया.

स्वामीजी की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने जगमगा रहे थे. किंतु जब 1 महीने तक उस भक्त का कोई संदेश नहीं आया तो उन्होंने श्रद्धानंद और सत्यानंद को उस के निवास पर भेजा. वहां उपस्थिति गार्ड ने उन दोनों को देखते ही बताया, ‘‘उन साहब ने तो 2 महीने के लिए यह कोठी किराए पर ली थी, किंतु आप लोगों के आने के 2 दिनों बाद वे अचानक ही इसे खाली कर के चले गए थे. किंतु जाने से पहले वे आप लोगों के लिए एक लिफाफा दे गए थे. कह रहे थे कि आप लोग एक न एक दिन उन से मिलने यहां जरूर आएंगे.’’

इतना कह कर गार्ड अपनी कोठरी के भीतर से एक लिफाफा ले आया. डगमगाते कदमों से वे दोनों स्वामी दिव्यानंद के पास लौट आए और लिफाफा उन्हें पकड़ा दिया.

स्वामीजी ने लिफाफा फाड़ा तो उस के भीतर से एक पत्र निकला, जिस में लिखा था:

‘‘आदरणीय स्वामी जी,

सादर चरण स्पर्श. अब तो आप को विश्वास हो गया होगा कि यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन कोई व्यक्ति इन बेड़ियों को तोड़ देगा उस दिन वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा. आप ने अपने भक्तों की बेड़ियां तोड़ने का कार्य किया है और मैं ने आप की इन बेड़ियों को तोड़ने की छोटी सी चेष्टा की है. आप इसे ‘धंधा अपना अपना’ भी कह सकते हैं.

आप का एक सेवक.

स्वामीजी उस पत्र को अपलक निहारे जा रहे थे और श्रद्धा और सत्या उन के चेहरे को. Best Social Story In Hindi :

Hindi Best Kahani : रोटी – शर्माजी अम्मां को समझाने का प्रयास क्यों कर रहे थे ?

Hindi Best Kahani : ढाई बजे तक की अफरातफरी ने पंडितजी का दिमाग खराब कर के रख दिया था. ये लाओ, वो लाओ, ये दिखाइए, वो दिखाइए, ऐसा क्यों है, कहां है, किस तरह है? इस का सुबूत… उस का साक्ष्य?

पारिवारिक सूची क्या बनी, पूरे खानदान की ही फेहरिस्त तैयार हो गई. पूरे 150 नाम दर्ज हो गए, सभी के पते, फोन नंबर, मोबाइल नंबर, उन का व्यवसाय और उन सब के व्यवसायों से जुड़े दूसरेदूसरे लोग.

पंडित खेलावन ने बेटी की सगाई पिछले माह ही की थी. उन्हें डर था कि कहीं ऐसा कुछ न हो कि उन के संबंधों पर आंच आए, सो कह उठे, ‘‘देखिए शर्मा साहब, आप को मेरे परिवार और मेरे धंधे के बाबत जो कुछ पूछना और जानना है, पूछिए किंतु मेरे समधी को इस में न घसीटिए, प्लीज. बेटी के विवाह का मामला है. कहीं ऐसा न हो कि…’’

पंडित खेलावन को बीच में टोकते हुए शर्माजी बोले, ‘‘देखिए पंडितजी, जिस तरह से आप को अपने संबंधों की परवा है उसी तरह मुझे भी अपनी नौकरी की चिंता है. यह सब तो आप को बताना ही होगा. आखिर आप का, आप के व्यापार का किसकिस से और कैसाकैसा संबंध है, यह मुझे देखना है और यही मेरे काम का पार्र्ट है.’’

तमाम जानकारियां दर्ज कर शर्माजी लंच के लिए बाहर निकल गए थे किंतु पीछे अपनी पूरी फौज छोड़ गए थे. घर के हर सदस्य पर पैनी नजर रखने के लिए आयकर विभाग का एकएक कर्मचारी मुस्तैद था.

