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थायराइड के क्या हैं लक्षण, इसे कंट्रोल करने में फायदेमंद हैं ये फूड

Thyroid Awareness Month 2024 : आज के समय में थायराइड एक ऐसी समस्या बन गई है, जो किसी भी उम्र में किसी को भी अपनी चपेट में ले रही हैं. यह बीमारी थायराइड ग्रंथि के बढ़ने के कारण होती है, जो शरीर की कई अहम गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं. इसके अलावा अक्समात वजन बढ़ने या हार्मोंस में गड़बड़ी के कारण भी थायराइड की परेशानी हो सकती है.

हालांकि उम्र के साथ महिलाओं में थायराइड बढ़ने या कम होने की दिक्कत होना आम बात है, लेकिन जिस तरह से छोटे-छोटे बच्चों व युवाओं को भी ये समस्या अपनी चपेट में ले रही है, वो चिंता की बात है. इसलिए जरूरी है कि समय रहते आप थायराइड के लक्षण (Thyroid Symptoms) को पहचानें और अपनी डाइट में उन चीजों को शामिल करें, जिससे थायराइड होने की संभावना को कम किया जा सके.

थायराइड के लक्षण

  • घबराहट
  • नींद में कमी
  • चिड़चिड़ापन
  • पसीना आना
  • हाथ-पैरों में कंपन
  • मांसपेशियों में दर्द
  • बार-बार भूख लगना
  • पीरियड्स में अनियमितता
  • अक्समात वजन कम होना
  • बहुत ज्यादा बालों का झड़ना
  • बार-बार हार्ट बीट का तेज होना

इन चीजों से कंट्रोल करें थायराइड

आंवला

आंवले में विटामिन सी की भरपूर मात्रा होती है. इसी वजह से थायराइड (Thyroid Control Tips) को कंट्रोल करने के लिए आंवले खाने की सलाह दी जाती है. इससे न सिर्फ इम्यूनिटी मजबूत होती है. साथ ही शरीर में ब्लड सर्कुलेशन भी अच्छा रहता है, जिससे थायरॉइड होने का खतरा भी बहुत ज्यादा कम हो जाता है.

डेयरी प्रोडक्ट्स

थायराइड के मरीजों को अपनी डाइट में दूध, दही और पनीर आदि डेयरी प्रोडक्ट्स को जरूर शामिल करना चाहिए. दरअसल डेयरी प्रोडक्ट्स में विटामिन, मिनरल्स और कैल्शियम आदि पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है, जिससे शरीर स्वस्थ रखता है.

मुलेठी

मुलेठी में मौजूद पोषक तत्व थकान और कमजोरी की समस्या को दूर करते हैं. इसलिए थायराइड की समस्या में मुलेठी खाना बहुत ज्यादा फायदेमंद होता है.

सोयाबीन

डाइट में टोफू, सोया मिल्क और सोयाबीन को शामिल करने से शरीर में हार्मोन बैलेंस रहता है. इसके अलावा सोया प्रोडक्ट खाने से बॉडी में आयोडीन का स्तर और थायराइड भी कंट्रोल होता है.

नारियल

थायरॉइड (Tips to Control Thyroid) से ग्रसित मरीजों को अपनी डाइट में नारियल को जरूर शामिल करना चाहिए. नियमित रूप से कच्चा नारियल खाने से मेटाबॉलिज्म मजबूत होता है और थायरॉइड कंट्रोल में रहता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

इस तरह पढ़ाई के साथ स्किल्स भी सिखाएं अपने बच्चों को

जीवन में पढ़ाई की बहुत अहमियत है, इस से आप जानकारी हासिल करते हैं पर पढ़ाई के साथसाथ उन व्यावहारिक स्किल्स का होना जरूरी है जो आप के नागरिक होने और बेहतर कैरियर के लिए बेहद जरूरी हैं. दिल्ली के कीर्ति नगर इलाके में रहने वाला 19 वर्षीय रिषभ शुरू में पढ़ाई में अच्छा था. 8वीं तक हर क्लास में अच्छे मार्क्स भी लाया करता था. पढ़ाई में अच्छा होने के चलते उस के मातापिता उसे उन बच्चों से दूर रखने लगे थे जो क्लास के या तो कमजोर स्टूडैंट्स में गिने जाते थे या एवरेज.

वे मानते थे कि अगर वह बाकी बच्चों से घुलेमिलेगा तो उन का प्रभाव रिषभ पर पड़ने लगेगा और वह भी पढ़ाई में कमजोर हो जाएगा. इसी कारण उस की कालोनी में उस के कम ही दोस्त बन पाए थे. वह अधिकतर समय किताबों के साथ रहता या अकेला घर में समय बिताता. उसे किसी तरह की दिक्कत न आए, इस के लिए उस के मातापिता ने घर में ही होम ट्यूशन लगा रखी थी. यह सही है कि छोटे बच्चों के लिए शुरू में मातापिता दोस्त जैसे होते हैं क्योंकि बच्चों की केयरिंग करने की जरूरत होती है पर उम्र बढ़ने के साथ बच्चे को कुछ तरह की जिम्मेदारी और अधिकार मिलना या उसे खुद पर निर्भर रहना सिखाना अच्छा होता है.

यह बात उस के मातापिता समय रहते नहीं सम?ा पाए. ऐसा होने से रिषभ इंट्रोवर्ट बनता चला गया. उस की उम्र के बच्चे उस के दोस्त न होने से वह उन ऐक्टिविटीज में पार्टिसिपेट करने से घबराता रहा जहां वह कई चीजें एक्सप्लोर कर सकता था, नए स्किल्स डैवलप कर सकता था. वह न तो स्पोर्ट्स में था, न स्कूल के डांस कंपीटिशन में भाग लेता, न किसी ड्रमैटिक सोसाइटी का हिस्सा. उस के भीतर कौन्फिडैंस की कमी आने लगी. दबासहमा सा रहने के चलते 12वीं तक आतेआते उस की पढ़ाई पर भी असर पड़ने लगा. विकासपुरी में रहने वाले आदर्श के साथ मामला उलट था. आदर्श बचपन से हाजिरजवाबी में तेज था.

हाजिरजवाब होना गलत नहीं पर मातापिता का इस बात पर अत्यधिक गर्व करना और उसे पुचकारना उस के हौसले को गलत दिशा में ले जाता रहा. उस की हाजिरजवाबी बदतमीजी में बदलते देर नहीं लगी. आदर्श धीरेधीरे घर आए मेहमानों, स्कूल टीचरों, आसपड़ोसियों से भी बदतमीजी से बात करने लगा. एक बार शंतो आंटी घर आई थीं. जैसे ही आंटी ने उस से पूछा कि पढ़ाई कैसी चल रही है बेटा, आदर्श ने आव देखा न ताव तुरंत कहा, ‘‘आप के बेटे को पढ़ाई में दिक्कत है, मु?ो नहीं. उस की चिंता करो.’’ आदर्श के इस जवाब से आसपास सब हंसने लगे.

