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ग्रामीण महिलाओं का मोबाइल रखने का सपना

शहरी क्षेत्रों में मोबाइल फोन की कड़ी प्रतिद्वंद्विता से परेशान दूरसंचार क्षेत्र प्रदाता गांव की तरफ रुख कर रहे हैं. गांव में भी मोबाइल सेवा का चक्र तेजी से घूम रहा है, इसलिए इन्होंने ग्रामीण महिलाओं को भी अपना लक्ष्य बना लिया है.

ग्रामीण क्षेत्रों के बारे में कहा जाता है कि वहां 76 फीसदी मोबाइल फोन पुरुषों के पास हैं जबकि महिला मोबाइल फोन धारकों की संख्या महज 29 फीसदी है. इस अंतर को कम करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय मोबाइल फोन सेवा प्रदाता कंपनी ने हर ग्रामीण महिला के हाथ में कम दर की आकर्षक योजना पर अपनी सेवा देने की पहल की है. उस की इस साल गांव में इस परियोजना पर 101 करोड़ रुपए से अधिक के निवेश की योजना है. कंपनी ने उत्तर प्रदेश के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में यह काम पायलट परियोजना के रूप में शुरू भी कर दिया है और उस का दावा है कि इस में उसे अच्छी सफलता मिल रही है.

गांव में सचमुच बड़ी दिक्कत है. मोबाइल वहां क्रांति के रूप में अपनी पैठ बना रहा है. गांवों में मोबाइल रखना अब हर महिला का सपना बन गया है. गरीबी, शिक्षा और पर्याप्त दस्तावेजों के अभाव में यह सपना कई महिलाओं का पूरा नहीं हो पा रहा है. रोटी, कपड़ा, मकान के साथ मोबाइल रखना भी एक जरूरत बन गया है. अपनों से तत्काल संपर्क करने का इस से अच्छा दूसरा साधन फिलहाल और कुछ है भी नहीं.

इस तरह की पहल सरकार को भी करनी चाहिए और सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों को सरकारी स्तर पर ऐसी सुविधा दी जानी चाहिए. गांव में लैपटौप बांटे जा रहे हैं तो मोबाइल भी बांटे जा सकते हैं. सस्ती दरों पर उन्हें यह सेवा दी जा सकती है. यह अलग बात है कि बिजली और शुद्ध पेयजल गांव की बड़ी समस्याएं हैं. मोबाइल उन समस्याओं का समाधान नहीं है लेकिन यह गांव वालों को खुशी का अवसर जरूर दे सकता है.

1 लाख मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य

सरकार सौर ऊर्जा यानी साफसुथरी ऊर्जा के उत्पादन को विशेष महत्त्व दे रही है. इस की बड़ी वजह यह है कि सरकार ने 1 दशक में सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य 1 लाख मेगावाट निर्धारित किया है. यह लक्ष्य कितना बड़ा है, इस का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इस समय देश में 2,500 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है और 1 साल में इस उत्पादन को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. सरकार ने सौर ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 6 लाख करोड़ रुपए के निवेश का अनुमान लगाया है. इस साफसुथरी ऊर्जा के उत्पादन में विश्व बैंक साथ दे रहा है और जरमनी जैसे प्रमुख देश इस प्रणाली को और मजबूत बनाने में सहयोग करने के लिए तैयार हैं. राजधानी दिल्ली में इस लक्ष्य को हासिल करने की एक तरह से शुरुआत भी की जा चुकी है. दिल्ली बिजली नियामक आयोग ने लोगों से अपने घरों की छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने की सलाह दी है और कहा है कि सरकार उन से 5 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदेगी. इस के लिए बाकायदा आवेदन मंगवाए गए हैं. आवेदनपत्र की कीमत 500 रुपए रखी गई है.

आवेदन के स्वीकृत होते ही आवेदक पंजीकृत हो जाएगा और 5 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली बेचने का हकदार बन जाएगा. दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने हाल ही में गुजरात का दौरा किया था और वहां किस तरह से सौर ऊर्जा पैनल के जरिए बिजली तैयार कर के बेची जा रही है, इस बारे में जानकारी हासिल की और अब दिल्ली में उस व्यवस्था को लागू करने की योजना है.

उत्तर प्रदेश सरकार तो इस से एक कदम आगे निकल रही है और इस के लिए वह नैट मीटर सिस्टम शुरू कर रही है. इस सिस्टम से उत्पादक अपनी छत पर पैदा की गई बिजली को ऊर्जा वितरण कंपनी को बेच सकेगा. इस व्यवस्था के लागू होने के साथ ही उत्तर प्रदेश सौर ऊर्जा बेचने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है. बहरहाल, यह योजना उन्हीं क्षेत्रों में ज्यादा प्रभावी साबित हो सकती हैं जहां आबादी भले ही कम हो लेकिन घर ज्यादा हों. दिल्ली जैसे शहरों में आबादी बहुत है लेकिन सारी आबादी बहुमंजिले आवासों में घुसी हुई है, जहां न खुली हवा आती है और न ही सूर्य की रोशनी पहुंचती है. 500 गज जमीन पर 500 परिवार गुजरबसर कर रहे हैं. सब की छत एक ही होगी और इस से आबादी के अनुपात से सौर ऊर्जा उत्पादन नगण्य ही होगा. इसलिए सरकार को यदि सचमुच छत पर बिजली पैदा करनी ही है तो उसे गांव का रुख करना पड़ेगा और गांव की हर छत को सौर ऊर्जा प्रणाली से जोड़ कर गांव को सौऊर्जा उत्पादन के केंद्र बना कर और ऊर्जा की कमाई से उन्हें संपन्न बनाना होगा. वहां पर्याप्त रूप से खुली और बेकार जमीन भी है जिस का फायदा सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए उठाया जा सकता है और गांवों को सीधे रोजगार से जोड़ा जा सकता है.

गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा का नया सपना

सरकार हरेक नागरिक को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाने के लिए एक महत्त्वाकांक्षी योजना की तैयारी कर रही है. योजना का मकसद देश के हर नागरिक को बिना भेदभाव के स्वास्थ्य बीमा के कवच के दायरे में लाना है और उसे भरोसा दिलाना है कि सरकार दुख की घड़ी में उस के साथ है.

