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देर आए दुरुस्त आए

रात का 1 बज रहा था. स्नेहा अभी तक घर नहीं लौटी थी. सविता घर के अंदर बाहर बेचैनी से घूम रही थी. उन के पति विनय अपने स्टडीरूम में कुछ काम कर रहे थे, पर ध्यान सविता की बेचैनी पर ही था. विनय एक बड़ी कंपनी में सीए थे. वे उठ कर बाहर आए. सविता के चिंतित चेहरे पर नजर डाली. कहा, ‘‘तुम सो जाओ, मैं जाग रहा हूं, मैं देख लूंगा.’’

‘‘कहां नींद आती है ऐसे. समझासमझा कर थक गई हूं. स्नेहा के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. क्या करूं?’’

तभी कार रुकने की आवाज सुनाई दी. स्नेहा कार से निकली. ड्राइविंग सीट पर जो लड़का बैठा था, उसे झुक कर कुछ कहा, खिलखिलाई और अंदर आ गई. सविता और विनय को देखते ही बोली, ‘‘ओह, मौम, डैड, आप लोग फिर जाग रहे हैं?’’

‘‘तुम्हारे जैसी बेटी हो तो माता पिता ऐसे ही जागते हैं, स्नेहा. तुम्हें हमारी हैल्थ की भी परवाह नहीं है.’’

‘‘तो क्या मैं लाइफ ऐंजौय करना छोड़ दूं? मौम, आप लोग जमाने के साथ क्यों नहीं चलते? अब शाम को 5 बजे घर आने का जमाना नहीं है.’’

‘‘जानती हूं, जमाना रात के 1 बजे घर आने का भी नहीं है.’’

‘‘मुझे तो लगता है पेरैंट्स को चिंता करने का शौक होता है. अब गुडनाइट, आप का लैक्चर तो रोज चलता है,’’ कहते हुए स्नेहा गुनगुनाती हुई अपने बैडरूम की तरफ बढ़ गई.

सविता और विनय ने एकदूसरे को चिंतित और उदास नजरों से देखा. विनय ने कहा, ‘‘चलो, बहुत रात हो गई. मैं भी काम बंद कर के आता हूं, सोते हैं.’’

सविता की आंखों में नींद नहीं थी. आंसू भी बहने लगे थे, क्या करे, इकलौती लाडली बेटी को कैसे समझाए, हर तरह से समझा कर देख लिया था. सविता ठाणे की खुद एक मशहूर वकील थीं.

उन के ससुर सुरेश रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे. घर में 4 लोग थे. स्नेहा को घर में हमेशा लाड़प्यार ही मिला था. अच्छी बातें ही सिखाई गई थीं पर समय के साथ स्नेहा का लाइफस्टाइल चिंताजनक होता गया था. रिश्तों की उसे कोई कद्र नहीं थी. बस लाइफ ऐंजौय करते हुए तेजी से आगे बढ़ते जाना ही उस की आदत थी. कई लड़कों से उस के संबंध रह चुके थे. एक से ब्रेकअप होता, तो दूसरे से अफेयर शुरू हो जाता. उस से नहीं बनती तो तीसरे से दोस्ती हो जाती. खूब पार्टियों में जाना, डांसमस्ती करना, सैक्स में भी पीछे न हटने वाली स्नेहा को जबजब सविता समझाने बैठीं दोनों में जम कर बहस हुई. सुरेश स्नेहा पर जान छिड़कते थे. उन्होंने ही लंदन बिजनैस स्कूल औफ कौमर्स से उसे शिक्षा दिलवाई. अब वह एक लौ फर्म में ऐनालिस्ट थी. सविता और विनय के अच्छे पारिवारिक मित्र अभय और नीता भी सीए थे और उन का इकलौता बेटा राहुल एक वकील.

एक जैसा व्यवसाय, शौक और स्वभाव ने दोनों परिवारों में बहुत अच्छे संबंध स्थापित कर दिए थे. राहुल बहुत ही अच्छा इनसान था. वह मन ही मन स्नेहा को बहुत प्यार करता था पर स्नेहा को राहुल की याद तभी आती थी जब उसे कोई काम होता था या उसे कोई परेशानी खड़ी हो जाती थी. स्नेहा के एक फोन पर सब काम छोड़ कर राहुल उस के पास होता था.

सविता और विनय की दिली इच्छा थी कि स्नेहा और राहुल का विवाह हो जाए पर अपनी बेटी की ये हरकतें देख कर उन की कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे इस बारे में राहुल से बात भी करें, क्योंकि स्नेहा के रंगढंग राहुल से छिपे नहीं थे. पर वह स्नेहा को इतना प्यार करता था कि उस की हर गलती को मन ही मन माफ करता रहता था. उस के लिए प्यार, केयर, मानवीय संवेदनाएं बहुत महत्त्व रखती थीं पर स्नेहा तो इन शब्दों का अर्थ भी नहीं जानती थी.

समय अपनी रफ्तार से चल रहा था. स्नेहा अपनी मरजी से ही घर आतीजाती.  विनय और सविता के समझाने का उस पर कोई असर नहीं था. जब भी दोनों कुछ डांटते, सुरेश स्नेहा को लाड़प्यार कर बच्ची है समझ जाएगी कह कर बात खत्म करवा देते. वे अब बीमार चल रहे थे. स्नेहा में उन की जान अटकी रहती थी. अपना अंतिम समय निकट जान उन्होंने अपना अच्छा खासा बैंक बैलेंस सब स्नेहा के नाम कर दिया.

एक रात सुरेश सोए तो फिर नहीं जागे. तीनों बहुत रोए, बहुत उदास हुए, कई दिनों तक रिश्तेदारों और परिचितों का आनाजाना लगा रहा. फिर धीरेधीरे सब का जीवन सामान्य होता गया. स्नेहा अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई. वैसे भी किसी भी बात को, किसी भी रिश्ते को गंभीरतापूर्वक लेने का उस का स्वभाव था ही नहीं. अब तो वह दादा के मोटे बैंक बैलेंस की मालकिन थी. इतना खुला पैसा हाथ में आते ही अब वह और आसमान में उड़ रही थी. सब से पहले उस ने मातापिता को बिना बताए एक कार खरीद ली.

सविता ने कहा, ‘‘अभी से क्यों खरीद ली? हमें बताया भी नहीं?’’

‘‘मौम, मुझे मेरी मरजी से जीने दो. मैं लाइफ ऐंजौय करना चाहती हूं. रात में मुझे कभी कोई छोड़ता है, कभी कोई. अब मैं किसी पर डिपैंड नहीं करूंगी. दादाजी मेरे लिए इतना पैसा छोड़ गए हैं, मैं क्यों अपनी मरजी से न जीऊं?’’

विनय ने कहा, ‘‘बेटा, अभी तुम्हें ड्राइविंग सीखने में टाइम लगेगा, पहले मेरे साथ कुछ प्रैक्टिस कर लेती.’’

‘‘अब खरीद भी ली है तो प्रैक्टिस भी हो जाएगी. ड्राइविंग लाइसैंस भी बन गया है. आप लोग रिलैक्स करना सीख लें, प्लीज.’’

अब तो रात में लौटने का स्नेहा का टाइम ही नहीं था. कभी भी आती, कभी भी जाती. सविता ने देखा था वह गाड़ी बहुत तेज चलाती है. उसे टोका, ‘‘गाड़ी की स्पीड कम रखा करो. मुंबई का ट्रैफिक और तुम्हारी स्पीड… बहुत ध्यान रखना चाहिए.’’

‘‘मौम, आई लव स्पीड, मैं यंग हूं, तेजी से आगे बढ़ने में मुझे मजा आता है.’’

‘‘पर तुम मना करने के बाद भी पार्टीज में ड्रिंक करने लगी हो, मैं तुम्हें समझा कर थक चुकी हूं, ड्रिंक कर के ड्राइविंग करना कहां की समझदारी है? किसी दिन…’’

‘‘मौम, मैं भी थक गई हूं आप की बातें सुनतेसुनते, जब कुछ होगा, देखा जाएगा,’’ पैर पटकते हुए स्नेहा कार की चाबी उठा कर घर से निकल गई.

सविता सिर पकड़ कर बैठ गईं. बेटी की हरकतें देख वे बहुत तनाव में रहने लगी थीं. समझ नहीं आ रहा था बेटी को कैसे सही रास्ते पर लाएं.

एक दिन फिर स्नेहा ने किसी पार्टी में खूब शराब पी. अपने नए बौयफ्रैंड विक्की के साथ खूब डांस किया, फिर विक्की को उस के घर छोड़ने के लिए लड़खड़ाते हुए ड्राइविंग सीट पर बैठी तो विक्की ने पूछा, ‘‘तुम कार चला पाओगी या मैं चलाऊं?’’

‘‘डोंट वरी, मुझे आदत है,’’ स्नेहा नशे में डूबी गाड़ी भगाने लगी, न कोई चिंता, न कोई डर.

अचानक उस ने गाड़ी गलत दिशा में मोड़ ली और सामने से आती कार को भयंकर टक्कर मार दी. तेज चीखों के साथ दोनों कारें रुकीं. दूसरी कार में पति ड्राइविंग सीट पर था, पत्नी बराबर में और बच्चा पीछे. चोटें स्नेहा को भी लगी थीं. विक्की हकबकाया सा कार से नीचे उतरा. उस ने स्नेहा को सहारा दे कर उतारा. स्नेहा के सिर से खून बह रहा था. दोनों किसी तरह दूसरी कार के पास पहुंचे तो स्नेहा की चीख से वातावरण गूंज उठा. विक्की ने भी ध्यान से देखा तो तीनों खून से लथपथ थे. पुरुष शायद जीवित ही नहीं था.

विक्की चिल्लाया, ‘‘स्नेहा, शायद कोई नहीं बचा है. उफ, पुलिस केस हो जाएगा.’’

