Download App
Home » पृष्ठ 3726

नरेंद्र मोदी- विवादों के घेरे में भाजपा के ‘प्रधानमंत्री’

भाजपा की आंतरिक कलह और रूठनेमनाने के नाटकीय सिलसिले के बाद आखिरकार नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर सामने आ ही गया. लेकिन मोदी के पीएम पद के सपने की राह इतनी भी आसान नहीं है. गुजरात दंगों का कलंक, फर्जी मुठभेड़ जैसे मामलों में उन की संदिग्धता और हिंदुत्व की कट्टर छवि उन के इस अरमान पर पानी फेरने के लिए काफी हैं. पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

भारतीय जनता पार्टी ने तमाम विवादों और कलह के बीच नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. मोदी के नाम पर घोषणा का वक्त आया तो लालकृष्ण आडवाणी ने अडं़गा डालने की कोशिश कर मोदी की सर्वस्वीकार्यता पर सवाल खड़ा कर दिया है. आडवाणी को मनाने की तमाम कोशिशें हुईं पर वे नहीं माने. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी ने उन की परवा किए बिना मोदी के नाम का ऐलान कर दिया. हालांकि बाद में वह मान गए क्योंकि और कोई चारा भी न था. आडवाणी की मांग थी कि मोदी को अभी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न किया जाए. साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों तक फैसला टाला जाए, नहीं तो नतीजे प्रभावित होंगे. आडवाणी की यह अड़ंगेबाजी, उन की प्रधानमंत्री पद की लालसा मानी जा रही है.

प्रधानमंत्री पद की ओर बढ़ते जा रहे नरेंद्र मोदी की राह के रोड़े कम नहीं हैं. धूमकेतु से चमकता सूरज बनने की कोशिश में मोदी की चमक विवादों के सायों के चलते फीकी दिखती है. गोआ बैठक में जब मोदी के नाम की चुनाव समिति के अध्यक्ष के तौर पर घोषणा की गई तो लालकृष्ण आडवाणी कोपभवन में जा बैठे. अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मोदी के नाम के ऐलान का वक्त आया तो आडवाणी अड़ गए. उन्होंने पत्र लिख कर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की कार्यशैली पर सवाल उठाया है.

आएदिन इस तरह हो रही फजीहत से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर चोट पड़ रही है. देश में ऐसा संदेश जा रहा है कि मोदी विपक्ष से ही नहीं, अपनों से भी चारों ओर से घिरे हुए हैं और विवादों का साया उन का पीछा नहीं छोड़ रहा. गुजरात के पुलिस अधिकारी डी जी वंजारा की चिट्ठी के बाद मोदी उस समय पस्त नजर आए जब शिक्षक दिवस पर एक बच्चे ने यह पूछ लिया कि क्या आप 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी हम से बात करने यहां आएंगे? मोदी ने कहा कि उन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने का सपना नहीं देखा. गुजरात की जनता ने उन्हें 2017 तक जनादेश दे रखा है.

मोदी ने यह भी कहा कि जो प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हैं वे खुद को तबाह कर लेते हैं. किसी को कुछ बनने का सपना नहीं देखना चाहिए, बल्कि कुछ करने का सपना देखना चाहिए. मोदी की यह टिप्पणी अहम मानी गई क्योंकि एक दिन पहले ही वंजारा ने जेल से लिखे पत्र में मुख्यमंत्री मोदी और उन के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाए थे. इसे ले कर विपक्ष ने कई सवाल उठाए. गुजरात दंगों का कलंक, फर्जी मुठभेड़ जैसे मामलों में मोदी की संदिग्धता और पार्टी के भीतर उन को ले कर मची कलह मोदी के लिए नई मुसीबत बन गई है.

अब तो भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपना नेता मान लिया है. चुनाव समिति के प्रमुख बनाए जाने के बाद मोदी खुद को देश के तारनहार के तौर पर पेश करने लगे थे. भजभज मंडली उन में हिंदुत्व का नया अवतार देखने लगी तो मोदी के लिए इस समय सब से ज्यादा साधुसंत, पंडेपुजारी और उन के अनुयायी उछलते दिख रहे हैं.

भजभज मंडली ने अपने चिरपरिचित पुराने ढोंगतमाशे शुरू कर दिए जो अकसर आम चुनाव आने से पहले किए जाते हैं. उस ने अयोध्या में चौरासी कोसी परिक्रमा कर के मोदी के पक्ष में हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास किया है. और वही भजभज मंडली धर्म संसद में मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की मांग करती है.

भाजपा समर्थकों द्वारा ऐसा प्रचारित किया जा रहा है मानो मोदी के सत्ता में आते ही चमत्कार हो जाएगा. रामराज्य आ जाएगा. देश की तमाम समस्याएं चुटकियों में खत्म हो जाएंगी. सोशल मीडिया में युवाओं को 43 वर्षीय आकर्षक राहुल गांधी के बजाय 62 वर्षीय नरेंद्र मोदी अधिक लुभा रहे हैं. पार्टी भले ही मोदी के नाम पर बंटी हुई हो, मध्य वर्ग के युवाओं का बड़ा वर्ग उन की जयजयकार कर रहा है. भाजपा के नेताओं को लग रहा है कि देश, खासतौर से युवा, मोदी की मांग कर रहा है.

यह सच है कि देश आज कई ज्वलंत समस्याओं से जूझ रहा है. घरेलू और बाहरी दोनों मोरचों पर मौजूदा संप्रग सरकार नाकाम दिख रही है. सरकार के प्रति आम जनता में काफी आक्रोश है. अर्थशास्त्रियों से भरीपूरी सरकार के बावजूद अर्थव्यवस्था लगातार गिरती जा रही है. महंगाई तूफानी गति से बढ़ रही है. खानेपीने की वस्तुओं के भाव बेलगाम हैं. प्याज थाली से दूर चला गया. पैट्रोल से ले कर अनाज, दालें, दूध, बच्चों की पढ़ाई के खर्चों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है.

इधर, रुपया डौलर के मुकाबले काफी नीचे गिरा हालांकि अब संभल रहा है. इस सरकार से लोगों को उम्मीदें थीं, लेकिन उन्हें निराश होना पड़ रहा है. व्यापारियों में निराशा है. औरतें कहीं सुरक्षित नहीं हैं. घर, बाहर और मंदिर, मसजिद, चर्च तक में. केंद्र सरकार की विफलता के खिलाफ जनता आएदिन सड़कों पर उतर रही है.

