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Iron Rich Foods : शरीर में आयरन की कमी हो सकती है जानलेवा, डाइट में शामिल करें ये फूड्स

Iron Rich Foods : शरीर को स्वस्थ रखने और मजबूत बनाए रखने के लिए सभी जरूरी पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है. बॉडी में अगर एक भी पोषक तत्व की कमी होने लगती है, तो इससे कई गंभीर बीमारियों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है. शरीर को नियमित रूप से जिस तरह प्रोटीन, विटामिन, मिनरल और कैल्शियम आदि की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह आयरन की भी जरूरत होती है.

आयरन एक ऐसा मिनरल है, जिसका काम शरीर में खून और कोशिकाओं को बनाना, ऊर्जा देना, हीमोग्लोबिन के स्तर को नियंत्रित करना व  इम्यून सिस्टम और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना है. आयरन की कमी से व्यक्ति को थकान, कमजोरी, चिड़चिड़ापन, त्वचा से रंगत उड़ना, सांस लेने में तकलीफ और मानसिक स्वास्थ्य आदि की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि आप अपनी डाइट में उन चीजों को शामिल करें, जिससे कभी भी आपके शरीर में आयरन की कमी ना हो. आइए अब जानते हें आयरन रिच फूड्स (Iron Rich Foods) के बारे में.

सोयाबीन

जो लोग खून की कमी से जूझ रहे हैं, उन्हें अपनी डाइट में सोयाबीन (Iron Rich Foods) को जरूर शामिल करना चाहिए. सोयाबीन में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन की उच्च मात्रा होती है, जिससे रेड ब्लड सेल्स की कमी दूर होती है.

कद्दू

आपको बता दें कि कद्दू में आयरन का भंडार होता है. हालांकि ज्यादातर लोगों को कद्दू की सब्जी पंसंद नहीं आती है लेकिन कद्दू और उसके बीज कई बीमारियों का खात्मा करने में सक्षम है. इसलिए अपनी डाइट में कद्दू को जरूर शामिल करें.

पालक

पालक को आयरन का सबसे प्रमुख स्रोत माना जाता हैं. इसे अपनी डाइट में शामिल करने से आयरन की कमी तो दूर होती ही है. साथ ही इसमें विटामिन और मिनरल्स जैसे कई जरूरी पोषक तत्व भी होते हैं, जो शररी के लिए काफी फायदेमंद है.

दाल

मूंग, मसूर और सभी तरह की दालों को नियमित रूप से खाना चाहिए. दालों में सबसे ज्यादा आयरन पाया जाता है, जिसके सेवन से कभी भी व्यक्ति को खून की कमी नहीं होती है.

बीन्स

दालों के अलावा बीन्स में आयरन (Iron Rich Foods) की भरपूर मात्रा होती है. जो लोग नियमित रूप से बीन्स खाते हैं, उन्हें कभी भी खून की कमी से जूझना नहीं पड़ता है. इसके अलावा बीन्स खाने से कई बीमारियों के होने का खतरा भी कम हो जाता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

काश, आप ने ऐसा न किया होता: भाग 2

श्रीमती गोयल चुप थीं और मु?ा में काटो तो खून न था. क्या भैया कभी सलाखों के पीछे भी रहे थे? हमें क्या पता था यहां बंगलौर में भैया के साथ इतना कुछ घट चुका है.

‘‘औरत भी बलात्कार कर सकती है,’’ भैया भनक कर बोले, ‘‘इस का पता मु?ो तब चला जब तुम ने भीड़ जमा कर के सब के सामने यह कह दिया था कि मैं ने तुम्हें रेप करने की कोशिश की है, वह भी आफिस के केबिन में. हम में अच्छी दोस्ती थी, मु?ो कुछ करना ही होता तो क्या जगह की कमी थी मेरे पास? हर शाम हम साथ ही होते थे. रेप करने के लिए मु?ो आफिस का केबिन ही मिलता. तुम ने गिरीश की प्रमोशन के लिए मु?ो सब की नजरों में गिराना चाहा…साफसाफ कह देतीं मैं ही हट जाता. इतना बड़ा धोखा क्यों किया मेरे साथ? अब इस से क्या चाहती हो, बताओ मु?ो. इसे अकेला लावारिस मत सम?ाना.’’

‘‘मैं किसी से कुछ नहीं चाहती सिर्फ माफी चाहती हूं. तुम्हारे साथ मैं ने जो किया उस का फल मु?ो मिला है. अब गिरीश मेरे साथ नहीं रहता. मेरा बेटा भी अपने साथ ले गया…सोम, जब से मैं ने तुम्हें बदनाम करना चाहा है एक पल भी चैन नहीं मिला मु?ो. तुम अच्छे इनसान थे, सारी की सारी कंपनी तुम्हें बचाने को सामने चली आई. तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा…मैं ही कहीं की नहीं रही.’’

‘‘मेरा क्या नहीं बिगड़ा…जरा बताओ मु?ो. मेरे काम पर तो कोई आंच नहीं आई मगर आज किसी भी औरत पर विश्वास कर पाने की मेरी हिम्मत ही नहीं रही. अपनी मां के बाद तुम पहली औरत थीं जिसे मैं ने अपना माना था और उसी ने अपना ऐसा रूप दिखाया कि मैं कहीं का नहीं रहा और अब मेरे भाई को अपने जाल में फंसा कर…’’

‘‘मत कहो सोम ऐसा, विजय मेरे भाई जैसा है. अपने घर बुला कर मैं तुम्हारी पत्नी से और विजय से अपने किए की माफी मांगनी चाहती थी. मेरी सांस बहुत घुटती है सोम. तुम मु?ो क्षमा कर दो. मैं चैन से जीना चाहती हूं.’’

‘‘चैन तो अपने कर्मों से मिलता है. मैं ने तो उसी दिन तुम्हारी और गिरीश की कंपनी छोड़ दी थी. तुम्हें सजा ही देना चाहता तो तुम पर मानहानि का मुकदमा कर के सालों अदालत में घसीटता. लेकिन उस से होता क्या. दोस्ती पर मेरा विश्वास तो कभी वापस नहीं लौटता. आज भी मैं किसी पर भरोसा नहीं कर पाता. तुम्हारी सजा पर मैं क्या कह सकता हूं. बस, इतना ही कह सकता हूं कि तुम्हें सहने की क्षमता मिले.’’

अवाक् था मैं. भैया का अकेलापन आज सम?ा पाया था. श्रीमती गोयल चीखचीख कर रो रही थीं.

‘‘एक बार कह दो मु?ो माफ कर दिया सोम.’’

‘‘तुम्हें माफ तो मैं ने उसी पल कर दिया था. तब भी गिरीश और तुम पर तरस आया था और आज भी तुम्हारी हालत पर अफसोस हो रहा है. चलो, विजय.’’

श्रीमती गोयल रोती रहीं और हम दोनों भाई वापस गाड़ी में आ कर बैठ गए. मैं तो सकते में था ही भैया को भी काफी समय लग गया स्वयं को संभालने में. शायद भैया शोभा से प्यार करते होंगे और शोभा गिरीश को चाहती होगी, उस का प्रमोशन हो जाए इसलिए भैया से प्रेम का खेल खेला होगा, फिर बदनाम करना चाहा होगा. जरा सी तरक्की के लिए कैसा अनर्थ कर दिया शोभा ने. भैया की भावनाओं पर ऐसा प्रहार सिर्फ तरक्की के लिए. भैया की तरक्की तो नहीं रुकी. शोभा ने सदा के लिए भैया को अकेला जरूर कर दिया. कब वह दिन आएगा जब भैया किसी औरत पर फिर से विश्वास कर पाएंगे. यह क्या किया था श्रीमती गोयल आप ने मेरे भाई के साथ? काश, आप ने ऐसा न किया होता.

उस रात पहली बार मु?ो ऐसा लगा, मैं बड़ा हूं और भैया मु?ा से 10 साल छोटे. रो पड़े थे भैया. खाना भी खा नहीं पा रहे थे हम.

‘‘आप देख लेना भैया, एक प्यारी सी, सुंदर सी औरत जो मेरी भाभी होगी एक दिन जरूर आएगी…आप कहते हैं न कि हर कीमती राह तरसने के बाद ही मिलती है और किसी भी काम का एक निश्चित समय होता है. जो आप की थी ही नहीं वह आप की हो कैसे सकती थी. जो मेरे भाई के लायक होगी कुदरत उसे ही हमारी ?ोली में डालेगी. अच्छे इनसान को सदा अच्छी ही जीवनसंगिनी मिलनी चाहिए.’’

डबडबाई आंखों में ढेर सारा प्यार और अनुराग लिए भैया ने मु?ो गले लगा लिया. कुछ देर हम दोनों भाई एकदूसरे के गले लगे रहे. तनिक संभले भैया और बोले, ‘‘बहुत तेज चलने वालों का यही हाल होता है. जो इनसान किसी दूसरे के सिर पर पैर रख कर आगे जाना चाहता है प्रकृति उस के पैरों के नीचे की जमीन इसी तरह खींच लेती है. मैं तुम्हें बताना ही भूल गया. कल पापा से बात हुई थी. बौबी का बहुत बड़ा एक्सीडेंट हुआ है. उस ने 2 बच्चों को कुचल कर मार दिया. खुद टूटाफूटा अस्पताल में पड़ा है और मांबाप पुलिस से घर और घर से पुलिस तक के चक्कर लगा रहे हैं. जिन के बच्चे मरे हैं वे शहर के नामी लोग हैं. फांसी से कम सजा वे होने नहीं देंगे. अब तुम्हीं बताओ, तेज चलने का क्या नतीजा निकला?’’

