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आप के पत्र

संपादकीय टिप्पणी ‘नरेंद्र मोदी, भक्त और भाजपा’ और ‘चुनावी दौर’ पढ़ीं. मोदी के बारे में आप के विचारों से मैं सहमत नहीं हूं. खासतौर पर आप की इस सोच से कि यदि मोदी बहुत पा गए तो सरकार का विधिवत कार्य शुरू होने में महीनों लग जाएंगे. अब चूंकि 16 मई के नतीजों के बाद मोदी सरकार को जनता ने उम्मीद से भी कहीं ज्यादा बहुमत दे दिया है, मैं आशा करता हूं आप अपना मत बदल देंगे.

2014 के लोकसभा चुनावों में जनता का जनादेश बहुत साफ है और शायद कोई भी अब उस से खिलवाड़ नहीं कर सकता. नवंबर 2013 में हुए दिल्ली के चुनावों में जनादेश के मुताबिक जनता ने शीला दीक्षित को हरा कर कांगे्रस को एक तरह से नकार दिया था. बीजेपी और ‘आप’ नंबर 1 और 2 पार्टी थीं. बहुमत न मिल सकने के कारण बीजेपी सरकारनहीं बना पाई और चालाक कांग्रेस ने केजरीवाल को बाहर से समर्थन दे कर उन की सरकार बनवाई जो 50 दिन भी न चल पाई. मैं समझता हूं कि नवंबर के चुनावों में और लोकसभा के नतीजों में जनता की राय ज्यादा बदली नहीं है, बल्कि उस ने विकास को प्राथमिकता दी है.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

 

आप के पत्र

आप की संपादकीय टिप्पणी ‘कैसीनो जैसा क्रिकेट’ अद्वितीय है. आप ने भारतीय क्रिकेट की तुलना लास वेगास के जुआखाने से कर के मिसाल कायम कर दी है. अदालतें और मीडिया जितना इस की तह में जा रहे हैं उतना पता चलता है कि सब एक से बढ़ कर एक हैं.

इस विषय में सुप्रीम कोर्ट ने इतना कहा है कि श्रीनिवासन समेत अन्य12 खिलाडि़यों व अन्य सदस्यों पर गंभीर आरोप हैं. ?आप का यह कहना कि क्रिकेट राजनीति और नौकरशाही की तरह इस देश की संस्कृति की पोल खोलता है. राजनीति देशसेवा की जगह स्वयंसेवा और नौकरशाही अपने दायित्व से भटक कर मालिकशाही बन गई है. दोनों ने जनता को जम कर लूटा है और यह लूट जारी रहेगी, अक्षरश: सत्य है. भ्रष्टाचारमुक्त देश का चाहे जितना नारा दिया जाए, भारत भ्रष्टाचारमुक्त नहीं हो सकता क्योंकि बेईमानी इस देश की संस्कृति का हिस्सा है.

हमारे देश को ‘सोने की चिडि़या’ कहा जाता था. सोने की चिडि़या तो यह अब भी है. मगर भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार व लूटखसोट, घूसखोरी के कारण इस देश का सर्वनाश हो रहा है. लाखोंकरोड़ों लोग भूख से ग्रस्त हैं. उधर स्विस बैंक का खजाना भरता जा रहा है. देश फटेहाल होता जा रहा है और काले धन से स्विस बैंक आबाद होते जा रहे हैं.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

सुसाइड की कोशिश

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ फिल्म ‘डिटैक्टिव व्योमकेश बख्शी’ से बौलीवुड में पदार्पण कर रही बंगाली अभिनेत्री स्वास्तिका मुखर्जी ने तथाकथित तौर पर सुसाइड करने की कोशिश की. खबरों की मानें तो स्वास्तिका ने यह कदम अपने फिल्ममेकर बौयफ्रैंड के साथ हुए झगड़े के चलते उठाया है. स्वास्तिका ने अपनी कलाई और हाथ की नस काट कर आत्महत्या करने की कोशिश की तभी उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया. हालांकि उन की बहन इसे महज हादसा करार दे रही है.

खतरों का खिलाड़ी

इन दिनों टीवी पर रिऐलिटी शो की भरमार है. कहीं डांस पर चांस मारा जा रहा है तो कहीं सुरों का संग्राम छिड़ा है. इन सब के बीच स्टंट पर आधारित रिऐलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ भी खासा लोकप्रिय है. हाल ही में इस के 5वें संस्करण का फिनाले हुआ. इस बार फिल्म ‘1920’ के स्टार रजनीश दुग्गल ने बाजी मारी. रजनीश ने बेहद मुश्किल स्टंट में टीवी ऐक्टर गुरमीत चौधरी और निकीतन धीर को जबरदस्त तरीके से मात देते हुए खतरों के खिलाड़ी का खिताब अपने नाम कर लिया. रजनीश के मुताबिक, इस शो ने उन्हें बेहद मजबूत इंसान बनाया है. उन के लिए यह जीत खास है.

रोशन पर किताब

फिल्मी सितारों पर किताबें लिखने का चलन पुराना है. लेकिन बीते कुछ सालों में देखा गया है कि अकसर फिल्मी हस्तियों के जीवन पर लिखी जा रही किताबों के लेखक परिवार के ही सदस्य होते हैं. पिछले दिनों प्रेम चोपड़ा की बेटी ने उन पर लिखी किताब का विमोचन किया था. हाल ही में अभिनेता, निर्माता, निर्देशक राकेश रोशन की सचित्र जीवनी का विमोचन भी उन की बेटी सुनैना रोशन ने किया. ‘टू डैड विद लव’ नाम की इस किताब के विमोचन के दौरान जब उन से अगले प्रोजैक्ट के बारे में पूछा गया तो उन का जवाब दिलचस्प था. उन के मुताबिक, शायद उन की अगली किताब सुपरस्टार भाई ऋतिक रोशन पर हो.

सीरियल से संसद तक

धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ ने अभिनेत्री स्मृति ईरानी को देश के हर घर में लोकप्रिय चेहरा बना दिया था. सासबहू के उस सीरियल से स्टार बनी स्मृति ईरानी ने जब सियासत में कदम रखा तो शुरुआत में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया. लेकिन वे सियासी मैदान में डटी रहीं और इस बार के लोकसभा चुनाव में वे राहुल गांधी के खिलाफ लड़ीं. स्मृति चुनाव भले ही न जीत पाई हों लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया है. हालांकि कई लोग उन की शिक्षा और कैबिनेट पद को ले कर सवाल उठा रहे हैं लेकिन स्मृति का सीरियल से संसद तक का सफर लाजवाब कहा जा सकता है.

लिंगा में सोनाक्षी

पुराना दस्तूर है कि हिंदी फिल्म अभिनेत्रियां दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम करती हैं. ऐश्वर्या राय से ले कर दीपिका पादुकोण इस का उदाहरण हैं. अब इस कड़ी में ताजा नाम सोनाक्षी सिन्हा का भी जुड़ गया है.

सोनाक्षी इन दिनों तमिल फिल्म ‘लिंगा’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. वे इस फिल्म को ले कर काफी उत्साहित हैं. इस के 2 कारण हैं. पहला कारण तो यह कि ‘लिंगा’ उन की पहली साउथ इंडियन फिल्म है और दूसरा बड़ा कारण है फिल्म में सुपरस्टार रजनीकांत का होना.

गौरतलब है कि रजनीकांत के साथ काम करना हर अभिनेत्री का सपना होता है. इस से पहले रजनी के साथ फिल्म ‘रोबोट’ में ऐश्वर्या राय और ‘कोचडयान’ में दीपिका ने काम किया था. ऐसे में फिल्म ‘लिंगा’ से जुड़ कर सोनाक्षी सिन्हा का खुश होना लाजिमी है.

कोयलांचल

निर्देशक आशु त्रिखा ने फिल्म में जहां स्टेट ब्यूरोक्रेसी और कोल माफिया की मिलीभगत को दिखाया है वहीं उस ने सभी चालू मसालों को भी डाला है. फिल्म में माओवादी हैं, एक क्रांतिकारी बंगाली नेता है, नौटंकी है, वेश्या के उभार हैं और क्रांतिकारी कविता भी. साथ ही, उस ने एक ऐसे किरदार करुआ (विपिन्नो) की रचना की है जो सिर्फ खून की भाषा समझता है, एक इशारे में आदमी का सिर धड़ से अलग कर देता है और सिर्फ अपने ‘मालिक’ (डौन) का हुक्म मानता है, उस के पैर धो कर वह पानी पीता है. उस के लिए उस का यह ‘मालिक’ ही सबकुछ है. ऐसे किरदार की रचना कर निर्देशक ने आतंक का माहौल क्रिएट किया है.

फिल्म की कहानी आम फिल्मों की तरह एक कोल माफिया डौन सरयूभान सिंह (विनोद खन्ना) और एक ईमानदार कलैक्टर निशीथ कुमार (सुनील शेट्टी) के टकराव की है. राजापुर इलाके में सरयूभान सिंह का राज है. कोयलांचल में जो भी उस के रास्ते में आता है, उसे मार डाला जाता है. करुआ (विपिन्नो) उस का खास आदमी है, जो खूंखार है. कलैक्टर निशीथ कुमार की पोस्ंिटग राजापुर होती है. वह सरयूभान सिंह की आंख की किरकिरी बन जाता है. करुआ निशीथ कुमार की पत्नी को जख्मी कर उस के छोटे बेटे को किडनैप कर लेता है. निशीथ कुमार सरयूभान पर शिकंजा कसता है. परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि बच्चा करुआ के लिए मुसीबत बन जाता है. एक वेश्या करुआ को सीख देती है कि बच्चे को उस की मां को लौटा दे. करुआ का हृदय परिवर्तन होता है. वह सरयूभान को कोयलांचल की आग में समा जाने को राजी कर लेता है और खुद भी भस्म हो जाता है.

कोयलांचल में माफिया डौन प्रशासन के राष्ट्रीयकरण के प्रयासों को धता बताते हुए किस तरह समानांतर सरकार चलाते हैं, फिल्म इस का जीताजागता उदाहरण है.

माफिया डौन की भूमिका में विनोद खन्ना जमा नहीं है. विपिन्नो प्रभावित करता है. फिल्म के निर्देशक ने जबरन लौंडा नाच जैसी नौटंकी को डाला है. वेश्या की भूमिका में रूपाली कृष्णा राव के उभारों को दिखाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है.

निर्देशन साधारण है, गीतसंगीत बेदम है. सुनील शेट्टी बेअसर रहा है.  फिल्म का क्लाइमैक्स जबरन खींचा गया है.

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