Download App

Summer Tips: गरमी में भी सब्जियों और फलों को लंबे समय तक ऐसे रखें ताजा

सब्जी और फल दोनों ही हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होते हैं परंतु इन्हें उगाने में आजकल अनेक पैस्टीसाइड का प्रयोग किया जाता है जिन से ये बहुत जल्दी खराब होने लगते हैं. सब से बड़ी बात है कि सब्जियां और फल आजकल बहुत महंगे हो गए आते हैं, ऐसे में इन्हें ठीक से न रखा जाए तो फल तो खराब होते ही हैं, साथ ही, पैसों का भी बहुत नुकसान हो जाता है.

इस के अलावा कभीकभी बाजार में हमें फल और सब्जियां सस्ते दामों पर भी मिल जाते हैं जिस से हम उन्हें अधिक मात्रा में खरीद लेते हैं और यदि इन्हें सही तरीके रख लिया जाए तो पैसों की बचत तो होगी ही, साथ ही, आप इन का उपयोग अधिक समय तक कर भी सकती हैं. आज हम आप को ऐसे ही कुछ टिप्स बता रहे हैं जिन से आप रोज के फल और सब्जियों को काफी लंबे समय तक सुरक्षित रख सकती हैं-

हरा धनिया, पोदीना और हरी मिर्च

धनिया और पोदीना को साफ कर के इन की जड़ों को एक कांच के जार या गिलास में पानी भर कर इन की जड़ों को डाल दें. ध्यान रखें कि पानी सिर्फ जड़ों तक ही रहे. 3-4 दिनों के अंतराल पर पानी बदलते रहें. इस तरह से आप 15 दिनों तक इन्हें ताजा रख पाएंगें. बिना जड़ों वाले धनिया-पोदीना को साफ कर के धो कर सूती कपड़े या पेपर पर फैला कर पानी को अच्छी तरह सुखा लें और फिर एक डब्बे में टिश्यू पेपर बिछा कर रखें. इसे आप आराम से हफ्ते तक प्रयोग कर सकती हैं.
हरी मिर्च को धो कर इन के डंठल तोड़ दें और कांच के जार में स्टोर कर के प्रयोग करें.

पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई

हरी सब्जियों को ताजा रखने के लिए दुकानदार बहुत अधिक पानी छिड़कते हैं इसलिए यदि इन्हें बाजार से ला कर यों ही छोड़ दिया जाए तो ये एक दिन में ही खराब होने लगती हैं. इन्हें बाजार से ला कर तुरंत साफ करें और बिना धोए ही पेपर या टिश्यू पेपर में लपेट कर फ्रिज में रखें. पालक को आप पीस कर प्यूरी के रूप में भी स्टोर कर सकतीं हैं. मेथी की पत्तियां तोड़ कर इन्हें पंखे की हवा में सुखाएं और डब्बे में भर कर स्टोर करें.

नीबू और आंवला

नीबू के रस को निकाल कर छलनी से छान लें. सौफ्ट ड्रिंक की छोटी बोतल के ढक्कन में गरम सलाई से एक छेद कर लें और नीबू के रस को इस में भर दें. अब इस बोतल को फ्रिज में रख कर प्रयोग करें. इसी तरह आप नीबू के रस को बोतल में भर कर फ्रीजर में डाल दीजिए और जब प्रयोग करना हो तो एक दिन पहले फ्रीजर से निकाल दें और रस को छोटी बोतल में भर कर प्रयोग करें. नीबू को आप साबुत ही फ्रीजर में डाल दें, फिर आवश्यकतानुसार प्रयोग करें.
आंवले को प्रैशर कुकर में एक सीटी ले कर उबाल लें. इस की कलियां निकाल कर पीस लें और इस के गूदे को आइस ट्रे में भर कर फ्रीजर में जमा दें. जमने पर ट्रे में से निकाल कर जिपलौक बैग में भर कर फ्रीजर में स्टोर कर के प्रयोग करें.

स्ट्रौबेरी और पाइनएप्पल

स्ट्रौबेरी को प्लास्टिक के डब्बे में से निकाल कर टिश्यू पेपर से अच्छी तरह पोंछ कर इन के डंठल को काट दें. धो कर सूती कपड़े से पोंछ कर कांच के जार में थोड़ी सी शकर बुरक कर स्टोर करें. लंबे समय तक खराब नहीं होंगे.
इसी प्रकार पाइनएप्पल को भी छीलने के बाद उन्हें छोटे टुकड़ों में काट लें, फिर उन पर चीनी बुरक कर कांच के जार में स्टोर करें.

मशरूम

मशरूम एक प्लास्टिक के छोटे से डब्बे में आता है. यदि इसे आप ऐसे ही छोड़ दें तो बहुत जल्दी खराब हो जाता है. इसे बाजार से ला कर सूती कपड़े या टिश्यू पेपर से अच्छी तरह से पोंछ लें ताकि इस की सारी मिटटी निकल जाए. अब इस के तने को थोड़ा सा काट कर पेपर में लपेट कर रखने से यह 10-15 दिनों तक भी खराब नहीं होता.

टमाटर

सर्वप्रथम तो बाजार से हलके लाल टमाटर अर्थात आधे कच्चे आधे पके ही खरीदें ताकि ये धीरेधीरे लाल हों और एकदम सुर्ख लाल टमाटरों को धो-पोंछ कर इन के डंठल वाली जगह पर हलका सा मोम डाल दें. इस से उन के पकने की प्रक्रिया रुक जाती है और वे काफी लंबे समय तक चलते हैं.

मटर और बीन्स

मटर को छील कर उन के दानों को निकाल लें. फिर एक डब्बे में ऊपरनीचे दोनों तरफ टिश्यू पेपर डाल कर दाने रखें. ये काफी समय तक खराब नहीं होते.
इसी तरह बीन्स को साफ कर के उन्हें बारीक काट कर डब्बे में टिश्यू पेपर रख कर स्टोर करें.

प्याज, लहसुन और आलू

प्याज, लहसुन और आलू को अलगअलग बास्केट में रखें. एकसाथ रखने से इन में अंकुरण की प्रक्रिया बहुत जल्दी होने लगती है. इन की बास्केट में पेपर के कुछ टुकड़े डाल दें क्योंकि पेपर इन में निहित नमी को सोख लेते हैं और अंकुरण नहीं होता.

चरित्रहीन कौन- भाग 1: कामवाली के साथ क्या कर रहा था उमेश

आयुषी बैंक में नौकरी करती है और उमेश एलआईसी कार्यालय में है. उमेश तो घर से 10-11 बजे निकलता है, पर आयुषी को घर से जल्दी निकलना पड़ता है. उन के 2 बच्चे हैं- बेटी पावनी 11 साल की और बेटा सनी 7 साल का.

आयुषी दोनों बच्चों को स्कूल भेज उमेश का लंच पैक कर बाकी का काम बाई पर छोड़ तैयार हो कर बैंक निकल जाती. उसे हमेशा यही डर सताता है कि पता नहीं उस के पीछे उमेश और बाई कहीं कुछ…

कितनी बार आयुषी ने उमेश को अखबार की ओट से बाई को गंदी नजरों से घूरते देखा है. अब झाड़ूपोंछा लगाते वक्त किसी के भी कपड़े अस्तव्यस्त हो ही जाते हैं. इस का यह मतलब तो नहीं है कि कोई उसे गंदी नजरों से घूरे. ऐसे में कोई भी बाई असहज हो जाएगी. आयुषी ऐसे ही पति पर शक नहीं कर रही थी.