वास्तव में निरुत्तर हो गया मैं. भैया ने सच ही कहा था बौबी के बारे में. उस का आचरण ही उस की सब से बड़ी सजा बन जाने वाला है. मनुष्य काफी हद तक अपनी पीड़ा के लिए स्वयं ही जिम्मेदार होता है.

दूसरे दिन कंपनी के काम से जब मु?ो श्रीमती गोयल के पास जाना पड़ा तब उन का ?ाका चेहरा और तरल आंखें पुन: सारी कहानी दोहराने लगीं. उन की हंसी कहीं खो गई थी. शायद उन्हें मु?ा से यह भी डर लग रहा होगा कि कहीं पुरानी घटना सब को सुना कर मैं उन के लिए और भी अपमान का कारण न बन जाऊं.

पहली बार लगा मैं भी भैया जैसा बन गया हूं. क्षमा कर दिया मैं ने भी श्रीमती गोयल को. बस मन में एक ही प्रश्न उभरा :

आप ने ऐसा क्यों किया श्रीमती गोयल जो आज आप को अपनी नजरें शर्म से ?ाकानी पड़ रही हैं. हम आज वह अनिष्ट ही क्यों करें जो कब दुख का तूफान बन कर हमारे मानसम्मान को ही निगल जाए. इनसान जब कोई अन्याय करता है तब वह यह क्यों भूल जाता है कि भविष्य में उसे इसी का हिसाब चुकाना पड़ सकता है.

काश, आप ने ऐसा न किया  होता.

फिसड्डी सांसद साबित हुए सनी देओल

लोकसभा चुनाव सिर पर हैं. ऐसे में मुनासिब वक्त है कि गुरदासपुर के इन 2 युवाओं की बात पर बड़े पैमाने और संजीदगी से गौर किया जाए. अमरजोत सिंह और अमृतपाल का आरोप है कि सांसद और अभिनेता सनी देओल ने गुरदासपुर के लोगों को धोखे में रखा. बात पिछली अगस्त के पहले सप्ताह की है जब पूरा देश सनी देओल अभिनीत फिल्म ‘गदर 2’ का इंतजार कर रहा था तब उन्हीं के संसदीय क्षेत्र गुरदासपुर से इस फिल्म के बहिष्कार की अपील हो रही थी. इस बाबत वहां पोस्टर भी चस्पां किए गए थे.

यह कोई पहला मौका नहीं था जब गुरदासपुर में सनी देओल का विरोध हुआ हो बल्कि इस के कुछ दिनों पहले ही उन के लापता होने के पोस्टर भी दीवारों पर लगाए गए थे. बात या दर्द या भड़ास कुछ भी कह लें, अकेले इन 2 युवाओं की नहीं बल्कि उन लाखों मतदाताओं की भी है जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ी उम्मीदों से इस भाजपा उम्मीदवार को चुना था कि वे रियल लाइफ में भी हीरो की तरह काम करेंगे और वे वादे पूरे करेंगे जो उन्होंने चुनावप्रचार के दौरान किए थे.

कड़ा और रोमांचक था मुकाबला

उस चुनाव में गुरदासपुर हाई प्रोफाइल सीटो में शुमार थी क्योंकि कांग्रेस ने दोबारा सुनील जाखड़ को टिकट दिया था जो अपने दौर के दिग्गज कांग्रेसी नेता बलराम जाखड़ के बेटे हैं. बलराम जाखड़ की न केवल गुरदासपुर में बल्कि पूरे पंजाब में अपनी एक अलग साख है. वे केंद्रीय मंत्री राज्यपाल और लोकसभा अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर भी रहे हैं. आखिरी वक्त तक भाजपा को इस सीट से ऐसा कोई उम्मीदवार नहीं मिला था जो सुनील जाखड़ को टक्कर दे सके. सो, उस ने सनी देओल को जैसेतैसे राजी किया.

लेकिन तब सनी के अभिनेता पिता धर्मेंद्र इस के लिए राजी नहीं थे क्योंकि उन की जाखड़ परिवार से काफी नजदीकियां रही हैं और वे बलराम जाखड़ की बेइंतहा इज्जत भी करते थे.

काफी ऊहापोह और न के बाद धर्मेंद्र ने मंजूरी दी तो सनी ने नामांकन दाखिल किया. तब भी यह चर्चा आम थी कि भले ही सनी देओल एक लोकप्रिय अभिनेता हों लेकिन वे सुनील जाखड़ को टक्कर नहीं दे पाएंगे क्योंकि गुरदासपुर की जनता उन्हें बहुत चाहती है. ऐसा होता दिख भी रहा था क्योंकि सनी देओल को न तो भाषण देना आता था और न ही उन के पास सुनील जाखड़ के सवालों का जवाब था.

बेटे की खस्ता हालत देख धर्मेंद्र को मोरचा संभालना पड़ा था और जनता के बीच उन्होंने यह स्वीकार लिया था कि सनी को भाषण देना नहीं आता और वे यहां बहस करने नहीं बल्कि जनता का दर्द दूर करने आए हैं.

असल में सुनील जाखड़ ने सनी देओल को स्थानीय मुद्दों पर खुली बहस करने की चुनौती दी थी जिस पर सनी लड़खड़ा गए थे. तब धर्मेंद्र को मैदान में आना पड़ा जो मीटिंगों में सुनील जाखड़ को भी अपना बेटा बताते रहते थे. धर्मेंद्र सभाओं में यह भी गिनाते रहते थे कि साल 2004 के आम चुनाव में भाजपा ने उन्हें राजस्थान की चुरू सीट से बलराम जाखड़ के खिलाफ लड़ने की गुजारिश की थी लेकिन उन्होंने उन के लिहाज के चलते मना कर दिया था और बीकानेर सीट से लड़े थे.

गुरदासपुर सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है. साल 2017 के उपचुनाव में सुनील जाखड़ ने भाजपा के उम्मीदवार सवर्ण सिंह सलारिया को 1 लाख 93 हजार 219 वोटों के बड़े अंतर से हराया था. हालांकि इस के पहले भाजपा की तरफ से अभिनेता विनोद खन्ना 4 बार यहां से जीत कर लोकसभा पहुंचे लेकिन बतौर सांसद, जनता उन से भी संतुष्ट नहीं रही थी. वे, बस, अपनी लोकप्रियता के चलते जीत जाते थे. यही इस बार भी हुआ.

वोटिंग का दिन आतेआते ग्लैमर का जादू एक बार फिर जनता के सिर चढ़ कर बोला और बेहद कड़े रोमांचक व नजदीकी मुकाबले में सनी ने सुनील को 82,459 हजार वोटों से शिकस्त दे दी. चुनावप्रचार में उन की फिल्मों के हाहाकारी और देशभक्ति वाले डायलौग्स ने अपना रंग दिखाया और ढाई किलो का हाथ, हाथ के पंजे पर भारी पड़ा. जीत के बाद सनी देओल ने इस क्षेत्र के कल्याण और विकास के बड़ेबड़े वादे करते. विनोद खन्ना के छोड़े अधूरे कामों को पूरा करने की बात की थी.

लेकिन झांकने भी नहीं आए

एक बार जीत कर गए तो सनी देओल ने फिर गुरदासपुर की तरफ मुड़ कर भी नहीं देखा. इतना ही नहीं, हद तो तब हो गई जब ‘गदर 2’ के प्रमोशन के लिए वे भारतपाकिस्तान की सीमा तक गए लेकिन वहां से महज 30 किलोमीटर अपने संसदीय क्षेत्र गुरदासपुर जाना उन्होंने जरूरी या मुनासिब न समझा. इस से वहां के लोगों को एक बार फिर अपने ठगे जाने का एहसास हुआ लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था क्योंकि चिड़िया खेत चुग कर दिल्ली जा चुकी थी.

दिल्ली में भी वे लोकसभा में कम ही दिखे और लगातार अपनी फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त रहे. सनी देओल उन इनेगिने सांसदों में से एक हैं जिन्होंने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में अपना वोट भी नहीं डाला जबकि भाजपा ने सभी सांसदों को संसद में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया था. इन दोनों ही मौकों पर वे विदेश में थे.

जाहिर है, भाजपा का मकसद उन्हें मोहरा बना कर अपनी सीट संख्या बढ़ाना था. अगर ऐसा न होता तो वह उन के कान मरोड़ते कह सकती थी कि एक बार तो अपनी लोकसभा जा कर मुंह दिखा आओ. तुम तो सलमान खान के साथ ‘सफर’ फिल्म की शूटिंग करते रहोगे लेकिन हमें तो 2019 में भी लड़ना है.

राजनीति में नौसिखिए और लापरवाह सनी देओल किस मुंह से गुरदासपुर जाते और अब कभी जाएंगे, ऐसा लगता नहीं. अपनी सांसद निधि से भी उन्होंने क्षेत्र के लिए कुछ खास नहीं किया. साल 2020 में कोविड 19 के वक्त वे गुरदासपुर में चुनाव जीतने के बाद पहली और आखिरी दफा दिखे थे तब उन्होंने 50 लाख रुपए जारी करने की घोषणा कर दी थी जिस का इस्तेमाल एक साल गुजर जाने के बाद न होने पर भी गुरुदासपुर में काफी चर्चा रही थी. साल 2021-22 में उन की सांसद निधि 7 करोड़ रुपए में से एक धेला भी उन्होंने खर्च नहीं किया था, जबकि यह पैसा विकास कार्यों के लिए होता है.