पलंग पर निढाल हो पंडित खेलावन ने सारी स्थितियों पर गौर करना शुरू किया. आयकर वालों की ऐसी रेड पड़ी थी कि छिपनेछिपाने की तनिक भी मोहलत नहीं मिली. यह शनि की महादशा ही थी कि सुबहसुबह हुई दस्तक ने उन्हें जैसे सड़क पर नंगा ला कर खड़ा कर दिया हो.

पंडित खेलावन का दिमाग हर समय हर बात को धंधे की तराजू पर तोलता रहता था. पलड़ा अपनी तरफ झुके तभी फायदा है, इसी सिद्धांत को उन्होंने अपनाना सीखा था. और पलड़ा अपनी ओर झुकाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति ही कारगर सिद्ध  होती थी, होती आई है. इसीलिए पूरे जीवन को उन्होंने धंधे की तराजू पर तोला था.

‘‘मुझे, नहीं खाना कुछ भी,’’ कह कर पंडित खेलावन ने थाली परे सरका दी.

‘‘हमारी तो तकदीर ही फूटी थी जो यह दिन देखना पड़ रहा है,’’ पत्नी ने पीड़ा पर मरहम लगाते हुए कहा, ‘‘मैं कहती थी न कि अपने दुश्मनों से होशियार रहो. कहने को भाई हैं तुम्हारे मांजाए. पर हैं नासपीटे…यह सबकुछ उन्हीं का कियाधरा है, नहीं तो…’’ कहतेकहते पंडिताइन सिसकसिसक कर रोने लगीं.

‘‘देख लूंगा…एकएक को देख लूंगा…किसी को नहीं छोड़ं ूगा. मुझे बरबाद करने पर तुले हैं…उन को भी आबाद नहीं रहने दूंगा. क्या मैं उन की रगरग को नहीं जानता हूं कि उन की औलादें क्याक्या गुल खिलाती फिरती हैं? मेरे मुंह खोलने की देर भर है, सब लपेटे में आ जाएंगे.’’

पंडितजी जोरजोर से चिल्ला रहे थे. वह जानते थे कि दीवार के उस पार जरूर भाइयों के कान लगे होंगे, भाभियों को चटखारे लेने का आज अच्छा मौका जो मिला था.

आयकर जांच अधिकारी ने लंच से लौटते ही एकएक चीज का मूल्यांकन करना शुरू किया. पत्नी के काननाक को भी उन्होंने नहीं छोड़ा.

‘‘हर चीज सामने होनी चाहिए…सोना, चांदी, हीरा, मोती, नकदी, बैंकबैलेंस, जमीनजायदाद, फैक्टरी, दुकान, घर, मकान, कोठी, बंगला, खेत खलिहान… सबकुछ नामे या बेनामे.’’

ज्योंज्यों लिस्ट बढ़ती जा रही थी त्योंत्यों पंडित खेलावन का दिल बैठता जा रहा था.

कोई जगह, कोई  कोना, कोई तहखाना नहीं छोड़ा था रेड पार्टी ने. हर कमरे की तलाशी, गद्दोंतकियों को छू- दबा कर देखा तो देखा, दीवारों के प्लास्टर को भी ठोकबजा कर देखने से नहीं चूके.

पंडितजी कुछ कहने को होते तो शर्मा साहब उन्हें बीच में ही रोक देते, ‘‘हम, अच्छी तरह जानते हैं, कहां क्या हो सकता है. टैक्स बचाने के चक्कर में आप लोगों का बस चले तो क्या कुछ नहीं कर सकते?’’

आखिरी कमरा बचा था अम्मां वाला. शर्माजी ने कहा, ‘‘इसे भी देखना होगा.’’

‘‘इस में क्या रखा है…बूढ़ी मां का कमरा है. जाओजाओ, अब उसे भी देख लो…कोई कसर बाकी नहीं रहनी चाहिए पंडितजी की इज्जत का फलूदा बनाने में…’’ झल्लाहट में पंडित खेलावन बड़बड़ा रहे थे.

