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गरमी में भी विटामिन डी के लिए धूप जरूरी

वालेंसिया के पौलिटैक्निक विश्वविद्यालय में सौर विकिरण अनुसंधान समूह के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया. अध्ययन के निष्कर्षों को जर्नल औफ द टोटल एनवायरनमैंट में प्रकाशित किया गया. शोध के अनुसार बसंत और ग्रीष्मकाल में विटामिन डी के लिए धूप में 10 से 20 मिनट बैठना पर्याप्त है. लेकिन सर्दी में एक व्यक्ति को विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा लेने के लिए कम से कम 2 घंटे बैठने की आवश्यकता होती है. सर्दी और गरमी के बीच यह अंतर इसलिए है क्योंकि सर्दी में हमारी बौडी सिर्फ 10 फीसदी ही सूर्य की किरणों के संपर्क में आ पाती है. इसलिए सर्दी में विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा प्राप्त करने में अधिक समय लगता है. वहीं गरमी में हमारे शरीर का 25 फीसदी भाग सूर्य के प्रकाश के संपर्क में होता है और हमें पोषक तत्त्वों को अवशोषित करने के लिए कम समय की आवश्यकता होती है.

दरअसल सूरज की किरणें विटामिन डी प्राप्त करने का सब से आसान और जबरदस्त स्त्रोत होती हैं. धूप में कुछ देर बैठ कर आसानी से विटामिन डी प्राप्त किया जा सकता है. यह हमारे शरीर के लिए एक बहुत ही आवश्यक पोषक तत्त्व है. जबकि इस विटामिन की कमी न सिर्फ अधिकतर भारतीयों में बल्कि दुनियाभर के लोगों में देखी जाती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोग गरमी में अलगअलग कारणों से जैसे कि टैनिंग होने का डर, सनबर्न और शरीर में बेचैनी आदि के चलते धूप में नहीं बैठते हैं.

जब शरीर में इस विटामिन की कमी होने लगती है तो शरीर के अंग अलगअलग तरह से प्रभावित होने लगते हैं. हम इस पोषक तत्त्व को भोजन से पर्याप्त रूप से प्राप्त नहीं कर सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि विटामिन डी को धूप में बैठ कर ग्रहण किया जाए भले ही मौसम गरमी का हो या सर्दी का.

शरीर के लिए कितना जरूरी है विटामिन डी

जब हमारी त्वचा धूप के संपर्क में आती है तो यह कोलैस्ट्रौल के साथ मिल कर विटामिन डी बनाती है. यह पोषक तत्त्व शरीर में कैल्शियम और फोस्फेट के अवशोषण के लिए भी महत्त्वपूर्ण है. यह आप के दांतों और हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है. विटामिन डी की कमी से हड्डियों, कमजोर मांसपेशियों, रिकेट्स और औस्टियोपोरोसिस जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती हैं.

विटामिन डी एक ऐसा विटामिन है जो कि जो शरीर में मैसेजिंग पावर बढ़ाने में मदद करता है, यानी कि यह विटामिन आप के लिए न्यूरोट्रांसमीटर की तरह काम करता है और ब्रेन से ले कर शरीर के हर अंग तक मैसेजिंग का काम करता है.

इस के अलावा यह हार्मोनल हैल्थ को भी बेहतर बनाने में मदद करता है. जिन लोगों में इस विटामिन की कमी होती है उन की मानसिक सेहत प्रभावित हो जाती है. साथ ही, विटामिन डी शरीर में डोपामाइन के लैवल को भी प्रभावित करता है और डिप्रैशन जैसे मनोरोगों का कारण बन सकता है. ऐसे में जरूरी है कि आप विटामिन डी की कमी से बचें और धूप इस काम में मदद कर सकती है.

रोजाना सुबह की धूप लेने से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से भी बचा जा सकता है. सूरज की किरणों में एंटी कैंसर तत्त्व मिले होते हैं जिन से व्यक्ति को कैंसर का खतरा कम हो जाता है. इस के साथ ही जिन लोगों को कैंसर हैं वे भी धूप में आराम कर सकते हैं. लेकिन ध्यान रखें कि सही समय पर ही धूप लें. सूरज की रोशनी में कई ऐसे गुण पाए जाते हैं जो शरीर में मौजूद इंफैक्शन से लड़ने में हमारी मदद करते हैं. धूप सेंकने से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है. शरीर का ब्लड सर्कुलेशन सही रहता है. शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर एनर्जेटिक रहता है.

धूप के अलावा विटामिन डी के अन्य स्रोत

यह कहना गलत नहीं होगा कि बहुत कम ऐसी चीजें हैं जिन में विटामिन डी होता है. ओकरा, डेयरी उत्पाद और मशरूम में विटामिन डी पाया जाता है. विटामिन डी का डेली रिकमेंडेशन डाइटरी इनटेक (आरडीआई) लैवल 70 वर्ष से कम उम्र के लोगों के लिए 600 आईयू और 70 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए 800 आईयू है. रोजाना कुछ समय धूप में बिताने से आप का शरीर पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी बना सकता है और रोजाना की जरूरत पूरी कर सकता है.

विटामिन डी की कमी होने के कारण

विटामिन डी की कमी होने के कई कारण हैं, मसलन गरमी में बाहर धूप में निकलने से बचना, बदन ढकने वाले पहनावे और सिटिंग जौब करने की मजबूरी.

गरमी के मौसम में अकसर लोग धूप में निकलने से बचते हैं क्योंकि सुबह से ही धूप में काफी गरमी होती है. यही नहीं, शरीर को धूप का फायदा मिले, इस के लिए शरीर के एकतिहाई हिस्से का धूप में एक्सपोजर जरूरी होता है. लेकिन भारतीय पहनावे में शरीर का अधिकांश हिस्सा ढका रहता है जिस वजह से शरीर को जरूरी धूप और धूप से मिलने वाली विटामिन डी नहीं मिल पाती.

इस के अलावा इन दिनों सिटिंग जौब का प्रचलन बढ़ गया है. लोग एसी कार या मैट्रो में औफिस आते हैं. दिनभर एसी केबिन में बैठेबैठे काम करते हैं और देर शाम को घर जाते हैं. इस लाइफस्टाइल में उन्हें धूप में निकलने का मौका ही नहीं मिलता.

सही समय महत्त्वपूर्ण

गरमी में सुबह का वक्त धूप लेने के लिए सब से सही माना जाता है. रोजाना सुबह 6 बजे से 9.30 के बीच आप कभी भी 15-20 मिनट तक धूप लें तो यह पर्याप्त होता है. जिस दिन तापमान बहुत अधिक हो उस दिन दोपहर में धूप में निकलने से बचना चाहिए क्योंकि इस से सनबर्न से ले कर स्किन कैंसर जैसी समस्याएं हो सकती हैं. लू लगने का भी खतरा रहता है.

