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माकड़ोंन के दलितपिछड़े – मूर्तियों को ले कर भिड़े

धार्मिक शहर उज्जैन से 57 किलोमीटर दूर माकड़ोंन कसबे में पसरा सन्नाटा और तनाव दरअसल 2 जातियों की लड़ाई की देन है जो देश में हर कभी हर कहीं देखने में आती है. लगभग 16 हजार की आबादी वाले इस कसबे में दलितों की हिस्सेदारी 20 फीसदी के करीब है. पिछड़े हालांकि इन से कम हैं लेकिन पैसे वाले हैं. इन में भी पाटीदार समुदाय के लोग ज्यादा हैं जबकि दलित समुदाय में मालवीयों की संख्या ज्यादा है.

25 जनवरी की सुबह पूरे मालवा में बेहद सर्द थी. माकड़ोंन भी ठिठुरन से अछूता नहीं था. लेकिन यह ठंड देखते ही देखते गरमी में बदल गई. सुबहसुबह ही मंडी गेट और बसस्टैंड के पास खड़ी वल्लभभाई पटेल की मूर्ति को कुछ लोगों ने ट्रैक्टर से तोड़ दिया. यह मूर्ति पिछली रात को ही कुछ अज्ञात लोग लगा गए थे. मूर्ति तोड़ने की खबर की वही प्रतिक्रिया हुई जो देश में आमतौर पर होती है.

पिछड़े तबके के कुछ लोग बाहर आ गए और गिराने वालों यानी भीम आर्मी के लोगों से विवाद करने लगे. दलित तबके के लोग चाहते थे कि खाली पड़ी इस जगह पर भीमराव आम्बेडकर की मूर्ति लगे. यह मामला पंचायत में विचाराधीन है लेकिन जब पिछड़ों ने चोरीछिपे अपना फैसला पटेल की मूर्ति लगा कर सुना या थोप दिया तो भला दलित कहां पीछे रहने वाले थे. उन्होंने इस फैसले को मिट्टी में मिला दिया.

दिन निकलतेनिकलते भारी तादाद में दलित-पिछड़े आमनेसामने आ खड़े हुए. तू तड़ाक से बात शुरू हुई तो गालियों के आदानप्रदान से ले कर हाथापाई से होते हुए हिंसा में तबदील हो गई. पथराव दोनों तरफ से हुआ और आगजनी भी हुई. इसी दौरान खबर मिलने पर पुलिस आ गई और स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रणवाली हो गई. हालांकि, यह सब अभी तात्कालिक ही कहा जाएगा.

पटेल बनाम आम्बेडकर

पिछड़े और उन में भी पटेल पाटीदार समुदायों के लोग वल्लभभाई पटेल को अपना आदर्श मानते हैं तो दलित समुदाय भीमराव आंबेडकर को भगवान मानता है. वैचारिक तौर पर पटेल और आंबेडकर में एक बड़ा फर्क सनातन या हिंदू धर्म को ले कर है. पटेल घोर सनातनी थे हालांकि वे भी जातपांत और छुआछूत दूर करने की बात करते थे लेकिन यह वे कभी नहीं बता पाए कि यह भावना कैसे लोगों के दिलोदिमाग से निकाली जा सकती है और सोमनाथ जैसे मंदिरों के पुनर्निर्माण से इस का क्या कनैक्शन है.

आंबेडकर छुआछूत और वर्णव्यवस्था के धुर विरोधी थे और उन्होंने इस से छुटकारे का रास्ता भी सुझाया था कि मनुस्मृति सरीखे धर्मग्रंथ जला दो, तो न खाट रहेगी न खटमल रहेंगे. इस बाबत उन के निशाने पर ब्राह्मण ही ज्यादा रहते थे क्योंकि तमाम फसादों की जड़ वे इस श्रेष्ठि वर्ग को ही मानते थे.

आजादी मिलने के कुछ सालों बाद तक पिछड़ों की गिनती भी शूद्रों में ही होती रही थी लेकिन वक्त बदलने के साथसाथ यह वर्गीकरण खत्म सा हो चला. लेकिन यह बदलाव धार्मिक स्तर पर नहीं हुआ. आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी न के बराबर हुआ. हां, राजनीतिक स्तर पर ज्यादा हुआ जिस के कोई खास माने नहीं.

पिछड़ों ने खुद से ही मान लिया कि वे शूद्र नहीं हैं लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि उन्हें इस से कोई सम्मान समाज में मिलने लगा. थोड़ीबहुत पूछपरख जो हुई वह पैसों और शिक्षा की वजह से हुई. उलट इस के, शूद्रों यानी दलितों की बदहाली ज्यों की त्यों है. अब तो पिछड़े भी उन पर कहर ढाने लगे हैं.

माकड़ोंन की हिंसा में नया कुछ नहीं है सिवा इस संभावना के कि दोनों ही समुदाय अपनेअपने ईष्टों के नाम पर खाली पड़ी सरकारी जमीन कब्जाना चाहते हैं. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में दलित और पिछड़े दोनों ने ही दिल खोल कर भाजपा का साथ दिया था.

यह विवाद भी, दरअसल, भाजपा की ही देन है जिस ने दलितपिछड़ा विवाद सुलझाने की गरज से बसस्टैंड का नामकरण भीमराव आंबेडकर के नाम पर कर दिया था और पटेल की मूर्ति लगाने का वादा पिछड़ों से कर लिया था. जिस पर दलित सहमत नहीं थे. चूंकि उज्जैन नए मुख्यमंत्री मोहन यादव का गृह जिला है, इसलिए भी लोगों की दिलचस्पी इस में है कि वे इस फसाद को कैसे सुलझाएंगे.

समझाबुझा कर या दूसरे किसी तरीके से भाजपा इस विवाद को सुलझा भी सकती है लेकिन जो नया वर्ग संघर्ष इस घटना में खुलेआम दिखा, उस का कोई इलाज उस के पास भी नहीं है क्योंकि मूर्तियों का मर्ज ज्यादा फैलाया भी उसी ने है.

कांग्रेस के दौर में इस मामले में बड़ा सुकून था जो गांधीनेहरू की मूर्तियां लगा कर पल्ला झाड़ लेती थी. वक्तजरूरत वह रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चंद्र बोस, भीमराव आम्बेडकर सहित महाराणा प्रताप की मूर्तियों को भी जगह देती थी. उस के पास मूर्तियों में भी कोटा सिस्टम था कि 80 फीसदी मूर्तियां गांधीनेहरू की लगेंगी, बाकी 20 फीसदी में दूसरे महापुरुष एडजस्ट किए जाएंगे.

भाजपा ने हथियाए पटेल

इस व्यवस्था यानी मूर्तियों के कोटा सिस्टम पर किसी ने कोई खास एतराज नहीं जताया. उलट इस के, जो भी दल सत्ता में आते गए उन्होंने भी अपने ईष्टों की मूर्तियों को लगाना शुरू कर दिया. बसपा प्रमुख मायावती इन में अव्वल रहीं जिन्होंने अपनी पार्टी के चुनावचिन्ह हाथी सहित आम्बेडकर और कांशीराम के साथसाथ खुद की भी मूर्तियां पार्कों व चौराहों पर लगवा दीं. करोड़ों रुपए मूर्तियों पर फूंकने के बाद भी दलितों का कोई भला नहीं हुआ बल्कि सियासी वनवास काटते खुद मायावती ही इन दिनों अपने महलनुमा घर में बुत की तरह बैठी हैं.

नरेंद्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद मूर्तिवाद फैलाया. वल्लभभाई पटेल की 597 फुट ऊंची मूर्ति (लागत 2,989 करोड़ रुपए) गुजरात में नर्मदा नदी के किनारे किस का क्या भला कर रही है, यह राम जाने. स्टेच्यू औफ यूनिटी नाम की इस मूर्ति से कितनी यूनिटी आई, यह माकड़ोंन से साफ उजागर हुआ कि धार्मिक हो या वैचारिक, मूर्तियों से कट्टरवाद ही पनपता और फैलता है. अब तो इस मूर्ति को देखने को न के बराबर पर्यटक जाते हैं. माकड़ोंन में पटेल की मूर्ति तोड़ने में युवतियां सब से आगे थीं. यह युवाओं के लिहाज से चिंता की बात है कि यह मूर्तिवाद उन्हें किस दिशा में ले जा रहा है.

आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में भीमराव आंबेडकर की 125 फुट ऊंची मूर्ति की लागत 404 करोड़ रुपए आई थी जिस से नाम के मुताबिक स्टेच्यू औफ सोशल जस्टिस नहीं मिल रहा. पटेल को हथियाने के बाद तो भाजपा को मूर्ति रोग ऐसा लगा कि उस ने देशभर में जगहजगह मूर्तियां लगवाईं और इस से भी जी न भरा, तो उस ने मंदिरों पर जम कर पैसा लुटाया.

22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा को तो दीवाली की तरह मनाया गया. इस मूर्ति और मंदिर पर भी तबीयत से पैसा फूंका जाना बुद्धिमानी की बात तो कतई नहीं मानी जा सकती.

बढ़ रहा है वर्ग संघर्ष

विविधता वाले हमारे देश में मूर्तियां कितनी संकीर्णता फैला रही हैं, माकड़ोंन इस का ताजा उदाहरण है. नहीं तो आएदिन के फसाद आम बात हैं. ये मूर्तियां न केवल कीमती जगह घेरती हैं बल्कि इन के रखरखाव पर भी तगड़ा पैसा खर्च होता है. छोटेमोटे विवाद तो आम बात हैं. अब से कोई डेढ़ साल पहले ही इन्हीं पटेल की मूर्ति को ले कर झारखंड के रामगढ़ कसबे में कांग्रेस और आजसू के कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए थे, जिस से वहां भी धारा 144 लगानी पड़ी थी.

मूर्तियां कैसे आपसी द्वेष और बैर फैलाती हैं, इस की एक मिसाल पिछले साल जुलाई में हरियाणा के कैथल से भी देखने में आई थी जब गुर्जर और राजपूत समुदायों के लोग आपस में भिड पड़े थे. ये दोनों ही सम्राट मिहिर भोज चौक पर लगी राजा मिहिर की मूर्ति पर गुर्जर शब्द लिखे और हटाए जाने पर धरनाप्रदर्शन करते नजर आए थे.

वहां के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी इस विवाद को नहीं सुलझा पाए थे, तो उन का पुतला भी राजपूत समाज ने फूंका था. कई भाजपा नेताओं ने विरोध जताते पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया था. 9 अगस्त, 2023 को हाईकोर्ट के आदेश पर गुर्जर शब्द पर काली पट्टी लगा दी गई थी.

अब मिहिर गुर्जर थे या राजपूत, यह अगर विवाद का विषय है तो लोगों की अक्ल पर तरस ही खाया जा सकता है कि इन फसादों से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, उलटे, रहासहा आपसी भाईचारा गायब हो जाता है. 2 समुदायों और जाति के लोग आपस में दुश्मन बन बैठते हैं, जैसे कि माकड़ोंन में बैठे हैं.

अब यह दलितों और पिछड़ों के सोचने की बात है कि मूर्तियों से उन्हें कुछ मिलता जाता नहीं. यह तो ब्राह्मणों के रोजगार का जरिया है जिस पर आपस में झगड़ना कोरी वेबकूफी है.

स्वाद के साथ सेहत से भरपूर है सूप, जानें सर्दियों में इसे पीने के शानदार फायदे

Benefits of Soup in Winter : सर्दियों के मौसम में हरी सब्जियां खाने का मजा ही कुछ और है. इससे न सिर्फ शरीर हेल्दी रहता है, बल्कि कई मौसमी बीमारियों के होने का खतरा भी बहुत ज्यादा कम हो जाता है. हालांकि जिन लोगों को सब्जियां खाना पसंद नहीं है, वो लोग तरह-तरह की सब्जियों से सूप बनाकर भी पी सकते हैं.

ठंड के दिनों में  गरमागरम सूप पीना शरीर के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद होता है. इसमें विटामिन्स, मिनरल, प्रोटीन, मैग्नीशियम और एंटी-औक्सीडेंट्स आदि कई पौष्टिक गुणों की भरपूर मात्रा होती हैं, जिससे सर्दी, जुकाम, खांसी और नाक बहना जैसे मौसमी बीमारियों से छुटकारा मिलता है. इसके अलावा इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है. आइए जानते हैं ठंड के दिनों में सूप (Benefits of Soup in Winter) पीने से शरीर को क्या फायदे मिलते हैं.

सूप पीने के फायदे

इम्यून सिस्टम होगा मजबूत

सर्दियों में कमजोर इम्युनिटी के कारण कई बीमारियों का खतरा रहता है, ऐसे में इम्युनिटी बढ़ाने के लिए आप अपनी डाइट में सूप शामिल कर सकते हैं. दरअसल, सूप में वो सभी जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जो स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है. इसलिए इसके नियमित सेवन से इम्यून सिस्टम मजबूत होगा.

मौसमी बीमारियों का खतरा होगा कम

सर्दियों में पत्तागोभी, मशरूम, टमाटर, कद्दू, बीन्स और स्वीट कॉर्न का सूप पीना शरीर के लिए अच्छा होता है. इससे सर्दी, जुकाम, खांसी और नाक बहना आदि मौसमी बीमारियों के होने का खतरा कम हो जाता है. वहीं जिन लोगों को खांसी या गले में खराश की समस्या रहती है, वो सूप (Benefits of Soup in Winter) में चुटकी भर काली मिर्च डाल कर भी उसे पी सकते हैं.

शुगर रहेगा कंट्रोल

सर्दियों में साबुत दालों से बना सूप पीना भी फायदेमंद होता है. दरअसल, दालों में मिनरल्स और विटामिन्स की भरपूर मात्रा होती है, इसे पीने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है.

डिहाइड्रेशन से मिलेगा छुटकारा

इस मौसम में ज्यादातर लोग पानी कम पीते हैं, जिससे शरीर डिहाइड्रेटेड होने लगता है, लेकिन रोजाना सूप पीने से शरीर डिहाइड्रेट नहीं होगा, साथ ही संक्रमण होने की संभावना भी कम होती है. 

वजन होगा कम

सूप (Benefits of Soup in Winter) को लौ-कैलोरी फूड के रूप में  जाना जाता है, इसलिए वेट लॉस डाइट में सूप पीने की सलाह दी जाती है. ऐसे में सर्दियों में वजन मेंटेन करने के लिए रोजाना सूप पी सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

क्या आप भी खाते हैं जरूरत से ज्यादा बादाम, तो अब जान लीजिए इसके कई नुकसान

Almonds Side Effects : सर्दियों में बादाम, काजू, पिस्ता और अखरोट आदि ड्राई फ्रूट्स खाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है, लेकिन हमेशा इनका सीमित मात्रा में ही सेवन करना चाहिए. जरूरत  से ज्यादा कोई भी चीज खाने के कई बड़े नुकसान हो सकते हैं.

ठंड के दिनों में रोजाना बादाम खाने की सलाह दी जाती है. आप खाने में इसका इस्तेमाल कई तरह से कर सकते हैं. हलवे में बादाम की गार्निशिंग से लेकर आप इसकी मिठाई भी बना सकते हैं. इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-ई, विटामिन-के, जिंक और ओमेगा-3 फैटी एसिड आदि तमाम पोषक तत्वों की उच्च मात्रा होती हैं, लेकिन अधिक मात्रा में इसका सेवन करना नुकसानदायक भी हो सकता है. इससे पाचन से जुड़ी समस्याएं, एलर्जी और यहां तक की पथरी की दिक्कत भी बढ़ सकती है. चलिए जानते हैं,  ज्यादा बादाम (Almonds Side Effects) खाने से क्या समस्याएं होती हैं.

ज्यादा बादाम खाने के नुकसान

पाचन की समस्याएं

जो लोग नियमित रूप से बादाम (Almonds Side Effects) का अधिक मात्रा में सेवन करते हैं, उन्हें कब्ज, गैस, सूजन और लूज मोशन आदि पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. दरअसल, बादाम में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है और जरूरत से ज्यादा फाइबर का सेवन शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है.

बढ़ सकता है वजन

बादाम में फैट्स, कैलोरी और मोनोसैचुरेटेड फैट की उच्च मात्रा होती है, जिससे वजन बहुत जल्दी बढ़ता है. इसके अलावा इससे दिल पर भी असर पड़ता है.

हो सकती है एलर्जी

बादाम का अधिक मात्रा में सेवन करने से एलर्जी और त्वचा पर चकत्ते आदि की समस्याएं भी हो सकती हैं. जिन लोगों को एनाफिलेक्सिस की दिककत रहती है, उन्हें तो बादाम खाने से परहेज ही करना चाहिए.