समाज में इज्जत बनाने के लिए और बाजार में अपनी साख कायम रखने के लिए पंडित खेलावन ने क्याक्या नहीं किया था. थोड़ीबहुत राजनीति में भी दखल रखने का इरादा था. इसीलिए उन्होंने हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हुए अपने एक चित्र को परचे पर छपवाया और इस खूबसूरत परचे को शहर के कोनेकोने में चस्पां करवा डाला था. गली, महल्ला, टैक्सी, जीप, बस और रेल के डब्बों में भी उन की पहचान कायम थी.

सबकुछ धो डाला है आज के मनहूस दिन ने. हो न हो, कहीं यह सामने वाली पार्टी की करतूत तो नहीं? हो भी सकता है क्योंकि अभी वह पार्टी पावर में है. उन का मानना था कि अगले चुनाव में केंद्र वाली पार्टी ही राज्य में भी आएगी, इसलिए उस से ही जुड़ना ठीक होगा. पर इस बार के अनुमान में वह गच्चा खा गए.

अम्मां 80 को पार कर रही थीं. इस आयु में तो हर कोई सठिया जाता है. बातबात पर बच्चों जैसी जिद…अब वह क्या जानें कि ये आयकर क्या होता है वह तो जिद पर अड़ी हैं कि अपने कमरे में किसी को नहीं आने देंगी.

आंख से भले ही पूरा दिखाई न देता हो पर किसी बच्चे के पैरों की आहट भी सुनाई दे जाती है तो कोहराम मचा देती हैं…रोने लगती हैं. उन्हें अकेले पड़े रहना ही सुहाता है. अब अम्मां को कौन समझाए कि ये रेड पार्टी वाले जो ठान लेते हैं कर के ही दम लेते हैं, उन्हें तो यह कमरा भी चेक कराना ही होगा.

शर्माजी समय की नजाकत को जानते थे और जांचपड़ताल के दौरान किस के साथ कैसा व्यवहार कर के जड़ तक पहुंचना है, खूब जानते थे. उन्होंने सभी को रोक कर अकेले अम्मां के कमरे में प्रवेश किया.

‘‘अम्मां, पांव लागूं. कैसी हो अम्मां जी. बहुत दिनों से सुनता था कि बड़ेबूढ़ों का आशीर्वाद जीवन में पगपग पर कामयाबी देता है, क्या ऐसा वरदान आप मुझे नहीं देंगी?’’

‘‘बेटा, सब करनी का फल है… आशीषों से क्या होता है? पर तुम हो कौन? सुबह से इस घर में कोहराम मचा हुआ है. क्यों परेशान कर रखा है मेरे बच्चों को?’’ अम्मां के शब्दों में तल्खी भी थी और आर्तनाद भी, जैसे वह सबकुछ जानतीसमझती हों.

शर्माजी ने अम्मां को जैसे समझाने का प्रयास किया, ‘‘हम लोग सरकारी आदमी हैं, अम्मां. हमारा काम है गलत तरीकों से कमाए गए रुपएपैसों की पड़ताल करना…खरी कमाई पर खरा टैक्स लेना सरकार का कायदा है. अब देखिए न अम्मांजी, मैं ठहरा सरकारी मुलाजिम. मुझे आदेश मिला है कि पंडित खेलावन पर टैक्स चोरी का मुआमला है, उस की छानबीन करो…सो आदेश तो बजाना ही होगा न…अब बताइए अम्मां, इस में मेरा क्या दोष है? जो खरा है तो खरा ही रहेगा…पंडितजी ने कोई गुनाह किया नहीं है तो उन्हें सजा कैसे मिल सकती है पर खानापूर्ति तो करनी ही होगी न…’’

‘‘सो तो है, बेटा…तुम आदमी भले लगते हो. मुझ से क्या चाहते हो? सारे घर का हिसाब तो तुम ले ही चुके हो…लो, मेरा कमरा भी देख लो. यही चाहते हो न…पूरी कर लो अपनी ड्यूटी,’’ शर्माजी की बातों से अम्मां प्रभावित हुई थीं.