पाकिस्तानी सीमा पर आएदिन भारतीय सैनिकों का खून बह रहा है. चीन हमारी जमीन पर घुसपैठ कर रहा है पर सरकार पड़ोसी देशों को उन की बेजा हरकतों पर ललकारने के बजाय खामोश खड़ी देख रही है. हमारे सैनिकों की लाशों को देख कर देशवासियों का खून खौल रहा है पर सरकार सुस्त दिखती है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अकसर मौन ही दिखाई पड़ते हैं.

सरकार के नपुंसक रवैये ने लोगों में गुस्सा पैदा कर दिया है. ऐसे में स्वाभाविक है कि देश की जनता को ऐसे मजबूत राजनीतिक नेतृत्व की तलाश है जो इन तमाम समस्याओं से सख्ती से निबटता नजर आए.

कांग्रेस में राहुल गांधी हैं. वे युवा हैं पर देश के युवाओं पर वे अब तक कोई छाप नहीं छोड़ पाए हैं. देश की समस्याओं को ले कर राहुल का कोई स्पष्ट नजरिया नहीं है. ऐसे में स्वाभाविक है, भाजपा नरेंद्र मोदी के रूप में एक ऐसे भावी प्रधानमंत्री की छवि पेश कर रही है जो न केवल अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कर आम आदमी को महंगाई, भ्रष्टाचार, सुरक्षा जैसी समस्याओं से राहत दिला सके, सीमा लांघने वाले पड़ोसी देशों को भी मुंहतोड़ जवाब दे सके. लेकिन, क्या नरेंद्र मोदी में वह काबिलीयत है जो वे अपने भाषणों में जगहजगह जाहिर करते घूमते हैं. मोदी ने 15 अगस्त को गुजरात के लालन में प्रधानमंत्री की तुलना में अपना जो भाषण दिया, उस का लब्बोलुआब यह था कि मनमोहन सिंह किसी मामले में कुछ करते दिखाई नहीं देते. वह चाहे महंगाई का हो या सीमाओं पर चीन और पाकिस्तान की घुसपैठ का. अपने समूचे भाषण में वे प्रधानमंत्री की आलोचना के अलावा यह नहीं बता पाए कि अगर वर्ष 2014 में वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो क्याक्या करेंगे, कैसे करेंगे. उन्होंने अब तक देश के सामने ऐसा कोई दृष्टिकोण पेश नहीं किया जो वास्तव में देश को आगे ले जाने वाला हो.

सवाल है कि मोदी ने गुजरात राज्य में अपने 10 साल के शासन के दौरान ऐसा क्या किया जो और मुख्यमंत्रियों ने नहीं किया? मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में अशोक गहलोत, महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण, तमिलनाडु में जयललिता, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, ओडिशा में नवीन पटनायक. ये मुख्यमंत्री मोदी के मुकाबले किस बात में कम हैं? क्या ये लोग काम नहीं कर रहे? भले ही शिवराज सिंह चौहान अपनी मूंछ को मोदी के मुकाबले ज्यादा चमका कर न रख पाते हों पर उन के कामों की भी खूब प्रशंसा होती है. भले ही ममता बनर्जी की साड़ी के कलफ में मोदी के झक कुरतेपाजामे की तुलना में अधिक चमक न हो पर वे मोदी से कहां कम हैं. अशोक गहलोत, नवीन पटनायक भी अपनेअपने राज्यों में क्या हाथ पर हाथ धरे बैठै हैं?

हां, मोदी ने सोलर पैनल लगा कर थोड़ी बिजली पैदा कराई पर दूसरे राज्य भी अब इस काम को करा रहे हैं. राजस्थान में अशोक गहलोत एशिया का सब से बड़ा सोलर एनर्जी क्षेत्र बनाने का दावा कर रहे हैं. निवेश गुजरात में बढ़ा तो दूसरे राज्य भी पीछे नहीं हैं. लेकिन मोदी पर एक तो गुजरात दंगों का दाग और विकास के नाम पर रिलायंस, अदाणी, टाटा जैसे कुछ कौर्पोरेट घरानों की मदद करने के आरोप हैं. राज्य में गरीब, मजदूर, दलित और महिलाओं की हालत में कोई बदलाव नहीं आया. फिर ऐसा क्या है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का सब से बड़ा और काबिल दावेदार माना जाने लगा.

दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक ऐसे मोहरे की जरूरत थी जो उस का हिंदुत्व का एजेंडा आगे बढ़ा सके. आज की तारीख में संघ की कसौटी पर नरेंद्र मोदी एकदम खरे उतरते हैं. मोदी ने अपने पिछले 10 साल के कार्यकाल में जो कुछ किया, वह कट्टर हिंदुत्व का ही वास्तविक रूप वह नागपुर का असली एजेंडा है. गोधरा घटना के बाद गुजरात में हुई हिंसा कट्टर हिंदुत्व विचारधारा का नतीजा थी. उस दौरान मोदी की जो भूमिका रही, उस से संघ गद्गद हो गया. मोदी के होते मुसलमानों का कत्लेआम हुआ, और मोदी सरकार ने बचाव व राहत के कामों में जानबूझ कर ढिलाई बरती.

मोदी ने तो अपने भाषणों में यह तक कहा था कि हम राहत कार्य चलाएं या राहत कैंपों में जो बच्चे पैदा हो रहे हैं उन को देखें. मोदी चुनावों में भी उन से पहले और बाद में मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने का कोई मौका नहीं गंवाते थे. वे उस समय संघ के सब से प्रिय पात्र बन गए.

मोदी के उत्थान के बाद अब हिंदू संगठन पूरे जोश में दिखाई पड़ रहे हैं. लेकिन मोदी ने आज हिंदुओं के लिए क्या किया? उन्होंने नष्ट हुए केदारनाथ मंदिर को बनाने की बात कही थी पर केदारनाथ त्रासदी के बाद मोदी हैलीकौप्टर से गए पर उन्होंने कितने हिंदुओं को मलबे से बाहर निकाला? उन्हें हैलीकौप्टर से क्यों, पैदल जाना चाहिए था और जब सारे हिंदू तीर्थयात्री सुरक्षित बच निकलते तभी वापस आना चाहिए था पर वे जल्दी ही वहां से चल दिए.

क्या सिर्फ लफ्फाजी करने से देश में बदलाव लाया जा सकता है? सवाल है नरेंद्र मोदी गुजरात में लीक से हट कर ऐसा कौन सा अच्छा काम किया है जो चमत्कारिक साबित हुआ है. ऐसे में वे समूचे देश के लिए कैसे कोई चमत्कारिक काम कर सकेंगे या कोई चमत्कारिक कानून बना सकेंगे.