अब तो हाल यह है कि गुरदासपुर की गुस्साई जनता केंद्र सरकार से चिट्ठी लिख कर यह अपील करने लगी है कि कुछ ऐसे कानून भी बनाए जाएं कि अगर कोई सैलिब्रेटी राजनीति में आता है और अपने क्षेत्र की जनता को वक्त नहीं दे पाता है तो उस की सदस्यता को रद्द किया जाए.

अमरजोत सिंह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को लंबाचौड़ा पत्र लिखते मांग की है कि सांसद सनी देओल जनता की समस्याओं को हल करने में नाकाम रहे हैं. ऐसे गैरजिम्मेदार लोकसभा सदस्य को न तो पद पर बने रहने का हक है और न ही सरकारी वेतन-भत्तों के साथसाथ सरकारी सहूलियतें लेने का हक है. गुरदासपुर के दुखी कई लोगों ने इस आशय की चिट्ठी राष्ट्रपति को भी भेजी है.

इन्हें चुनने से फायदा क्या ?

इन चिट्ठियों का कोई असर होगा, ऐसा लगता तो नहीं लेकिन फिर भी एक उम्मीद गुरदासपुर के लोगों ने जगाई है और आगाह भी किया है कि महज फिल्मी लोकप्रियता की चकाचौंध में आ कर, उसे सांसद चुन कर किस कदर पछताना भी पड़ सकता है. केवल सनी ही नहीं बल्कि फिल्मों सहित खेल और दूसरे क्षेत्रों से आए सैलिब्रेटीज अकसर अच्छे जनप्रतिनिधि साबित नहीं होते. ऐसे लोगों को लोकसभा भेजने से फायदा क्या जिन का राजनीतिक इस्तेमाल करने को चुनावी मैदान में उतारा जाता है.

सनी के मामले में तो दुखद लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भाजपा उन का राजनीतिक इस्तेमाल भी जीत के बाद नहीं कर पाई. उन की लोकसभा में हाजिरी न के बराबर रही. एक वैबसाइट के मुताबिक, पिछले बजट सत्र के दौरान 23 बैठकों में से सनी देओल महज 2 में ही मौजूद रहे थे.

उन की संसद में अटेंडैंस केवल 18 फीसदी रही जबकि सांसदों की उपस्थिति का राष्ट्रीय औसत 79 फीसदी है. सनी देओल ने एक बार भी किसी बहस में हिस्सा नहीं लिया और न ही कोई निजी विधेयक पेश किया. अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने सिर्फ एक बार सवाल पूछा जबकि सांसदों द्वारा सवाल पूछने का राष्ट्रीय औसत 191 फीसदी है.

सनी देओल की सौतेली मां हेमामालिनी भी कम लोकप्रिय नहीं जो भाजपा से मथुरा सीट से सांसद हैं. उन का काम योगी-मोदी मथुरा जाएं तब अपने डांस प्रोग्राम देना भर रहा है, नहीं तो मथुरा भी कम बदहाल नहीं. हां, इतना जरुर है कि हेमामालिनी अपने बेटे की तरह क्षेत्र से लापता नहीं रहतीं. वे कभीकभी वहां के मंदिरों में गीत और नृत्य के कार्यक्रम देती नजर आ जाती हैं. देओल परिवार के मुखिया धर्मेंद्र भी बीकानेर की जनता की नाराजगी का शिकार होते रहते थे जो साल 2004 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते थे.

अब फिर सभी दल कुछ सीटों पर फिल्मी सितारों को उतार कर अपना नंबर बढ़ाने की जुगत में हैं. इन में भाजपा की तरफ से कंगना रानौत का नाम ज्यादा सुर्ख़ियों में है जो इन दिनों भाजपा, आरएसएस और नरेंद्र मोदी की तारीफों में कसीदे गढ़ती रहती हैं.

हिमाचल प्रदेश की कंगना के कई बयान भी सुर्ख़ियों और विवादों में रहे हैं. खुद उन के पिता अमरदीप रानौत भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा से मिलने के बाद कह चुके हैं कि कंगना भाजपा से ही चुनाव लड़ेगी लेकिन किस सीट से, यह पार्टी तय करेगी.

लेकिन सनी देओल जैसों का हाल देखते अब जनता को तय करना है कि वे किसी फिल्मस्टार को महज ग्लैमर के चलते लोकसभा भेजना पसंद करेंगे या नहीं. अभी तक के अनुभव तो कतई अच्छे नहीं रहे हैं.

संपत्ति के साथ-साथ मैनेजमैंट में भी होना चाहिए लड़कियों का हिस्सा

भारत ऐसा देश है जहां लड़कियों को बचपन से ही घरगृहस्थी की शिक्षा दी जाती है ताकि वे भविष्य में अपने परिवार को भली प्रकार संभाल सकें लेकिन बदलते समय में लड़कियां न सिर्फ घर संभाल रही हैं बल्कि अपने व्यक्तित्व को भी मजबूत कर रही हैं और आर्थिक रूप से संपन्न हो रही हैं.

हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून 2005 कहता है कि बेटाबेटी में कोई फर्क नहीं है. बेटी का जन्म 9 सितंबर, 2005 से पहले हुआ है या बाद में, पिता की संपत्ति में उस का हिस्सा भाई के बराबर ही होगा. कानून ने बेटे और बेटी दोनों को जन्म से ही बराबरी का दरजा दे दिया गया है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में रह गए लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए इस एक्ट में संशोधन कर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 लाया गया. इस के अंतर्गत बेटी को जन्म से ही संयुक्त परिवार की संपत्ति में भी भागीदार बना दिया गया. पुत्र के ही समान अब एक पुत्री को भी संयुक्त परिवार की संपत्ति में भागीदार माना जाएगा.

लेकिन समय अब बदल गया है. लड़कालड़की अब एकजैसी शिक्षा ले रहे हैं, दोनों पर बराबर खर्चा होता है. ऐसे में अब महिलाओं को मैनेजमैंट में भी हिस्सेदारी देने की जरूरत है. मैनेजमैंट किसी भी कार्य को सुव्यवस्थित तरीके से कराने की एक कला होती है. इस के अंतर्गत अन्य व्यक्तियों द्वारा कार्य को इस तरह से करवाया जाता है कि कर्मचारियों द्वारा कम से कम समय में अधिक से अधिक कार्य लिया जा सके या फिर कम से कम लागत के अंतर्गत अधिकतम लाभ या लक्ष्य प्राप्त किया जा सके.

भारत ने पिछले कुछ दशकों में महिला उद्यमियों की संख्या में काफी वृद्धि देखी है. महिलाएं आज लगभग हर उद्योग व क्षेत्र में कदम रख रही हैं.

महिलाओं ने अपनी काबिलीयत से इस सोच को हरा दिया है कि वे सिर्फ घर का चूल्हाचौका संभालने के लिए बनी हैं. भारत में महिलाएं अब न सिर्फ बाहर काम करने जा रही हैं बल्कि कई तो बिजनैस टाईकून भी बन गई हैं और व्यापार संभाल रही हैं. यह न सिर्फ पारिवारिक बिजनैस संभाल रही हैं, बल्कि खुद का स्टार्टअप भी बड़ी समझदारी के साथ संभालती हैं. देश की कई ऐसी बिजनैस वुमेन हैं जिन्होंने कारोबार की दुनिया में अपना मुकाम हासिल कर लिया है. उन्हें देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक में लोग जानते हैं.

अपनी प्रतिभा, सूझबूझ से उन्होंने अपने सपने को पूरा करते हुए करोड़ों कमजोर वर्ग की महिलाओं को प्रेरणा दी. इन्हीं कारोबारी महिलाओं की सूची में किरण मजूमदार शा, सावित्री जिंदल, दिव्या गोकुलनाथ, लीना तिवारी के नाम शामिल हैं. फार्मा कंपनी यूएसवी इंडिया की चेयरपर्सन लीना तिवारी तो भारत की सब से अमीर महिलाओं की सूची में तीसरे स्थान पर हैं. वहीं 100 लोगों की लिस्ट में लीना तिवारी का 43वां स्थान है. लीना तिवारी की कुल संपत्ति 4.4 अरब डौलर है. लीना तिवारी की कंपनी यूएसवी इंडिया डायबिटीज और कार्डियोवैस्कुलर ड्रग से संबंधित है.

ऐसे ही नेहा नरखड़े और फाल्गुनी नायर हैं जो सैल्फमेड बिजनैस वीमेन हैं. 2021 में भारत की 8वीं सब से अमीर आंकी गई नेहा की कुल संपत्ति 13,830 करोड़ रुपए आंकी गई है थी. हालांकि उन्हें बाद में नुकसान हुआ लेकिन उन की बिजनेस मैनेजमैंट पर काफी अच्छी पकड़ है.

वहीं मुंबई के एक समृद्ध गुजराती परिवार में जन्मी फाल्गुनी ने अपने कैरियर के 20 साल कोटक महिंद्रा ग्रुप के साथ काम किया. 1993 में उन्होंने कंपनी जौइन की थी और उस के बाद 2012 में छोड़ कर अपना खुद का बिजनैस शुरू करने की सोची. 2012 में फाल्गुनी ने ब्यूटी और फैशन प्रोडक्ट्स के औनलाइन रीटेल स्टोर नायका की शुरुआत की. सिर्फ 10 सालों के भीतर ‘नायका’ भारत का सब से बड़ा औनलाइन ब्यूटी एंड फैशन रीटेल प्लेटफौर्म बन गया है.

