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महायोग : पांचवीं किस्त

अब तक की कथा :

फोन पर बात कर के यशेंदु संतुष्ट नहीं हो सके. आखिर उन की बेटी के भविष्य का प्रश्न उन के समक्ष अधर में लटक रहा था. मन में संदेह के बीज पड़ चुके थे. बेटी का चिड़चिड़ापन उन्हें प्रताड़ना दे रहा था. उन्होंने लंदन जा कर अपने संदेह का निराकरण करना चाहा. मानसिक तनाव व द्वंद्व में घिरे यशेंदु कार पार्क कर के सड़क पार करते समय ट्रक की चपेट में आ गए.

अब आगे…

पूजापाठ, ग्रहनक्षत्र, शुभअशुभ सब पंडितों से पूछ कर ही तो घर के सारे काम होते थे, फिर यशेंदु के साथ ऐसा अनिष्ट क्यों हुआ? कामिनी अब मांजी से इस सवाल का क्या जवाब मांगती. पंडितों ने तो उन की आंखों पर ऐसी पट़्टी बांध दी थी जिस के पार वह कुछ नहीं देख सकती थीं. लेकिन कामिनी  उस पार की तबाही साफ देख रही थी. ट्रक ड्राइवर के ब्रेक लगातेलगाते यशेंदु ट्रक से टकरा कर लगभग 4-5 फुट दूर जा गिरे और बेहोश हो गए.

यशेंदु की ट्रक से दुर्घटना की खबर डाक्टर द्वारा घरवालों को मिली तो वे घबरा गए. वे शीघ्रातिशीघ्र अस्पताल पहुंच गए. वहां कई लोग मौजूद थे.

‘‘कैसे हुआ यह सब?’’ सेठ ने अपने ड्राइवर से पूछा.

‘‘साब, पता नहीं चला कहां से ये साहब अचानक ही ट्रक के सामने आ गए और मैं ब्रेक लगा पाऊं इतनी देर में तो ये ट्रक से टकरा कर लगभग 4-5 फुट ऊपर उछल कर गिर कर बेहोश हो गए,’’ ड्राइवर को बहुत अफसोस हो रहा था. लगभग 30 वर्ष से वह यह काम कर रहा था. अभी तक इस प्रकार की कोई दुर्घटना उस से नहीं हुई थी.

दिया का रोरो कर बुरा हाल था. दादी, कामिनी, नौकर सब इस दुर्घटना से जड़ से हो गए थे. दिया जानती थी कि पापा उसे अपने साथ लंदन ले जाने के लिए यह सब भागदौड़ कर रहे थे इसलिए उस का मन और भी व्यथित हो उठा. यह प्रसाद मिला पापा को दादी की इतनी पूजा का? उस का मन हाहाकार करने लगा. वह बहुत अभागी है. अपने पिता की दुर्घटना के लिए वही जिम्मेदार है. वैसे कहीं पर कुछ भी हो सकता है परंतु दिया को इसलिए यह बात बारबार कचोट रही थी क्योंकि यह सबकुछ वीजा औफिस के बाहर ही  हुआ था. उस के अनुसार, पापा को यह सब उस की चिंता के लिए ही भोगना पड़ रहा था.

कामिनी ने आंसूभरी आंखों से औपरेशन के फौरमैलिटी पेपर्स पर हस्ताक्षर कर दिए. उस के मस्तिष्क में मानो हथौड़ी की सी मार भी पड़ने लगी. अगर लड़के के घर में सगाई या विवाह के बाद बड़ी दुर्घटना हो जाती है तो लड़की के मुंह पर कालिख पोती जाती है. इस के पैर ऐसे हैं, यह घर के लिए शुभ नहीं है आदि. परंतु जहां लड़की के घर में इस प्रकार की कोई दुर्घटना हो जाए तो क्या लड़के को भी अपशकुनी माना जाता है?

लगभग 3 घंटे के औपरेशन ने घरभर के सदस्यों को हिला कर रख दिया था. ड्राइवर और उस का मालिक दोनों ही सहृदय, संवेदनशील थे, होंठ सिए हाथ जोड़ कर, सिर झुकाए चुपचाप सबकुछ सुनते रहे. 5-7 मिनट बाद कामिनी ने सास को औपरेशन थिएटर के बाहर पड़ी कुरसी पर बैठा दिया और ड्राइवर व उस के मालिक के सामने हाथ जोड़ कर उन्हें वहां से जाने का इशारा किया.

कामिनी व दिया दोनों के मन में बहुत स्पष्ट था कि यह दुर्घटना क्यों हुई होगी? वे कई दिनों से यश को बहुत अधिक असहज देख रही थीं. दिया तो अपने में ही सिमट कर रह गई थी परंतु कामिनी ने पति को समझाने का भरपूर प्रयास किया था. यश थे कि बेटी को देखदेख कर भीतर ही भीतर कुढ़ रहे थे. ऊपर से उन की मां ने घर में पंडितजी को बैठा कर पूजापाठ का नाटक कर रखा था. उन्हें कभी भी पूजाअर्चना में कोई परेशानी नहीं रही परंतु यह कुछ भी हो रहा था, वह उन की समझ से बाहर था और उन की सोच उन्हें यह समझने के लिए बाध्य कर रही थी कि घंटी बजाने से काम नहीं चलेगा, उन्हें कर्मठ होना होगा. एक ओर उन के मन में सवाल पनप रहा था कि मां ने तो दिया की जन्मपत्री कई बार मिलवाई और 90 प्रतिशत गुण मिलने के बावजूद यह सब घटित हो रहा था. समय दीप व स्वदीप भी शहर में नहीं थे.

औपरेशन थिएटर के बाहर कुरसियों पर तीनों शांत बैठे हुए थे. तीनों के मस्तिष्क में एक बात अलगअलग प्रकार से उमड़घुमड़ रही थी. अचानक न जाने दिया को क्या हुआ, ‘‘दादी, आप हर चीज पंडितजी से ही पूछ कर करती हैं न? उन्होंने आप को यह नहीं बताया कि पापा पर ऐसा कोई ग्रह भारी है?’’

दादी के तो आंसू ही नहीं थम रहे थे. वे क्या उत्तर देतीं? इस उम्र में उन्हें बेटे का यह दुख देखना पड़ रहा था. इस पंडित के पिता ने जिंदगीभर उन के घर के लिए पूजाअर्चना की थी. दिया की दादी व दादाजी तो प्रारंभ से ही पंडितों के मस्तिष्क से ही चलते आए हैं. उन के द्वारा बताए हुए ग्रहों की शांति करवाना, जन्मपत्री मिलवाना व प्रतिदिन उन के द्वारा ही पूजाअर्चना करवाना. कामिनी के पिता ने अपने किसी भी बच्चे की जन्मपत्री नहीं मिलवाई थी फिर भी सब सुखी थे. उन्हें केवल कामिनी की ही जन्मपत्री मिलानी पड़ी थी और कामिनी ही जिंदगीभर इस घर के वातावरण में असहज बनी रही थी. दिया के साथ ये सबघटित तो हो ही रहा है साथ ही यश भी चपेट मेें आ गए. वह पंडित अभी भी घर पर बैठा घंटियां बजा कर भगवान को मनाने में लगा होगा.

दादी मन ही मन सोच रही थीं कि उन्हें अब कौन से जाप करवाने होंगे. यह एक लंबा दर्दीला घटनाक्रम बन गया था मानो. एक दुर्घटना का दर्द समाप्त भी नहीं हो पाता था कि दूसरी कोई दुर्घटना आ उपस्थित होती. कामिनी के लिए तो इस घर के प्रवेश का प्रथम दिवस ही दुर्घटना था बल्कि यह कहा जाए कि यश की सगाई का दिन ही दुर्घटना का दिन था. जिस पिता से वह यह अपेक्षा करती रही थी कि वे उसे किसी हताश स्थिति में डाल ही नहीं सकते उसी पिता ने उसे कहां से उठा कर कहां

पहुंचा दिया था.

बचपन में पिता रटाते थे-

वैल्थ इज लौस्ट, नथिंग इज लौस्ट,

हैल्थ इज लौस्ट, समथिंग इज लौस्ट,

इफ कैरेक्टर इज लौस्ट, एवरीथिंग इज लौस्ट.

ये पंक्तियां रटतेरटते कामिनी युवा हो चली थी. मध्यवर्गीय वातावरण में पलीबढ़ी कामिनी की विवाह के बाद बुद्धि में वृद्धि हुई और उस ने बड़ी शिद्दत के साथ यह महसूस किया था कि वैल्थ के बिना कोई पूछ नहीं है और जैसेजैसे वह इस वैल्दी घर का पुराना हिस्सा होती जा रही थी वैसेवैसे उस की यह भावना दृढ़ होती जा रही थी. कितना मानसम्मान था उस की ससुराल का इतने बड़े शहर में कि वह स्वयं को बौना महसूस करती थी. इतनी कि उस के मुख के बोल भी ‘जी हां’ और ‘जी नहीं’ तक सिमट कर रह गए थे. फिर वह इस सब की आदी हो गई थी और प्रात:कालीन मंत्रोच्चार उस के मुख से निकल कर केवल उस की आत्मा के ही साक्षी बन कर रह गए थे.

घर का संपूर्ण वातावरण सुबहसवेरे पंडितजी की घंटियों की मधुर ध्वनि से नहा उठता था. धीरेधीरे घंटियों के साथ हर घड़ी घर में पंडितों की नाटकीय आवाजें व फुसफुसाहटें सुनाई देने लगीं तब वह और अधिक सहज होती गई. उस ने पंडितों को मंत्रोच्चार करते हुए अकसर हंसीठिठोली करते देखा था. जैसे ही वहां घर का कोई सदस्य पहुंचता वे जोरजोर से मंत्रोच्चार करने लगते. अच्छे पल भी आए थे कामिनी के जीवन में जब उस ने 3 शिशुओं को जन्म दिया था. वास्तव में कामिनी को 2 बेटों के जन्म के बाद किसी तीसरे की कोई इच्छा ही नहीं थी परंतु घर में 1 बेटी की चाह ने पूरे वातावरण में मानो नाराजगी भर रखी थी. बेटी की चाह भी किस लिए क्योंकि 2-3 पीढि़यों से परिवार में कोई बेटी नहीं थी और इस परिवार के बुजुर्गों की कन्यादान करने में रुचि थी. पंडितजी ने उस के सासससुर के मस्तिष्क में कन्यादान की महत्ता इस कदर भर दी थी कि कन्यादान न किया तो उन का जीवन व्यर्थ था. और पंडितजी का गणित तो बिलकुल स्पष्ट था ही कि यशेंदुजी के हाथ की लकीरों में कन्या का पिता बनना स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो रहा था. सो, कामिनी के तीसरा शिशु कन्या हुई.

न जाने क्यों कामिनी इस बात से भयभीत सी रहती थी कि इतनी लाड़प्यार से पली उस की बिटिया एक दिन दूसरे के घर चली जाएगी उस का मनउपवन खाली कर के. वह भी तो आई थी, ठीक था, परंतु इतनी शीघ्रता से यह सब होगा और इस प्रकार होगा, इस के लिए उस का मन तैयार न था. हुआ वही जो घर के बुजुर्ग ने चाहा और परिवार के सब सदस्य यह होना देखते रहे.

अस्पताल में आईसीयू के बाहर सोफे पर बैठेबैठे न जाने मांजी की वृद्ध काया कब सोफे के हत्थे पर लटक सी गई थी. झुर्री भरे मुख पर आंसुओं की गहरी लकीरें किसी झील में कंकर फेंकने पर लहरों की भांति टेढ़ीमेढ़ी हो कर चिपक सी गई थीं. कामिनी ने सास को बड़ी करुणापूर्ण दृष्टि से देखा और उस के नेत्र फिर से भर आए. मां बुरी बिलकुल न थीं, उन्होंने अपने हिसाब से उसे प्यार भी बहुत दिया था परंतु उन की सोच थी जिस ने सारे वातावरण पर अपनी मुहर चिपका रखी थी. उन का अंधविश्वास और सर्वोपरि समझने की भावना ने पूरे वातावरण पर अजीब से पहरे बिठा दिए थे.

कितनी बार सोचा था कामिनी ने, समय के अनुसार प्रत्येक में बदलाव आते हैं परंतु उन की सोच व तथाकथित परंपराओं में बदलाव क्यों नहीं आ पा रहे थे? यदि पत्थर पर भी बारबार कोई चीज घिसी जाए तो वहां भी गड्ढा हो जाता है परंतु मां… थोड़ी देर में डाक्टर आए और उन के पास ही सोफे पर बैठ गए, ‘‘मांजी, रोने से तो कुछ हो नहीं सकता? आप तो कितनी समझदार हैं.

‘‘नर्स,’’ डाक्टर ने समीप से गुजरती हुई नर्स को आवाज दी. नर्स रुक गई.

‘‘मांजी को आईसीयू के बाहर से जरा यशेंदुजी को दिखा दो, जिन का आज औपरेशन हुआ है.’’

‘‘यस, डाक्टर,’’ नर्स उन्हें सहारा दे कर आईसीयू की ओर हाथ पकड़ कर धीरेधीरे चल पड़ी.

डाक्टर खड़े हो गए और कामिनी से बोले, ‘‘एक्चुअली मिसेज कामिनी, आय वांटेड टू डिसकस सम इंपौर्टेंट इश्यू विद यू.’’

– क्रमश:

बौनों का रहस्यमयी संसार : यांग्सी

हम लोग 4 घंटे का थकाऊ सफर पूरा कर के चीन के सिचुआन प्रांत के दूरदराज के गांव यांग्सी आ पहुंचे थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि हमारा स्वागत बच्चों ने किया. हमारा मन भावुक हो उठा. बच्चों के चेहरों पर फैली मुसकराहट बता रही थी कि वे हम से मिल कर खुश थे.

‘‘क्या कोई बड़ा बुजुर्ग हम से मिलने नहीं आएगा?’’ मैं ने अपने गाइड शिजुआओ ली से पूछा. वह मेरी बात सुन कर हंस दिया. एक क्षण बच्चों की ओर देख कर बोला, ‘‘महाशय, यहां आप की और मेरी तरह 5 साढ़े 5 फुट का कोई नहीं है, यही वे लोग हैं जिन्हें आप देखने आए हैं.’’

मैं उस की बात सुन कर एक क्षण को स्तब्ध रह गया. कभी उन बुजुर्ग बच्चों को देखता था और कभी ली को. तभी ली ने एक बच्चे को गोद में उठाया और मुझ से ‘हैलो’ करने को कहा. उस बच्चे ने चीनी भाषा में मेरा अभिवादन किया. ये लोग चीनी भाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं जानते. उस बच्चे का नाम मित्सु था जिस की उम्र 37 वर्ष थी.

मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मित्सु की उम्र 37 वर्ष थी. तब ली ने मुझे एक बार फिर चौंकाया, ‘‘वे जो 2 बच्चे आप खेलते देख रहे हैं वे जुड़वां हैं और 8-8 साल के हैं. मित्सु उन के पिता हैं.’’ मुझे इतनी हैरानी हुई कि मैं कुछ बोल नहीं पाया. मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.

मैं ने ली से उन के बौनेपन के बारे में विस्तार से बताने को कहा. ली ने कहा, ‘‘बताया जाता है कि 1920 के आसपास 5 से 7 वर्ष की आयु के बच्चे किसी रहस्यमय बीमारी की चपेट में आ गए. उस बीमारी का असर सीधे हड्डियों पर हो रहा था जिस से बच्चों का विकास रुक गया. हां, मानसिक और बौद्धिक विकास पर उस बीमारी का कोई प्रभाव देखने को नहीं मिला.’’

वैज्ञानिकों ने उस क्षेत्र के पानी, मिट्टी और अनाज का गहन अध्ययन किया लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा. कुछ समय पूर्व एक जरमन लेखक हार्टविग हौसडौर्फ इन लोगों पर शोध करने यहां आया था. उस ने अपने शोधपत्र में लिखा था, ‘‘सिचुआन प्रांत में 120 बौने पाए गए, जिन में सब से ऊंचे बौने की ऊंचाई 3 फुट 10 इंच थी. यह घटना नवंबर 1995 की है. सब से छोटे कद के बौने की ऊंचाई 2 फुट 1 इंच थी. यह आश्चर्यजनक है.’’

चीन के मानवजाति विज्ञानी यह रहस्य आज तक नहीं जान पाए हैं कि शारीरिक विकास रुकने का क्या कारण था. बहरहाल, एक शोध के अनुसार, मिट्टी में पारे के तत्त्व पाए गए थे जिस के कारण हड्डियों का विकास रुकने लगा. परिणामस्वरूप शरीर का संपूर्ण विकास ही रुक गया. बौनों के इस गांव का नाम है बयान कारा उला, जो एक पर्वतशृंखला के बीच बसा हुआ है. यह वह जगह है जहां क्ंवगहाई और सिचुआन प्रांतों की सीमाएं मिलती हैं.

जिस स्थान पर बयान कारा उला स्थित है उसी के पास एक नदी बहती है-डिले, जिसे इस गांव की जीवनरेखा कहा जा सकता है. चीन के लोग इन यांग्सी बौनों को ‘मशरूम पीपल’ भी कहते हैं. इन लोगों ने अपने मनोरंजन के लिए खास व्यवस्था कर रखी है. इन के लिए एक ‘ड्वार्फ थीम पार्क’ का निर्माण भी किया गया है जहां ये लोग नाचतेगाते हैं, नाटकों का मंचन करते हैं और खास बैठकें करते हैं.

विश्वभर में ड्वार्फिज्म (बौनेपन) पर होने वाले शोधकार्यों से पता चलता है कि बौने सिर्फ चीन या जापान में ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भी पाए जाते हैं. ब्रिटेन में तो बौनों की पूरी फुटबौल टीम है. भारत में भी बौनों की कमी नहीं है. सर्कस एक ऐसा व्यवसाय है जिस में बौनों की अनिवार्यता होती है. दुनिया में कहीं भी, कोई भी सर्कस ऐसा नहीं जिस में बौने कलाकार नहीं हैं. वास्तव में बच्चों के मनोरंजन के लिए बौने कलाकारों का होना अनिवार्यता होती है. यह बात अलग है कि अब सर्कस जैसा महंगा व्यवसाय लुप्तप्राय होने के कगार पर है. यों भी, सर्कस में इस्तेमाल किए जाने वाले जानवरों पर प्रतिबंध के चलते सर्कस व्यवसाय डूब रहा है.

प्रश्न उठता है कि सर्कस के बंद हो जाने पर अन्य (सामान्य) लोगों को तो कहीं न कहीं जीवनयापन योग्य कामधंधा मिल भी जाएगा लेकिन बौने लोगों (जो अमूमन जोकर का काम करते हैं) को कौन काम पर रखेगा? इसलिए सरकार को इन लोगों के सहायतार्थ सोचना चाहिए. सिचुआन प्रांत में बौनों के 18 गांव हैं और 3 प्रजातियां हैं. ये सभी लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और महामहिम जांग्चेन रिन्पोचे के प्रति समर्पित हैं.

बौनों का रहस्य चाहे जो भी हो, इतना तय है कि सामान्य व्यक्ति और उन के बीच किसी न किसी ऐसे तत्त्व की कमी अवश्य होती है जो उन की शारीरिक वृद्धि को एक स्थान पर ला कर रोक देती है. एक उल्लिखित जानकारी के अनुसार विश्वभर के वैज्ञानिक इस रहस्य से परदा नहीं उठा पाए हैं कि आखिर बौनापन होता क्यों है. बौनापन वंशानुगत होता हो, ऐसा भी आवश्यक नहीं है.

भोपाल की जीनत बी

113 वर्ष की जीनत बी शायद विश्व की सर्वाधिक आयु की बौनी महिला हैं (कद पौने 3 फुट). उन के विवाह न करने के कारण उन की कोई संतान नहीं है. भारत में ही भोपाल की रहने वाली जीनत बी को अपना बचपन और वह समय अच्छी तरह याद है जब ब्रिटिशर्स भारत पर राज करते थे. जीनत बी ने बताया, ‘‘मेरी उम्र इतनी है कि मैं ने भोपाल शहर को अपनी आंखों के सामने बसते देखा है. एक समय यहां सिर्फ जंगल ही जंगल हुआ करता था. मुझे आज भी याद है वह दिन जब अंगरेजों ने शहर में पहली बार डबलरोटी (ब्रैड) का प्रचलन शुरू किया था.’’

जीनत बी की देखभाल करने वाले सज्जन अबरार मुहम्मद खान दुखी मन से बताते हैं, ‘‘शर्म की बात है कि हमारे देश की सरकार जीनत की तरह के अन्य बौनों की तरफ कोई तवज्जुह नहीं देती, कोई सहूलियत नहीं देती बल्कि उन्हें प्रदर्शनी की वस्तुमात्र बना छोड़ा है.’’ जीनत बी, अबरार खान के घर में पिछले 30 सालों से रह रही हैं. अबरार खान उन्हें मां का दरजा और इज्जत देते हैं और उन की हर जरूरत का ध्यान रखते हैं. जीनत बी बताती हैं कि उन की मनपसंद चीज पान है. वे खाने के बिना रह सकती हैं, पान के बिना नहीं.

दर्द रिश्तों का

हर रिश्ते से बंधी थी
पर कोई भी रिश्ता
मेरा न था
रिश्तों में फासले तो थे पर
वे इतने खौफनाक भी हो सकते हैं
कभी सोचा न था

हमसफर बनाया था जिसे, हमसफर तो था
पर साथी न बन सका
रहते थे इक मकां में पत्थर की तरह
क्योंकि वो मकां था, घर न बन सका
घर न होने का दर्द
ऐसा भी होता है
कभी सोचा न था

गीली रेत पर लिखा था
अपना नाम उस के नाम के साथ
हवा का इक झोंका आया
रेत के साथ नाम भी उड़ा ले गया
नाम का वजूद मिटने का दर्द
ऐसा भी होता है
कभी सोचा न था

मुट्ठी में बंद रेत की तरह
कब फिसल गया वो
मालूम न था
रीति मुट्ठी लिए खड़े रहने का दर्द
दर्दनाक इतना भी होता है
कभी सोचा न था

होता है जो रिश्ता दिल के करीब
वही दे जाता है इतना दर्द
कहते हैं दिए जला कर रोशनी करो
पर दिए के नीचे के अंधेरे का दर्द
कितना होता है दिए को
ये सोचा न था.

बहुत प्यारा है जीवन

विकास और आंचल एकदूसरे से प्रेम करते थे. दोनों के घर वालों ने इस प्रेम को नाम देने का निश्चय किया और शादी के लिए मान गए. सगाई के कुछ दिन बाद आंचल के पिता ने लड़के को नशे का आदी पाया. उन की इस घोषणा से कोहराम मचा. आंचल ने भी तूफान खड़ा किया. खैर, यह बात सही निकली तो उस के पीछे दस तरह की और आशंकाएं सिर उठाने लगीं. सब से आखिर में किया जाने वाला काम पहले किया गया यानी सगाई तोड़ दी गई. विकास के लिए यह आन, मान और प्यार का मसला था. वह नशा मुक्ति केंद्र भी जा रहा था.

प्यार को खोने तथा सगाई तोड़ने के आघात को वह सह न सका. उस ने जहर खा लिया. जब उसे लगने लगा कि वह मर ही जाएगा तो वह घबरा गया और डाक्टर से कहने लगा कि उस के गम में उस के मम्मीपापा मर जाएंगे. वह मांबाप का इकलौता लड़का है. बड़ी कोशिशों के बाद पैदा हुआ है. बहरहाल, उसे बचाया न जा सका. अब कई वर्ष बीत गए हैं. उस के मातापिता जिंदा लाश बन कर जी रहे हैं. आज 48 साल की हो चुकी आंचल भी कहीं शादी करने को तैयार नहीं. वह विकास की मृत्यु का कारण अपने को ही मानती है. वह भावावेश को आत्महत्या का कारण मानती है.

कइयों का जीवन प्रभावित

इस प्रकार एक व्यक्ति का जीवन सिर्फ एक व्यक्ति का जीवन नहीं होता, उस से कई और जीवन भी प्रभावित होते हैं. मरने वाला मर जाता है पर उस के परिवार के सदस्य जीवित तो रहते हैं लेकिन उन की स्थिति किसी लाश से कम नहीं होती. वे हरपल घुटते हैं. उन का मनोबल टूट जाता है. वे अपने को लज्जित महसूस करते हैं व स्वयं को इस की मौत का जिम्मेदार मान कर खुद को अपराधभाव से ग्रसित कर लेते हैं.

छोटीछोटी बातें बड़ी अहम

दिल्ली के पालम गांव में रहने वाली शिखा की दोस्ती पड़ोस में रहने वाली लड़की रीमा से थी. एक दिन अचानक जब शिखा रीमा से मिलने उस के घर गई तो उसे पता चला कि रीमा ने आग लगा ली है. वह दूसरे ही दिन मर गई. छोटी सी बात पर उस ने आग लगा ली. फ्रिज खराब हो गया था, मां उसे ठीक कराने दे आई. 8 दिन तक मैकेनिक नहीं आया. बंद दुकान और भरी गरमी. रीमा ने मां को तुरंत नया फ्रिज खरीदने को कहा. मां ने कहा कि घर में पहले ही बहुत सामान रखा है, नए फ्रिज का क्या होगा. उन्होंने पिता की मृत्यु के बाद सिर्फ किराए की आय से चल रहे जीवन का हवाला भी दिया पर रीमा बिफर गई. वह बोली, ‘‘फ्रिज मुझ से बढ़ कर है? कम आय है? अब कम न पडे़गी…’’

मां ने इसे सामान्य समझा. इसी बीच रीमा ने अपनेआप को जलाना शुरू कर दिया. मां ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की पर नाकाम रहीं. आज वे अपनी बेटी की मौत के लिए खुद को जिम्मेदार मान कर पछतावा लिए जी रही हैं. तनाव व अवसाद के कारण वे कई बीमारियों की शिकार हो गई हैं. उन्हें बेटी की मृत्यु बेहद कचोटती है. वे अफसोस से कहती हैं कि बच्चा जरूरत से ज्यादा भावुक हो, क्रोधी हो, आक्रामक हो तो उसे मनोचिकित्सक के पास जरूर ले जाएं. मेरी बेटी इतनी अच्छी इंसान थी. दौड़दौड़ कर सब की मदद करती थी पर गुस्से में चीजें तोड़ डालती थी. हम ऊपरी हवा के अंधविश्वास में पड़ कर उसे मनोचिकित्सक के पास नहीं ले गए. आज हम उसे खो कर अपनी गलती की सजा भुगत रहे हैं.

प्रौपर पेरैंटिंग

मनोचिकित्सक डा. सिद्धार्थ चेलानी कहते हैं कि अब पेरैंटिंग इतनी आसान नहीं रही. कम बच्चे बढ़ता तनाव. ऐसे में सुखसुविधा, अच्छे स्कूल में पढ़ाईलिखाई, लैपटौप, मोबाइल दिला कर मांबाप सोचते हैं कि उन्होंने बच्चे के लिए बहुत कर लिया है. लेकिन बच्चों को सुखसुविधाओं के साथसाथ मातापिता का सहयोग, समय व नियमित संवाद भी जरूरी है. मातापिता उन की समस्याओं को अनसुना न करें. उन के आसपास की दुनिया को भी जानेंसमझें. कुछ भी असामान्य लगे तो मनोचिकित्सक से अवश्य संपर्क करें.

हर उम्र के लोग शामिल हैं

किसी समय में युवा या स्त्रियां आत्महत्या करने में आगे थे पर आज हर उम्र व समूह का व्यक्ति ऐसा करता दिखाई देता है. बढ़ता भौतिकवाद और बढ़ती अपेक्षाएं इस की जड़ हैं. ये अपेक्षाएं मांबाप की बच्चे से हों या पत्नी की पति  से या सास से बहू की या बहू से सास की या फिर बौस की अधीनस्थ कर्मचारी से. ऐसी स्थिति तनाव तथा दबाव बनाती है. व्यक्ति उस तनाव के वशीभूत हो जाता है और आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है. मनोचिकित्सक न्यूरोकैमिकल्स की कमी को भी कारण मानते हैं. हार्मोनल असंतुलन की स्थिति में डाक्टर से मिलें.

किसी को नहीं मिलता सबक

अकसर आत्महत्या के लिए कदम उठाने वालों के मन में लोगों, जिन से वे पीडि़त हैं, को सबक सिखाने की मानसिकता रहती है. महविश नामक महिला के भाइयों को बहन का छोटी जाति और पड़ोसी युवक से ब्याह करना नागवार गुजरा. उन्होंने बहन की छोटीछोटी बच्चियों के पैदा हो जाने पर भी उस के पति की हत्या कर दी. पुलिस ने कार्यवाही नहीं की. प्रशासन एवं उच्चाधिकारियों के कान पर जूं तक न रेंगी. उस के जेठ ने धरना दिया तब भी कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने अपने पर पैट्रोल डाल कर आग लगा ली. अब सिर्फ सासबहू रह गई हैं. इन्हें ही सब भुगतना पड़ रहा है. प्रशासन या पुलिस को क्या फर्क पड़ा.

सुधारने की अपेक्षा

कुमारी बीना कहती हैं कि उन की बहन ने आत्महत्या की. जीजाजी परेशान करते थे. बातोंबातों में कहती थी, मैं मर जाऊंगी तब सुधरेंगे, 3 बच्चों को पालना आसान नहीं, हम ने बात सुन कर उन्हें समझाया. खैर, जीजाजी आज भी वैसे के वैसे हैं. बच्चों की जिंदगी बिगड़ रही है. उन्होंने दूसरी शादी कर ली. लड़की वालों को सच पता चला पर उन्होंने हमारी ही बहन की कमी मानी. दूसरों का ध्यान दिलाने व कार्यवाही कराने के लिए उठाए जाने वाले ये कदम कभी कारगर नहीं हो सकते हैं. हमारा जीवन के दायरे से जुड़े लोगों के बारे में सोचना बहुत जरूरी है. जीवित रहे तो कार्यवाही की व कराई जा सकती है. मरने पर तो जो हो रहा है वह भी नहीं हो पाता.

अब मरने से डरती हूं

चेतना ने जहर खा कर जान देने की कोशिश की. समय पर मिले इलाज ने जान बचा ली पर उसे अब भी कभीकभी बेहोशी के दौरे पड़ते हैं. वह कहती है, ‘‘जहर खा तो लिया पर जैसे पूरा शरीर हिल गया, उबल गया…जीने की इच्छा जाग उठी. मैं ने डाक्टर के पैर पकड़ लिए, ‘डाक्टर साहब, जिंदगीभर आप के यहां काम कर के आप का कर्ज उतार दूंगी. आप बस, मुझे बचा लीजिए.’ ‘‘अब मुझे मरने का प्रयास बचकाना लगता है. मैं आत्मनिर्भर हुई. मैं ने बच्चों से अपनी गलती की माफी मांगी और उन से वचन लिया कि वे मेरी जैसी मूर्खता जीवन में कभी भी, किसी भी हालत में नहीं करेंगे. बल्कि अब मुझे डर लगता है कि भीड़ या ऐसी किसी जगह मुझे दौरे न आ जाएं. मैं किसी बीमारी से मर न जाऊं.’’

खूब हिफाजत करता हूं

संभव कोचिंग में सफल न होने के कारण रेल से कटने चला. उसे लगता था कि उस ने मांबाप का पैसा खूब बरबाद किया, फिर भी उन की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा. वह बताता है, ‘‘मैं रेल के आगे कूदा तो टांग कट गई और मैं जिंदा बच गया. पुलिस केस बना, कार्यवाही हुई. अब जिंदगी की तो छोड़ो, उस लकड़ी की टांग तक की हिफाजत करता हूं. बदनामी होने से शादी भी नहीं हुई. पहले से अधिक दुखी जीवन है, फिर भी मैं मजे में हूं. कोल्डड्रिंक व स्नैक्स की छोटी सी दुकान है. मैं बूढ़े मांबाप की उतनी देखरेख तथा दौड़भाग नहीं कर पाता, इस का अफसोस है. आज बीवीबच्चे होते तो जीवन और भी खूबसूरत होता. अब उस की कोशिश कर रहा हूं.’’

गलतियों से सबक लें

लता ने युवावस्था में प्यार किया और गर्भवती हो गई. प्रेमी ने साथ छोड़ दिया तो मरने की कोशिश की. मां को भनक लगी तो उन्होंने समझाया और उस का गर्भपात कराया. गलती से सबक ले कर लता ने अपना जीवन व्यवस्थित बनाया. वह कहती है, ‘‘शादी कर के 2 बच्चों के साथ खुश हूं. मैं ने दिल्ली विश्वविद्यालय से 3 महीने का काउंसलिंग का कोर्स किया. अब गरीब व भटके बच्चों की काउंसलिंग करती हूं. जीवन से बड़ी कोई चीज नहीं है.’’

जीवन है तो संघर्ष है

अकसर लोग संघर्ष व तनाव से घबरा कर उन्हें जड़ से खत्म करने की सोचते हैं. आत्महत्या कभी भी किसी भी समस्या का हल नहीं. जीवन की खूबसूरती ही दिनबदिन के संघर्ष से है. रात  न आए तो दिन का आना खुशगवार नहीं लगता. भूख और प्यास के बाद खानेपीने का आनंद ही कुछ और है.

फिलौसफी ही बदल गई

आज 16 हजार करोड़ रुपए के मालिक बन चुके एक व्यवसायी कहते हैं, ‘‘एक समय था जब मैं तौलिया लपेट कर पार्कों में अपने पहने हुए कपड़े धो कर सुखाता था. उस के 4 वर्ष बाद संघर्ष कम हुआ तो भी कूलरपंखा तक नहीं खरीद पाया. बिस्तर गीला कर के रात बिताता था. आज मैं जो कुछ हूं, उसी अभाव की बदौलत हूं. 2 बार आत्महत्या करने की सोची. अब सोचता हूं कि यदि आत्महत्या कर लेता तो जीवन के इस सुंदर रूप को न देख पाता.’’

जिजीविषा सब से खूबसूरत चीज

आत्महत्या की कोशिश करने वालों को समझाने वाले एक प्रोफैशनल मोटिवेटर कहते हैं, ‘‘मुझे बड़ेबड़े घर के लोग बुलाते हैं ताकि बच्चों को डिप्रैशन यानी अवसाद न हो. मैं उन्हें समझाता हूं कि जीव, जानवर इतने दुख के बावजूद नहीं मरते यानी आत्महत्या नहीं करते. क्या हम उन से भी गएगुजरे हैं? धरती पर एक इंच भी कच्ची जमीन हो तो वहां घास निकल आती है. यह है जीवन. जिजीविषा यानी जीने की इच्छा को सर्वोपरि महत्त्व दिया  जाए. शास्त्रों और आधुनिक ग्रंथों में भी आत्महत्या को निकृष्टतम कार्य माना गया है.’’

विवेकसम्मत जीवन

विवेकसम्मत जीवन गुजारना जरूरी है. केयरिंग, शेयरिंग, कृतज्ञता को महत्त्व दें. कोई दुख में हो तो उसे संबल दें. अवसाद से भरे लोगों का सहारा बन कर मनोचिकित्सक तक पहुंचाने में देरी न करें. क्षणभंगुर जीवन को लोग आत्महत्या द्वारा और विकृत बनाते हैं. जीवन का मजा संघर्षों से हारने में नहीं, बल्कि उन से पार पाने में है.

कठघरे में मुहूर्त

छत्तीसगढ़ के छोटे से जिले महासमुंद के नामी अधिवक्ता जयनारायण दुबे को शहर में हर कोई जानता है क्योंकि वे ज्योतिष के भी अच्छे जानकार हैं लेकिन यह उन का पेशा नहीं है. 28 जुलाई को जयनारायण  ने 1-2 नहीं बल्कि धर्म से जुड़े लोगों और धर्म को हांकने वाली 40 संस्थाओं को कानूनी नोटिस भेज एक ऐसे मुद्दे मुहूर्त पर सवालिया निशान लगा दिया जिसे ले कर आम लोग रोज लुटतेपिटते रहते हैं और आज तक यह नहीं समझ पाए कि मुहूर्त आखिर है क्या बला और इस की तुक और जरूरत क्या है?

जयनारायण दुबे का एतराज इस बात को ले कर था कि अगस्त के महीने में ही पड़े त्योहारों–हल षष्ठी और जन्माष्टमी के बाबत पंचांग अलगअलग तारीखें बता रहे थे यानी ये त्योहार 2 दिन मनाए जाने की व्यवस्था धर्माचार्यों और मठाधीशों ने कर रखी थी. तमाम त्योहारों, तिथियों और पर्वों के 2 दिन पड़ने पर अलगअलग मुहूर्त होने पर इन वकील साहब की दलील यह है कि इस से भक्तों में भ्रम फैलता है. जब ग्रहों की संख्या वही है, साल के दिन भी सभी के लिए उतने ही हैं तो पंचांगों की गणना में फर्क क्यों आ रहा है? अपनी बात में दम लाने के लिए जयनारायण बीते 3 वर्षों से जरूरी कागजात जुटा रहे थे. नोटिस देने से पहले उन्होंने वर्ष 1967 से ले कर 2014 तक के 10 प्रमुख पंचांगों का बारीकी से अध्ययन भी किया और साबित किया कि मुहूर्त में बड़ा गड़बड़झाला है.

ऐसा पहली बार हुआ कि कोई मुहूर्त को ले कर कानूनी रूप से जागृत हुआ और उसे कठघरे में खड़ा करने की हिम्मत भी दिखाई वरना मुहूर्त की गुलामी करते लोग कभी इस तरफ नहीं सोचते कि यह उन से पैसा झटकने भर की साजिश है. जयनारायण की इस दलील से हर कोई परिचित है कि हिंदुओं के अधिकांश त्योहार अब 2 दिन मनाए जाने लगे हैं ताकि लोग 2 दिन पैसा दें.

मुहूर्त : तुक क्या?

पंडेपुजारियों ने हर शुभ कार्य का पूजन शुभ मुहूर्त में ही किए जाने के इंतजाम कर रखे हैं वरना वे फल नहीं देते. हां, अशुभ कार्य लोग जब चाहें करने के लिए स्वतंत्र हैं.

शुभ और अशुभ का खौफ हमेशा से ही लोगों के सिर चढ़ कर बोलता रहा है जिस का सार यह है कि अगर शादी शुभ मुहूर्त में नहीं की गई तो दांपत्य टूट जाएगा, संतान नहीं होगी, किसी एक की मौत हो जाएगी या पतिपत्नी में कलह होती रहेगी. वे दुखी और तनाव में रहेंगे. हर टूटती शादी के बाबत यही कहा जाता है कि यह गलत मुहूर्त में हुई होगी. पतिपत्नी की जिद अहं और स्वभाव में भिन्नता की चर्चा कोई नहीं करता. नए घर में जा कर अगर सुखशांति से रहना है तो इस का भी मुहूर्त होता है, सोना या वाहन खरीदना है तो इस के भी मुहूर्त हैं. यात्रा के भी मुहूर्त होते हैं और व्यापारव्यवसाय शुरू करने के भी.

हमारा दैनिक जीवन किस तरह मुहूर्त के मकड़जाल में उलझा है, यह जान कर हैरत होती है कि शौच जाने का भी मुहूर्त (प्रथम) होता है और पुत्रप्राप्ति हेतु सहवास का भी विशेष मुहूर्त होता है. बिलाशक पिछड़ेपन और दयनीयता की इस से बेहतर मिसाल कोई और हो भी नहीं सकती. अदालतों में तलाक के और घरेलू विवादों के जो करोड़ों मुकदमे चल रहे हैं उन में कहीं इस मुहूर्त नाम के अजूबे का जिक्र नहीं होता. जाहिर है ऐसा सिर्फ इसलिए कि धर्म के दुकानदारों ने खुद को बचाने के लिए तलाक और घरेलू विवादों के लिए लोगों को कर्मों और किस्मत को कोसने का भी पाठ पढ़ा रखा है.

दिक्कत की बात यह नहीं है कि किसी भी पर्व या पूजन के 2-2 मुहूर्त क्यों हैं बल्कि अहम सवाल यह है कि मुहूर्त है ही क्यों.

सट्टे सा मुहूर्त

आम लोग नहीं जानते, न ही जानने की कोशिश करते और न बताया जाता कि मुहूर्त निकालता कौन है. दरअसल, मुहूर्त किसी सट्टे के नंबर की तरह है जो मुंबई और कल्याण से चल कर चंद सैकंडों में देश भर में फैल जाता है जिस में जीते हुए लोग खुश हो लेते हैं और हारे हुए अगली बार कौन सा नंबर लगाएं, इस सोचविचार में डूब जाते हैं. ग्रहनक्षत्रों का अपना विज्ञान है. धर्म और उस के तमाम क्रियाकलाप इन से कैसे संचालित हो सकते हैं. सट्टा प्रमुख रूप से 2 लोग खिलाते हैं. वैसे ही मुहूर्त भी प्रमुख रूप से 2 जगह से जारी होता है. पहला, पुरी पीठ से और दूसरा, ज्योतिष पीठ से, जिस के मुखिया इन दिनों शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद हैं जो इन दिनों साईंबाबा पूजन विवाद और हिंदू पुरुषों को संतान न होने पर दूसरे विवाह का अधिकार देने के बयान पर चर्चाओं में हैं.

पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती भी स्वरूपानंद की तरह करोड़ों के आसामी हैं. इन दोनों का ही सनातन धर्म पर दबदबा इस कहावत से लगाया जा सकता है कि सूर्य दिशाओं के अधीन नहीं होता बल्कि वह जहां से उगता है वही पूर्व दिशा कहलाने लगती है. ठीक इसी तरह, शंकराचार्य धर्म के अधीन नहीं हैं. ये जो कह देते हैं वही धर्म हो जाता है.

अरबों की बादशाहत के शहंशाह ये दोनों हर साल हिंदू नववर्ष पर सालभर के तीजत्योहारों, पर्वों और शुभ कार्यों के मुहूर्त ठीक सट्टे के नंबरों की तरह जारी करते हैं जो देखते ही देखते हर घर में पंचांग की शक्ल में पहुंच जाते हैं. दैनिक अखबार भी रोजाना पंचांग और चौघडि़या प्रकाशित कर इस अंधविश्वास को हवा देने का काम करते हैं. हर जिले के प्रमुख पंडित यानी धर्माधिकारी के पास शंकराचार्यों के मठों से छपे हुए पंचांग पहुंचते हैं. इन्हीं पंचांगों की वजह से वे अपनी दुकान विश्वसनीयता का हवाला दे कर बगैर किसी विघ्न के चलाते हैं. पर इस का यह मतलब नहीं कि पंचांग या अखबार हाथ में होने पर लोगों को अपने मन से मुहूर्त निकालने का अधिकार मिल जाता है. दरअसल, यह इतनी गहरी साजिश है कि लोगों को आखिरकार जाना तो पंडों के पास ही पड़ता है. केवल पूजा के मुहूर्त लोग अखबारों में देख कर या न्यूज चैनल्स पर देख, बगैर पंडे के परामर्श के कर सकते हैं.

हालत ठीक वैसी ही है कि बुखार और हलका दर्द होने पर पैरासिटामोल की गोली खा लो. आराम न मिले तो जेब में पैसे ले कर डाक्टर के पास भागो. मुहूर्त के मामले में पंडा एक विशेषज्ञ डाक्टर की तरह होता है. शादी का मुहूर्त निकलवाने पंडे के पास ही जाना पड़ता है जो वर व वधू की जन्मपत्रियों, राशियों और ग्रहनक्षत्रों की गणना कर बताता है कि कौन सा समय शुभ रहेगा. यह दीगर बात है कि वह शुभ मुहूर्त उस वक्त का निकालता है जब उसे किसी दूसरे यजमान के यहां नहीं जाना होता. इसी तरह गृहप्रवेश का मुहूर्त गृहस्वामी की राशि के आधार पर तय किया जाता है.

कड़की का नाम नहीं

पूजन या पर्व के 2 दिनों या एक से ज्यादा मुहूर्तों से फायदा पंडों को ही है इसलिए जयनारायण दुबे को एतराज इस बात पर जताना चाहिए था कि जब कभी भी पूजन पाठ किया जा सकता है और पर्व मनाए जा सकते हैं तो मुहूर्त की जरूरत क्या है. और इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि जब इन के बगैर भी काम चल सकता है तो इन की जरूरत ही क्या है.

दरअसल, जरूरत पंडों को है जिन की रोजीरोटी ही मुहूर्त जैसे अंधविश्वासों से चलती है. मुहूर्त बताने के लिए दक्षिणा ली जाती है और पूजापाठ करने के लिए भी. फिर क्यों इन मुफ्तखोरों की जमात यह चाहेगी कि मुहूर्त को ले कर कोई अदालत जाए. अब पंडेपुरोहित कम हो चले हैं और यजमान बढ़ रहे हैं. मुहूर्त निकलवाने के लिए अब सनातनी चौखटों पर पैसे वाले पिछड़े और दलित भी बहुतायत से जाने लगे हैं. लिहाजा 2 दिन त्योहारपर्व मनाने की स्वीकृति और बहुत से मुहूर्तों का होना धर्माचार्यों व मठाधीशों के खुराफाती दिमाग की ही उपज समझ आती है जो अकसर धार्मिक विवाद फैला कर अपने शोरूम, अपने से छोटों की दुकानें और उन से भी छोटों की गुमटियां चलाए रखने के इंतजाम करते रहते हैं.

अब तो इन लोगों, जो धर्म के निर्माता और पालक हैं, ने पैसा कमाने के लिए नएनए हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं. आमतौर पर धार्मिक मान्यता यह है कि पितृपक्ष के दिनों में खरीदारी नहीं करनी चाहिए, शुभकार्य भी इस दौरान वर्जित रहते हैं. अपनी ही थोपी इस मान्यता से पंडे 15 दिन बेरोजगार बैठे रहने को मजबूर होते हैं, इसलिए अब अखबारों और न्यूज चैनल्स के जरिए फतवा सा जारी कर देते हैं कि पितृपक्ष के दौरान ही फलां दिन इतने ग्रहनक्षत्रों का शुभ मुहूर्त बन रहा है जिस में सोने, चांदी और दीगर आइटमों की खरीदारी शुभ है.

इस बार तो पितृपक्ष में भी खरीदारी का मुहूर्त पंडों ने निकाल दिया. बीते 1 सितंबर को भोपाल के अखबारों में प्रमुखता से एक धर्माचार्य भंवरलाल शर्मा के हवाले से यह खबर छपी थी कि पितृपक्ष में इस बार खरीदारी शुभ है और वह समृद्धिकारक भी होगी. इस बाबत बाकायदा पितृपक्ष के दौरान पड़ने वाली तारीखों 11, 15, 16 और 19 सितंबर को शुभ बताया गया था. यह सलाह किस पंचांग या शंकराचार्य से ली गई थी, यह भंवरलाल शर्मा ने नहीं बताया, न ही यह कि किस धर्मग्रंथ में यह उल्लेख है. जाहिर है मकसद व्यापारियों को और खुद को फायदा पहुंचाना था.

यानी धर्म के इन ठेकेदारों की नजर में अशुभ सिर्फ एक ही काम है, वह है इन्हें दक्षिणा न देना और दक्षिणा लेने का कोई मौका ये चूकते नहीं. उलटे नएनए मौके पैदा करने लगे हैं. अब अकसर पुष्य नक्षत्र नाम का शुभ योग प्रकाशित, प्रसारित और प्रचारित किया जाता रहता है.

अक्ल से काम लें

इन योगों और मुहूर्तों से फायदा व्यापारियों को भी होता है और मीडिया को भी. लिहाजा यह तिकड़ी जम कर धर्म और मुहूर्त के नाम पर चांदी काट रही है. त्योहारों के दिनों में विज्ञापनों की बारिश मीडिया पर हो, यह हर्ज या एतराज की बात नहीं पर यह जरूर है कि कारोबार बढ़ाने के लिए वह मुहूर्त जैसे अंधविश्वासों को बढ़ावा देने की गलती करता है.

व्यापारी भी जानते हैं और एक हद तक मान भी लेते हैं कि मुहूर्त कुछ नहीं होता. असल मुहूर्त और धर्म पैसा होता है. इसे ग्राहकों की जेब से निकलवाने के लिए उन्हें पंडों का सहारा लेना पड़ रहा है तो बात हर्ज की उन्हें नहीं लगती. हजार दो हजार की दक्षिणा में अगर कोई पंडित पितृपक्ष में भी खरीदारी का मुहूर्त घोषित कर दे तो पूरे व्यापारी समुदाय को लाखों का फायदा होता है. इसी बात से एक मामूली सी बात यह भी साबित होती है कि मुहूर्त का कोई औचित्य वास्तव में है नहीं, यह पंडों की कारगुजारी भर है. अगर वाकई मुहूर्त में दम होता तो शुभ मुहूर्त में की गई शादियां टूटती नहीं, शुभ मुहूर्त में किए गए गृहप्रवेश में गृहकलह नहीं होती. लोगों को बीमारियां व रोजमर्राई परेशानियां नहीं होतीं.

आसानी से समझ आने वाली मुहूर्त की हकीकत बताती मिसाल आम चुनाव है जिन में सभी दलों के प्रत्याशी पंडित से शुभ मुहूर्त पूछ कर ही परचा दाखिल करने के लिए चुनाव अधिकारी के यहां जाते हैं, फिर भी जीतता एक ही है. यह तो पंडों की धूर्तता की इंतहा ही है कि इस बाबत पूछने पर वे बड़ी ढिठाई से जवाब यह देते हैं कि जीते प्रत्याशी के ग्रहनक्षत्र हारे हुए से ज्यादा प्रबल थे. अब पंडितजी से यह कोई नहीं पूछता कि जब प्रबल ग्रहनक्षत्र ही जिताते हैं तो मुहूर्त की जरूरत क्या थी? यह बात सीधे पहले चुनाव आयोग को क्यों नहीं बता दी जाती जिस से अरबों का चुनावी खर्च बचे.

आजादी पर अंकुश

ऐसे जवाब सीता वनवास और कृष्ण की असमय मौत सहित ढेरों प्रसंगों में वे देते हैं. धर्म का तानाबाना दरअसल बुना ही इस तरह गया है कि कोई इस की प्रासंगिकता पर उंगली उठाए तो उसे निरुत्तर कैसे किया जाए. इस पर भी बात न बने तो हरि या ऊपर वाले की इच्छा का ब्रह्मास्त्र चला कर बात समाप्त कर दी जाती है. मुहूर्त के चक्कर में नुकसान आम लोगों का होता है. शादीविवाह के मौसम में उस से जुड़ी हर चीज महंगी हो जाती है, त्योहारों पर घासफूस तक महंगे दामों में पूजा के लिए खरीदनी पड़ती है. और सब से नुकसानदेह बात एक जकड़न भरी मानसिकता में जिंदगीभर के लिए खुद और आने वाली पीढ़ी को भी फंसा देना है जो आजादी और अपनी मरजी से जीने की इजाजत नहीं देती.

ऐसे में जयनारायण दुबे की पहल स्वागत योग्य है. यह और भी प्रभावी साबित हो सकती है जब कोई यह नोटिस धर्म के दुकानदारों को दे कि मुहूर्त की प्रामाणिकता और जरूरत क्यों है. इस का दूसरा मतलब सीधा सा यह भी निकलता है कि मुहूर्त कुछ होता ही नहीं. जब भी अच्छे मन से बगैर किसी डर या आशंका के शुभ कार्य किया जाए वही असली मुहूर्त है. शुभ मुहूर्त बताने वाला कोई पंडा कार्यसिद्धि की लिखित गारंटी क्यों नहीं लेता, इस पर भी लोगों को विचार करना चाहिए.   

घर में करें मिलावट की जांच

यह वही दौर है जिस में सेहत के प्रति जागरूकता बढ़ रही है. लोग स्वास्थ्य नियमों का पालन कर रहे हैं, कसरत कर रहे हैं. साफसफाई व स्वच्छता पर भी ध्यान दे रहे हैं और इन से ताल्लुक रखते उत्पादों का पहले से कहीं ज्यादा इस्तेमाल भी कर रहे हैं लेकिन ये सावधानियां बेफिक्री नहीं, एक झूठी तसल्ली भर देती हैं. वजह, हर चीज में मिलावट है जिस से बच पाना आसान नहीं. मिलावटखोरी कितने शबाब पर है, इस की गवाही विभिन्न एजेंसियों के आंकड़े भी देते हैं और सुप्रीम कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी भी कि दूध में मिलावट करने वालों को उम्रकैद की सजा होनी चाहिए.

कानूनी खामियों व जानकारियों के अभाव में मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति के शिकार आम लोगों की स्थिति मिलावटखोरों के सामने मेमनों सरीखी है जिस में बड़ी दिक्कत यह है कि मिलावट का खेल अब खेतों से ही शुरू होने लगा है जो फुटकर दुकानों से बड़ीबड़ी फैक्टरियों और फूड प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों तक पसरा हुआ है. रोज लाखों लोग मिलावटी खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल के चलते छोटीबड़ी बीमारियों का शिकार हो कर डाक्टरों के पास भागते हैं. अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में भरती हो कर महंगा इलाज कराते हैं और अगर ठीक हो गए तो फिर मिलावटखोरी का शिकार होने दोबारा वहीं जाने की तैयारी में जुट जाते हैं.

मिलावट आमतौर पर दिखती नहीं, समझ तब आती है जब पेट में मरोड़े उठती हैं. बिलाशक मिलावट लाइलाज मर्ज है और कानून भी इस के सामने बेबस है. सरकारी विभागों, खासतौर से खाद्य विभाग से किसी तरह की उम्मीद रखना फुजूल की बात है जिस के मुलाजिम मिलावटखोरों के हमदम हैं और लोगों की सेहत व जिंदगी से खिलवाड़ करने की शर्त पर घूस खाते हैं. मिलावट कभी नंगी आंखों से नहीं दिखती, इस की जांच के लिए कुछ रसायनों और साधारण उपकरणों की जरूरत होती है. अगर इन का इस्तेमाल घर में ही किया जाए तो एक हद तक इन से बचा जा सकता है.

दूध और डेयरी प्रोडक्ट

दूध और इस के उत्पादों में कई तरह की मिलावटी चीजें मिलाई जाती हैं. इन में सब से ज्यादा मिलाई जाने वाली चीजें स्टार्च और अरारोट हैं. इन्हें मावा और पनीर में भी मिलाया जाता है. स्टार्च से दूध में गाढ़ापन आता है और उस की मात्रा भी बढ़ जाती है. स्टार्च की ज्यादा मात्रा से पेट संबंधी तरहतरह की बीमारियां होती हैं. पाचनतंत्र गड़बड़ा उठता है और उल्टी, दस्त होने लगते हैं. स्टार्च से दूध और उस के उत्पादों के पोषक तत्त्व भी नष्ट हो जाते हैं.

घर में मिलावट की जांच बेहद आसान है. 5-10 ग्राम दूध ले कर उसे परखनली में डालें और उस में 20 मिलीलिटर साफ पानी मिला कर इसे उबालें. ठंडा होेने पर 2 बूंद तरल आयोडीन उस में मिलाएं. अगर सैंपल नीले रंग में तबदील हो जाए तो समझ लें कि उस में स्टार्च की मिलावट है.

हरी सब्जियां

भोपाल के नवोदय अस्पताल के ओंकालौजिस्ट डा. श्याम अग्रवाल कहते हैं कि मिलावटी सब्जियों के लगातार इस्तेमाल से भी कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है. सब्जियों को ताजी और हरी दिखाने के लिए कैमिकल्स मिलाए जाते हैं. व्यापारी ही नहीं, अब तो अन्नदाता कहे जाने वाले किसान भी मिलावट के जानलेवा खेल के खिलाड़ी बन गए हैं जो जल्द और ज्यादा पैदावार के लिए अंधाधुंध तरीके से कीटनाशकों व उर्वरकों का ज्यादा प्रयोग करने लगे हैं. कच्ची सब्जियों में हार्मोंस के इंजैक्शन भी ये लगाते हैं. जाहिर है सब्जियां अब ज्यादा और जल्द पैसों के लिए अप्राकृतिक रूप से उगाई जा रही हैं.

मेलाकाइट ग्रीन स्वास्थ्य के लिए एक खतरनाक रसायन है जो एक और्गेनिक कंपाउंड है. इस का इस्तेमाल डाई करने के लिए किया जाता है लेकिन आजकल इस का इस्तेमाल खेतों और मंडियों के अलावा फुटकर सब्जी विक्रेता भी कर रहे हैं. इस के इस्तेमाल से सब्जियां हरी दिख कर चमकने लगती हैं, जिस से उपभोक्ता समझता है कि सब्जी ताजी है और वह ज्यादा दाम दे कर खरीद लेता है.

मेलाकाइट ग्रीन का लगातार पेट में जाना छोटीमोटी से ले कर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की वजह बनता है. यह बात तमाम शोधों से साबित भी हो चुकी है. हरी मटर, भाजियों, हरी मिर्च और कद्दूवर्गीय हरी सब्जियों को रंगने में इस का दुरुपयोग होता है. जितना खतरनाक यह रसायन है उस की जांच कहीं ज्यादा आसान है. सब्जी का नमूना ले कर उसे ब्लौटिंग पेपर पर रखें. रखने से पहले ब्लौटिंग पेपर को पानी से हलका गीला कर लें. 2 मिनट में ही नतीजा सामने आ जाता है. अगर ब्लौटिंग पेपर पर धब्बे आ जाएं तो समझ लें कि उस में मेलाकाइट ग्रीन की मिलावट है.

दालें

सब्जियों और फलों में मेलाकाइट ग्रीन जैसे जानलेवा कैमिकल की मिलावट से दहशत में आए जो लोग दालों के इस्तेमाल को सुरक्षित समझते हैं वे दरअसल गलतफहमी में हैं. मिलावटखोरों द्वारा घरों में सब से ज्यादा खाई जाने वाली तुअर (अरहर) के अलावा चने व मसूर की दालों में दूसरी डाई मेटानिल यलो का इस्तेमाल किया जाता है जिस से दालें चमकती दिखती हैं. खेसरी दाल की मिलावट भी आम है जो मूलरूप से खरपतवार है और बेहद नुकसानदेह है. कैंसर विशेषज्ञ मानते हैं कि मेटानिल यलो में कैंसर पैदा करने वाले तत्त्व पाए जाते हैं. पेट संबंधी बीमारियां तो इस के इस्तेमाल से ही शुरू हो जाती हैं जिन में बदहजमी और संक्रमण प्रमुख हैं.

मेटानिल यलो की मिलावट की जांच के लिए एक चम्मच सैंपल ले कर उसे 20 मिलीलिटर कुनकुने पानी में अच्छी तरह हिला कर मिलाएं और इस में 2-4 बूंदें हाइड्रोक्लारिक एसिड की मिलाएं. पानी का रंग यदि बैगनी या गुलाबी हो जाए तो समझ लें कि सैंपल में मेटानिल यलो की मिलावट की गई है.

सरसों या राई

देश के उत्तरी इलाके में खाने में सरसों व उस से बने तेल का ज्यादा इस्तेमाल होता है. राई सरसों की ही एक किस्म है. इन के दाने बेहद चिकने व छोटे होते हैं, सरसों का तेल अगर शुद्ध हो तो सीधा आंखों में इतना चुभता है कि उस के तीखेपन से आंख में पानी आ जाता है पर ऐसा आजकल नहीं होता. वजह, मिलावट ही है. तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए सरसों में इन से मिलतेजुलते दाने वाले पौधे भटकटैया यानी आर्जीमोन की मिलावट की जाती है. यह एकदम जहरीला तो नहीं पर लगातार इस्तेमाल किया जाए तो किसी जहर से कम असर नहीं डालता. आर्जीमोन की मिलावट से बना सरसों का तेल एपिडेमिक ड्रौप्सी बीमारी की वजह होता है. ग्लूकोमा नाम की खतरनाक बीमारी का अंदेशा भी इस से रहता है.

सरसों या राई मसाले के रूप में खाई जाए या तेल के रूप में, आर्जीमोन की मिलावट पहचानने के लिए इस के दानों को तोड़ कर देखा जाना ही बेहतर होता है. राई या सरसों के दानों की पहचान इन की चिकनाहट से होती है और तोड़ने पर ये अंदर से पीले रंग के होते हैं. इसलिए खरीदने के पहले कुछ दानों को हथेली में ले कर उपरोक्त तरीके से पहचान करना बेहतर होता है.

आइसक्रीम

बच्चे तो बच्चे, बड़े भी आइसक्रीम चाव से खाते हैं पर अब आइसक्रीम भी मिलावट से अछूती नहीं रही है. इन्हें स्थानीय निर्माता भी बनाते और बेचते हैं और कई नामी कंपनियां भी अलगअलग फ्लेवर में अपने ब्रांड नाम से बेचती हैं. ठंडी और जायकेदार आइसक्रीम में मात्रा बढ़ाने के लिए डिटरजैंट पाउडर की मिलावट की जाती है. इस से पेट की बीमारियां होती हैं और लंबे वक्त तक सेवन से लिवर भी खराब होता है. आइसक्रीम में डिटरजैंट की मिलावट की जांच या पहचान करना बेहद आसान है. इस पर कुछ बूंदें नीबू के रस की गिराएं. अगर बुलबुले उठें या झाग बनें तो समझ लें कि आइसक्रीम में डिटरजैंट पाउडर की मिलावट है.

और भी हैं मिलावटें

इन प्रमुख खाद्य पदार्थों के अलावा रोजाना इस्तेमाल में आने वाले दूसरे आइटमों में भी तबीयत से मिलावट की जाती है. शक्कर इन में प्रमुख है जिस का इस्तेमाल रोज होता है. शक्कर की मात्रा बढ़ाने के लिए छोटेबडे़ दोनों पैमानों पर इस में चाक पाउडर मिलाया जाता है जो पेट के लिए काफी नुकसानदेह साबित होता है. शक होने पर इस की जांच के लिए 10-25 ग्राम शक्कर ले कर एक गिलास में घोलें. थोड़ी देर बाद चाक पाउडर नीचे बैठा साफ दिखाई देता है.

कालीमिर्च में पपीते के बीजों को मिलाना बेहद आम और प्रचलित है. यह मिलावट भी वजन बढ़ाने के लिए की जाती है. पपीते का बीज लिवर के लिए नुकसानदेह होता है. जांच के लिए सैंपल को एल्कोहल में डालें. मिलावट होगी तो पपीते का बीज एल्कोहल में तैरता रहेगा और कालीमिर्च नीचे बैठ जाएगी. mचावल और मैदा जैसे खाद्य पदार्थ भी बड़े पैमाने पर मिलावट की गिरफ्त में हैं. इन में खतरनाक बोरिक एसिड की मिलावट की जाती है जो कई बीमारियों की वजह बनता है. जांच के लिए सैंपल को पानी में भिगोएं और उस पर हाइड्रोक्लोरिक एसिड मिलाएं. अब इस में टरमरिक पेपर स्ट्रिप डालें. अगर यह पेपर लाल हो जाए तो तसल्ली कर लें कि चावल या मैदे में बोरिक एसिड मिलाया गया है.

कौफी में चिकोरी पाउडर की मिलावट होती है. इस के इस्तेमाल से डायरिया और जोड़ों का दर्द होना तय होता है. नामी कंपनियों की कौफी में मिलावट की शिकायतें कम ही आती हैं पर छोटे पैमाने की मिलावट अकसर पकड़ी जाती है. इस की जांच घर पर आसानी से की जा सकती है. थोड़ा सा पाउडर पानी में डालने से चिकोरी पाउडर नीचे बैठ जाता है और कौफी पाउडर पानी में ऊपर तैरता रहता है.

समस्याएं और समाधान

घर में मिलावट की जांच के सामान और रसायन किसी भी साइंस सैंटर यानी प्रयोगशाला का सामान बेचने वाली दुकानों पर मिल जाते हैं जो हर छोटेबड़े शहरों में हैं. आमतौर पर इन दुकानों की जानकारी आम लोगों को नहीं होती इसलिए किसी भी हाईस्कूल या कालेज की प्रयोगशाला से इसे हासिल किया जा सकता है. जांच के ये सामान बहुत ज्यादा महंगे भी नहीं होते. घर में मिलावट की जांच से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती है. इस से लोग मिलावटी सामान के इस्तेमाल और उन से होने वाले नुकसानों से खुद को बचा सकते हैं.

शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है जिस पर कोई सरकार खरी नहीं उतरती. मिलावट की जांच और कार्यवाही करने वाले खाद्य और आबकारी महकमे घूसखोरी में गले तक डूबे हैं. खाद्य सुरक्षा अधिनियम में एक खामी यह भी है कि उस में मिलावटियों को सजा का उल्लेख रस्म अदा करने के रूप में ही है. बेहतर तो यह होगा कि शुद्ध और मिलावट रहित खाद्य पदार्थों को मौलिक अधिकारों की श्रेणी में शामिल किया जाए.

पाठकों की समस्याएं

मैं  40 वर्षीय सरकारी सेवा में कार्यरत विवाहित पुरुष हूं और 2 पुत्र (आयु 15 व 18 वर्ष) एवं 16 वर्षीय बेटी का पिता हूं. पत्नी को ले कर मैं बेहद परेशान हूं. उस के संबंध पड़ोस में रह रहे कम उम्र के लड़के से हो गए हैं. काफी समझाया पर वह नहीं मानती. हमारी बहुत कहासुनी हुई पर सब बेकार गया. मार्गदर्शन कीजिए, क्या करूं?

क्या आप ने उस लड़के से बात की है? उस को तो डांटिए ही, साथ ही उस के मांबाप से भी इस बारे में बात कीजिए. इस केस को सुलझाने में वे महत्त्वपूर्ण कड़ी होंगे. हो सकता है उन्हें इस बात का पता न हो. अब तो आप के बच्चे भी बड़े हो गए हैं, वे भी सब जानते होंगे. वे अपनी भटकी मां को समझा भी सकते हैं. आप पत्नी से सख्ती से पेश आएं और यहां तक कह दें कि आप उस से तलाक ले लेंगे. ऐसा बोलने से वह सीधे रास्ते पर आ जाएगी.

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मैं 32 वर्षीय विवाहिता, 2 बच्चों की मां हूं. 2 साल से अपने मातापिता के साथ बेंगलुरु में रह रही हूं. ससुराल में संयुक्त परिवार है, वहां पति की ज्यादतियों से तंग आ कर मायके आई. पति अपनी सारी कमाई अपने घरवालों पर उड़ा देते हैं. मुझ से कहते हैं, ‘दो वक्त रोटी तुम्हें मिल जाती है, बस, वही बहुत है.’ बीमार पड़ने पर दवा नहीं दिलाते, न डाक्टर को दिखाते हैं. मातापिता जो पैसे भेजते थे वह भी खुद ही रख लेते थे. मेरा बेटा भी मायके में ही हुआ. मैं तलाक लेना चाहती हूं. आप मुझे बेंगलुरु की महिला हैल्पलाइन का नंबर व पता बताने की कृपा करें.

आप 2 साल से पति से अलग हैं और परिस्थितियों को देखते हुए आप को लगता है कि अब आप दोनों का साथ रहना असंभव है इसलिए आप ने पति से अलग रहने का निर्णय ले लिया है. जहां तक बेंगलुरु की महिला हैल्प लाइन का सवाल है आप बेंगलुरु सिटी पुलिस की हैल्प लाइन वनिता सहाय वानी (वीएसवी) (1091) पर संपर्क कर के विस्तार से इस बारे में राय ले सकती हैं. इस के अलावा आप चाहें तो अपने किसी निजी ऐडवोकेट से भी सलाह ले सकती हैं.

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मैं 23 वर्षीय अविवाहिता हूं. हम 7 भाईबहन हैं, 4 बहनें व 3 भाई और मातापिता. 3 बहनों की शादी हो चुकी है. हम सब ठीक से रह रहे थे. इधर बड़े भाई की शादी हुई, भाभी बेहद कर्कशा और झगड़ालू किस्म की हैं. हर समय क्लेश करती हैं. इधर, मुझ में भी सहनशक्ति नहीं है. हाल ही में मैं ने आत्महत्या की कोशिश की पर बचा ली गई. अब बड़े भाई और भाभी अलग घर ले कर रह रहे हैं. घर में बचे 2 भाई और मैं. छोटा भाई हर बात में मीनमेख निकालता है, हर बात का दोष मुझ पर मढ़ता है. मंझला  भाई मेरी तरफदारी करता है. उसी का सहारा है वरना मैं तो फिर आत्महत्या की सोच रही थी. मैं बीए पास हूं, नौकरी कैसे मिलेगी. जिंदगी नीरस व दिशाहीन लगती है. शादी के भी कोई आसार नजर नहीं आते क्योंकि आजकल शादी के लिए लड़के वालों की मांगें बहुत अधिक होती हैं. हाल यह है घर वालों ने मुझ से बात करना बंद कर दिया है. मैं स्वयं को बेहद बेसहारा महसूस कर रही हूं. कोई राह सुझाएं?

पहले तो यह समझ लीजिए कि कभी भी आत्महत्या जैसा विचार अपने मन में नहीं लाना है. दूसरी, जिंदगी में अगर कोई परेशानी है तो उस से लडि़ए, भागती क्यों हैं, क्यों पलायनवादी प्रवृत्ति को अपना रही हैं. यह समझ लीजिए कि जहां चार बरतन होंगे, खटकेंगे ही. इसी तरह जहां चार लोग साथ रहते हैं वहां खटपट होनी मामूली बात है. लगभग हर घर की यही कहानी है. इतने बड़े परिवार में झगड़ालू सदस्य भी होंगे तो शांतिप्रिय भी. जिंदगी के अच्छे पहलू को भी तो देखिए. मंझले भाई को ही लीजिए, वह आप की तरफ से बोलता है. अपने अंदर भी झांक कर देखिए. आप ने बताया कि आप को भी बहुत गुस्सा आता है, हो सकता है इस बात से भी घर के लोग नाराज हों, तभी बात नहीं करते. मुझे लगता है आप खाली रहती हैं और 24 घंटे ऊलजलूल ही सोचती होंगी, बात वहीं से बढ़ जाती है. सब से पहले तो आप कहीं नौकरी करने की कोशिश कीजिए. आप स्नातक हैं, नौकरी मिल सकती है, साथ ही, कोई कोर्स भी जौइन कर लें. इस से एक तो क्वालिफिकेशन बढ़ेगी, दूसरे टाइम भी अच्छा पास होगा. आप की कुछ सहेलियां भी होंगी, उन से भी मिलेंजुलें व बहनों के साथ भी प्रोग्राम बनाती रहिए. साथ ही, अपने गुस्से को कंट्रोल करना सीखें. कोशिश कीजिए जिंदगी खुशनुमा हो जाएगी.

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मैं 30 वर्षीय विवाहिता, 7 वर्षीय बेटे की मां हूं. कुछ दिन से बेटे के व्यवहार में अजीब सी बात हो रही है. वह हर चीज को बारबार छूता है, अपने हाथों को एक ही दिशा में बारबार चलाता है. मैं ने ऐसा कई लोगों में देखा है. क्या यह कोई बीमारी है? कृपया जानकारी दें.

आप के बेटे का इस प्रकार का व्यवहार किसी मनोवैज्ञानिक कारण से भी हो सकता है. यह वैसे कोई बीमारी नहीं है. कई बार घर का वातावरण ठीक न होने से बच्चे के दिमाग पर असर पड़ता है और वह कुछ अजीबोगरीब हरकतें करने लगता है, या यह भी हो सकता है कि वह स्वयं को उपेक्षित समझ रहा हो, तब भी ऐसा हो सकता है. आप किसी अच्छे बाल मनोवैज्ञानिक को दिखा दें.

फिल्मी दुनिया की इज्जतदार दूसरी औरत

हमारी फिल्म इंडस्ट्री के रीतिरिवाज और मान्यताएं अलहदा हैं. वहां दूसरी पत्नी या फिर नायकों के जीवन में आई दूसरी औरत को ही सम्मान मिलता है. पहली पत्नी गुमनामी के अंधेरे में खो जाती है या फिर किसी तरह संघर्षों के सहारे अपना जीवन गुजारती है. फिल्मों से जुड़ी मशहूर शख्सीयतें चाहे वे निर्माता हो, कलाकार हो या फिर संगीतकार, अपनी पहली पत्नी को न केवल तलाक दे देते हैं बल्कि पहली पत्नी के साथ उसी शहर में दूसरा घर बसा लेते हैं. पहली पत्नी का घर तो होता है लेकिन उस में उस का पति नहीं होता. उसे खाली और एकाकीपन का दंश जीवनभर झेलना पड़ता है.

कुछ दिन पहले एक मशहूर फिल्म अभिनेता ने अपनी पत्नी से कहा था कि मेरी जान बख्शो क्योंकि मुझे किसी और से प्यार हो गया है. तुम धनदौलत, घरबार सब ले लो लेकिन मुझे आजाद करो. यह उस मानसिकता का परिचय है जिस में एक पुरुष शादी के संबंधों को बंधन मानता है, इसलिए आजादी की आकांक्षा प्रकट करता है.

वैसे भारतीय पौराणिक ग्रंथों में बहुपत्नी प्रथा के उदाहरण भरे पड़े हैं. महाभारत से ले कर कई अन्य धर्मग्रंथों में न केवल दूसरी शादी का उल्लेख मिलता है बल्कि विवाहेतर संबंधों का भी विस्तार से वर्णन मिलता है. लेकिन हमारे समाज में दूसरी पत्नी या सहजीवी को इज्जत की नजरों से नहीं देखा जाता था और उस के लिए ‘रखैल’ से ले कर ‘दूसरी औरत’ जैसी संज्ञा का प्रयोग होता रहा है. कहना न होगा कि भारतीय समाज में दूसरी पत्नी को वह दरजा प्राप्त नहीं हो पाता जो पहली पत्नी को मिलता था. यहां फिल्मी दुनिया अपवाद है जहां दूसरी औरत अपनी चमकदमक से पहली को अंधेरे में धकेल देती है.

दूसरी महिला का आकर्षण

बौलीवुड में 2 तरह के अभिनेता हुए हैं. एक तो मुंबई में ही पलेबढ़े, उन का सामाजिक परिवेश फिल्मों से ही जुड़ा रहा. अभिनेताओं का एक दूसरा तबका देश के छोटे शहरों से आया और संघर्ष के बाद सफलता के शीर्ष पर जा पहुंचा. छोटे शहरों से जो अभिनेता मुंबई आए उन में से तकरीबन सभी शादीशुदा थे. यहां आ कर उन्हें महिलाओं का खुलापन और बिंदास स्वभाव लगातार आकर्षित करने लगा. और इन छोटे शहरों से बौलीवुड में आए ज्यादातर अभिनेताओं ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ कर दूसरी महिला का दामन थाम लिया. कइयों ने तो उस रिश्ते को कानूनी जामा पहनाया और कइयों ने रिश्तों को बगैर कोई नाम दिए लंबे समय तक निभाया. इस के पीछे मनोवैज्ञानिक से ले कर सामाजिक व निजी वजहें भी रही हैं.

जब धर्मेंद्र फिल्म इंडस्ट्री में आए तो वे शादीशुदा थे लेकिन फिल्मी दुनिया में उन्हें उस वक्त की सुपरस्टार मीना कुमारी से इश्क हो गया. यह इश्क इतना परवान चढ़ा कि धर्मेंद्र का ज्यादातर वक्त मीना कुमारी के घर ‘जानकी कुटीर’ में ही बीतने लगा. कहा तो यहां तक जाता है कि जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो एक बार धर्मेंद्र की पत्नी अपने दोनों बेटों और तमाम रिश्तेदारों की फौज के साथ जानकी कुटीर पहुंच गई. उस के बाद वहां जम कर झगड़ा और हंगामा हुआ. उस अप्रिय और सार्वजनिक फजीहत के बाद से ही धर्मेंद्र और मीना कुमारी ने परस्पर दूरी बना ली. मीना कुमारी से अलग होने के बाद भी धर्मेंद्र आकर्षक महिलाओं से खुद को दूर नहीं रख पा रहे थे.

धर्मेंद्र लगातार सुकून की तलाश में थे. पहली पत्नी के रहते उन्होंने उस वक्त की ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी के साथ रोमांस की पींगें बढ़ानी शुरू कर दीं. दोनों की जोड़ी रुपहले परदे पर धमाल भी मचाने लगी थी. दोनों के बीच प्यार इतना बढ़ गया कि धर्मेंद्र ने कानून को ताक पर रख कर पहली पत्नी को बगैर तलाक दिए चुपके से जा कर हेमा मालिनी से दूसरी शादी रचा ली. दूसरी पत्नी होते हुए भी हेमा मालिनी को धर्मेंद्र ने पहली पत्नी से ज्यादा इज्जत बख्शी. 2 बच्चे भी हुए.

बौलीवुड के जानकारों का कहना है कि धर्मेंद्र के बड़े बेटे सनी देओल ने भी घर में पत्नी के होते हुए मशहूर अदाकारा डिंपल कपाडि़या के साथ संबंध बनाए और बगैर शादी के उन्होंने डिंपल को पत्नी का दरजा दिया. प्यार के शिकार तो दिलीप कुमार भी हुए थे और उन का सायरा बानो से तलाक होतेहोते बचा था. 1982 में यह चर्चा आम थी कि दिलीप कुमार एक पाकिस्तानी महिला आसमा में इतने मसरूफ हैं कि उन्होंने सायरा बानो को छोड़ उस के साथ घर बसाने का फैसला कर लिया. किसी तरह से सायरा ने उस होनी को टालने में सफलता हासिल की.

पहली पत्नी की हार

यही हाल फिल्म अभिनेता बनने की चाहत में मुंबई पहुंचे सलीम खान का भी रहा. सलीम ने एक इंटरव्यू में बताया कि सलमा से उन की मुलाकात 1959 में हुई थी और 5 साल तक दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ता रहा और 1964 में दोनों ने शादी कर ली. सलीम खान सलमा से मिलने से पहले हेलेन से मिल चुके थे और उन के दिल में हेलेन को ले कर प्यार की चिंगारी दबी रह गई थी. दिल में दबी चिंगारी जब तब प्यार का शोला बन कर भड़कती रहती थी. आखिरकार सलमा से शादी के 16 साल बाद 1980 में सलीम ने हेलेन से दूसरी शादी रचाई. यहां कहानी कुछ अलहदा है. सलीम खान के बेटों ने हेलेन को भी मां के बराबर इज्जत बख्शी. सलमा ने भी शुरुआती दौर में विरोध किया लेकिन बढ़ते वक्त और ढलती उम्र के साथ वे भी हेलेन को बहन मानने लगीं.

अस्सी के दशक की सुपरस्टार श्रीदेवी की कहानी एकदम फिल्मी है लेकिन यहां भी पहली पत्नी को ही हार मिलती है. श्रीदेवी बोनी कपूर के गैस्ट रूम में रहती थीं और धीरेधीरे दोनों ने मोहब्बत का ऐसा अफसाना लिखा कि वे गैस्टरूम से कब उन के बैडरूम तक पहुंच गई, यह बात बोनी की पहली पत्नी मोना कपूर को भी पता नहीं चल सकी. मोना कपूर ने इस शादी के लिए अपने जीते जी मंजूरी नहीं दी और न ही उस ने बोनी को तलाक दिया. बगैर पहली पत्नी को तलाक दिए बोनी ने श्रीदेवी से शादी की और दूसरे नीड़ का निर्माण कर लिया.

आमिर खान की पहली पत्नी रीना दत्ता ने इस से उलट व्यवहार किया. जब आमिर खान ने तय किया कि वे ‘लगान’ फिल्म की अपनी सहायक निर्देशक किरण राव से शादी करेंगे तो रीना दत्ता ने फौरन उन को तलाक दे कर आजाद कर दिया. उन के नजदीकियों का कहना है कि रीना को जब आमिर और किरण के रिश्ते का पता चला तो उन्होंने भी इस रिश्ते को छोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया.

गुमनामी के अंधेरे

महिला अधिकारों की बात करने वाली शबाना आजमी भी शादीशुदा जावेद अख्तर के इश्क में इस तरह से मसरूफ हुईं कि दोनों ने शादी रचा ली. लेकिन जब शबाना ने लेखकगीतकार जावेद अख्तर से शादी करने का ऐलान किया था तो उस की खूब लानतमलामत हुई थी. शबाना ने उस वक्त 2 बच्चों, फरहान और जोया अख्तर के पिता से शादी की थी. अपनी स्त्रीवादी छवि के विपरीत उन के इस कदम से हनी ईरानी का घर टूटा था. लेकिन यहां भी शबाना आलोचना का शिकार बनने के बावजूद आज एक सफल पत्नी की तरह समाज में प्रतिष्ठा हासिल कर चुकी हैं. लोग यह भूल गए हैं कि वे जावेद अख्तर की दूसरी औरत हैं. हनी ईरानी की तो लोगों को याद भी नहीं है. कुछ ऐसा ही हुआ था नादिरा बब्बर के साथ. जब स्त्रीवादी स्मिता पाटिल ने उन के पति के साथ विवाह कर लिया था. हालांकि स्मिता पाटिल की मौत के बाद राज बब्बर वापस नादिरा के पास लौट आए थे.

इस कड़ी में ताजा नाम जुड़ा है सैफ अली खान का, जिन्होंने अपनी पत्नी अमृता सिंह को छोड़ कर करीना कपूर से ब्याह रचाया. दोनों की उम्र में लंबा फासला है. करीना को बेगम का दरजा मिल चुका है और पहली पत्नी अमृता सिंह गुमनामी के अंधेरे में खो गई.

पहली पत्नी का स्याह पक्ष

ऐसा नहीं है कि यह सबकुछ सिर्फ बौलीवुड में ही हो रहा है. दक्षिण भारत के सफलतम अभिनेताओं में से एक कमल हासन ने 1978 में मशहूर डांसर वाणी गणपति से शादी की थी. वाणी किसी वजह से लंबे समय के लिए अमेरिका गईं तो कमल हासन ने सारिका को सहजीवी बना लिया. इस सहजीविता के दौरान सारिका ने 1 बच्ची को जन्म दिया. बच्ची के जन्म के बाद कमल हासन पर सामाजिक दबाव इतना बढ़ा कि उन को वाणी को तलाक दे कर सारिका से शादी करनी पड़ी. इस तरह की अनगिनत प्रेम कहानियां फिल्मी दुनिया में हैं. लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित है कि फिल्मी दुनिया का जो समाज है उस में पहली पत्नी के लिए न तो किसी के दिल में दर्द है और न ही उस को ले कर संवेदना. कहना न होगा कि यह चमकदार बौलीवुड का एक स्याह पक्ष है लेकिन है तो हकीकत ही और इस हकीकत के साथ ही जी रही हैं बौलीवुड की पहली पत्नियां.

भारत भूमि युगे युगे

लगातार नौवीं बार

अक्तूबर के पहले हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा, फिर उन का झाड़ू पुराण और उस के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा के विधानसभा चुनावों में उन की गर्जना के बीच मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए. यह खबर बौक्स आइटम बन कर रह गई. क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय अधिवेशन बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं जिन का दायरा भले ही एक प्रदेश हो लेकिन बातें अंतरिक्ष तक की होती हैं. बहरहाल, मुलायम आंखें मिचमिचाए चेहरे पर ओज व तेज लिए 9वीं बार सपा के  राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए तो हमेशा की तरह कोई विरोध नहीं हुआ और किसी चिडि़या ने चूं तक नहीं की. इस लोकतांत्रिक खूबी पर कौन कुरबान न जाए जिस में एक पंक्ति का प्रस्ताव कोई अदना या दूसरी पंक्ति का नेता पढ़ता है और उस का कोई भाई अनुमोदन कर फख्र महसूस करता है और आखिर में अधिवेशन रात्रि भोज में सिमट कर रह जाता है.

ऐसी दीवानगी

दक्षिण भारत के लोग बड़े जज्बाती होते हैं, बातबात पर खुदकुशी करने पर उतारू हो आते हैं. तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता को पैसों की हेराफेरी के इल्जाम में अदालत ने जेल की सजा क्या सुनाई लोगों ने खुदकुशी करना शुरू कर दिया.

इस दीवानगी से लोगों का ध्यान आरोप से हट कर इस बेवकूफी पर आ कर टिक गया कि यह तो हद हो गई. और इसे लोकप्रियता एक दफा मान भी लिया जाए पर बेगुनाही का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए. लोगों को इस तरह किसी नेता के समर्थन में आत्महत्या नहीं करनी चाहिए. एक फर्क दिशाओं का भी है. उत्तर भारत की तरफ के लोग बड़ेबड़े घोटालेबाजों के जेल जाने पर जश्न मनाते हैं कि देखो, अपना नेता वाकई सच्चा नेता निकला, चलो इसी खुशी में किसी चौराहे पर मिठाई बांटते हैं. दक्षिण वालों को इन से सीखना चाहिए कि भावुकता और कैसे व्यक्त की जा सकती है.

राष्ट्रीय दामाद

अभी भी देहातों में एक घर का दामाद पूरे गांव का दामाद होता है. उस की सभी इज्जत करते हैं महज इसलिए कि वह गांव की बेटी को खुश रखे. सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा की परेशानी यह है कि अब उन के दामादपने पर सरेआम कीचड़ खासतौर से चुनाव के दिनों में उछाला जाता है और पब्लिक तालियां पीट कर सार्वजनिक अपमान में योगदान देती है.

जाने क्यों इसे संस्कृति का पतन कोई नहीं कहता, थोड़ीबहुत जमीन वह भी कथित रूप से कौडि़यों के दाम में हथिया लेना इतना बड़ा गुनाह भी नहीं है कि उसे बारबार चुनावी मुद्दा बनाया जाए लेकिन नरेंद्र मोदी ने चुनाव में इसे तुरुप के पत्ते की तरह खेला तो बचेखुचे कांग्रेसी सिपहसालारों के उतरे चेहरे जता गए कि दामादपुराण के समापन तक कांग्रेस का कुछ नहीं होने वाला.

झाड़ू का शौक

पेशेवर सफाई कर्मचारी, जो पुराने जमाने में जातिगत संबोधनों से ही पुकारा जाता था, आज भी रोज सुबह कमर चटकाने के बाद झाड़ू हाथ में ले कर अपने पुश्तैनी काम में जुट जाता है. झाड़ू लगाना उस के लिए रोजीरोटी की बात होती है, इसलिए सफाई की क्वालिटी पर सभी नाकभौं सिकोड़ते रहते हैं.

दूसरा गांधी बनने का ख्वाब देख रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चरखे के बजाय झाड़ू उठाई तो देखते ही देखते यह शौक बीमारी में बदल गया. भारतरत्न सचिन तेंदुलकर, तमाम नामी फिल्मी कलाकारों और अनिल अंबानी जैसे उद्योगपतियों ने भी झाड़ू लगाई. ऐसे में कहा जा सकता है कि झाड़ू लगाना योग की तरह एक अच्छा व्यायाम है. इस से बुढ़ापे में कमर संबंधी बीमारियां कम होती हैं, घुटनेजोड़ों के दर्द में राहत मिलती है. इसलिए उठाओ झाड़ू और चल पड़ो अपने शहर के किसी चर्चगेट की तरफ. इस के बाद तो यह काम फिर एक वर्ग विशेष के लोगों को ही करना है.

बंगलादेशी शरणार्थी राजनीतिबाजों का वोटबैंक

नई सरकार बनने के बाद से पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों, मुंबई और दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में अवैध रूप से बस चुके बंगलादेशियों का मुद्दा गरमा रहा है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बंगलादेशियों का मुद्दा सामाजिक के बजाय कहीं अधिक राजनीतिक है. इस के पीछे वोटबैंक की राजनीति काम करती है. प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनाव प्रचार के दौरान पहले हैदराबाद, फिर पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर और कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में नरेंद्र मोदी ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला दे कर इस मसले पर अपनी राय जाहिर करते हुए साफ कर दिया था कि केंद्र में उन की सरकार बनने पर अवैध रूप से सीमा पार कर भारत में बस जाने वाले तमाम बंगलादेशियों को उन के देश वापस भेजा जाएगा.

इस को ले कर ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच जबानी जंग और कड़वाहट ने शालीनता की तमाम हदें पार कर दी थीं. दिलचस्प बात यह है कि यही ममता बनर्जी कभी वाममोरचे पर घुसपैठियों को ले कर वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया करती थीं. वर्ष 2005 में ममता बनर्जी ने बड़े जोरशोर से इन घुसपैठियों का मामला संसद में भी उठाया था.

अवैध रूप से सीमा पार कर के बहुत सारे बंगलादेशी पश्चिम बंगाल में चले आ रहे हैं. भारतीय सांख्यिकी संस्थान से जुड़े समीर गुहा के अनुसार, 1971 में बंगलादेश मुक्ति युद्ध के समर्थन में भारतपाकिस्तान लड़ाई के बाद 1981 से ले कर 1991 तक हजारों बंगलादेशी भारत आए और यहां बस गए. इस के अलावा आएदिन सीमा पार कर के बंगलादेशी यहां रोजीरोजगार की जुगाड़ में आते ही रहते हैं.

आमतौर पर वहां के आदमी यहां राजमिस्त्री, मजदूर, साफसफाई, कुलीगीरी के काम में लग जाते हैं और औरतें चौकाबरतन जैसे घरेलू कामकाज के अलावा छोटेछोटे कारखानों में काम करने में लग जाती हैं. इन के साथ आए बच्चे कूड़ाकचरा बीनने और रद्दी बेचने के काम में लग जाते हैं. कुछ दिन यहां पैसा कमा कर जिस रास्ते से आते हैं उसी रास्ते से वापस लौट आते हैं. कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार मिलन दत्त, 2009 और 2010 में एसोसिएशन स्नैप गाइडैंस गिल्ड द्वारा पश्चिम बंगाल में कराए गए सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहते हैं कि 65 प्रतिशत बंगलादेशी ऐसे ही हैं. इन्हें घुसपैठिए कहने के बजाय ‘प्रवासी’ कहा जाना ज्यादा बेहतर होगा, जो गैरकानूनी तरीके से सीमा पार कर यहां चले आते हैं. यह ऐसा ही है जैसा अमेरिका में मैक्स्को या आस्ट्रेलिया में इंडोनेशिया के कामगर कर रहे हैं.

कोलकाता के उपनगर में घरेलू कामकाज करने वाली रुकइया बीबी बताती है कि प्रति व्यक्ति साढ़े 3 हजार रुपए दे कर उस का पूरा परिवार लगभग 60 लोगों के एक जत्थे के साथ सीमा पार कर के पश्चिम बंगाल आया. रुकइया बीबी अब घरों में चौकाबरतन करती है और उस का पति न्यू टाउन के रिहाइशी कौंप्लैक्स में झाड़ूबुहारी का काम करता है. वह आगे कहती है कि सीमा पार करने का काम दलालों के जरिए होता है. लोग दलालों को रकम देते हैं, जो सीमा सुरक्षा बल के साथ ‘सैटिंग’ कर के हम लोगों को सीमा पार करवाते हैं और वापस बंगलादेश जाने भी देते हैं. ऐसे लोग मुख्यतया कोलकाता के आसपास के नएपुराने उपनगरों में बस जाते हैं.

गृह मंत्रालय इस काम में बड़ी तत्परता के साथ जुटे होने का दावा कर रहा है. देश के अलगअलग हिस्सों में बंगलादेशियों को पहचानने का काम शुरू हो चुका है.

वोटबैंक का खेल

लंबे समय से पश्चिम बंगाल में बंगलादेशी शरणार्थियों की समस्या पर काम करने वाले राजनीतिक विश्लेषक मोहित राय कहते हैं कि यह हमारे देश की राजनीतिक व सांस्कृतिक विडंबना ही है कि अल्पसंख्यक शब्द का अर्थ केवल मुसलमानों से जोड़ कर देखा जाता है. तमाम राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों की बात करने में जुटी रहती हैं.

यह दावा किया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में मुसलिम वोटबैंक के मद्देनजर मुसलमानों की आबादी में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है. इस का व्यापक असर यह होने लगा है कि आम लोगों के मन में यह आशंका घर करने लगी है कि पश्चिम बंगाल देरसवेर मुसलिम बहुल राज्य के तौर पर जाना जाने लगेगा. पश्चिम बंगाल के मुसलिम बहुल इलाके में विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में भी इजाफा हुआ है. आबादी के आधार पर जहां एक तरफ कोलकाता में विधानसभा केंद्र 21 से घट कर 11 हो गए हैं तो दूसरी ओर राज्य के विभिन्न जिलों के विधानसभा क्षेत्र में खासा बदलाव आया है. हिंदू बहुल पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर जिलों में 2-2 और वहीं बीरभूम, बांकुड़ा, हुगली, बर्द्धमान में 1-1 विधानसभा केंद्र कम हो गए हैं, वहीं बंगलादेश सीमा से सटे जिले मुर्शिदाबाद में 3, उत्तर दिनाजपुर और नदिया में 2-2, दक्षिण दिनाजपुर और मालदह में 1-1 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों का इजाफा हो गया है.

मिलन दत्त का यह भी मानना है कि समयसमय पर बंगलादशी घुसपैठियों की जो तादाद केंद्र व राज्य सरकार की ओर से पेश की जाती रही है, उस का कोई पुख्ता आधार नहीं है. घुसपैठियों की संख्या का निर्धारण का एक और फार्मूला है और वह यह कि बाकायदा पासपोर्टवीजा ले कर कितने लोग यहां आए और वीजा खत्म होने के बाद कितने लोग वापस नहीं लौटे. उस का आंकड़ा हो.

भारत और बंगलादेश में औनलाइन इमीगे्रशन की सुविधा न होने के कारण अगर लोग जमीन के रास्ते यहां आ कर हवाई रास्ते से लौट जाते हैं तो इस का हिसाब नहीं होता है. जाहिर है रुकइया बीबी जैसे अवैध रूप से सीमा पार करने वालों से भी बंगलादेशियों की तादाद का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है.

वर्ष 1947 में देश के बंटवारे के दौरान बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थियों ने पश्चिम बंगाल में आश्रय लिया था और फिर यहां उन्हें भारत की नागरिकता भी मिल गई. उधर, 1951 में राष्ट्र संघ सम्मेलन में शरणार्थी की परिभाषा बदल दी गई. वहीं घुसपैठिए को भी चिह्नित कर दिया गया. नई परिभाषा के अनुसार, बंगलादेश में उत्पीड़न का शिकार हो कर भारत चले आए हिंदू, बौद्ध व ईसाई शरणार्थी हैं और शेष यानी बंगलादेश से भारत चले आए बाकी मुसलमानों को घुसपैठिया माना गया है.

अल्पसंख्यक राजनीति की बात की जाए तो मोहित राय कहते हैं कि लगभग 50 सालों से पूर्वोत्तर और पूर्वी राज्यों में भारतीय अल्पसंख्यकों के साथ बंगलादेशी अल्पसंख्यकों का घालमेल कर के वोटबैंक की राजनीति की जा रही है, यह भी एक बड़ा मसला है. 1971 में भारतपाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान भी लाखों की संख्या में बंगलादेशी सीमा पार कर के यहां शरण लेने चले आए थे. पर इन्हें भारत की नागरिकता नहीं मिली. दरअसल, नवंबर 1971 में भारत सरकार ने एक नोट जारी कर के साफ कर दिया था कि 25 मार्च, 1971 के बाद जो लोग सीमा पार कर के भारत आए, उन्हें भारत की नागरिकता नहीं दी जाएगी. भारत सरकार द्वारा जारी इस नोट के आधार पर 1971 के बाद पश्चिम बंगाल में शरण लेने वाले हिंदू बंगलादेशियों को भी अवैध करार दे दिया गया.

कैसे हो समाधान

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि पश्चिम बंगाल में शरण लेने वाले हिंदू बंगलादेशियों की संख्या कितनी होगी? इस मुद्दे पर मोहित राय ढाका विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अबुल बरकत द्वारा किए गए शोध का हवाला देते हुए कहते हैं कि 1971 से ले कर 2001 तक 63 लाख हिंदू बंगलादेश से भारत चले आए. इन में से दोतिहाई लोग भी अगर पश्चिम बंगाल में बस गए तो राज्य में शरणार्थियों की संख्या लगभग 42 लाख होगी. इस के अलावा 2014 में बगैर नागरिकता प्राप्त किए अवैध तरीके से सीमा पार कर पश्चिम बंगाल में बस चुके लोगों की संख्या लगभग 50 लाख होगी.

जहां तक हिंदू बंगलादेशियों का मामला है, सब जानते हैं कि हिंदू वहां भी उत्पीड़न और अत्याचार के शिकार हैं. बंगलादेश में कभी हिंदुओं की आबादी 30 प्रतिशत थी, अब यह महज 9 प्रतिशत रह गई है. समयसमय पर बंगलादेश से बड़ी संख्या में हिंदू पलायन कर के पश्चिम बंगाल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बस गए हैं. इस सिलसिले में मातुआ संप्रदाय का जिक्र प्रासंगिक है.

गौरतलब है कि वोट की राजनीति के मद्देनजर पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों की नजर हमेशा इस संप्रदाय पर रही है. मातुआ जनजाति ने लंबे समय से भारत की नागरिकता के लिए संघर्ष किया है, जो मातुआ आंदोलन के नाम से जाना जाता है. वाममोरचे ने इन के आंदोलन का समर्थन किया. आज इस जनजाति के मतदाताओं की संख्या लगभग 70 लाख है. जाहिर है इतने बड़े वोटबैंक पर पश्चिम बंगाल की हरेक राजनीतिक पार्टी की नजर हुआ करती है.

बहरहाल, हिंदू बंगलादेशियों के मामले में कहीं कोई संवेदना भी काम करती है. पश्चिम बंगाल का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग र तमाम राजनीतिक पार्टियां चुप्पी साधे हुए हैं. इस मसले पर हमेशा से सब से ज्यादा मुखर भारत की एकमात्र राजनीतिक पार्टी भाजपा रही है. दोनों ही मोरचे यानी राज्य और केंद्र में भाजपा यह मामला उठाती रही है. इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ने के साथ पश्चिम बंगाल में यह मामला जोर पकड़ रहा है. इस मुद्दे पर मोदी और ममता आमनेसामने हैं. ममता बनर्जी ने भी साफ कह दिया है कि बंगलादेशियों के खिलाफ कोई भी फैसला करने से पहले केंद्र राज्य सरकार से बात करे. देखना है कि नरेंद्र मोदी इस मुद्दे में किस हद तक सफल होते हैं.  द्य

क्या कहते हैं आंकड़े

इंस्टिट्यूट औफ डिफैंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस यानी आईडीएसए की रिपोर्ट बताती है कि देश में 2 करोड़ से अधिक अवैध बंगलादेशी मौजूद हैं. वहीं, सरकार इन की संख्या 1,07,137 बताती है. इन में से मात्र 83,484 बंगलादेशियों को शरणार्थी बताया गया है शेष 23,653 बंगलादेशी घुसपैठियों को देश से निकाल दिए जाने का दावा किया जाता है. एक आंकड़ा बताता है कि अकेले असम में 1 करोड़ 20 लाख बंगलादेशी घुसपैठिए रह रहे हैं.

नवीनतम जनगणना के अनुसार, कोकराझार और धुबरी जिलों में उन की आबादी 65 फीसदी से अधिक हो गई है जबकि राज्य के मूल निवासी बोडो आदिवासियों तथा अन्य आदिवासियों की जनसंख्या घट कर 5 फीसदी रह गई है. दिल्ली में 9 लाख से अधिक बंगलादेशी घुसपैठिए मौजूद हैं. वहीं दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड की मानें तो छोटेबड़े कुल 3 हजार ऐसे आपराधिक मामले दर्ज हैं जिन्हें कथित तौर पर बंगलादेशी अपराधियों ने अंजाम दिया.

पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने भी बताया था कि बंगलादेश की ओर से भारत में घुसपैठ करने वाले 6,867 लोगों को पिछले 5 वर्षों में गिरफ्तार किया गया है. वर्ष 2009 में सर्वाधिक 10,602 बंगलादेशी निर्वासित किए गए, जबकि वर्ष 2010, 2011 में क्रमश: 6,290 और 6,761 बंगलादेशियों को वापस भेजा गया. इसी प्रकार, 31 दिसंबर, 2011 को 40 देशों के 67,945 लोग भारत में निर्धारित अवधि से अधिक रहते पाए गए थे. वहीं, आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद की सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में वर्ष 2010 तक की ही जानकारी मिली है. जानकारी में बताया गया कि मणिपुर में 13, पोर्टब्लेयर में 134, झारखंड में 1, गोआ में 1, टिहरीगढ़वाल में 1, हरिद्वार में 91, नैनीताल में 1 और उधमसिंह नगर में 7 बंगलादेशियों को गिरफ्तार किया गया है वहीं, हरियाणा के जीन्द में 4, पलवल में 5, सोनीपत में 20, रेवाड़ी में 11 और यमुनानगर में 49 बंगलादेशियों को पकड़ कर उन्हें वापस भेज दिया गया है.

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