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बौलीवुड में चिकने चौकलेटी चेहरे कभी चलने की गारंटी नहीं रहे

70 का दशक हिंदी फिल्मों का सुनहरा दौर कहा जाता है क्योंकि इस वक्त में कलाकरों की पीढ़ी बदल रही थी. राजकपूर, दिलीप कुमार, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, देवानंद और राजकुमार सरीखे नायकों का कैरियर ढलान पर था और उन की जगह लेने नए नायकों का हुजूम उमड़ने लगा था लेकिन मुकाम राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और ऋषि कपूर ही हासिल कर पाए जिन्होंने फिल्मों में लम्बी पारी खेली.

तब यह माना जाता था कि हिंदी फिल्मों के हीरो का चेहरा चौकलेटी होना एक अनिवार्यता है और एक हद तक यह सच भी था क्योंकि फिल्मों का भी स्वरूप बदल रहा था. एतिहासिक और पौराणिक फिल्में बनना कम हुई थीं उन की जगह रोमांटिक और एक्शन फिल्में ज्यादा बनने लगी थीं. ऐसे में हीरो से उम्मीद की जाती थी कि वह हीरोइन के साथ पार्कों में नाचे गाए भी और ढिशुमढिशुम में भी खलनायक को धूल चटा दे.

इन शर्तों को पूरा करने के लिए कई जानेअनजाने चेहरे फिल्मों में आए कुछ 3-4 दशक तक चले तो कुछ 3-4 फिल्मों में अपनी धमक दिखा कर गायब हो गए. उन की चर्चा आज भी फिल्म इंडस्ट्री में होती है क्योंकि उन की अभिनय प्रतिभा बिलाशक उत्कृष्ट थी. इन में से कईयों का हश्र देख लगता है कि वाकई फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत एक बड़ा फैक्टर है, नहीं तो जो हीरो खासा नाम और कुछ पैसा कमा कर गुमनामी में खो गए या जिन्होंने बी और सी ग्रेड की फिल्मों से ही तसल्ली कर ली वे हीरो बनने के तमाम पैमानों पर खरे उतरते थे.

खासतौर से चेहरे के मामले में जो उन दिनों एक बड़ा फैक्टर हुआ करता था, फैक्टर वह आज भी है लेकिन उस के माने बदल गए हैं. चिकना चौकलेटी चेहरा अब गुम होता जा रहा है उस की जगह अब खुरदुरा सख्त और रफ चेहरा दर्शकों को भाने लगा है.

जो अपने वक्त में चमके लेकिन चमक को बरकरार नहीं रख पाए उन में एक अहम नाम नवीन निश्छल का है जो एक स्टाइलिश हीरो थे. 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘सावन भादो’ से नवीन निश्छल और रेखा दोनों ने फिल्म इंडस्ट्री में पांव रखा था. मोहन सहगल द्वारा निर्मित और निर्देशित यह फिल्म तत्कालीन पारिवारिक विवादों पर आधारित थी. गौरतलब है कि मोहन सहगल की सलाह पर ही नवीन निश्चल ने पुणे के एफटीआईआई से ऐक्टिंग में डिग्री ली थी.

रोमांस, मारधाड़, पारिवारिक षड्यंत्र, नाचगाना सबकुछ ‘सावन भादों’ में था. इसलिए इस ने बौक्स औफिस पर खासा पैसा इकट्ठा किया था. रेखा और नवीन दोनों को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया था लेकिन नवीन अपना रुतबा और जगह कायम नहीं रख पाए, जबकि रेखा आज भी दर्शकों के दिलों पर राज करती हैं.

‘सावन भादों’ की कामयाबी में गीतसंगीत का भी अहम योगदान रहा था. ‘कान में झुमका चाल में ठुमका कमर पे चोटी लटके हो गया दिल का पुरजा पुरजा…’ और ‘सुनसुन ओ गुलाबी कली…’ गाने तो आज भी शिद्दत से सुने जाते हैं.

तब यह मान लिया गया था कि आने वाला वक्त नवीन निश्छल का है. पर बौलीवुड की खासियत है कि किसी भी कलाकार के कैरियर को किसी एक फिल्म से आंकना बड़ी भूल साबित होती है. यही नवीन के साथ हुआ.

उन की अगली फिल्में उम्मीद के मुताबिक नहीं चलीं हालांकि ‘सावन भादो’ के बाद आईं कुछ फिल्में हिट रहीं थीं मसलन परवाना, नादान, विक्टोरिया नंबर 203, बुड्डा मिल गया, हंसते जख्म और संसार. उन का यह स्टारडम बमुश्किल 3 साल ही रहा. इस के बाद उन की फिल्मों का फ्लौप होना शुरू हुआ तो फिर वे वापसी नहीं कर पाए. वो मैं नहीं, छलिया, पैसे की गुडिया, निर्माण, एक से बढ़ कर एक, से ले कर 1980 में आई कशिश तक लाइन से औंधे मुंह गिरीं थीं.

अब तक नवीन निश्छल गुजरे कल की बात हो चले थे. कुछ फिल्मों में वे बतौर सहायक अभिनेता दिखे जिन में ‘द बर्निंग ट्रेन’ और ‘देश द्रोही’ सरीखी मल्टीस्टारर फिल्मों से दर्शकों को याद आया कि अरे ये तो वही हीरो हैं. साल 1997 में आस्था फिल्म में भी सहायक भूमिका में वे रेखा के साथ नजर आए थे. इस फिल्म में भी उन्होंने प्रभावी अभिनय किया था. रेखा के साथ सैक्सी सीन देते वक्त उन की अभिनय क्षमता एक बार फिर उजागर हुई थी लेकिन तब तक फिल्म इंडस्ट्री में काफी कुछ बदल चुका था और नवीन जैसे आधा दर्जन हीरो फिलर हो कर रह गए थे.

नवीन निश्चल को वह मुकाम नहीं मिला जिस के वे हकदार थे तो इस की और भी कई वजहें हैं. मसलन उन की पारिवारिक जिंदगी. उन की दूसरी पत्नी गीतांजली ने साल 2006 में आत्महत्या कर ली थी. इस मामले में उन पर प्रताड़ना के आरोप लगे थे जिस के चलते कुछ दिन जेल की हवा भी उन्हें खानी पड़ी थी.

नवीन की पहली शादी नीलू कपूर से हुई थी जो देवानंद की नातिन थीं. 2-3 साल ही सही उन का कैरियर शबाब पर रहा और इसी दौरान वे केबरे डांस के लिए ज्यादा पहचानी जाने वाली ऐक्ट्रैस पद्मिनी कपिला से इश्क लड़ा बैठे थे. इस वजह से उन का नीलू से तलाक हुआ था.

आखिरी बार वे खोसला का घोसला फिल्म में नजर आए थे. इस के पहले कुछ टीवी सीरियल्स में भी उन्हें देखा गया था. साल 2011 में होली खेलने जब वे मुंबई से पुणे जा रहे थे तब हार्टअटैक से उन की मौत हो गई थी.

फिल्म इंडस्ट्री में नवीन निश्चल जैसे कलाकरों का योगदान कमतर नहीं आंका जा सकता जो आधे सफल और आधे असफल साबित हुए. ऐसा ही एक चर्चित नाम चिकने चेहरे वाले अभिनेता विनोद मेहरा का भी है. उन की पहली फिल्म तनूजा के साथ आई थी जिस का नाम था ‘एक थी रीता’.

1971 में ही प्रदर्शित 2 चर्चित फिल्मों लाल पत्थर और एलान से उन्हें पहचान मिली. विनोद मेहरा के चेहरे और व्यक्तित्व में एक खास किस्म की कशिश थी जो दर्शक उन्हें बारबार देखना पसंद करते थे. वे महज 45 साल जिए लेकिन इस दौरान उन्होंने कोई 90 फिल्मों में काम किया और हर फिल्म में अपनी ऐक्टिंग का लोहा मनवाया, फिर वह फिल्म ‘सफेद झूठ’ जैसी फ्लौप रही हो या ‘दो फूल’ जैसी हिट रही हो.

एलान फिल्म में वे एक खोजी पत्रकार की भूमिका में नजर आए थे. इत्तफाक से इस में उन के अपोजिट भी सावन भादो वाली रेखा ही थीं. इसी फिल्म में विनोद खन्ना भी एक अहम रोल में थे जो उन दिनों इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे.

इस फिल्म में ठूसठूस कर निर्देशक के रमनलाल ने मसाले भरे थे इसलिए फिल्म ने ठीकठाक बिजनेस कर लिया था लेकिन इस से विनोद मेहरा अपनी पहचान बनाने में सफल रहे थे. अगली ही फिल्म लाल पत्थर से वे समीक्षकों की निगाह में भी चढ़ गए थे क्योंकि इस फिल्म में राजकुमार, हेमा मालिनी और राखी जैसे मंझे कलाकारों से उन का मुकाबला था, जिस में वे कहीं से हल्के या कमजोर नहीं पड़े थे.

इस फिल्म में पियानो पर उन पर फिल्माया गाना ‘गीत गाता हूं मैं गुनगुनाता हूं मैं’, ‘मैं ने हंसने का वादा किया था इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं…’ काफी हिट हुआ था.

कैमरे का सामना विनोद महरा ने बहुत कम उम्र में ही कर लिया था. 50 के दशक की 3 फिल्मों ‘अदल ए जहांगीर’, ‘रागिनी’ और ‘बेवकूफ’ फिल्मों में वे बाल कलाकार की भूमिका में देखे गए थे तुरंत इस के बाद उन्हें अमर प्रेम में देखा गया था लेकिन इस में वे सहायक कलाकार थे यह वह फिल्म थी. इस ने राजेश खन्ना को सुपर स्टार का दर्जा दिलाया था.

जानकर हैरानी होती है कि ये वही राजेश खन्ना थे जिन्हें 1965 में एक अखिल भारतीय प्रतिभा खोज प्रतियोगिता से खारिज कर दिया गया था और विनोद मेहरा को रनर का खिताब दिया गया था. लाल पत्थर और अमर प्रेम से विनोद मेहरा को कुछ फायदे भी हुए थे तो कुछ नुकसान भी उन्हें उठाना पड़े थे. उन पर अघोषित रूप से सहायक अभिनेता का ठप्पा लग गया था जो आखिर तक उन से चिपका रहा.

1973 शक्ति सामंत की ‘अनुराग’ फिल्म से उन्हें एक अलग पहचान मिली थी लेकिन वह भी तात्कालिक ही साबित हुई. इस फिल्म का नायक राजेश एक रईस परिवार का युवक है जो एक अंधी लड़की शिवानी ( मौसमी चटर्जी ) से प्यार करने लगता है. ‘अमर प्रेम’ के उलट अनुराग में राजेश खन्ना एक सहायक भूमिका में दिखे थे लेकिन फिल्म की सफलता का श्रेय बतौर हीरो विनोद मेहरा को ही मिला था. भावुकता से भरी इस फिल्म को सभी वर्गों के दर्शकों ने पसंद किया था.

इस के बाद विनोद महरा लीड रोल में कम ही दिखाई दिए लेकिन सहायक अभिनेता के तौर पर उन की कई फिल्मों ने कामयाबी के झंडे गाड़े. इन में साजन बिना सुहागन, स्वर्ग नर्क, कर्तव्य जुर्माना, खुद्दार, बेमिसाल, जानी दुश्मन, द बर्निंग ट्रेन, चेहरे पे चेहरा, प्यासा सावन, नौकर बीबी का के नाम उल्लेखनीय हैं. कशिश और द बर्निंग ट्रेन में नवीन निश्चल उन के साथ नजर आए थे.

विनोद मेहरा की संवाद अदायगी का अपना अलग अंदाज था जो कूल कहा जा सकता है. एक ऐसा अभिनेता जो आमतौर पर शांत दिखता है लेकिन उन की व्यक्तिगत जिंदगी भी उथलपुथल भरी रही. खूबसूरत और आकर्षक इस अभिनेता ने तीसरी शादी रेखा से की थी जिसे ले कर आज भी फिल्म इंडस्ट्री में तरहतरह की अफवाहें और बातें होती रहती हैं.

रेखा भी आमतौर पर इस पर खामोश रहती हैं. खुद जिन्होंने 3 शादियां की थीं. कहा जाता है कि 1973 में हुई रेखा विनोद की शादी 60 दिन ही चली थी. विनोद मेहरा की मां रेखा को पसंद नहीं करती थीं. इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोग यह भी मानते हैं कि दरअसल में इन दोनों ने शादी नहीं की थी यह एक चर्चित अफेयर था.