पुराने कमरे में क्या लुकाधरा है लेकिन शर्माजी की पैनी नजर ने संदेह तो खड़ा कर ही दिया था.

‘‘इस संदूक में क्या है? अम्मां, जरा खोल कर दिखाओ तो,’’ शर्माजी ने कहा तो अम्मां जैसे फिर बिफर पड़ीं, ‘‘नहीं… नहीं, इसे नहीं खोलने दूंगी. तुम इसे नहीं देख सकते…’’

‘‘लेकिन ऐसा भी क्या है, अम्मां, संदूक को जरा देख तो लेने दो,’’ शर्माजी बोले, ‘‘आप ने ही तो कहा है कि मुझे मेरी ड्यूटी पूरी करने देंगी. सो समझिए कि मेरी ड्यूटी में हर बंद चीज को खोल कर देखना शामिल है.’’

अम्मां ने अब और जिद नहीं की. खटिया से उठीं, दरवाजा भीतर से बंद किया.

संदूक का नाम सुनते ही पंडिताइन के मन में खटका हुआ था कि हो न हो, बुढि़या ने सब से छिपा कर जरूर कुछ बचा रखा है. इसीलिए वह अपने संदूक के पास किसी को फटकने तक नहीं देती थीं. जरूर कुछ ऐसा है जिसे शर्माजी ताड़ गए हैं, नहीं तो…

इधर पंडितजी भी शंकालु हो उठे तो पंडिताइन से कहने लगे, ‘‘अम्मां रहती हैं मेरे यहां और मन लगा रखा है दूसरे बेटों के साथ. भले ही वे उन्हें न पूछते हों. कहीं ऐसा तो नहीं है कि बड़के भैया के लिए कुछ रख छोड़ा हो. चलो, जो भी होगा, आज सामने आ ही जाएगा.’’

बंद कमरे में पसरे अंधकार में पिछली खिड़की से जो थोड़ी रोशनी की लकीर  आ रही थी उसी रोशनी में संदूक रखा था. ताला खोल कर ज्यों अम्मां ने संदूक का ढक्कन उठाया तो शर्माजी अवाक् रह गए.

‘‘रोटियां, ये क्या अम्मां… रोटियां और संदूक में?’’

‘‘हां, बेटे, यही जीवन का सत्य है… रोटियां. इन्हीं के लिए इनसान दुनिया में जीता है, जीवन भर भागता फिरता है, रातदिन एक करता है, बुरे से बुरा काम करता है. किस के लिए ? रोटी के लिए ही तो. खानी उसे सिर्फ दो रोटी ही हैं. फिर भी न जाने क्यों…’’ कहतेकहते अम्मां का गला भर उठा था.

‘‘लेकिन मांजी, ये तो सूखी रोटियां हैं. आप ने इन्हें संदूक में सहेज कर क्यों रख छोड़ा है?’’ शर्माजी इस गुत्थी को सुलझा नहीं पा रहे थे, भले ही उन्होंने बड़ी से बड़ी गुत्थियों को सुलझा दिया हो.

‘‘सप्ताह में एक दिन ऐसा भी आता है बेटे, जब कोई भी घर में नहीं रहता. इतवार को सभी बाहर खाना खाते हैं. उस दिन घर में रोटी नहीं बनती. उसी दिन के लिए मैं इन्हें बचाए रखती हूं. दो रोटियों को पानी में भिगो देती हूं और फिर किसी न किसी तरह से उन्हें चबा कर पेट भर ही लेती हूं…लो बेटे, तुम ने तो देख ही लिया है… अब इस कटुसत्य को पूरे घर के सामने भी जाहिर हो जाने दो…न जाने मेरे बच्चे क्या सोचेंगे.’’ आंसू पोंछते हुए अम्मां ने बंद दरवाजा खोल दिया. Hindi Best Kahani :