योजना के तहत आने वाले गरीबों को निशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जानी है. योजना के क्रियान्वयन होने पर सरकारी अस्पतालों में 50 आवश्यक दवाओं का पैकेज बनाया जाएगा और बीमाधारक व्यक्तियों को इस पैकेज में शामिल दवाएं निशुल्क दी जाएंगी. योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में गरीबों को आयुर्वेदिक, यूनानी, प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी की दवाएं भी निशुल्क दी जाएंगी. स्वास्थ्य बीमा की यह योजना गरीबी की रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों के सदस्यों के लिए निशुल्क होगी. योजना को लागू करने की तरकीब सुझाने के लिए चंडीगढ़ मैडिकल स्नातकोत्तर चिकित्सा महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफैसर रणजीत राय चौधरी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया और इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. स्वास्थ्य बीमा जैसी महत्त्वाकांक्षी योजना लोगों में उत्साह पैदा कर रही है. वैसे भी अब तक देश में सिर्फ 25 फीसदी लोग ही स्वास्थ्य बीमा की परिधि में हैं. सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य बीमा की योजना नहीं होने के कारण बड़ी आबादी इस से वंचित है.

ये हालात उस स्थिति में हैं जब कहा जाता है कि भारत चिकित्सा पर्यटन के लिहाज से दुनिया का अग्रणी देश बन रहा है. दुनियाभर से बीमार सस्ते और बेहतर इलाज के लिए भारत का रुख कर रहे हैं. देश में निजी अस्पताल तो सचमुच अच्छे हैं लेकिन सरकारी अस्पतालों की हालत बहुत खराब है. इन अस्पतालों का रखरखाव अच्छे बजट के बावजूद बहुत खराब है. वहां अच्छी मशीनें हैं और बहुत उम्दा किस्म के चिकित्सा उपकरण हैं लेकिन वे काम ही नहीं करते हैं. वहां डाक्टर हैं लेकिन इलाज नहीं करते हैं. वहां दवाएं निशुल्क मिलती हैं लेकिन दी नहीं जातीं और अगर दवा मिलती भी हैं तो वे नकली होती हैं. स्वयं डाक्टर ही अपने मरीज को उन दवाओं के सेवन की सलाह नहीं देते हैं. सरकारी अस्पतालों के अधिकांश डाक्टर दवा और जांच के लिए मरीजों को निजी लैब में भेजते हैं और कमीशन खाते हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि स्वास्थ्य बीमा योजना लागू होने से गरीबों को सचमुच राहत मिलेगी.

बाजार में मजबूती का माहौल

विश्व बाजार में सोने के दाम 15 माह के निचले स्तर पर पहुंचने और कच्चे तेल के दाम 28 माह में न्यूनतम स्तर पर रहने के बावजूद बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई में बिकवाली का दौर शुरू हुआ और सूचकांक दशहरे से पहले और उस के बाद कमजोर बना रहा. सितंबर के आखिरी सप्ताह के लगभग सभी दिनों के कारोबार के दौरान बाजार में मुनाफावसूली का दौर चला जिस की वजह से सूचकांक उठापटक के बीच लगभग कमजोर स्थिति में ही बंद होता रहा. अक्तूबर की शुरुआत में भी बाजार का माहौल नहीं सुधरा हालांकि पहले सप्ताह दशहरा, गांधी जयंती तथा ईद के कारण छुट्टी का माहौल रहा और बाजार सिर्फ 1 ही दिन खुल सका. दूसरे सप्ताह की शुरुआत भी कमजोरी के साथ हुई और यह माहौल करीब पूरे सप्ताह बना रहा.

सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिवस को तो बाजार 2 माह के निचले स्तर पर बंद हुआ. इन सब स्थितियों के बावजूद साल की शुरुआत से ही मोदीमय रहे बाजार में माहौल को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के विकास दर के वर्तमान 5.4 प्रतिशत से बढ़ कर 6.5 प्रतिशत तक पहुंचने के पूर्वानुमान ने सकारात्मक बनाया. शेयर बाजार के मोदीमय होने की वजह से इस साल अब तक बाजार का निवेश 23 लाख करोड़ रुपए हो चुका है. सूचकांक पिछले 9 माह के दौरान 25.49 फीसदी की छलांग लगा चुका है. इसी दौरान भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई के औद्योगिक व्यापार विश्वास सूचकांक यानी इंडस्ट्रीज बिजनैस कौन्फिडैंस इंडैक्स के सूचकांक में इस तिमाही में भी लगातार दूसरी बार तेजी रही है. पहली तिमाही में इस सूचकांक में तेजी 57.4 प्रतिशत की थी जो दूसरी तिमाही में बढ़ कर 72.5 प्रतिशत तक पहुंची है. इन घटकों की वजह से बाजार घटतबढ़त के बावजूद मजबूत स्थिति में है.

मैनग्रोव जंगल की कटाई होगी बड़ी तबाही

हर मकर संक्रांति पर्व अपने पीछे छोड़ जाता है सुंदरवन के मैनग्रोव की तबाही. चक्रवाती तूफान और बरसात यानी प्राकृतिक आपदा किस रूप में आ सकती है, इस का पूर्वानुमान तो लगाना संभव है पर इस प्राकृतिक आपदा की तबाही से बचना नामुमकिन सा है. तमाम पूर्वानुमानों के बावजूद यह बंगाल की खाड़ी के करीब 2 जिलों उत्तर और दक्षिण परगना समेत बंगलादेश में तबाही मचाता है. हर साल बंगाल की खाड़ी से इस दौरान कम से कम 6 चक्रवाती तूफान उठते हैं. हालांकि ये तूफान महज कुछेक मिनटों के होते हैं पर मिनटों में ही बड़े पैमाने पर तबाही मचाते हैं.

25 मई, 2009 में आया आइला तूफान इस की एक बड़ी मिसाल है, जिस ने पश्चिम बंगाल और बंगलादेश के तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर कहर ढाया. पर्यावरण विशेषज्ञ और कलकत्ता विश्वविद्यालय के समुद्र व जीव विभाग के प्राध्यापक अमलेश चौधुरी की अगुआई में तत्कालीन सुंदरवन विकास परिषद द्वारा 1983-84 में वेणुवन नदी के द्वीप से 7 किलोमीटर इलाके में मैनग्रोव के पौधे लगाए गए थे. इस का उद्देश्य था मैनग्रोव के जरिए नदी बांध की सुरक्षा. 1984 में लगाए गए मैनग्रोव अब पूरी तरह से जंगल में तबदील हो गए थे. लेकिन इस साल के गंगासागर मेले के दौरान इस जंगल की बलि चढ़ा दी गई.