महिला सशक्तीकरण की रफ्तार

आजादी के बाद महिलाओं का समाज में सम्मान बढ़ा लेकिन उन के सशक्तीकरण की गति दशकों तक धीमी रही. गरीबी व निरक्षरता महिलाओं की प्रगति में गंभीर बाधा रही हैं. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल के माध्यम से महिलाओं को व्यवसाय की ओर प्रोत्साहित कर इन्हें आर्थिक रूप से सुदृढ़ किया जा सकता है. विशेषकर कृषि प्रसंस्करण उद्योगों, बैंकिंग सेवाओं और डिजिटलीकरण की सहायता से महिलाओं के सामाजिक व वित्तीय सशक्तीकरण की शुरुआत की जा सकती है.

भारतीय महिलाएं ऊर्जा से लबरेज, दूरदर्शिता, जीवंत उत्साह और प्रतिबद्धता के साथ सभी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं. भारत के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, ‘हमारे लिए महिलाएं न केवल घर की रोशनी हैं बल्कि इस रोशनी की लौ भी हैं. अनादि काल से ही महिलाएं मानवता की प्रेरणा का स्रोत रही हैं. ?ांसी की रानी लक्ष्मीबाई से ले कर भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले तक, महिलाओं ने बड़े पैमाने पर समाज में बदलाव के बड़े उदाहरण स्थापित किए हैं.’

2030 तक पृथ्वी को मानवता के लिए बेहतरीन जगह बनाने के लिए भारत सतत विकास लक्ष्यों की ओर तेजी से बढ़ चला है. लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण करना सतत विकास लक्ष्यों में एक प्रमुखता है. वर्तमान में मैनेजमैंट, पर्यावरण संरक्षण, समावेशी आर्थिक व सामाजिक विकास जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विशेष ध्यान दिया गया है.

महिलाएं और नेतृत्व

महिलाओं में जन्मजात नेतृत्वगुण समाज के लिए संपत्ति है. प्रसिद्ध अमेरिकी धार्मिक नेता ब्रिघम यंग ने ठीक ही कहा है कि जब आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं तो आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं लेकिन जब आप एक महिला को शिक्षित करते हैं तो आप एक पीढ़ी को शिक्षित करते हैं. इसलिए, यह इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की थीम ‘एक स्थायी कल के लिए आज लैंगिक समानता’ है.

भारतीय इतिहास महिलाओं की उपलब्धि से भरा पड़ा है. आनंदीबाई गोपालराव जोशी (1865-1887) पहली भारतीय महिला चिकित्सक थीं और संयुक्त राज्य अमेरिका में पश्चिमी चिकित्सा में 2 साल की डिग्री के साथ स्नातक होने वाली पहली महिला चिकित्सक रही हैं.

सरोजिनी नायडू ने साहित्य जगत में अपनी छाप छोड़ी. हरियाणा की संतोष यादव ने 2 बार माउंट एवरेस्ट फतेह किया. बौक्सर एमसी मैरी कौम जानापहचाना नाम है. हाल के वर्षों में, हम ने कई महिलाओं को भारत में शीर्ष पदों पर और बड़े संस्थानों का मैनेजमैंट करते हुए भी देखा है. अरुंधति भट्टाचार्य, एसबीआई की पहली महिला अध्यक्ष, अलका मित्तल, ओएनजीसी की पहली महिला सीएमडी, सोमा मंडल, सेल अध्यक्ष, कुछ और नामचीन महिलाएं हैं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है.

कोविड-19 के दौरान कोरोना योद्धाओं के रूप में महिला डाक्टरों, नर्सों, आशा वर्करों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं व समाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी जान की परवा न करते हुए मरीजों को सेवाएं दी हैं. कोरोना के खिलाफ टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में भी महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई. भारत बायोटैक की संयुक्त एमडी सुचित्रा एला को स्वदेशी कोविड-19 की वैक्सीन विकसित करने में उन की शानदार भूमिका के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है. महिमा दतला, एमडी, बायोलौजिकल ई, ने 12-18 वर्ष की आयु के लोगों को दी जाने वाली कोविड-19 वैक्सीन विकसित करने के लिए अपनी टीम का नेतृत्व किया. निस्संदेह, महिलाएं और लड़कियां समाज में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की अग्रदूत हैं.

जैसा कि कोविड-19 के कारण हुई तबाही की पृष्ठभूमि में ‘बिल्ड बैक’ प्रक्रिया में शामिल करें तो महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए. 6ठी आर्थिक गणना के अनुसार, हमारे पास देश में 8.05 मिलियन महिला उद्यमी हैं. शौपक्लूज, घर और रसोई, दैनिक उपयोगिता वस्तुओं की मार्केटिंग के लिए 2011 में राधिका ने औनलाइन स्टार्टअप शुरू किया. ये यूनिकौर्न क्लब में प्रवेश करने वाली पहली भारतीय महिला उद्यमी थीं. राजोशी घोष के हसुरा, स्मिता देवराह के लीड स्कूल, दिव्या गोकुलनाथ के बायजू और राधिका घई के ’शौपक्लूज’ अन्य यूनिकौर्न हैं जो महिला स्टार्टअप की क्षमता के बारे में बहुतकुछ बयां करते हैं.

स्टार्टअप्स की भूमिका

केंद्र सरकार ने देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला उद्यमियों के सामने आने वाली चुनौतियों को दूर करने के लिए स्टैंडअप इंडिया और स्टार्टअप संबंधी कई योजनाएं शुरू की हैं. अब एक महिला उद्यमिता मंच पोर्टल का गठन करना एक प्रमुख पहल है जो नीति आयोग की एक प्रमुख पहल है. यह अपनी तरह का पहला एकीकृत पोर्टल है जो विभिन्न प्रकार की पृष्ठभूमि की महिलाओं को एक पटल और सुविधा प्रदान करता है.

महिलाओं को उद्यमिता के क्षेत्र में पांव रखने के लिए महिला स्टार्टअप महत्त्वपूर्ण है. अब महिलाओं ने पूरी उर्जा के साथ उद्यमिता के क्षेत्र में पांव जमाए हैं. बैन एंड कंपनी और गूगल के अनुसार, महिला उद्यमी 2030 तक लगभग

150-170 मिलियन नौकरियां पैदा करेंगी. एक आधिकारिक अनुमान के अनुसार, 2018-21 तक स्टार्टअप्स द्वारा लगभग 5.9 लाख नौकरियां पैदा की गईं. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से शुरू से ही उद्यमिता के बीज बोने का सार्थक प्रयास किया जा चुका है.

हाल ही में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़ में आयोजित दीक्षांत समारोह में 24 छात्रों को स्वर्ण पदक प्रदान किए गए. उन में से

16 लड़कियां थीं. यह सिर्फ एक विश्वविद्यालय की बात नहीं है. वे लगभग हर संस्थान में लड़कों से कहीं बेहतर कर रही हैं. उन में उत्कृष्टता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा और दृढ़ता है. ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ वर्ष के पहले भाग में ही केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 6-12 सितंबर के बीच केवल एक सप्ताह में 2,614 स्वयं सहायता समूह के उद्यमियों को सामुदायिक उद्यम निधि का 8 करोड़ 60 लाख रुपए का ऋण प्रदान किया.

स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के माध्यम से महिलाएं न केवल खुद को सशक्त बना रही हैं बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था की मजबूती में भी योगदान दे रही हैं. सरकार के निरंतर आर्थिक सहयोग से आत्मनिर्भर भारत के संकल्प में उन की भागीदारी दिनबदिन बढ़ती जा रही है.

पिछले 6-7 वर्षों में महिला स्वयं सहायता समूहों का अभियान और तेज हुआ है. आज देशभर में 70 लाख स्वयं सहायता समूह हैं. महिलाओं के पराक्रम को सम?ाने की जरूरत है, जो हमें महिमा की अधिक ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी. सो, हमें चाहिए कि हम उन्हें आगे बढ़ने और फलनेफूलने में उन की मदद करें.

मेरी पत्नी न ही मेरा और न नहीं मेरे बच्चों का ध्यान नहीं रखती है, ऐसे में मैं क्या कर सकता हूं?

सवाल

मैं 42 वर्षीय पुरुष हूं. अचानक से जिंदगी में एक के बाद एक ऐसी घटनाएं घट रही हैं कि हरदम तनाव में रहता हूं. लगता है हंसी आए बरसों हो गए. पत्नी से तलाक हो गया है. पिता की अचानक मृत्यु हो गई. नौकरी कभी भी छूट सकती है. कंपनी घाटे में चल रही है, इसलिए पिछले 3 महीने से तनख्वाह नहीं मिली. बच्चे बहुत छोटे हैं जिन की जिम्मेदारी मेरी है. मम्मी का साथ है, लेकिन उन की भी उम्र हो गई है. कब तक मेरा साथ देंगी वे. उन से जितना बनता है, करती हैं. वे घर देखती हैं, मेरे बच्चों को संभालती हैं. इन सब हालात ने मेरी मानसिक स्थिति को डांवांडोल कर दिया है. मैं बहुत स्ट्रैस में हूं. क्या करूं?

जवाब

कभीकभी जिंदगी में ऐसा फेज आता है लगता है चारों तरफ से मुसीबतें एक के बाद एक आ रही हैं. लेकिन सामना तो करना ही पड़ेगा. पिता की मौत का आप को गहरा सदमा लगा है, लेकिन आप को दिल मजबूत कर सोच को सकारात्मक रखना होगा. दूसरी नौकरी के लिए कोशिश कीजिए. आप में यदि काबिलीयत है तो दूसरी नौकरी मिलेगी. बस, कोशिश करना मत छोडि़ए. आर्थिक तंगी हो रही होगी, लेकिन किसी तरह उसे मैनेज कीजिए. थोड़े दिन कोई पार्टटाइम जौब कर लीजिए. कुछ ऐसा काम करें जो घर बैठ कर हो सके. इस से आप बच्चे संभालने में मम्मी की मदद कर सकते हैं.

