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मैं 30 साल की हूं मैं नोटिस कर रही हूं, मेरे पीरियड का रंग काला आ रहा है , ऐसे में क्या करूं?

सवाल

मैं 30 साल की हूं. पिछले 3 बार से नोटिस कर रही हूं मेरे पीरियड में खून का रंग काला आ रहा है. मैं घबराई हुई हूं. क्या यह बुरा संकेत है. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

आप के मासिकधर्म के खून का रंग आप के स्वास्थ्य की ओर संकेत करता है. इस से पहले कि आप घबराएं, हम आप को बता दें कि पीरियड ब्लड का रंग अलग होना बिलकुल सामान्य है. उदाहरण के लिए, यह गहरा लाल या भूरा, गुलाबी, ग्रे और काला हो सकता है. बहुत सी महिलाओं को यह चिंता तब होती है जब वे अपने पीरियड्स के खून को काला होते हुए देखती हैं.

एक महिला के पीरियड ब्लड का रंग और बनावट में महीनेदरमहीने या यहां तक कि एक ही पीरियड के दौरान बदलाव आ सकता है. हार्मोनल परिवर्तनों के साथसाथ एक व्यक्ति के आहारजीवनशैलीउम्र और पर्यावरण के कारण यह बदलाव हो सकता है. हालांकि संक्रमणगर्भावस्था और दुर्लभ मामलों में जैसे सर्वाइकल कैंसरअसामान्य रक्त के रंग या अनियमित रक्तस्राव का कारण बन सकता है.

इस बात का ध्यान रहे कि अगर ब्लैक पीरियड ब्लड के साथ असामान्य योनि स्रावदुर्गंध और खुजली हो तो तुरंत डाक्टर से सलाह लें. ऐसे मामलों में देरी न करें.

मार्च का अंतिम सप्ताह कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार

2024 की तिमाही का अंतिम सप्ताह बौलीवुड को थोड़ी सी राहत दे गया. पर इस राहत को ले कर लोग आश्चर्य चकित हैं. मार्च के अंतिम सप्ताह की शुरुआत गुरुवार 28 मार्च को पृथ्वीराज सुकुमारन की फिल्म “द गोट लाइफ” के प्रदर्शन से हुई. यह मलयालम फिल्म है, जिसे हिंदी तमिल तेलुगू और कन्नड़ में भी एक साथ रिलीज किया गया. तो वहीं 29 मार्च को एकता कपूर व अनिल कपूर निर्मित फिल्म ” क्रू” के साथ आकाशादित्य लामा की फिल्म “बंगाल 1947” भी रिलीज हुई.

पृथ्वीराज सुकुमारन की मुख्य भूमिका वाली बेसस्ली निर्देशित फिल्म “द गोट लाइफ” एक अच्छी व संदेश परक फिल्म है, पर 3 घंटे लंबी है. इस फिल्म में दक्षिण भारत से गल्फ कंट्रीज में नौकरी करने जाने वाले लोगों को किन मुसीबतों से गुजरना पड़ता है, उस का सजीव चित्रण है.

फिल्म देखते समय रोंगटे खड़े हो जाते हैं. 85 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने लगभग 100 करोड़ कमा लिए हैं. यानी की है फिल्म एवरेज रही. इस फिल्म से नुकसान की संभावनाएं कम हैं.

29 मार्च को ही प्रदर्शित एकता कपूर व अनिल कपूर निर्मित तथा राजेश कृष्णन निर्देशित फिल्म ‘क्रू’में तब्बू ,करीना कपूर व कृति सैनन की मुख्य भूमिकाएं हैं. इस फिल्म की कहानी के केंद्र में 3 एयर होस्टेस हैं, जिन पर सोने की स्मगलिंग का आरोप लगता है. वह भी भारत से विदेशों में अवैध तरीके से सोना ले जाने का जब कहानी आगे बढ़ती है, तो लोगों को लगता है कि यह कहानी तो विजय माल्या की असली कहानी है. यह अति कमजोर और अविश्वसनीय दृश्यों वह द्विअर्थी संवादों से भरी फिल्म है. और इस फिल्म को दर्शक मिलने की उम्मीदें नहीं थी, लेकिन सनक डांट काम के अनुसार इस फिल्म ने 43 करोड़ कमा लिए हैं. जबकि इस फिल्म का बजट 75 करोड़ है. लेकिन फिल्म के पीआरओ का दावा है कि फिल्म ने 87 करोड़ 28 लाख कमाए हैं.

फिल्म ‘क्रू’ के निर्माताओं पर कौर्पोरेट बुकिंग के आरोप लग रहे हैं. बहरहाल यह फिल्म एवरेज रही और फिल्म इंडस्ट्री के लिए तो सुखद ही कहा जाएगा.

29 मार्च को ही आकाशादित्य लामा की फिल्म ‘बंगाल 1947’ रिलीज हुई. इस फिल्म की कहानी के केंद्र में शबरी व मोहन की खूबसूरत प्रेम कहानी है. मगर फिल्मकार ने बेवजह एक खास विचारधारा वालों को खुश करने के चक्कर में कुछ अनचाहे दृश्य जोड़ दिए हैं जिस से फिल्म का सत्यानाश हो गया.

इस फिल्म का नाम पहले ‘शबरी का मोहन’था पर बाद में बदल कर “बंगाल 1947” किया गया. फिल्मकार का यह निर्णय गलत रहा. इस वजह से भी दर्शकों ने इस फिल्म से दूरी बना कर रखी.

यूं तो यह फिल्म बहुत कम सिनेमाघर में रिलीज हुई. प्राप्त सूत्रों के अनुसार इस फिल्म ने पूरे सप्ताह 10 लाख रुपए भी नहीं कमाए. वैसे अभी तक निर्माता ने बौक्स औफिस के आंकड़े को ले कर चुप्पी साध रखी है.

कायनात मुस्कुरा उठी- भाग 3: पराग की मनोदशा आखिर क्यों बिगड़ी?

“यह कैसी बातें कर रहे हो पराग? हिम्मत हारोगे तो  कैसे काम चलेगा? अभी तुम्हारा घाव ताजा है.  इसलिए कंसंट्रेट नहीं कर पा रहे हो. देखना, थोड़े दिनों में तुम पहले की तरह पढ़ाई करने लग जाओगे. अगर थक गए हो तो थोड़ा लेट लो. आधा घंटे बाद मेरी मीटिंग है. तब तक मैं फ्री हूं. चलो, तब तक एक पावर नैप ले लेते हैं यार. मैं भी सुबह से बैठेबैठे थक गई हूं,” कहते हुए वह उसे  अपनी बांह में जकड़ उस से चिपक कर लेट गई, लेकिन रोते हुए पराग ने उस से छिटक कर दूर होते हुए कहा,”नहीं, मुझे लगता है कि मैं एक पैरासाइट की लाइफ बिता रहा हूं, हर चीज के लिए तुम पर डिपेंडेंट हो गया हूं. मुझ से यह जिंदगी नहीं जी जा रही है यार, समझा करो. कभी सोचा ना था कि मुझे यह दिन भी देखना पड़ेगा, जब मैं हर चीज के लिए तुम्हारा मोहताज हो जाऊंगा. नहीं… नहीं, बस और नहीं, मुझे जयपुर जाने दो.”

“यह तुम कह रहे हो पराग? क्या हम अलगअलग हैं?  तुम तो अपने प्यार की कसमें खाया करते थे, दुहाई दिया करते थे. तो अब वो वादे, वो कसमें क्या हुए? याद है, तुम हमेशा क्लास में फर्स्ट आया करते थे और  मैं हमेशा टॉप टेन के आखिर में रहा करती थी. तुम को हरगिज हिम्मत नहीं हारनी  है. मैं तुम्हें गाइड करूंगी. यह हो ही नहीं सकता कि तुम सीए नहीं बनो.”

“नहीं तानी, अब पढ़ाई करना मेरे बस की बात नहीं है. बहुत कोशिश कर ली, नहीं हो पा रहा है मुझ से. इतनी देर से यह बैलेंसशीट टेली करने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन हो ही नहीं  रही. समझो यार, मैं कोई नाटक नहीं कर रहा, फैक्ट बता रहा हूं. मुझे वापस जयपुर जाने दो.”

“नहीं, मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूंगी. हम शादी करेंगे, अपनी एक खूबसूरत दुनिया बसाएंगे, जिस में बस तुम होगे और मैं. मरते दम तक हम साथ रहेंगे. तुम सीए  बनोगे और जरूर बनोगे.

“जब मैं सीए बन सकती हूं, तो तुम क्यों नहीं बन सकते? तुम मुझ से कहीं ज्यादा इंटेलिजेंट हो,” यह कहते हुए उस ने पराग को एक बार फिर अपनी बांहों  में भींच लिया. उस को बेहद ममता से चूमते हुए वह बुदबुदाई, “तुम्हारा ड्रीम जरूर पूरा होगा, यह तुम्हारा नहीं हम दोनों का ड्रीम है.”

पराग को उस की बातों से बेहद हिम्मत मिली.

वक्त के साथ उस के समर्पित सहयोग से वह धीरेधीरे सामान्य होता गया. धीरेधीरे उस का कंसंट्रेशन वापस आने लगा, और वह पहले से कहीं अधिक एकाग्रता से पढ़ने लगा.

उस बार पराग ने आशंकित ह्रदय से सीए फाइनल परीक्षा दी, लेकिन नियति तो इन दो प्यार करने वालों का कड़ा इम्तिहान लेने पर आमादा थी.

दो माह बाद परिणाम निकला, लेकिन पराग उसे उत्तीर्ण नहीं कर पाया. दोनों के सपने मिट्टी में मिल गए, लेकिन वह परिस्थितियों के सामने सहजता से घुटने टेकने वालों में से नहीं थी.

उस ने एक बार फिर से पराग को हिम्मत दी और उसे फिर से पूरे जोश से परीक्षा की तैयारी करने के लिए हौसला दिया.

दुर्घटना घटे खासा वक्त गुजर चुका था. पराग बहुत हद तक संभल चुका था. सो, इस बार वह पूरी लगन से फाइनल की तैयारी में जुट गया और तय वक्त पर उस ने सीए का फाइनल एग्जाम दे दिया.

इस बार पराग के पेपर बहुत शानदार हुए. उसे पूरीपूरी उम्मीद थी कि वह इस बार फाइनल एग्जाम क्रैक कर लेगा.