शहरों में धूप कैसे लें

शहरों में ज्यादातर लोगों के घर कई मंजिला होते हैं और आसपास सटे हुए होते हैं जिस से बालकनी, छत या गार्डन में धूप लेना संभव नहीं हो पाता. ऐसे में अगर घर से बाहर निकलना मुमकिन नहीं है तो खिड़की के पास खड़े हो कर भी धूप ली जा सकती है. खिड़कियों के परदे और शेड्स रोजाना कुछ घंटों के लिए खुले छोड़ दें ताकि धूप और ताजी हवा घर के अंदर आ सके.

कांच की खिड़कियां हमेशा साफ रखें ताकि उन के जरिए धूप घर के अंदर आ सके. कांच पर जमी धूल रोशनी के समुचित आगमन को रोकती है. सूरज की रोशनी का प्रभाव बढ़ाने के लिए दीवारों पर हलके रंगों के पेंट का इस्तेमाल करें. ये पेंट सूरज की रोशनी को कमरे में बिखेरते हैं. खिड़की के सामने की दीवार पर बड़े आकार का शीशा लगाएं. इस से कमरे में दाखिल होने वाली धूप रिफ्लेक्ट हो कर बिखर जाएगी.

चिड़िया खुश है: बड़े घर की बहू बनते ही अपनी पहचान भूल गई नमिता

नमिता और अजय की आज शादी है. हमारे शहर के सब से बड़े उद्योगी परिवार का बेटा है अजय, जो अमेरिका से पढ़ाई पूरी कर के अपना कारोबार संभालने हिंदुस्तान आ गया है. अजय के बारे में अखबारों में बहुत कुछ पढ़ने को मिला था. उस की उद्योग विस्तार की योजना, उस की सोच, उस की दूरदृष्टि वगैरहवगैरह और नमिता, हमारे साथ पढ़ने वाली बेहद खूबसूरत लड़की. नमिता की खूबसूरती और उस के कमिश्नर पापा का समाज में रुतबा, इसी के बलबूते पर तो यह शादी तय हुई थी.

कला, काव्य, संगीत आदि सारे रचनात्मक क्षेत्रों में रुचि रखने वाली और पढ़ाई कर के कुछ बनने की चाह रखने वाली नमिता ने अजय जैसा अमीर और पढ़ालिखा वर पाने के लिए अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ दी. रईस खानदान में शादी की तुलना में पढ़ाई का कोई महत्त्व नहीं रहा.

शादी में पानी की तरह पैसा बहाया गया. शादी के फोटो न केवल भारत में बल्कि विदेशी पत्रिकाओं में भी छपवाए गए. नमिता की खूबसूरती के बहुत चर्चे हुए. नवविवाहित जोड़ा हनीमून के लिए कहां गया, इस के भी चर्चे अखबारों में हुए. फिर आए दिन नमिता की तसवीरें गौसिप पत्रिकाओं में छपने लगीं. लोग उसे रईस कहने लगे और वह पेज 3 की सदस्य बन गई.

एक दिन उस्ताद जाकिर हुसैन का तबलावादन का कार्यक्रम हमारे शहर में था. हम दोस्तों ने नमिता को फोन किया और पूछा, ‘‘चलोगी उस्ताद जाकिर हुसैन का तबला सुनने?’’

हंस कर वह बोली, ‘‘मैं तो कल शाम ही उन से मिलने होटल में गई थी. हमारे बिजनैस हाउस ने ही तो यह कार्यक्रम आयोजित किया है. आज रात उन का खाना हमारे घर पर है. अजय चाहते हैं घर की सजावट खास भारतीय ढंग से हो और व्यंजन भी लजीज हों. इसलिए आज मुझे घर पर रह कर सभी इंतजाम देखने होंगे. आप लोग तबलावादन सुन कर आओ न. हां, आप लोगों को फ्री पास चाहिए तो बताना, मैं इंतजाम कर दूंगी.’’

हम दोस्तों ने उस का आभार मानते हुए फोन रख दिया.

एक दिन पेज 3 पर हम ने उस की तसवीरें देखीं. बेशकीमती साड़ी पहने, मेकअप से सजीधजी गुडि़या जैसी नमिता अनाथालय के बच्चों को लड्डू बांट रही थी. ऐसे बच्चे, जो एक वक्त की रोटी के लिए किसी के एहसान के मुहताज हैं. उन के पास जाते हुए कीमती साड़ी व गहने पहन कर जाना कितना उचित था? वह चाहे गलत हो या सही, मगर बड़े उद्योगी परिवार की सोच शायद यही थी कि बहू की फोटो अनाथों के साथ छपेगी तो वह ऐसी ही दिखनी चाहिए.

उस के जन्मदिन पर बधाई देने के लिए हम ने उसे फोन मिलाना चाहा. काफी देर तक कोई जवाब नहीं मिला, तो हम ने सोचा नमिता अजय के साथ अपना जन्मदिन मना रही होगी. दोनों कहीं बाहर घूमने गए होंगे.

2 घंटे बाद उस का फोन आया, ‘‘मैं तो फलां मंत्रीजी की पत्नी के साथ चाय पार्टी में व्यस्त थी.’’

‘‘मगर उस मंत्री की बीवी के साथ तुम क्या कर रही थीं, वह भी आज के दिन? काफी देर तक तुम ने फोन नहीं उठाया, तो हमें लगा तुम और अजय कहीं घूमने गए होगे.’’

‘‘नहीं रे, अजय एक नई फैक्टरी शुरू करना चाहते हैं. कल उसी फैक्टरी के प्रोजैक्ट की फाइल मंत्रीजी के दफ्तर में जाने वाली है. सब काम सही ढंग से हो जाए, इस के लिए मंत्रीजी की पत्नी से मैं मिलने गई थी. जब पापा कमिश्नर थे, तब इन मंत्रीजी से थोड़ीबहुत जानपहचान थी. अजय कहते हैं, ऐसे निजी संबंध बड़े काम आते हैं.’’

‘‘फिर भी नमिता… शादी के बाद अजय के साथ यह तुम्हारा पहला जन्मदिन है?’’

‘‘अजय ने तो सवेरे ही मुझे सरप्राइज गिफ्ट दे कर मेरा जन्मदिन मनाया. पैरिस से मेरे लिए औरेंज कलर की साड़ी ले कर आए थे.’’

‘‘नमिता, औरेंज कलर तो तुम्हें बिलकुल पसंद नहीं है. क्या वाकई तुम्हें वह साड़ी अच्छी लगी?’’ हम ने पूछा.

‘‘अजय चाहते थे कि मैं औरेंज कलर के कपड़े पहन कर मंत्रीजी की पत्नी से मिलने जाऊं. मंत्रीजी बीजेपी के हैं न.’’

शादी को 1 साल हो गया, तो नमिता के बंगले के लौन में ही बड़ी सी पार्टी का आयोजन था. हम दोस्तों को भी नमिता ने न्योता भेजा, तो हम सारे दोस्त उसे बधाई देने उस के बंगले पर पहुंचे. बंगले के सामने ही बड़ी सी विदेशी 2 करोड़ की गाड़ी खड़ी थी.

नमिता ने चहकते हुए कहा, ‘‘डैडीजी, यानी ससुरजी ने यह कार हमें तोहफे में दी है.’’

‘‘नमिता, तुम्हें तो जंगल ट्रैक में ले जाने लायक ओपन जीप पसंद है.’’