नौकरी मिल जाए और पैसों की ज्यादा दिक्कत न हो तो कोई नैनी रख लें जिस से बच्चों की देखभाल हो सके. दूसरी शादी एक विकल्प हो सकता है लेकिन बच्चों के साथ दूसरी पत्नी कितना एडजस्ट करती है, कुछ कह नहीं सकते. ज्यादा स्ट्रैस मत लीजिए. स्ट्रैस का सीधा असर दिमाग पर पड़ता है. जिस की वजह से और परेशानियां बढ़ सकती हैं. चिंता मत कीजिए, वक्त के साथसाथ सब समस्याएं दूर होंगी. बस, नैगेटिविटी को अपने ऊपर हावी न होने दें. स्ट्रैस से दूर रहने के लिए सकारात्मक सोच रखें. अपनी कमजोरियों को स्वीकार करें. रोज सुबह ऐक्सरसाइज करें. अपने खानेपीने का ध्यान रखें. दोस्तों से मेलजोल बनाएं. बच्चों के साथ समय बिताएं. अपने उत्साहजनक व्यवहार से घर में अच्छा माहौल बना कर रखने की कोशिश करें. घर का खुशनुमा माहौल व्यक्ति में उत्साह भर देता है और अभी आप की उम्र ही क्या है. अपने में नया जोश भरिए और हर मुसीबत का डट का सामना कीजिए.

जितनी कीमत उतनी सुविधा

अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिस में दिखाया गया कि मुंबई एयरपोर्ट पर एक डोसा खाने के लिए 600 रुपये देने होंगे. बटर डोसा की कीमत 620 रुपए है. इस वीडियो को कैप्शन दिया गया- मुंबई एयरपोर्ट पर सोना, डोसे से भी सस्ता है. शेयर किए जाने के बाद वीडियो को लाखों बार देखा गया और 2 लाख से ज्यादा लाइक मिले. जाहिर है पैसे वाले लोग फ्लाइट पकड़ने से पहले महंगा होने के बावजूद लोग वहां जा कर खाने की बात जरूर सोचेंगे क्योंकि कई दफा कीमत से ज्यादा उस जगह की अहमियत होती है.

बात करें दुनिया के सब से महंगे रेस्टोरेंट की, तो यह है स्पेन का सब्लीमोशन रेस्टोरेंट. यहां सामान्य खाना खाने पर भी आप को करीब 2,000 डौलर का बिल चुकाना पड़ता है जो भारतीय रुपए में करीब 1,63,000 बनता है. सब्लीमोशन रेस्तरां स्पेन के इबिज़ा द्वीप पर बनाया गया है. इस पर बैठने के बाद आप को अपने मन के मुताबिक नजारा दिखेगा. दरअसल इस का इंटीरियर बेहद खास है जहां रोशनी और ध्वनि का सम्मोहक नजारा भी मौजूद है. यहां जाना अपनेआप में एक अलग अनुभव है.

इसी तरह हमारे यहां के कितने ही फाइवस्टार होटल्स और लग्जीरियस रेस्टोरेंट्स हैं जहां आ कर भोजन करने का अलग ही एहसास होता है. दरअसल ऐसी जगहों पर सिर्फ खाना ही लजीज नहीं होता बल्कि पूरा माहौल सुकून भरा, म्यूजिकल, हाइजीन युक्त, कंफर्टेबल और आंखों को भाने वाला होता है. कहीं गंदगी या मिसमैनेजमेंट नजर नहीं आता.

तभी तो अच्छे खाने की तलब हो या रोमांटिक डेट पर जाना हो, हर कोई एक अच्छे रेस्टोरेंट की तलाश में रहता है. जिस का इंटीरियर शानदार हो, आसपास का माहौल खुशनुमा हो और हाइजीन के साथ कायदे से परोसा हुआ लजीज खाना हो ताकि आप अपनी ये यादें ताउम्र न भूल पाएं.

हर इंसान अकसर कुछ ऐसा ही चाहता है और इसलिए वह बड़े रेस्टोरेंट्स का रुख करता है. यह महंगा हो तो भी खास मौकों पर हम ऐसी अच्छी जगह जा कर ही खाना पसंद करते हैं. हल्दीराम, सागर रत्न, आंध्र भवन, बुखारा, कौफी हाउस, सर्वना भवन, स्पाइस रुट, काके दा होटल , नैवैद्यम , सात्विक जैसे बहुत से बेहतरीन रेस्टोरेंट्स हैं जहां आप मनचाहा खाना खा सकते हैं. ये महंगे हैं मगर सर्विसेज देखते हुए पैसा देना अखरता नहीं.

कंफर्ट और हाइजीन का मूल्य

होटलों या रेस्टोरेंट्स में खाना महंगा होने के कई कारण हैं जैसे खाने में इस्तेमाल पदार्थों जैसे तेल, घी, मसाले, सब्जियां, मेवे इत्यादि की क्वालिटी बेहतर होती है. दूसरे जिस वातावरण में बैठ कर आप खा रहे हैं उस जगह की कीमत, साफसफाई, क्रौकरी, खाना पकाने वाले कुक का स्तर, ट्रेंड सर्व करने वाले लोग आदि पर भी काफी खर्च आता है. हमें एसी कमरे में आराम से खाने का मौका दिया जाता है.

तीसरे टैक्स यानी हर स्तर के होटल या रेस्टोरेंट पर टैक्स की दरें भिन्न होती हैं. जबकि सड़कों पर स्ट्रीट फ़ूड बेच रहे लोगों या ढाबे वालों को ऐसे खर्चे नहीं करने होते. हो सकता है एक ढाबे वाले का खाना किसी बड़े होटल के मुकाबले कहीं अधिक स्वाददार हो और खाना पकाने में बराबर ही खर्च होता हो परंतु होटलों में हम मिलने वाली सुविधाओं और हाइजीन का मूल्य चुकाते हें.

बड़ेबड़े होटल्स या रेस्टोरेंट्स में खाने के ऊपर इतना टैक्स लगता है कि उस की सामान्य कीमत से वह लगभग 4 गुना महंगा हो जाता है. यह भी एक वजह है कि वहां पर खाना महंगा मिलता है.

आप चाहें तो महंगे होटल में भी खा सकते हैं और आप चाहें तो सस्ते रोड पर बने होटलों/ढाबों में भी खा सकते हैं. अपनी आर्थिक स्थिति और परिस्थिति के हिसाब से इंसान जगह सैलेक्ट करता है. समोसे छोटे ढाबों या ठेलों पर 10-15 रुपए में मिल जाते हैं. वहीँ समोसा अच्छे रेस्टोरेंट्स में 50-60 रुपए में मिलते हैं.

बड़े होटल्स में ये और भी महंगे होते हैं. अगर दो लोग किसी फाइवस्टार होटल में रुकते हैं तो एक बार डिनर करने में आप को दो लोगों के लिए 5,000 से 6,000 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं.

महंगे होटल में जहां पर एक चाय/कौफी की कीमत 100-200 रुपए वसूली जाती है तो उस चाय को देने का तरीका, वहां की व्यवस्था और साफ सफाई इस लायक होती है कि इंसान इतने रूपए ख़ुशी से खर्च करे. जबकि सड़कों और ढाबों पर वही चाय 5-10 रुपए में मिलती है. वहां पर सफाई व्यवस्था नहीं होती है. गंदे हाथों से काम किया जाता है. गंदा पानी यूज होता है.

चायकौफी या खाना सर्व करने का कोई सही तरीका नहीं होता. बरतनों की भी ठीक से सफाई नहीं की जाती. चाय बनाने में पुरानी ही चाय पत्ती कई बार यूज होती है. इसी तरह समोसे, पकौड़े या कचौरियां आदि तलने में वही तेल बारबार इस्तेमाल होता है जिस का बुरा असर खाने वाले की सेहत पर हो सकता है. दोनों में यही मुख्य अंतर होता है. महंगे होटल में साफसफाई की व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है और सस्ते में इन सुविधाओं का लाभ नहीं मिलता है.

पांचसितारा होटलों में खाने की हरेक सामग्री स्टैंडर्ड क्वालिटी की ही आती है. यह भी ध्यान रखा जाता है कि ये सामग्रियां कहां से मंगवाई जा रही हैं. इन होटलों में आप की मांग के अनुसार आप को सिल्वर कटलरी भी उपलब्ध कराई जाती है. हर एक स्टाफ को खाना परोसने के तौरतरीकों के बारे में खास निर्देश होता है.

बेहतर है कि कुछ भी खाने का सामान खरीदने से पहले मेन्यू जरूर देख लें जिस पर कीमत लिखी होती है. अगर प्रोडक्ट की क्वालिटी अच्छी है और सर्विस में कमी नहीं रही तो फिर आप शिकायत भी क्या कर सकते हैं.

इन आधारों पर तय होती है कीमत

किसी बड़े होटल या रेस्टोरेंट कुछ बातों के आधार पर अपने मेन्यू का रेट तय करते हैं. जैसे कि जहां पर आउटलेट है उस जगह की कमर्शियल वैल्यू कितनी है. क्या उस डिश को किसी प्रोफेशनल ने बनाया है. यह भी देखते हैं कि कहीं वो डिश उस की सिग्नेचर डिश तो नहीं जिस के लिए कस्टमर से ज्यादा चार्ज लिया जाएगा.