तभी  कोविड-19 के प्रकोप की वजह से आई मंदी के चलते तानी की कंपनी में छंटनी हुई और उस की नौकरी चली गई. उन दोनों पर घोर आर्थिक संकट के बादल मंडराने लगे. कुछ दिन तो उन्होंने बेहद तंगी में गुजारे. दोनों पराग और तानी को अपनेअपने परिवारों से कोई उम्मीद न थी. तीन माह पूरे होतेहोते उस की बचत पूरी तरह से खत्म हो गई और दोनों के सड़क पर आने के आसार नजर आने लगे.

तभी एक दिन अचानक दादाजी को अपने दरवाजे पर देख उसे और पराग को जैसे जीवनदान मिला. अगले ही दिन उन्हें अपना फ्लैट खाली करना था और उन के पास कुल जमापूंजी के नाम पर मात्र एक हजार रुपए बचे थे. परले ही दिन से उन के रहने का कोई ठिकाना नहीं था.

वह और पराग  दादाजी के साथ जयपुर उन के  घर आ गए. लगभग एक सप्ताह बाद दादाजी ने दोनों के विवाह की तिथि निकलवाने के लिए अपने खानदानी पंडित को बुलवा भेजा.

पंडितजी ने दोनों की कुंडलियों का मिलान कर दादाजी से कहा, “जजमान, दोनों की कुंडलियां नहीं मिल रही हैं. अगर आप ने दोनों को विवाह बंधन में बांध भी दिया, तो दोनों जीवनभर दुख पाएंगे. दोनों की ग्रहदशा बहुत अशुभ है.  दोनों का अमंगल ही अमंगल होगा.”

पंडितजी की बातें सुन कर दादाजी का चेहरा लटक गया कि तभी कमरे के एक कोने पर लैपटाप के सामने बैठी तानी खुशी से चीखी, “दादाजी, मुझे एक दूसरी नौकरी मिल गई. एक बढ़िया कंपनी में पहले से ड्योढ़ी सैलरी पर. अगले वीक से ही मुझे जौइन  करना है दिल्ली में.”

तानी की नई नौकरी लगने की खबर सुन कर सब के चेहरे खिल उठे. घरभर में उछाहउमंग की लहर फैल गई कि तभी पराग का एक दोस्त घर में चिल्लाते हुए घुसा,” पराग भाई, सीए का रिजल्ट आ गया है. नेट पर देख कि तेरा क्या रहा?”

धड़कते दिल से तानी ने पराग का रिजल्ट चेक किया, और कंप्यूटर स्क्रीन पर उस का नाम और रोल नंबर देख तानी खुशी के अतिरेक से उमगते हुए चीखी, “पराग, पराग, तू पास हो गया. सुन रहा है, तू सीए बन गया. हमारा सपना पूरा हुआ.”

तभी पराग ने पंडितजी से कहा, “पंडितजी, आप तो कह रहे थे कि दोनों की कुंडली नहीं मिल रही. शादी का खयाल छोड़ दो, लेकिन यहां तो शादी की बात चलाते ही दोदो खुशखबरी मिल गई. अब क्या कहते हैं पंडितजी,” और गले में थूक  निगलते घबराए हुए से पंडितजी बोले, “बेटा,  जरूर आप दोनों बच्चों के जन्म का समय सही नहीं होगा, तभी यह गड़बड़ी हुई है.”

“पंडितजी, अब मुझे कोई कुंडलीवुंडली नहीं मिलानी.  अब मैं खुद ही कोई अच्छा सा दिन देख कर इन की शादी का दिन तय कर देता हूं,” इस बार दादाजी बोले  और उन की बातें सुन कर पंडितजी बगलें झांकने लगे.

दादाजी ने अपने जिगर के टुकड़ों की शादी के लिए एक संडे चुना.

आज उन दोनों की सगाई और संगीत संध्या के प्रोग्राम  हंसीखुशी संपन्न हुए. कल उस की शादी है.

तभी दूर कहीं रेलगाड़ी की सीटी की कर्कश ध्वनि हवा में तैरती हुई उस तक पहुंची, और वह अपनी पुरानी यादों की पोटली समेट यथार्थ के धरातल पर वापस आई.

उस ने घड़ी देखी, सुबह के 8 बजे थे, तभी जेहन में कौंधा, ‘ओह, आज तो उस की जिंदगी का यादगार दिन है.’ इस खुशनुमा खयाल से वह होंठों ही होंठों में मुसकरा दी.

वह पलंग पर लेटेलेटे अंगड़ाई ले ही रही थी कि तभी उस के दरवाजे पर दस्तक हुई.

“तानी बेटा दरवाजा खोलो.”

“जी, दादाजी.”

“गुडमार्निंग दादाजी,”और यह कहते हुए उस ने उन के पैर छू लिए.

“सदा सुखी रहो बेटा,” दादाजी ने उसे आशीर्वाद दिया.

तभी उन के पीछे आते पराग ने हंसते हुए दादाजी से कहा, “दादाजी, मुझे आशीर्वाद नहीं देंगे?”

“अरे बेटा, मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तेरे साथ है,” यह कहते हुए दादाजी ने पराग  और तानी दोनों को अपनी बांहों में भर लिया.

दोनों बच्चों को कलेजे से लगा कर उन्हें यों लगा था मानो और कुछ पाना शेष न रहा था. बरसों से आंखों में सजा पोते की शादी का ख्वाब आज सच होने आया था. वह मुसकरा दिए. तभी फिजां में शहनाई की मधुर स्वरलहरी गूंजी. उन्हें लगा, उन के साथसाथ पूरी कायनात मुसकरा रही थी.

चुनाव से पहले सत्तापरस्त एजेंडे वाली फिल्में : क्या गुल खिलाएंगी?

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि समाज से संवाद करने का सीधा माध्यम भी है. सिनेमा समाज पर प्रभाव भी डालता है. यही वजह है कि पूरे विश्व के हर देश की सरकार बदलने के साथ ही वहां का सिनेमा बदलता रहा है. इस से भारतीय फिल्म उद्योग भी अछूता नहीं रहा. आजादी के बाद नेहरू की नीतियों की तर्ज पर सिनेमा बनता रहा. फिर कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों व सोच के मुताबिक ‘इप्टा’ हावी हुआ और इप्टा से जुड़े लोगों ने वैसा ही सिनेमा बनाया.

श्याम बेनेगल व गोविंद निहलानी जैसे फिल्मकारों को पश्चिम बंगाल के उद्योगपति वहां की सरकार के दबाव में सिनेमा बनाने के लिए उन्हें धन मुहैया कराते रहे. मगर इन फिल्मकारों ने एजेंडा वाला सिनेमा बनाते हुए भी सिनेमा की तरह ही बनाया. जिस के चलते इन फिल्मकारों या इन की फिल्मों पर ‘एजेंडा वाला’ सिनेमा का लैवल नहीं लगा.

आज भी वामपंथी विचारधारा वाला सिनेमा मलयालम भाषा में धड़ल्ले से बन रहा है, पर इस सिनेमा पर भी ‘एजेंडे वाला’ या ‘प्रोपगंडा वाला’ सिनेमा का आरोप नहीं लगा सकते. मगर 2014 के बाद हिंदी में ‘एजेंडे वाला’ सिनेमा और प्रोपगंडा वाला सिनेमा इस हिसाब का बन रहा है कि इन्हें खुलेआम सरकारपरस्त एजेंडा वाला सिनेमा कहा जा रहा है.

सिनेमा बना माध्यम

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने आरएसएस की सहयोगी संस्था संस्कार भारती से जुड़े तमाम लोगों के साथ बैठक की. उन के साथ इस बात पर विचारविमर्श किया कि सिनेमा के माध्यम से किस तरह अपनी नीतियों का प्रचार किया जा सकता है और किस तरह बौलीवुड पर कब्जा जमा सकते हैं. पिछले 9 वर्षों से जिस तरह का सिनेमा बन रहा है, उस पर गौर करें, तो हमें नजर आता है कि इसी बैठक का नतीजा है. भाजपा व्यवस्थित तरीके से सिनेमा में अपनी घुसपैठ बनाती जा रही है.

अभी कुछ दिनों पहले पंचकूला में वार्षिक सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिस में चित्र साधक नामक ग्रुप ने चित्र भारतीय सिने महोत्सव का भी आयोजन किया, जहां पर दक्षिणापंथी फिल्मकार एकत्र हुए थे. इस से एहसास हुआ कि अब ‘दक्षिणापंथी’ भी ‘इप्टा’ की तर्ज पर आंदोलन चला रहे हैं. पर ये लोग इप्टा की तरह प्रभाव नहीं डाल पा रहे हैं क्योंकि इप्टा में ज्ञानी, सिनेमा व कला की समझ रखने वाले उत्कृष्ट रचनात्मक लोग थे, जबकि भाजपा की संस्कार भारती या चित्र साधक ग्रुप की बात करें तो इन में विचारों का अभाव है.
ये सभी महज एक व्यक्ति पर केंद्रित हो कर सिनेमा बना रहे हैं. इस वजह से दक्षिणापंथी फिल्मकार भाजपा के इशारे पर काम करते हुए बेहतरीन फिल्में नहीं बना पा रहे हैं. पिछले 2 वर्षों में सत्तापरस्त एजेंडा वाली कुछ फिल्में बनीं, जिन में से ज्यादातर फिल्में असफल रहीं.

किस्सा ‘आरआरआर’ का

दक्षिण के फिल्मकार एस एस राजामौली की फिल्म ‘आरआरआर’ सफलतम फिल्म मानी जाती है. इस फिल्म का एक सच यह है कि 60 प्रतिशत फिल्माए जाने के बाद इस फिल्म के निर्माता ने आरएसएस के इशारे पर फिल्म में काफी बदलाव किया. आरएसएस के एक पत्र अधिकारी ने फिल्म की पटकथा नए सिरे से अपनी देखरेख में लिखवाई, जिस के चलते फिल्म के एक कलाकार को इस फिल्म से हटाया भी गया और नए कलाकार को जोड़ा गया तथा पूरी फिल्म का काफी हिस्सा फिर से फिल्माया गया. उस के बाद इस फिल्म का प्रचार करने के लिए निर्देशक राजामौली व अभिनेता प्रभाष जोशी वाराणसी भी गए, गंगा आरती की. इतना ही नहीं, इस फिल्म का प्रचार दिल्ली व गुजरात के द्वारका मंदिर में भी किया गया.
इसी तरह विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द ताशकंद फाइल्स’ के अलावा ‘मैं अटल हूं’, ‘तेजस’, ‘फाइटर’ सहित कुछ फिल्में आईं, पर इन’में से सिर्फ ‘द कश्मीर फाइल्स’ सफल रही, वह भी इसलिए सफल हो पाई क्योंकि भाजपा के सारे पदाधिकारियों ने अपनी जेब से पैसे खर्च कर इस फिल्म के टिकट खरीद कर दर्शकों को मुफ्त में बांटे. अब आप इसे यह भी कह सकते हैं कि यह फिल्म सरकार ने लोगों को मुफ्त में दिखाई.