शंतो आंटी भी भले ऊपरी मन से मुसकरा दीं लेकिन अंदरअंदर उन्हें बहुत बुरा लगा. जैसेजैसे आदर्श बड़ा हुआ, उस में एक अलग तरह का व्यवहार पैदा होने लगा. वह दूसरे की सुनने की जगह अपनी कहने पर ज्यादा जोर देने लगा. दूसरे की ओपिनियन जाने बगैर अपनी बात कह जबरदस्ती थोपना उस की आदत बन गई. जब कभी कोई दूसरा लौजिकल बात कहता, भले उसे अंदर से वह बात ठीक लगे पर वह नकार देता, क्योंकि किसी और की बात पर सहमति देना उसे पसंद नहीं था. वह दूसरे की सही बात पर चिड़चिड़ा जाता और आवाज को तेज रख कर दूसरे की बात को दबाने की कोशिश करता. बहुत बार इसी कारण उस के कई दोस्त नहीं बन पाए.

उस के आसपास के लोग भी उस से कन्नी काटने लगते. दूसरों को सुनने की भी एक कला होती है जो आदर्श में बिलकुल डैवलप नहीं हो पाई थी, जो उस के कैरियर को नुकसान पहुंचाता रहा. शांतनु को ऐसी कोई समस्या नहीं थी. उस के दोस्त थे. दूसरे की बातों को ठीक से सुनता भी था, घूमता भी था. वह ऊलजलूल बहसों में नहीं फंसता था पर शुरू से जिस चीज की कमी उस में थी वह लीडरशिप क्वालिटी की थी. स्कूल में वह हर जगह तो था पर गायब तरीके से. उस की प्रैजेंस उस के दोस्तों के बीच सब से लास्ट में थी. क्लास में भी वह न अच्छे स्टूडैंट, न बुरे स्टूडैंट, कहीं बीच में इन्विजिबल टाइप सिचुएशन में था. वह हर बार ओपिनियनलैस सिचुएशन में रहता था. जब कभी किसी बात पर अपनी राय देने की बारी आती, वह चुप हो जाता. उस में सहीगलत का स्टैंड लेने की हिम्मत नहीं थी.

ज्यादा लोग जिस तरफ के लिए हां कह दें उसी तरफ वह मूव कर जाता, भले बात सही हो या गलत. स्कूल से ले कर कालेज तक में वह न तो किसी बात की शुरुआत का बिंदु बन पाया न अंत करने का कारण. सही स्टैंड न लेने और बातबात पर यहांवहां मूव करने के चलते उस के ग्रुप में उसे ‘लोटा’ कह कर पुकारने लगे थे. निर्णय न लेने की क्षमता के चलते उसे जौब में भी खासी दिक्कत आई. उस की ग्रोथ बढ़ नहीं पाई. धृति की तो कहानी ही अलग थी. घर में पूरा परिवार ही धार्मिक था. परिवार में सारे धार्मिक आयोजन कट्टरता से फौलो किए जाते. किशोर अवस्था में पहुंची तो बेमतलब व्रतउपवास के चक्करों में पड़ गई. नवरात्र में माता, जन्माष्टमी में राधा बनना तो हर साल की बात हो गई थी. इलाके में होने वाले जागरण में देररात तक जागना, कीर्तनों, पाठों, कथाओं में जाना, परिवार के साथ धार्मिक बाबाओं के प्रवचन सुनने उन के आश्रमों में जाना सामान्य बात होने लगी.

इस से हुआ यह कि पूजापाठी होने से धृति को अपनी काबिलीयत और मेहनत की जगह भाग्य, कुंडली, वास्तु जैसे अंधविश्वासों पर ज्यादा भरोसा होने लगा. इस के चक्कर में उस का दिमाग भी संकीर्ण होने लगा. अच्छाबुरा कुछ भी होता, वह किस्मत के मत्थे मढ़ देती. उस के अंदर मेहनत करने का जज्बा विकसित ही नहीं हो पाया. कुछ पाने के लिए वह धार्मिक कर्मकांडों में पैसा और समय गंवाने लगी. विजय कालोनी में रहने वाला अनिकेत दिमाग से तेजतर्रार तो है पर उस की सब से बड़ी समस्या यह है कि उस ने अपनी लाइफ को बहुत ही ज्यादा मैसी बना रखा है. मैनेजमैंट का दूरदूर तक कोई नाता नहीं. आलसी होने के साथ वह जो भी काम करता है, अपने मूड के हिसाब से करता है. अगर उसे किसी काम में मन है तो उसे अच्छे से कर लेगा पर अगर कोई काम उस के मन का नहीं तो वह कन्नी काटने में भी देर नहीं लगाता. काम की जरूरत और समय से उस का कोई लेनादेना नहीं. इस के चलते होता क्या है कि बहुत बार अपनी लाइफ के जरूरी फैसले समय रहते कर नहीं पाता.

किसी काम को करने से पहले वह कोई मैनेजमैंट नहीं करता. जब काम का मैनेजमैंट नहीं होता तो टाइम फ्रेम में कोई काम बंध नहीं पाता. इस का खमियाजा भी उसे भुगतना पड़ा है. उसे कैरियर में काफी दिक्कत ?ोलनी पड़ी है. उस के बावजूद उस का केयरलैस बिहेवियर बदला नहीं. कोरोना महामारी के दौरान देशभर में हालत यह हुई कि एक अच्छीखासी पीढ़ी के ढाई साल लैप्स हो गए. इस बीच जो व्यावहारिक चीजें स्किल के रूप में सीखी जा सकती थीं वे यह नई पीढ़ी सीख नहीं पाई. यह नहीं भूलना चाहिए कि आज कंप्यूटर, स्मार्टफोन और बढ़ती सोशल मीडिया की दुनिया में नई पीढ़ी तैयार हो रही है. यह ठीक है कि इस पीढ़ी को तकनीकी चीजों की जानकारी होनी जरूरी है पर साथ ही ऐसी स्किल्स भी डैवलप करने की जरूरत है जिस से वे अपने कैरियर में आगे बढ़ पाएं. यहां हम ऐसे व्यावहारिक स्किल्स की बात करेंगे जिन्हें 18 साल की उम्र से पहले अपने बच्चों को सिखा लिया तो सम?ा नैया पार. बदलावों को संभालने का हुनर चाइल्ड डैवलपमैंट स्पैशलिस्ट अकसर समय के साथ बदलावों को संभालने की स्किल को बच्चों के लिए जरूरी मानते हैं.