‘‘हां, मगर अजय कहते हैं ऐसी जीप में घूमना फूहड़ लगता है. यह रंग और मौडल अजय ने पसंद किया और डैडी ने खरीद ली. अच्छी है न?’’

पार्टी में ढेरों फोटो खींचे जा रहे थे. गौसिप मैगजीन में अब चर्चे होंगे. नमिता ने किस डिजाइनर की साड़ी पहनी थी, कौन से मेक के जूते पहने थे, कौन से डायमंड हाउस से उस का हीरों का सैट बन कर आया था वगैरहवगैरह…

मम्मीडैडी की पसंद ऐसी है, अजय ऐसा चाहते हैं, अजय वैसा सोचते हैं, पार्टी का आयोजन कैसा होगा, मेन्यू क्या होगा, यह सब कुछ जैसा अजय चाहते हैं वैसा होता है, हम ने नमिता से सुना.

दया आई नमिता पर. नमिता, एक बार अपने अंदर झांक कर तो देखो कि तुम क्या चाहती हो? तुम्हारा वजूद क्या है? तुम्हारी अपनी पहचान क्या है? तुम किस व्यक्तित्व की मलिका हो?

शादी के बाद मात्र एक दिखावटी गुडि़या बन कर रह गई हो. अच्छे कपड़े, भारी गहने, बेशकीमती गाडि़यों में घूमने वाली रईस. मंत्री की पत्नी तक पहुंचने का एक जरिया. यह सब जो तुम कर रही हो, इस में तुम्हारी सोच, चाहत, पसंदनापसंद कहां है? तुम तो एक नुमाइश की चीज बन कर रह गई हो.

फिर भी तुम खुश हो? इंसान पढ़लिख कर अपनी सोच से समाज में अपना स्थान, अपनी पहचान बनाना चाहता है. शादी के बाद अमीरी के साथसाथ समाज में रुतबा तो तुम्हें मिल गया. फिर अपने सोचविचारों से कुछ बनने की, अपना अस्तित्व, अपनी पहचान बनाने की तुम ने जरूरत ही नहीं समझी? दूसरों की सोच तुम्हारा दायरा बन कर रह गई. दूसरों का कहना व उन की पसंदनापसंद को मानते हुए तुम चारदीवारी में सिमट कर रह गईं.

चिडि़या जैसी चहकती हुई नमिता पार्टी में इधरउधर घूम रही थी. मोतियों का चारा पा कर यह चिडि़या बहुत खुश थी. चांदी की थाली में खाना खाते हुए उसे बड़ा आनंद आ रहा था.

अपनी उपलब्धि पर इतराती नमिता अपनेआप को बड़ी खुशकिस्मत समझती थी. नमिता को देख कर ऐसा लगता था, उस की खुशी व चहचहाना इसलिए है, क्योंकि वह समझ नहीं रही है कि वह सोने के पिंजरे की चिडि़या बन गई है. यहां उस के लिए अपनी सोच की उड़ान भरना नामुमकिन है.

अपनी पसंदनापसंद से जिंदगी जीने की उसे इजाजत नहीं है. खुद की जिंदगी पर वह अपने व्यक्तित्व की मुहर नहीं लगा सकती. अपनी जिंदगी पर उस का कोई अधिकार नहीं है.

सोने के पिंजरे में बंद वह बड़ी खुशहाल जिंदगी बिता रही है, लेकिन वह अपनी पहचान मिटा रही है. सोने के पिंजरे में यह चिडि़या इसलिए बहुत खुश है, क्योंकि इसे अपनी कैद का एहसास नहीं है.

एकल महिलाओं के लिए मनी मैनेजमैंट है बेहद जरूरी

सशक्तीकरण एवं स्वतंत्रता का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है वित्तीय स्वतंत्रता. इस से एक प्रगतिशील समाज का निर्माण होता है और समाज से जुड़े सभी जनों का भविष्य उज्ज्वल होता है. आज जीवन के हर क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने के लिए महिलाएं कड़ी मेहनत कर रही हैं. ऐसे में उन के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे लंबे समय तक अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बनाए रखें.

यद्यपि लंबे समय के लिए वित्तीय स्वतंत्रता प्रदान करने लायक संपत्ति जुटाना तथा स्वयं के संसाधन निर्मित करने की एकमात्र वजह सशक्तीकरण ही नहीं होती. पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के वित्तीय संसाधन जल्दी चुक जाने की संभावनाएं कहीं ज्यादा होती हैं. भले ही यह वाक्य कठोर लगे, लेकिन सचाई यही है.

औसतन महिलाओं का जीवन सोपान पुरुषों की तुलना में अधिक लंबा होता है. इस का सीधा अर्थ है कि महिलाओं के सामने आर्थिक समस्याएं पैदा होने के खतरे भी वास्तव में अधिक होते हैं. स्पष्ट है कि महिलाओं को अपने स्वास्थ्य की देखभाल तथा सेवानिवृत्ति का इंतजाम करने के लिए अधिक मेहनत करने की आवश्यकता होती है.

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विकास के तमाम दावों के बावजूद आमतौर पर महिलाओं को आज भी पुरुषों के मुकाबले कम भुगतान किया जाता है. इसे यों भी समझा जा सकता है कि महिलाओं की जेब में खर्च करने के लिए अपेक्षाकृत कम पैसे बचते हैं. थोड़ी देर के लिए यह भी मान लिया जाए कि वे पुरुषों के बराबर ही पैसे खर्च करती हैं तब भी इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि आरामदायक और कर्जमुक्त जीवन बिताने के लिए अपनी सेवानिवृत्ति, आपातकालीन कोष, निवेश तथा अन्य वित्तीय उपायों हेतु बचत करने के लिए उन के हाथ में पैसे कम ही पड़ जाते हैं.

यह स्थिति मुसीबतों की काली घटा जैसी लग सकती है, लेकिन कहते हैं न कि जहां अंधेरा है वहीं रोशनी भी है और यहां तो रोशनी की एक बहुत बड़ी लकीर सामने है तेजी से बदल रहे सामाजिक, आर्थिक माहौल से फूटने वाले अवसरों की रोशनी.

भारत में 2008 से 2014 के काल से स्नातक की उपाधि ग्रहण करने वाली महिलाओं का प्रतिशत दोगुना हो गया है. इस दौरान उन की आय में भी 20% से अधिक का इजाफा हुआ है. सामाजिकआर्थिक परिस्थितियों में आए इन सुधारों के चलते कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी है जिस के फलस्वरूप संभावनाओं में भी वृद्घि हुई है. सामाजिकआर्थिक माहौल में आया यह बदलाव महज उच्च वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि हकीकत यह है कि आज भारत में

30 लाख से ज्यादा सूक्ष्म, लघु एवं मझोलेउद्यम पूर्ण या आंशिक रूप से महिलाओं की मिल्कीयत हैं. उन की यह उद्यमिता 4-5% की वार्षिक दर से बढ़ती जा रही है.

महिलाओं के लिए ज्यादा वित्तीय स्थिरता और कैरियर की नित नई बढ़ती संभावनाएं उन्हें धनसंपत्ति जुटाने में सक्षम बना रही हैं. ऐसे में उन की जिंदगी के लिए बेहतर वित्तीय नियोजन समझाना आज की जरूरत बन गई है.