‘‘नंदा, मैं औफिस जा रही हूं. तुम काम खत्म कर के चली जाना… और हां फ्रिज में कुछ खाने का सामान रखा है उसे लेती जाना,’’ कह एक दिन आयुषी औफिस चली गई.

आयुषी थोड़ी दूर ही पहुंची थी कि उसे याद आया कि वह अपनी दराज की चाबी भूल आई. उस ने तुरंत स्कूटी घर की तरफ घुमाई. घर की दूसरी चाबी आयुषी के पास रहती थी. अत: वह दरवाजा खोल कर जैसे ही अंदर गई उस के पैर वहीं ठिठक गए. उमेश और नंदा दोनों आयुषी के बैड पर एकदूसरे से लिपटे थे.

आयुषी को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था. बाई तो भाग गई… उमेश हकलाते हुए कहने लगा, ‘‘आयुषी मैं नहीं वही जबरदस्ती करने…’’

आयुषी ने बिना उमेश की पूरी बात सुने एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर दे मारा और फिर कहने लगी, ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें झूठ बोलते हुए… बिना तुम्हारी मरजी के वह और तुम… छि… छि:…,’’ कह आयुषी अपने आंसू पोंछते हुए आगे बोली, ‘‘उस दिन को कोसती हूं मैं, जिस दिन मेरी तुम से शादी हुई थी.’’

आयुषी औफिस तो चली गई, पर अपनी तबीयत खराब होने का बहाना कर तुरंत घर आ गई. पूरा दिन और रात वह सिसकती रही. किसी से कुछ नहीं कहा. न ही अपने बच्चों को इस बारे में कुछ पता लगने दिया. वह सोचने लगी कि कभी बच्चों को अपने पापा की इन गंदी हरकतों का पता चला, तो दोनों नफरत करेंगे उन से… उमेश की तो अब हिम्मत ही नहीं थी कि वह आयुषी के सामने जाए.

आयुषी बच्चों को सुबह स्कूल भेज कर घर का सारा काम खत्म कर औफिस चली जाती थी. कोई भी कामवाली सुबह आने को तैयार नहीं थी. सब यही कहतीं कि 9 बजे के बाद ही आ सकती हैं. आयुषी का मन तो करता कि नौकरी छोड़ दे, पर बच्चों के स्कूल और पढ़ाई पर जो मोटा पैसा खर्च होता है वह कहां से आएगा. आसमान छूती महंगाई के युग में एक की कमाई से घर चलाना संभव नहीं था.

एक बाई आई भी, पर कुछ दिन काम कर के छोड़ गई. वही बात सुबह 8 बजे नहीं आ सकती. आयुषी की तो कमर जवाब देने लगी थी. आखिर वह घरबाहर कितना करेगी.

आयुषी ने अपनी सहेली वैशाली से बाई के बारे में पूछने के लिए फोन किया, तो उस ने बताया, ‘‘हां एक बाई आती तो है मेरे घर काम करने, पर वह थोड़ी बूढ़ी है. अगर तुम कहो तो भेज देती हूं.’’

वैशाली की बात सुन कर आयुषी खुश हो गई, उसे यही तो चाहिए था. वह मन ही मन मुसकराई कि उमेश अब बूढ़ी औरत को क्या घूरेगा.

कांता बाई दूसरे दिन से ही काम पर आने लगी. अब आयुषी को कोई फिक्र नहीं थी. सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा था.

कांता बाई 2-3 दिनों से नहीं आ रही थी, वैशाली से पता चला कि उस की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए कुछ दिनों बाद आएगी. सुन कर आयुषी के पसीने छूट गए.

कांता बाई एक रोज किसी और को ले कर आई और कहने लगी, ‘‘मैडमजी, यह मेरी बहू है रूपा. अब से यही आप के घर काम करेगी.’’

‘‘कांता बाई जब आप की तबीयत ठीक हो जाएगी तब तो आओगी न काम पर?’’ आयुषी ने पूछा.

‘‘मैडमजी अब मुझ से काम नहीं होता है… गठिया की शिकायत है मुझे. काम करती हूं तो दर्द और बढ़ जाता है. मगर आप चिंता न करो मेरी बहू मुझ से भी अच्छा काम करेगी,’’ कांता बाई ने कहा.

आयुषी ने हां तो कह दी पर फिर वही शर्त कि सुबह 8 बजे आना पड़ेगा. रूपा मान गई.

रूपा काम तो अच्छा करती थी, पर आयुषी को डर लगा रहता था कि उमेश की गंदी नजर कहीं रूपा पर भी न पड़ जाए. रूपा थी भी बहुत खूबसूरत और फिर उम्र भी ज्यादा नहीं थी. यही कोई 22-23 साल. आयुषी के सामने ही वह काम कर के चली जाती थी.

आयुषी रविवार के दिन रूपा से खाना बनाने में भी मदद ले लिया करती थी. रूपा का व्यवहार भी अच्छा था. आयुषी हमेशा उसे कुछ न कुछ दे देती थी. जैसे पुराने सलवारसूट, चूडि़यां, बिंदी, लिपस्टिक आदि. रूपा भी बहुत खुश रहती थी. आयुषी को वह अब मैडमजी नहीं, दीदी कह कर बुलाने लगी थी.

प्यार का सूरज: भाग 2

उस दिन रक्षाबंधन था. रवि को अपनी बहन के घर मथुरा जाना था. सुबह से मेरे पेट में दर्द था. मैं ने रवि से कहा, ‘आज तुम मथुरा मत जाओ, मेरी तबीयत काफी खराब है.’  ‘कैसी बेवकूफी की बात करती हो. दीदी ने आज खासतौर पर मु?ो बुलाया है, मैं अवश्य जाऊंगा,’ रवि ने रूखे स्वर में कहा और मथुरा चले गए.

सारा दिन मेरे पेट में दर्द होता रहा. शाम तक दर्द असहनीय हो उठा तो मैं ने दीपक को फोन किया. सास उस समय पड़ोस में बैठी थीं. दीपक कार में बिठा कर मु?ो तुरंत डाक्टर के यहां ले गया. डाक्टर ने मेरी हालत देख फटकारा, ‘पेशेंट को सुबह ही ले कर आते तो बच्चे को बचाया जा सकता था किंतु अब बहुत देर हो चुकी है.’

दूसरी सुबह मु?ो होश आया तो सबकुछ समाप्त हो चुका था. जीवन में हलकी सी जो रोशनी की किरण दिखाई दी थी, नियति के क्रूर चक्र के हाथों वह भी अंधकार में विलीन हो गई. मु?ो पता नहीं, रवि के दिल को कितना सदमा पहुंचा क्योंकि हम दोनों नदी के दो किनारों के समान एकदूसरे से बहुत दूर हो चुके थे. मेरी ननदें आगरा आई हुई थीं. उन की और सास की सलाह पर रवि ने एक रात कहा, ‘स्वाति, तुम शादी से पहले जयपुर डिग्री कालेज में पढ़ाती थीं. मेरे विचार में तुम्हें नौकरी छोड़नी नहीं चाहिए और जयपुर जा कर फिर से सर्विस जौइन कर लेनी चाहिए.’