पिछले 300 सालों के दौरान दुनिया में कानूनों के द्वारा बहुत से सामाजिक विकास और बदलाव  हुए हैं. जो देश धर्म के गुलाम थे और जहां आज भी धार्मिक कानून हावी हैं वहां गरीबी, भुखमरी, हिंसा, अशिक्षा, अमानवीय प्रथाएं अधिक हैं. पाकिस्तान, अफगानिस्तान में आज भी अमानवीयता की हदें लांघने वाले कानून हैं.

नरेंद्र मोदी जिस तरह अपना कद राष्ट्रीय नेता या प्रधानमंत्री के बराबर मान कर चल रहे हैं, उन के गुजरात के कार्यों को देखते हुए तो नहीं लगता कि वे इस बड़े देश में कोई बहुत बड़ा सामाजिक विकास और परिवर्तन ला देंगे. मोदी ने अपने कार्यकाल में कई विधेयक पारित कराए. उन में से कुछ विधेयकों पर गौर करते हैं.

सब से पहले गोधरा घटना और फिर गुजरात दंगों के बाद वर्ष 2003 में आया गुजरात कंट्रोल औफ टेररिज्म ऐंड औरगेनाइज्ड क्राइम बिल पर देशभर में बड़ा हल्ला मचा. इस बिल पर देश को आशंका थी कि गुजरात सरकार किसी भी अल्पसंख्यक या उस के किसी वर्ग को इस कानून में फंसा सकती है. गुजरात विधानसभा द्वारा इस विधेयक को पारित करा कर राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा गया पर राष्ट्रपति ने इसे कुछ संशोधनों का सुझाव देते हुए लौटा दिया था. मगर राज्य सरकार ने फिर इसे ज्यों का त्यों भेज दिया. राष्ट्रपति ने इसे दोबारा लौटा दिया.

वर्ष 2005 में गुजरात विधानसभा में श्री सोमनाथ संस्कृत यूनिवर्सिटी ऐक्ट-2005 पारित हुआ था. इस कानून के तहत राज्य में संस्कृत पाठशाला, कालेज, इंस्टिट्यूट खोलने व शास्त्री, आचार्य जैसी संस्कृत डिगरियां देने का प्रावधान किया गया. इस का उद्देश्य गुरुशिष्य परंपरा को बढ़ावा देना भी है. यानी पुराने जमाने में चले जाओ और गुरुओं को दानदक्षिणा देते रहो. अध्ययन के तरीके में अनुशासन और स्वाध्याय मूलभूत तत्त्व होंगे. यह भी कि ऐसे स्कूलों की स्थापना करना जहां भाषा, संस्कृति, दर्शन, वेदवेदांग, शिक्षक, प्रशिक्षण, धर्मशास्त्र, वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाएगा.

इस का मतलब देश फिर 1 हजार साल पीछे चला जाएगा. केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार पर हल्ला करने वाले मोदी गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति में रोडे़ अटकाते रहे. पिछले साल जब राज्यपाल कमला बेनीवाल द्वारा राज्य सरकार को अलग कर न्यायमूर्ति आर ए मेहता की लोकायुक्त के तौर पर नियुक्ति कर दी गई तो मोदी को खूब अखरा. मोदी सरकार का राज्यपाल के साथ झगड़ा चला. इस नियुक्ति के खिलाफ  सरकार सुप्रीम कोर्ट में गई. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ठुकरा दी लेकिन बाद में मोदी सरकार विधानसभा में लोकायुक्त विधेयक ले कर आई जिस में राज्यपाल और हाईकोर्ट के जज को लोकायुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया से ही अलगथलग कर दिया गया.

गुजरात स्पैशल इकोनौमिक जोन ऐक्ट-2004 के तहत भूमाफियाओं, निजी डैवलपरों को खूब प्रश्रय मिला. विधेयक के तहत डैवलपर को मान्यता दी गई. गुजरात राज्य महिला आयोग ऐक्ट-2002 बनाया गया पर सरकार ने नियुक्ति और बर्खास्तगी के सारे अधिकार खुद के पास रखे. विधेयक में लिखा है कि राज्य सरकार चेयरमैन या सदस्य को कभी भी, किसी भी समय हटा सकती है.

वहीं केंद्र सरकार ने विवाह विधि संशोधन विधेयक, खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि अर्जन विधेयक जैसे विशेष कदम उठाए हैं. सोनिया गांधी ने इन तमाम सामाजिक कानूनों के जरिए देश के आम, गरीब, वंचित आदमी को आगे बढ़ाने की कोशिश की है. इन कानूनों का असर धीरेधीरे इन लोगों के जीवन पर पडे़गा. उन की माली, शैक्षिक दशा में सुधार होगा. उधर, मोदी के कानूनों में गरीबों, वंचितों, किसानों का भला नहीं, चंद औद्योगिक घरानों और धर्म की खाने वालों की जयजय जरूर हो रही है. हां, मोदी ने गुजरात दंगों की बदनामी के बाद राज्य में विकास पर ध्यान लगाया पर वास्तविक विकास कहां होना चाहिए, कैसा होना चाहिए, प्रधानमंत्री पद के दावेदार मोदी शायद समझ नहीं पाए.

मोदी के कानून धर्म के ध्ांधेबाजों और कौर्पोरेट को ही फायदा पहुंचाने वाले हैं. श्री सोमनाथ संस्कृत यूनिवर्सिटी से किस का कल्याण हो सकता है, सिवा धर्म की खाने वालों के. इस यूनिवर्सिटी के माध्यम से मोदी राज्य में वास्तुशास्त्री, ज्योतिषी पैदा करना चाहते हैं, जो अंधविश्वास फैलाने के अलावा और क्या योगदान दे सकते हैं? ये लोगों में भाग्य के भरोसे रहने की सीख देंगे, जिस से निकम्मापन बढे़गा.

सोलर एनर्जी पैनल स्थापित करने के लिए निजी कंपनियों को जमीनें दी गईं. ये सोलर पैनल निजी कंपनियों द्वारा ही लगाए गए और फायदा भी उन्हें ही अधिक हुआ. राज्य की विकास दर अन्य राज्यों के मुकाबले सामान्य ही है. दूसरे राज्यों से कौर्पोरेट उद्योग उठ कर गुजरात में आ रहे हैं या आप आमंत्रित कर रहे हैं तो यह अच्छी बात है पर क्या रोजगार के लिए दूसरे राज्यों से और लोग भी आ रहे हैं?