पथरी

बादाम (Almonds Side Effects) में ऑक्सालेट की उच्च मात्रा होती है. इसलिए जिन लोगों को किडनी स्टोन यानी पथरी की समस्या है, उन्हें बादाम खाने से बचना चाहिए.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

‘दक्षिणा बैंक’ में जमा हो रही मेहनत की कमाई

25 साल के नवल की पहली सैलरी आई तो उस के घर वालों ने कथा सुनने और मंदिर में दान देने में लगवा दी. नवल अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर के बचे पैसे बैंक खाते में रखना चाहता था. घर वालों ने कहा कि अगर वह मंदिर और दानपुण्य में पैसा देगा तो भगवान उस की मदद करेंगे और वह तरक्की करेगा. उस ने यही किया. पहली सैलरी ही नहीं, उस के बाद हर माह घर के लोग कोई न कोई कार्यक्रम तय कर लेते थे. इस तरह नौकरी करने के बाद उस की जो भी छुट्टी मिलती थी उस वक्त वह कहीं न कहीं मंदिर घूमने के लिए परिवार के साथ जाता था. इसी के बाद कोविड आ गया था. उस की सेलरी में 20 प्रतिशत की कटौती कर दी गई.

कोविड में कटौती ने उस के सारे गणित को बिगाड़ दिया. उस के वे दोस्त मजे से अपनी कम हुई सैलरी में भी खुश थे जिन्होंने बचत की थी. उसे अब लग रहा था कि पैसे को दानपुण्य में खर्च न कर के अगर बचाया होता तो उस को मदद मिलती. अब वह दक्षिणा बैंक में पैसा जमा करने की जगह पर बचत खाते में पैसा जमा कर रहा है. उसे लग रहा है कि जरूरत पड़ने पर यही उस के काम आएगा. कोविड में जब उसे पैसे की जरूरत थी तब किसी ने मदद नहीं की थी. दक्षिणा बैंक उस के काम नहीं आया.

बचत में आई भारी गिरावट

भारत में कमाने वाले तेजी से बढ़ रहे हैं. लोगों की आमदनी बढ़ रही है. प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ रही है. इस के बाद भी बचत में कमी आ रही है. भारत का घरेलू बचत 50 साल के निचले स्तर पर आ गया है. हाउसहोल्ड एसेट और लायबिलिटीज पर रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार साल 2022-23 के दौरान नेट हाउसहोल्ड सेविंग गिर कर 5.1 फीसदी रह गई है.

जीडीपी के हिसाब से देखें तो इस साल भारत की शुद्ध बचत गिर कर 13.77 लाख करोड़ रुपए रह गई है. यह बीते 50 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है. इस से एक साल पहले यह 7.2 फीसदी थी. इस की वजह यह है कि लोगों की आमदनी में भारी कमी आई है. कोरोनाकाल के बाद लोग बचाने के बजाय खर्च ज्यादा करने लगे हैं.

चिंता की बात यह है कि बचत घट रही है, देनदारियां बढ़ रही हैं. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि लोगों की फाइनैंशियल लायबिलिटीज तेजी से बढ़ी है. साल 2022-23 में यह तेजी से बढ़ते हुए जीडीपी के 5.8 फीसदी तक पहुंच गई. जबकि एक साल पहले यह महज 3.8 फीसदी ही थी.

इस का मतलब है कि लोग कंजप्शन परपज के लिए ज्यादा लोन लेने लगे हैं चाहे वे घरेलू सामान खरीद रहे हैं या जमीन, मकान, दुकान आदि खरीद रहे हैं. आजादी के बाद यह दूसरा मौका है जब लोगों की फाइनैंशियल लायबिलिटीज इतनी तेजी से बढ़ी हैं. इस से पहले साल 2006-07 में यह दर 6.7 फीसदी थी जब विश्व में आर्थिक मंदी का दौर आया था.

आरबीआई के मुताबिक ऐब्सोल्यूट टर्म में देखा जाए तो साल 2020-21 के मुकाबले 2022-23 के दौरान नेट हाउसहोल्ड एसेट में भारी गिरावट हुई है. साल 2020-21 के दौरान शुद्ध घरेलू संपत्ति 22.8 लाख करोड़ रुपए की थी जो कि साल 2021-22 में तेजी से घटते हुए 16.96 लाख करोड़ रुपए तक गिर गई.

साल 2022-23 में तो यह और घट कर 13.76 लाख करोड़ रुपए ही रह गई. इस के उलट, फाइनैंशियल लायबिलिटीज की बात करें तो हाउसहोल्ड डेट या कर्ज बढ़ोतरी ही हो रही है. साल 2021-22 में यह जीडीपी के 36.9 फीसदी थी जो कि साल 2022-23 में बढ़ कर 37.6 फीसदी तक पहुंच गई. बचत घटने और कर्ज बढ़ने के पीछे बढ़ती महंगाई का बड़ा हाथ है. यह अमीर और गरीब के बीच की दूरी को बढ़ाती जा रही है.

बाजार पर इस का अच्छा असर नहीं पड़ रहा है. नवंबर-दिसंबर माह में त्योहार और वैडिंग सीजन का भी बाजार पर अच्छा असर नहीं पड़ा. रिटेल बिक्री फीकी ही रही. दिसंबर 2023 में केवल 4 फीसदी की ग्रोथ रही. लोगों ने खर्चो में कटौती कर के ईएमआई वाले सामान खरीदे. ईएमआई में घर, बाड़ी और इलैक्ट्रौनिक सामान खरीदे. रिटेल ग्रोथ 2022 के मुकाबले के 2023 में केवल 4 फीसदी ही बढ़ी. 2023 अक्टूबर में यह ग्रोथ 7 फीसदी देखी गई थी. दिसंबर में छूट के बाद भी रिटेल की ग्रोथ कम हुई.

बढ़ रहा दक्षिणा बैंक

अयोध्या के राममंदिर में करोड़ों रुपए का चढ़ावा पहले ही दिन आ गया. इस को ले कर अलगअलग दावे किए जा रहे हैं. राममंदिर ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने सोने के दरवाजे और चांदी के कमल के बारे में कहा कि इस से अच्छा होता कि पैसा दान दिया जाता. राममंदिर की दानपेटी में नकद चढ़ावा रोज 2 से 3 लाख रुपए का आ रहा है. इस के अलावा चांदी और सोने का चढ़ावा अलग से आ रहा है.

भारत में कई ऐसे मंदिर हैं जहां हर साल करोड़ों रुपयों का चढ़ावा आता है. केरल में त्रिवेंद्रम स्थित पद्मनाभ स्वामी मंदिर भारत का सब से अमीर मंदिर माना जाता है. मंदिर के खजाने में हीरे, सोने के गहने और सोने से निर्मित मूर्तियां शामिल हैं. मंदिर की 6 तिजोरियों में 20 अरब डौलर की कुल संपत्ति है. मंदिर में स्थापित महाविष्णु भगवान की मूर्ति सोने से बनी है. मूर्ति की अनुमानित कीमत 500 करोड़ रुपए है.

इस के बाद आंध्र प्रदेश का तिरुपति बालाजी मंदिर है. तिरुपति बालाजी मंदिर का करीब 5,300 करोड़ रुपए का 10.3 टन सोना और 15,938 करोड़ रुपए कैश बैंकों में जमा है. इस तरह इस मंदिर की कुल संपत्ति 2.50 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जाती है.

महाराष्ट्र के शिरडी में स्थित साईं बाबा मंदिर है. मंदिर के बैंक खाते में 380 किलो सोना, 4,428 किलो चांदी और डौलर व पाउंड जैसी विदेशी मुद्राओं के रूप में बड़ी मात्रा में धन के साथसाथ लगभग 1,800 करोड़ रुपए जमा हैं. वैष्णो देवी मंदिर देश के अमीर मंदिरों में से एक है. सालभर यहां मां के दर्शन के लिए हजारों भक्त आते हैं. 500 करोड़ रुपए सालाना यहां के श्राइन बोर्ड को भक्तों के चंदे से मिलते हैं.

मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है. यहां सैलिब्रिटी से ले कर आम नागरिक तक माथा टेकने और मन्नत मांगने आते हैं. इस मंदिर को 3.7 किलोग्राम सोने से कोट किया गया है. मंदिर को दान और चढ़ावे से सालाना करीब 125 करोड़ रुपए की आय होती है. मंदिरों में आने वाला चढ़ावा बताता है कि देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है. एक तरफ 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो फ्री राशन पाते हैं, दूसरी तरफ, लोग सोना और चांदी मंदिरों में दान दे रहे हैं.