‘मु?ो सर्विस करने में कोई एतराज नहीं है किंतु विवाह के बाद भाईभाभी के घर रहना ठीक नहीं लगता. तुम आगरा डिग्री कालेज में मेरा स्थानांतरण करवाने का प्रयास करो,’ मैं ने कहा. ‘स्थानांतरण होने में समय लगेगा. तुम इसी जुलाई में जयपुर जा कर सर्विस फिर से जौइन कर लो,’ रवि ने कहा. प्रतिवाद करना व्यर्थ था. जाहिर था, रवि पर अपनी मां और बहनों का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था. जुलाई में जयपुर आ कर मैं ने अपनी पुरानी सर्विस फिर से जौइन कर ली. कालेज में सुधा से मेरी मित्रता हो गई. सुधा विवाहित थी. इत्तफाकन उसका विवाह भी आगरा में हुआ था.

3 वर्षों के सुखी विवाहित जीवन के बाद उस के पति सौरभ का अपनी सहकर्मी की ओर ?ाकाव हो गया था. सुधा पति की बेवफाई सहन न कर पाई थी और उस का घर छोड़ जयपुर आ गई थी. हम दोनों एक ही किश्ती के मुसाफिर थे. सो, एकदूसरे के मन की वेदना को भलीभांति सम?ाते थे.

बीचबीच में रवि के पत्र आए किंतु मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. एक बार वे मु?ा से मिलने भी आए, तब मैं सुधा के साथ उदयपुर चली गई थी. 2 बार रवि ने दीपक को भी भेजा किंतु मैं ने उस से इस बारे में बात करने से इनकार कर दिया. रवि के व्यवहार ने मु?ो बेहद पीडि़त किया था. मु?ो जबरन स्वयं से दूर कर देने पर मेरा आत्मसम्मान छलनी हो गया था, जबकि रवि की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी थी. सोचतेसोचते आधी से ज्यादा रात आंखों में ही कट गई. देररात गए मु?ो नींद आई. सुबह न जाने कितनी देर मैं सोई रहती यदि सुधा न जगाती. हड़बड़ा कर मैं उठ बैठी. सामने कुरसी पर दीपक बैठा था.

‘‘आप तो कल यों ही चली आईं.’’

‘‘मु?ो आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी. आप को रवि को नहीं बुलाना चाहिए था,’’ मैं ने नाराजगी जताई.

‘‘भाभी, रवि को अपने किए पर बेहद अफसोस है. गुस्सा थूक दो और घर वापस लौट आओ.’’

‘‘किस का घर और कौन सा घर. मेरा कोई घर नहीं. इतने दिन वहां रह कर मैं ने जान लिया है, रवि को मेरी कोई जरूरत नहीं. उन्हें आप एक आदर्श बेटा और आदर्श भाई बना रहने दीजिए, पति बनाने का प्रयास मत कीजिए.’’

‘‘अब हालात बदल गए हैं. मम्मी भी पंकज के पास हैदराबाद चली गई हैं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘आप को जयपुर भेजने के कुछ दिनों बाद मम्मी गिर गई थीं. उन के पैर में फ्रैक्चर हो गया था. मुसीबत में उन की सेवा के लिए कोई बेटी नहीं आई. उस समय आप के साथ किए व्यवहार पर वे बहुत पछताई थीं. उन की देखभाल के लिए घर में एक स्त्री का होना जरूरी था, सो, पंकज उन्हें अपने साथ हैदराबाद ले गया,’’ दीपक ने बताया. मैं ने वैसे तो कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की मगर बोली, ‘‘भैया, रवि की उपेक्षा ने मेरी भावनाओं को कुचल दिया है. उन से कहिएगा, मेरी चिंता न करें.’’ मेरे हठ के आगे दीपक निराश हो गया. फिर वह सुधा से बोला, ‘‘तुम भाभी को सम?ाओ. मैं शाम को फिर आऊंगा.’’

दीपक के जाते ही सुधा बिफर पड़ी, ‘‘रवि तु?ो बारबार बुला रहा है किंतु तू उस से बात तक करने को तैयार नहीं. इतना अभिमान अच्छा नहीं, स्वाति. कहीं ऐसा न हो कि तु?ो अपने फैसले पर पछताना पड़े.’’ मैं खामोश रही, शायद सुधा ठीक कह रही थी. अगले दिन हमें जयपुर लौटना था. लड़कियां जीभर कर खरीदारी करना चाहती थीं. नाश्ता कर के हम दोनों भी खरीदारी के लिए निकलने वाली थीं, तभी सुधा से मिलने उस का पति सौरभ आ गया. वह सुधा से बात करना चाहता था पर मैं हैरान रह गई थी कि थोड़ी सी नानुकुर के बाद सुधा उस के साथ चली गई.

2 घंटे बाद जब वह लौटी तो बहुत खुश थी. आते ही मु?ा से लिपट गई, बोली, ‘‘मैं बहुत खुश हूं, मेरा और सौरभ का सम?ाता हो गया. वह अपने किए पर शर्मिंदा है. क्षमा मांग रहा है और मु?ो घर वापस बुला रहा है.’’

‘‘और तू जाने को मान गई?’’ मैं ने चिढ़ कर उस की बात काटते हुए कहा, ‘‘तू तो कहती थी कि ऐसे बेवफा आदमी के साथ मैं कभी नहीं रह सकती?’’

‘‘हां, स्वाति, मैं ऐसा कहती थी किंतु यह भी सच है कि अकेले रह कर जीवन काटना बहुत कठिन है. मैं निजी अनुभवों के आधार पर कह रही हूं, अकेली स्त्री को यह समाज चैन से जीने नहीं देता. जीवन में कदमकदम पर हमें सम?ाते करने पड़ते हैं, भाईबहनों के साथ, मित्रों के साथ और नौकरी में भी. फिर पति के साथ सम?ाता करने में संकोच कैसा?

‘‘गलती किसी से भी हो सकती है और सौरभ को अपनी गलती पर पश्चात्ताप भी है, फिर गलती सुधारने का एक मौका मैं उसे क्यों न दूं?

‘‘मेरी मानो तो स्वाति, तुम भी रवि के पास लौट जाओ. रवि ने तुम से कभी बेवफाई नहीं की. वह हमेशा सिर्फ तुम से प्यार करता रहा है. सिर्फ घर वालों के दबाव में आ कर भूल कर बैठा. उस की भूल इतनी बड़ी नहीं है कि उसे क्षमा न किया जा सके, इसलिए मेरी बात पर ठंडे दिमाग से विचार करो और शाम को दीपक तुम्हें लेने आए तो रवि के पास लौट जाओ.’’ सुधा की बातों का मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. सच तो यह था कि मन के किसी कोने में अब तक रवि से मिलने की अभिलाषा शेष थी, जिसे मेरे अहं ने जला कर राख बना डाला था. आज सुधा की बातों से उस राख में कोई दबीढकी चिनगारी फिर से सुलगने लगी थी.

सहयात्री: क्या शालिनी और राधेश्याम के बीच कोई रिश्ता था?