क्या मोदी गुजरात दंगों से पहले की सांप्रदायिक सौहार्द्र की स्थिति को लौटा पाएंगे? समूचे देश को चलाने के लिए सब के लिए समान अधिकार और तरक्की वाले कानूनों की जरूरत होती है. नरेंद्र मोदी कभी भी बराक ओबामा, ब्लादिमीर पुतिन की बराबरी नहीं कर सकते. न सोच में, न नीतियों के निर्माण में, न लोकतांत्रिक सुदृढ़ता के लिए उठाए जाने वाले कदमों में और न ही अंगरेजी बोलने में.

ऐसे में सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी इस देश को साधुसंतों के आदेश पर चलाएंगे? किस तरह के कानून बनाएंगे? क्या धर्म, मनुस्मृति पर आधारित विधेयक लागू करेंगे? उन के पिछले 10 सालों के कामों और कानूनों से नहीं लगता कि वे 120 करोड़ की आबादी वाले देश और दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र भारत में सब को साथ ले कर चलने की योग्यता रखते हैं. कोरे भाषणों से इस देश का भला नहीं होने वाला है.

देश के सामने सब से अहम सवाल यह है कि क्या आज भारत को मध्यकालीन विचारधारा को साथ ले कर चलने वाले प्रधानमंत्री की जरूरत है या 2040-50 से आगे की सोचने वाले की?

बेकारी और बेकार

बेकारी की समस्या इस देश में विकराल नहीं दिखती क्योंकि यहां लोग 2 घंटे काम कर के भी अपने को काम पर समझते हैं और उन्हें गुजारे लायक पैसा मिल जाता है. यूरोप, अमेरिका बेकारी की मार से कराह रहे हैं. अमेरिका, जहां की केवल 7.5 प्रतिशत आबादी बेकारों के रजिस्टर में है, बेकारी राष्ट्रपति के लिए रात की नींद उड़ा देती है और हर सप्ताह वह गिनता है कि कितनी नई नौकरियां निकलीं.

दूसरी तरफ अटलांटिक पार, ग्रीस में बेकारी 60 प्रतिशत है,?स्पेन में 56, इटली में 38, हंगरी, पोलैंड, आयरलैंड, पुर्तगाल आदि में लगभग 30 प्रतिशत. इन देशों में मुख्य सड़कों पर आएदिन बड़ेबड़े धरनेप्रदर्शन होते रहते हैं. युवा सरकारों को कोसते नजर आते हैं. बेकारी से जूझना आसान नहीं होता. जब अपने पैरों पर खड़े होने का समय आए और पता चले कि कोई आप की योग्यता का इस्तेमाल करने वाला न हो तो पूरा अस्तित्व कांप उठता है. गहरा मानसिक तनाव हो जाता है. मातापिता,?भाईबहन या सरकारी दान पर भिखारियों की तरह रहना पड़ता है.

इस गम को भुलाने के लिए शराब या किसी अन्य नशे की आदत पड़ जाती है. काम वाले दोस्त साथ छोड़ जाते हैं और बेकारों का गुट बन जाता है. बेकारी की समस्या का मुख्य कारण यह है कि बहुत से युवा इस तरह पारिवारिक या सरकारी लाड़ में पलते हैं कि वे जौब मार्केट के लिए अपने को तैयार ही नहीं करते. वे कम काम वाली नौकरियां ढूंढ़ते हैं. नौकरी पाने पर नई तकनीक या विविधता अपनाने से हिचकते हैं. मेहनत करना भूल जाते हैं. अपना समय व पैसा मौजमस्ती, नाचगाने, खानेपीने में लगा डालते हैं.

हमारे देश में वही बेकार हैं जो कम से कम काम करना चाहते हैं. काम वालों को अगर निकाला जाता है तो कम वेतन पर दूसरी नौकरी मिल ही जाती है. हमारे यहां जो सरकारी नौकरी या मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत नहीं है, वह अपने को बेकार मानता है. हर जने को, चाहे वह बेकार हो या अच्छीभली पक्की नौकरी पर हो, नई तकनीक सीखने, मेहनत से काम करने, की आदत बनाए रखनी चाहिए. जो बिलकुल बेकार हैं वे अपने कपड़े धोएं, आसपास की सफाई करें, वृद्धों की सहायता करें पर खाली न बैठें. जो काम पर हैं, चाहे सरकारी नौकरी क्यों न हो, अपने को जंग न लगने दें. आगे बढ़चढ़ कर जिम्मेदारी लें. कई घंटे स्वत: काम करें. शरीर को व्यस्त रखें.

अपनी नौकरी बनाए रखनी है, दूसरों के लिए नौकरियां पैदा करनी हैं तो उत्पादकता बढ़ानी होगी. पूंजी का पूरा व सही इस्तेमाल करना होगा. नारेबाजी, धरनेप्रदर्शन कोई शौर्टकट नहीं है. डिगरी पा लेना अकेली योग्यता नहीं है. लगातार मेहनती बदन और वैसी सोच बनाना जरूरी है वरना हाथ मलोगे या हाथ पसारोगे.      

कानून और अदालत

देश की अदालतों की नाक तले अन्याय और गुनाहगारों को सजा देने वाला कानून लोकतंत्र के मुख्य अधिकार स्वतंत्रता को बुरी तरह कुचल रहा है. आज किसी के लिए भी यह आसान है कि वह पुलिस थाने में सही या झूठे अपराध की प्राथमिकी दर्ज करा कर किसी को भी जेल भिजवा दे. अदालतों ने बेल नहीं, जेल का मार्ग अपना लिया है क्योंकि वादी और जनता को खुश करने का यह आसान तरीका है.

देश की अदालतें जानती हैं कि आज किसी को सजा दिलाना बहुत मुश्किल है. लंबी गवाहियों, अपीलों, अदालतों की घोंघे से भी धीमी चाल के कारण सजा दिलातेदिलाते 10-15 साल लग जाएंगे. इसलिए ज्यादातर अदालतें मुलजिम को 10-15 से 50-60 दिन तक के लिए जेल भेज कर अपना न्याय करने का थोथा दावा ठोंक देती हैं. देश की जेलों में 90 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन पर अपराध साबित नहीं हुआ और वे अपने जीवन के बहुमूल्य दिन अपराधियों के बीच बिताने को विवश हैं.