अफेयर तो विनोद मेहरा का ऐक्ट्रैस बिंदिया गोस्वामी से भी चला था जो शादी में भी तब्दील हुआ था लेकिन यह शादी भी ज्यादा नहीं चली और दोनों अलग हो गए. विनोद मेहरा की पहली शादी 1974 में मीना नाम की युवती से हुई थी जो महज 4 साल ही चली. बाद में दोनों ने तलाक ले लिया था.

उन्होंने आखिरी शादी किरण से 1987 में की थी. किरण से उन्हें 2 बच्चे भी हुए. अब विनोद मेहरा को चाहने वालों को लगने लगा था कि उन के भटकाव का दौर खत्म हो चुका है तभी 1990 में उन की जिंदगी ही खत्म हो गई वजह वही थी हार्ट अटैक.

इस में कोई शक नहीं कि विनोद मेहरा ने एक शानदार जिंदगी जी और अपनी शर्तों और समझौतों में जी. बौलीवुड के वह पहले ऐसे हीरो थे जो अपने दौर में किसी से उन्नीस नहीं था लेकिन उस ने कभी सहायक भूमिकाओं में आने को अपनी हेठी नहीं समझा.

चिकने चौकलेटी चेहरों की लिस्ट में एक अहम नाम अनिल धवन का भी शुमार होता है जो नवीन निश्छल और विनोद मेहरा के बराबर ही प्रतिभाशाली थे लेकिन उन के चेहरे पर एक अलग किस्म की मासूमियत भी थी. अनिल धवन का बेटा सिद्धार्थ भी पिता की तरह अभिनय के झंडे गाड़ रहा है तो भाई डेविड धवन का नाम किसी सबूत का मोहताज नहीं.

कानपुर से मुंबई फिल्मों में किस्मत आजमाने गए अनिल ने भी पुणे के एफटीआईआई से कोर्स किया था. जया भादुरी उन की बेचमेट थीं जिन के साथ उन्होंने साल 1972 में पिया का घर फिल्म में काम किया था. हालांकि उन्हें पहचान अपनी पहली ही फिल्म चेतना से ही मिल गई थी जिस में उन के अपोजिट रेहाना सुल्तान थीं.

चेतना की कहानी लीक से हट कर थी जिस में एक युवक एक कौलगर्ल से न केवल प्यार करने लगता है बल्कि उस से शादी भी कर लेता है लेकिन बाद की दुश्वारियां नहीं झेल पाता. 70 के दशक के युवाओं को यह फिल्म काफी पसंद आई थी क्योंकि नायक ने समाज से लड़ने का दुसाहस किया था. इस फिल्म का गाना ‘मैं तो हर मोड़ पर तुझ को दूंगा सदा…’ आज के प्रेमियों में भी उतना ही लोकप्रिय है जितना 60-62 साल पहले के प्रेमियों में हुआ करता था.

चेतना फिल्म के बिलकुल उलट ‘पिया का घर’ एक अलग समस्या पर बनी फिल्म थी जिस में महानगर के कपल्स को प्यार करने जगह और मौके कम मिलते हैं क्योंकि वे संयुक्त परिवार में रहते हैं जो दो कमरों के मकान में रहता है. विषय यह भी नया था और बासु चटर्जी के सधे निर्देशन ने तो इसे और भी प्रासंगिक बना दिया था. अनिल और जया दोनों को इस फिल्म से पहचान और तारीफें दोनों मिले थे लेकिन जल्द ही अनिल छोटीमोटी भूमिकाओं में सिमट कर रह गए.

शुरुआती फिल्में सफल हुईं तो अनिल धवन को भी कामयाब मान लिया गया. लेकिन दोचार हिट फिल्में देने के बाद भी उन की गाड़ी पटरी से उतर गई. दोराहा, मन तेरा मन मेरा, प्यार की कहानी और यौवन व हवस जैसी फिल्मों को बौक्स औफिस पर भाव नहीं मिला. इस के बाद वे भी बी ग्रेड की फिल्में करने लगे. मसलन सिक्का, ओ बेवफा और ताकतवर. हौरर फिल्में बनाने के लिए कुख्यात रामसे ब्रदर्स की फिल्मों ‘पुरानी हवेली’ और ‘खूनी पंजा’ वगैरह में भी उन्होंने एक्टिंग की लेकिन देख कर लगा नहीं कि ये वही अनिल धवन हैं जिन्होंने चेतना और पिया का घर जैसी प्रयोगवादी फिल्मों में शानदार अभिनय किया था.

बाद में कुछ वक्त काटने और कुछ पैसा कमाने की गरज से कुछ टीवी सीरियलों में भी उन्होंने काम किया लेकिन इस दौर का दर्शक उस दौर के अनिल धवन को नहीं जानता था. हां कुछ चरित्र भूमिकाओं में जरुर उन्होंने अपनी हाजिरी दर्ज कराई, जैसे हिम्मतवाला, जोड़ी नंबर वन और चल मेरे भाई सहित हसीना मान जाएगी.

जो चिकना चौकलेटी चेहरा कामयाबी की गारंटी माना जाता है वह न तो 70 के दशक में स्वीकार किया गया और न ही आज स्वीकार जा रहा है क्योंकि दर्शक खासतौर से युवा फिल्म के हीरो में खुद को तलाश करते हैं. यह बात उन्हें तीनों खान से ले कर कार्तिक आर्यन, राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना में दिखती है तो बात कतई हैरत की नहीं.

गांव में स्वाद ढूंढते दुनिया के मशहूर शैफ

किसी ठेलेवाले की पत्ते पर दी गई चाट अगर जुबान को भा गई तो उस के आगे फाइव स्टार होटल की एक्सपैंसिव कटलरी में परोसी गई चाट फीकी मालूम पड़ती है. मटन-चिकेन खाने के शौकीनों की दुकानें बंधी होती हैं. वे उस स्वाद के लिए बारबार उन्हीं दुकानों पर जाते हैं. लिट्टीचोखा का स्वाद ढूंढने वाले किसी बिहारी बाबू के ठेले को ढूंढते हैं तो सांभर वड़ा या सांभर डोसा खाने का मजा साउथ इंडियन होटल में ही आता है.

अब तो चटपट बन जाने वाला जो भोजन पहले ठेलों या ढाबों पर मिलता था, अब कुछ सलीके और सफाई से बड़ेबड़े होटलों में भी मिलने लगा है. पहले गोलगप्पे खाने के लिए हम अपने पड़ोस में लगने वाले ठेले पर पहुंच जाते थे और 20-30 रूपए में भरपेट गोलगप्पे खाते थे. ठेलेवाले से इसरार कर के एकाध ज्यादा ही खा लेते थे. उस के बाद गोलगप्पे के नमकीन धनिया वाले पानी में सोंठ वाली चटनी डलवा कर पीना तो जैसे हमारा जन्मसिद्ध अधिकार था.

ठेलेवाले के द्वारा एकएक गोलगप्पा हमारी कटोरी में डाला जाता और हम एकएक गोलगप्पे का आनंद उठाते थे. गोलगप्पे की प्लेट अब बड़ेबड़े होटलों में भी और्डर कर सकते हैं. वहां 100 रूपए में 4 गोलगप्पे मंहगी प्लेट में सज कर आ जाते हैं. साथ ही एक कटोरे में नमकीन पानी और सोंठ की चटनी साथ होती है. आप खुद गोलगप्पे में चटनी और पानी डालिये और खाइए. इस में कोई मजा नहीं आता.

आज भले बड़ेबड़े होटलों में वो सारी चीजें सर्व की जाती हों जो सड़क पर बिकती हैं, मगर जो स्वाद ठेलेवाले की चाटपकौड़ी, चाउमीन, समोसों, लिट्टीचोखे, टिक्के, कबाब में आता है. वह स्वाद एयरकंडीशन होटल की साफ मेज और महंगी कटलरी में परोसे गए खाने में नहीं आता. कई बड़े शैफ इस चीज को समझते हैं और शायद यही वजह है कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाले बहुत पकवानों को जानने और बनाने का तरीका सीखने के लिए वे ग्रामीण अंचलों में घूमते और वहां स्थानीय लोगों से कई तरह की चीजें बनाना सीखते दिखते हैं.

लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले जानेमाने शैफ रणबीर बरार को नईनई डिशेज सीखने के लिए देश के कोनेकोने में घूमते देखा गया है. वे कभी राजस्थान के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में किसी कच्चे मकान में मिट्टी के चूल्हे पर किसी राजस्थानी महिला से बाजरे की रोटी बनाना सीख रहे होते हैं तो कभी केरल के किसी गांव में नारियल की मिठाई बनाने की रैसेपी अपनी डायरी में नोट करते मिलते हैं.

फाइव स्टार होटल में सब से कम उम्र के शैफ बनने से ले कर खुद के कुकिंग शो की मेजबानी करने के बाद भी रणबीर बरार को लगता है कि जो स्वाद ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाले उन के पारंपरिक खानों में है, वह स्वाद वे अभी तक अपने ग्राहकों को नहीं दे पाए हैं.

पश्चिमी भारत के छोटे और वस्तुतः अज्ञात शाही राज्यों की यात्रा करने से ले कर, एक वेब श्रृंखला करने के लिए आस्ट्रेलिया जाने तक, बरार हमेशा आप की रसोई और प्लेटों में अप्रत्याशित चीज़ें ले कर आते हैं. शैफ बरार लगातार पाक खोज में खुद को भोजन-सूफी कहते हैं.

गैरी मेहिगन एक अंग्रेजी-आस्ट्रेलियाई शैफ और रेस्तरां मालिक हैं. मेहिगन नेटवर्क 10 श्रृंखला मास्टरशैफ आस्ट्रेलिया के मूल न्यायाधीशों में से एक थे. उन्होंने बर्नहैम बीचेस कंट्री हाउस और होटल सोफिटेल सहित मेलबर्न के कुछ सब से प्रमुख रेस्तरां में रसोई का नेतृत्व किया है. आस्ट्रेलियन शैफ गैरी मेहिगन का इंडियन खाने से खास लगाव है, फिर चाहे वो दाल-चावल ही क्यों न हो. दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता में उन्मादी भीड़ के बीच चिंतन के क्षणों से ले कर हैदराबाद में ईद के लिए हलीम कैसे बनाया जाता है, यह जानने तक, गैरी मेहिगन ने अपने नए शो इंडियाज मेगा फैस्टिवल्स के लिए नेशनल ज्योग्राफिक के साथ देशभर की यात्रा है.

गैरी ने भारत की यात्रा के दौरान केरल से ले कर कश्मीर तक के ग्रामीण अंचलोन में घूमघूम कर यहां के अनेक पकवानों को स्थानीय लोगों के साथ रह कर सीखा और अपने होटलों में उन्हें इंट्रोड्यूस किया. हाल ही में गैरी नागालैंड में एक उत्सव के दौरान वहां के जनजातीय समूहों के साथ रहे और उन्होंने वहां अनेक नागा व्यंजनों को बनाने के विधि देखी और सीखी.

अपने एक टीवी शो में वे राजस्थान में रेत के अंदर गड्ढा खोद कर उस में कोयला जला कर विभिन्न मसालों में मेरिनेट किया हुआ गोश्त भूमिगत अवन में पकाते नजर आए. उन्होंने कुछ औथेंटिक साउथ इंडियन व्यंजनों का आनंद लेने और सीखने के लिए एक पौपुलर कैफे में रुकने का फैसला किया. सोचिए वे कहां गए होंगे? शैफ गैरी फेमस रामेश्वरम कैफे में थे, जहां उन्होंने रागी डोसा, घी रोस्ट डोसा, मेदु वड़ा, घी पोडी इडली, केसरी बाथ और निश्चित रूप से फिल्टर कौफी का एक फ्रेश गिलास इंजौय किया और इन साउथ इंडियन व्यंजनों को बनाने के तरीके सीखे. निश्चित रूप से इन्हें वे अपने होटलों में इंट्रोड्यूस करेंगे.

