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पंजाब में शिअद और भाजपा लड़खड़ा रहे, कांटे की टक्कर आप और कांग्रेस के बीच

पंजाब की राजनीति बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हुई है. शिअद यानी शिरोमणि अकाली दल और भाजपा की तरह आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच भी गठबंधन न हो पाने से कहने को भले ही मुकाबला चतुर्कोणीय हो गया हो लेकिन वह 13 में से 4 सीटों पर सिमटा दिखाई दे रहा है, बाकी 9 पर तो आप और कांग्रेस भारी पड़ रहे हैं. सिखबाहुल्य राज्य पंजाब में न तो राम मंदिर और हिंदुत्व का कोई असर है और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां कभी करिश्माई साबित हो पाए हैं.
वे वहां इन बातों और मुद्दों का जिक्र करने में हिचकते हैं, हां, हिंदुओं और सिखों के बीच फूट डालने का दोष जरूर कांग्रेस के सिर मढ़ देते हैं जो बेअसर ही साबित होता रहा है. न केवल नरेंद्र मोदी बल्कि पूरा भगवा गैंग यह राग अलापता रहता है लेकिन सिख इस से भड़कते नहीं क्योंकि वे बेहतर जानतेसमझते हैं कि भाजपा का मकसद सिर्फ फूट डालना रहता है.

हिंदू राष्ट्र के होहल्ले और खतरों से भी सिख समुदाय वाकिफ है और कभी इस से सहमत नहीं रहा. जबजब भी इस मुद्दे ने जोर पकड़ा तो जवाब में खालिस्तान की मांग उठी जो भाजपा की नजर में राष्ट्रद्रोह होती है और आतंकवाद फैलाती है.
पंजाब में अगर कोई मुद्दा है तो वह किसान आंदोलन और किसानों की मांगे हैं. दूसरा मुद्दा जो धीरेधीरे जोर पकड़ रहा है वह शराब नीति मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की साजिशाना और नाजायज गिरफ्तारी है. बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार पर भी वहां के लोग मुखर हैं यानी भाजपा के हक में कुछ खास नहीं है जिस ने 2019 का लोकसभा चुनाव शिअद के साथ लड़ा था तब उसे महज 2 सीटें 9.63 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. शिअद के खाते में भी 2 सीटें ही गई थीं लेकिन उम्मीद के मुताबिक उस का वोट शेयर ठीकठाक 27.76 रहा था.

इस चुनाव में आप ने एक सीट 7.38 फीसदी वोटों के साथ जीत कर पिछले चुनाव के मुकाबले नुकसान उठाया था. कांग्रेस की दुर्गति 2019 के चुनाव में पूरे देश में हुई थी लेकिन पंजाब में उस का प्रदर्शन शानदार था. उस ने 8 सीटें 40.12 फीसदी वोटों के साथ जीती थीं.
लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में तसवीर एकदम उलट थी. सभी को चौंकाते हुए आप ने 117 में से रिकौर्ड 92 सीटें 42.01 फीसदी वोटों के साथ हासिल कर ली थीं. कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. शिअद को 3 सीटें 18.38 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं जबकि भाजपा को 2 सीटें 6.6 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं.
मोदी लहर सिर्फ हिंदीभाषी राज्यों का शिगूफा है, यह बात 2014 के लोकसभा चुनाव से भी उजागर हुई थी. तब भाजपा को 2 सीटें 8.70 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. शिअद के खाते में 4 सीटें 36.30 फीसदी वोटों के साथ गईं थीं. कांग्रेस को 3 सीटें 33.10 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं.

इस चुनाव में आप ने धमाकेदार एंट्री लेते 4 सीटें 24.40 फीसदी वोटों के साथ झटकने में कामयाबी हासिल कर ली थी. इस के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वापसी करते हुए 77 सीटें 38.5 फीसदी वोटों के साथ जीत ली थीं. आप के खाते में 20 सीटें 17.1 फीसदी वोटों के साथ दर्ज हुई थीं. शिअद को 15 सीटें 25.2 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं जबकि भाजपा को महज 3 सीटें 5.4 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं.

ये आंकड़े और मौजूदा हालात साफसाफ बयां करते हैं कि भाजपा और शिअद को यहां से ज्यादा उम्मीदें इस बार भी नहीं लगानी चाहिए. पंजाब में कांग्रेस मुश्किल दौर से गुजर चुकी है, उस के दिग्गज सुनील जाखड़, कैप्टन अमरिंदर सिंह और उन की पत्नी परनीत कौर भाजपा में शामिल हो चुके हैं और भी कुछ छोटेबड़े नेताओ ने पार्टी छोड़ी है.
अमरिंदर सिंह के बाद कांग्रेस ने दलित समुदाय के चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था लेकिन वे जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए. आप को सत्ता पंजाब के लोगों ने इन्हीं हालात के मद्देनजर सौंपी थी कि कांग्रेस अंतर्कलह का शिकार थी और शिअद व भाजपा सिर्फ हिंदूसिखमुसलमान कर रहे थे जो नशे के कारोबार से भी ज्यादा खतरनाक और नुकसानदेह है.

दिल्ली का अरविंद केजरीवाल मौडल लोगों को भाया तो उन्हें लगा कि हमारे राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और दूसरे जनहित के मुद्दों पर काम हो जो कि आप के वादे के मुताबिक हो भी रहे हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान ने विपक्षियों को कोई मौका नहीं दिया और पार्टी की लोकप्रियता बनाए रखी है.
भगवंत मान की शैली खासतौर से भाजपा को अखरती है कि वह सरकारी नीतियों और उपलब्धियों का आक्रामक प्रचार इश्तिहारों के जरिए करते हैं. बौखलाई भाजपा ने उन्हें शराबीकबाबी प्रचारित करने की नाकाम कोशिश की थी. इस के अलावा पंजाब और उस के इर्दगिर्द में वह कितने निचले स्तर तक आ गई है, यह चंड़ीगढ़ मेयर चुनाव के फर्जीवाड़े और खुली बेईमानी से भी साबित हुआ था. वैसे भी, पंजाब में जमीनी नेताओं की कमी से जूझ रही भाजपा विनोद खन्ना और सनी देओल जैसे फिल्मी सितारों के ग्लैमर पर ज्यादा जीतती रही है इस बार तो वह भी नदारद है.

शिअद-भाजपा गठबंधन न होने से कांग्रेस और आप को बड़ा फायदा होता दिख रहा है. शिअद के वोटों का बड़ा हिस्सा गांवों में है जिस के चलते उस ने भाजपा का हाथ झटक तो दिया लेकिन किसान आंदोलन के उस के रुख से किसान और आम लोग उस पर भरोसा नहीं कर रहे. आम लोग चाहते थे कि शिअद भाजपा पर एमएसपी की गारंटी और बंदी बनाए गए सिखों की रिहाई की बाबत दबाव बनाए जो वह नहीं कर पाया. किसान आंदोलन के बाद शिअद का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है. जालंधर और संगरूर लोकसभा चुनाव इस की गवाही भी देते हैं. इस के अलावा जातिगत समीकरण भी आप ने बिगाड़े हैं.

राज्य में 58 फीसदी सिख और 38 फीसदी हिंदू हैं. देश में सब से ज्यादा दलित आबादी 32 फीसदी दलितों की है जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का वोटबैंक रहा है. पिछड़े वर्ग की 31 फीसदी आबादी का वोट कभी एकमुश्त किसी को नहीं जाता. 19 फीसदी जाट सिख वोट भी बंटता रहता है. वैश्य, सूद, अरोरा और खत्री करीब 14 फीसदी हैं जो हवा का रुख देख कर वोट करते हैं. 4 फीसदी अल्पसंख्यकों में बड़ा हिस्सा मुसलमानों का है जिस के आप और कांग्रेस में बंटने के आसार बन चुके हैं.
आप उन 8 हजार करोड़ के बाबत भी केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में कामयाब रही है जो पंजाब को ग्रामीण विकास फंड की शक्ल में मिलना था. किसान संगठनों का साथ और सहयोग तो उसे मिला ही हुआ है जिसे कांग्रेस भी शेयर कर रही है. ऐसे में सियासी पंडितों का यह गणित 4 जून के नतीजों की झलक ही दिखाता है कि 13 में 6-6 सीटें आप व कांग्रेस में बंट सकती हैं, बची एक शिअद या भाजपा के खाते में जा सकती है.

सख्त नियम और कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल बच्चों की खरीदफरोख्त की जिम्मेदार

राखी के पति सौरभ को कैंसर था. बीते कई सालों से उसका इलाज चल रहा था. नौकरी जा चुकी थी. कीमोथेरेपी के कारण शरीर जीर्णशीर्ण हो गया था. सेहत गिरती जा रही थी. बचने की कोई उम्मीद नहीं थी. राखी और सौरभ की कोई संतान नहीं थी. सौरभ यह सोच कर परेशान रहता था कि उसके बाद राखी अकेले कैसे रहेगी? सौरभ के माता पिता का देहांत कई साल पहले हो गया था. उसके कोई भाई बहन भी नहीं थे. एक दिन उसने अपनी परेशानी राखी के पिता से कही. कुछ राय मशवरा हुआ और कुछ दिन बाद लोगों ने देखा कि राखी की गोद में एक नवजात बच्चा है. मोहल्ले में जिसने भी पूछा उसको यही बताया गया कि उन्होंने इस बच्चे को गोद लिया है.

केन्द्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण यानी कारा (CARA- Central Adoption Resource Authority), जिसके नियमों के तहत ही भारत में बच्चे को अडॉप्ट किया जाता है, उसके नियमों के तहत राखी की उस वक़्त जो उम्र थी, उस उम्र की महिला किसी नवजात शिशु को अडॉप्ट नहीं कर सकती थी. राखी उस वक़्त 41 साल की था और उसके पति सौरभ 44 साल का. कारा के नियमों के अनुसार इस उम्र के नि:संतान दंपत्ति को कारा में रजिस्ट्रशन के उपरान्त सभी शर्तों और नियमों के पालन के बाद किसी अनाथ आश्रम से दो से चार साल की उम्र का बच्चा मिल सकता था, इससे कम उम्र का नहीं. वह भी तब जब दोनों पति पत्नी पूरी तरह स्वस्थ हो, आर्थिक रूप से बच्चे की परवरिश करने के लिए सक्षम हों, उनके पास अपनी चल-अचल संपत्ति हो और बच्चा अडॉप्ट करने के लिए परिवार के अन्य सदस्यों की रजामंदी हो. रजिस्ट्रेशन के बाद भी गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी है कि बच्चा मिलने में चार से छह वर्ष का समय लग जाता है.

जाहिर है इनमें से कोई भी नियम या शर्त राखी और सौरभ पूरी नहीं करते थे. उन्होंने बच्चा किसी दलाल के माध्यम से खरीदा था. उस बच्चे के आने के छह महीने बाद ही सौरभ की मृत्यु हो गयी. इस बात को अब 12 साल बीत चुके हैं. राखी का बेटा भी 12 साल का हो चुका है. वह रोज माँ की ऊँगली थाम कर स्कूल जाता है. बाज़ार में माँ के साथ घूमता और चीजों की फरमाइश करता नज़र आता है. दोनों के बीच जो अथाह प्यार है उसको देख कर कोई कह भी नहीं सकता कि राखी उसकी सगी माँ नहीं है. राखी अपने बेटे पर जान लुटाती है. उसकी हर छोटी बड़ी ख्वाहिश को पूरा करती है. राखी के पिता भी अपने नवासे से बेइंतहा प्यार करते हैं. अब अगर राखी के ऊपर बच्चा चोरी या बच्चा खरीद का कोई क्रिमिनल केस चले और प्रशासन बच्चे को उससे छीन कर किसी किशोर गृह में भेज दे तो क्या यह माँ और बच्चे के साथ क्रूरता नहीं होगी?

दिल्ली के रहने वाले संदीप और नेहा ने अपना बच्चा पाने के लिए सभी प्रयास कर लिए. दो बार फोर्टिस अस्पताल में आईवीएफ भी कराया और करीब दस लाख रुपये गवाने के बाद भी दोनों को संतान सुख नहीं मिला. एक दिन मोहल्ले वालों को पता चला कि उन्होंने छह माह की एक बच्ची गोद ली है. संदीप से बातचीत में उसने बताया कि उसने पंजाब से इस बच्ची को गोद लिया है. संदीप और नेहा की आयु भी 45 – 50 के बीच है. कारा की गाइड लाइन के अनुसार उनको भी इतना छोटा बच्चा गोद नहीं दिया जा सकता है. उनकी उम्र के हिसाब से उनको करीब चार साल तक का बच्चा ही गोद मिल सकता है. साफ़ है उन्होंने भी इस बच्ची को किसी से ख़रीदा है. आमतौर पर चूंकि समाज में कारा और उसके नियम कानून के बारे में ज़्यादा जागरूकता नहीं है, लिहाजा कोई सवाल नहीं उठाता. लोग खुश होते हैं कि चलो उनके घर में रौनक तो आयी. पूरा घर नए बच्चे को खिलाने-खेलने में व्यस्त हो जाता है.

अधिकांश लोग बच्चा खरीदने के बाद अपना घर बदल लेते हैं या दूसरे शहर में जाकर बस जाते हैं, ताकि कोई भी उनके बच्चे को यह ना बता सके कि वह उनका अपना नहीं बल्कि गोद लिया हुआ है. ऐसा वह बच्चे की भलाई के लिए ही करते हैं.

देश भर में ऐसे हज़ारों अस्पताल, क्लीनिक और नर्सिंग होम हैं जहां प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में ऐसे बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनको पैदा करने वाली मायें उन्हें पालना नहीं चाहतीं. अवैध संबंधों से उत्पन्न बच्चे, बलात्कार के चलते गर्भ ठहर जाने पर होने वाले बच्चे, लड़के की आस में एक के बाद एक पैदा होने वाली लड़कियों से घरवाले छुटकारा चाहते हैं. ऐसे बच्चे कई बार प्लास्टिक की थैलियों में बंधे किसी कूड़ाघर में, किन्ही झाड़ियों के बीच, किसी नाले में या किसी गटर में मरने के लिए छोड़ दिए जाते हैं. कुछ मर भी जाते हैं तो कुछ को पुलिस अपनी कार्रवाई के बाद अनाथ आश्रम पहुंचा देती है. कुछ मायें बच्चे को जन्म देकर उन्हें अस्पताल के बेड पर छोड़ कर चुपचाप फरार हो जाती हैं. कुछ बच्चे रात के अँधेरे में किसी अनाथाश्रम के बाहर लगे पालने में छोड़ दिए जाते हैं. महाभारत की कुंती और कर्ण की कहानी कौन नहीं जानता? आज ऐसी कुंतियाँ लाखों की संख्या में हैं जो कर्णों को पैदा करके यहां वहां छोड़ देती हैं और उनकी तरफ पलट कर भी नहीं देखतीं.