दुनिया हर दिन बदल रही है. इस के साथ खुद को भी बदलने की स्किल्स, नई चीजें सीखने, बदलती दुनिया को औब्जर्व करने का हुनर सीखना आगे बहुत काम आने वाला है. फोर्ब्स ने 2021 में बिजनैस स्पैशलिस्ट से आज के समय में कर्मचारियों के गुणों के बारे में पूछा तो बदलाव के साथ फ्लैक्सिबिलिटी जैसे बिंदुओं को सब से अधिक जरूरी माना गया था. फ्लैक्सिबल होना, सीखना अकसर तब होता है जब कोई अप्रत्याशित घटना घटती है. यह किसी असहज स्थिति से खुद को निकालने जैसा है. इस के लिए पेरैंट्स और टीनएजर खुद इस कौशल को बढ़ावा देने के तरीके खोज सकते हैं. इस के लिए टास्क दिए जा सकते हैं. आवाज उठाने का साहस डिजिटल एरा में ज्यादातर टीनएजर टैक्स्टिंग या मैसेजिंग में तो माहिर होते हैं लेकिन कम्युनिकेशन की कमी के चलते अपने विचारों को सा?ा करना उन के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है. इस तरह हम ऐसे युवाओं की फौज तैयार कर रहे हैं जो बहुत कम बात करती है,

जब वह बात नहीं करती तो किसी बात को उठाने, किसी समस्या को रेज करने का हुनर उस में पैदा नहीं हो सकता. ऐसे में जरूरी है कि युवा को ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने, जैसे स्कूल में लीड करने, ग्रुप डिस्कशन में भेजने, कंपीटिशन में पार्टिसिपेट करने को प्रोत्साहित किया जाए. साथ ही, उन्हें सम?ाया जा सकता है कि गलत के खिलाफ वे आवाज उठाएं. दूसरों की बातों को सुनने की कला बहुत लोगों को लग सकता है यह भी कोई स्किल हुई. लेकिन सच मानिए, हम अपनेआप में आज के समय में इतना खो गए हैं कि दूसरे की सुन ही नहीं रहे हैं. टीनएज उम्र से बच्चों को इस बात का पता होना चाहिए कि समाज बहुत विविध है, जैसे भारत का उदाहरण, हमारे देश में धर्म, जाति, संस्कृति, भाषा की विविधता है. अगर जो आप से भिन्न हैं उन की बातों को ठीक से सुना नहीं गया और सिर्फ अपनी कहा गया तो कम्यूनिकेशन ब्रेक होता है.

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफैसर जेम्स फिशकिन द्वारा स्थापित डेलीबरेटिव पोलिंग प्रोसैस कहता है कि सुनने की कला लोगों को ग्रो करने में मदद करती है. इस से विषय पर बात की जा सकती है और उसे सम?ा जा सकता है. दूसरों की मदद के लिए सहानुभूति हैल्प करना मानवीयता से जोड़ा जाता है. यह ठीक है पर हैल्प करना इसलिए भी जरूरी है कि कहीं न कहीं यह आप ही के काम आता है. आप जब किसी टीमवर्क में काम करते हैं तब आप की टीम का कोई व्यक्ति अच्छा परफौर्म नहीं कर रहा होता है तो इस का असर पूरी टीम की सक्सैस पर पड़ता है. जब टीम मैंबर उस की मदद करते हैं तो इस से हो सकता है वह उस दिक्कत से बाहर आ जाए पर आप की टीम भी इंप्रूव करती है. चुनौतियों से निबटने का साहस जीवन में कई चुनौतियां आती हैं. अगर शुरुआत से उन चुनौतियों से मुकाबला करने का हुनर या साहस न आए तो आगे चल कर दिक्कत आती है.

टीनएज उम्र में चुनौतियों के पड़ाव हैं. हमें अपने बच्चों को सम?ाना चाहिए कि आज भी देश में कई गांव ऐसे हैं जहां शिक्षा तक हासिल करने के लिए छोटेछोटे बच्चों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. कई ऐसे हैं जिन्हें पढ़ाई के साथसाथ काम करना पड़ता है. वे अपनी चुनौतियों से लड़ कर खुद को मजबूत बना रहे हैं. ऐसे ही ऐसी कई चुनौतियां उन की लाइफ में भी आ सकती हैं, सो उस के लिए प्रिपेयर होना जरूरी है. लीडरशिप क्वालिटी टीनएज और उस के बाद के वर्षों में अकसर बच्चे उस दिशा में बढ़ते हैं जहां भीड़ ले चलती है. भीड़ में चलने से आदमी सहज तो रहता है पर अलग कभी नहीं रह पाता. भीड़ से हट कर अपनी अलग राह जो बनाता है और उस का अनुसरण बाकी करते हैं, उसे लीडरशिप क्वालिटी कहते हैं. कन्क्लूजन पर आने से पहले टीनएजर की एक इंडिपेंडैंट थिंकिंग होनी जरूरी है जिस से वे स्वतंत्र रूप से अपना निर्णय ले सकें.

टाइम मैनेजमैंट स्कूल में अकसर एग्जाम्स के दिनों में स्टूडैंट टाइम टेबल बनाते हैं. कैसे वे अपने एग्जाम में पढ़ेंगे, कितना किस सब्जैक्ट को समय देंगे, किस पर कितना जोर देंगे. ठीक ऐसे ही अपनी लाइफ को व्यवस्थित रखने के लिए टाइम मैनेजमैंट करने का हुनर होना जरूरी है. इस के लिए टू-डू लिस्ट बनाने की आदत अगर टीनएजर में आती है तो वे अपने कोई भी गोल आसानी से अचीव कर सकते हैं. इस के लिए वे अपने रोजमर्रा के कामों का मैनेजमैंट कर सकते हैं.

रैशनल थिंकिंग किसी भी व्यक्ति की थिंकिंग रैशनल और लौजिकल होनी जरूरी है. जब बात टीनएज उम्र की आती है तो यह सब से सही समय होता है जब आप अपने बच्चों को ऐसा सोचविचार दें ताकि वे लौजिक के करीब दिखें, न कि अंधविश्वासी और धर्मकांडी. अगर बच्चा अतिधार्मिक और अंधविश्वासी बनता है तो नुकसान यह है कि वह अपना समय और पैसा इन्हीं चीजों पर उड़ाता रहेगा. हर समय वह किसी न किसी डर या लालच से घिरा रहेगा. अपनी मेहनत पर भरोसा करने की जगह वह किस्मत और भाग्य को मानेगा. इस से उस के काम पर प्रभाव पड़ेगा और पढ़ेलिखों के बीच वह अलगथलग सम?ा जाएगा.