अमलेश चौधुरी का कहना है, ‘‘चक्रवाती तूफान और बाढ़ के लिहाज से इस साल इस क्षेत्र का समय कठिन होगा. गौरतलब है कि इस इलाके में गरमी के मौसम की शुरुआत में अकसर चक्रवाती तूफान आते हैं. हलकेफुलके चक्रवाती तूफान भी यहां बड़ी तबाही मचाया करते हैं.’’आइला तूफान ने पश्चिम बंगाल और बंगलादेश के खाड़ी के करीबी जिलों के भूगोल और मौसम के पैटर्न को ही बदल कर रख दिया है. आज तक वहां का जनजीवन अपने ढर्रे पर नहीं लौट पाया है. वहीं, गंगासागर मेले के मद्देनजर मैनग्रोव की अंधाधुंध कटाई को ले कर पर्यावरणविदों के माथे पर बल पड़ गए हैं. इस से जो तबाही हो रही है वह प्राकृतिक आपदा से ज्यादा है.

तीर्थयात्रा की मार

हर साल मकर संक्रांति के मौके पर गंगासागर मेला लगता है. साल दर साल तीर्थयात्रियों की भीड़ बढ़ रही है. तीर्थयात्रियों की सुविधा और पुराने जेटी पर लोगों का दबाव कम करने के लिए स्थानीय सागरद्वीप के करीब चेमागुड़ी पौइंट के वेणुवन में नई सड़क और जेटी के निर्माण किए गए. इस के लिए लगभग 100 मीटर से भी बड़े इलाके में, अधिक पैमाने पर मैनग्रोव को काटा गया.

नई जेटी और सड़क बनाने का जिम्मा गंगासागर बकखाली उन्नयन (विकास) परिषद का था. पर्यावरणविदों की आशंका के बारे में पूछे जाने पर परिषद के चेयरमैन बंकिम हाजरा ने माना कि सागरमेला के दौरान तीर्थयात्रियों की सुविधा के मद्देनजर मैनग्रोव के जंगलों का सफाया किया गया था. लेकिन जंगल काटने का फैसला तमाम स्तर पर बैठक और सहमति के बाद किया गया. हालांकि उन का यह भी कहना है कि बरसात के मौसम में नदी के कटाव को रोकने के लिए नदी के द्वीप में बड़े पैमाने पर मैनग्रोव के पौधे लगाए गए हैं. इन से नदी के बांध के लिए किसी तरह का खतरा पैदा नहीं होगा. इधर, दक्षिण चौबीस परगना जिला प्रशासन का कहना है कि हर साल गंगासागर में बढ़ते तीर्थयात्री मुश्किलें पेश कर रहे हैं. गंगासागर तक पहुंचने के रास्ते में चेमागुड़ी पौइंट, जो बंगाल की खाड़ी से बहुत करीब है, के पास मुड़ीगंगा नदी में जेटी है. लेकिन भाटा के दौरान इस में समस्या इसलिए पेश आती रही है क्योंकि तीर्थयात्रियों से भरा लौंच अकसर नदी की गाद में अटक जाता है. इस के कारण जेटी में भीड़ बढ़ती जाती है. इस से बड़ी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. इस कारण वेणुवन में नए जेटी के निर्माण का फैसला लिया गया.

गौरतलब है कि वेणुवन में नदी की गहराई अधिक है, जिस के कारण वहां यात्री लौंच चलाने में परेशानी नहीं पेश आएगी, यही सोच कर प्रशासन ने वहां नई जेटी का निर्माण किया. इस के अलावा जेटी से जोड़ कर 60 फुट चौड़ी सड़क का भी निर्माण किया गया. जेटी और सड़क निर्माण के लिए बड़ी तादाद में मैनग्रोव के जंगल का सफाया किया गया.

प्रकृति से खिलवाड़

चिंता इस बात की है कि यह क्षेत्र विकसित प्रजाति के मैनग्रोव का है, जिस की अंधाधुंध कटाई की गई. इस को ले कर पर्यावरणविदों में बड़ी नाराजगी है. मैनग्रोव के ये जंगल बरसात के मौसम में बाढ़ के कारण नदी के कटाव को रोकने में बड़ी अहम भूमिका निभाते हैं. पर्यावरणविदों को आशंका है कि इतने बड़े पैमाने पर मैनग्रोव को काटे जाने से सागरद्वीप के पर्यावरण संतुलन पर जरूर आंच आएगी. इस का नतीजा इस बार बरसात के मौसम में साफ नजर आएगा. इस मेले का प्रचार बहुत बड़े पैमाने पर होता है. जत्थों के साथ पंडेपुजारी भक्तों के खर्च पर आते हैं और अपनी जेबें भरते हैं. भक्तों के चढ़ावे और उन की खरीदारी में अफसरों के साथ पंडों का भी हिस्सा होता है. इसीलिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ की बात कोई सुनना ही नहीं चाहता.

पटना के गर्ल्स होस्टल का सच

सीलन भरे, दड़बेनुमा छोटेछोटे कमरे उन कमरों में 2-3 चौकियां, हवा आनेजाने के लिए ठीक से खिड़कियां तक नहीं, गंदे बाथरूम व टौयलेट, संकरी सीढि़यां, दीवारों और छतों से ढहते प्लास्टर, रंगरोगन का नामोनिशान नहीं, अंदर और जहांतहां बाहर बिजली के लटकते तार, पानी की तरह बेजायका चाय, गंदी पड़ी पानी की टंकियां, गेट पर लगा बड़ा सा फाटक और वहां पर सिक्योरिटी के नाम पर खड़ा बूढ़ा व कमजोर गार्ड. कुछ ऐसी है पटना के गर्ल्स होस्टल्स की पहचान. ज्यादातर गर्ल्स होस्टल्स की ऐसी हालत है कि बाहर से देखने पर अजीब सा रहस्यमयी वातावरण नजर आता है. टूटेफूटे पुराने मकानों के कमरों में लकड़ी या प्लाईबोर्ड से पार्टिशन कर के छोटेछोटे कमरों का रूप दे दिया गया है. सीलन भरे कमरों में न ही ढंग से रोशनी का इंतजाम है, न पानी और साफसफाई का. खानेपीने की व्यवस्था काफी लचर है.