ऐसे अनचाहे बच्चों से देश के तमाम अनाथाश्रम भरे पड़े हैं. दूसरी ओर ऐसे निःसंतान दम्पत्तियों की संख्या भी लाखों में है जो जल्दी से जल्दी बच्चा गोद लेना चाहते हैं. मगर केन्द्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के नियम इतने सख्त हैं और प्रक्रिया इतनी धीमी है कि बच्चा गोद लेने के लिए ऑनलाइन एप्लीकेशन डालने और सारी शर्तों को पूरा करने के बाद भी बच्चा पाने में दंपत्तियों को चार से छह साल लग जाते हैं. ऐसे में दंपत्ति की उम्र भी बढ़ जाती है और बच्चा पालने की चाह भी धीमी पड़ जाती है. चार-छह साल बाद जब उन्हें बच्चा मिलता है तो उस उम्र का होता है जिसमें वह खासा समझदार हो चुका है. जिसे पता है कि वह जिनके साथ जा रहा है वह उसके असली माँ बाप नहीं हैं. ऐसे में बच्चे और माता-पिता के बीच एक दूरी पूरी जिंदगी बनी रहती है. ऐसे भी मामले देखे गए हैं जब ऐसे बच्चे किशोरावस्था में अपने असली माँ बाप की खोज करने लगते हैं. वे मानसिक रूप से व्यथित रहते हैं और उनके दिल में यह सवाल हमेशा रहता है कि उनके असली माँ बाप ने उनको क्यों त्याग दिया?

यही वजह है कि नि:संतान दंपत्ति कारा के नियमों के तहत रजिस्ट्रशन करा के, फीस भर के, सालों के इंतज़ार के बाद एक बड़ा और समझदार बच्चा गोद लेने की बजाय, किस दलाल के जरिये नवजात शिशु को खरीदना ज़्यादा प्रिफर करते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वे नहीं चाहते कि बच्चा कभी भी इस बात को जाने कि उसके असली माँ बाप कोई और हैं. जबकि कानूनी तौर पर जब कोई बच्चा गोद दिया जाता है तो हाउस विजिट के दौरान बार बार गोद लेने वाले दंपत्ति के घर आने वाले सरकारी कर्मचारियों द्वारा बच्चे की काउंसलिंग के नाम पर उसको बताया जाता है कि तुमको पैदा करने वाली माँ कोई और थी और पालने वाली माँ यह है. सोचिये इन बातों का बच्चों के कोमल हृदय पर कितना घातक प्रभाव पड़ता होगा. क्या यह बच्चे के प्रति और उसको गोद लेने वाले माता पिता के प्रति क्रूरता नहीं है?

आज देश भर के हज़ारों अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राइवेट क्लीनिक आदि में बच्चा खरीद-फरोख्त का काम हो रहा है. डॉक्टर, नर्से, दाइयां जहां एक ओर ऐसी माओं की डिलीवरी करवाती हैं जो समाज में बदनामी के डर से पैदा हुए नवजात को पालना नहीं चाहतीं, वहीं दूसरी और दलालों के पास उन लोगों की सूची होती है जो निसंतान हैं और नवजात बच्चा पाना चाहते हैं. इन दलालों में ज़्यादातर निचले तबके की वह औरतें होती हैं, जो बड़ी कोठियों और फ्लैट्स आदि में मेड का काम करती हैं. इन्हें पता होता है कि किस दम्पत्ति को बच्चे की चाह है. कौन बच्चा खरीदने के लिए कितना पैसा खर्च कर सकता है.

जैसे ही कोई गर्भवती अपने नाजायज गर्भ से छुटकारा पाने के लिए डॉक्टर के पास आती है, डॉक्टर यह कह कर उसको बच्चा पैदा करने के लिए तैयार करते हैं, कि डिलीवरी के बाद उसके बच्चे की जिम्मेदारी उनकी है. किसी को पता नहीं चलेगा कि उसने बच्चा पैदा किया है. इसके एवज में उन्हें कुछ पैसे भी ऑफर कर दिए जाते हैं. बच्चा होने के बाद माँ को छुट्टी दे देते हैं और बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट पर उस महिला का नाम बतौर माँ चढ़ा दिया जाता है, जिससे दलाल का सौदा तय हो जाता है. वह तय धनराशि लेकर बच्चे को बर्थ सर्टिफिकेट और डिलीवरी के सभी दस्तावेजों के साथ उस महिला को सौंप देता है. यह पैसा डॉक्टर, नर्से, दाई और दलाल के बीच बंट जाता है. यह रकम दो लाख रुपये से लेकर आठ लाख और कभी कभी इससे भी ज़्यादा होती है. बच्चे को पैदा करने वाली माँ और उसे खरीदने वाली माँ एक दूसरे के सामने कभी नहीं आते और ना एक दूसरे के बारे में जान पाते हैं.

इन लोगों से बात करो तो वे इसे समाज सेवा का नाम देते हैं. सुनीता नामक एक दलाल जिसका ऑटो चालक पति भी इस काम में उसकी मदद करता है, कहती है हम तो सूनी गोद में किलकारी भरने का काम करते हैं, इससे बड़ा नेक काम क्या कोई हो सकता है? बच्चा नाली में फेंक दिया जाए, उसको कुत्ते नोच कर खा जाएँ इससे तो बेहतर है कि उसको माँ बाप की गोद और एक अच्छा घर मिल जाए. सुनीता आगे कहती है – अगर अनाथ आश्रम से बच्चा मिलना इतना ही आसान होता तो बेऔलाद लोग हमारे पास नहीं आते. हमें रोजाना दस से पंद्रह फ़ोन आते हैं बच्चों के लिए. दिल्ली में तो कितने अस्पताल हैं जहां यह काम होता है. नार्थ ईस्ट की कितनी लडकियां हैं जो दिल्ली में अपने बॉयफ्रैंड्स के साथ रहती हैं. प्रेग्नेंट हो जाती हैं और फिर बच्चा गिराने अस्पताल पहुंच जाती हैं. कुछ केस में तो इतने महीने निकल चुके होते हैं, कि डॉक्टर गर्भ गिराने से मना कर देती है. उन लड़कियों के बच्चे हम ले लेते हैं. हम औरतों की सूनी गोद भरते हैं, नाजायज बच्चों को घर मिल जाता है. इस काम में हमें दुआ भी मिलती है और पैसे भी.

6 अप्रैल 2024 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने बच्चों की खरीद-बिक्री करने वाले एक गिरोह को पकड़ा. सीबीआई ने दिल्ली और हरियाणा में 7 जगहों पर छापेमारी की. दिल्ली के केशवपुरम इलाके के एक घर से तीन नवजात शिशुओं को बरामद किया गया. इसमें दो लड़के और एक लड़की है. लड़कों में एक मात्र डेढ़ दिन का है और दूसरा 15 दिन का, जबकि बच्ची करीब महीने भर की है. सीबीआई ने एक नामी अस्पताल के वार्ड बॉय समेत 7 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें से 5 महिलाएं हैं.

सीबीआई के मुताबिक़ यह लोग बच्चों के असली माता-पिता से या सेरोगेट माँ से इन बच्चों को खरीद कर सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिये नि:संतान दम्पत्तियों को बेचते हैं. एक बच्चे की कीमत 4 से 6 लाख रुपये तक लगाईं जाती है. लड़कों की कीमत ज़्यादा होती है. ये लोग फेसबुक पेज या वाट्सएप के द्वारा बच्चे के फोटो भेज कर नि:संतान दंपत्तियों से दाम तय करते हैं और फिर पैसा लेकर तय जगह पर बच्चा डिलीवर कर दिया जाता है. सीबीआई ने इन लोगों के खिलाफ आईपीसी और किशोर न्याय अधिनियम 2015 के विभिन्न दंड प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया है. दिल्ली के कई नामचीन अस्पताल भी अब सीबीआई की रडार पर हैं. सीबीआई ने बच्चों को कोर्ट के सामने पेश कर अनाथ आश्रम भेज दिया है. सीबीआई के मुताबिक़ इन बच्चों को बचाया गया है. पर क्या सचमुच?

अगर दलाल इन बच्चों का सौदा करके किसी निसंतान दंपत्ति को दे देते तो क्या इन नवजात बच्चों को, जिन्हें उनकी अपनी माँ ने ठुकरा दिया, एक घर, एक परिवार ना मिल जाता? प्यार करने वाले माँ बाप ना मिल जाते? जो उन्हें कभी इस बात का पता भी ना चलने देते कि वह उनकी अपनी संतान नहीं है. उनकी अच्छी परवरिश होती, अच्छी शिक्षा मिलती और उनका भविष्य सुरक्षित हो जाता.

अब जबकि यह बच्चे अनाथ आश्रम भेज दिए गए हैं तो पहले तो पुलिस उनके असली माता पिता की खोज में समय खराब करेगी. नतीजा जीरो निकलेगा. कई महीने बीत जाने के बाद उनको एडॉप्शन के लिए रजिस्टर कर दिया जाएगा. उनसे पहले गोद दिए जाने वाले बच्चों की एक लम्बी लिस्ट होगी. लिहाजा उन्हें कई साल तक अपनी बारी के इंतज़ार में अनाथ आश्रम के कर्मचारियों के साथ रहना होगा. वे दो साल, चार साल, छह साल के हो जायेगे. यह समझने लगेंगे कि वे अनाथ हैं. उनके माँ बाप ने उन्हें पैदा करके छोड़ दिया. उनको बताया जाएगा कि एक दिन कोई नए माँ बाप आएंगे जो उनको अपने साथ ले जाएंगे. यह सब कुछ मासूम बच्चों के लिए कितना कष्टकारी होता होगा. ये बच्चे पढ़ने के लिए सरकारी स्कूलों में जाते हैं, जहां अन्य बच्चों के माता पिता उनके साथ आते हैं. कैसा लगता होगा इन बड़े होते, समझदार होते अनाथ बच्चों को?

यदि गोद देने की कानूनी प्रक्रिया को तेज कर दिया जाए और नवजात बच्चों को तुरंत किसी नि:संतान दंपत्ति की गोद में दे दिया जाए तो ना समाज में बच्चों की खरीद फरोख्त करने वाले गिरोह पनपें और ना ऐसे बच्चे घर और माँ बाप के प्यार को तरसें.

सीबीआई एकाध जगह छापा मार कर और चंद लोगों को गिरफ्तार कर अपनी पीठ थपथपा रही है, मगर बच्चों की खरीद फरोख्त का धंधा बहुत व्यापक पैमाने पर देश भर में फैला हुआ है. तमाम छोटे-बड़े अस्पताल इसमें इन्वॉल्व हैं. यहां तक कि अनाथ आश्रमों के संचालक तक इस धंधे से जुड़े लोगों को जानते हैं और कई बार जल्दी बच्चा चाहने वाले दम्पत्तियों को उनका फ़ोन नंबर तक उपलब्ध करा देते हैं. सौदा तय करवा देते हैं. अब किस किस को पकड़ेगी सीबीआई ?

डिप्रैशन : नाट्य अभिनय से बचाव संभव

किसी विद्वान के मुताबिक तनाव अर्थात डिप्रैशन ही वह विषय है जो सारी बीमारियों की जड़ है. तनाव से बचाव के अनेकाअनेक रास्ते विशेषज्ञ बताते हैं. यहां हम आप को बताने जा रहे हैं कि अभिनय और नाट्य मंच के माध्यम से भी तनाव से बचा जा सकता है.

अब धीरेधीरे यह तथ्य भी स्वीकार किया जा रहा है कि हमारे जीवन में अनेक ऐसे आयाम हैं, अगर हम उन्हें अपना लें तो बड़ी आसानी से तनाव यानी कि डिप्रैशन से मुक्ति मिल सकती है.

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के वरिष्ठ नाट्यकर्मी अशोक मनवानी बताते हैं कि उन्हें ‘रंगमंच’ से जुड़े 4 दशक हो गए हैं. इन 40 सालों में शौकिया लगभग 30 नाटकों में काम किया है. हिंदी, सिंधी, गुजराती और बुंदेली के नाटकों में अभिनय किया है. वे बताते हैं, “भले नाटक कम संख्या में हैं लेकिन संतोष यह है कि इन में विविध और अहम भूमिकाएं करने का अवसर मिला जैसे पुलिस इंस्पैक्टर, डीआईजी, डाक्टर, स्वतंत्रता सेनानी, बुजुर्ग मुखिया, पड़ोसी और सेल्समैन.”

महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्होंने यह बात गहराई से महसूस की कि नाट्य अभिनय से जिंदगी के क्षण खुशनुमा हो जाते हैं और तनाव गायब हो जाता है. यह बात उन्होंने बारंबार महसूस की है. उन्होंने बातचीत में बताया कि अब यह अन्वेषण विदेश में मनोवैज्ञानिक भी कर रहे हैं और मानते हैं. अब माना जा रहा है कि चाहे अभिनय हो या फिर अन्य कोई शौक जैसे बागबानी, कुश्ती, लेखन, अभिनय आदि से भी तनाव से हम मुक्त हो जाते हैं.

निराशाओं और अवसाद से बचाव

विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश के लेखक एवं नाट्य मंच में लंबे समय तक काम करने वाले डाक्टर टी महादेव राव के मुताबिक, रंगमंच जीवन की निराशाओं और अवसाद से भी व्यक्ति को बचाने का काम अनायास करता चलता है और जिंदगी में उमंग भर देता है.

अशोक मनवानी अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, “एक दफा एक साथी कलाकार के उपलब्ध नहीं होने पर महाभोज (लेखक- मन्नू भंडारी) को पुलिस अधिकारी की भूमिका करनी पड़ी थी. तब 2 दिनों में सैल्यूट सीखने के साथ ही मुख्यमंत्री के साथ लंबे संवाद याद करने की चुनौती थी. खैर, भारत भवन के अंतरंग मंच पर यह नाटक बहुत कामयाब रहा. इस का निर्देशन जानेमाने नाट्य निर्देशक अशोक बुलानी ने किया था. ऐसे ही एक दफा रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘काबुलीवाला’ पर आधारित नाटक के रवींद्र भवन में हो रहे मंचन में उसी दिन रोल करने को कहा गया.