‘योजना’ शब्द का सीधा सा मतलब है कि भविष्य को वर्तमान में उतार लाया जाए ताकि हम ‘अभी’ से उस की तैयारी कर सकें.

अभी से तैयारी करें

महिलाओं को चाहिए कि वे अपने सामर्थ्य तथा आमदनी बंद होने पर उत्पन्न होने वाले जोखिम का वास्तविक आकलन करें. वित्तीय नियोजन का पहला कदम है अपने मोल का अनुमान लगाना और उसे बचा कर रखना. महिलाओं को चाहिए कि वे जीविका और जीवनशैली प्रभावित करने वाली अप्रत्याशित परिस्थितियों से स्वयं की और अपने प्रियजनों (इन में बूढे़ मांबाप भी शामिल हैं) की सुरक्षा के लिए पर्याप्त जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा कराएं. अपने परिवार के लिए सब से निस्स्वार्थ निवेश अगर कोई है तो वह है जीवन बीमा. महिलाओं को इस मामले में पहलकदमी जरूर करनी चाहिए.

महिलाओं को चाहिए कि वे अपने अंशदान पर भरोसा रखें और अपने भविष्य पर पड़ने वाले बोझ से बचने के उपाय करें. उन्हें अल्प समय के नकदी प्रवाह जैसेकि घर कि मरम्मत और छुट्टियां आदि, मध्यावधि नकदी प्रवाह जैसेकि कार खरीदना और दीर्घावधि नकदी प्रवाह जैसेकि सेवानिवृत्ति, कर्ज अदायगी आदि के लिए योजनाएं बनाने की जरूरत है. वित्तीय औजारों का एक समुच्चय इन जरूरतों को पूरा करने में सहायक है. इन कुछ औजारों में लिक्विड फंड, मनीबैक बीमा पौलिसी और सेवानिवृत्ति प्लानों का नाम लिया जा सकता है.

महिलाओं को सामने आ कर बड़ेबड़े सपने देखने चाहिए. अपने नाम पर खुद का मकान होने या अपना भविष्य सुरक्षित करने में आखिर गलत ही क्या है? वर्तमान आवश्यकताओं और सेवानिवृत्ति की योजनाओं पर समान ध्यान केंद्रित करना महिलाओं के लिए अनिवार्य है.

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अगर आप को लगता है कि पैसादाम के मामले में आप एक आत्मनिर्भर महिला हैं और आप की उम्र 40 के पार हो चुकी है, तो कृपया फौरन ये प्रश्न अपनेआप से अवश्य पूछें, क्योंकि आप के पास अगले 40 साल सुरक्षित करने के लिए अभी 15-20 साल और बाकी हैं:

क्या मेरे पास इस बात का वास्तविक अनुमान है कि मैं कितना कमाती हूं और कितना खर्च करती हूं?

अगर नहीं तो अपने लिए एक बजट बनाने वाला ऐप ले आएं और पाईपाई का हिसाब रखना शुरू करें. आप को यह जान कर आश्चर्र्य होगा कि आप की रोजाना वाली ब्रैंडेड कौफी साल भर में आप की जेब पर कितनी बड़ी चपत लगा रही है.

क्या मैं पैसे की ‘बचत’ करती हूं या निवेश?

जी हां, ये दोनों अलगअलग बातें हैं. आप यह मान कर चल सकती हैं कि खर्च न करना ही पैसे की बचत करना है. इस का सीधा अर्थ यह होगा कि आप का पैसा बैंक खाते में पड़ा है जिस पर मात्र 4% की सालाना ब्याज दर मिल रही है और उस पर टैक्स भी लगता है. अब खुद ही अंदाजा लगाएं कि 6% की सालाना महंगाई दर के हिसाब से तो आप के पैसे का मूल्य उलटा घट ही रहा है. इस के साथसाथ यह भी सोचिए कि अंततोगत्वा यह पैसा आप के कितने काम आएगा?

क्या मैं अगले 5 साल बाद से आगे की अपनी जिंदगी देख पा रही हूं?

हम में से ज्यादातर लोग 20-25 साल बाद की प्राथमिकताओं और खुद की जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर पाते (80 साल का होने की तो बात ही छोड़ दीजिए) हम अपने सपोर्ट सिस्टम खासतौर पर वित्तीय प्रणालियों की जरूरतों को कम कर के आंकते हैं. हम भावनात्मक और सामाजिक ढांचे निर्मित करते हुए अपना जीवन गुजार देते हैं, लेकिन धन की कीमत नहीं समझते. इसीलिए समय आ गया है कि आप अपनी सेवानिवृत्ति की योजनाओं पर गंभीरता से विचार करें.

क्या मैं ने अपने और अपने आश्रितों को किन्हीं आकस्मिक आपदाओं से सुरक्षित रखने की व्यवस्था की है?

अकसर हम यह मान कर चलते हैं कि एकल और 40 से ज्यादा की उम्र का होने का मतलब यह होता है कि हमारा कोई आश्रित ही नहीं है जबकि हमेशा यह सच नहीं होता. हमारे बूढ़े मांबाप हो सकते हैं, परिवार हो सकता है जिस की हम इतनी फिक्र करते हैं. सब से महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि हमें खुद की देखभाल की जरूरत सब से ज्यादा होती है.

महिलाओं को चाहिए कि वे अपनी वित्तीय योजनाओं को ले कर सचेत एवं दृढ़ निर्णय लें. इन में खुद के जीवन बीमा से ले कर अपने मातापिता के स्वास्थ्य की देखभाल से संबंधित जरूरतों की पूर्ति करने वाले उपाय शामिल हो सकते हैं. वर्तमान का खयाल रखने के साथसाथ महिलाओं को अपनी सेवानिवृत्ति के लिए एक सुरक्षित पैंशन योजना ले कर भविष्य भी संवारना चाहिए.

हर महिला को चाहिए कि वह अपनी आर्थिक सेहत का जायजा ले और इस के लिए सार्थक योजना बनाए.

– सोनिया नोतानी, इंडिया फर्स्ट लाइफ इंश्योरैंस

”एआई तो न्यूक्लियरर बम से भी ज्यादा खतरनाक’’- रोहित बोस रौय

विज्ञान वरदान और अभिशाप दोनों ही है. विज्ञान के क्षेत्र में नित नए प्रयोग होते जा रहे हैं, नित नईनई तकनीक सामने आ रही हैं. इन दिनों हर जगह ‘एआई’ यानी कि‘आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस’ की चर्चा हो रही है. लोग इसे ले कर काफी आशंकित हैं. बौलीवुड में तो बहुत बड़ा डर बैठा हुआ है. कहा जा रहा है कि अब ‘एआई’ का उपयोग धड़ल्ले से होगा और लेखकों व निर्देशकों की छुट्टी तय है. इन्हीं चर्चाओं के बीच फिल्मकार सैम भट्टाचार्जी ने एआई पर फिल्म ‘आइरा’ का निर्माण किया है. रोहित बोस रौय, राजेश शर्मा, करिश्मा कोटक व रक्षित भंडारी की प्रमुख भूमिकाओं वाली यह फिल्म यूरोप में फिल्माई गई है. 5 अप्रैल को सिनेमाघरों में पहुंचने वाली फिल्म ‘आइरा’ के संगीतकार समीर सेन हैं.