जब लालू प्रसाद यादव, जे जयललिता, सुरेश कलमाड़ी जैसे सीखचों के पीछे जाते हैं तो देश की जनता के दिल में जल रही आग शांत होती है पर यह गलत और अमानवीय है. उन्हें जेल में भेजिए पर अपराध साबित होने के बाद. अपराध नहीं किया, यह साबित करने के लिए उन्हें बाहर रहने का मौका मिलना चाहिए. जमानत एक महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकार होना चाहिए. पूछताछ के लिए 2-3 दिन थाने में रोकने के बाद हर जने को छोड़ा जाना चाहिए. केवल हत्या या गंभीर चोट पहुंचाने के मामले ऐसे हैं जिन में अपराधी को समाज से दूर रखने के लिए जेल में भेजने का रास्ता अपनाया जा सकता है.

अदालतें अपनी गिरती प्रतिष्ठा, ‘वहां न्याय नहीं मिलता’, को बचाने के प्रयास में व सख्त दिखने के लिए ‘जेल, बेल नहीं’ का सिद्धांत अपनाती हैं जो संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के खिलाफ है.

 

धर्म और दंगा

उत्तर प्रदेश में धार्मिक दंगों के भयंकर जानवर का फिर से सिर उठा लेना थोड़ी आश्चर्य की बात है. अखिलेश यादव की सरकार कितनी भी सुस्त हो, मुसलिमों के प्रति वह कभी भी उदासीन नहीं रही. ऐसे में दंगे इस तरह हो जाएं कि गांव के गांव जला दिए जाएं और हजारों को गांव छोड़ने पड़ें, कुछ जमा नहीं. पिछली बार इस तरह के दंगे तो नरेंद्र मोदी के शासन में वर्ष 2002 में गुजरात में हुए थे जहां प्रशासन को सुस्ती अपनाने के निर्देश दिए गए थे.

बात साफ है कि अभी भी धर्म को भुनाना आसान है और धर्म के नाम पर जान लेना भी. एक लड़की को छेड़ने का या मोटरबाइकों के भिड़ जाने का ही मामला होता तो इतनी मारकाट न होती. यहां तो पूरी तैयारी से एकदूसरे की जान लेने की कोशिश हुई है, तभी गांव खाली हुए हैं. धर्म का काम ही असल में लोगों में खाइयां पैदा करना रहा है क्योंकि धर्म की दुकान चलती ही तब है जब कुछ को दूसरों से मिलने न दिया जाए और उन दूसरों को दुश्मन करार दे दिया जाए. चाहे व्यापार में साथ काम करते हों, बस में साथ सफर करते हों, दफ्तरों में कंधे से कंधा मिला कर काम करते हों पर जहां धर्म का शामियाना टंगा नहीं, लोग एकदूसरे से अलग हो जाते हैं. धर्म का नशा कुछ शब्दों के जाम पीने से तुरंत चढ़ जाता है. दारू ठेकेदारों की तरह धर्म के ठेकेदार छोटे मामले को बढ़ानेचढ़ाने में माहिर होते हैं और यही मुजफ्फरनगर में हुआ जहां न तो गोधरा जैसा मामला था न बाबरी मसजिद जैसा.

लगा तो ऐसा है कि मानो कुछ लोग तैयार हैं कि किसी तरह दंगा कराया जाए ताकि हिंदुओं और मुसलिमों में पहले से खुदी धर्म की खाई में पैट्रोल डाल कर आग जलाई जा सके, जो दोनों तरफ के लोगों को  झुलसा दे. कफन पर राजनीति करना तो हमारे राजनीतिबाज नेतागीरी की पहली क्लास में ही सीख आते हैं. यह दंगा अब पुलिस व अर्धसैनिकों के सहारे भले ही दबा दिया गया पर यह स्थायी हल नहीं है. जब तक धर्म की दुकानों पर भीड़ रहेगी, हम बारूद के ढेरों पर बैठे रहेंगे. जरूरत धर्मों के बीच भाव पैदा करने की नहीं, धर्म की दुकानें बंद करने की है जहां कल्पना की कहानियों को ठोस सामान की तरह महंगे दामों पर बेचा जा रहा है. पर यह आसान नहीं, शायद नामुमकिन है क्योंकि धर्म के व्यापार में करोड़ों लोग लगे हैं जो रोज निरर्थक बातें कर के बेवकूफों को फंसाते हैं ताकि वे हत्या, अपराध कर धर्म का नाम रोशन रख सकें.

 

बलात्कारियों को सजा

16 दिसंबर, 2012 को एक छात्रा के साथ चलती बस में हुए निर्मम बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा तो देनी ही चाहिए थी. उन का अपराध ही ऐसा था कि न उस पर रहम की दुहाई सुनी जा सकती है और न कम आयु के जोश का बहाना. पशुओं से भी बदतर जो बरताव उन 6 जनों ने एक अनजानी लड़की से किया वह केवल सैनिकों द्वारा शत्रुओं की औरतों से मध्ययुगों में किया जाता था. दिल्ली जैसे शहर में लोग इस तरह खूंखार हो सकते हैं, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती. लगा ही नहीं कि ये 6 जने हजारों साल सभ्यता का पाठ सिखाने वाले समाज की देन हैं.

बलात्कार तो आम हैं और ये सैक्स की भूख का परिणाम कहे जा सकते हैं पर बलात्कार के दौरान अंगभंग करना, योनि में स्टील रौड डालना, हाथ डाल कर अंतडि़यां निकाल लेना कल्पना से भी बाहर है. सफेदपोश लोग कितने जहरीले हो सकते हैं, इस की कल्पना भी असंभव है. उन दोषियों को तो अदालत ने सजा दे दी पर उस समाज को क्या सजा दी जिस ने ऐसे खूंखार जानवर पैदा किए. आखिर किन परिवारों में इस तरह का व्यवहार सिखाया गया है? यह पाठ कौन पढ़ाता है कि बलात्कार का आनंद लो और हिंसा के जरिए उस आनंद को बढ़ाओ? हमारी शिक्षा, तथाकथित धर्म के उपदेश, सुगठित व्यवस्था आखिर किस काम की कि लड़की को अकेले देखा और 6 जने उस पर टूट पड़े.

ऐसे समाज पर धिक्कार है जो इन को अपने बीच पालता है. ये मानसिक रोगी नहीं थे, ये समाज के दिए काले रंग में ही पुते थे. कठघरे में 4 के अलावा समाज भी था. यह बात दूसरी है कि समाज ने अपना दोष इन पर मढ़ दिया और खुद को सभ्य, कानूनप्रिय साबित कर दिया.