Hindi Family Story : उपलब्धि – नौकरानी और मालकिन की अद्भुत कहानी

Hindi Family Story : इतवार को सोचा था पर मेहमान आ गए तो उन्हीं में व्यस्त होना पड़ा. आज भी छुट्टी है और नाश्ता भी पकौडि़यों का भरपेट हो चुका है. खाना आराम से बनेगा. रसोई का हर कोना उस ने रगड़रगड़ कर अच्छी तरह चमकाया. फिर रैकों पर साफ अखबार, प्लास्टिक बिछाए.

अंदर जब कुछ सर्दी लगने लगी थी तो सोचा थोड़ी देर धूप में बैठ कर अखबार पढ़ लूं फिर खाने का काम शुरू होगा. तब तक रसोईघर भी सूख जाएगा.

अखबार ले कर शीला छत पर अभी आई ही थी कि पति विनोद की आवाज सुनाई दी, ‘‘अरे भई, कहां हो? आज खाना नहीं बनेगा क्या?’’ यह कहते हुए वह भी छत पर आ गए.

‘‘अभी तो भरपेट नाश्ता हुआ है सब का. आप ने भी तो किया है.’’

‘‘शीला, जानती हो मैं नाश्ता नहीं करता हूं. बच्चों का मन रखने के लिए 2-4 पकौडि़यां ले ली थीं. मुझे तो हर रोज 10 बजे खाने की आदत है. फिर भी बहस किए जा रही हो.’’

‘‘क्यों? आप इतवार को सब के साथ देर से खाना नहीं खाते हैं?’’

‘‘पर आज इतवार नहीं है. अब नहीं बना है तो और बात है. मुझे तो पहले ही पता है कि आजकल तुम्हारी हर काम को टालने की आदत हो गई है. अब यह समय अखबार पढ़ने का है या घर के काम का. दूसरी औरतों को देखा है, नौकरी भी करती हैं और घर भी कितनी कुशलता से संभालती हैं. यहां तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं, काम करने को नौकरानी है फिर भी हर काम देरी से होता है.’’

विनोद के ऊंचे होते स्वर के साथ शीला का मूड बिगड़ता चला गया.

शीला अखबार वहीं पटक कर नीचे रसोईघर में गई. उबले आलू रखे थे वे छौंक दिए और फटाफट आटा गूंध कर परांठे बना दिए. पर खाना देख कर विनोद का पारा और चढ़ गया.

‘‘यह क्या? सिर्फ सब्जी, परांठे. तुम जानती ही हो कि लंच के समय मैं पूरी खुराक लेता हूं. जब नाश्ता बंद कर दिया है तो खाना तो कम से कम ढंग का होना चाहिए. पता नहीं तुम्हें क्या हो गया है. सारे ऊलजलूल कामों के लिए तुम्हारे पास समय है, बस, मेरे लिए नहीं.’’

गुस्से में विनोद ने थाली सरका दी थी. शीला का मन हुआ कि वह भी फट पडे़. एक तो दिन भर काम में जुटे रहो उस पर फटकार भी सुनो.  आखिर कुसूर क्या था, रसोई की सफाई ही तो की थी. चाय, नाश्ता, खाना, घर की संभाल, बच्चों की देखरेख में उस ने जिंदगी गुजार दी पर किसी को संतोष नहीं. बच्चों को लगता है मां आधुनिक, स्मार्ट नहीं हैं जैसी औरों की मम्मी हैं. विनोद को तो अब नौकरीपेशा औरतें अच्छी लगने लगी हैं. चार पैसे जो कमा कर लाती हैं. घरगृहस्थी संभा-लने वाली तो इन की नजरों में गंवार ही हैं.