75वें स्वतंत्रता दिवस पर मायावती ने उठाई आवाज

वैसे तो बसपा प्रमुख मायावती केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना कम ही करती हैं. 75वें स्वतंत्रता दिवस पर सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट में मायावती ने कहा, ‘देश की प्रगति का सही मापदंड गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि का उन्मूलन तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि है, न कि जीडीपी और बड़ेबड़े पूंजीपतियों-घन्नासेठों की पूंजी में इजाफा है. देश दावों और वादों के बजाय ठोस प्रगति की राह पर चले तो बेहतर होगा.’

असल में धार्मिक कट्टरता अमीर और गरीब दोनों के साथ देश के हित में भी नहीं होती. दुनिया में इस के तमाम उदाहरण मौजूद हैं. ईरान अमीर देश है लेकिन कट्टर होने के कारण प्रगति नहीं कर पा रहा. इसी तरह से अफगानिस्तान गरीब देश है लेकिन कट्टर होने के कारण और गरीब होता जा रहा है.

कोई भी समाज तभी प्रगति की राह पर चल सकेगा जब वह देश में रहने वाले हर नागरिक को साथ ले कर चले. देश में अमन, चैन और शांति हो. लड़ाई, झगडे, तनाव और कट्टरता प्रगति में बाधक होते हैं. देश और समाज की नीतियां जोड़ने वाली होनी चाहिए, तोड़ने वाली नहीं. धर्म और कट्टरता विकास में बाधक होते हैं.

सिख और साजिश

खालिस्तान का सवाल सिर्फ लोगों का मुंह बंद करने, कुछ को गिरफ्तार करने, कुछ को समाप्त करने या मीडिया पर चुप्पी थोपने से बंद न होगा. यह अफसोस है कि हिंदू समाज की कुरीतियों से बचने के लिए बना एक सैक्ट आज अलग धर्म बन गया और उस के अनुयायी दुनियाभर में हिंदू-सिख खाई को चौड़ा करने में लगे हैं.

हिंदू धर्म ने बहुत से अलग धर्मों या संप्रदायों को पैदा होने का मौका दिया और उन में से बहुत से फिर उस सनातन धर्म में मिल गए हैं जिन के आराध्य विष्णु के अवतार हैं और जो वेदों व पुराणों को अपने धर्म का स्रोत मानते हैं. बौद्ध व जैन धर्म अलग हैं पर वे उस तरह अलग पहचान वाले नहीं हैं जिस तरह सिख हो गए हैं.

औपरेशन ब्लूस्टार के कारण 2 सिखों द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या किए जाने के बावजूद कांग्रेस ने किसी तरह मानमनौवल कर सिखों को अलगाववादी रवैया छोड़ने को राजी कर लिया था. प्रधानमंत्री राजीव गांधी व संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच हुए राजीव-लोंगोंवाल समझते के बाद सिख विवाद समाप्त सा हो गया था. अब भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद भारत में तो यह उभर नहीं रहा पर दुनियाभर में फैले सिख उसे इस्तेमाल कर रहे हैं. दुनियाभर में फैले कट्टरवादी हिंदू आजकल मंदिरों का जम कर निर्माण कर रहे हैं तो इस के जवाब में सिखों का रुख भी विदेशों में कड़ा होता जा रहा है.

एक ही जमीन से गए लोग, एक ही समाज के लोग, एक ही भाषा के लोग बाहर जा कर अलगअलग हो जाएं, यह हमारी बहुत बड़ी विफलता है. यह हमारे देश की सरकार और हमारे समाज की कमजोरी व गलती है कि गुरुपतवंत सिंह पन्नू जिस की अमेरिका में की गई हत्या की साजिश में एक हिंदू आरोपी निखिल गुप्ता पर मुकदमा शुरू हो गया है. यही नहीं, कनाडा सरकार व उस के प्रधानमंत्री भी कनाडा में ही एक दूसरे सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए भारतीय सरकारी गुप्तचरों को दोषी मान रहे हैं.

यह सोच कि जैसे भारत में पत्रकारों, विचारकों, विपक्षी दलों, स्वतंत्र जनता को धमका कर या सामाजिक बहिष्कार का रास्ता अपना कर चुप कराया जा सकता है, वैसे ही पश्चिमी देशों के लोकतंत्रों में भारतीय सरकार विरोधी आवाजों को बंद करने से समस्या का हल हो जाएगा, गलत है.

भारत सरकार जो उपाय अपना रही है वे पुलिसिया हैं. राजनीतिज्ञ दूर की सोचते हैं. पुलिस वाला यह नहीं सोचता कि पौकेटमार पैदा क्यों हुआ, वह उसे मारपीट कर या जेल में बंद कर सजा देता है. राजनीति सम?ाती है कि पौकेटमार पैदा ही क्यों हुआ? भारत सरकार अपने ढोलों की आवाजों से इतनी बहरी हो गई है कि उसे सम?ा नहीं आ रहा कि देश के या विदेश के सिख आज भारत से नाराज क्यों हैं?

सिख बंटवारे के समय हिंदुओं की तरह पाकिस्तान के इलाकों से भाग कर आए. कितनों ने ही जानें दीं. आज वे भारत में ऊंचे पदों पर भी हैं. फिर भी, एक वर्ग नाखुश हो, तो यह मौजूदा भगवा सरकार की गंभीर पराजय है जो राममंदिर के निर्माण और उद्घाटन के समय आने वालों द्वारा उड़ाई गई धूल में छिप नहीं सकती. इस के लिए दोषी हर वह भारतीय भी है जो धर्म के नाम पर अपने को अलग सम?ाता है.

मेरी छाती लड़कियों की तरह उभर आई है, अब आप ही बताइए मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 12वीं कक्षा का छात्र हूं और डाक्टर बनने का इच्छुक हूं. समस्या यह है कि 13 साल की उम्र से मेरी दोनों छातियां लड़की की छातियों की तरह कुछकुछ बाहर की तरफ उठ आई हैं. मुझे चिंता है कि कहीं इस कारण मैं मैडिकल प्रवेश परीक्षा से पहले शारीरिक जांच के समय अनुत्तीर्ण न हो जाऊं? परेशान हूं. कृपया मुझे इस समस्या का उपाय बताएं ?

जवाब

जिस समय लड़केलड़कियां बचपन की दहलीज लांघ किशोरावस्था में पहुंचते हैं उस समय उन में पुरुष और स्त्री यौन हार्मोन बनने लगते हैं. लड़कों में पुरुष हार्मोन और लड़कियों में स्त्री हार्मोन अधिक बनते हैं पर कुछ में विपरीत सैक्स के हार्मोन भी बनते हैं.

इसी के फलस्वरूप कुछ लड़कों की छाती लड़कियों की छाती जैसी बढ़ जाती है और कुछ लड़कियों में लड़कों की तरह चेहरे पर बाल आ जाते हैं. ऐसा हो तो बहुत विचलित होने की जरूरत नहीं होती. कई लड़कों में समय के साथ छातियां अपनेआप सही हो जाती हैं. अगर 18-20 साल की उम्र तक भी छातियां कम न हों और अटपटा लगे तो किसी कौस्मैटिक सर्जन से मिल कर सलाह ली जा सकती है.

अगर छातियां चरबी जमने से बढ़ी हुई हों तो लाइपोसक्शन द्वारा चरबी घटाई जा सकती है पर यदि छातियों में ग्रंथि ऊतक अधिक हों तो छोटे से औपरेशन से छातियों को छोटा किया जा सकता है.

जहां तक मैडिकल कालेज में प्रवेश के समय होने वाली शारीरिक जांच का सवाल है, उस बाबत आप चिंता त्याग दें. गाइनोकोमैस्टिया नामक यह समस्या मैडिकल जांच के समय अनुत्तीर्णता का कारण नहीं बन सकती.

जब पार्टनर हो बीमार, तो ऐसे रखें ख्याल

जब जीवनसाथी अधिक समय तक बीमार रहते हैं तो वह स्थिति बहुत कष्ट देने वाली होती है. कुछ लोग एकदूसरे से दूर भागने लगते हैं तो कुछ एडजस्ट कर लेते हैं. एक प्राइवेट अस्पताल के फिजियोथैरेपिस्ट डा. गौरव राज राघव कहते हैं कि मैं ने अपने कैरियर में बहुत से मामले देखे हैं जहां लोग लंबी बीमारी से जूझते हैं. मैं आप को कुछ ऐसे ही मामलों के बारे में बताता हूं.