फिल्म के निर्देशक सैम भट्टाचार्जी कहते हैं, ‘‘तकनीक का जमाना है. अब लोग बंदूक के बजाय टैक्नोलौजी के साथ लड़ाई करते हैं. आज तकनीक, डेटा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए हैं. आज डेटा को किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, हमारी फिल्म एआई की इसी क्रांति के बारे में है. सब से पहले रोहित बोस रौय को मैं ने यह आइडिया सुनाया और मुझे खुशी है कि वे इस भूमिका को करने को तैयार हुए. ‘आइरा’ के वीएफएक्स पर 3 साल तक काम हुआ है. हम ने कुल 1,600 वीएफएक्स बनाए.’’

फिल्म ‘आइरा‘ में एआई तकनीक के दुरुपयोग पर रोशनी डाली गई है. फिल्म में हरी का मुख्य किरदार निभाने वाले अभिनेता रोहित बोस रौय कहते हैं, ‘‘यह फिल्म एआई के गलत इस्तेमाल के पहलू पर प्रकाश डालती है. मैं ने इस में हरी सिंह का किरदार निभाया है. अगर आप मेरे नाम को इंग्लिश में लिख कर उसे उलटा करेंगे तो फिल्म का नाम ‘आइरा’ होगा. हरी एआई तकनीक से ‘आइरा’ नामक ऐप क्रिएट करता है, जिस से कुछ भी रीक्रिएट किया जा सकता है. अगर यह ऐप गलत इंसान के हाथ में पड़ जाए तो क्या अंजाम होगा, फिल्म इसी बारे में है.

“कहानी के अनुसार एक दिन यह ‘ऐप’ गलत हाथों में पड़ जाती है, जिस के चलते हरी को ही कई मुसीबतों से जूझना पड़ता है. यहां तक कि एक दूसरा शख्स हरी बन कर लोगों के सामने पहुंच जाता है और लोग उसे ही हरी समझते हैं. फिल्म का क्लाइमैक्स जबरदस्त है जिस के बारे में मैं अभी से नही बता सकता.’’ रोहित बोस रौय आगे कहते हैं, ‘‘यह फिल्म मेरे लिए बहुत खास है जिस में मेरा किरदार केंद्रीय किरदार है. इस तरह के जौनर का सिनेमा करना और लगभग पूरी फिल्म वीएफएक्स के माध्यम से करना मेरा पहला अनुभव रहा. मेरे बहुत सारे सीन वीएफएक्स के हैं, जहां मुझे हवा में डायलौग बोलना था. शूटिंग के दौरान मैं ने निर्देशक से पूछा था कि मैं संवाद किस के सामने बोल रहा हूं तो उन्होंने कहा कि अभी ‘ब्रेन’ आएगा, जिसे तुम ने क्रिएट किया है यानी कि डेटाबैंक.
“पूरी फिल्म मेरे कंधों पर है. फिल्म एआई के बैकड्रौप पर है मगर इस में रोमांस, ड्रामा, रोमांच, गाने सबकुछ हैं. फिल्म का सस्पैंस जबरदस्त है. अंतिम 5 मिनट का क्लाइमैक्स दर्शकों को देखना होगा. लंदन में इस की शूटिंग का अनुभव यादगार रहा.’’

एआई को न्यूक्लियर बम से भी ज्यादा खतरनाक बताते हुए रोहित बोस रौय कहते हैं, ‘‘एआई तकनीक के फायदे भी हैं. अकसर होता यह है कि जब हमारा अपना कोई प्रिय इस संसार से चला जाता है, तो हम उन की याद में उन की तसवीर लगा लेते हैं या उन के पुराने वीडियो देख लेते हैं. पर एआई के माध्यम से आप उस इंसान को ‘रीक्रिएट’ कर सकते हैं. और वह पूरी जिंदगी आप के बगल में रहेगा.
“पहले की ही तरह आप उस से बातें भी कर सकते हैं लेकिन आप उसे छू नहीं सकेंगे, क्योंकि वह इस संसार में है नहीं. वह तो एक छाया की तरह ही रहेगा. एआई का उपयोग करने से वह इंसान हूबहू वैसा ही होगा जैसा पहले था. पर जब यह ऐप किसी गलत इंसान के हाथ में पड़ जाए, तो ‘आइरा’ जैसी फिल्म बनती है. लेकिन मेरी राय में ‘एआई’ को ले कर लोगों के बीच जागरूकता लाना अति आवश्यक है.

“एआई का उपयोग कर कोई भी इंसान कितना भी बड़ा स्कैम कर सकता है. मेरा मानना है कि ‘एआई’ तो ‘न्यूक्लियर बम’ से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि न्यूक्लियर बम जिस जगह गिरता है, वह वहां और उसके आसपास के क्षेत्र में ही नुकसान करता है. मगर ‘एआई’ किसी गलत इंसान के हाथ लग जाए, तो वह किसी भी गांव के एक कमरे में बैठ कर पूरे विश्व को नुकसान पहुंचा सकता है. एआई का उपयोग करना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. माना कि इस के फायदे हैं, मगर यह आगे चल कर नुकसान ज्यादा पहुंचाएगा.’’

मुझे 4 साल से फाइब्रौयड की समस्या है, इसके लिए क्या इलाज है?

सवाल

मैं 38 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. मुझे 4 वर्षों से फाइब्रौयड की समस्या है. इस के लिए क्या उपचार उपलब्ध है?

जवाब

अगर कोई लक्षण न नजर आए और फाइब्रौयड के कारण रोजमर्रा का जीवन प्रभावित न हो तो किसी उपचार की आवश्यकता नहीं है. यहां तक कि अगर किसी महिला को पीरियड्स के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होता है, लेकिन उस की जीवनशैली प्रभावित नहीं होती है तब भी उपचार की आवश्यकता नहीं है.

जब उपचार जरूरी हो और दवा काम न करे तब मरीज को सर्जरी कराने की सलाह दी जाती है:

हिस्टेरेक्टोमी: इस में सर्जरी के द्वारा पूरे गर्भाशय को निकाल दिया जाता है.

मायोमैक्टोमी: गर्भाशय की दीवार से फाइब्रौयड को सर्जरी के द्वारा निकाल दिया जाता है.

ऐंडोमैट्रियल ऐब्लैशन: इस में गर्भाशय की सब से अंदरूनी परत को निकाल दिया जाता है. इस प्रक्रिया का उपयोग तब किया जाता है जब फाइब्रौयड गर्भाशय की आंतरिक सतह पर होता है.

लैप्रोस्कोपी तकनीक ने इन सर्जरियों को आसान और दर्दरहित बना दिया है और फिर इन में समय भी बहुत कम लगता है.

नहीं बदली हूं मैं: सुनयना का पति उसे लेस्बियन क्यों कह रहा था?