विनोद तो बाहर निकल गए थे पर शीला ने बेमन से पूरा खाना बनाया. शुभा भी तब तक सहेली के घर से आ गई थी, और शुभम कोच्ंिग से. दोनों को खाना खिला कर वह अपने कमरे में आ गई.

और दिन तो शीला काम पूरा करने के बाद टीवी देखती, अधबुना स्वेटर पूरा करती या कोई पत्रिका पढ़ती पर आज कुछ भी करने का मन नहीं था. विनोद का यह बेरुखी भरा व्यवहार वह पिछले कई दिनों से देख रही थी. आखिर कहां गलत हो गई वह. क्या इन घरेलू कामों की कोई अहमियत नहीं है? अगर बाहर नौकरी करती होती तो क्या तभी तक शख्सियत थी उस की?

शादी हुए 18 साल हो गए. जब शादी हुई थी उसी साल एम.ए. फर्स्ट डिवीजन में पास किया था. चाहती तो तभी नौकरी कर सकती थी. इच्छा भी थी पर उस समय तो ससुराल वालों को नौकरी करती हुई बहू पसंद नहीं थी.

विनोद भी तब यही कहते थे कि बच्चों को अच्छे संस्कार दो, उन की पढ़ाई में मदद करो, घर संभाल लो, यही बहुत है मेरे लिए.

उस ने सबकुछ तो उन्हीं की इच्छानुसार किया था. देवर की शादी हो गई, देवरानी आ गई तब भी सासससुर उसी के पास रहे.

‘‘बड़ी बहू हम लोगों का जितना ध्यान रखती है छोटी नहीं रख पाती,’’ मांजी तो अकसर कह देती थीं.

बच्चों को संभालना, बूढ़े सासससुर की सेवा करना, घरगृहस्थी देखना, सबकुछ तो कुशलता से निभाया था उस ने. फिर ससुरजी की मौत के बाद यह सोच कर मांजी का खयाल वह और भी रखने लगी थी कि कहीं इन्हें अकेलापन महसूस न हो.

पर अब क्या हो गया? ठीक है, बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उन्हें अब उस की उतनी जरूरत नहीं रही है. मांजी ने भी अपनेआप को सत्संग, भजन, पूजन में व्यस्त कर लिया है. विनोद का प्रमोशन हुआ है तब से उन की भी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. मकान का लोन लिया है तो खर्चे भी बढ़ गए हैं. बच्चों की भारी पढ़ाई है फिर शुभा की शादी भी 4-5 साल में करनी है. शायद इसी बात को ले कर विनोद को अब नौकरीपेशा औरतें अच्छी लगने लगी हैं. पर क्या देखते नहीं कि उस की भी तो व्यस्तता बढ़ गई है. सुबह 6 बजे से काम की जो दिनचर्या शुरू होती है तो रात को ही सिमटती है. फिर उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि वह फालतू है?

घर के सारे काम क्या अपनेआप हो जाते होंगे, और तो और शुभा जब से बाहर होस्टल में गई है और शुभम की कोचिंग शुरू हुई है, बाजार के भी सारे काम उसे ही करने पड़ रहे हैं. पर नहीं, सब को यही लगता है कि वह फालतू है. सब को उस से शिकायतें ही शिकायतें हैं. और तो और मांजी पहली बार 10-15 दिन को देवर के पास गईं तो वह भी जाते समय कहने में नहीं चूकीं, ‘‘बहू, तुम मेरी देखभाल करतेकरते थक जाती हो तो सोचा कि छोटी के पास कुछ दिन रह लूं.’’

अनमनी सी शीला फिर बाहर बरामदे में पड़े मूढ़े पर आ कर बैठ गई थी. शुभा पास ही बैठी सिर झुकाए डायरी में कुछ लिख रही थी.

‘‘क्या कर रही है?’’

