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हवा हवाई

‘हवा हवाई’ को अमोल गुप्ते ने निर्देशित किया है, जिस ने आमिर खान की फिल्म ‘तारे जमीं पर’ को निर्देशित करने की जिम्मेदारी उठाई थी, मगर बीच में ही आमिर खान ने अपनी इस फिल्म को खुद ही निर्देशित करने का फैसला कर लिया था. इस के बाद अमोल गुप्ते ने अपने बेटे को ले कर ‘स्टेनले का डिब्बा’ फिल्म बनाई. कम बजट में बनी इस फिल्म को खूब सराहा गया.

‘हवा हवाई’ की कहानी व पटकथा भी अमोल गुप्ते ने लिखी है. इस फिल्म में भी उस ने अपने बेटे पार्थो गुप्ते को बतौर हीरो चुना है. अमोल गुप्ते की यह फिल्म सिर्फ स्केटिंग के खेल की ही बात नहीं करती, इस फिल्म में सामाजिक विषमताओं को भी दर्शाया गया है. फिल्म में एक तरफ 25 से 50-50 हजार रुपए तक के महंगे स्केट्स पहन कर स्केटिंग सीखने आ रहे अमीर बच्चों को दिखाया गया है तो दूसरी तरफ ऐसे बच्चों को भी दिखाया गया है जो या तो कचरा बीनते हैं, कारखाने में काम करते हैं या 16-16 घंटे चाय की दुकानों पर लोगों को चाय पिलाने और झूठे बरतन साफ करने का काम करते हैं. ऐसे बच्चों का वजूद मानो खत्म सा हो जाता है.

ऐसा नहीं है कि उन के सपने नहीं हैं, उन के भी सपने होते हैं. वे भी उन अमीर बच्चों की तरह बनना चाहते हैं, मगर समाज में अमीरगरीब की जो दीवार है, वह उन के आगे बढ़ने में बाधक बनती है. निर्देशक ने अपनी इस फिल्म में इन मुद्दों को भी संजीदगी से उठाया है. कमर्शियली यह फिल्म भले ही हिट या सुपरहिट न हो लेकिन फिल्म को सराहना जरूर मिलेगी.

फिल्म की कहानी महाराष्ट्र के एक किसान के बेटे अर्जुन (पार्थो गुप्ते) की है. उस के पिता की मृत्यु हो चुकी है. उस की मां अपने परिवार को ले कर मुंबई की एक चाल में रहने चली आती है. अपनी मां का हाथ बंटाने के लिए अर्जुन एक चाय की दुकान पर नौकरी करने लगता है. वहां वह रोजाना रात को बच्चों के एक झुंड को स्केटिंग करते देखता है, जिन्हें उन का कोच लकी सर (साकिब सलीम) टे्रनिंग देता है. यहीं अर्जुन की मुलाकात लकी सर से होती है.

अर्जुन को लगता है कि वह भी स्केटिंग सीख सकता है. वह रोजाना एकलव्य की तरह लकी सर को स्केटिंग के गुर सिखाते हुए देखता है. अर्जुन के पास स्केट्स नहीं हैं.

अर्जुन के 4 दोस्त हैं. एक कचरा बटोरता है, दूसरा वर्कशौप में काम करता है, तीसरा गजरा बेचता है और चौथा सिलाई का काम करता है. जब उन्हें अर्जुन के स्केटिंग के शौक के बारे में पता चलता है तो चारों मिल कर अर्जुन के लिए स्केटिंग शूज बनाते हैं जिस का नाम वे हवा हवाई रखते हैं. लकी सर को जब अर्जुन की स्केटिंग के प्रति लगन का पता चलता है तो वे उसे स्टेट चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए तैयार करते हैं. आखिर अर्जुन स्टेट चैंपियन बन कर पुरस्कार पाने का हकदार बनता है.