स्नेहा का सारा नशा उतर चुका था. रोने लगी, ‘‘विक्की, प्लीज, हैल्प मी, क्या करें?’’

‘‘सौरी स्नेहा, मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा. प्लीज, कोशिश करना मेरा नाम ही न आए. मेरे डैड बहुत नाराज होंगे, सौरी, मैं जा रहा हूं.’’

‘‘क्या?’’ स्नेहा को जैसे तेज झटका लगा, ‘‘तुम रात में इस तरह मुझे छोड़ कर जा रहे हो?’’

विक्की बिना जवाब दिए एक ओर भागता चला गया. सुनसान रात में अकेली, घायल खड़ी स्नेहा को हमेशा की तरह एक ही नाम याद आया, राहुल. उस ने फौरन राहुत को फोन मिलाया. हमेशा की तरह राहुल कुछ ही देर में उस के पास था. स्नेहा राहुल को देखते ही जोरजोर से रो पड़ी. स्नेहा डरी हुई, घबराई हुई चुप ही नहीं हो रही थी.

राहुल ने उसे गले लगा कर तसल्ली दी, ‘‘मैं कुछ करता हूं, मैं हूं न, तुम पहले हौस्पिटल चलो, तुम्हें काफी चोट लगी है, लेकिन उस से पहले भी कुछ जरूरी फोन कर लूं,’’ कह उस ने अपने एक पुलिस इंस्पैक्टर दोस्त राजीव और एक डाक्टर दोस्त अनिल को फोन कर तुरंत आने के लिए कहा.

अनिल ने आकर उन 3 लोगों का मुआयना किया. तीनों की मृत्यु हो चुकी थी. सब सिर पकड़ कर बैठ गए. स्नेहा सदमें में थी. उस पर केस तो दर्ज हो ही चुका था. उसे काफी चोटें थीं तो पहले तो उसे ऐडमिट किया गया.

सरिता और विनय भी पहुंच चुके थे. स्नेहा मातापिता से नजरें ही नहीं मिला पा रही थी. कई दिन पुलिस, कोर्टकचहरी, मानसिक और शारीरिक तनाव से स्नेहा बिलकुल टूट चुकी थी. उस की जिंदगी जैसे एक पल में ही बदल गई थी. हर समय सोच में डूबी रहती. उस के लाइफस्टाइल के कारण 3 लोग असमय ही दुनिया से जा चुके थे. वह शर्मिंदगी और अपराधबोध की शिकार थी. 1-1 गलती याद कर, बारबार अपने मातापिता और राहुल से माफी मांग रही थी. राहुल और सविता ने ही उस का केस लड़ा. रातदिन एक कर दिया. भारी जुर्माने के साथ स्नेहा को थोड़ी आजादी की सांस लेने की आशा दिखाई दी. रातदिन मानसिक दबाव के कारण स्नेहा की तबीयत बहुत खराब हो गई. उसे हौस्पिटल में ऐडमिट किया गया. अभी तो ऐक्सिडैंट की चोटें भी ठीक नहीं हुई थीं. उस की जौब भी छूट चुकी थी. पार्टियों के सब संगीसाथी गायब थे. बस राहुल रातदिन साए की तरह साथ था. हौस्पिटल के बैड पर लेटेलेटे स्नेहा अपने बिखरे जीवन के बारे में सोचती रहती. कार में 3 मृत लोगों का खयाल उसे नींद में भी घबराहट से भर देता. कोर्टकचहरी से भले ही सविता और राहुल ने उसे जल्दी बचा लिया था पर अपने मन की अदालत से वह अपने गुनाहों से मुक्त नहीं हो पा रही थी.

विनय, सविता, राहुल और उस के मम्मीपापा अभय और नीता भी अपने स्नेह से उसे सामान्य जीवन की तरफ लाने की कोशिश कर रहे थे. अब उसे सहीगलत का, अच्छेबुरे रिश्तों का, भावनाओं का, अपने मातापिता के स्नेह का, राहुल की दोस्ती और प्यार का एहसास हो चुका था.

एक दिन जब विनय, सविता, अभय और नीता चारों उस के पास थे, बहुत सोचसमझ कर उस ने अचानक सविता से अपना फोन मांग कर राहुल को फोन किया और आने के लिए कहा.

हमेशा की तरह राहुल कुछ ही देर में उस के पास था. स्नेहा ने उठ कर बैठते हुए राहुल का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘इस बार तुम्हें किसी काम से नहीं, सब के सामने बस इतना कहने के लिए बुलाया है, आई एम सौरी फौर ऐवरीथिंग, आप सब मुझे माफ कर दें और राहुल, तुम कितने अच्छे हो,’’ कह कर रोतेरोते स्नेहा ने राहुल के गले में बांहें डाल दीं तो राहुल वहां उपस्थित चारों लोगों को देख कर पहले तो शरमा गया, फिर हंस कर स्नेहा को अपनी बांहों के सुरक्षित घेरे में ले कर अपने मातापिता, फिर विनय और सविता को देखा तो बहुत दिनों बाद सब के चेहरे पर एक मुसकान दिखाई दी, सब की आंखों में अपनी इच्छा पूरी होने की खुशी साफसाफ दिखाई दे रही थी.

फेयरवैल : शनाया और रागिनी ने रुचि को क्या समझाया?

शनाया को नए पीजी में कुछ दिन तो थोड़ा अजीब लगा पर अब उसे काफी अच्छा लगने लगा था. चारों लड़कियों प्रीति, रुचि, रागिनी और आईना के साथ उस की बहुत अच्छी बनती थी. बस, श्वेता थोड़ा मूडी थी. वह कभी तो बहुत अच्छा व्यवहार करती, लेकिन कभीकभी बिना वजह छोटी सी बात का बतंगड़ बना देती.

रुचि के पास एक कार थी. कभीकभी सभी सहेलियां उसी कार से रात को डिस्को चली जाती थीं. आज भी अचानक ऐसे ही प्लान बन गया. शनाया पहले कभी रात को घर से बाहर नहीं निकलती थी. मम्मी ने उसे सख्ती से मना किया था. बस, पीजी से औफिस और औफिस से पीजी आनाजाना ही होता था. यही शनाया का रूटीन था, पर इस नए पीजी में आने के बाद शनाया में काफी बदलाव आ गया था. वह अपने लुक्स और पहनावे को ले कर सजग हो रही थी.

वह नएनए डांस स्टैप्स भी सीख रही थी. उस ने सभी लड़कियों को नईनई पत्रिकाएं पढ़ने का शौक लगा दिया था.

आज श्वेता का मूड भी काफी अच्छा था. डिस्को जाने के लिए वह हमेशा तैयार रहती थी. डिस्को में बार भी था, जहां श्वेता ने पांचों के लिए बियर और्डर की.

शनाया ने साफ मना कर दिया. बहुत जोर देने पर रुचि और प्रीति ने श्वेता का साथ दिया, पर श्वेता ने थोड़ी देर में एक के बाद एक कई पैग चढ़ा लिए. बड़ी मुश्किल से श्वेता को घर वापस लौटने के लिए मनाया गया.

ये सब शनाया और रागिनी को बिलकुल पसंद नहीं आया. रागिनी ने प्रीति और रुचि को भी समझाया कि अलकोहल लेना गलत है. आगे से ऐसी गलती न करे. अगर श्वेता जिद करती है तो ना कहना सीखे.

ये बातें श्वेता के कानों में भी पड़ीं और इस पर बुरी तरह बहस हुई. श्वेता ने पांचों को खूब बुराभला कहा. खैर, कुछ ही दिन में सब सामान्य हो गया. शनाया ने श्वेता को किसी से फोन पर बात करते हुए सुना था, ‘तुम मेरे लिए एक अच्छा फ्लैट ढूंढ़ दो. यहां तो कंपनी ही बेकार है. पांचों लड़कियां जाहिल हैं.’

शनाया ने बात को बढ़ाना उचित नहीं समझा पर उस की फैमिली के बारे में जरूर पूछा. प्रीति ने बताया कि उस के पिता विधायक हैं. इस से ज्यादा कोई भी नहीं जानता था. वह प्रौपर्टी डीलर के जरिए आ पाई थी. ‘मकानमालिक ने वैरिफिकेशन तो कराया ही होगा,’ पता नहीं क्यों शनाया गहराई से सोच रही थी.

मकानमालिक ने वैसे तो सीसीटीवी कैमरे लगा रखे थे, लेकिन वह लड़कियों को कुछ कहते नहीं थे. वे रहते भी काफी दूर थे. बस, महीने बाद किराया वसूलने आते थे.

एक दिन खुशगवार मौसम देख कर श्वेता ने कुछ निकाला. पैकेट देख कर शनाया समझ गई कि यह ड्रग्स है, ‘‘किसी को ट्राई करना हो तो कर सकता है,’’ श्वेता ने रुचि को कहा.

‘‘यार, यह तो गैरकानूनी है. दिस इस वैरी बैड,’’ शनाया ने कह ही दिया. बस, श्वेता को चुप कराना मुश्किल हो गया. अगले दिन पांचों लड़कियों ने श्वेता से साफसाफ कह दिया, ‘‘देखो श्वेता, अलकोहल तक तो ठीक है लेकिन ये सब हम बरदाश्त नहीं करेंगे. आगे से ऐसा मत करना वरना कहीं और रहने का इंतजाम कर लो.’’

श्वेता ने नया फ्लैट देख लिया था. जाने से पहले पांचों ने श्वेता को फेयरवैल देने की योजना बनाई. केक काटने के बाद सब जम कर नाचे. श्वेता की जिद पर सब ने हलकेहलके पैग लिए. खूब मस्ती कर सब सो गए. अगली सुबह श्वेता अपना सामान ले कर चली गई. मांगने पर भी उस ने उन को एड्रैस नहीं बताया.