खाद्य या पेय सामग्री को बनाने में किस तरह के इंग्रीडिएंट्स यूज हुए हैं और उन की क्वालिटी क्या है. कुछ चीजें इम्पोर्टेड भी हो सकती हैं. इस के अलावा पैक्ड चीजों के लिए जीएसटी भी देनी पड़ती है. साथ ही, होटल या रेस्टोरेंट की ओर से खाना परोसने और दूसरी सेवाओं के लिए सर्विस चार्ज लिया जाता है.

देशभर में चर्चा है भोपाली कुत्तों के आतंक की

जर्दा, पर्दा और गर्दा की अपनी पहचान खोता जा रहा भोपाल इन दिनों कुत्तों के आतंक के लिए सुर्ख़ियों में है. 16 जनवरी को एकदो नहीं बल्कि 45 लोगों को कुत्तों ने काट लिया. इस के 7 दिनों पहले ही कारोबारी इलाके एमपी नगर में महज डेढ़ घंटे में 21 लोगों को कुत्तों ने काटा था. छिटपुट घटनाओं की तो गिनती ही नहीं. लेकिन दहशत उस वक्त भी फैली थी जब अयोध्या इलाके में रहने वाले एक मजदूर परिवार के 7 महीने के मासूम को कुत्तों के झुंड ने घसीट कर काटकाट कर मार डाला था. उस बच्चे का एक हाथ ही कुत्तों ने चबा डाला था.

हर शहर की तरह भोपाल भी कुत्तों से अटा पड़ा है. कुत्तों की सही तादाद का आंकड़ा नगर निगम के पास भी नहीं लेकिन पालतू कुत्तों की संख्या केवल 500 है. इतने ही लोगों ने अपने पेट्स का रजिस्ट्रेशन कराया है वरना तो पालतू कुत्तों की तादाद 10 हजार से भी ज्यादा है. लेकिन नई समस्या पालतू या आवारा कुत्तों की संख्या से ज्यादा उन का आतंक है जिस का किसी के पास कोई हल या इलाज नहीं.

इलाज तो कुत्तों के काटे का भी सभी को नहीं मिल पाता क्योंकि डौग बाइट्स के बढ़ते मामलों के मद्देनजर अस्पतालों में एंटी रेबीज इंजैक्शनों का टोटा पड़ने लगा है. 10 जनवरी को कुत्ते के काटने के बाद जब 45 लोग एकएक कर जयप्रकाश अस्पताल पहुंचे थे तब कुछ को ही ये इंजैक्शन मयस्सर हो पाए थे.

कुत्तों का आतंक हालांकि पूरे देश और दुनिया में है लेकिन भोपाल के हादसों ने सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा है सिवा सरकार और नगर निगम के, जिन का तर्क यह है कि हम कुत्तों पर कोई कार्रवाई करें तो झट से डौगलवर्स आड़े आ जाते हैं. इन में भी युवतियों की तादाद खासी है. जैसे, नगर निगम अमला आवारा कुत्तों के खिलाफ कोई ऐक्शन लेता है तो ये पेटलवर्स जाने कहां से टपक पड़ते हैं. बीती 14 जनवरी को जब नगर निगम की टीम आवारा कुत्तों को पकड़ने पिपलानी इलाके पहुंची तो एक डौगलवर युवती उस से भिड़ गई और झूमाझटकी भी की. नगर निगम ने इस युवती के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. जान कर हैरानी होती है कि भोपाल में कोई 7 डौगलवर्स के खिलाफ अब तक नगर निगम अमला एफआईआर दर्ज करा चुका है.

तो क्या करें इन कुत्तों का ?

जाहिर है कुत्ताप्रेमियों का विरोध कुत्ता पकड़ो मुहिम में बाधा बनता है. कई एनजीओज तो बाकायदा कुत्ताप्रेम से फलफूल रहे हैं. इन की रोजीरोटी ही कुत्ताप्रेम है. इन लोगों को उन मासूमों की मौत से कोई लेनादेना नहीं जिन्हें कुत्तों ने बेरहमी से काटकाट कर और घसीटघसीट कर मार डाला. आवारा और पालतू कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है तो इस की बड़ी वजह कुत्तों की नसबंदी न हो पाना भी है जो आसान काम नहीं. लेकिन इस बाबत तो स्थानीय निगमों को जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी कि वे ढिलाई बरतते हैं और हरकत में तभी आते हैं जब हादसे बढ़ने लगते हैं.

लाख टके का सवाल जो मुंहबाए खड़ा है वह यह है कि इन कुत्तों का क्या किया जाए. इन्हें मारो तो दुनियाभर के लोगों की संवेदनाएं और कानून आड़े आ जाते हैं और न मारो तो बेकुसूर लोग परेशान होते हैं. कई मासूमों की मौत ने तो इस चिंता को और बढ़ा दिया है. जहां नजर डालें, चारों तरफ यत्र तत्र सर्वत्र की तर्ज पर कुत्ते ही कुत्ते हैं.

धर्म भी कम जिम्मेदार नहीं

कुत्तों के हिंसक होने की कोई एक वजह नहीं होती. भोपाल के हादसों के बीच कुछ ज्ञानियों ने मौसम को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की लेकिन यह दलील लोगों के गले नहीं उतरी. असल में लोगों की धार्मिक मान्यताएं भी इस की जिम्मेदार हैं जो यह कहती हैं कि कुत्तों को शनिवार के दिन खाना खिलाने से जातक पर शनि और राहू का प्रकोप नहीं होता. भोपाल में जगहजगह ऐसे दृश्य देखने को मिल जाते हैं जिन मे राहू-शनि पीड़ित समारोहपूर्वक कुत्तों का भंडारा कर रहे होते हैं.

भोपाल के ही शिवाजी नगर इलाके में हर शनिवार की शाम एक बड़ी कार रुकती है तो कुत्ते जीभ लपलपाते उस की तरफ लपक पड़ते हैं. इस गाडी से 2 सभ्य अभिजात्य से सज्जन उतरते हैं और कुत्तों को बिस्कुट, रोटी, ब्रेड वगैरह खिलाते हैं और इतने प्यार से खिलाते हैं कि पलभर को आप यह भूल जाएंगे कि इन कट्खने कुत्तों की वजह से औसतन 5 लोग रोज अस्पतालों के चक्कर काटते हैरानपरेशान होते हैं. कहना तो यह बेहतर होगा कि इन धर्मभीरुओं की वजह से लोग तकलीफ उठाते हैं और पैसा भी बरबाद करने को मजबूर होते हैं.

कुत्तों के इस सामूहिक और सार्वजनिक भोज के नज़ारे में दिलचस्प बात यह भी है कि इस वक्त कुत्ते बिलकुल इंसानों की तरह अपनी बारी आने का इंतजार इतनी शांति और अनुशासन से करते हैं कि लगता नहीं कि ये वही कुत्ते हैं जो बड़ी चालाकी से घात लगा कर राह चलते लोगों की पिंडली अपने दांतों में दबा लेते हैं या फिर ग्रुप बना कर भोंभों करते ऐसे झपट्टा राहगीरों और गाड़ियों पर मारते हैं कि नास्तिक से नास्तिक आदमी भी भगवान को याद करने लगता है और जान बच जाने पर कम से कम सवा रुपए का प्रसाद भी नजदीकी हनुमान या शंकर मंदिर में चढ़ा देता है.

नेताओं के प्रिय कुत्ते

इस में शक नही कि गाय के साथ साथ कुत्ता आदिम काल से ही आदमी का साथी और पालतू रहा है. महाभारत काल में तो कुत्ता पांडवों के साथ स्वर्ग तक गया था. हुआ यों था कि धर्मराज के ख़िताब से नवाजे गए युधिष्ठिर के लिए जब स्वर्ग का दरवाजा खुला तो वे अड़ गए कि जाऊंगा तो कुत्ता ले कर ही, वरना नहीं जाऊंगा. अब भला कहां कुत्ता सरीखा निकृष्ट प्राणी और कहां स्वर्ग. बात बिगड़ने लगी तो उपन्यासकार वेद व्यास ने सुखान्त के लिए यह बताते सस्पैंस खत्म किया कि दरअसल उस कुत्ते के भेष में यमराज ही थे जो युधिष्ठिर की परीक्षा ले रहे थे.

यानी, पौराणिक काल से ही कुत्ता आम के साथसाथ खास लोगों और शासकों का प्रिय रहा है. मौजूदा दौर में कई नेताओं का कुत्ताप्रेम अकसर खबर बनता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रिय कुत्ता कालू तो इंटरनैट सैलिब्रिटी कहलाता है. यह लेब्राडोर नस्ल का कुत्ता गोरखपुर में उन के मठ में रहता है और पनीर खाने का शौक़ीन है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी कुत्तों के शौक़ीन हैं. उन के नए कुत्ते का नाम नूरी है जो उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी को कर्नाटक चुनाव के दौरान तोहफे में दिया था. इस कुत्ते की नस्ल जैक रसेल टेरियर है. यहां बताना प्रासंगिक है कि इस कुत्ते (संभवतया कुतिया) का नाम नूरी रखने पर एआईएमआईएम के एक नेता मोहम्मद फरहान ने इसे लाखों मुसलिम युवतियों की बेइज्जती बताया था जिन का नाम नूरी है.