मेरी पत्नी का मुझ से ज्यादा मेरे भाई पर ध्यान देना मुझे बेहद खटकता है, मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी उम्र 37 वर्ष है. मैं अपनी पत्नी से बहुत परेशान हूं. परेशानी का कारण यह है कि वह मुझ से ज्यादा मेरे 27 वर्षीय भाई के आसपास रहना पसंद करती है. मेरी 2 बेटियां हैं जो स्कूल में पढ़ रही हैं. मेरी पत्नी मेरे भाई को अपना बेटा समझ मां समान प्यार देती है पर इस का मतलब यह तो नहीं कि इन सब में वह मुझे ही भूल जाए. मेरी पत्नी का मुझ से ज्यादा मेरे भाई पर ध्यान देना मुझे बेहद खटकता है. समझ नहीं आता कि क्या करूं. कुछ मार्गदर्शन करें.

जवाब

आप की पत्नी जरूरत से ज्यादा अपने देवर पर ध्यान देती हैं तो इस के पीछे उन की बेटे की चाह है जो साफ दिखाई पड़ती है. इस समस्या से निबटने का रास्ता केवल यही है कि आप अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश करें कि इस तरह घर के बाकी सदस्यों को नजरअंदाज करना सही नहीं है. आप बेटियों को घर पर छोड़ कर पत्नी के साथ लंबी यात्राओं पर जाएं, भाई से दूर रह कर घर के काम करने के लिए प्रोत्साहित करें.

आप अपनी पत्नी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करने की कोशिश करें. उस के साथ फिल्में देखें व यों ही कहीं टहल आएं. आप जितना ज्यादा समय पत्नी के साथ अकेले व्यतीत करेंगे, उतना ही उन का ध्यान आप पर केंद्रित होगा.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

सुगंध : धन दौलत के घमंड में डूबे लड़के की कहानी

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भाजपा बांट रही है अक्षत, बिहार बांट रहा है रोजगार, वजह बड़ी जोरदार

बिहार सरकार राज्य में 94 लाख 33 हजार 312 गरीब परिवारों को 2-2 लाख रुपए नकद देने जा रही है. इस के पहले 72 दिनों के अंदर 2.17 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दे कर बिहार ने रिकौर्ड कायम किया है. 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले यह नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. अयोध्या में राम पर करोड़ों रुपए खर्च वाली भाजपा इस पर सवाल उठा रही है. बिहार और उत्तर प्रदेश की तुलना की जाए तो यूपी के रहने वाले ही बिहार में नौकरी पाकर खुश हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गरीब परिवारों को आर्थिक मदद देने की घोषणा करते कहा कि, ‘गरीब परिवार के एकएक सदस्य को दोदो लाख रुपए सरकार की तरफ से दिए जाएंगे.’ इन परिवारों की संख्या 94 लाख 33 हजार 312 है. सरकार ने जातीय गणना के दौरान इन परिवारों के बारे में जानकारी जुटाई थी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा में इन गरीब परिवारों को आर्थिक मदद देने की घोषणा और मंत्रिमंडल की बैठक में इस पर मोहर लगा दी गई. इस का लाभ सभी वर्ग के गरीब परिवारों को मिलेगा. यह राशि 3 किस्तों में दी जाएगी.

पहली क़िस्त में 25 फीसदी, दूसरी में 50 और तीसरी में 25 फीसदी राशि दी जाएगी. 63 तरह के रोजगार करने के लिए यह पैसा दिया जाएगा.
नीतीश कुमार ने 22 नवंबर, 2023 को विधानसभा में इस की घोषणा करते कहा था कि जाति आधारित गणना में सभी वर्गों को मिला कर बिहार में लगभग 94 लाख गरीब परिवार पाए गए हैं. उन सभी परिवारों के एकएक सदस्य को रोजगार हेतु 2 लाख रुपए तक की राशि किस्तों में उपलब्ध कराई जाएगी. सतत् जीविकोपार्जन योजना के तहत अत्यंत निर्धन परिवारों की सहायता के लिए अब एक लाख रुपए के बदले दो लाख रुपए दिए जाएंगे. इन योजनाओं के क्रियान्वयन में लगभग 2 लाख 50 हजार करोड़ रुपए की राशि व्यय होगी. इन कामों के लिए काफी बड़ी राशि की आवश्यकता होने के कारण इन्हें 5 वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

सरकारी नौकरी देने में बनाया रिकौर्ड

सरकारी नौकरी देने के मामले में बिहार ने पूरे देश में इतिहास रच दिया. 72 दिनों के अंदर 2.17 लाख नियुक्ति कर दी. जब वाइब्रेंड गुजरात का नारा पूरे देश में सुनाई दे रहा था तब बिहार अपने युवाओं को नौकरी दे रहा था. बिहार में नौकरी पाने वालों में उत्तर प्रदेश के लडकेलडकियां भी हैं. कई ऐसे हैं जो ‘दक्षिणापंथी’ विचारधारा के साथ सोशल मीडिया पर काम कर रहे थे. जब उन्होंने बिहार में नौकरी की पोस्ट डाली तो कमैंट में लोगों ने बिहार और यूपी की तुलना करनी शुरू कर दी. ऐसे युवाओं ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट ही डिलीट कर दिए.

देश में यह पहली बार हुआ जब नीतीश सरकार के 2 विज्ञापनों से युवाओं को इतनी रिकौर्ड संख्या में नौकरी मिली. इस सरकार ने 96,823 युवाओं को नियुक्तिपत्र दे कर उन्हें शिक्षक होने का मानसम्मान दिया. इस का एक समारोह किया था. उत्तर प्रदेश में शिक्षक भरती विवादों और मुकदमों में फंस जाती है. वहां 69 हजार शिक्षक भरती के लिए लोग धरना दे रहे हैं. सरकार को इन से अधिक मंदिर की चिंता है. बिहार सरकार ने अपनी तरह से एक राजनीतिक लाइन बड़ी कर दी है. नीतीश कुमार ने कहा कि शिक्षकों के खाली पदों पर भी जल्द नियुक्ति की जाएगी. अगले डेढ़ साल में 10 लाख नौकरी और 10 लाख रोजगार दिए जाएंगे. अब तक 3 लाख 63 हजार युवाओं को सरकारी नौकरी दी जा चुकी है, जबकि 5 लाख लोगों को रोजगार दिए गए हैं. देखने वाली बात यह है कि बिहार के अलावा दूसरे राज्यों व देश से बाहर के लोग भी आ कर यहां शिक्षक बने हैं.

नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार के लोग भी बाहर जा कर अलगअलग प्रदेशों में व देश के बाहर नौकरी करते हैं, इसलिए हम ने शुरू में ही कहा था कि बिहार के अलावा बाहर के लोगों को भी यहां होनेवाली बहाली में शामिल होने का अवसर प्रदान किया जाएगा. इस को ले कर मेरी आलोचना भी हुई थी. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, झारखंड समेत कई दूसरे राज्यों के लोग बिहार में शिक्षक नियुक्त हुए हैं.