अब सबकुछ सामान्य था. शनाया भी काफी खुश रहती थी. अचानक एक दिन एक छोटा सा वीडियो शनाया को किसी ने भेजा. वीडियो देख कर वह स्तब्ध रह गई. वे पांचों हाथों में गिलास ले कर नाच रही थीं. उन के कपड़े भी बेहद अस्तव्यस्त थे. वैसे भी लड़कियों के फ्लैट में कपड़ों का खयाल रखता कौन है. उन के अंग साफ दिख रहे थे.

श्वेता जाहिर है, वीडियो शूट कर रही थी. पांचों लड़कियां जैसे गश खा कर गिरीं लगभग 10-15 दिन रोनेधोने के बाद उन्होंने श्वेता को खोज लिया.

‘‘देखो, किसी फ्रैंड ने यह अपलोड किया है. तुम लोग चाहो तो खुशी से साइबर पुलिस से शिकायत करो,’’ श्वेता बोली. वह बेहद चालाक थी. उस ने साइबर पुलिस को भी बताया कि वह वीडियोज फ्रैंड्स को शेयर करती रहती है. उस का फोन भी हरवक्त उस के पास नहीं रहता. इसलिए कैसे, क्या हुआ, वह नहीं बता सकती.

श्वेता तो साफ बच निकली पर इन पांचों को फेयरवैल का गिफ्ट जरूर दे गई. खैर, पांचों ने इस शहर को छोड़ कर अन्य किसी शहर में नौकरी करने में ही अपनी भलाई समझी.

पुलिस बन रही अलग पावर सैंटर, लोगों का खो रहा विशवास

विधायक और बाहुबली मुख्तार अंसारी को जब जेल में रखा गया तो उस ने लिखित में शिकायत की थी कि उस को धीमा जहर दिया जा रहा है. इस के कुछ दिनों में जब उस की तबीयत खराब हुई तो जेल में ही उस को हार्ट अटैक आ गया, जिस से वह मर गया. मुख्तार अंसारी के परिवार वाले खुल कर कह रहे हैं कि उस को धीमा जहर दिया जा रहा था. अब कई तरह की जांचें शुरू हो गई हैं. इन के पूरा होने पर ही पता चल सकेगा कि क्या सच है. उत्तर प्रदेश में इस के पहले विकास दुबे और अतीक अहमद के साथ इस तरह की घटनाएं घट चुकी हैं.

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को सुधारने में पुलिस का प्रयोग जिस तरह से हुआ उस से कामकाज में पुलिस की धमक बढ़ गई. मित्र पुलिस की छवि यहां दबंग की बन गई है. पुलिस के जवान सिंघम जैसे दिखने लगे हैं. आम आदमी के लिए उस का व्यवहार मित्र जैसा नहीं है. पहले की सरकारों के शासन के दौरान नेता और विधायक का दबाव होने के कारण जनता की सुनवाई हो जाती थी. इस दौर में अफसरों के अलावा पुलिस किसी दबाव में नहीं है, जिस से वह मनमानी करने लगी है.

रिटायर डीपीपी सुलखान सिंह कहते हैं कि जब उत्तर प्रदेश में पुलिस जब फर्जी मुठभेड़ कर सकती है तो माफिया मुख्तार अंसारी को जहर क्यों नहीं दिया जा सकता. मसले की सीबीआई से जांच होनी चाहिए. जनता जिस तरह से जाति और धर्म को ले कर उलझी है, उस में पुलिस के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है.

हिरासत में मौत के मामलों में यूपी नंबर वन

लोकसभा में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पेश की गई रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में हर दिन 6 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हो रही है. इस मामले में पिछले 2 वर्षों से उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है. पुलिस सुधार को ले कर लंबे समय से बहस चल रही है, इस के बाद भी हिरासत में होने वाली मौतों का आंकड़ा कम नहीं हो रहा.
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से लोकसभा में पेश किए गए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 2 वर्षों में हिरासत में होने वाली कुल मौतों की संख्या 4,484 है. हिरासत में मौत के मामलों में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है और पश्चिम बंगाल दूसरे पर.

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि अकेले उत्तर प्रदेश में 2021-22 में हिरासत में कुल 501 मौतें हुईं जबकि इस से पहले यानी 2020-21 में हिरासत में मौत के 451 मामले दर्ज किए गए. यूपी के बाद पश्चिम बंगाल और फिर मध्य प्रदेश का नंबर आता है. वहीं देश भर में 2021-22 में हिरासत में हुई मौतों का आंकड़ा 2,544 है जबकि 2020-21 में यह संख्या 1,940 थी.

खाता न बही पुलिस जो कहे वही सही

पुलिस कई बार कुछ मामलों में अभियुक्तों को हिरासत में लेती है और उन से बिना कोर्ट की रिमांड के भी पूछताछ करती है. हालांकि संवैधानिक रूप से उसे 24 घंटे के भीतर अभियुक्त को किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है लेकिन कई बार पुलिसकर्मी अभियुक्तों से थाने पर ही पूछताछ करते हैं और रिकौर्ड में दर्ज ही नहीं करते. इस पूछताछ के दौरान अकसर बल प्रयोग भी किया जाता है और कई बार अभियुक्तों की मौत हो जाती है.

पुलिस हिरासत में उत्पीड़न और मौत के मामलों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने चिंता जताते कहा था कि “संवैधानिक रक्षा कवच के बावजूद अभी भी पुलिस हिरासत में शोषण, उत्पीड़न और मौत होती है. इस के चलते पुलिस थानों में ही मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका बढ़ जाती है. पुलिस जब किसी को हिरासत में लेती है तो उस व्यक्ति को तत्काल कानूनी मदद नहीं मिलती है. गिरफ्तारी के बाद ही अभियुक्त को यह डर सताने लगता है कि आगे क्या होगा.”

सुप्रीम कोर्ट ने साल 1996 में एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि हिरासत में हुई मौत कानून के शासन में सब से जघन्य अपराध है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हिरासत में हुई मौतों का विवरण दर्ज करने के साथसाथ संबंधित लोगों को इस की जानकारी देना भी अनिवार्य बना दिया गया. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी के दौरान पुलिस के व्यवहार को ले कर भी नियम निर्धारित कर दिए. ये नियम न सिर्फ पुलिस पर बल्कि रेलवे, सीआरपीएफ, राजस्व विभाग सहित उन तमाम सुरक्षा एजेंसियों पर भी लागू होते हैं जो अभियुक्तों को पूछताछ के लिए गिरफ्तार कर सकती हैं.

हिरासत में मौत के खिलाफ है कानून

सभ्य समाज में हिरासत में मौत शायद सब से खराब अपराधों में से एक है. भारत में हिरासत में होने वाली मौतों के बारे में मानवाधिकार आयोग ने साल 2021-22 में 28 फरवरी, 2022 तक न्यायिक हिरासत में 2,152 मौतें हुईं और पुलिस हिरासत में 155 मौतें हुईं. 26 जुलाई, 2022 को लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने खुलासा किया कि 2020-21 से 2021-22 की अवधि के दौरान भारत में हिरासत में मौत के 4,484 मामले सामने आए.

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 176 (आई) में कहा गया है कि यदि हिरासत में कोई व्यक्ति मर जाता है या गायब हो जाता है या हिरासत में किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जांच का आदेश देने की शक्ति है. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 46 में कहा गया है कि पुलिस गिरफ्तारी करते समय किसी की हत्या नहीं कर सकती. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 330 (ए) और (बी) यातना के मामलों में पुलिसकर्मियों को 7 साल तक की सजा का प्रावधान है.

18 दिसंबर, 1996 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में एक खास फैसला सुनाया. इस में हिरासत में लगातार होने वाली मौतों के मुद्दे की जांच करने, गिरफ्तारी के दौरान पालन किए जाने वाले दिशा निर्देश बनाने और हिरासत में यातना या मौत के मामले में पीड़ितों परिवारों को प्रदान किए जाने वाले मुआवजे को तैयार करने का अनुरोध किया गया. फैसले में अदालत ने 11 दिशानिर्देश सुझाए जिन में हिरासत में लिए गए व्यक्ति की मृत्यु के मामले में गिरफ्तारी प्रक्रियाओं और मुआवजे को शामिल किया गया था.

हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों में अब पुलिस को सजा भी होने लगी है. इस के बाद भी पुलिस एक पावर सैंटर के रूप में उभर रही है, जो खतरनाक है. इस से न्याय प्रभावित होता है. संविधान ने पुलिस को केवल विवेचक की जिम्मेदारी दी है. पुलिस अब न्याय देने का ही नहीं, पावर सैंटर बनने का काम भी करने लगी है.

गरीब की बीबी सब की जोरू

हिरासत में मौत का सब से बड़ा कारण न्याय व्यवस्था का आम लोगों से दूर होना है. उस में खामियों की वजह से भी हिरासत में मौत के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. असल में न्याय प्रणाली आम नागरिकों के लिए सुलभ नहीं है. संविधान में चाहे जितनी व्यवस्था हो और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश हों लेकिन आम आदमी अब भी उस की पहुंच से दूर है. हिरासत में मौत के मामलों में ज्यादातर गरीब, पिछड़े और शोषित वर्ग के लोग ही शिकार होते हैं. अमीर लोगों से पुलिस आमतौर पर इस स्तर पर पूछताछ नहीं करती है क्योंकि उसे कानून का डर रहता है.

ऊंची पहुंच वालों को पुलिस वाले न तो मारपीट पाते हैं और न ही उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रख सकते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह गैरकानूनी है और अदालत के पचड़े में आ जाएंगे. गरीब और कम पढ़ा लिखा तबका यह नहीं जानता. गिरफ्तारी के संबंध में संविधान में पर्याप्त सुरक्षा उपाय दिए गए हैं लेकिन पुलिस व्यवस्था की घिसीपिटी परंपरा आज भी नागरिकों के अनुकूल नहीं बन पाई. व्यापक तौर पर पुलिस सुधार की जरूरत है अन्यथा देश एक पुलिस राज्य में तबदील हो जाएगा क्योंकि राज्य सरकारों का अकसर पुलिस को समर्थन रहता है और सरकार पुलिस को बचाती भी है.

कोख मेरी, बच्चा मेरा, फैसला किसी और का क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पौपुलेशन फंड ( UNFPA ) ने यह पता लगाने की कोशिश की कि महिलाओं के खुद के शरीर के बारे में फैसले लेने की क्षमता कितनी है. रिपोर्ट के मुताबिक 57 विकासशील देशों में रहने वाली करीब 50 परसेंट महिलाओं के पास अपने शरीर को ले कर लिए जाने वाले फैसले ( जैसे गर्भनिरोधक, स्वास्थ्य सुविधा आदि ) लेने का कोई अधिकार नहीं होता. केवल 55 फीसद महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य देखभाल, गर्भनिरोधक और सैक्स के दौरान हां या न कहने के लिए सशक्त हैं.

भारत के संदर्भ में UNFPA की रिपोर्ट बताती है कि केवल 12% शादीशुदा महिलाएं जिन की उम्र 15 से 49 के बीच है वे स्वतंत्र रूप से अपनी स्वास्थ्य सेवा के बारे में निर्णय लेती हैं जबकि 63% अपने जीवनसाथी से परामर्श ले कर ये फैसले करती हैं. हर 10 में से एक महिला का पति ही गर्भनिरोधक के बारे में फैसला लेता है. वहीं महिलाओं को गर्भनिरोधक के बारे में दी जाने वाली जानकारी भी सीमित होती है. सिर्फ 47 फीसद महिलाएं ही जो गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करती हैं उस के साइड इफैक्ट्स के बारे में जानती हैं.

महिलाओं के लिए ही समाज ये तय करता है कि उन्हें किस तरह बोलना है, कब कितनी जबान खोलनी है, किस तरह के कपड़े पहनने से वे संस्कारी कहलाएंगी और उन के अपने शरीर से जुड़े फैसले भी यह समाज ही लेता है. ये वो तमाम बातें हैं जिस बारे में महिलाएं एक इंसान होने के नाते खुद ही निर्णय ले सकती हैं मगर समाज ने इन की भी परमिशन नहीं दी है.

समाज और कानून पुरजोर कोशिश में लगा रहता है कि महिलाओं, उन के विचारों और उन के शरीर को चारदीवारी में कैद कैसे किया जाए. इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं ऐसी बंधुआ मजदूर हैं जो सब की खुशी के लिए सब कुछ करती हैं मगर अपनी खुशी के लिए कुछ नहीं कर सकती.

रिप्रोडक्टिव कोअर्शन : स्त्री के हक पर शिकंजा

बहुत सी लड़कियां जो अभी मां बनने के लिए तैयार नहीं और अबौर्शन कराना चाहती है मगर घरवालों के दवाब में आ कर वह ऐसा नहीं कर पाती. इसी तरह कोई लड़की जो बच्चे को जन्म देना चाहती है उसे ससुरालवालों के कहने पर अबौर्शन कराना पड़ता है क्योंकि उस के गर्भ में लड़की है और घरवाले लड़की नहीं लड़का चाहते हैं. ऐसी बातें अकसर सुनने को मिलती हैं. जो दुल्हन दोतीन साल प्रैग्नैंट होना नहीं चाहती, उसे जबरदस्ती उस की ड्यूटी याद दिलाते हुए ऐसा करने को बाध्य किया जाता है.

गर्भधारण करना है, नहीं करना है, अबौर्शन करवाना है, कब मां बनना है जैसे फैसलों में औरतों की मर्जी की अहमियत नहीं होती है. यह फैसले या तो पति को करता है या ससुराल के अन्य सदस्य. जबकि कोख लड़की का है, बच्चे को उसे अपने शरीर में बड़ा करना है, बच्चा पैदा करने और पालने की तकलीफ उसे सहनी है मगर इन सब से जुड़े फैसले कोई और करता है. इस तरह गर्भधारण से जुड़े फैसलों को प्रभावित करना और इस के लिए जबरदस्ती करना रिप्रोडक्टिव कोअर्शन यानी प्रजनन संबंधी हिंसा की श्रेणी में आता है.

क्या है रिप्रोडक्टिव कोअर्शन

महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में हस्तक्षेप करना रिप्रोडक्टिव कोअर्शन कहलाता है. यह कई प्रकार का होता है. मान लीजिए किसी महिला को गर्भधारण करने के लिए बाध्य किया गया हो तो इसे प्रैगनैंसी कोअर्शन कहते हैं. प्रैगनैंसी कोअर्शन में जबरन गर्भवती करना या किसी को गर्भधारण न करने देना दोनों ही तरह के मामले शामिल होते हैं. कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जिन में अनचाही प्रैगनैंसी को थोपा जाता है. गर्भनिरोधक के तरीकों के साथ औरत की जानकारी के बिना छेड़छाड़ करना भी रिप्रोडक्टिव कोअर्शन ही होता है. इस के तहत अकसर गर्भनिरोधक गोलियों को किसी सामान्य गोली से बदल दिया जाता है. संबंध के दौरान कंडोम पहनने से मना करना, महिला को फिजिकल होने के लिए विवश करना रिप्रोडक्टिव कोअर्शन के ही रूप हैं.

वहीं कई मामलों में इस का उल्टा भी होता है. महिला से बिना पूछे बगैर या धोखे से उसे गर्भनिरोधक गोलियां खिला कर या औपरेशन कर जबरन अबौर्शन कराया जाता है. अगर परिवार नियोजन करना भी है को इस का पूरा भार हमारे देश में महिलाओं पर ही थोप दिया जाता है. पुरुषों में आज भी नसबंदी को ले कर यह मिथ्या बेहद प्रचलित है कि नसबंदी से वह नपुंसकता का शिकार हो सकते हैं.

दुनिया की आधी आबादी यानी कि औरतों के साथ होने वाली हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है. सदियों से औरतों को पुरुषों के मुकाबले कमतर आंका जाता रहा है. उन्हें अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने तक के अधिकारों से वंचित रखा जाता रहा है. उस के साथ हिंसा और अत्याचार किया जाता रहा है. आज रिप्रोडक्टिव कोअर्शन औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा का ही एक रूप है जहां उसे अपने बदन के अधिकार से ही वंचित किया जाता है.

जब औरतें पार्टनर या घरवालों द्वारा जबरन थोपे जा रहे प्रैगनैंसी से जुड़े फैसलों को मानने से इनकार करती हैं तो उन के साथ मारपीट की जाती है. उन्हें तलाक देने, रिश्ता खत्म करने या घर से निकालने तक की धमकी दी जाती है. रिश्ता टूटने के डर से वह बात मानने को मजबूर होती है.

साल 2019 में उत्तर प्रदेश के 49 जिलों में की गई एक रिसर्च की मानें तो इस में शामिल लगभग 12% औरतों ने रिप्रोडक्टिव कोअर्शन झेला था. इन में से 42% औरतें ऐसी थीं जिन के साथ रिप्रोडक्टिव कोअर्शन उन के पति ने किया है. वहीं 48% महिलाओं के साथ ससुरालवालों ने ऐसा किया.

हमारे देश में बेटे की चाहत रिप्रोडक्टिव कोअर्शन की एक मुख्य वजह है. कई औरतों को जब तक वे बेटे को जन्म नहीं देती तब तक उन्हें बारबार गर्भवती होने के लिए मजबूर किया जाता है. बारबार प्रैगनैंसी औरतों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है. कई मामलों में अगर उन के गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़की होती है तो महिलाओं को जबरन अबौर्शन से भी गुजरना पड़ता है.

पितृसत्तात्मक परवरिश का नतीजा है कि लड़कियों को हमेशा यही बताया गया कि उन का अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं, सैक्स के दौरान उन की सहमति आवश्यक नहीं क्योंकि पति को ‘खुश करना’ स्त्री धर्म है.

अमेरिका जैसे विकसित देश में भी महिलाओं से जुड़े इस कानून को ले कर गफलत है. हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को 50 साल पुराने रो बनाम वेड मामले में आए फैसले को पलट दिया जिस के जरिए गर्भपात कराने को कानूनी करार दिया गया था और कहा गया था कि संविधान गर्भवती महिला को गर्भपात से जुड़ा फैसला लेने का हक देता है. यानी अब अमेरिका में भी मान लिया गया कि औरतों को अपनी कोख पर संवैधानिक हक नहीं.

भारत में अबौर्शन से संबंधित कानून

कुछ समय पहले भारतीय संसद में मेडिकल टर्मिनेशन औफ प्रैगनैंसी (अमेंडमेंट) एक्ट 2020 को मंजूरी दी गई. इस एक्ट के आने के बाद देश में अबौर्शन की समय सीमा को बढ़ा कर 24 हफ्ते किया गया. हालांकि इस पर फैसला लेने की जिम्मेदारी मैडिकल बोर्ड पर होगी. यह एक्ट कुछ शर्तों के आधार पर अबौर्शन की अनुमति देता है. गर्भावस्था में अगर गर्भवती महिला के जीवन को खतरा है, यदि गर्भावस्था बलात्कार का परिणाम है, यदि यह संभावना है कि जन्म के बाद बच्चे को गंभीर शारीरिक व मानसिक परेशानियों का सामना करना होगा या गर्भनिरोधक विफल रहा है.

भारत में मातृत्व मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण असुरक्षित अबौर्शन है. गटमैचर इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक युवा महिलाओं के 78 फीसद अनचाहे गर्भ के लिए असुरक्षित अबौर्शन का इस्तेमाल किया जाता है. यदि भारत में सुरक्षित अबौर्शन किया जाए और उस के बाद सही देखभाल की जाए तो इस से संबधित मृत्यु में 97 फीसद की गिरावट देखी जा सकती है.

बच्चा पैदा करने और न करने का निर्णय केवल एक महिला का होना चाहिए. इन मामलों में कोई भी हस्तक्षेप न केवल समानता के विरूद्ध है बल्कि उन की निजता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी है.

14 अक्टूबर 2022 को बौम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पतिपत्नी को बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. जस्टिस अतुल चंदुरकर और उर्मिला जोशी-फाल्के की बेंच ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला दिया और कहा कि यह अच्छी तरह से स्थापित है कि एक महिला का प्रजनन करने का अधिकार उस की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अविभाज्य हिस्सा है. उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

इस मामले में पति ने आरोप लगाया कि पहले बेटे के बाद दूसरी बार गर्भवती होने पर पत्नी ने पति की सहमति के बिना अपनी उसे समाप्त कर दिया. याचिका में पति ने पत्नी द्वारा उस की सहमति के बिना गर्भावस्था को समाप्त करने को उसके खिलाफ क्रूरता बताया. उस ने इसी आधार पर न्यायालय में तलाक की भी अर्जी दी.

इस के विपरीत पत्नी ने अपने वकील के माध्यम से तर्क दिया कि उस ने एक बच्चे को जन्म दिया है. दूसरी गर्भावस्था को उस ने बीमारी के कारण समाप्त कर दिया था. एक अजन्मे भ्रूण को एक जीवित महिला के अधिकारों से अधिक ऊंचे स्थान पर नहीं रखा जा सकता है. दोनों पक्षों को सुनने के बाद बौम्बे हाई कोर्ट ने इसे महिला के व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक हिस्सा माना.

हमेशा से एक महिला द्वारा गर्भावस्था को चुनने के विकल्प पर सवाल उठते रहे हैं. शादी के बाद पति और उस के घर वाले महिला द्वारा गर्भधारण करने को अपना हक / अधिकार समझते हैं. गर्भावस्था एक महिला के शरीर के भीतर होती है और उस के स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और जीवन को गहराई से प्रभावित करती है. एक पुराने शोध से पता चलता है कि एक महिला को उस की इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था के लिए मजबूर करने से उसके अवसाद का खतरा 20% तक बढ़ जाता है.

महिलाएं पुरुषों के हाथ की कठपुतली नहीं हैं

सवाल यह उठता है कि सारे बंधन और कानून महिलाओं पर ही क्यों लागू होते हैं. महिलाएं पुरुषों के हाथ की कठपुतली बन कर क्यों रह जाती हैं. उन का अलग वजूद है, अपनी इच्छाएं और प्राथमिकताएं हैं. अपना शरीर है और अपने शरीर पर तो उस का अपना हक़ होना चाहिए या वहां भी उसे पुरुषों की, धर्म की, कानून और सरकार की कठपुतली बनने को मजबूर रहना होगा. सारे कानून और रीति रिवाज स्त्रियों पर ही शिकंजे जकड़ने के लिए बने होते हैं. पुरुषों पर वे ही बंधन क्यों नहीं जड़े जाते. अगर स्त्री को शादीशुदा दिखने के लिए सिन्दूर लगाने की पाबंदी है तो वही पाबंदी पुरुषों पर क्यों नहीं है? उन्हें सिन्दूर जैसी चीज को नहीं लगानी पड़ती.

अगर अबौर्शन के लिए एक स्त्री की बाध्य किया जा सकता है, उसे बताया जाता है कि वह कब मां बने और कब, कितने महीने में अबोर्ट कराए या न कराए तो इस का मतलब तो यह है कि कल को कानून हमें बताएगा कि हमें कब सांस लेना है, कब खाना है और कब नहाना है. कितनी बार बाहर निकलना है कब घर के अंदर घुसना है. आखिर कानून और धर्म हर जगह क्यों घुसते हैं? अगर वे कोख में घुस रहे हैं घर में घुस रहे हैं रिश्तों में घुस रहे हैं तो कल को बैडरूम और टौयलेट में भी घुसेंगे. इस तरह तो इंसान की कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही नहीं रह जाएगी.

पीरियड्स को ले कर अटपटी गाथा

धर्म और पुरुषवादी सोच कहां तक पहुंच सकती है उस का एक नमूना महिलाओं के पीरियड्स से जुड़ी कहानी में है. हम सभी जानते हैं कि महिलाओं को पीरियड्स यानी मासिक धर्म होते हैं. प्रत्येक मासिक धर्म चक्र के दौरान 1 अंडा विकसित होता है और बाहर निकलता है. गर्भावस्था तब होती है जब पुरुष के शुक्राणु अंडे से मिलते हैं और उसे निषेचित करते हैं. और तभी वह मां बन पाती है. भारत में पीरियड्स को अशुद्ध माना जाता है और एक रजस्वला स्त्री को अलग जमीन पर अछूतों की तरह बिठा दिया जाता है. लेकिन दुनिया के कई कल्चर ऐसे हैं जहां इसे फीमेल पावर का एक तरीका समझा जाता है.

पीरियड्स की शुरुआत कैसे हुई? हो सकता है कि आप को यह बचकाना सवाल लगे क्योंकि इस का एक महत्वपूर्ण साइंटिफिक रीजन है और इस की वजह से ही महिलाएं मां बन पाती हैं. मगर हमारे देश में इस की भी एक धार्मिक कहानी है और धर्मग्रंथों की मानें तो यह दरअसल महिलाओं को मिले हुए श्राप के कारण होता है. इस से हास्यास्पद कुछ हो सकता है? मगर हमारे धर्म ग्रंथ जिन्हें पुरुषों ने लिखा है इस की एक अलग ही वजह सुनाते हैं.

इंद्र का श्राप बना पीरियड्स का कारण

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इंद्र के श्राप के कारण महिलाओं को पीरियड्स होते हैं. एक कहानी के अनुसार इंद्र ने एक ब्राह्मण की हत्या की थी. स्वर्ग पर असुरों ने विजय प्राप्त कर ली थी और उस वक्त इंद्र मदद के लिए ब्रह्मा के पास गए. ब्रह्मा ने उन्हें एक अन्य ब्राह्मण के पास जाने का मार्ग दिखाया. उस ब्राह्मण की पत्नी राक्षसी थी और उस ने इंद्र की तपस्या सफल ना होने दी. इस से क्रोधित हो कर इंद्र ने ब्राह्मण और उस की पत्नी दोनों को मार दिया.

मारने के बाद इंद्र को यह अहसास हुआ कि उन्होंने एक ब्राह्मण की हत्या की है जिस से उन्हें पाप लगा है. इस का उपाय जानने के लिए जब वो ब्रह्मा के पास गए तब उन्होंने कहा कि इंद्र को अपने पाप को कई हिस्सों में बांटना होगा जिस से उन का पाप कम हो जाए. ऐसे में धरती, पेड़, जल और महिला को उन्होंने पाप का भागीदार बनाया. धर्म में यही कारण दिया जाता है कि महिलाओं को पीरियड्स होने लगे.

इस अजीबोगरीब कारण की कल्पना पुरुष सत्तावादी समाज ही कर सकता है जो हर हालत में स्त्रियों को कमजोर, पापी और तुच्छ साबित करने में लगा रहता है. स्त्री का मानो अपना कोई वजूद नहीं. जैसा धर्मगुरुओं और पुरुषों ने चाहा वैसा उसे बना दिया गया. अपने स्वार्थ के लिए जैसे चाहा उस के शरीर का उपयोग किया और फिर उसे कोई सम्मान कोई अधिकार भी नहीं दिया. इस तरह का व्यवहार अब स्त्रियां नहीं सह सकतीं. क्योंकि अब वह किसी पर आश्रित नहीं. वह खुद बच्चा पैदा कर उसे पाल सकती है. अपने बल पर जी सकती है. क्योंकि आज उस के पास शिक्षा का हथियार है. वह खुद को साबित कर सकती है.

शादी के बाद काम करना या न करना या बच्चे पैदा करना या न करना एक महिला की पूरी तरह से निजी पसंद है. एक महिला के लिए अपनी शादी के बाद भी अपने कैरियर के बारे में सोचना उस का हक है क्योंकि यह उसे अपने सपनों और आकांक्षाओं को जीने की अनुमति देता है और साथ ही साथ उस की वित्तीय स्वतंत्रता के लिए रास्ता बनाता है. अगर इस दौरान वह कुछ साल मां बनना न चाहे तो इस में किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए. बच्चा एक स्त्री के शरीर में है तो उस से जुड़े फैसले लेने को वह स्वतंत्र क्यों नहीं.

आज 21वीं सदी में स्त्रियों को पुरुषों के रहमोकरम पर जीने की जरूरत नहीं. वह अपना और अपने कोख के बच्चे का ख्याल रख सकती है इसलिए उस की कोख से जुड़े फैसले करने का हक़ किसी को नहीं मिलना चाहिए. न धर्म को, न समाज को, न परिवार को और न पति को. यह हक सिर्फ और सिर्फ उस का है.

33 साल बाद राज्यसभा से रिटायर हुए पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह

एक अर्थशास्त्री के रूप में अपने करियर की ऊंचाइयों को छू रहे डॉ. मनमोहन सिंह अचानक राजनीति में कैसे आ गए? यह किस्सा बहुत दिलचस्प है. मनमोहन सिंह को राजनीति में लाने का पूरा श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को जाता है.

सन 1991 में नरसिम्हा राव की राजनीतिक पारी का एक तरह से अंत हो चुका था. उनकी किताबों का वजन लादकर एक ट्रक दिल्ली से हैदराबाद की ओर रवाना हो चुका था कि तभी 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गयी. इसके बाद तेजी से घटनाक्रम बदलने लगे. नरसिम्हा राव को जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह जल्द ही भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं.

राजीव की मृत्यु से देश की सहानुभूति कांग्रेस के प्रति उमड़ उठी. 1991 के भारतीय आम चुनाव में, नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और 244 सीटें जीतीं और उसके बाद उन्होंने अन्य दलों के बाहरी समर्थन के साथ अल्पमत सरकार बनाई और वह प्रधानमंत्री बने. दक्षिण से आने वाले राव भारत और गैर- हिन्दी भाषी पृष्ठभूमि से प्रधानमंत्री बनने वाले दूसरे व्यक्ति थे.

प्रधानमंत्री बनने से पहले नरसिम्हा राव कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ रह चुके थे. स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालय वह पहले देख चुके थे. वह भारत के विदेश मंत्री भी रह चुके थे. परन्तु एक ही विभाग ऐसा था जिसमें उनका हाथ तंग था, वह था वित्त मंत्रालय. पीएम बनने से दो दिन पहले कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा ने उन्हें 8 पेज का एक नोट थमाया जिसमें बताया गया था कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है.

ऐसे में राव को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और उनके घरेलू विरोधियों को यह सन्देश दे सके कि भारत अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगा. उन्होंने उस समय के अपने सलाहकार पीसी अलेक्जेंडर से पूछा कि क्या आप वित्त मंत्री के लिए ऐसे शख्स का नाम सुझा सकते हैं जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता हो. अलेक्जेंडर ने उन्हें रिजर्व बैंक के गवर्नर और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक रहे आई.जी. पटेल का नाम सुझाया. परन्तु आई. जी. पटेल दिल्ली नहीं आना चाहते थे क्योंकि उन दिनों उनकी मां सख्त बीमार थीं. उस समय वह वडोदरा में रह रहे थे. ऐसे में अलेक्जेंडर ने दूसरा नाम लिया – मनमोहन सिंह.

अलेक्जेंडर ने शपथ ग्रहण समारोह से एक दिन पहले मनमोहन सिंह को फोन किया. उस समय वह सो रहे थे. कुछ घंटे पहले ही वह विदेश से लौटे थे. जब उन्हें उठाकर इस प्रस्ताव के बारे में बताया गया तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ. अगले दिन शपथ से तीन घंटे पहले मनमोहन सिंह के पास यूजीसी के दफ्तर में नरसिम्हा राव का फोन आया – मैं आपको अपना वित्त मंत्री बनाना चाहता हूं.

वित्त मंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह राजीव-इंदिरा की नीतियों को पलटते हुए देश को आर्थिक सुधारों की ओर ले गए. मनमोहन सिंह 1991 से 1996 तक नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहे और 2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे. मनमोहन सिंह की नीतियों की बदौलत उनके प्रधानमंत्री रहते हुए भारत 27 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सफल हुआ.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मनमोहन सिंह के बारे में एक बार कहा था कि जब भी भारतीय प्रधानमंत्री बोलते हैं तो पूरी दुनिया उन्हें सुनती है.

आज जीवन के 91 बरस पूरे कर चुके डॉ. मनमोहन सिंह मनमोहन सिंह ने अपनी शिक्षा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की थी. साथ ही उन्होंने दुनिया की प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की थी. डॉ. मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय के अलावा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और दिल्ली विश्वविद्यालय में शैक्षणिक कार्य भी किया.

1991 में वे पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने थे. 1991 के आर्थिक सुधारों में उनका अहम रोल रहा. साल 1991 में पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने बजट के दौरान उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से जुड़ी अहम घोषणाएं की, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिल सकी. इसके चलते देश में व्यापार नीति, औद्योगिक लाइसेंसिंग, बैंकिंग क्षेत्र में सुधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति से जुड़े नियम-कायदों में बदलाव किए गए.

मनमोहन सिंह 1982 से 1985 तक भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे. इस दौरान कई बैंकिंग सुधार किए थे. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ भी काम किया. वह वर्ष 1966-1969 के दौरान संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए आर्थिक मामलों के अधिकारी के रूप में चुने गए थे।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. मनमोहन सिंह 1985 से 1987 तक योजना आयोग के प्रमुख के पद पर भी रह चुके हैं. साथ ही उन्होंने 1972 और 1976 के बीच मुख्य आर्थिक सलाहकार समेत कई पदों पर कार्य किया.

1987 से 1990 तक संयुक्त राष्ट्र में मनमोहन सिंह का कार्यकाल दक्षिण आयोग के महासचिव के तौर पर था, जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक इंटर-गवर्नमेंटल संगठन है. साल 1991 में वे असम से राज्यसभा सदस्य चुने गए. इसके बाद वह साल 1995, 2001, 2007 और 2013 में फिर राज्यसभा सदस्य बने. 1998 से 2004 तक जब भाजपा सत्ता में थी, तब वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे. 1999 में उन्होंने दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं पाए. बाद में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो लगातार दस साल तक डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे. पहली बार डॉ. मनमोहन सिंह ने 2004 के आम चुनावों के बाद 22 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. उसके बाद 22 मई 2009 को सरकार के दूसरे कार्यकाल के लिए पद की शपथ ली. ऐसे में उन्होंने दो बार लगातार 10 साल तक पीएम की कुर्सी पर बैठ कर देश चलाया.

आज राज्यसभा से उनकी रिटायरमेंट के अवसर पर कांग्रेस के अनेक नेता काफी भावुक नज़र आये. खासतौर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे. खड़गे ने भावुक होते हुए मनमोहन सिंह के नाम एक खत भी लिखा. जिसमें उन्होंने कहा कि अब आप राज्यसभा में नहीं होंगे. मगर इसके बाद भी आपकी आवाज देश की जनता के लिए उठती रहेगी. तीन दशकों से अधिक समय तक देश की सेवा करने के बाद आज जब आप राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे हैं, तो एक युग का अंत हो रहा है. बहुत कम लोग कह सकते हैं कि उन्होंने आपसे अधिक समर्पण और अधिक निष्ठा से हमारे देश की सेवा की है. बहुत कम लोगों ने देश और उसके लोगों के लिए आपके जितना काम किया है. आपके मंत्रिमंडल का हिस्सा बनना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से सौभाग्य की बात है. पिछले दस वर्षों में जबकि मैं लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी का नेता रहा हूँ, आप हमेशा ज्ञान का स्रोत रहे हैं और ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिनकी सलाह को मैं महत्व देता हूँ. पिछले कुछ वर्षों में आपने व्यक्तिगत असुविधाओं के बावजूद कांग्रेस पार्टी के लिए उपलब्ध रहना सुनिश्चित किया है. इसके लिए पार्टी और मैं सदैव आभारी रहेंगे.

 

 

गतिअवरोधक : भाग 1- सूफी ने अपने भविष्य का क्या फैसला किया

‘‘अजमल भाई, आदाब अर्ज. मेरा यह पत्र पा कर आप अवश्य ही चौंकेंगे. इतना लंबा पत्र मैं ने पहले कभी नहीं लिखा आप को. इस के अलावा यह कि इस पत्र में जो कुछ लिख रही हूं, इस संबंध में पहले कभी कोई चर्चा मेरे और आप के बीच में नहीं चली परंतु जिंदगी में कुछ लमहे ऐसे अवश्य आते हैं जब मन होता है कि अपने अंदर जो कुछ है, वह सब किसी के सामने खोल कर रख दें.  ‘‘मेरी जिंदगी में भी वह लमहा आ गया है जब मैं अपने अंदर की सारी बातें कह देना चाहती हूं. इस का एक कारण यह भी है कि मैं भविष्य में जो कुछ करने जा रही हूं, उस का औचित्य कम से कम उस व्यक्ति के समक्ष रख दूं जिसे मैं बहुत आदर और सम्मान की दृष्टि से देखती हूं और चाहती हूं कि उस व्यक्ति के मन में मेरे द्वारा उठाए गए कदम को ले कर कोई गलतफहमी न रहे.’’ सूफी का पत्र पढ़ते हुए मैं चिंतित हो उठा.

कितनी ही आशंकाएं मन में उभरने लगीं. मेरे स्थान पर सूफी से परिचित कोई भी व्यक्ति होता तो वह भी आशंकित हुए बिना न रहता. लगभग 30 वर्ष की आयु को पहुंचने तक कोई सुंदर और सुशिक्षित लड़की, जिस का हाथ थामने के लिए एकदो नहीं, बीसियों लड़के चक्कर काटते रहे, जिस के लिए शहर के संपन्न और सभ्य परिवारों से रिश्ते की मांग की जाए, यदि कुंआरी बैठी रहे, मांबाप चाहते हुए भी उस की शादी नहीं कर पाएं तो उस लड़की का जीवन कितना दुखमय बन जाएगा, इस की कल्पना सहज ही की जा सकती है. और फिर वह लड़की यदि इस प्रकार का पत्र लिखे तो आशंका होती है कि कहीं वह नींद की गोलियां अधिक मात्रा में ले कर आत्महत्या करने तो नहीं जा रही. उस के पत्र पर मेरी नजरें शीघ्रता से फिसलने लगीं. ‘‘आप भलीभांति जानते हैं कि मेरी शादी को ले कर अब्बा, अम्मा और भाईजान बेहद चिंतित हैं और उन की यह चिंता आज से नहीं, 8-10 वर्षों से कायम है.’’

