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तुम हो नागचंपा- भाग 3

उस दिन आकाश से बाजार में भेंट हो जाना कामिनी के लिए सुखद संयोग था. साथसाथ चलते बातचीत होती रही. जीवन में घट रही घटनाओं को आकाश से साझा किया तो वह चौंक उठा,”कैसे अजीबोगरीब आदमी हैं तुम्हारे पति। भूल गईं कि मैं ने तुम्हें नागचंपा इत्र भेंट करते हुए क्या कहा था? नागचंपा की पत्तियों के आकार जैसे नाग के फन क्यों नहीं दिखाए जब महीप तुम पर अत्याचार कर रहा था. फिर उस स्वामी को भी सह रही हो. क्यों? स्वामी ने छूने की जब पहली कोशिश की तो तुम नागचंपा पेड़ की लकड़ी सी क्यों नहीं बन गईं? वह गलीज तुम्हारी इच्छा, तुम्हारी इज्जत यहां तक कि तुम्हारी कोमल भावनाओं पर अपनी कुटिल कुल्हाड़ी चलाता रहा, क्यों नहीं तब नागचंपा की सख्त लकड़ी बन नीचता की उस कुल्हाड़ी की धार निस्तेज कर दी तुम ने? नागचंपा के फूलों सी तुम्हारी उजली देह की महक और पत्तियों की छाया लेता रहा वह. कितना समझाया था विवाह से पहले मैं ने. क्या लाभ हुआ उस का?” सब सुनने के बाद व्यग्र हो आकाश ने प्रश्न कर डाले.

“तो क्या करूं?” आकाश के प्रश्न के उत्तर में कामिनी ने प्रतिप्रश्न कर कुछ क्षणों की चुप्पी साध ली फिर बोली, “महीप ने जीवन नर्क बना दिया. स्वामी के आश्रम में मन पक्का कर कुछ घंटों चुपचाप अपनी देह सामने रख देती हूं, उस के बाद तो शांति है. कोई कुछ कहता नहीं, उलटे स्वामी के नजदीक होने से वहां का हर कार्यकर्त्ता मुझे सम्मान देता है.”

“तुम शायद समझ नहीं पा रही स्वामी का खेल. तुम्हारे पति के दिमाग में यह ठूंस दिया कि महीने में 1 बार ही बनाना है संबंध. नतीजतन महीप करीब ही नहीं आ पाया तुम्हारे. इस से न तो आपसी अंडरस्टैंडिंग बनी न दोनों को शरीर का सुख मिला. महीप को भी पति सुख की चाह तो होती ही होगी. अपनी उस इच्छा को दबाने से कुंठित प्रवृति का होता जा रहा है वह. गुस्सा उतरता है तुम पर. तुम्हें वह गर्भधारण न करने पर पापी समझ रहा है. इधर तुम महीप के बरताव से परेशान स्वामी के सामने समर्पण कर रही हो, उस के सामने जिस के कारण तुम पापी कहलाई जा रही हो. दान के नाम पर पैसा भी तुम्हारे घर से जा रहा है. कुछ समझी? असली गुनहगार महीप नहीं स्वामी है.”

“मैं ने तो बहुत कोशिश की महीप को स्वामी की असलियत बताने की, लेकिन वह उन के खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहता,” कामिनी बेबस दिख रही थी.

“स्वामी बहुत शातिर है. पहले अपने प्रवचनों से पत्नियों का आत्मविश्वास तोड़ता है फिर ऐक्सप्लोयट करता है. तुम पति के सामने स्वामी की पोल न खोलो इसलिए तुम्हारे गुस्से को प्रसाद का नाम दे कर एक तरफ तुम्हें अपनी ओर कर लिया, तो दूसरी ओर तुम्हारे पति के मन में हीनभावना उत्पन्न कर उस की हिम्मत तोड़ रहा है. वह मूर्ख महीप मन ही मन व्याकुल हो कर भी स्वामी की कलाई नहीं छोड़ रहा.”

“मेरी जिंदगी यों ही चलेगी क्या अब?” कामिनी निराशा के गर्त में डूब रही थी.

“महीप तुम्हारे नजदीक आ जाए तो स्वामी की पट्टी उस की आंखों से उतर जाएगी. कुछ सोचता हूं. कल मिलोगी?”

“ठीक है. मेरा मोबाइल नंबर ले लो और अपना दे दो. बता देना जहां मिलना हो. घर पर मम्मीपापा के सामने तो बात नहीं हो सकेगी.”

घर पहुंच कर कामिनी सुकून महसूस कर रही थी, उधर आकाश समाधान खोजने में जुटा था. रात 10 बजे आकाश का मैसेज आया कि कामिनी उस से 2 दिन बाद कालेज की कैंटीन में मिले, कल नहीं.

कामिनी निर्धारित दिन सहेलियों से मिलने का बहाना बना कर कैंटीन चली आई. आकाश भी नियत समय पर आ गया. कामिनी के पास ही कुरसी ले कर बैठते हुए बोला,“मैं ने तुम को 2 दिन बाद आने को इसलिए कहा था कि अपने एक मित्र की सहायता से महीप के बारे में कुछ पता लगवाऊं. वह दोस्त महीप के गांव का रहने वाला है. उस ने कई बातें बताई हैं मुझे. सब से पहले उस बात का जिक्र करूंगा जिस से मुझे यह सोचने में मदद मिली कि हमें क्या करना चाहिए.”

“बताओ न फिर जल्दी,” कामिनी अधीर हो रही थी.

“कई वर्षों पहले महीप के गांव में एक महिला के अंदर देवी आया करती थी और महीप उस को बहुत सम्मान देता था. उस की हर बात मानता था.”

“अच्छा तो क्या हुआ उस का बाद में?”

“होगा क्या, जब तक गांव में रही, देवी आने का नाटक कर खूब लूटा लोगों को. बाद में पति के साथ गांव छोड़ कर चली गई. खैर, असली मुद्दा यह नहीं है कि उस का क्या हुआ. मैं तो तुम्हें यह कहना चाह रहा था कि तुम्हें भी अपने पति के सामने देवी होने का ढोंग करना होगा.”

“लेकिन क्यों? यह कैसा समाधान है?”

“यही है समाधान. तुम्हारे पति को पाखंडी लोगों पर विश्वास है तो इस का फायदा उठाओ. वह देवी को अवश्य सम्मान देगा, तब देवी बनीं तुम अपनी बात मनवा लेना. मैं महीप के जीवन और परिवार से जुड़ी कुछ बातें बता दूंगा जो मेरे दोस्त ने मुझे बताई हैं. वे सब किस्से तुम अपनी शक्ति से पता लगने का नाटक करना. महीप का ध्यान कहीं और किसी अन्य शक्ति में लगेगा तो स्वामी के बंधन से खुद ब खुद आजाद हो जाएगा.”

“तुम कहते हो तो कोशिश कर लूंगी,” कामिनी सहमति में सिर हिला कुरसी से उठ खड़ी हो गई.

“एक बात और,” आकाश कामिनी को रोकते हुए बोला, “याद है न तुम कैसे भारी सी आवाज निकालती थीं. उसी तरह बोलना देवी बन कर.”

कामिनी की हंसी छूट गई, “हां, अच्छा याद दिलाया. एक दिन मैं खुद से बात करते हुए महीप की आवाज निकाल रही थी, लेकिन महीप को इस बारे में कुछ पता नहीं.”

“जब समय मिले फोन पर इस बारे में जानकारी देती रहना.”

चलने से पहले आकाश ने उसी अंदाज में कामिनी को ‘औल द बैस्ट’ कहा जैसे परीक्षा से पहले कहा करता था.

कासगंज लौटने के बाद कामिनी योजनानुसार देवी बनने के अवसर की तलाश में रहने लगी. एक दिन वह नहा कर निकली तो आंगन में खड़े हो कर भारी आवाज में जोरजोर से चिल्लाने लगी, “मुझे मीठा चाहिए कुछ गरमगरम. पूरी और आलू की सब्जी खाऊंगी और पान भी. मीठा पान. अभी…”

कमरे से भागता हुआ महीप आंगन में आया और कामिनी को खींचता हुआ अंदर कमरे में ले गया. कामिनी आंखें निकाल गुर्रा कर बोली, “जो कहा है करो जल्दी. जाओ, अभी चाहिए, जो मैं ने मांगा है.”

महीप को उस महिला की याद आ गई जिस पर गांव में देवी आती थी. कामिनी में किसी दैवीय शक्ति का प्रवेश महीप को डरा रहा था. ‘देवी की इच्छा पूरी न की तो श्राप दें देंगी’ सोचते हुए महीप भागाभागा बाजार गया. गाजर का हलवा, पूरियां हलवाई से पैक करने को कहा तब तक पान खरीदा फिर उलटे पांव दौड़ते हुए घर आ गया. कामिनी झूम रही थी. दोनों चीजें उस के सामने रख महीप चुपचाप खड़ा हो गया. एक पूरी और थोड़ा सा हलवा खा कर कामिनी ने बाकी उस की ओर बढ़ा दिया,”लो, खाओ तुम भी.” पान भी आधा उसे दे दिया.

महीप सब खा कर आनंदित तो हुआ लेकिन मुंह से कुछ नहीं बोला. अभी तक वह आश्रम में अधिक से अधिक दान देने के चक्कर में अपना मन मारे रहता था.

कुछ देर झूमने के बाद कामिनी बिस्तर पर जा कर लेट गई. 10 मिनट यों ही लेटे रहने के बाद धीरे से आंखें खोल कर देखा. महीप उस के पास ही बैठा था. कामिनी धीमी आवाज में बोली, “मुझे क्या हुआ था अभी कुछ याद नहीं. थकान बहुत हो रही है. पानी पीती हूं.” महीप चुपचाप उठ कर उस के लिए पानी ले आया. कुछ देर बाद बिना कुछ कहे काम पर निकल गया. कामिनी को महीप का बदला हुआ रूप अच्छा लग रहा था.

2 दिन निकल गए। तीसरे दिन कामिनी फिर नहाने के बाद कमरे में नाश्ता कर रहे महीप के सामने आ कर खूब मोटी, भारी आवाज बना कर बोली, “मुझे साड़ी चाहिए, गुलाबी रंग की. ठीक वैसी ही जैसी तुम ने मालती को दी थी 5 साल पहले. मालती तो तुम से फिर भी क्रोधित ही रही थी लेकिन मैं प्रसन्न हो जाऊंगी. अभी मैं जा रही हूं. तुम जल्दी ही सारा सामान एकत्र कर मेरी तसवीर के आगे रखने के बाद कामिनी को सजा देना. समझ गए न? उसे अपने हाथों से साड़ी पहनाना, बिंदी, सिंदूर लगाना,” बात पूरी करते ही कामिनी झूमने लगी, फिर लेट गई.