‘‘मां, अब दिसंबर खत्म हो रहा है न, तो अपनी उपलब्धियां लिख रही हूं इस जाते हुए साल की और तय

कर रही हूं कि अगले साल मुझे

क्याक्या करना है. नए संकल्प भी तो करूंगी न…’’

‘‘अच्छा, क्या उपलब्धियां रहीं?’’

‘‘मां, विशेष उपलब्धि तो इस वर्ष की यह रही कि मेरा मेडिकल में चयन हो गया. अब मैं संकल्प करूंगी कि मेरा कैरियर इतना ही अच्छा रहे. अच्छे नंबर आते रहें हर परीक्षा में.’’

शुभा कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘ममा, मैं अपनी ही नहीं शुभम और पापा की भी उपलब्धियां लिखूंगी. देखो न, शुभम को इस साल स्कूल में बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिला है और पापा का तो प्रमोशन हुआ है न…’’

शीला ने भी उत्सुक हो कर शुभा की डायरी में झांका था तो वह बोली, ‘‘ममा, आप भी अपनी उपलब्धियां बताओ, मैं लिखूंगी. और आप अगले साल क्या करना चाहोगी. यह भी…’’

शीला का उत्साह फिर से ठंडा हो गया. क्या बताए, कुछ भी तो उपलब्धि नहीं है उस की. अब घर भर के लिए फालतू जो हो चली है वह…और एक ठंडी सांस न चाहते हुए भी उस के मुंह से निकल ही गई.

‘‘ओह मां, आप बहुत थक गई हो, आप को थोड़ा चेंज करना चाहिए…’’

शुभा कह ही रही थी कि फोन की घंटी बजने लगी. शुभा ने ही दौड़ कर फोन उठाया था.

‘‘मां, मामा का फोन है. पूछ रहे हैं कि शेफाली की शादी में हम लोग कब पहुंच रहे हैं. लो, बात कर लो.’’

‘‘हां, भैया, अभी तो कुछ तय नहीं हुआ है. बात यह है कि इन्हें तो फुरसत है नहीं क्योंकि बैंक की क्लोजिंग चल रही है. शुभम के अगले ही हफ्ते बोर्ड के इम्तहान हैं.’’

‘‘पर तू तो आ सकती है.’’

शीला क्या जवाब दे यह सोच ही रही थी कि शुभा ने आ कर दोबारा फोन ले लिया और बोली, ‘‘मामा, हम लोग भले ही न आ पाएं पर मम्मी जरूर आएंगी,’’ और शुभा ने फोन रख दिया था.

‘‘मां, आप हो आइए न,’’ शुभा आग्रह करते हुए बोली, ‘‘भोपाल है ही कितनी दूर. एक रात का ही तो सफर है. आप का चेंज भी हो जाएगा और नातेरिश्तेदारों से मुलाकात भी हो जाएगी. और फिर दोनों मौसियां भी तो आ रही हैं.

‘‘मां, आप यहां की चिंता न करें. मैं घर संभाल लूंगी. बस, पापा और शुभम का ही तो खाना बनाना है. फिर लीला बाई है ही मदद के लिए. बस, आप तो अपनी तैयारी करो.’’

जाने का खयाल तो अच्छा लगा था शीला को भी पर विनोद क्या तैयार हो पाएंगे? शीला अभी भी असमंजस में ही थी पर शुभा ने विनोद को राजी कर लिया था. फटाफट दूसरे दिन का आरक्षण भी हो गया और शुभा ने मां की सारी तैयारी करवा दी.

शादी की गहमागहमी में शीला को भी अच्छा लगा था. रातरात भर जाग कर बहनों में गपशप होती रहती. सब रिश्तेदारों के समाचार मिले. भैया ने बेटी की शादी खूब धूमधाम से की थी.

शेफाली के विदा होते ही घर सूना हो गया था. रिश्तेदार तो चल ही दिए थे, बहनों ने भी जाने की तैयारी कर ली थी.

‘‘भैया, मुझे भी अब लौटना है,’’ शीला ने याद दिलाया था.