खजांची रोड के एक गर्ल्स होस्टल में रहने वाली प्रिया बताती है कि 8×8 फुट के कमरे में 3 चौकियां लगी हुई हैं, खिड़की का नामोनिशान नहीं है. खाने के लिए 2 हजार रुपए हर महीने लिए जाते हैं और घटिया चावल और उस के साथ दाल के नाम पर पानी दिया जाता है. सब्जी के रस में आलू या गोभी ढूंढ़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है.

दरअसल, पटना में कोचिंग के कारोबार के साथ कई धंधे चल रहे हैं. कोचिंग संस्थानों के आसपास गर्ल्स होस्टल, बौयज होस्टल, मैस, किताबकौपियों की दुकानें, टिफिन वालों का कारोबार फलताफूलता रहा है. पटना के महेंदू्र, मुसल्लहपुर हाट, खजांची रोड, मखनियां कुआं, नया टोला, भिखना पहाड़ी, कंकड़बाग, राजेंद्रनगर, बोरिंग रोड, कदमकुआं, आर्य कुमार रोड, पीरमुहानी आदि इलाकों में कोचिंग सैंटर और होस्टल्स की भरमार है. शहर में करीब 3 हजार से ज्यादा छोटेबड़े होस्टल्स हैं. उन का करोबार करोड़ों रुपए का है.

सुरक्षा का अभाव

होस्टल की सुरक्षा के नाम पर चारों ओर की खिड़कियां बंद कर दी जाती हैं, चारदीवारी को ऊंचा कर दिया जाता है और लोहे का बड़ा सा गेट लगा दिया जाता है. मखनियां कुआं के होस्टल में रह कर मैडिकल की कोचिंग करने वाली पूर्णियां शहर की रश्मि बताती है कि हर रोज सुबह और रात को लड़कियों की हाजिरी नहीं लगाई जाती है. लड़कियों के गार्जियन, प्रशासन और होस्टल संचालकों के बीच समन्वय नहीं होने के चलते होस्टल्स को हमेशा संदेह की नजरों से देखा जाता है. ज्यादातर गर्ल्स होस्टल्स के संचालक मर्द हैं जो लड़कियों से अकसर बेशर्मी से पेश आते हैं.

पटना की सिटी एसपी रह चुकी किम कहती हैं कि गर्ल्स होस्टल्स की वार्डेन महिला ही होनी चाहिए और लोकल थानों के टैलीफोन नंबर होस्टल्स में चिपकाने चाहिए. गर्ल्स होस्टल्स की कई शिकायतें मिलने के बाद समयसमय पर महिला पुलिस वालों द्वारा होस्टल्स के मुआयने करने के निर्देश थानों को दिए जाते रहे हैं. पटना के श्रीकृष्णापुरी महल्ले के मुसकान गर्ल्स होस्टल की इंचार्ज श्वेता वर्मा कहती हैं कि उन के होस्टल में ज्यादातर मैडिकल और इंजीनियरिंग की कोचिंग करने वाली लड़कियां ही रहती हैं. उन का दावा है कि उन के होस्टल में लड़कियों की हिफाजत, मैडिकल और साफसफाई का पूरा खयाल रखा जाता है.

इस होस्टल में रह कर मैडिकल की तैयारी करने वाली सृष्टि जैन कहती है कि उस के होस्टल का इंतजाम चुस्तदुरुस्त है. शाम 8 बजे तक हर हाल में होस्टल में आ जाना होता है, नहीं तो इंचार्ज गार्जियन को खबर कर देते हैं. सरकारी होस्टल्स का हाल तो और भी ज्यादा बदतर है. पटना में ऊंची पढ़ाई के लिए महेंद्रू और सैदपुर महल्ले में 3 सरकारी होस्टल्स बने हुए हैं. उन में पटना और मगध विश्वविद्यालय और नैशनल इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी के छात्र रहते हैं. इन होस्टल्स की जर्जर हालत की वजह से उन में रहने वालों के सिर पर हमेशा जान का खतरा बना रहता है.

कमरों का हाल यह है कि चादर का घेरा बना कर बने कमरों में छात्र रहने के लिए मजबूर हैं. महेंद्रू के होस्टल में हैंडपंप खराब होने की वजह से महीनों से गंदा पानी निकल रहा है. होस्टल की टंकी की साफसफाई नहीं हो पाती है. छात्रों ने बताया कि अकसर वे खुद चंदा कर के पैसा जमा करते हैं और टंकी की सफाई करवाते हैं. होस्टल में रहने वाले छात्र दिलीप ने बताया कि जब होस्टल की हालत में सुधार के लिए छात्र हंगामा मचाते हैं तो अफसर उन्हें बालटी और झाड़ू थमा देते हैं.

होस्टल व कोचिंग के कारोबार में मोटी कमाई और बढ़ती कारोबारी प्रतियोगिताके चलते होस्टल व कोचिंग के संचालकों ने अपने चारों ओर सुरक्षा का मजबूत घेरा बना रखा है. प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स से घिरे रहने वाले होस्टल संचालकों को स्टूडैंट्स की सुरक्षा का कोई खयाल नहीं रहता. पटना विश्वविद्यालय के एक प्रोफैसर कहते हैं कि होस्टल व कोचिंग चलाने वालों को सब से ज्यादा खतरा स्टूडैंट्स से ही होता है. 95 फीसदी होस्टल में स्टूडैंट्स के रहने व खाने का इंतजाम ठीक नहीं होता है, जबकि इस के लिए स्टूडैंट्स से मोटी रकम वसूली जाती है. भोजन के लिए 20 से 35 हजार रुपए और रहने के लिए 25 से 40 हजार रुपए सालाना वसूले जाते हैं.

कई होस्टल्स के स्टूडैंट्स ने बताया कि जब कभी होस्टल के बदतर इंतजाम के खिलाफ स्टूडैंट्स हल्ला मचाते हैं तो संचालक उन्हें पुलिस को सौंप देने की धमकी देने के साथ अपने राइफलधारी बौडीगार्ड्स का खौफ दिखा कर मामले को ठंडा कर देते हैं.

ढाबे वालों की मोटी कमाई

घरपरिवार से दूर होस्टल में रह कर कालेज और कोचिंग में पढ़ाई व बेहतर भविष्य बनाने के लिए जीतोड़ मेहनत करने वाले बच्चों को ढंग का खाना नसीब नहीं हो पाता है. ज्यादातर स्टूडैंट्स गलियों और चौकचौराहों पर झोंपडि़यों में बने ढाबों में गंदा, मिलावटी और नकली तेल में बना खाना खाने को मजबूर हैं. हैल्दी भोजन नहीं मिलने से वे अकसर बीमार पड़ जाते हैं और शरीर को कमजोर बना लेते हैं. पटना के कंकड़बाग महल्ले में रह कर आईआईटी की तैयारी कर रहा शेखपुरा जिले का श्याम शर्मा बताता है कि होस्टल का खाना बहुत ही घटिया होता है वह और उस के 4 दोस्त पास के ही ढाबे में एक टाइम खाने के 35 रुपए चुकाते हैं. होस्टल्स के आसपास झोंपड़ी में ढाबा चलाने वाले मोटी कमाई कर खुद तो मालामाल हो रहे हैं जबकि स्टूडैंट्स को शारीरिक व मानसिक तौर पर कमजोर कर रहे हैं.

होस्टल संचालकों का रोना

होस्टल का कारोबार कर लाखों रुपए कमाने वाले होस्टल संचालकों का अपना रोना है कि मकान मालिक उन से मनमाना किराया वसूलते हैं. होस्टल के लिए किराए पर मकान लेते समय मकान मालिक और होस्टल संचालक के बीच में लीगल एग्रीमैंट होता है, जिस में तमाम तरह की शर्तों के साथ हर साल 10 फीसदी किराया बढ़ाने का जिक्र होता है. जब होस्टल का धंधा अच्छा चलने लगता है तो मकान मालिकों के मुंह से लार टपकने लगती है और वे 10 फीसदी के बजाय मनमाने तरीके से किराया बढ़ा देते हैं. अचानक मकान को छोड़ा भी नहीं जा सकता. इन सारी परेशानियों की वजह यही है कि होस्टल संचालक एकजुट नहीं हैं और उन का कोई संगठन नहीं है. सब से बड़ी दिक्कत यह है कि सरकार की ओर से होस्टल के रजिस्ट्रेशन आदि का कोई नियम नहीं है.

बच्चों के मुख से

मेरा 5 साल का बेटा बहुत बातूनी है. एक दिन पढ़ाई के दौरान जब मैं उसे सूरज और चंद्रमा के बारे में बता रही थी तो उस ने पूछा, ‘‘सूरज जब उगता है तो चंद्रमा कहां चला जाता है?’’
मैं ने कहा, ‘‘पहाड़ों के पीछे छिप जाता है. सूरज की रोशनी इतनी तेज होती है कि चंद्रमा दिखाई नहीं देता.’’
उस ने कहा, ‘‘सूरज के पास कोई गया है?’’
मैं ने कहा, ‘‘नहीं.’’
‘‘और चंद्रमा के पास?’’
मैं ने कहा, ‘‘हां. चंद्रमा पर तो बहुत लोग जा चुके हैं.’’
तो वह कहने लगा, ‘‘आप भी गई हैं?’’
मैं ने कहा, ‘‘नहीं.’’
‘‘हां, जाना भी मत, नहीं तो चंदा मामा टूट जाएंगे, आप इतनी मोटी जो हो.’’ उस की बात सुन कर मैं मुसकराए बिना न रह सकी.

रीता तिवारी, भिलाई (छग.)

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मेरा पोता आदित्य 5 साल का है. वह तेज दिमाग है और बोलने में भी तेज है. घर में कुछ मेहमान आए हुए थे. गपशप चल रही थी. इतने में वह आया. तभी एक मेहमान ने उस से दादा का नाम पूछा तो उस ने झट से सुरेंद्र प्रसाद गुप्ता कह दिया. फिर मेहमान ने उस से उस के पापा का नाम पूछा तो उस ने कहा, ‘पतिदेव अमित कुमार गुप्ता हैं.’ पतिदेव शब्द सुन कर हम लोग हंसे बगैर नहीं रह सके. असल में पतिदेव कह कर उस की मम्मी को लोग चिढ़ाया करते थे, जैसे- देखो, तुम्हारे पतिदेव आ गए हैं, पतिदेव को खाना दो, आदि.

सुरेंद्र प्रसाद गुप्ता, पटना (बिहार)

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इलैक्शन के दिनों में घर में काफी लोग आते रहते थे. कोई कहता कि भारतीय जनता पार्टी अच्छी है, कोई कहता कि कांगे्रस अच्छी है तो कोई आम आदमी पार्टी को अच्छा बताता. एक दिन ऐसी ही बात हो रही थी, पास में 3 वर्षीय अंकित खड़ा था, तपाक से बोला, ‘‘मुझे तो बर्थडे पार्टी सब से अच्छी लगती है.’’ उस की बात सुन कर सभी खूब हंसे.

निर्मल कांता गुप्ता, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

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मेरा 6 साल का पोता पेड़पौधों से बहुत प्यार करता है. एक दिन उस की छोटी बहन पिहू ने घर में रखे गमलों में से 3-4 पत्ते तोड़ कर फेंक दिए तो मेरे पोते अमिश ने जोर से डांट लगाते हुए कहा, ‘‘पिहू, तुम्हें पता है पेड़ों को नुकसान पहुंचाने से पर्यावरण को कितना नुकसान होता है.’’ मेरे छोटे से बच्चे ने इतनी बड़ी व गंभीर बात समझ ली लेकिन बड़े लोग ये बात कब समझेंगे?

संध्या श्रीवास्तव, झांसी (उ.प्र.)

हमारी बेडि़यां

खरगोन शहर के बिस्टान रोड स्थित नाका क्षेत्र में हनुमान जयंती के अवसर पर रात 9 बजे से 2 बजे तक अत्यधिक तेज ध्वनि में भजनों का कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस में विडंबना देखिए कि 10 से 12 लोग भजन मंडली के और 10 से 12 लोगों का ही श्रोता समूह था, जिन्होंने रात्रि 2 बजे तक महल्ले के तमाम लोगों की नींद व शांति भंग कर दी थी. चूंकि धर्म का मामला है, इसलिए किसी में विरोध करने की हिम्मत ही नहीं. धर्म के इन कथित ठेकेदारों को किस धर्म ने, किस कानून ने इस तरह की छूट दे रखी है, यह बात समझ से परे है. लोगों की शांति भंग करने का हक जबरिया हासिल करने वाले ये धर्म के ठेकेदार किसी भी तरह से जबरिया हफ्ता वसूल करने वाले किसी गुंडे, दादा या मवाली से कम नहीं हैं.

अनिल कुमार गुप्ता, खरगोन (म.प्र.)

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मेरे ननिहाल में एक युवक ने भोजन के समय मौनव्रत का नियम बना रखा था. यह क्रम काफी दिनों से चल रहा था. एक दिन वह भोजन पर बैठा. खाना शुरू हुआ. माताजी पंखा झल रही थीं. युवक को नीबू खाने की चाह जगी. भोजन के समय मौनव्रत भंग तो कर नहीं सकता था इसलिए इशारे से वह अपनी इच्छा व्यक्त करने लगा. न तो युवक सही इशारा कर पा रहा था न मां उस के भाव को समझ पा रही थीं. मां कभी टमाटर, कभी लड्डू, कभी अन्य वस्तुएं लाती गईं. युवक एकएक कर फेंकता गया. इसी क्रम में अनावश्यक वस्तुओं का ढेर लग गया. आखिरकार, युवक गुस्से में आ कर बोल पड़ा. सोचने वाली बात है, मौनव्रत के कारण उसे  ‘क्रोध तो खूब पीना पड़ा पर पेट नहीं भरा.’

विंग कमांडर एस ठाकुर, दरभंगा (बिहार)

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कहने को तो हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारे देश में अंधविश्वास व चमत्कार की जड़ें अभी भी सदियों पुरानी हैं. इसी तरह की एक घटना हमारी रिश्तेदारी में घटी. हुआ यह कि हमारे रिश्तेदार के लड़के को ब्राह्मणों ने मंगली बता दिया जिस के लिए मंगली लड़की की खोज शुरू हुई. बहुत कठिनाई से एक मंगली लड़की मिली. शादी हुई और अब आलम यह है कि लड़की घर वालों की नाक में दम किए हुए है. उस लड़की का स्वभाव बहुत ही रूखा है. वह किसी का कहना नहीं मानती और अकसर मायके चली जाती है. मैं ने अपने रिश्तेदार से कहा था कि आप किसी जानकार की लड़की से शादी कीजिएगा, अच्छे खानदान की हो, सुसंस्कृत हो. मगर वे ‘मंगलामंगली’ के चक्कर में अनजान परिवार में लड़के की शादी कर के अब पछता रहे हैं. सारा परिवार चिंतित है कि अब आगे क्या होगा?            

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

यह भी खूब रही

समाचारपत्र में छपे वैवाहिक विज्ञापनों को देख कर मेरी चाचीजी ने अपनी बेटी के विवाह के बारे में बात करने को फोन नंबर मिलाया. दूसरी ओर से लड़के की मां बोल रही थीं. कुछ देर बेटे की शिक्षा आदि के बारे में जानकारी ली. एक ही शहर में होने के कारण बेटे की मां ने कहा, ‘‘आप लोग हमारे घर आ जाइए.’’ और वे पता बताने लगीं. इस पर मेरी चाचीजी बोलीं, ‘‘वहां पर हमारी बहन भी रहती है.’’
वे नाम पूछने लगीं. नाम सुन कर फोन पर वे हंसीं और बोल उठीं, ‘‘अरे, छोटी तू है, तभी तेरी आवाज जानीपहचानी लग रही थी.’’ अब तक चाचीजी भी कहने लगीं, ‘‘अरे दीदी, आप हैं. वाह, यह भी खूब रही.’’
स्वाति पटेल, कानपुर (उ.प्र.)

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हम तीनों बहनें, भैया के साथ इंडियन हिस्ट्री कांगे्रस का सैशन अटैंड करने मैसूर जा रहे थे. भैया, जोकि बहुत मजाकिया हैं, जब भी कोई विशेष चीज नजर आती, हम सब से कहते, ‘देखोदेखो.’
सफर मजे से कट रहा था. तभी भैया अचानक जोर से चिल्लाए, ‘‘देखोदेखो ट्रेन की पूंछ.’’
हम सब खिड़की की तरफ लपके. हमें देख कर भैया हंसने लगे. तभी हम ने देखा कि हमारे पूरे कंपार्टमैंट के यात्री खिड़कियों से बाहर झांक रहे थे. उन्हें देख हम हंसतेहंसते लोटपोट हो गए. सभी यात्रियों के चेहरे देखने लायक थे.
हुआ यों कि किसी मोड़ पर ट्रेन के पीछे का हिस्सा दिख रहा था, उसे ही भैया ने पूंछ कहा था.

नेहा प्रधान, कोटा (राज.)

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मेरे पति डाक्टर हैं. एक दिन हम लोग बड़ी दीदी को देखने उन के घर गए. दीदी इन से बोलीं कि उन की स्टिक एक जगह से टूट गई है, उसे ठीक करा दें. इन्होंने देखा और बोले कि यह तो अभी ठीक हो जाएगी. बस, आप जरा नौकर को भेज कर एरलडाइट की ट्यूब मंगा दें. मैं अभी जोड़ दूंगा. उन्होंने नौकर हरिराम को बुला कर कहा कि दौड़ कर जाओ और यह ट्यूब ले आओ. नाम थोड़ा कठिन था तो इन्होंने एक परचे पर लिख कर दे दिया. एक घंटा तक हरीराम नहीं आया. देर हो जाने के कारण हम निकलने को ही थे कि देखा, हरिराम सिर झुकाए खड़ा है. दीदी ने डांटा कि इतनी देर कहां लगा दी और ट्यूब कहां है?
हरिराम रोंआसा हो कर बोला, ‘‘सारी दवा की दुकानें देख डालीं, यह कहीं न मिली.
जैसे ही उस ने ‘दवा की दुकान’ कहा, हम सारी बात समझ गए. फिर तो हंसी का जो दौर शुरू हुआ कि देर तक सब हंसते रहे. उसे जाना था हार्डवेयर की दुकान पर, पहुंच गया कैमिस्ट के पास.

सुश्रुता श्रीवास्तव, भोपाल (म.प्र.)

महायोग : पांचवीं किस्त

अब तक की कथा :

फोन पर बात कर के यशेंदु संतुष्ट नहीं हो सके. आखिर उन की बेटी के भविष्य का प्रश्न उन के समक्ष अधर में लटक रहा था. मन में संदेह के बीज पड़ चुके थे. बेटी का चिड़चिड़ापन उन्हें प्रताड़ना दे रहा था. उन्होंने लंदन जा कर अपने संदेह का निराकरण करना चाहा. मानसिक तनाव व द्वंद्व में घिरे यशेंदु कार पार्क कर के सड़क पार करते समय ट्रक की चपेट में आ गए.

अब आगे…

पूजापाठ, ग्रहनक्षत्र, शुभअशुभ सब पंडितों से पूछ कर ही तो घर के सारे काम होते थे, फिर यशेंदु के साथ ऐसा अनिष्ट क्यों हुआ? कामिनी अब मांजी से इस सवाल का क्या जवाब मांगती. पंडितों ने तो उन की आंखों पर ऐसी पट़्टी बांध दी थी जिस के पार वह कुछ नहीं देख सकती थीं. लेकिन कामिनी  उस पार की तबाही साफ देख रही थी. ट्रक ड्राइवर के ब्रेक लगातेलगाते यशेंदु ट्रक से टकरा कर लगभग 4-5 फुट दूर जा गिरे और बेहोश हो गए.

यशेंदु की ट्रक से दुर्घटना की खबर डाक्टर द्वारा घरवालों को मिली तो वे घबरा गए. वे शीघ्रातिशीघ्र अस्पताल पहुंच गए. वहां कई लोग मौजूद थे.

‘‘कैसे हुआ यह सब?’’ सेठ ने अपने ड्राइवर से पूछा.

‘‘साब, पता नहीं चला कहां से ये साहब अचानक ही ट्रक के सामने आ गए और मैं ब्रेक लगा पाऊं इतनी देर में तो ये ट्रक से टकरा कर लगभग 4-5 फुट ऊपर उछल कर गिर कर बेहोश हो गए,’’ ड्राइवर को बहुत अफसोस हो रहा था. लगभग 30 वर्ष से वह यह काम कर रहा था. अभी तक इस प्रकार की कोई दुर्घटना उस से नहीं हुई थी.

दिया का रोरो कर बुरा हाल था. दादी, कामिनी, नौकर सब इस दुर्घटना से जड़ से हो गए थे. दिया जानती थी कि पापा उसे अपने साथ लंदन ले जाने के लिए यह सब भागदौड़ कर रहे थे इसलिए उस का मन और भी व्यथित हो उठा. यह प्रसाद मिला पापा को दादी की इतनी पूजा का? उस का मन हाहाकार करने लगा. वह बहुत अभागी है. अपने पिता की दुर्घटना के लिए वही जिम्मेदार है. वैसे कहीं पर कुछ भी हो सकता है परंतु दिया को इसलिए यह बात बारबार कचोट रही थी क्योंकि यह सबकुछ वीजा औफिस के बाहर ही  हुआ था. उस के अनुसार, पापा को यह सब उस की चिंता के लिए ही भोगना पड़ रहा था.

कामिनी ने आंसूभरी आंखों से औपरेशन के फौरमैलिटी पेपर्स पर हस्ताक्षर कर दिए. उस के मस्तिष्क में मानो हथौड़ी की सी मार भी पड़ने लगी. अगर लड़के के घर में सगाई या विवाह के बाद बड़ी दुर्घटना हो जाती है तो लड़की के मुंह पर कालिख पोती जाती है. इस के पैर ऐसे हैं, यह घर के लिए शुभ नहीं है आदि. परंतु जहां लड़की के घर में इस प्रकार की कोई दुर्घटना हो जाए तो क्या लड़के को भी अपशकुनी माना जाता है?

लगभग 3 घंटे के औपरेशन ने घरभर के सदस्यों को हिला कर रख दिया था. ड्राइवर और उस का मालिक दोनों ही सहृदय, संवेदनशील थे, होंठ सिए हाथ जोड़ कर, सिर झुकाए चुपचाप सबकुछ सुनते रहे. 5-7 मिनट बाद कामिनी ने सास को औपरेशन थिएटर के बाहर पड़ी कुरसी पर बैठा दिया और ड्राइवर व उस के मालिक के सामने हाथ जोड़ कर उन्हें वहां से जाने का इशारा किया.

कामिनी व दिया दोनों के मन में बहुत स्पष्ट था कि यह दुर्घटना क्यों हुई होगी? वे कई दिनों से यश को बहुत अधिक असहज देख रही थीं. दिया तो अपने में ही सिमट कर रह गई थी परंतु कामिनी ने पति को समझाने का भरपूर प्रयास किया था. यश थे कि बेटी को देखदेख कर भीतर ही भीतर कुढ़ रहे थे. ऊपर से उन की मां ने घर में पंडितजी को बैठा कर पूजापाठ का नाटक कर रखा था. उन्हें कभी भी पूजाअर्चना में कोई परेशानी नहीं रही परंतु यह कुछ भी हो रहा था, वह उन की समझ से बाहर था और उन की सोच उन्हें यह समझने के लिए बाध्य कर रही थी कि घंटी बजाने से काम नहीं चलेगा, उन्हें कर्मठ होना होगा. एक ओर उन के मन में सवाल पनप रहा था कि मां ने तो दिया की जन्मपत्री कई बार मिलवाई और 90 प्रतिशत गुण मिलने के बावजूद यह सब घटित हो रहा था. समय दीप व स्वदीप भी शहर में नहीं थे.

औपरेशन थिएटर के बाहर कुरसियों पर तीनों शांत बैठे हुए थे. तीनों के मस्तिष्क में एक बात अलगअलग प्रकार से उमड़घुमड़ रही थी. अचानक न जाने दिया को क्या हुआ, ‘‘दादी, आप हर चीज पंडितजी से ही पूछ कर करती हैं न? उन्होंने आप को यह नहीं बताया कि पापा पर ऐसा कोई ग्रह भारी है?’’

दादी के तो आंसू ही नहीं थम रहे थे. वे क्या उत्तर देतीं? इस उम्र में उन्हें बेटे का यह दुख देखना पड़ रहा था. इस पंडित के पिता ने जिंदगीभर उन के घर के लिए पूजाअर्चना की थी. दिया की दादी व दादाजी तो प्रारंभ से ही पंडितों के मस्तिष्क से ही चलते आए हैं. उन के द्वारा बताए हुए ग्रहों की शांति करवाना, जन्मपत्री मिलवाना व प्रतिदिन उन के द्वारा ही पूजाअर्चना करवाना. कामिनी के पिता ने अपने किसी भी बच्चे की जन्मपत्री नहीं मिलवाई थी फिर भी सब सुखी थे. उन्हें केवल कामिनी की ही जन्मपत्री मिलानी पड़ी थी और कामिनी ही जिंदगीभर इस घर के वातावरण में असहज बनी रही थी. दिया के साथ ये सबघटित तो हो ही रहा है साथ ही यश भी चपेट मेें आ गए. वह पंडित अभी भी घर पर बैठा घंटियां बजा कर भगवान को मनाने में लगा होगा.

दादी मन ही मन सोच रही थीं कि उन्हें अब कौन से जाप करवाने होंगे. यह एक लंबा दर्दीला घटनाक्रम बन गया था मानो. एक दुर्घटना का दर्द समाप्त भी नहीं हो पाता था कि दूसरी कोई दुर्घटना आ उपस्थित होती. कामिनी के लिए तो इस घर के प्रवेश का प्रथम दिवस ही दुर्घटना था बल्कि यह कहा जाए कि यश की सगाई का दिन ही दुर्घटना का दिन था. जिस पिता से वह यह अपेक्षा करती रही थी कि वे उसे किसी हताश स्थिति में डाल ही नहीं सकते उसी पिता ने उसे कहां से उठा कर कहां

पहुंचा दिया था.

बचपन में पिता रटाते थे-

वैल्थ इज लौस्ट, नथिंग इज लौस्ट,

हैल्थ इज लौस्ट, समथिंग इज लौस्ट,

इफ कैरेक्टर इज लौस्ट, एवरीथिंग इज लौस्ट.

ये पंक्तियां रटतेरटते कामिनी युवा हो चली थी. मध्यवर्गीय वातावरण में पलीबढ़ी कामिनी की विवाह के बाद बुद्धि में वृद्धि हुई और उस ने बड़ी शिद्दत के साथ यह महसूस किया था कि वैल्थ के बिना कोई पूछ नहीं है और जैसेजैसे वह इस वैल्दी घर का पुराना हिस्सा होती जा रही थी वैसेवैसे उस की यह भावना दृढ़ होती जा रही थी. कितना मानसम्मान था उस की ससुराल का इतने बड़े शहर में कि वह स्वयं को बौना महसूस करती थी. इतनी कि उस के मुख के बोल भी ‘जी हां’ और ‘जी नहीं’ तक सिमट कर रह गए थे. फिर वह इस सब की आदी हो गई थी और प्रात:कालीन मंत्रोच्चार उस के मुख से निकल कर केवल उस की आत्मा के ही साक्षी बन कर रह गए थे.

घर का संपूर्ण वातावरण सुबहसवेरे पंडितजी की घंटियों की मधुर ध्वनि से नहा उठता था. धीरेधीरे घंटियों के साथ हर घड़ी घर में पंडितों की नाटकीय आवाजें व फुसफुसाहटें सुनाई देने लगीं तब वह और अधिक सहज होती गई. उस ने पंडितों को मंत्रोच्चार करते हुए अकसर हंसीठिठोली करते देखा था. जैसे ही वहां घर का कोई सदस्य पहुंचता वे जोरजोर से मंत्रोच्चार करने लगते. अच्छे पल भी आए थे कामिनी के जीवन में जब उस ने 3 शिशुओं को जन्म दिया था. वास्तव में कामिनी को 2 बेटों के जन्म के बाद किसी तीसरे की कोई इच्छा ही नहीं थी परंतु घर में 1 बेटी की चाह ने पूरे वातावरण में मानो नाराजगी भर रखी थी. बेटी की चाह भी किस लिए क्योंकि 2-3 पीढि़यों से परिवार में कोई बेटी नहीं थी और इस परिवार के बुजुर्गों की कन्यादान करने में रुचि थी. पंडितजी ने उस के सासससुर के मस्तिष्क में कन्यादान की महत्ता इस कदर भर दी थी कि कन्यादान न किया तो उन का जीवन व्यर्थ था. और पंडितजी का गणित तो बिलकुल स्पष्ट था ही कि यशेंदुजी के हाथ की लकीरों में कन्या का पिता बनना स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो रहा था. सो, कामिनी के तीसरा शिशु कन्या हुई.

न जाने क्यों कामिनी इस बात से भयभीत सी रहती थी कि इतनी लाड़प्यार से पली उस की बिटिया एक दिन दूसरे के घर चली जाएगी उस का मनउपवन खाली कर के. वह भी तो आई थी, ठीक था, परंतु इतनी शीघ्रता से यह सब होगा और इस प्रकार होगा, इस के लिए उस का मन तैयार न था. हुआ वही जो घर के बुजुर्ग ने चाहा और परिवार के सब सदस्य यह होना देखते रहे.

अस्पताल में आईसीयू के बाहर सोफे पर बैठेबैठे न जाने मांजी की वृद्ध काया कब सोफे के हत्थे पर लटक सी गई थी. झुर्री भरे मुख पर आंसुओं की गहरी लकीरें किसी झील में कंकर फेंकने पर लहरों की भांति टेढ़ीमेढ़ी हो कर चिपक सी गई थीं. कामिनी ने सास को बड़ी करुणापूर्ण दृष्टि से देखा और उस के नेत्र फिर से भर आए. मां बुरी बिलकुल न थीं, उन्होंने अपने हिसाब से उसे प्यार भी बहुत दिया था परंतु उन की सोच थी जिस ने सारे वातावरण पर अपनी मुहर चिपका रखी थी. उन का अंधविश्वास और सर्वोपरि समझने की भावना ने पूरे वातावरण पर अजीब से पहरे बिठा दिए थे.

कितनी बार सोचा था कामिनी ने, समय के अनुसार प्रत्येक में बदलाव आते हैं परंतु उन की सोच व तथाकथित परंपराओं में बदलाव क्यों नहीं आ पा रहे थे? यदि पत्थर पर भी बारबार कोई चीज घिसी जाए तो वहां भी गड्ढा हो जाता है परंतु मां… थोड़ी देर में डाक्टर आए और उन के पास ही सोफे पर बैठ गए, ‘‘मांजी, रोने से तो कुछ हो नहीं सकता? आप तो कितनी समझदार हैं.

‘‘नर्स,’’ डाक्टर ने समीप से गुजरती हुई नर्स को आवाज दी. नर्स रुक गई.

‘‘मांजी को आईसीयू के बाहर से जरा यशेंदुजी को दिखा दो, जिन का आज औपरेशन हुआ है.’’

‘‘यस, डाक्टर,’’ नर्स उन्हें सहारा दे कर आईसीयू की ओर हाथ पकड़ कर धीरेधीरे चल पड़ी.

डाक्टर खड़े हो गए और कामिनी से बोले, ‘‘एक्चुअली मिसेज कामिनी, आय वांटेड टू डिसकस सम इंपौर्टेंट इश्यू विद यू.’’

– क्रमश:

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