महीप हतप्रभ था. मालती कई वर्ष उस की प्रेमिका रही थी. दोस्त की बहन मालती ने उस से अनेक उपहार लिए थे फिर नाराजगी का झूठा नाटक कर किसी और से विवाह कर लिया था. महीप को डर था कि देवी द्वारा बताया मालती का किस्सा कहीं कामिनी को भी पता न लग गया हो. कामिनी अपने सामान्य रूप में आई तो मालती का नाम तक न लिया. चैन की सांस लेते हुए महीप ने देवी का बताया सामान खरीदा और कामिनी को सजाने के लिए छुट्टी का दिन चुना.

“आप मुझे सजाएंगे? कोई खास बात है क्या?” कामिनी ने अनजान बनते हुए पूछा.

“बस यों ही. तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती शायद. सजतीधजती नहीं हो आजकल,” महीप ने बात बना दी.

कामिनी के गोरे मखमली बदन पर साड़ी लपेटते हुए महीप को एक सुखद अनुभव हो रहा था. मेकअप किया तो लगा ऐसे स्पर्श की अनुभूति तो पहले हुई ही नहीं थी. उस का रोमरोम कामिनी के जिस्म को पाने की लालसा करने लगा.

आकाश ने महीप के विषय में जो जानकारी जुटाई थी उस में महीप के एक मित्र अजीत का विशेष उल्लेख था. महीप स्वामीजी का चेला बनने से पहले देवी वाली महिला का भक्त होने के साथसाथ बचपन के दोस्त अजीत के बहुत करीब था. अपनी समस्याएं, उलझनें, विचार वह अजीत के साथ साझा किया करता था. इस बार देवी बनी कामिनी ने अजीत का नाम लिया और महीप के समक्ष यादें ताजा करवा दीं. उस दिन जब कामिनी सामान्य हुई तो महीप ने उसे अपने मित्र अजीत के विषय में बहुत कुछ बताया,”मेरा बहुत मन करता है अजीत से मिलने का,” कहते हुए महीप की आंखें नम हो गईं.

कामिनी ने आकाश को उस दिन मैसेज किया कि शायद समय आ रहा है, धीरेधीरे महीप स्वामी के पंजे से मुक्त हो सकता है.

2 दिन बाद नहा कर जब कामिनी बाहर निकली तो जोरजोर से हंसने लगी. महीप हाथ जोड़ सिर झुकाए सामने खड़ा रहा. देवी ने भारीभरकम आवाज में कहा, “इस के बाद अब मैं कब आऊंगी पता नहीं. जातेजाते इतना कहना चाहती हूं कि सुगंधित साबुन…” कामिनी ने अपनी बात पूरी नहीं की थी कि महीप को लगातार हाथ जोड़े अपनी ओर ताकते उसे हंसी आने लगी. किसी तरह अपनी हंसी दबा कर बात वहीं छोड़ वह चुपचाप बिस्तर पर जा कर लेट गई.

महीप ने अनुमान लगाया कि देवी चाहती हैं कि वह अच्छा सा खुशबूदार साबुन खरीद उस का प्रयोग कामिनी पर करे. उस दिन शाम को चंदन की खुशबू वाला साबुन ले कर वह घर आया. कामिनी को दिखाते हुए बोला, “जब तुम्हें मैं अपने हाथों से सजाता हूं तो अच्छा लगता है न? देखो यह नहाने का महकदार साबुन ले कर आया हूं. तो कल सुबह… समझ गईं न?”

कामिनी लाज से लाल हो गई. उस की झुकी पलकें और मुसकान लिए गुलाबी होंठ देख महीप का दिल फूल सा खिल उठा. रातभर वह यह सोच कर ही रोमांचित हुआ जा रहा था कि क्या सचमुच ऐसा हो सकेगा?

अगले दिन कामिनी उठी तो सिर चकरा रहा था. बोली, “अपच जैसा हो रहा है. महीना भी नहीं आया.”

“डाक्टर के पास चलते हैं.” महीप आज पहली बार कामिनी की चिंता करता दिख रहा था.

क्लिनिक पर गए तो खुशखबरी मिली, कामिनी के मां बनने के संकेत थे.

घर पहुंचकर कामिनी लेट गई. महीप उस के समीप बैठ कर भविष्य के सपने देख रहा था कि दरवाजे की घंटी बज गई. बेमन से महीप ने दरवाजा खोला तो आश्चर्यचकित रह गया. स्वामीजी आए थे. अंदर घुसते ही बोले, “बहुत दिनों से तुम लोग नहीं आए तो मैं ने सोचा आज मैं ही कामिनी से मिलने चलता हूं.”

महीप को स्वामीजी का केवल कामिनी से मिलने की इच्छा जताना बिलकुल अच्छा नहीं लगा, फिर भी उन को आदर से बैठाते हुए बोला, “कामिनी की तबीयत ठीक नहीं है. आप बैठिए उसे बुलाता हूं.”

अधीर स्वामीजी उठ कर बैडरूम तक पहुंच गए. उसे बेटी कहते हुए बाहुपाश में कस गालों को चूम लिया. महीप के लिए स्वामीजी का यह रूप बिलकुल नया था. दोनों को आश्रम में जल्द हाजिर होने की आज्ञा दे कर वे चले गए.

स्वामीजी के प्रति महीप का क्रोध देख कामिनी बोली, “मैं ने आप को कितनी बार समझाने की कोशिश की इन के बारे में, लेकिन आप ने कभी सुनना ही नहीं चाहा. अनुष्ठान के बहाने न जाने कितनी लड़कियों का शोषण किया होगा इस स्वामी ने.”

“अब क्या होगा? यह तो तुम्हारा पीछा ही नहीं छोड़ेगा,” घबराया सा महीप बोला.

“आप को डरने की जरूरत नहीं है. हम पुलिस के पास चलेंगे. इस के द्वारा शोषित कुछ लड़कियों के मोबाइल नंबर हैं मेरे पास, उन से भी बात करती हूं.”

महीप अब तक आश्रम में दिए दान का मोटामोटा हिसाब लगा पश्चाताप की अग्नि में जल रहा था. कामिनी ने आकाश को मैसेज कर पूरी बात बताते हुए यह भी लिखा, “जब मुझे विश्वास हो जाएगा कि महीप पूरी तरह बदल गए हैं तब अपने देवी बनने का सच बता दूंगी.”

आकाश ने जवाब दिया, “अपने पति को फूलों की सुगंध और पत्तियों की छांव देते हुए सुधारने का काम काबिल ए तारीफ है. इस के अलावा तुम मजबूत लकड़ी बन कर स्वामी जैसे लोगों के होश ठिकाने लगवाने का काम भी कर रही हो. तो कामिनी आज फख्र से कहता हूं कि तुम हो नागचंपा.”

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ से क्या भयभीत है भाजपा ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में जो कहा उस से सिद्ध हो गया कि वे कांग्रेस और राहुल गांधी से कितना भयभीत हैं. सांसद में अपने भाषण के दौरान सब से ज्यादा 85 बार देश, 43 बार कांग्रेस, 31 बार भारत, 19 बार विपक्ष, 14 बार महंगाई, 9 बार परिवारवाद, 8 बार किसान-युवा, 7 बार भ्रष्टाचार, 7 बार नेहरू, 5 बार बेटियों और 2 बार इंदिरा गांधी का नाम नरेंद्र मोदी ने लिया.

नरेंद्र मोदी ने कहा, “एक ही प्रोडक्ट को कई बार लौंच करने के चक्कर में कांग्रेस की दुकान पर ताला लगने की नौबत आ गई है. देश के साथसाथ कांग्रेस भी परिवारवाद का खमियाजा भुगत रही है. यह विपक्ष कई दशक तक सत्ता में बैठा था, वैसे ही इस विपक्ष ने कई दशक तक विपक्ष में बैठने का संकल्प लिया है. जनता के आशीर्वाद से ये अगले चुनाव में दर्शक दीर्घा में दिखेंगे.”

मोदी ने 2024 लोकसभा चुनाव के रिजल्ट पर कहा, “देश का माहौल बता रहा है कि अब की बार 400 पार. अकेले भाजपा 370 सीटें जीतेगी.”

यह बड़बोलापन, दरअसल, नरेंद्र मोदी की पहचान बन चुकी है. राहुल गांधी एक बार फिर जब भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकल पड़े हैं तो सत्ता में बैठे हुए भाजपा के चेहरे नरेंद्र मोदी और उन की सरकार के बारे में अगर यह कहा जाए कि वे थरथर कांप रहे हैं और उन का सिंहासन डोल रहा है तो गलत नहीं होगा.

अगर हम लंबे समय के घटनाक्रम को, तथ्यों को छोड़ भी दें तो असम में 22 जनवरी, 2024 को, जब प्रधानमंत्री अयोध्या में रामराम कर रहे थे, जिस तरह राहुल गांधी को शंकर देव के मंदिर में जाने से रोका गया वह हास्यास्पद ही कहा जा सकता है. राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान बाधाएं खड़ी की जा रही हैं. उस से यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी के व्यक्तित्व और काम से भारतीय जनता पार्टी भयभीत है.

यह सीधासीधा मनोविज्ञान है कि अगर आप किसी से भयभीत नहीं हैं तो उसे बेवजह रोकेंगेटोकेंगे नहीं. आज आम आदमी भी नरेंद्र मोदी से यह कहना चाहता है कि आप अपना काम करिए और राहुल गांधी और विपक्ष को अपना काम करने दीजिए. देश की जनता स्वयं तय कर लेगी कि कौन और क्या देश के हित में है.

नरेंद्र मोदी की घबराहट यह बताती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वे मोदी और उन की पार्टी कौन्फिडैंट नहीं हैं. आत्मविश्वास की कमी के कारण ही जब ‘इंडिया’ गठबंधन बना तो ‘इंडिया’ नाम पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया गया.

शंकर देव मंदिर जाने से रोका

22 जनवरी को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में थे तब राहुल गांधी असम में शंकर देव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना चाहते थे. मगर असम की हेमंत बिस्वा की भाजपाई सरकार ने राहुल को रोकने की हिमाकत कर डाली.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा को असम में अलोकतांत्रिक ढंग से रोक दिया गया. राहुल गांधी यहां प्रसिद्ध शंकर देव मंदिर जाना चाहते थे और राज्य सरकार ने सुरक्षा कारण गिनाते हुए उन्हें मंदिर दर्शन की अनुमति नहीं दी.