मंदिर बनाम विकास की राजनीति

बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने राममंदिर को ले कर कहा, ‘भूख लगेगी तो मंदिर जाओगे? खाना मिलेगा? वहां उलटा दान मांग लेंगे. पैर कट जाएगा तो मंदिर जा कर पंडित को दिखाइएगा कि अस्पताल जा कर डाक्टर को दिखाइएगा?’ ‘दक्षिणापंथी’ लोगों ने उन की आलोचना शुरू कर दी. अब बिहार सरकार ने सरकारी नौकरी और गरीब परिवारों को 2-2 लाख रुपए की नकद राशि दे कर यह दिखा दिया है कि मंदिर की राजनीति के मुकाबले विकास की राजनीति कैसे हो सकती है. असल में बिहार ने जातीय जनगणना के जरिए गरीबों के विकास की जो योजना बनाई है वह मंदिर की राजनीति का सटीक जवाब है.

1990 के दौर में जब मंडल-कमंडल आमनेसामने थे तब बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने ही लालकृष्ण आडवाणी का राममंदिर रथ रोक दिया था. 2024 के लोकसभा चुनाव में अब दक्षिणापंथी लोगों ने मंदिर को मुददा बनाने का काम किया. हजारों करोड़ रुपए अयोध्या पर खर्च कर दिया. उस के मुकाबले बिहार की सरकार ने लाखों लोगों को सरकारी नौकरी और रोजगार दे कर अपना विकास का मौडल देश के सामने पेश किया. जातीय गणना का विरोध करने वाले यह पूछ रहे थे कि इस से क्या भला होगा? बिहार सरकार ने इस का जवाब दे दिया है.

जातीय गणना से गरीबों के भला करने की योजना से अब देश के बाकी हिस्सों में जातीय गणना की मांग तेजी से उठेगी. लोगों को इस का लाभ समझ आ गया है. पहले लोगों को लगता था कि यह केवल राजनीतिक स्टंट है. इस के सहारे वोटबैंक की राजनीति की जा रही है. 94 लाख लोगों की मदद से बिहार सरकार ने भी अपना लाभार्थी वर्ग तैयार कर लिया है. जहां दक्षिणपंथी राममंदिर पर हजारों करोड़ रुपए खर्च कर दक्षिणाबैंक बना रहे हैं वहां बिहार सरकार ने रोजगार और नौकरियों के सहारे लोगों के घरों में उजाला कर दिया है. बिहार सरकार ने अक्षत वितरण के जवाब में नौकरी बांट कर युवाओं को खुश कर दिया है.

Radish Health Benefits : इम्युनिटी बढ़ाने से लेकर शुगर कंट्रोल करने तक, मूली खाने के हैं अनगिनत फायदे

Health Benefits Of Eating Radish : सर्दियों में कई मौसमी सब्जियां आती है, जिन्हें खाने का मजा और फायदा दोनों इसी मौसम में मिलता है. इसी में से एक हैं मूली. मूली में कई पोषक तत्वों जैसे कि विटामिन, मिनरल्स, फाइबर और प्रोटीन आदि की भरमार होती है. इसके अलावा इसके सेवन से सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार आदि मौसमी बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है. साथ ही ये डायबिटीज मरीजों के लिए भी कई मायनों में फायदेमंद होती हैं.

आइए अब जानतें हैं विंटर में डाइट में मूली (Health Benefits Of Eating Radish) को शामिल करने से सेहत को क्या-क्या लाभ मिलता है.

मूली खाने के फायदे

ब्लड शुगर रहेगा कंट्रोल

कड़ाके की ठंड के बीच डायबिटीज मरीजों को अपनी डाइट में मूली (Health Benefits Of Eating Radish) को जरूर शामिल करना चाहिए. दरअसल, मूली खाने से शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा कम होने लगती है लेकिन इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए.

डायजेशन होगा मजबूत

मूली में विटामिन सी, कैल्शियम, फाइबरफोलेट, पोटैशियम, फोलेट और मैग्नीशियम जैसे कई पोषण तत्व तो होते ही हैं. साथ ही ये एंटी-ऑक्सीडेंट का भी मुख्य स्रोत है, जिससे शरीर को तमाम बीमारियों से लड़ने की सुरक्षा मिलती है. इसी वजह से मूली खाने से डायजेशन अच्छा रहता है.

इम्यूनिटी होगी बूस्ट 

जब भी मौसम में बदलाव आता है तो उसका सबसे ज्यादा असर इम्यूनिटी पर होता है. इसलिए जरूरी है कि हर मौसम में हम अपनी डाइट में उन चीजों को शामिल करें, जिससे इम्यूनिटी बूस्ट हो. सर्दियों में इम्यूनिटी को बूस्ट व मजबूत करने के लिए डाइट में मूली को शामिल करना फायदेमंद होता है.

पाचन संबंधी समस्याओं से मिलेगा छुटकारा

ठंड में नियमित रूप से मूली (Health Benefits Of Eating Radish) खाने से पाचन बेहतर होता है. साथ ही पाचन संबंधी समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है.

हड्डियों में आएगी मजबूती

आपको बता दें कि मूली में कैल्शियम की भरपूर मात्रा होती है. इसलिए इस मौसम में इसके सेवन से हड्डियों में मजबूती आती है. साथ ही जोड़ों के दर्द में भी राहत मिलती है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

बढ़ते Uric Acid से हैं परेशान, तो कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय

Tips To Control Uric Acid : आज के समय में ज्यादातार लोग यूरिक एसिड बढ़ने की समस्या से परेशान है. रक्त में जिस तरह कोलेस्ट्रॉल या शुगर का लेवल बढ़ने से गंभीर बीमारियों के होने का खतरा बना रहता है. ठीक वैसे ही शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने से समस्याएं बढ़ सकती हैं. दरअसल, यूरिक एसिड वो गंदा पदार्थ होता है, जो शरीर में उन चीजों से जम जाता है जिनमें प्यूरीन की उच्च मात्रा होती है. वैसे तो ये यूरिन के जरिए शरीर से बाहर निकल जाता है लेकिन जब यह अपने आप बॉडी से निकल नहीं पाता है तो इससे पथरी, दर्दनाक गाउट की बीमारी या हड्डियां, किडनी, और दिल को भी नुकसान पहुंच सकता है.

इसलिए जरूरी है कि समय रहते आप यूरिक एसिड को बढ़ने से रोके. आज हम आपको 5 आसान तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप यूरिक एसिड (Tips To Control Uric Acid) के बढ़ने की समस्या को कंट्रोल कर सकते हैं.

एक्सरसाइज करें

यूरिक एसिड कंट्रोल करने के लिए आप हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाएं. जैसे कि समय से सोएं और टाइम से उठें. इसके अलावा रोजाना ज्यादा से ज्यादा फिजिकल एक्टिविटी या एक्सरसाइज करें.

