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बाजार को दी नई खुशी

शेयर बाजार में सीरिया संकट के कारण मची उथलपुथल के बीच रिजर्व बैंक औफ इंडिया के नए गवर्नर रघुराम राजन के पदभार संभालने के बाद से जो रौनक लौटी उस की किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. शेयर बाजार वित्त मंत्री के सुधार के उपाय किए जाने की घोषणा और प्रधानमंत्री की तरफ से आर्थिक सुधारों के लिए संसद में कड़े कदम उठाने की घोषणा से प्रभावित नहीं हुआ लेकिन जैसे ही नए गवर्नर ने पदभार संभाला, बाजार में रौनक लौट आई और कई दिनों से खून के आंसू बहा रहा शेयर बाजार खुशियों से झूम उठा.

संसद के आखिरी दिन 6 सितंबर को जब संसद में पूरक अनुदान मांगों को पारित कराने के लिए लोकसभा में बहस चल रही थी तो कई दिनों से 17 और 18 हजार अंक के बीच झूल रहा शेयर बाजार का सूचकांक 19 हजार के पार चला गया. यह सप्ताहभर तक गिरावट से जूझ रहे बाजार में सप्ताह का भी आखिरी कारोबारी दिन था.

ऐसा कम देखने को मिलता है कि अर्थव्यवस्था का कोई नया प्रहरी आए और उसे परखे बिना ही बाजार का संवेदी सूचकांक उस के सम्मान में इस कदर उछाल भरे. 3 सितंबर को देश की ऋण साख घटने के भय से उदास निवेशकों ने जम कर लिवाली की जिस के कारण बाजार 650 अंक तक लुढ़क गया, निफ्टी भी करीब 250 अंक तक लुढ़क गया. इस से पहले रिकौर्ड स्तर पर बाजार उतर आया था. इस की बड़ी वजह सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के बाद अमेरिकी नेतृत्व द्वारा उस के खिलाफ हमले की तैयारी को बताया गया. भारत की दुनिया की रेटिंग एजेंसियों द्वारा गिराई जा रही साख भी इस पर भारी पड़ रही थी और बाजार में हाहाकार मचा हुआ था लेकिन नए गवर्नर ने ऐसी उम्मीद जगाई कि पूरे बाजार में दीवाली का सा माहौल बन गया और सूचकांक झूम उठा. जानकारों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बाजार में इसी तरह की रौनक बनी रहेगी और नए गवर्नर पर बाजार ने जो विश्वास जताया है, वह बरकरार रहेगा.

झाड़ू करेगी भ्रष्टाचार का सफाया-अरविंद केजरीवाल

भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर2 साल पहले शुरू किए गए जन आंदोलन में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के साथ पूरा देश सरकार के खिलाफ आक्रोशित दिखा. लेकिन वक्त की बदलती करवट ने अन्ना और अरविंद केजरीवाल की राहें जुदा कर दीं. ‘आम आदमी पार्टी’ बना कर अरविंद केजरीवाल अब सियासत के रास्ते उस अधूरी लड़ाई को पूरा करने के लिए चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं. क्या है उन की रणनीति, यह जानने के लिए बुशरा खान ने उन से बातचीत की.

चुनावी मैदान में उतरने जा रहे नए राजनीतिक दल ‘आम आदमी पार्टी’ यानी ‘आप’ ने दिल्ली में होनेवाले विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाने का निश्चय किया है. दिल्ली के मतदाताओं से भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान करने की अपील कर रही ‘आप’ के संस्थापक अरविंद केजरीवाल 2 साल पहले समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध और जनलोकपाल बिल पास किए जाने के लिए छेड़े गए जनआंदोलन में कंधे से कंधा मिला कर चलते रहे थे. मगर जब उन्हें महसूस होने लगा कि राजनीति में गहरे तक पैठ बना चुके भ्रष्टाचार को आंदोलन से दूर नहीं किया जा सकता, इस के लिए राजनीति में उतर कर ही वहां मौजूद गंदगी साफ करनी होगी तो उन्होंने आखिरकार 2 अक्तूबर, 2012 को ‘आम आदमी पार्टी’ बनाने की विधिवत घोषणा कर दी.  इन दिनों अरविंद पूरी तरह कमर कस कर चुनावों की तैयारी में जुटे हैं. चुनावों में उन का मुख्य मुद्दा जनता को भ्रष्टाचार और भ्रष्ट नेताओं से नजात दिलाना है. पेश हैं अरविंद केजरीवाल से हुई बातचीत के खास अंश :

दिल्ली विधानसभा की कितनी सीटों पर ‘आप’ के उम्मीदवार जोर- आजमाइश करेंगे?

हम सभी 70 सीटों पर लड़ेंगे और सरकार बनाने के 15 दिन के भीतर दिल्ली में वह लोकपाल बिल पास करेंगे जिस के लिए अन्ना हजारे को अनशन पर बैठना पड़ा था.

जनता के बीच किन मुद्दों को ले कर जाएंगे?

हमारा सब से बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार  है, जिस के चलते आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है. यदि भ्रष्टाचार दूर होगा तो महंगाई दूर होगी. भ्रष्टाचार दूर होगा तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होगी, सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दवाइयां मिलेंगी, सड़कें नहीं टूटेंगी, बारिश में ट्रैफिक जाम नहीं होगा, साफसफाई रहेगी. हर समस्या की जड़ भ्रष्टाचार है. सभी पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. अगर लोकपाल बिल पास कर दिया जाए तो आधे से ज्यादा नेता जेल के अंदर होंगे. भ्रष्टाचार के कारण ही इतनी अधिक महंगाई है. आज बिजली के दाम इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि मुख्यमंत्री बिजली कंपनियों के साथ मिली हुई हैं. पानी के दाम इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि बड़ेबड़े ठेकों में भ्रष्टाचार है. यह भी पूरी तरह साफ हो चुका है कि ये राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार दूर नहीं करेंगी. इसलिए, हमें पार्टी बनानी पड़ी.

जो काम बड़े जनआंदोलन के बाद भी संभव नहीं हो पाया उसे आप की नई राजनीतिक पार्टी कैसे संभव कर दिखाएगी?

देखिए, आज सारी समस्याओं की जड़ गंदी राजनीति है. राजनीति खराब है, इसलिए भ्रष्टाचार हो रहा है. जिन लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बनाना है वही लोग संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं. भला वे अपने खिलाफ कानून कैसे बनाएंगे. इसलिए अच्छे और ईमानदार लोगों का अंदर जाना बहुत जरूरी है.

शीला दीक्षित ही क्यों? आप ने किसी भाजपा नेता के विरुद्ध चुनाव लड़ने का फैसला क्यों नहीं किया?

दिल्ली में 15 साल से कांग्रेस राज कर रही है. दिल्ली में शीला दीक्षित भ्रष्टाचार और इनऐफिशिएंसी की प्रतीक बन गई हैं इसलिए मैं ने दिल्ली में भ्रष्टाचार की सब से बड़ी प्रतीक के खिलाफ ही चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन पर ढेरों भ्रष्टाचार के मामले हैं. कौमनवैल्थ गेम्स में 70 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ, शुंगलू रिपोर्ट में सीधेसीधे मुख्यमंत्री कार्यालय का नाम आया, इस के बाद ट्रांसपोर्ट स्कैम हुआ, जिस में ट्रांसपोर्ट के एक अफसर ने कहा कि मुख्यमंत्री ने मुझे गलत काम करने के लिए बोला था और अब मेरी जान को खतरा है. 

इस बात की क्या गारंटी है कि आप राजनीति में आ कर खुद भ्रष्ट नहीं हो जाएंगे?

आप का सवाल बिलकुल ठीक है. मैं इन्कम टैक्स में कमिश्नर था. इन्कम टैक्स में एक इंस्पैक्टर साल में कम से कम 1 करोड़ रुपए की रिश्वत आराम से उगाही कर लेता है. मैं तो कमिश्नर था, करोड़ों कमा सकता था, मगर एक पैसा नहीं कमाया. अगर पैसा ही कमाना होता तो मेरी नौकरी बुरी नहीं थी. पैसा था, लाल बत्ती की गाड़ी थी. वह सबकुछ छोड़ कर मुझे दरदर की ठोकरें खाने की क्या जरूरत थी? 15 दिनों तक मैं ने अनशन किया, भूखा रहा. सत्ता और पैसे का लालची व्यक्ति 15-15 दिन भूखा नहीं रह सकता. मैं पैसा कमाने नहीं देश बदलने और भ्रष्टाचार दूर करने के लिए राजनीति में आया हूं. एक और सवाल जो बारबार उठाया जाता है कि ‘आप’ के बाकी उम्मीदवारों की ईमानदारी की गारंटी कौन लेगा. इस पर मेरा कहना है कि हम ने हरएक उम्मीदवार की जांच करवाई है. मैं 3 चीजों की गारंटी लेता हूं. हमारे सभी 70 उम्मीदवार ईमानदार, चरित्रवान हैं और किसी भी उम्मीदवार के खिलाफ कहीं कोई संगीन अपराध का मामला नहीं चल रहा है. दिल्ली विधानसभा में आज 16 कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं, जिन पर संगीन अपराधों के मुकदमे चल रहे हैं.

अभी कुछ दिन पहले आप की पार्टी के कई लोगों ने टिकट न मिलने को ले कर ‘आप’ से अलग हो कर और अपनी नई पार्टी ‘भारतीय आम आदमी परिवार’ यानी ‘बाप’ बना ली है. क्या कहेंगे आप?

मैं आप की बात से 100 प्रतिशत सहमत हूं. कुछ लोग इस समय ऐसे आ गए हैं जिन लोगों को केवल टिकट चाहिए. हम ने प्रौसेस ओपन कर दिया है. हम लोगों से आवेदन मांग रहे हैं कि यदि आप देश की सेवा करना चाहते हैं तो टिकट के लिए आवेदन कीजिए. इस के लिए ‘आप’ का कार्यकर्ता होना भी अनिवार्य नहीं है. जो चाहे आवेदन कर सकता है. हम चाहते हैं कि जिस ने भी समाज के लिए काम किया है, हम अपनी पार्टी के टिकट पर उसे चुनाव लड़ाएं. पर इस प्रक्रिया में कांग्रेस और भाजपा ने अपने कुछ लोगों को हमारे यहां आवेदन भरने के लिए आगे कर दिया. 

देश में राजनीति धर्म और जाति के आधार पर हो रही है. ऐसे में आप समाज के सभी धर्मों, वर्गों और जातियों के लोगों को अपने साथ कैसे ले कर चलेंगे?

पिछले 2 सालों में अन्नाजी ने पूरे देश के लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ इकट्ठा  किया. इस में हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई सब शामिल थे. यह देख कर सभी पार्टियां घबरा गईं. भाजपा, कांग्रेस दोनों भ्रष्टाचारी हैं, इसलिए ये चुनाव से पहले भ्रष्टाचार की बात नहीं करतीं बल्कि ये मसजिदमंदिर की बात उठाती हैं. हम जनता के बीच जा कर उन्हें समझाते हैं.

मुसलमानों ने 62 सालों तक कांग्रेस को वोट दिया पर कांग्रेस ने उन्हें भुखमरी, गरीबी और अशिक्षा के अलावा क्या दिया? इधर, भाजपा हिंदुओं को अपना वोटबैंक बनाने की कोशिश करती है. सच तो यह है कि  न कांग्रेस ने मुसलमानों को कुछ दिया है और न भाजपा ने हिंदुओं को. ये केवल हम लोगों के भीतर जहर घोलने की कोशिश करते हैं.

क्या अन्ना हजारे आप के लिए चुनाव प्रचार करेंगे?

अन्नाजी ने कहा है कि मैं पार्टी से एसोसिएट नहीं होना चाहता. मैं कह सकता हूं कि हमारे रास्ते बेशक अलग हैं, पर मंजिल एक ही है. हमारे बीच मन में मतभेद नहीं हैं. उन्हें लगता है कि राजनीति कीचड़ है जिस में जाने से हम गंदे हो जाएंगे जबकि हम कहते हैं कि इस की सफाई के लिए कीचड़ में कूदना पड़ेगा. वे मेरे पिता समान हैं. मैं अभी भी उन से लगातार मिलता रहता हूं.

क्या सिर्फ राजनीति से भ्रष्टाचार दूर कर देने मात्र से देश सुधारा जा सकता है? नौकरशाही में मनमानी और भ्रष्टाचार भरा पड़ा है. इसे कैसे दूर करेंगे?

जब सफाई होगी तो चारों तरफ, ऊपर से नीचे तक होगी. पूरी राजनीति व ऐडमिनिस्ट्रेशन की सफाई होगी. लोग ईमानदारी से काम करेंगे तो केवल जनता के लिए करेंगे. आज लोग बेईमानी से काम कर रहे हैं तो केवल अपने लिए कर रहे हैं. मैं कहता हूं दिल्ली का बजट 40 हजार करोड़ रुपए है. इस में से अगर 50 प्रतिशत यानी 20 हजार करोड़ रुपए हर साल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं और शेष 20 हजार करोड़ रुपए जनता की भलाई में लगा दिए जाएं तो हालात कितने सुधर जाएंगे, आप अंदाजा लगा सकते हैं.

चुनाव चिह्न झाड़ ू रखने के पीछे क्या मकसद था?

जिस तरह से हम घर और सड़क की सफाई झाड़ ू से करते हैं उसी तरह से भ्रष्टाचार की सफाई करनी है. यह इसी का सिंबल है.

आटोरिकशा पर आप की पार्टी के पोस्टर चिपके होते हैं, विशेषकर बलात्कार के मामलों को ले कर, जिस से यह समझ आता है कि आप चुनावों में इन मुद्दों को भुनाने की फिराक में हैं?

हम यही तो चाहते हैं कि चुनाव इस बार इन्हीं मुद्दों पर हों. हर बार चुनाव धर्म के नाम पर होते हैं, अब हम उन्हें असली मुद्दों पर लाना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि जनता सवाल पूछे कि कौन सी पार्टी लड़कियों को बलात्कार से मुक्ति दे सकती है. यदि आप फिर इन्हीं को वोट देंगे तो क्या बलात्कार जैसे अपराधों से मुक्ति मिल सकती है? कांग्रेस से यह सवाल किया जाना चाहिए कि देश में इतने बलात्कार हो रहे हैं, सरकार क्या कर रही है?

चुनाव जीतने के लिए पार्टियां धन और बल दोनों का प्रयोग करती हैं. आप किस बल पर चुनाव जीतेंगे?

हम नंबर एक के पैसे से चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे. जनता ईमानदारी का पैसा दे रही है. ये नेता लोग तो उद्योगपतियों से पैसा ले कर चुनाव लड़ते हैं. चुनाव जीत जाते हैं तो उद्योगपति आ कर इन के कान उमेठते हैं कि पैसे दिए थे अब बिजली के दाम बढ़ाओ. लेकिन हम जनता के पैसे से चुनाव लड़ रहे हैं. जनता आ कर चुनाव के बाद हमारे कान उमेठेगी. हमारी जवाबदेही जनता के प्रति होगी जबकि इन की जवाबदेही बड़े उद्योगघरानों के प्रति होती है. जनता ही हमारी प्रमुख रणनीतिकार है.

यदि चुनाव हार गए तो क्या करेंगे?

मुझ से जब भी यह सवाल पूछा जाता है तो मैं कहता हूं कि मैं चुनाव हार गया तो सवाल यह नहीं है कि मैं क्या करूंगा बल्कि यह आप को सोचना है कि अगर मैं चुनाव हार गया तो आप क्या करोगे. क्योंकि आम आदमी पार्टी हार गई तो आप के बच्चों के भविष्य का क्या होगा. क्योंकि  वही कांग्रेस और वही भाजपा आप के सामने होगी. हमारी जिंदगी अब इस देश के लिए कुरबान है. जब तक शरीर में खून का एक भी कतरा है तब तक भ्रष्टाचार से लड़ते रहेंगे. यह मेरा अकेले का चुनाव नहीं है, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता. देश की जनता को हमारे साथ आना पड़ेगा.

सिटीजंस चार्टर क्या सुनी जाएंगी जन शिकायतें?

सरकारी विभागों को जनता के प्रति जवाबदेह और पारदर्शी बनाने के लिए प्रस्तावित विधेयक सिटिजंस चार्टर व्यावहारिक तौर पर कितना कारगर होगा, कहना मुश्किल है क्योंकि अरसे से भ्रष्टाचार और कामचोरी की आदी हो चुकी लालफीताशाही को खुद पर अंकुश कभी गवारा नहीं होगा. बहरहाल, क्याक्या है सिटिजंस चार्टर में, बता रहे हैं शाहिद ए चौधरी.

हालांकि यूपीए-2 की मौैजूदा सरकार ने अब तक लोकपाल कानून नहीं बनाया है लेकिन मार्च 2013 के दूसरे सप्ताह में उस के मंत्रिमंडल ने ‘द राइट औफ सिटिजंस फौर टाइमबाउंड डिलीवरी औफ गुड्स ऐंड सर्विसेज ऐंड रिड्रैसल औफ देयर ग्रीवैंसिस बिल 2011’ को मंजूरी दे दी है. इस विधेयक के तहत नागरिकों को निश्चित अवधि के दौरान सरकार से अपने काम कराने व जन सेवाएं हासिल करने का अधिकार होगा. इस के अलावा उन की शिकायतों का भी निर्धारित समयसीमा में निवारण किया जाएगा. इसलिए इस विधेयक को अधिक पारदर्शी व जवाबदेह प्रशासन के संदर्भ में मील का पत्थर माना जा रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह विधेयक कानून बनने के बाद न सिर्फ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सक्षम रहेगा बल्कि इस के जरिए आरटीआई का असली मकसद भी पूरा हो सकता है. साथ ही, इस से सरकार का कुछ बोझ कम भी हो सकता है.

पहले आरटीआई और अब इस नए विधेयक के जरिए जो व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है वह भले ही परफैक्ट न हो पाए लेकिन इन के जरिए सरकार जनसमीक्षा के लिए खुल जाती है, इसलिए उसे मजबूरन अपने विभागों को अधिक पारदर्शी व जवाबदेह बनाना होगा. साथ ही, इस प्रक्रिया से यह उम्मीद भी की जा सकती है कि जो भ्रष्टाचार आम आदमी को दैनिक जीवन में प्रभावित करता है उस पर भी किसी हद तक अंकुश लग सकेगा. बहरहाल, इस नए विधेयक की संभावित सफलता का अंदाजा लगाने से पहले यह जानना जरूरी है कि जो राज्य इस किस्म का कानून पहले से ही गठित कर चुके हैं उन में इस से जनता को क्या लाभ हासिल हो सका है. गौरतलब है कि पूर्व में दिल्ली, राजस्थान व मध्य प्रदेश में ‘जनसेवा डिलीवरी व शिकायती कानून’ बनाया जा चुका है.

प्रस्तावित कानून के जरिए नागरिकों को एक निश्चित समय अवधि के भीतर संसाधन व सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी. इस के लिए प्रशासन को उन चीजों व सेवाओं की सूची (सिटिजंस चार्टर) प्रकाशित करनी होगी जिन को उपलब्ध कराने की उस की जिम्मेदारी है. साथ ही, यह भी बताना होगा कि कितने समय में उन को उपलब्ध कराया जाएगा. अगर नागरिकों को चार्टर से संबंधित कोई शिकायत होगी, जैसे किसी चीज या सेवा का समय पर न मिलना, सरकारी अधिकारी का सही तरह से काम न करना, कानून या नीति या योजना का उल्लंघन करना आदि तो वे उस के खिलाफ शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं.

सभी जन प्राधिकरणों को जानकारी व सुविधा केंद्र स्थापित करने होंगे और नगरपालिका व पंचायत स्तर पर अधिकारी नियुक्त करने होंगे जिस से 15 दिन के भीतर शिकायत का समाधान किया जाए. शिकायत के सिलसिले में लिखित जवाब देना होगा कि उस का क्या समाधान किया जा रहा है, दोषी व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्यवाही की जा रही है?

अगर शिकायत का निवारण 15 दिन के भीतर नहीं होता है तो एक स्पष्टीकरण विभाग के प्रमुख को भेजना होगा. विभाग प्रमुख को शिकायतकर्ता भी लिख सकता है यदि उस की समस्या का 15 दिन के भीतर संतोषजनक समाधान नहीं होता है. शिकायत का समाधान नहीं किया गया तो उसे भ्रष्टाचार माना जाएगा और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून 1988 के तहत संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही भी की जा सकती है.

एक केंद्रीय जन शिकायत निवारण आयोग और ऐसे ही आयोग राज्यों में नियुक्त किए जाएंगे. शिकायत दर्ज करने में शिकायत निवारण अधिकारी यानी जीआरओ मदद करेंगे. आयोग के समक्ष न्यायिक प्रक्रियाएं भारतीय दंड संहिता के तहत होंगी. दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ आर्थिक जुर्माना लगाया जाएगा जोकि समयसमय पर तय किए जाने वाली दर के हिसाब से होगा. जो अधिकारी या कर्मचारी दुर्भावना का दोषी पाया जाएगा उस के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही भी होगी.

हालांकि प्रस्तावित विधेयक ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस से आरटीआई की तरह ही जनता के हाथ में काफी ताकत आ जाएगी और वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बजाय सही से अपना काम करा सकेगी. लेकिन विधेयक में कुछ ऐसे प्रावधान भी हैं जिन्हें राज्य सरकारें इस आधार पर चुनौती दे सकती हैं कि वे संघीय ढांचे का उल्लंघन करते हैं.

प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि केंद्रीय जन शिकायत निवारण आयोग जो भी आदेश पारित करेगा उसे राज्य आयोगों को लागू करना होगा. अगर कोई नागरिक राज्य आयोग के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो वह 30 दिन के भीतर केंद्रीय आयोग में अपील दायर कर सकता है. इस सिलसिले में कुछ विशेषज्ञों की राय है कि दोनों आयोग स्वतंत्र होने चाहिए और अगर किसी नागरिक को राज्य आयोग के फैसले से शिकायत है तो उसे हाईकोर्ट जाना चाहिए. आवश्यकता पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में भी अपील की जाए.

गौरतलब है कि इसी की तरह राज्य सूचना आयोग व केंद्रीय सूचना आयोग काम करते हैं. साथ ही, इस संदर्भ में राज्यों में जो कानून बनाए गए हैं उन्हें निरस्त करने की जरूरत नहीं है, नया विधेयक अतिरिक्त कानून बन सकता है. दरअसल, राज्य आयोगों को केंद्रीय आयोग के अधीन रखने की कोई जरूरत नहीं है. इस से न सिर्फ संघीय ढांचा प्रभावित होता है बल्कि राज्य आयोगों के खिलाफ सभी अपीलें केंद्रीय आयोग में लंबित पड़ी रहेंगी. केंद्रीय आयोग का काम सिर्फ केंद्र सरकार की सेवाओं से संबंधित शिकायतों तक ही सीमित रहना चाहिए. बेहतर यही है कि जिस तरह आरटीआई में क्षेत्रीय न्यायिक क्षेत्र की व्यवस्था रखी गई है कि राज्य आयोग के खिलाफ हाईकोर्ट में जाया जाए, वैसी ही व्यवस्था प्रस्तावित विधेयक में भी शामिल की जानी चाहिए.

सरकार के जो महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्यक्रम हैं जैसे मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, ग्रामीण स्वास्थ्य, पीडीएस आदि, उन का जनता को सही लाभ नहीं मिल रहा है, साथ ही उन में जबरदस्त घोटाले भी हैं. इस समस्या का समाधान प्रस्तावित विधेयक के कानून बनने से ही संभव है. गौरतलब है कि प्रस्तावित विधेयक में योजनाओं की निगरानी करने वाले व्यक्तियों को भी जवाबदेह बनाया गया है, इसलिए ऊपर के स्तर का कोई घोटालेबाज भी आसानी से बच नहीं सकता.

आरटीआई लोगों को जानकारी हासिल करने व अपनी सरकार से जवाब मांगने का अवसर प्रदान करती है. लेकिन लोग यह भी चाहते हैं कि सरकार जिम्मेदार व जवाबदेह भी हो, जो इस प्रस्तावित विधेयक से ही संभव है. ध्यान रहे कि आरटीआई के ज्यादातर सवाल आज भी शिकायतों से ही संबंधित हैं क्योंकि सरकारी विभाग अवाम की जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहते हैं. प्रस्तावित विधेयक के तहत शिकायतों का सीधे समाधान होगा और अगर कानून बनने के बाद इसे ईमानदारी से लागू कर दिया गया तो आरटीआई का बोझ भी काफी कम हो जाएगा.

दरअसल, अगर प्रस्तावित विधेयक कानून बन जाता है तो इस से समाज में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है. सब से पहली बात तो यह है कि इस के तहत एक नागरिक को मालूम होगा कि वह सरकार से किनकिन चीजों व सेवाओं की उम्मीद रख सकता है. अगर उस को वे चीजें या सेवाएं निर्धारित समय में उपलब्ध नहीं हो रही हैं तो वह शिकायत कर सकता है और उस शिकायत को भी

15 दिन में हल होना होगा. जाहिर है, इस से सरकारी कर्मचारियों को काम करना पड़ेगा और अब तक जो वे घूस के लालच में काम को टालते रहते हैं उस पर भी विराम लग सकेगा. कहने का अर्थ यह है कि प्रस्तावित विधेयक में इतना दम है कि वह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके व जनता को सुशासन प्रदान करने में मदद कर सके. इसलिए सरकार पर दबाव डाला जाना चाहिए कि वह प्रस्तावित विधेयक को संसद के दोनों सदनों में जल्द पारित करा कर कानून बनाए.

ऐसा भी होता है

मेरे पति बाजार गए हुए थे. वहां पर एक महिला कुछ खरीद रही थी. इतने में एक भिखारी आया. वह उस महिला से बोला, ‘‘माताजी, मुझ गरीब को कुछ दे दें…’’ वह आगे कुछ और बोलता उस से पहले वह महिला गुस्से में उसे डांटते हुए बोली, ‘‘मैं तुझे माताजी दिख रही हूं.’’ वह मांगने वाला चुपचाप आगे चल दिया. घर आ कर पति ने यह बताया तो हम सब खूब हंसे.    

काशी चौहान, कोटा (राज.)

 

मेरे बेटे को एक सवाल हल करने में सफलता नहीं मिल रही थी. उस ने पापा,  जोकि प्रोफैसर हैं, से सहायता ली पर वे भी नहीं हल कर पाए. उन्होंने अपने दोचार अध्यापक मित्रों से भी पूछा पर आश्चर्य, वे सब भी असफल रहे. मेरा बेटा उस सवाल को बारबार करता रहा पर असफल रहा. आखिरकार सो गया. उस की बहन अभी पढ़ रही थी. उस ने देखा कि भाई कुछ बड़बड़ा रहा है, वह तुरंत कौपीपैंसिल ले कर जो वह बोल रहा था, लिखने लगी.

सुबह उठ कर बोली, ‘‘भाई, मैं ने तेरा सवाल हल कर लिया.’’ मुझे वह सब बता चुकी थी. मैं चुप रही पर बेटा बोला, ‘‘उत्तर तो एकदम ठीक है पर यह तेरे बस का नहीं. बता, कैसे किया?’’ वह बोली, ‘‘भाई, रात को तू ने नींद में जो बोला, मैं ने लिख लिया.’’ उस की मेहनत देख कर सब ने उस की तारीफ की.

संध्या राय, गुड़गांव (हरियाणा)

 

बात 1975 की है. हम बैंकौक में थे. वहां मेरे पति भारतीय दूतावास में कार्यरत थे. एक दिन हम ने रेल द्वारा थाईलैंड की पुरानी राजधानी अयुध्या जाने का कार्यक्रम बनाया. हम ने अपनी बेटी दीपा, जो 5 वर्ष से कम आयु की थी, का टिकट नहीं लिया. टे्रन चलने पर टिकटचैकर आया व हम लोगों के टिकट देखने के बाद दीपा का टिकट मांगने लगा. मेरे पति ने इशारों व जितनी भी थाई भाषा आती थी, उसे समझाया कि दीपा की उम्र 5 वर्ष से कम है. इस पर टिकटचैकर ने थाई में कुछ कहा, जो हमें समझ नहीं आया. तब उस ने दीपा को डब्बे के आखिर में ले जा कर डब्बे से सटा कर खड़ा कर दिया व विजयी मुद्रा में इशारा कर के हमें देखने के लिए कहा.

हम ने देखा कि डब्बे की दीवार पर एक लकीर का निशान बना था व दीपा का सिर उस से लगभग 1 इंच ऊपर था. तब हमें समझ आया कि थाईलैंड में बच्चों का टिकट ऊंचाई के आधार पर लगना शुरू होता है, आयु के हिसाब से नहीं. यह हमारे लिए रोचक अनुभव था.

पूर्णिमा माथुर, जोधपुर (राज.)

किस में कितना है दम

होंडा का अमेज और मारुति सुजूकी का स्विफ्ट डिजायर मौडल कार के शौकीनों को खूब आकर्षित कर रहे हैं. आटो बाजार में ये एकदूसरे को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. आइए, जानते हैं कि कौन सा मौडल ज्यादा बेहतर है.

वे दिन बीत गए जब डीजल, पैट्रोल से काफी सस्ता था तो फिर क्यों हम आज भी महंगी डीजल कारों की तरफ रुख करें. आज हम बात करेंगे 2 परफैक्ट शहरी सेडान कारों की जो इतनी कांपैक्ट हैं कि कहीं भी समा जाएं. दोनों बहुत कुछ एक जैसी हैं मानो जुड़वां हों.

आइए, हम आप को इन दोनों कारों की तकनीकी बारीकियों के बारे में बता दें ताकि आप निर्णय ले सकें कि इन में कौन ज्यादा बेहतर है, होंडा की अमेज या मारुति सुजूकी की स्विफ्ट डिजायर. सब से पहली बात तो यह कि ये दोनों ही हैश बैक फार्मूले पर आधारित हैं. दोनों की लंबाई 4 मीटर से कम है, जिस से इन को ऐक्साइज का बैनिफिट भी मिल जाता है. दोनों में 1.2 लिटर पैट्रोल इंजन है. अमेज को होंडा की ब्रियो के प्लेटफौर्म पर बनाया गया है और इस में 400 लिटर का बूट स्पेस है. 

जहां तक इंटीरियर की बात है तो डिजायर बेहतर है और अमेज से आगे है. डिजायर का कंट्रास्ट डैश बोर्ड यानी बैगी उस के लुक को प्रीमियम व स्पेशियस बनाता है. अगर स्पेस की बात की जाए तो अमेज के व्हीलबेस को ब्रियो से बढ़ा दिया गया है. दोनों कारों में बराबरी की टक्कर है. दोनों में इंटीग्रेटेड म्यूजिक सिस्टम है, एडजस्टेबल सीट हैं. म्यूजिक सिस्टम के सारे कंट्रोल स्टीयरिंग में दिए गए हैं. दोनों ही कारों में 5 लोगों के बैठने के लिए पर्याप्त स्पेस है. लेकिन डिजायर एकमात्र ऐसी गाड़ी है जिस में क्लाइमैट कंट्रोल की सुविधा दी गई है, साथ ही उस के डैश बोर्ड के मैटीरियल की क्वालिटी भी बैस्ट है. अमेज की गहरी फं्रट सीट और ऐक्सटैंडेड व्हीलबेस की वजह से पीछे की सीट में दी गई अतिरिक्त लैग स्पेस के चलते इस ने यहां बाजी मार ली है.

अमेज का बूट स्पेस जहां 400 लिटर का है वहीं डिजायर का 316 लिटर का है. दोनों में 1.2 लिटर व 4 सिलैंडर वाला इंजन है. पावर आउटपुट भी दोनों में समान है लेकिन ड्राइविंग सीट पर बैठ कर आप को डिफरैंस अवश्य महसूस होगा. जहां डिजायर का टर्निंगस्केल 4-8 मीटर का है वहीं अमेज का 4.7 मीटर का है. डिजायर के फ्रंट ब्रेक बैटिलेटेड हैं जबकि अमेज में डिस्क ब्रेक हैं. रियर ब्रेक दोनों में ही ड्रम हैं. जहां डिजायर के फीचर अपडेटेड हैं. डिजायर की अधिकतम स्पीड 138 किलोमीटर प्रतिघंटा है जबकि अमेज की 166 किलोमीटर प्रतिघंटा. जहां अमेज 0 से 100 किलोमीटर की रफ्तार 13.4 सैकेंड में पकड़ती है वहीं डिजायर 11.7 सैकेंड में यह रफ्तार पकड़ती है. सस्पैंशन और केबिन साउंड के हिसाब से डिजायर, अमेज से आगे है. इस का श्रेय इस के 15 इंच के बड़े व्हील को जाता है जिस की वजह से ड्राइविंग में ऐक्स्ट्रा कंफर्ट मिलता है. अगर आप शहर में स्ट्रैसफ्री ड्राइविंग चाहते हैं तो डिजायर चुनिए लेकिन अमेज को चुनना भी कम सुखद अनुभव नहीं होगा. निर्णय आप का है.    

सौजन्य : बिजनैस स्टैंडर्ड मोटरिंग

बौडी पार्ट्स से झलकती लैंग्वेज

बौडी लैंग्वेज हमारे विचारों के आदानप्रदान में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. कहते हैं कि ताश के खिलाड़ी अपनी चाल तय न कर पाने की वजह से एकदूसरे की ओर ताक लगाए बैठे रहते हैं, ताकि किसी भी तरह उन्हें अपने अगले दांव का सूत्र मिल जाए. इसी तरह से हमारे व्यक्तित्व की चाबी है बौडी लैंग्वेज, जो हमारी अंदरूनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में काफी कारगर होती है.

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, शब्द हमारी बातचीत का सिर्फ एकतिहाई हिस्सा हैं और जब तक शब्दों के साथ चेहरे की भंगिमाएं और हावभाव शुमार न हों, बातचीत अधूरी रह जाती है. जीवन में किसी भी इंसान की वर्तमान मानसिक स्थिति जानने के लिए उस के शब्दों और शरीर के विभिन्न अंगों की गतिविधियों को सूक्ष्मता से परखना होता है. ऐसे बहुत से शारीरिक संकेत हैं जिन का अर्थ काफी सीक्रेट होता है और वे हमें सामने वाले के प्रति और ज्यादा चौकन्ना कर देते हैं.

1.    शरीर के सभी अंग किसी तरह नकारात्मक या सकारात्मक संकेत देते हैं. इस में चेहरे को सब से ज्यादा अहमियत दी जाती है. सिर का हिलाना यानी किसी चीज के लिए सहमति देना होता है या फिर धैर्य रखना. सिर ऊपर उठा कर चलना या ऊपर की ओर सधी हुई नाक घमंड का द्योतक होता है या फिर एकांतता में यकीन करने का. कांपते होंठ दिल पर गहरी चोट पहुंचने का संकेत देते हैं.

2.    चमकती हुई आंखें, डरावनी आंखें, गहरी आंखें, गुस्से से भरी आंखें, इतने सारे भावों वाली होने के कारण आंखों को मन का आईना भी कहा जाता है. बातचीत के दौरान हम एकदूसरे की आंखों में जितना देखते हैं, संबंध उतने ही मजबूत बनते हैं. बंद आंखें सीक्रेसी या आराम करने की इच्छा जताती हैं. झुकी हुई, इधरउधर निहारती हुई आंखें कुछ छिपाने की कोशिश करती हैं. घूरती हुई आंखें किसी की आक्रामक प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करती हैं. अधखुली और बुझी हुई सी आंखें ऊब जाने की दशा जाहिर करती हैं. बातचीत के दौरान आंखें मिला कर बात न करना दर्शाता है कि व्यक्ति असुरक्षा का शिकार है या फिर लापरवा है.

3.    भौंहें भी किसी न किसी तरह भावनाएं शेयर करती हैं. ऊंची भौंहें इंसान की परेशानी की सूचक होती हैं.

4.    बातचीत के समय हाथपांवों की गतिविधियां हमारे व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने में सहायक होती हैं. यह एक अच्छे वक्ता की पहचान है कि वह बोलते वक्त अपने हाथों और पांवों का भी इस्तेमाल करता हो.

5.    बातचीत के दौरान अपनी बांहें या टांगें क्रौस न करें, इस से आप की मुद्रा तनावग्रस्त नजर आएगी. अपने हाथ सिर के पीछे बांधना अतिरिक्त आत्मविश्वास का सूचक होता है. बातचीत के दौरान पैर हिलाना व टेबल पर उंगलियां फिराना घबराहट का सूचक होता है. हैंडशेक हलके हाथों से किया जाए तो यह कम उत्सुकता को दर्शाता है. कस कर, हाथों को दबा कर किया गया हैंडशेक व्यावसायिकता की पहचान है.

6.    मुंह के ऊपर या चेहरे पर हाथ रखना नकारात्मक बौडी लैंग्वेज का सूचक है.

7.    मुट्ठी भींचना गुस्से का सूचक होता है, वहीं मुट्ठी बंद करना डर का संकेत देता है. बातचीत के दौरान नाख्ून कुतरना और बारबार नाक को छूना सामने वाले की नर्वसनैस को दर्शाता है. 

सौंदर्य रखें बरकरार

सौंदर्य उम्र का मुहताज नहीं होता. जब कोई आप को देख कर कहता है, ‘आप की त्वचा से उम्र का पता ही नहीं चलता,’ तो यह बात सच हो जाती है. 40 प्लस के बाद यह माना जाता है कि नारी सौंदर्य अपने ढलान पर होता है लेकिन यही वक्त है जब आप अपनी खूबसूरती बरकरार रख कर जवां सौंदर्य को मात दे सकती हैं. कैसे, हम बताते हैं.

भरपूर नींद लेने के बाद सुबह उठ कर दैनिक क्रिया से निबटें. फिर थोड़ा प्राकृतिक आबोहवा का लुत्फ उठाएं. नियमित रूप से व्यायाम, सैर शरीर की मांसपेशियों को क्रियाशील बनाते हैं. जिस्म निखरता है. छरहरा शरीर उम्र भी कम दर्शाता है. लेकिन पतले होने के चक्कर में उचित खानपान, पौष्टिक आहार से परहेज न करें वरना शरीर में विटामिन, कैल्शियम, खून की कमी हो जाएगी और इन की कमी शरीर को दुर्बल बना कर आप की उम्र की रेखाओं को और बढ़ा देगी.

खाने में दूध, पनीर, दही, सूखे मेवे शामिल करें. रसभरी, संतरा, स्ट्रौबैरी, अमरूद व विटामिन ‘सी’ युक्त फल खाएं. फाइबरयुक्त दलिया, ब्राउन राइस, ब्रोकोली, सोयाबीन का भी सेवन करें. जहां तक हो सके कैफीन और सोडा पेय में कटौती करें और जंक फूड से दूर रहें. दिनभर में 10-12 गिलास पानी पीएं. इस से त्वचा डाइड्रेटैड रहेगी. चिंतामुक्त रहने की कोशिश करें. शरीर को पर्याप्त आराम देने के लिए 6-8 घंटे की नींद लें. इन सब का भी चेहरे की चमक पर असर पड़ता है.

इस के अतिरिक्त मिल्क क्रीम, चंदन और हलदी जैसे प्राकृतिक फेसपैक चेहरे की रौनक बढ़ाते हैं. दूध त्वचा को आवश्यक पोषण प्रदान करता है. हलदी विरोधी बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होती है. चंदन शीतलता प्रदान करता है. इन  सब को अपनाने से आप की त्वचा में अतिरिक्त चमक आएगी और देखने वाले कहेंगे, ‘आप की तो उम्र घटती जा रही है, आप तो फिर से जवां हो रही हैं.’

आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी

साल 2013. साधु सुंतों और महात्माओं के देश भारत के उत्तर प्रदेश का जिला शाहजहांपुर, जो क्रांतिकारी शहीदों की जन्मभूमि, खूबसूरत कालीनों की निर्माणस्थली और चीनी मिलों की मिठास के लिए जाना जाता है, आजकल कथावाचक आसाराम द्वारा तथाकथित यौन उत्पीड़न की शिकार हुई उस नाबालिग लड़की के लिए चर्चा में है जिस के पिता आसाराम को अपना ‘भगवान’ मानते थे. शहर में चारों ओर आसाराम को ले कर हंगामा बरपा हुआ है. एक तरफ आसाराम के समर्थक शहर में प्रदर्शन कर रहे हैं तो दूसरी ओर शहर के आम लोग आसाराम का पुतला फूंक कर अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं. 

पीडि़त परिवार को आसाराम के समर्थकों द्वारा धमकियां मिल रही हैं. युवती के घर को पुलिस सुरक्षा मुहैया करवा दी गई है. घर के मुख्य गेट पर 2 कौंस्टेबलों को और घर के भीतर 1 दारोगा व 2 महिला कौंस्टेबलों को तैनात किया गया है जो चौबीसों घंटे उन के घर पर मौजूद रहते हैं. मीडियाकर्मियों का उन के घर आनाजाना लगा हुआ है. कुछ दिन पहले एक महिला ने पत्रकार के भेष में कई दिनों तक उन के घर में प्रवेश करने का प्रयास किया लेकिन पुलिस ने उसे भीतर नहीं जाने दिया. इसी कारण मीडियाकर्मियों को काफी छानबीन के बाद ही घर के भीतर जाने की इजाजत दी जा रही थी. जब हम पीडि़ता के घर उस के पिता से मिलने पहुंचे तो हमें मुख्य गेट पर बैठे 2 कौंस्टेबलों ने रोक लिया. उन में से 1 क ौंस्टेबल हमारा प्रैस कार्ड ले कर भीतर मौजूद दारोगा के पास गया. कुछ समय बाद आ कर उस ने हमें इंतजार करने को कहा.

सुबह के 11 बज चुके थे और धूप तेज होती जा रही थी. हम घर के बाहर बैठे रहे. 20 मिनट के बाद भीतर से दारोगा साहब ने हमें ऊपर बैठाने का संदेश कौंस्टेबल के जरिए भेजा. हम घर की पहली मंजिल पर पहुंचे. दारोगा ने बताया कि किशोरी के पिता पूजापाठ कर रहे हैं, कुछ समय लगेगा. हम बरामदे में पड़े नए डिजाइन की लकड़ी की कुरसी पर बैठ गए.

पिता की नादानी

मुख्य सड़क पर स्थित पीडि़त किशोरी के घर का यह वह हिस्सा था जिस में पीडि़ता के पिता ने आसाराम व उन के साधकों के लिए हर तरह की सुखसुविधाओं से भरपूर कमरे बनवाए थे. एसी लगवा कर और बढि़या रंगरोगन करवा कर एक कमरे में एक बैड और अच्छा फर्नीचर डलवाया था. इसी कमरे में अकसर सत्संग किया जाता था और साधक आ कर ठहरते थे.

ग्राउंड फ्लोर पर पीडि़ता के पिता व 21 वर्षीय भाई ट्रांसपोर्ट का कारोबार करते हैं. इसी फ्लोर से साथ वाले मकान में एक खिड़कीनुमा दरवाजा निकाला गया है. दोनों घरों में भीतर से ही आवाजाही के लिए शायद इस दरवाजे को खोला गया था हमें दारोगा ने उस कमरे में इंतजार करने को बैठा दिया जहां आसाराम का बेटा नारायण साईं एक बार आ कर रुका था और वहीं पड़े बैड पर सोया था. उन के इस घर में आसाराम के चरण भी पड़ चुके हैं. कुछ देर बाद पीडि़ता के पिता उसी दरवाजे से होते हुए कमरे में आ कर बैठ गए.

कभी आसाराम को अपना भगवान मानने वाले इस शख्स क ो आज आसाराम के नाम से ही घृणा है. वे अपनी बेटी के इस गुनाहगार को सख्त से सख्त सजा दिलाना चाहते हैं. युवती के पिता एक साधारण जाट परिवार से हैं जिन का कद लगभग 6 फुट के आसपास होगा. बातचीत के दौरान उन की आवाज में रुदन था. रुदन एक तरफ विश्वास के चकनाचूर हो जाने का तो दूसरी तरफ उन की नादानी की सजा बेटी को भुगतने का. वे कहते हैंकि मीडिया ने उन्हें काफी सहयोग दिया है. इस के लिए वे उस के आभारी हैं. उन के द्वारा सुनाई गई आपबीती को बयां करने से पहले हम पाठकों को उस घटना के बारे में बता रहे हैं जिस के आरोप में आसाराम सलाखों के पीछे हैं.

गत 16 दिसंबर को दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना पर आसाराम ने जब पीडि़ता को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराते हुए बलात्कारियों का बचाव किया और कहा कि गलती एक तरफ से नहीं होती, तभी आसाराम की बलात्कारी सोच दुनिया के सामने उजागर हो गई थी.

अपने उक्त बयान के लगभग 8 महीने बाद अब आसाराम अपने एक साधक की 17 वर्षीय बेटी का यौन उत्पीड़न किए जाने के आरोप में खुद सलाखों के पीछे हैं. वैसे अपनी साधिकाओं व अपने पास आने वाली महिलाओं के साथ उन के अवैध संबंधों का खुलासा समयसमय पर होता रहा है लेकिन ऐसे किसी मामले में जेल की हवा वे पहली बार खा रहे हैं.

पीडि़त किशोरी के पिता 10-12 वर्षों से आसाराम बापू के साधक थे. आसाराम की सलाह पर ही उन्होेंने 5-6 वर्ष पूर्व अपनी बेटी का दाखिला आसाराम के मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा स्थित गुरुकुल में 7वीं कक्षा में करवाया था. वर्तमान में वह 12वीं कक्षा की छात्रा थी.

महंगी भक्ति

मामला बीते अगस्त माह में शुरू होता है जब युवती के पिता को छिंदवाड़ा गुरुकुल से फोन द्वारा सूचित किया गया कि उन की बेटी की तबीयत खराब है. गुरुकुल से सूचना पा कर किशोरी के मातापिता तुरंत छिंदवाड़ा आश्रम के लिए रवाना हो गए. वहां उन्हें बताया गया कि फिलहाल उन की बेटी की तबीयत में सुधार है लेकिन, तबीयत पूरी तरह ठीक करने के लिए झाड़फूंक व अनुष्ठान किए जाने की जरूरत है. किशोरी के पिता से कहा गया कि यह अनुष्ठान खुद आसाराम बापू द्वारा किया जाएगा. उन्हें बताया गया कि आसाराम राजस्थान में जोधपुर के पास मणाई गांव में अपने एक शिष्य के आश्रम में ठहरे हुए हैं.

किशोरी के पिता अपनी बेटी को ले कर उक्त आश्रम में पहुंचे. वहां आसाराम ने उन से कहा कि रातभर की पूजा और अनुष्ठान होने पर आप की बेटी हमेशा के लिए ठीक हो जाएगी. अनुष्ठान की तैयारी की गई. आसाराम किशोरी को कमरे में ले गए. फिर वहां से वे उसे एक गुप्त दरवाजे से एक अन्य कमरे में ले गए, जहां आसाराम व उन के 3 शिष्यों ने मिल कर किशोरी के साथ कई घंटे तक यौन उत्पीड़न का नंगा नाच किया.

व्यथा वर्णन

पीडि़त किशोरी के पिता ने आसाराम के प्रति अपनी भक्ति से ले कर उन के राक्षसी रूप के खुलासे तक की पूरी कहानी बयां की. पेश है उन्हीं की जबानी यह कहानी :

मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि आसाराम का साधक बन कर उन की भक्ति करना मुझे इतना महंगा पड़ने वाला है. इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वही व्यक्ति मेरी बेटी को अपनी हवस क ा शिकार बना लेगा जिस की तसवीर के सामने बैठ कर मैं घंटों माला जपता था. पूरेपूरे दिन भूखेप्यासे रह कर उन की साधना करता था.

आसाराम के 60-70 हजार पूर्णव्रतधारी साधकों में मैं भी एक था. ये साधक पूर्णिमा के दिन आसाराम के दर्शन के बिना अन्नजल ग्रहण नहीं क रते हैं. मैं ने जिस दिन से दीक्षा ली थी उसी दिन से यह व्रत ले लिया था. यह व्रत मैं हर माह रखता था और सर्दीगरमीबरसात हर मौसम में, जहां भी आसाराम होते थे वहां जाता था, उन के दर्शन करने के बाद ही अन्नजल ग्रहण करता था. मेरे इस अंधविश्वास के कारण आज मेरे बच्चों की पढ़ाईलिखाई सब बंद है. उन का 1 साल बरबाद हो गया है. हर पल डर के वातावरण में गुजरता है.

किस तरह वे आसाराम के संपर्क में आए और अपना सबकुछ उन पर न्योछावर करने को आतुर रहने लगे, इस बारे में वे यों बताते हैं :

साल 2001 के जनवरी महीने में आसाराम का बरेली में सत्संग था. उस से पहले मेरा भतीजा रोहतक गया था जहां से वह ‘ऋषि प्रसाद’ नामक पत्रिका ले आया जो आसाराम द्वारा प्रकाशित की जाती है. मैं ने पत्रिका पढ़ी तो मुझे बहुत अच्छी लगी. मुझे लगा कि ये बाबा तो बहुत बढि़या बातें बताते हैं, इन से मिलना चाहिए, इन का सत्संग सुनना चाहिए.  इत्तफाक से 2-3 महीने बाद शहर में जगहजगह लगे पोस्टरों के माध्यम से इन के बरेली आगमन की खबर हमें लगी.

इन का सत्संग सुनने हम बरेली चले गए. वहां हमें इन की बातें बहुत पसंद आईं जिस में उन्होंने बताया कि गुरु के बिना गति नहीं है. बगैर गुरु के मुक्ति नहीं होती, बगैर गुरु के भगवान से मिलन नहीं हो सकता. इन की बातों से प्रभावित हो कर हम ने इन्हें गुरु बनाने का मन बना लिया और साल 2002 में इन से दीक्षा ले ली.

दीक्षा ले कर उन्हें अपना गुरु बनाने की इच्छा जताने वालों को बता दिया जाता है कि फलां दिन फलां समय पर गुरुदीक्षा दी जाएगी. लोग निर्धारित दिन व समय पर पंडाल में इकट्ठे हो कर बैठ जाते हैं. इस  के बाद आसाराम अपना दीक्षा कार्यक्रम शुरू करते हैं. जिस में वे कहते हैं कि यहां बैठे जितने लोगों के इष्टदेव शिव, भगवान हैं वे हाथ खड़ा कर लें. जो लोग हाथ खड़ा कर लेते हैं वे उन्हें ‘ओम् नम: शिवाय’ का मंत्र दे देते हैं. जो लोग कृष्ण को मानते हैं उन्हें ‘कृष्णाय नम:’ का मंत्र जाप करने को कहते हैं. इसी तरह राम को मानने वालों को ‘ओम् रामाय नम:’ का मंत्र देते हैं. जितनी भी मालाएं ये जपने को बताते हैं उतनी मालाएं साधक को जपनी होती हैं. यही मंत्र दीक्षा होती है. जिस समय मैं ने दीक्षा ली थी उस समय भी

3 से 4 हजार लोग दीक्षा लेने के लिए बैठे थे. आसाराम कहते हैं, ‘जो उन से दीक्षा लेने आएगा वह दानदक्षिणा कुछ भी ले कर नहीं आएगा.’ उन की इस बात से लोग बहुत ही प्रभावित होते हैं. लेकिन अपरोक्ष रूप से दक्षिणा उसी दिन से शुरू हो जाती है जिस दिन से व्यक्ति इन का साधक बनता है.

धर्म का धंधा

साधकों को उन के साहित्य स्टाल से साधक को मंत्र दीक्षा का सामान खरीद कर लाने को कहा जाता है, जिस में माला, गोमुखी, आसन व अन्य कई पूजापाठ की सामग्री होती है. यह सामग्री कम से कम 140-150 रुपए की होती है. सत्संग में इन सामानों की दुकानें लगी होती हैं. सत्संग खत्म होने पर उठ कर चलने वाला इन दुकानों पर अवश्य रुकता  है. कहीं इन की किताबें बिकती हैं तो कहीं दवाइयां और शरबत. धूप, अगरबत्ती, चंदन, रूह अफजाह, साबुन भी लोग खरीदते चलते हैं. इस तरह आसाराम का धंधा चलता रहता है.

इस के बाद आसाराम अपना अगला वार करते हैं और बातों को घुमाफिरा कर अपने मतलब पर ले आते हैं. यह कार्य उन का पुत्र, उन का दत्तक पुत्र व उन के सेवक निभाते हैं, जो साधकों को बताते हैं कि गुरूर्ब्रह्मा, गुरूर्विष्णु, गुरूर्देव महेश्वरा; यानी भगवान विष्णु, ब्रह्मा व शिव ये तीनों ही इन गुरु में समाहित हैं इसलिए इन तीनों की अगलअलग पूजा करने के बजाय आसाराम की पूजा करो.

पूजा सामग्री के साथ इन का फोटो दिया जाता है. साधक को बताया जाता है कि तसवीर की पूजा करोगे तो सारे देवों की पूजा हो जाएगी. इसलिए लोग इन की फोटो रख कर इन की पूजा शुरू कर देते हैं. इस तरह साधक इन से जुड़ जाता है, उसे लगता है कि ये तो भगवान हैं और फिर वह पीछे मुड़ कर नहीं देखता.

इस के बाद इन के सेवक साधकों को धीरेधीरे मीडिया के खिलाफ भड़काते हैं. कहा जाता है कि प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडिया को विदेशों से पैसा मिलता है संतों को बदनाम करने के लिए. यदि संत बदनाम होंगे तो हिंदू धर्म में लोगों की आस्था कम होगी. इस प्रकार ये साधकों का ब्रेनवाश कर देते हैं. यही वजह है कि इन के आश्रमों में अनेक घटनाएं घटने के बाद भी इन के साधकों का इन पर से विश्वास जरा भी नहीं डिगा, किसी ने इन के खिलाफ हुई बातों पर जरा भी यकीन नहीं किया. यही पहला फार्मूला है.

अहमदाबाद और छिंदवाड़ा में जब इन के आश्रमों में 2 बच्चों की बलि लेने की बात आई तो हमारे मोबाइल पर मैसेज आता था कि कोई भी आदमी न्यूज चैनल नहीं देखेगा. यह संदेश हमें ‘ऋषि प्रसाद’ पत्रिका व सत्संग के माध्यम से भी दिया जाता था. केवल ‘ए2जेड’ या ‘सुदर्शन’ चैनल ही देखने का निर्देश दिया जाता है.

उन के साधक बाकी चैनलों को बंद करवा देते थे. यही कारण है उन के साधक दुनियादारी से कटे रहते हैं. वे सिर्फ इन के धार्मिक चैनल देख क र, उन की पत्रिका पढ़ कर व सत्संग सुन कर उन के पिछलग्गू बने रहते हैं. उन का दायरा वहीं तक सिमट जाता है. लोगों को मीडिया के खिलाफ करने के बाद सत्संग के माध्यम से उन के साधक पूरी तरह इस बात पर जोर देते हैं कि हमें गुरु में निष्ठा होनी चाहिए. गुरु को ब्रह्माविष्णुमहेश मान कर निष्ठा रखनी चाहिए. इसलिए हर साधक गुरु में पूरी तरह निष्ठा रखता है यह सोच कर कि यदि गुरु प्रसन्न होंगे तो भगवान प्रसन्न होंगे.

फिर कुछ दिनों बाद इन के सेवक आसाराम के साधकों के सामने दूसरा तुरुप का पत्ता फेंकते हैं. कहते हैं, खाली माला जपने या साधना करने से कुछ नहीं होगा. जब तक तुम सेवा नहीं करोगे तब तक कुछ नहीं होगा. आसाराम कहते हैं कि सिर्फ मेरी चरणभक्ति करना ही सेवा नहीं है. जो भी, तुम मेरा कार्य करोगे वह गुरु व भगवान की सेवा मानी जाएगी. तुम ‘ऋषि प्रसाद’ या ‘लोक कल्याण सेतु’ नामक पत्रिका घरघर जा कर लोगों में बांटो या ‘ऋषि दर्शन’ नामक सीडी बांट कर लोगों में गुरु की महिमा बताओ, ईश्वरीय सेवा व गुरु सेवा मानी जाएगी.

यानी पूरी तरह से साधकों को यह बता दिया जाता है कि माला भी जपनी है और गुरु सेवा भी करनी है. साधक ऐसा ही करते हैं, जैसे कहीं प्याऊ बनवा कर उन के नाम का बैनर लगवा देते हैं या कहीं भंडारे करवा कर उन के नाम का प्रचार करते हैं. भंडारे में सारा पैसा साधक का लगा होता है और बैनर पर लिखा होता है ‘संत श्री आसाराम आश्रम की ओर से भंडारा.’ साधक जीजान से इन कामों में जुटे रहते हैं. पूरे देश में जगहजगह इन के नाम पर कपड़े बंटवाते हैं. मैं ने भी 11-12 सालों तक जम कर ये सब कार्य किए.

आसाराम से दीक्षा लेने से पहले मैं वैष्णो देवी को मानता था. हर साल उन की यात्रा पर जाता था, परिवार के साथ. मेरा पूरा परिवार आसाराम का भक्त था. मैं ने अपने बड़े बेटे को भी दीक्षा दिलवा दी थी. ऐसा मैं ने इसलिए किया क्योंकि आसाराम द्वारा सदा इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि जो बगैर मंत्र दीक्षा के  मर जाएगा उसे 84 लाख पाप योनियों में भटकना पड़ेगा. इसलिए मैं ने सोचा कि हमारे पूरे खानदान को मंत्र दीक्षा मिल जाए ताकि वे 84 लाख पाप योनियों में जाने से बच जाएं.

जहां तक बेटी और छोटे बेटे को उन के गुरुकुल में दाखिला दिलाने का सवाल है तो खुद आसाराम ने ही सत्संग में कहा था कि इन स्थानों पर मेरे गुरुकुल हैं. जिन के बच्चे मेरे इन आश्रमों में पढ़ेंगे वे बड़े हो कर बहुत होनहार बनेंगे. कोई बड़ा अधिकारी बनेगा, कोई बड़ा मंत्री बनेगा. इस प्रकार उन्होंने प्रेरित किया और हम ने 6-7 साल पहले अपनी बेटी का दाखिला इन केछिंदवाड़ा आश्रम में 7वीं कक्षा में करवा दिया और छोटे बेटे का तीसरी कक्षा में दाखिला करवाया. ये भरपूर खर्चा लेते थे. 1 लाख रुपए तो मैं ने ऐडवांस में जमा करवाया था. बाकी 1 बच्चे का सालाना 60-70 हजार रुपए का खर्च आता था. लेकिन हम ने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया यह सोच कर कि यह भी एक प्रकार से दान हो रहा है.

गुरुकुल में बच्चों का एक पीरियड गुरु में निष्ठा और ध्यान का होता था. हम हर माह अपनी बेटी से बात करते थे. हर दीवाली पर उसे घर ले आते थे. हमारे क्षेत्र के 10-12 बच्चे वहां पढ़ते थे. अब सब ने अपने बच्चों को उन के आश्रम से निकाल लिया है. केवल एक लड़की बची है जो मेरी बेटी के साथ पढ़ती थी जिसे उस के पिता अगले साल निकालने वाले हैं. अब इस क्षेत्र में उन अधिकांश लोगों ने आसाराम की तसवीरों को नष्ट कर दिया है जिन्हें सामने रख कर वे पूजापाठ किया करते थे.

घिनौनी साजिश

मेरी बेटी की तबीयत खराब होने की सूचना मुझे छिंदवाड़ा आश्रम की वार्डन शिल्पी द्वारा फोन पर दी गई जिस ने मुझ से कहा कि आप तुरंत चल पड़ो, आप की बेटी सीरियस है. मैं ने उन से कहा कि आप अच्छे डाक्टर से इस का इलाज करवाएं, मैं वहां आ कर सारा पैसा दे दूंगा. इस पर उस ने कहा कि शायद सीटी स्कैन करवाने के लिए नागपुर ले जाना पड़े. मैं ने उन से कहा कि आप ले जाओ और अच्छे से ट्रीटमैंट करवाओ, हम आ रहे हैं. बेटी से बात हुई तो उस ने कहा कि पापा, ये लोग कह रहे हैं कि अपने मम्मीपापा को बुला लो.

यह सब मेरी बेटी को आसाराम के पास भेजने का एक बहाना मात्र था. खैर, मैं अपनी पत्नी के साथ छिंदवाड़ा के लिए अपनी कार से निकल पड़ा. वहां पहुंच कर हम अपनी बेटी से मिले और उसे जोधपुर आश्रम ले जाने के लिए निकले लेकिन पत्नी की तबीयत खराब हो जाने की वजह से हम वहां से घर आ गए. फिर कुछ दिन बाद हम जोधपुर आश्रम के लिए रवाना हुए. वहां मुझे और मेरी पत्नी को आसाराम की कुटिया के निकट बने मकान में ठहराया गया और रात में अनुष्ठान करने के बहाने उन्होंने मेरी बच्ची के साथ इस घिनौनी करतूत को अंजाम दिया.

दरअसल, मैं अपने बच्चों को गुरुकुल में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहता था लेकिन पत्नी की जिद थी कि बच्चों का बापू के आश्रम में ही दाखिला करवाओ. मैं मना करता रहा कि बच्चे हमारे साथ ही ठीक हैं. पत्नी मुझ से ज्यादा उन की साधक थी. मैं ने पत्नी की खुशी की खातिर वहां बच्चों का दाखिला करवा दिया. वरना यहां एक से एक बढि़या स्कूल मौजूद हैं. अब पत्नी पछताती है.

जिस दिन उक्त घटना घटी उस दिन भी मैं पत्नी से कहता रहा कि चलो, बेटी को निकालो अंदर से. लेकिन वह बोली कि नहीं, बेटी का मंत्र अधूरा रह जाएगा, अनुष्ठान अधूरा रह जाएगा. जब तथाकथित अनुष्ठान पूरा हो गया तो जोधपुर से सुबह उन्होंने हमें स्टेशन पर छुड़वा दिया था.

सुबह जब मैं ने बेटी के सिर पर हाथ रख कर पूछने का प्रयास किया कि बापू का आचरण कैसा है तो उस की आंखों में आंसू आ गए थे. तभी मुझे कुछ गलत होने का एहसास हो गया था. उस ने बस इतना कहा था कि जल्दी घर चलो यहां से. मैं ने अपनी पत्नी से कहा कि बेटी से पूछो कि क्या हुआ है. लेकिन उस समय बेटी ने इस डर से कि उस के मातापिता को आसाराम भस्म न कर दे, वह चुप रही.

जब घर आ कर वह थोड़ी नौर्मल हो गई तो अगले दिन उस ने सारी घटना बताई. सब सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं आसाराम से मिल कर उस से बात करना चाहता था. मैं पत्नी और बेटी को ले कर दिल्ली के लिए रवाना हो गया जहां 19-20 अगस्त को रामलीला मैदान में आसाराम का सत्संग हो रहा था. हम 19 अगस्त को दोपहर बाद दिल्ली पहुंच गए थे. हमारे अंदर आसाराम की इस करतूत को ले कर गुस्सा भरा हुआ था, लेकिन हमें मालूम था कि यहां इतनी भीड़ है, कुछ कहने पर आसाराम के समर्थक हमें मार डालेंगे. हम ने सोचा कि हम धरने पर बैठेंगे या कानूनी कार्यवाही करेंगे.

यह सोच कर हम कमला मार्केट थाने में आसाराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाने पहुंचे. वहां पुलिस ने रिपोर्ट लिखने में काफी नानुकुर की. कहा कि जोधपुर जा कर लिखवाओ. हम ने कहा कि अगर आप ने रिपोर्ट नहीं लिखी तो हम धरने पर बैठ जाएंगे, तब जा कर उन्होंने हमारी रिपोर्ट लिखी. इस के बाद आसाराम के समर्थकों द्वारा हमें खूब डरानेधमकाने की कोशिशें की गईं. आज मुझे पछतावा इस बात का है कि मैं ने अपना सबकुछ आसाराम पर न्योछावर कर दिया. अपने घर के एक हिस्से को पूरी तरह से उन के सत्संग व उन के रहने के लिए तैयार करवा दिया. उन का बेटा एक बार यहां इसी कमरे में सोया था जिस कमरे में आप बैठी हैं. उस के बाद उस का दत्तक पुत्र भी यहीं पर आ कर रुका था.

ढाईतीन साल पहले जब मैं ने यहां सत्संग करवाया था तब आसाराम भी मेरे घर आए थे. मैं ने अपने घर में उन की चरणफिराई करवाई थी. किसी के घर में चरणफिराई के वे कम से कम 51 हजार या 1 लाख रुपए लेते हैं. इसे ही चरणफिराई कहा जाता  है. हम ने हमेशा अपने सामर्थ्य से अधिक उन्हें देने का प्रयास किया.

मैं ने 10-11 साल उन की सेवा में लगाए. हर रोज 4 घंटे पूजा करता था, 2 घंटे उन का साहित्य बांटता था. हजारों साहित्य बांटे मैं ने. जो पैसा घरगृहस्थी में खर्च करना चाहिए था वह सब उन की सेवा में लगा दिया. यह सोच कर कि भगवान प्रसन्न हो जाएंगे और हमें संसार से मुक्ति मिल जाएगी.

यहां हम ने उन के नाम पर आश्रम का निर्माण करवाया, जिस में लगभग 30-32 लाख रुपए का खर्च आया था. हम सब ने मिल कर आश्रम के लिए जमीन खरीदी. जिस की जितनी श्रद्धा थी उस ने उतना चंदा दिया, बाकी सारा पैसा मैं ने अपने पास से लगाया. ऐसा ही सत्संग में होता, जितना लोगों ने दे दिया वह दे दिया, बाकी मैं अपने पास से खर्च कर देता था. हर साल संकीर्तन यात्रा करवाते थे जिस में लाख से सवा लाख रुपए का खर्च आता था. उस में हम हजारों रुपया पानी की तरह बहाते थे.

धर्म के चोले में छिपे पाखंडी

मैं और मेरी पत्नी दोनों ही 10वीं क्लास पास हैं. मेरा जन्मस्थान हरियाणा है और मेरी पत्नी रोहतक की है. 30 साल पहले मैं यहां आ बसा था. मैं ने दिल्ली से अपने कारोबार की शुरुआत की. फिर पानीपत, गाजियाबाद में कारोबार किया और फिर यहां शाहजहांपुर में आ बसा. जब काम ठीकठाक चलने लगा तो मैं ने सोचा कि अब थोड़ी भगवान की भक्ति की जाए.

पीडि़त किशोरी के पिता के मुंह से बयां यह दास्तां धर्म के चोले में छिपे किसी पाखंडी के पापों की कोई पहली या आखिरी कहानी का खुलासा नहीं है लेकिन नई बात यह है कि आस्था के नाम पर इन पाखंडी साधुसंतों पर किस तरह लोग अपना सबकुछ न्योछावर कर देते हैं और खुद पर सबकुछ न्योछावर करने देने वाले ये संत अपने भक्त की बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से बाज नहीं आते, यह रोंगटे खड़े कर देने वाली है.

पीडि़ता के पिता के मुंह से कही गई इस कहानी के बाद यह साफ हो जाता है कि धर्म की दुकानें किस तरह चलाई जाती हैं. लोगों को किस तरह पागल बना कर उन्हें लूटापीटा जाता है. धर्म और आस्था के नाम पर हमेशा से लोगों, विशेषकर औरतों का शारीरिक और मानसिक शोषण किया गया है. लोगों को पापपुण्य का भय दिखा कर कंगाल किया गया है.

पिछले एक दशक में भगवा चोलों में छिपे पाखंडी लोगों की ऐयाशियों का जिस तरह परदाफाश हुआ है उस ने भगवाधारियों के माथे पर चिंता और भय की मिलीजुली लकीरों को जरूर उकेर दिया है. चाहे वह स्वामी नित्यानंद हो, जो खुद को कृष्ण बताता था और उस के प्रवचनों से मोहित हो कर महिलाएं उस के आश्रमों में चली आती थीं और नित्यानंद उन्हें बहलाफुसला कर धीरेधीरे अपने बैडरूम तक ले जाता था. इसी तरह पाखंडी स्वामी भीमानंद की पाप की नगरी भी लुट गई जब धर्म की दुकान की आड़ में उस के सैक्स रैकेट का परदाफाश हुआ.

हैरानी यह है कि इन पाखंडी लोगों के असली चेहरे सामने आ जाने के बावजूद हम जागने को तैयार नहीं हैं. धर्मगुरुओं के  आह्वान पर अपने परिवारों सहित दुर्गम धार्मिक यात्राओं पर असमय मरने को रवाना हो जाते हैं, कथावाचकों की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर उन के नाम की माला जपते हैं, अपना सारा कामकाज छोड़ कर सत्संगों में अपना समय बरबाद करते हैं.

आज सब पानी पीपी कर आसाराम को कोस रहे हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि आसाराम को भगवान बनाने वाले या उसे मनमानी करने का लाइसैंस देने वाले हम खुद ही हैं. इस के बाद हम किस बात का रोना रोते हैं जब हम अंधे हो कर साधुसंतों की चकाचौंध और आवरण से प्रभावित हो कर उन पर अपना सबकुछ लुटाने को तैयार हो जाते हैं. 

हैरानी तब होती है जब आसाराम पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगने के बाद उस के समर्थक सड़कों पर उतर कर आसाराम का बचाव करते नजर आते हैं और इन में अधिकांश महिलाएं थीं जो मीडिया से भी हाथापाई करती दिखती हैं. महिलाएं ऐसे हैवान के साथ खड़ी दिखीं जिस ने तथाकथित रूप से अपनी पोती की उम्र की लड़की को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से परहेज नहीं किया. आसाराम पर जमीनों पर अवैध रूप से कब्जा कर के आश्रमों का निर्माण किए जाने, लोगों को डरानेधमकाने आदि के आरोप आएदिन लगते रहते हैं. 

शाहजहांपुर के निकट स्थित रुद्रपुर गांव में जब 3 साल पहले आसाराम ने आलीशान आश्रम का निर्माण किया और उस में सफेदपोश लोगों को बड़ीबड़ी गाडि़यों में आतेजाते देखा तो गांव के लोग काफी प्रभावित हुए. कुछ लोगों ने आसाराम के  इस भव्य आश्रम और तामझाम से प्रभावित हो कर उन से दीक्षा लेने का फैसला किया. गांव के ही एक  व्यक्ति का कहना है कि हमारे गांव में कई परिवार ऐसे हैं जो आसाराम के भक्त हैं. गांव के वे परिवार जो आसाराम के साधक बन गए, गरीब और छोटी जाति के हैं. आसाराम से दीक्षा लेना और उन के आलीशान आश्रमों में बैठ कर सत्संग सुनना उन के लिए किसी वरदान से कम नहीं. इन सफेदपोश लोगों के बीच बैठने की लालसा और आलीशान आश्रमों में बेरोकटोक प्रवेश पाने की इच्छा के चलते गांव के लोग आसाराम के निकट आते चले गए. 

दरअसल, अधिकांश लोग, जिन्हें आज भी मंदिरों में प्रवेश वर्जित है, उच्च जातियों के लोगों के बीच बैठने की इजाजत नहीं, सत्संगों और धर्मगुरुओं की शरण में जा कर उन के बीच जगह बनाने या अपनी गिनती करवाने की होड़ में लगे रहते हैं. हमारे यहां आज भी कई ऐसी जातियां हैं जिन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता है.

ऐसी जातियों के लोग इन सत्संगों, प्रवचनों व अन्य धार्मिक आयोजनों में दानदक्षिणा दे कर खुद को उन जातियों के करीब लाने की कोशिश करते हैं जो उन्हें आज भी हिकारत की नजर से देखती हैं. जबकि यहां भी उन के साथ जम कर भेदभाव होता है क्योंकि अधिक दानदक्षिणा देने वाले को यहां भी अधिक तवज्जुह दी जाती है. बड़ी जातियों के लोग आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत होते हैं और उन के द्वारा दान की गई रकम भी ज्यादा होती है. महिलाएं इन में इसलिए बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह पुण्य कमाने का सुनहरा मौका है.       

दंगों में दरक गए सामाजिक रिश्ते

सांप्रदायिक दंगों से दागदार होते देश के दामन में मुजफ्फरनगर के दंगों ने एक और दाग लगा दिया है. इस दौरान राज्य सरकार के ढीले रवैए के कारण स्थानीय प्रशासन भी निरंकुश सा दिखा. लिहाजा, दो गुटों के बीच शुरू हुए मामूली विवाद की चिंगारी सांप्रदायिक दंगों के शोले में तबदील हो गई. उस पर भी अब सियासी दल वोट की मारामारी में जुटे हैं. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में वक्त के मरहम से दंगों के ये घाव भले ही भर जाएं लेकिन हिंदू और मुसलिम समुदायों के बीच संदेह, अविश्वास की जो गहरी खाई पैदा हुई है उसे भरने में काफी वक्त लगेगा. पढि़ए शैलेंद्र सिंह की रिपोर्ट.

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के कवाल गांव में 27 अगस्त को प्रिया (बदला नाम) नामक लड़की से छेड़छाड़ के बाद दंगा भड़क गया. छेड़छाड़ की छोटी सी घटना को ले कर शाहनवाज की हत्या कर भाग रहे सचिन और गौरव को भी मार डाला गया. सदियों से एकदूसरे के साथ रहते आए 2 मजहबों के लोगों में एकदूसरे की जान लेने की होड़ लग गई. लोग गांव छोड़ कर भागने लगे. घटना के 12 दिन बाद भी गांव में सन्नाटा पसरा था. गांव के बाहर पुलिस के जवान रखवाली कर रहे थे. 

अलमासपुर, कुटबा, लिसाढ़, लांक, बहावड़ी, जौली, खालापार और नंगला मंदौड़ आदि गांवों का भी यही हाल था. 7 सितंबर की शाम मुजफ्फरनगर शहर में दंगा भड़कने के बाद रात गुजरतेगुजरते दंगों की आग गांव तक पहुंच गई. बस्तियां जलने लगीं. दंगों में मारे गए ज्यादातर लोग गांव के ही थे. दूसरे दिन सेना के आने के बाद शहर में रहने वाले लोगों को कुछ राहत महसूस होने लगी थी पर गांव के लोग शाम होते ही घरों में छिपते जा रहे थे. अलमासपुर के रहने वाले शफीक भाई कहते हैं, ‘‘7 सितंबर की सुबह तो बहुत अच्छी थी पर शाम ढलतेढलते गोलियों की आवाजों से पूरा इलाका दहल गया. डर के मारे सब अपनेअपने घरों में दुबक गए थे. ऐसा लग रहा था कि हम अपने गांव में नहीं, किसी दुश्मन के बीच फंस गए हों.’’

दंगों का डर छंटने के बाद अब लोग घरों में वापस तो आ गए हैं पर सवाल उठता है कि क्या ये लोग एकदूसरे के प्रति पहले जैसा भरोसा कर पाएंगे? पूछने पर भले ही ये लोग ऊपरी मन से ‘हां’ में जवाब दे रहे हों पर जिस हिचक से वे ‘हां’ कहते हैं उस से समझ में आ जाता है कि पहले जैसा भरोसा करना इतना आसान नहीं है.

मुश्किलों में फंसी जिंदगी 

दंगों की दहशत से गांव के गांव खाली हो गए. अपना घरगांव छोड़ कर लोगों को घरों में ताला लगा कर दूसरे शहर में रिश्तेदारों के घरों को अपना ठिकाना बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा. 

दंगों के बाद पुलिस का कहर कम नहीं होता. ऐसे में सामान्य जिंदगी भी मुश्किल नजर आने लगती है. मुजफ्फरनगर चुंगी नंबर 2 पर रहने वाले रोहतास की पत्नी मुनेश गर्भवती थी. उस को बच्चा होने वाला था. दंगे के चलते एंबुलैंस नहीं मिल सकी. ऐसे में मुनेश को घर में ही बच्चा हो गया. इस के बाद उस की तबीयत बिगड़ गई. पति को कोई रास्ता नहीं सूझा तो वह माल ढोने वाली गाड़ी से पत्नी को अस्पताल ले जाने लगा. घर से कुछ दूर जाने पर मुनेश ने दम तोड़ दिया.   

मोहब्बत का जिला

मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश का सब से ज्यादा प्रतिव्यक्ति आय वाला जिला है. करीब 41 लाख आबादी वाला यह जिला 4008 वर्ग किलोमीटर में बसा है. 6 तहसील और 14 विकासखंडों वाले इस जिले में पूरे देश के गेहूं उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा पैदा होता है. गेहूं के साथ गन्ने और आलू की भी सब से अधिक पैदावार यहीं होती है. खेतीकिसानी से जुड़ा होने के बाद भी यहां की करीब 85 फीसदी आबादी पढ़नालिखना जानती है.  मुजफ्फरनगर के दक्षिण में मेरठ, उत्तर में सहारनपुर, पश्चिम में हरियाणा का करनाल और पूर्व में गंगा नदी है. इस शहर का इतिहास हड़प्पा की सभ्यता से जुड़ा मिलता है. इस से जुडे़ जिलों में रुड़की, सहारनपुर, मेरठ और बागपत हैं. पूरेकाजी और शिवचौक यहां के बड़े बाजार हैं.

यहां हिंदू और मुसलिम मिलीजुली आबादी है. यहां रहने वाले मुसलिम भी मूलाजाट कहे जाते हैं. मूलाजाट के पूर्वज काफी समय पहले हिंदू ही थे. मुसलिम धर्म स्वीकार करने के कारण वे मुसलिम बिरादरी में शामिल हो गए थे. इस के बाद भी यहां हिंदू और मुसलिम मिलजुल कर अपने तीजत्योहार मनाते थे. खेती करने के कारण यहां का एक बड़ा तबका आर्थिक रूप से बेहद संपन्न है. दूसरा गरीब तबका इन के खेतों में काम कर के अपनी गुजरबसर करता है. ऐसे में यहां पर जातीय भेदभाव कम देखा जाता है. यह बात जरूर है कि आर्थिक रूप से यहां एकदूसरे के बीच गहरी खाई है. इस के बाद भी लोग एकदूसरे को अपना पूरक मान कर काम करते हैं.

मुजफ्फरनगर और शामली में सांप्रदायिक दंगों में 36 से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. 50 से अधिक लोग घायल हुए. अब यहां वोटों की फसल काटने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ लग गई है. वैसे देखा जाए तो इस जिले में दंगों की फसल तैयार करने में राजनीतिक दलों ने बहुत मेहनत की है. महीनों की तैयारी का ही नतीजा है कि अब दंगों के खेत में वोटों की फसल लहलहाने लगी है.

तनाव और अफवाह

सांप्रदायिक तनाव के मद्देनजर वोट की फसल काटने वालों ने किसी सफल किसान की तरह दंगों का खेत तैयार किया. कहीं कोई कमी न रह जाए इस के लिए तनाव के उपजाऊ बीज और अफवाहों की उम्दा खाद का इस्तेमाल किया गया. मुजफ्फरनगर और इस के आसपास के इलाके खाप पंचायतों के लिए भी मशहूर हैं. औनर किलिंग को ले कर यह इलाका चर्चा में रहा है. यहां पर हिंदू और मुसलिम दोनों ही बिरादरियों में खाप पंचायतों का पूरा दखल सामान्य जीवन में बना रहता है. ये पंचायतें किसी भी तरह का आदेश या फतवा जारी करने को आजाद होती हैं.

सहारनपुर में महिला अधिकार और मानवाधिकार को ले कर आंदोलन करने वाली ‘अस्तित्व’ संगठन की रेहाना कहती हैं, ‘‘जब बात महिला अधिकारों की आती है तो हिंदू और मुसलिम दोनों ही बिरादरियों की खाप पंचायतें एक स्वर में महिला आजादी के खिलाफ बोलती हैं. जब अपना कोई छिपा मकसद हल करना होता है तो ये दोनों पंचायतें अलग राह पर चल देती हैं.’’

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में छेड़छाड़, बलात्कार, लड़कियों पर तेजाब डालने की घटनाएं पहले भी घटती रही हैं. लेकिन कवाल गांव की छेड़छाड़ की घटना को हवा देने के लिए पहले तनाव फैलाया गया. इस के बाद अफवाहों की खाद डाली गई, जिस से दंगे की फसल जल्द लहलहाने लगे. अफवाहों को हवा देने के लिए साल 2010 के एक वीडियो क्लिप का सहारा लिया गया. मूलरूप से यह क्लिप पाकिस्तान के सियालकोट इलाके में बनी थी. इस वीडियो क्लिप में 11वीं में पढ़ने वाले 2 युवकों के हाथपैर बांध कर उन को जिंदा पीटपीट कर मारते दिखाया गया था. मूल क्लिप में पाकिस्तान के सिपाही भी उस में दिखाई देते हैं.

मुजफ्फरनगर में तनाव फैलाने के लिए इस क्लिप को एडिट कर पाकिस्तान के सिपाहियों को गायब कर दिया गया. अब इस वीडियो में मारे जा रहे युवकों को ही दिखाया जा रहा था. इन के हाथपैर रस्सी से बंधे थे. इन को पीटपीट कर मारा जा रहा था. पहले एक युवक मर जाता है फिर दूसरे को मारा जाता है. तनाव फैलाने वालों ने इस वीडियो क्लिप को मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में हुए दोहरे हत्याकांड से जोड़ दिया. सब से पहले  इसे यू ट्यूब और फेसबुक पर अपलोड किया गया. इसे करीब 2 हजार लोगों ने देखा और 200 लोेगों ने इस पर अपने कमैंट दिए थे.

उत्तर प्रदेश के एडीजी, लौ ऐंड और्डर, अरुण कुमार कहते हैं, ‘‘पुलिस को जैसे ही इस वीडियो का पता चला, उसे ब्लौक कर दिया गया.’’ तनाव फैलाने वाले पुलिस से तेज निकले, उन लोगों ने इस को मोबाइल पर लोड कर एकदूसरे को दिखाना शुरू किया. इस की सीडी बना कर गांवगांव में फैलाने का काम किया गया.

चूक गया प्रशासन

युवकों की हत्या वाली यह सीडी पूरे इलाके में अपना रंग दिखाने लगी थी. आसपास के गांवों तक में तनाव फैलने लगा था. दोनों वर्गों की तरफ से जातीय पंचायतों का दौर भी चल पड़ा. यह वह समय था जब उत्तर प्रदेश के अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद और समाजवादी पार्टी चौरासी कोस की अयोध्या की परिक्रमा यात्रा को ले कर आमनेसामने थे. विश्व हिंदू परिषद और उस से जुडे़ दूसरे संगठनों के लोग जिलेजिले गिरफ्तारी दे रहे थे. अखिलेश सरकार को मुजफ्फरनगर के तनाव और दंगों का पता था पर वह चुप रही. 8 सितंबर को ‘बहूबेटी बचाओ’ नाम से एक बड़ी पंचायत नंगला मंदौड़ मैदान में आयोजित की गई. शहर में धारा 170 लागू होने के बाद भी यह पंचायत हो जाती है.

यहां से वापस होती इस भीड़ की झड़प दूसरे वर्ग के लोगों से हो जाती है. वाजिमपुर गांव के रहने वाले शोऐब की मौत हो जाती है. इस के बाद तो हिंसा का भयानक तांडव फैल जाता है. दंगे में पत्रकार राजेश वर्मा सहित 36 लोगों की हत्या हो गई. ‘बहूबेटी बचाओ’ पंचायत करने और वहां भड़काऊ भाषण देने के आरोप में भारतीय जनता पार्टी विधानमंडल दल के नेता और कैरना के विधायक हुकुम सिंह, भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत, राकेश टिकैत, भाजपा विधायक ठाकुर संगीत सोम, विधायक सुरेश राणा, विधायक कुंवर भारतेंदु, पूर्व सांसद सोहनवीर सिंह, कांग्रेस के पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक, पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश, भाजपा के प्रदेश मंत्री अशोक कटारिया, लोकदल के जिलाध्यक्ष अजित राठी और दूसरे करीब 40 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया. भाजपा नेता मानते हैं कि मुजफ्फरनगर दंगों में उन की पार्टी के नेताओं को फंसाया जा रहा है.

मोदी फैक्टर से हुआ उन्माद

मुजफ्फरनगर में समाजसेवा से जुड़ी एक महिला कहती है, ‘‘भाजपा ने मोदी की अगुआई में लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए जो रोडमैप तैयार किया है, यह उस पटकथा का एक सीन भर है. जब चौरासी कोसी परिक्रमा को ले कर अयोध्या में शांति बनी रही तो मुजफ्फरनगर में तनाव भड़का दिया गया. इस दंगे में गुजरात के दंगे की छवि दिखाई देती है. गांव में रहने वाले रजाई भरने वाले गरीब परिवारों को निशाना बनाया गया. गांव छोड़ कर मारुति कार से भाग रहे लोगों को मारा गया.’’ 

जहां एक ओर मुजफ्फरनगर दंगों को ले कर भाजपा नेताओं पर मुकदमे कायम हो रहे थे वहीं दूसरी ओर दिल्ली में भाजपा नेता नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की माथापच्ची कर रहे थे. समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव मुजफ्फरनगर के दंगे को दंगा नहीं जातीय संघर्ष मानते हैं. कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री कहते हैं, ‘‘भाजपा ने सत्ता की खातिर गुजरात में कई जगह दंगे कराए थे. उत्तर प्रदेश में भी उस ने यही फौर्मूला अपनाया है.’’ 

इतिहास में झांक कर देखें तो पता चलता है कि 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने के समय वहां मौजूद रहे तमाम भाजपा नेताओं पर मुकदमा चल रहा है. 22 साल बीत जाने के बाद भी उस घटना का फैसला नहीं आ सका है. ऐसे में दूसरे नेताओं का साहस बढ़ता है. दंगों की जांच कर अगर दोषियों के खिलाफ जल्द से जल्द फैसला सुनाया जाने लगे तो ऐसे कृत्यों को रोका जा सकता है.      

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