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वह बदनाम लड़की : आकाश की ज़िन्दगी में कैसे आया भूचाल

आकाश जैसे एक खूब पढ़ेलिखे व काबिल इनसान की एक कालगर्ल से यारी…? यकीन मानिए, वह अपनी पत्नी प्रिया को पूरा प्यार देने वाला अच्छा इनसान है और हवस मिटाने के लिए यहांवहां झांकना भी उसे हरगिज गवारा नहीं है. इस के बावजूद वह टीना को दिलोजान से चाहता है, उस की इज्जत करता है.

आप के दिमाग में चल रही कशमकश मिटाने के लिए हम आप को कुछ पीछे के समय में ले चलते हैं. कुछ साल हो गए हैं आकाश को बैंगलुरु आए हुए. एक छोटे कसबे से निकल कर इस महानगरी की एक निजी कंपनी में जब क्लर्की का काम मिला तो पत्नी प्रिया को भी वह अपने साथ यहां ले आया था और उस के नन्हेमुन्ने प्रियांशु ने भी यहीं पर जन्म लिया था.

औफिस से अपने किराए के घर और घर से औफिस, यही आकाश की दिनचर्या बन चुकी थी. ऐसे ही एक दिन वह बस में सवार हो कर औफिस जा रहा था कि कंडक्टर की बहस ने उस का ध्यान खीच लिया. एक बेहद हसीन लड़की शायद पैसे घर पर ही भूल आई थी और कंडक्टर बड़े शांत भाव से पैसों का तकाजा कर रहा था. उस लड़की के चेहरे के भाव उस की परेशानी बयां करने के लिए काफी थे.

न जाने आकाश के मन में क्या आया कि उस ने लड़की के टिकट के पैसे अदा कर दिए. वह उसे ‘थैंक्स’ कह कर पीछे की सीट पर बैठ गई. आकाश ने भी पैसों को ज्यादा तवज्जुह नहीं दी और अपना स्टौप आते ही नीचे उतर गया.

आकाश कुछ कदम ही चला था कि हांफते हुए वह लड़की एकदम उस के आगे आ कर खड़ी हो गई और बोली, ‘‘सर… आप के पैसे मैं कल लौटा दूंगी. हुआ यह कि मैं आज जल्दी में अपने पर्स में पैसे डालना ही भूल गई.’’

आकाश ने उस का चेहरा देखा तो अपलक निहारता ही रह गया. फिर जैसे उसे अपनी हालत का बोध हुआ. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैडम, वह इनसान ही क्या, जो इनसान के काम न आए. आप पैसों की टैंशन न लें.’’

‘‘नहीं सर, आप ने आज मुझे शर्मिंदा होने से बचा लिया. प्लीज, मुझे अपना घर या औफिस का पता बता दें. मैं किसी का अहसान नहीं रख सकती.’’

‘‘तो फिर कल मैं बिना टिकट बस में चढ़ूंगा. आप मेरा टिकट ले कर अहसान चुका देना,’’ आकाश के इस अंदाज ने उस लड़की के होंठों पर हंसी बिखेर दी.

साथसाथ चलते हुए आकाश को पता चला कि उस का नाम टीना है और वह प्राइवेट नौकरी करती है. काम के बारे में पूछने पर वह हंस कर टाल गई. साथ ही, यह भी पता चला कि वह इस महानगरी के पौश इलाके छायापुरम में रहती है. बाकी उस की बातें, उस का लहजा उस के ज्यादा पढ़ेलिखे होने का सुबूत दे ही रहा था.

आकाश ने उसे वापसी के खर्च के लिए 100 रुपए देने चाहे, लेकिन उस ने कहा कि उस की सहेली इस जगह काम करती है. वह उस से पैसा ले लेगी.

आकाश के औफिस का पता ले कर पैसे आजकल में लौटाने की बात

कह कर वह चली गई. न जाने उस छोटी सी मुलाकात में क्या जादू था कि आकाश दिनभर टीना के बारे में ही सोचता रहा.

अगले दिन आकाश ने टीना का इंतजार किया, पर वह नहीं आई. कुछ दिन बीत गए. आकाश के दिमाग से अब वह पूरा वाकिआ निकल ही गया था.

आज काम की भारी टैंशन थी. आकाश अपने केबिन में फाइलों में सिर खपाए बैठा था कि किसी ने पुकारा, ‘‘हैलो, सर.’’

काम की चिंता में गुस्से से सिर उठाया तो सामने टीना को देख आकाश का सारा गुस्सा काफूर हो गया.

‘‘सौरी सर, मैं आप के पैसे तुरंत नहीं लौटा पाई. दरअसल, मेरा इस तरफ आना ही नहीं हुआ,’’ वह एक ही सांस में कह गई.

आकाश ने उसे कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए चपरासी को कौफी लाने को बोल दिया. इस बीच उन दोनों में हलकीफुलकी बातों का दौर शुरू हो गया.

आकाश को अच्छा लगा, जब टीना ने उस के बारे में, उस के परिवार और उस के शौक का भी जायजा लिया. लेकिन तब तो और भी अच्छा लगा, जब आकाश के शादीशुदा होने की बात सुन कर भी उस के चेहरे पर किसी तरह के नैगेटिव भाव नहीं उभरे.

आकाश अंदाजा लगाने लगा कि टीना उस के बारे में क्या सोच बना रही होगी, पर वह नहीं चाहता था कि उस से बातों का यह सिलसिला यहीं टूट जाए.

आकाश की इस हालत को टीना ने भी महसूस किया और कौफी की घूंट भर कर कहा, ‘‘आकाशजी, आज तक न जाने मैं कितने मर्दों से मिली हूं लेकिन आप से जितनी प्रभावित हुई हूं, उतनी कभी किसी से नहीं हुई.’’

आकाश खुद पर ही इतरा गया. आखिर में उस के जज्बात शब्दों में उमड़ ही आए, ‘‘क्या हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं?’’

टीना ने मूक सहमति तो दी, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि आकाश के शादीशुदा होने के चलते उस की पत्नी प्रिया को वह दोस्ती हरगिज गवारा नहीं होगी. पर आकाश का बावला मन तो किसी भी तरह उस के साथ के लिए छटपटा रहा था. आकाश ने बचकाने अंदाज में बोल दिया, ‘‘हमारी दोस्ती के बारे में प्रिया को कभी पता नहीं चलेगा. मैं दोस्ती तो निभाऊंगा, पर पति धर्म मेरे लिए बढ़ कर होगा.’’

टीना ने सहमति जताई और आकाश को अपना मोबाइल नंबर दे कर चली गई. आकाश फिर से अपने काम में जुट गया. फाइलों का जो ढेर उसे सिरदर्दी दे रहा था, अब वह पलक झपकते ही निबट गया.

मोबाइल फोन पर मैसेज और बातों का सिलसिला शुरू हो गया. शाम को टीना ने आकाश को अपने घर बुला लिया. घर क्या आलीशान बंगला था, जिस के आसपास सन्नाटा पसरा हुआ था. टीना के दरवाजा खोलते ही शराब का तेज भभका आकाश की नाक से टकराया. टीना ने उसे भीतर बुला कर दरवाजा बंद कर दिया.

आकाश कुछ सोचनेसमझने की कोशिश करता, इस से पहले ही टीना ने उसे बैठने का संकेत किया और खुद उस के सामने सोफे पर पसर गई और बोली, ‘‘तुम मेरा यह अंदाज देख कर हैरान हो रहे होगे न. दरअसल, आज मैं तुम से अपनी जिंदगी के कुछ गहरे राज बांटना चाहती हूं.’’

चंद पल चुप रहने के बाद टीना बोली, ‘‘हम अपनी जिंदगी में एक नकाब ओढ़े रहते हैं. यह ऊपर का जो चेहरा है न, यह सब को दिखता है, पर जो चेहरा अंदर है उसे कोई दूसरा नहीं देख पाता. तुम भी सोच रहे होगे कि मैं कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हूं. पर आकाश, मैं ने तुम्हारे अंदर एक सच्चा इनसान, एक सच्चा दोस्त देखा है

जो जिस्म नहीं, दिल देखता है. और इस दोस्त से मैं भी कुछ छिपा

कर नहीं रखना चाहती… तुम मेरी नौकरी पूछते थे न? तो सुनो, मैं एक कालगर्ल हूं,’’ इतना कह कर वह ठिठक गई.

आकाश को झटका सा लगा. उस के होंठ कुछ कहने को थरथराए, इस

से पहले ही टीना बोली, ‘‘मेरी कोई मजबूरी नहीं थी, न ही किसी ने मुझे जबरन इस धंधे में धकेला. मेरे बीटैक होने के बावजूद कोई भी नौकरी, कोई भी तनख्वाह मेरी ऐशोआराम की जरूरतें, मेरे शाही ख्वाब पूरे नहीं कर सकती थी, इसलिए मैं ने अपने रूप, अपनी जवानी के मुताबिक देह का धंधा चुना. तुम यह जो आलीशान फ्लैट देख रहे हो, यह मैं नौकरी कर के कभी नहीं बना सकती थी.

‘‘आकाश, मैं ने बहुत पैसा कमाया, बहुत संबंध बनाए, लेकिन रिश्ता नहीं कमा सकी. मैं कोई ऐसा शख्स चाहती थी जिसे मैं खुल कर अपनी भावनाएं साझा कर सकूं. लेकिन हर किसी की नजरें मेरे जिस्म से हो कर गुजरती थीं. यही वजह है कि तुम्हारे अंदर की सचाई देख कर मैं खुद तुम्हारी दोस्ती को उतावली थी. पर मुझे यह मंजूर नहीं

हो रहा था कि मैं अपने दोस्त को अंधेरे में रखूं,’’ कह कर उस ने आकाश को सवालिया नजरों से देखा.

‘‘टीना, मैं तुम्हारे काम के बारे में सुन कर चौंका तो जरूर हूं, लेकिन मुझे झटका नहीं लगा. तुम ने जिस बेबाकी से मुझे अपने बारे में बताया, उसे जान कर मेरी दोस्ती और गहरी हुई है.

‘‘मेरी जानकारी में ऐसी कई और

भी लड़कियां और औरतें हैं, जिन्होंने शराफत का चोला ओढ़ रखा है, लेकिन उन के नाजायज रिश्तों ने आपसी रिश्तों को ही बदनाम कर दिया है. भले ही यह पेशा अपनाना तुम्हारी मजबूरी न हो, लेकिन दिलोदिमाग और जिस्मानी मेहनत तो इस में भी है. हर किसी को अपनी जरूरत के मुताबिक काम चुनने का हक है. कानून और समाज भले ही इसे नाजायज माने, लेकिन मैं इस में कुछ भी गलत नहीं मानता.’’

‘‘दोस्त, मैं तुम्हारी सोच की कायल हूं. अच्छा यह बताओ, क्या पीना चाहोगे…’’

‘‘फिलहाल तो मैं कुछ नहीं लूंगा. अच्छा, तुम्हारे परिवार में और कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरी मम्मी बचपन में ही चल बसी थीं और पापा की मौत 2 साल पहले हुई. वे इलाहाबाद में रहते थे लेकिन अपनी आजादी के चलते मैं ने बैंगलुरु आना ही मुनासिब समझा. अच्छा, यह बताओ कि तुम्हारा चेहरा क्यों लटका हुआ है.’’

‘‘कोई खास बात नहीं है,’’ कह कर आकाश ने टालने की कोशिश की, पर टीना के जोर देने पर उसे बताना पड़ा, ‘‘मेरा नया बौस मुझे बेवजह परेशान कर रहा है.’’

‘‘चिंता न करो. सब ठीक हो जाएगा. अब तो मेरे हाथ की बनी कौफी ही तुम्हारा मूड ठीक करेगी,’’ टीना ने कहा.

कौफी वाकई उम्दा बनी थी. तरावट महसूस करते हुए आकाश ने उस से विदा लेनी चाही. न जाने आकाश के दिल में क्या भाव उभरे कि उस ने टीना से लिपट कर उस का चेहरा चूमना चाहा, तो वह छिटक कर पीछे हट गई और बोली, ‘‘दोस्त, दूसरों और तुम्हारे बीच में बस यही तो फासला है. क्या इसे भी मिटाना चाहोगे…’’

गर्मजोशी से इनकार में सिर हिलाते हुए आकाश ने उस से विदा ली.

अगले 2 दिनों में बौस के तेवर बिलकुल बदले देखे तो आकाश को यकीन न हुआ. साथ में काम करने वालों में से एक ने कहा, ‘‘यार, क्या जादू चलाया है तू ने? कल तक तो यह तुझे काट खाने को दौड़ता था और अब तो तेरा मुरीद हो कर रह गया है. अब तो तेरी प्रमोशन पक्की.’’

अगले ही महीने आकाश का प्रमोशन कर दिया गया. जब उस ने यह खुशखबरी टीना को सुनाई, तो उस ने मुबारकबाद दी.

आकाश ने पूछा, ‘‘यह सब कैसे हुआ टीना?’’

‘‘बौस शायद तुम्हारे काम से खुश हो गया होगा.’’

‘‘टीना, प्लीज सच क्या है?’’

‘‘सच तो यह है कि मुझ से अपने दोस्त का लटका चेहरा देखा नहीं

गया और…’’

‘‘और क्या?’’

‘‘और यह कि सख्त दिखने वाले बुढ़ऊ ही महफिल में हुस्न के तलबे चाटते हैं. वैसे, तुम चिंता न करो. उसे मेरी और तुम्हारी दोस्ती की कोई खबर नहीं है.’’

‘‘टीना, मेरे लिए तुम ने…’’

‘‘बस, अब भावुक मत होना. और कोई परेशानी हो तो साफ बताना.’’

उस दिन से आकाश के मन में टीना के लिए और ज्यादा इज्जत बढ़ गई. वह उस के लिए सच्चे दोस्त से बढ़ कर साबित हुई.

कुछ दिन बाद जब आकाश ने अपने लिए एक छोटा सा घर खरीदने के लिए बैंक के कर्ज के बावजूद 2 लाख रुपए कम पड़े तो टीना ने उसे इस मुसीबत से भी उबार दिया.

हालांकि आकाश ने उसे वचन दिया कि भविष्य में वह यह रकम उसे जरूर वापस लौटाएगा.

अब आकाश के दिल में टीना के लिए प्यार की भावना उछाल मारने लगी थी. लेकिन उस ने कभी इन जज्बातों को खुद पर हावी न होने दिया. वह औफिस से छुट्टी के बाद आज शाम को फिर टीना के घर पर था.

‘‘टीना, मैं तुम्हारा सब से अच्छा दोस्त हूं तो फिर मुझ से ऐसी दूरी क्यों?’’

‘‘आकाश, अकसर हम मतलबी बन कर दूसरे रिश्तों खासकर अपनों को भूल जाते हैं. फिर क्या तुम नहीं मानते कि दोस्ती दिलों में होनी चाहिए, जिस्म की तो भूख होती है?’’

‘‘मैं कुछ नहीं समझना चाहता. मेरे लिए तुम ही सबकुछ हो…’’ भावनाओं के जोश में आकाश ने लपक कर उसे अपनी बांहों के घेरे में कस लिया. उस के लरजते लबों ने जैसे ही टीना के तपते गालों को छुआ, उस की आंखें मुंद गईं. सांसों के ज्वारभाटे के साथ ही उस की बांहें भी आकाश पर कसती चली गईं.

‘टिंगटांग…’ तभी दरवाजे की घंटी बजते ही टीना आकाश से अलग हुई. उसे जबरन एक तरफ धकेल कर टीना ने दरवाजा खोला. कोरियर वाला उसे एक लिफाफा थमा कर चला गया. आकाश ने लिफाफे की बाबत पूछा तो उस ने लिफाफा अलमारी में रख कर बात टाल दी.

जब आकाश ने दोबारा उसे अपनी बांहों में लिया तो उस ने आहिस्ता से खुद को उस की पकड़ से छुड़ा लिया और बोली, ‘‘नहीं आकाश, यह सब करना ठीक नहीं है.’’

आकाश नाराजगी जताते हुए वहां से चला गया.

अगले दिन जब सुबह टीना ने मोबाइल फोन पर बात की तो आकाश ने काम का बहाना बना कर फोन काट दिया. वह चाहता था कि टीना को अपनी गलती का अहसास हो.

रात को 10 बजे मोबाइल फोन बज उठा. टीना का नंबर देख कर आकाश कांप गया. नजर दौड़ाई. प्रिया और प्रियांशु सो रहे थे. उस ने फोन काट दिया. मोबाइल फोन फिर बजने पर आकाश ने रिसीव किया तो उधर से टीना का बड़ा धीमा स्वर सुनाई दिया. ‘‘हैलो आकाश, कैसे हो? नाराज हो न?’’

आकाश नहीं चाहता था कि प्रिया उठ जाए और उसे टीना की भनक तक लगे, इसलिए फौरन कहा, ‘‘नहीं, नाराज नहीं. कहो, कैसे याद किया?’’

‘‘दोस्त, तुम्हारी बड़ी याद आ रही है. मैं तुम्हें अभी अपने पास देखना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है, मैं देखता हूं.’’

तभी प्रिया ने करवट बदली तो आकाश ने फोन काट कर मोबाइल स्विच औफ कर दिया. अब जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था. प्रिया को क्या जवाब देगा भला… और टीना को इस समय फोन करने की क्या सूझी? कल तक इंतजार नहीं कर सकती थी?

इसी उधेड़बुन में आकाश की आंख लग गई.

सुबह उठते ही प्रिया ने रोज की तरह अखबार की सुर्खियों को टटोलते हुए कहा, ‘‘छायापुरम में अकेली रहने वाली कालगर्ल की मौत.’’

आकाश फौरन बिस्तर से उठ कर बैठ गया. खबर में उस की उत्सुकता देख प्रिया ने पूरी खबर पढ़ी, ‘‘छायापुरम में तनहा जिंदगी बसर करने वाली टीना की कल देर रात ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई. वह देह धंधे से जुड़ी बताई जाती थी. डाक्टर के मुताबिक टीना काफी समय से दिमागी कैंसर से पीडि़त थी. कल रात हालत बिगड़ने पर पड़ोसियों ने उसे अस्पताल पहुंचाया, लेकिन रास्ते में ही उस ने दम तोड़ दिया.’’

खबर पढ़ने के बाद प्रिया ने कह दिया, ‘‘ऐसी औरतों का तो यही हश्र होता है,’’ और उस ने आकाश की तरफ देखा.

आकाश की आंखों में पानी देख कर उस ने वजह पूछी. आकाश ने सफाई दी, ‘‘कुछ नहीं, आंखों में कचरा चला गया है. मैं अभी आंखें धो कर आता हूं.’’

विदेशी धरती पर मेरे अपने

आज अनिल का जन्मदिन है,कल से उसकी याद आ रही है, बचपन का मेरा हर क्राइम में पार्टनर ! बचपन के क्राइम पार्टनर लाइफ में ख़ास जगह रखते हैं, अभी तो इंडिया में अनिल उठा नहीं होगा सोकर, बर्थडे पर ऑफिस नहीं जाता है, चेक कर लेता हूँ क्या पता उठ गया हो, सोचकर मैंने उसे व्हाट्सएप्प कॉल की, जनाब ने फोन उठा आकर ऐसा बात शुरू की जैसे बीते सालों में हमारे बीच कुछ हुआ ही न हो ! बोला,‘’और मेरे परदेसी बाबू ! याद है मेरा बर्थडे! क्या ऐश हो रही है बोस्टन में?”

”थोड़ा चुप हो जाओ तो मैं तुम्हे बर्थडे विश कर लूँ!” कहते हुए मैं बहुत जोर से हंस दिया,उसे हैप्पी बर्थडे कहा तो फिर शुरू हो गया, नाटकीय स्वर में बोला,”अरे, यहाँ के क्या हैप्पी बर्थडे ! मौज तो तुम करते होंगे वहां ?”

”बकवास मत करो! अकेला रहता हूँ, सब कुछ अकेले मैनेज करने में हालत खराब हो जाती है, तुम लोगों को तो सब कुछ किया कराया मिलता है वहां !”

”तो कमा भी तो तुम ही रहे हो हम सबसे ज्यादा, हम तो यहाँ इलाहाबाद में ऑफिस से घर, घर से ऑफिस! बस !”

”अच्छा, और वो ऑफिस में गप्पें और आते जाते नुक्कड़ के हरि चाय वाले पर जो दोस्ती यारी होती है, उसके मजे नहीं लेते तुम लोग? कहीं भी आना जाना हो, सबका अड्डा आज भी वही है न?राधे की ठंडी फ्रूट क्रीम,देहाती के रसगुल्ले,राजाराम की रबड़ी कुल्फी ! हाय! खा रहे हो न तुम सब वहां ?’’

”अरे, आनंद, तुम्हे ये सब याद आ रहा है? मुझे तो लगा कि अब कहाँ याद आता होगा तुम्हे यह सब! तुम सबको भूल गए होंगें !”

”नहीं, मेरे भाई, अब तो सब कुछ, एक एक बात और ज्यादा याद आती है!’’मेरा स्वर शायद थोड़ा उदास हुआ था, तभी शायद अनिल ने बात बदल दी, ”यह बता, कोई बेब पसंद आयी वहां ?”

मैं हंस पड़ा, ”जिस तरह से पूछ रहा है, उस तरह से तो नहीं, हाँ, ऑफिस में अच्छी दोस्त हैं कुछ !”

”मतलब कोई गर्लफ्रेंड नहीं है?”

”नहीं!”

”फिर तो तेरी लाइफ सच में बोरिंग है, तू एक काम कर, कोई अफेयर चला ले, मन लगा रहेगा!”

”बड़े भाई को कौन ऐसी सलाह देता है!”

”दो ही साल बड़ा है तू, और कॉलेज की खुराफ़ातों में शामिल करते हुए ध्यान नहीं आया कि तू बड़ा है!”

हम दोनों ने फिर तो एक एक बात याद की और बहुत हंसे, जैसे पिछले कुछ समय की कड़वाहट ने हमें छुआ भी न हो ! और फोन रखने से पहले मैंने पूछ लिया, ”यहाँ आजा, थोड़े दिन,आएगा?साथ घूमेंगें,मस्ती करेंगें थोड़ा !”

”यार, अभी तेरे पास आने के लिए थोड़ा सेविंग कर लूँ, फिर आता हूँ.‘’

”अरे, मैं हूँ न! मैं भेज दूंगा टिकट, ये बता तू कब फ्री है? पासपोर्ट तो हम सबने साथ ही बनवाया था !”

”सोच कर बताता हूँ.‘’

”सोच कर क्या बताएगा? ऐसा कर, मेरे बर्थडे पर आ जा!”

”चल फिर, आता हूँ.” आगे की कई बातें करकेबहुत सारे हंसी मजाक करके हमने फोन रख दिया.

इलाहाबाद के नैनी क्षेत्र में हमारा बड़ा सा मकान है, जिसकी दूसरी मंजिल पर  मेरे पिता केशव,मम्मी लता,पहली मंजिल पर मेरे बड़े चाचा शेखर,चाची सुधा,उनके बच्चे सुनील, अनिल और तीसरी मंजिल पर मेरे छोटे चाचा महेश, चाची रमा, उनकी बेटियां नेहा और आरती रहते थे,ग्राउंड फ्लोर पर नौकरों के लिए एक कमरा और गैराज है. सिविल लाइन्स में हमारे रेडीमेड गारमेंट्स के बड़े बड़े शोरूम्स हैं. कुल मिलाकर सब ठीक चल रहा था पर धीरे धीरे बिजनेस में वो बात नहीं रही जो हुआ करती थी. तीनों भाइयों में मनमुटाव होने लगा जिनमे हम सब बच्चे जो दिल से एक दूसरे के साथ जुड़े थे, हम भी पिस गए.हालात इतने बिगड़े कि घर और बिजनेस का बॅटवारा हो गया और सब अलग अलग हो गए. घर भी अलग, बिजनेस भी अलग. हम बच्चे आपस में किसी भी तरह कभी भी जुड़े रहते, हमारा प्यार बड़ों की तरह कम  नहीं हो पाया, मैं इकलौता बेटा था, मेरे तो सब भाई बहन ही थे, उनसे दूर होने का ख्याल मुझे कई दिन तक परेशान करता रहा.बिजनेस में मेरा मन नहीं लग रहा था, मैंने पेरिस से ही एम बी ए किया और फिर मुझे बोस्टन में ही यह अच्छा जॉब मिल गया है. यहाँ तो आ गया पर अकेलापन तो लगता है, ऑफिस में काम करते रहना अच्छा लगता है, घर आकर अकेलापन ज्यादा महसूस होता है, हमेशा भरे पूरे घर में समय बीता था, अब एकदम अकेला था, दोस्त भी ख़ास नहीं थे, घर आकर अपने  फ्लैट में बंद हो जाता हूँ, मैच देख लिया, घर के काम निपटा लिए, कोई शो देख लिया, घर आकर भी स्क्रीन पर, ऑफिस में भी !कभी छुट्टी वाले दिन एप्पल  सिनेमाहॉल चला जाता हूँ जहाँ हिंदी  फ़िल्में चलती हैं. पर मैंने तो कभी अकेले फ़िल्में देखी ही नहीं थीं, हम सब कजिन्स साथ जाया करते थे, बस अनिल आ जाए, बहुत मस्ती करेंगें साथ, बस चाचाजी उसे आने दें ! और फिर मैंने जल्दी ही अनिल की फ्लाइट बुक करदी.

मेरे बर्थडे पर एयरपोर्ट पर खड़ा वो मेरे गले मिल रहा था, मुझे यकीन ही नहीं हुआ. मैं उसे टैक्सी से अपने फ्लैट पर ले गया, साथ ही साथ उसे शहर के बारे में बताता रहा, आती जाती स्मार्ट लड़कियों को देख आकर वो जैसे मुझे देख कर हाथ से वाह का इशारा करता, मैं खुल कर हँसता! मुझे अपनी ही हंसी अच्छी लग रही थी, मुदद्तों हो जाती है ऐसे हंसे हुए आजकल !फिर मैंने एक हफ्ते की छुट्टी ले ली, उसे अपने साथ घर का कुछ सामान लेने फेनुएल हॉल भी ले गया, पटेल ग्रॉसरी स्टोर में वो हैरान होता रहा, ”यार, सब कुछ मिलता है क्या ?” पैराडाइस बिरयानी खा आकर उसने  बिरयानी की हद से ज्यादा शौक़ीन नेहा और आरती को वीडियो कॉल ही कर दी, हमारी दोनों बहनें शुरू हो गयीं,”बहुत गुस्सा आ रहा है, आनंद भैया, आपने अनिल भैया को बुलाया, हमें नहींऔर बिरयानी खाते हुए वीडियो कॉल करते हुए आप दोनों भाइयों को शर्म नहीं  आयी? देखना, हजम नहीं होगी! आनंद भैया,हमें भी आना है !”

”तो आ जाओ, जब कहोगी, तुम्हारे भी टिकट्स बुक कर दूंगा.‘’

आरती ने कहा,”भैया, मुझे भी वहीँ पढ़ना है.‘’

”ठीक है, जी मैट की तैयारी करो, आकर एम बी ए कर लो, मैं पूरी हेल्प कर दूंगा, चिंता मत करो !”

”भैया, मेरे लिए कुछ जरूर भेजना !”

मैं हंस पड़ा ,”सब तो मिलता है वहां !”

”हाँ,  भैया, फिर भी कुछ तो भेजना, फ्रेंड्स को थोड़ा शो ऑफ करुँगी.‘’

हंसी मजाक होता रहा, हमारा डिनर हो गया तो अनिल और  मैं बोस्टन पब्लिक गार्डन घूमते रहे. हमने  कितनी ही बातें की,  अपने सब दोस्तों के अफेयर्स और ब्रेक अप पर खूब बातें की. मेरा मन जैसे चहक उठा था, नया जोश भर गया था, आसपास बहुत घूमे, मैं भी अकेले अभी तक इन जगहों पर नहीं गया था. हमने सबके लिए इंडिया ले जाने के लिए कुछ न कुछ खरीदा. मेरे कहने पर ‘लोकनाथ चौक’ की कचौड़ी , नमकीन जो वो लाया था, मैं डट कर खाता, कह देता,”यह तुम न खाना, तुम तो जाकर भी खा लोगे !” और वो इस बात पर हंस देता. बहुत ही यादगार समय बिताकर अनिल चला गया. बड़ों के विवादों का हम पर जरा भी असर नहीं हुआ है, यह बात मन को बहुत ख़ुशी दे गयी थी.मेरे कुछ दिन बहुत अच्छे बीते,इन मीठी सी यादों ने दिल को एक नए उत्साह से भर  दिया था, मैं  अपनी लाइफ में फिर बिजी हो गया, अब इतना जरूर हुआ था कि मेरे कजिन्स मेरे साथ बड़े हक़ से बड़े प्यार से टच  में रहते. सब मेरे पास घूमने आने के लिए तैयार थे.हम सब कभी भी वीडियो कॉल करते, हमें अपने बड़ों से इस मामले में अब कोई मतलब नहीं था, उनके आपसी सम्बन्ध बिगड़ गए थे पर हम सब भाई  बहन आपस में प्यार करते, हमारा बचपन एक साथ एक घर में बीता था, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि हम सब आपस में कितना  जुड़े थे. मैं तो आते समय चुपचाप उदास सा आ गया था पर बाद में सब मुझसे फोन पर कितना लड़े थे कि मैं माफ़ी मांगता रह गया था. जबसे अनिल मिलकर गया था, मुझे अपने कजिन्स और याद आते. मेरी मम्मी की अपने भाई रमेश मामा से नानी नाना के बाद बनी  नहीं, पर मामा का बेटा रोहित मुझे बहुत प्रिय था, मामा के यहाँ लखनऊ आना जाना छूट गया पर रोहित जब भी इलाहाबाद आता, घर जरूर आता, मम्मी खिंची खिंची रहती पर हम सब कजिन्स उसका खूब स्वागत करते, हम सारे जब दो कारों में भरकर उसे ‘शामियाना’ में छोले भठूरे खिलाने ले जाते, वहां मिलने वाले दोस्त कहते,”आ गयी आनद की टीम !” और फिर किसी दिन जॉर्ज टाउन की पंडित जी की चाट खायी जाती,मजा आ जाता. चाट खिलाने वाले भी जानते थे कि हम सब एक घर से हैं. अब जब उसी रोहित का एक दिन फोन आया, मेरा चौंकना स्वाभाविक ही था, व्हाट्सएप्प कॉल पर मेरी डी पी देखते हुए उसका पहला सेंटेंस था,”यार, तू तो बहुत हैंडसम लग रहा है, डी पी में !”

”देख भाई, हैंडसम तो मैं शुरू से ही था, बस घर की मुर्गी दाल बराबर वाली बात है !” फिर क्या था, दो कजिन्स, दो बालसखा जब बात करेंगें तो क्या होगा! बस एक दूसरे  की टांग जी भर कर खींची, फिर उसने कहा, ”न्यू यॉर्क  की एक कंपनी ने जॉब ऑफर किया है, आ जाऊँ ?”

”अबे, सच? आ जा, भाई,वाह वाह,क्या बात बतायी! मेरे यहाँ से लगभग ३००  किलोमीटर दूर है,सब हो जायेगा !”

उसने बहुत कुछ यहाँ के हालचाल पूछे,मैंने कहा,”और जब आएगा तो मामी जो भी कुछ अपने हाथ से बना कर  देंगीं, मेरे लिए भी लाना.‘’

”भुक्खड़! आज भी तुम्हारे खाने के शौक कम नहीं हुए?”

”आओ, देखो, यहाँ रहकर! क्या क्या याद आता है!”

फोन रखने के बाद मैं बड़ी देर तक मुस्कुराता रहा था, रोहित आएगा, कोई होगा आसपास अपना !घर तो रोज बात  होती ही थी, मैं जब अपने कजिन्स की बातें बताने लगता, कोई अच्छा रिस्पांस न मिलता, हमारे बड़े लाइफ में शायद कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ चुके थे.अब तो नेहा और आरती कभी भी वीडियो कॉल कर लेतीं, उन्होंने कह दिया था,”भैया, हम दोनों बहुत जल्दी ही मम्मी पापा से ज़िद करके आपके पास घूमने आने वाली हैं, हमने तो अभी से घर में बार बार कहना शुरू कर दिया है जिससे बार बार की ज़िद से मम्मी पापा चिढ़ कर कह ही दें, ‘जाओ, जो करना है करो !”

मैं उनके कहने के ढंग पर बहुत हंसा,समझाया, ”उन्हें चिढ़ा कर नहीं, आराम से कह कर प्रोग्राम बना लो कि अपने भाई के पास जा रहे हैं, हो सकता है किसी दिन हमारे बड़े भी मेरे पास आ ही जाएँ !”

”भैया, बड़ों की बातें तो आप रहने ही दो ! हम भाई बहन बहुत अच्छे हैं उनसे ! लड़ने दो उन्हें आपस में !” कहते कहते आरती उदास हुई थी,मैं भी चुप हुआ तो नेहा ने फिर हंसी मजाक करके फोन रख दिया था.जबसे अनिल आकर गया था, मेरे दिल का अकेलापन कुछ कम हो गया है, मेरे भाई बहन मेरे टच में रहते हैं, जानता हूँ कोई न कोई मेरे पास आता रहेगा, इस विदेशी धरती पर जब मेरा कोई अपना मेरे साथ होगा, इस जगह की खूबसूरती और बढ़ जाएगी. हमारे बड़ों के आपसी मनमुटाव ने हम भाई बहनों के प्यार में कोई कमी नहीं आने दी, यही सबसे बड़ी ख़ुशी की बात है. अब रोहित भी पास में ही आ जाएगा, कभी भी मिला करेंगें, साथ साथ घूमेंगें तो कितना मजा आएगा. फिर नेहा आरती भी आएंगीं. विदेशी धरती पर मैं अपनों का स्वागत करने के लिए अधीर था.

जमानत अधिकार है, दया नहीं

दिल्ली शराब घोटाले में 6 महीने से जेल में बंद आम आदमी पार्टी नेता, राज्यसभा सांसद संजय सिंह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत पर छूटने के बाद संजय सिंह राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन वे इस मामले के संबंध में कोई बयान नहीं देंगे. कोर्ट ने कहा कि संजय की जमानत के आदेश को नजीर नहीं माना जाएगा. इस से यह अर्थ निकलता है कि इसी मसले में जेल में बंद मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल को जेल में रहना होगा, उन को जमानत नहीं मिलेगी.

संजय सिंह 4 अक्टूबर, 2023 से जेल में थे. करीबकरीब 6 माह या 180 दिन वे जेल में रहे. अगर इस मसले में आगे बहस के दौरान संजय सिंह बरी हो जाते हैं तो इन 180 दिनों का हिसाब कौन देगा ? क्या इस की क्षतिपूर्ति ईडी दे सकती है ? बात केवल संजय सिंह की नहीं है. छोटेमोटे घरेलू अपराध होने के बाद पुलिस आम आदमी को जेल में डाल देती है. जहां दहेज उत्पीड़न, नारकोटिक्स, आतंकवाद और राष्ट्रद्रोह जैसे बहुत सारे ऐसे मसले होते हैं जिन में सालोंसाल लोगों को जेल में डाल कर रखा जा सकता है. अगर वे सजा से बरी भी हो जाएं तो जेल में रह तो लिए ही हैं. यह मानवाधिकार के खिलाफ है.

संजय सिंह के मामले में जमानत देते समय कोर्ट ने कई बातें कहीं, जैसे वे केस की मेरिट पर कुछ भी व्यक्त नहीं कर सकते है. इस आदेश को मिसाल नहीं माना जाएगा. जमानत पर रिहा होने के बाद संजय सिंह शराब नीति घोटाला मामले में कोई बयान नहीं देंगे. इन बातों से यह लग रहा कि जमानत देते समय कोर्ट को सफाई जैसी देनी पड़ रही है. असल में जमानत देने में कोर्ट को खुले दिल से काम लेना चाहिए. जमानत आरोपित किए गए व्यक्ति का अधिकार होना चाहिए.

किसी मामले में कोई आरोपी जब सजा पा जाता है तो उस की सजा से वे दिन कम कर दिए जाते हैं जितने दिन वह विचाराधीन कैदी के रूप मे जेल में रहा है. जैसे किसी को 2 साल की सजा मिली, वह पहले ही 6 माह जेल में रह चुका है तो उस को सजा मिलने के बाद केवल 1 साल 6 माह ही जेल में रहना होगा.
इस का अर्थ यह है कि विचाराधीन कैदी के रूप में आरोपी ने जितने दिन जेल में गुजारे उस को क्षतिपूर्ति के रूप में सजा में से कम कर दिया गया. यह नियम उस मामले में भी लागू होना चाहिए जिस में आरोपी को सजा नहीं मिलती है. जिस में अदालत उस को बाइज्जत बरी कर देती है. जितने दिन जेल में गुजारे उस की क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए क्योंकि उसे जमानत न दे कर उस के मानवाधिकारों का हनन किया गया है.

जेलों में सजा पाए से ज्यादा हैं कैदी विचाराधीन

कई मामलों में विचाराधीन कैदी सजा से अधिक का समय जेल में गुजार चुके होते हैं. अगर किसी को 2 साल की मिलनी हो, सजा से पहले ही वह 3 साल जेल में गुजार चुका है तो उस की क्षतिपूर्ति क्यों नहीं होनी चाहिए? देश की जेलों में बंद विचाराधीन कैदी इस का बड़ा उदाहरण हैं. भारत की जेलों में सिर्फ 22 प्रतिशत कैदी ही ऐसे हैं जिन्हें किसी अपराध में दोषी करार दिया गया है. इस के मुकाबले 77 फीसदी विचाराधीन कैदी हैं. 2022 की इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के मुताबिक विचाराधीन कैदियों की संख्या 2010 के बाद सब से ज्यादा बढ़ी है. 2010 में यह तादाद 2.4 लाख थी जो 2021 में करीब दोगुनी हो कर 4.3 लाख हो गई. इस में 78 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
देशभर में 11,490 कैदियों को 5 साल से ज्यादा समय तक कैद में रखा गया था. जबकि यह आंकड़ा 2020 में 7,128 और 2019 में 5,011 था. इस दौरान रिहा किए गए कुल विचाराधीन कैदियों में से 96.7 प्रतिशत कैदी एक साल के भीतर जमानत पर छूट गए. 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेशों में क्षमता से ज्यादा कैदियों को रखा गया था. टेंपरेरी बेल या इमरजैंसी पैरोल पर रिहाई आसानी से नहीं मिलती है. अदालतें अर्जेंट बेल को छोड़ कर किसी और मामले की सुनवाई जल्दी नहीं करती हैं.
नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की जेलों की स्थिति पर ताजा रिपोर्ट में कहा गया कि 31 दिसंबर, 2021 तक देश की कुल 1,319 जेलों में औसतन हर 100 कैदियों की निर्धारित जगह में 130 कैदी रह रहे थे. उत्तर प्रदेश की जिला जेलों में हर 100 कैदियों के लिए उपलब्ध जगह में 208 कैदी और उत्तराखंड की उपजेलों में हर 100 कैदियों के लिए जगह में करीब 300 कैदी रह रहे थे.
बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक कैद में रखने पर ध्यान देने की जरूरत है. उन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाया जाना चाहिए जिन की वजह से ऐसे हालात बनते हैं. जेलों में भीड़ की बड़ी वजह यही है कि अंडरट्रायल कैदियों के मामले लंबे समय तक चलते रहते हैं. उन को जमानत नहीं दी जाती है. अंडरट्रायल कैदी के तौर पर जेल में 3 महीने से 2 साल तक का समय बिता चुके कैदियों की संख्या 2.13 लाख है जिन में 8,822 महिलाएं शामिल हैं.

मनावाधिकार का हनन है जेलों में रखना

देशभर की निचली अदालतों में मामले सालोंसाल चलते रहते हैं और इन मामलों में आरोपी के तौर पर गिरफ्तार किए गए लोग अंडरट्रायल के तौर पर जेलों में बंद रहते हैं. अंडरट्रायल कैदियों के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण आंकड़ा यह है कि तकरीबन 48 फीसदी अंडरट्रायल कैदी 18 से 30 साल की उम्र के हैं. इस से यह समझना मुश्किल नहीं है कि अपने जीवन के एक महत्त्वपूर्ण समय के कई कीमती महीने और साल ये अंडरट्रायल कैदी जेल में इस इंतजार में बिता देते हैं कि उन के मामले का फैसला हो जाए. इन में से 25 प्रतिशत अनपढ़ हैं.

हकीकत में तो किसी भी आरोपी को जेल जाना ही नहीं चाहिए. सचाई इस से उलट है. किसी ने किसी को थप्पड़ मार दिया तो भी जेल, किसी ने जेब काट ली तो भी उसे जेल भेजा जा रहा है. जेलों में जो 70 साल से ज्यादा उम्र के कैदी हैं, जो बीमार हैं, बूढ़े हैं या विकलांग हैं और जो अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा काट चुके हैं वे भी सजा काट रहे हैं.

कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों जिम्मेदार

ट्रायल कोर्ट छोटे से छोटे मामले में जमानत देने से बचने लगी है. इस से हाईकोर्ट पर जमानत देने का दबाव बढ़ गया है. इस वजह से आरोपी को जमानत लेने पर होने वाला खर्च बढ़ जाता है. विचाराधीन कैदियों के रूप में देश के सामान्य लोग ही सब से ज्यादा हैं. नेताओं के मामले उंगली पर गिने जाने भर के ही हैं. इस के बाद भी सब का फोकस नेताओं के ऊपर होता है. उन की ही चर्चा मीडिया करता है. नेता जब सत्ता में रहते हैं, कानून को कड़े से कड़ा बनाने का काम करते हैं. उदाहरण के लिए ईडी और एमपीएमएलए कानून में कई प्रावधान उस समय जोड़े गए जब कांग्रेस सत्ता में थी. आज वही कांग्रेस भाजपा पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगा रही है.
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल जब सत्ता में नहीं थे, दिल्ली में कांग्रेस सरकार, मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और सोनिया गांधी का नाम ले कर कहते थे- ‘सोनियां गांधी को जेल भेजो, सारा सच सामने आ जाएगा’. आज जब वे दिल्ली शराब घोटाले में जेल में हैं तो उन का कहना है- ‘जेल क्यों भेजा गया उन को?’
हमारे देश में जब भी कानून बनता है तो उस को इस तरह का बनाया जाता है कि अधिकतम और कड़ी से कड़ी सजा कैसे दी जाए? कांग्रेस के कार्यकाल में ही दिल्ली के निर्भया कांड के बाद महिला कानून बना. उस में महिलाओं के खिलाफ छोटेछोटे मामलों में बड़ीबड़ी सजा के प्रावधान कर दिए गए. महिलाओं को देखना (घूरना) और छूना तक अपराध की श्रेणी में आ गया. ऐसे में अब इन का दुरुपयोग होने लगा है.

नेताओं से अधिक परेशान है देश की जनता

दहेज कानून उन पर भी बन जाता है जिन के यहां शादी प्रेमविवाह में हो. महिला आत्महत्या कर ले तो पूरे परिवार को जेल जाने से कोई बचा नहीं सकता. कांग्रेस आज टैक्स कानून को आंतक बता रही है. 60 साल सत्ता में रहने के दौरान कितने टैक्स जनता पर लगाए, इस का कोई हिसाब उस के पास नहीं है. कितनों को कर चोरी में जेल भेजा, कोई हिसाबकिताब नहीं है. नेता सत्ता में रहते समय कानूनों में बदलाव नहीं करना चाहते. जब सत्ता में नहीं होते तो कानून के आंतक का रोना रोते हैं.
बात टैक्स कानून की हो या विचाराधीन कैदियों की या बात करें जमानत मिलने की, देश की जनता सब से अधिक परेशान है. घर, परिवार और महिलाएं परेशान हैं. घर का कोई एक आदमी भी जेल में हो तो पूरे घर का आर्थिक ढांचा टूट जाता है. परिवार बिखर जाता है. 8 हजार महिलाएं विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं. ये सजा से बरी भी हो जाएं तो समाज में इन की क्या जगह बन पाएगी? अदालतों और विवेचकों को यह लगता है कि जमानत दया है. असल में सविधान कहता है, जमानत हर आरोपी का अधिकार है.

संजय सिंह 180 दिन जेल में रहे तो क्या इतने दिन उन से केवल पूछताछ की गई होगी? विवेचक का काम पूछताछ करना होता है. क्या जेल से बाहर रख कर पूछताछ नहीं हो सकती? अगर ऐसा हो तो जेलों पर बोझ नहीं बढ़ेगा. किसी का दोष साबित होने से पहले सजा के तौर पर जेल में रहना नहीं पड़ेगा. सरकार को विचाराधीन कैदियों पर खर्च नहीं करना पड़ेगा. न्यायपालिका को जमानत देने में अपनी सोच बदलनी होगी. जमानत दया नहीं, अधिकार है.

 

 

मेरी स्किन औयली है मुझे क्रीम का कोलोजन सीरम में से किस का डेली इस्तेमाल करना चाहिए?

सवाल

मेरी स्किन औयली है. मुझे क्रीम का कोलोजन सीरम में से किस का डेली इस्तेमाल करना चाहिए?

जवाब
सीरम में त्वचा की रिपेयर करने वाले तत्त्व कौन्संट्रेटेड फौर्म में होते हैं, जिस कारण यह बहुत कम मात्रा में लगता है और ज्यादा असरदार होता है जबकि क्रीम माइल्ड होती है. इसी कारण सीरम क्रीम से ज्यादा बेहतर होता है. अपनी त्वचा को डीपली नरिश करने के लिए रोज सुबह फेस क्लीन या हो सके तो लाइट स्क्रब करने के बाद कोलोजन सीरम का इस्तेमाल कीजिए. इस का डेली इस्तेमाल आप की स्किन को रिपेयर कर के उसे प्रोटैक्ट व हाईड्रेट करेगा, साथ ही ऐजिंग साइंस को भी दूर करेगा. जबकि रात में सोने से पहले एएच यानी अल्फा हाईड्रौक्सी ऐसिड सीरम लगाएं. ड्राई स्किन के लिए क्रीम का इस्तेमाल ज्यादा ठीक है.

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गरमी का मौसम आते ही धूप, धूलमिट्टी और पसीने से त्वचा चिपचिपी होने लगती है. ऐसे मौसम में औयली स्किन और भी ज्यादा औयली और चिपचिपी होने लगती है. ऐसी त्वचा की खूबसूरती निखारने के लिए ब्यूटी टिप्स बता रही हैं मेकअप आर्टिस्ट पिंकी चावला:

औयली स्किन मेकअप: औयली स्किन वाली महिलाएं गरमी के मौसम को भी अन्य मौसमों की तरह ऐंजौय कर सकती हैं. स्किन चाहे कैसी भी हो अगर खूबसूरती को निखारने के लिए आप समर में कुछ स्पैशल ट्रिक्स का इस्तेमाल करेंगी, तो आप की त्वचा भी रहेगी फ्रै श और सुंदर.

स्किन क्लीनिंग पर दें ध्यान: मेकअप करने से पहले चेहरे को धोएं और स्क्रब करें. फिर उसे क्लींजर, क्लींजिंग मिल्क से साफ करें. क्लींजर त्वचा को गहराई से साफ तो करते ही हैं साथ ही अतिरिक्त औयल को भी औब्जर्ब कर लेते हैं. मेकअप करने से पहले अपने चेहरे को अलकोहल फ्री टोनर से साफ करें. इसे क्लींजर से चेहरा साफ करने के 5 मिनट बाद ही लगाएं.

फेस मेकअप: स्किन में ऐक्स्ट्रा शाइन लाने के लिए औयल फ्री, चिकनाई सोखने वाले फाउंडेशन और टिंटेड मौइश्चराइजर का प्रयोग करें. औयली स्किन पर मेकअप से पहले ऐंटीशाइन प्राइमर लगाएं. जरूरत के अनुसार इसे दोबारा भी लगा सकती हैं.

मौइश्चराइजर व फाउंडेशन: अगर आप अच्छी क्वालिटी का मौइश्चराइजर लगाएंगीतो मेकअप ज्यादा देर तक टिका रहेगा और आप का लुक भी बेहतर लगेगा. हमेशा औयल फ्री या वाटर बेस्ड मौइश्चराइजर का प्रयोग करें. औयल फ्री फाउंडेशन त्वचा के ओपन पोर्स को पूरी तरह ढक देता है. अच्छे रिजल्ट के लिए इसे थोड़े से मौइश्चराइजर के साथ मिला कर चेहरे पर ब्रश या उंगलियों की मदद से लगाएं.

ट्रांसल्यूशन पाउडर: फाउंडेशन लगाने के बाद ट्रांसल्यूशन पाउडर लगाएं. इसे फाउंडेशन लगाने के करीब 10 मिनट बाद लगाएं. ट्रांसल्यूशन पाउडर लाइट कलर का ही हो. इस से फोरहौड, चीक्स और नोज को हाईलाइट करें.

कंसीलर: औयली स्किन पर अधिकतर पिंपल्स व मार्क्स होते हैं. ऐसे में अपनी स्किनटोन से मिलताजुलता कंसीलर पिंपल्स व मार्क्स पर ब्रश या उंगलियों से थपथपाते हुए लगाएं ताकि वे छिप जाएं.

औयल ब्लौटिंग शीट: अपने पास हमेशा औयल ब्लौटिंग शीट रखें. इस से आप आराम से फेस पर आए ऐक्स्ट्रा औयल को औब्जर्ब कर सकती हैं.

आईज मेकअप: गरमी में पसीने की वजह से आईज मेकअप ज्यादा देर न टिक फैल जाता है. इस के लिए आप मोबिलीन न्यूयौर्क वौल्यूम ऐक्सप्रैस मसकारा और यार्डले ऐक्टिव लैश मसकारे का प्रयोग करें. यह आप की आईलैशेज को घना दिखाने के साथसाथ देर तक टिका भी रहेगा. आईब्रो पैंसिल से आंखों को सही आकार दें और आईशैडो लाइट ब्राउन या ग्रे ही लगाएं. इस में आईज अट्रैक्टिव लगेंगी.

चीक्स मेकअप: औयली स्किन के लिए लिक्विड ब्लशर का इस्तेमाल करें. यह चीक्स पर एकसार सा लगेगा और फैलेगा भी नहीं. इसे ब्रश की सहायता से चीक्सबोंस से ले कर कनपटियों तक फैला कर लगाएं. यह स्किन को अलग ही ग्लो देगा.

लिप्स मेकअप: गरमी के मौसम में अपने लिप्स पर लिपबाम और पैट्रोलियम जैली लगाना न भूलें. इन्हें लगाने से लिप्स स्मूद रहते हैं और लुक भी बेहतर रहता है.

औयली स्किन होने के कारण

अन्य स्किन की तुलना में औयली स्किन वाली महिलाएं अधिक उम्र तक जवां दिखती हैं. ऐसी स्किन पर रिंकल्स, फाइन लाइन आदि पड़ने की संभावना जल्दी नहीं रहती है. लेकिन औयली स्किन बहुत जल्दी शाइन करने लगती है, जिस से मेकअप बहुत ही जल्दी उतर जाता है. ऐसी स्किन पर पिंपल्स और ऐक्ने जल्दी होते हैं. औयली स्किन के कारणों को जान कर उन का समाधान करें.

जैनेटिक्स: त्वचा के प्रकार निर्धारण करने में जैनेटिक्स महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अगर आप की फैमिली में किसी की स्किन औयली होगी तो वह आप की स्किन पर भी प्रभाव डालेगी. वह आप की स्किन के पोर्स से अधिक से अधिक औयल छोड़ेगी.

अधिक मात्रा में प्रयोग: हम सभी अपनी स्किन को साफ, सौम्य और सुंदर बनाने के लिए ब्यूटी प्रोडक्ट्स का प्रयोग करते हैं. लेकिन अत्यधिक क्रीम, जैल, कैमिकल पील आदि से स्किन में औयल पैदा होता है जिस से स्किन औयली होती है.

मौसम का बदलाव: मौसम का बदलना भी औयली स्किन का कारण होता है. गरम और उमस वाला मौसम औयल के लैवल को बढ़ाता है. गरम और ठंडे मौसम में जब ज्यादा औयल निकलता है, तो स्किन को ड्राई होने से बचाता है और औयली स्किन को और ज्यादा औयली कर देता है.

हारमोनल बदलाव: यौवन, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति हारमोन की अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं. ऐसे समय में महिलाओं के शरीर से अधिक औयल का उत्पादन होता है.

दवा: अत्यधिक औयली स्किन दवा के सेवन से भी होती है. जैसे हारमोनल बर्थ कंट्रोल पिल्स और हारमोनल रिप्लेसमैंट दवाओं से. सुंदर त्वचा और अच्छी सेहत के लिए ऐसी दवाओं का सेवन डाक्टर की सलाह से व कम से कम करें.

तनाव: तनाव शरीर पर बहुत प्रभाव डालता है. जब तनाव होता है उस समय भी औयल का उत्पादन ज्यादा होता है, जिस से स्किन औयली हो जाती है.

औयली स्किन की बेसिक देखभाल

  1. एक बोतल में एकतिहाई गुलाबजल, एकतिहाई विज हैजल और एकतिहाई डिस्टिल वाटर मिलाएं. फिर बोतल को फ्रिज में रख दें. जरूरत के अनुसार त्वचा पर लगा कर फ्रैश हो जाएं.
  2. औयली स्किन वाली महिलाएं हमेशा मुंह धोने के लिए कुनकुने पानी का इस्तेमाल करें. कुनकुना पानी चेहरे पर जमी गंदगी को बेहतर ढंग से साफ करता है.
  3. औयली स्किन वाली महिलाएं नियमित रूप से त्वचा की साफसफाई करें. दिन में 2 बार पूरे फेस को अच्छी तरह साफ करें ताकि औयल कम हो सके.
  4. चेहरे पर बहुत ज्यादा स्क्रब न करें. हफ्ते में 2-3 बार ही करें.
  5. समयसमय पर नैचुरल फेस मास्क का प्रयोग करेें. यह फेश से ऐक्स्ट्रा औयल को सोख लेता है और चेहरे से हार्मफुल बैक्टीरिया को भी हटाता है.

मौका: पुरूषवादी सोच वाले सुरेश को बीवी ने कैसे समझाया?

दिन के 11 बज चुके थे और सुरेश अभी भी गहरी नींद में सोया था. आजकल उस की शाम की शिफ्ट चल रही है इसलिए सुबह जल्दी उठने की परवाह नहीं होती. वैसे भी बीवी सुजाता 2 दिन पहले ही मायके गई है. अभी कम से कम 15-20 दिन तो वह बीवी की चिकचिक से भी आजाद था.

सुजाता घर में होती है तो उसे जल्दी उठ कर व्यायाम के लिए जाने की जिद करती है. वैसे सुरेश कभी उस की सुनता नहीं. सुरेश हमेशा से अपनी मरजी का मालिक रहा है. उस की मां ने भी बचपन से उसे यही सिखाया था. कितनी दफा वह सुजाता को मां की बात कह चुका है कि मर्द घर का मालिक होता है और औरत उस की गुलाम. घर कैसे चलाना है इस का फैसला मर्द करता है. औरत कभी भी मर्द को आज्ञा नहीं दे सकती मगर उसे मर्द की आज्ञा माननी जरूर चाहिए. ऐसी बातें सुन कर सुजाता चुप रह जाती और वह हंसता हुआ अपने मन की करने लगता.

दरवाजे पर दस्तक हुई तो सुरेश को उठना पड़ा. दरवाजा खोला तो सामने कुरियर वाला खड़ा था,” सर आप का कुरियर.”

उस के हाथ में एक लिफाफा था. सुरेश ने लिफाफा खोला तो भौंचक्का रह गया. यह तो वकील का नोटिस था जिसे सुजाता द्वारा भिजवाया गया था.

हड़बड़ाते हुए सुरेश ने नोटिस पढ़नी शुरू की. यह तलाक का नोटिस था जिस में लिखा हुआ था,’ श्रीमान सुरेश महाजन, यह नोटिस आप के नाम हमारी मुवक्किल सुजाता कपूर द्वारा भेजा गया है.

हमारी मुवक्किल सुजाता निम्न बातों पर आप को गौर कराना चाहती हैं. उन्होंने क्रम से कुछ घटनाओं का विवरण लिखा है कि आप की ज्यादतियों ने उन के अधिकार छीने और वे घरेलू हिंसा का शिकार हुईं. ऐसी तमाम घटनाओं के मद्देनजर वे आप से आजिज आ चुकी हैं और छुटकारा पाना चाहती हैं.

नोटिस में विस्तार से कुछ घटनाओं का वर्णन था. ये घटनाएं सुरेश के पुरुषवादी रवैये की पोल खोल रही थीं. सुजाता ने क्रम से ये घटनाएं लिखी थीं :

14 फरवरी, 2020 :

मिस्टर सुरेश महाजन यानी माननीय पति महोदय आप को हमारी शादी के करीब 1 सप्ताह बाद की वह रात तो याद ही होगी. लौकडाउन से 1 महीने पहले वैलेंटाइन डे के दिन जब हम हनीमून पर मनाली गए थे तो उस दिन मैं ने अपनी बहन द्वारा दिए गए तोहफे को खोला था. बहन ने चुपके से मेरे बैग में एक ड्रैस रख दी थी और मैं उसे पहन कर तैयार हो गई. ड्रैस कहीं से भी बेकार नहीं लग रही थी. स्लीवलैस जरूर थी मगर भद्दी नहीं थी. उस ड्रैस को पहन कर खुशीखुशी मैं अपने कमरे से बाहर निकली. आप ने बुरा सा मुंह बनाया. अपने हाथ में पकड़ा हुआ अखबार नीचे फेंका और झकझोरते हुए मुझे यह कहते हुए वापस बाथरूम में धकेल दिया कि ऐसी ड्रैस पहन कर साथ चलने की बात सोचना भी मत.

उस वक्त मुझे ऐसा लगा था जैसे मेरे वजूद पर ही सवाल खड़ा किया गया हो. क्या मुझे अपनी पसंद के कपड़े पहनने का हक भी नहीं मिलना चाहिए? क्या अपने हनीमून पर अपने पति के साथ भी मैं वैस्टर्न ड्रैस नहीं पहन सकती?

नोटिस में एक और घटना का विवरण था. सुजाता ने हिंसा का आरोप लगाते हुए एक दिन क्या हुआ था, इस बारे में विस्तार से लिखा था :

23 मार्च, 2020 :

उस दिन मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. मुझे उठने में देर हो गई. आप तो मेरे उठाने पर ही उठते हो. इस वजह से आप को औफिस जाने में देर हो गई. मैं ने तबीयत खराब में भी जल्दीजल्दी नाश्ता बनाया मगर आप झल्लाते हुए औफिस गए. शाम तक मुझे 102 डिग्री बुखार हो चुका था. मैं ने फोन करने की सोची फिर रुक गई कि आप का मूड सही नहीं. मैं दवा खा कर पूरे दिन सोई रही. शाम को दरवाजे की घंटी लगातार तेज आवाज में बजती सुन मैं हड़बड़ा कर उठी और चक्कर खा कर गिर पड़ी. किसी तरह लड़खड़ाते हुए मैं ने दरवाजा खोला.

मेरी तरफ एक पल को भी देखे बगैर आप ने मुझे धक्का दिया और चिल्लाते हुए घर में घुसे. अपना बैग बिस्तर पर पटकते हुए चीखने लगे,” दरवाजा खोलने में इतनी देर लगती है? पता नहीं क्यों पूरे दिन बिस्तर तोड़ती रहती है. मैं थकहार कर औफिस से लौटता हूं और एक तुम हो कि दरवाजा भी नहीं खुलता. अब मुंह क्या देख रही हो? पानी लाओ. ”

उस वक्त मुझे खुद पर कितना तरस आया यह केवल मैं ही जानती हूं. तुम ने एक नजर भी मेरे मलिन पड़े चेहरे की तरफ नहीं डाली. मेरी तकलीफ तुम्हें दिखाई ही नहीं दी. तुम ने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की कि मैं आज इतनी सुस्त क्यों हो रही हूं. तुम्हारे लिए मैं ने चाय बनाई मगर खाना बनाने की हिम्मत नहीं हुई. तुम्हें कुछ कहने का भी दिल नहीं किया. मैं जा कर सो गई और तुम ने रात में खाना न मिलने पर फिर से हंगामा कर दिया. मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए तुम थप्पड़ लगाने ही वाले थे मगर हाथ गरम देख कर रुक गए.

यह कैसा रिश्ता है हमारा, जहां पति को अपनी पत्नी की तकलीफ भी नहीं दिखती? यह बात अलग है कि अगले दिन से ही लौकडाउन हो गया और तुम मुझे चायब्रैड खिलाने के लिए घर में थे. मगर आज सोचती हूं कि यदि उस समय मुझे वायरल बुखार के बजाय कोरोना हुआ होता तो तुम मेरी क्या हालत करते.

3 अप्रैल 2020 :

इस दिन मैं ने तुम से बिना पूछे घर के परदे बदल दिए थे जिन्हें कुछ दिन पहले ही खरीदे थे. तुम ने उन पर सरसरी नजर डाली और कोने में पटक दिया. मुझ पर चिल्लाते हुए तुम ने कहा था,” इतने चटकीले रंग के परदे मेरे घर में नहीं लगेंगे.”

उस दिन मैं पूछना चाहती थी कि क्या यह घर केवल तुम्हारा है? मैं यहां मेहमान हूं? यह मेरा घर नहीं? मगर हमेशा की तरह मुझे तुम से कुछ भी पूछने या बताने की इच्छा नहीं हुई. मैं अपने कमरे में जा कर बैठ गई. मेरी आंखें छलछला आईं थीं मगर तुम अपने अहम के नशे में गुम थे.

26 अप्रैल 2020 :

याद करो उस दिन शाम 7 बजे मैं हंसतीमुसकराती अपनी सहेली से बातें कर के मुड़ी और तुम ने मेरे गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया. चीख पड़े थे तुम. मेरी गलती इतनी सी थी कि मैं ने अपनी सहेली से उस के पति की तारीफ कर दी थी. तुम्हारे अंदर जलन की आग ऐसी भड़की कि तुम ने आगेपीछे सोचे बगैर मुझ पर हाथ उठा दिया.

तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी तारीफ करती रहूं जबकि तुम मेरी खुशी की कोई कदर नहीं करते. मेरी सहेली विभा का पति हमेशा विभा की पसंद और उस की खुशी को तवज्जो देता है. ऐसे में मैं ने उस की तारीफ कर के क्या गलत कर दिया था?

2 मई 2020 :

इस दिन अपनी मां की शह पर तुम ने मेरी बांह मरोड़ दी. कई दिनों तक मैं इस दर्द से परेशान रही. वजह सिर्फ इतनी ही थी कि मैं तुम्हारे शर्ट की बटन टांकना भूल गई जबकि उस दिन तुम्हारी जूम मीटिंग थी. पर क्या इतनी सी बात पर तुम मेरे साथ इतना दुर्व्यवहार करोगे? लौकडाउन में तुम भी तो पूरे दिन घर में बैठे रहते हो. औफिस का काम तो मुश्किल से 3-4 घंटे करते हो बाकी समय कभी दोस्त, कभी टीवी तो क्या कभी बीवी का हाथ बंटाना जरूरी नहीं?

सच तो यह है कि तुम्हारे लिए दूसरी सभी चीजें महत्त्वपूर्ण हैं सिवाए हमारे रिश्ते के. तो फिर इस रिश्ते को ढोते रहने की मजबूरी कैसी? खत्म करते हैं न इस रिश्ते को.

5 मई 2020 :

इस दिन आप ने मेरी औकात समझाई थी. आप ने बताया था कि मुझे औरत होने का धर्म निभाना है. आप को एक बेटा देना है बेटी नहीं. बेटी की तो आप के जीवन में कोई अहमियत ही नहीं है. बेटा पैदा करना बस मेरे ही हाथ में तो है. कभीकभी तो मुझे शक होता है कि क्या वाकई आप पढ़ेलिखे हो? आप से बेहतर तो अनपढ़ हैं जो अपनी बिटिया को कंधों पर बैठाए दुनियाजहान घूम आते हैं. पर आप के लिए बेटी बोझ है. आप को तो सिर्फ बेटा चाहिए. जाने कैसी रूढ़िवादी मानसिकता में जकड़े हुए हो आप कि जब साथ चलती हूं तो एक अजीब सी जकड़न का एहसास होता है. अब आजादी चाहती हूं मैं आप से. आप की धौंस भरी बातों से, आप के पुरुषवादी व्यवहार से.

14 मई 2020 :

उस दिन शाम को सब्जी काटते हुए मेरा हाथ कट गया था. मेरे दाहिने हाथ में पट्टी बंधी थी मगर आप को कोई परवाह नहीं हुई कि मैं खाना कैसे बनाऊंगी. पिछले 2 महीने से मैं आप को पसंद की चीजें बनाबना कर खिला रही हूं न. फिर क्या आप एक दिन मेरे लिए कुछ बना नहीं सकते थे? बेशर्म हो कर मैं ने आप को कहा भी कि हैल्प कर दो तो आप ने कैसा धौंस भरा जवाब दिया था,” खाना बनाना औरतों का काम है. बता दो तुम से नहीं होता तो किसी और को रख लेता हूं.”

आप का जवाब सुन कर मैं बिलकुल चुप रह गई थी. आगे कुछ कहने को बचा ही नहीं था मेरे पास

मैं ने सोचा था कि लौकडाउन के इस समय में आप के साथ ज्यादा वक्त बिता पाऊंगी. ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकूंगी आप को. ज्यादा करीब आ पाऊंगी. मगर अफसोस, करीब आने के बजाय हमेशा के लिए दूर हो जाना चाहती हूं. क्योंकि लौकडाउन के इन दिनों में बेहतर ढंग से समझ लिया है.

मैं ऐसे शख्स के साथ कतई नहीं रह सकती जिस के लिए रिश्तों का कोई अर्थ नहीं. जो अपने जीवनसाथी की तकलीफ न समझ सके, उसे बराबरी का दरजा न दे सके उस की खुशियों का खयाल न कर सके, उस पर विश्वास भी न करे और न ही उसे अपनी जिंदगी में कोई अहमियत ही दे सके.

सुरेश बिस्तर पर लुढ़क गया. कागज छूट कर नीचे जा गिरा. उसे आज रोशनी भी चुभने लगी थी. उस ने जल्दी से अपने चेहरे को तकिए से ढंक लिया. आज पहली दफा किसी ने उसे आईना दिखाया था और अपनी सूरत देख कर उसे शर्म आ रही थी.

उसे सुजाता के साथ बिताए एकएक पल याद आने लगे थे. वे पल जब सुजाता को जीभर कर प्यार किया था उस ने. वे पल जब सुजाता के साथ ने जीवन आनंद से भर दिया था. उसे याद आ रहा था कैसे सुबह से शाम तक सुजाता उस के और घर के कामों में लगी रहती थी. सुजाता को तो हमेशा मुसकराने की आदत थी. तो क्या वाकई वह इतना स्वार्थी और घमंडी था जिस ने सुजाता की हंसी छीन ली?

सुरेश बारबार उस कागज में लिखी बातें पढ़ने लगा. उस में लिखी हर घटना उस की आंखों के आगे सजीव हो उठीं. वाकई सुजाता ने जो भी लिखा था वह 100% सही था. मगर जब घटनाएं हो रही थीं उस वक्त सुरेश ने कभी भी सुजाता की नजरों से नहीं सोचा था. सुजाता जो उस की जीवनसाथी है, कितनी दुखी थी और सुरेश को इस बात का अहसास भी नहीं था. उस ने कभी यह सोचा ही नहीं था कि सुजाता इस तरह सब कुछ छोड़ कर भी जा सकती है.

उसे तो सुजाता की आदत हो गई थी. उस के बिना घर में कितना अकेला हो जाएगा. एक छोड़ा हुआ पति कहलाएगा. दोस्त पीठ पीछे उस का मजाक उड़ाएंगे. ऐसी कितनी ही बातें सुरेश के जेहन में घूमने लगीं.

सुजाता के यों मुंह मोड़ने से उस की जिंदगी कितनी बदल जाएगी. पहले तलाक की भागदौड़ और परेशानियां और फिर सुजाता संपत्ति में से भी तो हिस्सा मांगेगी. उसे गुजाराभत्ता भी देना पड़ेगा. तलाक के बाद दूसरी शादी की टैंशन भी रहेगी.

सुरेश को अपना कुलीग विजय याद आया. तलाक के बाद बहुत मुश्किलों से उसे दूसरी दफा कोई ढंग की दुलहन मिल पाई थी. मगर वह भी फ्रौड निकली.

सुरेश सोफे के कोने में बैठ गया. एक सीधीसादी व पढ़ीलिखी पत्नी को गंवाने के बाद कहीं वह भी परेशानियों के भंवर में न फंस जाए. सुजाता में कोई कमी नहीं. यह तो सचमुच उस का खोखला घमंड था, पुरुषवादी रवैआ था जिस की वजह से उस की शादीशुदा जिंदगी बरबाद होने वाली थी.

सुरेश रातभर करवटें बदलता रहा. वह लगातार यही सोचता रहा कि सुजाता को तलाक न लेने के लिए कैसे राजी किया जाए.

अगले दिन सुबह उठते ही उस ने सुजाता को फोन लगाया और एक दफा मिलने की इच्छा जाहिर की. किसी तरह सुजाता तैयार हो गई. सुजाता का मायका आगरा में था. सुरेश ने सुबहसुबह बस ली और इलाहाबाद से आगरा के लिए रवाना हो गया. सुजाता ने उसे माल में मिलने बुलाया.

सुजाता का हाथ थाम कर सुरेश ने कहा,”बस एक मौका दे दो मुझे सुजाता. तुम्हारी हर शिकायत दूर कर दूंगा. तुम्हें खोने के एहसास ने ही मुझे मेरी औकात समझा दी है. सुजाता बस एक मौका दे दो अपने पति को. फिर जो चाहे कर लेना. तुम ने मुझे आईना दिखा दिया है. यकीन रखो मैं चेहरा बदल लूंगा. बस तुम्हारा साथ नहीं खो सकता.”

सुजाता ने सोचा भी नहीं था कि सुरेश इस तरह उस से माफी मांगेगा.

“एक मौका तो हर अपराधी को दिया जाता है. आप को भी दे दूंगी. पर ध्यान रखना, मौके बारबार नहीं मिलते.” मुसकराते हुए सुजाता ने कहा तो सुरेश ने बढ़ कर उसे गले से लगा लिया. सुजाता के द्वारा भेजे गए नोटिस ने उस की जिंदगी की दिशा ही बदल दी थी. सुरेश को सबक मिल चुका था कि वह तुलसीदास की रामचरित मानस की चौपाइयों पर भरोसा करके सुखी जिंदगी नहीं जी सकता. सुजाता उन में से नहीं है जो सिर पर पल्लू ढांक कर प्रवचनकर्ताओं की ऊलजलूल बातें मान ले. वह एक बराबरी का हक रखने वाली पत्नी है, ताड़न की अधिकारी नहीं.

देर आए दुरुस्त आए

रात का 1 बज रहा था. स्नेहा अभी तक घर नहीं लौटी थी. सविता घर के अंदर बाहर बेचैनी से घूम रही थी. उन के पति विनय अपने स्टडीरूम में कुछ काम कर रहे थे, पर ध्यान सविता की बेचैनी पर ही था. विनय एक बड़ी कंपनी में सीए थे. वे उठ कर बाहर आए. सविता के चिंतित चेहरे पर नजर डाली. कहा, ‘‘तुम सो जाओ, मैं जाग रहा हूं, मैं देख लूंगा.’’

‘‘कहां नींद आती है ऐसे. समझासमझा कर थक गई हूं. स्नेहा के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. क्या करूं?’’

तभी कार रुकने की आवाज सुनाई दी. स्नेहा कार से निकली. ड्राइविंग सीट पर जो लड़का बैठा था, उसे झुक कर कुछ कहा, खिलखिलाई और अंदर आ गई. सविता और विनय को देखते ही बोली, ‘‘ओह, मौम, डैड, आप लोग फिर जाग रहे हैं?’’

‘‘तुम्हारे जैसी बेटी हो तो माता पिता ऐसे ही जागते हैं, स्नेहा. तुम्हें हमारी हैल्थ की भी परवाह नहीं है.’’

‘‘तो क्या मैं लाइफ ऐंजौय करना छोड़ दूं? मौम, आप लोग जमाने के साथ क्यों नहीं चलते? अब शाम को 5 बजे घर आने का जमाना नहीं है.’’

‘‘जानती हूं, जमाना रात के 1 बजे घर आने का भी नहीं है.’’

‘‘मुझे तो लगता है पेरैंट्स को चिंता करने का शौक होता है. अब गुडनाइट, आप का लैक्चर तो रोज चलता है,’’ कहते हुए स्नेहा गुनगुनाती हुई अपने बैडरूम की तरफ बढ़ गई.

सविता और विनय ने एकदूसरे को चिंतित और उदास नजरों से देखा. विनय ने कहा, ‘‘चलो, बहुत रात हो गई. मैं भी काम बंद कर के आता हूं, सोते हैं.’’

सविता की आंखों में नींद नहीं थी. आंसू भी बहने लगे थे, क्या करे, इकलौती लाडली बेटी को कैसे समझाए, हर तरह से समझा कर देख लिया था. सविता ठाणे की खुद एक मशहूर वकील थीं.

उन के ससुर सुरेश रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे. घर में 4 लोग थे. स्नेहा को घर में हमेशा लाड़प्यार ही मिला था. अच्छी बातें ही सिखाई गई थीं पर समय के साथ स्नेहा का लाइफस्टाइल चिंताजनक होता गया था. रिश्तों की उसे कोई कद्र नहीं थी. बस लाइफ ऐंजौय करते हुए तेजी से आगे बढ़ते जाना ही उस की आदत थी. कई लड़कों से उस के संबंध रह चुके थे. एक से ब्रेकअप होता, तो दूसरे से अफेयर शुरू हो जाता. उस से नहीं बनती तो तीसरे से दोस्ती हो जाती. खूब पार्टियों में जाना, डांसमस्ती करना, सैक्स में भी पीछे न हटने वाली स्नेहा को जबजब सविता समझाने बैठीं दोनों में जम कर बहस हुई. सुरेश स्नेहा पर जान छिड़कते थे. उन्होंने ही लंदन बिजनैस स्कूल औफ कौमर्स से उसे शिक्षा दिलवाई. अब वह एक लौ फर्म में ऐनालिस्ट थी. सविता और विनय के अच्छे पारिवारिक मित्र अभय और नीता भी सीए थे और उन का इकलौता बेटा राहुल एक वकील.

एक जैसा व्यवसाय, शौक और स्वभाव ने दोनों परिवारों में बहुत अच्छे संबंध स्थापित कर दिए थे. राहुल बहुत ही अच्छा इनसान था. वह मन ही मन स्नेहा को बहुत प्यार करता था पर स्नेहा को राहुल की याद तभी आती थी जब उसे कोई काम होता था या उसे कोई परेशानी खड़ी हो जाती थी. स्नेहा के एक फोन पर सब काम छोड़ कर राहुल उस के पास होता था.

सविता और विनय की दिली इच्छा थी कि स्नेहा और राहुल का विवाह हो जाए पर अपनी बेटी की ये हरकतें देख कर उन की कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि वे इस बारे में राहुल से बात भी करें, क्योंकि स्नेहा के रंगढंग राहुल से छिपे नहीं थे. पर वह स्नेहा को इतना प्यार करता था कि उस की हर गलती को मन ही मन माफ करता रहता था. उस के लिए प्यार, केयर, मानवीय संवेदनाएं बहुत महत्त्व रखती थीं पर स्नेहा तो इन शब्दों का अर्थ भी नहीं जानती थी.

समय अपनी रफ्तार से चल रहा था. स्नेहा अपनी मरजी से ही घर आतीजाती.  विनय और सविता के समझाने का उस पर कोई असर नहीं था. जब भी दोनों कुछ डांटते, सुरेश स्नेहा को लाड़प्यार कर बच्ची है समझ जाएगी कह कर बात खत्म करवा देते. वे अब बीमार चल रहे थे. स्नेहा में उन की जान अटकी रहती थी. अपना अंतिम समय निकट जान उन्होंने अपना अच्छा खासा बैंक बैलेंस सब स्नेहा के नाम कर दिया.

एक रात सुरेश सोए तो फिर नहीं जागे. तीनों बहुत रोए, बहुत उदास हुए, कई दिनों तक रिश्तेदारों और परिचितों का आनाजाना लगा रहा. फिर धीरेधीरे सब का जीवन सामान्य होता गया. स्नेहा अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई. वैसे भी किसी भी बात को, किसी भी रिश्ते को गंभीरतापूर्वक लेने का उस का स्वभाव था ही नहीं. अब तो वह दादा के मोटे बैंक बैलेंस की मालकिन थी. इतना खुला पैसा हाथ में आते ही अब वह और आसमान में उड़ रही थी. सब से पहले उस ने मातापिता को बिना बताए एक कार खरीद ली.

सविता ने कहा, ‘‘अभी से क्यों खरीद ली? हमें बताया भी नहीं?’’

‘‘मौम, मुझे मेरी मरजी से जीने दो. मैं लाइफ ऐंजौय करना चाहती हूं. रात में मुझे कभी कोई छोड़ता है, कभी कोई. अब मैं किसी पर डिपैंड नहीं करूंगी. दादाजी मेरे लिए इतना पैसा छोड़ गए हैं, मैं क्यों अपनी मरजी से न जीऊं?’’

विनय ने कहा, ‘‘बेटा, अभी तुम्हें ड्राइविंग सीखने में टाइम लगेगा, पहले मेरे साथ कुछ प्रैक्टिस कर लेती.’’

‘‘अब खरीद भी ली है तो प्रैक्टिस भी हो जाएगी. ड्राइविंग लाइसैंस भी बन गया है. आप लोग रिलैक्स करना सीख लें, प्लीज.’’

अब तो रात में लौटने का स्नेहा का टाइम ही नहीं था. कभी भी आती, कभी भी जाती. सविता ने देखा था वह गाड़ी बहुत तेज चलाती है. उसे टोका, ‘‘गाड़ी की स्पीड कम रखा करो. मुंबई का ट्रैफिक और तुम्हारी स्पीड… बहुत ध्यान रखना चाहिए.’’

‘‘मौम, आई लव स्पीड, मैं यंग हूं, तेजी से आगे बढ़ने में मुझे मजा आता है.’’

‘‘पर तुम मना करने के बाद भी पार्टीज में ड्रिंक करने लगी हो, मैं तुम्हें समझा कर थक चुकी हूं, ड्रिंक कर के ड्राइविंग करना कहां की समझदारी है? किसी दिन…’’

‘‘मौम, मैं भी थक गई हूं आप की बातें सुनतेसुनते, जब कुछ होगा, देखा जाएगा,’’ पैर पटकते हुए स्नेहा कार की चाबी उठा कर घर से निकल गई.

सविता सिर पकड़ कर बैठ गईं. बेटी की हरकतें देख वे बहुत तनाव में रहने लगी थीं. समझ नहीं आ रहा था बेटी को कैसे सही रास्ते पर लाएं.

एक दिन फिर स्नेहा ने किसी पार्टी में खूब शराब पी. अपने नए बौयफ्रैंड विक्की के साथ खूब डांस किया, फिर विक्की को उस के घर छोड़ने के लिए लड़खड़ाते हुए ड्राइविंग सीट पर बैठी तो विक्की ने पूछा, ‘‘तुम कार चला पाओगी या मैं चलाऊं?’’

‘‘डोंट वरी, मुझे आदत है,’’ स्नेहा नशे में डूबी गाड़ी भगाने लगी, न कोई चिंता, न कोई डर.

अचानक उस ने गाड़ी गलत दिशा में मोड़ ली और सामने से आती कार को भयंकर टक्कर मार दी. तेज चीखों के साथ दोनों कारें रुकीं. दूसरी कार में पति ड्राइविंग सीट पर था, पत्नी बराबर में और बच्चा पीछे. चोटें स्नेहा को भी लगी थीं. विक्की हकबकाया सा कार से नीचे उतरा. उस ने स्नेहा को सहारा दे कर उतारा. स्नेहा के सिर से खून बह रहा था. दोनों किसी तरह दूसरी कार के पास पहुंचे तो स्नेहा की चीख से वातावरण गूंज उठा. विक्की ने भी ध्यान से देखा तो तीनों खून से लथपथ थे. पुरुष शायद जीवित ही नहीं था.

विक्की चिल्लाया, ‘‘स्नेहा, शायद कोई नहीं बचा है. उफ, पुलिस केस हो जाएगा.’’

स्नेहा का सारा नशा उतर चुका था. रोने लगी, ‘‘विक्की, प्लीज, हैल्प मी, क्या करें?’’

‘‘सौरी स्नेहा, मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा. प्लीज, कोशिश करना मेरा नाम ही न आए. मेरे डैड बहुत नाराज होंगे, सौरी, मैं जा रहा हूं.’’

‘‘क्या?’’ स्नेहा को जैसे तेज झटका लगा, ‘‘तुम रात में इस तरह मुझे छोड़ कर जा रहे हो?’’

विक्की बिना जवाब दिए एक ओर भागता चला गया. सुनसान रात में अकेली, घायल खड़ी स्नेहा को हमेशा की तरह एक ही नाम याद आया, राहुल. उस ने फौरन राहुत को फोन मिलाया. हमेशा की तरह राहुल कुछ ही देर में उस के पास था. स्नेहा राहुल को देखते ही जोरजोर से रो पड़ी. स्नेहा डरी हुई, घबराई हुई चुप ही नहीं हो रही थी.

राहुल ने उसे गले लगा कर तसल्ली दी, ‘‘मैं कुछ करता हूं, मैं हूं न, तुम पहले हौस्पिटल चलो, तुम्हें काफी चोट लगी है, लेकिन उस से पहले भी कुछ जरूरी फोन कर लूं,’’ कह उस ने अपने एक पुलिस इंस्पैक्टर दोस्त राजीव और एक डाक्टर दोस्त अनिल को फोन कर तुरंत आने के लिए कहा.

अनिल ने आकर उन 3 लोगों का मुआयना किया. तीनों की मृत्यु हो चुकी थी. सब सिर पकड़ कर बैठ गए. स्नेहा सदमें में थी. उस पर केस तो दर्ज हो ही चुका था. उसे काफी चोटें थीं तो पहले तो उसे ऐडमिट किया गया.

सरिता और विनय भी पहुंच चुके थे. स्नेहा मातापिता से नजरें ही नहीं मिला पा रही थी. कई दिन पुलिस, कोर्टकचहरी, मानसिक और शारीरिक तनाव से स्नेहा बिलकुल टूट चुकी थी. उस की जिंदगी जैसे एक पल में ही बदल गई थी. हर समय सोच में डूबी रहती. उस के लाइफस्टाइल के कारण 3 लोग असमय ही दुनिया से जा चुके थे. वह शर्मिंदगी और अपराधबोध की शिकार थी. 1-1 गलती याद कर, बारबार अपने मातापिता और राहुल से माफी मांग रही थी. राहुल और सविता ने ही उस का केस लड़ा. रातदिन एक कर दिया. भारी जुर्माने के साथ स्नेहा को थोड़ी आजादी की सांस लेने की आशा दिखाई दी. रातदिन मानसिक दबाव के कारण स्नेहा की तबीयत बहुत खराब हो गई. उसे हौस्पिटल में ऐडमिट किया गया. अभी तो ऐक्सिडैंट की चोटें भी ठीक नहीं हुई थीं. उस की जौब भी छूट चुकी थी. पार्टियों के सब संगीसाथी गायब थे. बस राहुल रातदिन साए की तरह साथ था. हौस्पिटल के बैड पर लेटेलेटे स्नेहा अपने बिखरे जीवन के बारे में सोचती रहती. कार में 3 मृत लोगों का खयाल उसे नींद में भी घबराहट से भर देता. कोर्टकचहरी से भले ही सविता और राहुल ने उसे जल्दी बचा लिया था पर अपने मन की अदालत से वह अपने गुनाहों से मुक्त नहीं हो पा रही थी.

विनय, सविता, राहुल और उस के मम्मीपापा अभय और नीता भी अपने स्नेह से उसे सामान्य जीवन की तरफ लाने की कोशिश कर रहे थे. अब उसे सहीगलत का, अच्छेबुरे रिश्तों का, भावनाओं का, अपने मातापिता के स्नेह का, राहुल की दोस्ती और प्यार का एहसास हो चुका था.

एक दिन जब विनय, सविता, अभय और नीता चारों उस के पास थे, बहुत सोचसमझ कर उस ने अचानक सविता से अपना फोन मांग कर राहुल को फोन किया और आने के लिए कहा.

हमेशा की तरह राहुल कुछ ही देर में उस के पास था. स्नेहा ने उठ कर बैठते हुए राहुल का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘इस बार तुम्हें किसी काम से नहीं, सब के सामने बस इतना कहने के लिए बुलाया है, आई एम सौरी फौर ऐवरीथिंग, आप सब मुझे माफ कर दें और राहुल, तुम कितने अच्छे हो,’’ कह कर रोतेरोते स्नेहा ने राहुल के गले में बांहें डाल दीं तो राहुल वहां उपस्थित चारों लोगों को देख कर पहले तो शरमा गया, फिर हंस कर स्नेहा को अपनी बांहों के सुरक्षित घेरे में ले कर अपने मातापिता, फिर विनय और सविता को देखा तो बहुत दिनों बाद सब के चेहरे पर एक मुसकान दिखाई दी, सब की आंखों में अपनी इच्छा पूरी होने की खुशी साफसाफ दिखाई दे रही थी.

फेयरवैल : शनाया और रागिनी ने रुचि को क्या समझाया?

शनाया को नए पीजी में कुछ दिन तो थोड़ा अजीब लगा पर अब उसे काफी अच्छा लगने लगा था. चारों लड़कियों प्रीति, रुचि, रागिनी और आईना के साथ उस की बहुत अच्छी बनती थी. बस, श्वेता थोड़ा मूडी थी. वह कभी तो बहुत अच्छा व्यवहार करती, लेकिन कभीकभी बिना वजह छोटी सी बात का बतंगड़ बना देती.

रुचि के पास एक कार थी. कभीकभी सभी सहेलियां उसी कार से रात को डिस्को चली जाती थीं. आज भी अचानक ऐसे ही प्लान बन गया. शनाया पहले कभी रात को घर से बाहर नहीं निकलती थी. मम्मी ने उसे सख्ती से मना किया था. बस, पीजी से औफिस और औफिस से पीजी आनाजाना ही होता था. यही शनाया का रूटीन था, पर इस नए पीजी में आने के बाद शनाया में काफी बदलाव आ गया था. वह अपने लुक्स और पहनावे को ले कर सजग हो रही थी.

वह नएनए डांस स्टैप्स भी सीख रही थी. उस ने सभी लड़कियों को नईनई पत्रिकाएं पढ़ने का शौक लगा दिया था.

आज श्वेता का मूड भी काफी अच्छा था. डिस्को जाने के लिए वह हमेशा तैयार रहती थी. डिस्को में बार भी था, जहां श्वेता ने पांचों के लिए बियर और्डर की.

शनाया ने साफ मना कर दिया. बहुत जोर देने पर रुचि और प्रीति ने श्वेता का साथ दिया, पर श्वेता ने थोड़ी देर में एक के बाद एक कई पैग चढ़ा लिए. बड़ी मुश्किल से श्वेता को घर वापस लौटने के लिए मनाया गया.

ये सब शनाया और रागिनी को बिलकुल पसंद नहीं आया. रागिनी ने प्रीति और रुचि को भी समझाया कि अलकोहल लेना गलत है. आगे से ऐसी गलती न करे. अगर श्वेता जिद करती है तो ना कहना सीखे.

ये बातें श्वेता के कानों में भी पड़ीं और इस पर बुरी तरह बहस हुई. श्वेता ने पांचों को खूब बुराभला कहा. खैर, कुछ ही दिन में सब सामान्य हो गया. शनाया ने श्वेता को किसी से फोन पर बात करते हुए सुना था, ‘तुम मेरे लिए एक अच्छा फ्लैट ढूंढ़ दो. यहां तो कंपनी ही बेकार है. पांचों लड़कियां जाहिल हैं.’

शनाया ने बात को बढ़ाना उचित नहीं समझा पर उस की फैमिली के बारे में जरूर पूछा. प्रीति ने बताया कि उस के पिता विधायक हैं. इस से ज्यादा कोई भी नहीं जानता था. वह प्रौपर्टी डीलर के जरिए आ पाई थी. ‘मकानमालिक ने वैरिफिकेशन तो कराया ही होगा,’ पता नहीं क्यों शनाया गहराई से सोच रही थी.

मकानमालिक ने वैसे तो सीसीटीवी कैमरे लगा रखे थे, लेकिन वह लड़कियों को कुछ कहते नहीं थे. वे रहते भी काफी दूर थे. बस, महीने बाद किराया वसूलने आते थे.

एक दिन खुशगवार मौसम देख कर श्वेता ने कुछ निकाला. पैकेट देख कर शनाया समझ गई कि यह ड्रग्स है, ‘‘किसी को ट्राई करना हो तो कर सकता है,’’ श्वेता ने रुचि को कहा.

‘‘यार, यह तो गैरकानूनी है. दिस इस वैरी बैड,’’ शनाया ने कह ही दिया. बस, श्वेता को चुप कराना मुश्किल हो गया. अगले दिन पांचों लड़कियों ने श्वेता से साफसाफ कह दिया, ‘‘देखो श्वेता, अलकोहल तक तो ठीक है लेकिन ये सब हम बरदाश्त नहीं करेंगे. आगे से ऐसा मत करना वरना कहीं और रहने का इंतजाम कर लो.’’

श्वेता ने नया फ्लैट देख लिया था. जाने से पहले पांचों ने श्वेता को फेयरवैल देने की योजना बनाई. केक काटने के बाद सब जम कर नाचे. श्वेता की जिद पर सब ने हलकेहलके पैग लिए. खूब मस्ती कर सब सो गए. अगली सुबह श्वेता अपना सामान ले कर चली गई. मांगने पर भी उस ने उन को एड्रैस नहीं बताया.

अब सबकुछ सामान्य था. शनाया भी काफी खुश रहती थी. अचानक एक दिन एक छोटा सा वीडियो शनाया को किसी ने भेजा. वीडियो देख कर वह स्तब्ध रह गई. वे पांचों हाथों में गिलास ले कर नाच रही थीं. उन के कपड़े भी बेहद अस्तव्यस्त थे. वैसे भी लड़कियों के फ्लैट में कपड़ों का खयाल रखता कौन है. उन के अंग साफ दिख रहे थे.

श्वेता जाहिर है, वीडियो शूट कर रही थी. पांचों लड़कियां जैसे गश खा कर गिरीं लगभग 10-15 दिन रोनेधोने के बाद उन्होंने श्वेता को खोज लिया.

‘‘देखो, किसी फ्रैंड ने यह अपलोड किया है. तुम लोग चाहो तो खुशी से साइबर पुलिस से शिकायत करो,’’ श्वेता बोली. वह बेहद चालाक थी. उस ने साइबर पुलिस को भी बताया कि वह वीडियोज फ्रैंड्स को शेयर करती रहती है. उस का फोन भी हरवक्त उस के पास नहीं रहता. इसलिए कैसे, क्या हुआ, वह नहीं बता सकती.

श्वेता तो साफ बच निकली पर इन पांचों को फेयरवैल का गिफ्ट जरूर दे गई. खैर, पांचों ने इस शहर को छोड़ कर अन्य किसी शहर में नौकरी करने में ही अपनी भलाई समझी.

पुलिस बन रही अलग पावर सैंटर, लोगों का खो रहा विशवास

विधायक और बाहुबली मुख्तार अंसारी को जब जेल में रखा गया तो उस ने लिखित में शिकायत की थी कि उस को धीमा जहर दिया जा रहा है. इस के कुछ दिनों में जब उस की तबीयत खराब हुई तो जेल में ही उस को हार्ट अटैक आ गया, जिस से वह मर गया. मुख्तार अंसारी के परिवार वाले खुल कर कह रहे हैं कि उस को धीमा जहर दिया जा रहा था. अब कई तरह की जांचें शुरू हो गई हैं. इन के पूरा होने पर ही पता चल सकेगा कि क्या सच है. उत्तर प्रदेश में इस के पहले विकास दुबे और अतीक अहमद के साथ इस तरह की घटनाएं घट चुकी हैं.

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को सुधारने में पुलिस का प्रयोग जिस तरह से हुआ उस से कामकाज में पुलिस की धमक बढ़ गई. मित्र पुलिस की छवि यहां दबंग की बन गई है. पुलिस के जवान सिंघम जैसे दिखने लगे हैं. आम आदमी के लिए उस का व्यवहार मित्र जैसा नहीं है. पहले की सरकारों के शासन के दौरान नेता और विधायक का दबाव होने के कारण जनता की सुनवाई हो जाती थी. इस दौर में अफसरों के अलावा पुलिस किसी दबाव में नहीं है, जिस से वह मनमानी करने लगी है.

रिटायर डीपीपी सुलखान सिंह कहते हैं कि जब उत्तर प्रदेश में पुलिस जब फर्जी मुठभेड़ कर सकती है तो माफिया मुख्तार अंसारी को जहर क्यों नहीं दिया जा सकता. मसले की सीबीआई से जांच होनी चाहिए. जनता जिस तरह से जाति और धर्म को ले कर उलझी है, उस में पुलिस के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है.

हिरासत में मौत के मामलों में यूपी नंबर वन

लोकसभा में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पेश की गई रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में हर दिन 6 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हो रही है. इस मामले में पिछले 2 वर्षों से उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है. पुलिस सुधार को ले कर लंबे समय से बहस चल रही है, इस के बाद भी हिरासत में होने वाली मौतों का आंकड़ा कम नहीं हो रहा.
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से लोकसभा में पेश किए गए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 2 वर्षों में हिरासत में होने वाली कुल मौतों की संख्या 4,484 है. हिरासत में मौत के मामलों में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है और पश्चिम बंगाल दूसरे पर.

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि अकेले उत्तर प्रदेश में 2021-22 में हिरासत में कुल 501 मौतें हुईं जबकि इस से पहले यानी 2020-21 में हिरासत में मौत के 451 मामले दर्ज किए गए. यूपी के बाद पश्चिम बंगाल और फिर मध्य प्रदेश का नंबर आता है. वहीं देश भर में 2021-22 में हिरासत में हुई मौतों का आंकड़ा 2,544 है जबकि 2020-21 में यह संख्या 1,940 थी.

खाता न बही पुलिस जो कहे वही सही

पुलिस कई बार कुछ मामलों में अभियुक्तों को हिरासत में लेती है और उन से बिना कोर्ट की रिमांड के भी पूछताछ करती है. हालांकि संवैधानिक रूप से उसे 24 घंटे के भीतर अभियुक्त को किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है लेकिन कई बार पुलिसकर्मी अभियुक्तों से थाने पर ही पूछताछ करते हैं और रिकौर्ड में दर्ज ही नहीं करते. इस पूछताछ के दौरान अकसर बल प्रयोग भी किया जाता है और कई बार अभियुक्तों की मौत हो जाती है.

पुलिस हिरासत में उत्पीड़न और मौत के मामलों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने चिंता जताते कहा था कि “संवैधानिक रक्षा कवच के बावजूद अभी भी पुलिस हिरासत में शोषण, उत्पीड़न और मौत होती है. इस के चलते पुलिस थानों में ही मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका बढ़ जाती है. पुलिस जब किसी को हिरासत में लेती है तो उस व्यक्ति को तत्काल कानूनी मदद नहीं मिलती है. गिरफ्तारी के बाद ही अभियुक्त को यह डर सताने लगता है कि आगे क्या होगा.”

सुप्रीम कोर्ट ने साल 1996 में एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि हिरासत में हुई मौत कानून के शासन में सब से जघन्य अपराध है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हिरासत में हुई मौतों का विवरण दर्ज करने के साथसाथ संबंधित लोगों को इस की जानकारी देना भी अनिवार्य बना दिया गया. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी के दौरान पुलिस के व्यवहार को ले कर भी नियम निर्धारित कर दिए. ये नियम न सिर्फ पुलिस पर बल्कि रेलवे, सीआरपीएफ, राजस्व विभाग सहित उन तमाम सुरक्षा एजेंसियों पर भी लागू होते हैं जो अभियुक्तों को पूछताछ के लिए गिरफ्तार कर सकती हैं.

हिरासत में मौत के खिलाफ है कानून

सभ्य समाज में हिरासत में मौत शायद सब से खराब अपराधों में से एक है. भारत में हिरासत में होने वाली मौतों के बारे में मानवाधिकार आयोग ने साल 2021-22 में 28 फरवरी, 2022 तक न्यायिक हिरासत में 2,152 मौतें हुईं और पुलिस हिरासत में 155 मौतें हुईं. 26 जुलाई, 2022 को लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने खुलासा किया कि 2020-21 से 2021-22 की अवधि के दौरान भारत में हिरासत में मौत के 4,484 मामले सामने आए.

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 176 (आई) में कहा गया है कि यदि हिरासत में कोई व्यक्ति मर जाता है या गायब हो जाता है या हिरासत में किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जांच का आदेश देने की शक्ति है. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 46 में कहा गया है कि पुलिस गिरफ्तारी करते समय किसी की हत्या नहीं कर सकती. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 330 (ए) और (बी) यातना के मामलों में पुलिसकर्मियों को 7 साल तक की सजा का प्रावधान है.

18 दिसंबर, 1996 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में एक खास फैसला सुनाया. इस में हिरासत में लगातार होने वाली मौतों के मुद्दे की जांच करने, गिरफ्तारी के दौरान पालन किए जाने वाले दिशा निर्देश बनाने और हिरासत में यातना या मौत के मामले में पीड़ितों परिवारों को प्रदान किए जाने वाले मुआवजे को तैयार करने का अनुरोध किया गया. फैसले में अदालत ने 11 दिशानिर्देश सुझाए जिन में हिरासत में लिए गए व्यक्ति की मृत्यु के मामले में गिरफ्तारी प्रक्रियाओं और मुआवजे को शामिल किया गया था.

हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों में अब पुलिस को सजा भी होने लगी है. इस के बाद भी पुलिस एक पावर सैंटर के रूप में उभर रही है, जो खतरनाक है. इस से न्याय प्रभावित होता है. संविधान ने पुलिस को केवल विवेचक की जिम्मेदारी दी है. पुलिस अब न्याय देने का ही नहीं, पावर सैंटर बनने का काम भी करने लगी है.

गरीब की बीबी सब की जोरू

हिरासत में मौत का सब से बड़ा कारण न्याय व्यवस्था का आम लोगों से दूर होना है. उस में खामियों की वजह से भी हिरासत में मौत के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. असल में न्याय प्रणाली आम नागरिकों के लिए सुलभ नहीं है. संविधान में चाहे जितनी व्यवस्था हो और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश हों लेकिन आम आदमी अब भी उस की पहुंच से दूर है. हिरासत में मौत के मामलों में ज्यादातर गरीब, पिछड़े और शोषित वर्ग के लोग ही शिकार होते हैं. अमीर लोगों से पुलिस आमतौर पर इस स्तर पर पूछताछ नहीं करती है क्योंकि उसे कानून का डर रहता है.

ऊंची पहुंच वालों को पुलिस वाले न तो मारपीट पाते हैं और न ही उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रख सकते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह गैरकानूनी है और अदालत के पचड़े में आ जाएंगे. गरीब और कम पढ़ा लिखा तबका यह नहीं जानता. गिरफ्तारी के संबंध में संविधान में पर्याप्त सुरक्षा उपाय दिए गए हैं लेकिन पुलिस व्यवस्था की घिसीपिटी परंपरा आज भी नागरिकों के अनुकूल नहीं बन पाई. व्यापक तौर पर पुलिस सुधार की जरूरत है अन्यथा देश एक पुलिस राज्य में तबदील हो जाएगा क्योंकि राज्य सरकारों का अकसर पुलिस को समर्थन रहता है और सरकार पुलिस को बचाती भी है.

कोख मेरी, बच्चा मेरा, फैसला किसी और का क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पौपुलेशन फंड ( UNFPA ) ने यह पता लगाने की कोशिश की कि महिलाओं के खुद के शरीर के बारे में फैसले लेने की क्षमता कितनी है. रिपोर्ट के मुताबिक 57 विकासशील देशों में रहने वाली करीब 50 परसेंट महिलाओं के पास अपने शरीर को ले कर लिए जाने वाले फैसले ( जैसे गर्भनिरोधक, स्वास्थ्य सुविधा आदि ) लेने का कोई अधिकार नहीं होता. केवल 55 फीसद महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य देखभाल, गर्भनिरोधक और सैक्स के दौरान हां या न कहने के लिए सशक्त हैं.

भारत के संदर्भ में UNFPA की रिपोर्ट बताती है कि केवल 12% शादीशुदा महिलाएं जिन की उम्र 15 से 49 के बीच है वे स्वतंत्र रूप से अपनी स्वास्थ्य सेवा के बारे में निर्णय लेती हैं जबकि 63% अपने जीवनसाथी से परामर्श ले कर ये फैसले करती हैं. हर 10 में से एक महिला का पति ही गर्भनिरोधक के बारे में फैसला लेता है. वहीं महिलाओं को गर्भनिरोधक के बारे में दी जाने वाली जानकारी भी सीमित होती है. सिर्फ 47 फीसद महिलाएं ही जो गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करती हैं उस के साइड इफैक्ट्स के बारे में जानती हैं.

महिलाओं के लिए ही समाज ये तय करता है कि उन्हें किस तरह बोलना है, कब कितनी जबान खोलनी है, किस तरह के कपड़े पहनने से वे संस्कारी कहलाएंगी और उन के अपने शरीर से जुड़े फैसले भी यह समाज ही लेता है. ये वो तमाम बातें हैं जिस बारे में महिलाएं एक इंसान होने के नाते खुद ही निर्णय ले सकती हैं मगर समाज ने इन की भी परमिशन नहीं दी है.

समाज और कानून पुरजोर कोशिश में लगा रहता है कि महिलाओं, उन के विचारों और उन के शरीर को चारदीवारी में कैद कैसे किया जाए. इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं ऐसी बंधुआ मजदूर हैं जो सब की खुशी के लिए सब कुछ करती हैं मगर अपनी खुशी के लिए कुछ नहीं कर सकती.

रिप्रोडक्टिव कोअर्शन : स्त्री के हक पर शिकंजा

बहुत सी लड़कियां जो अभी मां बनने के लिए तैयार नहीं और अबौर्शन कराना चाहती है मगर घरवालों के दवाब में आ कर वह ऐसा नहीं कर पाती. इसी तरह कोई लड़की जो बच्चे को जन्म देना चाहती है उसे ससुरालवालों के कहने पर अबौर्शन कराना पड़ता है क्योंकि उस के गर्भ में लड़की है और घरवाले लड़की नहीं लड़का चाहते हैं. ऐसी बातें अकसर सुनने को मिलती हैं. जो दुल्हन दोतीन साल प्रैग्नैंट होना नहीं चाहती, उसे जबरदस्ती उस की ड्यूटी याद दिलाते हुए ऐसा करने को बाध्य किया जाता है.

गर्भधारण करना है, नहीं करना है, अबौर्शन करवाना है, कब मां बनना है जैसे फैसलों में औरतों की मर्जी की अहमियत नहीं होती है. यह फैसले या तो पति को करता है या ससुराल के अन्य सदस्य. जबकि कोख लड़की का है, बच्चे को उसे अपने शरीर में बड़ा करना है, बच्चा पैदा करने और पालने की तकलीफ उसे सहनी है मगर इन सब से जुड़े फैसले कोई और करता है. इस तरह गर्भधारण से जुड़े फैसलों को प्रभावित करना और इस के लिए जबरदस्ती करना रिप्रोडक्टिव कोअर्शन यानी प्रजनन संबंधी हिंसा की श्रेणी में आता है.

क्या है रिप्रोडक्टिव कोअर्शन

महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में हस्तक्षेप करना रिप्रोडक्टिव कोअर्शन कहलाता है. यह कई प्रकार का होता है. मान लीजिए किसी महिला को गर्भधारण करने के लिए बाध्य किया गया हो तो इसे प्रैगनैंसी कोअर्शन कहते हैं. प्रैगनैंसी कोअर्शन में जबरन गर्भवती करना या किसी को गर्भधारण न करने देना दोनों ही तरह के मामले शामिल होते हैं. कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जिन में अनचाही प्रैगनैंसी को थोपा जाता है. गर्भनिरोधक के तरीकों के साथ औरत की जानकारी के बिना छेड़छाड़ करना भी रिप्रोडक्टिव कोअर्शन ही होता है. इस के तहत अकसर गर्भनिरोधक गोलियों को किसी सामान्य गोली से बदल दिया जाता है. संबंध के दौरान कंडोम पहनने से मना करना, महिला को फिजिकल होने के लिए विवश करना रिप्रोडक्टिव कोअर्शन के ही रूप हैं.

वहीं कई मामलों में इस का उल्टा भी होता है. महिला से बिना पूछे बगैर या धोखे से उसे गर्भनिरोधक गोलियां खिला कर या औपरेशन कर जबरन अबौर्शन कराया जाता है. अगर परिवार नियोजन करना भी है को इस का पूरा भार हमारे देश में महिलाओं पर ही थोप दिया जाता है. पुरुषों में आज भी नसबंदी को ले कर यह मिथ्या बेहद प्रचलित है कि नसबंदी से वह नपुंसकता का शिकार हो सकते हैं.

दुनिया की आधी आबादी यानी कि औरतों के साथ होने वाली हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है. सदियों से औरतों को पुरुषों के मुकाबले कमतर आंका जाता रहा है. उन्हें अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने तक के अधिकारों से वंचित रखा जाता रहा है. उस के साथ हिंसा और अत्याचार किया जाता रहा है. आज रिप्रोडक्टिव कोअर्शन औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा का ही एक रूप है जहां उसे अपने बदन के अधिकार से ही वंचित किया जाता है.

जब औरतें पार्टनर या घरवालों द्वारा जबरन थोपे जा रहे प्रैगनैंसी से जुड़े फैसलों को मानने से इनकार करती हैं तो उन के साथ मारपीट की जाती है. उन्हें तलाक देने, रिश्ता खत्म करने या घर से निकालने तक की धमकी दी जाती है. रिश्ता टूटने के डर से वह बात मानने को मजबूर होती है.

साल 2019 में उत्तर प्रदेश के 49 जिलों में की गई एक रिसर्च की मानें तो इस में शामिल लगभग 12% औरतों ने रिप्रोडक्टिव कोअर्शन झेला था. इन में से 42% औरतें ऐसी थीं जिन के साथ रिप्रोडक्टिव कोअर्शन उन के पति ने किया है. वहीं 48% महिलाओं के साथ ससुरालवालों ने ऐसा किया.

हमारे देश में बेटे की चाहत रिप्रोडक्टिव कोअर्शन की एक मुख्य वजह है. कई औरतों को जब तक वे बेटे को जन्म नहीं देती तब तक उन्हें बारबार गर्भवती होने के लिए मजबूर किया जाता है. बारबार प्रैगनैंसी औरतों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है. कई मामलों में अगर उन के गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़की होती है तो महिलाओं को जबरन अबौर्शन से भी गुजरना पड़ता है.

पितृसत्तात्मक परवरिश का नतीजा है कि लड़कियों को हमेशा यही बताया गया कि उन का अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं, सैक्स के दौरान उन की सहमति आवश्यक नहीं क्योंकि पति को ‘खुश करना’ स्त्री धर्म है.

अमेरिका जैसे विकसित देश में भी महिलाओं से जुड़े इस कानून को ले कर गफलत है. हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को 50 साल पुराने रो बनाम वेड मामले में आए फैसले को पलट दिया जिस के जरिए गर्भपात कराने को कानूनी करार दिया गया था और कहा गया था कि संविधान गर्भवती महिला को गर्भपात से जुड़ा फैसला लेने का हक देता है. यानी अब अमेरिका में भी मान लिया गया कि औरतों को अपनी कोख पर संवैधानिक हक नहीं.

भारत में अबौर्शन से संबंधित कानून

कुछ समय पहले भारतीय संसद में मेडिकल टर्मिनेशन औफ प्रैगनैंसी (अमेंडमेंट) एक्ट 2020 को मंजूरी दी गई. इस एक्ट के आने के बाद देश में अबौर्शन की समय सीमा को बढ़ा कर 24 हफ्ते किया गया. हालांकि इस पर फैसला लेने की जिम्मेदारी मैडिकल बोर्ड पर होगी. यह एक्ट कुछ शर्तों के आधार पर अबौर्शन की अनुमति देता है. गर्भावस्था में अगर गर्भवती महिला के जीवन को खतरा है, यदि गर्भावस्था बलात्कार का परिणाम है, यदि यह संभावना है कि जन्म के बाद बच्चे को गंभीर शारीरिक व मानसिक परेशानियों का सामना करना होगा या गर्भनिरोधक विफल रहा है.

भारत में मातृत्व मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण असुरक्षित अबौर्शन है. गटमैचर इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक युवा महिलाओं के 78 फीसद अनचाहे गर्भ के लिए असुरक्षित अबौर्शन का इस्तेमाल किया जाता है. यदि भारत में सुरक्षित अबौर्शन किया जाए और उस के बाद सही देखभाल की जाए तो इस से संबधित मृत्यु में 97 फीसद की गिरावट देखी जा सकती है.

बच्चा पैदा करने और न करने का निर्णय केवल एक महिला का होना चाहिए. इन मामलों में कोई भी हस्तक्षेप न केवल समानता के विरूद्ध है बल्कि उन की निजता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी है.

14 अक्टूबर 2022 को बौम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पतिपत्नी को बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. जस्टिस अतुल चंदुरकर और उर्मिला जोशी-फाल्के की बेंच ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला दिया और कहा कि यह अच्छी तरह से स्थापित है कि एक महिला का प्रजनन करने का अधिकार उस की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अविभाज्य हिस्सा है. उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

इस मामले में पति ने आरोप लगाया कि पहले बेटे के बाद दूसरी बार गर्भवती होने पर पत्नी ने पति की सहमति के बिना अपनी उसे समाप्त कर दिया. याचिका में पति ने पत्नी द्वारा उस की सहमति के बिना गर्भावस्था को समाप्त करने को उसके खिलाफ क्रूरता बताया. उस ने इसी आधार पर न्यायालय में तलाक की भी अर्जी दी.

इस के विपरीत पत्नी ने अपने वकील के माध्यम से तर्क दिया कि उस ने एक बच्चे को जन्म दिया है. दूसरी गर्भावस्था को उस ने बीमारी के कारण समाप्त कर दिया था. एक अजन्मे भ्रूण को एक जीवित महिला के अधिकारों से अधिक ऊंचे स्थान पर नहीं रखा जा सकता है. दोनों पक्षों को सुनने के बाद बौम्बे हाई कोर्ट ने इसे महिला के व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक हिस्सा माना.

हमेशा से एक महिला द्वारा गर्भावस्था को चुनने के विकल्प पर सवाल उठते रहे हैं. शादी के बाद पति और उस के घर वाले महिला द्वारा गर्भधारण करने को अपना हक / अधिकार समझते हैं. गर्भावस्था एक महिला के शरीर के भीतर होती है और उस के स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और जीवन को गहराई से प्रभावित करती है. एक पुराने शोध से पता चलता है कि एक महिला को उस की इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था के लिए मजबूर करने से उसके अवसाद का खतरा 20% तक बढ़ जाता है.

महिलाएं पुरुषों के हाथ की कठपुतली नहीं हैं

सवाल यह उठता है कि सारे बंधन और कानून महिलाओं पर ही क्यों लागू होते हैं. महिलाएं पुरुषों के हाथ की कठपुतली बन कर क्यों रह जाती हैं. उन का अलग वजूद है, अपनी इच्छाएं और प्राथमिकताएं हैं. अपना शरीर है और अपने शरीर पर तो उस का अपना हक़ होना चाहिए या वहां भी उसे पुरुषों की, धर्म की, कानून और सरकार की कठपुतली बनने को मजबूर रहना होगा. सारे कानून और रीति रिवाज स्त्रियों पर ही शिकंजे जकड़ने के लिए बने होते हैं. पुरुषों पर वे ही बंधन क्यों नहीं जड़े जाते. अगर स्त्री को शादीशुदा दिखने के लिए सिन्दूर लगाने की पाबंदी है तो वही पाबंदी पुरुषों पर क्यों नहीं है? उन्हें सिन्दूर जैसी चीज को नहीं लगानी पड़ती.

अगर अबौर्शन के लिए एक स्त्री की बाध्य किया जा सकता है, उसे बताया जाता है कि वह कब मां बने और कब, कितने महीने में अबोर्ट कराए या न कराए तो इस का मतलब तो यह है कि कल को कानून हमें बताएगा कि हमें कब सांस लेना है, कब खाना है और कब नहाना है. कितनी बार बाहर निकलना है कब घर के अंदर घुसना है. आखिर कानून और धर्म हर जगह क्यों घुसते हैं? अगर वे कोख में घुस रहे हैं घर में घुस रहे हैं रिश्तों में घुस रहे हैं तो कल को बैडरूम और टौयलेट में भी घुसेंगे. इस तरह तो इंसान की कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही नहीं रह जाएगी.

पीरियड्स को ले कर अटपटी गाथा

धर्म और पुरुषवादी सोच कहां तक पहुंच सकती है उस का एक नमूना महिलाओं के पीरियड्स से जुड़ी कहानी में है. हम सभी जानते हैं कि महिलाओं को पीरियड्स यानी मासिक धर्म होते हैं. प्रत्येक मासिक धर्म चक्र के दौरान 1 अंडा विकसित होता है और बाहर निकलता है. गर्भावस्था तब होती है जब पुरुष के शुक्राणु अंडे से मिलते हैं और उसे निषेचित करते हैं. और तभी वह मां बन पाती है. भारत में पीरियड्स को अशुद्ध माना जाता है और एक रजस्वला स्त्री को अलग जमीन पर अछूतों की तरह बिठा दिया जाता है. लेकिन दुनिया के कई कल्चर ऐसे हैं जहां इसे फीमेल पावर का एक तरीका समझा जाता है.

पीरियड्स की शुरुआत कैसे हुई? हो सकता है कि आप को यह बचकाना सवाल लगे क्योंकि इस का एक महत्वपूर्ण साइंटिफिक रीजन है और इस की वजह से ही महिलाएं मां बन पाती हैं. मगर हमारे देश में इस की भी एक धार्मिक कहानी है और धर्मग्रंथों की मानें तो यह दरअसल महिलाओं को मिले हुए श्राप के कारण होता है. इस से हास्यास्पद कुछ हो सकता है? मगर हमारे धर्म ग्रंथ जिन्हें पुरुषों ने लिखा है इस की एक अलग ही वजह सुनाते हैं.

इंद्र का श्राप बना पीरियड्स का कारण

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इंद्र के श्राप के कारण महिलाओं को पीरियड्स होते हैं. एक कहानी के अनुसार इंद्र ने एक ब्राह्मण की हत्या की थी. स्वर्ग पर असुरों ने विजय प्राप्त कर ली थी और उस वक्त इंद्र मदद के लिए ब्रह्मा के पास गए. ब्रह्मा ने उन्हें एक अन्य ब्राह्मण के पास जाने का मार्ग दिखाया. उस ब्राह्मण की पत्नी राक्षसी थी और उस ने इंद्र की तपस्या सफल ना होने दी. इस से क्रोधित हो कर इंद्र ने ब्राह्मण और उस की पत्नी दोनों को मार दिया.

मारने के बाद इंद्र को यह अहसास हुआ कि उन्होंने एक ब्राह्मण की हत्या की है जिस से उन्हें पाप लगा है. इस का उपाय जानने के लिए जब वो ब्रह्मा के पास गए तब उन्होंने कहा कि इंद्र को अपने पाप को कई हिस्सों में बांटना होगा जिस से उन का पाप कम हो जाए. ऐसे में धरती, पेड़, जल और महिला को उन्होंने पाप का भागीदार बनाया. धर्म में यही कारण दिया जाता है कि महिलाओं को पीरियड्स होने लगे.

इस अजीबोगरीब कारण की कल्पना पुरुष सत्तावादी समाज ही कर सकता है जो हर हालत में स्त्रियों को कमजोर, पापी और तुच्छ साबित करने में लगा रहता है. स्त्री का मानो अपना कोई वजूद नहीं. जैसा धर्मगुरुओं और पुरुषों ने चाहा वैसा उसे बना दिया गया. अपने स्वार्थ के लिए जैसे चाहा उस के शरीर का उपयोग किया और फिर उसे कोई सम्मान कोई अधिकार भी नहीं दिया. इस तरह का व्यवहार अब स्त्रियां नहीं सह सकतीं. क्योंकि अब वह किसी पर आश्रित नहीं. वह खुद बच्चा पैदा कर उसे पाल सकती है. अपने बल पर जी सकती है. क्योंकि आज उस के पास शिक्षा का हथियार है. वह खुद को साबित कर सकती है.

शादी के बाद काम करना या न करना या बच्चे पैदा करना या न करना एक महिला की पूरी तरह से निजी पसंद है. एक महिला के लिए अपनी शादी के बाद भी अपने कैरियर के बारे में सोचना उस का हक है क्योंकि यह उसे अपने सपनों और आकांक्षाओं को जीने की अनुमति देता है और साथ ही साथ उस की वित्तीय स्वतंत्रता के लिए रास्ता बनाता है. अगर इस दौरान वह कुछ साल मां बनना न चाहे तो इस में किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए. बच्चा एक स्त्री के शरीर में है तो उस से जुड़े फैसले लेने को वह स्वतंत्र क्यों नहीं.

आज 21वीं सदी में स्त्रियों को पुरुषों के रहमोकरम पर जीने की जरूरत नहीं. वह अपना और अपने कोख के बच्चे का ख्याल रख सकती है इसलिए उस की कोख से जुड़े फैसले करने का हक़ किसी को नहीं मिलना चाहिए. न धर्म को, न समाज को, न परिवार को और न पति को. यह हक सिर्फ और सिर्फ उस का है.

33 साल बाद राज्यसभा से रिटायर हुए पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह

एक अर्थशास्त्री के रूप में अपने करियर की ऊंचाइयों को छू रहे डॉ. मनमोहन सिंह अचानक राजनीति में कैसे आ गए? यह किस्सा बहुत दिलचस्प है. मनमोहन सिंह को राजनीति में लाने का पूरा श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को जाता है.

सन 1991 में नरसिम्हा राव की राजनीतिक पारी का एक तरह से अंत हो चुका था. उनकी किताबों का वजन लादकर एक ट्रक दिल्ली से हैदराबाद की ओर रवाना हो चुका था कि तभी 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गयी. इसके बाद तेजी से घटनाक्रम बदलने लगे. नरसिम्हा राव को जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह जल्द ही भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं.

राजीव की मृत्यु से देश की सहानुभूति कांग्रेस के प्रति उमड़ उठी. 1991 के भारतीय आम चुनाव में, नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और 244 सीटें जीतीं और उसके बाद उन्होंने अन्य दलों के बाहरी समर्थन के साथ अल्पमत सरकार बनाई और वह प्रधानमंत्री बने. दक्षिण से आने वाले राव भारत और गैर- हिन्दी भाषी पृष्ठभूमि से प्रधानमंत्री बनने वाले दूसरे व्यक्ति थे.

प्रधानमंत्री बनने से पहले नरसिम्हा राव कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ रह चुके थे. स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालय वह पहले देख चुके थे. वह भारत के विदेश मंत्री भी रह चुके थे. परन्तु एक ही विभाग ऐसा था जिसमें उनका हाथ तंग था, वह था वित्त मंत्रालय. पीएम बनने से दो दिन पहले कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा ने उन्हें 8 पेज का एक नोट थमाया जिसमें बताया गया था कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है.

ऐसे में राव को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और उनके घरेलू विरोधियों को यह सन्देश दे सके कि भारत अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगा. उन्होंने उस समय के अपने सलाहकार पीसी अलेक्जेंडर से पूछा कि क्या आप वित्त मंत्री के लिए ऐसे शख्स का नाम सुझा सकते हैं जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता हो. अलेक्जेंडर ने उन्हें रिजर्व बैंक के गवर्नर और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक रहे आई.जी. पटेल का नाम सुझाया. परन्तु आई. जी. पटेल दिल्ली नहीं आना चाहते थे क्योंकि उन दिनों उनकी मां सख्त बीमार थीं. उस समय वह वडोदरा में रह रहे थे. ऐसे में अलेक्जेंडर ने दूसरा नाम लिया – मनमोहन सिंह.

अलेक्जेंडर ने शपथ ग्रहण समारोह से एक दिन पहले मनमोहन सिंह को फोन किया. उस समय वह सो रहे थे. कुछ घंटे पहले ही वह विदेश से लौटे थे. जब उन्हें उठाकर इस प्रस्ताव के बारे में बताया गया तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ. अगले दिन शपथ से तीन घंटे पहले मनमोहन सिंह के पास यूजीसी के दफ्तर में नरसिम्हा राव का फोन आया – मैं आपको अपना वित्त मंत्री बनाना चाहता हूं.

वित्त मंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह राजीव-इंदिरा की नीतियों को पलटते हुए देश को आर्थिक सुधारों की ओर ले गए. मनमोहन सिंह 1991 से 1996 तक नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहे और 2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे. मनमोहन सिंह की नीतियों की बदौलत उनके प्रधानमंत्री रहते हुए भारत 27 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सफल हुआ.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मनमोहन सिंह के बारे में एक बार कहा था कि जब भी भारतीय प्रधानमंत्री बोलते हैं तो पूरी दुनिया उन्हें सुनती है.

आज जीवन के 91 बरस पूरे कर चुके डॉ. मनमोहन सिंह मनमोहन सिंह ने अपनी शिक्षा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की थी. साथ ही उन्होंने दुनिया की प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की थी. डॉ. मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय के अलावा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और दिल्ली विश्वविद्यालय में शैक्षणिक कार्य भी किया.

1991 में वे पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने थे. 1991 के आर्थिक सुधारों में उनका अहम रोल रहा. साल 1991 में पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने बजट के दौरान उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से जुड़ी अहम घोषणाएं की, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिल सकी. इसके चलते देश में व्यापार नीति, औद्योगिक लाइसेंसिंग, बैंकिंग क्षेत्र में सुधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति से जुड़े नियम-कायदों में बदलाव किए गए.

मनमोहन सिंह 1982 से 1985 तक भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे. इस दौरान कई बैंकिंग सुधार किए थे. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ भी काम किया. वह वर्ष 1966-1969 के दौरान संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए आर्थिक मामलों के अधिकारी के रूप में चुने गए थे।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. मनमोहन सिंह 1985 से 1987 तक योजना आयोग के प्रमुख के पद पर भी रह चुके हैं. साथ ही उन्होंने 1972 और 1976 के बीच मुख्य आर्थिक सलाहकार समेत कई पदों पर कार्य किया.

1987 से 1990 तक संयुक्त राष्ट्र में मनमोहन सिंह का कार्यकाल दक्षिण आयोग के महासचिव के तौर पर था, जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक इंटर-गवर्नमेंटल संगठन है. साल 1991 में वे असम से राज्यसभा सदस्य चुने गए. इसके बाद वह साल 1995, 2001, 2007 और 2013 में फिर राज्यसभा सदस्य बने. 1998 से 2004 तक जब भाजपा सत्ता में थी, तब वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे. 1999 में उन्होंने दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं पाए. बाद में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो लगातार दस साल तक डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे. पहली बार डॉ. मनमोहन सिंह ने 2004 के आम चुनावों के बाद 22 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. उसके बाद 22 मई 2009 को सरकार के दूसरे कार्यकाल के लिए पद की शपथ ली. ऐसे में उन्होंने दो बार लगातार 10 साल तक पीएम की कुर्सी पर बैठ कर देश चलाया.

आज राज्यसभा से उनकी रिटायरमेंट के अवसर पर कांग्रेस के अनेक नेता काफी भावुक नज़र आये. खासतौर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे. खड़गे ने भावुक होते हुए मनमोहन सिंह के नाम एक खत भी लिखा. जिसमें उन्होंने कहा कि अब आप राज्यसभा में नहीं होंगे. मगर इसके बाद भी आपकी आवाज देश की जनता के लिए उठती रहेगी. तीन दशकों से अधिक समय तक देश की सेवा करने के बाद आज जब आप राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे हैं, तो एक युग का अंत हो रहा है. बहुत कम लोग कह सकते हैं कि उन्होंने आपसे अधिक समर्पण और अधिक निष्ठा से हमारे देश की सेवा की है. बहुत कम लोगों ने देश और उसके लोगों के लिए आपके जितना काम किया है. आपके मंत्रिमंडल का हिस्सा बनना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से सौभाग्य की बात है. पिछले दस वर्षों में जबकि मैं लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी का नेता रहा हूँ, आप हमेशा ज्ञान का स्रोत रहे हैं और ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिनकी सलाह को मैं महत्व देता हूँ. पिछले कुछ वर्षों में आपने व्यक्तिगत असुविधाओं के बावजूद कांग्रेस पार्टी के लिए उपलब्ध रहना सुनिश्चित किया है. इसके लिए पार्टी और मैं सदैव आभारी रहेंगे.

 

 

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