एक इंटरव्यू के दौरान गैरी कहते हैं कि उन के द्वारा बनाई गई डिश नौर्मल हुआ करती थीं लेकिन 2010 के बाद से वो जब भी भारत आते हैं, यहां के खानपान की रैसिपी इकट्ठा करते हैं. अब उन के पास 30 से 40 भारतीय मसालें है, तरहतरह के आइटम हैं, जिस में से हल्दी, सौंफ, इलायची और काली मिर्च तो गैरी के पसंदीदा हैं. नागालैंड के खानपान को ले कर गैरी का कहना है कि नागा में रेड वुड वार्म, सिल्क वार्म और कई चीजों को डीप फ्राई कर के नहीं बनाया जाता. इसे सिर्फ पानी में पकाते हैं, अदरक, लहसुन जैसी चीजें डाली जाती हैं. यहां तक कि इन में मसालों का प्रयोग भी नहीं होता लेकिन फिर भी यह बहुत स्वादिष्ट लगता है.

गैरी कहते हैं कि वो साउथ इंडियन स्टाइल में काली मिर्च फ्लेवर के साथ चिकन बनाते हैं जो उन के परिवार को भी काफी पसंद है. सब से आसान और स्वादिष्ट दाल तड़का गैरी भी फटाफट बना लेते हैं. कमाल की बात यह है कि उन की बेटी इस के साथ लच्छा पराठा बनाना पसंद करती है. गैरी अपने घर पर हैदराबाद स्टाइल बिरियानी भी पकाते हैं.

Curd Rice Benefits : अगर आप भी हैं कर्ड राइस लवर्स, तो जानें इसे खाने के गजब के फायदे

Curd Rice Benefits : दही और चावल दोनों को ही हेल्दी डाइट माना जाता हैं. रोजाना एक कटोरी दही खाने से पाचन तंत्र, हड्डियां और इम्यूनिटी मजबूत होती है, तो वहीं चावल खाने से शरीर को एनर्जी मिलती है. लेकिन क्या आपको ये बात पता है कि दही और चावल दोनों को साथ में खाने से शरीर स्वस्थ रहता है. साथ ही वजन कम करने में भी काफी मदद मिलती है.

खासतौर पर साउथ इंडिया में लोग दही चावल को बड़े चाव से खाते हैं. इसके अलावा फिटनेस ट्रेनर भी इसे खाने की सलाह देते हैं. दही-चावल को साथ में खाने से ये स्वादिष्ट तो लगता ही है. साथ ही शरीर को कई फायदे भी मिलते हैं, तो चलिए अब जानते हैं दही-चावल यानी कर्ड राइस (Curd Rice Benefits) खाने के फायदों के बारे में.

दही चावल खाने के फायदे    

पाचन होगा दुरुस्त

आपको बता दें कि दही को प्रोबायोटिक फूड माना जाता है, जो आंतों के लिए अच्छा होता है. साथ ही इसे खाने से पाचन से जुड़ी कई समस्याओं से छुटकारा भी मिलता है, तो वहीं चावल को प्रोटीन का समृद्ध स्रोत माना जाता हैं. इसलिए जिन लोगों को पाचन से जुड़ी दिक्कत रहती है, उनके लिए कर्ड राइस (Curd Rice Benefits) खाना काफी फायदेमंद होता है.

तनाव होगा कम

जिन लोगों को छोटी-छोटी बातों पर तनाव होने लगता है या वो हर बात पर बहुत ज्यादा चिंता करने लगते हैं. उन्हें तो अपनी डाइट में कर्ड राइस को जरूर शामिल करना चाहिए. दरअसल, कर्ड राइस में एंटीऑक्सीडेंट और हेल्दी फैट्स दोनों की भरपूर मात्रा होती है, जिससे तनाव से छुटकारा मिल सकता है.

शरीर को मिलेगी एनर्जी

दही-चावल में सभी जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जिससे शरीर को इंस्टेंट एनर्जी मिलती है. इसलिए फिटनेस ट्रेनर भी इसे खाने की सलाह देते हैं.

स्किन रहेगी हेल्दी

दही चावल (Curd Rice Benefits) में वो सभी जरूरी गुण होते हैं, जिससे त्वचा स्वस्थ रहती हैं. इसलिए जो लोग नियमित रूप से कर्ड राइस का सेवन करते हैं, उन्हें स्किन से जुड़ी समस्याओं के होने का खतरा बहुत ज्यादा कम हो जाता है. इसके अलावा उनके चेहरे पर ग्लो भी आने लगता है.

रोग प्रतिरोधक क्षमता होगी मजबूत

कर्ड राइस में प्रोबायोटिक्स की उच्च मात्रा होती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. इसके अलावा संक्रमण होने का खतरा भी बहुत ज्यादा कम हो जाता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

Anjeer Benefits : हेल्दी रहने के लिए जरूर खाएं अंजीर, जानें इसे खाने का सही तरीका

Figs Health Benefits : सर्दियों में शरीर को स्वस्थ रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि ना चाहते हुए भी इस मौसम में संक्रमण और मौसमी बीमारियों के होने का खतरा काफी बढ़ जाता है. इसलिए जरूरी है कि आप अपनी डाइट में उन चीजों को शामिल करें, जिससे आप हेल्दी रहे.

अंजीर को विंटर का सुपरफूड माना जाता है, क्योंकि ये शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है. इसलिए इस मौसम में आप अपनी डाइट में अंजीर को शामिल कर सकते हैं. वैसे तो अंजीर को साल भर खाया जा सकता है, लेकिन सर्दियों में इसे खाने से ना सिर्फ बॉडी गर्म रहती है, बल्कि सर्दी, जुकाम, खांसी और नाक बहने आदि समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स, पॉलीफेनोल्स और डाइटरी फाइबर की भी उच्च मात्रा होती है.

आइए अब जानते हैं अंजीर (Anjeer Health Benefits) खाने के सही तरीके व फायदों के बारे में.

अंजीर खाने के फायदे

पाचन तंत्र होगा दुरुस्त

अंजीर (Figs Health Benefits) में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है. इसलिए जिन लोगों को गैस, कब्ज, मतली और पेट से जुड़ी समस्याएं रहती है. वो खाना खाने के बाद 2 से 3 टुकड़े अंजीर के खा सकते हैं. इससे उनका पेट साफ होगा. साथ ही पाचन तंत्र दुरुस्त रहेगा.

शुगर रहेगा कंट्रोल

डायबिटीज के मरीजों के लिए भी अंजीर खाना काफी फायदेमंद होता है. सर्दियों में अंजीर को नियमित रूप से खाने से रक्त शर्करा के स्तर में सुधार आता है, जिससे ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मदद मिलती हैं.

स्किन पर आएगा ग्लो

अंजीर को सुबह खाली पेट खाना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है. इसके लिए अंजीर के 2 से 3 टुकड़े रात में पानी में भिगोकर रखे दें और सुबह खाली पेट उन्हें खाएं. लगभर महीनेभर इस तरह अंजीर खाने से बेजान और रूखी त्वचा से छुटकारा मिलेगा. साथ ही त्वचा पर ग्लो भी आने लगेगा. दरअसल, अंजीर में विटामिन ए, विटामिन सी और विटामिन ई आदि सभी जरूरी पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा होती है, जो स्किन को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं.

हड्डियां रहेंगी मजबूत

अंजीर (Anjeer Health Benefits) में कैल्शियम और फास्फोरस की भी भरपूर मात्रा होती है, जिससे हड्डियां स्वस्थ रहती है. इसलिए जिन लोगों को सर्दियों में जोड़ों में दर्द की समस्या रहती है, उन्हें तो अंजीर को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए.

हार्ट रहेगा हेल्दी

अंजीर में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 जैसे हेल्दी फैट पाए जाते हैं, जो दिल के लिए जरूरी होते है. इसके अलावा इसमें फ्लेवोनोइड्स, फाइबर और पॉलीफेनोल भी होते हैं जो शरीर को फ्री- रैडिकल डैमेज से बचाने के साथ-साथ हार्ट के लिए अच्छे होते हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

बिहार राजनीति में फिर से उलट, पौराणिक है पलटी और पाला कल्चर

बिहार की जनता के बाद सब से ज्यादा सकते और नुकसान में कोई है तो वे तेजस्वी यादव ही होंगे. बीते डेढ़ साल से चाचा नीतीश कुमार उन्हें छाती से लगाए घूम रहे थे, जिस के चलते मान यह लिया गया था कि युवा तेजस्वी बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे.

इतिहास गवाह है कि मामाओं ने तो भांजों को परेशान किया है. उन्हें जान से मारने तक की कोशिश की लेकिन चाचाओं ने भतीजों की राह में कभी ऐसी दुश्वारियां खड़ी नहीं कीं जैसी कि बिहार के मुख्यमंत्री अपने उप मुख्यमंत्री भतीजे तेजस्वी यादव की राह में खड़ी कर रहे हैं.

बिहार में तेजस्वी की इमेज एक ऐसे परिपक्व नेता की बनती जा रही है जो आमतौर पर शांत और प्रतिक्रियाहीन रहना ज्यादा पसंद करता है. जबकि उन के पिता राजद मुखिया एक बड़बोले नेता के तौर पर जाने और पसंद भी किए जाते रहे हैं.

विरासत में मिली राजनीति को तेजस्वी ने सहेज कर ही रखा है और काम पर ज्यादा फोकस किया है. 3 दशकों से बिहार की राजनीति बेहद उथलपुथल भरी रही है. सरकारें गठबंधनों की ही बनती रहीं जिस की कमान पिछड़ों के हाथ में ही ज्यादा रही. पहले लालू यादव और फिर नीतीश कुमार ही बारीबारी मुख्यमंत्री बनते रहे. बीच में थोड़ा मौका दलित नेता हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के मुखिया जीतनराम मांझी को मिला था.

उठापटक और जोड़तोड़ के इस खतरनाक खेल को आज भी तेजस्वी मासूमियत से ही देख रहे हैं. बिहार की जनता की ही तरह वे यह भी बेहतर जानते हैं कि लालू यादव कोई ऐसीवैसी हस्ती या खिलाड़ी का नाम नहीं है हालांकि नीतीश के नए पैतरों से लालू भी कम बौखलाए हुए नहीं हैं, जिन्होंने अप्रैल 2019 में लोकसभा चुनाव की वोटिंग के वक्त नीतीश कुमार के बारे में ट्वीट किया था कि –

– वह दोमुंहा सांप है. कब किधर जाएगा किसी को पता है. कोई लेगा उस की गारंटी? लेगा कोई?. गौरतलब है कि नीतीश को पलटू राम नाम भी लालू ने ही दिया था. इस के पहले 3 अगस्त 2017 को लालू ने एक ट्वीट करते कहा था कि-

– नीतीश सांप है जैसे सांप केंचुल छोड़ता है वैसे ही नीतीश भी केंचुल छोड़ता है और हर 2 साल में सांप की तरह नया चमड़ा धारण कर लेता है किसी को शक ?

इस पर एक यूजर एनके खेतान ने चुटकी लेते प्रतिक्रिया दी थी कि लो भाई अब तो एनाकोंडा को भी नीतीशजी सांप लगने लगे हैं. हालिया उठापठक पर लालू के ट्वीट का हवाला देते एक यूजर मुलायम सिंह यदुवंश लिखते हैं, ‘बिहार में मौजूदा सरकार रहेगी या नहीं यह 1-2 दिन में तय हो जाएगा लेकिन नेता के रूप में तेजस्वी यादव ने अपना कद इतना बड़ा कर लिया है कि 18 साल से मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार बौने दिखने लगे हैं. विश्वसनीयता के मामले में नीतीश देश के राजनेताओं में सब से नीचे हैं.’

तो फिर क्यों यादव परिवार ने सांप को गले में लटकाया था जबकि सांप के काटे का मंत्र उसे नहीं आता. जाहिर है यह जेल में बंद लालू का पुत्र मोह था. वह तेजस्वी को बिहार का मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते थे. हालफिलहाल तो उन के मंसूबों पर छोटे भाई ने पानी फेर दिया है.

लेकिन ऐसा क्या हो गया था कि नीतीश कुमार एकाएक ही घबरा गए? इस का जबाब खोजने 10-12 दिन पीछे चलना पड़ेगा लेकिन उस के भी पहले यह मानना पड़ेगा कि तेजस्वी यादव की बढ़ती लोकप्रियता और स्वीकार्यता से नीतीश डरने लगे थे और उसे हजम नहीं कर पा रहे थे. यह एक फिजूल की बात और बहाना है कि इंडिया गठबंधन में उन्हें उन की हैसियत के मुताबिक इज्जत नहीं मिल रही थी और उन्हें प्रधानमंत्री भी घोषित नहीं किया गया था जिस के चलते उन्हें घुटन हो रही थी.