‘‘चलो कहीं घूमने चलते हैं. राघव भी अपने दोस्तों के साथ 15 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहा है. कितने दिन हो गए हमें कहीं गए हुए,’’ सुनयना ने अपने पति जय से बहुत ही मनुहार करते हुए कहा.

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना. कोफ्त होती है मुझे कहीं जाने की सुन कर. मिलता क्या है कहीं बाहर जा कर? वापस घर ही तो आना होता है. ट्रेन में सफर करो, थको और फिर किसी होटल में रहो और बेवकूफों की तरह उस जगह की सैर करते रहो. बेकार में इतना पैसा खर्च हो जाता है और वापस आ कर फिर थकान उतारने में 2 दिन लग जाते हैं. सारा शैड्यूल बिगड़ जाता है वह अलग. पता नहीं क्यों तुम्हें हमेशा घूमने की लगी रहती है. तुम्हें पता है मुझे कहीं बाहर जाना पसंद नहीं, फिर भी कहती रहती हो,’’ जय ने चिढ़ते हुए कहा.

‘‘पता है मुझे तुम्हें नहीं पसंद पर कभी मेरी खुशी की खातिर तो जा सकते हो? शादी को 22 साल हो गए पर कभी कहीं ले कर नहीं गए. राघव को भी नहीं ले जाते थे. शुक्र है वह तुम्हारे जैसा खड़ूस नहीं है और घूमने का शौक रखता है. शादी के बाद हर लड़की का ख्वाब होता है कि उस का पति उसे घुमाने ले जाए. बंधीबंधाई रूटीन जिंदगी से निकल कुछ समय अगर रिलैक्स कर लिया जाए तो स्फूर्ति आ जाती है और फिर नएनए लोगों और जगहों को जानने का भी अवसर मिलता है. दुनिया पागल नहीं जो देशविदेश की सैर पर जाती है. केवल तुम ही अनोखे इनसान हो. असल में पैसा खर्चते हुए मुसीबत होती है तुम्हें. अव्वल दर्जे के कंजूस जो ठहरे… कभी दूसरे की भावना का भी सम्मान करना सीखो. छोटीछोटी खुशियों को तरसा देते हो,’’ सुनयना के अंदर भरा गुबार जैसे बाहर आने को बेताब था.

‘‘ज्यादा बकवास करने की जरूरत नहीं है. रही बात राघव की तो अभी उस की शादी नहीं हुई है. हो जाने दो अपनेआप सारे शौक खत्म हो जाएंगे जब पैसे खर्चने पड़ेंगे. अभी तो बाप के पैसों पर ऐश कर रहा है.’’

‘‘बेकार की बातें न करो. तुम्हारी जेब से कहां निकलते हैं पैसे. उस के ट्रिप का सारा खर्च मैं ने ही दिया है,’’ सुनयना गुस्से से बोली.

‘‘हां, तो कौन सा एहसान कर दिया. कमाती हो तो खर्च करना ही पड़ेगा वरना क्या सारा पैसा अपने ऊपर ही खर्च करने का इरादा है?’’

दोनों के बीच बहस बढ़ती जा रही थी. यह कोई एक दिन की बात नहीं थी. अकसर उन में मतभेद पैदा हो जाते थे. जय का स्वभाव ही ऐसा था. पता नहीं उसे खुश रहने से क्या ऐलर्जी थी. बस सुनयना की हर बात को काटना, उस में दोष देखना… जैसे उसे मजा आता था इस सब में.

‘‘मैं ने भी सोच लिया है कि कहीं घूमने जाऊंगी,’’ उस ने जैसे जय को चुनौती दी. उसे पता था कि इन दिनों वूमन ओनली ट्रैवल जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिन में औरतें चाहें तो अकेले या फिर ग्रुप में ट्रैवल कर सकती हैं. सारा अरेंजमैंट वही करते हैं, इसलिए सेफ्टी की भी चिंता नहीं रहती.

उस ने गूगल पर ऐसे अरेंजमैंट करने वाले देखने शुरू किए. ‘वूमन ऐंजौय विद ट्रैवलर्स ग्रुप’ नामक साइट पर क्लिक करने पर जब उस ने संस्थापक का नाम पढ़ा तो जानापहचाना लगा. उस का प्रोफाइल पढ़ते ही उस की आंखें चमक उठीं. मानसी उस की कालेज फ्रैंड. शादी के बाद दोनों का संपर्क टूट गया था, जैसेकि अकसर लड़कियों के साथ होता है. जय को तो वैसे भी उस का किसी से मिलना या किसी के घर जाना पसंद नहीं था खासकर दोस्तों के तो बिलकुल भी नहीं. इसलिए शादी के बाद उस ने अपने सारे फ्रैंड्स से नाता ही तोड़ लिया था खासकर पुरुष मित्रों से.

साइट से मानसी का फोन नंबर ले कर सुनयना ने जैसे ही उसे फोन कर अपना परिचय दिया वह चहक उठी. बोली, ‘‘हाय सुनयना, कितने दिनों बाद तुम्हारी आवाज सुन रही हूं… यार कहां गायब हो गई थी? बता कैसा चल रहा है?’’

फिर तो जो उन के बीच बातों का सिलसिला चला तो रुका ही नहीं. उसे पता चला कि मानसी के साथ इस वूमन ऐंजौय विद ट्रैवलर्स ग्रुप में उन के कालेज की 2 फै्रंड्स भी शामिल हैं.

‘‘अब तुम्हारा नैक्स्ट ट्रिप कब और कहां जा रहा है? मैं भी जाना चाहती हूं.’’

‘‘अरे, तो चल न. 4 दिन बाद ही लद्दाख का 10 दिन का ट्रिप प्लान किया है. सारा अरेंजमैंट हो चुका है. 10 लेडीज का ग्रुप ले कर जाते हैं, पर मैं तुझे शामिल कर लूंगी. मजा आएगा. चलेगी न? लैट्स हैव फन… इसी बहाने पुरानी यादों को ताजा भी कर लेंगे… तू बस हां कर दे… मैं बाकी सारी व्यवस्था कर लूंगी और हां तुझे डिस्काउंट भी दे दूंगी.’’

‘‘बिलकुल… मैं तैयारी कर लेती हूं. ऐसा मौका कौन गंवाना चाहेगा,’’ सुनयना ने चहकते हुए कहा.

पर जय को जैसे ही उस ने यह बात बताई उस का पारा 7वें आसमान पर पहुंच गया. बोला, ‘‘दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा… इतना पैसा बरबाद करोगी… फिर ऐसी औरतें जिन के साथ तुम जा रही हो न सब फ्रस्ट्रेटेड होती हैं… या तो इन की शादी नहीं हुई होती है या फिर तलाकशुदा होती हैं अथवा पति से अलग रह रही होती हैं वरना क्यों बनातीं वे ऐसा ग्रुप, जो केवल औरतों के लिए हो? न जाने ये औरतें क्याक्या करती हैं… घूमने के बहाने क्या गुल खिलाती हैं… कोई जरूरत नहीं है तुम्हें जाने की. पुरुषों के लाइफ में न होने पर आपस में ही संबंध बना लेती होंगी तो भी कोई बड़ी बात नहीं… पुरुषों की न सही, औरतों की ही कंपनी सही… यही फंडा होता है इन का. सब की सब बेकार की औरतें होती हैं. ऐक्सपैरिमैंट करने के चक्कर में यहांवहां घूमती हैं और स्वयं को इंटेलैक्चुअल कह समाज को दिखाती हैं कि अकेले भी वे बहुत कुछ कर सकती हैं. ऐसी औरतें सैक्सुअल प्लैजर को तरसने वाले वर्ग में आती हैं. तुम्हें तो नहीं है न मुझ से कोई ऐसी शिकायत?’’ जय ने व्यंग्य कसा.