वर्ष 2024 की शुरुआत से अब तक प्रोपगंडा व सत्तापरस्त एजेंडा वाली कई फिल्में आईं, जिन में से ‘मैं अटल हूं’, ‘ फाइटर’, ‘आर्टिकल 370’ जैसी फिल्मों को दर्शक नहीं मिले. यहां तक कि एक मार्च को प्रदर्शित 150 करोड़ की लागत में बनी एजेंडे वाली फिल्म ‘औपरेशन वैलेंटाइन’ बौक्सऔफिस पर सिर्फ 9 करोड़ रुपए ही कमा सकी.

फिल्म ‘रजाकार: साइलैंट जीनोसाइड औफ हैदराबाद’

चुनाव से पहले ही फिल्मकार याता सत्यनारायण की फिल्म ‘रजाकार: साइलैंट जीनोसाइड औफ हैदराबाद’ प्रदर्शित होगी, जिस का ट्रेलर हाल में कंगना रनौत ने रिलीज किया. इस फिल्म में मकरंद देशपांडे, राज अर्जुन, बौबी सिम्हा, वेदिका और अनुप्रिया त्रिपाठी की अहम भूमिकाएं हैं.
इस फिल्म की कहानी 1947 की पृष्ठभूमि में हैदराबाद के भारत में विलय में हो रही देरी के समय निजाम और रजाकार समुदाय द्वारा हिंदुओं की सामूहिक नरसंहार की कथा है. बाद में सरदार पटेल के प्रयासों से हैदराबाद का भारत में विलय संभव हो पाया था. ट्रेलर से स्पष्ट हो जाता है कि इस फिल्म का मुख्य एजेंडा क्या है.

‘ टू जीरो वन फोर’

2014 में किस के इशारे पर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की कोशिश की गई थी, इस की पड़ताल पर आधारित स्पाई थ्रिलर फिल्म ‘टू जीरो वन फोर’ ले कर श्रवण तिवारी आ रहे हैं, जिस में जैकी श्रौफ का अहम किरदार है. लेखक व निर्देशक श्रवण तिवारी का दावा है कि उन की यह फिल्म सत्य घटनाक्रमों पर आधारित है, तो वहीं वे इसे काल्पनिक कथा भी बताते हैं.
निर्देशक श्रवण तिवारी कहते हैं, “2014 में जब गुजरात के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाता है, तब उन्हें रोकने के लिए पाकिस्तानी आतंकवादी, कुछ विदेशी सीक्रेट एजेंटों ने मिल कर उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की थी. उसी की पड़ताल हमारी यह फिल्म करती है.”

फिल्म ‘ऐक्सिडैंट और कौंस्पिरैंसी : गोधरा’

2002 के गोधरा कांड पर आधारित फिल्म ‘ऐक्सिडैंट और कौंस्पिरैंसी : गोधरा’ नामक फिल्म का निर्माण ओम त्रिनेत्र फिल्म्स के बैनर तले किया गया है. इस में भाजपा के पूर्व विधायक हितु कनोडिया, भाजपा समर्थक अभिनेता मनोज जोशी के साथ ही कई दूसरे कलाकार हैं. फिल्म के निर्देशक एम के शिवाकश का दावा है कि उन की यह फिल्म सत्य घटनाक्रमों और नानावती मेहता कमीशन की रिपोर्ट पर आधारित है. उन का दावा है कि वे अपनी इस फिल्म के माध्यम से हर इंसान को सच से परिचित कराना चाहते हैं.

 ‘द साबरमती रिपोर्ट’

गोधरा कांड पर ही रंजन चंदेल निर्देशित फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ 3 मई को प्रदर्शित होगी. इस के लेखक असीम अरोड़ा, अर्जुन भांडे गांवकर और अविनाश सिंह तोमर हैं. यह फिल्म 27 फरवरी, 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग में 59 लोगों की मौत होने के घटनाक्रम पर आधारित है.
निर्देशक रंजन चंदेल का दावा है कि उन की फिल्म गोधरा कांड में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि है. फिल्म के ट्रेलर में दिखाया गया है कि फिल्म में किस तरह टीवी चैनल के एंकर को अपनी खबर पढ़ते समय रोक कर नए तरीके से खबर पढ़ने के लिए कहा जाता है. इस फिल्म में विक्रम मैसे व राशि खन्ना की अहम भूमिकाएं हैं.

फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’

कन्नन अय्यर निर्देशित और सारा अली खान, अलैक्स ओनीर, इमरान हाशमी व अभय वर्मा के अभिनय से सजी फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ हाल ही में रिलीज हुई. यह कहानी 1942 के विश्व युद्ध के समय एकता का संदेश देने वाली उस लड़की की है, जिस ने भूमिगत रेडियो स्टेशन शुरू किया था तथा ब्रिटिश सैनिकों के खिलाफ रोमांचक लड़ाई शुरू की थी.

फिल्म ‘इमरजैंसी’

अभिनेत्री व निर्मात्री कंगना रनौत ने फिल्म ‘इमरजैंसी’ बनाई है. इस में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का किरदार खुद कंगना रनौत ने ही निभाया है. इस ऐतिहासिक ड्रामा फिल्म की कहानी भी कंगना ने लिखी है, जिस पर रितेश शाह ने पटकथा लिखी है. कंगना रानौत निर्देशित इस फिल्म की कहानी 1975 के आपातकाल पर है. इस फिल्म में अनुपम खेर, श्रेयस तलपड़े, मिलिंद सोमन और महिमा चौधरी की भी अहम भूमिकाएं हैं.

‘बस्तर’

फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ फेम फिल्मकार सुदीप्तो सेन ने इस बार नक्सलवाद पर आधारित फिल्म ‘बस्तर’ बनाई है. इस फिल्म की कहानी के केंद्र में छत्तीसगढ़ की नक्सलवाद की वास्तविक घटनाएं हैं. इस के ट्रेलर में एक पुलिस अफसर को केंद्रीय गृहमंत्री पर नक्सलियों द्वारा 76 पुलिस वालों की हत्या का दोष मढ़ते हुए दिखाया गया है. यह फिल्म पुलिस अफसर कम्युनिस्टों को जड़ से उखाड़ फेंकने की भी बात करती है. इसी बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस फिल्म का मुख्य एजेंडा क्या है. इस फिल्म में अदा शर्मा, इंदिरा तिवारी, यशपाल शर्मा और राइमा सेन की अहम भूमिकाएं हैं.

फिल्म ‘स्वतंत्र वीर सावरकर’

‘स्वतंत्र वीर सावरकर’ की कहानी हिंदुत्व की बात करने वाले स्वतंत्रता सेनानी और सुधारक विनायक दामोदर सावरकर की जीवनी है. हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा हिंदुत्व को विकसित करने का श्रेय भी वीर सावरकर को ही जाता है.
रणदीप हुड्डा निर्देशित इस फिल्म में वीर सावरकर की मुख्य भूमिका में रणदीप हुड्डा खुद हैं. इस फिल्म में अंकिता लोखंडे, अपिंदर दीप सिंह और अमित सियाल की भी अहम भूमिकाएं है. पहले इस फिल्म का निर्देशन महेश मांजरेकर कर रहे थे, पर रणदीप हुड्डा जिस एजेंडे के साथ बनाना चाहते थे उस से महेश मांजरेकर सहमत नहीं थे. इसलिए महेश मांजरेकर की जगह रणदीप हुड्डा खुद निर्देशक बन गए.

फिल्म के टीजर व ट्रेलर से स्पष्ट होता है कि यह अति विवादास्पद फिल्म है, जिस में इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है. टीजर में दिखाया गया कि सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर की विचारधारा के समर्थक थे. इस का विरोध सुभाष चंद्र बोस के पोते कर चुके हैं. फिल्म के ट्रेलर में वीर सावरकर बने रणदीप हुड्डा कहते हैं कि- ‘कभी आप ने सोचा है कि किसी कांग्रेसी को काला पानी की सजा क्यों नहीं मिली?’ इस से एहसास होता है कि इस फिल्म का मूल एजेंडा क्या है.

इतना ही नहीं, आरएसएस ने भी कुछ फिल्में गुप्त रुप से बनवाई हैं जो कि अप्रैल माह में प्रदर्शित होंगी. इन में से‌ एक फिल्म डाक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने निर्देशित की है.
इस तरह देखें तो जो फिल्में चुनाव से पहले प्रदर्शित होने वाली हैं वे सभी सरकारपरस्त एजेंडा वाली मगर सभी तात्कालिक फिल्में हैं. ये सभी भाजपा सरकार की नीतियों, उस की सोच, विचार से युक्त फिल्में है. मगर हकीकत यह है कि इन फिल्मों का व्यापक प्रभाव नहीं पड़ने वाला क्योंकि ‘एनिमल’ या ‘बारहवीं फेल’ जैसी कमर्शियल फिल्मों के आगे दक्षिणापंथियों का सारा व्याकरण असफल हो जाता है.

आज दक्षिणापंथी फिल्मकार व कलाकार बहुत अग्रैसिव हो कर सोशल मीडिया पर अपनी बातें जरूर कर रहे हैं जबकि स्वतंत्र विचारधारा के फिल्मकार व कलाकार खामोश व सहमे हुए हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव के कारण दक्षिणापंथी फिल्मकार प्रोपगंडा व सरकारपरस्त फिल्में बना रहा है, लेकिन, हकीकत में वह सिनेमा नहीं बना रहा है. इसलिए यह सिनेमा याद नहीं रखा जाएगा.