रेलवे स्टेशन पर एसी कोच में बैठी ट्रेन चलने का इंतजार कर रही शालिनी का बेटा रमेश अभी सारा सामान ठीक से लगा कर बाहर निकला ही था कि ट्रेन चलने की सीटी बज गई.मां को चलने से पहले खिड़की से झांकते हुए विदाई के अंदाज में मुसकराते हुए अपने मन को समझाने का प्रयास कर ही रहा था कि रमेश ने पास से निकले 70 वर्षीय राधेश्याम को देखा, जो ट्रेन के उसी डिब्बे के दरवाजे पर चढ़ने की जल्दी में थे.उन का एक बैग जल्दी के चलते रमेश के कुछ ही आगे गिर गया.

राधेश्याम की उम्र शरीर की शिथिलता के सामने हार मान गई थी.तभी उस की मदद करने के लिए रमेश दौड़ा.इधर शालिनी अचानक अपने बेटे को दौड़ते देखा तो चिंतित सी दरवाजे की तरफ लपकी.जब तक शालिनी पंहुचती तब तक रमेश तक राधेश्याम को ट्रेन के डिब्बे में सामान सहित सुरक्षित पहुंचा चुका था.रमेश का तो मन था कि वह अंदर सीट तक छोड़ कर आए मगर समय की कमी थी.ट्रेन कभी भी चल सकती थी.ट्रेन के दरवाजे पर खड़े राधेश्याम कृतज्ञता से रमेश के हाथ को पकड़े धन्यवाद कर रहे थे और रमेश इसे अपना फर्ज बता रहा था कि तभी ट्रेन ने दूसरी सिटी भी बजा दी और शालिनी ने मुसकराते हुए दरवाजे से ही रमेश को विदा किया.

चेहरे की भावभंगिमा से ही राधेश्याम समझ तो रहे थे कि शालिनी और उस लड़के के बीच कोई आत्मीय संबंध है.फिर भी जिज्ञासा के चलते मदद से खुश राधेश्याम ने वहीं खड़ेखड़े शालिनी से पूछ लिया,”मैडम, यह आप का बेटा है?”

मुसकराती शालिनी ने कहा,”जी हां.”

ट्रेन पकड़ने की खुशी से गदगद राधेश्याम ने कहा, “बड़ा ही सुशील बच्चा है.आप खुशकिस्मत हैं.” सहमति में गरदन हिलाते हुए शालिनी ने मुसकराते हुए राधेश्याम की तरफ देखते हुए पूछा,”यह सारा सामान आप ही का है?”

“जी हां, मैं अपनी बेटी के पास लंबी अवधि के लिए जा रहा हूं इसलिए सामान थोड़ा ज्यादा हो गया.”

“लाइए, मैं लिए चलती हूं,” कहते हुए शालिनी एक हाथ से एक थैला पकड़ दूसरे हाथ से कोच का दरवाजा खोलते हुए आगे बढ़ी.

अपने दोनों हाथों में बाकी सामान लिए राधेश्याम भी पीछेपीछे चल दिए.दोनों हाथों में सामान लिए लाचार राधेश्याम की सुविधा को देखते हुए शालिनी ने दरवाजे को देर तक पकड़े रखा.शालीनि ने पूछा,”आप का बर्थ नंबर कौन सा है?”

“जी सीट नंबर 7 है।”

“अरे वाह, मेरा सीट नंबर 9 है.मतलब आमनेसामने की ही सीट है,” दोनों पलभर के लिए मुसकरा दिए।
सामान अपनी जगह रख चैन की सांस लेते हुए राधेश्याम ने फिर कहा,”अगर आज आप के बेटे ने मदद न की होती तो शायद मेरी ट्रेन ही छूट जाती.”

सामने की सीट पर शालीनता से बैठी शालिनी ने मुसकराते हुए एक बार फिर कहा,”यह तो उस का फर्ज था.अगर आप की जगह मैं होती तो क्या आप का बेटा मेरी मदद न करता?”

“आप सही कह रही हैं,” राधेश्याम ने सहमती जताते हुए कहा.

शालिनी ने अपने पर्स से तब तक एक किताब निकाल ली.ऊपर लिखी भाषा को पढ़ने में असमर्थ राधेश्याम ने पूछा,”यह किस भाषा की किताब है?”

“तेलुगु है,” शालिनी ने छोटा सा उत्तर दिया.

“अच्छा तो आप आंध्र प्रदेश से हैं?” राधेश्याम मुसकराते हुए अंदाज में बोले.”

“जी, वर्तमान में मैं समाजसेविका हूं और अभी मैं अपने बेटे के पास दिल्ली आई हुई थी.मैं राज्य प्रशासन में सीनियर औडिटर के पद से 5 साल पहले ही सेवानिवृत्त हुई हूं.कोई खास काम नहीं रहता इसलिए थोड़ी समाजसेवा हो जाती है और मन भी लगा रहता है.कभीकभी बेटे के पास दिल्ली चली आती हूं…और आप?” प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ शालिनी ने राधेश्याम की तरफ देखते हुए पूछा.

“जी, मेरा नाम राधेश्याम भटनागर है और मैं दिल्ली में ही अध्यापक था.लगभग 10 साल हो चुके हैं सेवानिवृत्ति के.मैं अपनी बेटी के पास भोपाल जा रहा हूं.वह वहां प्रोग्राम ऐनालिस्ट के पद पर है.उस के 2 जुड़वां बच्चे हैं, बेटी को बच्चे संभालने में दिक्कत न हो इसलिए आजकल ज्यादातर मैं बेटी के पास ही रहता हूं.बस, अपनी सालाना जीवित प्रमाणपत्र देने के लिए आया था.सुनते ही दोनों एकसाथ हंस पड़े.

राधेश्याम ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “कभी ये दिन भी देखने पड़ेंगे सोचा न था,” शालिनी ने किताब से नजरें उठाते हुए राधेश्याम की तरफ प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ देखा और पूछा, “ऐसे दिन का क्या मतलब?”

राधेश्याम तपाक से बोले,”मतलब यही कि हमें खुद ही सिद्ध करना पड़ेगा कि हम जिंदा हैं.”

“यह बात तो आप ने सही कहा,” शालिनी ने राधेश्याम की बात में सहमति जताते हुए कहा.

“लेकिन सरकार भी क्या करे और कोई चारा भी तो नहीं और फिर हमें पेंशन तो मिल रही है न.यह एक बड़ा सुख है.साल में एक बार की परेशानी जरूर है, लेकिन कम से कम बाकी सब परेशानियां तो नहीं हैं,” शालिनी ने राधेश्याम की बात से सहमति के साथ अपना पक्ष रखते हुए कहा.

मगर राधेश्याम ने फिर भी अपना पक्ष रखते हुए कहा,”मैं सब समझता हूं मैडम, मगर जब जिंदा होने का प्रमाण देता हूं तब थोड़ा बुरा सा महसूस तो होता ही है.आप की बात भी सही है,” शालिनी ने मुसकराते हुए कहा.

मगर साथ ही प्रश्न किया,”आप की बेटी के जुड़वां बच्चों को देखभाल के लिए आप अकेले क्यों? आप की पत्नी…” कह कर शालिनी रुक गई।

राधेश्याम ने हलकी सी गरदन नीचे की ओर खुद को संभालते हुए कहा,”जी वे 4 साल पहले ही हमारा साथ छोड़ कर भाग गईं,” एकदम आश्चर्य से भरी शालिनी ने एक बार फिर किताब से नजरें राधेश्याम की तरफ करते हुऐ चश्मे के अंदर से झांकते हुए देखा.