नॉन वेज से बनाएं दूरी

यूरिक एसिड (Tips To Control Uric Acid) की समस्या में नॉनवेज बिल्कुल भी नहीं खाना चाहिए, नहीं तो समस्या और ज्यादा बढ़ सकती है. दरअसल, नॉनवेज में प्यूरिन की उच्च मात्रा होती है, जो शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को बढ़ाता है. ऐसे में फल, हरी पत्तेदार सब्जियां और दाल-चावल आदि को अपनी डाइट में शामिल करें.

पर्याप्त मात्रा में पिएं पानी

नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं. इससे न सिर्फ यूरिक एसिड (Tips To Control Uric Acid) का स्तर कंट्रोल में रहेगा. साथ ही शरीर हाइड्रेटेड होगा और मौसमी बीमारियों से छुटकारा भी मिलेगा.

मीठी चीजों को खाने से बचें

मीठे खाद्य पदार्थों में नैचुरल स्वीटनर फ्रुक्टोज की भरपूर मात्रा होती है. जब शरीर में फ्रुक्टोज जाता है, तो इससे प्यूरिन जारी होता है जिससे शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने का खतरा बना रहता है. इसलिए यूरिक एसिड की समस्या से परेशान लोगों को मीठा खाने से बचना चाहिए.

शराब नहीं पिएं

शराब के अत्यधिक सेवन से डिहाइड्रेशन की समस्या होने लगती है. इसके अलावा शराब में प्यूरीन का स्तर सबसे ज्यादा होता है, जिससे यूरिक एसिड की समस्या होने लगती है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

घूसखोरों का स्वर्ग है मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में नए साल की शुरुआत ही रिश्वतखोरी से हुई थी. जब लोकायुक्त पुलिस ने ग्वालियर के शाताब्दिपुरम इलाके में एक पटवारी पंकज खड़गे को 5 हजार की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा था. मामला दूसरे हजारोंलाखों मामलों जैसा ही था. भिंड जिले की गोहद तहसील के विशवारी गांव के एक किसान रवि बघेल को अपनी दादी राजाबेटी के नाम की जमीन का नामांतरण करवाना था. अब वह पटवारी भी क्या जो बगैर दक्षिणा के अपनी ड्यूटी ईमानदारी से बजाते माथे पर कलंक का टीका लगा ले. लिहाजा उस ने 15 हजार रुपए मांगे. दूसरे हजारोंलाखों मामलों की तरह इस में भी भावताव और सौदेबाजी हुई और मामला 7 हजार रुपए में तय हुआ.

किसान ने बतौर पेशगी 2 हजार रुपए दे भी दिए लेकिन साथ ही लोकायुक्त पुलिस में शिकायत भी कर दी. नतीजतन साल के पहले ही दिन पटवारी साहब रंगेहाथों धरे गए. लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि इस से घूसखोरी खत्म या कम हो गई.

मध्य प्रदेश में घूसखोरी बदस्तूर जारी है और आगे भी रहने की पूरी गारंटी है. 2024 के पहले दिन की तरह ही साल 2023 के आखिरी दिन भी भिंड में ही एक घूसखोर सब इंजीनियर को 25 हजार रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया था. आरईएस यानी ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के इस सब इंजीनियर का नाम दीपक गर्ग है. इस मामले में शिकायतकर्ता ने मनरेगा के तहत गांव में तालाब बनाया था जिस का मूल्यांकन उक्त सब इंजीनयर को करना था जिस से कि उसे भुगतान हो सके.

सौदा 72 हजार रुपए में तय हुआ था लेकिन ठेकेदार ने ईओडब्ल्यू में शिकायत कर दी, फिर फ़िल्मी स्टाइल में कार्रवाई हुई और इंजीनियर साहब के साल का अंत बुरा हुआ. बाद में खुलासा हुआ कि रोजगार सहायक संजीव गुर्जर दीपक गर्ग को 2 लाख 20 हजार रुपए पहले भी दे चुका है लेकिन उस का मुंह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा था जिस से तंग आ कर उस ने शिकायत कर दी. घूसखोरी के इस मामले में रिश्वत एक पैट्रोल पंप पर दी गई थी जो ऐसे मामलों के लिए बड़ी मुफीद जगह होती है.

अब घूस में सैक्स की मांग

इधर नए मख्यमंत्री मोहन यादव भ्रष्टाचार पर जीरो टालरैंस की बात ही करते रह गए और उधर नया गुल ग्वालियर से ही खिला. इस बार मामला थोड़ा अलग और दिलचस्प था. जीवाजी यूनिवर्सिटी में कैंपस ड्राइव के तहत बीज निगम में संविदा में भरतियां होनी थीं. इस में कुछ लड़कियां भी सेलैक्ट हुई थीं.

इंटरव्यू लेने वालों में से एक बीज निगम का मुलाजिम संजीव तंतुवे भी था. चुनी गई 3 लड़कियों से उस ने 15 जनवरी को फोन कर कहा कि अगर नौकरी चाहिए तो मुझे खुश करना होगा. फाइनल इंटरव्यू भोपाल में होगा और रात में होगा, बैडरूम में होगा. दूसरे दिन सुबहसुबह ही तुम्हें नियुक्तिपत्र मिल जाएगा.

लेकिन 26 साल की एक लड़की को यह पेशकश रास नहीं आई और उस ने पुलिस में शिकायत कर दी. आरोपी ने बाकायदा व्हाट्सऐप पर भी यह मांग की थी जिस के स्क्रीनशौट लड़की ने सेव कर लिए थे. अब ग्वालियर पुलिस की क्राइम ब्रांच इस की जांच कर रही है जो अगर ईमानदारी से हो पाई तो बीज निगम के कई आला अफसर भी लपेटे में आ सकते हैं. क्योंकि संजीव तंतुवे मामूली कंप्यूटर औपरेटर है.

ग्वालियर भोपाल में यह चर्चा आम है कि एक अकेला मुलाजिम इस काम को अंजाम नहीं दे सकता, इस में और भी लोग शामिल हैं. एक रात में वह अकेला कैसे तीनतीन लड़कियों के बैडरूम इंटरव्यू लेता.

इसलिए जन्नत है

मध्य प्रदेश में घूसखोरों को जेल नहीं भेजा जाता बल्कि उन्हें हाथोंहाथ जमानत मिल जाती है. एनसीआरबी की एक ताजी रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार 26 फीसदी बढ़ा है. देशभर में यह 6वें नंबर पर है. पिछले 10 सालों में राज्य में 2,165 घूसखोर पकड़े गए जिन में से किसी को भी जेल नहीं जाना पड़ा. जाहिर है जो एजेंसियां घूसखोरों को रंगेहाथों पकड़ती हैं वही उन्हें जमानत दिलवाने में भी मदद करती हैं और सजा से बचाने में भी मामला ढीला बनाती हैं.