18 जनवरी को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पटना पहुंचे थे तो बिहार के भाजपाई यादवों ने ड्रामा ऐसा किया मानो साक्षात कृष्ण आ गए हों और उन के हाथ में सुदर्शन चक्र भी है. सियासी हलकों में मोहन यादव को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने की बड़ी वजह यही मानी गई थी कि भाजपा यादवों से अपनी दूरी कम करना चाहती है और अपनी यादव विरोधी इमेज भी धोना चाहती है.

मोहन यादव को यह पट्टी पढ़ा कर भेजा गया था कि तुम्हें वहां लालू या नीतीश की नहीं बल्कि कृष्ण और यदुवंश की जज्बाती बातें करते रहना है और यही यादव लेंड में मोहन यादव ने किया भी. जब भी उन्होंने कृष्ण और मोदी का नाम लिया तब उन के नाम के जयकारे लगे.

ऐसे में मुमकिन है कि लालू यादव का नाम लेने पर मीटिंग में मौजूदा यादव झोंक में उन की भी जयजयकार कर देते. ऐसा अगर होता तो भगवा गैंग की खासी किरकिरी होती. हालांकि इन बातों के कोई तात्कालिक या दीर्घकालिक माने नहीं हैं ऐसा सोचना भी जल्दबाजी होगी. लेकिन यह इत्तफाक की बात नहीं है कि मोहन यादव के पटना दौरे के बाद ही नीतीश को दोबारा भगवा खेमे में सहारा दिखा और वह भूल गए कि सार्वजनिक तौर पर वह कह चुके हैं कि मर जाऊंगा लेकिन भाजपा से हाथ नहीं मिलाऊंगा.

अब सक्रांति बाद बिहार में खिचड़ी जो भी पकती रही हो जल्द सामने आ जाना है लेकिन यह तय दिख रहा है कि अगर कोई डील नीतीश और भाजपा के बीच हुई है तो उस के तहत यादवों को ज्यादा अहमियत दी जाएगी. मुमकिन है एक उपमुख्यमंत्री यादव समुदाय से लिया जाए.

शल्य या युयुत्सु

बिहार में अब क्या होगा इस सस्पेंस से पर्दा उठने में अभी कुछ घंटे बाकी हैं. लेकिन पलटी मार, पलटू राम और पाला बदलू के नाम से कुख्यात हो गए नीतीश कुमार को देख सहज ही महाभारत के 2 पात्रों युयुत्सु और शल्य की याद हो आती है.

महाभारत के युद्ध के पहले ही पांडवों के बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने एलान किया था कि यह धर्मयुद्ध है और वह अधर्म के खिलाफ लड़ रहे हैं. यदि कोई योद्धा अधर्म के खिलाफ लड़ना चाहता है तो उस का स्वागत है.

युयुत्सु कौरवों में से एक था लेकिन दासी पुत्र था जिस का एक नाम सुधड़ा भी था. कहा जाता है कि वह इकलौता कौरव था जो सामान्य प्रसव से पैदा हुआ था. युधिष्ठिर की बात सुन वह पांडव सेना में शामिल हो गया था और कौरवों के खिलाफ लड़ा था. दिलचस्प बात यह भी है कि वह इनेगिने कौरवों में से एक था जो युद्ध के बाद जिंदा बच गए थे. और जिसे युधिष्ठिर ने अपना मंत्री भी बनाया था. गांधारी और धृतराष्ट्र का अंतिम संस्कार भी उसी ने किया था.

बिहार की लड़ाई भी कुछकुछ धर्म और अधर्म की बनाई जा रही है जिस की जड़ में राजद कोटे से मंत्री चन्द्र शेखर यादव हैं, जिन का पिछले दिनों ही नीतीश कुमार ने विभाग बदला है. शिक्षा मंत्री रहते चन्द्र शेखर यादव हर कभी रामचरित मानस की बखिया उधेड़ते रहे थे. उन के मुताबिक यह ग्रंथ भेदभाव फैलाने वाला है.

कुछ दिन पहले तो उन्होंने रामचरित मानस की तुलना पोटेशियम साइनाइड तक से कर दी थी. भगवा गैंग के नजरिए से तो चन्द्र शेखर विधर्मी टाइप के आइटम हैं. ठीक वैसे ही जैसे सपा के स्वामी प्रसाद मौर्य और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री हम के मुखिया जीतनराम माझी हैं.

बिहार कभी सनातन विरोधी माने जाने वाले वामदलों का गढ़ रहा है और उस का असर अभी भी वहां है, जहां उस के 243 में से 16 विधायक हैं. नीतीश कुमार दिलचस्प इन मानों में भी हैं कि वे जरूरत पड़ने पर सभी से हाथ मिला लेते हैं. कम्युनिस्टों से भी, राजद से भी, कांग्रेस से भी और भाजपा से भी.

ऐसे में यह तय कर पाना मुश्किल है कि वे किस विचारधारा या गुट की तरफ से, किस की लड़ाई लड़ रहे हैं. हालिया विवाद पर लालू यादव की बेटी रोहिणी का वह कमेंट भी कम जिम्मेदार नहीं बताया जा रहा जिस में उन्होंने नीतीश को उन के समाजवादी होने को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था.

यह देख याद आती है पांडवों के मामा मद्र के राजा शल्य की भी जो महाभारत की लड़ाई में गए थे तो पांडवों की तरफ से लड़ने, लेकिन दुर्योधन के छल कपट की वजह से उन्हें कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा था. बाद में वे सूत पुत्र कर्ण के सारथी बने थे. उन का झुकाव पांडवों की तरफ था. इसलिए वह कर्ण की हिम्मत तोड़ने वाली बातें किया करते थे. इस बाबत यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उन्होंने बाकायदा दुर्योधन से इजाजत भी ले रखी थी.

बिहार का महाभारत

इन दिनों मिनी कुरुक्षेत्र बने बिहार के महाभारत में भी इतिहास का ही दोहराव हो रहा है जिस में यह साफ नहीं हो पा रहा कि कौन किस के साथ है और किस बात या विचारधारा की लड़ाई लड़ रहा है.

चिराग पासवान और जीतनराम मांझी को नीतीश कुमार फूटी आंख भी नहीं भाते लेकिन वे भाजपा के नजदीक होने के चलते उन के साथ जाने को तैयार हैं. यानी तथाकथित धर्म की लड़ाई लड़ने में उन के साथ हैं. नीतीश कुमार इन में सब से संदिग्ध हैं जो बतौर विचारधारा कौन सी लड़ाई लड़ रहे हैं या शायद राम भी न जाने. यह तय कर पाना भी मुश्किल है कि वे शल्य के रोल में हैं या युयुत्सु की भूमिका में हैं.

अपनी भूमिकाएं वे बदलते रहते हैं. उन की मुख्य भूमिका सत्ता में जमे रहने की है जिस के बाबत वे विचारधारा भी बदल लेते हैं. उन्हें देख लगता यही है कि ये गुट, पाला और पलटी कहने भर की बातें हैं नहीं तो अंतिम सत्य सत्ता है जिस की लड़ाई घरघर में लड़ी जाती है.

बिहार के यादवों को 2 फाड़ करने की भाजपाई कोशिश कितनी कामयाब हुई यह तो लोकसभा और उस से भी ज्यादा उस के डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में वोटर तय करेगा, जो अब रोजरोज के तमाशे और झिखझिख देख उबने और खीझने लगा है.

मेरे प्रेमी की शादी हो गई है लेकिन हम एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते, क्या करें?

सवाल

मैं 22 साल की हूं. 5 साल तक जिस से प्यार था, उस की शादी हो गई है. पारिवारिक वजहों से मेरी उस से शादी नहीं हो पाई, पर हम एकदूसरे के बगैर नहीं रह सकते. क्या करें?

जवाब

आप का प्रेमी आप के बिना रह सकता है, तभी तो उस ने कहीं और शादी कर ली. अगर उसे आप से सच्चा प्यार होता, तो वह उस के लिए संघर्ष करता. आप उस के चक्कर में अपना खून न जलाएं. वक्त आने पर आप को उस से बेहतर साथी मिल जाएगा.

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अवैध संबंध

अवैध संबंध पति के हों या पत्नी के, देरसबेर इन की पोल खुल ही जाती है. इस के बाद नतीजे अपराध के रूप में सामने आते हैं. कह सकते हैं कि इन नतीजों से कभी पत्नी प्रभावित होती है तो कभी पति. यदाकदा प्रेमी या प्रेमिका का नंबर भी आ जाता है. इस कहानी में पति जागीर सिंह को मौत की नींद सोना पड़ा और मंजीत कौर व उस के प्रेमी कुलवंत को…

मनप्रीत कौर सालों के बाद मामा के घर आई थी. गुरप्रीत सिंह और उस की पत्नी ने मनप्रीत की खूब खातिरदारी की. मामामामी और मनप्रीत के बीच खूब बातें हुईं. बातोंबातों में मनप्रीत ने गुरप्रीत से पूछा,‘‘मामाजी, बड़े मामा जागीर सिंह के क्या हालचाल हैं. उन से मुलाकात होती है या नहीं?’’‘‘नहीं, हम 5 साल पहले मिले थे अनाजमंडी में. जागीर उस समय परेशान भी था और दुखी भी. गले लग कर खूब रोया. उस ने बताया कि भाभी (मंजीत कौर) के किसी कुलवंत सिंह से संबंध हैं और दोनों मिल कर उस की हत्या भी कर सकते हैं.’’

गुरप्रीत ने यह भी बताया कि उस ने जागीर सिंह से कहा था कि वह भाभी का साथ छोड़ कर मेरे साथ मेरे घर में रहे. लेकिन उस ने इनकार कर दिया. वजह वह भी जानता था और मैं भी. उस ने मुझे समझाने के लिए कहा कि वह भाभी को अपने ढंग से संभाल लेगा. बस उस के बाद जागीर सिंह मुझे नहीं मिला.

‘‘वाह मामा वाह, बड़े मामा ने तुम से अपनी हत्या की आशंका जताई और आप ने 5 साल से उन की खबर तक नहीं ली?’’

‘‘खबर कैसे लेता, भाभी ने तो लड़झगड़ कर घर से निकाल दिया था. मैं उस के घर कैसे जाता? जाता तो गालियां सुननी पड़तीं.’’ गुरमीत ने अपनी स्थिति साफ कर दी.

बात चिंता वाली थी. मनप्रीत ने खुद ही बड़े मामा जागीर सिंह का पता लगाने का निश्चय किया. उस ने मामा के पैतृक गांव से ले कर गुरमीत द्वारा बताई गई संभावित जगह रेलवे बस्ती, गुरु हरसहाय नगर तक पता लगाया. उस की इस छानबीन में जागीर सिंह का तो कोई पता नहीं लगा, पर यह जानकारी जरूर मिल गई कि जागीर सिंह की पत्नी मंजीत कौर रेलवे बस्ती में किसी कुलवंत सिंह नाम के व्यक्ति के साथ रह रही है.

सवाल यह था कि मंजीत कौर अगर किसी दूसरे आदमी के साथ रह रही थी तो जागीर सिंह कहां था? मंजीत ने ये सारी बातें छोटे मामा गुरमीत को बताईं. इन बातों से साफ लग रहा था कि जागीर सिंह के साथ कोई दुखद घटना घट गई थी. सोचविचार कर गुरमीत और मंजीत ने थाना गुरसहाय नगर जा कर इस बारे में पूरी जानकारी थानाप्रभारी रमन कुमार को दी.

बठिंडा (पंजाब) के रहने वाले गुरदेव सिंह के 2 बेटे थे जागीर सिंह और गुरमीत सिंह. उन के पास खेती की कुछ जमीन थी, जिस से जैसेतैसे घर का खर्च चलता था. सालों पहले उन के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था. पत्नी के बीमार होने पर उन्हें अपनी जमीन बेचनी पड़ी. इस के बावजूद वह उसे बचा नहीं पाए थे.

पत्नी की मौत के बाद गुरदेव सिंह टूट से गए थे. जैसेतैसे उन्होंने अपने दोनों बेटों की परवरिश की. आज से करीब 15 साल पहले गुरदेव सिंह भी दुनिया छोड़ कर चले गए. पर मरने से पहले गुरदेव सिंह यह सोच कर बड़े बेटे जागीर सिंह का विवाह अपने एक जिगरी दोस्त की बेटी मंजीत कौर के साथ कर गए थे कि वह जिम्मेदारी के साथ उस का घर संभाल लेगी.