‘‘अरे, तुझे क्या जल्दी है. शोभा और शशि तो नौकरीपेशा हैं. उन की छुट्टियां नहीं हैं इसलिए उन्हें लौटने की जल्दी है पर तू तो रुक सकती है.’’

भैया ने सहज स्वर में ही कहा था पर शीला को लगा जैसे किसी ने फिर कोमल मर्म पर चोट कर दी है. सब व्यस्त हैं वही एक फालतू है, वहां भी सब यही कहते हैं और यहां भी.

भैया के बहुत जोर देने पर वह 2 दिन रुक गई पर लौटना तो था ही. बेटी वापस जाएगी. शुभम पता नहीं ढंग से पढ़ाई कर भी रहा होगा या नहीं. सबकुछ भूल कर उसे भी अब घर की याद आने लगी थी.

स्टेशन पर सभी उसे लेने आए थे.

‘‘मां, बस, दादी नहीं आ पाईं आप को लेने क्योंकि वह अभी यहां नहीं हैं पर उन के 2 फोन आ गए हैं और वे जल्दी ही वापस आ रही हैं, कह रही थीं कि मन तो बड़ी बहू के पास ही लगता है.’’

शुभा ने पहली सूचना यही दी थी. उधर शुभम कहे जा रहा था, ‘‘आप ने इतने दिन क्यों लगा दिए लौटने में, 2 दिन ज्यादा क्यों रुकीं?’’

‘‘अच्छा, पहले घर तो पहुंचने दे.’’

शीला हंस कर रह गई थी. विनोद चुपचाप गाड़ी चला रहे थे. घर पहुंचते ही शुभा गरम चाय ले आई थी. शीला ने कमरे को देखा तो काफी कुछ अस्तव्यस्त सा लगा.

‘‘मां, अब यह मत कहना कि मैं ने घर की संभाल ठीक से नहीं की और रसोई को देख कर तो बिलकुल भी नहीं. आप तो बस, चाय पीओ…और फिर अपना घर संभालना…’’

शुभा ने मां के आगे एक डायरी बढ़ाई तो वह बोली, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘मां, आप तो अपनी इस साल की उपलब्धियां बता नहीं पाई थीं पर पापा ने खुद ही आप की तरफ से यह डायरी पूरी कर दी, और पता है सब से ज्यादा उपलब्धियां आप की ही हैं…लो, मैं पढ़ूं…’’

शुभा उत्साह से पढ़ती जा रही थी.

‘‘हम सब को बनाने में आप का ही योगदान रहा. मेरा मेडिकल में चयन हुआ आप की ही बदौलत. मैं एक बार मेडिकल में असफल हो गई थी तब आप ही थीं जिन्होंने मुझे दोबारा परीक्षा के लिए प्रेरित किया और शुभम को स्कूल के बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिलना आप की ही क्रेडिट है. सुबह जल्दी उठ कर बेटे को तैयार करना, नाश्ते, खाने से ले कर हर चीज का ध्यान रखना, उस का होेमवर्क देखना, और तो और यह आप की ही मेहनत और लगन थी कि पापा का प्रमोशन हुआ. पापा कह रहे थे कि जब कभी आफिस में किसी कारण से उन्हें लौटने में देर हो जाती तो आप ने कभी शिकायत नहीं की बल्कि उन की गैरमौजूदगी में दादी को डाक्टर के पास तक आप ही ले कर जाती रहीं…’’

‘‘बसबस…अब बस कर,’’ शीला ने शुभा को टोका था. उधर विनोद मंदमंद मुसकरा रहे थे.

‘‘अब नया संकल्प हम सब लोगों का यह है कि तुम इसी तरह हम सब का ध्यान रखती रहो…’’ विनोद के कहते ही सब हंस पड़े थे. उधर शीला को लग रहा था कि एक घना कोहरा, जो कुछ दिनों से मन पर छा गया था, अचानक हटने लगा है. Hindi Family Story :

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