आंकड़े और मामले एक दिलचस्प बात यह भी बताते हैं कि मध्य प्रदेश में भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई में किस तरह भेदभाव किया जाता है. अगर प्रदेश में केंद्र का कोई अधिकारी भ्रष्टाचार करते पकड़ाता है तो उस की गिरफ्तारी तुरंत होती है लेकिन कोई अफसर घूस ले या फिर करोड़ों की नामीबेनामी जायदाद बना ले तो उसे तुरंत जमानत पर छोड़ दिया जाता है जबकि केंद्र व राज्य दोनों की सरकारी एजेंसियां एक ही कानून भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट 1988) के तहत कार्रवाई करती हैं.

इस अधिनियम के मुताबिक रिश्वत लेते पकड़े जाने पर आरोपी को तुरंत जमानत देने का अधिकार जांच एजेंसी को नहीं है लेकिन प्रदेश की लोकायुक्त पुलिस भ्रष्टाचार के आरोपियों को गैरजमानती धाराओं में गिरफ्तार करने के बाद भी जेल नहीं भेजती. पिछले 15 सालों में कोई भी भ्रष्ट अफसर जेल नहीं गया है. शायद इसीलिए कहा जाता है कि एमपी गजब है.

यह गजब अब और भी दिलचस्प हो चला है. खुलेआम भ्रष्ट अफसरों को रसूख वाले और मलाईदार पद व प्रमोशन दिए जाने लगे हैं. इस की एक ताजी मिसाल इंदौर का उप श्रमआयुक्त रहा लक्ष्मी प्रसाद पाठक है जिसे बीती 9 जनवरी को श्रम मंत्री प्रहलाद पटेल का ओएसडी बना दिया गया. जबकि पिछले साल नवंबर में लोकायुक्त ने श्रम विभाग को पत्र लिखते बताया था कि इस अधिकारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप पहली नजर में सही हैं. लिहाजा उस के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत दी जाए. इस पर कोई ऐक्शन विभाग ने या सरकार ने नहीं लिया लेकिन मंत्री का ओएसडी इस को बनाया तो हल्ला मचा जिस के चलते प्रहलाद पटेल ने इसे लेने से मना कर दिया.

ऐसे दर्जनों मामलों में से एक गवर्नमैंट प्रैस का भी है जिस के उप नियंत्रक विलास मंथनवार को 3 हजार रुपए की घूस लेते लोकायुक्त पुलिस ने पकड़ा था और उसे पद से हटाने को राज्य शासन को पत्र भी लिखा था. लेकिन हैरतअंगेज तरीके से इस अफसर को मुख्यालय में ही खरीद-वितरण की जिम्मेदारी दे दी गई. क्यों मध्य प्रदेश को भ्रष्टाचारियों का जन्नत कहा जाता है, इस का एक और उदाहरण उमरिया जिले का एसडीएम नीलाम्बर मिश्रा है जिसे जुलाई 2019 में एक मामले में 5 हजार रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया था, तब उस के सुरक्षा गार्ड चंद्रभान सिंह को भी लोकायुत रीवा की टीम ने आरोपी बनाया था. हुआ गया तो कुछ नहीं, लेकिन चलती जांच के बीच नीलांबर मिश्रा को पन्ना जिले का एडीएम बना दिया गया.

ऐसे कई मामले हैं जिन में भ्रष्टाचारी को सजा के बजाय इनाम दिया गया लेकिन नए मुख्यमंत्री मोहन यादव का सारा वक्त रामकाज में गुजर रहा है तो कोई क्या कर लेगा सिवा यह मानने के कि यही रामराज्य होता होगा.

जब दोस्त ही बन जाएं दुश्मन, तो क्या करें ?

‘‘अरे, तुम्हारा फोन कितनी देर से बिजी आ रहा था, किस से बात कर रही थी?’’

‘‘अपनी छोटी ननद से.’’

‘‘क्यों, अभी 2 दिनों पहले भी तुम ने यही बताया था कि ननद से बात कर रही थी.’’

‘‘हां, उस दिन बड़ी ननद से बात कर रही थी.’’

‘‘पर इतनी बात क्यों करती हो ससुराल वालों से?’’

‘‘अरे, तुम्हें बताया तो था कि मेरे उन सब से अच्छे संबंध हैं.’’

‘‘पर बड़ी से तो तुम ने कुछ मनमुटाव बताया था न?’’

‘‘नहीं, अब ऐसा कुछ नहीं. वे तो पुरानी बातें थीं, अब समय के साथ सब ठीक हो

गया है.’’

‘‘फिर भी, क्यों करनी है ससुराल वालों से इतनी बातें?’’

‘‘मु?ो अच्छा लगता है. जब सब अच्छी तरह बात करते हैं तो क्यों दूरियां रखें.’’

‘‘तुम्हें जो करना है करो, मेरा फर्ज तुम्हें सम?ाना था, तुम्हें सम?ा नहीं आ रहा तो तुम्हारी मरजी,’’ चिढ़ कर नीमा ने फोन रख दिया.

रीता ने ठंडी सांस ली, परेशान हो गई है वह नीमा के हर समय के ज्ञान से. रीता का कहना है, ‘‘नीमा मेरी बहुत अच्छी दोस्त है पर इतनी डौमिनेटिंग हो जाती है कि बिना मांगे सलाह देदे कर बोर कर देती है. जरा भी लाइफ में स्पेस नहीं देती, जो बात सुनेगी, उस में टांग अड़ाएगी. अरे भई, मेरे पास भी है दिमाग. मेरी ही उम्र की तो है वह, मैं क्या कोई बच्ची हूं. दोस्ती में स्पेस भी चाहिए होता है, नीमा तो यह बात जानती ही नहीं.’’

  1. दोस्ती बोझ तो नहीं

अनीता की भी यही परेशानी है. फेसबुक पर उस के और उस की पक्की सहेली रीमा के बहुत सारे कौमन फ्रैंड्स हैं. रीमा की एक कौमन फ्रैंड उमा से अनबन हो गई. जब भी उमा की किसी पोस्ट पर अनीता कोई अच्छा कमैंट करती तो रीमा अनीता की जान खा जाती, ‘‘क्यों किया तुम ने उस की पोस्ट पर कमैंट, जाओ, अभी डिलीट करो, तुम्हें पता है न, मैं उसे पसंद नहीं करती.’’

अनीता कहती हैं, ‘‘मु?ो रीमा की यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगती. उस की दोस्ती में मेरी सांस जैसे घुटने लगती है. अब तो रीमा की दोस्ती एक बो?ा जैसी होती जा रही है.