मंजीत कौर तेजतर्रार और झगड़ालू किस्म की औरत थी. उस ने घर की जिम्मेदारी तो संभाल ली, लेकिन पति और देवर की कमाई अपने पास रखती थी. दोनों भाई जमींदारों के खेतों में मेहनतमजदूरी कर के जो भी कमा कर लाते, मंजीत कौर के हाथ पर रख देते. लेकिन पत्नी की आदत को देखते हुए जागीर सिंह कुछ पैसे बचा कर रख लेता था.

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परिवार है तो प्यार है

आज के समय में परिवार छोटे होते जा रहे हैं जबकि पहले परिवार बड़े होते थे. एक परिवार में तीनचार पीढि़यां भी एकसाथ रहती थीं. भाईबहन अब के मुकाबले अधिक होते थे. यानी, हमें एक बड़े परिवार में रहने की आदत थी. सब मिल कर कारोबार करते थे. नई पीढि़यां उसी कारोबार में जुड़ती जाती थीं पर जरा सोचिए, क्या उन बड़े परिवारों में सबकुछ सही था? क्या उन परिवारों में रहने वालों में आपसी प्यार था?

भारत में संयुक्त परिवारों के भीतर कई संपत्ति विवाद देखे गए हैं. राजनेताओं, रईस खानदानों, सैलिब्रिटीज और बड़ेबड़े उद्योगपतियों के यहां भी ऐसे विवाद आएदिन सामने आते रहते हैं. उन की जिंदगी के भी पारिवारिक ?ागड़ों और विवादों ने सुर्खियां बटोरी हैं. वहीं, कई ऐसे भी नामीगिरामी परिवार हैं जिन की एकता और प्रेम ने उन के बिजनैस को ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया.

उदाहरण के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज के संस्थापक धीरूभाई अंबानी रिश्तों को बहुत तवज्जुह देते थे. हालांकि अपने निधन से पहले वे एक बड़ी गलती कर गए. अपने जीतेजी उन्होंने बेटों के नाम वसीयत नहीं की. इसी के कारण मुकेश और अनिल के बीच रिश्ते दरक गए. धीरूभाई ने सोचा भी नहीं होगा कि एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले मुकेश और अनिल एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाएंगे.

वर्ष 2002 में धीरूभाई के आंख मूंदते ही भाइयों में कारोबारी वर्चस्व की जंग शुरू हो गई. आखिरकार, 2005 में रिलायंस ग्रुप के बंटवारे के बाद ही चीजें शांत पड़ीं. लेकिन तब तक भाइयों में फांस पैदा हो चुकी थी और परिवार टूट गया था. यही वजह है कि अपने पिता के निधन के बाद से मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी अकसर एकदूसरे से नजरें नहीं मिला पाते. फिलहाल हालात कुछ सुधरे हैं, मगर समस्याएं अभी भी हैं.

इसी तरह भारतीय मूल का हिंदुजा ग्रुप पिछले 100 वर्षों से दुनिया के अलगअलग देशों में व्यापार कर रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हिंदुजा बंधुओं के बीच संपत्ति को ले कर विवाद बना हुआ है. करीब 1,400 अरब रुपए की दौलत वाले और 38 देशों में कारोबार करने वाले हिंदुजा ग्रुप में 8 साल से ज्यादा समय तक पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे का विवाद चला, बाद में परिवार के सदस्यों ने आपसी सुलह करने का फैसला किया.

विवाद की शुरुआत 2014 में सम?ाते के बाद हुई जब हिंदुजा समूह के संस्थापक दीपचंद हिंदुजा के 4 बेटों श्रीचंद, गोपीचंद, प्रकाश और अशोक के बीच हुए सम?ाते में कहा गया था कि एक भाई के नाम पर रखी गई संपत्ति एक की नहीं, बल्कि चारों भाइयों की होगी. सम?ाते के करीब एक साल बाद हिंदुजा भाइयों में सब से बड़े श्रीचंद हिंदुजा ने हिंदुजा बैंक औफ स्विट्जरलैंड पर अकेले स्वामित्व का दावा किया था. इस के लिए उन्होंने हाईकोर्ट में अपने तीनों भाइयों पर केस कर दिया था. दशकों से संयुक्त परिवार की तरह रहने वाली फैमिली में संपत्ति को ले कर शुरू हुए विवाद को देख कर लोग अचरज में पड़ गए थे.

ऐसा ही कुछ हुआ फैशन के क्षेत्र में 100 साल से भी ज्यादा पुराने और जानेमाने ब्रैंड रेमंड से जुड़े उद्योगपति सिंघानिया फैमिली के साथ. महाराष्ट्र के ठाणे में साल 1900 में रेमंड की शुरुआत वूलन मिल के रूप में हुई थी. धीरेधीरे कंपनी फेमस होने लगी. साल 1980 में रेमंड की कमान विजयपत सिंघानिया के हाथों में आई जिन्होंने भारत के बाहर भी इस कारोबार को बढ़ाया.

बापबेटे के बीच विवाद

साल 2015 में विजयपत सिंघानिया ने अपने बेटे गौतम सिंघानिया को अपने सारे शेयर और लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की कंपनी दे दी. यहीं से विवाद शुरू हुआ. दरअसल, बापबेटों के बीच एक फ्लैट को ले कर विवाद शुरू हुआ. पिता उस फ्लैट को बेचना चाहते थे लेकिन गौतम नहीं. विवाद इतना बढ़ गया कि इस व्यावसायिक घराने के बापबेटे की लड़ाई लोगों के सामने आ गई. बाद में मध्यस्थता द्वारा पारिवारिक संपत्तियों को तीनतरफा विभाजित करने के बाद सिंघानिया परिवार समूहों के बीच विवाद समाप्त हो गया.

विजयपत सिंघानिया ने अपनी आत्मकथा ‘ऐन इन्कम्प्लीट लाइफ’ में अपना दर्द बयां किया. विवाद की वजह से उन्हें अपना काम और पैतृक घर छोड़ना पड़ा था. किताब में उन्होंने लिखा कि अपने जीवन में जो सब से बड़े सबक सीखे उन में से एक यह है कि किसी को जीवित रहते अपनी संपत्ति अपने बच्चों को देते समय सावधान रहना चाहिए.

यही हाल रैनबैक्सी ग्रुप का भी रहा. दादा मोहन सिंह ने 1950 में रैनबैक्सी की कमान संभाली थी, जिस की विरासत बाद में उन के बेटे परविंदर सिंह को मिली. परविंदर के बेटे मलविंदर और शिविंदर ने रैनबैक्सी को कुछ साल पहले बेच कर हौस्पिटल्स, टैस्ट लैबोरेटरीज, फाइनैंस और अन्य सैक्टर्स में डायवर्सिफाई किया. दोनों भाइयों ने करीब 10 हजार करोड़ रुपए में रैनबैक्सी को एक जापानी कंपनी के हाथों बेचा था. आज ग्रुप पर करीब 13 हजार करोड़ रुपए का कर्ज चढ़ चुका है. कारोबार के मामले में गर्दिश के दौर से गुजर रहे रैनबैक्सी लैबोरेट्रीज के पूर्व प्रमोटर और फोर्टिस हौस्पिटल्स के फाउंडर शिविंदर सिंह ने अपने बड़े भाई मालविंदर सिंह के खिलाफ कोर्ट में मामला दायर कराया.

भारत की सब से बड़ी लौ फर्म अमरचंद मंगलदास एंड सुरेश श्रौफ एंड कंपनी 2015 में परस्पर विरोधी भाइयों सिरिल श्रौफ और शार्दुल श्रौफ के बीच विभाजित हो गई थी. शार्दुल और सिरिल की मां ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी की वसीयत बड़े के पक्ष में कर दी थी, जिस के कारण दोनों भाइयों के बीच कानूनी टकराव हुआ. मगर बाद में मामला सुल?ा गया और कंपनी का बंटवारा हो गया.

किर्लोस्कर समूह के संरक्षक एस एल किर्लोस्कर की मृत्यु के बाद हुई ?ाड़पों के बाद समूह परिवार में विभाजित हो गया. विजय आर किर्लोस्कर अपने स्वयं के दृष्टिकोण और व्यावसायिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए समूह से बाहर हो गए.

वहीं, हाल ही में दक्षिण भारत के बड़े बिजनैस समूह मुरुगप्पा ग्रुप का पारिवारिक विवाद सुल?ा है. परिवार ने 20 अगस्त को ऐलान किया कि जो भी विवाद था उसे आपसी सहमति से सुल?ा लिया गया है. दरअसल, यह पारिवारिक विवाद साल 2017 में मुरुगप्पा ग्रुप के चेयरमैन एम वी मुरुगप्पा के निधन के बाद शुरू हुआ था. एम वी मुरुगप्पा ने एक विल छोड़ी थी जिस में उन्होंने अपना हिस्सा अपनी पत्नी और बेटियों के नाम किया था. हालांकि परिवार ने उन की पत्नी या बेटियों को महिला होने की वजह से बोर्ड में जगह देने से इनकार कर दिया था. मुरुगप्पा ग्रुप की शुरुआत वर्ष 1900 में हुई थी. फिलहाल मुरुगप्पा परिवार की 5वीं पीढ़ी कंपनी संभाल रही है. मुरुगप्पा गु्रप औफ कंपनीज में 28 कंपनियां हैं.

भारत के बड़े कारोबारी समूहों में से एक गोदरेज ग्रुप में भी आपसी सम?ौते से बंटवारा होने जा रहा है. 126 साल पुराने गोदरेज ग्रुप के पास लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति है. यह गोदरेज ग्रुप जल्द ही मुख्य रूप से 2 भागों में बंटने वाला है. पहला भाग है- गोदरेज इंडस्ट्रीज एंड एसोसिएट्स, जिस की अगुआई आदी और नासिर गोदरेज कर रहे हैं. ये दोनों भाई हैं. वहीं, दूसरा भाग है- गोदरेज एंड बौयस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी, जिस की अगुआई उन के कजिन जमशेद गोदरेज और स्मिता गोदरेज कृष्णा कर रहे हैं.

ऐसे ही विदेशों के भी कई हाई प्रोफाइल उदाहरण हैं जहां रिश्ते खराब हुए. परिवार में विवाद के कारण ही स्पोर्ट्सवियर के 2 मशहूर ब्रैंड्स- प्यूमा और एडिडास का जन्म हुआ. प्यूमा एसई एक जरमन बहुराष्ट्रीय निगम है जो एथलैटिक और कैजुअल जूते, परिधान आदि डिजाइन व निर्माण करता है और जिस का मुख्यालय जरमनी में है. प्यूमा दुनिया की तीसरी सब से बड़ी स्पोर्ट्सवियर निर्माता है.

कंपनी की स्थापना 1948 में रुडौल्फ डैस्लर द्वारा की गई थी. 1924 में रुडौल्फ और उन के भाई एडौल्फ ‘आदी’ डैस्लर ने संयुक्त रूप से कंपनी ‘डैसलर ब्रदर्स शू फैक्ट्री’ बनाई थी. बाद में दोनों भाइयों के बीच रिश्ते खराब हो गए. वे 1948 में विभाजित होने के लिए सहमत हो गए और 2 अलग संस्थाएं, एडिडास और प्यूमा बन गईं. विभाजन के बाद प्यूमा और एडिडास के बीच भयंकर और कड़वी प्रतिद्वंद्विता शुरू हो गई.

सैमसंग में भी परिवार का ?ागड़ा और विरासत का संकट हुआ. इसी तरह आस्ट्रेलिया की अरबपति खनन कारोबारी गिना राइन हार्ट ने अपने परिजनों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी. हाल में ही प्रिंस हैरी और मेगन मर्केल ब्रिटेन के शाही परिवार की वरिष्ठ सदस्यता से अलग हुए तो लोग सोच में पड़ गए. परिवार से अलग होना मुश्किल फैसला होता है क्योंकि वहां भावनात्मक मुद्दे जुड़े होते हैं.

दरअसल, पारिवारिक व्यवसायों में भरोसे की वजह से अहम कानूनी औपचारिकताओं को नजरअंदाज किया जाता है. जब सभी लोग खुश होते हैं तो कानूनी दस्तावेज बनाने की नहीं सोचते. हाथ मिलाने और मौखिक वादे पर ही एतबार कर लेते हैं. लेकिन जब चीजें बिगड़ने लगती हैं तो सम?ाते को साबित करने वाले कागजात नहीं होते. ऐसे में समस्याएं पैदा होती हैं.