प्राइवेट कालेज में पढ़ा रहे 35 साल के एक प्रोफैसर का शादी के 3 साल बाद ही ब्रेन हैमरेज हुआ और उन्हें पैरालेसिस हो गया. उन की पत्नी काफी सहयोगी थी. आर्थिक स्थिति भी उन लोगों की काफी अच्छी थी. परिवार का पूरा सपोर्ट था लेकिन वह व्यक्ति बहुत चिड़चिड़ाता था. अपनी बीवी पर बहुत गुस्सा होता था. उन का संबंध दिन पर दिन खराब होता जा रहा था. एक दिन तो उन्होंने गुस्से में डाक्टर के सामने अपनी बीवी का गला तक दबा दिया. शायद वे अपनी जिंदगी से हार चुके थे. उन का इलाज लगभग 4-5 सालों तक हमारे यहां चला, उसी बीच उन का तलाक भी हो गया.

38 वर्ष के एक सज्जन को स्पाइन में ट्यूमर था जिसे ठीक करने के लिए उन की 2 बार सर्जरी की गई. इस के बावजूद उन की हालत में कोई फर्क नहीं पड़ा. कई साल तक उन का इलाज चलता रहा. उन के 2 बच्चे थे. उन की पत्नी उन की देखरेख में लगी रहती थी. वह घर के साथ उन्हें भी संभाल रही थी. हां, कभीकभी निराशा में हम ने उसे जरूर देखा लेकिन उस की हिम्मत टूटते हुए कभी नहीं देखा. उस ने पति का पूरा सहयोग दिया.

शादी अपने साथ कई तरह की चुनौतियां लाती है और अगर पति, पत्नी में से किसी एक को गंभीर बीमारी हो जाए तो मामला पेचीदा हो जाता है. कुछ लोग एकदूसरे का साथ देने के बजाय परेशान व हताश हो जाते हैं. इस बारे में रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट कमल खुराना का कहना है, ‘‘जब पति या पत्नी में से कोई एक बीमार हो जाता है तो उन के मन में कई तरह के सवाल चलते हैं कि यदि और ज्यादा तबीयत खराब हो गई तो मैं क्या करूंगी या करूंगा? ऐसा कितने समय तक चलेगा, घर का खर्चापानी कैसे होगा आदि. एकदूसरे के रिश्तों में भी असर पड़ने लगता है और छोटीछोटी बात कभीकभी बतंगड़ बन जाती है.

‘‘दुख की ही बात है कि जब पति, पत्नी में से कोई एक गंभीर रूप से बीमार हो जाता है तो कई जोड़े यह सब बरदाश्त नहीं कर पाते और तलाक ले लेते हैं. लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि आप की शादी का भी यही अंजाम होगा.’’ ऐसे बहुत से जोड़े हैं जो अपनी जिंदगी के मुश्किल दौर में भी एकदूसरे का साथ देते हैं. इस बारे में गुरु तेग बहादुर अस्पताल की नर्स विमला कोहली बताती हैं :

मेरा एक पेशेंट था-विकास. उस की रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाने के कारण वह बिना किसी मदद के हिलडुल भी नहीं सकता था. उसे हर समय किसी की मदद की जरूरत पड़ती थी. लगभग 2 महीने तो वह अस्पताल में भरती रहा. उस की पत्नी अस्पताल में आती रहती थी. धीरेधीरे उस की पत्नी की भी तबीयत खराब रहने लगी. उस ने बताया कि पति की देखभाल करतेकरते मेरी गरदन, कंधे और बाजुओं में लगातार दर्द रहने लगा. वह भी अपनी फिजियोथेरैपी करा रही थी. इन सारी मुश्किलों के बावजूद उन का रिश्ता कायम है.

कुछ ऐसे भी होते हैं जो बीमारी से खुद तो परेशान रहते ही हैं, अपने साथी को भी परेशान करते हैं क्योंकि उन की यह बीमारी तन के साथ मन की भी हो जाती है. एक 70 साल के बुजुर्ग व्यक्ति का हमारे यहां इलाज चल रहा था. वे लगभग 4 साल से बीमारी से जूझ रहे थे. वे दिन में 4 दवाएं लेते थे. बीच में कई बार ऐसा हुआ कि हम ने दवा की जरूरत न होने पर कुछ दवाएं बंद कर दीं लेकिन दवा बंद कर देने पर उन्हें लगा कि दवाएं कम लेने की वजह से उन की तबीयत बिगड़ रही है. जबकि ऐसा कुछ नहीं था. सच तो यह है कि उन्होंने मानसिक रूप से यह बात मन में बिठा ली थी कि वे सिर्फ दवा लेते रहेंगे तो ठीक हैं वरना नहीं. इसलिए उन की बीमारी तन से ज्यादा मन की हो गई थी.

बीमारी की स्थिति में मुश्किल और बढ़ जाती है. लेकिन हिम्मत हारना और साथी को छोड़ कर चले जाना इस का हल नहीं है, बल्कि आप को कुछ ऐसे तरीके अपनाने होंगे जिन से आप सभी कुछ अच्छी तरह से मैनेज कर पाएं और बीमार व्यक्ति भी इस में आप का पूरा सहयोग दे पाए. आइए जानें, ऐसे ही कुछ तरीकों के बारे में :

बीमार से डील करें :

किसी भी यंग पेशेंट को बीमारी की हालत में जो सवाल सब से ज्यादा परेशान करता है वह यह है कि यह मेरे साथ ही क्यों हुआ. सब से पहले तो उसे इस लूप से बाहर निकालिए और सचाई के धरातल पर आ कर इस स्थिति को थोड़ा ठीक करने के बारे में सोचिए. इस के बाद एक लिस्ट बनाइए जिस में उन तरीकों को लिखिए जिन से आप का साथी मौजूदा हालत को सहना आसान महसूस कर सकता है. एक ऐसी ही लिस्ट साथी को भी बनाने के लिए कहिए. फिर दोनों साथ मिल कर उन में से कुछ सुझाव चुनिए जिन पर अमल किया जा सकता है.

नया करने की सोचें :

क्या आप दोनों ऐसा कोई काम कर सकते हैं जिसे करने पर आप को बीमारी से पहले खुशी मिलती थी? अगर नहीं, तो कुछ नया करने के बारे में सोचिए. आप कोई ऐसा काम ढूंढि़ए जिस में बीमारी बाधा न बन सके, जैसे अंत्याक्षरी खेलना, एकदूसरे को पुस्तक पढ़ कर सुनाना, कोई नई भाषा सीखना आदि.

मेहमानों से कहें कि वे मिलने आएं:

अकसर देखने में आता है कि जब घर में कोई बीमार हो जाता है तो मेहमानों का आना बहुत बुरा लगता है कि बीमार की सेवा करूं या मेहमानों की. लेकिन ऐसा सोच कर लोगों से कट जाना भी सही नहीं है. इस से अकेलापन बढ़ता है और दिमाग पर बुरा असर पड़ता है. इस के विपरीत कभीकभार लोगों से मिलनेजुलने से सेहत पर काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है. सो, लोगों को अपने घर बुलाते रहें.

देखभाल की जरूरत :

साथी अगर बीमार है तो उसे थोड़ी अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है. पति को लंबी बीमारी के साथ डायबिटीज भी है तो उन्हें अलग केयर की जरूरत है. बिना चीनी वाली चाय बनाने के आलस में उन्हें चीनी वाली चाय न दें. यह उन की सेहत के लिए ठीक नहीं है.

पत्नी को चाहिए कि वह पति का पूरा खयाल रखे. अगर पति को डाक्टर ने तेज मसाले व परहेज वाला भोजन खाने की सलाह दी है तो आप खाने में मसालों की मात्रा धीरेधीरे कुछ इस तरह कम करें कि पति को पता ही न चले. धीरेधीरे वे ऐसे भोजन के आदी हो जाएंगे. खाने में मसाले व घीतेल की मात्रा अगर पति को बता कर कम करेंगी तो उन्हें अखरेगा.

पति को समयसमय पर चैकअप कराने ले जाती रहें और डाक्टर के द्वारा दी गई हिदायतों को डायरी में पति के हाथों से ही नोट कराएं. समयसमय पर वह डायरी उन्हें दिखा कर याद भी दिलाती रहें. पति की सेहत के लिए जिस तरह का भोजन जरूरी है, उसे अलगअलग तरह की रेसिपी के साथ बना कर खिलाएं ताकि खाने से उन्हें बोरियत न हो.