‘‘छि:… तुम्हारी इस तरह की सोच पर मुझे हैरानी होती है जय. तुम्हें क्या लगता है कि जो औरतें अकेले बिना पति के या बिना किसी पुरुष के फिर चाहे वह उन का पिता हो या पुत्र अथवा भाई अकेले कुछ करती हैं तो उन में कोई खोट होता है या वे फ्रस्ट्रेट होती हैं? अपनी खुशी से कुछ पल गुजारना क्या इतने प्रश्नचिन्ह लगा सकता है, मैं ने कभी सोचा न था… और यह सैक्सुअल प्लैजर की बात कहां से आ गई… मुझे तुम से किसी तरह की बहस नहीं करनी है. मैं नहीं जाती… लेकिन तब तुम्हें मुझे ले कर जाना होगा.’’

सुनयना की बात सुन तिलमिला गया जय. चुपचाप दूसरे कमरे में चला गया.

मानसी और अन्य 2 फ्रैंड्स से मिल सुनयना बहुत अच्छा महसूस कर रही थी. जय की रूढि़वादी मानसिकता और रोकटोक से मुक्त वह 1-1 पल ऐंजौय कर रही थी. लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता अभिभूत करने वाली थी. वहां जा कर ऐसा महसूस होता है मानो पूरी दुनिया की छत पर घूम रहे हैं. लद्दाख की ऊंचाई इतनी है मानो हम धरती और आकाश के बीच खड़े हैं. लद्दाख का नीला पानी और ताजा हवा उस पर जादू सा असर कर रही थी. मानसी ने उसे बताया कि लद्दाख भारत का ऐसा क्षेत्र है जो आधुनिक वातावरण से बिलकुल अलग है. वास्तविकता से जुड़ी पुरानी परंपराओं को समेटे हुए है यहां का जीवन. जो पर्यटक यहां आते हैं उन्हें लद्दाख का जनजीवन, संस्कृति और लोग दुनिया से अलग लगते हैं. महान बुद्ध की परंपरा को वहां के लोगों ने आज भी सहेज रखा है. इसी कारण लद्दाख को छोटा तिब्बत भी कहा जाता है. छोटा तिब्बत कहने का एकमात्र कारण यह है कि यहां तिब्बती संस्कृति का प्रभाव दिखाईर् देता है. यह अपनेआप में इतना अद्भुत है कि हर किसी को आकर्षित करता है. पहाड़ों के बीच बने यहां के गांव, आकाश छूते स्तूप और खड़ी व पथरीली चट्टानों पर बने मठ ऐसे दिखाई देते हैं जैसे हवा में झूल रहे हों.

सुनयना को लग रहा था कि वह बहुत लंबे समय के बाद अपने हिसाब से जी रही है. उस ने तय कर लिया कि वह अब मानसी के साथ अकसर ऐसे ट्रिप में आया करेगी.

10 दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला मानसी को. एकदम रिलैक्स हो कर जब वह लौटी तब तक राघव भी वापस आ चुका था. दोनों एकदूसरे के साथ अपने ट्रिप के अनुभवों को शेयर कर रहे थे कि अचानक जय भड़क गया, ‘‘पता नहीं दोनों क्या तीर मार कर आए हैं, जो इतने खुश हो रहे हैं… और तुम सुनयना जरूरत से ज्यादा खिली हुई लग रही हो. क्या बात है? उन औरतों का साथ कहीं ज्यादा तो नहीं भा गया तुम्हें? कहीं उन औरतों का रंग तो नहीं चढ़ गया है तुम पर?’’

मानसी जो जय के व्यवहार व सोच से पहले ही दुखी रहती थी, अब उस से कटीकटी रहने लगी. उस की बातें, उस के कटाक्ष सीधे उस के दिल पर चोट करते थे. उस के बाद दोनों के बीच तनाव बहुत बढ़ गया. कैसेकैसे इलजाम लगाता है जय. वह जब भी उस के साथ सैक्स संबंध बनाने की कोशिश करता वह उस का हाथ झटक देती… हद होती है, किसी बात की. इतने ताने सुनने के बाद कैसे वह जय के करीब जा सकती थी… थोड़ी देर पहले किसी का दिल दुखाओ और फिर उस के शरीर को पाना चाहो, आखिर कैसे संभव है यह? मन खुश न हो तो तन कैसे साथ देगा?

जय की तिलमिलाहट सुनयना के  इस व्यवहार से और बढ़ गई. एक रात उस के करीब आने की कोशिश में जब सुनयना ने उसे धक्का दे दिया तो वह चिल्लाने लगा, ‘‘सब समझ रहा हूं मैं तुम में आए इस बदलाव की वजह…

औरतों के साथ रहोगी तो पति का साथ कैसे अच्छा लगेगा? स्वाद जो बदल गया है तुम्हारा अब…. देख रहा हूं मानसी से भी खूब मिलने लगी हो तुम.’’

सुनयना यह सुन सकते में आ गई, ‘‘क्या कहना चाहते हो तुम? साफसाफ कहो.’’

‘‘साफसाफ क्यों सुनना चाहती हो, समझ जाओ न खुद ही,’’ जय ने ताना मारा.

‘‘नहीं, मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती हूं. जब से घूम कर लौटी हूं तुम कुछ न कुछ मुझे सुनाते ही रहते हो… आखिर ऐसा क्या बदल गया मुझ में?’’ सुनयना का चेहरा लाल हो गया था.

‘‘तुम तो पूरी ही बदल गई हो. मुझे तो लगता है कि तुम लेस्बियन बन गई हो. इसलिए मेरे स्पर्श से भी दूर भागती हो.’’

सुनयना अवाक खड़ी रह गई. कैसे जय ने इतनी आसानी से रिश्ते की सारी गरिमा को कलंकित कर दिया था… अगर महिला दोस्तों के साथ कोई महिला घूमने जाए तो लेस्बियन कहलाती है और पुरुष मित्रों के साथ घूमे तो चरित्रहीन… समाज की खोखली परिभाषाएं उसे परेशान कर रही थीं.

अब जय रात को देर से घर लौटने लगा. वह कुछ पूछती तो कहता कि घूमता रहता हूं दोस्तों के साथ, पर जान लो मैं गे नहीं हूं. बीचबीच में उस के कानों में यह बात जरूर पहुंच रही थी कि जय आजकल बहुत सी औरतों से मिलता है. उन्हें घुमाने ले जाता है, मूवी भी देखता है और शायद उन के साथ संबंध भी बनाता है. सुनयना इन सब बातों पर विश्वास नहीं करना चाहती थी पर एक दिन जय की शर्ट पर लिपस्टिक के निशान देख उस का शक यकीन में बदल गया. हालांकि पहले भी उस के कई दोस्तों ने उसे चेताया था कि जय के कदम डगमगा रहे हैं, पर उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थी.