फिल्म की यह कहानी फर्स्ट हाफ में तो ढीली है लेकिन सैकंड हाफ में कहानी की गति तेज हो जाती है और दर्शक दम साधे बैठे रहते हैं. क्लाइमैक्स में तो लगता है जैसे यह किरदार अर्जुन नहीं बल्कि मिल्खा सिंह निभा रहे हैं. निर्देशक ने अर्जुन के किरदार  के जरिए भूख और गरीबी में खोता बचपन और किसान परिवार की बेबसी को अर्जुन की मां की आंखों के जरिए दिखाया है. कहींकहीं फिल्म दर्शकों को झकझोरती है.

पार्थो गुप्ते सहित उस के चारों दोस्तों ने लाजवाब ऐक्ंिटग की है. बाकी कलाकार साधारण हैं. फिल्म का गीतसंगीत भी ताजगी महसूस कराता है. छायांकन अच्छा है.

कोचडयान

फिल्म का कैनवास काफी बड़ा और भव्य है. ऐसा लगता है जैसे महाभारत काल में हुए विशाल युद्ध का नजारा देख रहे हों जिस में अनगिनत हाथियों और घोड़ों पर सवार योद्धाओं ने युद्ध लड़ा था.

इस फिल्म की तुलना कुछ साल पहले आई हौलीवुड की फिल्म ‘अवतार’ से की जा सकती है, मगर तकनीक में यह ‘अवतार’ से कहीं पीछे है. रजनीकांत की बेटी निर्देशिका सौंदर्या रजनीकांत अश्विन ने एनिमेशन के जरिए दृश्यों को वास्तविक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. वह एक ग्राफिक डिजाइनर है. उस ने अपनी तकनीशियन टीम के साथ मिल कर फिल्म को 3डी इफैक्ट में बनाया है. फिल्म काफी हद तक दर्शकों को बांधे रखती है.

पूरी फिल्म रजनीकांत के इर्दगिर्द बुनी गई है. सभी पात्रों की संवाद अदायगी दक्षिण भारतीय फिल्मों जैसी है.

फिल्म की कहानी भारत के 2 राज्यों कोट्टापट्टनम और कलिंगपुरी की है. कोट्टापट्टनम का राजा उदयभान (नासिर) है तो कलिंगपुरी का राजा महेंद्रराज (जैकी श्रौफ) है. दोनों राज्यों में दुश्मनी है. कोट्टापट्टनम का एक किशोर राणा (बड़ा हो कर रजनीकांत) कलिंगपुरी जाने के लिए एक नाव पर बैठ कर निकलता है और एक जलप्रपात में गिर पड़ता है. किसी तरह वह कलिंगपुरी के किनारे पहुंचता है जहां कुछ लोग उस की जान बचाते हैं.

शिक्षादीक्षा ले कर वह एक योद्धा बन जाता है. वह अपनी बहादुरी से कई राज्यों को कलिंगपुरी में मिला लेता है. महेंद्रराजा उसे महासेनापति बना देता है. राणा कोट्टापट्टनम पर हमले की योजना बनाता है. वह कोट्टापट्टनम आता है. वहां के राजा उदयभान के बेटे के साथ अपनी बहन की शादी करवाता है और राजा की बेटी (दीपिका पादुकोण) से प्यार करने लगता है. वह राजा उदयभान पर जानलेवा हमला करते समय पकड़ा जाता है. वह अपनी प्रेमिका को राजा पर हमले का प्रयोजन बताता है.

यहां कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है. राजा उदयभान ने उस के पिता कोदर्यान (रजनीकांत की दूसरी भूमिका) को मौत के घाट उतार दिया था इसी का बदला लेने के लिए राणा ने राजा उदयभान पर हमला किया था.

राजा उदयभान राणा को मौत की सजा का फरमान सुनाता है परंतु राणा राजा की फौज का मुकाबला करते हुए राजा को मार डालता है और राजा की बेटी का हाथ थाम लेता है.

यह पूरी कहानी बदले की है. कहानी रोचक है. फिल्म के ऐक्शन दृश्यों में काफी मेहनत की गई है. डांस सीक्वैंस भी अच्छे हैं. फिल्म बुराई पर अच्छाई का प्रतीक बन गई है.

फिल्म देख कर लगा कि यदि इस फिल्म के रजनीकांत और दीपिका पादुकोण वाले कुछ प्रेम प्रसंग रियल किरदारों पर फिल्माए जाते तो कुछ और ही असर पड़ता. दीपिका पादुकोण का यह एनिमेटेड किरदार भी सुंदर लगा है. रजनीकांत का तो कहना ही क्या. उस ने 2-3 मिनट तक तांडव नृत्य किया है जो काफी अच्छा बन पड़ा है. खलनायक पात्रों में नासिर और जैकी श्रौफ का काम भी अच्छा है.

ए आर रहमान का संगीत परंपरागत फिल्मों से अलग है. फिल्म की फोटोग्राफी गजब की है.

हमारा नाश बर्गर कर रहा है : अमोल गुप्ते

हाल ही में प्रदर्शित बाल फिल्म ‘हवा हवाई’ के लेखक, निर्देशक व निर्माता अमोल गुप्ते किसी परिचय के मुहताज नहीं है. 2008 में प्रदर्शित फिल्म ‘तारे जमीं पर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ कहानीकार व पटकथा लेखक के लिए फिल्मफेअर सहित कई अवार्ड जीत चुके अमोल गुप्ते का दावा है कि ‘तारे जमीं पर’ के रिलीज के बाद शिक्षा क्षेत्र में काफी बदलाव आया है. वे ‘कमीने’, ‘उर्मि’, ‘स्टेनली का डिब्बा’, ‘भेजा फ्राय’ सहित कई फिल्मों में विलेन के किरदार निभा चुके हैं. पेश हैं उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप फिल्मों में हमेशा विलेन के किरदारों में नजर आते हैं जबकि आप लेखक व निर्देशक के रूप में बहुत ही इमोशनल बाल फिल्में बनाते हैं. इतना बड़ा अंतर क्यों?

फिल्म इंडस्ट्री में भेड़चाल है. एक बार आप ने जिस तरह का काम कर लिया, आप को बारबार उसी तरह के काम को करने के औफर मिलते हैं. विशाल भारद्वाज ने फिल्म ‘कमीने’ में मुझे एक बार कमीना बना दिया, उस के बाद से हर फिल्म में लोग मुझे कमीना बना कर ही पेश करते आ रहे हैं.

दूसरी बात, एक किताब है ‘क्राइम ऐंड पनिशमैंट’. इस में जितने गहरे किरदार हैं उतने गहरे किरदार निभाने के मौके तो मुझे मिलने से रहे. जबकि मैं बच्चों के लिए अच्छी स्क्रिप्ट लिखता रहता हूं. जिस तरह के किरदार बलराज साहनी निभाया करते थे, उस ढांचे के किरदार कोई लिखे तो बात समझ में आए. लेकिन हम जिस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, उस तरह के चरित्र बचे नहीं हैं. हमारा नाश बर्गर कर रहा है. इसी संस्कृति ने सोवियत यूनियन को भी बरबाद कर दिया. जबकि कभी सोवियत यूनियन रिफाइंड देश था. पूंजीवाद हर किसी को बरबादी के कगार पर ही ले जाता है.

हाल ही में आप की फिल्म ‘हवा हवाई’ रिलीज हुई, जिसे काफी सराहा जा रहा है?

इस की वजह इतनी है कि मैं ने इस फिल्म में उस सपने की बात की है जोकि इंसान को सोने नहीं देता. मैं ने सवाल उठाया है कि जेब में दमड़ी न हो तो क्या आप को या आप के बच्चे को सपने देखने का हक नहीं है? हम ने ‘हवा हवाई’ में 5 बच्चों के सपनों को पूरा करने की जद्दोजेहद को दिखाया है. मूल्यों की भी बात की है. हमारी फिल्म कुछ भी न होते हुए भी बहुत बड़ा कारनामा कर जाने की दास्तान है. यह हर वर्ग के हर इंसान के जद्दोजेहद की कहानी है.

आप की हर फिल्म में बच्चों से जुड़ा मुद्दा होता है?

मैं समझ गया हूं कि नए भारत को ‘शुगर कोटेड’ गोली चाहिए. इसलिए मैं उसी हिसाब से फिल्म बना रहा हूं. मैं फिल्मों में उपदेशात्मक भाषणबाजी देने के बजाय दृश्यों में इस तरह से बात कह जाता हूं कि फिल्म देखते हुए लोग समझ जाएं. मैं ने फिल्म ‘तारे जमीं पर’ में देश की शिक्षा प्रणाली पर कटाक्ष किया था. आप को शायद यकीन न हो, मगर ‘तारे जमीं पर’ की रिलीज के बाद सरकार ने शिक्षा का पूरा ढांचा ही बदल दिया.

आप के अनुसार बच्चों से जुड़ी सब से बड़ी समस्या क्या है?

बच्चों से जुड़ी तमाम समस्याएं हैं और हर समस्या के लिए प्रौढ़/वयस्क इंसान दोषी हैं. वे बच्चों को कोई अहमियत नहीं देते. राजनेता भी बच्चों पर ध्यान नहीं देते. यदि बच्चों को वोट देने का अधिकार होता तो शायद उन पर ध्यान दिया जाता. इस वजह से बच्चों को जो आत्मसम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है.

पर हर मातापिता एक ही रट लगाए रहता है कि आज के बच्चे बुजुर्गों की इज्जत नहीं करते?

बच्चे बड़ों से ही तो सीखते हैं. यदि एक इंसान अपने मातापिता की इज्जत नहीं करता है और यह बात उस का बेटा या बेटी देखते हैं, तो वे भी उन की इज्जत नहीं करते. इस के अलावा मुझे लगता है कि हमारी भारतीय संस्कृति बच्चों पर जरूरत से ज्यादा बोझ डालती है. भारतीय संस्कृति सिर्फ बच्चों पर ही कई तरह की पाबंदी लगाती है. हमारी भारतीय संस्कृति में नियम है कि बच्चा घर आने वाले हर इंसान के पैर छुए. पर क्यों? जरूरत यह है कि आप अपनी इज्जत इस तरह की बनाएं कि बच्चा खुद आप की इज्जत करना चाहे.

इतना ही नहीं, हमारे यहां एक नई संस्कृति पैदा हो गई है, वह है रिऐलिटी शो. मातापिता अपने सपनों को अपने बच्चों के माध्यम से पूरा होते देखने के लिए उन्हें रिऐलिटी शो में भेज कर उन का भविष्य बरबाद कर रहे हैं.

आप मानते हैं कि टीवी पर प्रसारित हो रहे रिऐलिटी शो में बच्चों को ला कर उन के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है तो इस के खिलाफ कोई मुहिम क्यों नहीं चलाते?

मैं सरकार को कई पत्र लिख चुका हूं पर सरकार ने मेरे एक भी पत्र का जवाब नहीं दिया. इसलिए अब मैं इस मुहिम को स्कूल प्रिंसिपल के साथ मिल कर चला रहा हूं. मैं ने 2 हजार स्कूल के प्रिंसिपल से बात की है. उन से कहा है कि वे अपने स्कूल के बच्चों को बाहर न जाने दें. जब स्कूल के प्रिंसिपल बच्चे को इजाजत नहीं देंगे तो बच्चे रिऐलिटी शो के साथ नहीं जुड़ पाएंगे. तभी बदलाव आएगा. मैं ने 2 फिल्में बनाईं. मैं ने कभी भी 4 घंटे से ज्यादा बच्चों से काम नहीं करवाया. मगर रिऐलिटी शो वाले तो 12 घंटे और लगातार कई माह तक काम करवाते हैं, जो कि गलत है. स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को रिऐलिटी शो में आने से शोहरत तो मिलती है पर यह शोहरत सिर्फ चंद दिनों की ही होती है.

बाद में वह डिप्रैशन का शिकार हो जाता है. यह समाज की बीमारी हो गई है. इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है.

तो क्या बच्चों का डांस वगैरह सीखना गलत है?

ऐसा मैं ने कब कहा. कला सीखना आसान नहीं है. जब एक बच्ची लगातार 12 साल तक भरतनाट्यम सीखती है, तब उस का पहला डांस का कार्यक्रम होता है. उस के बाद भी सीखते रहना पड़ता है. इस में तुरंत शोहरत नहीं मिलती. तुरंत शोहरत पाने का जो मसला है, उस पर मैं रिसर्च कर रहा हूं. आगे चल कर इस पर फिल्म बनाऊंगा.

मैं ने भी बच्चों को ले कर फिल्म बनाई. हम ने पूरी फिल्म बच्चों की स्कूल की छुट्टियों में फिल्माई है. किसी भी बच्चे की पढ़ाई का कोई नुकसान नहीं हुआ.

बच्चों के बीच थिएटर व सिनेमा का ज्ञान बांटते समय आप के क्या अनुभव होते हैं?

अच्छे अनुभव ही हो रहे हैं. मैं ने इन बच्चों को पूरा ईरानी सिनेमा दिखाया. ईरान के फिल्मकार मजीद मजीदी ने तो तमाम बाल फिल्में बनाई हैं. मैं चार्ली चैप्लिन की फिल्में भी बच्चों को दिखाता हूं. इस के अलावा विश्व के जो बड़ेबड़े फिल्मकार हैं, उन की फिल्में भी हम इन बच्चों के साथ बैठ कर देखते हैं. उस के बाद उस पर चर्चा करते हैं. फिर हम लोग अपना स्क्रीनप्ले लिखते हैं और फिल्म बनाते हैं. हमारी ये फिल्में 5 से 10 मिनट की होती हैं.

मैं इस बात में यकीन नहीं करता हूं कि ये गरीब बच्चे हैं, इसलिए इन्हें वोकेशनल टे्रनिंग दे कर कारपेंटर बना दें या फिल्म इंडस्ट्री में स्पौट बौय बना दें. मेरा मानना है कि इन बच्चों को तो फिल्म बनानी चाहिए. ऐसे बच्चे गरीब होने की वजह से लाइट बौय क्यों बनें? ऐसे बच्चे फिल्म निर्देशक बनें, तो बेहतर होगा.

बच्चों के साथ शूटिंग करते समय किस तरह की समस्याएं सामने आती हैं?

समस्याएं तो नहीं आईं मगर हम जब बच्चों के साथ काम करते हैं तो कुछ बातों का खयाल रखते हैं. सब से पहली बात हम उन के साथ ज्यादा समय तक काम नहीं करते. मेरा मानना है कि बच्चों के स्वास्थ्य का खयाल रखना बहुत जरूरी होता है.

ईरानी सिनेमा में बच्चों को ले कर तमाम फिल्में बनाई गई हैं पर भारत में बाल फिल्में न के बराबर बनती हैं?

मैं ऐसा नहीं मानता. भारत में भी बाल फिल्में बनती हैं पर वे बच्चों तक पहुंच नहीं पातीं. चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी हर साल 4 फिल्में बनाती है. सब से बड़ा सवाल यह है कि ये बाल फिल्में दिखाई कहां जाएं? किसे दिखाएं? हमारे यहां का दर्शक ‘ग्रैंड मस्ती’ जैसी फिल्में देखने में व्यस्त है. हमारे यहां बच्चों की फिल्मों के नाम पर ‘चिल्लर पार्टी’ जैसी फिल्में बनती हैं. मेरी नजर में यह फिल्म सही नहीं थी. इस में जिस तरह से चड्ढी वगैरह दिखाई गई थी, वह गलत है.

इन दिनों आप चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी से जुड़े हुए हैं. चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी फिल्मों को दिखाने को ले कर क्या कोई कदम उठा रही है?

मेरी कोशिश है कि स्कूल बच्चों को एक विषय की तरह बाल फिल्में दिखाने के लिए मल्टीप्लैक्स में ले जाएं. ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ ने बच्चों के लिए तमाम बेहतरीन फिल्में बनाई हैं. मैं तो चाहता हूं कि हर स्कूल में सिनेमा एक विषय होना चाहिए. सिनेमा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

यूथ ब्रिगेड पर भरोसा

एक ओर जहां 17 महीने बाद भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं ने टैस्ट टीम में गौतम गंभीर पर भरोसा जताया है तो वहीं दूसरी ओर बंगलादेश की वनडे सीरीज के लिए सुरैश रैना को कप्तानी का जिम्मा सौंपा है.

चयनकर्ताओं ने 22 जून से इंगलैंड के विरुद्ध शुरू होने वाले 5 टैस्ट मैचों की शृंखला के लिए 16 सदस्यीय टीम की जगह इस बार 18 खिलाडि़यों को चुना है. महेंद्र सिंह धौनी की कप्तानी की अगुआई में मुरली विजय, गौतम गंभीर, शिखर धवन, विराट कोहली, रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे, चेतेश्वर पुजारा, आर अश्विन, रवींद्र जडेजा, मोहम्मद शमी, भुवनेश्वर कुमार, पंकज सिंह, स्टुअर्ट बिन्नी, वरुण ऐरोन, ईश्वर पांडेय, ईशांत शर्मा सहित रिद्धिमान साहा शामिल हैं.

12 साल के बाद ऐसा हो रहा है जब भारतीय टीम 5 टैस्ट मैचों की टैस्ट सीरीज खेलेगी. इस से पहले वर्ष 2002 में वेस्ट इंडीज के साथ ऐसी सीरीज हुई थी.  इंगलैंड की परिस्थितियों को देखते हुए 6 पेस बौलरों को जगह दी गई है. हालांकि पेस बौलरों में जहीर खान को जगह नहीं मिली है. उन की जगह पर 29 वर्षीय राजस्थान के फास्ट बौलर पंकज सिंह को लिया गया है. पंकज को घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का फल मिला है. उन्होंने कई रणजी मैचों में 30 से ज्यादा विकेट झटके हैं. जहां तक औलराउंडर की बात है, इस की जगह, रवींद्र जडेजा और स्टुअर्ड बिन्नी को पूरी करनी होगी. धौनी के सामने सब से बड़ी चुनौती होगी टीम में लय स्थापित करना क्योंकि पिछले 3 वर्षों में विदेशी जमीन पर टैस्ट मैचों में भारत को हार का ही मुंह देखना पड़ा है.

अगर बंगलादेश के खिलाफ जून महीने में ही 3 एकदिवसीय मैचों की बात करें तो टीम में यहां भी युवा खिलाडि़यों को मौका दिया है और सीनियर खिलाडि़यों को आराम दिया गया है. अक्षर पटेल और केदार जाधव को घरेलू क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन का इनाम मिला है. ये दोनों टीम में नए चेहरे हैं. 6 वर्ष बाद रोबिन उथप्पा की भी वापसी हुई है. चयनकर्ताओं ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि युवा खिलाडि़यों को मौका मिले. ऐसा तो होना ही चाहिए क्योंकि जब तक आप युवा खिलाडि़यों को मौका नहीं देंगे तब तक वे अपनी प्रतिभा कैसे दिखा पाएंगे. ऐसा करने से ही तो आज हमारे पास विराट कोहली व युवराज सिंह जैसे खिलाड़ी टीम में हैं.

फीफा वर्ल्ड कप की खुमारी

विश्व के सब से लोकप्रिय खेल फुटबाल की खुमारी लोगों के सिर चढ़ कर बोल रही है. 12 जून से 13 जुलाई तक चलने वाला फीफा वर्ल्ड कप इस बार ब्राजील के 12 शहरों में हो रहा है. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 32 टीमें इस विश्वकप की गवाह बनने जा रही हैं.

ब्राजील को इस बार विश्वकप के खिताब का प्रबल दावेदार माना जा रहा है क्योंकि इतिहास भी कुछ ऐसा रहा है कि मेजबान टीम अधिकतर इस खिताब पर कब्जा जमा लेती है. वर्ष 1930 में उरुग्वे, 1934 में इटली, 1966 में इंगलैंड, 1974 में वैस्ट जरमनी, 1978 में अर्जेंटीना और 1998 में फ्रांस की टीमें जीत हासिल कर चुकी हैं. इस के अलावा ब्राजील के पास नेमियार जैसा मशहूर स्ट्राइकर जब टीम में हो तो उम्मीदें और बढ़ जाती हैं. हालांकि स्पेन को कमतर नहीं आंका जा सकता. स्पेन फीफा की रैंकिंग में नंबर 1 पर में लंबे समय से बना हुआ है. वर्ष 2010 में विश्व विजेता बनने के बाद स्पेनिश टीम लगातार बढि़या प्रदर्शन कर रही है.

इस पूरे टूर्नामैंट में दुनिया की नजर मशहूर खिलाडि़यों लायोनेल मैसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो की अर्जेंटीना और पुर्तगाल की टीमों पर रहेगी क्योंकि ये दोनों खिलाड़ी ऐसे हैं जो मिनटों में खेल की बाजी पलट सकते हैं.

जरमनी भी प्रबल दावेदार है. डिफैंस के लिए जरमनी के पास अनुभवी और एक से बढ़ कर एक बेहतरीन खिलाडि़यों की लंबी लिस्ट है. कई और देशों की टीमें भी मजबूत हैं. पर मेजबान ब्राजील की टीम फिलहाल सब से मजबूत दिखाई दे रही है क्योंकि ब्राजील की टीम इस से पहले 5 बार विश्व विजेता रह चुकी है.

फुटबाल के लिए यह सब से बड़ा आयोजन माना जाता है और इस खेल में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है. इस बार भी अनुमान है कि तकरीबन 8.4 अरब पाउंड इस भव्य आयोजन में खर्च किए जाएंगे. इस बाबत प्रदर्शनकारी ब्राजील में कई बार अपना विरोध जता चुके हैं. उन का मानना है कि इतना पैसा खर्च करना फुजूलखर्ची है.

बहरहाल, लोकप्रियता के लिहाज से देखा जाए तो ‘फीफा वर्ल्ड कप’ सब से बड़ा खेल आयोजन है और खेल शुरू होने से पहले ही दुनियाभर में खिलाडि़यों सहित प्रशंसकों के मन में फुटबाल की खुमारी सिर चढ़ कर बोलने लगती है.

आम भरवां टिक्की

सामग्री : 2 आलू उबले हुए, 1 कच्चा आम, नमक स्वादानुसार, 1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर, 1 चुटकी पीला रंग, 2 छोटे चम्मच तिल, लाल मिर्च पाउडर स्वादानुसार, 50 ग्राम सेवईं, 4-5 बड़े चम्मच मैदा, 1/2 छोटा चम्मच गरममसाला, हरी मिर्च स्वादानुसार, तलने के लिए तेल.

विधि : मैदे का घोल बना कर उस में पीला रंग व हलका सा नमक डाल कर घोल बना लें. आलू को मसल कर उस में नमक, मिर्च, जीरा पाउडर, धनिया पाउडर, तिल, गरममसाला मिला कर पिट्ठी तैयार करें. एक प्लेट में सेवइयां फैला लें. आम को कद्दूकस कर के उस में नमक, हरी मिर्च मिला लें. आलू की पिट्ठी को हथेली पर फैला कर उस में आम के मिश्रण को भर दें. टिक्की का आकार दे कर मैदे के घोल में डिप कर के सेवईं में लपेट दें. कड़ाही में तेल गरम कर के सुनहरा होने तक तल लें. मीठी चटनी के साथ गरमागरम सर्व करें.

खट्टामीठा रायता

सामग्री : 200 ग्राम पका हुआ आम, 1 छोटा चम्मच जीरा पाउडर, 3 छोटे चम्मच काजूपिस्ताबादाम, 2 चुटकी इलायची पाउडर, कुछ बूंदें केवड़ा एसेंस, 2 बड़े चम्मच अनारदाना, 4 बड़े चम्मच बारीक कटा सेब,4 छोटे चम्मच चीनी.

विधि : दही को कपड़े में डाल कर थोड़ी देर के लिए लटका दें ताकि दही गाढ़ा हो जाए. दही को अच्छी तरह फेंट लें. आम को बारीक टुकड़ों में काट लें. अब सभी सामग्री को दही में मिला कर अच्छी तरह फेंटें और ठंडा होने के लिए फ्रिज में रखें. काजू, बादाम, आम से सजा कर ठंडाठंडा पेश करें.

 

आम राइस

सामग्री : 100 ग्राम कद्दूकस किया कच्चा आम, 4 हरी मिर्चें, 1 छोटा चम्मच हरा धनिया, 2 छोटे चम्मच कद्दूकस किया नारियल, 3 चम्मच तेल, 1/2 छोटा चम्मच सरसों दाना, 8-10 करीपत्ते, स्वादानुसार लाल मिर्च, 1 चुटकी हींग,1/2 छोटा चम्मच जीरा, 2-3 छोटे चम्मच चना दाल, 1/4 कप काजूकिशमिश,1/2 छोटा चम्मच हलदी, नमक स्वादानुसार, 1 गिलास उबले चावल,4 साबुत लाल मिर्चें.

विधि : उबले चावल ठंडे होने दें. एक पैन में गरम तेल कर के उस में सरसों व जीरा डाल कर भूनें. हलदी डाल कर चने की दाल, नारियल डाल कर 2 मिनट भूनें. साबुत मिर्चें डालें. काजू, किशमिश, हरी मिर्च, हींग, करीपत्ते व आम डाल कर मुलायम होने तक चलाएं. अब नमक डाल कर उबले ठंडे चावल डालें और 2 मिनट तक उलटेंपलटें. ऊपर से हरे धनिए से सजा कर सर्व करें.

आम सब्ज बहार

सामग्री : 250 ग्राम कच्चा आम, 1/2 कप हरी मटर, 1/2 कप हरी प्याज, 1/2 छोटा चम्मच सौंफ, 1/2 छोटा चम्मच कलौंजी, 1/2 छोटा चम्मच जीरा, 1/4 छोटा चम्मच अजवायन, 1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर, 2-3 साबुत लाल मिर्चं, 3/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर,1/2 छोटा चम्मच मेथी पाउडर, लाल मिर्च व नमक स्वादानुसार,  25 ग्राम कमलककड़ी, 2-3 छोटे चम्मच तेल, 1/2 छोटा चम्मच गरम मसाला.

विधि : कड़ाही में तेल गरम कर के उस में जीरा, कलौंजी, सौंफ, अजवायन डालें. चटकने लगे तो हलदी पाउडर, साबुत मिर्च, मेथी पाउडर, धनिया पाउडर डालें. अब मटर, कच्चा आम डाल कर 2 मिनट तक भूनें. कमलककड़ी भी डाल दें व मुलायम होने तक भूनें. जरूरत पड़े तो 2-3 चम्मच पानी डालें. नमकमिर्च डाल कर पकने दें. पकने के बाद गैस बंद कर के ऊपर से कटी हुई हरी प्याज व हरा धनिया से सजा कर पेश करें.

आम की बहार

आम के रोल्स

सामग्री : 250 ग्राम कद्दूकस किया कच्चा आम, 1 छोटा चम्मच भुना हुआ जीरा, 2 हरे प्याज, 1 छोटा चम्मच कटा पुदीना, हरा धनिया, 2 उबले आलू, 3 बड़े चम्मच मैदा, 1 कप ब्रैड क्रंब्स, तेल तलने के लिए, 2-3 हरी मिर्चें, लाल मिर्च व नमक स्वादानुसार.

विधि : कच्चे आम को कद्दूकस

कर के गरम पानी में 2 मिनट रख कर छान लें. अच्छी तरह पानी निकल जाना चाहिए. इस में नमक, मिर्च, आलू, हरा प्याज, हरा धनिया, पुदीना सभी को अच्छी तरह मिला लें. मैदे का घोल बना लें. ब्रैड क्रंब्स प्लेट में फैला लें. मिश्रण के गोलगोल रोल बना कर मैदे के घोल में लपेट कर क्रंब्स में लपेट दें. तेल गरम करें और बौल्स को सुनहरा होने तक तलें. मीठी चटनी के साथ गरमागरम सर्व करें.

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