नए नए विषयों पर बातचीत करें :

घर में हर वक्त साथी की बीमारी की ही चर्चा नहीं होनी चाहिए. बातचीत के विषय को बदलें. करंट अफेयर्स से जुड़ें और रोज अखबार पढ़ कर साथी से नए विषयों पर उन की राय ले कर अपनी राय दें.

कहें कि तुम ठीक हो रहे हो :

अगर साथी की हालत में थोड़ी सी भी बेहतरी दिखे तो उन्हें यह बताएं. हौसला बढ़ाते हुए उन्हें समझाएं कि वे ठीक हो रहे हैं और कुछ दिनों में ही वे पूरी तरह ठीक हो जाएंगे. ऐसा करने पर उन्हें हिम्मत मिलेगी.

घर का माहौल सामान्य बनाए रखें :

साथी के बीमार होने की वजह से अगर घर का माहौल गमगीन बना रहेगा तो यह उन्हें अच्छा नहीं लगेगा. साथी के बीमार होने की वजह से अपने जरूरी कामों को न टालें. बच्चों को स्कूलकालेज भेजते रहें. शौपिंग पर भी जाएं, घर में मेहमानों का आनाजाना भी रखें. साथी को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि उन की वजह से आप की जिंदगी भी रुक सी गई है. अगर ऐसा हुआ तो वे इस के लिए खुद को जिम्मेदार मानेंगे और खुद को कभी माफ नहीं कर पाएंगे.

अपने काम स्वयं करने दें :

अगर साथी अपना नहाने, खानेपीने और दूसरे जरूरी काम खुद करना चाहता है तो उसे करने दें क्योंकि अगर बीमारी लंबी है तो आप भी ये सब काम करते हुए परेशान हो जाएंगी और साथी को भी दूसरों पर निर्भर होने की आदत पड़ जाएगी, इसलिए जरूरी है कि उन की मदद के लिए हर समय तैयार रहें लेकिन जो काम वे खुद से कर सकते हैं उन्हें करने दें.

बाहर नहीं तो घर में एंजौय कराएं :

अगर पति बीमारी की वजह से बाहर जाने में असमर्थ हैं तो इस का यह मतलब नहीं है कि उन्हें एंजौय करने का अधिकार नहीं है. अगर वे बाहर मूवी देखने नहीं जा सकते तो क्या हुआ उन के लिए घर पर ही ऐसा माहौल तैयार करें कि वे थिएटर में मूवी देख रहे हैं. कोई अच्छी सी मूवी डीवीडी पर लगाएं और कमरे में अंधेरा कर सपरिवार उसे एंजौय करें.

भविष्य से जुड़ी बातें करें :

जिस तरह पहले आप भविष्य से जुड़ी बातें करते थे वैसा अभी भी करें. उन से बच्चों, परिवार आदि के भविष्य के बारे में बात करें. उन के और अपने सपनों से जुड़ी बातें करें. इस से उन का जिंदगी जीने का जज्बा बना रहेगा. उन का यह जज्बा उन्हें जल्दी ठीक होने में मदद करेगा.

साथी को बिजी रखें :

साथी लंबी बीमारी से जूझ रहा है तो हर वक्त बिस्तर पर खाली पड़ेपड़े उस का मन ऊब जाएगा, इसलिए उसे बिजी रखने की कोशिश करें. उस का अगर कोई शौक हो जैसे कि लिखना या फिर गाना गाना या फिर कोई और हो जो वह बीमारी के साथ भी आसानी से कर पाए, उसे करने को प्रेरित करें. बच्चे के साथ बिजी रखें, टीवी देखने, अखबार पढ़ने आदि कामों में बिजी रखें.

साथी को डिप्रैशन से निकालें :

अपनी बीमारी से तंग आ कर ऐसा समय भी आएगा जब साथी को अपनी जिंदगी बेमानी लगने लगेगी और उसे लगेगा कि वह बेवजह सब पर बोझ बना हुआ है और यहीं से उस के डिप्रैशन की शुरुआत होगी. लेकिन वह ऐसी सिचुएशन में आ ही नहीं पाए, इस का आप को पूरा खयाल रखना होगा. अगर वह डिप्रैशन में आ गया तो उस की बीमारी तन से ज्यादा मन की हो जाएगी और फिर उसे ठीक कर पाना पहले से भी बहुत ज्यादा कठिन हो जाएगा. उस की नींद का पूरा ध्यान रखें, अगर वह थोड़ा भी डिप्रैस है तो उस से बात करें, उस की समस्याओं का हल निकालें. उसे बताएं कि आप को उस की कितनी जरूरत है. डाक्टर से डिप्रैशन दूर करने के सैशन भी दिलवाएं क्योंकि अगर शुरुआती दौर में ही आप ने ध्यान दिया तो वह डिप्रैशन से बच सकता है वरना बाद में मुश्किल हो जाएगी.

अहमियत बताएं :

लंबी बीमारी से जूझतेजूझते कई बार साथी के मन में जीने की इच्छा लगभग बिलकुल समाप्त हो जाती है. उसे लगने लगता है कि उस का जीवन व्यर्थ है, वह किसी के काम नहीं आ सकता. ऐसे में सिर्फ आप ही हैं जो उस की इस सोच को बनने से रोक सकती हैं. साथी को यह बताएं कि उस के बिना आप का जीवन और परिवार का भविष्य कुछ नहीं है. आप उसे बताएं कि सबकुछ अपने बलबूते पर करने की हिम्मत आप को उन से ही मिल रही है. अगर साथी नहीं तो आप की जिंदगी कितनी खाली और बेरंग हो जाएगी.

खुद भी हिम्मत रखें :

अगर पूरे घर में सब से ज्यादा हिम्मत की जरूरत किसी को है तो वह बीमार की तीमारदारी करने वाले व्यक्ति को है. क्योंकि वही है जिस के इर्दगिर्द पूरा घर चल रहा है और बीमार की सेवा भी हो रही है. ऐसे में अगर दुखी हो कर वह खुद हिम्मत छोड़ देगा तो न केवल घर चलाना मुश्किल हो जाएगा बल्कि बीमार की देखभाल करना भी एक कठिन कार्य होगा. आप को हिम्मत रखता हुआ देख कर ही घर के बाकी सदस्यों को हिम्मत और विश्वास मिलेगा.

पौजिटिव रहें :

साथी को बीमारी की हालत में देख मन में बुरेबुरे विचारों का आना लाजिमी है. मन कुछ गलत होने के विचार से ही कांप जाता होगा और आप का पूरा मनोबल टूटने के लिए यह एक विचार ही काफी होता होगा. लेकिन आप को अपने मन में पल रहे इन नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक बनना होगा और सोचना होगा कि सब ठीक है और जो ठीक नहीं है उसे आप ठीक कर देंगी.

चिड़चिड़ाएं नहीं :

अगर आप साथी (बीमार) से चिड़चिड़ा कर बात करेंगी और यह जताएंगी कि उस की तीमारदारी करतेकरते आप थक चुकी हैं तो साथी का मनोबल टूट जाएगा और वह डिप्रैस्ड हो जाएगा. इसलिए जब आप को खुद को डिप्रैस्ड महसूस हो, तो साथी के पास न जाएं बल्कि अपने को रिलैक्स करने के तरीके खोजें. जब आप सही और खुश रहेंगी तभी साथी को ठीक कर पाएंगी.

भावनाओं को समझें :

अगर बीमार व्यक्ति चिड़चिड़ा रहा है तो उस के चिड़चिड़ाने की वजह जानें कि उसे गुस्सा क्यों आ रहा है. क्या वह बीमारी की वजह से परेशान है इसलिए गुस्सा कर रहा है या उसे पहले से ही गुस्सा करने की आदत है या फिर आप के बीच कोई तालमेल की कमी है.

कुछ लोग बीमार होने पर भावुक हो जाते हैं और सोचते हैं कि उन का साथी उन से दूर चला जाए क्योंकि वे उस पर बोझ नहीं बनना चाहते इसलिए ही उन का व्यवहार बदल जाता है. ऐसे में उन के इमोशंस को समझना जरूरी है, नैगेटिव न सोचें. अपनेआप को मजबूत बनाएं.

वैलेंटाइन डे- पति पत्नी की प्यार भरी कहानी

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फिल्मों में भ्रमित करने वाले सीन्स VFX यानी विजुअल इफैक्ट का क्या है भविष्य, जाने यहां

फिल्में चाहे हिंदी हों या अंग्रेजी, अकसर ऐसे कई सीन्स देखें होंगे, जिस को देख कर आप अवश्य हैरान रह गए होंगे और सोचा होगा कि ये कैसे होना संभव है, कैसे किया होगा? तो इस का उत्तर है VFX यानि विजुअल इफैक्ट.