सूफी के इन शब्दों में छिपी व्यंग्य की तीव्रता को केवल वही व्यक्ति अनुभव कर सकता है जो उस के परिवार के इन तीनों सदस्यों से पूरी तरह परिचित हो. मैं सूफी के पिता साजिद चाचा से भी अच्छी तरह परिचित हूं और उस की मां से भी. उस का भाई वाजिद मेरे साथ ही कालेज में पढ़ा है. हम दोनों ने कई वर्ष एक ही परिवार के सदस्यों की भांति गुजारे हैं और सूफी के लिए वर ढूंढ़ने में ये तीनों जिस प्रकार प्रयत्नशील रहे हैं, उस से भी मैं किसी हद तक परिचित हूं. साजिद चाचा शहर के जानेमाने नेता हैं. एक प्रकार से उन के नाम का सिक्का चलता है शहर में. जितने भी प्रकार के सरकारी, अर्धसरकारी, गैरसरकारी महकमे हैं, सब के निम्न कर्मचारी से ले कर उच्च अधिकारी तक उन के नाम का लोहा मानते हैं. चाहे जिस महकमे के अधिकारी की छुट्टी करवा दें, जिसे चाहें कुरसी पर चिपका दें. प्रदेश और देश की राजधानी उन के लिए घरआंगन है. जनसेवा उन के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है और इस ‘जन’ की परिधि में सर्वप्रथम वे अपने परिवारजनों को सम्मिलित करते हैं. सो, जो भी कार्य करते हैं अपने परिवार के लोगों के संपूर्ण हितों को सर्वोपरि मान कर करते हैं.

वे नेता वर्ग को जनता का सर्वश्रेष्ठ हितैषी मानते हैं. अन्य वर्गों के लोगों को निम्न श्रेणी में रखते हैं.  सूफी के लिए योग्य वर का चयन  करते समय साजिद चाचा अपने   इसी दृष्टिकोण को समक्ष रखते हैं और ऐसा वर चाहते हैं जो पूर्णरूप से एक सफल नेता हो या ऐसा अभिनेता हो जिस में नेता बनने के सभी गुण विद्यमान हों. आज के युग में ऐसे युवकों की कोई कमी भी नहीं है. कालेजों में छात्रसंघों के नेता, कार्यालयों में कर्मचारी संघों के नेता, कारखानों में मजदूर संघों के नेता और महल्लों में महल्ला सुधार समितियों के नेता युवावर्ग से ही उभर रहे हैं. परंतु जब भी साजिद चाचा ने सूफी के लिए किसी ऐसे ही प्रतिभाशाली युवा नेता का चयन किया है, तब उसे सूफी की मां या भाई ने कोई न कोई तर्क दे कर नापसंद कर दिया है. हां, सूफी के घर की तीनों महाशक्तियों को यह अधिकार या वीटो पावर प्राप्त है और वास्तविकता यह है कि इन्हीं तीनों के कारण आज तक वह कुंआरी बैठी है.

अपने विचारों को बीच में ही छोड़ कर मैं फिर पत्र पढ़ने लगा. ‘‘इन 8-10 वर्षों की लंबी अवधि में एकदो नहीं, बीसियों रिश्ते आए हैं. अभी कुछ माह पहले ही सुलतानपुर से बड़े मामूजान ने डा. तनवीर को घर भेजा था. इस से पूर्व मामूजान का पत्र आया था जिस में डा. तनवीर के संबंध में पूरी जानकारी थी. यह नेत्र विशेषज्ञ के रूप में एक वर्ष पूर्व ही सरकारी नौकरी में आए थे. इन के पिता पास के एक जिले के जिलाधीश थे. घर में मां के अतिरिक्त केवल एक छोटा भाई था. अच्छा संपन्न और सभ्य परिवार था इन का. ‘‘मामूजान का खत पा कर घर में सब को डा. तनवीर का इंतजार था. वे निर्धारित तिथि पर हम लोगों से मिलने आए. खाने की मेज पर सब से मुलाकात हुई. अम्मा और भाईजान उन्हें देख कर बहुत खुश हुए, लेकिन अब्बा को जब पता चला कि डा. तनवीर को राजनीति से कोई सरोकार नहीं रहा है तो वे एकदम उदास हो गए. अपनी पढ़ाई के दिनों में उन्होंने छात्रसंघ की गतिविधियों से खुद को अलग ही रखा था. ऐसा कर के ही वे विश्वविद्यालय में सब से ज्यादा अंक ला सके थे.

मैं दांतों के पीलेपन से परेशान हूं, इसे साफ करने का उपाय बताएं?

सवाल

मैं 28 साल की युवती हूं. देखने में खूबसूरत हूं लेकिन मेरे दांतों का पीलापन मेरी खूबसूरती को फीका कर देता है, जबकि मैं रैग्युलर दोनों वक्त सुबह व रात को सोने से पहले ब्रश कर के सोती हूं. मैं दांतों के डाक्टर के पास नहीं जाना चाहती. कुछ आसान से घरेलू उपाय बताएं जिन्हें अपना सकूं.

जवाब

कुछ आहार ऐसे होते हैं जिन में टैनिक एसिड उच्च मात्रा में होता है जिस से दांतों में पीलापन आ जाता है. इस के अलावा कौफी और सोडा से भी दांत पीले हो सकते हैं. धूम्रपान, कुछ मैडिकल ट्रीटमैंट चल रहा हो या सही तरीके से ब्रश न करना या फिर अत्यधिक फ्लोराइड के कारण भी दांतों का पीलापन बढ़ने लगता है.

खैर इन में कोई वजह आप को नहीं दिख रही है तो अपने खानपान पर ध्यान दें. शरीर में पोषण या कैल्शियम की कमी होगी तो कितने ही नुस्खे अपना लें, दांत सफेद नहीं होंगे. इसलिए आहार विटामिन डी और कैल्शियम से भरपूर लें. चिपचिप कैंडी, स्टार्चयुक्त खाद्य पदार्थ, कार्बोनेटेड पेय पदार्थ का सेवन न करें.

रही बात घरेलू उपाय अपनाने की तो बेकिंग सोडा दांतों पर रगड़ें या टूथपेस्ट में मिला कर ब्रश कर सकती हैं. आप चाहें तो इस में नमक भी मिला सकती हैं. नारियल का तेल 15-20 मिनट दांतों पर लगा रहने दें फिर ब्रश कर लें. पीलापन कम होगा. हींग पाउडर को पानी में उबाल कर ठंडा कर लें. दिन में 2 बार इस से कुल्ला करें. ये कुछ घरेलू उपाय हैं जो आप अपना सकती हैं.

केजरीवाल और सोरेन को जेल भेज कर भाजपा ने इंडिया गठबंधन को कैसे दी मजबूती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता को संबोधित करने के लिए मंच पर जब आते हैं तो जनता के रोजमर्रा के हित से जुड़ी कोई बात उन के भाषण में नहीं होती है. न वे गरीबों के बच्चों की शिक्षा की बात करते हैं, न युवाओं को रोजगार देने की बात करते हैं, न बढ़ती महंगाई को कम करने की बात करते हैं, न बिजली-पानी-रसोई गैस की दरों में कमी लाने की बात करते हैं, न पुरानी पैंशन पर कोई आश्वासन और न किसानों को कोई राहत. वे मंच पर चढ़ कर पहली बात यह बताते हैं कि आज उन को कितने नंबर की गाली पड़ी. आज उन को विपक्ष के किस नेता ने क्या कहा.

प्रधानमंत्री मोदी मंच से लोगों को बताते हैं कि हम विश्व की सब से बड़ी इकोनौमी बनने वाले हैं, हम विश्वगुरु बनने वाले हैं, भव्य राम मंदिर बनने से विश्व में भारत का गौरव बढ़ रहा है. सेनाओं का शौर्य बढ़ रहा है. लेकिन इन बातों से आम आदमी को क्या लेनादेना? देश का गरीब आदमी जिस को दोपहर की दो रोटी मिलने के बाद इस बात की चिंता होने लगती है कि पता नहीं रात की रोटी उस को और उस के बच्चों को मिलेगी या नहीं, उस को आप के विश्वगुरु हो जाने से क्या फायदा? आप विश्वगुरु हो जाएं या अंतरिक्ष गुरु, अगर गरीब के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं कर सकते, उस के बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकते, उस के जवान लड़के के हाथों को रोजगार नहीं दे सकते, तो उस की नजर में आप जीरो हैं.

भाजपा जहांजहां भी सत्ता में आई वह रोटी-रोजगार के मुद्दे पर नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर देश की जनता के बीच घृणा, वैमनस्य और ध्रुवीकरण पैदा कर के आई है. उस ने जनता को डराया कि हिंदू खतरे में है. उस ने विश्वास दिलाना चाहा कि राम मंदिर निर्माण से ही धर्म की रक्षा होगी. नोटबंदी कर कालाधन निकालने और गरीब के खाते में 15-15 लाख रुपए डालने की झूठी बातें फैला कर उसे झांसे में लिया, मगर सत्ता पाने के बाद वह न गरीब की हुई, न किसान और जवान की. वह तो उद्योपतियों, पूंजीपतियों की कठपुतली बन कर रह गई.

आज भाजपा की बड़ीबड़ी बातों में आम आदमी – किसान, मजदूर, जवान कहीं नहीं है. जबकि विपक्ष के नेता सड़क से संसद तक सीधे जनता से जुड़े मसलों पर बात करते हैं. खासतौर पर आम आदमी पार्टी के नेता और नेतृत्व न सिर्फ जनता के हित की बातें करते आए हैं, बल्कि उन्होंने किया भी है.

आज दिल्ली की अधिकांश जनता को प्रतिमाह आने वाले बिजली-पानी के हजारों रुपए के बिल से राहत मिल चुकी है. गरीबों के बच्चे जिन सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं उन की व्यवस्था किसी प्राइवेट स्कूल की व्यवस्था से कम नहीं है. यही वजह थी कि अरविंद केजरीवाल के पहले मुख्यमंत्रित्व काल का सुशासन देख दूसरी बार भी दिल्ली की जनता ने उन्हें सिरआंखों पर बिठाया. पंजाब में कांग्रेस की जड़जमाई सत्ता को उखाड़ फेंका और आम आदमी पार्टी की सरकार बनवा दी. आजादी के बाद के सात दशकों में आम आदमी पार्टी पहली राजनीतिक पार्टी है जिस ने इतनी तेजी से अपनी जगह जनता के दिल में बनाई.

मगर आम आदमी पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता भाजपा को खटक गई. भाजपा जो आने वाले चंद सालों में ही तानाशाह होने का सपना देखने लगी थी, को आम आदमी पार्टी के कार्यों और उस की लोकप्रियता से खौफ पैदा हो गया. तानाशाही को जनता के सवाल, जनता के मुद्दे पसंद नहीं हैं. लिहाजा, जनता के लिए काम करने वाली पार्टी को खत्म करना जरूरी हो गया. इस के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए पूरी रणनीति तैयार की गई.

पीएमएलए कानून में बदलाव किया गया. कानून को ऐसा बना दिया कि सिर्फ आरोप लगाने भर से ही किसी को जेल भेजा जा सकता है. फिर केजरीवाल पर सीधे हाथ न डाल कर ईडी के जरिए पहले आम आदमी पार्टी के सैकंड लाइन के नेताओं सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह को शराब घोटाले में जेल में डाला गया. जबकि आज तक ईडी इस मनीलौन्ड्रिंग केस में फूटी कौड़ी बरामद नहीं कर पाई है. अब आम चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी जेल भेज दिया गया है ताकि चुनाव में खुल कर खेलने के लिए मैदान खाली हो जाए.

लंबे समय से भाजपा की कोशिश थी कि किसी तरह दिल्ली की सरकार गिरा दी जाए और आम आदमी पार्टी के नेताओं को बिखरा दिया जाए. साथ ही साथ वे केंद्रीय जांच एजेंसियों के माध्यम से कांग्रेस को भी धमकाते रहे, तृणमूल के लिए भी मुसीबतें पैदा करते रहे तो बहुजन समाज पार्टी की मायावती को भी धौंस में लिए रहे. कुल जमा यह कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों को गिराने और उन के गठबंधनों को तोड़ने की रणनीति में भाजपा ने अमानवीयता की सारी हदें पार कर दीं.

विपक्षी नेताओं को डराने के लिए सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो), आईटी (आयकर विभाग) और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) जैसी जांच एजेंसियों को उन के पीछे लगा दिया गया. जो विपक्षी हाथपैर जोड़ कर भाजपा में आ गया उस के ऊपर से सारे मुकदमे हटा लिए गए; जो नहीं आए उन को ईडी के जरिए जेल में ठूंसने लगे.

भाजपा की केंद्र सरकार में अगर किसी जांच एजेंसी पर सब से ज्यादा दाग लगे हैं तो वह है ईडी. जो आरोपियों को जेल में ठूंसने के बाद आका के इशारे पर उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय तक जेल में रखने के लिए कोर्ट में तारीख पर तारीख लेती रहती है और आरोपपत्र दाखिल नहीं करती कि केस ट्रायल की स्टेज पर पहुंचे.

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि, केंद्रीय एजेंसियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों की जांच पर ही फोकस करना चाहिए. ईडी का खेल देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2 अप्रैल, 2024 को यह कहते हुए आप नेता संजय सिंह को जमानत दे दी कि जब पैसे की कोई रिकवरी अब तक नहीं हुई तो संजय सिंह को और अधिक समय तक हिरासत में रखने की आवश्यकता क्यों है? आखिर संजय सिंह 6 महीने बाद जेल से बाहर आ गए. जल्दी ही मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन भी रिहा होंगे. मगर भाजपा को फिर भी शर्म नहीं आएगी.

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी भारतीय जनता पार्टी की आसन्न हार के मद्देनजर बढ़ती हताशा को दर्शाती है. विपक्षी एकता से डरी भाजपा विपक्षी इंडिया गठबंधन को कमजोर करने के लिए हर दांव आजमा रही है. भाजपा आलाकमान विपक्षी गठबंधन के नेताओं को हर मंच से देश के ‘दुश्मन’ और ‘भ्रष्टाचारी’ करार देने में जुटे हैं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट का डंडा पड़ने पर जब इलैक्टोरल बौंड की हकीकत खुली तो जनता ने देखा कि सब से बड़े भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज कौन है? बावजूद इस के, भाजपा को शर्म नहीं आई और उस के तमाम प्रवक्ता गोदी मीडिया के मंच पर दूसरी पार्टियों के नेताओं से बहस के नाम पर बदतमीजियां करते ही दिखाई दिए, खासतौर पर आप नेताओं के साथ.

सत्ता के तलुवे चाटने वाला गोदी मीडिया भले दिनभर भाजपा की आरती उतारता रहे मगर दिनभर इन चैनलों को देखने वाले लोग हैं कितने? जो लोग टीवी देखते भी हैं उन को अब समाचार चैनलों के चीखतेचिल्लाते एंकरों में कोई दिलचस्पी नहीं है. असली सच तो सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर है, जहां आम जनता भाजपा को गरियाती नजर आ रही है, खासतौर पर दिल्ली की. दिल्ली की चुनी हुई सरकार को नष्ट करने के लिए जो गंदा खेल खेला जा रहा है उस से जनता में खासा आक्रोश है.

भाजपा अच्छी तरह से जानती थी कि अरविंद केजरीवाल के चुनावी प्रचार अभियान में भारी भीड़ उमड़ेगी और इसीलिए उन के प्रचार को रोकने के लिए ईडी को मुस्तैद किया गया, चुनावी तारीखों का इंतजार किया गया और आखिरकार केजरीवाल को जेल भेज दिया गया. केजरीवाल अब लंबे समय तक जेल में रहेंगे, इस की पूरी संभावना है, क्योंकि ईडी पूछताछ और सहयोग न करने के नाम पर आगे की तारीखें लेती रहेगी.

आम आदमी पार्टी में बचे कुछ मजबूत नेता जिन में सौरभ भारद्वाज और आतिशी मर्लेना के नाम सब से ऊपर हैं, को भी कुछ ही समय में सलाखों में डाल दिया जाएगा. लेकिन देश की जनता इन साजिशों को समझ नहीं रही है, या इन खबरों पर उस की नजर नहीं है, इस मुगालते में भाजपा को नहीं रहना चाहिए. जनता देख भी रही है, समझ भी रही है और लोकसभा चुनाव में जवाब देने के लिए तैयार भी बैठी है. गौरतलब है कि चुनाव आयोग से ले कर केंद्रीय जांच एजेंसियों और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के वक्तव्यों तक पर सुप्रीम कोर्ट भी पैनी नजर बनाए हुए है.

31 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली ने यह साबित कर दिया है कि देश के 2 राज्यों के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल को जेल भेजने से इंडिया गठबंधन और मजबूत हुआ है. अभी तक जो बिखराव और तनातनी गठबंधन के नेताओं के बीच दिख रही थी वह भी बिलकुल खत्म हो चुकी है.

इंडिया गठबंधन के सभी नेता रामलीला मैदान में आयोजित रैली में मौजूद थे, जबकि केजरीवाल और सोरेन के लिए मंच की पहली पंक्ति में 2 कुरसियां प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने के लिए खाली छोड़ी गई थीं. इस दौरान केजरीवाल, सोरेन और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह तथा सत्येंद्र जैन की पत्नियां भी मौजूद रहीं. इस दृश्य ने जनता के दिल में हमदर्दी ही पैदा की है. मंच से नेताओं के भाषणों ने भी इस बात को पुख्ता किया कि भाजपा द्वारा ‘अलोकतांत्रिक बाधाएं’ पैदा करने के बावजूद गठबंधन लड़ने, जीतने और देश का लोकतंत्र बचाने के लिए प्रतिबद्ध है. इस रैली में हजारों की संख्या में दिल्ली की जनता ने भाग लिया. इस से चुनाव में भाजपा को हराने का इंडिया गठबंधन का संकल्प और मजबूत हुआ है.

मेरी भाभी हमेशा शांत रहती हैं वह कुछ बताती नहीं है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी भाभी की उम्र 24 साल है. मैं उन से 2 साल छोटी हूं. मुझे लगता है कि वे डिप्रैशन में हैं. भैया और भाभी की शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ है. भाभी हमेशा या तो किताबों में डूबी रहती हैं या एकटक किसी दिशा में देखती रहती हैं. मुझे नहीं लगता कि वे भैया के साथ खुश हैं. मैं उन से पूछती हूं तो वे कुछ बताती नहीं हैं. वे कुछ खाती भी नहीं हैं, इसलिए उन का वजन भी लगातार घट रहा है. मैं उन की कैसे मदद कर सकती हूं?

जवाब

आप अपने भैया से इस बारे में बात कीजिए. हो सकता है वे अपनी पत्नी के डिप्रैशन की वजह जानते हों. वे इस में मदद कर सकते हैं. या आप अपनी भाभी से अकेले में पूछने की कोशिश कीजिए कि वे आप के भाई के साथ खुश हैं या नहीं. यदि नहीं तो इस का कारण जानने की कोशिश कीजिए. उन्हें कोई बात अंदर ही अंदर खाए जा रही होगी, इसीलिए आप को उन में अवसाद के लक्षण दिखाई देने लगे हैं. अपनी भाभी की किसी करीबी सहेली या परिवार के किसी सदस्य को इस बारे में बता दीजिए, जिस से वे मदद के लिए आगे आ पाएं.

अवसादग्रस्त व्यक्ति के मन की बात जानना बेहद कठिन होता है और इस के चलते डाक्टर से संपर्क करना अनिवार्य होता है. यदि डाक्टरी सहायता की जरूरत पड़े तो अधिक न सोचें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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