“वह अपने पिता के पास है,” राधेश्याम ने मानों शालिनी के मन में उठ रहे प्रश्न का मुसकराते हुए जबाब दिया.शालिनी के मन में अभी संवेदना के भाव आए ही थे कि राधेश्याम ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा,”हमारी मैडम तो दूसरी दुनिया में सुकून से हैं।” शालिनी को राधेश्याम की मजाक करने के अंदाज में अपनी दिवंगत पत्नी के चले जाने का इस तरह से बताना कुछ अच्छा नहीं लगा.शालिनी ने शिकायत भरे अंदाज में उन्हें मुंह बनाते हुए कहा,”यह भी कोई बात हुई? कोई इस तरह परिचय देता है क्या अपनी दिवंगत पत्नी का?”

राधेश्याम, जो अब तक अपनी बात पर खुद ही हंस रहे थे, मुसकराते हुए कटाक्ष भरे अंदाज में बोले,”अरे मैडम, दूसरी दुनिया में तो वे अचानक ही चली गईं मुझे अकेला छोड़ कर.अब तो वे वहां सुखी हैं और मैं यहां अकेला बुढ़ापे के दिन काट रहा हूं.जब तक वे साथ रहीं, मेरे पास समय नहीं था.अब मेरे पास समय है तो वे मेरे साथ नहीं हैं.अब इस बेवफा पत्नी को आप ही कहो कि छोड़ कर भागना न कहूं तो और क्या कहूं?” शालिनी सैद्धांतिक रूप से राधेश्याम से सहमत तो न थी मगर इतने कष्टभरी घटना को भी मजाक में कह देने के राधेश्याम की इस बेबाक अंदाज की कायल हो गई.अब उस का मन किताब से ज्यादा सामने बैठे राधेश्याम की बातों में आ रहा था।

शालिनी ने गौर से देखा, पूरी तरह से सफेद हो चुके रेशमी बालों के साथ ही सफेद भोंहों के नीचे दिख रही दोनों आंखों में अभी भी चमक साफ दिख रही थी.आंखों में उम्र के निशान दूरदूर तक न थे.शालिनी को राधेश्याम की बेबाकभरी बातें अच्छी लग रही थीं जबकि शालिनी के सामने बैठे राधेश्याम शालिनी से एकदम उलट थे.

इधर राधेश्याम बोलते ही जा रहे थे,”हम तो टीचर हैं मैडम, जिंदगीभर बोलने का ही खाया है.आप ठहरीं सीनियर औडिटर.जीवनभर सब के काम में कमियां ही निकाली होंगी,”और यह कह कर राधेश्याम हंस पङे.

शालिनी को राधेश्याम की बात एक बार फिर अच्छी नहीं लगी मगर अचानक ही शालिनी ने शांत मन से राधेश्याम की बात को मनन किया तो पाया कि मजाक में ही सही मगर जीवनभर उस के कार्य करने और विभागीय जिम्मेदारियों के चलते वे घर पर भी हमेशा सब में कमियां निकालने और सुधारने में ही तो लगी रहीं.

उसे याद आया कि एक बार उस के दिवंगत पति प्रभाकरण जोकि उसी के विभाग में प्रशासनिक पद पर थे, एकबार उन्होंने भी यही कहा था मगर तब शालिनी अपने पति पर बहुत गुस्सा हुई थीं और पूरे 1 हफ्ते तक घर का माहौल भी खराब रहा था.मगर अब इन सब बातों से क्या फायदा? शालिनी अपनी स्मृतियों से बाहर आते हुए राधेश्याम से पूछ बैठीं, “अच्छा तो आप को कैसे पता, मैं घर पर औडिटर ही बन कर रही?” एक बार फिर मुसकराते हुए राधेश्याम ने कहा,”मैडम, मैं भी तो जिंदगीभर अपने घर में टीचर बन कर ही बोलता रहा और अब भी देखो बोलता ही रहता हूं,” और फिर दोनों एकसाथ हंस पड़े

शालिनी बहुत दिनों बाद इतना खुल कर हंस रही थी.उसे यह खुलेमन और बक्कड़ सहयात्री राधेश्याम, किताब से ज्यादा रुचिकर लगा.शालिनी ने किताब को एक तरफ रख दिया और मुसकराते हुए उस की बातों में खो गई.देर रात आखिर दोनों ने अपनाअपना खाना निकाला और आत्मीयता भरे माहौल में एकदूसरे के खाने का हिस्सा भी बने.दोनों की आदतें एकदम विपरीत होने के बावजूद एकदूसरे को समझने की कोशिशें भी जारी थीं.राधेश्याम ने सोने से पहले अपनी दवाइयां लीं और लेटते हुए शालिनी की तरफ मुड़ कर बोले,”मैडम, आप मेरी बेटी का नंबर नोट कर लीजिएगा,” राधेश्याम की इस अजीब की हरकत पर शालिनी को एक बार फिर से आश्चर्य हुआ.

राधेश्याम ने मुसकराते हुए कहा,”अगर मैं सुबह नहीं उठा तो कम से कम आप मेरे घर पर फोन कर सूचना तो दे देंगी न,”और कह कर हंस दिए.

शालिनी को राधेश्याम की यह मजाक बिलकुल पसंद नहीं आई.भला कोई अपने मरने की बात किसी अजनबी से इस तरह कहता है क्या? राधेश्याम समझ गए और अपनी बात पलटते हुए बोले,”मैडम, मैं तो सुबह 5 बजे अपने स्टेशन पर उतर जाऊंगा तब तक आप तो सोती रहेंगी.हम दोनों के पास बातें करने का मन हो तो नंबर तो होना चाहिए कि नहीं?”

शालिनी ने राधेश्याम का नंबर पूछ कर अपने मोबाइल में ‘राधेश्याम सहयात्री’ के नाम से सेव भी कर लिया और ‘गुड नाइट’ कह कर कंपार्टमेंट की लाइट बंद कर दी।

इन बातों को बीते अब लगभग 2 साल हो चले हैं.शालिनी के एकाकी जीवन में किताबें थीं या रोज सुबह ‘राधेश्याम सहयात्री’ की तरफ से आने वाला ‘सुप्रभात’ का एक संदेश, जिस की अब शालिनी को आदत पड़ चुकी थी.शालिनी को रोज की दिनचर्या से जब भी समय मिलता वह राधेश्याम के सुप्रभात के संदेश पढ़ लिया करती और उत्तर भी जरूर देती.

यों तो राधेश्याम के सुप्रभात के संदेशों में लिखी ज्यादातर बातें या तो सैद्धांतिक होतीं या उम्र की इस दहलीज पर व्यर्थ ही लगती.मगर सीखने की कोई उम्र नहीं होती.फिर भी इतने संदेशों में से 1-2 बार काम की बात मिल ही जाती थी, जिस से शालिनी को अच्छा लगता था.सब से ज्यादा मुसकराहट शालिनी के चेहरे पर अभी भी उस छोटी सी मुलाकात के दौरान राधेश्याम द्वारा की गई छोटीछोटी नादानियां थीं जिन्हें याद कर शालिनी अभी भी यदाकदा मुसकरा लेती थी.