वैसे, परिवार के साथ बना कर रखा जाए तो नजारा कुछ और ही होता है. यह बात जापान की होशी रयोकन ने साबित की है. 46 पीढि़यों से एक ही परिवार इस कंपनी को चला रहा है. होशी एक रयोकन यानी जापानी पारंपरिक सराय है जिस की स्थापना 718 में जापान के इशिकावा प्रांत में हुई थी. इस का स्वामित्व और प्रबंधन होशी परिवार द्वारा 46 पीढि़यों से किया जा रहा है. वहीं, रिटेल जायंट वालमार्ट भी समस्याओं से अछूता नहीं है लेकिन आज भी संस्थापक सैम वाल्टन के वंशज करीब 50 फीसदी हिस्से के मालिक हैं. परिवार में कोई विवाद हो भी तो खबरों में नहीं आ पाता. आस्ट्रेलिया में 70 फीसदी कंपनियां परिवार के स्वामित्व में हैं.

सदियों पहले भी यही हालात थे हमारी पौराणिक कहानियों में एक बात साफ नजर आती है कि उस समय परिवार काफी बड़े थे मगर उन में प्यार नहीं था. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि रामायण-महाभारत काल में भी परिवारों को कभी सुकून नहीं मिला. आप महाभारत काल का उदाहरण लें या फिर रामायण काल का, दोनों में ही परिवार के सदस्य एकदूसरे से लड़ते?ागड़ते, मारकाट या साजिश करते ही दिखेंगे. चाहे महाभारत में कौरव और पांडव यानी भाइयों का ?ागड़ा हो या फिर रामायण में कैकेई जैसे किरदारों का चित्रण. हमें यही नजर आता है कि वे एकदूसरे के अहित में अपना हित देखते थे.

पांडव हमेशा कौरवों की आंखों में गड़ते रहे. इस चक्कर में महायुद्ध हुआ और हर तरफ नाश का तांडव मचा. इसी तरह अपने बेटे भरत के लिए कैकेई ने जिस तरह मंथरा के झासे में आ कर तूफान खड़ा किया और उस के बाद जैसे पूरे परिवार का बिखरना तय हो गया, वह क्या दर्शाता है? यही न कि राजामहाराजाओं के आलीशान महलों और बड़े खानदानों में भी सुकून नहीं था.

तो क्या हम यह समझे कि हमारे जींस में पारिवारिक द्वेष, हिंसा, ?ागड़ा जैसी प्रवृत्तियां घुसी हुई हैं? अगर ऐसा है भी, तो ध्यान रखें कि हमारी वर्तमान सोच तर्क और विवेक पर आधारित होनी चाहिए. हम ने बौद्धिक रूप से काफी सफलताएं हासिल की हैं. ऐसे में हमें इस मामले में भी अपनी सोच तार्किक रखनी होगी.

तर्क यह कहता है कि अभी के समय में हमारे परिवार छोटे हैं. ऐसे में और भी ज्यादा जरूरी है कि जो थोड़े से लोग परिवार में हैं वे कम से कम एकदूसरे के साथ खड़े रहें. परिवार छोटे हैं, इसलिए हमें अपने रिश्तों को संभाल कर रखना होगा. याद रखें, आपसी वैर और द्वेष से किसी का भला नहीं होता, सब खत्म हो जाता है. जबकि, प्यार के सहारे आप बड़ी से बड़ी मुश्किल भी आसानी से पार कर जाते हैं.

सफलता के लिए प्यार जरूरी

दुनियाभर की दोतिहाई कंपनियां परिवारों द्वारा चलाई जाती हैं. उन में काम करने के कई फायदे हो सकते हैं. 2014 की फैमिली बिजनैस सर्वे रिपोर्ट में प्राइस वाटरहाउस कूपर्स ने लिखा था कि रिश्तों के साथ काम करना विश्वास और प्रतिबद्धता का ऊंचा स्तर पैदा कर सकता है लेकिन वहीं यह तनाव, नाराजगी और खुले संघर्ष की ओर भी ले जा सकता है क्योंकि लोगों को दिल और दिमाग अलग रखने व कारोबार एवं परिवार दोनों को सफल बनाने में मुश्किल होती है.

कैरियर के साथ मन के सुकून के लिए भी बेहतर है कि आप संबंधों को न बिगाड़ें. पारिवारिक कारोबार में यह और जरूरी होता है क्योंकि सभी से जिंदगीभर आप का वास्ता रहने वाला है. संबंध बिगड़ भी गए हैं तो प्रयास कर के उन्हें सुधार लें.

राजनीतिक गलियारे में परिवारवाद

राजनीतिक गलियारे की बात करें तो अकसर कांग्रेस पर परिवारवाद को बढ़ावा देने के इलजाम लगते रहते हैं. नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया और फिर राहुल व प्रियंका के राजनीतिक सफर को वंशवाद या परिवारवाद का नाम दिया जाता है मगर जरा सोचें कि इस में बुराई क्या है? अगर एक ही परिवार से आने वाली नई पीढि़यां राजनीति या किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ती हैं तो

उन्हें काफी फायदा होता है. उन्हें सही मार्गदर्शन मिलता है और वे माहौल से पूरी तरह परिचित होते हैं. उन्हें पता होता है कि आगे क्या करना है. उन्हें अनुभव का लाभ मिलता है. उन का सफर आसान हो जाता है और वे ज्यादा समर्थ बन पाते हैं. नेहरू खानदान ने हमेशा इसी हकीकत को दर्शाया है.

बड़ेबड़े और रईस खानदानों व सैलिब्रिटीज की जिंदगी के भी पारिवारिक ?ागड़ों व विवादों ने सुर्खियां बटोरी हैं जबकि कई ऐसे भी नामीगिरामी परिवार हैं जिन की एकता व प्रेम ने उन के बिजनैस को ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया.

क्या करें

जो जैसा है, वैसा रहने दें : हर इंसान दूसरे से अलग होता है. आप के परिवार में भी संभव है कि सब की सोच और रहनसहन का तरीका अलग हो. ऐसे में अगर आप को किसी की कोई बात सही न लगती हो तो बारबार उस से ?ागड़ने या उसे सम?ाने के बजाय उसे अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने दें. आप ज्यादा सोचेंगे तो आप का सुकून तो जाएगा ही, रिश्ता भी खराब होगा.

बेहतर है कि दूसरों को टोकने से बचें. जरा सोचिए, सफर के दौरान आप मैट्रो/सड़क/औफिस में किसी से कुछ नहीं कहते. जो जैसा है या जैसा कर रहा है उसे वैसा रहने देते हैं. कोई म्यूजिक सुन रहा है, कोई बातें कर रहा है, कोई टेढ़ा हो कर बैठा है और कोई फोन में लगा है. आप सब के साथ चलते हैं, सब की तरफ देखते भी रहते हैं मगर किसी को टोकते नहीं. ऐसी ही मनोवृत्ति परिवार के सदस्यों के साथ भी रखें.

इसी तरह मान लीजिए कि राजधानी ऐक्सप्रैस ट्रेन में आप सफर कर रहे हैं. आप की सीट का बीच वाला शख्स हल्ला मचा रहा है कि खाना ठंडा है या कौफी में शुगर कम है आदि. जबकि आप आराम से खाना खा कर बैठे हो और उस की बातें आप को इरिटेट कर रही हैं फिर भी आप कुछ नहीं कहते. कौर्नर वाली सीट का शख्स बारबार ऊपर वाले ड्रौयर से सामान निकाल और रख रहा है. वह आप को डिस्टर्ब करते हुए बारबार वाशरूम जा रहा है. तब भी आप कुछ नहीं कहते क्योंकि आप बेकार के ?ागड़ों में पड़ना नहीं चाहते.

आप को लगता है कि कुछ समय की बात है, फिर आप यहां से निकल ही जाओगे. ऐसा ही व्यवहार घर के लोगों के साथ भी रखें. अगर किसी सदस्य की वजह से आप को परेशानी हो रही है तो उसे इग्नोर करें और सोचें कि सारी जिंदगी तो वह साथ रहेगा नहीं और अगर रहे भी तो उस की खूबियां देखें और गलतियों को नजरअंदाज करें. परिवार में कोई सदस्य जैसा भी हो, उसे वैसा रहने दो.

कनैक्टेड रहें : आप भले ही घर से दूर रह रहे हों या आप ने बड़ी गाड़ी खरीद ली हो या आप की अच्छी जौब लग गई है पर दूसरों के आगे घमंड न करें और सब से कनैक्टेड रहें. इसी तरह यदि आप के पास छोटी गाड़ी हो, जबकि आप का भाई महंगी गाड़ी खरीद कर लाया है या उसे बहुत अच्छी जौब मिल गई है और उस की सैलरी आप से दोगुनी हो गई है तो भी उस से जलें नहीं.

कहने का मतलब यह है कि सब से मिल कर रहें. अपने साथ दूसरों की खुशियों में भी खुश रहें. आर्थिक मतभेद उभरने न दें. संपत्ति में हिस्सा चाहिए तो यह बात कहें. मगर रोजरोज इसे ले कर ?ागड़ें नहीं. आप परिवार की लड़की या बहन हैं. वर्ष 1956 और 2005 के एक्ट के अनुसार आप ने फैसला लिया है कि संपत्ति में से अपना हिस्सा लेंगी. इस के लिए आप जरूरी कदम उठाएं. लेकिन जब त्योहार का समय हो या सब मिल कर खुशियां मना रहे हों तब मन की नाराजगी को उभरने न दें. प्यार से मिल कर खुशियों का आनंद लें.

परिवार में किसी से जलें नहीं और न ही ईर्ष्या रखें. कोई दूर भले ही हो पर सब से संपर्क बना कर रखें. यह मत भूलें कि आप पर विपत्ति आएगी तो परिवार के यही लोग आप के काम आएंगे. पुलिस स्टेशन हो या अस्पताल, आप के परिवार वालों से ही बातें पूछी जाएंगी या उन के सहयोग से ही आप किसी भी तरह की मुश्किलों से निकल पाएंगे.

पुराने गिलेशिकवे दबा कर रखें : 34 साल की प्रभा की अपनी देवरानी से बनती नहीं है. उस की देवरानी आशा ज्यादा पढ़ीलिखी है और इस बात का वह घमंड भी दिखाती है. जबकि प्रभा घर के कामों में निपुण है और उसे आशा के तौरतरीके बिलकुल भी पसंद नहीं. पहले दोनों भाई एक घर में रहते थे मगर प्रभा और आशा के बढ़ते ?ागड़ों की वजह से छोटा भाई पास में ही अलग घर ले कर रहने लगा. अब आलम यह है कि प्रभा जब भी आशा के घर जाती है या तीजत्योहार में आशा ससुराल आती है तो दोनों की तकरार शुरू हो जाती है.

प्रभा आशा के कामों में हर समय कमी निकालती रहती है तो आशा के दिल का गुबार भी फूट पड़ता है. इस वजह से वह त्योहारों का भी मजा नहीं ले पाती. मगर जब एक बार प्रभा का ऐक्सिडैंट होता है तो आशा बहुत अच्छे से उसे संभालती है. उस का खयाल रखती है तब प्रभा समझती है कि अपने ही काम आते हैं. अब वह कभी भी प्रभा को बात नहीं सुनाती और हर तरह के गिलेशिकवे मन में दबा कर रखती है. इस से घर में प्यार और शांति लौट आती है.

आप भी इस बात का खयाल रखें कि किसी को बात सुना देना आसान है, मगर इस से रिश्तों में कड़वाहट आ जाती है जबकि प्यार रहे तो कमियां नजरअंदाज करना आसान होता है.

परिवार नहीं होगा तो झगड़ा किस से करोगे ?

आप किसी अकेले रह रहे शख्स से पूछिए कि वह अपने परिवार को कितना मिस करता है. परिवार होता है तो आप अपनों से ?ागड़ सकते हैं, उन्हें बात सुना सकते हैं. वहीं, सौरी कह कर फिर गले भी लग सकते हैं. परिवार के साथ गम आधा और खुशियां दोगुनी हो जाती हैं. परिवार ही नहीं होगा तो आप न झगड़ने का आनंद ले सकेंगे और न साथ खुशियां मनाने का. बस, दिल में एक कसक ही रह जाएगी. ऐसी स्थिति से बचना है तो अपने परिवार का खयाल रखें. रिश्तों को संभाल कर रखें.

आज के समय में कब कौन कहां फंस जाए ?