‘‘मैं किस की पोस्ट लाइक करूं, किस की पोस्ट पर कैसे कमैंट्स करूं, सब पर अपनी पसंदनापसंद बताती है जैसे मैं अपनी मरजी से कुछ कर ही नहीं सकती. कोई स्पेस नहीं देती है दोस्ती में. मेरी अच्छी दोस्त है पर मेरी हर चीज पर अपना पूरा कंट्रोल रखना चाहती है. आजकल तो हर रिश्ते में स्पेस चाहिए होता है, पर वह तो यह बात जानती ही नहीं.’’

उमेश जब भी अपने अच्छे दोस्त रवि के साथ कहीं बाहर जाता है, दोनों कुछ खाने बैठते हैं. रवि हमेशा वही खाना और्डर करने की जिद करता है जो उसे खाना होता है. जब उमेश कहता है कि दोनों अपनीअपनी पसंद से कुछ मंगवा लेते हैं तो रवि का कहना होता है कि फिर ज्यादा बिल आएगा. हर बार बहस के बाद वही आता है जो रवि को खाना होता है. उमेश बताता है, ‘‘मु?ो सिजलर खाना होता है, तो वह फ्राइड खाना खाना चाहता है जो मु?ो बिलकुल सूट नहीं करता. बात छोटी सी है पर किसी भी बात में वह दूसरे की सुनता ही नहीं. खाने जैसी आम सी बात में भी कभी इतना स्पेस नहीं देता कि बंदा अपने मन से कुछ कर ले.’’

2.दोस्त जब दोस्त न रहे

मेघा और काजल बहुत अच्छी फ्रैंड्स हैं. मेघा को पढ़नेलिखने का शौक है तो काजल को फिटनैस पर ध्यान देने का. काजल कहती है, ‘‘जब भी मेरा जिम जाने का टाइम होता है, मेघा मु?ो जानबू?ा कर उसी टाइम फोन करती है कि छोड़, क्यों जाना है जिम.’’

‘‘मेघा को फिटनैस पर ध्यान देने का जरा भी शौक नहीं है. मेरे हर बार जिम जाने पर इतना ज्यादा टोकते हुए कहती है कि क्या हो जाएगा, अरे, आराम कर और खापी. क्या रखा है हैल्थ पर ध्यान देने में. मु?ो देख, मैं कितने आराम से बस बुक्स पढ़ती हूं. कितना अच्छा शौक है, वगैरहवगैरह.

‘‘उस में बहुत खूबियां हैं पर दोस्ती में दूसरे को स्पेस देने के बारे में बिलकुल नहीं सोचती. बस, यहीं इसी बात पर मु?ो उस से उल?ान होने लगती है. मैं उस की बुक रीडिंग की आदत पर कभी कुछ नहीं कहती पर वह तो मेरे फिटनैस के शौक पर टोकती ही रहती है.’’

रचना और मीता आमनेसामने के फ्लैट्स में रहती हैं. खाली समय में बहुत गपियातीं. कुछ दिन तो सब अच्छा चला पर फिर रचना को उल?ान होने लगी. वह बताती है, ‘‘मीता के बच्चे बड़े हैं, वह घर में उस समय बिलकुल फ्री होती है जब मैं शाम को सैर करने जाती हूं.

3. खुद की भी कुछ मरजी है

मीता को बैठ कर गौसिप करने में बड़ा मजा आता है. वह अकसर उसी समय आती और मेरा सारा प्रोग्राम धरा का धरा रह जाता. जिस समय मैं सैर करना चाहती हूं, उस समय मैं चायनाश्ता बना रही होती. मैं मन ही मन कलपने लगती, उसे ढके शब्दों में बताया भी पर वह इस बात को सम?ाती ही नहीं कि दूसरे का भी कुछ प्रोग्राम हो सकता है.

हार कर एक दिन साफसाफ कहा कि, ‘‘भई, मैं तो ऐक्सरसाइज के मूड में हूं.’’ इस पर वह बोली, ‘‘हां, करो, मैं तो बैठी हूं. तुम करती रहो.’’

उसे सम?ाने में काफी मुश्किल हुई कि दोस्ती में भी स्पेस देना चाहिए.  हर रिश्ते में स्पेस चाहिए होता है. सब को अपने हिसाब से जीने के लिए कुछ समय चाहिए होता है. इंसान की कुछ अपनी मरजी भी होती है, कुछ अपनी इच्छाएं भी होती हैं. उन में दखलंदाजी से बचना चाहिए. घरपरिवार से कुछ समय निकाल कर इंसान दोस्त से जुड़ता है. उस दोस्ती में भी जब घुटन होगी, दोस्ती बंधन सा लगेगी, तो अच्छी दोस्ती में भी धीरेधीरे दूरी बढ़ती जाती है और फिर दोस्ती टूटने में देर नहीं लगती. सो, ऐसे दोस्त बनें जो दोस्त को प्यार भी करें, उस के सुखदुख में उस का साथ भी दें और दें स्पेस जो आज के तनावभरे माहौल में बहुत जरूरी है. आप की दोस्ती दोस्त के गले की हड्डी नहीं बननी चाहिए.

मेरे पति मुझसे लड़ाई करने के बाद कईकई दिनों के लिए घर छोड़कर चले जाते हैं, मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी शादी 10 साल पहले हुई थी. मेरे 2 बच्चे हैं. मेरे पति बिना बात के मुझे मारते हैं, गालियां देते हैं. लड़ाई के बाद वे कईकई दिनों के लिए बाहर चले जाते हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप ने यह नहीं बताया कि आप नौकरी करती हैं या नहीं? सामान्यतया कोई व्यक्ति तभी किसी पर अत्याचार करता है जब वह जानता है कि उस का कोई और ठिकाना नहीं.

यदि आप पढ़ीलिखी हैं तो सब से पहले आप अपने लिए कोई अच्छी नौकरी ढूंढ़ें और खुद को स्वावलंबी बनाने का प्रयास करें. इस से पति का आप पर एकाधिकार खत्म होगा. यदि आप के पति का व्यवहार शुरू से ऐसा ही है तो आप को अपना रास्ता अलग कर लेना चाहिए और यदि ऐसा कुछ समय से है तो कारण जानने का प्रयास करें. कहीं उन की संगत तो गलत नहीं या फिर वे किस तरह की परेशानी में तो नहीं फंसे हैं. आप का खुद के प्रति बेपरवाह रहना भी एक कारण हो सकता है. अपने पहनावे और मेकअप पर ध्यान दें. स्वयं को थोड़ा सजाएंसंवारें. अपने व्यवहार पर भी ध्यान दें. इस से आप के पति का प्यार आप के प्रति लौट सकता है.

यदि घर में आप के सासससुर हैं तो उन से भी इस संदर्भ में चर्चा कर सकती हैं. नारीहित में काम करने वाली किसी संस्था से भी संपर्क कर सकती हैं. वह संस्था आप को रास्ता दिखाने के साथसाथ आप की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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