क्या है वीएफएक्स ?

यह एक ऐसी कंप्यूटर सौफ्टवेर तकनीक है जिस का उपयोग लाइव ऐक्शन शौट्स और डिजिटल छवियों के कौम्बिनेशन से वीडियो बनाने के लिए किया जाता है. ऐक्शन फिल्मों में हीरो को हेलिकौप्टर से कूदते या विशालकाय राक्षसों से लड़ते हुए देखा होगा. ये सभी सीन VFX का इस्तेमाल कर के बनाए जाते हैं. ये इफैक्ट फिल्म को और भी ज्यादा खास बना देते हैं, जिसे दर्शक बिना पलक झपकाए देखते रहते है.
इस सीन्स को रियल में शूट करना नामुमकिन होता है इसलिए इन्हें कंप्यूटर ग्राफिक्स से बनाया जाता है और यही VFX है. फिल्मों के अलावा इसका प्रयोग गेमिंग में भी किया जाता है, जिस के आदि आज के बच्चे और यूथ हो जाते हैं और दिनभर कंप्यूटर या मोबाइल पर खेलते रहते हैं जिस का प्रभाव उन के मानसिक स्थिति पर पड़ता है, उन्हें पढ़ाई में मन नहीं लगता. इस की आदत इतनी खराब होती है कि बच्चे रातरात भर इसे जाग कर खेलते रहते हैं.

वीएफएक्स के तरीके

वीएफएक्स बनाने में Maya, Flame जैसे सौफ्टवेयर इस्तेमाल किए जाते हैं. इसे बनाने वाली टौप कंपनियां प्राइम फोकस लिमिटेड, रेड चिलीज, प्रना स्टूडियोज, रिलायंस मीडिया वर्क्स, मूविंग पिक्चर कंपनी, टाटा एलेक्सी आदि हैं. किसी सीन में विजुअल इफैक्ट्स लाने में कई बड़े सौफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता है.

सब से पहले डायरैक्टर और ऐक्टर उस सीन की शूटिंग कर लेते हैं. शूटिंग के समय पीछे की तरफ ब्लू या ग्रीन कलर का पर्दा लगा दिया जाता है. उस सीन को फिल्माने के बाद कम्प्यूटर में मौजूद VFX सौफ्टवेयर और CGI ( इस में कम्प्यूटर की मदद से टू डी और थ्री डी इमेज या बैकग्राउंड बनाए जाते हैं) की मदद से एडिट किया जाता है.

इस सौफ्टवेयर की सहायता से उस ग्रीन या ब्लू पर्दे पर कोई काल्पनिक सीन बना दिया जाता है, जो बिल्कुल वास्तविक सीन्स जैसा दिखता है. स्पेशल इफैक्ट के लिए वीएफएक्स में समय एक महत्वपूर्ण फैक्टर होता है. मसलन कब और कैसे प्रभाव पैदा किया जाना है, यह वीडियो बनाते हुए ही पता लगता जाता है. हरे बैकग्राउंड पर सीन शूट करने के बाद साधारण बैकग्राउंड को समुद्र, जंगल, स्टेडियम आदि में बदल देना आसान होता है.

इस के बाद इस में स्पैशल इफैक्ट्स डाले जाते हैं. इस में सब से पहले किसी भी ऐक्टर को रिकौर्ड किया जाता है, फिर उस को कंप्यूटर जेनरेटेड

– इमेजरी (CGI) के मौडल में ट्रांसफर किया जाता है. इस के लिए ऐक्टर को एक अलग तरह का सूट पहनाया जाता है जिसे मोशन कैप्चर सूट कहा जाता है.

अवतार जैसी फिल्मों को इसी तकनीक से फिल्माया गया है. कई बार इस में प्रोस्थेटिक तकनीक का भी प्रयोग किया जाता है. इस से चरित्र के चेहरे के स्वरूप को बदल दिया जाता है, जैसा कि हिंदी फिल्म ‘पा’ में अभिनेता अमिताभ बच्चन को बच्चे का रूप दिया गया था.

भ्रमित करने वाले दृश्यों की भरमार

पहले वीएफएक्स का प्रयोग अंग्रेजी फिल्मों में अधिक होता था, जिस में हैरी पौटर, जुरासिक पार्क, द लार्ड औफ द रिंग्स, इंसैप्शन, थौर आदि कई फिल्में हैं. सब से अधिक सफल फिल्म बच्चों की फिल्म हैरी पौटर रही, इसे सभी बच्चों और यूथ ने बहुत पसंद किया. इस में एक बस को सकरी गली से स्पीड से प्रवेश कर जाना, अचानक से किसी व्यक्ति का विशालकाय रूप ले लेना, विशालकाय जीव से लड़ाई कर जीत जाना, आदि ऐसे कई भ्रमित करने वाले दृश्य होते हैं, जिसे रियल लाइफ में कल्पना कर पाना मुश्किल होता है.

ऐसे रियलिटी से दूर दृश्यों को आज के दर्शक अधिक पसंद कर रहे हैं लेकिन आज के कुछ हौलीवुड के निर्माता, निर्देशकों का ये भी डर सता रहा है कि वीएफएक्स के अधिक प्रयोग से फिल्मों की कहानी ओरिजिनालिटी से हट जाएगी और कहानी की मुख्य पात्र की भूमिका खत्म हो सकती है, जबकि फिल्म की प्रमुख फाउंडेशन चरित्र ही होता है.

आज के पढ़ेलिखे दर्शक भी ऐसी अनरीयलिस्टिक दृश्यों को कितना सह पाएंगे, ये समझना निर्माताओं के लिए मुश्किल होगा, क्योंकि कोई भी भ्रमित करने वाली कहानियों और फिल्मों को दर्शक कुछ हद तक ही सहन कर सकती है. इस के बाद वे उसका बहिष्कार अवश्य करेंगे और तब सभी को फिर से रियल फिल्मों की ओर आना पड़ेगा.

हिंदी सिनेमा में वीएफएक्स का ट्रेंड

इंडियन सिनेमा में वीएफएक्स का ट्रेंड नया नहीं है. इंडियन सिनेमा में सब से पहले वीएफएक्स का प्रयोग फिल्म प्यार तो होना ही था में किया गया था. बाहुबली सीरीज की दोनों फिल्में भी संभव नहीं हो पाती अगर VFX न होते. इन दोनों फिल्मों को दर्शकों ने काफी पसंद किया. इस के बाद से ही हर बड़ी फिल्म में VFX की खास जगह बन गई है. इन इफैक्ट्स के बिना आजकल फिल्में बनाना शायद किसी भी निर्माता निर्देशक के लिए संभव नहीं.

बनती है फिल्में लार्जर देन लाइफ

जितनी भी हिस्टोरिकल फिल्में बनती हैं, सभी में वीएफएक्स का प्रयोग जम कर किया जाता है. इस तकनीक के द्वारा ही 500 सैनिक 5000 सैनिकों में बदल जाते हैं. बड़ेबड़े महल दिखाए जाते हैं. मुंबई को लन्दन दिखा दिया जाता है. बाहुबली के अलावा पानीपत, जोधा अकबर, केसरी, पद्मावत, हनुमान ऐसी ही फिल्में है जिस में वीएफएक्स के द्वारा ही फिल्मों में जान डाली गई.

बनती है कम बजट की फिल्में

दक्षिण की फिल्मों में वीएफएक्स का प्रयोग आजकल खूब किया जा रहा है. आज जिन फिल्मों का बजट 50 से 60 करोड़ का होता है, उस में VFX का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि वीएफएक्स के प्रयोग से फिल्मों का निर्माण कम बजट में हो जाता है और फिल्में देखने में उम्दा होती हैं. वर्ष 2020 में भारत में VFX का 7,900 करोड़ रुपए का कारोबार था और 2024 तक यह आंकड़ा 14,700 करोड़ पर पहुंच सकता है. आज वीएफएक्स पहले से ज्यादा रियलिस्टिक लगने लगे हैं.

साथ ही इस से फिल्म मेकिंग में 2 साल तक का कम वक्त लग रहा है. मेकर्स के 65 करोड़ रुपए. तक बच रहे हैं और इस का काम भी 300 गुना तेजी से हो जाता है. लगभग 80 परसेंट ऐसी फिल्में हैं, जिन में वीएफएक्स का यूज किया जा रहा है. हालांकि छोटी फिल्मों में भी एक या दो शौट ही वीएफएक्स के होते हैं.