हकीकत यह है कि कब, किस तरह की विपत्ति आ जाए या कौन, कहां फंस जाए, कब किस का ऐक्सिडैंट हो जाए, कब आप को अपने बच्चों की जिम्मेदारी किसी और को सौंपनी पड़े, कब कोई बीमारी हो जाए या आप कहां किस तरह की धोखाधड़ी में फंस जाएं. ऐसे हालात में इंसान अपने परिवार की तरफ ही देखता है और परिवार ही आसरा बनता है. इसलिए परिवार की कीमत समझे.

घरपरिवार बचाना है तो अपने मतलब से बढ़ कर सोचें

हमेशा अपने मतलब की न सोचें. कभीकभी थोड़ा त्याग कर के आप परिवार से बहुत सारा प्यार व अपनापन पाते हैं जिस की कीमत नहीं आंकी जा सकती. इसलिए स्वार्थ से बढ़ कर परिवार के लिए सोचें. सब के आगे बढ़ने का सपना देखें. सब को अपना मानें. रिश्तों में एक ग्लू जरूरी है जो सब को बांध कर रखेगा.

फिल्मी हस्तियों के परिवारों में मनमुटाव

बौलीवुड में ऐसे कई सैलेब्स हैं जिन के परिवार से विवाद खुल कर सामने आए हैं :

  • कृष्णा अभिषेक

कृष्णा के अपने मामा गोविंदा से मतभेद हैं. कुछ समय पहले गोविंदा जब ‘द कपिल शर्मा शो’ में मेहमान बन कर पहुंचे तो कृष्णा शो का हिस्सा नहीं बने. दरअसल दोनों की तल्खी की वजह कृष्णा की पत्नी कश्मीरा शाह द्वारा किया गया सोशल मीडिया पर एक कमैंट है, जिसे गोविंदा से जोड़ कर देखने के बाद हंगामा मच गया था.

  • जान कुमार सानू

बिग बौस 14 के कंटैंस्टैंट जान कुमार सानू के अपने पिता कुमार सानू से संबंध बिलकुल ठीक नहीं हैं. दोनों के बीच आरोपप्रत्यारोपों का दौर चलता रहा है. जान को बचपन में पिता ने छोड़ दिया था और उन की परवरिश मां रीता ने की. वहीं पत्नी और बेटे को छोड़ कर कुमार सानू ने दूसरी शादी कर ली.

पिछले दिनों ‘बिग बौस’ में जान कुमार सानू द्वारा मराठी भाषा के अपमान के बाद पिता ने उन की परवरिश पर सवाल उठा दिए थे, जिस के बाद जान भड़क गए. तब से दोनों के बीच विवाद और गहराता गया.

  • अमीषा पटेल

2004 में अमीषा अपने परिवार पर अपनी कमाई का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा चुकी हैं. उन्होंने अपने पिता के खिलाफ 12 करोड़ रुपए के हर्जाने का मुकदमा दायर कर दिया था. यह लड़ाई तब और बदतर हो गई जब अमीषा के रिश्ते डायरैक्टर विक्रम भट्ट से जुड़े. अमीषा ने मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि उन के मम्मीपापा नहीं चाहते थे कि वे विक्रम से मिलें या फिर उन से शादी करें. वे चाहते थे कि उन की शादी किसी पैसे वाले आदमी से हो. जब अमीषा ने उन से अपने पैसों के बारे में पूछा तो वे ?ागड़ने लगे.

  • कंगना रनौत

एक समय कंगना की अपने पिता अमरदीप रनौत से बिलकुल नहीं बनती थी. कंगना मौडलिंग और ऐक्ंिटग में अपना कैरियर बनाना चाहती थीं लेकिन पिता इस के सख्त खिलाफ थे. वे बेटी को डाक्टर बनाना चाहते थे. उन्होंने मैडिकल की पढ़ाई के लिए कंगना का एडमिशन चंडीगढ़ के डीएवी स्कूल में कराया था. कंगना को मौडलिंग पसंद थी. उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया और होस्टल से पीजी में शिफ्ट हो गईं.

कंगना के घर से भागने और फिल्मों में काम करने की वजह से कंगना के पिता ने उन से सालों तक बात नहीं की थी. हालांकि अब बेटी की सफलता से पिता बेहद खुश हैं और दोनों के रिश्ते सुधर गए हैं.

  • नवाजुद्दीन सिद्दीकी

अपनी ऐक्टिंग के लिए पौपुलर नवाजुद्दीन पिछले कुछ दिनों से अपने भाई और एक्स वाइफ संग मतभेद के कारण चर्चा में बने हुए हैं. ऐक्टर के भाई शमास नवाब सिद्दीकी ने ऐक्टर पर आरोप लगाया कि उन्होंने अपने किसी भी भाई का कैरियर बनाने में मदद नहीं की. दोनों के बीच बात इतनी बढ़ गई कि हाल ही में नवाज अपनी बीमार मां से मिलने के लिए शमास के घर पर पहुंचे थे. लेकिन उन्होंने ऐक्टर को घर में घुसने नहीं दिया.

  • आमिर खान

आमिर खान बौलीवुड में मिस्टर परफैक्शनिस्ट के नाम से जाने जाते हैं. फिल्मों को बेहतर बनाने के लिए ऐक्टर कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन रियल लाइफ में उन्हें अपनों संग बनाने में स्ट्रगल करना पड़ा.

  • रेखा

एवरग्रीन रेखा भी उन स्टार्स में से एक हैं जिन का उन के परिवार संग मनमुटाव रहा. ऐक्ट्रैस ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि अपने पिता से उन के रिश्ते अच्छे नहीं थे. दोनों के बीच काफी लड़ाई होती थी.

मजबूरियां: ज्योति और प्रकाश के रिश्ते से निशा को क्या दिक्कत थी

Holi Special: हक ही नहीं कुछ फर्ज भी- भाग 2

उन्नति का बीडीएस पूरा हो गया. वापस आ कर उस ने भारत की मान्यता के लिए परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली. इंटर्नशिप के बाद उसे लाइसैंस मिल गया. मांबाप का सीना गर्व से चौड़ा हो गया. उन्नति ने एक पीजी डैंटिस्ट रवि को जीवनसाथी के रूप में पसंद कर लिया. रवि को दहेज नहीं चाहिए था पर घर वालों को शादी धूमधाम से चाहिए थी.

‘‘ठीक ही तो है पापा शादी रोजरोज थोड़े ही होती है. अब ये लोग दहेज तो नहीं ले रहे न,’’ उन्नति मम्मीपापा, को दलील के साथ राजी करने की कोशिश में थी.

‘‘हांहां, हो जाएगा. तू चिंता मत कर,’’ सुकांत ने उसे तसल्ली देते हुए कहा.

जैसेतैसे सुकांत और निधि ने बड़ी बेटी को फाइवस्टार होटल से विदा किया.

‘‘मम्मीपापा मुझे पढ़ने का शौक था सो पढ़ लिया… प्रैक्टिस वगैरह मेरे बस की नहीं… मुझे तो बस घूमनाफिरना और मस्ती करनी है. लोन का आप देख लेना… मेरे पास वहां बैंक का कोई लेटरवैटर नहीं आना चाहिए वरना बड़ा बुरा फील होगा ससुराल में… रवि को मैं ने लोन के बारे में कुछ नहीं बताया है,’’ उन्नति ने जातेजाते दोटूक अपना मंतव्य बता डाला.

‘‘रवि को मालूम है तू काम नहीं करेगी?’’ सुरम्य को जब मालूम हुआ तो उस ने हैरानगी से पूछा.

इस पर उन्नति बोली, ‘‘और क्या… कह रहे थे कुछ करने की जरूरत नहीं है. बस रानी बन कर रहना… पलकों पर बैठा कर रखेंगे तू देखना,’’ और वह हंस दी थी.

‘‘दीदी तुम्हें मालूम है न कि मम्मीपापा अब रिटायर हो चुके हैं… हम लोगों के चक्कर में बेचारे मकान तक नहीं बनवा सके… बैंक से स्टूडैंट लोन तो है ही प्राइवेट लोन अलग से, विदेश की पढ़ाई उन्हें कितनी महंगी पड़ी पता है?’’

‘‘भाई, तू तो लड़का है. सीए बनते ही बढि़या कंपनी में लग जाना है. तू ठहरा तेज दिमाग… फिर धड़ाधड़ पैसे कमाएगा तू… थोड़ा ओवरटाइम भी कर लेना हमारे लिए… मुझे तो गृहस्थी संभालने दे… लाइफ ऐंजौय करनी है मुझे तो, वह अपने लंबे नाखूनों में लगी ताजा नेलपौलिश सुखाने लगी.’’

‘‘कमाल है दीदी पहले विदेश की महंगी प्रोफैशनल पढ़ाई पर खर्च करवाया, फिर फाइवस्टार में शादी की… दहेज न देने पर भी इतना खर्च हुआ जिस की गिनती नहीं. अब काम नहीं करेगी तो तुम्हारा लोन कैसे अदा होगा, सोचा है? माना काव्या दीदी का और मेरा लोन तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं पर अपना लोन तो चुकता कर जो बैंक से तुम ने अपने नाम लिया है… काम क्यों नहीं करोगी? फिर प्रोफैशनल पढ़ाई क्यों की? इतना पैसा क्यों बरबाद करवाया जब तुम्हें केवल हाउसवाइफ ही बनना था?’’

‘‘तू तो करेगा न भाई काम?’’

‘‘तुम काम नहीं करोगी तो कुछ दिनों में ही प्यार हवा हो जाएगा रवि का.’’

‘‘तमीज से बात कर. रवि तेरे जीजू हैं.’’

‘‘तुम्हारी वजह से मैं ने डाक्टरी की पढ़ाई नहीं की जबकि मैं बचपन से ही डाक्टर बनना चाहता था. घर की स्थिति देख कर अपना इरादा ही बदल लिया. न… न… करतेकरते भी इतना खर्च करवा डाला… कर्ज में डूब गए हैं मम्मीपापा… शर्म नहीं आती तुम्हें? कब जीएंगे वे अपने लिए कभी सोचा है?’’

‘‘तू है न उन का बेटा… करना सेवा सारी उम्र लायक बेटा बन कर.’’

‘‘वाह, बाकी हर चीज में बराबरी पर जिम्मेदारी में नहीं. वह तो शुक्र है मकान नहीं बना वरना बिकवा कर उस में से भी अपना शेयर लेती… छोड़ उन्नति दीदी तुम क्या समझोगी… जाओ खुश रहो,’’ सुरम्य बाकी का सारा उफान पी गया.

उधर काव्या ने भी लंदन में कमाल कर दिया. वहीं अपने एक दोस्त प्रतीक से ब्याह रचा लिया. 1 महीने के गर्भ से थी. पढ़ाई अधूरी छोड़ कर भारत लौट आई. ससुराल वालों ने उसे स्वीकारा नहीं.

वे कट्टर रीतिरिवाजों वाले दक्षिण भारतीय मूल के थे. बड़ी जद्दोजहद के बाद राजी हुए पर घर में फिर भी नहीं रखा. लिहाजा प्रतीक और वह घर से अलग रहने पर मजबूर हो गए. दोनों में से किसी के अभी जौब में न होने की वजह से सारा खर्च सुकांत और निधि के कंधों पर ही आ गया.

काव्या ने तो पढ़ाई छोड़ ही दी थी पर प्रतीक ने अपना एमबीए पूरा कर लिया. बाद में उसे जौब भी मिल गई.

उधर उन्नति की ससुराल की असलियत सामने आने  लगी. आए दिन सास तकाजा करतीं, ताने देतीं, ‘‘बहू, तुम्हारी हर महीने की इनकम कहां है. हम ने रवि को तुम से शादी की इजाजत इसलिए दी थी कि दोनों मिल कर घरपरिवार का स्तर बढ़ाने में मदद करोगे… वैसे ही लंबाचौड़ा परिवार है हमारा… बहू तुम से न घर का काम संभाला जाता है न बाहर का… देखती हूं रवि भी कितने दिन तुम्हारी आरती उतारता है,’’ भन्नाई हुई सास रेवती महीने बाद ही अपने असली रूप में आ गई थी.

रवि जब अपने दोस्तों की प्रोफैशनल वर्किंग पत्नियों को देखता तो उन्नति को ले कर अपमानित सा महसूस करता. रोजरोज दोस्तों की महंगी पार्टियों से उसे हाथ खींचना पड़ता. उन्नति को न ढंग का कुछ पकाना आता न कुछ सलीके से करनेसीखने में ही दिलचस्पी लेती. सजनेसंवरने में वक्त बरबाद करती.