रात को जब जय लौटा तो नशे की हालत में था. शराब की बदबू कमरे में फैल गई थी. सुनयना ने गुस्से में जब जय से सवाल किया

तो वह चिल्लाया, ‘‘मेरी जासूसी करने लगी हो. खुद लद्दाख में ऐय्याशी कर के आई हो और मुझ से सवाल कर रही हो. तुम तो एकदम ही बदल गई हो. जब तुम मुझे सैक्स सुख नहीं दोगी तो कहीं तो जाऊंगा या नहीं. हां, मेरे संबंध हैं कई औरतों से तो इस में गलत क्या है? कम से कम पुरुषों से तो नहीं हैं… तुम लेस्बियन बन गई हो पर मैं….’’

‘‘जय मेरी बात सुनो, मैं नहीं बदली हूं. मुझे तुम्हारा साथ, स्पर्श अच्छा लगता है, पर तुम्हारा व्यवहार कचोटता है मुझे… एक बार मुझे समझने की कोशिश तो करो…’’

मगर सुनयना की बात ठीक से सुने बिना ही जय बिस्तर पर लुढ़क गया था. सुनयना को समझ नहीं आ रहा था कि जय ने उस पर अपने दोष छिपाने के लिए इतना बड़ा इलजाम लगाया था ताकि उसे और औरतों से संबंध बनाने का लाइसैंस मिल जाए या फिर उसे उस के  ट्रिप पर जाने की सजा दे रहा था.

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जानें, क्यों आयरन है बेहद जरूरी

आजकल बच्चे  हो या बड़े हर कोई अपने स्वाद की चीजें खाना पसंद करता हैं. खाते समय कोई यह नहीं सोचता की यह भोजन उसकी सेहत पर क्या असर डालेगा या इस से हमे पौष्टिकआहार की प्राप्ति होगी  या नहीं हमारे शरीर में विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन ,हीमोग्लोबिन इन सभी का संतुलन बना हो तो हम स्वस्थ व निरोगी रह सकते हैं.  शरीर को स्वस्थ बनाये रखने में आयरन का बहुत महत्व हैं .

क्यों जरूरी हैं आयरन

आयरन के बिना हीमोग्लोबिन नहीं बन सकता .हीमोग्लोबिन आयरन युक्त प्रोटीन हैं .हीमोग्लोबिन से खून को लाल रंग की प्राप्ति होती है. यह लाल रक्त कण खून का मुख्य घटक है. जो शरीर में अधिक औक्सीजन का उत्पादन करता  है और श्वास गति की क्षमता को भी बढ़ाता  है. आयरन जरूरी औक्सीजन को फेफड़ों से लेकर शरीर के अन्य अंगों तक पहुंचाने का कार्यकरता है.

आयरन की संतुलित मात्रा

आयरन की कमी व ज्यादा होना दोनों ही अवस्था नुकसान देह साबित हो सकती हैं. आयरन की कमी होने से एनीमिया जैसी घातक बीमारी होने का खतरा होता हैं और  पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में आयरन की कमी ज्यादा देखने को मिलती है. पुरूषों में सामान्य हीमोग्लोबिन 13.5-17.5ग्राम/डीएल और महिलाओं में 12.0-15.5 ग्राम/डीएल बच्चे: 11 – 16 ग्राम/डीएलगर्भवती महिलाओं: 11 – 15.1 ग्राम/डीएल होना चाहिए.

आयरन की मात्रा ज्यादा होने से होने वाले  रोग

आयरन की अधिकता से  हीमोक्रोमेटिक रोग होने की सम्भावना होती हैं. आयरन की मात्रा बढ़ जाती है तो कई और  रोगों के होने की संभावनाभी बढ़ जाती है. जैसे- मधुमेह, कैंसर, लीवर की समस्या, हार्ट-अटैक, गठिया, नपुंसकता, हाजमा बिगड़ना आदि कई गंभीर बीमारियों का खतरा बना रहता है.

आयरन की कमी से होने वाले रोग

आयरन की कमी से एनीमिया होने का खतरा होता हैं .यह महिलाओं मे अधिक होता हैं क्योंकी वो खुद के खान पान का ध्यान नहीं रख पाती और मासिकधर्म होने के कारण उन मे खून की कमी आ जाती हैं. इससे सांस की  बीमारी,शरीर के तापमान को बनाए रखने में कठिनाई होना, दिल की बीमारी का खतरा भी रहता हैं. इसके कई लक्षण होतेहैं जैसे -जल्दी थकान होना, त्वचा का फीका पीला दिखना,सर दर्द व चक्र आना, कमज़ोर इम्यून सिस्टम ,आंखों के नीचे काले घेरे होना ,पीरियड्स के दौरान अधिक दर्द होना ,बालों का अधिक झड़ना.

आयरन की कमी करें पूरी हरी सब्जी

हरी सब्जियों मे हीमोग्लोबिन बढ़ाने वाले तत्व अधिक मात्रा मे होते हैं.  जैसे  पालक में कैल्शियम, सोडियम, क्लोरीन, फास्फोरस, खनिज लवण और प्रोटीन जैसे तत्‍व  प्रचुर मात्रा मे होते  हैं.टमाटर, सरसों, मेथी, धनिया, पुदीना, बथुआ, गोभी ,बींस ,खीरा,का  खूब सेवन करें .

चकुंदर

चुकन्‍दर से प्राप्‍त आयरन से रक्त में हीमोग्‍लोबिन का निर्माण होता है और यह लाल रक्तकणों की सक्रियता के लिए भी प्रभावशाली होता है. चुकन्‍दर के अलावा चुकन्‍दर की पत्तियों मेंभी काफी अधिक मात्रा में आयरन होता है.चकुंदर को  जूस ,सूप या सलाद के रूप मे रोजाना अपनी डाइट मे लाए सकते हैं .

अनार

अनार आयरन कैल्शियम, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम और विटामिन से भरपूर होता है. प्रतिदिन अनार का जूस पीने से शरीर में रक्त का संचालन अच्‍छी तरह से होता है.

सूखे मेवे

हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए खजूर, बादाम और किशमिश खाएं. इनमें आयरन की पर्याप्त मात्रा होती है. रोजाना दूध के साथ खजूर खाने से शरीर को बहुत से फायदे होते हैं. खजूर खाने सेशरीर को भरपूर मात्रा में आयरन मिलता है.

 गुड़

गुड़ आयरन की कमी को दूर करने मे बहुत सहयक होता हैं यह एक  प्राकृतिक खनिज है.यह विटामिन से भरपूर होता है. गुड़ पेट के लिये भी लबकरी होता हैं .

अंडा

अंडे में प्रोटीन, वसा, कई तरह के विटामिन, मिनरल्स, आयरन और कैल्शियम जैसे गुणकारी तत्वों होते है. इसमे विटामिन डी भी  पाया जाता है.

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