 

दुनियाभर में मशहूर है लखनऊ की चिकनकारी

शहर लखनऊ न सिर्फ अपनी तमीज-तहज़ीब और मीठी जुबान के लिए मशहूर है, बल्कि अपनी चिकनकारी के लिए भी विश्वविख्यात है. विदेशी पर्यटक लखनऊ आएं और हजरतगंज, अमीनाबाद व चौक की गलियों से चिकेन के सूट, साड़ियां, दुपट्टे, लहंगा-चोली, अनारकली, प्लाजो, जेंट्स शर्ट और कुर्ते, चादरें, पिलो कवर, लैंप शेड, सोफा कवर, मेजपोश, आदि खरीद कर न ले जाएं, ऐसा हो नहीं सकता. लखनऊ घूमने के लिए आने वाला व्यक्ति चिकनकारी से सजे परिधान अवश्य खरीदता है. इस की दो वजहें हैं – एक तो यह कढ़ाई बेहद खूबसूरत होती है और दूसरा इन परिधानों की कीमत की रेंज बहुत व्यापक है. 500 रुपए से ले कर 3 लाख रुपए तक के चिकनवर्क के परिधान आपको लखनऊ में मिलेंगे और यहां आप अपनी जेब के अनुसार शौपिंग कर सकते हैं.

लखनऊ चिकेन की कढ़ाई का गढ़ है. पारम्परिक तौर पर यह कढ़ाई सफेद धागे से सफेद मलमल या सूती कपड़ों पर की जाती थी. मगर समय के अनुसार धीरेधीरे यह रंगीन कपड़ों पर भी होने लगी. अब तो प्रिंटेड कपड़ों पर भी कशीदाकारी होने लगी है. सूती और मलमल के अलावा जार्जेट, शिफौन और रेशमी कपड़ों पर होने वाली चिकनकारी देखने वालों की आंखें चौड़ी कर देती है.

चिकेन या चिकिन शब्द फारसी भाषा से आया है जिस का मतलब है कपड़े पर कशीदाकारी. माना जाता है कि 17वीं शताब्दी में मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां तुर्क कशीदाकारी से बहुत प्रभावित हुईं और उन्होंने उस विधा को तुर्क काशीदाकारों से यहां की महिलाओं को सिखवाया. तभी से भारत में चिकनकारी कला का आरंभ माना जाता है. जहांगीर भी इस कला से खासे प्रभावित रहे और उनके संरक्षण में यह कला खूब फलीफूली. उन्होंने इस कला को सिखाने के लिए कई कार्यशालाएं बनवायी. उस वक्त मलमल के कपड़े पर यह कढ़ाई होती थी, क्योंकि मलमल का कपड़ा बहुत मुलायम और गर्मी में सुकून देने वाला होता है. लखनऊ के चिड़ियाघर में बने म्यूजियम में आज भी लखनऊ के नवाबों द्वारा पहने गए चिकेन वर्क के कुर्ते काफी सहेज कर रखे गए हैं. उन मरदाना कुर्तों के ऊपर की गई कढ़ाई देख कर आप पलकें झपकाना भूल जाएंगे.

मुगल काल के पतन के बाद 18वीं और 19वीं शताब्दी में चिकनकारी के कारीगर पूरे भारत में फैल गए और उन्होंने चिकनकारी के कई केंद्र खोल दिए. इन में से लखनऊ सब से महत्वपूर्ण केंद्र था जबकि दूसरे नंबर पर अवध का चिकनकारी केंद्र आता था. उस समय ईरान का अमीर बुरहान उल मुल्क अवध का गवर्नर था. वह भी इस कला का बहुत मुरीद था. बुरहान उल मुल्क ने इस कला को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

सिने परदे पर पुरानी हीरोइनों ने चिकन वर्क के कुर्ते, दुपट्टे और लहंगा आदि पहन कर इस की कद्र बढ़ाई. चूंकि इस में हलकी कढ़ाई से ले कर बहुत हेवी कढ़ाई तक मिलती है, लिहाजा बड़ेबड़े ब्रैंड और कंपनियों ने इन कपड़ों से अपने शोरूम्स सजाए और इस को ऊंचाइयां दीं. लखनऊ चिकनकारी को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने में बौलीवुड तथा लिबास बनाने वाली छोटी कंपनियों का बहुत योगदान रहा है.

आप को जानकार हैरानी होगी कि लखनऊ की इस कशीदाकारी में लगभग 36 तरह की कढ़ाई का इस्तेमाल होता है. सब से पहले कपड़े पर हलके नीले रंग छापे वाले लकड़ी के ब्लौक से डिजाइन छापा जाता है, फिर लिबास के अनुसार कपड़े की कटिंग होती है. फिर यह पीस उन महिलाओं के पास भेजे जाते हैं जो चिकनकारी में माहिर हैं.

आमतौर पर यह कढ़ाई महिलाएं ही करती हैं. वे डिजाइन छपे कपड़े को छोटे लकड़ी के फ्रेम में लगा कर डिजाइन के अनुसार सफेद धागे से कढ़ाई करती हैं. कढ़ाई में वे पैटर्न के अनुसार अनेक प्रकार के टांकों का इस्तेमाल करती हैं जैसे – मकड़ा, कौड़ी, हथकड़ी, साज़ी, करण, कपकपी, धनिया पत्ती, जोड़ा, मुर्री, जाली, टेपची, बखिया, जंजीरा, हूल, फंदा, रहत, कील कंगन, खाटुआ और बुलबुल सिलाई आदि. इस में मुर्री और जाली का काम सब से उम्दा होता है और खूब पसंद किया जाता है. असली चिकनकारी वही है जिस में मुर्री और जाली का काम दिखता है. इस के अलावा शैडो वर्क बहुत आम है. लखनऊ चिकनकारी की प्रमुख विशेषता है कि हर सिलाई पूरी निपुणता के साथ की जाती है और इस तरह की नजाकत और कहीं मिलना मुश्किल है. हाथ से की हुई महीन और कलात्मक कढ़ाई लिबास को एक अलग ही रूप देती है.

कढ़ाई के बाद हर पीस को पानी में डाल दिया जाता है ताकि छपाई का नीला रंग निकल जाए, फिर दरजी इन को कुर्ता, शर्ट, लेडीज सूट, लहंगा के रूप में तैयार करते हैं. बाद में इन तैयार कपड़ों पर जरूरत के हिसाब से कलफ चढ़ाया जाता है, जो चिकन के कपड़ों और खासकर कड़क लखनवी कुर्तों की खासियत हैं.

लखनऊ चिकनकारी कला पर ईरानी सौंदर्य शास्त्र का गहरा प्रभाव है. इस के डिजाइन में फूलों और बेलों के पैटर्न, पत्तियां, गुलबूटे, जालियां ईरानी कला का दर्शन कराती हैं. इन्हें बनाने की शैलियां फैशन के चलन के साथ भले बदलती रहीं मगर कढ़ाई की जटिलता और नजाकत जस की तस है.

पुराने समय में में चिकनकारी सफेद धागे से बनाए गए मलमल या सामान्य सूती कपड़े पर की जाती थी लेकिन समय के साथ इस में हल्के रंगों और फ्लोरेसेंट का समावेश हो गया. चिकनकारी अब रेशम, शिफौन, जारजट, नेट, महीन कपड़ा, कोटा, डोरिया, आर्गेंजा, कौटन और पौलिएस्टर मिले कपड़ों पर भी होने लगी है. मगर कपड़ा जितना हल्का और मुलायम होता है, कशीदाकारी उतनी ज्यादा उभर कर आती है. क्योंकि चिकन वर्क महिलाएं सिर्फ हाथ से करती हैं इसलिए कपड़े का हल्का और मुलायम होना अच्छा होता है. इस पर कढ़ाई आसानी से हो जाती है और कारीगरी भी अलग ही नजर आती है.

लखनऊ चिकन की किस्में पहले जितनी होती थीं आज उस से कहीं ज्यादा हो चुकी हैं. शहर के आम लोगों, उच्च वर्ग और बौलीवुड तथा हौलीवुड की हस्तियों में इन की बहुत मांग है. ज्योग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री ने लखनऊ चिकन को दिसंबर 2008 में जी.आई. का दर्जा दिया था.

चिकनकारी उद्योग में आज ढाई लाख कारीगर काम करते हैं जो भारत में कारीगरों का सब से बड़ा जमावड़ा है. यह वह कारीगर हैं जो रजिस्टर्ड हैं, इन के अलावा बहुत बड़ी संख्या उन महिलाओं की है जो गांवदेहात में बैठ कर बहुत कम पैसे में यह कसीदाकारी करती हैं. यह संख्या लाखों में है मगर कहीं दर्ज नहीं है.

इन महिलाओं को बहुत कम पैसा देकर छोटे ठेकेदार और कपड़ा व्यवसाई कपड़ों पर चिकनकारी करवाते हैं और फिर उन्हें बड़े शहरों के मार्किट में ले जा कर बेचते हैं. लखनऊ का चौक इलाका चिकनवर्क के कपड़ों से भरा हुआ है. यहां आप को 500 रुपये में बढ़िया कसीदाकारी वाली जेंट्स शर्ट, लेडीज कुर्ता या सूट बहुत आसानी से मिल जाएगा, वहीं हजारों रुपये मूल्य के भारीभरकम कढ़ाई वाले पार्टी वेअर भी मिलेंगे. अनेक व्यवसायी चौक और अमीनाबाद की मार्किट से कम रेट में सूटपीस और जेंट्स शर्ट, कुर्ते वगैरा थोक में खरीद कर दिल्ली और मुंबई के बाजारों तक पहुंचाते हैं और भारी मुनाफा कमाते हैं. जो पीस ये व्यापारी हजारपांच सौ रुपये में लखनऊ से लाते हैं वह दिल्ली की मार्केट में दोढाई हजार में बड़ी आसानी से बिक जाता है. लाजपतनगर सेन्ट्रल मार्किट, सरोजिनी नगर मार्किट, दिल्ली हाट, करोल बाग, हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन आदि पर चिकनवर्क की दुकानें बहुतायत में दिखाई देती हैं. गर्मी के मौसम में हल्का हल्का रंग, हल्काहल्का कपड़ा और उस पर खूबसूरत कशीदाकारी शरीर और रूह दोनों को सुकून देती है.