फिर वही हुआ जो सुरम्य ने कहा था. खर्चे से रवि परेशान था, क्योंकि अपनी बहनों की ससुराल और रिश्तेदारी निभाने के लिए वही एक जरीया था. उस पर छोटे भाई आकाश की पढ़ाई भी उस के सिर थी.

बहनों की ससुराल वालों ने उस की पुश्तैनी प्रौपर्टी बिकवा कर उस में से हिस्सा लेने के बाद भी मुंह बंद नहीं किया. आए दिन फरमाइशें होती रहतीं, जिन से घर के सभी सदस्य चिड़ेचिड़े से रहते.

तब उन्नति को समझ आया कि बहनों की शादी के बाद प्रौपर्टी और पैसों में ही नहीं घर की जिम्मेदारियों में भी अपनी कुछ हिस्सेदारी समझनी चाहिए. उन्नति को मम्मीपापा और सुरम्य की बहुत याद आई.

आंखें सजल हो उठीं कि कितनी मुश्किल हुई होगी उन्हें. इतने कम पैसों में वे कैसे घर चलाते थे? हमारी जरूरतें, शौक पूरे करते रहे वे… अपना तो उन से सब कुछ करवा लिया हम ने पर उन की जरूरतों को कभी न समझा. सिर्फ नाम के लिए महंगी पढ़ाई कर ली. अपनी मस्ती और स्वार्थ के चलते न काम किया न अपना लोन ही चुकाया. वह आत्मग्लानि से भर उठी.

सप्ताह उपरांत उन्नति ने रवि की मदद से एक प्राइवेट डैंटल हौस्पिटल में काम करना शुरू कर दिया. रवि से उस ने साफ कह दिया, ‘‘जानती हूं कि और कुछ तो मम्मीपापा लेंगे नहीं पर कम से कम अपना ऐजुकेशन लोन जो मैं ने लिया था उसे अवश्य चुकाना चाहूंगी… तुम्हें कोई एतराज तो नहीं?’’

रवि ने प्यार से उस के कंधे पर हाथ रख मन ही मन सोचा कि काश उस की बहनें भी ऐसा सोच पातीं.

कुछ सालों बाद काव्या के ससुराल वालों ने उसे अपना लिया. उधर प्रतीक को बड़ी प्रमोशन मिली. उस ने यूएसए के क्लाइंट से अपनी कंपनी को बड़ा फायदा पहुंचाया था. वह एक झटके में ऊंचे ओहदे पर पहुंच गया.

काव्या को ऐशोआराम की सारी सुविधाएं मिलने लगीं तो उसे रहरह कर मम्मीपापा और घर की परिस्थितियों से जूझते भाई की तकलीफ ध्यान आने लगी कि उस ने कैसेकैसे उन का साथ दिया. हम बहनें तो निकम्मी निकलीं. उस का मन पश्चात्ताप से भर उठा. फिर उस ने उन्नति से मन की पीड़ा शेयर की तो उन्नति ने उस से.

इधर सुकांत के गांव की बरसों से मुकदमे में फंसी पैतृक संपत्ति का फैसला उन के पक्ष में हो गया. करीब 50 लाख उन की झोली में आ गए.

‘‘शुक्र है निधि जो फैसला हमारे पक्ष में हो गया. देर आए दुरुस्त आए. मैं ने सुरम्य को औफिस में ही फोन कर बता दिया. आता ही होगा. उन्नति और काव्या को भी खुशखबरी दे दो. उन्हें संडे को आने को कहना.’’

सुकांत के स्वरों में खुशी और उत्साह छलक रहा था. वे जल्द ही अपनी खुशी तीनों बच्चों में बांट लेना चाहते थे और रकम भी.

‘‘संडे को तो दोनों वैसे भी आने वाली हैं. रक्षाबंधन जो है. तभी सरप्राइज देंगे. अभी नहीं बताते,’’ निधि बोलीं.

लेखक- Dr. Neerja Srivastava

सवाल: भाग 3- सुरैया की खुशी बनी अनवर के लिए परेशानी का सबब

लेखक- शेख विकार अहमद

सुरैया के छोटे भाई की शादी के समय उस के अब्बू जब उसे लेने के लिए आए तो शाहिदा बेगम ने खुल कर अपनी बात उन के सामने रखी. उन का कहना था कि उन के खानदान का नामोनिशान इस लड़की की वजह से मिटने को है और वे किसी भी सूरत में ऐसा नहीं होने देंगी. उन का इरादा साहिल की दूसरी शादी करने का है. शाहिदा बेगम ने सुरैया के अब्बू से उसी वक्त जवाब मांगा.

तब सुरैया को सब से ज्यादा दुख इस बात का हुआ था कि पास बैठा साहिल चुपचाप सब तमाशा देख रहा था. उस ने पूरी बात के दौरान कुछ भी नहीं कहा था. इस का मतलब कि इस मामले में उस की पूरी रजामंदी थी. सुरैया के अब्बू ने उस वक्त कुछ न कहते हुए चुपचाप रहने में ही भलाई सम?ा. वह भी हकीकत को जानते थे और ऐसे किसी मामले के उठने का डर उन्हें कुछ दिनों से होने लगा था.

सुरैया के मायके आने के बाद उन के घर में काफी हंगामा हुआ. घर में हो रही शादी की तैयारियों पर मातम छा गया. शादी में शरीक होने आए सुरैया के ससुराल वाले कुछ दूरदूर ही रहे. ऐसा लग रहा था जैसे महज रिश्तेदारी निभाने की मजबूरी में आए हों. शादी के बाद लौटते समय जब उन्होंने ?ाठमूठ भी सुरैया को साथ ले जाने की बात नहीं की तो उस के अब्बू को गहरा धक्का लगा. शायद उन लोगों ने साहिल की दूसरी शादी करने का अपना मंसूबा इस तरह के बरताव से जाहिर कर दिया था.

एक दिन खबर आई कि साहिल की अम्मी उस के लिए लड़की तलाश कर रही हैं. तब सुरैया के अब्बू से रहा नहीं गया और वे अपने बड़े भाई को साथ ले कर सुरैया की ससुराल वालों से जवाब तलब करने पहुंचे. वहां पर उन्हें दोटूक जवाब मिल गया कि या तो आप सुरैया को सौतन के साथ रहने को भेज दीजिए या फिर तलाक करवा लीजिए. सुरैया अपने अब्बू की लाड़ली थी. उस के भाग ऐसे फूटेंगे, ऐसी उन्हें कतई उम्मीद नहीं थी. उन्होंने सोचा, बेटी को सौतन के हवाले करने से अच्छा तो उस का तलाक करवा देना ही बेहतर होगा.

टूटे मन से घर लौट कर जब उन्होंने सुरैया को पूरा किस्सा सुनाया तो वह खून के आंसू रोई. साहिल के बरताव से उस का दिल तो वैसे ही टूट गया था. उस के अब्बू के पूछने पर उस ने तलाक लेने के लिए हामी भर दी.

अब तक कुछ दिनों तक मायके में रहने के इरादे से आई सुरैया अब हमेशा के लिए वहां पहुंचा दी गई थी. उस के दोनों भाई और भाभियां बहुत अच्छे स्वभाव के थे. उन की तरफ से उसे कभी कोई तकलीफ नहीं हुई. उस ने हालात से सम?ाता कर लिया. वक्त गुजरने लगा. कभीकभार उस की दूसरी शादी के लिए कोई रिश्ता आता भी था तो वह ऐसा होता कि किसी को भी मंजूर न होता.

एक बात अब तक साफ हो गई थी कि अब सुरैया की दूसरी शादी मुमकिन नहीं. उस ने भी इसे अपनी नियति मान लिया और हालात से सम?ाता कर लिया.

तलाक हुए 10 साल गुजर गए थे, जब अनवर की अम्मा रिश्ता ले कर आई थीं. सुरैया के अब्बू तो जैसे भूल ही गए थे कि सुरैया की दूसरी शादी हो सकती है. घर के सभी लोग अचरज में पड़ गए थे. आखिर अब्बू ने सोचा कि रिश्ता मंजूर करने से पहले एक बार सुरैया से भी पूछ लेना जरूरी है.

‘नहीं अब्बू, मैं अब शादी नहीं करूंगी,’ उस ने जैसे अपनेआप से कहा था. अब्बू जानते थे कि उन की बेटी अपने अतीत के उस दर्द से कभी उबर नहीं पाएगी मगर उन को अनवर का रिश्ता बहुत पसंद आया था. फिर मांबाप उसे उम्रभर का साथ भी नहीं दे सकते थे. उन के बाद सुरैया को वैसी ही इज्जत मिलेगी, इस की भी कोई गारंटी नहीं थी.

आखिर जब अम्मी और अब्बू ने उस की काफी मानमनौअल की और अपने मन का डर उसे साफसाफ बता दिया तो वह जैसेतैसे राजी हो गई थी.

अनवर के साथ उस की शादी हो गई. एक बार फिर से उस के मन की सूख चुकी प्यार की बेल लहलहा उठी. उस का दिल उस छोटी सी दुनिया में ऐसे रम गया जैसे वह हमेशा से उसी दुनिया की थी. वह अपना अतीत भूलने में कामयाब हो गई थी.

अगर आज सुबह का वाकेआ न होता तो शायद उसे अतीत का वह काला हिस्सा याद भी नहीं आता. उस ने सोचा, ‘अगर वह इस उम्र में मां बन सकती है तो 20 साल पहले वह क्यों नहीं बन पाई थी. आज उस की सम?ा में आया कि क्यों उस समय साहिल डाक्टर की सलाह लेने की बात पर नाराज हुआ था. क्या वह जानता था कि वह बाप नहीं बन सकता? या वह सिर्फ उस का डर था कि अगर उस का दोष निकला तो उस की मर्दानगी पर शक किया जाएगा. फिर कैसे उस ने अपना सारा दोष अकेली सुरैया के माथे मढ़ दिया?

‘क्यों उसे लगातार 7 साल तक बां?ा होने का उलाहना सुनना पड़ा? क्यों उसे ऐसे फेंक दिया गया जैसे यह सिर्फ उसी अकेली का दोष हो? जवानी के 20 साल उस ने इस अपराधबोध में गुजार दिए कि वह कुदरत की इतनी बड़ी नेमत से महरूम है. क्या उस की गुजरी हुई जवानी का कोई बदला चुका सकेगा?’ वह सोचसोच कर ऊब गई.

फिर उस ने दूसरे नजरिए से इस बात को सोचा कि खैर, जो भी हो, देर से ही सही कुदरत ने उस की सूनी गोद आबाद तो कर ही दी और वह अपनेआप से मुसकराई.

शाम को जब अनवर घर आए तो सब से पहले उन्होंने सुरैया को ढूंढ़ा. जब वह हमेशा की तरह बैठक में नजर नहीं आई तो उन्हें उस की तबीयत की चिंता हुई और उन्होंने अम्मा से पूछा. जैसे ही उन्होंने उन्हें बताया कि वह मां बनने वाली है तो वे बैडरूम में आए.

‘‘बेगम, मैं यह क्या सुन रहा हूं? आप मां बनने वाली हैं?’’

सुरैया ने हंस कर ‘हां’ में सिर हिलाया.

‘‘ओह नो, यह नहीं हो सकता.’’

‘‘मतलब?’’ सुरैया ने अचरज से पूछा, ‘‘मेरे मां बनने में बुराई क्या है?’’

‘‘बुराई नहीं. मगर यह वक्त नहीं है कि आप मां बनें. लोग क्या कहेंगे?’’

सुरैया अब भी सम?ा नहीं पाई कि अनवर क्या कहना चाहते हैं.

‘‘लोग क्या कहेंगे?’’ उस ने उन का ही सवाल दोहराया.

‘‘मैं ने अम्मा से पहले ही कहा था,’’ अनवर जैसे अपनेआप से कह रहे थे, ‘‘दूसरी शादी तो कर लूंगा मगर

शादी के बाद मु?ो और औलाद नहीं चाहिए. मेरे पहले बच्चे अब जवान हो रहे हैं.’’

अनवर के मुंह से यह सुन कर सुरैया सन्न रह गई. तो क्या उस की शादी अनवर से सिर्फ इसलिए हुई थी कि उस पर बां?ापन का ठप्पा लगा हुआ था. क्या इस आदमी के प्यार में भी स्वार्थ था कि उस के यतीम बच्चों को एक मां तो मिले मगर उसे खुद को मां बनने के अधिकार से वंचित रहना होगा. क्या औरत की जिंदगी का मकसद इतना ही है कि कहीं वह मां बन कर अपने आदमी को खुश रखे और कहीं बां?ा बन कर?

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