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रातभर

नींद पलकों पर बैठी रही रातभर
याद में तेरी सोया नहीं रातभर

तू हवा की तरह बस महकती रही
मुझ को बहला के जाती रही रातभर

पल गए, छिन गए, रात भी कट गई
पास तू छिप के हंसती रही रातभर

मेरी आंखों में जुगनू चमकते रहे
तू भी पूनम सी जगती रही रातभर

ख्वाब तकिए के नीचे छिपे थे कहीं
तू उन्हें गुदगुदाती रही रातभर

रातभर मैं तुझे देखता ही रहा
तू सजतीसंवरती रही रातभर.

वो खिड़की

याद है तुम्हें कितना गुस्सा हुए थे तुम

जब पलट कर देखना बंद कर दिया मैं ने

चुप रहने लगी थी अपनेआप में बंदबंद

तुम्हें देख कर भी अनदेखा कर देती थी

खिड़की जानबूझ कर बंद कर ली थी

कि तुम्हें देख न सकूं

हालांकि अपनी हर कोशिश के बाद

भर आता था मन

आंखों में चुभन से सने हुए आंसू लिए

सब से अलग चलने लगती थी

तेज कदमों से भीतर के तूफान के साथ

कदम से कदम मिलाते हुए

मुश्किल होता था तुम्हें अनदेखा कर देना

तुम्हें लगा, मैं अलग हो रही हूं तुम से

यह सोच लिया था तुम ने कैसे

तुम्हारा गुस्सा फूट पड़ा था मुझ पर

जब मैं अचानक सामने आई थी तुम्हारे

तुम ने अपना मुंह घुमा लिया था

तिरस्कृत मेरा मन बहुत देर तक

कुछ भी नहीं सोच पाया था

सिवा वितृष्णा के

जो तुम्हारे चेहरे पर पढ़ा था मैं ने

हार गई थी अपनी ही कोशिशों से

तुम्हें प्यार करने से खुद को रोकना

अपमानित करना था अपने अस्तित्व को

तुम ने नाराज हो कर

मुझे नाराज होने से रोक दिया था

प्रेम में धुत्त

अब मैं ने खोल दी थी वो खिड़की

जहां से गुजरते थे हमारे मूक संवाद.

स्टैच्यू औफ लिबर्टी

सितंबर 2001 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका की यात्रा सैलानियों और छात्रों के लिए एक बुरा स्वप्न सी हो गई है. सुरक्षा जांच के नाम पर होने वाली जटिल व सघन प्रक्रिया किस तरह से अमेरिका को विदेशी यात्रियों से दूर कर रही है, बता रहे हैं महेंद्र राजा जैन.

11सितंबर, 2001 को लोग शायद कभी नहीं भूल पाएंगे. इस दिन आतंकवादियों ने भले ही न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सैंटर पर आक्रमण कर उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया हो, उस के परिणाम आज 12 वर्ष बाद भी पूरी दुनिया में, विशेषकर हर देश के हवाई अड्डों पर देखे जा सकते हैं. आजकल हवाई जहाज से यात्रा करने वालों की हवाई अड्डों पर जिस प्रकार सघन जांचपड़ताल की जाती है, उड़ान के लिए निर्धारित समय से 2 या 3 घंटे पूर्व तक एअरपोर्ट पहुंचना पड़ता है, सामान चैक कराने के बाद हवाई जहाज पर चढ़ने के पूर्व जिस प्रकार तलाशी ली जाती है और पासपोर्ट पर आप का फोटो होने के बाद भी जिस तरह आप के चेहरे को किसी आत्मघाती आतंकवादी के चेहरे से मिलाने की कोशिश की जाती है, इस की सामान्य जन कल्पना भी नहीं कर सकते. भुक्तभोगी ही इसे जान सकते हैं. ये सब देख कर इच्छा हो उठती है कि भविष्य में फिर कभी हवाई जहाज से यात्रा नहीं की जाए. पर नहीं, इस के अलावा और कोई चारा भी तो नहीं है.

इसे भी क्या संयोग ही कहा जाना चाहिए कि ब्राजील की यात्रा से लौटे अभी कुछ ही दिन हुए थे कि बेटे ने कहा, अमेरिका चलना है. यद्यपि 3 वर्ष पूर्व मैं अमेरिका जा चुका था पर उस बार लास एंजिल्स, हौलीवुड, लास वेगास की तरफ गया था. इस बार न्यूयार्क, वाश्ंिगटन, फ्लोरिडा, आरलेंडो जाना था.

न्यूयार्क में जेएफके एअरपोर्ट पर हवाई जहाज उतरे डेढ़ घंटे से ऊपर हो चुका था और अभी तक हम इमिग्रेशन काउंटर से आगे नहीं बढ़ पाए थे. लंदन में भी हवाई जहाज पर चढ़ने के पूर्व अच्छी तरह तलाशी ली जा चुकी थी, चैकिंग हो चुकी थी. गंतव्य पर पहुंचने के बाद फिर वैसी ही नहीं बल्कि उस से भी ज्यादा गहन चैकिंग का कोई कारण समझ में नहीं आ रहा था. बोर्डिंग यानी प्लेन पर चढ़ते समय चैकिंग के कारण हुई देरी की बात तो समझ में आती थी पर हवाई जहाज से उतरने के बाद पासपोर्ट आदि कागजात ठीक होने के बावजूद एअरपोर्ट से बाहर निकलने में इतनी देर होने का कोई औचित्य समझ में नहीं आ रहा था. हम लोग ही नहीं, सभी यात्री ऐसा ही सोच रहे थे.

इस समय जान पड़ता है कि अमेरिका ने सारी दुनिया में ‘फ्रीडम’ यानी स्वतंत्रता निर्यात करने का ठेका लिया हुआ है. शायद इसी कारण उसे पहले अफगानिस्तान, फिर इराक में वह सब करना पड़ा जिस के विषय में पहले कभी किसी ने कुछ  सोचा क्या, कल्पना भी नहीं की होगी. पर आज स्वयं अमेरिका में वहां के लोग कितने स्वतंत्र हैं, यह वहां पहुंच कर ही पता चलता है.

आज पूरा अमेरिका ‘पैट्रिऔट’ ऐक्ट की गिरफ्त में है. वैसे तो अंगरेजी में पैट्रिऔट का अर्थ होता है देशभक्त, पर यहां इस का अर्थ होता है आतंकवाद अंतररोधन करने या रोकने के लिए उपयुक्त साधनों को सुलभ करना. कहने का अर्थ यही है कि आज अमेरिका में जो कुछ भी हो रहा है या किया जा रहा है, वह आतंकवाद को रोकने, उस पर अंकुश लगाने के लिए ही किया जा रहा है. पर मैं तो इसे आतंकवाद के नाम पर परेशान करना ही कहना चाहूंगा. यह अमेरिका में जितना अधिक उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देखा जा सकता है वैसा शायद किसी अन्य क्षेत्र में नहीं.

यदि हवाई जहाज से यात्रा करने वाले इस बात के शुक्रगुजार हैं कि अभी तक कोई भी यात्री नहीं पकड़ा गया है जिस के पास हथियार हों या जो आतंकवादी हो तो अमेरिका के विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के लिए यह बुरी खबर है. आमतौर पर वे इसे अपने लिए अभिशाप मानते हैं कि 11 सितंबर, 2001 की घटना के लिए जिम्मेदार सऊदी आतंकवादी अमेरिका का ‘स्टूडैंट वीजा’ ले कर आए थे. शायद यही वजह है कि आज पैट्रिऔट ऐक्ट का शिकंजा जिस मजबूती से अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर है वैसा अन्यत्र नहीं. सुरक्षा की आड़ में आज कैंपस की पुलिस एफबीआई के प्रति जिम्मेदार कर दी गई है यानी एफबीआई से संपर्क बनाए रख कर ही कैंपस की पुलिस कुछ कर सकती है. यही स्थिति अमेरिकी कालेजों के पुस्तकालयाध्यक्षों की है. अली, मुहम्मद, रजा या फारूख किन विषयों की पुस्तकें पढ़ते हैं, यह सूचना एफबीआई को पुस्तकालयों से ही तो मिलेगी.

आज विश्वविद्यालयों के लिए सरकारी आदेश के तहत यह आवश्यक कर दिया गया है कि मुसलिम और अरब विद्यार्थियों (विशेषकर उन देशों से आए विद्यार्थी जिन के अलकायदा से अच्छे संबंध हैं या जो जाहिर तौर पर इस संगठन को सहायता देते हैं) के संबंध में इमिग्रेशन विभाग को विश्वस्त सूचनाएं दें.

फरवरी 2003 में अमेरिका की आईएनएस (इमिग्रेशन ऐंड नैचुरलाइजेशन सर्विस) ने कुछ खास अरब व मुसलिम देशों के 44 हजार से अधिक लोगों के फिंगर प्रिंट लिए थे. इन में छात्रों की संख्या ही अधिक थी. कुछ ऐसे लोगों से मिलने पर पता चला कि उन्होंने अपने साथ इस प्रकार का व्यवहार किए जाने पर खुद को बहुत अपमानित महसूस किया.

मुसलिम और अरब देशों के छात्रों पर अब शिकंजा और भी कसता जा रहा है. सितंबर 2003 से सभी कालेजों के लिए आवश्यक कर दिया गया कि सेवी यानी स्टूडैंट ऐंड ऐक्सचेंज विजिटर इन्फौरमेशन के प्रावधानों के अंतर्गत वे अपने यहां पढ़ने वाले सभी विदेशी छात्रों के संबंध में पूरी सूचना सरकारी कार्यालयों में दर्ज कराएं. कहा तो यही गया कि इस का उद्देश्य अमेरिका में विदेशी विद्यार्थियों की सूची तैयार करना है, लेकिन न्यूयार्क विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने इस आदेश पर इस आधार पर आपत्ति की है कि न्यूयार्क शुरू से ही अमेरिका में विदेशी छात्रों के लिए खुला द्वार रहा है.

इसलिए इस से बुरी बात और क्या हो सकती है. अब तो स्थिति यह है कि छात्रों को अपने वीजा के नवीनीकरण में भी कठिनाई हो रही है. पर्याप्त कागजात न होने का कारण बता कर भी अब बहुत से छात्रों को देश छोड़ने का आदेश दे दिया गया है. जो लोग अमेरिकी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए बाहर से यानी अपने देश से आवेदन करते हैं उन की स्थिति तो और भी बदतर है. ‘सेवी’ में शामिल होने के लिए आवेदनकर्ताओं को पहले अपने देश में अमेरिकी अधिकारियों (दूतावास के कर्मचारियों) के समक्ष साक्षात्कार देना होता है. पर उस में भी तरहतरह की बाधाएं हैं. उन सभी बाधाओं को पार करने में करीब 1 वर्ष का समय लग जाता है. यह नियम केवल मुसलिम और अरब आतंकवादियों के संदेह वाले देशों पर ही नहीं वरन सभी देशों के लिए है.

कुछ समय पूर्व न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल औफ आर्ट्स ऐंड साइंस की डीन कैथरीन स्ंिटप्सन का एक लेख छपा था, ‘विदेशी छात्र आवेदन नहीं करें.’ इस लेख में उन्होंने लिखा था कि हमारे कुछ बहुत ही प्रतिभाशाली आवेदनकर्ताओं का आवेदन बिना कोई कारण बताए 5 मिनट से भी कम समय के साक्षात्कार के बाद अस्वीकृत कर दिया गया है. यदि छात्रों की शैक्षणिक योग्यता पर ध्यान न दे कर उन्हें इसी प्रकार अस्वीकृत कर दिया जाता रहा तो ‘सेवी’ की सेवा पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है.

अपने कार्यालय से बाहर कैथरीन स्ंिटप्सन को वर्ल्ड ट्रेड सैंटर की दोनों मीनारों की खाली जगह अच्छी तरह दिखाई देती है, पर सेवी में रहते हुए वे अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं. खासतौर से एक शिक्षाविद होने के नाते वे अपने को और भी गरीब महसूस करती हैं. स्ंिटप्सन के अनुसार, अमेरिका के एक-तिहाई नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिका में पैदा नहीं हुए थे. इंजीनियरिंग जैसे विषयों के 50 प्रतिशत से अधिक ग्रेजुएट ‘अंतर्राष्ट्रीय’ रहे हैं. आज यह देख कर दुख होता है कि अपनी जिन विशेषताओं के कारण अब तक यह देश ‘बड़ा’ कहलाया जाता रहा है, आज उन्हीं का वहां हनन हो रहा है. ऐसी स्थिति में क्या यह उचित नहीं होगा कि ‘स्टैच्यू औफ लिबर्टी’ का नाम बदल कर ‘स्टैच्यू औफ सिक्योरिटी’ कर दिया जाए?

मुन्नाभाई चले जेल

मुंबई में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में मुन्नाभाई यानी संजय दत्त को अवैध हथियार रखने के आरोप में दोषी मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई है.  इस खबर से फिल्म इंडस्ट्री के उन निर्माताओं और फाइनैंसर्स को तगड़ा झटका लगा है जिन्होंने अपने करोड़ों रुपए संजय की आगामी फिल्मों में लगाए हैं. इस वक्त उन की कई बड़ी फिल्मों की शूटिंग जोरों पर है, जिन में शेर, जंजीर, पुलिसगीरी, उंगली, घनचक्कर, पीके और मुन्ना भाई चले दिल्ली प्रमुख हैं.

 

अभी तो जवां हूं

फिल्म ‘इंगलिशविंगलिश’ की सफलता के बाद तो लगता है श्रीदेवी और भी जवां हो गई हैं. तभी तो मैडम जहां भी नजर आती हैं, उन का ग्लैमरस लुक देखते ही बनता है. अभी हाल में एक ब्रैंड के प्रमोशन के सिलसिले में वे दिल्ली आई?थीं. चांदनी गर्ल इतनी फैशनेबल ड्रैस में थीं कि करीना और प्रियंका को भी कौम्प्लैक्स हो जाए. बहरहाल, उम्र के इस पड़ाव पर भी अगर वे इतनी हौट दिख रही हैं तो यह कहना ही पड़ेगा कि अभी तो ये जवां हैं.

 

तमन्ना के नखरे

हेमा मालिनी, श्रीदेवी और जया प्रदा के बाद अब एक और साउथ सुंदरी हिंदी फिल्मों में डेब्यू कर चुकी है. हम बात कर रहे हैं तमन्ना भाटिया की. साजिद खान की फिल्म ‘हिम्मतवाला’ में तमन्ना अपनी हौटनेस के चलते इन दिनों खूब चर्चा में है. फिलहाल मैडम कहती फिर रही हैं कि वे न तो बिकनी पहनेंगी और न ही किसी को किस करेंगी. खैर, शुरूशुरू में तो हर हीरोइन इसी तरह के नखरे करती है. देखते हैं तमन्ना अपनी बातों पर कितने दिन तक अमल कर पाती हैं.

 

अनुपम खेर

लंबे अरसे से फिल्मों में सक्रिय अभिनेता अनुपम खेर जिस तरह से आज भी अपने विविध अभिनय के रंग बिखेर रहे हैं, वह काबिलेतारीफ है. बौलीवुड से हौलीवुड तक की अपनी फिल्मी यात्रा पर उन्होंने शांतिस्वरूप त्रिपाठी से बातचीत की. पेश हैं अंश :

महेश भट्ट निर्देशित फिल्म ‘सारांश’ में वृद्ध इंसान का किरदार निभाने से ले कर डेविड ओ रसल निर्देशित अमेरिकन फिल्म ‘सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक’ में रौबर्ट डी नीरो जैसे अभिनेता के साथ काम कर अनुपम खेर ने हर किसी को कई बार आश्चर्यचकित किया है. इन दिनों वे कई बड़ी फिल्मों में काम कर रहे हैं.

अब तक की अपनी अभिनय यात्रा को किस तरह देखते हैं?

अभी तक की मेरी अभिनय यात्रा काफी खूबसूरत व शानदार रही. ‘सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक’ में अभिनय करने के मेरे अनुभव उसी तरह के रहे जैसे कि मेरी पहली फिल्म ‘सारांश’ के वक्त थे. मैं तो हर फिल्म के सैट पर खुद को नवोदित अभिनेता ही मानता हूं.

जब मैं फिल्मों में अभिनय करने के मकसद से मुंबई पहुंचा था उस वक्त मेरे सिर के बाल झड़ रहे थे और लोग कह रहे थे कि बौलीवुड में काम मिलना मुश्किल है. मगर ‘सारांश’ में बूढ़े का किरदार निभाया और अब तक ‘स्पैशल 26’ सहित 475 फिल्में कर चुका हूं.

लेकिन ‘सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक’ के लिए आप को अवार्ड नहीं मिल पाया?

‘स्क्रीन ऐक्टर्स गिल्ड अवार्ड’ के लिए नौमिनेट होना ही बहुत बड़ी उपलब्धि होती है. हमारी फिल्म ‘सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक’ की अभिनेत्री जेनिफर लारेंस को अवार्ड से नवाजा गया. मुझे इस अवार्ड समारोह की वजह से एक बार फिर मंच पर रौबर्ट डी नीरो के साथ खड़े होने का मौका मिला. मुझे गर्व है कि मैं इस फिल्म का हिस्सा रहा.

आप ने इस फिल्म में क्या सोच कर काम करना स्वीकार किया?

रौबर्ट डी नीरो मेरे लिए अभिनय के स्रोत हैं. इस फिल्म की वजह से मुझे रौबर्ट डी नीरो जैसे कलाकार से मिलने का मौका मिला. कम लोगों को यह मौका मिल पाता है.

सुना है इस फिल्म का औडिशन टेप एक होटल के रूम सर्वेंट ने रिकौर्ड किया था?

मैं अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवल के सिलसिले में टोरैंटो में था. फिल्म के निर्देशक डेविड ने स्कायपे पर औडिशन रिकौर्ड किया था, पर तकनीकी गड़बड़ी के कारण औडिशन रिकौर्ड नहीं हुआ था. तब उन्होंने कहा कि मैं अपना औडिशन रिकौर्ड कर के उन्हें ईमेल कर दूं. उस वक्त मैं अपने होटल के रूम में बैठा चाय का इंतजार कर रहा था. चाय देने रूम सर्वेंट आया. वह बंगलादेशी था और मेरा बहुत बड़ा फैन था. उस ने मुझ से पूछा कि दादा, क्या हुआ? मैं ने उसे सारी कहानी सुनाई. उस ने बताया कि उस के पास ‘आईफोन’ है. वह मेरा औडिशन रिकौर्ड कर सकता है. उस के बाद मेरे ऐक्शन व कट कहने पर उस ने औडिशन रिकौर्ड किया. फिर 3 घंटे के अंदर उस ने उस की क्लिप मुझे भेज दी और मैं ने फिल्म के निर्माता डेविड ओ रसल को ईमेल कर दिया.

इस फिल्म से आप ने क्या पाया?

मुझे इतने बेहतरीन लोगों को जानने का मौका मिला. एक कलाकार व इंसान के रूप में मेरी प्रतिभा में विस्तार हुआ. मुझे बहुतकुछ सीखने को मिला. इस फिल्म में काम करने को ले कर मैं कई वर्षों तक बात कर सकता हूं. इस फिल्म ने मुझे अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने का काम किया है.

बौलीवुड और हौलीवुड की फिल्मों में काम करने में क्या फर्क महसूस किया?

हौलीवुड में काम करने का कल्चर बहुत अलग है. वहां कलाकार फिल्मों के प्रति समर्पित रहता है. फिल्म की शूटिंग के दौरान कलाकार का सीन न होने पर भी कलाकार सैट पर मौजूद रहता है. दूसरी बात, जब आप हौलीवुड फिल्म के लिए काम करते हैं तो आप को अंदर से एहसास होता है कि आप अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. मेरे दिमाग में हमेशा यह बात चलती रहती थी कि इस फिल्म में रौबर्ट डी नीरो, ब्रैडली कूपर, जेनिफर लारेंस के अलावा एक भारतीय है.

पिछले दिनों इरफान खान ने कहा कि हौलीवुड फिल्मों में सिर्फ उन की ज्यादा डिमांड है. आप क्या कहेंगे?

यदि उन्हें ऐसा लग रहा है तो अच्छी बात है. पर उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि उन की फिल्म ‘लाइफ औफ पाई’ के सूरज शर्मा से बड़ा स्टार तो कोई हो ही नहीं सकता. जबकि फिल्म ‘लाइफ औफ पाई’ सूरज शर्मा के कैरियर की पहली फिल्म है. आज की तारीख में महज एक फिल्म की वजह से इरफान के मुकाबले सूरज शर्मा कहीं ज्यादा शोहरत बटोर रहा है. इसलिए मुझे लगता है कि कलाकारों के बीच इस तरह की होड़ नहीं होनी चाहिए.

भारतीय सिनेमा अभी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने का संघर्ष कर रहा है?

हमें बदलाव की जरूरत है. जरूरत इस बात की है कि हमें मौडर्न तरीके से हिंदुस्तानी कहानी को पेश करना पड़ेगा. जब तक हम भारत की जमीन से जुड़ी अपनी कहानियों को मौडर्न तरीके से फिल्मों में पेश नहीं करेंगे तब तक कोई भी विदेशी हमें या हमारी फिल्मों को गंभीरता से नहीं लेगा. फिल्मों के कंटैंट में बदलाव जरूरी है.

आप को नहीं लगता कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन के बिखराव से मामला गड़बड़ हो गया?

ऐसा नहीं है. वास्तव में मीडिया का अपना टीआरपी का जो खेल है उस के चलते कोई भी मुद्दा लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाता. अन्ना या केजरीवाल के आंदोलन को छोड़ दीजिए, दिल्ली में चलती बस के अंदर लड़की के साथ हुए गैंगरेप की बात भी लोग अब भूल चुके हैं.

लगता है अब आप ने फिल्मों के चयन करने का तरीका बदल दिया है?

मैं ने हमेशा छोटी फिल्मों को भी करने की कोशिश की. मैं आज भी वही कलाकार और वही इंसान हूं जो ‘सारांश’ में अभिनय करने से पहले था. यदि किरदार पसंद होता है तो मैं फिल्म कर लेता हूं.

कभी भी आप को लगा कि आप ने महत्त्वहीन फिल्म में काम किया?

मैं इस मुगालते में नहीं जीता कि मैं सिनेमा को बदलने की ताकत रखता हूं. यदि मेरा कोई दोस्त फिल्म बना रहा है, वह मेरे पास किसी किरदार को ले कर आएगा तो मैं उस दोस्त के लिए उस फिल्म में काम जरूर करूंगा. मैं खुशी के लिए काम करता हूं. यदि महेश भट्ट जैसे निर्देशक की फिल्म में मेरे 2 सीन हों तो भी मैं उन के साथ काम करूंगा.     

द अटैक्स औफ 26/11

26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुई आतंकवादी घटना को टीवी पर लाइव दिखाया गया था. 3 दिन तक चली कमांडो कार्यवाही के बाद एक आतंकवादी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब जिंदा पकड़ा गया, बाकी 9 आतंकवादी मारे गए थे.
रामगोपाल वर्मा ने परदे पर जो कुछ दिखाया है, वह आधाअधूरा है. उस ने ताज होटल, लियोपोल्ड कैफे, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस आदि पर हुआ हमला तो दिखा दिया, मगर ताज होटल में आतंकवादियों द्वारा विस्फोट कर आग लगाने वाली घटना के साथसाथ वहां हैलिकौप्टर से उतरे कमांडो द्वारा की गई कार्यवाही को नहीं दिखाया.

फिल्म की कहानी तत्कालीन जौइंट कमिश्नर राकेश मारिया (नाना पाटेकर) के मुंह से कहलवाई गई है. वह इनक्वायरी कमीशन के अधिकारियों को इस घटना के बारे में सिलसिलेवार बताता है.
इस कहानी में बदलाव सिर्फ यह किया गया है कि राकेश मारिया पकड़े गए एकमात्र आतंकवादी अजमल कसाब (संजीव जायसवाल) से रिमांड के दौरान पूछताछ करता है और उसे शवगृह में ले जा कर गोलियों से छलनी हुए उस के साथियों के शव दिखाता है. यह सीन काफी लंबा हो गया है और इस सीन में नाना पाटेकर की भाषणबाजी भी लंबी हो गई है.

फिल्म का निर्देशन बचकाना है. बिना कहानी वाली इस फिल्म में नाना पाटेकर का रोल दमदार नहीं है. अजमल कसाब की?भूमिका में संजीव जायसवाल के चेहरे पर क्रूरता नजर नहीं आती. इस फिल्म में संगीत की गुंजाइश नहीं थी, फिर भी बैकग्राउंड में 2 गाने डाले गए हैं. छायांकन साधारण है.

साहिब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स

निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की यह फिल्म वर्ष 2011 में आई ‘साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ का सीक्वल है. निर्देशक ने जहां पहला भाग खत्म किया था, वहीं से इसे आगे बढ़ाया है.
निर्देशक ने फिल्म के किरदारों को संवादों के सहारे संभाले रखा है. दर्शक बंधे रहते हैं. फिल्म की कहानी राजेरजवाड़ों की है. भारत में राजेरजवाड़े तो अब नहीं रहे लेकिन उन में अभी भी ठसक बाकी है, वे खुद को राजा साहब कहलवाना पसंद करते हैं.

कहानी पिछले भाग से आगे बढ़ती है. राजा साहब उर्फ आदित्य प्रताप सिंह (जिमी शेरगिल) चलनेफिरने लायक नहीं रह गया है लेकिन स्टेट की बागडोर अभी भी उसी के हाथों में है. उस की बीवी माधवी (माही गिल) हर वक्त नशे में धुत्त रहती है. आदित्य प्रताप सिंह उस की उपेक्षा करता है. एक दिन रानी मां अपने बेटे आदित्य प्रताप को सलाह देती हैं कि वह बिरेंद्र प्रताप (राज बब्बर) की बेटी रंजना (सोहा अली खान) से शादी कर ले जबकि रंजना इंद्रजीत सिंह (इरफान खान) से प्यार करती है. इंद्रजीत सिंह को आदित्य प्रताप से खानदानी दुश्मनी का बदला लेना है. रंजना का पिता अपनी बेटी की शादी आदित्य प्रताप से करने के लिए मना करता है तो आदित्य प्रताप उसे ब्लैकमेल कर मजबूर कर देता है.

इसी दौरान माधवी की मुलाकात इंद्रजीत से होती है. दोनों में जिस्मानी संबंध बन जाते हैं. इंद्रजीत माधवी को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करता है. वह चुनाव जीत जाती है. अब वह आदित्य प्रताप की नाक में दम कर देती है. आदित्य प्रताप के सारे दोस्त भी उस के खिलाफ हो जाते हैं. लेकिन अचानक एक दिन आदित्य प्रताप व्हीलचेयर से उठ खड़ा होता है और सारी बाजी पलट देता है. आदित्य प्रताप को अपने रास्ते से हटाने के लिए माधवी इंद्रजीत को मोहरा बनाती है. इंद्रजीत खुद को गोली मार लेता है. इलजाम राजा साहब पर लगता है. पुलिस उसे पकड़ कर ले जाती है.

इस फिल्म के संवाद ही हैं जो दर्शकों को बैठने पर मजबूर करते हैं. एक सीन में एक नेता और इरफान खान के बीच बोले गए संवाद काफी फनी हो गए हैं, हालांकि उस सीन में इरफान खान ने कौमेडी करने की कोशिश नहीं की है, फिर भी दर्शकों को हंसी आ ही जाती है.

इरफान खान के किरदार को एक गुंडे जैसा दिखाया गया है जिसे अपनी फोटो अखबार में छपवाने का शौक है. इस किरदार ने फिल्म में जान डाल दी है.

जिमी शेरगिल और माही गिल का किरदार दमदार है. सोहा अली का काम ठीक है. मुग्धा गोडसे पर फिल्माया आइटम डांस फूहड़ है. फिल्म का निर्देशन और छायांकन अच्छा है. गीतसंगीत साधारण है.

आई, मी और मैं

आजकल बड़े शहरों में जहां लिवइन रिलेशनशिप का चलन बढ़ा है वहीं स्त्री और पुरुष के रिश्तों में बदलाव भी आया है. स्त्रियां स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हो गई हैं, साथ ही प्रोफैशनल भी. दूसरी ओर लिवइन रिलेशन में रहने वाला पुरुष जिम्मेदारियों में बंध कर जीने में विश्वास नहीं करता. उसे लगता है, आई एम द बैस्ट. इसीलिए यह रिलेशनशिप ज्यादा समय तक नहीं चल पाती और ब्रेकअप हो जाता है.

‘आई, मी और मैं’ भी लिवइन रिलेशनशिप पर बनी फिल्म है. ईशान (जौन अब्राहम) एक म्यूजिक कंपनी में ऐग्जीक्यूटिव है. वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है. बचपन में मां ने उसे सिखाया था, वह बैस्ट है. इसीलिए बड़ा होने के बाद भी उस के मन में यह भावना अंदर तक पैठ बना लेती है कि वह बैस्ट है. उस की एक प्रेमिका है अनुष्का (चित्रांगदा सिंह). वह उस के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहता है. जब भी अनुष्का उस के परिवार से मिलने की बात करती है तो वह टाल जाता है. मजबूर हो कर अनुष्का उस से ब्रेकअप कर लेती है.

अब ईशान की जिंदगी में एक नई लड़की गौरी (प्राची देसाई) आती है. एक दिन ईशान को पता लगता है कि अनुष्का प्रैग्नैंट है. वह बच्चे को अपनाने से मना कर देता है. उधर गौरी ईशान से पेरिस चलने का प्रस्ताव रखती है. ईशान के दिमाग में द्वंद्व चलता रहता है. वह एक नई म्यूजिक सीडी लौंच करता है. प्रोग्राम शुरू होने से पहले ही उसे अनुष्का के लेबर पेन के बारे में पता चलता है. वह अस्पताल पहुंचता है जहां अनुष्का ने बेटी को जन्म दिया है. ईशान अपने अहं को त्याग कर अनुष्का और बेटी को अपनाता है. गौरी अकेली ही पेरिस चली जाती है.

निर्देशक कपिल शर्मा ने काफी सधा निर्देशन किया है. उस ने चित्रांगदा सिंह के किरदार को सशक्त बनाया है. रोमांटिक ऐक्टिंग के मामले में ईशान कमजोर साबित हुआ है. प्राची देसाई का काम अच्छा है.

फिल्म का गीतसंगीत साधारण है पर छायांकन अच्छा है.

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