“गुजरात से भोपाल आए नाट्य दल को पुलिस जवान का रोल करने वाले अपने आर्टिस्ट के न पहुंच पाने की वजह से इस किरदार के लिए एक आर्टिस्ट की आवश्यकता थी जो मैं ने निभाई. एक बार फिर मैं ने तत्काल संवाद याद कर अभिनय करने का आनंद उठाया. इन सारी चुनौतियों और अभिनय से मुझे जीवन में महसूस हुआ कि इस से हम बहुत हद तक तनाव/डिपप्रैशन से मुक्त हो जाते हैं. यह अपनेआप में एक प्राकृतिक चिकित्सा जैसा है.”

नाटकों में रुचि रखने वाले कवि दिलीप अग्रवाल कहते हैं कि जबजब उन्हें नाटकों में काम करने का अवसर मिला, उन्होंने अपने जीवन में बदलाव पाया. यह अपनेआप में अनेक तनावों से मुक्ति का इलाज है.

मध्य प्रदेश में शासकीय सेवा में कार्यरत एवं साहित्य में अभिरुचि रखने वाले अशोक मनवानी के कहते हैं, “मुझे इस के पहले लक्ष्मीकांत वैष्णव के ‘नाटक नहीं’, श्रवण कुमार गोस्वामी के ‘कल दिल्ली की बारी है’, मुंशी प्रेमचंद के ‘आहुति’ और कृष्ण बलदेव वैद के ‘भूख आग है’ के माध्यम से हिंदी रंगमंच पर आने और विशिष्ट भूमिकाएं करने का मौका मिला था.

“सिंधी नाटकों में लेखक कीरत बाबानी के लिखे ‘हेमू कालानी’ और लखमी खिलानी के देशविभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखे नाटक ‘रेत का किला’ में मुझे यादगार भूमिकाएं करने को मिलीं. कई वर्षों बाद इसी नाटक में 2023 में इंदौर में नाटक निर्देशिका कविता इसरानी के निर्देशन में अभिनय के लिए मंच पर रेलवे टीटी के रूप में मंच पर आया. थैलेसीमिया समस्या पर आम लोगों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से मेरे द्वारा लिखित नाटक ‘रक्तदोष’ में 10 बार से अधिक भूमिका का निर्वहन किया. इस में ब्लडबैंक अधिकारी के रूप में मंच पर अभिनय किया.

“इस के पहले मन्नू भंडारी के महाभोज में भी यही वरदी की गरमी दिखाई थी. डीआईजी सिन्हा की भूमिका में मुझे तब मुख्यमंत्री की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ कलाकार उदय शहाणे के साथ आंखें मिला कर एक्ट करने में पसीना आ गया था. दरअसल, मेरा यह मानना है कि थिएटर व्यक्तित्व विकास और अभिव्यक्ति क्षमता के विकास में भी‌ भूमिका निभाता है, साथ ही, मनुष्य की हिम्मत भी बढ़ाता है.”

कंगना रनौत के लिए कितनी आसान और मुश्किल होगी मंडी की सीट?

बौलीवुड ऐक्ट्रैस कंगना रनौत को बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार घोषित किया है. जिस के बाद से हिमाचल की यह सीट बेहद हौट बन गई है. कंगना रनौत पहली बार चुनावी मैदान में उतर रही हैं. कंगना के मंडी से उम्मीदवार बनने के साथ ही यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर बीजेपी ने मंडी से ही कंगना को क्यों उतारा? क्या सिर्फ कंगना का मंडी की बेटी होना इस सीट को जितने के लिए काफी है? या फिर मंडी की सीट पर बीजेपी इतनी आश्वस्त है कि उस ने किसी बड़े नेता की जगह पहली बार चुनाव में कूद रही फिल्म अदाकारा को मैदान में उतार दिया. आइए जानते हैं क्या है मंडी का समीकरण.

कंगना महज 17 साल की थी, तभी उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था. क्योंकि घरवाले उन के फैसले के खिलाफ थे. उन के घरवाले चाहते थे कि वो डाक्टर बने. लेकिन उन्हें तो ऐक्ट्रैस बनना था. बौलीवुड पर राज करने के बाद कंगना ने राजनीति की तरफ रुख करते हुए बीजेपी में हिस्सा लिया और इस बार वो लोकसभा चुनाव में मंडी से चुनावी मैदान में हैं.

बीजेपी का दांव

मंडी लोकसभा सीट में राजपूत वोटरों की संख्या सब से अधिक है. इस सीट पर हमेशा से राजपूत और ब्राह्मण वोटरों का दबदबा रहा है. कंगना रनौत राजपूत बिरादरी से आती हैं. ऐसे में बीजेपी ने जातीय समीकरण को साधने के लिए कंगना को मैदान में उतारा है.

मंडी में बीजेपी का दबदबा

मंडी जिले में 10 विधानसभा सीटें आती हैं. 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी का अच्छा प्रदर्शन रहा है. जिस में बीजेपी ने मंडी की 10 सीटों में से 9 पर कब्जा जमाया है. प्रदेश की 68 विधानसभा सीटों में बीजेपी ने 25 पर जीत दर्ज की, जिन में केवल मंडी से ही बीजेपी ने 9 सीटें अपने खातें में कीं. ऐसे में बीजेपी के लिए हिमाचल में यह सीट सब से सेफ है.

इतनी आसान नहीं होगी कंगना की राह

मंडी से टिकट मिलने से जीत तक सफर कंगना के लिए कांटोंभरा भी हो सकता है. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जानकारी के मुताबिक, हाल ही में पूर्व शाही परिवार के वंशज महेश्वर सिंह ने आलाकमान से रनौत को टिकट देने संबंधी फैसले की समीक्षा करने को कहा है. उन्होंने कहा कि ‘पार्टी में रनौत का कोई योगदान नहीं रहा है. साथ ही, मंडी के लोग मुखर हो गए हैं और फैसले की समीक्षा करने की सोशल मीडिया पर मांग कर रहे हैं.’

महेश्वर सिंह की मानें तो बीजेपी ने मंडी से उन्हें टिकट देने का आश्वासन दिया था. बता दें कि, महेश्वर सिंह बीजेपी की हिमाचल इकाई के अध्यक्ष और 3 बार सांसद रह चुके हैं.

प्रतिभा सिंह बढ़ा सकती हैं कंगना की मुश्किलें

प्रतिभा सिंह मंडी लोकसभा सीट से वर्तमान सांसद और हिमाचल कांग्रेस की अध्यक्ष हैं. इस के साथ ही वे हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी हैं. मंडी लोकसभा सीट पर अब तक 20 बार चुनाव हुए हैं, जिन में से 14 बार इस सीट पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है. जबकि 5 बार बीजेपी और एक बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की है.

मंडी लोकसभा सीट को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है क्योंकि यहां से पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह या प्रतिभा सिंह चुनाव लड़ती और जीतती आई हैं. हालांकि 2014 और 2019 में बीजेपी के रामस्वरूप शर्मा यहां से जीत हासिल कर चुके हैं. लेकिन 2021 में उन के निधन के बाद प्रतिभा सिंह ने यहां से फिर से जीत हासिल की.

ऐसे में अगर कंगना के खिलाफ कांग्रेस प्रतिभा सिंह पर दांव लगाती है तो बौलीवुड क्वीन के लिए यहां से जीत हासिल करना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

प्रतिभा सिंह ने कुछ समय पहले यह ऐलान किया था कि वो चुनाव न लड़ कर पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करेंगी. लेकिन हाल ही में उन्होंने अपनी बात से यूटर्न लेते हुए चुनाव लड़ने का फैसला आलाकमान पर छोड़ा है. जिस में उन्होंने कहा, “2021 में भी मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहती थी, लेकिन आलाकमान चाहता था कि मैं चुनाव में उतरूं तो मैं ने आलाकमान के फैसले का सम्मान किया. इस बार भी मैं चुनाव लड़ने का फैसला आलाकमान पर छोड़ती हूं, वो जो भी फैसला लेंगे, मुझे मंजूर होगा.

भाजपा के 400 पार का फेर कहीं 250 पर ढेर न हो जाए

बीती 3 अप्रैल की दोपहर एक भक्त चैनल नाम इंडिया टीवी की एक एंकर ओपिनियन पोल या सर्वे टाइप कोई प्रोग्राम संचालित कर रही थी. वह मन, वचन और कर्म से ही भक्तिन दिख रही थी. कमी बस भगवा पोशाक की खल रही थी. लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर किए गए इस सर्वे में आखिरकार वह यह साबित करने में कामयाब हो ही गई कि भाजपा और उस का गठबंधन इस बार 399 सीटें ले जा रहा है. यानी नरेंद्र मोदी और भाजपा अपने अब की बार 400 पार के नारे यानी टारगेट से महज एक सीट से पिछड़ रहे हैं. नहीं तो यह भविष्यवाणी सौ टका सच होने वाली है. वह चाहतीं तो और थोड़ी जोड़तोड़ कर पूरी 400 भी बता सकतीं थीं लेकिन बेहद बचकाने तरीके से 399 बता कर वह दर्शकों का भरोसा लूटने की कोशिश करती आईं तो उन पर तरस आना स्वभाविक बात है.

भविष्यवाणी कैसे सच होने वाली है, यह भी इस न्यूज चैनल सहित तमाम भक्त चैनल अपनेअपने तरीके और अंदाज से बता रहे हैं. वे स्क्रीन पर एकएक प्रदेश का आंकड़ा दिखाते बताते हैं कि भाजपा और उस का गठबंधन कहां से कितनी सीटें ले जा रहा है और क्यों ले जा रहा है. अगर आप के पास फालतू वक्त जाया करने के हैं और आप जुए सट्टे के शौकीन या लती हैं तो आप को ऐसे प्रोग्राम जरुर देखना चाहिए.

तय यह भी है कि अगर आप इन अहर्ताओं को पूरा करते हैं तो निश्चित ही आप या तो बेरोजगार हैं फुरसतिये हैं या कि फिर जिस की संभावना ज्यादा है खतरनाक तरीके के अंधभक्त हैं. इस में आप का कोई दोष भी नहीं क्योंकि 22 जनवरी को अयोध्या जलसे के दौरान सोशल मीडिया पर वायरल हुई इस पोस्ट में भी आप की अंगुली भी स्क्रीन पर फौरवर्ड वाले बटन पर दबी थी कि चुनाव की जरूरत क्या है मोदी जी को यूं ही शपथ दिलाए देते हैं.

इतना यानि अति आत्मविश्वास आमतौर पर डरे हुए लोगों में ही हो सकता है कि वे चुनाव से डरें और ईडी, आईटी, सीबीआई वगैरह जैसी सरकारी एजेंसियों की निष्ठां के चलते लोकतंत्र ( अगर कहीं बचा हो तो उस के ) रहे सहे अवशेष भी ढहाने में अपना योगदान दें. ठीक वैसे ही जैसे कभी अयोध्या का विवादित ढांचा ढहाने में दिया था. जो भक्त उस वक्त अयोध्या नहीं जा पाए थे उन्होंने घर बैठेबैठे ही यह ढांचा ढहा दिया था. इस से जाहिर हो गया था कि कल्पनाशक्ति की सीमाएं नहीं होतीं जिस के सहारे तमाम सुख और इच्छित कार्य बिना साक्षात मौजूद हुए सम्पन्न किए जा सकते हैं.

इस में इकलौती खोट या कमी खुद से और दुनिया से झूठ बोलने की होती है जिस में 8 – 10 करोड़ इतने माहिर हो चुके हैं कि उन्हें चुनौती देना आ भक्त मुझे मार जैसी कहावत को चरितार्थ करना है .

भक्ति कोई खास हर्ज की बात नहीं है लेकिन वह खतरा तब बन जाती है जब लोग उस का इस्तेमाल विध्वंस में करने लगते हैं. वे किसी जीते जागते इंसान जो हमारी आप की तरह कमजोरियों से मुक्त नहीं होता को देवता मान लेते हैं. फिर उस का कोई काम बुरा नहीं लगता बल्कि उस के उलटेसुलटे कामों को भी लोग सही ठहराने की कोशिश में जुट जाते हैं. नरेंद्र मोदी को देवता बना देने वाले लोग वही गलती कर रहे हैं जो कई लोगों ने 70-80 के दशक में इंदिरा गांधी को देवी बना कर की थी.

राजनीति में तब से यह पद या स्थान रिक्त था जो अब इस हद तक भरा जा चुका है कि चारों तरफ से आठों पहर एक ही आवाज आ रही है 400 पार, अब की बार 400 पार
जब यही बात न्यूज चैनल वाले कहते हैं तो शर्माशर्मी में उन्हें इसे साबित भी करना पड़ता है. इस तरह का आस्था प्रधान चुनावी विश्लेषण एक तरह से एक ही खिलाड़ी द्वारा दोनों तरफ से खेला जाने वाला शतरंज का खेल होता है. जिस में सफेद या काले मोहरे जिन्हें हराना हो हराया जा सकता है. अगर सफेद मोहरों को जिताना है तो काले मोहरों की तरफ से कमजोर चालें चली जाती हैं. यही इन दिनों मीडिया में हो रहा है जिस में नतीजों से पहले ही भगवा मोहरे जीते घोषित कर दिए गए हैं. बात कुछकुछ चित भी मेरी पट भी मेरी, सिक्का मेरी मीडिया कंपनी के मालिक का जैसी है.

इस में न तो झूठ बोलने पर गिल्ट फील होती है और न ही अपने धंधे से बेईमानी करने पर पछतावा होता. बल्कि मिथ्या गर्व जरुर होता है कि हम राष्ट्रहित की बात कर रहे हैं हिंदू राष्ट्र के यज्ञ में अपनी हैसियत के मुताबिक आहुति डाल रहे हैं और एक ऐसी संस्कृति की रक्षा या पुनर्स्थापना करने वालों के हाथ मजबूत कर रहे हैं जो कभी विश्वगुरु थी और अब फिर होने जा रही है.

यह और बात है कि सारा प्रपंच और खेल पैसों का ही है लेकिन उन साधु संतों सरीखा है जो माला फेरते नजरों से चढ़ावा गिन लेते हैं और फिर विरक्त होने का दिखावा करते कहते हैं कि हम तो सन्यासी हैं, हमें मोह माया और इस धन दौलत से क्या लेनादेना. हकीकत में यह अर्थ ही उन का धर्म और मोक्ष भी है जो उन्हें इश्तहारों और दूसरी सहूलियतों की शक्ल में मिलता है. ये न्यूज चैनल मीडिया के मंदिर हैं जिन में भंडारा सियासी दान से होता है. इन की भक्ति का तरीका और मिजाज पेशे के मुताबिक अलग है लेकिन जैसा भी है, है तो जो भक्ति के विभिन्न भेदों और स्वरूपों में से एक है.