इस के बाद राहुल गांधी का काफिला वहीं बीच सड़क पर रुक गया और विरोधस्वरूप राहुल गांधी सड़क पर ही करीब ढाई घंटे बैठे रहे. बाद में राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा कि- ‘भारत की सांस्कृतिक विविधता को शंकर देवजी ने भक्ति के माध्यम से एकता के सूत्र में पिरोया, लेकिन आज मुझे उन्हीं के स्थान पर माथा टेकने से रोका गया. मैं ने मंदिर के बाहर से ही भगवान को प्रणाम कर उन का आशीर्वाद लिया. अमर्यादित सत्ता के विरुद्ध मर्यादा का यह संघर्ष हम आगे बढ़ाएंगे.’

असम में राहुल गांधी को कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ हैबरगांव में रोक दिया गया और आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी गई. देररात यह यात्रा असम के दायरे से बाहर आ गई और यात्रा ने मेघालय की सीमा में प्रवेश किया, जहां स्थानीय लोगों व कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का तिरंगा लहरा कर अभूतपूर्व स्वागत किया. यात्रा को आगे बढ़ाने से पहले राहुल गांधी ने असम में नुक्कड़ सभा की. असम के नगांव में राहुल गांधी ने राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाया. राहुल गांधी ने कहा, “क्या यह प्रधानमंत्री मोदी तय करेंगे कि मंदिर में कौन जाए.”

राहुल ने राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या यह प्रधानमंत्री मोदी तय करेंगे कि मंदिर में कौन जाएगा? कानून व्यवस्था संकट के दौरान सभी लोग वैष्णव संत श्रीमंत शंकर देव के जन्मस्थान पर जा सकते हैं, लेकिन केवल मैं नहीं जा सकता.”

भाजपा के चेहरों को यह लगता है कि राहुल गांधी की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है. इंडिया गठबंधन मजबूत होता जा रहा है. गत वर्ष राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली थी, शायद यही कारण है कि राहुल गांधी की यात्रा को रोकने की कोशिश जारी है.

स्क्रीन पर देखने से आंखें दर्द करती हैं, मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 24 वर्षीया युवती हूं. मेरा सारा दिन कंप्पूटर पर काम करते बीतता है. कुछ दिनों से मेरी आंखों में दर्द होने लगा है. कृपया उचित समाधान बताएं ?

जवाब

घंटों कंप्यूटर के आगे काम करने वाले लोगों में ड्राई आई की समस्या आम है. दरअसल, यह समस्या कंप्यूटर स्क्रीन पर आंखें एकटक लगातार गड़ाए रखने से उपजती है. इस के फलस्वरूप पलक   झपकने की कुदरती गति धीमी पड़ जाती है और आंखों की बाहरी सतह को प्राकृतिक रूप से नम रखने वाले आंसुओं की सूक्ष्म धारा टूट जाती है. नतीजतन आंखें शुष्क पड़ जाती हैं.

ड्राई आई की समस्या से उबरने के लिए जरूरी है कि आप पलकें समयसमय पर   झपकाती रहें. काम करते हुए बीचबीच में कुछ देर के लिए कंप्यूटर छोड़ कर कोई दूसरा काम कर लें.

आंखों को नम बनाए रखने के लिए दिन में 3-4 बार आंखों में टियरप्लस या रिफ्रैश जैल आई ड्रौप्स भी इस्तेमाल में ला सकती हैं. समस्या फिर भी जस की तस रहे तो बेहतर होगा कि किसी आई स्पैशलिस्ट से परामर्श कर लें.

इंडिया के लिए ‘इंडिया’

अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनावों में कोई चमत्कार होने वाला है, इस की उम्मीद विपक्षी दलों को नहीं है. वे अपनी पहचान व महत्ता बनाए रखने के लिए सीट शेयरिंग की जो बात कर रहे हैं वह यह जताती है कि देश की राजनीति 2 हिस्सों में बंट चुकी है. एक ओर वे ताकतें हैं जो पौराणिक व्यवस्था को वोट के जरिए फिर से स्थापित कर देश के संस्थानों को, पुराणों के युग की तरह, कुछ हाथों में रखना चाहती हैं जबकि दूसरी ओर वे लोग हैं जो 1947 में आजादी मिलने के बाद लागू की गई गैरधार्मिक संवैधानिक प्रणाली को यथावत रखना चाहते हैं.

आज केंद्रीय सत्ता पर ऐसी पार्टी काबिज है जो धर्म विशेष की कट्टरता को लगातार बढ़ावा दे रही है, जिस के चलते देश में हर तरफ धार्मिक ताकतों का बोलबाला है. हालांकि यह ज्यादा दिन नहीं चल सकता क्योंकि हिंदू धर्म जन्म से ही भेद करता है कि कौन क्या पा सकता है. कुछ अपवाद हैं पर हिंदू धर्म का सामाजिक गठन इस तरह का है कि राजनीति, प्रशासन, व्यापार, व्यवहार आदि में जन्म से तय हुई कुछ जातियों का बोलबाला है.

भारतीय जनता पार्टी की राममंदिर मुहिम से पहले यह काम कांग्रेस चुपचाप बिना ढोल पीटे कर रही थी. आज यह काम भाजपा नगाड़े पीट कर कर रही है. यह शोर इतना है कि जो जन्म से तय वर्णव्यवस्था के शिकार हैं और देश की जनसंख्या के 90 फीसदी के आसपास होंगे, वे सोचते हैं कि जो शोर मचा रहे हैं वही ही ठीक होंगे. सो, काफी संख्या में वे भी शोर मचाने वालों में शामिल हो गए हैं.

भारतीय जनता पार्टी की इस कट्टर सोच पर ब्रेक लगाने के लिए कांग्रेस ने जो ‘इंडिया’ गठबंधन बनाने की कोशिश की है, वह कुछ सफल प्रतीत हो रही है. यह लोकतंत्र और अच्छी सामाजिक व्यवस्था दोनों के लिए जरूरी है. जरूरी नहीं कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उसे जीत ही मिले, उस की प्रभावशाली उपस्थिति ही देश की संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए काफी है. पौराणिक सोच के उलट, देश का संविधान हर व्यक्ति को बराबर मानता है और इस संविधान के अंतर्गत बने सैकड़ों कानूनों में औरतों को भी बराबर के हक मिले हुए हैं.

हमारे पुराण, रीतिरिवाज, त्योहार, पारिवारिक व्यवस्था भेदभावों से भरे हैं जिन में न केवल ऊंची जातियों में ऊंचनीच है बल्कि पिछड़ी और अछूत जातियों को बराबर का हिस्सा भी नहीं मिल सकता. ऊंची सवर्ण जातियों की औरतें भी 1947 से पहले अपने घरों में गुलाम सी थीं. वह सोच आज वापस आए, यह किसी सभ्य व्यक्ति को मंजूर नहीं होना चाहिए. लेकिन अफसोस है कि धर्मप्रचार इतना ज्यादा किया जा रहा है कि हर वर्ग के लोग और उन की औरतें भी अपने को ‘जंजीरें पहनाने वाली व्यवस्था’ का जश्न मनाने को तैयार बैठे हैं.

बहरहाल, ‘इंडिया’ गठबंधन की उपस्थिति पौराणिक व्यवस्था के बुलडोजर को रोकने या उसे धीमा करने के लिए काफी है. यह बुलडोजरी संस्कृति हमेशा अहल्याओं, सीताओं, द्रौपदियों, शकुंतलाओं को पैदा करती रही है.

आज जरूरत है कि न केवल हर नागरिक को निर्माण और शासन में हिस्सा मिले, बल्कि हर औरत को बराबर का सम्मान भी मिले. यह संभव तभी है जब देश की शासन व्यवस्था में भारतीय जनता पार्टी के सामने एक मजबूत विपक्ष खड़ा हो जो छोटीछोटी जातियों में बिखर कर देश को एक ऊंची जाति/पार्टी का गुलाम न बनने दे.

मजाक करते समय रखें इन बातों का ध्यान, तो माहौल होगा और भी खुशनुमा

रोज की तरह आज भी मीरा को सुबहसुबह औफिस जाने की जल्दी थी. सो, मीरा ने अपने पति राज को आवाज लगाते हुए गाड़ी की चाबी लाने को कहा. जैसे ही मीरा गाड़ी के पास पहुंची और चाबी मांगी तो राज ने कहा, ‘ओह, मैं तो लाना ही भूल गया.’ तब फिर क्या, मीरा गुस्सा होने लगी, ‘तुम से तो कुछ कहना ही बेकार है वैगरहवैगरह और बड़बड़ाती हुई चाबी लेने जाने लगी. तो राज बोला, ‘अरे यार, मैं तो मजाक कर रहा था, यह रही चाबी.’  मीरा बोली, ‘यह भी कोई वक्त है मजाक करने का?’

राज ने कहा, ‘अच्छा, तो अब तुम ही बताओ कि मुझे किस समय, किस दिन और कितने बजे मजाक करना चाहिए?’

राज के इन प्रश्नों का मीरा के पास कोई उत्तर न था क्योंकि ऐसा कहा और माना जाता है कि सुबह की 5-10 मिनट की हंसी या मजाक आप का पूरा दिन अच्छा व खुशनुमा बना देती या सकती है पर यहां सवाल है कि क्या हम वाकई ऐसा कर पाते हैं? या कोई हमें हंसाने की कोशिश कर रहा तो भी क्या हम सहन या स्वीकार कर पाते हैं? शायद इसलिए क्योंकि आप का हंसी या मजाक तभी अच्छा है जब वह सामने वाले को स्वीकार्य हो. राज ने कुछ ऐसा ही सोच कर मीरा के साथ मजाक किया था लेकिन यहां माहौल खुशनुमा होने के बजाय तनावभरा हो गया.

सो, आखिर हंसीमजाक करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि माहौल बना रहे खुशनुमा या खुशियोंभरा :

जब आप की हंसी से कोई चिढ़ रहा हो : आप की हंसी से कोई चिढ़ रहा है, आप की हंसी उस को अच्छी न लग रही हो तो उस समय अपनी हंसी को रोक देना ही बेहतर होगा क्योंकि तब माहौल खुशनुमा होने के बजाय तनावभरा हो जाएगा.

जब कोई दुखी या परेशान हो : इंसान किसी परेशानी में है तो उस समय किसी का हंसना उलटा भी पड़ सकता है. हो सकता है माहौल अच्छा होने के बजाय तनावभरा हो जाए. इसलिए जिन से भी आप हंसीमजाक कर रहे हो उन का मूड जानना आवश्यक है. यहां इस बात को सम  झना चाहिए कि किसी दूसरे पर हंसना तभी अच्छा लगता है जब तक उसे बुरा नहीं लग रहा.