भोपाल के हादसों के बाद साध्वी उमा भारती ने भी पेटलवर्स को लताड़ लगाई थी. कुत्तों के आतंक से बचने के लिए उन्होंने कुत्तों के लिए अलग से अभयारण्य बनाने की बात कही थी. मुमकिन है, अब गौशालाओं की तर्ज पर कुत्ताशालाएं खुलने की मांग उठने लगे.

लेकिन हल यह है

देशभर में कुत्तों के काटने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के ताजे आंकड़ों के मुताबिक साल 2023 में 27 लाख 50 हजार लोगों को कुत्तों ने काटा था. यह एक चिंताजनक आंकड़ा है क्योंकि इन में से 20 हजार लोग रेबीज से मरे. ऐसे में कोई वजह नहीं कि कुत्तों से हमदर्दी रखी जाए लेकिन उन्हें मार देना भी हल नहीं. बेहतर तो यह होगा कि लोग कुत्ते पालना बंद करें, इन्हें खाना देना बंद करें, अपने धार्मिक अंधविश्वास छोड़ें. इं सब से समस्या खत्म भले न हो लेकिन कम तो जरूर होगी.

जातीय और धार्मिक उन्माद तो नहीं आत्महत्या के कारण

फातिमा लतीफ, डाक्टर पायल तडवी, रोहित वेमुला ये उन छात्रों के नाम हैं जो अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक तबकों से आते हैं. पढ़ाई पूरी करने के लिए उच्च शिक्षा संस्थान में पहुंचे लेकिन इन्होंने आत्महत्या कर ली.

कानपुर आईआईटी में 30 दिनों के अंदर आत्महत्या की तीसरी घटना घट गई. 20 दिसम्बर को शोध की छात्रा डाक्टर पल्लवी चिल्का, 10 जनवरी को एमटेक अंतिम साल के छात्र विकास मीना ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. 18 जनवरी को कैमिकल इंजीनियरिंग में शोध कर रही छात्रा प्रियंका जायसवाल ने फांसी लगा कर जान दे दी.

प्रियंका हौस्टल नम्बर ई-1, कमरा नम्बर 312 में रहती थी. जब घर वालों ने प्रियंका के फोन पर कौल की और बात नहीं हो सकी तब हौस्टल के नम्बर पर बात की गई. हौस्टल वालों ने कमरे में जा कर देखा तो प्रियंका का शव लटक रहा था. इन छात्रों ने आत्महत्या क्यों की इस बात का खुलासा नहीं हो पाता है. जिस वजह से कोई सुधार नहीं हो पा रहा. घर परिवार किसी तरह से अपने दुख को भुलाने की कोशिश कर रहे हैं. जिस से नई घटना को रोकने की दिशा में कोई काम नहीं हो पा रहा है.

छात्रों की आत्महत्या के कारण खोजना जरूरी

हमारे देश में हर साल आत्महत्या के कारण एक लाख से अधिक जानें चली जाती हैं. पिछले दो दशकों में आत्महत्या की दर प्रति 100,000 पर 7.9 से बढ़ कर 10.3 हो गई है. भारत में अधिकांश आत्महत्याएं 37.8 फीसदी 30 वर्ष से कम उम्र के लोगों द्वारा की जाती हैं. युवाओं की संख्या अधिक है.

आत्महत्या के कारणों में कैरियर, तलाक, दहेज, प्रेम संबंध, शादी करने में असमर्थता, नाजायज गर्भावस्था, विवाहेतर संबंध, सामाजिक और जातीय भेदभाव, धार्मिक भी होते हैं. गरीबी, बेरोजगारी, कर्ज और शैक्षणिक समस्याएं भी आत्महत्या से जुड़ी हैं. छात्रों में शिक्षण संस्थानों में ऐसे कारण भी देखने को मिलते हैं जहां जाति और धर्म को ले कर टिप्पणियां की जाती हैं. हमारे देश में मेंटल हैल्थ पर कम काम किया जाता है. एक अरब से अधिक की आबादी के लिए केवल 5,000 मनोचिकित्सक हैं.

शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या करने वाले छात्रों का अध्ययन नहीं किया जाता है. केवल एक घटना समझ कर भुला दिया जाता है. कोटा जैसे शहर में जहां पर एक साल में 35 छात्रों ने आत्महत्या की. अब सरकार कोचिंग संस्थाओं के लिए नियमकानून बना रही है. सरकार के ताजा कानून के मुताबिक 16 साल से कम उम्र के बच्चे को कोचिग संस्थान प्रवेश नहीं दे सकते हैं. इस के अलावा यह भी देखना होगा कि क्या जातीय और धार्मिक भेदभाव छात्रों की आत्महत्या के लिए जवाबदेय हैं.

छात्रों की आत्महत्या को केवल परीक्षा में कम नंबर, खराब प्रदर्शन, कम अटेंडेंस और दिमागी तनाव को मान कर नहीं चला जा सकता है. आईआईटी मद्रास की छात्र फातिमा ने कुछ समय पहले आत्महत्या कर ली थी. फातिमा के पिता अब्दुल लतीफ ने आत्महत्या के लिए संस्थान के एक प्रोफेसर को जिम्मेदार बताया और उन की गिरफ्तारी की मांग की. फातिमा की मां ने कहा कि उन की बेटी मुसलमान के तौर पर अपनी पहचान जाहिर नहीं करना चाहती थी इसलिए वो हिजाब या शौल नहीं पहनती थी. देश के माहौल को देख कर हमें लगा था कि उसके लिए चेन्नई एक सुरक्षित जगह होगी. लेकिन हम ने उसे खो दिया.

फातिमा के पिता का कहना था कि वो आत्महत्या करने वाली नहीं थी. वो अफसर बनना चाहती थी. उस की मौत आत्महत्या नहीं लगती. उसे रस्सी कहां से मिल गई? उस की मौत के तुरंत बाद कमरा साफ क्यों कर दिया गया? उस का मोबाइल पुलिस के पास है, वो चिट्ठियां लिखने वाली इंसान थी. कुछ भी फैसला लेने से पहले उस ने जरूर पूरी बात लिखी होगी. यह मामला काफी उछला था.

बड़ेबड़े कैंपस में छात्रों के साथ जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर भेदभाव होता है. एक खास जाति के लोग दूसरों पर हावी होने की कोशिश करते हैं. इस तरह की खबरें आती रहती है. डा. पायल तडवी पर जातिवादी टिप्पणी होती थी. मुंबई में डाक्टर पायल तडवी की खुदकुशी के मामले में जब उन का सुसाइड नोट सामने आया तो खतरनाक सच सामने आया. 3 पेज के सुसाइड नोट में पायल तडवी ने अपने मातापिता को लिखे खत में अपने दर्द और अपने साथ हो रही ज्यादतियों का विस्तार से जिक्र किया था.

पायल तडवी ने लिखी पूरी बात

पायल तडवी ने लिखा था कि ‘मम्मीपापा मुझे वास्तव में अपनी जान लेने का बहुत खेद है. मैं जानती हूं कि मैं आप के लिए कितनी खास हूं और आप लोग ही मेरी दुनिया हो. लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि यह असहनीय हो गया है. मैं उन के साथ एक मिनट भी नहीं रह सकती हूं.’
डाक्टर पायल तडवी ने हौस्टल के कमरे में खुदकुशी की थी और इस मामले में तीन वरिष्ठ डाक्टरों को गिरफ्तार किया गया था.

इन आरोपी डाक्टरों का जिक्र डाक्टर तडवी ने अपने आखिरी खत में भी किया है. डाक्टर तडवी ने लिखा, ‘पिछले एक साल से इस उम्मीद से मैं उन से सुने जा रही थी कि यह सब खत्म हो जाएगा लेकिन मैं अब केवल अंत देख रही हूं. वास्तव में इस से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है, मुझे इस से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखा.’

नायर हौस्पिटल के स्त्री रोग विभाग के बारे में पायल तडवी ने लिखा है, जहां वह काम करती थीं. सुसाइड नोट में लिखा है, ‘यहां मेरे साथ और हमारे समर्थन में कोई खड़ा नहीं हुआ. मैं हमेशा स्त्री रोग विशेशज्ञ बनना चाहती थी लेकिन मुझे कालेज में खाना पकाना पड़ा.’

पायल ने लिखा, शुरू में मैं और स्नेहल ने किसी से कुछ नहीं कहा. लेकिन यातना उस स्तर तक जारी रही कि मैं सहन नहीं कर सकती थी. मैं ने उन के खिलाफ शिकायत की लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा. मैं ने अपनी पेशेवर जिंदगी, निजी जिंदगी सब खो दिया. आगे वह लिखती हैं कि जब तक वे नायर हौस्पिटल में हैं, मुझे कुछ नहीं सीखने देंगी. पिछले 3 सप्ताह से मुझे लेबर रूम में नहीं जाने दिया गया क्योंकि वो मुझे काबिल नहीं मानती थीं. मुझे ओपीडी में लेबर रूम से बाहर रहने के लिए कहा गया. मरीजों को देखने के बजाय क्लर्किल वर्क दिया गया.’

इस के अलावा डा तडवी ने लिखा, ‘मैं हेमा आहूजा, भक्ति मेहरा और अंकिता खंडेलवाल को अपनी और स्नेहल की हालत के लिए जिम्मेदार ठहराती हूं. मैं ने बहुत कोशिश की. कई बार आगे आई, मैडम से बात की लेकिन कुछ नहीं किया गया. मुझे सचमुच कोई रास्ता नहीं दिखा. डाक्टर तडवी ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, इस कदम को उठाने के लिए माफी मांगती हूं. अपनी दोस्त के बारे में काफी सोचा, मैं नहीं जानती कि कैसे स्नेहल इन 3 का सामना करेगी. मैं उसे उन के सामने छोड़ने पर डरी हुई हूं.