गीता में कृष्ण ने अध्याय 7 श्लोक 16 में ऐसे भक्तों को अर्थार्थी भक्त कहा है. अर्थार्थी भक्त वह है जो भोग, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त करने के लिए भगवान का भजन करता है. उस के लिए भोग पदार्थ व धन मुख्य होता है और भगवान का भजन गौण.

इधर भक्तों ने इस व्याख्या को थोड़ा पलट दिया है मोदी का भजन उन के लिए गौण नहीं बल्कि प्रधान है. उसी से इन्हें मनचाहा भोजन धन और भोग विलास के साधन मिलते हैं. इसी खुराक और भक्ति से उन्होंने साबित किया और 4 जून तक और चिल्लाचिल्ला कर साबित करते रहेंगे कि भाजपा गठबंधन कैसे 400 पार जा रहा है.

सी वोटर, सर्वे करने के लिए कुख्यात है उस के मुताबिक देश भर में 200 ऐसी सीटें हैं जिन पर भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है. 2019 में इन सीटों पर भाजपा का वोट शेयर 55.3 फीसदी था जबकि कांग्रेस का 31.7 और अन्य दलों का 13 फीसदी था. भाजपा ने 185 कांग्रेस ने 9 और अन्य दलों ने 6 सीटें जीती थीं.

अब नई आंकड़ेबाजी के मुताबिक 2024 के चुनाव में भाजपा को 182 सीटें 55.4 फीसदी वोटों के साथ मिलने वाली हैं. कांग्रेस को 18 सीटें 33.5 फीसदी वोटों के साथ मिलेंगी .अन्यों का खाता इस बार नहीं खुलेगा लेकिन उन्हें 11.1 फीसदी वोट मिलेंगे.

543 में 243 सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा का मुकाबला क्षेत्रीय दलों से है. 2019 के लोकसभा चुनाव में इन सीटों पर भाजपा का वोट शेयर 35.5 फीसदी था और उसे 118 सीटें मिली थीं. जो बढ़ कर 122 होने वाली हैं और वोट शेयर 39 फीसदी हो जाएगा. कांग्रेस को पिछले चुनाव में यहां 10 सीटें मिली थीं जो बढ़ कर 22 हो जाएंगी. अन्य दलों को 2019 के चुनाव में 115 सीटें गईं थीं जो इस बार घट कर 99 रह जाएंगी. इस केलकुलेटर ने 100 सीटें ऐसी भी बताई हैं जिन पर भाजपा का वोट शेयर महज 5.8 फीसदी था और उसे कोई सीट नहीं मिली थी.

कांग्रेस ने इन 100 में से 33 सीटें 19 फीसदी वोटों के साथ जीती थीं. अन्य दलों ने 67 सीटें 75.2 फीसदी वोटों के साथ जीती थीं. इन सीटों पर भाजपा का खाता इस बार भी नहीं खुल रहा है लेकिन उस का वोट शेयर 11.2 फीसदी हो जाएगा. कांग्रेस इन सीटों पर 16.8 फीसदी वोट और 31 सीटें ले जाएगी. अन्य दलों को 72 फीसदी वोट और 69 सीटें मिल रहे हैं.

ऐसे सर्वे देख सर पीटने के अभी और कई मौके मिलेंगे जिन का मकसद जैसे भी हो एनडीए को 400 के लगभग दिखाना है. ऊपर वाले सर्वे में कुछ जटिलताएं हैं जिन्हें आसान करते राज्यवार सर्वे भी मैदान में आने लगे हैं जो कहीं ज्यादा दिलचस्प हैं और मुफ्त का मनोरंजन भी करते हैं. इंडिया टीवी सीएनएक्स के मुताबिक भाजपा अकेले दम पर 343 सीटें ले जा रही है जबकि एनडीए को 399 सीटें मिलेंगी. कांग्रेस 38 सीटों पर सिमट कर रह जाएगी. टीएमसी को 19, डीएमके को 18, जीडीयू को 14, आप को 6, सपा को 3 और अन्य को 91 सीटें मिलेंगी.

भाजपा जहां 100 फीसदी सीटें ले जा रही हैं उन में गुजरात की 26, राजस्थान की 25, हरियाणा की 10, मध्य प्रदेश की 29, हिमाचल प्रदेश की 4, दिल्ली की 7 और उत्तराखंड की 5 सीटें शामिल हैं. इस तरह 106 सीटें उसे तोहफे में मिल रही हैं.

छत्तीसगढ़ में वह 11 में से 10 बिहार में 39 में से 17, झारखंड में 13 में से 12, कर्नाटक की 28 में से 22, केरल में 3, महाराष्ट्र में 47 में से 27, ओडिशा में 21 में से 10, पंजाब में 3, तमिलनाडु में 39 में से 3 तेलंगाना में 17 में से 5, पश्चिम बंगाल में 42 में से 22, जम्मू कश्मीर में 5 में से 2 और सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटें जीत रही है.

यहां बसपा और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल रहा है जबकि सपा को उदारतापूर्वक 3 सीटें दी गई हैं. बाकी 2 – 2 सीटें भाजपा के सहयोगी दलों अपना दल और आरएलडी को जा रही हैं.

इस तरह जब मुनीमो ने भाजपा को 342 और उस के गठबंधन को 399 पर पहुंचा दिया तभी सांस ली. यह कोई मामूली काम नहीं है आंकड़ों में जोड़तोड़ और हेराफेरी स्किल वाला काम होता है. कंपनियों की बैलेंस शीट और सरकारों के बजट यूं ही नही बन जाते. उन में इधर का उधर और उधर का इधर करने में अच्छे अच्छों के पसीने छूट जाते हैं.

इस सर्वे में कोई खोट निकालना उतनी ही नादानी का काम है जितना किसी बिना टिकट मुसाफिर का टिकट चैकर से चलती ट्रेन में छिप पाना. वैसे कहा तो यह भी जा सकता है कि तमिलनाडु और केरल में भाजपा को एकएक से ज्यादा सीट मिलना ठीक वैसी ही बात है जैसी यह कि उत्तर प्रदेश में वामदल या एआईडीएमके का भी इतनी ही सीटों पर जीत जाना.

इन चित्रगुप्तों और नारदों ने न तो कांग्रेस पर रहम किया है और न ही टीएमसी और बीजू जनता दल जैसे आधा दर्जन क्षेत्रीय दलों पर, जिन की सीटें काट कर भाजपा के खाते में जोड़ दी गई हैं. यानी वहां बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और कट्टरवाद मुद्दे नहीं हैं बल्कि लोग भाजपा को जिताने पर आमादा हो आए हैं. वे अपनी झोपड़ी के भाग खोलने वाले हैं.

रामचंद्रजी यूपी से निकल कर पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं. इसलिए ऐसे चमत्कार तो होंगे ही कि कोई 400 सीटों पे लड़ रही भाजपा 342 से ले कर 370 तक सीट ले जा रही है.

400 पार की लीला वाकई अदभुद है. देशभर के लोगों को एक वर्ग पहेली मिल गई है लेकिन इस का एक दो टूक पहलू यह भी है कि भाजपा 250 के आसपास भी सिमट कर रह सकती है. हर किसी को राजनैतिक विश्लेष्ण करने का हक है लेकिन बात जब खुशामद, चाटुकारिता और अंधभक्ति की हो हम इस दौड़ में शामिल नहीं हो सकते.

अस्तु सोशल मीडिया पर एक और सर्वे वायरल हो रहा है जिसे आरएसएस द्वारा किया बताया जा रहा है. मुमकिन है ऐसा न हो लेकिन देश का आम आदमी इस से इत्तफाक रख रहा है जिस में भाजपा को 543 में से केवल 214 सीटें दी गई हैं. इस में तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में भाजपा का खाता नहीं खुल रहा है. यह सर्वे जिस का भी हो कम से कम यह सच तो बोल रहा है कि हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा क्लीन स्वीप नहीं कर रही है और न ही ओडिशा, झारखंड , बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में वह सीवोटर या इंडिया टीवी जैसा कमाल कर रही है. दिल्ली में वह 5 और उत्तर प्रदेश में 65 सीट जीतती बताई गई है जो हालातों को देखते उतना ही मुमकिन है जितना उस का पश्चिम बंगाल में 9 ओडिशा में 6 और तेलंगाना में एक सीट पर ठिठक जाना यह भी इसी सर्वे में बताया गया है.

अब अगर सचमुच भाजपा 400 पार नहीं कर पाई तो भाजपाई जनता को क्या मुंह दिखाएंगे जो दिनरात सुबहशाम यह पहाड़ा मीडिया के सामने और मीटिंगों में रटते रहते हैं यह तो वे ही जानें. सही आंकड़ा और सच क्या है इस के लिए 4 जून तक इंतजार तो करना ही पड़ेगा.

महिलाएं हक के लिए करें नौकरी

हाल ही में यूनिसेफ द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार भारतीय महिलाएं शिक्षा पूरी करने के तुरंत बाद शादी के बजाय नौकरी करने को तवज्जुह देती हैं. यूनिसेफ के यूथ प्लेटफौर्म ‘युवाह’ और ‘यू रिपोर्ट’ द्वारा किए गए सर्वे में देश के 18-29 साल के 24,000 से अधिक युवा इस में शामिल हुए.

सर्वे के परिणाम में 75 फीसदी युवा महिलाओं और पुरुषों का मानना है कि पढ़ाई के बाद नौकरी हासिल करना महिलाओं के लिए सब से जरूरी कदम है. इस से अलग 5 फीसदी से भी कम लोगों ने पढ़ाई के तुरंत बाद शादी की वकालत की.

महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं फिर भी जब श्रम बल में उन की भागीदारी देखते हैं तो वह बहुत कम मिलती है. पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस जुलाई 2021-जून 2022) के आंकड़े बताते हैं कि 29.4 प्रतिशत महिलाएं (15-49 वर्ष की उम्र की) ही भारतीय श्रम बल में योगदान दे रही हैं. पुरुषों में यह दर 80.7 फीसदी है. भारत में महिलाओं की श्रम बल में कमी का एक बड़ा कारण महिलाओं के लिए निर्धारित जैंडर रोल्स हैं. जैंडर के आधार पर तय की गई भूमिका के कारण महिलाओं से घरपरिवार को ज्यादा महत्त्व देने की अपेक्षा की जाती है.

दरअसल भारतीय समाज में पितृसत्ता की वजह से लैंगिक भेदभाव होता है और छोटी बच्चियों से ले कर महिलाओं तक के जीवन को नियंत्रित किया जाता है. वे क्या चाहती हैं, उन्हें क्या पहनना है, क्या पढ़ना और क्या करना है, इन सब को तय करने में पितृसत्ता अहम भूमिका निभाती है.

आज के तकनीकी विकास के इस आधुनिक युग में भी औरतों को पारंपरिक रूप से तय भूमिकाओं के दायरे में रहना पड़ता है. उन्हें बचपन से ही घरपरिवार और रिश्तों को संभालने की हिदायतें दी जाती हैं और इन्हीं के बीच कहीं उन की भूमिका सीमित कर दी जाती है. भले ही सालदरसाल लड़कियों ने ऊंची शिक्षा की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है और लड़कों से बेहतर रिजल्ट भी लाती हैं लेकिन नौकरी की बातें आते ही उन के प्रति लोगों का रवैया बदल जाता है. वे नौकरी करने का सपना ही देखती रहती हैं और उन की शादी कर दी जाती है.

महिलाओं की नौकरी में भागीदारी आवश्यक क्यों है

जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं तो वह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक पहलू होता है. अधिकतर देश जो तेजी से विकास कर रहे हैं वहां कार्यश्रम में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के समान है. खुद महिलाओं के उत्थान और व्यक्तित्व विकास के लिए भी यह जरूरी है.

महिलाओं का नौकरी करना वर्तमान समय में इसलिए भी आवश्यक होता जा रहा है क्योंकि परिवार की जरूरतें इतनी बढ़ रही हैं कि उन की पूर्ति के लिए पतिपत्नी दोनों ही काम करें तब ही वे अपने बच्चों को अच्छा जीवन दे सकते हैं. वैसे भी आधुनिक समय में महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, ऐसे में नौकरी करने से उन्हें अपनी शिक्षा का सही प्रयोग करने का मौका मिलता है. सभी महिलाएं चाहती हैं कि वे अपने स्वयं के खर्च खुद उठाएं तथा स्वावलंबी बनें और अपने परिवार के भरणपोषण में पूरा सहयोग दें. वे किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहना चाहतीं क्योंकि उन के पास नौकरी करने के लिए आवश्यक शैक्षिक डिग्रियां हैं.

मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो घर के काम तो दिनभर चलते रहते हैं लेकिन जो महिलाएं नौकरी करती हैं वे ज्यादा सक्रिय रहती हैं तथा सभी कामों को समय पर निबटा कर अपने कार्यस्थल पर पहुंच जाती हैं. इस वजह से उन की मानसिक और शारीरिक स्थिति अच्छी रहती है.

अपने सहयोगियों के साथ जा कर बातचीत करने से उन का मूड भी बूस्टअप होता है. पूरा दिन घर के कामों में व्यस्त रहने और इधरउधर की व्यर्थ की बातें करने से तो अच्छा है कि वे कोई न कोई नौकरी कर लें ताकि उन के पास कोई काम भी रहे और कुछ इनकम भी हो जाए.

आर्थिक निर्भरता बनाती है सशक्त

नौकरी करने वाली महिलाएं सामाजिक और आर्थिक रूप से अपटूडेट रहती हैं. वे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से खुद का बेहतर खयाल रख पाती हैं. पुरुषों की पैसों की धौंस भी कम होती है. घरेलू महिलाओं की तरह उन्हें अपनी जरूरतों और पसंद की चीजें लेने में किसी तरह का कोई सम?ाता नहीं करना पड़ता. धनोपार्जन न करने की स्थिति में बहुत बार महिलाओं को दुर्व्यवहार सहने के लिए विवश होना पड़ता है जबकि नौकरी वाली महिलाएं ऐसे समय में सबल होती हैं.

आर्थिक आत्मनिर्भरता उन को निर्णय लेने की शक्ति देती है और यह शक्ति कई रूढि़यों को बदल सकती है. जीवनसाथी के अस्वस्थ होने या मृत्यु होने की दशा में किसी के मुहताज होने से बेहतर है कि अपनी आर्थिक सुरक्षा का इंतजाम खुद ही कर लिया जाए. नौकरी इस के लिए उत्तम उपाय है.