क्लासिक गानों की रीमिक्स और बेकार हुए संगीतकार

पिछले दिनों सिंगर इला अरुण ने फिल्म ‘क्रू’ के ‘चोली के पीछे क्या है…’ गाने की रीमिक्स पर काफी नाराजगी जताई और कहा कि ‘आप भले ही मुझे बूढ़ा कह सकते हैं, लेकिन ओरिजिनल गाना हर किसी के दिल को छूने वाला रहा है. यही वजह है कि इस का रीमिक्स किया गया है. असल में इला अरुण ने सुभाष घई की वर्ष 1993 की फिल्म ‘खलनायक’ का मूल गाना ‘चोली के पीछे क्या है…’ गाया था, जिस में माधुरी दीक्षित और नीना गुप्ता थीं.

इला की नाराजगी

इला अरुण ने फिल्म ‘क्रू’ के लिए अपने फेमस गाना ‘चोली के पीछे क्या है…’ के रीक्रिएशन से दुखी हैं. नए ट्रैक में करीना कपूर हैं जबकि सुभाष घई की 1993 की फिल्म ‘खलनायक’ के ट्रैक में माधुरी दीक्षित व नीना गुप्ता थीं. उन्होंने कहा कि म्यूजिक लेबल टिप्स ने गाने के लौंच से ठीक पहले उन्हें फोन किया और उन का आशीर्वाद मांगा.

अंतिम क्षण में उन्हें आशीर्वाद देने के अलावा और क्या कर सकती थी, मैं अवाक रह गई. लेकिन उन से यह नहीं पूछ सकी कि आप ने ऐसा क्यों किया? आगे इला ने यह भी कहा है कि नए संगीतकारों को नई पीढ़ी के लिए, क्लासिक्स गाने की रीमिक्स के बजाय ओरिजिनल, ऊर्जावान और सशक्त गीत बनाने चाहिए, जो युवा पीढ़ी को पसंद आएं. यहां तक कि डीजे भी सभी क्लासिकल गानों को दोबारा बना कर उन्हें खराब कर देते हैं.

इस गाने को इला और अलका याग्निक ने ओरिजिनल ट्रैक में अपनी आवाज दी थी. इसे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने कंपोज किया था और आनंद बख्शी ने लिखा था. इसे सरोज खान ने कोरियोग्राफ किया था, जबकि नए गाने को अक्षय और आईपी ने रीमिक्स किया है, जिसे दिलजीत दोसांझ और आईपी सिंह ने गाया है और आईपी सिंह ने लिखा है. फराह खान ने इस ट्रैक को कोरियोग्राफ किया है. गाने में करीना एक नाइट क्लब में गुलाबी रंग के आउटफिट में गाने पर थिरकती और लिप-सिंक करती नजर आ रही हैं.

उठते रहे कई और विवाद

यह सही है कि आएदिन पुराने चर्चित गानों को ले कर रीमिक्स करने पर विवाद उठते रहे हैं. गायिका नेहा कक्कड़ ने भी कई रीमिक्स गानों मे अपनी आवाज दी है. नेहा कक्कड़ का ‘ओ सजना…’ जब से रिलीज हुआ, तो उन्हें जम कर ट्रोल किया गया, क्योंकि यह गाना सिंगर फाल्गुनी पाठक के आइकौनिक गाने ‘मैं ने पायल है छनकाई…’ का रीमिक्स वर्जन है. नेहा कक्कड़ का गाना जैसे ही रिलीज हुआ, यूजर्स से ले कर फाल्गुनी पाठक तक ने उन पर इस गाने को ‘बरबाद’ करने का आरोप लगाया. इस के जवाब में नेहा कक्कड़ ने कहा कि लोग उन की खुशी देख कर परेशान है.

इस सभी सिंगर की नाराजगी में म्यूजिक कंपोजर ए आर रहमान ने भी कहा है कि मैं जितना अधिक इन रीमिक्स को देखता हूं, उतना ही अधिक खराब लगता है. खुद को संगीतकार कहलाए जाने वाले नए जमाने के कंपोजर क्लासिक संगीत को खराब कर रहे हैं, साथ ही, वे यह भी कह रहे हैं कि वे इन क्लासिक गीतों को री-इमेजिन कर रहे हैं. मेरा उन से पूछना है, वे होते कौन हैं री–इमेजिन करने वाले? मैं किसी के काम को जब प्रयोग करता हूं, तो सावधानी बरतता हूं, क्योंकि यह एक ग्रे एरिया है, जिसे सुलझाने की जरूरत है.

चलन रीमिक्स का

यह सही है कि इन गानों का आज बहुत अधिक चलन भी हो चुका है और फिल्मों मे भी इन गानों को ग्लैमरस तरीके से फिल्माया जाता है, जिसे युवा पीढ़ी पसंद करती है, लेकिन वे इन गानों के ओरिजिनल सिंगर को नहीं पहचान पाते, क्योंकि क्लासिक गाने की केवल ट्यून को ले कर कई बार उस में दूसरे शब्दसंग्रह का प्रयोग कर लिया जाता है और आज के यूथ, रीमिक्स गाने वाले को ही उस गायक कलाकार की आवाज मान बैठते हैं और यह ओरिजिनल गायकों के लिए असम्मानजनक होता है. आइए जानते हैं रीमिक्स है क्या?

रीमिक्स के तरीके

रीमिक्स किसी मूल गीत का नया संस्करण है, जिसे कलाकार एक नए तरीके से वाद्य और गायन ट्रैक को फिर से व्यवस्थित कर के बनाते हैं. गायिका और कंपोजर सोमा बनर्जी रीमिक्स के बारे में बताती हैं कि किसी भी पौपुलर गाने को पहले चुन लिया जाता है, इस के बाद ओरिजिनल गाने की ट्यून को हटा कर उसी सिंक और उसी फ्लो के आधार पर नई ट्यून को क्रिएट कर रिदम को बदल दिया जाता है.

इस के बाद उस गाने का न्यू लुक तैयार किया जाता है. जिन लोगों का म्यूजिक सैंस अच्छा है, वे एक अच्छा रीमिक्स बना सकते हैं, लेकिन कोई अनाड़ी जब इसे बनाने की कोशिश करता है तो डिजास्टर हो जाता है.

बेकार हो रहे हैं कंपोजर

आज कंपोजर के पास कोई काम नहीं है, क्योंकि उन्होंने पहले से गाने को कंपोज़ कर रखा है. इस में वे ट्यून को बदल नहीं रहे हैं बल्कि उस में कुछ नया जोड़ रहे हैं. इसे नया रूप देने वाले अरेंजर ही होते हैं. नएनए साउंड को ले कर छानबीन करने वाले अरेंजर ही इसे अधिकतर करते हैं. संगीत निर्देशक अगर अरेंजर है, तो सोने पर सुहागा होता है.

नई तकनीक का चतुराई से प्रयोग

रीमिक्स करने वाले सभी अरेंजर एक या दो व्यक्ति की सहायता से ‘कीबोर्ड’ की सहायता से करते हैं क्योंकि फिल्म ‘रौकी और रानी’ की प्रेमकहानी में ‘अभी न जाओ…’ गीत को धर्मेंद्र और शबाना आजमी के लिए गाया गया था, जो एक अलग गाना रहा. सोमा कहती हैं कि पहले उस की ट्यून अलग थी, लेकिन अभी रीमिक्स की वजह से उस का इन्सट्रूमेंशन बदल चुका है.

इस की अरेंजमेंट प्रीतम ने किया है, जबकि इस के गीतकार साहिर लुधियानवी, संगीतकार जयदेव हैं और इसे गाने वाले मोहम्मद रफी व आशा भोंसले हैं. यहां उसी गाने को मैं ने और अनुपम ने गाया है, क्लासिक लोगों के नाम कैप्शन पर जा रहे हैं, लेकिन प्रीतम अपनी काबिलीयत को इस गाने के जरिए दर्शा रहे हैं. इस प्रकार आवाज और अरेंजमेंट दोनों ही पूरी तरह से बदल गया है और इस गाने ने नए वस्त्र पहन लिए हैं. फिल्म ‘क्रू’ में भी सभी पुराने गानों को रीमिक्स कर नया रूप दिया गया है.

नया गाना बनाना भी हुआ आसान

अब अकेला व्यक्ति भी इस टैक्नोलौजी के इस्तेमाल से कंपोजीशन तैयार करने के साथ मोबाइल फोन की एप्लीकेशन के जरिए रिकौर्डिंग कर सकता है. उस रिकौर्डिग में भी अब सिर्फ लीड पर्सन के अलावा बाकी सौफ्टवेयर से कंपोज किया जाता है. लाइव म्यूजिक रिकौर्डिग कौन्सेप्ट पीछे छूटते हुए अब लेटेस्ट सौफ्टवेयर रिकौर्डिंग को डैवलप और प्ले कर रहे हैं. ये सब इंटरनैट पर यूट्यूब और सोशल नैटवर्किग साइट्स से मिलने वाली सुविधाएं हर किसी के दायरे में आने से काम आसान होने लगा है. साउंड कार्ड की सहायता से टेपलेस इस्तेमाल ने वर्कलोड आसान करने के साथ एक्सपैरिमैंट पर जोर दिया है.

पहले वर्चुअल इंस्ट्रूमेंट टैक्निक (वीएसटी) सिर्फ वैस्टर्न इंस्ट्रूमेंट को ही सपोर्ट करते थे, पर अब इंडियन इंस्ट्रृमेंट जैसे तबला, तानपूरा, हारमोनियम में भी मददगार साबित हो रहे हैं. वैस्टर्न में आए सौफ्टवेयर इंटरनैट के माध्यम से सौफ्टवेयर डाउनलोड किए जा रहे हैं. इंस्ट्रूमेंट्स से कनैक्ट होने के बाद वे सिंगल कंप्यूटर प्रोसैस करते हैं. इस में कंप्यूटर के सहयोग से अलगअलग साउंड इफैक्ट क्रिएट होते हैं, जिस से कंपोजर को इफैक्ट में वैरायटी मिलते हुए कंपोजीशन तैयार करने में मदद मिलती है.

गिटार के लिए गिटार रिग 5, एंप्लीत्यूब, कैबिनैट इंपल्स लोडर प्रमुख सौफ्टवेयर हैं. वहीं सिंथेसाइजर में प्रोपैलर हैड रीजन, नेटिव इंस्ट्रूमेंट, ट्रक्टर प्रो, कांटेक्ट है. रिदम के लिए नेटिव इंस्ट्रूमेंट बैटरी, टून ट्रैक, सुपीरियर ड्रमर, ईजी ड्रमर और एडिटिव ड्रमर प्रमुख सौफ्टवेयर हैं. आईफोन में भी तबला और हारमोनियम होता है, अब रियाज करने के लिए किसी को तबला, हारमोनियम या कोई वाद्ययंत्र खरीदने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि अब आईफोन के एप्स और एंड्रायड एप्लीकेशन में तानपूरा, तबला तरंग, स्वर पेटी आदि सभी रागों का साथ मिल जाता है.

एक नया ट्रैंड रीमिक्स का

आजकल एक नया ट्रैंड भी रीमिक्स में आ चुका है, जिस में एक नया लिरिक्स लिखा जाता है, उस में ओरिजिनल ट्यून से हट कर नए ट्यून में जा कर फिर ओरिजिनल सुर में आना पड़ता है. हुक लाइन पुराने गानों से ही लेते हैं, क्योंकि कुछ नया क्रिएट करना अरेंजर के वश में नहीं होता, मसलन फिल्म ‘रौकी और रानी की प्रेमकहानी’ में ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में…’ में व्हाट झुमका? को गाने में लाना इसी प्रकार का प्रयोग है. जिस में ओरिजिनल गाने से हट कर यह प्रयोग हुआ है.

ऐड वर्ल्ड में यह काफी दिनों से चल रहा है, जिस में गाना पुराना होता है, लेकिन गवाया किसी नए से जाता है और वीडियो नया बनाया जाता है. इस में ओरिजिनल सिंगर को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जाता है, जो बहुत गलत हो रहा है. यह सब काम मशीन से होता है, संगीत निर्देशक अब म्यूजिक प्रोड्यूसर हो चुके हैं. म्यूजिक प्रोड्यूसर में अरेंजमैंट भी आ जाता है. नए युवा खुद को म्यूजिक प्रोड्यूसर ही कहते हैं. वे सबकुछ करते हैं.

आजकल ऐसे प्रसिद्ध संगीत निर्देशक प्रीतम, सलीम सुलेमान, शंकर एहसान लौय आदि सभी ऐसे ही संगीत बना रहे हैं.
ए आर रहमान, संजय लीला भंसाली, अमित त्रिवेदी, हिमेश रेशमिया आदि कई संगीतकार हैं जो रीमिक्स करना पसंद नहीं करते. किसी भी गाने की बंदिश को पौपुलर करने वाले संजय लीला भंसाली हैं और ऐसे संगीतकारों की आज कमी है. यह क्रिएटिविटी इंडस्ट्री के लिए बहुत बड़ा खतरा है.

फिल्म प्रोड्यूसर की होती है डिमांड

 

इसे करने का मुख्य उद्देशय फिल्म प्रोडयूसर ही होते हैं, जो ऐसे गानों को रीमिक्स के लिए बाध्य करते हैं. सालों पहले भी ऐसा प्रयोग फिल्मों के साथ हुआ करता था. हालांकि यह काम आसान नहीं होता, क्योंकि बहुत सारे कानूनी परमीशन उस गाने के प्रयोग के लिए म्यूजिक कंपनी से लेने पड़ते हैं, जिस में गाने की प्रति खरीदनी, कौपीराइट धारक से अनुमति लेनी, लिखित या वौयस रिकौर्डिंग में अनुमति आदि लेनी होती है. बिना अनुमति के रीमिक्सिंग को तकनीकी रूप से ‘बूटलेग’ कहा जाता है और इस के कानूनी परिणाम हो सकते हैं.

 

बाल्टीमोर ब्रिज हादसा पुल के साथ ढहा भारतीय आत्मसम्मान

‘आज व्हाइट हाउस में शानदार स्वागत समारोह में एक प्रकार से भारत के 140 करोड़ देशवासियों का सम्मान है और गौरव है. यह सम्मान अमेरिका में रहने वाले 4 मिलियन (40 लाख) से अधिक भारतीय लोगों का भी सम्मान है.’

ये शब्द पिछले साल 22 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान बेहद गदगद होते हुए कहे थे. इस दिन उन का व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति जो बाइडेन की मेजबानी में राजकीय स्वागत व सम्मान आयोजित किया गया था, जो निश्चित रूप से कई वजहों के चलते नरेंद्र मोदी के लिए एक व्यक्तिगत उपलब्धि वाली बात थी. इस वजह को बहुत संक्षेप में बयां करें तो इसी अमेरिका ने कोई 19 साल पहले नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों का जिम्मेदार और दोषी मानते हुए राजनीतिक वीजा देने से साफ मना कर दिया था.

व्हाइट हाउस में हुए अपने स्वागत को नरेंद्र मोदी ने एक व्यक्तिगत जीत की शक्ल में देखा था और इस सम्मान को 140 करोड़ भारतीयों से जोड़ते हुए एक और भावनात्मक दबाव बनाने की कोशिश की थी, जो कि उन की आदत है. बात आईगई हो गई लेकिन उन का यह कहना व्हाइट झूठ निकला कि यह सम्मान और गौरव भारतीयों का या फिर 40 लाख से ज्यादा अमेरिकी भारतीयों का है. इस झूठ के चिथड़े बीती 28 मार्च को एक बार फिर उड़ते दिखे जब भारतीयों से नफरत प्रदर्शित करता एक नस्लभेदी कार्टून सुर्खियों में आया.

इस कार्टून के पीछे छिपी मंशा और नफरत को समझने से पहले बाल्टीमोर ब्रिज हादसे को समझना जरूरी है. अमेरिका के मेरिलैंड राज्य के बाल्टीमोर शहर में 26 मार्च को डौली नाम का मालवाहक जहाज फ्रांसिस स्कौट के पुल से टकरा गया था जिस से 6 लोगों की मौत हो गई थी. अमेरिका के राष्ट्रगान के रचयिता फ्रांसिस स्कौट मशहूर कवि थे जिन के नाम पर 1977 में यह पुल बनाया गया था. जहाज सिंगापुर का था जो श्रीलंका के लिए रवाना हुआ था. इस में 22 लोग सवार थे और इत्तफाक से सभी भारतीय थे जिन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. हालांकि टक्कर इतनी जबरजस्त थी कि लोहे का यह ढाई किलोमीटर लंबा पुल ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था. असल में डौली में बिजली की सप्लाई बाधित हो गई थी जिस से उस का इंजन बेकाबू हो गया था और पुल से टकरा गया.

इस हादसे की जांच अभी चल रही है लेकिन चालक दल की तारीफ सभी ने की थी कि उस ने वक्त रहते ट्रैफिक अथौरिटी के अधिकारियों को जहाज के बेकाबू हो जाने की खबर दे दी थी जिस से तुरंत ट्रैफिक रोक दिया गया और दूसरी एहतियात भी बरती गईं, जिस से नुकसान बहुत कम हुआ और कई जिंदगियां भी बच गईं.
हादसे के बाद स्वाभाविक तौर पर तरहतरह की आशंकाएं जताई जा रही थीं जो बेकार साबित हुईं. खुद राष्ट्रपति जो बाइडेन ने माना कि यह एक सामान्य लेकिन भयानक दुर्घटना थी. उन्होंने भारतीय क्रू की सूझबूझ की तारीफ की जिस से बड़ा हादसा होने से बच गया. मेरिलैंड के गवर्नर वेस मूर ने भी क्रू मैंबर्स को हीरो बताया. कोई शक नहीं कि इस के हकदार वे थे भी.

लेकिन फौक्सफोर्ड कौमिक्स कंपनी को यह तारीफ और भारतीयों की सूझबूझ इतनी नागवार गुजरी कि उस ने दूसरे ही दिन सोशल मीडिया प्लेटफौर्म एक्स पर एक कार्टून पोस्ट कर दिया जिस की मंशा भारत और भारतीयों का मखौल उड़ाने की ही थी. इस कार्टून, जिसे पुल से टकराने से ठीक पहले डौली जहाज की रिकौर्डिंग कैप्शन से नवाजा गया, में कुछ भारतीय नाव चलाते दिखाई दे रहे हैं. इन लोगों ने सिर्फ लंगोट पहन रखा है जो कभी परंपरागत भारतीय परिधान हुआ करता था. नाव चलाते भारतीयों के चेहरे से यह परेशानी झलक रही है कि एक बहुत बड़ा खतरा सामने है जिस से निबटने को अब क्या करें.

कार्टूनिस्ट की पूरी कोशिश यह रही कि ये भारतीय असभ्य, आदिमानवों जैसे नंगधड़ंग और गंवार दिखें. इस पर जी नहीं भरा, तो कार्टून में एक वीडियो भी जोड़ दिया गया जिस में ये हिंदुस्तानी गालीगलौच कर रहे हैं. इस कार्टून के बैकग्राउंड में फ्रांसिस स्कौट की ब्रिज से डौली की टक्कर से ढहता हुआ पुल भी दिख रहा है. जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, यूजर्स की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं जो ज्यादातर आलोचनात्मक ही थीं. लोगों ने इस कार्टून पर एतराज जताया था. महज 2 दिनों में ही इसे कोई 40 लाख लोग देख चुके थे और कोई 4 लाख ने इसे रीट्वीट किया था.

इस नस्लवादी कार्टून पर एक यूजर ने प्रतिक्रिया दी कि यह अपमानजनक है, गवर्नर ने क्रू की तारीफ की है और आप उन्हें इस तरह दिखा रहे हैं. लेकिन भारत के सोशल मीडिया सूरमाओं ने इस बेइज्जती से कोई इत्तफाक नहीं रखा. उन्हें तो रामश्याम, हिंदूमुसलिम और मोदीराहुल से फुरसत ही नहीं मिलती. ये वही लोग हैं जो दिनरात नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे गढ़ते रहते हैं कि उन्होंने विदेशों में देश का सम्मान और स्वाभिमान बढ़ाया है. वे जिस देश में भी जाते हैं वहां के राजनयिक और आम लोग पलकपांवड़े बिछाते स्वागत में बिछ जाते हैं. मोदी जैसा शेर आज तक नहीं पैदा हुआ जो देश को विश्वगुरु बनने की राह पर ले जा रहा है.

इन भक्तों को तो मालूम ही नहीं कि बाल्टीमोर में कब क्या हो गया और कैसे राष्ट्रीय सम्मान व स्वाभिमान के चिथड़े अमेरिका की एक मैगजीन ने उड़ाए. हां, इन होनहारों को यह जरूर मालूम है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर अमेरिका ने एतराज जताया है और वह आजकल खुल कर पाकिस्तान का साथ दे रहा है. इन दोनों मुद्दों पर वे अमेरिका को अपनी अक्ल और जानकारियों के मुताबिक घेर रहे हैं. लेकिन फौक्सफोर्ड कौमिक्स की करतूत पर खामोश हैं क्योंकि उन्हें एहसास और अंदाजा है कि वे 22 भारतीय छोटी जाति वाले ही रहे होंगे, जो यहां से जी नहीं भरा तो अमेरिका अपमानित होने पहुंच गए.
यानी, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का अपना दायरा है जिस में शिप पर काम करने वाले छोटेमोटे लोगों की कोई जगह नहीं है. कोई बड़ा नेता भी कुछ नहीं बोला. एक अर्थशास्त्री संजीव सान्याल, जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं, ने जरूर इस हादसे की खबर शेयर की लेकिन वे फौक्सफोर्ड कौमिक्स की हरकत से कतराते ही नजर आए.

यह कोई पहला मौका नहीं था और न ही आखिरी है जब अमेरिका में भारत का मजाक उड़ाया गया हो. साल 2015 में न्यूयौर्क टाइम्स ने क्लाइमेट समिट पर एक कार्टून साझा किया था जिस में एक हाथी ट्रेन के आगे बैठा उसे रोकता नजर आ रहा है. ट्रेन पर क्लाइमेट समिट और हाथी पर भारत लिखा हुआ था.
अमेरिकी भारतीयों से हर स्तर पर नफरत करते हैं, इस का एक उदाहरण वह आंकड़ा है जो इसी साल फरवरी में उजागर हुआ था. इस के मुताबिक, महज 2 महीनों में 5 भारतीय नस्लीय हिंसा का शिकार हो चुके हैं. इन में छात्र, कारोबारी और नौकरीपेशा सभी शामिल हैं. एक मामले में तो एक सुरक्षाकर्मी एक भारतीय युवती को धक्का दे कर खरदूषण जैसे हंस रहा है.

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और घटनाएं बताती हैं कि भारतीयों के प्रति नफरत और हिंसा डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद और बढ़ी थीं, जो, जो बाइडेन कार्यकाल में कुछ हद तक काबू हुई थीं लेकिन अब फिर रफ्तार पकड़ रही हैं. अमेरिका के युवा मानते हैं कि जो बाइडेन सरकार भारतीयों को प्राथमिकता देती है. उस ने कोई 125 अहम सरकारी पदों पर भारतीयों को नियुक्ति दी है. अमेरिका के मौजूदा चुनावों के मद्देनजर वहां भी दक्षिणपंथ फिर से हावी हो रहा है और वहां भी मीडिया इस मानसिकता को खूब हवा दे रहा है.

बाल्टीमोर हादसे के दिनों में ही यह दिलचस्प आंकड़ा सामने आया कि अमेरिका में भारतीय वहां की आबादी का लगभग एक फीसदी ही हैं लेकिन वे 6 फीसदी टैक्स देते हैं. वहां का हर छठा डाक्टर भारतीय है और दर्जनों पौलिटीशियंस खासा दखल रखते हैं. लेकिन बात जब सम्मान और स्वाभिमान की आती है तो वे खून का घूंट पी कर रह जाते हैं क्योंकि अहम बात पैसों और कमाई की है जो अमेरिका में कहीं ज्यादा होती है.
पिछले साल अक्तूबर में एक अमेरिकी सांसद रिच मेककार्मिक ने संसद में बताया भी था कि भारतवंशी सालाना 1 लाख 38 हजार डौलर कमाते हैं जबकि अमेरिकी इस से आधा भी नहीं कमा पाते.

डोनाल्ड ट्रंप ने इसे सियासी हथियार और चुनावी मुद्दा भी बना रखा है जिसे ले कर वहां के भारतीय सहमे हुए हैं. फौक्सफोर्ड कौमिक्स जैसी हरकत पर वे कुछ नहीं कर पाते, सिवा नरेंद्र मोदी के 22 जून, 2023 को व्हाइट हाउस में दिए इस भाषण को सुन कर कुढ़ने के कि-
आज व्हाइट हाउस में शानदार स्वागत समारोह में एक प्रकार से भारत के 140 करोड़ देशवासियों का सम्मान है और गौरव है. यह सम्मान अमेरिका में रहने वाले 4 मिलियन से अधिक भारतीय लोगों का भी सम्मान है.

मैं अपनी मां की बूआ की बेटी से प्यार करता हूं, क्या हम दोनों शादी कर सकते हैं?

सवाल
मैं अपनी मां की बूआ की बेटी से प्यार करता हूं. क्या हम दोनों शादी कर सकते हैं?

जवाब
हिंदू समाज और कानून ऐसी शादी को मंजूरी नहीं देता है, इसलिए सोचसमझ कर फैसला लें. मां की बूआ की बेटी से शादी करने पर आप को घर वालों और समाज का विरोध झेलना पड़ेगा. अगर उस के लिए आप दोनों दिमागी तौर पर तैयार हों तो ही यह जोखिम उठाएं.

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राशि और अमन का अफेयर पिछले 2 साल से चल रहा है. अब उन्होंने शादी करने का फैसला ले लिया, लेकिन वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि उन के पेरैंट्स इस रिश्ते के सख्त खिलाफ होंगे और वे चाह कर भी घर वालों की रजामंदी से शादी नहीं कर पाएंगे. इसलिए उन्होंने कोर्टमैरिज के बारे में सोचा, लेकिन कोर्ट में शादी की क्या औपचारिकताएं होती हैं, इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं था. उन्होंने अपने एक कौमन फ्रैंड राजेश से बात की जिस ने अभी कुछ साल पहले ही कोर्टमैरिज की थी, लेकिन उस से भी उन्हें आधीअधूरी जानकारी ही मिली.

ऐसा कई जोड़ों के साथ होता है, वे शादी करना तो चाहते हैं, लेकिन उस का क्या प्रोसीजर है, इस के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं होता और संकोचवश वे खुद इस की जांचपड़ताल करने से हिचकिचाते हैं. आइए जानें कि अगर पेरैंट्स राजी नहीं हैं और आप शादी के फैसले तक पहुंच गए हैं, तो आप विवाह कैसे कर सकते हैं.

आर्य समाज मंदिर में विवाह प्रक्रिया

आर्य समाज मंदिर में जो विवाह होते हैं, वे सभी हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत होते हैं. आर्य समाज मंदिर आमतौर पर विवाह की पंजिका रखते हैं और प्रमाणपत्र जारी करते हैं. विवाह से पहले यह भी जानकारी लेते हैं कि दोनों पक्ष विवाह के योग्य हैं भी या नहीं और विवाह दोनों की पूर्ण सहमति से हो रहा है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

जानिए खाने के बाद टहलना क्यों है जरूरी

खाने के बाद टहलना व्यक्ति के सेहत के लिए बेहद अहम है. खाने के बाद टहलने से पाचन क्रिया बेहतर होती है. पर ऐसा होता नहीं है, लोग खाने के बाद या तो टीवी स्क्रीन के सामने बैठ जाते हैं या तो सोने चले जाते हैं. उनके इस आदत से उनकी सेहत का काफी नुकसान होता है. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि खाने के बाद टहलने के क्या फायदे होते हैं.

मेटाबौलिज्म होता है अच्छा

अगर आप अपना वजन नियंत्रित रखना चाहते हैं तो जरूरी है कि आप खाने के बाद टहलें जरूर. इससे आपका मेटाबौलिज्म मजबूत होता है. और जितना बेहतर मेटाबौलिज्म होगा उतना ही आपका वजन भी कंट्रोल में रहेगा.

अच्छी नींद आती है

कई बार हमारे काम के चलते हम ठीक से सो नहीं पाते. पर खाने के बाद वौक करने से खाना भी सही से पचता है और ब्लड सर्कुलेशन भी अच्छे से होती है. इससे नींद भी अच्छी आती है.

वजन कम करने के लिए टहले

समय की कमी के कारण हम लोग एक्सरसाइज नहीं कर पाते. ऐसे में वौक करना बेहद जरूरी और असरदार होता है. खाने के बाद टहलना कई तरह के हमारे लिए लाभकारी होता है. इससे कैलोरीज बर्न होती हैं और शरीर में ब्लड फ्लो भी सही रहता है.

बेहतर होता है डाइजेशन

खाना खाने के बाद अक्सर सुस्ती लगती है. पर इसके बावजूद वौक जरूर करें. इससे खाना अच्छे से पचता है. इसके साथ ही पेट संबंधित बहुत सी बीमारियां भी दूर होती हैं.

ब्लड शुगर रहता है कंट्रोल

अगर आप शुगर के मरीज है तो खाने के बाद कम से कम 3 मिनट तक टहलें. ऐसा करने से आपके शरीर ब्लड शुगर की मात्रा कंट्रोल में रहती है.

हमारे मुन्ना भाई एमबीबीएस

झूठ नहीं हकीकत में हमारे भी एक मुन्ना भाई हैं और वह भी  एमबीबीएस हैं, यानी महा बोर, बदतमीज, सडि़यल. यह नाम तो लाड़- प्यार में मांबाप ने दिया होगा, उपाधि उन की हरकतों से चिढ़ कर रिश्तेदारों ने दी है. इसे मुन्ना भाई की मिलनसारी कहें या आवारापन, बंजारापन, वह दूरदराज के रिश्ते की भी हर शादी के दूल्हा और हर जनाजे का मुर्दा कहलाते हैं.

कहने का मतलब यह है कि वह हरेक शादी और गमी में शिरकत करते हैं और उस अवसर की खास हस्ती यानी जिस की बरात या अर्थी निकलनी हो उस से ज्यादा अहमियत लेना चाहते हैं, चाहे बरात निकलने या जनाजा उठने में भले ही देर हो जाए मुन्ना भाई को उन का गिलास (समयानुसार चाय या सुरा से भरा) मिलना ही चाहिए और मिलता भी है उन के महा बड़बोला होने की वजह से.

खुशी के मौके पर मुन्ना भाई को नाराज कर के कौन उलटीसीधी बातें सुनना या माहौल खराब करना चाहेगा, सो बेहतर यही है कि मुन्ना भाई को कहीं और उलझा दिया जाए या दूसरे शब्दों में कहें तो कहीं का चौधरी बना दिया जाए. ऐसे मौके पर खाने की व्यवस्था तो बडे़ पैमाने पर होती ही है और उस की जिम्मेवारी उठाने के लिए अपने मुन्ना भाई से बेहतर और कौन होगा?

लोगों की इस तरह की सोच के चलते ही मुन्ना भाई ने अब तक इतनी शादियों में शिरकत की है कि उन का नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में आना चाहिए. सच मानिए, उन के जितना तजुरबा तो शहर के नामचीन केटरर को भी नहीं हो सकता.

बस, मुन्ना भाई की ड्यूटी लग जाती है हलवाई की भट्ठी और भंडारे के बीच, कचौरियों और लड्डुओं का हिसाब रखने को. उन सब के साथसाथ मुन्ना भाई घर के बिगडै़ल बच्चों और चटोरी औरतों की हरकतों का अवलोकन भी करते रहते हैं कि किस का बच्चा कैसे आंख बचा कर कितने लड्डू मार गया, कौन बराबर ताक लगाए बैठा रहा और कौन सी भाभी किस बहाने से कितनी खस्ता कचौरी ले गईं, कौन सी मौसी  ने फरमाइशें करकर के उन का और पकाने वाले का कलेजा पका दिया, किस चाची ने मटर निकाले कम और फांके ज्यादा, कौन से मामा उन्हें कंपनी देने के बहाने वहां औरतें देखने बैठे हुए थे.

छोटे बच्चे तो मक्खियों की तरह हलवाई की भट्ठी के इर्दगिर्द मंडराएंगे ही और उन्हें ढूंढ़ती उन की मांएं भी वहां आएंगी ही. उन्हें देख कर मामाजी की बुढ़ाती हड्डियों में भी सनसनाहट हो जाती है.

भंडारे की डय्टी खत्म होते ही मुन्ना भाई को अपनी खुराक की चिंता सताने लगती है. वह बड़बोलेपन के अंदाज में बोलते हैं, ‘‘भाई साहब, दिन भर तो भट्ठी पर तपाया है…अब कुछ थकान उतारने के लिए गला तो तर कराओ.’’

अगर आदर्शवादी भाई साहब ने कह दिया कि यह सब उन के यहां नहीं चलता तो हो गई बेचारों की छुट्टी.

‘‘औकात नहीं है खातिर करने की तो बुलाते क्यों हो? बहुत गमी और खुशी के मौके देखे हैं लेकिन ऐसा तो पहली बार देखा कि हलवाई को चुल्लू भर घी दे कर टोकरा भर मिठाई बनाने को कहा जाए और मेहमानों को सिर्फ पानी से प्यास बुझाने को,’’ और इसी के साथ मुन्ना भाई का परनिंदा पुराण खुल जाता है कि कबकब किसकिस ने उन के साथ क्याक्या किया जबकि उन्होंने तो हमेशा सब का भला ही किया है.

मुन्ना भाई के मुंह से उन के उपकार की बातें सुन कर लगता है कि भारत सरकार न सही, अपनी बिरादरी की किसी संस्था को तो उन को ‘परमार्थी जीव’ की उपाधि देनी ही चाहिए. यदि यह भी न हो तो कम से कम सगेसंबंधियों को तो उन्हें सम्मानित करना ही चाहिए. लेकिन सम्मानित करना तो दूर मुन्ना भाई के शब्दों में, ‘अब सब उन से कन्नी काटने लगे हैं जबकि सब के लिए उन्होंने हमेशा बहुत कुछ किया है.’

कन्नी काटने की वजह जानने से पहले ‘बहुत कुछ’ की व्याख्या कर ली जाए.

बहुत कुछ में ज्यादातर तो वही शादी या गमी में कचौरियों व लड्डुओं का हिसाब है या फिर उस की लड़की की शादी उस के लड़के से करवा दी, किसी खुशहाल रिश्तेदार से बदहाल रिश्तेदार की मदद करवा दी, रुतबे वाले रिश्तेदार से कह कर किसी के बेटे, दामाद की बदली या तरक्की करवा दी, किसी के बिगडै़ल बच्चे को सुधारने के बहाने अपने पास रख कर घर के छोटेमोटे काम फोकट में करवा लिए, बस. इस से ज्यादा और कुछ नहीं.

अब यह सब ऐसी मेहरबानियां तो हैं नहीं कि हर कोई उन्हें सदाबहार गजल की तरह गुनगुनाता रहे या गुरुमंत्र की तरह जपता रहे. इस से अपने मुन्ना भाई के अहं को ठेस पहुंचती है और वह गाहेबगाहे किसी बच्चे को बता देते हैं, ‘तेरी मम्मी की शादी तो तेरी दादी की खुशामद कर के मैं ने ही करवाई थी,’ या ‘तेरी दादी तो तेरी मां को तेरे बाप के पास भेजने को भी तैयार नहीं थीं, मैं बीच में न पड़ता तो तू तो पैदा ही न हुआ होता.’ बात भले ही सही हो लेकिन बच्चे की मां को चुभ जाती है और वह बेचारे मुन्ना भाई का पत्ता काटने लगती है.

मुन्ना भाई मिजाज के भी मुन्ना ही हैं. जराजरा सी बात पर चिढ़ जाते हैं. जैसे किसी गमी के मौके पर अफसोस करने आए किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से उन का परिचय न करवाया जाए, कमरे में औरतों को सुला कर उन्हें बरामदे में सोने को कहा जाए, खाने में उन की पसंद की दालसब्जी न हो, निमंत्रणपत्र पर पहले पत्नी और फिर उन का नाम लिखा जाए, किसी को यह बताने पर कि वह उन के पड़ोस के शहर से आ रहे हैं, यह सुनने को न मिले कि फिर तो हमारे पास भी आइए.

अपनी जवानी और नौकरी के जमाने में मुन्ना भाई ने खूब जलवे दिखाए. यानी हर शादी और गमी में अपनी मौजूदगी का जीभर कर एहसास करवाया लेकिन चढ़ता सूरज भी ढलता ही है न, अपने मुन्ना भाई भी रिटायर हो गए. सोचा तो था कि अब निश्ंिचत हो कर रिश्तेनाते निबाहेंगे, छुट्टी का झंझट तो रहा नहीं, आराम से भांजेभतीजों के घर रहा करेंगे, लेकिन भांजेभतीजे भी कम उस्ताद नहीं हैं, वे तो एकदूसरे से गाहेबगाहे ही संपर्क रखते हैं.

मुन्ना भाई आने की सोच रहे हैं यह भनक लगते ही एकदूसरे को आगाह कर देते हैं और फिर सब के सब एक ही राग अलापने लगते हैं, ‘आजकल यहां बिजलीपानी की बहुत किल्लत है. आधी बालटी पानी भी नहाने को मिल जाए तो बहुत है, फ्लश कैसे चलता है ये तो भूल ही गए हैं. इस उम्र में बालटी उठा कर डालनी पडे़गी, यह सोच कर ही मां को तो कब्ज हो जाता है.

‘टीवी तो शोपीस बन कर रह गया है, बिजली होने पर भी देखने का मजा नहीं आता क्योंकि धारावाहिक में पहले क्या हुआ था, न देख पाने से लिंक टूट जाता है. सुन तो रहे हैं कि बरसात के बाद हालात सुधरेंगे फिर आप को खबर करेंगे, आप अवश्य आइएगा.’

बहाना और उस के साथ का आश्वासन भारत के हर प्रांत पर सटीक बैठता है, बगैर शिकायत के लिए कोई गुंजाइश छोड़े. बरसात तो हर साल ही आती है और जाती है लेकिन हालात न बदलते हैं न बदलेंगे और न मुन्ना भाई को बुलावा आएगा.

वह कहते हैं कि शेर कितना भी बूढ़ा हो जाए घास तो खाने से रहा, खाएगा तो गोश्त ही. यानी मुन्ना भाई भी अपना टाइम अखबार पढ़ कर या टीवी देख कर तो पास करने से रहे, गपशप किए बगैर उन का खाना हजम नहीं होता. उन्होंने इस की तरकीब भी ढूंढ़ ली और अपने पोते को स्कूल लाने ले जाने, उस का होमवर्क करवाने का काम भी संभाल लिया.

बहू ने राहत की सांस ली. बच्चे को स्कूल छोड़ना, लाना और फिर होमवर्क करवाना अच्छाखासा जी का जंजाल था, उस से भी उसे छुट््टी मिली और मुन्ना भाई के हरदम सिर पर सवार रहने से भी. मुन्ना भाई अकेले तो हैं नहीं जो बच्चे को स्कूल छोड़ने जाते हों, उन के जैसे कई दादीदादा और बच्चों की मांएं भी आती हैं. छोड़ने के समय तो खैर सभी जल्दी में होते हैं लेकिन लेने तो समय से कुछ पहले ही आना पड़ता है.

सयाने मुन्ना भाई ने इसी समय का सदुपयोग किया, पहले मुसकरा कर परिचय का आदानप्रदान किया और उस के बाद तो मीठीमीठी बातें कर के, सब के दिलों में घर कर के या यह कहें रूमाल से धोती बना लेने वाले जादूगर की तरह मुन्ना भाई धीरेधीरे सब की दुखतकलीफें और घर की अंदरूनी बातें भी जान गए पर केवल मुन्ना भाई, बच्चों को लेने आने वाले सब लोग नहीं. अगर सभी की आपस में दोस्ती हो जाती तो हमारे मुन्ना भाई की अहमियत क्या रह जाती?

शीघ्र ही मुन्ना भाई का पुराना परमार्थ का नेटवर्क चालू हो गया. पहले ससुराल के भतीजेभतीजियों का अपने भांजेभांजियों से रिश्ता करवाते थे, रिश्तेदारों से सुलहसफाई करवाते थे, अब यह सब नए बनाए दोस्तों में करवाने लगे हैं. विवाह योग्य बच्चेबच्चियां किस के घर में नहीं होतीं, मुन्ना भाई ने सदा उन का सदुपयोग किया था, अब भी कर रहे हैं. फिलहाल तो वह बच्चों के होमवर्क संबंधी परेशानियों को दूर करने वाले विशेषज्ञ माने जा रहे हैं मगर शीघ्र ही यहां भी हर मातम में मुखिया और हर खुशी के हीरो तो बनेंगे ही लेकिन अगर लगे हाथों उन्हें महल्ले के ‘माननीय बड़े बुजुर्ग सदस्य’ की उपाधि भी मिल जाए तो वह वाकई में मुन्ना भाई एमबीबीएस हो कर बस, वहीं के हो जाएं और रिश्तेदारों को बिजलीपानी की किल्लत का सहारा न लेना पड़े. लगे रहो मुन्ना भाई.

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