कैंपस में आत्महत्या के मसलो को ऐसे ही छोड़ देना खतरनाक होता जा रहा है. ज्यादातर मसलों में सचाई दबाने की कोशिश की जाती है. कानपुर आईआईटी में 30 दिनों में तीसरी आत्महत्या को गहराई से देखना होगा. जिस तरह का माहौल जाति और धर्म को ले कर सोशल मीडिया और कैंपस में चल रहा है कहीं उस की वजह से तो ये घटनाएं नहीं हो रहीं. देश में एक धार्मिक उन्माद सा है. जिस में एससी और ओबीसी छात्रों पर आरक्षण को ले कर टिप्पणियां होती रहती हैं. कहीं यह कारण तो नहीं बन रहे. इन पर गहराई से विवेचना करना होगा.

फूलों को तोड़ें नहीं सहेजें

आप शायद जानते न हों कि हमारा भारत करीब 20 देशों को 500 से अधिक प्रकार के फूलों का निर्यात करता है. बाकायदा इन फूलों की खेती होती है ताकि इन्हें तोड़ कर दूसरे देशों में भेजा जाए.

खुद भारत के अंदर भी फूलों का व्यापार बड़ी तेजी से फलफूल रहा है. जहां देखिए आप को फूलों के बुके, माले या खुले फूल बिकते मिल जाएंगे. इन को खासी कीमत पर बेचा जा रहा है. जबकि गौर फरमाइए उन फूलों पर जो घरों में गमलों में लगे होते हैं या सड़कों के किनारे, पार्कों में या दूसरी जगह शोभा बढ़ा रहे होते हैं. वे हमें कितना सुकून और ताजगी का एहसास कराते हैं. फूलों के बीच इंसान खुद को जीवंत महसूस करता है. इन की खुशबू हमें अपनी तरफ खींचती है. फूलों की घाटियां इसी वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहती हैं. मगर जब इन्हें तोड़ लिया जाता है तो ये मूक संवेदना के साथ जिंदगी से हार मान लेते हैं और सूख जाते हैं.

वैसे भी टूटी हुई चीजें कभी भी सुकून या उत्साह का संचार नहीं करतीं. फिर हम यह बात क्यों नहीं समझते कि फूलों को तोड़ कर हम उन के द्वारा फैलाई जा रही सकारात्मकता का नाश कर देते हैं.

हम अपने प्रिय लोगों को या आदरवश किसी को बुके गिफ्ट करते हैं. पर उस से क्या होता है? अगले ही सैकंड वह इंसान उस बुके को किनारे रख देता है. शाम तक वह बुके यों ही पड़ा रहता है और रात होतेहोते उस के फूल मुरझाने लगते हैं. अगले दिन वह बुके कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है. इस तरह कचरे के रूप में उस का वजूद ख़त्म हो जाता है. इस के विपरीत यदि आप उन फूलों को अपने पौधों पर लगा रहने दें तो क्या यह सच नहीं कि वे 10-15 दिन अपनी खुशबू बिखेरेंगे और माहौल को खुशनुमा बनाए रखेंगे.

इसी तरह कोई नेता कहीं जाता है तो लोग उस के स्वागत में सड़कों पर फूल बिछा देते हैं. उस के ऊपर पुष्पवर्षा होती है. पर इस का औचित्य क्या है? फूलों को तोड़ कर सड़कों पर क्यों बिखेर रहे हैं?

शादी समारोहों में फूलों की बरबादी

भारत में लोग शादी समारोहों को खास बनाने के लिए न जाने कितनी चीजों की बरबादी कर देते हैं. इसी में एक है फूलों की बरबादी. घर और मंडप सजाने में जाने कितने टन फूलों का उपयोग हो जाता है. आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल एक करोड़ से अधिक शादियां होती हैं और ये सभी शादियां इस्तेमाल किए गए फूलों, प्लास्टिक कटलरीज और बड़ी मात्रा में भोजन आदि के रूप में कितना ही कचरा पीछे छोड़ती हैं. जरूरी है कि हम विवाह समेत अन्य आयोजनों में फूलों की बरबादी करने से बचें.

पूजा के नाम पर टूटते फूल

भारत में प्रतिदिन पूजा स्थलों के आसपास इतने अधिक फूलों की बरबादी होती है जिस का कोई ठिकाना नहीं. कभी मूर्तियों पर चढाने के लिए मालाओं के रूप में, कभी मंदिरों की सजावट में और कभी मूर्तियों पर अर्पित करने के लिए. भारत में पूजास्थलों के आसपास प्रतिदिन 20 टन से अधिक फूल बरबाद हो जाते है. भला किसी ने कब कहा कि फूलों को तोड़ कर मेरे ऊपर चढ़ाओ और फिर टूटने की वजह से एक दिन में ही मुरझाए हुए इन सूखे फूलों को नदियों में बहाओ या जमीन पर यहांवहां फेंक कर कचरा बढ़ाओ.

टूटे फूलों से बढ़ता नदियों का प्रदूषण

भारत में देशभर में फैले छोटेबड़े हजारों उपासना स्थल हैं और वहां रोजाना श्रद्धालु मिठाइयों और फलों के अलावा टनों की मात्रा में फूल भी चढ़ाते हैं. एक बार जब पूजा समाप्त हो जाती है तो ये फूल और मालाएं बेकार हो जाती हैं.

इन पूजा के फूलों को नदियों में फेंक दिया जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि अंधविश्वास वश हमारे यहां सूखे फूलों को भी पवित्र माना जाता है और उसे कचरे में फेंकना पसंद नहीं करते. इसलिए उसे जल में प्रवाहित किया जाता है.

इस की वजह से नदियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है. वे हानिकारक रसायन भी छोड़ते हैं जिन की वजह से हमारे वनस्पति और जीव भी प्रभावित होते हैं. आप को यह जान कर हैरानी होगी कि जल और जमीन पर प्रदूषण फैलाने में इन का सब से बड़ा योगदान है.

एक अनुमान के मुताबिक अकेले गंगा नदी में हर साल मंदिरों और मसजिदों पर चढ़ाए गए 80 लाख मीट्रिक टन फूल डंप किए जाते हैं. जहां आसपास नदी नहीं है वहां पर इन फूलों को खुले में छोड़ दिया जाता है या फिर जमीन में गाड़ दिया जाता है. जाहिर है, इस की वजह से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, वायु और मिट्टी प्रदूषित होते हैं.

इस बरबादी को रोकने का एक उपाय फूलों को रीसाइकल करने की तकनीक का इस्तेमाल भी हो सकता है.

इस के अलावा जो सब से महत्त्वपूर्ण है वह यह कि हम फूलों को तोड़ें नहीं. फूलों के बगीचों को सहेजें, अपने घर और आसपास फूलों के पौधे लगाएं ताकि माहौल खुशनुमा रहे.

Diabetes : बढ़ते Sugar Level से हैं परेशान, तो कंट्रोल करने के लिए पिएं ये हेल्दी ड्रिंक्स

Drinks to control Blood Sugar Level in Diabetes : बदलती लाइफस्टाइल और अस्वस्थ खानपान का सबसे ज्यादा असर हमारी सेहत पर पड़ता है. इससे न सिर्फ हम खुद ही कई समस्याओं को न्योता देते हैं, बल्कि उनका शिकार भी हो जाते हैं. डायबिटीज भी इन्हीं समस्याओं में से एक है. यह एक लाइलाज बीमारी है, जो शरीर में ब्लड शुगर लेवल को प्रभावित करती है. अचानक से ब्लड शुगर के बढ़ने या घटने से तबीयत भी बिगड़ सकती है. ऐसे में जरूरी है कि आप हमेशा अपने ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखें.

आज हम आपको कुछ ऐसे हेल्दी ड्रिंक्स (Drinks to control Blood Sugar Level in Diabetes) के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके सेवन से आपको ब्लड शुगर को सामान्य रखने में मदद मिलेगी.

ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए पिएं ये ड्रिंक्स

दालचीनी की चाय

खाने में स्वाद बढ़ाने वाली दालचीनी डायबिटीज (Drinks to control Blood Sugar Level in Diabetes) मरीजों के लिए इंसुलिन का काम करती है. दरअसल, दालचीनी में प्राकृतिक तत्व होते हैं, जो ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रण में रखती है.

करेले का जूस

कड़वा करेले का जूस डायबिटीज मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होता हैं. करेले में विटामिन-सी, आयरन, पोटैशियम और जिंक आदि पोषक तत्वों की उच्च मात्रा होती है, जिससे ब्लड शुगर कंट्रोल में रहता है.

ग्रीन टी

डायबिटीज मरीजों के लिए ग्रीन टी पीना लाभदायक होता है. इसे पीने से शरीर में ब्लड ग्लूकोज की मात्रा कम होती है. साथ ही शरीर में ताजगी आती है.

मेथी का पानी

पीले मेथी में फाइबर की उच्च मात्रा होती है. इसलिए रोजाना खाली पेट मेथी का पानी पीने से ब्लड शुगर (Drinks to control Blood Sugar Level in Diabetes) कंट्रोल में रहता है.

नारियल पानी

नारियल पानी पीने से डायबिटीज मैनेजमेंट में काफी मदद मिलती है. ये जितना हाइड्रेट होता है उतना ही इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स की कम मात्रा होती है, जिससे शरीर में ब्लड शुगर लेवल नहीं बढ़ता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

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