कुछ लोग कहते हैं कि नौकरी करने वाली महिलाओं को घर के काम और बच्चों को संभालने के लिए काम वाली और आया वगैरह रखनी पड़ती है. इस वजह से सारे रुपए उसी में चले जाते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं है. नौकरी वाली को जितने खर्च करने होते हैं उस से ज्यादा घरेलू महिलाएं खर्च कर देती हैं. आइए देखते हैं इस खर्च का ब्योरा :

जब आप घर में रहती हैं और नौकरी नहीं कर रही होती हैं तो आप के खर्च इस तरह के हो सकते हैं-

किटी पार्टी का खर्च.

मेकअप प्रोडक्ट्स पर खर्च.

पार्लर जाना.

सहेली के साथ बाहर जाने के खर्चे.

बच्चों को संभालने के लिए आया.

आनेजाने का किराया.

कभीकभार आउटिंग के लिए रुपए.

फुजूल वक्त-खर्च बचाए.

बरतनकपड़े के लिए कामवाली.

कहीं घूमने जाना.

शौपिंग, खासकर, महंगी साडि़यों और हैवी सूट्स की खरीदारी.

रोजरोज मेहमानों के आने पर तरहतरह के पकवान तैयार करना.

औफिस जाने के लिए कुछ प्रोफैशनल ड्रैसेस की शौपिंग.

टीवी में तरहतरह के चैनल के लिए केबल का खर्च.

मंदिर, भजन कीर्तन या फिर धार्मिक त्योहारों पर खर्च.

पड़ोस में कभी शादी, कभी बर्थडे तो कभी कुछ और ओकेजन पर उपहार देने का खर्च.

फोन का लंबाचौड़ा बिल, क्योंकि काम खत्म कर के औरतें फोन पर ही लगी रहती हैं.

जब आप औफिस जाती हैं, यानी कामकाजी हैं उस समय आप के खर्च

घर के काम करने या खाना बनाने के लिए कामवाली.

जब आप जौब करती हैं तो आप के पास समय नहीं होता कि फालतू की किटी पार्टी अटैंड करें, धार्मिक उत्सवों और गीतसंगीत या भजनकीर्तन के कार्यक्रमों में शामिल हों, मंदिर जाएं या फिर घर में रिश्तेदारों को बुलाएं और पड़ोसियों से मिलें. आप के पास समय की कमी होती है. ऐसे में आप फालतू समय या रुपए खर्च करने से बचती हैं.

जो लड़कियां नौकरी करती हैं और जो नहीं करतीं दोनों को ही बच्चे को संभालने के लिए आया और घर के काम के लिए कामवाली रखनी ही होती है. अपने करीबी रिश्तेदारों के साथ कभीकभार मिलना तो स्वाभाविक है. इस में ऐसा भारी खर्च नहीं होता है. अगर आप को 20 हजार रुपए की छोटी सी मासिक सैलरी भी मिल रही है तो भी यह फायदे का सौदा है.

आप अपने घर की देखभाल या खाना पकाने के लिए कामवाली रखती हैं तो उसे अपनी सैलरी से रुपए दे सकती हैं. आनेजाने में या दूसरे छोटेमोटे खर्च होते हैं तो वे भी खुद मैनेज कर सकती हैं और उस के बाद भी आप के पास थोड़े रुपए बच जाएंगे जिन्हें आप अपने मेकअप या कपड़ों पर खर्च कर सकती हैं. आप को किसी से पैसे मांगने नहीं होंगे. आप आत्मनिर्भर रहेंगी.

आप जब जौब करती हैं तो आप की सोच भी काफी बदल जाती है. आप बौद्धिक रूप से मजबूत और स्ट्रौंग सोच वाली महिला बन जाती हैं. आप का बातव्यवहार, आप की सोच और आप की पर्सनैलिटी सबकुछ बहुत ही इंप्रूव हो जाती है क्योंकि आप जब कौर्पोरेटर वर्ल्ड से संबंध रखती हैं तो खुद को उस लैवल में ले आती हैं.

आप की इंग्लिश और बातचीत का तरीका बेहतर हो जाता है. आप प्रेजैंटेबल बनती हैं और आप को अपनी बात रखने का जज्बा आता है. आप के अंदर एक ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा आत्मविश्वासी और ज्यादा मजबूत औरत का जन्म होता है. इसलिए नौकरी जरूर करनी चाहिए.

आप को नौकरी के लिए अगर कुछ कंप्रोमाइज करने पड़ रहे हैं या आप को समय लगाना पड़ रहा है तो यह सोचिए कि जब घर में होतीं तो आप वह समय बरबाद ही करतीं. उस का कोई सही इस्तेमाल न होता पर अभी आप उस के बदले कमाई कर रही हैं. आप के पास उम्मीद है कि आप अपनी जिंदगी में ऊंचे से ऊंचे ओहदे तक पहुंच सकती हैं. आप के अंदर काबिलीयत है तो आप की कमाई भी बढ़ेगी और फिलहाल अगर आप को कम सैलरी मिल रही है तो भी कुछ तो मिल रहा है न.

कुछ रकम तो आप के हाथ में बच जाती है. वरना घरेलू महिलाओं के हाथ में कुछ रुपए आते नहीं उलटे उन्हें अपने पति या सास से पैसे मांगने पड़ते हैं. अपने छोटेछोटे खर्चों के लिए फिलहाल आप आत्मनिर्भर हैं. आप अपने खर्च को खुद से मैनेज कर सकती हैं और घरवालों को जरूरत होने पर दे भी सकती हैं.

अपने ऊपर विश्वास रहता है. समय के साथ काबिलीयत बढ़ती है. कभी परेशानी का मौका आए यानी कुछ बुरा हो गया तो आप को पता होता है कि आप सक्षम हैं और आप जौब कर अपना खर्च वहन कर सकती हैं. फिर आप को यह टैंशन नहीं रहती कि आप की जिंदगी आगे कैसे चलेगी. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना एक मजबूत औरत के लिए बहुत जरूरी है.

काम करने वाली महिलाएं होती हैं ज्यादा इंप्रैसिव

आप नौकरी नहीं करती हैं, मगर आप गोरी हैं, सुंदर हैं और ब्यूटीपार्लर में रुपए खर्च कर और भी खूबसूरत हो जाती हैं तो भी आप सामने वाले को इतना इंप्रैस नहीं कर सकतीं जितनी एक साधारण शक्लसूरत की आत्मनिर्भर कामकाजी लड़की कर सकती है. अगर उस का रंग सांवला है, वह ज्यादा खूबसूरत भी नहीं है लेकिन फिर भी उस की पर्सनैलिटी में जो आत्मविश्वासभरा चार्म रहेगा और बौद्धिक रूप से इतनी मजबूत रहेगी कि सामने वाला उस से बातें करने के बहाने ढूंढे़गा.

उस के पास बात करने के लिए बहुत से टौपिक होंगे. इसलिए लोग उस से आकर्षित होंगे. जबकि एक घरेलू महिला कितनी भी कोशिश कर ले, उस के पास खाना, कपड़ा या फैशन और पतिबच्चों से बढ़ कर ज्यादा कुछ कहने के लिए बात नहीं होती. जब महिला जौब कर रही होती है तो उसे दीनदुनिया की खबर रहती है. वह हर तरह से जागरूक होती है. उसे बहुत सी जानकारियां होती हैं. वे देशदुनिया के बारे में बात कर सकती हैं, इसलिए उन के दोस्त भी ज्यादा होते हैं और वे दोस्त उन के मानसिक लैवल के होते हैं.

ज्यादा खुशमिजाज होती हैं कामकाजी महिलाएं

आमतौर पर लोग मानते हैं कि घर और बाहर की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभालना बेहद जटिल काम है. महिलाओं को शादी के बाद सिर्फ घर ही संभालना चाहिए. जबकि वास्तविकता यह है कि यदि घर पर रहने का कोई विशेष कारण नहीं है तो आप को बाहर निकल कर नौकरी जरूर करनी चाहिए. यह आप को न सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि आप ज्यादा खुशमिजाज भी रहेंगी. अध्ययनों में यह बात साबित हुई है कि कामकाजी महिलाओं को गृहिणियों की अपेक्षा अवसाद और तनाव का खतरा कम होता है और वे ज्यादा खुश रहती हैं.

मजबूत मां की छवि

हर मां का सपना होता है कि उस का बच्चा बड़ा हो कर एक सफल और बेहतर इंसान बने. इस के लिए हर मां अपने बच्चे के पालनपोषण और पढ़ाई पर भी खूब ध्यान देती है. पर किसी भी बच्चे के व्यक्तित्व विकास में पढ़ाईलिखाई के साथसाथ उस के पारिवारिक माहौल का भी बहुत बड़ा योगदान होता है. जब बच्चा अपनी मां को एक मजबूत कामकाजी महिला के रूप में देखता है तो शुरू से ही उसे यह सम?ा आने लगता है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना कितना ज्यादा जरूरी है. यही वजह है कि कामकाजी महिलाएं अपने बच्चों के सामने अकसर एक आदर्श बन जाती हैं.     द्य

ऐश्वर्या नहीं चाहिए मुझे

‘‘उम्र उम्र की बात होती है. जवानी में जो अच्छा लगता है बुढ़ापे में अकसर अच्छा नहीं लगता. इसी को तो कहते हैं जेनरेशन गैप यानी पीढ़ी का अंतर. जब मांबाप बच्चे थे तब वे अपने मांबाप को दकियानूसी कहते थे. अब जब खुद मांबाप बन गए हैं तो दकियानूसी नहीं हैं. अब बच्चे उद्दंड और मुंहजोर हैं. मतलब चित भी मांबाप की और पट भी उन्हीं की. किस्सा यहां समाप्त होता है कि मांबाप सदा ही ठीक थे, वे चाहे आप हों चाहे हम.’’

राघव चाचा मुसकराते हुए कह रहे थे और मम्मीपापा कभी मेरा और कभी चाचा का मुंह देख रहे थे. राघव चाचा शुरू से मस्तमलंग किस्म के इनसान रहे हैं. मैं अकसर सोचा करता था और आज भी सोचता हूं, क्या चाचा का कभी किसी से झगड़ा नहीं होता? चिरपरिचित मुसकान चेहरे पर और नजर ऐसी मानो आरपार सब पढ़ ले.

‘‘इनसान इस संसार को और अपने रिश्तों को सदा अपने ही फीते से नापता है और यहीं पर वह भूल कर जाता है कि उस का फीता जरूरत के अनुसार छोटाबड़ा होता रहता है. अपनी बच्ची का रिश्ता हो रहा हो तो दहेज संबंधी सभी कानून उसे याद होंगे और अपनी बच्ची संसार की सब से सुंदर लड़की भी होगी क्योंकि वह आप की बच्ची है न.’’

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, राघव,’’ पिताजी बोले, ‘‘साफसाफ बात करो न.’’

‘‘साफसाफ ही तो कर रहा हूं. सोमू के रिश्ते के लिए कुछ दिन पहले एक पतिपत्नी आप के घर आए थे…’’

पिताजी ने राघव चाचा की बात बीच में काटते हुए कहा था, ‘‘आजकल सोमू के रिश्ते को ले कर कोई न कोई घर आता ही रहता है. खासकर तब से जब से मैं ने अखबार में विज्ञापन दिया है.’’

‘‘मैं अखबार की बात नहीं कर रहा हूं,’’ राघव चाचा बोले, ‘‘अखबार के जरिए जो रिश्ते आते हैं वे हमारी जानपहचान के नहीं होते. आप ने उन से क्या कहा क्या नहीं, बात बनी, नहीं बनी, किसे पता. दूर से कोई आया, आप से मिला, आप की सुनी, उसे जंची, नहीं जंची, वह चला गया, किसे पता किसे कौन नहीं जंचा. किस ने क्या कहा, किस ने क्या सुना…’’

चाचा के शब्दों पर मैं तनिक चौंक गया. मैं पापा के साथ ही उन के कामकाज मेें हाथ बटाता हूं. आजकल बड़े जोरशोर से मेरे लिए लड़की ढूंढ़ी जा रही है. घर में भी और दफ्तर में भी. कौन किस नजर से आता है, देखतासुनता है वास्तव में मुझे भी पता नहीं होता.

‘‘याद है न जब मानसी के लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा था तब आप की गरदन कैसी झुकी होती थी. उस का रंग सांवला है, उसी पर आप उठतेबैठते चिंता जाहिर करते थे. मैं तब भी आप को यही समझाता था कि रंग गोराकाला होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. पूरा का पूरा अस्तित्व गरिमामय हो, उचित पहनावा हो, शालीनता हो तो कोई भी लड़की सुंदर होती है. गोरी चमड़ी का आप क्या करेंगे, जरा मुझे समझाइए. यदि लड़की में संस्कार ही न हुए तो गोरे रंग से ही क्या आप का पेट भर जाएगा? आप का सम्मान ही न करे, जो हवा में तितली की तरह उड़ती फिरे, जो जमीन से कोसों दूर हो, क्या वैसी लड़की चाहिए आप को?

‘‘अच्छा, एक बात और, आप मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं न, जहां दिन चढ़ते ही जरूरतों से भिड़ना पड़ता है. भाभी सारा दिन रसोई में खटती हैं और जिस दिन काम वाली न आए, उन्हें बरतन भी साफ करने पड़ते हैं. यह सोमू भी एक औसत दर्जे का लड़का है, जो पूरी तरह आप के हाथ के नीचे काम करता है. इस की अपनी कोई पहचान नहीं बनी है. आप हाथ खींच लें तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से कमा सकेगा. आप का बुढ़ापा तभी सुखमय होगा जब संस्कारी बहू आ कर आप से जुड़ जाएगी. कहिए, मैं सच कह रहा हूं कि नहीं?’’

राघव चाचा ने एक बार पूछा तो मम्मीपापा आंखें फाड़फाड़ कर उन का चेहरा देख रहे थे. सच ही तो कह रहे थे चाचा. मेरी अपनी अभी कोई पहचान है कहां. वकालत पढ़ने के बाद पापा की ही तो सहायता कर रहा हूं मैं.

‘‘मेरे एक मित्र की भतीजी है जो मुझे बड़ी प्यारी लगती है. काफी समय से उन के घर मेरा आनाजाना है. वह मुझे अपनीअपनी सी लगती है. सोचा, मेरे ही घर में क्यों न आ जाए. मुझे सोमू के लिए वह लड़की उचित लगी. उस के मांबाप आप का घरद्वार देखने आए थे. मेरे साथ वे नहीं आना चाहते थे, क्योंकि अपने तरीके से वे सब कुछ देखना चाहते थे.’’

‘‘कौन थे वे और कहां से आए थे?’’

‘‘आप ने क्या कहा था उन्हें? आप को तो सुंदर लड़की चाहिए जो ‘ऐश्वर्या राय तो मैं नहीं कहता हो पर उस के आसपास तो हो,’ यही कहा था न आप ने?’’

मैं चाचा की बात सुन कर अवाक् रह गया था. क्या पापा ने उन से ऐसा कहा था? ठगे से पापा जवाब में चुप थे. इस का मतलब चाचा जो कह रहे थे सच है.

‘‘क्या आप अमिताभ बच्चन हैं और आप का बेटा अभिषेक, जिस की लंबाई 5 फुट 7 इंच’ है. आप एक आम इनसान हैं और हम और? क्या आप को ऐश्वर्या राय चाहिए? अपने घर में? क्या ऐश्वर्या राय को संभालने की हिम्मत है आप के बेटे में?… इनसान उतना ही मुंह खोले जितना पचा सके और जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारे.’’

‘‘बस करो, राघव,’’ मां तिलमिला कर बोलीं, ‘‘क्या बकबक किए जा रहे हो.’’

‘‘बुरा लग रहा है न सुन कर? मुझे भी लगा था. मुझे सुन कर शर्म आ गई जब उन्होंने मुझ से हाथ जोड़ कर माफी मांग ली. भैया को शर्म नहीं आई अपनी भावी बहू के बारे में विचार व्यक्त करते हुए…भैया, आप किसी राह चलती लड़की पर फबती कसें तो मैं मान लूंगा क्योंकि मैं जानता हूं कि आप कैसे चरित्र के मालिक हैं. पराई लड़कियां आप की नजर में सदा ही पराई रही हैं, जिन पर आप कोई भी फिकरा कस लेते हैं, लेकिन अपनी बहू ढूंढ़ने वाला एक सम्मानजनक ससुर क्या इस तरह की बात करता है, जरा सोचिए. आप तब अपनी बहू के बारे में बात कर रहे थे या किसी फिल्म की हीरोइन के बारे में?’’

पापा ने तब कुछ नहीं कहा. माथे पर ढेर सारे बल समेटे कभी इधर देखते कभी उधर. गलत नहीं कह रहे हैं चाचा. मेरे पापा जब भी किसी की लड़की के बारे में बात करते हैं, तब उन का तरीका सम्मानजनक नहीं होता. इस उम्र में भी वे लड़कियों को पटाखा, फुलझड़ी और न जाने क्याक्या कहते हैं. मुझे अच्छा नहीं लगता पर क्या कर सकता हूं. मां को भी उन का ऐसा व्यवहार पसंद नहीं है.

‘‘अब आप बड़े हो गए हैं भैया. अपना चरित्र जरा सा बदलिए. छिछोरापन आप को नहीं जंचता. हमें स्वप्न सुंदरी नहीं, गृहलक्ष्मी चाहिए, जो हमारे घर में रचबस जाए और लड़की वालों को इतना सस्ता भी न आंको कि उन्हें आप कहीं भी फेंक देंगे. लड़की वाले भी देखते हैं कि कहां उन की बेटी की इज्जत हो पाएगी, कहां नहीं. जिस घर में ससुर ही ऐसी भाषा बोलेगा वहां बाकी सब कैसा बोलते होंगे यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.’’

‘‘कौन थे वे लोग? और कहां से आए थे?’’ मां ने प्रश्न किया.

‘‘वे जहां से भी आए हों पर उन्होंने साफसाफ कह दिया है कि राघवजी, आप के भाई का परिवार बेहद सुंदर है और इतने सुंदर परिवार में हमारी लड़की कहीं भी फिट नहीं बैठ पाएगी. वह एक सामान्य रंगरूप की लड़की है जो हर कार्य और गुण में दक्ष है, लेकिन ऐश्वर्या जैसी किसी भी कोण से नहीं लगती.’’

चाचा उठ खड़े हुए. उड़ती सी नजर मुझ पर डाली, मानो मुझ से कोई राय लेना चाहते हों. क्या वास्तव में मुझे भी कोई रूपसी ही चाहिए, जिस के नखरे भी मैं शायद नहीं उठा पाऊंगा. राह चलते जो रूप की चांदी यहांवहां बिखराती रहे और मैं असुरक्षा के भाव से ही घिरा रहूं. मैं ही कहां का देवपुरुष हूं, जिसे कोई अप्सरा चाहिए. चाचा सच ही कह रहे हैं कि पापा को ऐसा नहीं कहना चाहिए था. मैं ने एकाध बार पापा को समझाया भी था तो उन्होंने मुझे बुरी तरह डांट दिया था, ‘बाप को समझा रहा है. बड़ा मुंहजोर है तू.’

मुझे याद है एक बार मानसी की एक सहेली घर आई थी. पापा ने उसे देख कर मुझ से ही पूछा था :

‘‘सोमू, यह पटाखा कौन है? इस की फिगर बड़ी अच्छी है. तुम्हारी कोई सहेली है क्या?’’

तब पहली बार मुझे बुरा लगा था. वह मानसी की सहेली थी. अगर मानसी किसी के घर जाए और उस घर के लोग उस के शरीर की बनावट को तोलें तो यह जान कर मुझे कैसा लगेगा? यहां तो मेरा बाप ही ऐसी अशोभनीय हरकत कर रहा था.

मेरे मन में एक दंश सा चुभने लगा. कल को मेरे पिता मेरी पत्नी की क्या इज्जत करेंगे? ये तो शायद उस की भी फिगर ही तोलते रहेंगे. मेरी पत्नी में इन्हें ऐश्वर्या जैसा रूप क्यों चाहिए? मैं ने तो इस बारे में कभी सोचा ही नहीं कि मेरी पत्नी कैसी होगी. मेरी बहन  का रंग सांवला है, शायद इसीलिए मुझे सांवली लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं.

मैंने चाचा की तरफ देखा. उन की नजरें बहुत पारखी हैं. उन्होंने जिसे मेरे लिए पसंद किया होगा वह वास्तव में अति सुंदर होगी, इतनी सुंदर कि उस से हमारा घर रोशन हो जाए. मुझे लगा कि पिता की आदत पर अब रोक नहीं लगाऊंगा तो कब लगाऊंगा. मैं ने चाचा को समझाया कि वे उन से दोबारा बात करें.

‘‘सोमू, वह अब नहीं हो पाएगा.’’

चाचा का उत्तर मुझे निरुत्तर कर गया.

‘‘अपने पिता की आदत पर अंकुश लगाओ,’’ चाचा बोले, ‘‘उम्रदराज इनसान को शालीनता से परहेज नहीं होना चाहिए. खूबसूरती की तारीफ करनी चाहिए. मगर गरिमा के साथ. एक बड़ा आदमी सुंदर लड़की को ‘प्यारी सी बच्ची’ भी तो कह सकता है न. ‘पटाखा’ या ‘फुलझड़ी’ कहना अशोभनीय लगता है.’’

चाचा तो चले गए मगर मेरी आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा. ऐसा लगने लगा कि मेरा पूरा भविष्य ही अंधकार में डूब जाएगा, अगर कहीं पापा और मेरी पत्नी का रिश्ता सुखद न हुआ तो? पापा का अपमान भी मुझ से सहा नहीं जाएगा और पत्नी की गरिमा की जिम्मेदारी भी मुझ पर ही होगी. तब क्या करूंगा मैं जब पापा की जबान पर अंकुश न हुआ तो?

मां ने तो शायद यह सब सुनने की आदत बना ली है. मेरी पत्नी पापा की आदत पचा पाए, न पचा पाए कौन जाने. अभी पत्नी आई नहीं थी लेकिन उस के आने के बाद की कल्पना से ही मैं डरने लगा था.

सहसा एक दिन कुछ ऐसा हो गया जिस से हमारा सारा परिवार ही हिल गया. हमारी कालोनी से सटा एक मौल है जहां पापा एक दिन सिनेमा देखने चले गए. अकेले गए थे इसलिए हम में से किसी को भी पता नहीं था कि कहां गए हैं. शाम के 5 बजे थे. पापा खून से लथपथ घर आए. उन की सफेद कमीज खून से सनी थी. एक लड़की उन्हें संभाले उन के साथ थी. पता चला कि आदमकद शीशा उन्हें नजर ही नहीं आया था और वे उस से जा टकराए थे. नाक का मांस फट गया था जिस वजह से इतना खून बहा था. पापा को बिस्तर पर लिटा कर मां उन की देखभाल में जुट गईं और मैं उस लड़की के साथ बाहर चला आया.

‘‘ये दवाइयां इन्हें खिलाते रहें. टिटनैस का इंजेक्शन मैं ने लगवा दिया है,’’ इतना कहने के बाद उस लड़की ने अपना पर्स खोल कर दवाइयां निकालीं.

‘‘दरअसल इन का ध्यान कहीं और था. ये दूसरी ओर देख रहे थे. लगता है सुंदर चेहरे अंकल को बहुत आकर्षित करते हैं.’’

जबान जम गई थी मेरी. उस ने नजरें उठा कर मुझे देखा और बताने लगी, ‘‘माफ कीजिएगा, मैं भी उन चेहरों के साथ ही थी. जब ये टकराए तब वे चेहरे तो खिलखिला कर अंदर थिएटर में चले गए लेकिन मैं जा नहीं पाई. मेरी पिक्चर छूट गई, इस की चिंता नहीं. मेरे पिताजी की उम्र का व्यक्ति खून से सना हुआ छटपटा रहा है, यह मुझ से देखा नहीं गया.’’

दवाइयों का पुलिंदा और ढेर सारी हिदायतें मुझे दे कर वह सांवली सी लड़की चली गई. अवाक् छोड़ गई मुझे. मेरे पिता पर उस ने कितने पैसे खर्च दिए पूछने का अवसर ही नहीं दिया उस ने.

नाक की चोट थी. पूरी रात हम जागते रहे. सुबह पापा के कराहने से हमारी तंद्रा टूटी. आंखों के आसपास उभर आई सूजन की वजह से उन की आंखें खुली हैं या बंद, यह हमें पता नहीं चल रहा था.

‘‘वह बच्ची कहां गई. बेचारी कहांकहां भटकी मेरे साथ,’’ पापा का स्वर कमजोर था मगर साफ था, ‘‘बड़ी प्यारी बच्ची थी. वह कहां है?’’

पापा का स्वर पहले जैसा नहीं लगा मुझे. उस साधारण सी लड़की को वह बारबार ‘प्यारी बच्ची’ कह रहे थे. बदलेबदले से लगे मुझे पापा. यह चोट शायद उन्हें सच के दर्शन करा गई थी. सुंदर चेहरे उन पर हंस कर चले गए और साधारण चेहरा उन्हें संभाल कर घर छोड़ गया था. एक कमजोर सी आशा जागी मेरे मन में. हो सकता है अब पापा भी मेरी ही तरह कहने लगें, ‘साधारण सी लड़की चाहिए, ऐश्वर्या नहीं चाहिए मुझे.’

हीरो: क्या समय रहते खतरे से बाहर निकल पाई वह?

लेखिका-  संगीता माथुर

बादलों की गड़गड़ाहट के साथ ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी. अपने घर की बालकनी में बैठी चाय की चुसकियों के साथ बारिश की बौछारों का मैं आनंद लेने लगी. आंखें अनायास ही सड़क पर तितरबितर होते भीड़ के रैले में किसी को तलाशने लगीं लेकिन उसे वहां न पा कर उदास हो गईं. आज ये फुहारें कितनी सुहानी लग रही हैं, जबकि यही गड़गड़ाहट, आसमान में चमकती बिजली की आंखमिचौली उस दिन कितना कहर बरपाती प्रतीत हो रही थी. समय और स्थान परिवर्तन के साथसाथ एक ही परिदृश्य के माने कितने बदल जाते हैं.

2 बरस पूर्व की यादें अभी भी जेहन में आते ही शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है और इस के साथ ही आंखों के सामने उभर आता है एक रेखाचित्र, ‘हीरो’ का, जिस की मधुर स्मृति अनायास ही चेहरे पर मुसकान ला देती है.

उस दिन औफिस से निकलने में मुझे कुछ ज्यादा ही देर हो गई थी. काफी अंधेरा घिर आया था. स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थीं. मैं ने घड़ी देखी, घर पहुंचतेपहुंचते साढ़े 10 तो बज ही जाएंगे. मां चिंता करेंगी, सोच कर लिफ्ट से उतरते ही मैं ने मां को फोन लगा दिया.

‘हां, कहां तक पहुंची? आज तो बहुत तेज बारिश हो रही है. संभल कर आना,’ मां की चिंता उन की आवाज से साफ जाहिर हो रही थी.

‘बस, निकल गई हूं. अभी कैब पकड़ कर सीधे घर पहुंचती हूं और फिर मुंबई की बारिश से क्या घबराना, मां? हर साल ऐसे ही तो होती है. मेहमान और मुंबई की बारिश का कोई ठिकाना नहीं. कब, कहां टपक जाए कोई नहीं बता सकता,’ मैं बड़ी बेफिक्री से बोली.

‘अरे, आज साधारण बारिश नहीं है. पिछले 10 घंटे से लगातार हो रही मूसलाधार बारिश थमने या धीमे होने का नाम नहीं ले रही है. हैलो…हैलो…’ मां बोलती रह गईं.

मैं भी देर तक हैलो… हैलो… करती बिल्डिंग से बाहर आ गई थी. सिगनल जो उस वक्त आने बंद हुए तो फिर जुड़ ही नहीं पाए थे. बाहर का नजारा देख मैं अवाक रह गई थी. सड़कें स्विमिंग पूल में तबदील हो चुकी थीं. दूरदूर तक कैब क्या किसी भी चलती गाड़ी का नामोनिशान तक न था. घुटनों तक पानी में डूबे लोग अफरातफरी में इधरउधर जाते नजर आ रहे थे. महानगरीय जिंदगी में एक तो वैसे ही किसी को किसी से कोई सरोकार नहीं होता और उस पर ऐसा तूफानी मंजर… हर किसी को बस घर पहुंचने की जल्दी मची थी.

अपने औफिस की पूर्णतया वातानुकूलित इमारत जिस पर हमेशा से मुझे गर्व रहा है, पहली बार रोष उमड़ पड़ा. ऐसी भी क्या वातानुकूलित इमारत जो बाकी दीनदुनिया से आप का संपर्क ही काट दे. अंदर हमेशा एक सा मौसम, बाहर भले ही पतझड़ गुजर कर बसंत छा जाए. खैर, अपनी दार्शनिकता को ठेंगा दिखाते हुए मैं तेज कदमों से सड़क पर आ गई और इधरउधर टैक्सी के लिए नजरें दौड़ाने लगी. लेकिन वहां पानी के अति बहाव के कारण वाहनों का रेला ही थम गया था. वहां टैक्सी की खोज करना बेहद मूर्खतापूर्ण लग रहा था. कुछ अधडूबी कारें मंजर को और भी भयावह बना रही थीं. मैं ने भैया से संपर्क साधने के लिए एक बार और मोबाइल फोन का सहारा लेना चाहा, लेकिन सिगनल के अभाव में वह मात्र एक खिलौना रह गया था. शायद आगे पानी इतना गहरा न हो, यह सोच कर मैं ने बैग गले से कमर में टांगा और पानी में उतर पड़ी. कुछ कदम चलने पर ही मुझे सैंडल असुविधाजनक लगने लगे. उन्हें उतार कर मैं ने बैग में डाला.

आगे चलते लोगों का अनुसरण करते हुए मैं सहमसहम कर कदम बढ़ाने लगी. कहीं किसी गड्ढे या नाले में पांव न पड़ जाए, मैं न जाने कितनी देर चलती रही और कहां पहुंच गई, मुझे कुछ होश नहीं था. लोकल ट्रेन में आनेजाने के कारण मैं सड़क मार्गों से नितांत अपरिचित थी. आगे चलने वाले राहगीर भी जाने कब इधरउधर हो गए थे मुझे कुछ मालूम नहीं. मुझे चक्कर आने लगे थे. सारे कपड़े पूरी तरह भीग कर शरीर से चिपक गए थे. ठंड भी लग रही थी. अर्धबेहोशी की सी हालत में मैं कहीं बैठने की जगह तलाश करने लगी तभी जोर से बिजली कड़की और आसपास की बत्तियां गुल हो गईं. मेरी दबी सी चीख निकल गई.

फुटपाथ पर बने एक इलैक्ट्रिक पोल के स्टैंड पर मैं सहारा ले कर बैठ गई. आंखें स्वत: ही मुंद गईं. किसी ने झटके से मुझे खींचा तो मैं चीख मार कर उठ खड़ी हुई. ‘छोड़ो मुझे, छोड़ो,’ दहशत के मारे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. अंधेरे में आंखें चौड़ी कर देखने का प्रयास करने पर मैं ने पाया कि एक युवक ने मेरी बांह पकड़ रखी थी. ‘करेंट खा कर मरना है क्या?’  कहते हुए उस ने मेरी बांह छोड़ दी. वस्तुस्थिति समझ कर मेरे चेहरे पर शर्मिंदगी उभर आई. फिर तुरंत ही अपनी असहाय अवस्था का बोझ मुझ पर हावी हो गया. ‘प्लीज, मुझे मेरे घर पहुंचा दीजिए. मैं पिछले 3 घंटे से भटक रही हूं.’

‘और मैं 5 घंटे से,’ उस ने बिना किसी सहानुभूति के सपाट सा उत्तर दिया.

‘ओह, फिर अब क्या होगा? मुझ से तो एक कदम भी नहीं चला जा रहा. मैं यहीं बैठ कर किसी मदद के आने का इंतजार करती हूं,’ मैं खंभे से थोड़ा हट कर बैठ गई.

‘मदद आती नहीं, तलाश की जाती है.’

‘पर आगे कहीं बैठने की जगह भी न मिली तो?’ मैं किसी भी हाल में उठने को तैयार न थी.

‘ऐसी सोच के साथ तो सारी जिंदगी यहीं बैठी रह जाओगी.’

मेरी आंखें डबडबा आई थीं. शायद इतनी देर बाद किसी को अपने साथ पा कर दिल हमदर्दी पाने को मचल उठा था. पर वह शख्स तो किसी और ही मिट्टी का बना था.

‘आप को क्या लगता है कि मैं किसी फिल्मी हीरो की तरह आप को गोद में उठा कर इस पानी में से निकाल ले जाऊंगा? पिछले 5 घंटे से बरसते पानी में पैदल चलचल कर मेरी अपनी सांस फूल चुकी है. चलना है तो आगे चलो, वरना मरो यहीं पर.’

उस के सख्त रवैए से मैं सहम गई थी. डरतेडरते उस के पीछे फिर से चलने लगी. तभी मेरा पांव लड़खड़ाया. मैं गिरने ही वाली थी कि उस ने अपनी मजबूत बांहों से मुझे थाम लिया.

‘तुम आगे चलो. पीछे गिरगिरा कर बह गई तो मुझे पता भी नहीं चलेगा,’ आवाज की सख्ती थोड़ी कम हो गई थी और अनजाने ही वह आप से तुम पर आ गया था, पर मुझे अच्छा लगा. अपने साथ किसी को पा कर मेरी हिम्मत लौट आई थी. मैं दूने उत्साह से आगे बढ़ने लगी. तभी बिजली लौट आई. मेरे दिमाग में बिजली कौंधी, ‘आप के पास मोबाइल होगा न?’

‘हां, है.’

‘तो मुझे दीजिए प्लीज, मैं घर फोन कर के भैया को बुला लेती हूं.’

‘मैडम, आप को शायद स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं है. इस क्षेत्र की संचारव्यवस्था ठप हो गईर् है. सिगनल नहीं आ रहे हैं. पूरे इलाके में पानी भर जाने के कारण वाहनों का आवागमन भी रोक दिया गया है. हमारे परिजन चाह कर भी यहां तक नहीं आ सकते और न हम से संपर्क साध सकते हैं. स्थिति बदतर हो इस से पूर्व हमें ही किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचना होगा.’

‘लेकिन कैसे?’ मुझे एक बार फिर चारों ओर से निराशा ने घेर लिया था. बचने की कोईर् उम्मीद नजर नहीं आ रही थी. लग रहा था आज यहीं हमारी जलसमाधि बन जाएगी. मुझे अपने हाथपांव शिथिल होते महसूस होने लगे. याद आया लंच के बाद से मैं ने कुछ खाया भी नहीं है. ‘मुझे तो बहुत जोर की भूख भी लग रही है. लंच के बाद से ही कुछ नहीं खाया है,’ बोलतेबोलते मेरा स्वर रोंआसा हो गया था.

‘अच्छा, मैं तो बराबर कुछ न कुछ उड़ा रहा हूं. कभी पावभाजी, कभी भेलपुरी, कभी बटाटाबड़ा… मुझे समझ नहीं आता तुम लड़कियां बारबार खुद को इतना निरीह साबित करने पर क्यों आमादा हो जाती हो? तुम्हें क्या लगता है मैं अभी सुपरहीरो की तरह उड़ कर जाऊंगा और पलक झपकते तुम्हारे लिए गरमागरम बटाटाबड़ा ले कर हाजिर हो जाऊंगा. फिर हम यहां पानी के बीच गरमागरम बड़े खाते हुए पिकनिक का लुत्फ उठाएंगे.’

‘जी नहीं, मैं ऐसी किसी काल्पनिकता में नहीं जी रही हूं. बटाटाबड़ा तो क्या, मुझे आप से सूखी रोटी की भी उम्मीद नहीं है.’ गुस्से में हाथपांव मारती मैं और भी तेजतेज चलने लगी. काफी आगे निकल जाने पर ही मेरी गति थोड़ी धीमी हुई. मैं चुपके से टोह लेने लगी, वह मेरे पीछे आ भी रहा है या नहीं?

‘मैं पीछे ही हूं. तुम चुपचाप चलती रहो और कृपया इसी गति से कदम बढ़ाती रहो.’

उस के व्यंग्य से मेरा गुस्सा और बढ़ गया. अब तो चाहे यहीं पानी में समाधि बन जाए, पर इस से किसी मदद की अपेक्षा नहीं रखूंगी. मेरी धीमी हुई गति ने फिर से रफ्तार पकड़ ली थी. अपनी सामर्थ्य पर खुद मुझे आश्चर्य हो रहा था. औफिस से आ कर सीधे बिस्तर पर ढेर हो जाने वाली मैं कैसे पिछले 7-8 घंटे से बिना कुछ खाएपीए चलती जा रही हूं, वह भी घुटनों से ऊपर चढ़ चुके पानी में. शरीर से चिपकते पौलीथीन, कचरा और खाली बोतलें मन में लिजलिजा सा एहसास उत्पन्न कर रहे थे. आज वाकई पर्यावरण को साफ रखने की आवश्यकता महसूस हो रही थी. यदि पौलीथीन से नाले न भर जाते तो सड़कों पर इस तरह पानी नहीं भरता. पानी भरने की सोच के साथ मुझे एहसास हुआ कि सड़क पर पानी का स्तर काफी कम हो गया है.

‘वाह,’ मेरे मुंह से खुशी की चीख निकल गई. वाकई यहां पानी का स्तर घुटनों से भी नीचा था. तभी एक बड़े से पत्थर से मेरा पांव टकरा गया. ‘ओह,’ मैं जोर से चिल्ला कर लड़खड़ाई. पीछे आ रहे युवक ने आगे आ कर एक बार फिर मुझे संभाल लिया. अब वह मेरा हाथ पकड़ कर मुझे चलाने लगा क्योंकि मेरे पांव से खून बहने लगा था और मैं लंगड़ा रही थी. पानी में बहती खून की धार देख कर मैं दहशत के मारे बेहोश सी होने लगी थी कि उस युवक के उत्साहित स्वर से मेरी चेतना लौटी, ‘वह देखो, सामने बरिस्ता होटल. वहां काफी चहलपहल है. उधर इतना पानी भी नहीं है.

हम वहां से जरूर फोन कर सकेंगे. हमारे घर वाले आ कर तुरंत हमें ले जाएंगे. देखो, मंजिल के इतने करीब पहुंच कर हिम्मत नहीं हारते. आंखें खोलो, देखो, मुझे तो गरमागरम बड़ापाव की खुशबू भी आ रही है.’

मैं ने जबरदस्ती आंखें खोलने का प्रयास किया. बस, इतना ही देख सकी कि वह साथी युवक मुझे लगभग घसीटता हुआ उस चहलपहल की ओर ले चला था. कुछ लोग उस की सहायतार्थ दौड़ पड़े थे. इस के बाद मुझे कुछ याद नहीं रहा. चक्कर और थकान के मारे मैं बेहोश हो गई थी. होश आया तो देखा एक आदमी चम्मच से मेरे मुंह में कुनकुनी चाय डाल रहा था और मेरा साथी युवक फोन पर जोरजोर से किसी को अपनी लोकेशन बता रहा था. मैं उठ कर बैठ गई. चाय का गिलास मैं ने हाथों में थाम लिया और धीरेधीरे पीने लगी. किसी ने मुझे 2 बिस्कुट भी पकड़ा दिए थे, जिन्हें खा कर मेरी जान में जान आई.

‘तुम भी घर वालों से बात कर लो.’

मैं ने भैया को फोन लगाया तो पता चला वे जीजाजी के संग वहीं कहीं आसपास ही मुझे खोज रहे थे. तुरंत वे मुझे लेने निकल पड़े. रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, लेकिन आसपास मौजूद भीड़ की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. हर किसी की जबान पर प्रकृति के इस अनोखे तांडव की ही चर्चा थी.

‘मेरा साला मुझे लेने आ रहा है. तुम्हें कहां छोड़ना है बता दो… लो, वे आ गए.’अपनी गर्भवती पत्नी को भी गाड़ी से उतरते देख वह हैरत में पड़ गया, ‘अरे, तुम ऐसे में बाहर क्यों निकली? वह भी ऐसे मौसम में?’ बिना कोईर् जवाब दिए उस की पत्नी उस से बुरी तरह लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. वह उसे धीरज बंधाने लगा. मेरी भी आंखें भर आईं. पत्नी को अलग कर वह मुझ से मुखातिब हुआ, ‘पहली बार कोई हैल्प औफर कर रहा हूं. चलो, हम छोड़ देंगे.’

‘नहीं, थैंक्स, भैया और जीजाजी बस आ ही रहे हैं. लो, वे भी आ गए.’

‘अच्छा बाय,’ वह चला गया.

हम ने न एकदूसरे का नाम पूछा, न पता. उस की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए मैं ने उसे एक नाम दे दिया है, ‘हीरो’  वास्तविक हीरो की तरह बिना कोई हैरतअंगेज करतब दिखाए यदि कोई मुझे उस दिन मौत के दरिया से बाहर ला सकता था तो वही एक हीरो. उस समय तो मुझे उस पर गुस्सा आया ही था कि कैसा रफ आदमी है, लेकिन आज मैं आसानी से समझ सकती हूं उस का मुझे खिझाना, आक्रोशित करना, एक सोचीसमझी चालाकी के तहत था ताकि मैं उत्तेजित हो कर तेजतेज कदम बढ़ाऊं और समय रहते खतरे की सीमारेखा से बाहर निकल जाऊं. सड़क पर रेंगते अनजान चेहरों के काफिले में आज भी मेरी नजरें उसी ‘हीरो’ को तलाश रही हैं.

निर्णय: क्या कुमुद के बेटे की शादी हुई?

राजू, कुमुद दीदी का इकलौता पुत्र है, बेहद आज्ञाकारी व लाड़ला. पढ़नेलिखने में उस का मन कभी न लगा, सो, पिता ने अपने व्यवसाय में ही उसे माहिर बना दिया. राजू का व्यक्तित्व अब निखर गया था. नीले रंग के सूट में वह खूब जंच रहा था, वैसे उस पर तो कुछ भी जंच सकता था, मां का गोरा रंग, भूरे घुंघराले बाल व पिता की 6 फुट की ऊंचाई उस ने विरासत में जो पाई थी. ‘शादी कब कर रही हो तुम इस की?’ सभी मिलने वालों का एक ही प्रश्न था.

‘हां, कर ही दो शादी. अब तो लड़का काम पर भी लग गया है. कहो तो अपनी चचेरी बहन की ननद से बात चलाऊं,’ शोभा, कुमुद दीदी के पास सरक आई.

‘ऐसी जल्दी भी क्या है? मुझे बहू चाहिए लाखों में एक. लड़की गोरीचिट्टी तो होनी ही चाहिए. तुम्हारी बहन की ननद का रंग तो काला है,’ कुमुद दीदी ने मुंह बिचकाया. शोभा के इस अपमान से पास ही खड़ी शारदा की आंखें चमकने लगीं. वह बोली, ‘कुमुद, मेरी जेठानी की लड़की है. वे लोग तुम्हारा घर भर देंगे. पूरे 25 लाख रुपए नकद देने को तैयार हैं.’ दीदी को यह लुभावना प्रस्ताव भी डिगा न सका. पूछा, ‘लड़की देखने में कैसी है? पढ़ीलिखी कितनी है?’

सुनते ही शारदा का मुंह उतर गया. हौले से बोली, ‘8वीं पास है. लेकिन तुम्हें पढ़ीलिखी लड़की का क्या करना है, नौकरी थोड़े ही करवानी है.’

‘न सही नौकरी, पर दोचार लोगों में उठनेबैठने लायक तो हो. न बाबा न, मुझे लड़की देखपरख कर ही चुननी है.’

ऐसे ही अनेक लुभावने प्रस्तावों को कुमुद दीदी निर्ममता से पैरों तले रौंदती चली गईं. कहीं लड़की का रंग आड़े आ जाता कहीं कदकाठी तो कहीं पढ़ाईलिखाई. कुमुद दीदी को बहू चाहिए थी, सर्वगुणसंपन्न. दिखने में अत्यंत रूपवती, पढ़ीलिखी, घर के कामकाज में माहिर, सिर झुका कर सभी की आज्ञा शिरोधार्य करने वाली. राजू की उम्र आगे सरकती जा रही थी. दीदी की तलाश अभी भी जारी थी. एक दिन मैं ने दीदी को समझाने का प्रयास किया, ‘अब तुम लड़की जल्दी से ढूंढ़ लो. इस अगस्त में राजू 28 साल पूरे कर लेगा. अब देरी ठीक नहीं.’

‘कहां ढूंढ़ लूं? कोई अच्छी लड़की मिलती ही नहीं. लगता है, हमारे यहां लड़कियों का अकाल पड़ गया है. किसी में कुछ नुक्स है तो किसी में कुछ. अब हमें एक ही तो बहू चाहिए. आंखों से देखते हुए मक्खी कैसे निगल लें?’ उत्तर में वे फट पड़ी थीं.

‘क्यों, तुम्हारी सरला चाची की लड़की सुषमा में क्या कमी है? तुम ने पिछली बार उस की कितनी प्रशंसा की थी.’

‘वह तो बड़ी बेशर्म लड़की है. पूरे समय खीखी कर के हंसती रही. किसी का कोई लिहाज ही नहीं. हमें बहू चाहिए, जोकर नहीं.’

मुझ से अब चुप न रहा गया, ‘रूपा को तुम ने चुप रहने पर नापसंद किया था. कहा था कि बहू चाहिए, पत्थर की मूर्ति नहीं. पता नहीं कैसी लड़की पसंद आएगी तुम्हें. कोई जोकर है, कोई पत्थर की मूर्ति तो कोई रेल का इंजन. देखो, देर होने से पहले ही संभल जाओ.’ पर उन्हें समझाने के मेरे सभी प्रयास निष्फल रहे. अब तक राजू की उम्र 30 पार कर चुकी थी.

हार कर मैं ने राजू को ही समझाने का प्रयास किया. परंतु उस ने रुखाई से उत्तर दिया, ‘ये सभी बातें तो मां ही बेहतर समझती हैं. मुझे अपनी पसंद पर कोई भरोसा नहीं है. पता नहीं, लड़की कैसी निकल आए?’ फिर एक दिन गर्व से फूली न समाती कुमुद दीदी मेरे घर आईं. साथ आए नौकर ने फलों से भरी टोकरी और मिठाई का डब्बा मेज पर रख दिया. ‘इस बुधवार को हमारे राजू की सगाई है. हमारी बहू है लाखों में एक. बहुत बड़ा घराना तो नहीं है पर बिटिया है सुंदर, सुशील और समझदार,’ उन्होंने गर्व से घोषणा की. राजू की सगाई धूमधाम से हुई. कुछ समय बाद ही विवाह का न्योता भी मिला. शादी का कार्ड देख कर सभी मुग्ध हो गए. कुमुद दीदी की बहू रिनी वास्तव में ही अत्यंत रूपवती थी. हम सभी ने चैन की सांस ली. राजू के विवाह के तुरंत बाद ही मुझे किसी कारणवश 2-3 महीने बाहर रहना पड़ा. लौट कर आई तो कुमद दीदी से मिलने पहुंच गई. खूबसूरत और हरेभरे लौन की दुर्दशा देख कर एक क्षण को मेरे कदम ही रुक गए. लगा, मानो किसी और ही घर में आ गई हूं. हिम्मत कर के मैं आगे बढ़ी. मैं द्वार पर ही थी कि अंदर से आने वाले स्वरों ने मुझे वहीं ठिठक कर रुक जाने पर बाध्य कर दिया.

‘इस टोकाटाकी से तो मैं तंग आ चुकी हूं. कहां जा रहे हो? क्यों जा रहे हो? कब तक लौटोगे…? इतना दखल अब बरदाश्त नहीं होता. बेहतर होगा कि अब आप हमारे मामलों में दखल देने के स्थान पर अपने कमरे में ही रह कर कुछ कामधाम करें,’ इस के साथ ही द्वार धड़ से खुल गया. पूरी तरह से आधुनिक, कटे हुए बालों को एक झटका दे कर मेरी ओर देखे बिना रिनी सैंडल खटखटाती तेजी से बाहर निकल गई. निरीह गाय सी खड़ी कुमुद दीदी ने मुझे देख लिया था. इसलिए भीतर जाना ही पड़ा.

‘आओ, आओ. आज बहुत दिनों के बाद आना हुआ. रिनी अभीअभी किसी जरूरी काम से बाहर गई है, नहीं तो वही तुम्हारा सत्कार करती. शायद पहचाना नहीं उस ने तुम्हें,’ फीकी सी मुसकान के साथ वे आवश्यकता से कुछ अधिक ही बोल गई थीं.

फिर रुक कर पूछा, ‘क्या लोगी, ठंडा या चाय?’

घर का हुलिया व उस से बढ़ कर दीदी को देख कर चाय तो क्या, पानी पीने का भी मन न किया. वे भद्दे से रंग की एक फीकी सी साड़ी पहने थीं, जिस का आंचल धूल से सने हुए कालीन पर झाड़ू लगा रहा था. माथे पर लगी सिंदूर की बिंदिया पसीने की बहती धारा के साथ नाकमुंह पर नक्शा बना रही थी. उन के हाथ में झाड़न था. दर्पण सा चमकता दीदी का घर बदलाबदला लग रहा था. जगहजगह धूल की परतें, मकड़ी के जाले व बिखरे वस्त्र. इसी हौल को सजाने में दीदी ने न जाने कितना खर्च आवश्यकता न होने पर भी किया होगा. रसोई नवीनतम उपकरणों से सजी थी. स्नानघर का तो वास्तव में जवाब ही नहीं था. इतने सारे तामझाम के बिना इस परिवार का काम ही नहीं चल पाता था. आज भी दीदी के वैभव में तो कोई कमी नहीं आई थी पर उन की वह शाही तबीयत कहां खो गई?

मैं ने हैरानी से पूछा, ‘नौकर कहां है, दीदी? तुम ने यह क्या हाल बना रखा है?’

‘राम छुट्टी पर है. वैसे रिनी को उस का किया काम पसंद भी नहीं है. कहती है, चार जनों के परिवार में नौकर का क्या काम? बड़ी समझदार लड़की है.’ कुमुद दीदी की बातों से झूठ साफ झलक रहा था.

तभी आंधीतूफान की भांति राजू ने प्रवेश किया. मुझे देख केवल एक फीकी सी मुसकान उस के होंठों पर उभरी. फिर वह सोफे पर बैठ गया.

‘मां, रिनी तैयार है क्या? मुझे आने में थोड़ी देर हो गई. एक मीटिंग में फंस गया था,’ वह लापरवाही से बोला.

‘वह तो बाहर गई, बेटे. तू बैठ, पानी पी ले.’

‘नहीं, आप ने उसे जाने ही क्यों दिया? पता नहीं आटो मिलेगा भी या नहीं. बेचारी धूप में कहांकहां घूमेगी. आप बहुत लापरवाह हैं. मैं भी चलता हूं.’ मुझ से बिना कुछ कहे राजू उठ कर बाहर चला गया. कुछ देर इधरउधर की बातें कर के मैं भी लौट आई. कुछ दिनों बाद एक विवाहोत्सव में दीदी से फिर भेंट हो गई.

‘बहू नहीं आई क्या?’

‘नहीं, आई है. रिनी, इन से मिलो…’ कुछ दूर खड़ी बहू को उन्होंने पुकारा.

रिनी आई तो नहीं, पर उस का कुछ ऊंचा, अशिष्ट स्वर मेरे कानों में पड़ा.

‘अब किसी से मिलनाजुलना हो तो भी इन की मरजी ही चलेगी. हर बात में अपनी टांग जरूर अड़ाती हैं. पता नहीं, मुझे कब छुटकारा मिलेगा.’

दीदी का मुख अपमान से काला पड़ गया. सभी मेहमानों के समक्ष रिनी से ऐसे व्यवहार की शायद उन्हें आशा न थी. पीछे बजता गाड़ी का हौर्न सुन कर मेरी चेतना लौट आई. दोढाई माह बाद किसी काम से बैंक गई थी कि अचानक एक सतरंगी आंचल ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया. देखा तो रिनी थी. बात करने की इच्छा तो नहीं हुई पर कुमुद दीदी का हालचाल पूछने की जिज्ञासा अवश्य थी. इतने में वह स्वयं ही मेरे पास आ खड़ी हुई.

‘‘दीदी कैसी हैं?’’ मैं ने पूछ ही लिया.

‘‘ठीक हैं. हम लोग कल ही उन से मिल कर आए हैं,’’ कुछ देर इधरउधर की बातें कर वह चली गई.

मैं सोचने लगी, ‘मिल कर आए हैं’ का क्या अर्थ है? कहीं ऐसा तो नहीं कि दीदी ने वह घर ही छोड़ दिया हो? वैसे भी रिनी और राजू के साथ उन के संबंधों में कड़वाहट आ ही गई थी. किंतु कुमुद दीदी ने जीवन में कभी हार कर पलायन करना नहीं सीखा था. कैसा भी दुख हो, उन्होंने मुंह खोल कर किसी से शिकायत नहीं की थी. सदा परिस्थितियों का डट कर सामना किया था. क्या वे हार मान सकती हैं? विचार थे कि लगाम तोड़ कर इधरउधर भागे ही जा रहे थे. इसी उधेड़बुन में मेरे पैर अनजाने ही कुमुद दीदी के घर की ओर ही मुड़ गए. दरवाजा दीदी ने ही खोला. उन्हें देख कर मैं ने राहत की सांस ली.

‘‘क्या हुआ? बहुत परेशान लग रही हो, अंदर आओ.’’

ये तो वही पुरानी वाली कुमुद दीदी थीं. वेशभूषा वैसी ही गरिमामय, मुख पर फिर वही तेज.

घर का भी कायापलट हो चुका था. बैठते ही नमस्कार कह कर एक नौकर 2 गिलासों में जूस ला कर रख गया.

मेज पर रखी हुई पत्रिकाओं को एक ओर सरकाते हुए कुमुद दीदी ने पूछा, ‘‘हां, आज अचानक कैसे आना हुआ?’’

‘‘सुबह बैंक में रिनी मिली थी.’’

‘‘ओह रिनी, मुझे उसे फोन भी करना था. दरअसल, कल वह अपना कुछ सामान यहां भूल गई थी. सुबह तक ध्यान भी था, फिर कामकाज में व्यस्त हो गई तो याद ही नहीं रहा,’’ दीदी ने जूस का हलका सा घूंट लिया, ‘‘लो न, नहीं तो गरम हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन…रिनी…क्या वे लोग अब यहां तुम्हारे साथ नहीं रहते?’’

कुमुद दीदी ने गहरी सांस ली. फिर बोलीं, ‘‘नहीं. रिनी का स्वभाव तो तुम से छिपा नहीं है. राजू की शादी के बाद हम लोग पूरा व्यापार उसी को सौंप कर निश्चिंत हो गए थे. बस, शायद यहीं से रिनी को यह महसूस होने लगा कि वही घर की मालकिन है. फिर मैं ने भी तो चाबियां उसी को थमा दी थीं. लेकिन हम लोग तो उसे बोझ लगने लगे. राजू भी उसी की सुनता था. ‘‘पिछले दिनों मेरे भानजे का तबादला यहां हो गया था. वह पूरे परिवार को ले कर मिलने आया. मकान मिलने में 2-4 दिन लग ही जाते. अब हमारी कोठी इतनी बड़ी है कि कोई भी महीने, 2 महीने आराम से रह सकता है. उसे रुक जाने को कहा तो रिनी ने ऐसा हंगामा किया कि पूछो मत. हमारी तो छोड़ो, उन लोगों का भी बहुत अपमान किया. तुम्हारे जीजाजी का भी लिहाज न किया. इतने पर भी राजू चुपचाप सुनता रहा.’’

कुमुद दीदी की आंखें भर आईं. उन्हें पोंछ कर दृढ़ स्वर में आगे बोलीं, ‘‘उसी दिन हम ने यह फैसला किया कि राजू और रिनी का अलग हो जाना ही हम लोगों के लिए अच्छा है. उन्हें एक फ्लैट खरीद कर दे दिया है. व्यापार भी धीरेधीरे अलग कर देंगे. असल में रिनी को गलतफहमी ही यही थी कि राजू हमारा इकलौता बेटा है और उस की जुदाई हम शायद सह नहीं पाएंगे. पर अब जब राजू ही पराया हो गया तो उस का क्या मोह करना?’’

‘‘लेकिन रिनी तो कह रही थी कि वे लोग कल यहां आए थे?’’ मैं ने पूछ लिया.

‘‘हां, राजू और रिनी ने बहुत माफी मांगी पर मैं अडिग रही. मेरे लिए वे दोनों अनमोल हैं, किंतु एक बार रस्सी टूट जाए तो जुड़ने पर भी गांठ रह ही जाती है. दूर रह कर पास होना बेहतर है, साथसाथ रह कर दूर हो जाने के लिए और कोई चारा भी नहीं था.’’

‘‘अब हम लोग तीजत्योहारों पर मिलते हैं, कोई खुशी हो या दुख, मिलबांट सकते हैं. सच मानो तो अब हम पहले से अधिक पासपास हैं.’’

दीदी की बातें सुन कर मैं मन ही मन उन के इस निर्णय का अवलोकन करने लगी. शायद, दीदी ने वक्त को देखते हुए सही निर्णय लिया था. अगर अपनों का प्यार बना रहे, फिर दूरी क्या माने रखती है.

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