दक्षिणापंथी और पंकज त्रिपाठी के लालच ने डुबाया ‘मैं अटल हूं’, फिल्म अपनी लागत वसूलने में भी रही विफल

हम पिछले कुछ समय से लगातार कहते आए हैं कि पंकज त्रिपाठी, विक्की कौशल, मनोज बाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दिकी अब केवल ओटीटी के ही स्टार रह गए हैं लेकिन जनवरी के तीसरे सप्ताह यानी कि 19 जनवरी को प्रदर्शित फिल्म ‘मैं अटल हूं’ से साबित हो गया कि पंकज त्रिपाठी अपनेआप को इतना बड़ा स्टार समझने लगे हैं कि अब उसी अहम में वह स्वयं का कैरियर चौपट करने पर आमादा हो गए हैं.
खुद पंकज त्रिपाठी हम से कई बार कह चुके हैं कि वह तो जूम पर विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देते हुए इस कदर थक जाते हैं कि दूसरों से बात करने का उन के पास समय ही नहीं होता. वह यह भी बता चुके हैं कि जब वह बेकीसी, मुंबई में एसबीआई बैंक गए तो 600 से ज्यादा बैंक कर्मी बिल्डिंग के शीशे के पीछे से उन्हे देखने के लिए उन का इंतजार कर रहे थे.

पंकज त्रिपाठी का दावा है कि अब हर इंसान उन की एक झलक पाने के लिए लालायित रहता है लेकिन खुद पंकज त्रिपाठी को विचार करना चाहिए कि अगर लोग उन्हें और उन के सिनेमा को देखना पसंद करते हैं तो फिर 20 करोड़ की लागत में बनी फिल्म ‘मैं अटल हूं’, जिस में पंकज त्रिपाठी ने शीर्ष भूमिका निभाई है वह एक सप्ताह के अंदर बौक्स औफिस पर महज साढ़े 7 करोड़ ही कमा सकी.

इस में से निर्माता के हाथ बामुश्किल 3 करोड़ ही लगने वाले हैं. हम यहां याद दिला दें कि फिल्म ‘मैं अटल हूं’ में पंकज त्रिपाठी की पत्नी मृदुला त्रिपाठी सह निर्माता हैं. इस हिसाब से यह कहा जा रहा है कि फिल्म के बजट में पंकज त्रिपाठी की पारिश्रमिक राशि नहीं जुड़ी है, बल्कि उन्हे तो फिल्म की कमाई में हिस्सा मिलना था, जिस से अब वह हाथ धो चुके हैं.

फिल्म ‘मैं अटल हूं’ की बौक्स औफिस पर हुई दुर्गति के लिए सर्वाधिक दोषी पंकज त्रिपाठी के साथ ही फिल्म के प्रचारक हैं, जिन्होंने पिछले सप्ताह ‘मेरी क्रिसमस’ को डुबाने में अहम भूमिका निभाई थी. पंकज त्रिपाठी एक बेहतरीन कलाकार हैं. इस बात को वह अतीत में साबित कर चुके हैं. ऐसे में इन्हें पता होगा कि उन के अंदर अभिनय की क्या कमियां हैं.

फिल्म ‘मैं अटल हूं’ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की बायोपिक फिल्म है. इस की कहानी उन के कालेज दिनों, कालेज दिनों के प्रेम, आरएसएस की शाखाओं में जाने से ले कर प्रधानमंत्री बनने, कारगिल युद्ध और पोखरण तक की कहानी बयां करती है.

फिल्म में पंकज त्रिपाठी सत्रह वर्ष के अटल बिहारी बाजपेयी के किरदार में नजर आते हैं, जहां वह हाफ पैंट पहन कर आएसएस की शाखा में लाठी चला रहे हैं. इस दृष्य के साथ न्याय करने में 47 वर्षीय पंकज त्रिपाठी बुरी तरह से असफल रहे हैं. इतना ही नहीं अटल बिहारी का चेहरा चौड़ा था, जबकि पंकज त्रिपाठी का चेहरा आयताकार है. इसलिए लुक में भी वह मात खा गए.

अटल बिहारी बाजपेयी के भाषण के वक्त की कुछ अदाओं को जरुर उन्होंने पकड़ा है पर कई दृष्यों में वह अटल की जगह पंकज त्रिपाठी ही नजर आते हैं. इस के अलावा कथानक व निर्देशन की भी कमियां रहीं. मगर जब पंकज त्रिपाठी खुद इस फिल्म के निर्माण से जुड़े थे तो उन्हें इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिए था कि वह किरदार के साथ न्याय कर सकें.

मगर यह हमेशा से पाया गया कि जब कलाकार फिल्म की कमाई का हिस्सेदार होता है तो वह कई बार इसलिए चुप रह जाता है कि फिल्म का बजट न बढ़ने पाए. लगता है कि ऐसा ही कुछ ‘मैं अटल हूं’ में भी हुआ, जिस के चलते पंकज त्रिपाठी अपने चेहरे को सही प्रोस्थेटिक मेकअप की मदद से चौड़ा बनाने से रह गए.

इतना ही नहीं ‘मैं अटल हूं’ का प्रमोशन भी बहुत घटिया रहा. अपने प्रचारक की सलाह पर पंकज त्रिपाठी ने साठ पत्रकारों संग ग्रुप इंटरव्यू करने के अलावा कुछ चैनलों से बात कर इतिश्री कर दी. उस के बाद वह शहरों का भ्रमण करने व भाजपा के नेताओं को फिल्म दिखा कर अपनी पीठ जबरन थपथपवाते रहे.

अफसोस भाजपा व आरएसएस ने भी इस फिल्म को तवज्जो नहीं दी. जबकि इस फिल्म के निर्माण से संदीप सिंह भी जुड़े हुए हैं, जिन्होने कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म बनाई थी, जिसे दर्शक नहीं मिले थे.

हम याद दिला दें कि फिल्म ‘मैं अटल हूं’ का प्रचार उसी शख्स की कंपनी ने किया है, जिस ने पिछले सप्ताह ‘मेरी क्रिसमस’ का प्रचार किया था. 60 करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ 15 दिन में महज साढ़े 18 करोड़ ही इकट्ठा कर सकी.जबकि हिंदी में डब हो कर 12 जनवरी को प्रदर्शित हुई.

19 जनवरी को ही एक दूसरी हिंदी फिल्म ‘‘695’’ (छह नौ पांच ) प्रदर्शित हुई. इस फिल्म के निर्माता व निर्देशक को भरोसा था कि सभी ‘दक्षिणापंथी’ उन की इस फिल्म को देखने के लिए टूट पड़ेंगे और उन की फिल्म हजार करोड़ की कमाई कर लेगी.

इसी वजह से मुंबई के इस्कान मंदिर में एक प्रैस काफ्रेंस करने के अलावा निर्माता ने इस के प्रचार पर एक भी पैसा नहीं लगाया. यह फिल्म इतनी घटिया है कि दक्षिणापंथियों ने भी इस फिल्म को देखना उचित नहीं समझा. जिस के चलते यह फिल्म पूरे सप्ताह में एक करोड़ भी नहीं कमा सकी. इस के निर्माता फिल्म की लागत बताने से दूरदूर भागते रहे.

अरूण गोविल, मनोज जोषी, अखिलेंद्र मिश्रा सहित कई लोकप्रिय कलाकारों के अभिनय से सजी फिल्म ‘छह नौ पांच’ की कहानी ‘श्रीराम जन्म भूमि मंदिर’ के पांच सौ वर्षों के संघर्ष की गाथा है. फिल्म के नाम में छह का अंक ‘छह दिसंबर 1992, जब ढांचा गिराया गया था, का प्रतीक है.

9 का अंक नौ नंवबर 2019 सुप्रीम कोर्ट के फैसले और पांच का अंक पांच अगस्त 2020 है जिस दिन मंदिर का शिलान्यास हुआ था, उस दिन का प्रतीक है. फिल्म की कहानी शिलान्यास पर ही आ कर खत्म हो जाती है. पर फिल्म में कोई कहानी नजर नहीं आती. कई जगह यह डाक्यूमेंट्री नजर आती है. फिल्म का निर्देशन व फिल्मांकन बहुत घटिया है. पता नहीं लोग ‘दक्षिणपंथियों’ के भरोसे इस कदर की घटिया फिल्में बनाने का साहस कैसे कर लेते हैं.

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