आज अचानक शालिनी की तबीयत बहुत तेजी से खराब हुई.शालिनी के बेटे रमेश को जैसे ही पता चला वह औफिस छोड़ भागता हुआ आया और शालिनी को सीधे हौस्पिटल में भरती कराया.तबीयत खराब होने के चलते अगले 3 दिनों से शालिनी आईसीयू में भरती रही.डाक्टर शालिनी की स्थिति के बारे में कुछ नहीं बता रहे थे.रमेश को डाक्टर ने कह दिया है कि अगले 24 घंटे बहुत संवेदनशील हैं.कुदरत ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा.शालिनी के कमरे में बैठा रमेश आशाभरी नजरों से अपनी मां की तरफ देख ही रहा था कि अचानक शालिनी का फोन बज उठा.उस ने देखा स्क्रीन पर ‘राधेश्याम सहयात्री’ लिखा था.जिज्ञासा के साथ रमेश ने फोन उठाया मगर इस से पहले कि वह “हैलो” कह पाता उधर से एक महिला की आवाज आई,”शालिनीजी हैं?”

“जी नहीं, मैं उन का बेटा रमेश बोल रहा हूं.रमेश ने प्रश्नवाचक अंदाज के साथ पूछा,”आप कौन?”

उधर से महिला की आवाज आई,”जी, मैं राधेश्यामजी की बेटी अनिता बोल रही हूं.”

अनिता बोल रही थी,”मेरे पिताजी को दिवंगत हुए 6 महीने हो चुके हैं.उन्होंने मरने से पहले मुझे एक जिम्मेदारी दी थी कि मैं रोज शालिनीजी के इस नंबर पर एक सुंदर सा सुप्रभात का संदेश भेजा करूं और अगर लगातार 3 दिनों तक उधर से कोई उत्तर न आए तो मैं फोन लगा कर शालिनीजी की तबीयत के बारे में पूछ लूं.पिछले 4 दिनों से सुप्रभात संदेश का शालिनीजी की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण मैं ने उन की तबीयत के बारे में जानने के लिए यह फोन लगाया है।” रमेश कुछ जवाब देता तब तक शालिनी के कमरे से मौनिटर पर लगी हृदयगति दिखाने वाली रेखा एक शांत आवाज के साथ सीधी दिशा में चलने लग गई थी।

इस ‘सहयात्री’ वाले रिश्ते को महसूस कर रमेश स्तब्ध था.उधर से रमेश का उत्तर सुनने के लिए लगातार “हैलो… हैलो…” की आवाज आ रही थी.

रमेश ने रुंधे गले से कहा,”आप के पिताजी की सहयात्री आज वापस उसी डिब्बे में जा कर बैठ गई हैं, जहां आप के पिता पिछले 6 महीने से उन का शायद इंतजार कर रहे हैं.”

Ectopic Pregnancy: जब बच्चा बच्चेदानी में नहीं फेलोपियन ट्यूब में ठहर जाए

कुछ सालों पहले 20-22 साल की लड़की के गालब्लैडर का औपरेशन हुआ था. उस के कुछ ही दिनों बाद उस के पेट में दर्द हुआ तो वह एक अस्पताल में सर्जरी विभाग में पहुंची. उस के गालब्लैडर का औपरेशन करने वाले डाक्टरों ने जांच की पर उन को दर्द की कोई वजह समझ नहीं आई. लड़की को महिला रोग विभाग भेजा गया. लड़की कुंआरी थी. डाक्टरों को जांच में पेट में सूजन का एहसास हो रहा था. लड़की से जब सैक्स करने के बारे में पूछा गया तो उस ने साफ इनकार कर दिया. डाक्टर ने जब एकदो टैस्ट किए तो मामला साफ हो गया कि उस लड़की ने असुरक्षित सैक्स किया था और परिणामस्वरूप गर्भ बच्चेदानी में ठहरने के बजाय अंडवाहिनी यानी फेलोपियन ट्यूब में ठहर गया था. गर्भ के बढ़ने से फेलोपियन ट्यूब फूल रही थी जिस की वजह से लड़की के पेट में दर्द हो रहा था. उस दौरान फेलोपियन ट्यूब को फटने से बचाने के लिए डाक्टरों को उस का औपरेशन करना पड़ा.

इस मामले में लखनऊ स्थित किंग जौर्ज मैडिकल कालेज के, महिला रोग विभाग की प्रोफैसर अमिता पांडेय से विस्तार से बातचीत हुई. पेश हैं उस के खास अंश: 

 

जब गर्भ बच्चेदानी में ठहरने के बजाय अंडवाहिनी यानी फेलोपियन में ठहर जाए तो क्या होता है?

सामान्य रूप में गर्भ हमेशा बच्चेदानी में ठहरता है. यहीं भ्रूण का विकास होता है. भ्रूण का विकास जब गर्भाशय के बजाय बाहर की अंडवाहिनी यानी फेलोपियन ट्यूब में होने लगता है तो इस को एक्टोपिक प्रैग्नैंसी कहा जाता है.  जैसेजैसे भ्रूण का आकार बढ़ता जाता है, फेलोपियन ट्यूब की हालत खराब होने लगती है. एक समय वह फटने की हालत तक पहुंच जाती है जो महिला के लिए जानलेवा हो सकती है. 2 प्रतिशत मामलों में एक्टोपिक प्रैग्नैंसी का खतरा बना रहता है.

एक्टोपिक प्रैग्नैंसी का पता कैसे चलेगा?

देखिए हर लड़की को या महिला को यह पता होता है कि उस की माहवारी की डेट क्या है. अगर उस ने किसी पुरुष के साथ संबंध बनाए हैं, चाहे वह कुंआरी हो या शादीशुदा, तो उसे पता रहता है कि अगर समय पर माहवारी न आई हो तो तुरंत प्रैग्नैंसी टैस्ट करा लेना चाहिए और किसी महिला रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए.

अगर बच्चेदानी यानी गर्भाशय में गर्भ ठहरता है और समय से पता चल जाए तो दवाओं और सर्जरी के द्वारा सुरक्षित गर्भपात कराया जा सकता है. अगर गर्भ  फेलोपियन ट्यूब में ठहरा है तो गर्भपात कराने से कोई लाभ नहीं होता. गर्भनिरोधक और गर्भपात के लिए खाई जाने वाली गोलियां इस पर असर नहीं करतीं. अगर शुरुआत में इस बात का पता चल जाए कि गर्भ फेलोपियन ट्यूब में ठहरा है तो इंजैक्शन द्वारा गर्भ को बढ़ने से रोका जा सकता है. गर्भ बढ़ जाता है तो सर्जरी के अलावा दूसरा रास्ता नहीं रहता. कई बार डाक्टरों की जानकारी में मामला तब आता है जब हालात काबू से बाहर हो जाते हैं. ऐसे में सर्जरी कर फेलोपियन ट्यूब तक  निकालनी पड़ती है.

इस से कैसे बचा जा सकता है?

सैक्स करने वालों को केवल गर्भ ठहरने का खतरा ही समझ आता है. उन को लगता है कि आईपिल के सेवन से गर्भ ठहरने से बचा जा सकता है या फिर गर्भ ठहर गया तो जो वे एमटीपी यानी गर्भपात कराने वाली गोलियों का सेवन कर के गर्भ को रोक सकते हैं. वे इस बात से अनजान रहते हैं कि अगर एक्टोपिक प्रैग्नैंसी जैसे हालात आ गए तो सर्जरी से बचना संभव नहीं होता है. अगर कुंआरी है तो इस से समाज में उन की मान और प्रतिष्ठा को भी चोट पहुंच सकती है. 