 

प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवा कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वही किया है जो हिंदू राजाओं के साथ उन के ब्राह्मण सलाहकार किया करते थे. इतिहास में दर्ज है कि ज्यादातर राजा ब्राह्मणों की सिफारिश पर बनाए जाते थे. कुछ ही युद्धों में जीत कर या नीचे से जनता की इच्छा पर राजा बन पाते थे. नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की भी पसंद हैं, यह औपचारिकता तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नहीं निभाने दी.

नरेंद्र मोदी ने अब तक केंद्र में काम नहीं किया. वे राज्य के मुख्यमंत्री चाहे हों पर वहां उन्होंने कोई क्रांतिकारी काम नहीं किया. उन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भरोसा है तो इसलिए कि उन्होंने वर्ष 2002 में दिखा दिया था कि वे कैसे हिंदुओं का नाजायज पक्ष ले सकते हैं और राजनीतिक व कानूनी वार झेल सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी के बहुत से समर्थकों को नरेंद्र मोदी अपने मुसलिम विरोध के कारण बेहद पसंद हैं. भारतीय जनता पार्टी के सभी केंद्रीय नेता सम झते हैं कि 20 प्रतिशत जनता से वैरभाव ले कर देश नहीं चलाया जा सकता. हिटलर भी यहूदियों का भारी नरसंहार कर के अपने को और जरमनी को पूर्ण विध्वंस से नहीं बचा सका था.

लालकृष्ण आडवाणी ने इस बार बेहद दम दिखाया है. उन्हें एहसास हो गया है कि विघटन की राजनीति देश को डुबो देगी. भारतीय जनता पार्टी के अंधभक्तों की मांग को लगातार अनदेखा कर उन्होंने एक तरह से राममंदिर, रथ यात्रा व बाबरी मसजिद को तुड़वाने के लिए अपने ऊपर लगे कलंकों को थोड़ा फीका किया है. भारतीय जनता पार्टी का हाल शिवाजी के बाद के सालों में मराठा राजाओं जैसा हो जाए तो कोई हैरानी नहीं जो पेशवाओं के कारण बुरी तरह हारे थे. महाराष्ट्र गंगाजमुनी हिंदू संस्कृति का क्षेत्र तो नहीं पर संस्कृतीकरण के लालच में मराठी नवब्राह्मण अपना पुराना नाटक दोहराने से बाज नहीं आते दिखते.

 

आपके पत्र

सरित प्रवाह, अगस्त (द्वितीय) 2013

आप की संपादकीय टिप्पणी ‘तेलंगाना और कांगे्रस’ पढ़ी. आप ने तेलंगाना राज्य बनाने के निर्णय को सही ठहराया है. आप के विचारों का स्वागत करते हुए पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाके और तराई डुवर्स के गोरखा बहुल क्षेत्रों को ले कर एक पुराने आंदोलन का जिक्र करना चाहता हूं. गोरखालैंड के मुद्दे को ले कर संसद में हंगामा हुआ जब दार्जिलिंग के सांसद व वरिष्ठ भाजपा नेता जसवंत सिंह ने गोरखालैंड के आंदोलन का जिक्र करते हुए राजनीतिक समाधान निकालने का अनुरोध किया लेकिन तृणमूल कांगे्रस के सांसद संदीप बंधोपाध्याय, सौगत राय और कल्याण बनर्जी ने असंसदीय भाषा में गोरखालैंड का घोर विरोध किया, जैसा पहले से बंगाल के अन्य दल माकपा, भाकपा, कांग्रेस करते आ रहे हैं.

गोरखालैंड के लिए जिस भूभाग को ले कर आंदोलन किया जा रहा है, उस का उन्हें ऐतिहासिक सत्य मालूम नहीं है. सुगौली संधि, तितलिया संधि और सिंचूला संधि के तथ्यों का ज्ञान नहीं है. इतना ही नहीं, उन्हें 1986 में तत्कालीन वाम मोरचा सरकार द्वारा प्रकाशित श्वेतपत्र में लिखित सत्य भी स्वीकार्य नहीं है. दरअसल, दार्जिलिंग की भूमि सिक्किम के राजा ने 1835 में ब्रिटिश सरकार को दी थी. तब इस इलाके में रहने वाले कौन थे? इस का जवाब है कि गोरखा ही थे.

अफसोस तो इस बात का भी है कि गोरखाओं का खुल कर विरोध करने वाले भद्र लोगों को यह भी जानकारी नहीं है कि देश के स्वतंत्र होने के बाद डा. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में बनी संविधान सभा के सदस्यों में कलिंपोंग (दार्जिलिंग) के बैरिस्टर अरि बहादुर गरुड़ भी थे. आज के राजनेता देश के स्वतंत्रता संग्राम में जीवन बलिदान करने वाले सुभाषचंद्र बोस के सहयोगी गोरखाओं के त्याग का इतिहास जानना ही नहीं चाहते. तेलंगाना राज्य गठन करने का फैसला जब कांगे्रस वर्किंग कमेटी ने लिया तो एक शताब्दी पुराने गोरखालैंड राज्य की मांग के लिए किए जा रहे आंदोलन को ऊर्जा मिली है. गोरखालैंड के नाम से राज्य बनाना ही होगा वरना आंदोलन रुकने वाला नहीं.

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)

*

आप की टिप्पणी ‘मैडिकल शिक्षा, सरकार और अदालत’ सचाई से रूबरू कराती है. इस में यह दर्शाया गया है कि व्यावसायिक मैडिकल शिक्षा पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया द्वारा आदेशित कौमन मैडिकल एंट्रैंस टैस्ट के नियम को असंवैधानिक करार दे दिया है. इस से लगभग 300 कालेज खुश होंगे जो निजी सैक्टर के हैं. कौमन टैस्ट के कारण वे अपनी मनमरजी के अनुसार छात्रों को मैडिकल कालेजों में प्रवेश नहीं दे पा रहे थे.