मूड को पहचानें : आजकल तकरीबन सभी कपल्स जौब करते है लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आप घर पर हैं और आप का पार्टनर औफिस गया है तो ऐसे में घर आने पर उस का मूड जान कर ही हंसीमजाक करें. हो सकता है कि पार्टनर कुछ परेशान या तनाव में हो. ऐसे में आप के मजाक करने से बात बिगड़ सकती है, इसलिए यहां मूड को जानना जरूरी है.

आखिर कब करें मजाक ?

खाने की टेबल पर बनाएं खुशनुमा माहौल : आजकल की भागमभाग वाली दिनचर्या में कभीकभी ही ऐसा मौका आता है कि घर के सभी लोग साथ बैठ कर खाना खाएं. इसलिए इस समय आप डिजिटल दुनिया से दूर रहें और एकदूसरे से हंसीमजाक करें व घर में बनाएं एक खुशनुमा माहौल ताकि कुछ समय तनाव से दूर रह सकें.

पिकनिक और पर्यटन स्थान पर : जब आप अपने दोस्तों, बच्चों या परिवार संग कहीं पिकनिक पर या घूमनेफिरने जाएं तो एकदूसरे संग खूब हंसीमजाक करें. इस के लिए चुटकुले, कुछ पुरानी बातें, किस्सेकहानियां सुनें और सुनाएं, गेम्स आदि खेलें और डिजिटल दुनिया से दूरी बनाए रखें क्योंकि अकसर हम सैल्फी लेने और उस को पोस्ट करने में लग जाते हैं.

शादी समारोह या कोई और खुशी के अवसर पर : शादी समारोह या किसी और खुशी के अवसर पर मजा तो तभी आता है जब कुछ हंसीमजाक, एकदूसरे की खींचातानी आदि हो, वरना शादी का कुछ खुशगवार माहौल ही नहीं बनता. इसलिए ऐसे मौकों पर एक खुशनुमा माहौल जरूर बनाएं. इस के लिए हंसी और ठहाके लगाना न भूलें.

रखें ध्यान

  • हंसीमजाक एक सीमा के अंदर ही सही है. हद पार न हो.
  • हर वक्त बहुत ज्यादा हंसीमजाक नहीं करना चाहिए. ऐसा करने से कोई आप को गंभीरता से नहीं लेगा.
  • दूसरे की मजबूरी का भी मजाक बनाने से बचें.

 

अंधविश्वास और स्वार्थ का गठजोड़ देश के लिए नुकसानदेह

मनुष्य के भीतर का डर उसे अंधविश्वासों की ओर अग्रसर करता है. अंधविश्वास मानवीय कमजोरियों व अज्ञानता के कारण पनपते और फलतेफूलते हैं. हम सभी भावनाओं से संचालित होते हैं और अपने प्रियजनों से प्रेम करते हैं व जब उन के किसी अनिष्ट की आशंका होती है तो वह डर हमें आस्थाओं और अंधविश्वासों की ओर ले जाता है. उदाहरण के लिए, हम कहीं जाने के लिए निकले और बिल्ली हमारे रास्ते से निकल गई और हमारे साथ कोई दुघर्टना घटित हो गई तो हमारा कमजोर मन यही कहेगा कि बिल्ली रास्ता काट गई थी, इसीलिए यह अनिष्ट हुआ.

मानव मन की इस कमजोरी का फायदा चालाक, स्वार्थी और लालची लोगों ने उठाया और उसे अंधविश्वासों के जाल में फंसा दिया. अंधविश्वास और अनिष्ट की शंका के समाधान के लिए लोग इन बाबाओं, शंकाओं का समाधान करने वालों के पास जाएंगे और ये लोग अपनी स्वार्थपूर्ति करेंगे.

हमारे समाज में तर्क और विज्ञान से ज्यादा महत्त्व लोग आस्था और विश्वास को देते हैं जो कि अशिक्षा और गरीबी से उत्पन्न मानसिक दुर्बलता का होता है. अंधविश्वासों की पराकाष्ठा तब होती है जब लोग तर्क, विवेक, बुद्धि को ताक पर रख कर अंधविश्वासों के मायाजाल में फंस कर दूसरों की जिंदगियों से भी खेल जाते हैं. तांत्रिकों के कहने पर धनदौलत, खजाना मिलने या निसंतान होने पर बच्चे के लिए किसी निर्दोष की बलि तक चढ़ा देते हैं ऐसे लोग.

बागेश्वर धाम के एक बाबा की निरर्थक बातों को सोशल मीडिया जिस तरह प्रसारितप्रचारित कर रहा है उस से अच्छी तरह से समझ जा सकता है कि देश को अंधविश्वासों के किस अंधेरे गर्त में धकेला जा रहा है. बलात्कारी बाबा राम रहीम की प्रशंसा में अभी भी अखबार रंगे रहते हैं. जेल में भी उस पर अधिकारियों की कृपादृष्टि रहती है और उसे वर्ष में कई बार पैरोल पर रिहा कर दिया जाता है. अंधविश्वास का राजनीति और स्वार्थ से बड़ा गठजोड़ है और उसी कारण अंधविश्वासों की दुकान खूब फलफूल रही है क्योंकि जनता को मूर्ख बना कर, तरहतरह के मायाजालों में उलझ कर, जनता के विवेक को कुंद कर के ही सत्ता पर कब्जा बनाए रखा जा सकता है और जिंदगी में ऐशोआराम के मजे लूटे जा सकते हैं. इस में बाबा और नेता दोनों शामिल हैं. ये बाबा बड़ी चालाकी से आम जनता के विवेक को शून्य कर देते हैं.

आगरा में कोठी मीना बाजार में महाराज रामभद्राचार्य के श्रीराम कथावाचन में स्वामीजी ने नारा दिया- ‘मरें मुलायम-कांशीराम, जोर से बोलो जय श्रीराम.’ भीड़ भी साथसाथ नारे लगा रही थी. मजे की बात यह है कि इस भीड़ में बहुत से मुलायम सिंह और कांशीराम के समर्थक भी रहे होंगे लेकिन धर्म एवं अंधविश्वास का नशा किस तरह बुद्धि व विवेक को कुंद कर देता है, यह यहां देखा जा सकता है.

धार्मिक कट्टरता और कटुता

इसी तरह 10 अप्रैल, 2023 के अपने कथावाचन में स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि ‘‘चरित्र केवल हिंदू नारी के पास है, विदेशी महिलाओं के पास न चित्त है और न चरित्र.’’ कथा में असंख्य महिलाएं निहाल होहो कर महाराजजी के चरणों में लोट रही थीं और भावविभोर हो कर अश्रु बहा रही थीं.

यह भी सत्य है कि मंत्र, जप, तप इत्यादि का गुणगान वे ही लोग करते हैं जो धर्म के प्रति हद दर्जे के रिजिड हैं. अन्यथा जो नहीं मानते इन बातों को, उन्हें तो कुछ नहीं होता यदि वे व्रत, पूजा, उपवास, हवन, यज्ञ इत्यादि न भी करें तो.

आजकल धार्मिक कट्टरता एवं कटुता व असहिष्णुता का माहौल इस कदर बढ़ गया है कि यदि ऐसे लोगों के बीच बैठ जाओ तो भले ही उन की बात से सहमत न हो फिर भी उन का विरोध करना उचित नहीं लगता. भले ही चुप रह जाओ और वही करो जो सही समझते हो. अंधश्रद्धा और धार्मिक कट्टरता किसी भी तर्क, बहस को खुलेदिल से समझने और स्वीकारने को राजी नहीं है.

आज गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार आदि तरहतरह की मुसीबतों से त्रस्त आम आदमी की भीड़ पलायनवादी रास्ता अपना कर शांति व सुकून की तलाश में बाबाओं की शरण में जाती है जो बड़ी धूर्तता से इन का इस्तेमाल अपने ऐशोआराम व प्रसिद्धि के लिए करते हैं. एक बाबा जिस के लगभग 10,000 भक्त हैं, कहता है कि मेरे शिष्य मुझे कुछ न दें, बस, प्रतिदिन 1 रुपया मैं उन से स्वीकारूंगा. अब प्रतिदिन 1 रुपया अपने 10 लाख भक्तों से लिए तो 10 लाख रुपए हो गए बाबा के. इन बाबाओं की राजनेताओं से कैसी सांठगांठ होती है, यह जगजाहिर है. जैसेजैसे चुनाव नजदीक आते हैं, बाबा अपना काम करने लगते हैं और जनता के विवेक को शून्य कर उसे अंधविश्वासों व आस्थाओं के जाल में फंसा कर उस का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करने लगते हैं.

ध्यान भटकाते धार्मिक मुद्दे

यही माइंड गेम है जो हिटलर-मुसोलिनी, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग और न जाने कितने विश्व के सत्ता के प्रेमी राजनेता खेलते रहे हैं और खेल रहे हैं. विश्वास को ही जब कट्टरता का आवरण पहना कर अपरिवर्तनीय, असहिष्णु बना दिया जाता है तो वह अंधविश्वास का रूप ले लेता है.

न्यायालय द्वारा आसाराम बापू को बलात्कार के केस में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है लेकिन हैरत की बात तो यह है कि अभी भी आप को समाज में आसाराम के शिष्य और भक्त मिल जाएंगे जो कि समाज के विवेक, बुद्धिहीन लोगों की अंधभक्ति को दर्शाता है.

हमारा समाज बुरी तरह से अंधविश्वासों के जाल में जकड़ा हुआ है. जीवन के कदमकदम पर हमारी गतिविधियों पर अंधविश्वासों ने डेरा जमाया हुआ है. छत पर कौवा बोले तो कोई मेहमान आने वाला है. घर का कोई सदस्य या मेहमान जाए तो तुरंत झड़ू नहीं लगाते. आंख फड़के तो कुछ होने वाला है. शरीर पर अगर छिपकली गिर जाए तो धन मिलेगा. सांप को मारा तो अगले जन्म में बदला लेगा. बाहर जाते समय कोई छींक दे तो थोड़ी देर रुक कर जाना होता है वरना अनिष्ट होने की आशंका होती है. किसी शुभ काम को करने जाने से पहले दहीचीनी खिला कर भेजा जाता है. गर्भावस्था में नारियल खाने से बच्चा गोरा पैदा होगा. घर से निकलते समय रास्ते में सफाई वाला दिखे तो अच्छा होगा. अर्थी दिखने का भी अर्थ होता है. सोना खोना अशुभ होता है. सोना पाना शुभ होता है. पीपल के पेड़ को काटते नहीं हैं क्योंकि उस पर आत्माओं का वास होता है आदिआदि. कुल मिला कर भारत अंधविश्वासों का गढ़ है. ऐसा नहीं है कि अंधविश्वास केवल भारत में ही प्रचलित हैं, संसार के हर देश के समाज में कुछ न कुछ अंधविश्वास प्रचलित हैं क्योंकि ये मानवीय कमजोरियों के परिणाम हैं. हां, भारतीय समाज में अंधविश्वासों की अति ही है जो कि हमारे तर्कहीन दृष्टिकोण और परिश्रम से ज्यादा भाग्य पर यकीन होने की पुष्टि करते हैं.

रहीसही कसर टीवी धारावाहिकों, सोशल मीडिया और धर्मभीरु जनता से वोट के भूखे नेताओं ने पूरी कर दी है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि जैसी किसी भी समस्या का समाधान नहीं चाहते और उस का सरल सा, सब से आसान उपाय है जनता को धर्म व अंधविश्वासों के जंजाल में उलझए रखो. हर टीवी धारावाहिक में पूरा परिवार ज्यादातर समय पूजापाठ में ही लगा रहता है और यहां शगुनअपशगुन होते ही रहते हैं. पूजा के बीच में दीपक बुझ जाए तो अपशगुन. मूर्ति गिर जाए तो अपशगुन.

नायिका के हाथ में मंदिर से अचानक फूल आ कर गिर जाता है तो शगुन. सिंदूर अचानक फैल कर सीधे नायिका की मांग पर आ कर गिरता है और नायक से उस का रिश्ता ईश्वर द्वारा जोड़ दिया जाता है. उस के भीतर आत्मा भी आ जाती है जो उस से अपने काम कराती है. बस, यही सब दिखाया जाता है हमारे धारावाहिकों में जिन का विवेक, बुद्धि, तर्क, विज्ञान, शिक्षा से दूरदूर का संबंध नहीं होता है. गूगल पर आप सर्च करो तो उस पर औरत को वश में करने के उपाय, चाणक्य नीति के अनुसार चरित्रहीन या चरित्रवान औरत के लक्षण या फिर राशि के अनुसार आप के व्यक्तित्व की पहचान जैसे लेख आते रहते हैं जो यूजर या पाठक पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं और उसे अंधविश्वासों के इस दलदल में धकेलते हैं. गूगल प्लेस्टोर पर एस्ट्रो टौक जैसी ऐप्स उपलब्ध हैं जहां 24 घंटे ज्योतिष आप को सलाह देने को उपलब्ध हैं.

कुतार्किक बनता देश

हर वह व्यक्ति जो किसी भी बात को बिना तर्क की कसौटी पर कसे विवेकहीन हो कर मानता है या अंधानुकरण करता है वह शिक्षित या अशिक्षित कोई भी हो सकता है. ऐसे लोगों को आसानी से बरगलाया जा सकता है. ये लोग देश व समाज की प्रगति नहीं होने देते. अनपढ़ या अशिक्षित ही नहीं, पढ़ेलिखे, शिक्षित भी तर्कहीन विश्वासों के मायाजाल में उलझे हुए हैं.

एक पोंगापंथी, रूढि़वादी, अंधविश्वासों के जाल में उलझ हुई जनशक्ति वाला समाज देश की प्रगति में अपना कोई योगदान नहीं देता है. तर्क और विज्ञान से वास्ता न रख कर वह बस, अंधानुकरण को अपनाता है. भारतीय समाज को इस भ्रमजाल से निकालने की आवश्यकता

है किंतु निराशा की बात यह है कि सत्ताप्राप्ति के लिए हमारे नेतृत्वकर्ता भी जनता की भावनाओं को इन्हीं तरीकों से भुनाते हैं और अन्य वर्ग, जिन में अधिकारी, कर्मचारी भी शामिल हैं, सरकारों के नक्शेकदम पर चल कर उन्हीं की नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हैं. देखना यह है कि यह सब कब तक चलता रहेगा और देश कब इस मानसिक गुलामी से उबरता है?

फिर वही शून्य : समर को सामने पा कर सौम्या का क्या हुआ ?

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सिंगल वुमन जरूर करवाएं ये 7 मेडिकल टेस्ट, कम होगा बीमारियों का खतरा

जो महिलाएं शादी नहीं करतीं या तलाक अथवा पति की मृत्यु के कारण अकेली रह जाती हैं उन में उम्र बढ़ने पर अकेलेपन की भावना घर करने लगती है, क्योंकि जब तक वे 40 की होती हैं, उन के भाईबहनों, कजिंस और दोस्तों की शादियां हो जाती हैं और वे अपनेअपने परिवार में व्यस्त हो जाते हैं, जिस से वे एकदम अकेली पड़ जाती हैं. इस से उन में तनाव का स्तर बढ़ने लगता है, जो उन्हें कई बीमारियों का शिकार बना देता है. उन में वजन कम या अधिक होने, उच्च रक्त दाब, हृदय रोग, तंत्रिकातंत्र से संबंधित समस्याएं यहां तक कि कई प्रकार के कैंसर होने की आशंका तक बढ़ जाती है.

एकल जीवन बिता रही महिलाओं को अपनी सेहत का और अधिक खयाल रखना चाहिए. वे यह न सोचें कि हैल्थ चैकअप समय और पैसों की बरबादी है. चूंकि कई गंभीर बीमारियों के लक्षण प्रथम चरण में नजर नहीं आते, इसलिए मैडिकल टैस्ट जरूरी है ताकि बीमारी का पता चलने पर उस का समय रहते उपचार करा लिया जाए.

प्रमुख मैडिकल चैकअप

ओवेरियन सिस्ट टैस्ट: अगर आप को पेट के निचले हिस्से में दर्द हो या अनियमित मासिक धर्म हो अथवा मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग हो तो ओवेरियन सिस्ट का टैस्ट कराएं. अगर सामान्य पैल्विक परीक्षण के दौरान सिस्ट का पता चलता है, तो ऐब्डोमिनल अल्ट्रासाउंड किया जाता है. छोटे आकार के सिस्ट तो अपनेआप ठीक हो जाते हैं पर यदि ओवेरियन ग्रोथ या सिस्ट का आकार 1 इंच से बड़ा हो तो आप को ओवेरियन कैंसर होने की आशंका है. इस स्थिति में डाक्टर कुछ और टैस्ट कराने की सलाह देते हैं.

मैमोग्राम: यह महिलाओं के लिए सब से महत्त्वपूर्ण टैस्ट है. जब कैंसर हो जाने पर भी कोई बाहरी लक्षण दिखाई न दे तब यह टैस्ट कैंसर होने का पता लगा लेता है. क्लीनिकल ब्रैस्ट ऐग्जामिनेशन (सीबीई) किसी डाक्टर द्वारा किया जाने वाला ब्रैस्ट का फिजिकल ऐग्जामिनेशन है. इस में स्तनों के आकार में बदलाव जैसे गठान, निपल का मोटा हो जाना, दर्द, निपल से डिस्चार्ज बाहर आना और स्तनों की बनावट में किसी प्रकार के बदलाव की जांच की जाती है.

कितने अंतराल के बाद: सीबीई साल में 1 बार और मैमोग्राम 2 साल में 1 बार.

कोलैस्ट्रौल स्क्रीनिंग टैस्ट: कोलैस्ट्रौल एक तरह का फैटी ऐसिड होता है. यह जांच यह बताने के लिए जरूरी है कि आप के दिल की बीमारियों की चपेट में आने की कितनी संभावना है. कोलैस्ट्रौल 2 प्रकार के होते हैं-एचडीएल या हाई डैंसिटी लिपोप्रोटीन्स और एलडीएल या लो डैंसिटी लिपोप्रोटीन्स. इस टैस्ट में रक्त में दोनों के स्तर की जांच होती है.

कितने अंतराल के बाद: 3 वर्ष में 1 बार. लेकिन अगर जांच में यह बात सामने आती है कि आप के रक्त में कोलैस्ट्रौल का स्तर सामान्य से अधिक है या आप के परिवार में दिल की बीमारी का पारिवारिक इतिहास रहा है तो डाक्टर आप को हर 6 से 12 महीनों में यह जांच कराने की सलाह देते हैं.

ब्लड प्रैशर टैस्ट: नियमित रूप से ब्लड प्रैशर की जांच शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है. अगर आप का ब्लड प्रैशर 90/140 से अधिक या कम है तो आप के दिल पर दबाव पड़ता है, जिस से ब्रेन स्ट्रोक, हार्ट अटैक और किडनी फेल होने की आशंका बढ़ जाती है.

कितने अंतराल के बाद: साल में 1 बार, लेकिन अगर आप का ब्लड प्रैशर सामान्य से अधिक या कम है तो डाक्टर आप को 6 महीने में 1 बार कराने की सलाह देंगे.

ब्लड शुगर टैस्ट और डायबिटीज स्क्रीनिंग: ब्लड शुगर टैस्ट में यूरिन की जांच कर रक्त में शुगर के स्तर का पता लगाया जाता है. डायबिटीज स्क्रीनिंग में शरीर के ग्लूकोज के अवशोषण की क्षमता की जांच की जाती है.

कितने अंतराल के बाद: 3 साल में 1 बार. पारिवारिक इतिहास होने पर प्रति वर्ष.

बोन डैंसिटी टैस्ट: बोन डैंसिटी टैस्ट में एक विशेष प्रकार के ऐक्स रे के द्वारा स्पाइन, कलाइयों, कूल्हों की हड्डियों की डैंसिटी माप कर इन की शक्ति का पता लगाया जाता है ताकि हड्डियों के टूटने से पहले ही उन का उपचार किया जा सके.

कितने अंतराल में कराएं: हर 5 साल बाद.

पैप स्मियर टैस्ट: इस के द्वारा गर्भाशय के कैंसर की जांच की जाती है. अगर समय रहते इस के बारे में पता चल जाए तो इस का उपचार आसान हो जाता है. इस में योनि में एक यंत्र स्पैक्युलम डाल कर सर्विक्स की कुछ कोशिकाओं के नमूने लिए जाते हैं. इन कोशिकाओं की जांच की जाती है कि कहीं इन में कोई असमानता तो नहीं है.

कितने अंतराल के बाद: 3 साल में 1 बार.

– डा. नुपुर गुप्ता, कंसलटैंट ओस्टेट्रिशियन ऐंड गाइनोकोलौजिस्ट, निदेशक, लैव वूमन क्लीनिक, गुड़गांव   

Valentine’s Day 2024 : प्यार का रंग – राशि के बौयफ्रैंड ने क्यों गिरगिट की तरह बदला रंग ?

जब राशि की आंखें खुलीं तो उस ने खुद को अस्पताल के बैड पर पाया. उसे शरीर में कमजोरी महसूस हो रही थी. इसलिए उस ने फिर आंखें मूंद लीं. जब उस ने अपने दिमाग पर जोर डाला तो उसे याद आया कि उस ने तो नींद की गोलियां खा कर अपनी जीवनलीला समाप्त करने की कोशिश की थी, लेकिन वह बच कैसे गई. तभी किसी की पदचाप से उस की तंद्रा भंग हुई. उस के सामने डाक्टर रंजना खड़ी थीं.

‘‘अब कैसी हो तुम?’’ वे उस का चैकअप करते हुए उस से पूछ बैठीं.

‘‘ठीक हूं डाक्टर,’’ वह धीमे स्वर में बोली.

फिर डाक्टर रंजना सामने खड़ी नर्स को कुछ हिदायतें दे कर चली गईं. लेकिन राशि न चाहते हुए भी अतीत के सागर में गोते खाने लगी और रोहन को याद कर के फूटफूट कर रो पड़ी. थोड़ी देर रो लेने के बाद उस का जी हलका हुआ और वह न चाहते हुए भी फिर से यादों के मकड़जाल में उलझ कर रह गई. फिर उसे अपने कालेज के मस्ती भरे दिन याद आने लगे जब वह और उस के 2 दोस्त रोहन और कपिल कालेज में मस्ती करते थे. रोहन मध्यवर्गीय परिवार का सुंदर नौजवान था और कपिल रईस परिवार का गोलमटोल युवक था. ‘मुझ से शादी करेगी तो मुनाफे में रहेगी,’ कपिल उसे अकसर छेड़ते हुए कहता, ‘मैं गोलू हूं तो क्या हुआ? पर देख लेना, जिस दिन तूने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी, उस दिन से मेरी डाइटिंग चालू हो जाएगी.’

‘यह मुंह और मसूर की दाल,’ राशि कपिल का मजाक उड़ाते हुए कहती, ‘मैं अर्धांगिनी बनूंगी तो सिर्फ रोहन की, क्योंकि मेरे मन में तो उसी की तसवीर बसी हुई है.’ फिर मजाकमजाक में सभी जोर से हंस देते. पर कालेज खत्म होने के बाद राशि और रोहन अपने रिश्ते को ले कर काफी संजीदा हो उठे थे. लेकिन शादी से पहले जरूरी था कि रोहन अपने पैरों पर खड़ा हो जाए ताकि वह राशि का हाथ मांग सके. वैसे रोहन आगे बढ़ने के लिए हाथपांव तो मार रहा था, पर उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी. सरकारी जौब पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना बहुत जरूरी था. अब 3 बहनों के इकलौते भाई के पास इतनी जमापूंजी तो थी नहीं कि वह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अच्छी कोचिंग ले पाता. वैसे उस के पापा अपने स्तर पर उस की मदद को तो तत्पर रहते थे, पर बढ़ती महंगाई ने उन के हाथ बांध रखे थे.

तब ऐसे में राशि ने ही रोहन की मदद का बीड़ा उठा लिया था. वैसे तो राशि भी आगे पढ़ना चाहती थी और आगे बढ़ना चाहती थी पर रोहन की मदद के बाद इतना नहीं बच पाता था कि वह खुद भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सके. फिर उस ने खुद से समझौता कर लिया था और अपना कैरियर दांव पर लगाते हुए रोहन की सहायता करना उस ने अपना लक्ष्य बना लिया था. ‘तुम से यों हर वक्त पैसे लेना अखरता है मुझे, पर क्या करूं विवश हूं,’ रोहन अकसर उस से भरे मन से कहता. ‘तुम में और मुझ में कुछ फर्क है क्या?’ फिर वह उस की गले में बांह डालती हुई कहती, ‘जब अपना सारा जीवन ही तुम्हारे नाम कर दिया है तो अपने और पराए का फर्क बचा ही कहां है?’

फिर धीरेधीरे समय का पहिया घूमा. इधर संघर्षरत रोहन को सफलता मिली तो उधर कपिल अपने पापा के बिजनैस में सैटल हो गया. जब रोहन को पुणे की एक जानीमानी कंपनी में जौब मिली, तब सब से ज्यादा खुश राशि ही थी, जिस ने इस दिन के लिए न जाने कितने पापड़ बेले थे. उस ने न सिर्फ आर्थिक रूप से बल्कि हर तरह से रोहन की मदद की थी. जब रोहन पढ़ता तो वह सारी रात जाग कर उस का हौसला बढ़ाती. वह हमेशा अपने रोहन की सफलता की कामना करती थी. इसीलिए उसे जैसे ही पता चला कि रोहन की जौब लग गई है, वह बहुत खुश हो गई. रोहन को सामने देख खुशी के अतिरेक में मानो उस के तो होंठ सिल ही गए थे और आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे.

‘पगली, अब तो तेरे खुश होने का समय है,’’ रोहन शरारती अंदाज में बोला तो राशि शर्म से पानीपानी हो गई. तब उस ने आत्मसमर्पण सा कर दिया था. उस ने अपना सिर उस के कंधे से टिका दिया था. जिस दिन रोहन पुणे के लिए गया, उस दिन भी कमोबेश उस की यही स्थिति थी. अपनी मम्मी से कह कर उस ने रोहन के लिए नमकीन, अचार, हलवा और न जाने क्याक्या पैक करवा डाला था. ‘अरी, कम से कम यह तो बता कि इतना सब किस के लिए पैक करवा रही है,’ उस की मां सामान पैक करते वक्त लगातार उस से पूछती रहीं, पर वह जवाब में मंदमंद मुसकराती रही. ‘रोहन, यह सब सिर्फ तुम्हारे लिए है. अगर दोस्तों में बांटा तो मुझ से बुरा कोई नही होगा,’ राशि खाने के सामान से भरा बैग उसे थमाते हुए बोली थी.

‘जानेमन, तुम फिक्र न करो. यह बंदा ही सिर्फ इस सामान को खाएगा,’ फिर रोहन ने वह बैग राशि से ले कर अपने सामान के साथ रख लिया था. ‘मम्मीपापा से मिलने कब आओगे,’ लाख चाहते हुए भी राशि अपनी अधीरता उस से छिपा नहीं पाई थी. ‘पगली, पहले वहां जा कर सैटल तो होने दे मुझे. बस, फिर तुरंत आ कर तुझे तेरे परिवार से मांग लूंगा,’ फिर उस ने आगे बढ़ कर उस का माथा चूमते हुए कहा था, ‘बस, यह समझ ले कि मेरा तन पुणे जा रहा है, मन तो तेरे पास ही है, उस की हिफाजत करना.’ फिर ट्रेन चली गई थी और रोहन भी. तब वह न जाने कितनी देर स्टेशन पर ही खड़ी रह गई थी. जब तक ट्रेन उस की आंखों से पूरी तरह ओझल नहीं हो गई थी.

अब तो उस का किसी भी काम में मन नहीं लगता था. इधर वह रोहन की दुलहन का सपना अपनी आंखों में संजोए उस का बेसब्री से इंतजार कर रही थी तो उधर रोहन अब उस से कन्नी काटने लगा था. धीरेधीरे बढ़ रही उस की बेरुखी राशि को तोड़ने लगी थी. ऐसे में उस ने पुणे जा कर सारी बात जानने का मन बनाया. पर उस के जाने से पहले ही उसे माही मिल गई थी, जिस का चचेरा भाई संयोगवश रोहन की कंपनी में ही काम करता था. ‘अरे यार, तू जिस के साथ शादी कर सैटल होने का मन बना रही है, वह तो दगाबाज निकला. रोहन तो अब अपनी कंपनी के सीईओ की बेटी से इश्क फरमाने में लगा है. आखिर अपने परिवार की गरीबी दूर करने का इस से बढि़या विकल्प क्या होगा?’ फिर माही तो चली गई, लेकिन राशि… वह तो मानो दुख के सागर में डूबती चली गई. जिस पेड़ की शाखा के सहारे वह इस जिंदगी के सागर को पार लगाने की आस में थी, वह शाखा इतनी कच्ची निकलेगी, इस का उसे अंदाजा ही नहीं था.

वह क्या करे? इसी ऊहापोह में करीब एक महीना गुजर गया. इस बीच न तो उस ने रोहन से बात की और न ही रोहन का कोई फोन आया. तब फिर एक दिन जब वह अपने दिल से हार गई, तब उस ने ही उसे फोन लगाया.

‘हैलो, रोहन, कैसे हो?’

‘ठीक हूं.’

‘और तुम कैसी हो?’

‘मैं भी ठीक हूं.’

‘अच्छा रोहन, तुम दिल्ली कब आ रहे हो,’ राशि न चाहते हुए भी उस से पूछ बैठी. ‘‘अभी तो फिलहाल दिल्ली आने का कोई प्रोग्राम नहीं है, क्योंकि मैं तो अपना सारा परिवार यहां पुणे में शिफ्ट करने की सोच रहा हूं,’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. रोहन ने तो उस से दोटूक बात कर के अपनी जिम्मेदारी से, अपने प्यार से मुंह मोड़ लिया, लेकिन खाली हाथ रह गई तो राशि. वह बहुत कोशिश करती थी, रोहन को भूलने की, पर उस का दिल हर समय उस की याद में ही धड़कता रहता था. सच, कितनी आसानी से रोहन ने उस से कह दिया कि वह अपना पूरा परिवार पुणे शिफ्ट करने की सोच रहा है, जबकि वह यह बात अच्छे से जानता है कि वह भी तो उस के परिवार का हिस्सा थी. रोहन के परिवार में शामिल होने के लिए ही तो उस ने इतने सारे यत्न किए थे. यहां तक कि अपना कैरियर भी दांव पर लगा दिया था, पर बदले में उसे क्या मिला?

वह फोन पर उस से यह सब कहना चाहती थी, पर चाह कर भी उसे फोन नहीं मिला पाई. रोहन जैसा मौकापरस्त इंसान अब उस की नफरत के काबिल भी नहीं था. रोहन की बेवफाई ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था. तब उस ने खुद को आगे की पढ़ाई में झोंक दिया. हर समय हंसनेखिलखिलाने वाली राशि चुप्पी के खोल में सिमट कर रह गई थी. उस की यह खामोशी उस के मम्मीपापा के लिए भी कम दुखदाई नहीं थी, पर मौके की नजाकत को देखते हुए वे चुप ही रहते थे.

अपने दुख को दबाना जब राशि के लिए असहनीय हो गया, तब उस ने एक दिन नींद की ढेर सारी गोलियां खा कर अपना जीवन समाप्त करने की कोशिश की. लेकिन शायद अभी उसे और जीना था इसलिए बच गई. ‘‘बेटी, कैसी है तू अब?’’ मां की प्यार भरी आवाज सुन कर उस की तंद्रा भंग हो गई और वह अतीत से वर्तमान में लौट आई थी. जब मां का आत्मीयता भरा स्पर्श उसे अपने माथे पर महसूस हुआ तो वह सिसक पड़ी. ‘‘मेरी बेटी इतनी कमजोर निकलेगी, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था,’’ मां के स्वर में तड़प का पुट था.

मां की यह बात उसे चुभ गई थी. अब उस ने रोतेरोते सारी बातें अपनी मां को बता दी थीं. सबकुछ जानने के बाद उस की मां का भी दिल भर आया था. फिर वे प्यार से उसे समझाते हुए बोलीं, ‘‘मैं मानती हूं कि जो कुछ भी तेरे साथ हुआ वह गलत था, पर बेटी, किसी मौकापरस्त इंसान के लिए अपना जीवन समाप्त करना भी तो समझदारी नहीं है. तुझे तो यह सोचना चाहिए कि तू ऐसे खुदगर्ज इंसान से बच गई जो सिर्फ अपने को ही महत्त्व देता है.’’ मां की प्यार भरी बातों ने उस के रिसते घाव पर मरहम का काम किया था. फिर वह हलके मन से सामने रखा सूप पीने लगी थी. तभी अचानक मां उस से बोलीं, ‘‘बेटा, एक बात कहूं?’’

‘‘हां, कहो न मां.’’

‘‘देख बेटी, पुरानी बातों को छोड़ कर आगे बढ़ने में ही समझदारी है. इस से पुरानी बातों का दंश कम हो जाता है.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर…’’

‘‘अब परवर कुछ नहीं. बस, यह समझ ले कि एक बार तूने सूरत के आधार पर अपने जीवन का फैसला लिया था, अब तू सीरत को आधार बना कर आगे बढ़ जा.’’

‘‘लेकिन आप कहना क्या चाह रही हैं, मैं समझी नहीं,’’ राशि सूप का खाली कप अपनी मां को थमाते हुए बोली. ‘‘अरे, मैं तो उसी कपिल की बात कर रही हूं, जिसे तू गोलू कह कर छेड़ती थी,’’ मां फिर से संजीदा हो उठी थीं, ‘‘पता है, जब मैं ने तुझे बेहोश देखा, तब मैं समझ नहीं पाई थी कि क्या करूं? पहले तेरे पापा को फोन लगाया, लेकिन उन का फोन स्विच औफ जा रहा था. तब मैं ने परेशान हो कर तेरे एकदो दोस्तों को फोन लगाया. वे सभी पुलिस केस के डर से कन्नी काट गए. ‘‘फिर मैं ने गोलू को फोन लगाया. मेरे फोन करते ही वह तुरंत मेरे पास पहुंच गया. उस ने उस समय न सिर्फ तुझे संभाला बल्कि मुझे भी हिम्म्मत दी. अब बता, जो इंसान तेरी बेरुखी के बावजूद सिर्फ इंसानियत के नाते तेरी मदद को आगे आया, वह इंसान तारीफ के काबिल है या नहीं…’’

‘‘पर मां, अब तो शादी के नाम से ही नफरत हो गई है मुझे…’’ इतना कहतेकहते राशि फिर से रो पड़ी.

‘‘बेटा, धोखा रोहन ने दिया है तो उस की करनी की सजा तू क्यों भुगते? किसी और की गलती का पश्चात्ताप तू क्यों करे?’’ मां के स्वर में चिंता का पुट था. फिर न जाने उस के मन में अचानक क्या आया? उस ने तुरंत हां में सिर हिला दिया. उस की हां मिलते ही गोलू और उस की मां अस्पताल जा पहुंचे. ‘‘देख लेना बेटा, मैं दुनिया की हर खुशी दूंगी तुझे. बस, तू जल्दी से ठीक हो जा. तुझे ही अपने कमरे का सारा डैकोरेशन करना होगा,’’ गोलू की मां उस का माथा चूमते हुए बोलीं. फिर वह और उस की मां कमरे से बाहर चली गईं. उन के जाने के बाद कपिल राशि से मिलने आया.

‘‘मैं तो मरमिटा हूं तेरी हां पर. मैं ने तो पहली नजर में ही तुझे अपना दिल दे दिया था, लेकिन वहां तो… चल छोड़ उन बेकार की बातों को.

‘‘पर अब जब हम दोनों ने एक होने का फैसला कर लिया है, तो आज से तेरे सारे गम मेरे और मेरी सारी खुशियां तेरी,’’ मोटू राशि का हाथ थामते हुए बोला. गोलू की इस अदा पर राशि फिदा हो गई. अब उसे अपनी मां की कही बातों का अर्थ समझ में आने लगा था. सच, कितना फर्क है रोहन और कपिल की सोच में. एक वह निर्मोही रोहन है, जो अपनी मौकापरस्ती के कारण उसे लगभग भूल ही गया और दूसरी तरफ कपिल है, जो उस का झुकाव रोहन की तरफ होते हुए भी उसे अपना बनाने को तैयार है. सच में कपिल महान है जो इतना कुछ होने के बावजूद उस से सच्चा प्यार करता है. बस, कपिल की यही जिंदादिली भा गई थी उसे. उस का वर्तमान और भविष्य सुरक्षित रहेगा उस के साथ, इस की उम्मीद अब राशि के अंदर जाग चुकी थी. फिर अचानक ही कपिल उस से बोला, ‘‘थोड़े दिन बाद होली है. तुझे हमारे घर आना होगा, मेरे साथ होली खेलने,’’ कपिल उसे दोबारा बैड पर लिटाते हुए बोला.

‘‘हांहां, मैं जरूर आऊंगी,’’ राशि ने हां में अपना सिर हिला दिया.

‘‘यह हुई न बात, तो तू रंगेगी न, मेरे प्यार के रंग में?’’

‘‘हां, मेरे मोटू.’’ राशि के इतना कहते ही झट से मोटू ने एक प्यार भरा चुंबन उस के गाल पर अंकित किया और फिर शरमा कर बाहर निकल गया.

बलात्कार का आरोपी चिन्मयानंद अदालत से बाइज्जत रिहा हुआ

Swami Chinmayanand Rape Case : लौ छात्रा से बलात्कार के आरोपी संत और पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद को एमपी-एमएलए कोर्ट ने दोषमुक्त कर ‘बाइज्जत’ बरी कर दिया. मामले के विवेचना अधिकारी कोर्ट के सामने पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं कर सके, लिहाजा साक्ष्यों के अभाव का फायदा बलात्कार के आरोपी को मिला. पुख्ता साक्ष्य मिलता भी कैसे? सरकार स्वामीजी की, स्वामीजी सरकार के, पुलिस सरकार की और पीड़िता का मुंह तो डर, दबाव और पैसे से पहले ही बंद करवाया जा चुका है. मगर कोर्ट ने भी कुछ क्यों नहीं किया, यह सवाल है?

इस देश में साधु, महात्मा और स्वामी कहलाने वाले बड़ेबड़े लोग बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य कृत्यों के कारण जेल गए. कुछ छूट गए, कुछ छूटने की पूरी उम्मीद में हैं. छूट वे इसलिए जाते हैं क्योंकि सत्ता, नेता, पुलिस, अदालत और जनता सब उन की जेब में हैं.

इन चिन्मायनंद सरीखों को शर्म नहीं आती. अपनी गलीच करतूतों पर धर्म का परदा डाल कर ये रोज जनता को प्रवचन देने बैठ जाते हैं. और जनता निरी मूर्ख, इन के कुकृत्यों के वीडियो देख कर, इन के कुकर्मों को समाचारपत्रों और चैनलों पर देखपढ़ कर भी इन की भक्त बनी रहती है. ऐसे अनपढ़, मूर्ख और धर्म के आगे अंधे व बहरे हो चुके लोगों को अगर ये साधु-संन्यासी आराम से अपना शिकार बनाते हैं, उन की बहूबेटियों की इज्जत लूटते हैं और फिर कानून के शिकंजे से साफसुथरे बाहर निकल आते हैं तो दोष किस का है?

निसंदेह दोषी इस देश की जनता ही है. अंधभक्त लोगों को ये साधुसंत ही नहीं नोंच रहे, यही उन की बेटियों से रेप नहीं कर रहे बल्कि आज तो धर्म के नाम पर सत्ता भी यही सब कर रही है.

चिन्मयानंदों को उन के किसी कुकृत्य की सजा इसलिए नहीं मिलती क्योंकि अपने अंधभक्तों की बेशुमार संख्या दिखा कर वे सरकार को हमेशा अपने दबाव में रखते हैं. वोट खिसकाने की धमकी में लिए रहते हैं. इसलिए चिन्मयानंदों के कुकृत्यों के केस कमजोर करने और उन की रिहाई के लिए सरकार पुलिस व अदालत पर दबाव बनाती है.

अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए चिन्मयानंदों की जरूरत सरकार को बहुत ज़्यादा है, खासतौर पर दक्षिणपंथी सरकार को. सत्ता में बना रहना ही एकमात्र लक्ष्य है, उस के आगे औरत की इज्जत कोई माने नहीं रखती. ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के नारे लगाते रहो और बलात्कारी चिन्मयानंदों को जेल से निकलवाते रहो, उस के लिए चाहे गवाहों को खरीदना पड़े या पीड़ित को. चिन्मयानंदों के खिलाफ अदालतों में चल रहे मुकदमों को कमजोर करने के लिए सरकार किसी भी हद तक जा सकती है. धर्म को राजनीति का हथियार बनाने वाली मौजूदा सत्ताधारी पार्टी ऐसे चिन्मयानंदों के सहारे ही सत्ता में बनी रहेगी.

आसाराम और उस के बेटे नारायण साईं सहित उस के आश्रम के 8 लोगों के खिलाफ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, अप्राकृतिक यौन अपराध, महिलाओं पर नाजायज बल का इस्तेमाल, धमकी, हत्या, बंधक बनाना जैसी धाराओं में केस दर्ज हुआ. सारे कुकृत्य इन संतों ने अपने आश्रमों में किए. आश्रमों में रहने वाली साध्वियों के साथ मुंह काला किया, आश्रम में अपने दुख ले कर आने वाली औरतों की इज्जत लूटी, मगर मूर्ख जनता आज भी इन आसारामों के गुणगान में लगी है. इन के आश्रम बदस्तूर चल रहे हैं. और धर्म की अंधी औरतें तो इन के आते ही इन के पैरों में लोटने लगती हैं. मूर्खता और अंधेपन की इस से बड़ी मिसाल कहीं नहीं मिलेगी.

डेरा सच्चा सौदा का बाबा रामरहीम अपने आश्रम में महिलाओं से बलात्कार करता रहा. उस पर ह्त्या का मामला भी दर्ज हुआ. मामला खुला तो पीड़ितों के दबाव में एफआईआर दर्ज हुई. उस को जेल भेजना पड़ा. मगर रामरहीम के लिए जेल तो जैसे एक पिकनिक स्पौट है, खानेखेलने की जगह. वह कुछ दिन अंदर रहता है, कुछ दिन पैरोल पर बाहर घूमता है. नेताओं से मिलता है. अपने भक्तों को दर्शन-प्रवचन देता है. आश्रम बदस्तूर चल रहा है. सत्ता को उस के अनुयायियों का पूरा सपोर्ट मिल रहा है. मूर्ख और अंधी जनता उस की भक्त बनी हुई है. उस को यह बलात्कारी अभी भी भगवान का अवतार नज़र आता है.

संत रामपाल के भी लाखों अनुयायी हैं. रामपाल पहले सिंचाई विभाग में इंजीनियर था. वहां बंधीबंधाई तनख्वाह मिलती थी. उस से संतोष नहीं हुआ तो बाबा बन कर कमाई करने लगा. धर्म के धंधे में उतारते ही करोड़ों की कमाई होने लगी. रामपाल के खिलाफ अवैध गर्भपात सैंटर खोलने, अनुयायी की हत्या करने, आश्रम में हथियार रखने और सरकारी काम में बाधा डालने जैसे कई जघन्य मामले दर्ज हैं. मगर जनता इस अपराधी के आगे अभी भी  नतमस्तक है.

नाचने वाले बाबा स्वामी नित्यानंद को कौन भूल सकता है? नित्यानंद भी स्वयंभू भगवान है. वह अपने भक्तों के सामने खुद को भगवान की तरह पेश करता था. नित्यानंद पर बच्चों का अपहरण करने और अपने शिष्यों के साथ दुष्कर्म करने के आरोप हैं. साल 2010 में उसे गिरफ्तार किया गया था, जिस के कुछ ही समय बाद ही उसे बेल मिल गई. इस के बाद नित्यानंद फरार हो गया. उस ने एक द्वीप पर अपना कब्जा जमाया और उसे एक देश घोषित कर दिया. इतना ही नहीं, नित्यानंद ने इस द्वीप के लिए पासपोर्ट भी जारी करने का दावा किया था. आखिर सरकार की मदद के बिना कोई देश छोड़ कर नए द्वीप पर कैसे जा सकता है?

खुद को इच्छाधारी बताने वाला बाबा भीमानंद राजधानी दिल्ली में हाईप्रोफाइल सैक्स रैकेट चलाता था. पूरी तरह ऐयाशी में डूबा रहने वाला भीमानंद कई नेताओं और अधिकारियों को लड़कियां सप्लाई करता था. फिलहाल जेल में है और उस के अंधभक्त उस के बाहर निकलने की राह देख रहे हैं.

आसाराम बापू, सच्चिदानंद गिरी, गुरमीत सिंह राम रहीम, स्वामी ओम, निर्मल बाबा, इच्छाधारी भीमानंद, स्वामी असीमानंद, नारायण सांई, संत रामपाल, आचार्य कुषमुनी, बृहस्पति गिरी, ओम नमः शिवाय बाबा, मलखान सिंह जैसे हत्या, बलात्कार, अवैध जमीनें और हथियार रखने के आरोपी बाबाओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है. इन की जगह सिर्फ जेल होनी चाहिए, मगर देश में इन के बड़ेबड़े लग्जरी आश्रम हैं, इन के पास अरबोंखरबों की संपत्तियां हैं. विदेशों में बड़ेबड़े आश्रम और जमीनें हैं. लाखों की भीड़ इन की अनुयायी है, सरकार और पुलिस इन की जेब में हैं, इसलिए इन्हें अपने कर्मों पर शर्म नहीं आती, बल्कि गर्व होता है.

लौ की छात्रा से बलात्कार का आरोपी स्वामी चिन्मयानंद जेल से बाहर आ कर गरजता है कि अगले 7 साल में मेरा लाड़ला देश का प्रधानमंत्री बनेगा, तो इशारा किस तरफ है और जेल से बाहर निकलने में किस स्तर पर जा कर उस को मदद पहुंचाई गई है, यह लिखने की जरूरत नहीं है. पीड़िता कहां है? चिन्मयानंद की रिहाई का उस पर क्या असर हुआ है? यह सब जानने की किसी को जरूरत नहीं है. अंधभक्त इस बात से खुश हैं कि बाबा पर ईश्वर की कृपा है. वे उन की जयजयकार में लगे हैं. इन अंधभक्तों में बहुत बड़ी संख्या औरतों की है. शर्मनाक !

बात 12 साल पहले की है. 30 नवंबर, 2011 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ उस की एक शिष्या ने चौक कोतवाली में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया था. यह शिष्या चिन्मयानंद द्वारा संचालित एक लौ कालेज की स्टूडैंट थी. आरोप था कि चिन्मयानंद ने अपने कर्मचारियों की मदद से शिष्या को मुमुक्षु आश्रम में बंधक बना कर उस से कई बार बलात्कार किया.

बता दें कि चिन्मयानंद का असली नाम कृष्णपाल सिंह है. वह उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का रहने वाला है. चिन्मयानंद का नाम राम मंदिर आंदोलन के बड़े नेताओं में शुमार था. वाजपेयी सरकार में वह केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बनाया गया. चिन्मयानंद का शाहजहांपुर में आश्रम है और वहां वह एक लौ कालेज भी चलाता है. बलात्कार की शिकार लड़की उसी लौ कालेज की स्टूडैंट थी.

लड़की के पिता की तरफ से कोतवाली शाहजहांपुर में लड़की के अपहरण, बलात्कार और जान से मारने की धाराओं में केस दर्ज हुआ था और लड़की का बयान मजिस्ट्रेट के सामने कलमबद्ध किया गया था. यह भी बता दें कि इस से पहले चिन्मयानंद के आश्रम में रहने वाली एक साध्वी ने भी उस पर बलात्कार का केस दर्ज करवाया था.

स्वामी चिन्मयानन्द को पुलिस ने अरेस्ट कर जेल भेज दिया. जिन दिनों यह मामला उछला, सारे टीवी चैनलों में चिन्मयानन्द की क्लिप्स चलीं. गंदे और घिनौने वीडियोज आज भी यूट्यूब पर देखे जा सकते हैं. अखबारों में उस की तस्वीरें छपीं. जाहिर है, पीड़ित लड़की ने ही वे वीडियो बनाए थे. मामला तो दर्ज होना था. कुछ दिनों बाद पुलिस ने विवेचना कर के चिन्मयानंद के खिलाफ आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया. मगर इस केस की विवेचना के दौरान पीड़ित लड़की को और पीड़ित किया गया. कहा गया कि उस ने चिन्मयानंद से एक बड़ी रकम की डिमांड की. उस ने चिन्मयानंद को बदनाम करने की नीयत से वीडियो मीडिया में लीक किए जबकि दोनों के संबंध सहमति से बने थे.

शर्म आनी चाहिए स्वामी चिन्मयानंद को अपनेआप को संत कहते हुए. पीड़ित लड़की ने कुछ भी किया हो मगर वीडियो तो चिन्मयानंद के ही थे जिस में उस की नग्नता साफ नजर आ रही थी.

खैर, आज पुख्ता सुबूतों के अभाव में चिन्मयानंद अदालत से बाइज्जत बरी हो चुका है. लोकसभा चुनाव से पहले स्वामी चिन्मयानंद को जेल से बाहर निकालना उत्तर प्रदेश सरकार से ले कर केंद्र सरकार तक के लिए जरूरी था क्योंकि रामलला के मंदिर के लिए लड़ाई लड़ने वालों में चिन्मयानन्द का नाम भी शामिल है. सम्मान-उपहार तो मिलना ही था.

दरअसल, 80 के दशक के आखिरी में जब देश में राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था तब इस आंदोलन में चिन्मयानंद ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और भाजपा में शामिल हो कर अपने राजनीतिक सफर का भी आगाज किया था. श्रीराम जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य डा. रामविलास वेदांती के मुताबिक, राम मंदिर आंदोलन में अनेक संत जुड़े थे. उन में से एक चिन्मयानंद भी था. आंदोलन के दौरान अयोध्या आनाजाना भी लगा रहा.

एक भाजपा नेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा- मंदिर आंदोलन के समय चिन्मयानंद ने महंत अवैद्यनाथ (उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु) के साथ मिल कर राम मंदिर मुक्ति यज्ञ समिति बनाई और इसी के जरिए ये लोग मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका निभाने लगे.

बाद में दूसरे बड़े संत रामविलास वेदांती और रामचंद्र परमहंस समेत तमाम संतों को भी राम मंदिर आंदोलन से जोड़ लिया गया. 7 अक्टूबर, 1984 को चिन्मयानंद ने सरयू तट पर राम जन्मभूमि आंदोलन का संकल्प लिया. 19 जनवरी, 1986 को वह राम जन्मभूमि आंदोलन संघर्ष समिति के राष्ट्रीय संयोजक बना. 1989 में स्वामी निश्चलानंद के अधिष्ठाता पद छोड़ने के बाद चिन्मयानंद मुमुक्षु आश्रम आ गया.

80 के दशक में स्वामी धर्मानंद के बाद स्वामी चिन्मयानंद इस आश्रम और उस से जुड़े संस्थानों के प्रबंधन की जिम्मेदारी का निर्वहन करने लगा. चिन्मयानंद ने ही शाहजहांपुर में मुमुक्षु शिक्षा संकुल नाम से एक ट्रस्ट बनाया, जिस के जरिए कई शिक्षण संस्थानों का संचालन किया जाता है. इन में पब्लिक स्कूल से ले कर पोस्टग्रेजुएट स्तर के कालेज तक शामिल हैं. इस तरह कमाई के साथसाथ धर्म के प्रचारप्रसार के कई द्वार खुल गए.

राम मंदिर को करीब से जानने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ब्रजेश शुक्ला कहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान चिन्मयानंद का शौक राजनीति के साथसाथ महिला संसर्ग का भी रहा. एक दिन यह ज़रा जोर से उछल गया.

आज चिन्मयानन्द के कई बड़े आश्रम हैं. हरिद्वार में भी एक आश्रम है. इन आश्रमों में महिला साध्वियों के साथ क्या हुआ और कालेज की छात्राओं को कैसे हवस का शिकार बनाया गया, ये बातें अब किसी से छिपी नहीं हैं. मगर ताज्जुब है कि इतने खुलासे के बाद भी औरतों को ऐसे घृणित किरदार के लोगों से नफरत नहीं होती. कानून अंधा हो, अदालत सुबूत मांगती हो लेकिन जिन लोगों ने स्वामी चिन्मयानन्द के नंगे और अश्लील वीडियो देखे हैं क्या उन को यह मानने के लिए किसी सुबूत की जरूरत है कि यह कोई संत नहीं है?

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