गर्भ न ठहरे, इस के क्या उपाय हैं?

गर्भ ठहरने से रोकने के बहुत सारे सरल तरीके होते हैं. इन में गोलियां, इंजैक्शन, कंडोम और कौपर टी जैसे उपाय हैं. एक शरीर में घुलने वाली गोली भी होती है जिसे सैक्स के पहले अंदर के अंग में डालने के बाद सैक्स करने से गर्भ ठहरने का खतरा कम हो जाता है. परेशानी की बात यह है कि इतने उपाय होने के बाद भी लोग जब गलती कर बैठते हैं और जब गर्भ ठहर जाता है तो दूसरे तमाम उपाय करते हैं. गर्भपात कानून आने के बाद जब जानकार डाक्टर गर्भपात से इनकार कर देते हैं तो लोग झोलाछाप डाक्टर और दाई के पास जाते हैं जहां असुरक्षित गर्भपात कराया जाता है. कई बार यह जानलेवा साबित हो जाता है.

ऐसी तमाम परेशानियां औरतों को ही भुगतनी पड़ती हैं, इस मानसिकता को आप कैसे देखती हैं?

हमारे देश में पुरुषवादी मानसिकता हर जगह हावी होती है. गर्भ का सब से अधिक जिम्मेदार पुरुष होता है. हमारे पास कई महिलाएं आती हैं, उन का कहना होता है कि उन का पुरुष साथी ऐसे उपाय नहीं करना चाहता. पुरुष और महिला दोनों को ही यह बात समझाने की जरूरत है कि गर्भ को रोकने के लिए गर्भ निरोधक साधनों का प्रयोग करें. सोचने वाली बात है कि समाज में गर्भपात तो बहुत हो रहे हैं पर नसबंदी नहीं हो रही है. यह औरतों पर अत्याचार और भेदभाव का एक तरीका माना जा सकता है.

क्या सैक्स एजुकेशन से कोई सुधार संभव है?

सैक्स एजुकेशन से सुधार किया जा सकता है. जरूरत इस बात की है कि सही सैक्स शिक्षा दी जाए. एक बार हम एक स्कूल में गए. लड़कियों से कहा गया कि वे सैक्स से जुडे़ सवाल लिख कर दें. हैरानी की बात थी कि कई लड़कियों ने सवाल पूछा कि आईपिल का प्रयोग कितनी बार कर सकते हैं? आईपिल खा कर गर्भ रोकने की बढ़ती प्रवृत्ति बताती है कि आईपिल का प्रयोग इमरजैंसी में नहीं होता, यह रैगुलर गर्भ निरोधक के रूप में इस्तेमाल हो रही है. अगर सैक्स एजुके शन होगी तो ऐसी परेशानियों से बचा जा सकता है. एक लड़की का सवाल था कि एड्स रोगी को किस करने से भी एड्स होने का खतरा होता है क्या? इन सवालों से पता चलता है कि स्कूली लड़केलड़कियों को जागरूक करने की जरूरत है. सैक्स एजुकेशन से सैक्स के बाद होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है जो आज के समाज की बड़ी जरूरत है.

2014 के पहले विपक्ष जैसा ही बिखराव था भाजपा में

तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा के लिए अपने सभी उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है. टीएमसी ने सभी 42 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं. इस को विपक्ष के बिखराव के रूप में देखा जा रहा है. इस के बाद भी कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन में बिखराव से इंकार करते कहा है कि ममता बनर्जी के साथ बातचीत चल रही है. जब तक नाम वापसी नहीं हो जाती गठबंधन की संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता.

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का मुख्य काम विपक्ष को एकजुट रखने का था. इंडिया गठबंधन बना कर कांग्रेस ने इस काम को काफी हद तक पूरा भी किया है. कांग्रेस ने कमोवेश इंडिया गठबंधन के हर सहयोगी का ध्यान रखते हुए सीटों का बंटवारा किया. राहुल और सोनिया गांधी की रणनीति यह थी कि विपक्ष को बंटने न दें. इस का पूरी तरह से कांग्रेस ने पालन किया है. इस के बाद भी जो बिखराव दिख रहा है वह चुनाव आतेआते खत्म हो जाएगा.

कुछ भी मुमकिन है

जैसा बिखराव आज कांग्रेस के साथ दिख रहा है 10 साल पहले 2014 के लोकसभा चुनावों के समय यही बिखराव भाजपा के सामने था. भाजपा में इस बात को ले कर विरोध था कि किस का चेहरा पीएम फेस बने. सब से अधिक चर्चा 2004 और 2009 के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी को ले कर हो रही थी. उन की उम्र को ले कर सवाल थे. दूसरे नम्बर पर राजनाथ सिंह थे जो उस समय के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. इस के बाद के कई और नाम जैसे नितीन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी के थे.

जब नरेंद्र मोदी को पीएम फेस बनाया गया तो जदयू जैसे उस के सहयोगी नाराज हो गए. जदयू नेता नीतीश कुमार का मानना था कि नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात दंगो का दाग लगा है ऐसे में मुसलिम वर्ग और जो कट्टर हिंदू नहीं है वह वोट नहीं करेगा. भाजपा के नेता भी यही मान कर चल रहे थे कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को बहुमत नहीं मिलेगा. पीएम फेस बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने चुनावी मैनेजमेंट इस तरह का रखा कि भाजपा बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई.

2014 में भाजपा को 31 प्रतिशत 2019 में 36 प्रतिशत वोट मिला था. इस का अर्थ है कि 60 प्रतिशत देश की जनता ने भाजपा को वोट नहीं दिया. यह वोट बिखराव का शिकार होता रहा है. 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की पहली जिम्मेदारी थी कि वोट के इस बिखराव को रोका जाए. इस के लिए कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन बनाया. पूरे देश में बिखरे पड़े दलों को एक मंच पर लाने का काम किया.

भाजपा ने इस बात से डर कर इस गठबंधन को तोड़ने का हर संभव प्रयास किया. भाजपा को सफलता तब मिली जब जदयू नेता नीतीश कुमार इडिया गठबंधन छोड़ कर वापस भाजपा के एनडीए में शामिल हो गए. उत्तर प्रदेश में बसपा को भी डराया गया. जिस से वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी. मीडिया मैनजमेंट के जरिए इंडिया गठबंधन के विरोध को बढ़ाचढ़ा कर दिखाया गया. सीट बंटवारे की खबरों को हाईलाइट किया गया.

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष भी जरूरी

कांग्रेस को ले कर यह बारबार कहा गया कि वह सहयोगी दलों के दबाव में काम कर रही है. इस के बाद भी कांग्रेस ने पूरे संयम से काम लिया. गठबंधन को बनाए रखने के लिए सहयोगी दलों को पूरा मौका दिया. कांग्रेस की कोशिश है कि वोट के बंटवारे को रोका जा सके. इसलिए वह बहुत संभल संभल के कदम रख रही है.