छात्रों को अब अलगअलग संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अलगअलग टैस्टों में बैठना पड़ेगा और वे देशभर में मारेमारे फिरेंगे. दरअसल, सस्ते होने के चलते सरकारी संस्थानों में प्रवेश के लिए लंबी लाइनें लगने लगीं और लाखों की रिश्वतें लीदी जाने लगीं. इन के पर्याय के रूप में प्राइवेट मैडिकल कालेज खुले और थोड़ीबहुत आनाकानी के बाद सरकार ने उन्हें स्वीकार कर लिया. यह अच्छा था क्योंकि सरकार के वश में और कालेज खोलना संभव न था. देश को चिकित्सा कालेजों की बहुत जरूरत है और गांवगांव में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके, इस के लिए हर तरह के चिकित्सक चाहिए ही. इस मामले में ज्यादा ढीलढाल आगे चल कर महंगी साबित होगी.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

*

‘मैडिकल शिक्षा, सरकार और अदालत’ शीर्षक से प्रकाशित आप का संपादकीय पढ़ा. आप के विचार अच्छे हैं. सरिता के माध्यम से मैं कुछ अपने विचार पेश करना चाहता हूं. प्राइवेट मैडिकल कालेजों में पढ़ाई के अलावा सबकुछ होता है. इसी वजह से उन का स्तर सरकारी मैडिकल कालेजों से नीचे है. इस के प्रमुख कारण ये हैं :

दाखिला मेरिट के आधार पर नहीं, बल्कि पैसों के बल पर होता है. अधिकांश प्राइवेट मैडिकल कालेजों में फुलटाइम टीचिंग फैकल्टी नहीं है. वे  वर्ल्डक्लास सुविधा का दावा करते हैं लेकिन अफसोस कि वर्ल्डक्लास शिक्षा देने में असमर्थ हैं. छात्र कालेज आते ही नहीं. यदि आते हैं तो सुविधाओं का लाभ लेने के लिए आते हैं. कान में इअरफोन लगा कर गाने सुनते हैं. लेकिन क्लास नहीं अटैंड करते. तो फिर इस वर्ल्डक्लास सुविधा का क्या मतलब है?

अधिकांश छात्र कालेज नहीं आते. लेकिन कोई भी छात्र उपस्थिति के आधार पर परीक्षा में बैठने से वंचित नहीं किया जाता, बल्कि पेनल्टी ले कर उसे परीक्षा में बैठने दिया जाता है, जोकि गलत है. प्रबंधन छात्रों की पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय उन्हें पास करवाने में व उन्हें प्रायोजिक परीक्षा में अच्छे नंबर दिलवाने में दिलचस्पी लेते हैं, जोकि उन की मजबूरी है. यदि छात्र फेल होते हैं तो पेरैंट्स का दबाव आता है, जिन्होंने लाखों रुपए दे कर अपने बच्चों का दाखिला करवाया है. प्रबंधन भी चाहता है कि हर छात्र अच्छे नंबर से पास हो, ताकि अगले सत्र में प्रवेश लेने ज्यादा से ज्यादा छात्र आएं. प्राइवेट मैडिकल कालेज पैसा कमाने के केंद्र बने हुए हैं. उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं कि वे छात्रों को क्या दे रहे हैं. पैसे के बल पर प्राइवेट मैडिकल कालेज सबकुछ मैनेज कर लेते हैं. पेरैंट्स सोचते हैं कि ज्यादा पैसे दे कर प्राइवेट कालेजों में उन के बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं तो यह उन का भ्रम है.

शशिकांत, जबलपुर (म.प्र.)

*

‘हिंदू राष्ट्रवादी मोदी’ संपादकीय में आप के विचार पढ़े, जो नरेंद्र मोदी यानी नमो के प्रति आप की एलर्जेटिक सोच को उजागर करते लगे. यों भी यह शायद हमारे देश की ही महानता है कि जो अपने राष्ट्र के प्रति जितना ज्यादा देशभक्त या राष्ट्रवादी है, वही देश का सब से बड़ा देशद्रोही या शत्रु कहलाता है. वरना आप जैसे बुद्धिजीवी तत्त्व यह नहीं कहते कि ‘किसी के मात्र हिंदू राष्ट्रवादी कहलाने या पुकारे जाने के कारण ही देश में मुसलिम राष्ट्रीयता का जन्म हुआ, जिस के परिणामस्वरूप ही देश का विभाजन हुआ.’ जबकि विभाजन के लिए वास्तव में वह कुंठित सोच, जिस के तहत आज भी किसी समुदाय विशेष के लोग स्वयं को भारतीय कहलाने में गर्व अनुभव न करते हों, जिम्मेदार हैं.

वैसे भी हाल ही के एक सर्वेक्षण में देश के युवाओं ने स्वीकारा कि उन्हें ऐसा तानाशाह शासक चाहिए जो अपने डंडे के जोर से देश की सभी जरूरतों को पूरी करने की ताकत रखता हो. वहीं अगर 1975 के तानाशाह फिर से इस देश के शासक चुने जा सकते हैं तो नमो के पीएम चुने जाने में कौन सी अड़चन है? हां, हिंदू पुकारना हमारे यहां अपराध है.

टी सी डी गाडेगावलिया, करोल बाग (न. दि.)

*

लेख ‘मिड डे मील मामला : स्कूलों में बंटता जहर’ हकीकत बयान करता है. बिहार के एक स्कूल में 23 बच्चों की मिड डे मील खाने से हुई मृत्यु ऐसा पहला मामला नहीं है. कई बार ऐसा हो चुका है और भ्रष्ट प्रशासन के चलते ऐसा होने की आगे भी आशंका है. सरिता में प्रकाशित चित्र ने दिल दहला दिया. पर हम हैं कि पैसों का सौदा किए जा रहे हैं. यह भूल कर कि इंसान अमीर हो या गरीब, अन्न ही खाता है. पूरी दुनिया में कोई भी इंसान पैसा खा कर जीवित नहीं रह सकता है. उसे अन्न का ग्रास करना ही पड़ेगा. और भ्रष्ट व्यवस्था के चलते कब किस के हाथ में मृत्यु का ग्रास थमा दिया जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.

कृष्ण मिश्रा, लखनऊ (उ.प्र.)

*

लेख ‘मिड डे मील’ मामला ‘स्कूलों में बंटता जहर’ पढ़ कर मन क्षुब्ध हो गया. क्या ये वही सरकारी स्कूल हैं जिन में कभी डा. राजेंद्र प्रसाद व लाल बहादुर शास्त्री सरीखे लोग पढ़ा करते थे? शिक्षकों की लापरवाही व पढ़ाई के गिरते स्तर के कारण वैसे भी लोग सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों का नामांकन करवाने से कतराते हैं, उस पर ‘मिड डे मील’ की इस हृदयविदारक दुर्घटना ने कोढ़ में खाज वाली कहावत को चरितार्थ ही किया है.

देश की सरकार योजनाएं तो खूब बनाती है परंतु उन योजनाओं का संचालन करना नहीं जानती. सरकारी कर्मचारी तो लापरवाही के लिए जाने ही जाते हैं. सरकार जानती है कि इन बच्चों के मातापिता अत्यंत निर्धन हैं और निर्धनता कमजोर का पर्याय है. तभी तो थोड़े दिन की गहमागहमी के बाद सबकुछ शांत हो जाता है और सरकारी कार्य फिर अपनी चाल से चलने लगता है. मिड डे मील के रूप में जहर बांटने से तो अच्छा होता अगर हर बच्चे को साबुत अनाज व सब्जियां ही दे दी जातीं ताकि मातापिता साफसफाई से खाना बना कर अपने बच्चों को खिलाते.

आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर (उ.प्र.)

*

समाधान से असहमत

अगस्त (प्रथम) अंक में ‘पाठकों की समस्याएं’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित चौथे प्रश्न के उत्तर में कंचनजी के समाधान से मैं असहमत हूं. अपनी संतान से संरक्षण पाना बुजुर्ग मातापिता का हक है, फिर चाहे वह संतान पुत्र हो या पुत्री. यहां, प्रश्नकर्ता की पत्नी बीमार, विधवा मां की इकलौती संतान है. इसलिए उन की देखभाल करना प्रश्नकर्ता की पत्नी व स्वयं प्रश्नकर्ता का नैतिक व सामाजिक उत्तरदायित्व है.

यहां, प्रश्नकर्ता पत्नी को मायके भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. प्रश्नकर्ता के अनुसार, जब वे अपनी सास की बहन के यहां पहुंचे तो उन की सास की तबीयत वाकई खराब थी. यानी पत्नी झूठे बहाने बना कर नहीं जाती बल्कि मां की बीमारी से मजबूर हो कर जाती है.

मेरे विचार से बेहतर समाधान यह होगा कि प्रश्नकर्ता अपनी पत्नी व सास को यह भरोसा दिलाने की कोशिश करें कि उन की परेशानी में वे उन के साथ हैं. हो सके तो बीमार सास को स्वस्थ होने तक या आजीवन ससम्मान अपने साथ रखें ताकि पत्नी निश्चिंत हो कर अपने घरपरिवार की तरफ ध्यान दे सके. हमेशा याद रखें कि जितने कष्ट उठा कर आप के मातापिता ने आप का पालनपोषण किया है, उतने ही कष्ट उठा कर पत्नी के मातापिता ने उस की परवरिश की है. इसलिए जो सम्मान व समर्पण आप पत्नी से अपने परिवार वालों के लिए चाहते हैं वही सम्मान व समर्पण आप को पत्नी के मातापिता को देना होगा.

पतिपत्नी का रिश्ता आपसी विश्वास व सहयोग पर आधारित होता है न कि अधिकार बोध पर. इस पूरे मामले में प्रश्नकर्ता को आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है. यदि वे सच्चे मन से सास के प्रति अपनी जवाबदेही को समझें और निभाएं तो तनाव के बादल छंट जाएंगे व स्थितियां सामान्य हो जाएंगी.

ज्योति राकेश, बेतिया (बिहार)

*

बच्चों के हक पर डाका

अगस्त (द्वितीय) अंक में ‘मिड डे मील मामला : स्कूल में बंटता जहर’ लेख पढ़ कर बड़ा दुख हुआ. देश से कुपोषण की समस्या दूर करते हुए बच्चों को शिक्षा के प्रति आकर्षित करने के लिए ‘दोपहर का भोजन’ योजना बनाई गई थी. दुखद यह है कि यह योजना एक बड़े घोटाले में तबदील होने के साथ ही बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रही है. पिछले दिनों बिहार के सारण जिले में 23 मासूम बच्चों की अकाल मृत्यु ने इस योजना में हो रही धांधली और लूट को सब के सामने ला दिया है.

इस योजना के लागू होते ही इस ने अपना यह सकारात्मक प्रभाव दिखा दिया कि स्कूल में बच्चों की उपस्थिति काफी बढ़ गई. लेकिन यह योजना भी देश के राजनीतिक और सामाजिक गिद्धों की नजरों से ज्यादा दिनों तक बच न सकी और आखिरकार यह भी देश के भ्रष्टतंत्र की भेंट चढ़ गई. दुनिया की इस सब से बड़ी ‘दोपहर का भोजन’ योजना के लिए केंद्र सरकार जो पैसा देती है वह बच्चों की थाली तक आतेआते काफी कम हो जाता है.

केंद्र सरकार की यह योजना बहुउद्देशीय और दूरगामी परिणाम वाली है मगर इस के क्रियान्वयन का तरीका ठीक नहीं होने के कारण गरीब बच्चों की भूख को शांत करने वाली इस योजना में हर स्तर पर लूट मची हुई है.

मुकुंद प्रकाश मिश्र, शिवहर (बिहार)

एकता का जोधा अकबर

एकता कपूर का धारावाहिक ‘जोधा अकबर’ हमेशा से विवादों में चल रहा है. इस की टीआरपी भी अच्छी नहीं चल रही है. नए ढंग और नई सोच के साथ प्रस्तुत किया गया यह धारावाहिक राजपूतों के जज्बात से छेड़छाड़ कर रहा है. ऐसे में राजपूतों के विरोध पर एकता ने माफी मांगी है और धारावाहिक को वे फिर से लिखवा रही हैं. एकताजी, सासबहू का धारावाहिक छोड़ कर आप कुछ भी करती हैं तो आप की नई सोच हमेशा उलटी पड़ती है. कम से कम सीरियल के तथ्यों को ले कर आप से यह उम्मीद नहीं थी.

 

रणदीप की पर्सनल लाइफ

बौलीवुड ऐेक्टर्स हमेशा अपनी पर्सनल लाइफ को डिस्कस करने से कतराते हैं, रणदीप हुड्डा भी आजकल अपनी पर्सनल लाइफ को डिस्कस करने से कतरा रहे हैं. दरअसल, रणदीप आजकल अदिति राव हैदरी के साथ काफी बार देखे गए, उन के रोमांस के चर्चे हैं. इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने आव देखा न ताव, पूछने वाले पर बरस पड़े कि आखिर वे अपनी पर्सनल लाइफ की चर्चा किसी से क्यों करें. रणदीपजी, जब बहुत कुछ हुआ हो तो उसे छिपाने से क्या फायदा, सभी को पता है कि आप के और अदिति के बीच कुछ चल रहा है.

 

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें