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हमारी बेडि़यां

घटना दीवाली के दिन की है. पूजन के बाद मेरे जीजाजी दीया बुझाए बिना ही दुकान बढ़ा कर घर आ गए क्योंकि ऐसी मान्यता है. इस दिन दीया बुझाया नहीं जाता है. रात को चूहे द्वारा दीये की घी से सराबोर बाती को खाने के चक्कर में दीया पलट गया, जिस से पास में रखे स्कूली कपड़ों के साथसाथ किताबों में आग लग गई और आग ने थोड़ी ही देर में आधी दुकान को अपनी चपेट में ले लिया. लाखों का माल स्वाहा हो गया. इस प्रकार एक अनावश्यक प्रथा को निभाने के चक्कर में आर्थिक नुकसान के साथसाथ मानसिक परेशानी भी झेलनी पड़ी.

मनोज जे जैन, चेन्नई (तमिलनाडु)

 

मेरी भांजी 3 महीने से बीमार चल रही थी. मेरी बहन का ध्यान दवा आदि की ओर कम और झाड़फूंक व भभूत की तरफ अधिक था. आखिरकार भांजी का मर्ज काला ज्वर साबित हुआ. मेरी भांजी मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी थी. आननफानन अस्पताल में दाखिल कर उचित उपचार किया गया.

अब जबकि बीमार भांजी को पथ्य, परहेज व उचित देखभाल की आवश्यकता है, उस की तरफ ध्यान न दे कर बहन- बहनोई को ढोंगी बाबाओं व ओझाओं के आगेपीछे भागते देख उन की समझ पर रोना आता है.

एन ठाकुर, दरभंगा (बिहार)

 

हमारे बहुत ही धार्मिक विचारों के एक रिश्तेदार अपने घर के सारे कार्यों को मुहूर्त के अनुसार ही करते हैं. एक दिन वे हमारे घर आए. उन्होंने अपनी धार्मिक चर्चा आरंभ कर दी. अगले दिन मेरे छोटे भाई का एक निजी कंपनी में साक्षात्कार था.

उन रिश्तेदार ने मेरे भाई से कहा, ‘‘वह तड़के उठ कर पूर्व दिशा में जा कर 1 किलो जलेबी या गुड़ रख आए तो उसे काम में कामयाबी मिलेगी.’’ परंतु मेरे भाई ने यह नहीं किया और वह साक्षात्कार में सफल रहा.  मेरे भाई ने फोन कर के उन को नसीहत दी कि वे प्रपंच छोड़ कर, मेहनत व लगन से कार्य करने की धारणा को अपनाएं.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

 

मेरी सासूमां पूजापाठ ज्यादा करती हैं.  मंदिर में महंगा प्रसाद, महंगी चुनरी चढ़ाती हैं. मुझे उन की एक बात अजीब लगती है, जब वे मंदिर के पंडित को 501 रुपए दे कर उन के पांव छूती हैं जबकि उसी मंदिर के बाहर पूरी तरह से लाचार व गरीब लोग उन के पैर छू कर कुछ ही पैसे मांगते हैं तो वे उन्हें झिड़क देती हैं. धर्म के नाम पर भरे पेट को देना और खाली पेट वालों को दुत्कारना, यह अंधविश्वास नहीं तो और क्या है.

दीपिका श्रीवास्तव, पटना (बिहार)

मुझे छोड़ दो मेरे हाल पर

है दुनिया एक मेला, यह है एक झुंड
सांस लेना है दूभर, रोकना है मुश्किल
न कोई फिक्र हो न कोई डर
खुला हो आसमान, पवन की हो सुगंध
मुझे छोड़ दो बस मेरे हाल पर

न कोलाहल सुनाई दे न चीखपुकार
न रोके कोई रास्ता, न दिखाए नया पथ
पंछी की उड़ान हो मेरा सफर
कोयल की कूक हो मेरी डगर
मुझे छोड़ दो बस मेरे हाल पर

कोई तो पहचाने मेरी इस आवाज को
कोई तो दे दे इसे मेरी ही पहचान
बस कोई तो सुन ले
इस धीमी सी चाल को
मुझे छोड़ दो बस मेरे हाल पर.

सुजाता ‘राज’

ये पति

मेरे पति बहुत मजाकिया व हाजिरजवाब हैं. एक बार उन के दोस्त ने कहा, ‘‘मेरी पत्नी बहुत बातूनी है. वह किसी भी टौपिक पर घंटों बोल सकती है.’’ इस पर मेरे पति बोले, ‘‘तेरी भाभी तो बिना टौपिक के भी घंटों बोल सकती है,’’ इस पर सब हंस पड़े और मैं मन ही मन मुसकराते हुए इन की बुद्धि की तारीफ करने लगी.

संगीता जोशी, जलगांव (महा.)

 

मेरी दोस्त के पति बनारस के रहने वाले हैं, लेकिन दिल्ली में रहते हैं. सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं. शादी की पहली वर्षगांठ पर वे अपनी बीवी को मौल में शौपिंग कराने के लिए ले गए. रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर जा कर दुकानदार से कहा, ‘‘मेरी बीवी के लिए गमछे वाला कुरतापजामा दिखाइए.’’

दुकानदार ने उन की तरफ घूर कर देखा, फिर मेरी दोस्त की तरफ. वह एकदम सकपका गई और बोली, ‘‘अरे भाईसाहब सलवारसूट दिखाइए जिस के साथ दुपट्टा भी हो.’’     

उपमा मिश्रा, गोंडा (उ.प्र.)

 

मेरे देवर की शादी थी. मेरी अभी नईनई शादी हुई थी. पति को टूर पर जाना पड़ा. जब वापस आए तो घर मेहमानों से भरा था. हमें एकांत नहीं मिल रहा था जिस कारण मेरे पति बहुत परेशान थे. एक दिन इन्होंने मुझ से कहा, ‘‘मेरे दोस्त रमेश के घर समारोह है और हम दोनों को वहां जाना है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मेहमानों से घर भरा है. मैं कैसे जा सकती हूं,’’ पर ये नहीं माने. हार कर मुझे हां कहना पड़ा. फिर इन्होंने मां से कहा, ‘‘मां, रमेश के घर समारोह है और हम दोनों को बुलाया है.’’ मां ने इजाजत दे दी. ये मुझे एक होटल में ले गए, जहां इन्होंने पहले से ही कमरा बुक करवा रखा था. 4-5 घंटे वहां गुजारने के बाद हम घर आ गए. हम जैसे ही घर पहुंचे उसी समय इन का मित्र रमेश भी आ पहुंचा.

मां ने रमेश से पूछा, ‘‘क्यों रे, आज काहे का समारोह था तेरे घर में?’’ उस ने झट से कहा, ‘‘हमारे?घर तो कोई समारोह नहीं था,’’ ‘‘पर तेरा दोस्त तो बीवी के साथ सुबह से गायब था. फिर कहां गए थे ये दोनों?…अच्छा, तो अब समझ में आया, कौन सा समारोह मना कर आ रहे हैं ये दोनों.’’

हमारी चोरी पकड़ी गई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मैं ने सोचा ये पति भी न… उस दिन को याद कर के हम आज भी रोमांचित हो जाते हैं.

सुधा रत्ती, भोपाल (म.प्र.)

सूक्तियां

सज्जन
जिस प्रकार बादल समुद्र का खारा पानी पी कर भी मीठा जल ही बरसाता है उसी प्रकार सज्जन किसी की कटु वाणी सुन कर भी सदा मधुर वाणी ही बोलता है.
संतोष
जैसे हरा चश्मा लगा लेने से सभी वस्तुएं हरीहरी ही दिखती हैं उसी प्रकार संतोष धारण कर लेने पर सारा संसार आनंदरूप ही दिखाई देता है.
शोभा
अपनीअपनी जगह पर ही किसी वस्तु की विशेष शोभा होती है, जैसे काजल आंख में शोभा देता है और महावर पैर में.
उद्यम
उद्यम करने से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल मनोरथ करने से नहीं. जैसे सोते हुए सिंह के मुख में मृग अपनेआप प्रवेश नहीं करते.
चरित्र
मनुष्य की सब से बड़ी आवश्यकता शिक्षा नहीं वरन चरित्र है और यही उस का सब से बड़ा रक्षक है.
शौर्य
शौर्य किसी में बाहर से पैदा नहीं किया जा सकता, वह तो मनुष्य के स्वभाव में होना चाहिए.

जिंदगी

मुट्ठी में से रेत सी

फिसलती जिंदगी

कस लो मुट्ठी तो

हाथ से निकल जाए जिंदगी

खोलो मुट्ठी तो

हाथ से उड़ जाए जिंदगी

 

पलकों पर ठहरे अंसुअन सी

भीगी जिंदगी

पलकें झपको तो

आंखों से गिर जाए जिंदगी

बंद कर लो आंखों को तो

भीतर कसमसाए जिंदगी

 

नवजात, नन्हे, अकेले

पंछी सी जिंदगी

भीतर रखो तो

भूखी मर जाए जिंदगी

बाहर निकालो तो

शिकारी खा जाए जिंदगी

 

दीवार पर चढ़तीउतरती

चींटी सी जिंदगी

कभी थक कर नीचे

गिर जाए जिंदगी

ऐ काश, कभी लक्ष्य को

पा जाए जिंदगी.

शिवानी सिंह

रूपहले परदे के पीछे ओझल होती नौटंकी

60 साल के सरजूदास कभी नौटंकी के मुख्य कलाकार थे. वे बड़े और लंबे किरदार अदा किया करते थे. उन्हें देखने के लिए दूरदूर से लोग खिंचे चले आते थे. आज वे पटना की सड़कों पर रिकशा चला कर अपना और परिवार का पेट भरने के लिए दिनरात मेहनत करते हैं. नौटंकी के बारे में पूछने पर वे कुछ देर के लिए चुप्पी साध लेते हैं और फिर कहते हैं, ‘‘नौटंकी के जनून पर पेट की आग भारी पड़ी. कब तक नौटंकी कर के अपने मन को आनंद पहुंचाता, इस के चक्कर में घर का सुकून खत्म हो गया था. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और न जाने किनकिन राज्यों में सैकड़ों प्रोग्राम किए पर पेट की आग बु?ाने और परिवार को पालने के लिए कोई काम तो करना ही था. नौटंकी करने के अलावा कुछ और तो आता नहीं था. कई जगह काम ढूंढ़ा पर कोई काम देने को राजी नहीं हुआ. एक दोस्त की मदद से रिकशा मिल गया. बस, उसे ही चला कर पिछले 22 सालों से गुजारा चल रहा है. नौटंकी मन के किसी कोने में दफन हो गई.’’

दूसरे नौटंकीबाज मिले 47 साल के भीखू साह. ये बिहार के दरभंगा जिले के रहिका गांव के रहने वाले हैं. मेलों और त्योहारों के मौके पर नौटंकी करने वाले भीखू ने करीब 8 सालों तक जगहजगह घूम कर नौटंकी की और खूब तालियां बटोरीं. भीखू के अनुसार, वे लैला का रोल करने के लिए मशहूर थे. यादों के दरीचे से धूल हटाते हुए वे कहते हैं, ‘‘जिंदा रहने के लिए कुछ कमाई जरूरी थी. तालियों और तारीफों से पेट तो भरता नहीं है. मजबूरी में नौटंकी को छोड़ना पड़ा और पैसों के लिए ढाबा चलाना शुरू किया. ढाबा चलाने के काम में मानइज्जत तो नहीं है पर दोजून की रोटी का जुगाड़ हो जाता है. 4 लोगों का परिवार का खर्च निकल आता है.’’

आज लोग भले ही बातबेबात यह कहते रहते हों, ‘नौटंकी मत करो’, ‘ज्यादा नौटंकी करोगे तो…’, ‘क्यों नौटंकी कर रहे हो’. पर नौटंकी असल में है क्या? इसे लोग न जानते हैं और न ही जानना चाहते हैं. सिनेमा, मल्टीप्लैक्स, वीडियो, कंप्यूटर और इंटरनैट के दौर में नौटंकी का कोई नामलेवा नहीं रहा है. कभी गांवों और शहरों के लोगों का दिल बहलाने वाली लोककला नौटंकी अब तकरीबन पूरी तरह से गायब हो चुकी है.

उत्तर प्रदेश में जन्मी और पलीबढ़ी नौटंकी 3 से 4 दशक पहले तक गांवों और कसबों के लोगों के मन को बहलाने का मजबूत और पसंदीदा जरिया थी. उत्तर प्रदेश की सीमाओं से निकल कर नौटंकी बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में धूम मचाती हुई समूचे देश के कोनेकोने तक जा पहुंची थी. मनोरंजन के दूसरे साधनों के आने और नौटंकी के कलाकारों को जरूरत के मुताबिक पैसे नहीं मिलने की वजह से यह ताकतवर लोककला धीरेधीरे गायब होने लगी.

12 सालों तक नौटंकी में द्रौपदी का किरदार निभाने वाले अहसान मलिक कहते हैं कि नौटंकी और उस के कलाकारों को न सरकार की ओर से कोई मदद मिल सकी और न ही आज की तरह बड़ीबड़ी कंपनियां ही कोई सहायता देने को आगे आईं. कलाकार भला अपने शौक के लिए कब तक नौटंकी से जुड़े रह पाते? नौटंकी तो छूट गई और जिंदगी कई तरह की ‘नौटंकियों’ में उलझ कर रह गई है.

सारीसारी रात गांव की चौपाल पर चलने वाली नौटंकी का जमाल और धमाल अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है. कला के जानकार हेमंत राव कहते हैं कि नौटंकी के खत्म होने के पीछे कुछ हाथ तो मनोरंजन की नईनई तकनीकों का रहा है पर इस के लिए ज्यादा जिम्मेदार नौटंकी से जुड़े लोग भी रहे हैं. बदलते समय के साथ नौटंकी कला में कोई बदलाव ही नहीं किया गया. वे रामायण और महाभारत की कहानियों को नौटंकी के जरिए दर्शकों के सामने परोसते रहे. हर बार वही घिसीपिटी कहानी और अभिनय से दर्शक बोर हो कर उस से कटने लगे. कई पीढि़यों से चले आ रहे एक ही ढर्रे की नौटंकी से पब्लिक दूर होती गई और नौटंकी वाले इस का ठीकरा कभी सरकार और कभी पब्लिक के माथे फोड़ कर अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश करते रहे. इन्हीं सब वजहों से एक मजबूत और लोकप्रिय लोककला का वजूद खत्म सा हो गया है.

नौटंकी कला से जुड़े ज्यादातर लोगों का मानना है कि सिनेमा नौटंकी को खा गया. नौटंकी की मशहूर कलाकार पद्मश्री गुलाबबाई भी अकसर कहा करती थीं कि सिनेमा की वजह से ही नौटंकी की हालत खराब हुई है. वे अकसर कहती थीं, ‘‘कभी हमारे प्रोग्राम के समय स्टेज के पास बैठने के लिए मारामारी होती थी, लाठियां तक चल जाती थीं. एक बार इतना हंगामा और मारपीट हो गई कि कोतवाल ने मु?ो शहर बदर की धमकी दे डाली.’’

हर कला का और तकनीक का एक सुनहरा दौर होता है. अगर बदलते समय के साथ कला या तकनीक में बदलाव नहीं किया जाए तो उस का नामोनिशान मिटने ?से कोई ताकत रोक नहीं सकती है. बिहार के शेखपुरा जिले के भदौंस गांव के बुजुर्ग किसान रामबालक सिंह बताते हैं कि पहले गांव में त्योहारों या शादी आदि के समय नौटंकी कंपनी को बुलाया जाता था और यह काफी सम्मान की चीज मानी जाती थी, पर आज शहर तो छोडि़ए, गांवों में भी इसे ओछी निगाह से देखा जाता है.

दरअसल, सिनेमा और मनोरंजन के कई नए तौरतरीकों के आने के बाद जब दर्शक नौटंकी से कटने लगे तो नौटंकी कंपनियों ने पब्लिक को बांधे रखने के लिए अपने कलाकारों से ऊलजलूल और भौंडी हरकतें करवानी शुरू कर दीं. नतीजतन, लोग परिवार के साथ बैठ कर इस का मजा लेने से कतराने लगे. बदलते हालात से लड़ने के लिए मजबूत उपाय करने के बजाय नौटंकी कंपनियों ने फूहड़ और शौर्टकट तरीका अपनाना चालू कर दिया. इसी से नौटंकी का धीरेधीरे कबाड़ा होता चला गया. लोककला के रंग और ढंग के बजाय नौटंकी में मुंबइया रंगढंग दिखने लगा तो उस के दर्शकों ने नौटंकी के फूहड़ रूप को देखने के बजाय सिनेमा में ही दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया और नौटंकी जैसी ताकतवर विधा का परदा धीरेधीरे गिरता चला गया.

भारत भूमि युगे युगे

मनोहारी हिंदुत्व

सैरसपाटे के लिए गोआ देशवासियों की पहली पसंद है जहां काजू की शराब और समुद्र्र के किनारे वर्जित दृश्य इफरात से देखने को मिलते हैं. कैथोलिकों की पहली पसंद रहे इस गोआ की भाजपाई सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर हैं. वे पूर्ण नहीं मगर अर्ध कट्टरवादी हिंदू तो कहे जा सकते हैं. बीते दिनों मनोहर पर्रीकर ने नरेंद्र मोदी की पीएम पद पर दावेदारी पर टंगड़ी अड़ा दी तो कहनेसुनने वालों ने भी यहीं तक दिलचस्पी ली. इस के बाद के हिस्से पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि देश के कैथोलिक ईसाई सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं, क्योंकि उन की प्रथाएं परंपरागत कैथोलिकों के बजाय हिंदुओं से मेल खाती हैं. इस बयान पर तरस ही खाया जा सकता है जो कैथोलिकों को हिंदू साबित करने पर तुला हुआ है. अब शायद पर्रीकर को पता हो कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के ईसाई बन गए हिंदू आज भी शादी के पहले मातापूजन करते हैं पर उन की माता का नाम इंगलिश देवी है.

अपनेअपने सामंतवाद

मध्य प्रदेश में जैसे ही कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को स्टार प्रचारक घोषित किया तो इस नई चाल से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी बौखलाहट पर काबू नहीं रख पाए और तुरंत जनसभाओं में कहना शुरू कर दिया कि मैं महाराज नहीं सेवक हूं और कांग्रेस सामंतवादी पार्टी है.

हाजिरजवाब सिंधिया ने पलटवार करते हुए शिवराज की बोलती यह कहते बंद कर दी कि भाजपा मेरी दादी विजयाराजे सिंधिया और बूआ वसुंधराराजे सिंधिया को मंत्री, मुख्यमंत्री बनाती रही है, तब सामंतवाद कहां था. कम ही लोग जानते हैं कि इन दोनों के झगड़े की असल जड़ सामंत या गैर सामंतवाद कम सिंधिया की शैक्षणिक संस्थाओं को राज्य में जमीन और सुविधाएं न देना ज्यादा है. इस पर खार खाए बैठे ज्योतिरादित्य अब कमर कस कर मैदान में कूद पड़े हैं और जनता भी चटखारे लेने लगी है कि अब आएगा चुनाव का मजा.

ममता को एक और झटका

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कानून का बैर एक बार फिर उजागर हुआ है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता की अप्रैल 2012 में की गई एक घोषणा को असंवैधानिक करार दिया है जिस के तहत राज्य सरकार इमामों को 2,500 और मुअज्जिनों को 1,500 रुपए देती. जस्टिस एम पी श्रीवास्तव और पी के चट्टोपाध्याय की बैंच ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 (1) का हवाला देते हुए व्यवस्था दी है कि सरकार धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थल के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती.

ममता बनर्जी को अब भेदभाव के नए तरीके खोजने होंगे. उत्तरी राज्य इस के लिए आदर्श हैं जहां सरकारें एजेंसियों के जरिए पंडोंमौलवियों को ऊपर वाले की पूजा करने के दाम देती हैं ताकि वे उन की सरकार की सलामती की दुआ मांगते रहें.

 

एकांत योग

आसाराम बापू के दुष्कर्मों पर संत बिरादरी की प्रतिक्रियाएं दुकानदारी पर मंडराता खतरा देख उन्हें बहिष्कृत करने की ज्यादा थीं. अकेले रामदेव ने  कायदे की बात कही कि संतों को लड़कियों और महिलाओं से एकांत में नहीं मिलना चाहिए. रामदेव की बात का बड़ा दार्शनिक और व्यावहारिक महत्त्व भी है. प्रभु के साक्षात्कार के अलावा सहवास और बलात्कार के लिए एकांत निहायत जरूरी है वरना इन कृत्यों में बाधा पड़ती है. रामदेव की मंशा कतई यह नहीं कि ये ईश्वरीय और मानवीय कार्य सार्वजनिक रूप से संपन्न किए जाने चाहिए. हकीकत तो यह है कि एक ब्रह्मचारी ही बेहतर बता सकता है कि एकांत में यौनेच्छाएं ज्यादा सिर उठाती हैं, इसलिए संतों को एकांत से परहेज करना चाहिए. पर वे यह नहीं बता पाए कि बगैर एकांत के संतों की उत्पत्ति कैसे होगी और क्या गारंटी है कि युवकों का एकांत में शारीरिक साक्षात्कार नहीं लिया जाएगा.     

समझें काम की कीमत

मनुष्य के कर्म उस के विचारों की सब से अच्छी व्याख्या होती है. काम ही मनुष्य को रचनात्मक खुशी प्रदान करता है. तो फिर क्यों न हम निष्क्रियता को त्याग कर काम की कीमत समझें व समाज और देश की समृद्धि में भागीदार बनें.

देश महान बनता है देशवासियों के कर्म से. जितने मेहनती लोग उतना ही संपन्न देश. जापान इस का अच्छा उदाहरण है. आज समूचा विश्व इस सचाई को जानता है कि जापान के कर्मचारियों में काम के प्रति ईमानदारी है. वहां के लोगों की राष्ट्रीय भावना और काम के प्रति समर्पण का ही यह नतीजा है कि छोटा सा जापान आर्थिक संपन्नता के मामले में विशालकाय अमेरिका और चीन को टक्कर दे रहा है. हालांकि काम को महत्त्व देने के मामले में अमेरिका भी पीछे नहीं है. हाल ही में हुए एक औनलाइन सर्वे के अनुसार, अमेरिका के 40 प्रतिशत से अधिक छात्र अपनी शिक्षा के दौरान ही काम करना शुरू कर देते हैं. और इस तरह वे अपनी कर्मठता से देश व समाज के विकास में शिक्षा का सदुपयोग करते हैं.

दुनिया में सब से ज्यादा युवा भारत में हैं और उन की आय पूरे विश्व के युवाओं में सब से कम है. और जहां छोेटे से देश जापान में एक भी गरीब नहीं है या यों कहें कि वहां ‘गरीबी की रेखा’ का अर्थ कोई नहीं जानता, वहीं संसाधनों से भरपूर विशाल देश भारत में वर्ष 2011-12 के आंकड़ों की बात करें तो 21.9 प्रतिशत जनता गरीबी की रेखा के नीचे जीवन गुजार रही थी.

भारत में संसाधनों की अधिकता होने के बावजूद ऐसे हालात क्यों हैं? आखिर क्या कारण है कि जापान जैसा छोटा देश विकास के मामले में भारत के साथ विश्व के दूसरे बड़े देशों को भी काफी पीछे छोड़ चुका है?

किसी देश के पिछड़े होने में जितनी जवाबदेही सरकार की होती है उतनी ही उस देश की जनता की भी होती है. हमारे देश में आमतौर पर लोग निर्धारित समय के बाद ही औफिस पहुंचते हैं. जैसेतैसे ड्यूटी करते हैं और छुट्टी होने के पहले ही घर जाने की तैयारी करने लगते हैं. वे ‘आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों, इतनी भी क्या जल्दी है अभी जीना है बरसों’ पर अमल करते दिखते हैं.

बिना पैसे का ओवरटाइम करना पड़े तो कर्मचारियों को नाकभौं चढ़ाते देर नहीं लगती. कुछ कर्मचारी अपना काम स्वयं करने के बजाय अपने अधीनस्थों से करवाते हैं. भारतीय शायद भूल रहे हैं कि मनुष्य के कर्म ही उस के विचारों की सब से अच्छी व्याख्या होती है. काम ही है जो आप को रचनात्मक खुशी प्रदान करता है.

दरअसल, भारत में सरकारी कर्मचारियों को पता है कि चाहे वे काम करें या न करें, उन का वेतन कोई नहीं रोक सकता. ऐसे लोग सही माने में देशद्रोही हैं. आखिर इन्हीं लोगों ने देश की आर्थिक कमर तोड़ कर रख दी है.

जिसे देखो वही बिना काम किए अपनी जेबें भरने में लगा है. ऐसे नकारा लोगों को काम न करने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सवाल उठता है कि उन्हें सजा दे कौन? अगर औफिस में काम करने वाला बाबू ही काम करने से जी चुराता है तो उस के ऊपर का अधिकारी उस के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है पर अगर अफसर ही काम की कीमत नहीं समझता है तो उस के खिलाफ कार्यवाही कौन करे? अंकुश लगाने वाले ही जब सब से बड़े नकारा हैं तो उन्हें सजा देगा कौन?

भारत के लोग तो मुफ्त खाने के आदी हैं. बिना हाथपैर हिलाए मेहनत कर के सफल होने के बजाय जिंदगी में सफलता पाने के लिए पंडेपुजारियों का सहारा लेते हैं. यह सिर्फ गरीब तबके तक ही सीमित नहीं है, बड़ेबड़े राजनेता भी इन सब का सहारा लेते दिख जाते हैं.

राजनीति से जुड़े लोगों में भी काम न करने की प्रवृत्ति अब पहले से काफी बढ़ गई है. इसी का नतीजा है कि चुनाव आते ही उन्हें झूठे वादों का सहारा ले कर जनता के सामने जाना पड़ता है. सोचने की बात है कि अगर इन नेताओं ने अपने कार्यकाल में जनता के लिए काम किया होता तो चुनाव जैसे मौकों पर उन्हें अपना प्रचार करने की जरूरत ही न पड़ती.

अगर भारत को एक समृद्ध देश बनाना है तो यहां के लोगों को अपना काम करने का ढंग बदलना होगा. निठल्लापन छोड़ना होगा, देश के हित को सर्र्वोपरि समझना होगा. साथ ही, सरकार को भी सचेत होने की जरूरत है. ‘फील गुड’ या ‘भारत निर्माण’ कहने से या इस के एहसास कराने भर से काम नहीं चलेगा, सभी को काम करना होगा, सिर्फ काम.    

टाटा ने सरकार को आईना दिखाया है

सरकार की नीतियों से आम आदमी ही नहीं बल्कि उद्योगपति भी परेशान हैं. यह परेशानी भले ही कुछ लोगों को राजनीतिक लगे लेकिन इस में सचाई है. टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष रतन टाटा ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती के शिकंजे में है और सरकार से निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है. उन का कहना है कि सिर्फ विदेशी ही नहीं, देशी निवेशक भी सरकार की नीतियों से खुश नहीं हैं, इसलिए वे निवेश करने से घबरा रहे हैं. उन का कहना है कि सरकार निवेशकों का रुख नहीं भांप पा रही है. निवेशकों का सरकार पर से विश्वास उठने के कारण देश की आर्थिक हालत लगातार खराब हो रही है.

टाटा का यह बयान जिन दिनों छपा तब रुपया लगातार तेजी से कमजोर हो रहा था और सोना आसमान छू रहा था. निर्यात का आंकड़ा चौंकाने वाले स्तर तक गिर रहा था. इसी वजह से टाटा ने जो कहा उस के राजनीतिक माने नहीं निकाले जा रहे हैं. यह ठीक है कि टाटा को भाजपा नेता नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है और दोनों के बीच यह रिश्ता उस समय खुल कर सामने आया जब टाटा की छोटी कार नैनो का कारखाना पश्चिम बंगाल से गुजरात लाया गया. उस समय कई अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन आखिर वही हुआ जो टाटा और मोदी को चाहिए था.

सवाल है कि टाटा का सरकार पर राजनेता की तरह उंगली उठाना कितना जायज है? एक उद्योगपति का सरकार को इस तरह से कमजोर कहने से तो यह साफ है कि बिना राजनीतिक सहयोग के यह बयान नहीं दिया जा सकता था. इस से यह भी साफ होता है कि टाटा को भी लगता है कि अगली सरकार भाजपा की होगी और नरेंद्र मोदी इस के मुकुट होंगे. सो, उस मुकुट पर टाटा भी लिखा हो.

वहीं, राजनीतिक चश्मे को अलग रख कर देखें तो टाटा का यह बयान सरकार की कमजोरी का सार्वजनिक खुलासा है जिस से साबित होता है कि विपक्षी दल ही नहीं बल्कि उद्योगपति भी अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की नीतियों से तंग आ चुके हैं. यहां जरूरत इस बयान का राजनीतिक अर्थ लेने की नहीं बल्कि इसे आईने के रूप में अपना चेहरा देखने के लिए इस्तेमाल किए जाने की है.

सरकार का लक्ष्य राजकोषीय घाटा कम करना नहीं

देश का राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा है जो सरकार के लिए नया संकट बना रहा है. सरकार ने हाल ही में खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवा कर के वोट मांगने की नैतिकता हासिल कर ली है लेकिन देश के लिए उस का यह निर्णय बड़ा संकट पैदा कर रहा है. खाद्य सुरक्षा योजना के तहत सरकार का लक्ष्य 67 फीसदी आबादी को कम दाम पर भोजन उपलब्ध कराना है लेकिन वहीं, इस से सरकारी खजाने पर हर साल 1.25 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है.

चालू वित्त वर्ष में खाद्य सब्सिडी पर 1 लाख 15 करोड़ रुपए खर्च होने की संभावना है. अब तक तो सरकार के पास रोने के लिए सिर्फ चालू खाता घाटा की जर्जर स्थिति ही थी लेकिन अब राजकोषीय घाटे का नया फंडा सामने आ गया है और इस से अर्थव्यवस्था के और चौपट होने की संभावना है.

सरकार का मकसद इस योजना के बहाने हर घर तक पहुंचना है और वोट हासिल करना है. उस ने संदेश देना शुरू कर दिया है कि सब के लिए सस्ते भोजन की व्यवस्था का काम अब तक किसी सरकार ने नहीं किया है. सरकार वोट की राजनीति कर रही है यदि उसे सचमुच गरीब के लिए भोजन उपलब्ध कराने की चिंता है तो देश के गोदामों में सड़ रहे अनाज को बचाने के उपायों पर विचार करना चाहिए.

सरकार को बुनियादी स्तर पर काम करना चाहिए लेकिन वह इस के लिए ईमानदारी से काम करने को तैयार नहीं है. वह सिर्फ वोटबैंक को लक्ष्य कर योजनाएं बना रही है. उस का लक्ष्य राजकोषीय घाटा कम करना नहीं बल्कि लुभावनी नीतियों के जरिए सत्ता हासिल करना है. इस बार यानी 2013-14 में सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.8 प्रतिशत निर्धारित किया है लेकिन उस की वोटबैंक की नीति के कारण यह लक्ष्य हासिल होने का सपना भी नहीं देखा जा सकता है.

 

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