हो सकता है कि कांग्रेस भाजपा को सत्ता से हटाने में सफल न हो सके. उस का दूसरा प्रयास यह है कि मजबूत विपक्ष का किरदार निभाए. 2019 में भी लोकसभा में कई बार ऐसे अवसर आए जहां विपक्ष मजबूत दिखा. 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष मजबूत और एकजुट रहे यह भी भाजपा के खिलाफ प्रमुख रणनीति है.

जब तक चुनाव खत्म नहीं होते तब तक कुछ भी बदलाव हो सकता है. राजनीति में चुनावी परिणाम हवा के रूख में बदल जाते हैं. इंडिया गठबंधन ने भाजपा के सामने वोट के बिखराव को रोक दिया है, जिस से चुनौती कठिन हो गई है. जनता यह नहीं कह सकती की विपक्ष ने कुछ किया ही नहीं है.

कांग्रेस और उस के सहयोगी दलों की मेहनत दिख रही है. विपक्ष को एकजुट करने और लड़ाई को कठिन बनाने तक कांग्रेस सफल हो गई है. अभी भाजपा और उस के गठबंधन के तमाम टिकट बंटने हैं. टिकट बांटना एक बड़ा काम है. यहां का विरोध भी भाजपा को कमजोर कर सकता है. यहां से भी चुनाव का रूख बदल सकता है. जब तक नाम वापसी नहीं हो जाती चुनाव के रूख को ले कर साफतौर पर कुछ भी कहना बेमानी होगा.

इलैक्टोरल बौन्ड पर एसबीआई को झटका, कल तक चाहिए सुप्रीम कोर्ट को जानकारी

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद भी इलैक्टोरल बौंड की जानकारी न देने पर 11 मार्च को स्टेट बैंक औफ इंडिया (एसबीआई) को कोर्ट के भीतर जिस तरह फटकार पड़ी है, वह बेहद शर्मनाक है. कोर्ट ने एसबीआई द्वारा और समय मांगे जाने वाली याचिका को खारिज कर 12 मार्च को सारी जानकारी देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि कल तक अगर जानकारी नहीं दी गई तो कोर्ट एसबीआई पर अवमानना का केस चलाएगी.

गौरतलब है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने इलैक्टोरल बौन्ड को असंवैधानिक बताते हुए उसे रद्द कर दिया था और स्टेट बैंक औफ इंडिया जो इलैक्टोरल बौन्ड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक है, को निर्देश दिया था कि वह 6 मार्च 2024 तक 12 अप्रैल, 2019 से ले कर अब तक खरीदे गए समस्त इलैक्टोरल बौन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को उपलब्ध कराए ताकि चुनाव आयोग उसे अपनी वेबसाइट पर अपलोड के सके. चुनाव आयोग को इलैक्टोरल बौंड से संबंधित तमाम जानकारी 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर जारी करनी थी. मगर एसबीआई ने और समय की मांग करते हुए कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को खूब खरीखरी सुनाई. चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा, “आप को कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए. कृपया आप मुझे बताएं कि आप 26 दिनों से क्या कर रहे थे? आप के हलफनामे में इस पर एक शब्द नहीं लिखा गया है. बौन्ड खरीदने वाले के लिए एक केवाईसी होती थी तो आप के पास खरीदने वाले की जानकारी तो है ही. फिर दिक्कत कहां है?

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने जानकारी मांगी थी कि कितने इलैक्टोरल बौंड्स किनकिन पार्टियों के लिए खरीदे गए और किस ने खरीदे, मगर एसबीआई ने जानकारी नहीं दी. एसबीआई की तरफ से कोर्ट में पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने जानकारी उपलब्ध कराने के लिए समय 30 जून तक का समय मांगा तो सुप्रीम कोर्ट भड़क उठा. कोर्ट ने कहा कि जो काम 24 घंटे में हो सकता है उस के लिए महीनों का समय क्यों?

इस पर हरीश साल्वे ने कहा इस बात में कोई दोराय नहीं है कि हमारे पास जानकारी है. डोनर्स से मिलान करने में वक्त लगेगा. साल्वे की बात पर जस्टिस संजीव खन्ना ने नाराज होते हुए कहा कि जानकारी अगर सील कवर में है तो उस सील कवर को खोलिए और जानकारी दीजिए.

बता दें कि इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीरआर गावई, जस्टिस जबी पार्दीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच कर रही है. एसबीआई जिस तरह चुनावी बौंड से संबंधित जानकारी देने में ही लापरवाही कर रही है उस से कोर्ट भड़का हुआ है.

एसबीआई चाहता है कि लोकसभा चुनाव हो जाएं, उस के बाद यह खुलासा हो, मगर कोर्ट का आदेश उस की गर्दन पर खंजर की तरह आ टिका है. अब बैंक भारतीय जनता पार्टी की चाकरी बजाए या कोर्ट का आदेश माने, इस ऊहापोह में घिर गया है. उस के पास 24 घंटे से भी कम समय है.

दरअसल इलैक्टोरल बौंड के मामले में एसबीआई नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की गर्दन फंसी हुई है. लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और ऐसे में अगर ये पोल पट्टी खुल गई कि कौन कौन उद्योगपति, पूंजीपति, व्यापारी, धंधेबाज, रसूखदार, एनआरआई, भारतीय जनता पार्टी की तिजोरियां भरते रहे हैं और बदले में उस से क्याक्या फायदे उठाते रहे हैं, तो भारतीय राजनीति में भूचाल आ जाएगा. विपक्ष को बहुत बड़ा मुद्दा मिल जाएगा और देश की जनता के सामने भारतीय जनता पार्टी की “ईमानदारी” का भंडाफोड़ हो जाएगा. यह खुलासा लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत गिरा सकता है. ऐसे में एसबीआई पर मोदी सरकार द्वारा जानकारी न देने जबरदस्त दबाव है.

कांग्रेस का आरोप है कि एसबीआई ऐसा इलैक्टोरल बौंड स्कीम की सब से बड़ी लाभार्थी भाजपा की छवि बचाने के लिए कर रही है. राहुल गांधी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “एक क्लिक पर निकाली जा सकने वाली जानकारी के लिए 30 जून तक का समय मांगना बताता है कि दाल में कुछ काला नहीं है, बल्कि पूरी दाल ही काली है.”

पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग भी कहते हैं कि एसबीआई सिर्फ बहाना बना रही है. बैंक को सिर्फ 3 आधारभूत जानकारी कोर्ट को देनी है कि किस ने बौंड खरीदा, कितने का बौंड खरीदा और कब खरीदा. ऐसे ही बौंड किस को मिला, कितने का मिला और कब मिला, यह जानकारी देनी है. यह सब जानकारी एसबीआई के कम्प्यूटर्स पर हर वक्त उपलब्ध होती है. इस जानकारी को इकट्ठा कर कोर्ट के सामने पेश करने के लिए महीनों का समय नहीं, बल्कि सिर्फ 10 मिनट का वक़्त चाहिए.

बता दें कि जब मोदी सरकार इलैक्टोरल बौंड स्कीम तैयार कर रही थी, उस वक्त सुभाष गर्ग इकोनौमिक अफैयर्स सेक्रेटरी थे. एसबीआई सरकार को इलैक्टोरल बौंड्स से जुड़ा डाटा देती रही है. वह बिक्री की प्रत्येक विंडो अवधि के बाद केंद्रीय वित्त मंत्रालय को रेगुलर ऐसी जानकारी भेजती थी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें