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सियासी दलों की अपनी डफली अपना राग

कोई मोदी फैक्टर का सियासी राग अलाप रहा है तो कोई राहुल के जादू का दावा कर रहा है लेकिन आगामी 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए इन दोनों से इतर जनता का मुद्दा तो कुछ और ही है. क्या है इस बार का मुद्दा, बता रहे हैं जगदीश पंवार.

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है. जातीय समीकरणों से ले कर टिकटों के बंटवारे, नेताओं की आपसी खींचतान के बाद चुनावप्रचार चरम पर पहुंच रहा है. 11 नवंबर से 4 दिसंबर के बीच होने वाले चुनाव के इस माहौल को देख कर लगता है राजनीतिक दल जीवनमरण की जंग में कूद पड़े हैं. तरहतरह के तमाशे सामने आ रहे हैं.

लोकसभा चुनावों से महज 5 महीने पहले होने वाले इन चुनावों में 5 में से 4 राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने से इन्हें आम चुनावों के लिहाज से अहम माना जा रहा है. दोनों दलों की रणनीति लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा की जंग जीत कर माहौल अपने पक्ष में करने की है. राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव 2014 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है.

पांचों राज्यों के करीब 11 करोड़ मतदाताओं की कसौटी पर दोनों प्रमुख पार्टियां हैं. दिल्ली के अलावा इन राज्यों में और कोई तीसरा दल अधिक ताकतवर दिखाईर् नहीं देता. चुनावों में मोदी बनाम राहुल फैक्टर की चर्चा जरूर है मगर मतदाता उदासीन है.

मजे की बात यह है कि इस वक्त जब राज्यों और वहां के नागरिकों का भविष्य तय होने जा रहा है, ऐसे में देश साधुओं के सपने को सच होते देखने वाले मजमे में शामिल दिखाई पड़ता है, इस से बड़ी दुख और हैरानी की बात और क्या हो सकती है.इन 5 में से 3 राज्यों, राजस्थान, दिल्ली व मिजोरम में कांग्रेस और 2 राज्यों, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है.

मोदी और कलह

इस बार भाजपा ने अपनी वैतरणी गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंप दी है. पार्टी उन्हें चमत्कारी अवतार मान कर भरोसा किए बैठी है. मोदी की रैलियों में काफी भीड़ उमड़ रही है पर यह पक्का नहीं है कि यहां आने वाले लोग भाजपा को ही वोट देंगे.

मोदी जहां भी जाते हैं, कांग्रेस सरकार की नाकामियां गिनाते हैं या फिर गांधी परिवार पर निशाना साधते हैं. मोदी रैलियों में विकास की बातें तो करते हैं पर वे विकास का कोई नया खाका देश के सामने पेश नहीं कर पाए हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद आने वाले इन चुनावों में मोदी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते.

ऊपर से हर राज्य में भाजपा आपसी कलह से जूझ रही है. मोदी के नाम पर न तो राज्य इकाइयों में नेताओं की कलह कम हो पा रही है और न ही कुरसी का मोह त्याग कर एकजुटता देखी जा रही.

क्या है असल मुद्दा

विधानसभा चुनावों में कोई लहर नहीं है. न कोई बड़ा मुद्दा है, न कोई मसला है. हमेशा की तरह महंगाई, मंदी, भ्रष्टाचार, असुरक्षा तथा अन्य स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे. 200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा में कांटे का मुकाबला माना जा रहा है. पिछले चुनावों में कांग्रेस 96 सीटें के साथ कुछ निर्दलीयों को शामिल कर सत्ता में आई थी. भाजपा को 78 सीटों के साथ सत्ता गंवानी पड़ी.

कांग्रेस की गहलोत सरकार पहले दिन से ही जनता की समस्याओं और प्रदेश के विकास की बात करती रही है, वह चाहे बाड़मेर में रिफाइनरी लगाने का काम हो, जयपुर मैट्रो ट्रेन शुरू कराना हो, मुफ्त चिकित्सा, किशनगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, सड़कें, बिजली, पानी, विधवा, बुजुर्गों को पैंशन बांटने जैसे काम हों. प्रदेश सरकार लोगों को खुश करने की पूरी कोशिश करती दिखाईर् दी है.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री पद की दावेदार वसुंधरा राजे सिंधिया कांग्रेस सरकार को घेर पाने में सफल नहीं दिख रहीं. पिछली बार सत्ता से हटने के बाद उन का विदेश प्रवास चर्चा में रहा. विधानसभा में उन की अनुपस्थिति को ले कर सवाल उठते रहे.

पिछले चुनावों में सरकारी कर्मचारियों की गहलोत सरकार से जरूर नाराजगी दिखी पर इस बार सरकार राज्य के लाखों कर्मचारियों और उन के परिवारजनों को खुश करने में जुटी देखी गई. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की छवि ईमानदार और जनता से जुड़े नेता के रूप में रही है लेकिन उन की सरकार के कई मंत्रियों व विधायकों पर भ्रष्टाचार, बेईमानी और यहां तक कि बलात्कार के आरोप भी लगते रहे.

कांग्रेस में जाट वोटों की नाराजगी कम करने के लिए केंद्र में उसी शीशराम ओला को फिर से मंत्री बना दिया गया जिन्हें कुछ समय पहले अधिक उम्र के चलते हटा दिया गया था. राज्य में जाट परंपरागत कांगे्रसी वोट माने जाते थे लेकिन अटल बिहारी सरकार ने राज्य के जाटों को ओबीसी में शामिल करा कर इस बिरादरी का झुकाव भाजपा की ओर मोड़ दिया. तब से कांग्रेस की हारजीत के लिए जाट मतदाता परेशानी का सबब बन गए. ओला के अलावा ब्राह्मण वोटों को लुभाने के लिए केंद्र में गिरिजा व्यास को भी मंत्री पद की शपथ दिलाई गई.

उधर, भाजपा में नेतृत्व को ले कर शुरू से ही कलह सामने आ गई थी. घनश्याम तिवाड़ी, रामदास अग्रवाल, नरपत सिंह राजवी, गुलाब चंद कटारिया जैसे बड़े नेता खुल कर वसुंधरा राजे सिंधिया की खिलाफत में उठ खड़े हुए.

वसुंधरा वर्ष 2003 से 2008 तक मुख्यमंत्री रहीं लेकिन उन का राज सामंती तौरतरीकों वाली महारानी जैसा माना गया. राजनीतिक तालमेल में कमी, पार्टी नेताओं से दूरी, सेज मामला, भू माफियाओं का तंत्र, गुर्जर आंदोलन में गोलीकांड जैसे कई ऐसे मामले थे जिन से वसुंधरा को काफी फजीहत झेलनी पड़ी.

एकजुट नहीं हैं नेता

विधानसभा की 230 सीटों वाले मध्य प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटा पाना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. हालांकि कुछ जमीन व बिल्ंिडग माफियाओं के कारण प्रदेश सरकार विपक्ष के निशाने पर रही. पूर्व वित्त राज्यमंत्री राघवजी की वजह से पार्टी को बदनामी झेलनी पड़ी.

उधर, मध्य प्रदेश में कांग्रेसी नेता एकजुट नहीं हैं. पार्टी ने युवा चेहरे के रूप में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य में चुनाव प्रचार अभियान का मुखिया बना कर नया नेतृत्व देने की पहल की गई है पर बाकी बड़े नेताओं में कमलनाथ, अजय सिंह और दिग्विजय सिंह की राहें अलगअलग हैं. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने 2003 में मुख्यमंत्री की कुरसी गंवाने के बाद

10 साल के संन्यास की घोषणा की थी. वे 10 साल इस वर्ष के अंत में खत्म हो रहे हैं पर वे राज्य की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप  नहीं करते दिख रहे. भाजपा को कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा मिलने की उम्मीद है. यहां पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 143, कांग्रेस को 71 सीटें मिली थीं.

बढ़ते दावेदार

दिल्ली में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है लेकिन इस बार भ्रष्टाचार आंदोलन से निकली ‘आम आदमी पार्टी’ भी तीसरे दावेदार के रूप में दिख रही है. भले ही वह सत्ता में न आ पाए लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों का खेल जरूर बिगाड़ देगी. आम आदमी पार्टी दोनों दलों के वोट काटने में कामयाब होगी. यहां लगातार 3 बार से कांग्रेस की सरकार है तो एमसीडी की सत्ता भाजपा के पास है.

कांग्रेस का प्रमुख चेहरा मुख्यमंत्री शीला दीक्षित हैं. कुल 70 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस 43 सीट जीत कर लगातार तीसरी बार सत्ता में आई. भाजपा 23 सीटों पर सीमित रह गई. बहुजन समाज पार्टी ने भी सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे लेकिन 2 सीटें ही जीत पाई थी.

भाजपा हरसंभव कांग्रेस से इस बार सत्ता हथियाना चाहती है पर आंतरिक कलह के चलते मतदाता उस पर भरोसा करने से कतरा रहे हैं. पार्टी में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार थे लेकिन अब डा. हर्षवर्धन पर भाजपा में सहमति बन गई है.

भाजपा के पास कांग्रेस को हराने का कोई ठोस मुद्दा नहीं नजर आ रहा. आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल शीला दीक्षित के खिलाफ लड़ने का ऐलान काफी पहले कर चुके थे पर उन के पास दिल्ली में कांग्रेस से सत्ता छीन कर बेहतर सरकार देने का अब तक कोई ब्लूप्रिंट नहीं है.

बदले से मिजाज

90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में पिछली बार भाजपा 50 सीटें जीत कर सत्ता में आई थी. कांग्रेस के पास 38 तथा 2 अन्य के हिस्से आईं. भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह की छवि साफसुथरी मानी जाती है. 2008 के चुनाव में उन की लोकप्रियता चरम पर थी. खासतौर से 2 रुपए किलो चावल ने छत्तीसगढ़ के गरीब आदिवासियों एवं दलितों के मन में उन के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा किया जिस का प्रदर्शन उन्होंने भाजपा के पक्ष में वोट दे कर किया. लेकिन जिन मुद्दों ने रमन सिंह को जिताया था, वे मुद्दे अब आकर्षण खो चुके हैं क्योंकि केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने इसे फीका कर दिया है.

रमन सरकार के लिए विपक्षी दलों की एकजुटता खतरा बन रही है. कुछ समय पहले भाजपा पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के तेवर से प्रसन्न थी क्योंकि आंतरिक कलह और जबरदस्त गुटबाजी से कांग्रेस के बिखरने के आसार दिखने लगे थे लेकिन जोगी के तीखे तेवर ढीले पड़े, पार्टी में बिखराव का संकट टल गया.

यहां भाजपा के सामने सत्ता विरोधी लहर का खतरा भी है.

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी कांग्रेस के बड़े नेता हैं. वे शुरू में अपनी ताकत दिखाने के लिए हाईकमान के लिए परेशानी पैदा करते रहे लेकिन पार्टी के लिए उन के खिलाफ कड़ा कदम उठाना मुश्किलों भरा होता. लिहाजा, उन्हें हर बार बरदाश्त किया जाता रहा. अब जोगी की जगह उन के बेटे अमित जोगी को मरवाही से टिकट दिया गया है तो उन की पत्नी रेणु जोगी को कोटा से प्रत्याशी बनाया गया है. जोगी को राज्य में प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

झूठे वादे और विकास  

मिजोरम में कांग्रेस के पी ललथनहवला की सरकार के सामने इस बार मिजो नैशनल फ्रंट की चुनौती है. यहां भाजपा का नामोनिशान नहीं है. पिछले विधानसभा चुनावों में कुल 40 सीटों में से कांग्रेस 32 सीटें जीती थी. कांग्रेस को इस बार यहां खाद्य सुरक्षा कानून लागू करना फायदेमंद लग रहा है पर स्थानीय समस्याओं पर सरकार के खिलाफ नाराजगी भारी पड़ सकती है.

अब यह तय हो चुका है कि राजनीतिक पार्टियों की पहले वाली सोच बदल रही है. मतदाताओं को हमेशा बेवकूफ समझने वाले दल संभल चुके हैं और वे झूठे वादे, झूठे आश्वासन और भावनात्मक मुद्दों से परहेज करते नजर आ रहे हैं. अब सब पार्टियों को लग रहा है कि विकास का मुद्दा सब पर भारी पड़ेगा इसलिए सब विकास का राग अलापने लगे हैं. हर दल के एजेंडे में विकास सर्वोपरि है. भले ही विकास के हवाईर् किले बांधे जा रहे हों पर बातें तो हो रही हैं.  हालांकि ‘पुरानी आदत जल्दी नहीं छूटती’ कहावत को भी पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि धर्म, जाति, वर्ग, धनबल, बाहुबल जैसे नुस्खे आजमाने की हरसंभव अंदर ही अंदर कोशिशें जारी हैं और अभी भी धर्म, जाति चुनावी हारजीत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. हर कोई विकास का राग तो गा रहा है पर राग बेसुरा सा है जिस में न ताल है न लय, न सुर है और न ही संगम.

विकास हुआ है पर किस का विकास? कैसा विकास? क्या जनता की नजरों में वास्तविक विकास एक्सप्रैस वे, चमकदार सड़कें, पुलों का जाल, बड़ेबड़े मौल्स, नए हवाई अड्डे विकास हैं या फिर उस की रोजमर्रा से जुड़ी दिक्कतों को हमेशाहमेशा के लिए आसान बना देना.  सरकारों ने अपराधियों, माफियाओं, कौर्पोरेट जगत, नौकरशाही और धर्मों के फायदे की बात प्रमुखता से उठाने वालों का तो विकास किया लेकिन निचले पायदान पर रह रहे लोगों के विकास के नाम पर उन के लिए मात्र योजनाएं ही बनाई गईं. उन योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंचाया गया.

पिछले साल दिल्ली के जंतरमंतर से शुरू हुए भ्रष्टाचार आंदोलन के बाद यह बड़ा चुनाव हो रहा है. हर राजनीतिक दल तब देश के आक्रोश की जद में था. आज भी राजनीति में अपराध और भ्रष्टाचार व नेताओं की शहंशाहों जैसी जिंदगी से देश बुरी तरह खफा है.

राज्यों में मतदाताओं पर मोदी फैक्टर हावी रहेगा, पक्का भरोसा नहीं पर कांग्रेस में राहुल गांधी का जादू चल पाना मुश्किल लगता है. भाजपा और कांग्रेस दोनों द्वारा शासित राज्यों में मुख्यमंत्रियों के कामकाज ही हारजीत का निर्णय करेंगे.  बहरहाल, चुनावी ऊंट अंतत: किस करवट बैठेगा, यह भविष्य गर्त में है.

तेलंगाना की राजनीति

तेलंगाना के गठन पर बवाल खड़ा कर आंध्र प्रदेश के नेता जगन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू फालतू में राज्य की शक्ति और पैसा बरबाद कर रहे हैं. मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश के हाल के विभाजन और उस से पहले महाराष्ट्र, पंजाब, असम के विभाजनों से साबित हो गया है कि राज्यों के विभाजन से देश व राज्य को कोई विशेष लाभ न भी हो तो कम से कम नुकसान कुछ नहीं होता.

अगर किसी राज्य के कुछ लोग अलग राज्य पा कर अपनी स्वतंत्र नेतागीरी चलाना चाहते हैं और उन्हें जनता के काफी हिस्से का समर्थन भी मिल रहा है तो इस बात को तूल देना बुद्धिमानी नहीं है. अलग हुआ राज्य अलग राजधानी बनाता है और मंत्रियों के ठाटबाट रहते हैं. पर उस से पहले बड़े राज्य में मंत्री फिर भी उतने ही होते थे और उन के ठाटबाट भी वैसे ही होते थे. फर्क इतना है कि एक नया सचिवालय बनता है, एक नया विधानसभा भवन बनता है.

राज्य के विभाजन के बाद दोनों राज्यों के विधायकों की संख्या उतनी ही रहती है यानी मंत्रियों की संख्या भी नहीं बढ़ती. इस से मंत्रियों का तो नुकसान होता है क्योंकि उन का अधिकार क्षेत्र सीमित हो जाता है. छोटे राज्यों के मुख्यमंत्री तो बेचारे केंद्र सरकार के पास भीख का कटोरा लिए खड़े रहते हैं. उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने के लिए समय तक जल्दी नहीं मिलता.

मुख्यमंत्री की ऐसी कुरसी भी किस काम की पर यदि आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी तेलंगाना राज्य समिति के अंतर्गत राज्य की मांग कर रहे हैं और केंद्र सहमत है तो मान लेने में हर्ज क्या है? चंद्रबाबू नायडू, जगन रेड्डी आदि फालतू में जनता का समय बरबाद कर रहे हैं.

केंद्र इस में दोषी है तो सिर्फ इसलिए कि उस ने ढीलढाल बहुत की, अपने मुख्यमंत्री के रोबदाब के चक्कर में इस मामले को रबड़ की तरह खींच दिया. अब उस दोष की सजा भुगतने का समय आ गया है. कांगे्रस यदि सीमा और तेलंगाना क्षेत्रों, दोनों में चुनाव हार जाए तो बड़ी बात न होगी क्योंकि उस के खराब राजनीतिक मैनेजमैंट के कारण दोनों तरफ के लोग नाराज हो गए हैं. यह विभाजन तो खुशीखुशी, बिना आंसू बहाए हो सकता था.

कर्ज और कर्जदार

बैंकों से कर्ज ले कर मौज उड़ाना या उन पैसों को अनापशनाप उद्योगों व व्यापारों में लगाना हमारे देश में एक खेल है. जहां करोड़ों लोग अपनी गाढ़ी कमाई ऐसे बैंकों और फाइनैंस कंपनियों के हवाले कर देते हैं जो उसे हड़प कर डकार भी नहीं लेते, वहीं हजारों ऐसे शातिर भी हैं जो बैंकों को चूना लगाते हैं. इस में शक नहीं है कि बैंकों से कर्ज ले कर बरबाद करने वालों में ज्यादातर वे हैं जिन्होंने रिश्वत दे कर कर्ज प्राप्त किया था. वे सोचते हैं कि उद्योगधंधे तो रिश्वतखोरी और हेरफेर से चलते हैं. उन्हें कर्ज लिए पैसे को सही ढंग से इस्तेमाल करना आता ही नहीं.

बैंकों ने कर्ज न लौटाने वालों को शर्मिंदा करने के लिए अब उन के फोटो अखबारों में प्रकाशित कराने शुरू कर दिए हैं और इस पर सवाल उठ खड़े हुए हैं कि यह इजाजत उन्हें कानून से मिली है या नहीं. आमतौर पर वकीलों का मानना है कि जब तक अदालत का आदेश न हो इस प्रकार का विज्ञापन, जो कर्ज पाने वाले की मानहानि करे, प्रकाशित करना गलत है. 1-2 मामलों में अदालतों ने बैंकों को ऐसा करने से रोका भी है.

कर्ज लौटाना हर कर्जदार का फर्ज है. देश में 20 साल पहले चले कर्ज मेलों ने लोगों के मन में भर दिया था कि कर्ज लौटाना जरूरी नहीं. लाखों किसानों के कर्ज माफकिए गए हैं. लाखों को कर्ज लौटाने पर ब्याज में भारी छूट दी गई है. इस से माहौल बना है कि कर्ज ले कर घी पीने का सिद्धांत आज भी चल रहा है.

कर्ज लेने वाला पैसा ढंग से और संभल कर खर्च करे, यह जरूरी है. अगर उसे मालूम हो कि कर्ज लेने के बाद उसे न लौटाने पर अदालतों में वर्षों लगेंगे तो वह कर्ज के पैसे के बारे में कभी सतर्क नहीं होगा. इसलिए कर्ज न लौटा पाने वालों को शर्मिंदा करना गलत नहीं है.

अगर आज का कानून आड़े आएगा तो भी यह बात न रुकेगी क्योंकि कर्ज देते समय ही लंबी शर्तों में बैंक यह भी लिखवा लेंगे कि कर्ज न लौटा पाने की स्थिति में वे ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करा सकते हैं और तब मानहानि का कानून लागू नहीं हो पाएगा. कर्ज लेते समय कर्जदार की हिम्मत कभी न होगी कि वह इस शर्त पर आपत्ति करे. कर्ज ले कर गाडि़यों और भव्य मकानों में मौज मनाने वालों की दुनिया में कमी नहीं है.

 

भाजपा की रामलीला

ऐन चुनाव से 2 माह पहले दिल्ली में भावी मुख्यमंत्री के सवाल को उठा कर भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा ने अपने अनुशासन की पोलपट्टी खोल दी है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल महीनों से अपनेआप को नरेंद्र मोदी की तर्ज पर मुख्यमंत्री घोषित कर रहे थे कि संघ की ओर से पूर्व अध्यक्ष डा. हर्षवर्धन  आ खड़े हुए और दोनों का घमासान कांगे्रसभाजपा जैसा हो गया.

अब नेता का नाम तय हो गया पर यह साफ हो गया है कि ‘साफसुथरी पार्टी’ कितनी साफ है. भाजपा को आमतौर पर मध्यवर्ग के वोट मिलते हैं और यही मध्यवर्ग आजकल सरकारी कामकाज से नाराज हो कर अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ का समर्थक बन रहा है और निश्चित है कि यह वर्ग कांग्रेस को कम, भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा. ऐसे में चुनावों से कुछ ही सप्ताह पहले विजय गोयल के नेतृत्व पर सवाल उठा कर भाजपा के नेताओं ने अपने दिमागी दिवालिएपन की कलई खोल दी. यह सवाल असल में चुनावों के बाद उठाया जाना चाहिए था अगर पार्टी को पर्याप्त बहुमत मिलता.

दिल्ली का चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि यहां से केवल 7 सांसद चुने जाते हैं लेकिन यदि नरेंद्र मोदी का प्रभाव दिल्ली की राज्य इकाई पर भी नहीं है तो साफ है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बावजूद भाजपा की प्रदेश इकाइयों में आपसी फूट और खींचतान जारी है.

वैसे, यह बात नई नहीं है. जैसे राम का नाम लेने वाली भारतीय जनता पार्टी के आराध्य राम को भी ऐन सिंहासन पर बैठने वाले दिन अयोध्या की महल की राजनीति के कारण राजपाट न मिल कर वनवास मिला, रामलीला को बारबार दोहराना तो भाजपा का धर्म वैसे ही है.

 

जनतंत्र और जनता

देश लोकतंत्र से अब जांचतंत्र बन गया है. राजनीतिबाजों और अफसरों ने इस तरह लूट मचा रखी है कि देश की अदालतें, केंद्रीय जांच ब्यूरो, सतर्कता आयोग, चुनाव आयोग, मीडिया आदि हर समय जांच करते नजर आ रहे हैं और मजेदार बात यह है कि हर जांच में कुछ न कुछ मिल जाता है. टाटा व अंबानी घरानों के लिए जनसंपर्क का काम कर रहीं नीरा राडिया के फोनों पर हुई बातचीतों के टेपों से सुप्रीम कोर्ट को अपराधों की बू आई है और उस के आधार पर टाटा, अंबानी, आदित्य बिड़ला, यूनीटैक की कंपनियों पर शक पैदा हो गया है.

उधर कोयला खानों में हेरफेर से एलौट का मामला ठंडा नहीं हुआ कि 17-18 नामी उद्योगपति जांच के लपेटे में आ गए हैं. इतना ही नहीं, जलते कोयले की गरमी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को झुलसाने लगी है.

केंद्र सरकार तो जांच के दायरे में है ही, राज्य सरकारें भी इसी तरह के कांडों में फंसी हैं. ऐसा महसूस होने लगा है कि सरकार का काम केवल बेईमानी करना रह गया है और जिस का जहां बस चलता है वह वहां हाथ मार रहा है. जितने पकड़े जाते हैं उन से हजारगुना बच निकलते हैं.

देश में इस आपाधापी का एक कारण यह है कि लोगों ने अपनेआप को आज भी राजाओं का सेवक सा समझ रखा है, लोकतंत्र को अपने सामूहिक कार्यों के लिए बनी संस्था न मान कर अपने पर राज करने की छूट देने वाला तरीका मान लिया है और वोट की मशीन से जिसे चुना उसे अपने पर अनाचार और अत्याचार करने का हक भी दे दिया.

देश अभी भी इस बात को समझने को तैयार नहीं है कि राजनीतिबाजों और नौकरशाहों के हाथों में ताकत जनता की कृपा से आती है और सामूहिक कार्यों के लिए धन जनता के योगदान से जमा किया जाता है. जनता अपनी बला सरकार पर छोड़ कर निश्ंिचत हो जाना चाहती है कि अब सब ठीक हो जाएगा. असल में हर बार चुनाव में लोग स्वयं को लूटने का हक पाने वालों को चुनते हैं जो 5 साल तक जम कर लूटते हैं.

यह भूल जाइए कि लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चौटाला, जगन्नाथ मिश्र जैसे कुछ को जेल में बंद कर देने से जनप्रतिनिधियों की लूट वाली सोच बदल जाएगी. जो पैसा खर्च कर के चुना जाएगा वह पैसा बनाएगा और उस जनता से बनाएगा जो अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती और जिसे सही व गलत का कोई अंदाजा नहीं है. 2013 में होने वाले कुछ राज्यों के और 2014 के आम चुनावों में जो चेहरे उतरने वाले हैं, उन में हरेक के चेहरे पर कालिख लगी है और वे जानते हैं कि साफसुथरे लोग न हैं और न ही जनता उन्हें जानना या चुनना चाहती है.

 

आरएसएस के मोदी

नरेंद्र मोदी को चुनावी सभाओं में मिलने वाली भीड़ भगवाइयों की पहली भीड़ नहीं है. यह वही भीड़ है जो कुंभ के मेलों में होती है, रामलीलाओं में होती है, तीर्थस्थानों में होती है, चारधाम यात्रा के लिए उत्तराखंड में जमा होती है, तिरुपति के मंदिर में लंबी लाइनों में होती है. धर्म के नाम पर रंगे लोगों की गिनती इस देश में कम नहीं है. इस तरह की भीड़ तब भी होती है जब रितिक रोशन शूटिंग पर पहुंचता है, फार्मूला 1 रेस होती है या क्रिकेट मैच होता है.

जनूनियों की भीड़ जनता का मत स्पष्ट नहीं करती. हां, मौजूद लोगों का उत्साह जरूर दर्शाती है. नरेंद्र मोदी ने छिन्नभिन्न होती, दिशाहीन भारतीय जनता पार्टी में एक नई जान फूंकी है. सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और लालकृष्ण आडवाणी से ऊबे लोगों को नरेंद्र मोदी में एक नया उत्साही, वाक्पटु नेता मिला है जो उन की पार्टी को नई ऊर्जा दे रहा है और पार्टी के निराश समर्थक व कार्यकर्ता जोश में आ गए हैं.

पटना में बम विस्फोटों के बावजूद नरेंद्र मोदी की सभा में गांधी मैदान में उमड़ी भीड़ यह जताती है कि नरेंद्र मोदी पर विश्वास व अंधविश्वास करने वाले अपनी जान की परवा भी नहीं करते. नरेंद्र मोदी ने पूरे भाषण में देश और बिहार के विकास का कोई गुर नहीं समझाया. उन्होंने नीतीश कुमार को मित्र कहकह कर भरपूर गालियां दे कर उस कृष्ण की याद दिलाई है जो एक तरफ कौरवों को सेना देता है तो दूसरी तरफ अर्जुन का सारथी बन कर उसे युद्ध करने पर राजी करता है.

10-20 साल से नहीं, सैकड़ों सालों से कट्टर हिंदू एक ऐसे उद्धारक की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो उन्हें बचा दे. पौराणिक ग्रंथों में जैसे देवता दौड़ेदौड़े कभी ब्रह्मा, कभी विष्णु के पास जाते थे कि उन्हें बचाया जाए वैसे ही हिंदू सदियों से अपने को बचाने वालों की चिरौरी करते रहे हैं और नए आक्रमणकारी का साथ तक देते रहे हैं ताकि पिछले आक्रमणकारी से छुटकारा मिल सके.

नरेंद्र मोदी फैक्टर देश पर छा गया है, इस से इनकार नहीं किया जा सकता है और यह सूखे में बादलों की तरह है. नरेंद्र मोदी पर इतना वादविवाद हो रहा है कि अब ज्यादा कहनेसुनने की गुंजाइश नहीं है क्योंकि मुद्दा नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व नहीं है, उन की शासन सक्षमता नहीं है, उन की नेतृत्व कला नहीं है. मामला तो कट्टर हिंदूवाद की पुनर्स्थापना का है. नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर मुख्यालय के प्रवक्ता हैं और नागपुर देश पर कब्जा करने का एक सपना क्यों न देखें, खासतौर पर जब बढ़ते भ्रष्टाचार, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, महंगाई, शहरों- गांवों में बढ़ते अपराध, शासकों का निकम्मापन रोज सुर्खियां बनते हों. बाढ़ के पानी में डूबते लोग तो कांटों भरी टहनी को पकड़ कर भी बचने की कोशिश कर लेते हैं. नरेंद्र मोदी को फिर क्यों छोड़ें?

 

आपके पत्र

सरित प्रवाह, अक्तूबर (प्रथम) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी’ अति महत्त्वपूर्ण है. आप ने बिलकुल सत्य लिखा है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवा कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वही किया है जो हिंदू राजाओं के साथ उन के ब्राह्मण सलाहकार किया करते थे.

इतिहास में दर्ज है कि ज्यादातर राजा ब्राह्मणों की सिफारिश पर बनाए जाते थे. कुछ ही युद्धों में जीत कर या जनता की इच्छा पर राजा बन पाते थे. नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की भी पसंद हैं, यह औपचारिकता तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नहीं निभाने दी.

नरेंद्र मोदी ने अब तक केंद्र में कभी काम नहीं किया. वे राज्य के मुख्यमंत्री चाहे हों पर वहां उन्होंने कोई क्रांतिकारी काम नहीं किया. उन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भरोसा है तो इसलिए कि उन्होंने वर्ष 2002 में दिखा दिया था कि वे हिंदुओं का नाजायज पक्ष कैसे ले सकते हैं और राजनीतिक व कानूनी वार झेल सकते हैं. प्रधानमंत्री का पद धर्मनिरपेक्ष ही होना देश के हित में है.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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हिंदी का प्राध्यापक होने के कारण आप की पत्रिका मैं नियमित पढ़ता हूं. यह एक अत्यंत आदर्श साहित्यिक पत्रिका है जिस में पुरोगामी विचारों को स्थान मिलता है. लेकिन अक्तूबर (प्रथम) अंक में ‘प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी’ शीर्षक के तहत छपे आप के संपादकीय विचार पढ़ कर बड़ा दुख हुआ, जिस में आप ने भाजपा व नरेंद्र मोदी पर अत्यंत प्रतिगामी टिप्पणी कर अकारण ब्राह्मण व मराठों के इतिहास को जातीय रंग दिया है. संभाजी राजे और राजाराम के सत्तासंघर्ष के कारण व छत्रपति शिवाजी महाराज के मृत्योपरांत मराठों में 2 गुटों के संघर्ष के परिणामस्वरूप पेशवा का उदय हुआ.

वैसे भी, सत्ता की राजनीति में स्वार्थ के आगे जाति गौण होती है. इतिहास में सभी जातियों ने राजनीति कर सत्ता सुख प्राप्त किया है. आज भी भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न जातियां सत्ता का सुख प्राप्त कर रही हैं और वर्तमान संदर्भ में किसी भी जाति पर टिप्पणी करना अशोभनीय है.

दूसरी बात, पेशवाओं ने अपने शौर्य के कारण उत्तर भारत में मराठों के राज्य का विस्तार किया. उन की हार के पीछे बहुत गहरा इतिहास है. आप ने आज के ब्राह्मणों को नवब्राह्मण कह कर अकारण कटुता को आमंत्रित किया है. आदर्श पत्रकारिता जाति पर नहीं, मात्र राष्ट्रहित पर आधारित होनी चाहिए.

डा. टी पी देशपांडे, नांदेड़ (महाराष्ट्र)

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संपादकीय टिप्पणियां ‘धर्म और दंगा’, ‘कानून और अदालत’ व ‘प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी’ समाज को यह संदेश देती हैं कि किस तरह हमारे देश के कर्णधार धर्म व जाति के नाम पर फूट डालते हैं और लोगों के दिलों में नफरत का जहर घोल कर दंगे करवाते हैं. क्या कभी किसी ने यह जाना या सुना है कि इन दंगों में किसी राजनीतिज्ञ की जान गई है या उस की हत्या की गई है.

इसी अंक में प्रकाशित लेख ‘आसाराम: संत के चोले में ऐयाशी’ लेख उन धर्मभीरू लोगों के लिए एक करारा थप्पड़ है जो आंखें मूंद कर समाज को कलंकित करने वाले तथाकथित ‘बाबाओं’ के पीछे चल रहे हैं. कितनी बड़ी विडंबना है कि आसाराम के भक्त यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आसाराम ने कोई अपराध किया है. वे धर्म के नाम पर एक धब्बा हैं.

सुनंदा गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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बाबाओं के फेर में

अक्तूबर (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ में आसाराम का कच्चा चिट्ठा खोला गया है. तस्करी, वेश्यावृत्ति व अपराध से बड़ा धर्म का कारोबार है. रात 11 बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाना वर्जित है. फिर भी सभी धर्मस्थल शोर मचाते रहते हैं. धर्मस्थल कानून से ऊपर नहीं हैं.

रजत कुमार, बरेली (उ.प्र.)

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लेख ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ पढ़ा. इस से यह निष्कर्ष निकला कि हमारे देश में राजनीतिक, सांस्कृतिक, नैतिक पतन के साथ धार्मिक विस्खलन भी तीव्र गति से हो रहा है. ऐसे ही कारणों की बदौलत हम हरेक क्षेत्र में पिछड़े हैं, अंदर से खोखले हो रहे हैं, केवल सरकारी आंकड़ों में आगे और स्वस्थ हैं.

धार्मिक प्रतिष्ठानों, पाखंडी खेलों में संलग्न पंडितों व मठाधीशों ने हमारे देश की धार्मिक प्रतिष्ठा को नष्ट करने में कुछ भी नहीं छोड़ा है. आसाराम की हैवानियत के चलते सच्चे धार्मिक गुरुओं की महिमा कम होने का डर है.

आश्चर्य की बात यह है कि आजकल टीवी चैनलों में धार्मिक प्रवचनों का प्रचारप्रसार ज्यादा होता है, लेकिन बलात्कार के घिनौने और अमानुषिक हादसे हमारे देश में लगातार बढ़ रहे हैं. महिलाओं पर बर्बर अत्याचार होता है जबकि दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियों की पूजाअर्चना यहीं ज्यादा होती है.

हैरानी यह भी होती है कि स्वयं घोषित देवों की संख्या भी बढ़ रही है और अंधविश्वासी, अशिक्षित, मानसिक कमजोर लोग उन के दरबार भी लगाए रहते हैं. अधिकतर देवस्थलों के संरक्षक राजनीतिक नेतागण होते हैं जिस के कारण संतों को सत्ता सहायता भी उपलब्ध होती है.

आसाराम के आश्रम में जिस तरीके से आसाराम और उन के शिष्यों ने किशोरी के साथ घंटों यौन उत्पीड़न का नंगा नाच किया, संपूर्ण विवरण पढ़ने के बाद लगा, ऐसे लोगों को मौत की सजा देनी चाहिए. पापपुण्य का हिसाब दिखा कर ज्यादातर लड़कियों और औरतों को गुमराह कर के ऐयाशी का शिकार बनाया जाता है. लड़की अगर नहीं बताती तो आसाराम लोगों की नजर में बदनाम नहीं होते, यथावत राम ही रहते.

सिलीगुड़ी में काली मंदिर के पीछे के कमरे में ब्लू फिल्म दिखाने की व्यवस्था करने वाले पुजारी जब पकड़े गए, लोगों के कान खुल गए. एक नवग्रह मंदिर के परिसर से रोज सुबह नकली दारू लोड कर के दार्जिलिंग ले जाने का धंधा चलता था. मंदिर के एकमात्र मालिक पंडित से शिकायत की गई तो वे मौन हो गए क्योंकि उन्हें शेयर मिलता था. श्वेत वस्त्रधारी, ललाट पर पीले चंदन का लेप लगाने वाला पंडित तब नाराज हो गया जब मंदिर परिसर से नकली दारू के लोड करने की व्यवस्था पर रोक लगाई गई.

सो, इस तरह के पंडितों की देखरेख में धार्मिक स्थलों का संचालन होता है और वहां भक्तजन भी जुट जाते हैं तो आसाराम जैसे रावणों का जन्म क्यों नहीं होगा?

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)

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आसाराम के बारे में ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ लेख पढ़ कर कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगा. जो हुआ वह तो होना ही था, बल्कि वर्षों से होता आया है, प्रकाश में अब आया है.

आश्चर्य यह है कि आस्थावान लोगों की आस्था टूटे नहीं टूट रही है. विश्वास और अंधविश्वास के बीच का फर्क कब समझ में आएगा लोगों को? नित्यानंद, निर्मल बाबा और आसाराम सरीखे कलियुगी भगवान से समाज को कब छुटकारा मिलेगा?

अफसोस यह है कि भगवान के खोल में छिपे इन राक्षसों के लिए जनता स्वयं ही उन का ग्रास बनने को तैयार है, विशेषकर महिलाएं, जो स्त्री हो कर भी एक स्त्री की पीड़ा नहीं समझतीं. अशिक्षित ही नहीं शिक्षित लोग भी अपनी अंधभक्ति के खिलाफ कोई तर्क सुनना पसंद नहीं करते. कई सैलिब्रिटी, जो जनता के आदर्श हैं, वे भी इन तथाकथित बाबाओं के चरणों में शीश नवाते हैं.

घर में काम करने वाली नौकरानी तनखा बढ़ाने को कहे तो उसे निकम्मा कह कर निकाल दिया जाता है, जरूरतमंद दोस्त या रिश्तेदार कुछ रुपए मांगे तो आप बहाने खोजते हैं, सब्जी वाले से 5-10 रुपयों के लिए बहस कर लेते हैं मगर इन बाबाओं के लिए लाखोंलाख रुपया दान करने में गर्व महसूस करते हैं.

हम यह क्यों नहीं समझते कि हमारे ही बीच में पैदा होने वाला मनुष्य, जो दैत्यों का सा आचरण करता है, वह भला भगवान कैसे हो सकता है. अगर सही अर्थों में ये महात्मा हैं तो हमारे बीच क्यों रह रहे हैं? राजसी ठाटबाट और ऐशोआराम त्याग कर हिमालय की कंदराओं में या सतपुड़ा के जंगलों में जा कर तपस्या क्यों नहीं करते?

पूजना ही है तो उन किसानों को पूजो जिन के परिश्रम के कारण ही हमारे घरों में अनाज आता है. सीमा पर मरमिटने वाले जवान पूजनीय हैं जिन के कारण हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं. माला जपो, उन देशभक्तों के नाम की, जिन की दी हुई आजाद आबोहवा में हम सांस ले रहे हैं. धन्यवाद करो मातापिता का जिन्होंने हमें यह दुनिया दिखलाई. दान करो प्रकृति को जो हर पल हमें जिंदगी दे रही है.

दरअसल, हमारी जागरूकता ही इन बाबाओं का सिंहासन हिला सकती है और हमारी धर्मनिरपेक्षता ही इन की जड़ें उखाड़ सकती है.

आरती प्रियदर्शिनी, गोरखपुर (उ.प्र.)

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प्रधानमंत्री की योग्यता

अक्तूबर (प्रथम) अंक का अग्रलेख ‘नरेंद्र मोदी ?: विवादों के घेरे में भाजपा के प्रधानमंत्री’ पढ़ा. लेखक ने कई सवाल भी उठाए, जैसे मोदी विपक्ष से ही नहीं, अपनों से भी घिरे हैं, मोदी कौन सा चमत्कार दिखाएंगे, उत्तराखंड की पहाडि़यों में वे हैलिकौप्टर से क्यों गए थे, वे अपना कद राष्ट्रीय नेतृत्व या पीएम योग्य किस आधार पर मान रहे हैं, उन्हें न तो अंगरेजी ही आती है और न ही सब को साथ ले कर चलने की योग्यता ही उन में है, आदि.

आज तक हमारे देश में बने प्रधानमंत्रियों में से कितने ‘अभिमन्यु’ थे, जो मां के पेट से ही सभी कुछ सीख कर आए थे? क्या ‘आसमान’ से अवतरित हुए ‘युवा’ प्रधानमंत्री ने चमत्कार कर दिखाया था या फिर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा, जिन्हें देश की राज्यभाषा हिंदी तक नहीं आती थी और जिन्हें राज्य से एकदम केंद्र में ले जा कर पीएम की कुरसी पर बैठा दिया गया था, ने क्या कोई चमत्कार कर दिखाया था?

देश में आज 10-12 महत्त्वाकांक्षी राजनेता ऐसे ही हैं. जो तीसरेचौथे मोरचे के नाम पर पीएम बन जाने का सपना संजोए बैठे या प्रयत्नशील हैं. मगर, इन में से किसी एक के भी बारे में क्या कोई भी बता सकता है कि वह सर्वमान्य, चमत्कारिक या फिर देश चलाने की सारी योग्यताएं अपने में समेटे हुए हैं.

रही बात सब को साथ ले कर चलने की, तो सुनिए, ये कहावतें हमारे देश में यों ही प्रचलित नहीं हैं कि ‘राजनीति में कोई किसी का न ही स्थायी दोस्त है न ही दुश्मन और न ही कोई अछूत.’ और ये सभी तथाकथित जननायक जब राजनीति ‘स्वहित’ की ही करते हों तो फिर वे दूर रहेंगे भी कब तक. पहाड़ों पर पैदल जाने की बात कर लेखक ने अपनी बौद्धिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगवाया है, क्योंकि उन्होंने यह नहीं बताया कि वहां पैदल गया ही कौन था, जो मोदी भी जाते.

टीसीडी गाडेगावलिया, करोल बाग (न.दि.)

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भेड़ की खाल में भेडि़या

आसाराम की हैवानियत की पड़ताल करती रिपोर्ट ‘आसाराम : संत के चोले में ऐयाशी’ पढ़ी. आसाराम जो कुछ भी धर्म के नाम पर कर रहे थे, आज दुनिया के सामने है. इन को क्या सजा होगी, कब होगी, होगी भी कि नहीं या इन के हर महकमे में बैठे इन के अंधविश्वासी भक्त इन को बचा ले जाएंगे, वक्त ही बताएगा. जब से इन को पकड़ा गया है, इन के भक्तों की पूरी कोशिश है कि उन्हें किसी भी तरीके से बचा लेना चाहिए. हैरानी की बात तो तब लगती है जब राम जेठमलानी जैसे विख्यात लोग भी उन्हें जमानत दिलवाने में लगे हैं.

पीडि़ता लड़की और उस के मांबाप जिन्होंने इतना सब सह कर भी जिंदादिली से काम लिया है, बधाई के पात्र हैं. अपने भीतर छिपी पीड़ा को एक दुखी बाप के लिए दुनिया के सामने लाना आसान बात नहीं है. यह तो देशवासियों के लिए ‘आई ओपनर’ है.

मैं समझता हूं कि इस से लोग, खासतौर पर महिलाएं, सबक लेंगी. कसम खाएंगी कि वे कभी भी ऐसे गुरुओं के चक्कर में नहीं पड़ेंगी.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

अकर्मण्य देश के मुंगेरी सपने

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का डौंडियाखेड़ा गांव देश के नक्शे में कहां है, कल तक कोई वाकिफ नहीं था. लेकिन पिछले दिनों एक साधु के सोने के खजाने से जुड़े तथाकथित स्वप्न ने इस गांव को रातोंरात मीडिया, नेता और नौकरशाहों के साथसाथ आम लोगों के पर्यटन स्थल में तबदील कर दिया है. शोभन सरकार के सपने के सोने पर हो रही सियासत, नौकरशाही की सक्रियता व खबरिया चैनलों का बेवकूफाना तमाशा क्या रंग लाएगा और क्या है खजाने का पूरा सच, पढि़ए शैलेंद्र सिंह की रिपोर्ट में.

खजाने की खोज की अफवाहें पूरी दुनिया में उड़ती रहती हैं. कई बार पुरातत्त्व विभाग भी ऐसे झांसे में आ जाता है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा गांव में ऐसे ही एक खजाने की खोज शुरू हुई. इसे खबरिया चैनलों ने जिस तरह से सनसनी बना कर पेश किया उस से उन की पत्रकारिता पर सवाल खडे़ हो गए हैं. जैसेजैसे खुदाई बढ़ती गई परत दर परत राजनीति की ईंटें भी उखड़ने लगीं. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में होड़ लग गई कि अफवाह का सब से बड़ा पैरोकार कौन है?

पूरे मामले में जनता के बीच फैला अंधविश्वास भी खुल कर सामने आ गया. 1 हजार टन सोना मिलने की आहट से ही लोग अपना कामधाम छोड़ कर उधर दौड़ पडे़. इस से डौंडियाखेड़ा में रहने वाले उन लोगों का कुछ लाभ जरूर हो गया जो खानेपीने की दुकानें चलाते थे. 20 रुपए बिकने वाले दूध की कीमत 45 रुपए और चाय की कीमत 8 रुपए हो गई. 7 फुट गहरी खुदाई तक पुरानी लखौरी ईंटों की दीवार मिलने से पुरातत्त्व विभाग खुश है. उस का कहना है कि पुरानी धरोहर किसी खजाने से कम नहीं होती है.

खजाने की इस कहानी को सिलसिलेवार पढ़ने से सचाई की झलक मिलने लगती है. राजधानी लखनऊ से 70 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा गांव में राजा राव रामबक्श सिंह का एक किला है. इस गांव को अब संग्रामपुर के नाम से जाना जाता है. अब यह किला एक टीले के रूप में दिखता है. यहां एक पुराना शिवमंदिर है. इस को देख कर ही अंदाजा लगता है कि यह काफी पुरानी जगह है. यह जगह पुरातत्त्व विभाग के अधीन है. जंगलनुमा इस जगह पर कोई आताजाता नहीं था. डौंडियाखेड़ा के इस किले में खजाना है, यह अफवाह काफी लंबे समय से इस क्षेत्र के लोगों से सुनी जा रही थी. यहीं पास में शोभन सरकार का आश्रम है. इस इलाके में रहने वाले लोग शोभन सरकार को भगवान की तरह मानते हैं.

खुदाई में सियासी पेंच

शोभन सरकार आश्रम में रहने वाले स्वामी भास्करानंद देव की तरफ से सितंबर में एक पत्र उन्नाव के डीएम, सांसद और प्रधानमंत्री को भेजा जाता है. पत्र में लिखा गया था कि ‘डौंडियाखेड़ा में राव रामबक्श के किले में 1 हजार टन सोने का खजाना दबा है. राजा राव रामबक्श की आत्मा ने शोभन सरकार से कहा है कि यह खजाना निकाल कर देश के खजाने में जमा करा दिया जाए, जिस से देश की खराब होती आर्थिक हालत में सुधार आ जाएगा.’ शुरुआत में पत्र को गंभीरता से नहीं लिया गया. इसी बीच, छत्तीसगढ़ से सांसद व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री चरणदास महंत शोभन सरकार आश्रम के संपर्क में आते हैं. खजाने की बात उन को पता चलती है. वे उन्नाव आ कर शोभन सरकार से मिलते हैं. इस के बाद खजाने की खुदाई में जो तेजी एएसआई दिखाती है वह देखते ही बनती है.

29 सितंबर को चरणदास महंत के निजी सचिव द्वारा भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण यानी जीएसआई उत्तरी क्षेत्र को ईमेल द्वारा पत्र भेजा जाता है. चरणदास महंत ने प्रधानमंत्री सहित दूसरे लोगों से मौखिक बात भी की. इस के बाद खजाने की खुदाई की प्रक्रिया में तेजी आनी शुरू हो गई. 3 और 4 अक्तूबर को जीएसआई की सर्वे टीम ने डौंडियाखेड़ा आ कर सर्वे का काम पूरा कर लिया. 10 अक्तूबर को भारतीय पुरातत्त्व विभाग यानी एएसआई ने सर्वे रिपोर्ट को गहराई से पढ़ कर खुदाई की तारीख तय कर दी. दरअसल, खुदाई की इसी तारीख ने राजनीति के पेंच को खोलना शुरू कर दिया था. एएसआई ने 18 अक्तूबर को डौंडियाखेड़ा में खजाने की खुदाई करने की तारीख तय की. डौंडियाखेड़ा से करीब 92 किलोमीटर की दूरी पर 19 अक्तूबर को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में अपनी पहली रैली कानपुर में करने वाले थे.

मीडिया का पीपली लाइव

एएसआई के कुछ लोग भी इस खजाने की खोज में दिखाई गई तेजी से हैरान थे. उस समय तक यह बात फाइलों में चल रही थी. अचानक 14 अक्तूबर से खबरिया चैनलों ने खजाने की खुदाई को तिलस्मी बना कर पेश करना शुरू कर दिया. खबरिया चैनलों के कार्यक्रमों में बाबा, सपना, किला, राजा और आत्मा को ले कर तमाम खबरें दिखाई जाने लगीं. इमेजिनेशन का खूब इस्तेमाल कर कार्यक्रमों को सनसनीखेज बनाया गया. स्टूडियो में बैठी ऐंकर सोने के पिंजडे़ जैसी लिफ्ट से जमीन के अंदर जा कर दिखाती थी कि खजाना कैसे दिखता है. हकीकत में खंडहर सा दिखने वाला राव रामबक्श सिंह का किला स्टूडियो में सोने सा चमक रहा था. घोडे़ पर चढ़ी राव रामबक्श सिंह की मूर्ति खरे सोने सी चमक रही थी. हर चैनल में इस बात की होड़ लग गई कि वह इस सनसनी को कैसे फैलाए?

खबरिया चैनलों ने ही यह अफवाह फैलाई कि बाबा के सपने में आ कर राजा ने खजाना निकालने की बात कही है. इस के बाद खबरिया चैनलों ने अपने कार्यक्रमों में बाबाओं, स्वप्न विशेषज्ञों को बैठा सपनों का महिमामंडन करना शुरू कर दिया. 2 दिन में ही खबरिया चैनलों में ऐसी होड़ मच गई कि हर तरफ सोने के खजाने का शोर मच गया. खजाना निकलने के बाद देश का कितना भला हो जाएगा? रिजर्व बैंक की हालत कितनी मजबूत हो जाएगी? रुपए का भाव कितना बढ़ जाएगा? देश में महंगाई खत्म हो जाएगी और विकास ही विकास नजर आएगा, ये सारा आकलन होने लगा. उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी खजाने की कहानी का असर दिखने लगा. पूरे देश में खजाने के प्रति कुतूहल बढ़ता जा रहा था.

18 अक्तूबर को डौंडियाखेड़ा में जब खजाने की खुदाई का काम शुरू हुआ तो 30 खबरिया चैनलों की ओबी वैन उस जंगल में पहुंच चुकी थीं. कुछ चैनलों के पास तो वीडियो कैमरे कम पड़ गए तो कानपुर और लखनऊ से किराए पर कैमरे मंगवाए गए. 20 से 25 हजार रुपए के किराए पर कैमरे मिले. खबरिया चैनलों में लगी होड़ देखते ही बन रही थी. उन के संवाददाता जिसे भी देख रहे थे उसी के पीछे भाग रहे थे. शोभन सरकार और उन के लोगों की एकएक बाइट हासिल करने में ऐसी जद्दोजेहद मची थी जैसे ओलिंपिक का मैडल बंट रहा हो. शाम को शोभन सरकार ने अपने आश्रम में 35 पत्रकारों से इस शर्त पर बात की कि कोई उन का फोटो नहीं लेगा. पत्रकारों को गहन तलाशी के बाद उन तक पहुंचाया गया.

20 मिनट की बातचीत में शोभन सरकार ने खजाने का एक पुराना सा नक्शा दिखाया. बहुत ज्यादा बात नहीं की. इस के बाद पत्रकार बाहर निकले तो यह होड़ मच गई कि कौन अपने चैनल पर सब से पहले यह बता दे कि वह शोभन सरकार से मिल चुका है. हर चैनल पर पत्रकार चीखचीख कर कह रहा था कि शोभन बाबा ने खासतौर पर उस से ही बात की है. यहीं पर, शोभन सरकार की तरफ से ओम बाबा मीडिया से मिलने लगे. ओम बाबा ने एक नया दावा किया कि केवल डौंडियाखेड़ा ही नहीं, फतेहपुर के आदमपुर और कानपुर में भी सोने का खजाना है. वहां के डीएम को भी खुदाई का पत्र दिया गया है.

काम न आया पूजापाठ

18 अक्तूबर को डौंडियाखेड़ा में सुबह 11 बजे से खजाने की खुदाई का काम शुरू हुआ. इस के पहले सुबह 4 बजे मीडिया से बचते हुए शोभन सरकार ने खजाने की खुदाई वाली जगह पर पूजापाठ किया. खुदाई के लिए पहला फावड़ा मारने का काम वहां के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, डीएम और उन्नाव के एसपी जैसे अधिकारियों ने किया. पुरातत्त्व विभाग की यह पहली खुदाई थी जिस के पहले इतना पूजापाठ किया गया था. पुरातत्त्व विभाग के लोगों ने मजदूरों के साथ मिल कर खुदाई शुरू की तो लोगों का उत्साह कम होने लगा. इस समय तक पुरातत्त्व विभाग के लोगों ने साफ कर दिया था कि 15 फुट की खुदाई में कम से कम 1 महीने का समय लगेगा. पुरातत्त्व विभाग ने यह भी कहना शुरू कर दिया था कि हम खजाने के लिए खुदाई नहीं कर रहे हैं.

29 अक्तूबर तक केवल 4.8 मीटर गड्ढे की खुदाई हुई थी. अब तक यह साफ हो गया कि 1 हजार टन सोना मिलने की बात कोरी अफवाह ही है. ऐसे में खबरिया चैनलों को अपना जमीर याद आने लगा. एक चैनल ने पूरे मामले में खबरिया चैनलों की भूमिका पर सवाल उठा कर अपना दामन पाकसाफ दिखाने की कोशिश शुरू कर दी. खबरिया चैनलों के साथ ही साथ धर्म और आडंबर का समर्थन करने वाले कुछ अखबारों ने भी खजाने की खोज के आधार पर सपने बुनने शुरू कर दिए थे. सवाल उठता है कि ऐसे सपने दिखा कर जनता को गुमराह करना कितना उचित है. लेखक और स्तंभकार हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं, ‘‘खबरिया चैनलों की विश्वसनीयता तो पहले से ही कम हो गई थी. अब समाचारपत्र भी उस होड़ में शामिल हो गए जो अच्छे लक्षण नहीं हैं.’’

खजाने के बंटवारे की होड़

खजाना मिला नहीं पर उस के बंटवारे की होड़ शुरू हो गई. शोभन सरकार की तरफ से केंद्र सरकार को कहा गया था कि खजाने का 20 फीसदी हिस्सा स्थानीय विकास पर खर्च हो. ऐसे में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को कहां चैन आने वाला था. कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी और समाजवादी पार्टी के महासचिव नरेश अग्रवाल ने कहा कि खजाने पर पहला हक उत्तर प्रदेश का होगा. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 18 अक्तूबर को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए कानुपर गए तो कहा कि हम चाहते हैं कि बाबा की बात सही निकले. प्रदेश के राज्यमंत्री का दरजा प्राप्त सुनील यादव ने शोभन सरकार से मुलाकात करने के बाद कहा कि संत का दावा अकाट्य है. खजाने से प्रदेश के विकास का खाका खींचा जाए. सुनील यादव ने भी खजाने पर उत्तर प्रदेश के दावे को मजबूती के साथ रखा.

सरकार ही नहीं, राजा राव रामबक्श और उन के सेनापति तक के करीबी होने का दावा करने वाले लोग भी जुट गए. वे सब भी खजाने में अपनी हिस्सेदारी मांगने लगे. वहीं, अखिल भारतीय क्षत्रिय समाज ने भी राजा के खजाने पर अपना दावा ठोंक दिया. राजा के इस किले में जहां कोई दिन में भी जाने का साहस नहीं करता था वहां मेला लग गया था. 200 पुलिस के जवान भीड़ को संभालने के लिए लगाए गए. प्रशासन ने खुदाई वाली जगह को चारों ओर बांस गाड़ कर घेर दिया. जैसेजैसे खजाने की खुदाई बढ़ रही थी, लोगों का सपना टूट रहा था.

6 फुट की खुदाई पर भूरे रंग की मिटट्ी मिलने के बाद शोभन सरकार के पैरोकार ओम बाबा ने नया दावा किया कि 15 फुट की खुदाई पर आश्चर्यजनक चीजें मिलेंगी.

नेताओं की तूतूमैंमैं

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 अक्तूबर को चेन्नई में कहा, ‘पूरी दुनिया हम पर हंस रही है. किसी ने खजाने का सपना देखा और सरकार ने खुदाई का काम शुरू कर दिया. अगर देश का काला धन वापस लाने का प्रयास होता तो खजाने की खुदाई की जरूरत नहीं पड़ती.’ हमेशा संत और बाबाओं का साथ देने वाली भाजपा शोभन सरकार के खिलाफ बोलने लगी. इस के पीछे की वजह केवल इतनी थी कि खजाने की खोज की चमक ने नरेंद्र मोदी की 19 अक्तूबर को होने वाली रैली को फीका कर दिया था.

चेन्नई में खजाने की खोज को जगहंसाई बताने वाले नरेंद्र मोदी ने कानपुर की अपनी रैली में इस विषय पर एक शब्द भी नहीं बोला. यही नहीं, जब वे कानपुर से वापस गुजरात गए तो शोभन सरकार का गुणगान किया. भाजपा ने कानपुर के एक नेता को दूत बना कर शोभन सरकार से मिलने के लिए भेजा.

18 अक्तूबर को ही शोभन सरकार की तरफ से एक पत्र नरेंद्र मोदी को लिखा गया था. पत्र में कई बातें लिखी गईं. इस के जवाब में भाजपा के प्रवक्ता रामेश्वर चौरसिया का बयान आया कि पत्र को देखने के बाद लगता है कि इस को कांग्रेस की तरफ से लिखा गया है. इसी बीच, मेरठ में कुछ लोगों ने शोभन सरकार के पैरोकार ओम बाबा को पहचान लिया. पूछने पर पता चला कि ओम बाबा का पहले नाम ओम अवस्थी था. वे कांग्रेस पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता थे. 15 साल पहले वे मेरठ से कानपुर चले आए. टीवी पर देख कर लोगों ने उन को पहचान लिया.

भाजपा नेता शोभन सरकार पर वार करने से बच रहे हैं पर ओम बाबा से वे खफा हैं. इन नेताओं का मानना है कि कांग्रेस के दबाव में ओम बाबा ने यह पूरा काम किया है. दूसरी पार्टियां भले ही इस मसले पर चुप हो गई हों पर जनता दल युनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस की आलोचना की. शरद यादव ने तो इस पूरे प्रकरण में अहम रोल निभाने वाले केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और एएसआई के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा कायम कराने की बात भी कही है.

अंधविश्वासियों का देश कहे जाने वाले भारत के नेता, नौकरशाह और प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडिया सभी का विश्वास सोने के खजाने पर डगमगा रहा है. कभी विश्वास तो कभी अविश्वास के फेर में पड़े इन ताजा अंधविश्वासियों के अंधविश्वास पर विश्वास को देख पुराने अंधविश्वासी, जिन में ज्यादातर महिलाएं हैं, मुसकराते मजे ले रहे हैं.

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फर्जी चमत्कारों पर जीता देश

ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों की इस पावन भारतभूमि पर सपनों में खोए लोगों का मजमा कब, कहां लग जाए, यह कोई हैरत की बात नहीं है. साधु शोभन सरकार ने अपना सपना केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री चरणदास महंत को सुनाया तो वह भला सपने को बकवास कैसे कह सकते थे. उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी को बताया. ऐसा खजाना हाथ लगने वाला हो तो किसी भी साधु की बात पर भरोसा किया जा सकता है. सपना साधु का था तो मिथ्या हो ही नहीं सकता. लिहाजा, भारतीय पुरातत्त्व विभाग यानी एएसआई और भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण यानी जीएसआई ने खोज कर बताया कि वास्तव में जमीन के नीचे कोई ‘धातु’ अवश्य है.

सरकार अपने महकमों की जांच से खुश हो गई. हो भी क्यों नहीं. आखिर हम उस भारतभूमि में रहते हैं जहां पहले भी राजा, महाराजा अपने साधुसंन्यासियों और राजपुरोहितों के सपनों के आधार पर ही राजकाज चलाया करते थे. यह देश बड़ेबड़े स्वप्नदृष्टा ऋषि, मुनियों, साधुसंतों, तपस्वियों की भूमि है जहां पहले भी इस तरह की महान विभूतियां अपने तप, अंतरदृष्टि के जरिए गड़े खजानों का अतापता बताती रही हैं.

देश हमेशा से भरोसा करता आया है कि साधु का सपना कभी झूठ नहीं होता. साधु की वाणी, वचन कभी खाली नहीं जाता. देश को साधुओं पर गहरी आस्था है. इस देश की पावन पवित्र भारतभूमि पर त्रिकालदर्शी ऋषि, मुनि, साधुसंत सदियों से वास करते आए हैं. शोभन सरकार के सपने में  शामिल सरकार खुश है कि हजार टन सोना आएगा तो देश की अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी. अर्थव्यवस्था सुधारने का जो काम सरकार स्वयं नहीं कर पाई, चलो शोभन सरकार का सपना ही पूरा कर देगा, इसलिए सरकार साधुओं, गुरुओं से दिशानिर्देश प्राप्त करने लगी है.

वहीं, कुछ लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही क्योंकि साधु ने सपने के सोने की मात्रा इतनी अधिक बताई है कि पूरे उत्तर प्रदेश के छोटेमोटे ईंट भट्ठों में ईंट का उत्पादन भी उतना नहीं होता होगा.

डौंडियाखेड़ा ही नहीं, पूरे उन्नाव जिले में लोगों का विश्वास है कि शोभन सरकार ने कहा है तो 1 हजार टन सोना निकलेगा ही. यह बात लोग छाती ठोंक कर कह रहे हैं. साधु के समर्थन में वे उन के तमाम चमत्कार गिनाते घूम रहे हैं, जिन में एक यह भी है कि एक बार शोभन सरकार ने अपने आश्रम में एक पेड़ को हिलाया तो इतने रुपए गिरे कि लोग गले तक ढक गए थे.

हमारी धर्र्म की किताबें भी तो गड़े खजाने के किस्से कहती हैं. हमारे यहां समुद्र मंथन से 14 बेशकीमती रत्न निकलने की कथा इस देश का बच्चाबच्चा जानता है. साधु, संत, गुरु, प्रवाचक यह कथा अपने लगभग हर प्रवचन में सुनाते भी हैं.

स्कंध पुराण के अनुसार, एक बार की बात है, शिवजी के दर्शनों के लिए दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कैलास जा रहे थे. मार्ग में उन्हें देवराज इंद्र मिले. इंद्र ने दुर्वासा ऋषि और उन के शिष्यों को प्रणाम किया. तब दुर्र्वासा ने इंद्र को आशीर्वाद दे कर विष्णु भगवान का पारिजात पुष्प प्रदान किया. इंद्रासन के गर्व में चूर इंद्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया. उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत सहसा विष्णु भगवान के समान तेजस्वी हो गया. उस ने इंद्र का परित्याग कर दिया और उस दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया.

इंद्र द्वारा भगवान विष्णु के पुष्प का तिरस्कार होते देख दुर्वासा के क्रोध की सीमा न रही. उन्होंने देवराज इंद्र को श्री(लक्ष्मी)हीन हो जाने का शाप दे दिया. दुर्वासा ऋषि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़ कर अदृश्य हो गई. लक्ष्मी के चले जाने से इंद्र आदि देवता निर्बल और श्रीहीन हो गए. उन का वैभव लुप्त हो गया. इंद्र को बलहीन जान कर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित कर के स्वर्र्ग पर अपना परचम फहरा दिया. तब इंद्र देवगुरु बृहस्पति और अन्य देवताओं के साथ  ब्रह्माजी की सभा में उपस्थित हुए. तब ब्रह्माजी बोले, देवेंद्र, भगवान विष्णु के भोगरूपी पुष्प का अपमान करने के कारण रुष्ट हो कर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गई हैं. उन्हें फिर से प्रसन्न करने के लिए तुम भगवान नारायण की कृपादृष्टि प्राप्त करो. उन के आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव फिर से मिल जाएगा.

ब्रह्माजी ने इस प्रकार इंद्र को आश्वस्त किया और उन्हें ले कर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे. देवताओं ने आने का प्रयोजन बताया. भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी हैं. वे पलभर में ही देवताओं के मन की बात जान गए. तब वे देवगण से बोले, देवगण, मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय है. दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उन से संधि कर लो. क्षीरसागर के गर्भ में अनेक दिव्य पदार्थों के साथसाथ अमृत भी छिपा है. उसे पीने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती है. इस के लिए तुम्हें समुद्रमंथन करना होगा. यह कार्य अत्यंत दुष्कर है. इस कार्य में दैत्यों की सहायता लो. कूटनीति भी यही कहती है.

भगवान विष्णु के बताए अनुसार, इंद्र आदि देवतागण दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव ले कर गए और उन्हें अमृत के बारे में बता कर समुद्रमंथन के लिए तैयार कर लिया. समुद्रमंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया. उस के बाद दोनों पक्ष अमृत प्राप्ति के लिए समुद्रमंथन करने लगे. भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मंदराचल पर्वत घूमने लगा. समुद्रमंथन में सब से पहले जल का हलाहल विष निकला. फिर अमृतमयी कलाओं से परिपूर्ण चंद्रदेव प्रकट हुए. कामधेनु गाय निकली. फिर उच्चै:श्रवा अश्व निकला. यह समस्त अश्व जाति में एक अद्भुत रत्न था.

उस के बाद गज जाति में रत्नभूत ऐरावत हाथी प्रकट हुआ, अब की बार समुद्र से संपूर्ण भुवनों की एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं. कौस्तुभमणि, कल्पद्रुम, रंभा नामक अप्सरा निकलीं. इस के बाद कन्या के रूप में वारुणि प्रकट हुई. फिर पारिजात वृक्ष व पांचजन्य शंख निकले और आखिर में धन्वंतरि वैद्य अमृत का घट ले कर प्रकट हुए.

तंत्रमंत्रों के सहारे गड़ा धन निकालने के दावे

‘कामाक्षा सिद्घि’ नामक पुस्तक में पृथ्वी में गड़ा धन दिखने के मंत्र बताए गए हैं. पुस्तक में एक जगह लिखा है,‘ॐ हृं क्लीं सर्वोषधी प्रणते नमो विच्चे स्वाहा.’

इस मंत्र की साधना के लिए विधि भी कही गई है,‘‘काले कौए की जीभ को काली गाय के दूध में औटा कर जमाने के बाद उस से घी निकाल कर, घी को उक्त मंत्र से 108 बार अभिमंत्रित कर के आंखों में आंजे तो गड़ा हुआ धन दिखाई देने लगता है अथवा उक्त घी को दीपक में जला कर काजल बनाएं. उस काजल को जो मनुष्य पांव की ओर से जन्मा (विष्णु पांव) हो, उस की आंखों में लगाए तो उसे पृथ्वी का गड़ा हुआ धन दिखाई देता है.’’

इसी पुस्तक में कुछ और विधि बताई गई हैं :

  1. काले रंग की इकरंगी मुरगी, जिस का मांस भी काला हो, उस की चरबी को अपनी आंखों में आंजने से पृथ्वी में गड़ा हुआ धन दिखाई देने लगता है.
  2. जिस स्थान पर कौए मैथुन करें और उसी स्थान पर सिंह आ कर बैठै, तो ऐसे स्थान में धन गड़ा हुआ है, ऐसा जान लेना चाहिए.

पृथ्वी में गड़ा धन जानने के और भी नियमानुसार तंत्र हैं.

  1. लाल पूंछ वाली वामनी को पकड़ कर  उस का रक्त निकाल लें. फिर उस में मैनसिल मिला कर पीसें, इस अंजन को आंखों में आंजने से पृथ्वी में गड़ा हुआ धन दिखाई देगा.
  2. शुभ तिथि, वार व नक्षत्र में काली गाय के दूध को जीभ पर रखें और उस के घी को दोनों आंखें में आंजें तो पृथ्वी में गड़ा हुआ धन दिखाई देगा.
  3. एक ऐसी काली मुरगी लें जिस का मांस भी काला हो, उस मुरगी के मांस को आंखों में आंजने से पृथ्वी में गड़ा धन दिखाई देगा.
  4. जिस जगह से कमल पुष्प जैसी गंध आती हो वहां धन गड़ा हुआ समझना चाहिए. जहां आसपास कोई जलाशय न हो, परंतु सूर्य की तेज धूप में भी जिस स्थान की मिट्टी नम रहती हो, वहां धन गड़ा हुआ समझना चाहिए.

इस पुस्तक में और भी साधन बताए गए हैं:

  1. दीपावली की रात में श्मशान में जा कर मनुष्य के कपाल में दीपक जला कर काजल पारें फिर उस काजल का आंख में अंजन करें तो पृथ्वी के भीतर गड़ी हुई वस्तुएं दिखाई देंगी.
  2. तुलसी, तुरंत मरे हुए मनुष्य के पेट का पानी, गोरोचन व शर्करा, इन सब को इकट्ठा कर 8 दिन तक धूप में रखें और 9वें दिन उन का अपनी आंखों में अंजन करें तो पृथ्वी में गड़ी हुई वस्तुएं दिखाई देंगी.
  3. कौए के रक्त में मैनसिल को भिगो कर छाया में सुखा लें. फिर उसे कूटपीस कर कपड़छन कर के आंखों में अंजन करें तो पृथ्वी में गड़ी हुई वस्तुएं दिखाई दे उठेंगी.
  4. काले कौए की जीभ तथा मांस को ले कर आक के सूत में लपेट कर बत्ती बनाएं और उसे बकरी के घी में भिगो कर रात के समय दीपक में जला कर काजल पारें. उस काजल को आंखों में लगाने से पृथ्वी के भीतर पड़ी हुई वस्तुएं दिखाई देंगी.

शोभन सरकार ने सपना कैसे देखा, यह रहस्य भी हमें मिल गया है. उन्होंने जरूर ‘कामाक्षी सिद्धि’ नामक पुस्तक पढ़ कर कड़ी मशक्कत की होगी तब जा कर स्वप्न में गड़ा सोना दिखाई पड़ा है. यह रहस्य क्या है, कैसे स्वप्न में गड़े धन का पता लगाया गया, आप भी जान लीजिए :

‘‘गुरुवार के दिन एक कौए को पकड़ कर पिंजरे में बंद कर दें. यदि धन गाड़ने वाला व्यक्ति पुरुष है तो नर कौए को और स्त्री हो तो मादा कौए को पकड़ना चाहिए. 3 दिन तक कौए को सामान्य दानापानी के अतिरिक्त दिन में एक बार किसी भी समय शुद्ध शहद के साथ गेहूं की रोटी भी अवश्य खिलानी चाहिए. चौथे दिन उस कौए को मार कर चोंच सहित उस के सिर को अलग कर लें व उस के शरीर के शेष भाग को पृथ्वी में गाड़ दें. फिर उस सिर को किसी लकड़ी की डब्बी में बंद कर के सुखाने के लिए किसी अंधेरी कोठरी में रख दें.

‘‘40 दिन बाद उस डब्बी को देखें. तब तक वह सिर सूख चुका होगा. तत्पश्चात उस सूखे हुए सिर को शुक्रवार के दिन 1 घंटे के लिए तेज धूप में रख दें और उस में 10 बूंद शुद्घ गुलाबजल व 1 माशा बढि़या शराब डाल कर डब्बी को फिर बंद कर दें. फिर अमावस्या की आधी रात के समय उस डब्बी को अपने सोने की चारपाई के सिरहाने जमीन में 1 फुट गहरा गड्ढा खोद कर गाड़ दें तथा स्वयं उसी चारपाई के ऊपर प्रतिदिन सोया करें. सोते समय सिर पूर्व की ओर व पांव पश्चिम की ओर रखने चाहिए.

‘‘उक्त कौए के सिर को सूखने में जितने दिन लगे हों (लगभग 40-50 दिन), उतने दिनों तक इसी प्रकार सोते रहें. इसी अवधि में किसी रात को सोते समय स्वप्न में गड़े हुए धन की पूरीपूरी सूचना मिल जाएगी और जागने पर स्वप्न की पूरी याद भी बनी रहेगी. तब उस सूचना के अनुसार, निश्चित स्थान पर पहुंच कर वहां गड़े हुए धन को निकाल लेना चाहिए.’’

इस के बाद जब आप को धन दिख जाए तो उस धन  को खोदने का मंत्र भी सीख लीजिए: ‘‘ॐ नमो भगवति सुमेरू रूपायै महाक्रांतायै कै कालरूपायै फट् स्वाहा.’’ और विधि भी समझ लीजिए: ‘‘पहले बिनौले, मूंग और तिल को गोमूत्र में पीस कर अपने शरीर पर लगाएं. फिर जहां खोदना हो वहां चौका लगा कर, बलिदान दे कर उक्त मंत्र का पाठ करें. फिर इसी मंत्र से गेहूं और तिल का होम करें. इस प्रकार 7 दिन तक करने के बाद शुभ नक्षत्र देख कर उस स्थान को खोदें तो सर्प आदि का भय नहीं होगा.’’

‘इच्छापूरक सिद्घियां’  नामक पुस्तक में भी गड़े धन की प्राप्ति के यंत्र बताए गए हैं. यंत्र इस प्रकार हैं:

‘‘बेलपत्र के रस हरताल तथा मैनसिल के मिश्रण द्वारा बेल कीलकड़ी के कलम से किसी शुभ स्थान पर बैठ कर पृथ्वी पर 2 हजार बार लिखने से गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है तथा मनोभिलाषाएं पूर्ण भी होती हैं.’’

लेकिन इन तमाम तरीकों से अब तक कहांकहां, कबकब, कितना गड़ा खजाना मिला, इस बात का जिक्र कहीं नहीं है.

सरकार ने बेमतलब ही जीएसआई, एएसआई जैसे महकमे बना रखे हैं. उसे सपने में गड़ा धन देखने वाले साधु, तंत्रमंत्र की सहायता से धन बताने वाले तांत्रिकों को भरती करना चाहिए ताकि वे सरकार को बताएं और फिर खुदाई हो. अर्थ संबंधी महकमा शोभन सरकार और उस जैसे सपना देखने वाले साधुओं को दे दिया जाए जो समयसमय पर पता कर के बताते रहें कि  किस जगह खजाना दबा पड़ा है.

इस देश में सदियों से साधु और शासक सपनों के सौदागर रहे हैं जिन्होंने न खुद परिश्रम कर के सोना उगाने की तरकीब की और न ही जनता को ऐसी कोई सीख दी. उन्होंने चमत्कारों पर भरोसा करना सिखाया. खोखले सपनों के सच होने की कहानियां सुनाईं इसीलिए जब खुली आंखों से ऐसे सपने देखे जाते हैं तो हाथ भी खाली ही रहते हैं. हैरत की बात है कि यह ठगविद्या आज तक जारी है.

सरकार के साथ साधु के समर्थक वाहवाही लूट रहे हैं लेकिन जब सपने की हकीकत खुलेगी तो न सरकार मुंह दिखाने लायक रहेगी, न समर्थक और न ही साधु. यह कोई नई बात नहीं है. इस अकर्मण्य देश में बैठेबिठाए गड़ा धन पाने के धार्मिक उपाय सदियों से चले आ रहे हैं. पृथ्वी में गड़ा धन आम आदमी को नहीं, इस पावन पवित्र धरती के त्रिकालदर्शी, अंतर्यामी साधुसंतों, तांत्रिकों को ही दिखाई पड़ता रहा है. ये लोग ही राजाओं, शासकों और आम लोगों को बताते रहे हैं.

यह देश सदियों से चले आ रहे थोथे सपनों को कब तक ढोता रहेगा, साधुओं की बातों पर चलता रहेगा? यह सपने, जागती आंखों के

नहीं, अफीमी उन्माद से भरी आंखों के सपने हैं. इन्हीं के कारण देश गुलाम बना रहा, पिटता रहा और पिछड़ा रहा. सदियां बीत गईं पर सपने वही हैं. आज विज्ञान के युग में भी वही सपने देखे जा रहे हैं. हैरानी तो यह है कि पंडेपुरोहितों, साधुओंबाबाओं के फैलाए अंधविश्वास पर शासनप्रशासन तनमनधन से विश्वास कर रहे हैं.

-जगदीश पंवार

 

आज के वैज्ञानिक युग में सिर्फ सपने के आधार पर खुदाई करवाना कहां तक उचित है?

इस विषय पर आप के विचार आमंत्रित हैं. पता है : सरिता, ई-3, झंडेवाला एस्टेट, रानी झांसी मार्ग, दिल्ली प्रैस, नई दिल्ली-110055. आप हमें 08527666772 नंबर पर एसएमएस भी कर सकते हैं.

बात ऐसे बनी

मेरी शादी के 1 साल बाद मेरी सास ने मुझ से कढ़ी बनाने को कहा. मैं ने कढ़ी बनाई लेकिन उस दिन गलती से मैं पकौडि़यों में नमक डालना भूल गई. बिना नमक की पकौडि़यां डालने से कढ़ी में स्वाद नहीं आएगा और उन्हें नमक के पानी में भिगो भी नहीं सकते, उन में पानी भर जाएगा. मैं यह सोच ही रही थी कि तभी मेरे पति वहां आ गए. मैं ने पति को यह बात बता दी. उन्होंने एक कटोरी में नमक का पानी बनाया और सिरिंज की मदद से पकौडि़यों में डाल दिया. इस तरह पकौडि़यों ने रस को सोख लिया और उन में नमक भी पहुंच गया. पति की सूझबूझ काम आई और मेहमानों ने कढ़ी की बहुत तारीफ की.

रश्मि श्रीवास्तव

 

बात 1960 की है. मेरा जालंधर के एक डाकखाने में अकाउंट था. मैं इसे बंद करवा कर अपने पैसे लेना चाहता था, क्योंकि मैं ब्रिटेन जा रहा था. जब मैं अपने पैसे लेने काउंटर पर पहुंचा तो खजांची ने मेरी पासबुक देखी और मुझ से कहा कि पैसे तभी मिल सकते हैं जब आप इस काम के लिए किसी गवाह को ले आएं.

मैं एक मित्र को ले आया पर खजांची ने पैसे देने से फिर भी इनकार कर दिया. उस ने कहा कि आप किसी ऐसे गवाह को लाएं जो हम दोनों को जानता हो. मैं ने उसी समय कहा, ‘आप किसी से मेरी शादी करवा दें, फिर आप उस को भी जानेंगे और मुझे भी.’ उस समय उस के मुंह का हाल देखने लायक था. चेहरे पर पसीना बहने लगा और मेरे पैसे मिल गए.

 जोगिंदर पाल सिंह मक्कड़, स्कौटलैंड (यू.के.)

 

बात उन दिनों की है जब हम नेपाल से उत्तर प्रदेश के चांदीनगर इलाके में शिफ्ट हुए थे. हमें आए कुछ दिन हुए थे कि एक रात मेरी बेटी के कान में दर्द शुरू हो गया. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं था. मेरे पतिदेव गांव गए हुए थे. बेटी दर्द के मारे रो रही थी. बेटी की हालत देख कर मैं घबरा गई. मुझे मालूम था कि 1-2 बूंद सरसों का तेल कान में डाल देने से दर्द में थोड़ी राहत मिलती है. लेकिन घर में एक बूंद भी सरसों का तेल नहीं था. रात के 12 बज रहे थे. मैं ने खिड़की से बाहर झांका तो गली सुनसान थी. मैं साहस कर के बाहर निकली और पड़ोसी का दरवाजा खटखटाया पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला. मुझे निराश हो कर लौटना पड़ा. क्या करूं, मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था.

मैं ने 2 बूंद रिफाइंड औयल बेटी के कान में डाल दिया. मैं ने सोचा, कुछ तो असर करेगा. सचमुच, 1 मिनट के अंदर दर्द गायब हो गया और मेरी बेटी चैन से सो गई.

जयंती रानी पात्रा, कृष्णा (आंध्र प्रदेश)

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