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Hindi Satire Story : वास्तु और मेरा घर – श्रीमतीजी की जिद के आगे मुझे घुटने टेकने ही पड़े

Hindi Satire Story : मकान बनाना कितनी बड़ी बला है यह तो वही जान सकता है जिस ने बनवाया हो. लोगों के जीवन में बड़ी मुश्किल से यह दिन आ पाता है. इतने सारे पापड़ बेलना हर किसी के बस की बात नहीं है. पर आदमी दूसरों को बनवाता देख कर हिम्मत कर बैठता है और एक दिन रोतेधोते मकान बनवा ही लेता है.

ऐसा ही मेरे साथ हुआ. एक दिन मेरी पत्नी ने सुबहसुबह एक गृहप्रवेश कार्ड मेरे सामने रख दिया. मेरे एक रिश्तेदार ने नया मकान बनवाया था. उसी खुशी में वह पार्टी दे रहा था. शाम को वहां जाना था.

‘‘देखिए, अब बहुत हो गया. मेरा शाम को कहीं जाने का मन नहीं है,’’ श्रीमतीजी तल्ख लहजे में बोलीं.

मैं ने उन के नहीं जाने के निर्णय को बहुत हलके से लिया, ‘‘हां, वैसे आजकल पक्का खाना नहीं खाना चाहिए. वाकई अब इस उम्र में इन चीजों का ध्यान भी रखना चाहिए.’’

पर यह क्या, मेरी इस बात पर तो वह बादल की तरह फट पड़ीं, ‘‘यह क्या, बस तुम्हें हर बात पर मजाक सूझता रहता है. मैं ने तो फैसला कर लिया है कि मैं अब किसी के गृहप्रवेश में तब तक नहीं जाऊंगी जब तक तुम मुझे एक प्यारा सा मकान नहीं बनवा कर दे दोगे.’’

मुझे बस चक्कर ही नहीं आया, ‘‘यह तुम कैसी बात कर रही हो. अरे, मूड खराब है तो शाम को चल कर एक साड़ी ले लेना. लेकिन कम से कम ऐसी बात तो मत करो जिसे सुन कर मुझे हार्टअटैक आ जाए.’’

श्रीमती के तेवर देख कर लगता था कि बात बहुत आगे बढ़ चुकी है. अब आसानी से केवल साड़ी पर सिमटने वाली नहीं थी. जब भी किसी का मकान बनता तो वह ऐसी फरमाइश कर बैठती थीं. उन्होंने थोड़ाबहुत इतिहास भी पढ़ा हुआ था अत: कह बैठती थीं, ‘‘देखो, शाहजहां ने अपनी बेगम के लिए ताजमहल बनवाया था. क्या तुम मेरे लिए एक अदद मकान नहीं बनवा सकते.’’

यहां मैं चुप रह जाता था. हालांकि चाहता तो मैं भी बता सकता था कि शाहजहां ने उस के जीतेजी कोई ताजमहल नहीं बनवाया था. जब मुमताज नहीं रही तब जा कर वह ऐसा कर पाया था. पर यह कहने पर एक युद्ध की संभावना और हो सकती थी इसलिए चुप रहने में ही भलाई थी.

बात जब इस स्तर पर पहुंच जाए तो कोई न कोई समाधान निकलना आवश्यक होता है. सो जल्दी ही यह बात मिलनेजुलने वालों तक पहुंच गई कि मैं मकान बनवाने वाला हूं.

मकान को ले कर लोगों ने अलगअलग सलाह दी. मुझे लगता है कि मुझे बनाबनाया मकान ले लेना चाहिए क्योंकि मकान बनवाने में उठाई जाने वाली मुसीबतों के नाम से ही मुझे बुखार आने लगता था. पर चूंकि मेरी बीवी के पिताजी यानी कि मेरे ससुर साहब का यही मानना था कि आदमी को जमीन खरीद कर ही मकान बनवाना चाहिए तो फिर भला मेरे तर्क कितनी देर चलते. अब प्लाट की खोज शुरू हुई और फिर जैसेतैसे एकमत हो कर एक प्लाट का चयन कर लिया गया.

प्लाट खरीदने वाला आदमी यही सोचता है कि वह आधी लड़ाई जीत चुका है, लेकिन यह मात्र उस का खयाली पुलाव ही होता है क्योंकि अभी तो उसे मकान बनाने की तकलीफदेह प्रक्रिया से गुजरना होता है और वही मेरे साथ भी हुआ. लेकिन बात यहीं तक सीमित होती तो कोई बात नहीं थी. असली परेशानी तो तब शुरू हुई जब मकान के निर्माण ने गति पकड़ी. मकान आधा बन चुका था. तभी एक दिन मेरी पत्नी ने मुझ से कहा, ‘‘आज तुम जरा आफिस से जल्दी घर आ जाना, मैं ने शर्माजी को बुलवाया है.’’

मैं चक्कर में पड़ गया, ‘‘यह शर्माजी कौन हैं. क्या कोई नए ठेकेदार हैं. तुम तो अभी इसी ठेकेदार को चलने दो.’’

वह नाराज हो गईं, ‘‘एक तो आप की आदत खराब है. पूरी कोई बात नहीं सुनते. वह कोई ठेकेदार नहीं हैं. वह तो बहुत पहुंचे हुए आदमी हैं. बहुत बड़े वास्तुकार हैं. मैं ने सोच लिया है, आजकल सभी लोग वास्तु के बिना कोई काम नहीं करते. मैं ने भी उन्हें बुलवाया है. उन के पास तो टाइम नहीं है. बड़ी मुश्किल से राजी हुए हैं.’’

मैं ने सोचा, चलो आज देख लेते हैं फिर टाल देंगे. मुझे तो पहले ही इन चीजों में कोई विश्वास नहीं है. आदमी कर्म करे, ईमानदारी से जीवन व्यतीत करे, समाज, परिवार व देश के प्रति जिम्मेदारी भलीभांति निभाए. बस, जीवन अपनेआप ठीकठाक निकल जाता है.

शाम को जल्दी घर आ गया. एक सज्जन मेरा इंतजार कर रहे थे. झूलती हुई दाढ़ी, माथे पर लंबा तिलक, गले में बड़ेबड़े मनकों की मालाएं, सभी उंगलियों में विभिन्न प्रकार की अंगूठियां पहनी हुईं. मुझे लगा किसी आश्रम से चंदा वगैरह लेने पधारे हैं.

मैं ने सोचा, इस से पहले कि श्रीमतीजी कुछ देनेलेने का वादा कर लें, इसे भगा दूं सो बोल पड़ा, ‘‘देखिए, हम लोग इन पाखंडों में विश्वास नहीं करते हैं. हमें जो भी देना होता है हम किसी सामाजिक संस्था को दे देते हैं. इसलिए आप हमें तो क्षमा कर ही दें.’’

मेरी इस बात से वह सज्जन नाराज हो गए. तभी मेरी आवाज सुन कर श्रीमतीजी बाहर निकल आईं, ‘‘क्या बकवास लगा रखी है. मैं ने इन्हें बुलवाया है.’’

वह सज्जन मुझे क्रोध भरी नजरों से देखने लगे. मैं ने नजर दूसरी ओर कर ली तो उधर श्रीमती की निगाहें अंगारे बरसा रही थीं, ‘‘माफ कीजिए, दरअसल यह आप को जानते नहीं हैं. पता है, शर्माजी बहुत बड़े वास्तु विशेषज्ञ हैं. इन्हें तो बिलकुल भी समय नहीं मिलता. बड़ेबड़े लोग इन से मकान के बारे में राय लेते हैं, तुम भी बस…’’ लानत उलाहना देते श्रीमतीजी बोलीं.

मैं निसहाय सा उन के पीछेपीछे चल दिया. थोड़ी ही देर में मकान पर पहुंचा. मैं अपने मकान पर बहुत मेहनत कर रहा था. मेरा आर्किटेक्ट बहुत अच्छा था. मैं ने स्वाभाविक रूप से अपनी निगाह प्रशंसा पाने के लिए उन के चेहरे पर जमा दी. पर यह क्या, उन का मुखमंडल तो मानो जड़ हो गया.

‘‘भई, यह क्या किया आप ने. एक तो दरवाजा ही गलत दे दिया. आप के दोनों ओर दरवाजे का विकल्प था, पर आप ने दरवाजा दक्षिण में क्यों दिया, उत्तर में क्यों नहीं.’’

‘‘देखिए, उत्तर की ओर दुकानें बनी हुई हैं. वहां भीड़भाड़ अधिक रहती है. उधर दरवाजा खोलने पर शोरशराबा अधिक रहता है.’’

‘‘पर भई, यह तो गजब हो गया. यह नहीं चल सकता. आप को इधर दरवाजा तुड़वाना पड़ेगा और यह क्या, आप ने रसोई उधर रख दी. यह तो 3 कोण पर निर्मित है, इसे तो बदलवाना ही पड़ेगा. बेडरूम इधर शिफ्ट करना पड़ेगा.’’

मैं धम से जमीन पर बैठ गया. अगर इतनी तोड़फोड़ हुई तो 50 हजार रुपए बेकार हो जाएंगे और समय भी अधिक लग जाएगा. जैसेतैसे उन्हें निबटा कर घर आया तो पत्नी ने 5 हजार रुपए मांगे. मैं तो आसमान से जमीन पर आ गिरा.

‘‘5 हजार…’’ मेरे मुंह से निकला.

शर्माजी को कुछ अच्छा नहीं लगा.

‘‘देखिए, यह तो डिस्काउंट रेट है, वरना मैं 15 हजार से एक पैसा कम नहीं लेता.’’

क्या करता, बुझे मन से 5 हजार दिए. शर्माजी के विदा होते ही श्रीमतीजी मुझ पर चढ़ बैठीं, ‘‘क्या है… बिलकुल भी तमीज नहीं है. कितनी मुश्किल से तैयार किया था. छोटीमोटी जगह तो शर्माजी जाते ही नहीं हैं. कितने नेताअभिनेता उन की एक विजिट के लिए चक्कर लगाते रहते हैं.’’

पर बात केवल लड़ने तक ही सीमित रहती तो चल जाती. वह तो शर्माजी की कही हुई बातों पर अड़ गईं.

‘‘देखो, तुम मुझे मत टोको. शर्माजी बहुत पहुंचे हुए हैं. उन की सारी बातें बिलकुल सच निकलती हैं. गर हम ने नहीं मानीं, तो अनिष्ट ही हो जाएगा.’’

मैं ने श्रीमतीजी की बातों का बहुत विरोध किया. बहुत लड़ाझगड़ा भी पर अनिष्ट का भूत उन के दिमाग पर इस कदर सवार था कि वह मानी ही नहीं, फिर घर वाले भी उन के साथ हो लिए.

मकान में टूटफूट होती रही. मैं भारी मन से सब देखता रहा. देखतेदेखते बजट से 60 हजार रुपए और निकल गए. जब सारा काम पूरा हुआ तो मैं ने चैन की सांस ली कि चलो, इतने में ही निबटे. पर अभी थोड़े दिन ही निकले थे कि एक दिन मैं ने शर्माजी को फिर अपने घर में पाया. एक बार फिर वह सब के साथ मकान पर गए, मकान में 10 दोष गिना दिए. नतीजे में फिर टूटफूट हो गई और फिर हजारों रुपए का खर्चा हुआ और इन सब से बड़ी दुख की बात तो यह हुई कि 5 हजार रुपए फिर शर्माजी को देने पड़े.

यह प्रक्रिया यहीं रुक जाती तो ठीक था, पर अफसोस, ऐसा नहीं हो पाया. शर्माजी का अनवरत आनाजाना लगा रहा. मकान के निर्माण में कई तरह के दोष हो जाते, फिर टूटफूट हो जाती और शर्माजी की जेब में एक मोटी रकम चली जाती.

इन सब बातों का फर्क यही पड़ा कि एक दिन मकान का निर्माण कार्य ओवरबजट होने के कारण बंद हो गया. जितने भी लोन मैं ले सकता था, मैं ने ले लिए थे. अब कोई जगह बाकी नहीं रह गई थी.

मकान मालिक, जो मेरे जल्दी मकान खाली करने के वादे को पूरा होते देख खुश था, वह हकीकत जान कर नाराज रहने लगा.

लगातार होती टूटफूट ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा. जिस बजट में मकान पूरा हो सकता था वह बजट पहले ही पूरा हो गया. मैं श्रीमतीजी पर भी नाराज होता था लेकिन वह भी चुपचाप रह जाती थीं.

ऐसे ही एक रविवार को घर पर बैठे हुए थे कि शर्माजी घर आ गए. उन्हें देखते ही मेरा पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, ‘‘शर्माजी, अब हमें किसी वास्तुशास्त्र की जरूरत नहीं है. वास्तु के चक्कर में पड़ कर मेरा तो मकान ही अधूरा रह गया.’’

शर्माजी हंसने लगे, ‘‘चिंता मत कीजिए, भाई साहब. मैं यहां वास्तुदोष बताने नहीं आया. मैं अपने गृहप्रवेश का न्योता देने आया हूं. शाम को पधारिएगा. खाना भी वहीं है,’’ कह कर वह चले गए.

मन तो नहीं था पर फिर शाम को यही सोच कर चले गए कि शाम को खाना तो नहीं बनाना पड़ेगा.

वहां जा कर देखा तो श्रीमतीजी की आंखें फटी की फटी रह गईं. शर्माजी ने बहुत भव्य मकान बनवाया था. पूरे मकान को देख कर यही लग रहा था कि उस में बहुत पैसा खर्च हुआ है.

श्रीमतीजी ने दबे स्वर में पूछ ही लिया, ‘‘शर्माजी, इस में तो बहुत खर्चा आया होगा.’’

शर्माजी हंसने लगे, ‘‘हां, बहनजी, प्लाट के अलावा 20 लाख रुपए खर्च हुए हैं. मेरी तो बिसात ही क्या थी, आप जैसे भक्त लोगों के सहयोग से यह कार्य पूरा हो पाया. हां, आप के मकान का काम कैसा चल रहा है. आप लोग कब शिफ्ट हो रहे हैं. मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताइएगा.’’

उन की बात सुन कर पत्नी का चेहरा उतर गया, लेकिन फिर धीरेधीरे चेहरे की रंगत बढ़ी और फिर जो उस ने कहा, वह मेरे लिए अप्रत्याशित था.

‘‘हां, आप बिलकुल सही कह रहे हैं. हमारे जैसे बेवकूफों के सहयोग से ही यह कार्य संपन्न हुआ है. आप ने अंधविश्वास के जाल में फंसा कर हमारा घर तो बनने नहीं दिया, पर अपनी झोली भर कर अपना उल्लू सीधा कर लिया. सेवा बस इतनी सी है कि आप भूल कर भी हमारे घर की ओर रुख मत करिएगा. आज आप की बातों में नहीं आते तो हम अपने घर में रह रहे होते.’’

इतना कह कर श्रीमतीजी ने मेरी ओर देखा. मुझे भी लगा कि उन के कहने से मेरे दिल पर छाया एक बड़ा बोझ उतर गया था.

हम दोनों बाहर निकल आए. हालांकि मुझे इतना बड़ा नुकसान झेलना पड़ा था पर इस बात की खुशी थी कि अंतत: मेरी श्रीमतीजी इन सब चीजों से बाहर तो निकल आई थीं. Hindi Satire Story :

Hindi Family Story : क्यों आंसुओं का कोई मोल नहीं – आखिर क्या हुआ था मार्गरेट के साथ ?

Hindi Family Story : कोमल एहसासों की चादर में लिपटी मारिया अपने आज और आने वाले कल की खुशियों को धीमधीमे खुद में समेटने की कोशिश में जुटी थी. आज वह बहुत खुश थी. पूरे 3 साल बाद उस की बेटी मार्गरेट अमेरिका से पढ़ाई पूरी कर जयपुर लौट रही थी. डैविड की असमय मृत्यु के 5 सालों बाद मारिया दिल से खुशी को जी रही थी. मार्गरेट तो वैसे भी घर की जान हुआ करती थी. उस की हंसी और खुशमिजाज स्वभाव से तो सारा घर खिल उठता था. उस के अमेरिका चले जाने के बाद घर बिलकुल सूना सा हो गया था. मारिया यह सोच खुश थी कि उस के घर की रौनक लौट रही है. उस की खुशी का अंदाजा लगाना मुश्किल था.

न्यूयौर्क जाने से पहले मार्गरेट ने मारिया को धैर्य बंधाते हुए कहा था, ‘‘मां, मैं तुम्हारी बहादुर बेटी हूं और तुम्हारी ही तरह आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं. आने वाले दिनों में तुम्हें मुझ पर गर्व होगा.’’ तब मारिया ने अपनी आंखें बंद कर मन ही मन कामना की थी बेटी की सारी इच्छाएं पूरी हों.

डैविड की 5 साल पहले एक ऐक्सीडैंट में असमय मौत हो गई थी. यों अचानक बीच रास्ते में साथी का साथ छूट जाना कितना तकलीफदेह होता है, इस बात को केवल वही समझ सकता है जिस के साथ यह घटित होता है. डैविड के जाने के बाद 2 बेटियों की परवरिश और घर चलाने का पूरा जिम्मा मारिया पर आ गया था. यह अच्छी बात थी कि मारिया भी डैविड के बिजनैस में अपना योगदान देती थी. उन का गारमैंट्स ऐक्सपोर्ट का बिजनैस था, जो बहुत अच्छा चल रहा था. इसीलिए डैविड की असमय मृत्यु के बाद मारिया को उतनी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा जितना कि एक नौनवर्किंग महिला को करना पड़ता है. पर अकेले व्यापार और घर संभालना आसान भी नहीं था. फिर बेटियां भी छोटी ही थीं.

तब बड़ी बेटी मार्गरेट 10वीं कक्षा में पढ़ रही थी और छोटी बेटी ऐंजेल 8वीं कक्षा में. उस समय मार्गरेट अपनी मां का सहारा बनी. परिस्थितियों ने अचानक उसे परिपक्व बना दिया. अपनी पढ़ाई के साथसाथ घर के कामों में मां का हाथ भी बंटाने लगी. मार्गरेट पढ़ाई में बहुत होशियार थी. 2 साल बाद 12वीं कक्षा में स्कूल में टौप किया था और एक टेलैंट सर्च कंपीटिशन में उसे स्कौलरशिप मिली थी न्यूयौर्क यूनिवर्सिटी से बिजनैस की पढ़ाई के लिए.

हालांकि मारिया नहीं चाहती थी कि मार्गरेट पढ़ने के लिए सात समंदर पार जाए, पर बच्चों की जिद और उन के सपनों के लिए अपनी सोच से डर को रुखसत करना ही पड़ता है. हर मातापिता यही चाहते हैं कि उन के बच्चे खूब पढ़ेंलिखें और आगे बढ़ें. मारिया ने भी आखिरकार रजामंदी दे दी. मारिया की एक कजिन सुजन अमेरिका में ही रहती थी. अत: एक भरोसा था कि कोई जानने वाला वहां है जो जरूरत के समय काम आ जाएगा और यह भी कि मार्गरेट को भी घर जैसा फील चाहिए हो तो वह सुजन के घर जा सकती है. मारिया ने सुजन से बात कर अमेरिका के विषय में काफी जानकारी ले ली थी. उसे यह जान कर खुशी हुई थी कि वहां पढ़ाई का बहुत उच्च स्तर है जो मार्गरेट के भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा. अत: 3 साल का समय किसी तरह दिल पर पत्थर रख कर बिता दिया.

मार्गरेट की फ्लाइट शाम को 5 बजे लैंड होने वाली थी. मार्गरेट के इंतजार में एअरपोर्ट पर जैसे मारिया को 1-1 पल भारी पड़ रहा था. इंतजार का वक्त खत्म हुआ और मार्गरेट एअरपोर्ट से बाहर निकल मारिया केसामने आ खड़ी हो गई. पर मानो मारिया के लिए उसे पहचान पाना मुश्किल सा था. सामने कोई मुसकराता चेहरा न था. मार्गरेट का चेहरा मायूसी से भरा था. आंखों के नीचे काले गड्ढे हो गए थे. मुसकराहट तो चेहरे से लापता थी. सामने जैसे कोई हड्डी का ढांचा खड़ा हो.

मारिया ने जैसेतैसे खुद को संभाला और मार्गरेट को गले से लगाते हुए कहा, ‘‘कैसी है मेरी बच्ची? बहुत दुबली हो गई है.’’ मार्गरेट ने बहुत धीमे स्वर में कहा, ‘‘ठीक हूं और जिंदा हूं.’’

न उस के चेहरे पर कोई खुशी का भाव था और न ही दुख का. एक बेजान चेहरा. कुछ क्षणों के लिए जैसे मारिया के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो, फिर खुद को संभालते हुए उस ने प्यार से मार्गरेट के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘‘चलो, घर चलें. ऐंजेल तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रही होगी.’’

मारिया ने गाड़ी में सामान रखवा कर गाड़ी घर की तरफ मोड़ दी. पूरा रास्ता मार्गरेट चुप बैठी एकटक लगाए कार की खिड़की से बाहर देखती रही.

मारिया को कई सवालों ने घेर लिया था. उसे मार्गरेट की चुप्पी खाए जा रही थी पर चाह कर भी उस ने मार्गरेट से कुछ नहीं कहा और न ही कुछ पूछा. उसे लगा हो सकता है लंबे सफर की वजह से थक गई हो या फिर 3 सालों के फासले ने उसे कुछ बदल दिया हो. दिमाग सवालों की एक माला पिरोता जा रहा था पर जवाब तो सारे मार्गरेट के पास थे. यही सब सोचतेसोचते मारिया मार्गरेट को ले कर घर पहुंच गई. कार का हौर्न बजाते ही ऐंजेल बुके लिए दरवाजे पर खड़ी थी. मार्गरेट कार से धीमी गति से उतरी, एकदम सुस्त. ऐंजेल दौड़ कर उस के पास पहुंची और चिल्लाते हुए बोली, ‘‘वैलकम होम दीदी… आई मिस्ड यू सो मच.’’

पर मार्गरेट के चेहरे पर न कोई खुशी, न कोई उत्साह और न कोई उल्लास था. जब मार्गरेट ने उसे कोई उत्साह नहीं दिखाया तो ऐंजेल थोड़ी मायूम हो गई. बोली, ‘‘क्या दीदी, तुम मुझ से 3 साल बाद मिल रही हो और तुम्हारे चेहरे पर कोई खुशी नहीं है.’’

मारिया ने ऐंजेल को समझाते हुए कहा कि मार्गरेट सफर से थकी हुई है. तुम इसे परेशान न करो. इसे आराम करने दो… बाद में बातें कर लेना.’’ ऐंजेल ने एक अच्छी बच्ची की तरह मां की बात मान ली. कहा, ‘‘चलो दीदी, मैं तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखा दूं. मैं ने और मां ने उसे तुम्हारी पसंद से सजाया है.’’

कमरा बहुत खूबसूरती और करीने से सजा था. टेबल पर गुलाब के फूलों का गुलदस्ता था और मार्गरेट की पसंदीदा बैडशीट जिस पर गुलाब के फूलों के प्रिंट थे बिस्तर पर बिछी थी. मार्गरेट की फैवरिट कौर्नर की स्टडी टेबल पर फूलों से लिखा था- वैकलम होम. मार्गरेट जैसे ही कमरे में दाखिल हुई जोर से चिल्ला उठी, ‘‘आई हेट फ्लौवर्स,’’ और फिर गुलदस्ता जमीन पर पटक दिया. चादर को भी उठा कर एक कोने में सरका दिया, फिर अपना सिर पकड़ वहीं बैड पर बैठ गई.

मार्गरेट का यह रूप देख मारिया और ऐंजेल डरीसहमी एक कोने में खड़ी हो गईं. मारिया को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. बहुत हिम्मत जुटा कर वह मार्गरेट के पास पहुंची और फिर उस के सिर पर हाथ सहलाते हुए बोली, ‘‘मार्गरेट, तुम आराम करो, सफर में थक गई होगी. थोड़ी देर बाद हम डिनर टेबल पर मिलते हैं,’’ और फिर मारिया ने ऐंजेल, जो सहमी सी एक कोने में खड़ी थी, को इशारे से वहां से जाने को कहा. फिर मार्गरेट को बिस्तर पर लिटा दिया. उसे चादर ओढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम आराम करो,’’ और कमरे से बाहर आ गई. डाइनिंगटेबल के पास बैठ बहुत परेशान हो मार्गरेट के विषय में सोचने लगी. उसे मार्गरेट के बदले स्वभाव के बारे में कुछ भी समझ नहीं आ रहा था.

फिर खयाल आया कि क्यों न सुजन से पूछे… हो सकता है वह कुछ जानती हो. अत: सुजन को फोन लगाया और यों ही बातोंबातों में जानने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘हैलो सुजन कैसी हो? तुम्हें इस वक्त फोन यह बताने के लिए कर रही हूं कि मार्गरेट घर पहुंच गई है. तुम्हें तहेदिल से शुक्रिया भी कहना था कि वहां परदेश में तुम ने मार्गरेट का खयाल रखा.’’ ‘‘नहीं मारिया शुक्रिया कहने की कोई जरूरत नहीं…मार्गरेट तो बहुत ही प्यारी बच्ची है और वह कभीकभार ही आती थी. पहले तो वह अकसर आती थी पर पिछले साल सिर्फ 1 बार ही आई थी और वह भी मेरे बुलाने पर,’’ सुजन बोली.

फिर कुछ इधरउधर की बातें कर मारिया ने थैंक्स कहते हुए फोन रख दिया. मारिया को सुजन से भी कुछ खास जानकारी न मिल सकी. अब वह और परेशान थी. तभी मार्गरेट के जोर से चिलाने की आवाज आई. मारिया दौड़ कर कमरे में पहुंची, मार्गरेट को देखा एक जगह सुन्न सी खड़ी रही. मार्गरेट अपने कपड़ों को अपने ही हाथों से नोचनोच कर अलग कर रही थी. बालों का एक गुच्छा जमीन पर पड़ा था. मार्गरेट की हालत और हरकतें कुछ पागलों जैसी थीं… मारिया ने खुद को फिर संभाला और मार्गरेट के पास जा उसे प्यार से सहलाने की कोशिश की तो मार्गरेट ने उस का हाथ झटकते हुए कहा, ‘‘डौंट टच मी,’’ और फिर जोरजोर से चिल्लाने लगी…

मार्गरेट की हालत देख कर मारिया को यह तो समझ आ गया था कि मार्गरेट किसी मानसिक समस्या से जूझ रही है. बड़ी मुश्किल से मारिया ने मार्गरेट को संभाला. किसी तरह खाना खिला उसे सोने के लिए छोड़ कमरे से बाहर गई. काफी रात हो चुकी थी, पर उस से रहा न गया. अपने फैमिली डाक्टर को फोन मिलाया और सारा ब्योरा देते हुए पूछा, ‘‘डाक्टर अमन बताएं मैं क्या कंरू? प्लीज मेरी मदद कीजिए. मैं ने अपनी बेटी को पहले कभी ऐसी हालत में नहीं देखा है.’’ डाक्टर ने धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘मेरे खयाल से डाक्टर राजन आप की मदद कर सकते हैं, क्योंकि वे साइकिएट्रिस्ट हैं. मेरे अच्छे दोस्त हैं. तुम्हारी मदद जरूर करेंगे…डौंट वरी… सब ठीक हो जाएगा. तुम्हारी कल की अपौइंटमैंट फिक्स करवा देता हूं.’’

मारिया ने डाक्टर का शुक्रिया करते हुए फोन रख दिया. फिर उसे कई सवालों ने घेर लिया. पूरी रात यही सोचती रही कि न्यूयौर्क में ऐसा क्या हुआ होगा जो मार्गरेट की ऐसी हालत हो गई… सोचतेसोचते अचानक खयाल आया कि जब मार्गरेट सैकंड ईयर में थी तब वीडियो चैट के दौरान उस ने अपनी एक सहेली से भी बात करवाई थी, जो अमेरिकन थी. शायद एमिली नाम था. तब शायद उस समय उस का नंबर भी लिया था. उसे यह भी याद आया कि पिछले साल मार्गरेट ने कभी वीडियो चैट नहीं किया. अकसर फोन पर ही बातें करती थी. ये सब सोचतेसोचते कब उसकी आंख लगी और कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला.

सुबह उठते ही सब से पहले मारिया ने एमिला का नंबर तलाशना शुरू किया. एक पुरानी डायरी में वह नंबर लिखा करती थी. उस में एमिली का नंबर लिखा मिल गया. इसी बीच डाक्टर की अपौइंटमैंट का समय हो गया. अत: मारिया ने एमिली को शाम को फोन लगाना उचित समझा, क्योंकि अमेरिका में तब रात होती है जब भारत में दिन होता है.

बड़ी मुश्किल से मार्गरेट तैयार हुई डाक्टर से मिलने को और वह भी यह कह कर कि मारिया को कुछ डिसकस करना है स्वयं के विषय में. डाक्टर अमन ने पहले ही डाक्टर राजन को पूरा ब्योरा दे दिया था.

मारिया जब डाक्टर मुखर्जी के रूम में मार्गरेट के संग दाखिल हुई तब डाक्टर राजन ऐसे मिले जैसे वह मारिया को पहले से जानते हों, ‘‘हैलो मारिया, कैसी हैं आप और अगर मैं गलती नहीं कर रहा तो यह आप बड़ी बेटी है मार्गरेट… एम आई राइट?’’ मारिया ने हां में सिर हिला दिया. बातोंबातों में डाक्टर ने बहुत सी जानकारी निकाल ली मार्गरेट के विषय में और उस के हावभाव, आचरण से यह साबित हो ही रहा था कि वह किसी तनाव से ग्रस्त है. यों ही मजाक करते हुए पहले मारिया का ब्लडप्रैशर लिया, फिर बाद में हंसते हुए कहा कि चलो मार्गरेट आज तुम्हारा भी बीपी चैक कर लिया जाए…

ऐसे ही बातोंबातों में डाक्टर ने एक प्रश्नावली मार्गरेट को भरने को कहा. दरअसल, यह कोई मामूली प्रश्नावली न हो कर एक साइकोलौजिकल टैस्ट था मार्गरेट के लिए. किसी तरह डाक्टर ने मार्गरेट का मूल्यांकन किया और फिर उसे बाहर बैठने को कहा. मार्गरेट के बाहर जाते ही उत्सुकता से मारिया ने पूछा, ‘‘क्या हुआ है मेरी बच्ची को… वह क्यों ऐसा बरताव कर रही हैं?’’

डाक्टर ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘मार्गरेट को ऐनोरेक्सिया और पार्शियल एपिलिप्स्या है.’’ मारिया ने इस बीमारी का नाम पहले कभी नहीं सुना था. कहा, ‘‘डाक्टर यह कौन सी बीमारी है और इसे कैसे हो गई? मेरी बच्ची ठीक तो हो जाएगी न?’’

डाक्टर ने हताश मन से कहा, ‘‘मैडिकल में इस बीमारी का कोई ठोस इलाज नहीं है. ठीक होने के चांसेज 30-35% ही हैं. यह बीमारी अकसर अत्यधिक स्ट्रैस या फिर लंबे समय तक किसी मानसिक तनाव से गुजरने से हो जाती है. आप चाहें तो मार्गरेट को कुछ दिनों के लिए यहां ऐडमिट करा सकती हैं.’’ मारिया ने सोचने का समय लेते हुए डाक्टर को धन्यवाद कहा और फिर एक उदासी को साथ लिए कमरे से बाहर आ गई. मन सवालों की गठरी के नीचे दबा जा रहा था. पर जवाब मिलें भी तो कहां से मिलें. मार्गरेट की अवस्था सवालों के जवाब देने लायक तो बिलकुल भी नहीं थी. इन्हीं सवालों में उलझी मारिया मार्गरेट को ले घर पहुंची और तुरंत एमिली को फोन मिलाने का निश्चय किया.

एमिली इस वक्त एकमात्र जरीया थी जहां से कुछ जानकारी मिलने की आशा थी. बहुत संकोच के साथ मारिया ने एमिली को फोन मिलाया. जाने क्या सुनने को मिलेगा बस यही विचार बारबार दिमाग में आ कर बेचैन कर रहा था. तभी बेचैनी को भेदती हुए एक आवाज कानों में पड़ी, ‘‘हैलो.’’

जवाब में मारिया ने भी, ‘‘हैलो,’’ कहा. एमिली ने पूछा, ‘‘मे आई नो हु इज औन

द लाइन?’’ मारिया ने कहा, ‘‘इज दिस एमिली औन द लाइन… दिस इज मारिया मार्गरेट्स मदर. डू यू रीमैंबर मार्गरेट?’’

‘‘ओह यस आई डू रीमैंबर मार्गरेट… हाऊ इज शी?’’ मारिया ने समय न गंवाते हुए झट मार्गरेट की स्थिति से अवगत कराते हुए पूछा, ‘‘डू यू हैव एनी आइडिया, व्हाट हैप्पंड विद मार्गरेट व्हैन शी वाज इन अमेरिका?’’

सवाल को सुन एमिली कुछ देर चुप रही. इधर मारिया की जान मानो हलक में अटकी हो. मारिया ने फिर अपना सवाल दोहराया. तब एमिली ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘यस आंटी, बट आई कांट टैल यू ओवर द फोन. यू नीड टु कम हियर… इट्स अ लौंग स्टोरी.’’

जवाब सुनते ही मानो मारिया के दिमाग में हजारों सवालों ने एक सुरंग का रूप धारण कर लिया हो, जहां सिर्फ अंधकार ही अंधकार हो, जहां से दूसरा छोर नजर तो आ रहा था पर पहुंच के बाहर सा लग रहा था. मारिया कुछ देर चुप सोचती रही कि आखिर क्या करे, फिर, ‘‘आई विल कौल यू लेटर… थैंक यू,’’ कह फोन रख दिया. एक तरफ मार्गरेट का दर्द और तकलीफ, तो दूसरी तरफ ऐंजेल की स्कूल की पढ़ाई, तीसरी तरफ बिजनैस की जिम्मेदारी तो चौथी तरफ घर…क्या संभाले और कैसे. पर इस चक्रव्यूह को किसी भी तरह तो भेदना ही था. अत: बहुत सोचविचार कर मारिया ने निर्णय लिया कि वह अमेरिका जाएगी.

अगले ही दिन मारिया ने वीजा के लिए तत्काल में आवेदन किया. 10 दिनों में यूएस का मल्टिपल ऐंट्री वीजा मिल गया. इन 10 दिनों में मार्गरेट को डाक्टर राजन के हौस्पिटल में दाखिल करवा दिया. हालांकि यह एक दिल पर पत्थर रख कर लिया जाने वाला निर्णय था पर लेना भी तो जरूरी था. जाने से एक दिन पहले ऐंजेल को डैविड की बड़ी सिस्टर जो जयपुर में ही रहती थी उन के पास छोड़ दिया ताकि उस का खयाल रखें और पढ़ाई में कोई नुकसान न हो. औफिस की सारी जिम्मेदारी डैविड के खास दोस्त और कंपनी के चार्टर्ड अकाउंटैंट उमेश को सौंप मारिया अब तैयार थी आगे की लड़ाई के लिए. फ्लाइट में मारिया सोच रही थी कि पता नहीं न्यूयौर्क पहुंच क्या सुनने और जानने को मिले. विमान में बैठे घर और बच्चों की चिंता से मन भारी हो रखा था. एअरपोर्ट पर सुजन मारिया का इंतजार कर रही थी.

सुजन को देखते ही मारिया उस के गले से लिपट गई. दोनों एकदूसरी से 10 साल बाद मिल रही थीं. एअरपोर्ट से सुजन का घर आधे घंटे की दूरी पर था. सुजन ने मारिया से कहा, ‘‘इतने सालों बाद अचानक तुम से मुलाकात होने पर बहुत खुशी हो रही है.’’ मारिया ने जवाब में कहा, ‘‘क्या बताऊं तुम्हें… मेरी तो दुनिया ही उलटपलट हो गई है.’’

रास्ते में मारिया ने सुजन को मार्गरेट के बारे में सब कुछ बता दिया, फिर बोली, ‘‘इसी सिलसिले में यहां मार्गरेट की दोस्त एमिली से मिलने आई हूं… जानना चाहती हूं कि क्या हुआ इन 3 सालों में, जिस ने मेरी हंसतीखिलखिलाती बच्ची के चेहरे से हंसी ही छीन ली है.’’ सुजन को यह सब जान कर बेहद दुख हुआ. उस ने मायूसी भरे स्वर में कहा, ‘‘काश मैं कुछ कर पाती… मैं तो यहीं थी पर मुझे कुछ मालूम ही नहीं चला.’’

अगली सुबह मारिया की मुलाकात एमिली से तय थी. पूरी रात मारिया ने एक भय के साए में बिताई कि न जाने सुबह क्या सुनने को मिले. मारिया एमिली के बताए पते पर पहुंच गई. रविवार का दिन था. एमिली की छुट्टी का दिन था. वह एक न्यूज एजेंसी में पत्रकार थी. एमिली और मार्गरेट एक ही कालेज में साथ पढ़े थे. एमिली ने जर्नलिज्म का कोर्स किया था और मार्गरेट ने मैनेजमैंट का. जर्नलिज्म का कोर्स करते हुए एमिली ने कामचलाऊ हिंदी भी सीख ली थी. दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी. एमिली ने मारिया को सोफे पर बैठने का आग्रह करते हुए कहा, ‘‘हैलो मारिया नाइस टु सी यू.’’

मारिया ने समय न गंवाते हुए सीधे एमिली से प्रश्न किया, ‘‘एमिली, आई हैव कम औल द वे टु नो अबाउट माई चाइल्ड मार्गरेट…प्लीज टैल मी इन डिटेल.’’ एमिली ने थोड़ी टूटीफूटी हिंदी में बताना शुरू किया, ‘‘वह मेरी रूममेट थी. हम एकदूसरे से काफी बातें शेयर करते थे. फर्स्ट ईयर तो हंसतेखेलते निकल गया. मार्गरेट ने कालेज में अपने अच्छे स्वभाव से अपनी बहुत अच्छी इमेज बना ली थी. वह पढ़ाई में तो होशियार थी ही, साथ ही ऐक्स्ट्रा ऐक्टिविटीज में भी.

‘‘रूथ एक अमेरिकन लड़का था जो मार्गरेट को पसंद करता था. दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती भी थी. एक ही क्लास में थे. रूथ कालेज में बहुत पौपुलर था. उस की इमेज कुछ प्लेबौय जैसी थी पर वह मार्गरेट को पसंद करता था. मगर मार्गरेट का लक्ष्य पढ़ाई कर वापस जाना था. अत: उस ने रूथ को कभी सीरियसली नहीं लिया. पर रूथ उसे इंप्रैस करने की हमेशा कोशिश करता. हर रोज मार्गरेट को एक गुलाब का फूल देता था. हम सब जानते थे मार्गरेट को गुलाब का फूल बेहद पसंद है. ‘‘लास्ट सैम से पहले कालेज इलैक्शन के दौरान मार्गरेट और रूथ को नौमिनेट किया गया, कालेज प्रैसिडैंट की पोस्ट के लिए और जैसाकि हम सब जानते थे मार्गरेट इलैक्शन जीत गई. रूथ को दुख तो हुआ पर उस ने मार्गरेट को बधाई दी. मार्गरेट की जीत की खुशी में रूथ ने एक पार्टी और्गनाइज की जिस में केवल कुछ दोस्तों को ही बुलाया गया,’’ कहतेकहते एमिली रुक गई और रोने लगी.

मारिया की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. उस ने एमिली से रिक्वैस्ट की ‘‘एमिली प्लीज मुझे सारी बातें बताओ… तुम ऐसे अचानक क्यों रोने लगी.’’ एमिली ने 1 घूंट पानी पीया और आगे बताना शुरू किया, ‘‘मार्गरेट जब रूथ के चंगुल से निकल कर आई तब उस ने मुझे बताया कि उस के साथ क्या गुजरी. अब तक हम सब रूथ को बस एक मदमस्त लड़के के रूप में जानते थे. पार्टी के बाद रूथ ने मार्गरेट को रुकने को कहा. अपनी दोस्ती का वास्ता दिया. मार्गरेट एक अच्छे दोस्त की तरह रूथ की बातों में आ गई. कहीं न कहीं मार्गरेट भी रूथ को पसंद करती थी. शायद यही कारण था कि वह उस की बातों में आ गई. फिर कोई अपने दोस्त पर शक करे भी तो कैसे? मार्गरेट भी तो अनजान थी रूथ के इरादों से.

‘‘पार्टी में सभी ने शराब पी. हालांकि मार्गरेट ने सिर्फ बियर ही पी थी पर न जाने कैसे बेहोश हो गई. जब आंखें खुली ने उस ने स्वयं को एक छोटे से गंदे से कमरे में पाया. स्टोररूम जैसा लग रहा था. मार्गरेट को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह उस कमरे में कैसे आई. घबराहट में उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी. तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई. सामने रूथ को देख उस की जान में जान आई. वह झट रूथ के गले लग गई. मगर रूथ ने उसे अपने से अलग करते हुए धक्का देते हुए कहा कि स्टे अवे. ‘‘मार्गरेट की समझ से परे था ये सब. वह सोच रही थी कि जिस लड़के ने एक दिन पहले उस की जीत की खुशी में पार्टी दी वही आज उस से इतनी बेरुखी से क्यों पेश आ रहा है? मार्गरेट ने फिर मदद की गुहार लगाई पर रूथ के कानों में तो जूं तक नहीं रेंग रही थी. अचानक उस ने मार्गरेट पर झपट्टा मारा और मार्गरेट के बदन से कपड़ों को नोच कर अलग कर दिया. मार्गरेट दया की गुहार लगाती रही और रूथ उस की इज्जत से खेलता रहा. मार्गरेट ने छूटने की बहुत कोशिश की, गिड़गिड़ाई पर जैसे रूथ तो एक आदमखोर भेडि़ए की तरह मार्गरेट को नोचने में लगा था.

बहुत कोशिशों के बाद भी मार्गरेट स्वयं को बचा न सकी. जब रूथ का दिल भर गया तो वह उसे वहीं कमरे में छोड़ जाने लगा. उस के चेहरे पर कुछ अजीब से भाव थे जैसे वह अपनी जीत का जश्न मना रहा हो. मार्गरेट को अब तक कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर रूथ ऐसा कर क्यों रहा था उस के साथ. जातेजाते रूथ अपने साथ मार्गरेट के कपड़े भी ले गया. ‘‘नग्नावस्था में मार्गरेट ने 1 नहीं, 2 नहीं पूरे 3 हफ्ते बिताए. रूथ का जब मन करता कमरे में आता और मार्गरेट की आबरू को छलनी कर वहां से ऐसे चला जाता जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. मार्गरेट के आसुओं का, उस की विनती का कोई असर नहीं होता. उसे तो केवल अपनी हवस ही सर्वोपरी थी. उस ने जीतेजी एक लड़की को निर्जीव बना दिया था वह भी केवल अपने घमंड को ऊंचा रखने के लिए. रूथ मार्गरेट का इस्तेमाल एक सैक्स टौय के रूप में कर रहा था,’’ कहतेकहते एमिली फिर रुक गई.

यह सब सुनना मारिया के लिए एक नर्क से गुजरने जैसा था. मार्गरेट की चीखें जैसे मारिया के कानों को भेदते हुए उस के शरीर को तारतार कर रही थीं. मारिया का केवल कल्पनामात्र से शरीर सुन्न पड़ गया था. न जाने मार्गरेट ने इन कठिन परिस्तिथियों का सामना किस प्रकार किया होगा… मारिया ये सब सुन कर पूरी तरह से ब्लैकआउट हो गई थी. आज उसे बेहद पछतावा हो रहा था कि उस ने मार्गरेट को अमेरिका पढ़ने ही क्यों भेजा… वह सोच रही कि मार्गरेट इतने कठिन दौर से गुजरी और उस ने इस दर्द को किसी के साथ बांटा भी नहीं. मार्गरेट ने इस दर्द को अकेले सह साहसी होने का परिचय तो दिया था पर इस दर्द और तकलीफ ने उसे जीतेजी मार डाला था.

इन सब बातों को सुनने के बाद मारिया ने यह तय किया कि उसे रूथ को उस की गलतियों की सजा अवश्य दिलवानी है. मारिया ने एमिली से रूथ का पता जानने की इच्छा जताई तो एमिली ने बताया कि रूथ भी होस्टल में ही रहता था. उस के पास उस का पता नहीं है. एक संभावना थी शायद कालेज से पता मिल जाए पर उस के लिए कुछ जुगत लगानी होगी, क्योंकि अधिकतर कालेजों में पर्सनल डिटेल्स देना रूल्स के खिलाफ माना जाता है.

‘‘लड़ाई तो बस अभी शुरू ही हुई है,’’ मारिया ने एक लंबी सांस छोड़ते हुए कहा. उस ने हाथ जोड़ कर एमिली से रूथ का पता निकलवाने का आग्रह किया. एमिली ने मारिया को धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘मैं पूरी कोशिश करूंगी… आप चिंता न करें.’’

एमिली को दिल से शुक्रिया कहते हुए मारिया ने उसे अपने गले से लगा लिया. फिर कहा, ‘‘तुम्हारी मदद की आवश्यकता मुझे आगे भी इस लड़ाई में पड़ती रहेगी. आशा करती हूं तुम मेरी हैल्प अवश्य करोगी.’’ एमिली ने दुख में सराबोर हो कहा, ‘‘एनी टाइम यू कैन कौल मी.’’

मारिया भारी मन से वहां से रुखसत हुई. वह यही सोच रही थी कि कैसे मार्गरेट ने इतनी तकलीफों का सामना किया होगा और अब सारी बातें जानने के बाद मार्गरेट के बदले और बेहाल स्वास्थ्य का कारण भी पता था. मारिया का मन तो कर रहा था कि रूथ बस कहीं से मिल जाए और वह उसे सरे बाजार नंगा कर बीच चौराहे में गोली मार दे. उस के भीतर गुस्से का ज्वालामुखी फट चुका था. इस ज्वालामुखी के शांत होने का सिर्फ एक ही उपाय था कि वह उसे सलाखों के पीछे देखे. पर यह इतना आसान भी नहीं था. मार्गरेट एक प्रवासी थी न्यूयौर्क में. इस रास्ते को तय करना बेहद मुश्किलों से भरा था, पर मारिया अब इन मुश्किलों से लड़ने के लिए स्वयं को तैयार कर चुकी थी.

2 दिन बाद एमिली ने मारिया को फोन कर खबर दी कि रूथ के लोकल गार्जियन जिन का नाम रोसेलिन था का पता मिल गया है. झट मारिया ने रूथ की आंटी का पता नोट कर उन से मिलने की सोची. समय न गंवाते हुए वे उस के घर जो बोस्टन में था के लिए रवाना हो गई. न्यूयौर्क से बोस्टन की दूरी बस द्वारा कुल 4 घंटों की थी. जैसेतैसे यह रास्ता भी तय हो गया. बस स्टौप से रोसेलिन का घर 5 मिनट की दूरी पर था. मारिया ने घर के दरवाजे पर दस्तक दी. दरवाजा रोसेलिन ने ही खोला. वह एक आकर्षक वृद्ध ब्रिटिश महिला थीं, जिन्होंने थोड़े आश्चर्यभाव के साथ दरवाजा खोला. उन्होंने दरवाजा खोलते ही पूछा ‘‘हू आर यू… व्हाट डू यू वांट.’’

मारिया ने जवाब में कहा, ‘‘आई वांट टू मीट रोसेलिन. आई एम मारिया फ्रौम इंडिया… वांट टू सी हर.’’ जवाब में रोसेलिन ने कहा, ‘‘कम इन, आई एम रोसेलिन.’’

घर काफी करीने से सजा था. मारिया ने एक नजर घर के चारों कोनों में दौड़ाई. वह मन ही मन सोच रही थी कि शुरुआत कहां से और कैसे की जाए.

तभी रोसेलिन ने पूछा, व्हाटस द पर्पज औफ आवर मीटिंग… हाऊ यू नो मी?’’ मारिया ने कहा, ‘‘आई वांट टु नो अबाउट रूथ योर नैफ्यू,’’ और फिर मारिया ने एक ही सांस में सारी कहानी रोसेलिन को बता डाली कि कैसे रूथ ने उस की बेटी मार्गरेट का जीवन नष्ट कर डाला और यह भी कि वह रूथ से मिल कर जानना चाहती है कि क्या मिला उसे मार्गरेट के जीवन से खेल कर.

पहले तो रोसेलिन चुप रहीं पर मारिया के बहुत समझाने और आग्रह करने पर वे मान गईं और फिर रूथ की पूरी कहानी मारिया को बताई. मारिया और रोसेलिन के बीच संपूर्ण वार्त्तालाप अंगरेजी में ही हुई थी. रोसेलिन ने बताया, ‘‘रूथ की परवरिश एक अजीबोगरीब परिवार में हुई थी. रूथ जब मात्र

7 साल का था तब उस की मां उस के पिता को छोड़ किसी और के साथ रहने लगी. पिता शराबी और व्यभिचारी था. रूथ ने जो बचपन से देखा वही सीखा. उसे कभी औरतों की इज्जत करना आया ही नहीं. आता भी कैसे. किसी ने कभी कुछ सिखाया ही नहीं. ‘‘अपने मातापिता होने के बावजूद उस ने अनाथों की तरह अपनी जिंदगी बिताई… घर का माहौल बेहद खराब था, जिस का असर यह हुआ कि रूथ में एक स्प्लिट पर्सनैलिटी ने जन्म ले लिया था. उसे औरतों से खासा नफरत सी थी. जब वह अपनी वास्तविक अवस्था में रहता तब कोईर् अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि उस के दिमाग के एक हिस्से में बेहद खतरनाक इंसान का वास है.

‘‘पर किसी भी दृष्टिकोण से रूथ को कोई हक नहीं था कि किसी बेगुनाह की जिंदगी से खेले. मुझे लगता है उसे उस के किए का कोई पछतावा भी नहीं होगा. होता भी कैसे. उसे जो उस की समझ में ठीक लगता है वह वही करता हैं. कई बार मैं ने उसे समझाने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ. रूथ जहां पढ़ने में बहुत अच्छा था, वहीं उस के मन को पढ़ना उतना ही कठिन था.’’ मारिया ने रोसेलिन से रूथ का पता जानने की इच्छा जताई तो रोसेलिन ने बताया कि जब तक कालेज में था तब तक वे उस की लोकल गार्जियन थीं, पर अब वह उन के साथ नहीं रहता था. कालेज खत्म कर रूथ ने वहां न्यूयौर्क के एक कालेज में फैलोशिप की नौकरी कर ली थी. उन की आखिरी मुलाकात 6 महीने पहले हुई थी.

मारिया को अपने कई सवालों के जवाब तो मिल गए थे पर यह जानना अभी बाकी था कि आखिर मार्गरेट ही क्यों उस का शिकार बनी? रोसेलिन का हृदय से धन्यवाद कर मारिया न्यूयौर्क वापस आ गई. अगले दिन मारिया सुजन की मदद से एक वकील जो इंडियन अमेरिकन था को मार्गरेट के साथ हुए भयावह अत्याचार का ब्योरा दिया.

वकील ने मारिया को सुझाव देते हुए कहा कि सुबूतों के अभाव की वजह से केस बहुत वीक है और विक्टिम भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं है, ऐसे स्थिति में पुलिस भी शायद ही एफआईआर लिखे. फिर भी मारिया ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. उस के सामने अब एक और चुनौती ने जन्म ले लिया था. वह किसी भी हाल में रूथ को सलाखों के पीछे देखना चाहती थी. उसे यह खयाल दिन में चैन से नहीं बैठने देता था कि उस के पास सारी जानकारी है पर सुबूत न होने की वजह से रूथ जैसे दुराचारी के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रही है. मारिया ने मार्गरेट के कालेज मैनेजमैंट से बात कर सीसीटीवी फुटेज निकलवाए. जिन से यह पता चला कि मार्गरेट की वाकई जानपहचान थी रूथ से और फिर डाक्टर राजन से कह मार्गरेट की मैडिकल रिपोर्ट तैयार करवाई, जिस में डाक्टर ने मार्गरेट की मानसिक और शारीरिक स्थिति का पूरा ब्योरा दिया कि कैसे शारीरिक और मानसिक यातना का नतीजा है मार्गरेट की ऐसी दयनीय स्थिति. इन सभी सुबूतों को ले मार्गरेट और उस के वकील ने रूथ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई. इतना ही नहीं एमिली ने भी गवाही देना मंजूर कर लिया.

इन सभी रास्तों पर चलना मारिया के लिए आसान तो नहीं था पर शायद मां की आत्मशक्ति के आगे रास्ते खुदबखुद बनने लगे थे. आखिरकार पुलिस ने रूथ को पकड़ ही लिया. कस्टडी में पूछताछ के दौरान उस ने मान लिया कि मार्गरेट को उसी ने बंदी बना रखा था और वह ये सब इसलिए करता था क्योंकि उसे सुंदर और अंकलमंद औरतों से नफरत थी. दूसरा कारण यह भी था कि मार्गरेट

स्टूडैंट इलैक्शन में जीत गई थी, जिस से रूथ के अहं को बहुत ठेस पहुंची थी और वह मार्गरेट से इस बात का बदला लेना चाहता था. रूथ को सैशन कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उसे मनोवैज्ञानिक उपचार भी करवाने की सलाह दी. मार्गरेट की कोई गलती न होने पर भी उसे नर्क से गुजरना पड़ा. मारिया को जब कारण का पता चला तो उस के होश उड़ गए. मार्गरेट को इतनी परेशानियों का सामना केवल इसलिए

करना पड़ा कि वह खूबसूरत और अकलमंद है. रूथ को सजा होने पर मारिया खुश तो थी पर मार्गरेट को देख बेहद दुख होता. एक होनहार लड़की की ऐसी हालत देख बहुत दर्द होता. मार्गरेट आज भी डाक्टर राजन से अपना इलाज करा रही है. उस से दैहिक घाव तो मिट गए हैं, पर आत्मिक घाव आज भी रिस रहे हैं. मार्गरेट के साथ जो भी घटित हुआ था वह आज के युग का एक ऐसा भयंकर सच है जिस के साथ जीना न केवल मुश्किल है, अपितु विषपान से भी अधिक कड़वा पान है. ऐसी कितनी ही मार्गरेट आएदिन विकृत विचारधारा वाले भेडि़यों के मुंह का निवाला बनती रहती हैं. उन के मन को इतना लहूलुहान कर दिया जाता है कि वे जिंदा तो होती हैं पर उन की स्थिति एक जिंदा लाश से कम नहीं. Hindi Family Story :

Hindi Satire Story : “मैं झूठ नहीं बोलती – लेकिन सच बोल कर बुरा कौन बनना चाहता है ?”

Hindi Satire Story : जब से होश संभाला, यही शिक्षा मिली कि सदैव सच बोलो. हमारी बुद्धि में यह बात स्थायी रूप से बैठ जाए इसलिए मास्टरजी अकसर ही  उस बालक की कहानी सुनाते, जो हर रोज झूठमूठ का भेडि़या आया भेडि़या आया चिल्ला कर मजमा लगा लेता और एक दिन जब सचमुच भेडि़या आ गया तो अकेला खड़ा रह गया.

मां डराने के लिए ‘झूठ बोले कौआ काटे’ की लोकोक्ति का सहारा लेतीं और उपदेशक लोग हर उपदेश के अंत में नारा लगवाते ‘सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला.’ भेडि़ये से तो खैर मुझे भी बहुत डर लगता है बाकी दोनों स्थितियां भी अप्रिय और भयावह थीं. विकल्प एक ही बचा था कि झूठ बोला ही न जाए.

बचपन बीता. थोड़ी व्यावहारिकता आने लगी तो मां और मास्टरजी की नसीहतें धुंधलाने लगीं. दुनिया जहान का सामना करना पड़ा तो महसूस हुआ कि आज के युग में सत्य बोलना कितना कठिन काम है और समझदार बनने लगे हम. आप ही बताओ मेरी कोई सहकर्मी एकदम आधुनिक डे्रस पहन कर आफिस आ गई है, जो न तो उस के डीलडौल के अनुरूप है न ही व्यक्तित्व के. मन तो मेरा जोर मार रहा है यह कहने को कि ‘कितनी फूहड़ लग रही हो तुम.’ चुप भी नहीं रह सकती क्योंकि सामने खड़ी वह मुसकरा कर पूछे जा रही है, ‘‘कैसी लग रही हूं मैं?’’

‘अब कहो, सच बोल दूं क्या?’

विडंबना ही तो है कि सभ्यता के साथसाथ झूठ बोलने की जरूरत बढ़ती ही गई है. जब हम शिष्टाचार की बात करते हैं तो अनेक बार आवश्यक हो जाता है कि मन की बात छिपाई जाए. आप चाह कर भी सत्य नहीं बोलते. बोल ही नहीं पाते यही शिष्टता का तकाजा है.

आप किसी के घर आमंत्रित हैं. गृहिणी ने प्रेम से आप के लिए पकवान बनाए हैं. केक खा कर आप ने सोचा शायद मीठी रोटी बनाई है. बस, शेप फर्क कर दी है और लड्डू ऐसे कि हथौड़े की जरूरत. खाना मुश्किल लग रहा है पर आप खा रहे हैं और खाते हुए मुसकरा भी रहे हैं. जब गृहिणी मनुहार से दोबारा परोसना चाहती है तो आप सीधे ही झूठ पर उतर आते हैं.

‘‘बहुत स्वादिष्ठ बना है सबकुछ, पर पेट खराब होने के कारण अधिक नहीं खा पा रहे हैं.’’ मतलब यह कि वह झूठ भी सच मान लिया जाए, जो किसी का दिल तोड़ने से बचा ले.

‘शारीरिक भाषा झूठ नहीं बोलती,’ ऐसा हमारे मनोवैज्ञानिक कहते हैं. मुख से चाहे आप झूठ बोल भी रहे हों आप की आवाज, हावभाव सत्य उजागर कर ही देते हैं. समझाने के लिए वह यों उदाहरण देते हैं, ‘बच्चे जब झूठ बोलते हैं तो अपना एक हाथ मुख पर धर लेते हैं. बड़े होने पर पूरा हाथ नहीं तो एक उंगली मुख या नाक पर रखने लगते हैं अथवा अपना हाथ एक बार मुंह पर फिरा अवश्य लेते हैं,’ ऐसा सोचते हैं ये मनोवैज्ञानिक लोग. पर आखिर अभिनय भी तो कोई चीज है और हमारे फिल्मी कलाकार इसी अभिनय के बल पर न सिर्फ चिकनीचुपड़ी खाते हैं हजारों दिलों पर राज भी करते हैं.

वैसे एक अंदर की बात बताऊं तो यह बात भी झूठ ही है, क्योंकि अपनी जीरो फिगर बनाए रखने के चक्कर में प्राय: ही तो भूखे पेट रहते हैं बेचारे. बड़ा सत्य तो यह है कि सभ्य होने के साथसाथ हम सब थोड़ाबहुत अभिनय सीख ही गए हैं. कुछ लोग तो इस कला में माहिर होते हैं, वे इतनी कुशलता से झूठ बोल जाते हैं कि बड़ेबड़े धोखा खा जाएं. मतलब यह कि आप जितने कुशल अभिनेता होंगे, आप का झूठ चलने की उतनी अच्छी संभावना है और यदि आप को अभिनय करना नहीं आता तो एक सरल उपाय है. अगली बार जब झूठ बोलने की जरूरत पड़े तो अपने एक हाथ को गोदी में रख दूसरे हाथ से कस कर पकड़े रखिए आप का झूठ चल जाएगा.

हमारे राजनेता तो अभिनेताओं से भी अधिक पारंगत हैं झूठ बोलने का अभिनय करने में. जब वह किसी विपदाग्रस्त की हमदर्दी में घडि़याली आंसू बहा रहे होते हैं, सहायता का वचन दे रहे होते हैं तो दरअसल, वह मन ही मन यह हिसाब लगा रहे होते हैं कि इस में मेरा कितना मुनाफा होगा. वोटों की गिनती में और सहायता कोश में से भी. इन नेताओं से हम अदना जन तो क्या अपने को अभिनय सम्राट मानने वाले फिल्मी कलाकार भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.

विशेषज्ञों ने एक राज की बात और भी बताई है. वह कहते हैं कि सौंदर्य आकर्षित तो करता ही है, सुंदर लोगों का झूठ भी आसानी से चल जाता है. अर्थात सुंदर होने का यह अतिरिक्त लाभ है. मतलब यह भी हुआ कि यदि आप सुंदर हैं, अभिनय कुशल हैं तो धड़ल्ले से झूठ बोलते रहिए कोई नहीं पकड़ पाएगा. अफसोस सुंदर होना न होना अपने वश की बात नहीं.

गांधीजी के 3 बंदर याद हैं. गलत बोलना, सुनना और देखना नहीं है. अत: अपने हाथों से आंख, कान और मुंह ढके रहते थे पर समय के साथ इन के अर्थ बदल गए हैं. आज का दर्शन यह कहता है कि आप के आसपास कितना जुल्म होता रहे, बलात्कार हो रहा हो अथवा चोट खाया कोई मरने की अवस्था में सड़क पर पड़ा हो, आप अपने आंख, कान बंद रख मस्त रहिए और अपनी राह चलिए. किसी असहाय पर होते अत्याचार को देख आप को अपना मुंह खोलने की जरूरत नहीं.

ऐसा भी नहीं है कि झूठ बोलने की अनिवार्यता सिर्फ हमें ही पड़ती हो. अमेरिका जैसे सुखीसंपन्न देश के लोगों को भी जीने के लिए कम झूठ नहीं बोलना पड़ता. रोजमर्रा की परेशानियों से बचे होने के कारण उन के पास हर फालतू विषय पर रिसर्च करने का समय और साधन हैं. जेम्स पैटरसन ने 2 हजार अमेरिकियों का सर्वे किया तो 91 प्रतिशत लोगों ने झूठ बोलना स्वीकार किया.

फील्डमैन की रिसर्च बताती है कि 62 प्रतिशत व्यक्ति 10 मिनट के भीतर 2 या 3 बार झूठ बोल जाते हैं. उन की खोज यह भी बताती है कि पुरुषों के बजाय स्त्रियां झूठ बोलने में अधिक माहिर होती हैं जबकि पुरुषों का छोटा सा झूठ भी जल्दी पकड़ा जाता है. स्त्रियां लंबाचौड़ा झूठ बहुत सफलता से बोल जाती हैं. हमारे नेता लोग गौर करें और अधिक से अधिक स्त्रियों को अपनी पार्टी में शामिल करें. इस में उन्हीं का लाभ है.

बिना किसी रिसर्च एवं सर्वे के हम जानते हैं कि झूठ 3 तरह का होता है. पहला झूठ वह जो किसी मजबूरीवश बोला जाए. आप की भतीजी का विवाह है और भाई बीमार रहते हैं. अत: सारा बंदोबस्त आप को ही करना है. आप को 15 दिन की छुट्टी तो चाहिए ही. पर जानते हैं कि आप का तंगदिल बौस हर्गिज इतनी छुट्टी नहीं देगा. चाह कर भी आप उसे सत्य नहीं बताते और कोई व्यथाकथा सुना कर छुट्टी मंजूर करवाते हैं.

दूसरा झूठ वह होता है, जो किसी लाभवश बोला जाए. बीच सड़क पर कोई आप को अपने बच्चे के बीमार होने और दवा के भी पैसे न होने की दर्दभरी पर एकदम झूठी दास्तान सुना कर पैसे ऐंठ ले जाता है. साधारण भिखारी को आप रुपयाअठन्नी दे कर चलता करते हैं पर ऐसे भिखारी को आप 100-100 के बड़े नोट पकड़ा देते हैं. यह और बात है कि आप के आगे बढ़ते ही वह दूसरे व्यक्ति को वही दास्तान सुनाने लगता है और शाम तक यों वह छोटामोटा खजाना जमा कर लेता है.

कुछ लोग आदतन भी झूठ बोलते हैं और यही होते हैं झूठ बोलने में माहिर तीसरे किस्म के लोग. इस में न कोई उन की मजबूरी होती है न लाभ. एक हमारी आंटी हैं, उन की बातों का हर वाक्य ‘रब झूठ न बुलवाए’ से शुरू होता है पर पिछले 40 साल में मैं ने तो उन्हें कभी सच बोलते नहीं सुना. सामान्य बच्चों को जैसे शिक्षा दी जाती है कि झूठ बोलना पाप है शायद उन्हें घुट्टी में यही पिलाया गया था कि ‘बच्चे सच कभी मत बोलना.’  बाल सफेद होने को आए वह अभी तक अपने उसी उसूल पर टिकी हुई हैं. रब झूठ न बुलवाए, इस में उन की न तो कोई मजबूरी होती है न ही लाभ.

सदैव सत्य ही बोलूंगा जैसा प्रण ले कर धर्मसंकट में भी पड़ा जा सकता है. एक बार हुआ यों कि एक मशहूर अपराधी की मौत हो गई और परंपरा है कि मृतक की तारीफ में दो शब्द बोले जाएं. यह तो कह नहीं सकते कि चलो, अच्छा हुआ जान छूटी. यहां समस्या और भी घनी थी. उस गांव का ऐसा नियम था कि बिना यह परंपरा निभाए दाह संस्कार नहीं हो सकता. पर कोई आगे बढ़ कर मृतक की तारीफ में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं. अंत में एक वृद्ध सज्जन ने स्थिति संभाली.

‘‘अपने भाई की तुलना में यह व्यक्ति देवता था,’’ उस ने कहा, ‘‘सच भी था. भाई के नाम तो कत्ल और बलात्कार के कई मुकदमे दर्ज थे. अपने भाई से कई गुना बढ़ कर. अब उस की मृत्यु पर क्या कहेंगे यह वृद्ध सज्जन. यह उन की समस्या है पर कभीकभी झूठ को सच की तरह पेश करने के लिए उसे कई घुमावदार गलियों से ले जाना पड़ता है यह हम ने उन से सीखा.

मुश्किल यह है कि हम ने अपने बच्चों को नैतिक पाठ तो पढ़ा दिए पर वैसा माहौल नहीं दे पाए. आज के घोर अनैतिक युग में यदि वे सत्य वचन की ही ठान लेंगे तो जीवन भर संघर्ष ही करते रह जाएंगे. फिल्म ‘सत्यकाम’ देखी थी आप ने? वह भी अब बीते कल की बात लगती है. हमारे नैतिक मूल्य तब से घटे ही हैं सुधरे नहीं. आज के झूठ और भ्रष्टाचार के युग में नैतिक उपदेशों की कितनी प्रासंगिकता है ऐसे में क्या हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना छोड़ दें. संस्कार सब दफन कर डालें? प्रश्न कड़वा जरूर है पर पूछना आवश्यक. बच्चों को वह शिक्षा दें, जो व्यावहारिक हो जिस का निर्वाह किया जा सके. उस से बड़ी शर्त यह कि जिस का हम स्वयं पालन करते हों.

सब से बड़ा झूठ तो यही कहना, सोचना है कि हम झूठ बोलते नहीं. कभी हम शिष्टाचारवश झूठ बोलते हैं तो कभी समाज में बने रहने के लिए. कभी मातहत से काम करवाने के लिए झूठ बोलते हैं तो कभी बौस से छुट्टी मांगने के लिए. सामने वाले का दिल न दुखे इस कारण झूठ का सहारा लेना पड़ता है तो कभी सजा अथवा शर्मिंदगी से बचने के लिए. कभी टैक्स बचाने के लिए, कभी किरायाभाड़ा कम करने के लिए. चमचागीरी तो पूरी ही झूठ पर टिकी है. मतलब कभी हित साधन और कभी मजबूरी से. तो फिर हम सत्य कब बोलते हैं?

शीर्षक तो मैं ने रखा था कि ‘मैं झूठ नहीं बोलती’ पर लगता है गलत हो गया. इस लेख का शीर्षक तो होना चाहिए था,  ‘मैं कभी सत्य नहीं बोलती.’ क्या कहते हैं आप?

Hindi Satire Story :

Hindi Family Story : “मैं सत्यवती नहीं बनूंगी”

Hindi Family Story : पुराने समय से लोग कुंडली ही मिलाते आए हैं शादी के लिए. लेकिन कुंडली से ज्यादा जरूरी है विचार मिलना और वैचारिक स्तर पर दोनों (लड़का लड़की) में ट्‌यू‌निंग होना, तभी शादियां सफल हो सकती हैं. रही बात रुपएपैसे की, आर्थिक संपन्नता की, तो मेरा विचार है, पैसा सबकुछ नहीं होता है, बहुतकुछ हो सकता है लेकिन सबकुछ नहीं. रुपयों का पहाड़ हो घर में और रिश्तों में धोखा हो, मनमरजी हो, कपट हो तो ऐसे रिश्ते सिर्फ ढोए जा सकते हैं, निभाए नहीं. हमारे देश की कानून व्यवस्था लचर है, तलाक लेना भी चाहें तो बरसोंबरस लग जाते हैं.

आसानी से तलाक नहीं मिलता. जरूरत है कानून व्यवस्था भी सुधारी जाए. जहां रिश्ते बोझ बनने लगे वहां तलाक आसानी से मिले.

साथियो, कोई पति, पत्नी नहीं चाहते रिश्तों को खत्म करना लेकिन जब रिश्तों में दम घुटने लगे, व्यक्ति सांस भी न ले पाए तो तलाक बेहतर होगा.

चूंकि तलाक की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और लंबी होती है, इसलिए वर्तमान पीढ़ी ने ‘लिवइन’ का जो रास्ता चुना है उस का मैं समर्थन करती हूं. लेकिन सोचसमझकर इस रिश्ते को चुनें, जिस से कि आप सुरक्षित रह सकें और जीवन अच्छे से बिता सकें. धन्यवाद. और मंजरी मंच से नीचे उतर गई.

तालियों का शोर, वाओ.

डिबेट कंपीटिशन में मंजरी विजेता घोषित कर दी गई. कालेज के डिबेट कंपीटिशन का विषय था, ‘लिवइन रिलेशनशिप समाज व संस्कृति के लिए घातक है.’ इस के पक्ष में मंजरी का भाषण था.

विपक्ष में जिसे विजेता घोषित किया गया था वह था मानस, जिस ने संस्कृति और समाज पर लिवइन के नुकसान बताए थे. इस से हमारे समाज पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. समाज में स्वच्छंदता का वातावरण होगा, बच्चे अपनी संस्कृति को भूलेंगे, समाज का पतन होगा.

मंजरी के लिए प्रथम आना बड़ी बात नहीं थी. उस की स्पीच, तर्क, बोलने का ढंग इतना शानदार होता था कि कालेज के स्टूडैंट मंत्रमुग्ध हो कर सुनते थे. यों कहें तो वह कालेज की हीरोइन थी. मंजरी बीए औनर्स की सैकंड ईयर की स्टूडैंट थी. मानस सांइस का स्टूडैंट था. मानस और मंजरी का कोई तालमेल नहीं था. दोनों के विचार विपरीत थे.

मंजरी को बधाई देने वालों की भीड़ सी लग गई थी. शायद इसी बहाने से मंजरी से फ्रैंडशिप हो जाए. बधाई देने वालों की भीड़ जब छंटी तो मानस सामने था. उस ने भी हाथ बढ़ाया.

“थैंक्यू मानस,” कहती हुई मंजरी आगे निकलने लगी.

“मंजरी, क्या हम कौफी पी सकते हैं कालेज की कैंटीन में?” मानस ने पूछा.

“क्यो नहीं, श्योर,” मंजरी बोली. उस ने सोचा पहली बार मानस ने कहा है. कालेज आतेजाते, कालेज के गार्डन मे अनेक बार टकराए हैं लेकिन हैलोहाय से ज्यादा कभी बात नहीं की.

मंजरी अपनी फ्रैंड्स के साथ रहती थी. मानस भी अपने फ्रैंड्स के साथ.

डिबेट कंपीटिशन संडे को रखा गया था लेकिन कैंटीन खुली थी. पूरा कालेज रेशमी एहसास से भरा था. हंसतीखिलखिलाती लड़कियांलड़के, दूसरे कालेजों के स्टूडेंट भी थे जो डिबेट कंपीटिशन को सुनने आए थे.

सब्जैक्ट ने सब को अपनी ओर खींचा था- ‘लिवइन…’ ने. कैंटीन में खासी भीड़ थी.

सभी लिवइन पर ही चर्चा कर रहे थे. मंजरी को जैसे ही देखा, कुछ स्टूडैंट मंजरी को घेर कर खड़े हो गए.

“क्यों मंजरी, तुम लिवइन के फेवर में हो तो शादी करोगी या फिर किसी के साथ लिवइन में रहने का मूड बना रखा है?” और जोरदार ठहाकाहंसी की आवाजें.

“वैसे, मंजरी बहुत सुंदर बोलती हो,” एक स्टूडैंट बोली.

“अब कौफी पी लें, इस टौपिक पर फिर कभी बात कर लेंगे,” मंजरी बोली और मानस के साथ कूपन काउंटर की ओर बढ़ गई.

मानस कौफी के साथ सैंडविच भी लाया था. कौफी की भाप दोनों के बीच चिलमन का काम कर रही थी. दोनों आज पहली बार इतनी करीब से एकदूसरे को देख रहे थे.

उन्नीस वर्षीय मंजरी को गोरा नहीं कहा जा सकता था, उसे बादामी रंगत वाला कह सकते हैं. ऊंचा कद, बादामी रंगत, खुले बाल, जींस पर कमर तक टौप और हंसते समय दोनों गालों पर पड़ने वाले डिम्पल उस की सुंदरता में जादू जगाते थे. बस, उस दिन से मानस गालों के इन डिंपलों में उलझने लगा था. उस को दिल पहली बार धड़कता हुआ महसूस होने लगा था. लड़‌कियों के बीच मानस असहज नहीं होता था पर आज उस को कंफर्टेबल फील नहीं कर पा रहा था-

मंजरी की हंसी, बालों का रेश्मीपन, दांए हाथ में पहना गोल्ड ब्रेसलेट जिसे मंजरी रहरह कर छू रही थी.

मानस को कोई टौपिक नहीं सूझ रहा था, मंजरी से क्या बात करे. तभी उसे ब्रेसलेट दिख गया. उस ने पूछा, “मंजरी, ब्रेसलेट बहुत प्यारा है, कहां से खरीदा है? देख सकता हूं?”

“क्यों नहीं. देखो,” कहते हुए मंजरी ने ब्रेसलेट हाथ से उतार कर मानस के हाथ में दे दिया.

मानस बड़ी देर तक उस की डिजायन, खूबसूरती को देखता रहा. फिर जैसे ही ब्रेसलेट देने के लिए उस ने हाथ आगे बढ़ाया, मंजरी ने हाथ आगे कर दिया.

मानस ने मंजरी की कलाई में ब्रेसलेट पहना दिया. उस की उंगलियां मंजरी की कलई को स्पर्श कर गईं. एक रेशमी छुअन का एहसास.

कौफी खत्म हो रही थी.

“मानस चलें, लेट हो रहा है,” कहती हुई मंजरी उठ खड़ी हुई.

“चलो पार्किंग तक साथ चलते हैं,” मानस बोला.

“चलो,” मंजरी बोली.

कैंटीन से पार्किंग तक का रास्ता खामोशी से निकला. मंजरी ने अपनी एक्टिवा निकाली. मानस ने अपनी कार.

कार स्टार्ट करतेकरते मानसम बोला, “बाय मंजरी, कल मिलते हैं.”

“बाय मानस,” कहते हुए मंजरी ने एक्टिवा स्टार्ट कर दी थी.

मंजरी का घर जौनपुर की एक पौश कालोनी में था. मंजरी एक उच्चमध्यवर्गीय परिवार की लड़की थी. पिता डाक्टर थे. मां एक सच्ची, सफल गृहिणी थी. परिवार में मंजरी के अलावा 2 भाई थे- एक की शादी हो चुकी थी, वह दुबई में रहता था. एक भाई 12वीं में था. मंजरी का परिवार खुले माहौल का पक्षधर था.

डा. विश्वास खुल कर बात करने में विश्वास रखते थे. परिवार किसी भी प्रकार के अंधविश्वास और रूढ़ियों से दूर रहता था. मंजरी को भी यह सजगता, साहस अपने परिवार से मिला था.

जब मंजरी अपनी ट्रौफी, मैडल लिए घर पहुंची तो भाई अतुल इंतजार कर रहा था.

“अरे वाह, मंजरी, आज तो पार्टी पक्की रही,” अतुल ने जल्दी से ट्रौफी-मैडल हाथ में लिया और उस के साथ सैल्फी लेने लगा.

मंजरी हंसती हुई अपने रूम में गई. कपड़े चेंज कर के आ गई. मां ने नाश्ता तैयार कर लिया था.

“मम्मी, नाश्ता नहीं करूंगी, मानस के साथ कैंटीन में कौफी और सैंडविंच खा लिया था.”

“मानस तेरी क्लास में है?” मां ने सवाल किया.

“नहीं, मम्मी, वो बधाई देने वालों में था. मानस साइंस का स्टूडैंट है.”

“मंजर, आज तुम कंपीटिशन में जीती हो, आज तो डिनर बाहर बनता है,” अतुल बोला,

“हां, क्यों नहीं, पहले पापा को आने दे फिर,” कह कर मंजरी आज वाले पिक्स सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगी. देखतेदेखते लाइक्स, कमैंटस आने चालू हो गए.

डा. विश्वास किसी पेशेंट को देखने गए थे, इसलिए उन को फोन करना भी उचित नहीं था. लगभग घंटेभर बाद डा. विश्वास आ गए थे. सब से पहले मंजरी को ढेर सारी बधाई दीं. “यों ही आगे बढ़ती रहो, विजेता बनती रहो.”

मंजरी पापा के लाड़ मे इतराते हुए बोली, “पापा, डिनर बाहर करेंगे.”

“बस, इतनी सी बात, जरूर करेंगे. ठीक है,” कह कर डा. विश्वास वापस क्लिनिक में चले गए. घर के ठीक बाहर क्लीनिक था. कोई पेशेंट घर बुलाता था, तो वहां भी जाते थे.

जब रात के लगभग साढ़े 9 बजे डा. विश्वास पेशेंट से फ्री हो कर घर के अंदर आए तो डिनर के लिए सभी तैयार थे.

“पापा, जल्दी से चेंज कर लीजिए,” मंजरी बोली.

“बस, दस मिनट में रेडी हो कर आता हूं.” कुछ ही देर में डा. विश्वास तैयार हो कर घर से निकल गए.

जौनपुर का वह प्रसिद्द होटल सुपर सत्यम रैस्टोरैंट था.

कार पार्किंग में रोक कर जब सब वहां पहुंचे तो मंजरी बहुत खुश थी. रहरह कर उस की आंखों के सामने मानस का चेहरा घूम जाता था. उस के हाथों की छुअन उसे याद आ रही थी.

सब जा कर टेबल पर जम गए. मंजरी को यह होटल और यहां का डिनर पसंद था.

पानी की बोतलें रखने के बाद वेटर मीनू रख गया था. रैस्टोरैंट की खूबसूरती देखते बनती थी.

मंजरी मीनू देखने में व्यस्त थी.

“अरे, मंजरी, आज का दिन बहुत लकी है. आप से दोबारा मुलाकात होगी, सोचा भी न था.”

मंजरी ने नजर उठाई, तो सामने मानस खड़ा था.

“अरे, मानस, तुम भी यहां,” मंजरी बोली.

डा. विश्वास दोनों को देख रहे थे, बोले, “मंजरी, तुम जानती हो इन्हें?”

“हां पापा, यह मानस है, मेरे कालेज में साइंस का स्टुडैंट है.”

“अरे वाह, यह तो अच्छी बात है,” डा. विश्वास बोले.

“नमस्ते अंकलजी,” कहते हुए मानस ने डा. विश्वास के पैर छू लिए.

“जीते रहो बेटा, जीते रहो,” विश्वास खुश हो गए, “ऐसे अच्छे संस्कार, कैसे आए? दोस्तों के साथ?” डा. विश्वास ने सवाल किया.

“मम्मीपापा के साथ, छोटी सिस्टर भी साथ है,” मानस बोला.

“बेटा, तुम्हें दिक्कत न हो, साथ में डिनर कर लें,” डा. विश्वास बेटी मंजरी के चेहरे पे छाई खुशी की लालिमा को महसूस कर रहे थे.

उन की बातचीत होते देख कर मानस के मम्मीपापा भी नजदीक आ गए थे. दोनों परिवारों का आपस में परिचय हुआ.

मानस का परिवार भी संपन्न था. शहर में कई शोरूम थे और प्रौपर्टी का भी बिजनैस था. मानस की छोटी बहन हिमानी 10वीं की स्टूडैंट थी. खूब सैल्फियों का दौर चला.

डिनर भी सब की मिलीजुली पसंद का मंगवाया गया- सब्जी, कोरमा, मशरूम, मसाला, मखनी पनीर, बिरियानी, स्टफ्ड नौन, मिक्स वैजिटेबल सलाद.

मानस के परिवार को मंजरी का परिवार पसंद आया था. इस मुलाकात के बाद मानस मंजरी की बातें बढ़ने लगीं, बाहर मुलाकातें भी होने लगीं.

जौनपुर के किले की कभी सैर की जाती, तो कभी कौफीहाउस के गुलाबी अंधेरे भले लगते. कभी कोई मूवी देखने जाते तो कभी फ्लौवर एक्जीबिशन में.

कालेज में भी ढेरो बातें होतीं. घंटों साथ रहना और कभी घंटों साथ रहते तो भी कोई बात न होती, सिर्फ खामोशी पसरी रहती दोनों के बीच. न जाने कौन सी भाषा होती जिस से बातें होतीं दोनों की खामोशी से. त‌भी किसी ने कहा है, शायद, मोहब्बत की जबां नहीं होती.

मानस एक दिन बोला, “मंजरी, तुम स्टेज पर कितना अच्छा बोलती हो, हर विषय पर कितनी पकड़ है तुम्हारी लेकिन मुझ से तुम ज्यादा बात नहीं करती हो. बस, जी अच्छा, हां या न के अलावा कुछ नहीं बोलती हो.”

“अच्छा,” मंजरी मुसकरा कर बोली.

“मैं परेशान हो उठता हूं तुम्हारी खामोशी से,” मानस बोला.

मंजरी खिलखिला कर हंस दी. मानस देखता रह गया उस की हंसी को जैसे छोटेछोटे घुंघरू बज उठे हों. वह देखता रहा एकटक.

“क्या देख रहे हो?” मंजरी ने मानस का हाथ अपने हाथ में लिया.

मानस के पूरे शरीर मे बिजली दौड़ गई. उस ने मंजरी के हाथ को पकड़ कर उस पर अपनी प्रेममोहर लगा दी. फिर अचानक से हाथ छोड़ दिया कहीं कोई देख तो नहीं रहा.

ऐसे ही खुशबूभरे दिन उड़ते रहे. कहते हैं सुख के दिन पंख लगा कर आते हैं, जल्दी ही उड़ भी जाते हैं जबकि दुख की एक रात भी बहुत लंबी होती है.

मानस को पढाई सिर्फ डिग्री के लिए करनी थी. वह जानता था कि उस के पापा के साथ उसे बिजनैस ही देखना था. यों भी, वह नौकरी के पक्ष में बिलकुल नहीं था. एक बंधीबंधाई रकम के बजाय उसे तो रुपयों का ढेर पंसद था, जो उस के पास था ही, इसलिए उसे इस की ज्यादा परवा नहीं थी. उस की दौलत से प्रभावित कई युवतियां मानस के करीब जाने की कोशिश कर चुकी थीं. पर मानस मंजरी के गालों के भंवर में डूब चुका था. मानस को दौलत का नशा भी था. उसे लगता था, उसूल,चरित्र, सत्य नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत सब किताबी बाते हैं.

मंजरी को पढ़ने में रुचि थी. वह प्रोफैसर बनना चाहती थी. इस के लिए उस ने मानस को बताया हुआ भी था. मानस को यह विश्वास था, मंजरी जब उस से शादी करेगी, प्रोफैसर बनना, पढ़नालिखना सब भूल जाएगी.

हुआ भी वही जो मानस ने सोचा था. कालेज में मंजरी का अंतिम वर्ष था. दोनों का मिलनाजुलना, प्रेम पूरे कालेज में फेमस हो गया था. सब को पता था दोनों ही संपन्न परिवार के हैं. कोई अड़चन नहीं आएगी. ऐसा ही हो भी गया. मंजरी का रिजल्ट आने से पहले ही मानस अपनी मम्मीपापा को ले कर मंजरी के घर पहुंच गया.

डा. विश्वास की विशाल कोठी, अंदर से उस की भव्यता देख मानस की मां बड़ी खुश हुई.

चाय, कौफी के साथ भुने काज़ुओं, गरम पकौड़ों के साथ चर्चा शुरु हुई. डा. विश्वास ने कहा, “मंजरी को तो प्रोफैसर बनना है. यह मंजरी का सपना है. बाकी का डिसीजन तो मंजरी को लेना है.”

“डा. साहब, पढ़ाई तो वहां भी कर सकती है, प्रोफैसर ही तो बनना है. आप तो मंजरी को हमें दे दो. दोनों बच्चे एकदूसरे को पसंद भी करते हैं.”

“मंजरी बेटे,” डा. विश्वास ने पुकारा.

मंजरी वहां नहीं थी. घर के गार्डन में मंजरी मानस के साथ गुलाबों को निहार रही थी. दोनों साथ ही अंदर पहुंचे.

“मंजरी बेटा, तुम्हारा क्या फैसला है शादी का?” डा. विश्वास ने पूछा.

मंजरी शरमा कर पापा के गले लग गई.

डा. विश्वास को जवाब मिल गया था.

दोनों परिवारों ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी थीं. मानस के परिवार को यकीन था, ढेर सारा दहेज मिलेगा, डाक्टर की लड़की है.

रिसैप्शन में शहर के जानेमाने डाक्टर और धनी लोग थे. भव्य फाइवस्टार होटल ‘प्लाज़ा’ में रिसैप्शन था. डा. विश्वास ने दहेज के नाम पर कुछ भी नहीं दिया था. मंजरी का परिवार इन बातों के खिलाफ़ था.

शादी के कुछ दिनों बाद ही मानस, मंजरी सिंगापुर चले जाते हैं. जौनपुर से वाराणसी टैक्सी से, फिर वाराणसी से सिंगापुर फ्लाइट से.

हनीमून के समय ही मंजरी को यह भी मालूम पड़ा कि मानस की बहुत सी महिला मित्र हैं. लेकिन आज के युग मैं यह सब सामान्य था. मंजरी के भी कई लड़के मित्र कभीकभी हालचाल ले लिया करते थे. शादी में मंजरी व मानस के लगभग सभी फ्रैंड्स आए थे. लड़कियों को तो मंजरी से जलन भी थी. शानदार जोड़ी की सभी ने तारीफ की थी.

हनीमून की खुमारी में दोनों ही एकदूसरे में डूबे हुए थे. मानस के मोबाइल में मधुर आवाज ने दोनों को खुमारी से जगा दिया. मानस ने देखा, मां की कौल थी.

“हां मां,” मानस ने मंजरी के बालों को सहलाते हुए कहा.

“बेटा, वापसी कब की है? करवाचौथ आ रहा है, बहू का पहला करवाचौथ है. व्रत करना है,” मां बोली.

“मां कब करवाचौथ है?” मानस ने पूछा.

“बेटा, 25 अक्टूबर को है,: मां बोली.

“23 की फ्लाइट है, हम 24 तक पहुंच जाएंगे,” मानस बोला.

मंजरी चुपचाप सुन रही थी.

“जानू, मां को करवाचौथ की चिंता लगी हुई है,” मानस बोला. मंजरी फिलहाल बहस नहीं करना चाहती थी, चुप रही.

वे दोनों जब घर पहुंचे तो देखा, बहुत जी महिलाएं आई हुई हैं. ब्यूटीपार्लर वाली भी आई हुई है अपनी 2 असिस्टैंट के साथ. मेहंदी लगाई जा रही है, कपड़े, ज्वैलरी की चर्चा चल रही है.

“बहू, मेहंदी वाली शाम तक यहीं है. तुम आराम कर लो, शाम को मेहंदी लगवा लेना.”

“मां, मुझे यह पसंद नहीं है,” मंजरी सीधी भाषा में प्यार से बोली.

“बेटा, कल पहला करवाचौथ है तुम्हारा, कैसी बातें करती हो?” मानस की मां आश्चर्य से बोली. बाकी सब महिलाएं देखने लगीं.

“मां, तुम मेहंदी लगाओ, मैं बाद में बात करूंगा,” कह कर मानस मंजरी को अपने कमरे में ले कर आ गया.

मानस ने कहा फ्रैश हो जाओ, रैस्ट करो,” कह कर खुद भी फ्रैश होने चला गया.

मंजरी खुश हो गई कि मानस समझता है. मंजरी फ्रैश होने के बाद कपड़े चेंज कर कौफी पी कर सो गई.

शाम होने पर दोनों उठे. मानस बोला, “मंजरी, जाओ मेहंदी लगवा लो. अब तो थकान भी दूर हो गई होगी.”

“क्या?” मंजरी ने आश्चर्य से कहा.

“कल करवाचौथ की तैयारी नहीं करोगी, मेरे लिए व्रत नहीं रखोगी?” मानस उसे गले लगा कर बोला,

“अरे नहीं, मैं ये बेसिरपैर के व्रत पसंद नहीं करती,” मंजूरी ने अपने से उसे दूर करते हुए कहा.

“बेसिरपैर, मतलब? यह व्रत मेरे जीवन से जुड़ा है,” मानस बोला.

“देखो मानस, व्रत रखा जाए तो दिल से रखा जाए, जहां व्रत में श्रद्धाविश्वास हो वही व्रत रखना चाहिए. मेरा विश्वास नहीं है व्रत में,” मंजरी ने एक बार दोबारा कोशिश की.

“मैं कुछ नहीं जानता, तुम को व्रत रखना चाहिए बस,” इतना कह कर वह गुस्से में दरवाज़े से बाहर चला गया.

मंजरी चुपचाप बैठी रही अपने कमरे में.

बहुत देर तक मंजरी बाहर नहीं आई, तो उस की सास और रिश्ते की कुछ महिलाएं मंजरी के पास उस के कमरे में गईं.

“मंजरी बेटे, मेहंदी लगवा लो. सभी ने लगा ली है, तुम ही रह गई हो,” एक महिला बोली.

“मुझे मेहंदी लगवाने में कोई दिक्कत नहीं. लेकिन में व्रत नहीं रखूंगी,”

मंजरी साफ शब्दों में बोली.

“प्रौब्लम क्या है, मंजरी?” मानस अंदर आतेआते बोला.

“एक के व्रत रखने से दूसरे की उम्र नहीं बढ़ती. यह कथा तथ्यहीन है, कहीं सत्यवती नाम है, कहीं करवा बताया गया है? तीसरी बात, पति की डैडबौडी पत्नी ने सालभर सुरक्षित रखी, सालभर बाद व्रत रखने से पति जीवित हो गया. इस पर तुम को कैसे यकीन होता है? मानस, तुम तो एजुकेटेड हो,” मंजरी ने पूछा.

“देखो, मैं नहीं जानता ये सब, व्रत तो तुम्हें करना पड़ेगा वरना मुश्किल है तुम्हारीहमारी निभनी.”

“मुझे कोई दिक्कत नहीं, लेकिन इन ढकोसलों में विश्वास नहीं है मेरा,” मंजरी बोली.

“तो क्या मुझ से प्रेम नहीं करतीं?” मानस बोला.

“प्रेम अपनी जगह है,” मंजरी बोली.

“अगर प्रेम करती हो तो प्रेम की खातिर व्रत भी करो, समझीं,”

मानस बोला.

“मानस, मुझे भेड़चाल में चलना पसंद नहीं.”

“देखो, फिर करवाचौथ तुम अपने घर में मना लो इस बार. करवाचौथ के बाद वापस ससुराल आ जाना,” मानस ने फैसला सुनाते हुए कहा. साथ ही, उस ने मंजरी के पापा को फोन कर दिया. फिर घर से बाहर निकल गया.

मंजरी के पापा डा. विश्वास ने आ कर समस्या सुनी. उन्होंने मंजरी की सास से कहा, “हम किस युग में हैं, यह तो देखिए.”

“युग बदलने से क्या संस्कार-रीतिरिवाज बदल दें, समधीजी? कैसी बात करते हो आप?”

“लेकिन आप सोचिए, क्या यह संभव है? कब तक ढोते रहेंगे हम सड़ेगले रिवाजों को?” डा. विश्वास बोले.

“समधीजी, आप भी महिलाओं के मामले में उलझ गए,” अपने कमरे से मंजरी के ससुर आतेआते बोले.”

“सवाल महिलाओं के मामले का नहीं है, समधी जी, सवाल विश्वास और श्रद्धा का है. अगर मंजरी को इस पर भरोसा नहीं तो प्रैशर क्यों बनाया जाए?” डा. विश्वास बोले.

“समधीजी, सावित्री सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आई थी. सत्यवती ने पति को सालभर बाद जीवित कर दिया, यह क्या गलत है? हम अपनी संस्कृति भूल जाएं?

“फिर आप खुद सोचिए, मंजरी और मानस हनीमून से अभी वापस लौटे हैं, महीनाभर भी नहीं हुआ शादी को, समाज क्या कहेगा?” मंजरी की सास बोली.

“मानस कहा है? मंजरी उन्हें बुलाओ”, डा. विश्वास बोले.

“पापा, वे गुस्से में बाहर निकल गए आप को फोन कर के,” मंजरी बोली.

“समधीजी, मानस गुस्से में बाहर चला गया है, मूड सही होगा तो आएगा. कुछ दिनों के लिए मंजरी को ले जाइए,” ससुर बोले.

“ले जाने से पहले एक बार जरूर सोचिए, मंजरी को दाग लग गया है शादीशुदा होने का. घर ले जाने से बदनामी होगी आप की,” सास बोली.

“शरीर के 2 इंच हिस्से से पवित्रअपवित्र कुछ नहीं होता. आप की सोच है, मेरी नहीं,” डा. विश्वास बोले.

“एक बार फिर सोचिए, पति को खुश करने के लिए व्रत रख भी लिया तो क्या हुआ?” ससुर बोले.

“आगे भी सालभर ये सब चलता रहेगा, क्या गलत बोल रहा हूं मैं?” डा. विश्वास ने पूछा, हमारे संस्कार हैं, सालभर व्रतत्योहार चलते भी हैं तो बुरा क्या है?” ससुर बोले.

“ठीक है. मंजरी, अब तुम ही बोलो, क्या फैसला है तुम्हारा,” डा. विश्वास ने मंजरी को देखा.

“पापा, मैं सत्यवती नहीं बनूंगी.”

मंजरी ने पापा का हाथ पकड़ा और घर के बाहर आ गई. Hindi Family Story :

Hindi Satire Story : व्यथा दो घुड़सवारों की – क्या बींद राजा ने मेरी बात मानी ?

Hindi Satire Story : जो  भी घोड़ी पर बैठा उसे रोता हुआ ही देखा है. घोड़ी पर तो हम भी बैठे थे. क्या लड्डू मिल गया, सिवा हाथ मलने के. एक दिन एक आदमी घोड़ी पर चढ़ रहा था. मेरा पड़ोसी था इसलिए मैं ने जा कर उस के पांव पकड़ लिए और बोला, ‘‘इस से बढि़या तो बींद राजा, सूली पर चढ़ जाओ. धीमा जहर पी कर क्यों घुटघुट कर मरना चाहते हो?’’

मेरा पड़ोसी बींद राजा, मेरे प्रलाप को नहीं समझ सका और यह सोच कर कि इसे बख्शीश चाहिए, मुझे 5 का नोट थमाते हुए बोला, ‘‘अब दफा हो जा, दोबारा घोड़ी पर चढ़ने से मत रोकना मुझे,’’ यह कह कर पैर झटका और मुझ से पांव छुड़ा कर वह घुड़सवार बन गया. बहुत पीड़ा हुई कि एक जीताजागता स्वस्थ आदमी घोड़ी पर चढ़ कर सीधे मौत के मुंह में जा रहा है.

मैं ने उसे फिर आगाह किया, ‘‘राजा, जिद मत करो. यह घोड़ी है बिगड़ गई तो दांतमुंह दोनों को चौपट कर देगी. भला इसी में है कि इस बाजेगाजे, शोरशराबे तथा बरात की भीड़ से अपनेआप को दूर रखो.’’

बींद पर उन्माद छाया था. मेरी ओर हंस कर बोला, ‘‘कापुरुष, घोड़ी पर चढ़ा भी और रो भी रहा है. मेरी आंखों के सामने से हट जा. विवाह के पवित्र बंधन से घबराता है तथा दूसरों को हतोत्साहित करता है. खुद ने ब्याह रचा लिया और मुझे कुंआरा ही देखना चाहता है, ईर्ष्यालु कहीं का.’’

मैं बोला, ‘‘बींद राजा, यह लो 5 रुपए अपने तथा मेरी ओर से यह 101 रुपए और लो, पर मत चढ़ो घोड़ी पर. यह रेस बहुत बुरी है. एक बार जो भी चढ़ा, वह मुंह के बल गिरता दिखा है. तुम मेरे परिचित हो इसलिए पड़ोसी धर्म के नाते एक अनहोनी को मैं टालना चाहता हूं. बस में, रेल में, हवाईजहाज में, स्कूटर पर या साइकिल पर चढ़ कर कहीं चले जाओ.’’

बींद राजा नहीं माने. घोड़ी पर चढ़ कर ब्याह रचाने चल दिए. लौट कर आए तो पैदल थे. मैं ने छूटते ही कहा, ‘‘लाला, कहां गई घोड़ी?’’

‘‘घोड़ी का अब क्या काम? घोड़ी की जहां तक जरूरत थी वहीं तक रही, फिर चली गई.’’

‘‘इसी गति से तुम्हें साधनहीन बना कर तुम्हारी तमाम सुविधाएं धीरेधीरे छीन ली जाएंगी. कल घोड़ी पर थे, आज जमीन पर. कल तुम्हारे जमीन पर होने पर आपत्ति प्रकट की जाएगी. तब तुम कहोगे कि मैं ने सही कहा था.’’

इस बार भी बींद ने मेरी बात पर गौर नहीं फरमाया तथा ब्याहता बींदणी को ले कर घर में घुस गया. काफी दिनों बाद बींद राजा मिले तो रंक बन चुके थे. बढ़ी हुई दाढ़ी तथा मैले थैले में मूली, पालक व आलूबुखारा ले कर आ रहे थे. मैं ने कहा, ‘‘राजा, क्या बात है? क्या हाल बना लिया? कहां गई घोड़ी. इतना सारा सामान कंधे पर लादे गधे की तरह फिर रहे हो?’’

‘‘भैया, यह तो गृहस्थी का भार है. घोड़ी क्या करेगी इस में.’’

‘‘लाला, दहेज में जो घोड़ी मिली है, उस के क्या हाल हैं. वह सजीसंवरी ऊंची एड़ी के सैंडलों में बनठन कर निकलती है और आप चीकू की तरह पिचक गए हो. भला ऐसे भी घोड़ी से क्या उतरे कि कोई सहारा देने वाला ही नहीं रहा?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. इस बीच मुझे पुत्र लाभ हो चुका है तथा अन्य कई जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. बाकी विशेष कुछ नहीं है,’’ बींद राजा बोले.

‘‘अच्छाभला स्वास्थ्य था राजा आप का. किस मर्ज ने घेरा है कि अपने को भुरता बना बैठे हो.’’

‘‘मर्ज भला क्या होगा. असलियत तो यह है, महंगाई ने इनसान को मार दिया है.’’

‘‘झूठ मत बोलो भाई, घोड़ी पर चढ़ने का फल महंगाई के सिर मढ़ रहे हो. भाई, जो हुआ सो हुआ, पत्नी के सामने ऐसी भी क्या बेचारगी कि आपातकाल लग जाता है. थोड़ी हिम्मत से काम लो. पत्नी के रूप में मिली घोड़ी को कामकाज में लगा दो, तभी यह उपयोगी सिद्ध होगी. किसी प्राइवेट स्कूल में टीचर बनवा दो,’’ मैं ने कहा.

‘‘बकवास मत करो. तुम मुझे समझते क्या हो? इतना कायर तो मैं नहीं कि बीवी की कमाई पर बसर करूं.’’

‘‘भैया, बीवी की कमाई ही अब तुम्हारे जीवन की नैया पार लगा सकती है. ज्यादा वक्त कंधे पर बोझ ढोने से फायदा नहीं है. सोचो और फटाफट पत्नी को घोड़ी बना दो. सच, तुम अब बिना घुड़सवार बने सुखी नहीं रह सकते,’’ मैं ने कहा.

पर इस बार भी राजा बनाम रंक पर मेरी बातों का असर नहीं हुआ और हांफता हुआ घर में जा घुसा तथा रसोईघर में तरकारी काटने लगा.

एक दिन बींद राजा की बींदणी मिली. मैं ने कहा, ‘‘बींदणीजी, बींद राजा पर रहम खाओ. दाढ़ी बनाने को पैसे तो दिया करो और इस जाड़े में एक डब्बा च्यवनप्राश ला दो. घोड़ी से उतरने के बाद वह काफी थक गए हैं?’’

बींदणी ने जवाब दिया, ‘‘लल्ला, अपनी नेक सलाह अपनी जेब में रखो और सुनो, भला इसी में है कि अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाते रहो. दूसरे के बीच में दखल मत दो.’’

मैं ने कहा, ‘‘दूसरे कौन हैं. आप और हम तो एकदूसरे के पड़ोसी हैं. पड़ोसी धर्म के नाते कह रहा हूं कि घोड़े के दानापानी की व्यवस्था सही रखो. उस के पैंटों पर पैबंद लगने लगे हैं. कृपया उस पर इतना कहर मत बरपाइए कि वह धूल चाटता फिरे. किस जन्म का बैर निकाल रही हैं आप. पता नहीं इस देश में कितने घुड़सवार अपने आत्मसम्मान तथा स्वाभिमान के लिए छटपटा रहे हैं.’’

बींदणी ने खींसें निपोर दीं, ‘‘लल्ला, अपना अस्तित्व बचाओ. जीवन संघर्ष में ऐसा नहीं हो कि आप अपने में ही फना हो जाओ.’’

वह भी चली गई. मैं सोचता रहा कि आखिर इस गुलामी प्रथा से एक निर्दोष व्यक्ति को कैसे मुक्ति दिलाई जाए. अपनी तरह ही एक अच्छेभले आदमी को मटियामेट होते देख कर मुझे अत्यंत पीड़ा थी. एक दिन फिर राजा मिल गए. आटे का पीपा चक्की से पिसा कर ला रहे थे. मैं ने कहा, ‘‘अरे, राजा, तुम चक्की से पीपा भी लाने लगे. मेरी सलाह पर गौर किया?’’

‘‘किया था, वह तैयार नहीं है. कहती है हमारे यहां प्रथा नहीं रही है. औरत गृहशोभा होती है और चारदीवारी में ही उसे अपनी लाज बचा कर रहना चाहिए.’’

‘‘लेकिन अब तो लाज के जाने की नौबत आ गई. उस से कहो, तुम्हारे नौकरी करने से ही वह बचाई जा सकती है. तुम ने उसे घोड़ी पर बैठने से पहले का अपना फोटो दिखाया, नहीं दिखाया तो दिखाओ, हो सकता है वह तुम्हारे तंग हुलिया पर तरस खा कर कोई रचनात्मक कदम उठाने को तैयार हो जाए. स्त्रियों में संवेदना गहनतम पाई जाती है.’’

इस पर पूर्व घुड़सवार बींद राजा बिदक पड़े, ‘‘यह सरासर झूठ है. स्त्रियां बहुत निष्ठुर और निर्लज्ज होती हैं. तुम ने घोड़ी पर बैठते हुए मेरा पांव सही पकड़ा था. पर मैं उसे समझ नहीं पाया. आज मुझे सारी सचाइयां अपनी आंखों से दीख रही हैं.’’

‘‘घबराओ नहीं मेरे भाई, जो हुआ सो हुआ. अब तो जो हो गया है तथा उस से जो दिक्कतें खड़ी हो गई हैं, उन के निदान व निराकरण का सवाल है.’’

इस बार वह मेरे पांव पड़ गया और रोता हुआ बोला, ‘‘मुझे बचाओ मेरे भाई. मेरे साथ अन्याय हुआ है. मैं फिल्म संगीत गाया करता था, तेलफुलेल तथा दाढ़ी नियमित रूप से बनाया करता था. तकदीर ने यह क्या पलटा खाया है कि तमाम उम्मीदों पर पानी फिर गया.’’

मैं ने उसे उठा कर गले से लगाया और रोने में उस का साथ देते हुए मैं बोला, ‘‘हम एक ही पथ के राही हैं भाई. जो रोग तुम्हें है वही मुझे है. इसलिए दवा भी एक ही मिलनी चाहिए. परंतु होनी को टाले कौन, हमें इसे तकदीर मान कर हिम्मत से काम करना चाहिए.’’ Hindi Satire Story :

Hindi Family Story : सोने का झुमका – पूर्णिमा का सोने का झुमका खोते ही मच गया कोहराम

Hindi Family Story :

जगदीश की मां रसोईघर से बाहर निकली ही थी कि कमरे से बहू के रोने की आवाज आई. वह सकते में आ गई. लपक कर बहू के कमरे में पहुंची.

‘‘क्या हुआ, बहू?’’

‘‘मांजी…’’ वह कमरे से बाहर निकलने ही वाली थी. मां का स्वर सुन वह एक हाथ दाहिने कान की तरफ ले जा कर घबराए स्वर में बोली, ‘‘कान का एक झुमका न जाने कहां गिर गया है.’’

‘‘क…क्या?’’

‘‘पूरे कमरे में देख डाला है, मांजी, पर न जाने कहां…’’ और वह सुबकसुबक कर रोने लगी.

‘‘यह तो बड़ा बुरा हुआ, बहू,’’ एक हाथ कमर पर रख कर वह बोलीं, ‘‘सोने का खोना बहुत अशुभ होता है.’’

‘‘अब क्या करूं, मांजी?’’

‘‘चिंता मत करो, बहू. पूरे घर में तलाश करो, शायद काम करते हुए कहीं गिर गया हो.’’

‘‘जी, रसोईघर में भी देख लेती हूं, वैसे सुबह नहाते वक्त तो था.’’ जगदीश की पत्नी पूर्णिमा ने आंचल से आंसू पोंछे और रसोईघर की तरफ बढ़ गई. सास ने भी बहू का अनुसरण किया.

रसोईघर के साथ ही कमरे की प्रत्येक अलमारी, मेज की दराज, शृंगार का डब्बा और न जाने कहां-कहां ढूंढ़ा गया, मगर कुछ पता नहीं चला.

अंत में हार कर पूर्णिमा रोने लगी. कितनी परेशानी, मुसीबतों को झेलने के पश्चात जगदीश सोने के झुमके बनवा कर लाया था.

तभी किसी ने बाहर से पुकारा. वह बंशी की मां थी. शायद रोनेधोने की आवाज सुन कर आई थी. जगदीश के पड़ोस में ही रहती थी. काफी बुजुर्ग होने की वजह से पासपड़ोस के लोग उस का आदर करते थे. महल्ले में कुछ भी होता, बंशी की मां का वहां होना अनिवार्य समझा जाता था. किसी के घर संतान उत्पन्न होती तो सोहर गाने के लिए, शादीब्याह होता तो मंगल गीत और गारी गाने के लिए उस को विशेष रूप से बुलाया जाता था. जटिल पारिवारिक समस्याएं, आपसी मतभेद एवं न जाने कितनी पहेलियां हल करने की क्षमता उस में थी.

‘‘अरे, क्या हुआ, जग्गी की मां? यह रोनाधोना कैसा? कुशल तो है न?’’ बंशी की मां ने एकसाथ कई सवाल कर डाले.

पड़ोस की सयानी औरतें जगदीश को अकसर जग्गी ही कहा करती थीं.

‘‘क्या बताऊं, जीजी…’’ जगदीश की मां रोंआसी आवाज में बोली, ‘‘बहू के एक कान का झुमका खो गया है. पूरा घर ढूंढ़ लिया पर कहीं नहीं मिला.’’

‘‘हाय राम,’’ एक उंगली ठुड्डी पर रख कर बंशी की मां बोली, ‘‘सोने का खोना तो बहुत ही अशुभ है.’’

‘‘बोलो, जीजी, क्या करूं? पूरे तोले भर का बनवाया था जगदीश ने.’’

‘‘एक काम करो, जग्गी की मां.’’

‘‘बोलो, जीजी.’’

‘‘अपने पंडित दयाराम शास्त्री हैं न, वह पोथीपत्रा विचारने में बड़े निपुण हैं. पिछले दिनों किसी की अंगूठी गुम हो गई थी तो पंडितजी की बताई दिशा पर मिल गई थी.’’

डूबते को तिनके का सहारा मिला. पूर्णिमा कातर दृष्टि से बंशी की मां की तरफ देख कर बोली, ‘‘उन्हें बुलवा दीजिए, अम्मांजी, मैं आप का एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी.’’

‘‘धैर्य रखो, बहू, घबराने से काम नहीं चलेगा,’’ बंशी की मां ने हिम्मत बंधाते हुए कहा.

बंशी की मां ने आननफानन में पंडित दयाराम शास्त्री के घर संदेश भिजवाया. कुछ समय बाद ही पंडितजी जगदीश के घर पहुंच गए. अब तक पड़ोस की कुछ औरतें और भी आ गई थीं. पूर्णिमा आंखों में आंसू लिए यह जानने के लिए उत्सुक थी कि देखें पंडितजी क्या बतलाते हैं.

पूरी घटना जानने के बाद पंडितजी ने सरसरी निगाहों से सभी की तरफ देखा और अंत में उन की नजर पूर्णिमा पर केंद्रित हो गई, जो सिर झुकाए अपराधिन की भांति बैठी थी.

‘‘बहू का राशिफल क्या है?’’

‘‘कन्या राशि.’’

‘‘ठीक है.’’ पंडितजी ने अपने सिर को इधरउधर हिलाया और पंचांग के पृष्ठ पलटने लगे. आखिर एक पृष्ठ पर उन की निगाहें स्थिर हो गईं. पृष्ठ पर बनी वर्गाकार आकृति के प्रत्येक वर्ग में उंगली फिसलने लगी.

‘‘हे राम…’’ पंडितजी बड़बड़ा उठे, ‘‘घोर अनर्थ, अमंगल ही अमंगल…’’

सभी औरतें चौंक कर पंडितजी का मुंह ताकने लगीं. पूर्णिमा का दिल जोरों से धड़कने लगा था.

पंडितजी बोले, ‘‘आज सुबह से गुरु कमजोर पड़ गया है. शनि ने जोर पकड़ लिया है. ऐसे मौके पर सोने की चीज खो जाना अशुभ और अमंगलकारी है.’’

पूर्णिमा रो पड़ी. जगदीश की मां व्याकुल हो कर बंशी की मां से बोली, ‘‘हां, जीजी, अब क्या करूं? मुझ से बहू का दुख देखा नहीं जाता.’’

बंशी की मां पंडितजी से बोली, ‘‘दया कीजिए, पंडितजी, पहले ही दुख की मारी है. कष्ट निवारण का कोई उपाय भी तो होगा?’’

‘‘है क्यों नहीं?’’ पंडितजी आंख नचा कर बोले, ‘‘ग्रहों को शांत करने के लिए पूजापाठ, दानपुण्य, धर्मकर्म ऐसे कई उपाय हैं.’’

‘‘पंडितजी, आप जो पूजापाठ करवाने  को कहेंगे, सब कराऊंगी.’’ जगदीश की मां रोंआसे स्वर में बोली, ‘‘कृपा कर के बताइए, झुमका मिलने की आशा है या नहीं?’’

‘‘हूं…हूं…’’ लंबी हुंकार भरने के पश्चात पंडितजी की नजरें पुन: पंचांग पर जम गईं. उंगलियों की पोरों में कुछ हिसाब लगाया और नेत्र बंद कर लिए.

माहौल में पूर्ण नीरवता छा गई. धड़कते दिलों के साथ सभी की निगाहें पंडितजी की स्थूल काया पर स्थिर हो गईं.

पंडितजी आंख खोल कर बोले, ‘‘खोई चीज पूर्व दिशा को गई है. उस तक पहुंचना बहुत ही कठिन है. मिल जाए तो बहू का भाग्य है,’’ फिर पंचांग बंद कर के बोले, ‘‘जो था, सो बता दिया. अब हम चलेंगे, बाहर से कुछ जजमान आए हैं.’’

पूरे सवा 11 रुपए प्राप्त करने के पश्चात पंडित दयाराम शास्त्री सभी को आसीस देते हुए अपने घर बढ़ लिए. वहां का माहौल बोझिल हो उठा था. यदाकदा पूर्णिमा की हिचकियां सुनाई पड़ जाती थीं. थोड़ी ही देर में बंशीं की मां को छोड़ कर पड़ोस की शेष औरतें भी चली गईं.

‘‘पंडितजी ने पूरब दिशा बताई है,’’ बंशी की मां सोचने के अंदाज में बोली.

‘‘पूरब दिशा में रसोईघर और उस से लगा सरजू का घर है.’’ फिर खुद ही पश्चात्ताप करते हुए जगदीश की मां बोलीं, ‘‘राम…राम, बेचारा सरजू तो गऊ है, उस के संबंध में सोचना भी पाप है.’’

‘‘ठीक कहती हो, जग्गी की मां,’’ बंशी की मां बोली, ‘‘उस का पूरा परिवार ही सीधा है. आज तक किसी से लड़ाई-झगड़े की कोई बात सुनाई नहीं पड़ी है.’’

‘‘उस की बड़ी लड़की तो रोज ही समय पूछने आती है. सरजू तहसील में चपरासी है न,’’ फिर पूर्णिमा की तरफ देख कर बोली, ‘‘क्यों, बहू, सरजू की लड़की आई थी क्या?’’

‘‘आई तो थी, मांजी.’’

‘‘लोभ में आ कर शायद झुमका उस ने उठा लिया हो. क्यों जग्गी की मां, तू कहे तो बुला कर पूछूं?’’

‘‘मैं क्या कहूं, जीजी.’’

पूर्णिमा पसोपेश में पड़ गई. उसे लगा कि कहीं कोई बखेड़ा न खड़ा हो जाए. यह तो सरासर उस बेचारी पर शक करना है. वह बात के रुख को बदलने के लिए बोली, ‘‘क्यों, मांजी, रसोईघर में फिर से क्यों न देख लिया जाए,’’ इतना कह कर पूर्णिमा रसोईघर की तरफ बढ़ गई.

दोनों ने उस का अनुसरण किया. तीनों ने मिल कर ढूंढ़ना शुरू किया. अचानक बंशी की मां को एक गड्ढा दिखा, जो संभवत: चूहे का बिल था.

‘‘क्यों, जग्गी की मां, कहीं ऐसा तो नहीं कि चूहे खाने की चीज समझ कर…’’ बोलतेबोलते बंशी की मां छिटक कर दूर जा खड़ी हुई, क्योंकि उसी वक्त पतीली के पीछे छिपा एक चूहा बिल के अंदर समा गया था.

‘‘बात तो सही है, जीजी, चूहों के मारे नाक में दम है. एक बार मेरा ब्लाउज बिल के अंदर पड़ा मिला था. कमबख्तों ने ऐसा कुतरा, जैसे महीनों के भूखे रहे हों,’’ फिर गड्ढे के पास बैठते हुए बोली, ‘‘हाथ डाल कर देखती हूं.’’

‘‘ठहरिए, मांजी,’’ पूर्णिमा ने टोकते हुए कहा, ‘‘मैं अभी टार्च ले कर आती हूं.’’

चूंकि बिल दीवार में फर्श से थोड़ा ही ऊपर था, इसलिए जगदीश की मां ने मुंह को फर्श से लगा दिया. आसानी से देखने के लिए वह फर्श पर लेट सी गईं और बिल के अंदर झांकने का प्रयास करने लगीं.

‘‘अरे जीजी…’’ वह तेज स्वर में बोली, ‘‘कोई चीज अंदर दिख तो रही है. हाथ नहीं पहुंच पाएगा. अरे बहू, कोई लकड़ी तो दे.’’

जगदीश की मां निरंतर बिल में उस चीज को देख रही थी. वह पलकें झपकाना भूल गई थी. फिर वह लकड़ी डाल कर उस चीज को बाहर की तरफ लाने का प्रयास करने लगी. और जब वह चीज निकली तो सभी चौंक पड़े. वह आम का पीला छिलका था, जो सूख कर सख्त हो गया था और कोई दूसरा मौका होता तो हंसी आए बिना न रहती.

बंशी की मां समझाती रही और चलने को तैयार होते हुए बोली, ‘‘अब चलती हूं. मिल जाए तो मुझे खबर कर देना, वरना सारी रात सो नहीं पाऊंगी.’’

बंशी की मां के जाते ही पूर्णिमा फफक-फफक कर रो पड़ी.

‘‘रो मत, बहू, मैं जगदीश को समझा दूंगी.’’

‘‘नहीं, मांजी, आप उन से कुछ मत कहिएगा. मौका आने पर मैं उन्हें सबकुछ बता दूंगी.’’

शाम को जगदीश घर लौटा तो बहुत खुश था. खुशी का कारण जानने के लिए उस की मां ने पूछा, ‘‘क्या बात है, बेटा, आज बहुत खुश हो?’’

‘‘खुशी की बात ही है, मां,’’ जगदीश पूर्णिमा की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘पूर्णिमा के बड़े भैया के 4 लड़कियों के बाद लड़का हुआ है.’’ खुशी तो पूर्णिमा को भी हुई, मगर प्रकट करने में वह पूर्णतया असफल रही.

कपड़े बदलने के बाद जगदीश हाथमुंह धोने चला गया और जाते-जाते कह गया, ‘‘पूर्णिमा, मेरी पैंट की जेब में तुम्हारे भैया का पत्र है, पढ़ लेना.’’

पूर्णिमा ने भारी मन लिए पैंट की जेब में हाथ डाल कर पत्र निकाला. पत्र के साथ ही कोई चीज खट से जमीन पर गिर पड़ी. पूर्णिमा ने नीचे देखा तो मुंह से चीख निकल गई. हर्ष से चीखते हुए बोली, ‘‘मांजी, यह रहा मेरा खोया हुआ सोने का झुमका.’’

‘‘सच, मिल गया झुमका,’’ जगदीश की मां ने प्रेमविह्वल हो कर बहू को गले से लगा लिया.

उसी वक्त कमरे में जगदीश आ गया. दिन भर की कहानी सुनतेसुनते वह हंस कर बिस्तर पर लेट गया. और जब कुछ हंसी थमी तो बोला, ‘‘दफ्तर जाते वक्त मुझे कमरे में पड़ा मिला था. मैं पैंट की जेब में रख कर ले गया. सोचा था, लौट कर थोड़ा डाटूंगा. लेकिन यहां तो…’’ और वह पुन: खिलखिला कर हंस पड़ा.

पूर्णिमा भी हंसे बिना न रही.

‘‘बहू, तू जगदीश को खाना खिला. मैं जरा बंशी की मां को खबर कर दूं. बेचारी को रात भर नींद नहीं आएगी,’’ जगदीश की मां लपक कर कमरे से बाहर निकल गई.

Hindi Family Story :

Hindi Family Story : एक तीर दो शिकार – आरती ने किस की अक्ल ठिकाने लगाई ?

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अटैची हाथ में पकड़े आरती ड्राइंगरूम में आईं तो राकेश और सारिका चौंक कर खडे़ हो गए.

‘‘मां, अटैची में क्या है?’’ राकेश ने माथे पर बल डाल कर पूछा.

‘‘फ्रिक मत कर. इस में तेरी बहू के जेवर नहीं. बस, मेरा कुछ जरूरी सामान है,’’ आरती ने उखड़े लहजे में जवाब दिया.

‘‘किस बात पर गुस्सा हो?’’

अपने बेटे के इस प्रश्न का आरती ने कोई जवाब नहीं दिया तो राकेश ने अपनी पत्नी की तरफ प्रश्नसूचक निगाहों से देखा.

‘‘नहीं, मैं ने मम्मी से कोई झगड़ा नहीं किया है,’’ सारिका ने फौरन सफाई दी, लेकिन तभी कुछ याद कर के वह बेचैन नजर आने लगी.

राकेश खामोश रह कर सारिका के आगे बोलने का इंतजार करने लगा.

‘‘बात कुछ खास नहीं थी…मम्मी फ्रिज से कल रात दूध निकाल रही थीं…मैं ने बस, यह कहा था कि सुबह कहीं मोहित के लिए दूध कम न पड़ जाए…कल चाय कई बार बनी…मुझे कतई एहसास नहीं हुआ कि उस छोटी सी बात का मम्मी इतना बुरा मान जाएंगी,’’ अपनी बात खत्म करने तक सारिका चिढ़ का शिकार बन गई.

‘‘मां, क्या सारिका से नाराज हो?’’ राकेश ने आरती को मनाने के लिए अपना लहजा कोमल कर लिया.

‘‘मैं इस वक्त कुछ भी कहनेसुनने के मूड में नहीं हूं. तू मुझे राजनगर तक का रिकशा ला दे, बस,’’ आरती की नाराजगी उन की आवाज में अब साफ झलक उठी.

‘‘क्या आप अंजलि दीदी के घर जा रही हो?’’

‘‘हां.’’

‘‘बेटी के घर अटैची ले कर रहने जा रही होे?’’ राकेश ने बड़ी हैरानी जाहिर की.

‘‘जब इकलौते बेटे के घर में विधवा मां को मानसम्मान से जीना नसीब न हो तो वह बेटी के घर रह सकती है,’’ आरती ने जिद्दी लहजे में दलील दी.

‘‘तुम गुस्सा थूक दो, मां. मैं सारिका को डांटूंगा.’’

‘‘नहीं, मेरे सब्र का घड़ा अब भर चुका है. मैं किसी हाल में नहीं रुकूंगी.’’

‘‘कुछ और बातें भी क्या तुम्हें परेशान और दुखी कर रही हैं?’’

‘‘अरे, 1-2 नहीं बल्कि दसियों बातें हैं,’’ आरती अचानक फट पड़ीं, ‘‘मैं तेरे घर की इज्जतदार बुजुर्ग सदस्य नहीं बल्कि आया और महरी बन कर रह गई हूं…मेरा स्वास्थ्य अच्छा है, तो इस का मतलब यह नहीं कि तुम महरी भी हटा दो…मुझे मोहित की आया बना कर आएदिन पार्टियों में चले जाओ…तुम दोनों के पास ढंग से दो बातें मुझ से करने का वक्त नहीं है…उस शाम मेरी छाती में दर्द था तो तू डाक्टर के पास भी मुझे नहीं ले गया…’’

‘‘मां, तुम्हें बस, एसिडिटी थी जो डाइजीन खा कर ठीक भी हो गई थी.’’

‘‘अरे, अगर दिल का दौरा पड़ने का दर्द होता तो तेरी डाइजीन क्या करती? तुम दोनों के लिए अपना आराम, अपनी मौजमस्ती मेरे सुखदुख का ध्यान रखने से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. मेरी तो मेरी तुम दोनों को बेचारे मोहित की फिक्र भी नहीं. अरे, बच्चे की सारी जिम्मेदारियां दादी पर डालने वाले तुम जैसे लापरवाह मातापिता शायद ही दूसरे होंगे,’’ आरती ने बेझिझक उन्हें खरीखरी सुना दीं.

‘‘मम्मी, हम इतने बुरे नहीं हैं जितने आप बता रही हो. मुझे लगता है कि आज आप तिल का ताड़ बनाने पर आमादा हो,’’ सारिका ने बुरा सा मुंह बना कर कहा.

‘‘अच्छे हो या बुरे, अब अपनी घरगृहस्थी तुम दोनों ही संभालो.’’

‘‘मैं आया का इंतजाम कर लूं, फिर आप चली जाना.’’

‘‘जब तक आया न मिले तुम आफिस से छुट्टी ले लेना. मोहित खेल कर लौट आया तो मुझे जाते देख कर रोएगा. चल, रिकशा करा दे मुझे,’’ आरती ने सूटकेस राकेश को पकड़ाया और अजीब सी अकड़ के साथ बाहर की तरफ चल पड़ीं.

‘पता नहीं मां को अचानक क्या हो गया? यह जिद्दी इतनी हैं कि अब किसी की कोई बात नहीं सुनेंगी,’ बड़बड़ाता हुआ राकेश अटैची उठा कर अपनी मां के पीछे चल पड़ा.

परेशान सारिका को नई आया का इंतजाम करने के लिए अपनी पड़ोसिनों की मदद चाहिए थी. वह उन के घरों के फोन नंबर याद करते हुए फोन की तरफ बढ़ चली.

करीब आधे घंटे के बाद आरती अपने दामाद संजीव के घर में बैठी हुई थीं. अपनी बेटी अंजलि और संजीव के पूछने पर उन्होंने वही सब दुखड़े उन को सुना दिए जो कुछ देर पहले अपने बेटेबहू को सुनाए थे.

‘‘आप वहां खुश नहीं हैं, इस का कभी एहसास नहीं हुआ मुझे,’’ सारी बातें सुन कर संजीव ने आश्चर्य व्यक्त किया.

‘‘अपने दिल के जख्म जल्दी से किसी को दिखाना मेरी आदत नहीं है, संजीव. जब पानी सिर के ऊपर हो गया, तभी अटैची ले कर निकली हूं,’’ आरती का गला रुंध गया.

‘‘मम्मी, यह भी आप का ही घर है. आप जब तक दिल करे, यहां रहें. सोनू और प्रिया नानी का साथ पा कर बहुत खुश होंगे,’’ संजीव ने मुसकराते हुए उन्हें अपने घर में रुकने का निमंत्रण दे दिया.

‘‘यहां बेटी के घर में रुकना मुझे अच्छा…’’

‘‘मां, बेकार की बातें मत करो,’’ अंजलि ने प्यार से आरती को डपट दिया, ‘‘बेटाबेटी में यों अंतर करने का समय अब नहीं रहा है. जब तक मैं उस नालायक राकेश की अक्ल ठिकाने न लगा दूं, तब तक तुम आराम से यहां रहो.’’

‘‘बेटी, आराम करने के चक्कर में फंस कर ही तो मैं ने अपनी यह दुर्गति कराई है. अब आराम नहीं, मैं काम करूंगी,’’ आरती ने दृढ़ स्वर में मन की इच्छा जाहिर की.

‘‘मम्मी, इस उम्र में क्या काम करोगी आप? और काम करने के झंझट में क्यों फंसना चाहती हो?’’ संजीव परेशान नजर आने लगा.

‘‘काम मैं वही करूंगी जो मुझे आता है,’’ आरती बेहद गंभीर हो उठीं, ‘‘जब अंजलि के पापा इस दुनिया से अकस्मात चले गए तब यह 8 और राकेश 6 साल के थे. मैं ससुराल में नहीं रही क्योेंकि मुझ विधवा की उस संयुक्त परिवार में नौकरानी की सी हैसियत थी.

‘‘अपने आत्मसम्मान को बचाए रखने के लिए मैं ने ससुराल को छोड़ा. दिन में बडि़यांपापड़ बनाती और रात को कपड़े सिलती. आज फिर मैं सम्मान से जीना चाहती हूं. अपने बेटेबहू के सामने हाथ नहीं फैलाऊंगी. कल सुबह अंजलि मुझे ले कर शीला के पास चलेगी.’’

‘‘यह शीला कौन है?’’ संजीव ने उत्सुकता दर्शाई.

‘‘मेरी बहुत पुरानी सहेली है. उस नेबडि़यांपापड़ बनाने का लघुउद्योग कायम कर रखा है. वह मुझे भी काम देगी. अगर रहने का इंतजाम भी उस ने कर दिया तो मैं यहां नहीं…’’

‘‘नहीं, मां, तुम यहीं रहोगी,’’ अंजलि ने उन्हें अपनी बात पूरी नहीं करने दी और आवेश भरे लहजे में बोली,  ‘‘जिस घर में तुम्हारे बेटाबहू ठाट से रह रहे हैं, वह घर आज भी तुम्हारे नाम है. अगर बेघर हो कर किसी को धक्के खाने ही हैं तो वह तुम नहीं वे होंगे.’’

‘‘तू इतना गुस्सा मत कर, बेटी.’’

‘‘मां, तुम ने कभी अपने दुखदर्द की तरफ पहले जरा सा इशारा किया होता तो अब तक मैं ने राकेश और सारिका के होश ठिकाने लगा दिए होते.’’

‘‘अब मैं काम करना शुरू कर के आत्मनिर्भर हो जाऊंगी तो सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मुझे तुम पर गर्व है, मां,’’ आरती के गले लग कर अंजलि ने अपने पति को बताया, ‘‘मुझे वह समय याद है जब मां अपना सुखचैन भुला कर दिनरात मेहनत करती थीं. हमें ढंग से पालपोस कर काबिल बनाने की धुन हमेशा इन के सिर पर सवार रहती थी.

‘‘आज राकेश बैंक आफिसर और मैं पोस्टग्रेजुएट हूं तो यह मां की मेहनत का ही फल है. लानत है राकेश पर जो आज वह मां की उचित देखभाल नहीं कर रहा है.’’

‘‘मेरी यह बेटी भी कम हिम्मती नहीं है, संजीव,’’ आरती ने स्नेह से अंजलि का सिर सहलाया, ‘‘पापड़बडि़यां बनाने में यह मेरा पूरा हाथ बटाती थी. पढ़ने में हमेशा अच्छी रही. मेरा बुरा वक्त न होता तो जरूर डाक्टर बनती मेरी गुडि़या.’’

‘‘आप दोनों बैठ कर बातें करो. मैं जरा एक बीमार दोस्त का हालचाल पूछने जा रहा हूं. मम्मी, आप यहां रुकने में जरा सी भी हिचक महसूस न करें. राकेश और सारिका को मैं समझाऊंगा तो सब ठीक हो जाएगा,’’ संजीव उन के बीच से उठ कर अपने कमरे में चला गया.

कुछ देर बाद वह तैयार हो कर बाहर चला गया. उस के बदन से आ रही इत्र की खुशबू को अंजलि ने तो नहीं, पर आरती ने जरूर नोट किया.

‘‘कौन सा दोस्त बीमार है संजीव का?’’ आरती ने अपने स्वर को सामान्य रखते हुए अंजलि से पूछा.

‘‘मुझे पता नहीं,’’ अंजलि ने लापरवाह स्वर में जवाब दिया.

‘‘बेटी, पति के दोस्तों की…उस के आफिस की गतिविधियों की जानकारी हर समझदार पत्नी को रखनी चाहिए.’’

‘‘मां, 2 बच्चों को संभालने में मैं इतनी व्यस्त रहती हूं कि इन बातों के लिए फुर्सत ही नहीं बचती.’’

‘‘अपने लिए वक्त निकाला कर, बनसंवर कर रहा कर…कुछ समय वहां से बचा कर संजीव को खुश करने के लिए लगाएगी तो उसे अच्छा लगेगा.’’

‘‘मैं जैसी हूं, उन्हें बेहद पसंद हूं, मां. तुम मेरी फिक्र न करो और यह बताओ कि क्या कल सुबह तुम सचमुच शीला आंटी के पास काम मांगने जाओगी?’’ अपनी आंखों में चिंता के भाव ला कर अंजलि ने विषय परिवर्तन कर दिया था.

आरती काम पर जाने के लिए अपने फैसले पर जमी रहीं. उन के इस फैसले का अंजलि ने स्वागत किया.

रात को राकेश और सारिका ने आरती से फोन पर बात करनी चाही, पर वह तैयार नहीं हुईं.

अंजलि ने दोनों को खूब डांटा. सारिका ने उस की डांट खामोश रह कर सुनी, पर राकेश ने इतना जरूर कहा, ‘‘मां ने कभी पहले शिकायत का एक शब्द भी मुंह से निकाला होता तो मैं जरूर काररवाई करता. मुझे सपना तो नहीं आने वाला था कि वह घर में दुख और परेशानी के साथ रह रही हैं. उन्हें घर छोड़ने से पहले हम से बात करनी चाहिए थी.’’

अंजलि ने जब इस बारे में मां से सवाल किया तो वह नींद आने की बात कह सोने चली गईं. उन के सोने का इंतजाम सोनू और प्रिया के कमरे में किया गया था.

उन दोनों बच्चों ने नानी से पहले एक कहानी सुनी और फिर लिपट कर सो गए. आरती को मोहित बहुत याद आ रहा था. इस कारण वह काफी देर से सो सकी थीं.

अगले दिन बच्चों को स्कूल और संजीव को आफिस भेजने के बाद अंजलि मां के साथ शीला से मिलने जाने के लिए घर से निकली थी.

शीला का कुटीर उद्योग बड़ा बढि़या चल रहा था. घर की पहली मंजिल पर बने बडे़ हाल में 15-20 औरतें बडि़यांपापड़ बनाने के काम में व्यस्त थीं.

वह आरती के साथ बड़े प्यार से मिलीं. पहले उन्होंने पुराने वक्त की यादें ताजा कीं. चायनाश्ते के बाद आरती ने उन्हें अपने आने का मकसद बताया तो वह पहले तो चौंकीं और फिर गहरी सांस छोड़ कर मुसकराने लगीं.

‘‘अगर दिल करे तो अपनी परेशानियों की चर्चा कर के अपना मन जरूर हलका कर लेना, आरती. कभी तुम मेरा सहारा बनी थीं और आज फिर तुम्हारा साथ पा कर मैं खुश हूं. मेरा दायां हाथ बन कर तुम चाहो तो आज से ही काम की देखभाल में हाथ बटाओ.’’

अपनी सहेली की यह बात सुन कर आरती की पलकें नम हो उठी थीं.

आरती और अंजलि ने वर्षों बाद पापड़बडि़यां बनाने का काम किया. उन दोनों की कुशलता जल्दी ही लौट आई. बहुत मजा आ रहा था दोनों को काम करने में.

कब लंच का समय हो गया उन्हें पता ही नहीं चला. अंजलि घर लौट गई क्योंकि बच्चों के स्कूल से लौटने का समय हो रहा था. आरती को शीला ने अपने साथ खाना खिलाया.

आरती शाम को घर लौटीं तो बहुत प्रसन्न थीं. संजीव को उन्होंने अपने उस दिन के अनुभव बडे़ जोश के साथ सुनाए.

रात को 8 बजे के करीब राकेश और सारिका मोहित को साथ ले कर वहां आ पहुंचे. उन को देख कर अंजलि का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया.

बड़ी कठिनाई से संजीव और आरती उस के गुस्से को शांत कर पाए. चुप होतेहोते भी अंजलि ने अपने भाई व भाभी को खूब खरीखोटी सुना दी थीं.

‘‘मां, अब घर चलो. इस उम्र में और हमारे होते हुए तुम्हें काम पर जाने की कोई जरूरत नहीं है. दुनिया की नजरों में हमें शर्मिंदा करा कर तुम्हें क्या मिलेगा?’’ राकेश ने आहत स्वर में प्रश्न किया.

‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कहनासुनना चाहती हूं. तुम लोग चाय पिओ, तब तक मैं मोहित से बातें कर लूं,’’ आरती ने अपने 5 वर्षीय पोते को गोद में उठाया और ड्राइंगरूम से उठ कर बच्चों के कमरे में चली आईं.

उस रात राकेश और सारिका आरती को साथ वापस ले जाने में असफल रहे. लौटते समय दोनों का मूड बहुत खराब हो रहा था.

‘‘मम्मी अभी गुस्से में हैं. कुछ दिनों के बाद उन्हें समझाबुझा कर हम भेज देंगे,’’ संजीव ने उन्हें आश्वासन दिया.

‘‘उन्हें पापड़बडि़यां बनाने के काम पर जाने से भी रोको, जीजाजी,’’ राकेश ने प्रार्थना की, ‘‘जो भी इस बात को सुनेगा, हम पर हंसेगा.’’

‘‘राकेश, मेहनत व ईमानदारी से किए जाने वाले काम पर मूर्ख लोग ही हंसते हैं. मां ने यही काम कर के हमें पाला था. कभी जा कर देखना कि शीला आंटी के यहां काम करने वाली औरतों के चेहरों पर स्वाभिमान और खुशी की कैसी चमक मौजूद रहती है. थोड़े से समय के लिए मैं भी वहां रोज जाया करूंगी मां के साथ,’’ अपना फैसला बताते हुए अंजलि बिलकुल भी नहीं झिझकी थी.

बाद में संजीव ने उसे काम पर न जाने के लिए कुछ देर तक समझाया भी, पर अंजलि ने अपना फैसला नहीं बदला.

‘‘मेरी बेटी कुछ मामलों में मेरी तरह से ही जिद्दी और धुन की पक्की है, संजीव. यह किसी पर अन्याय होते भी नहीं देख सकती. तुम नाराज मत हो और कुछ दिनों के लिए इसे अपनी इच्छा पूरी कर लेने दो. घर के काम का हर्जा, इस का हाथ बटा कर मैं नहीं होने दूंगी. तुम बताओ, तुम्हारे दोस्त की तबीयत कैसी है?’’ आरती ने अचानक विषय परिवर्तन कर दिया.

‘‘मेरे दोस्त की तबीयत को क्या हुआ है?’’ संजीव चौंका.

‘‘अरे, कल तुम अपने एक बीमार दोस्त का हालचाल पूछने गए थे न.’’

‘‘हां, हां…वह…अब ठीक है…बेहतर है…’’ अचानक बेचैन नजर आ रहे संजीव ने अखबार उठा कर उसे आंखों के सामने यों किया मानो आरती की नजरों से अपने चेहरे के भावों को छिपा रहा हो.

आरती ने अंजलि की तरफ देखा पर उस का ध्यान उन दोनों की तरफ न हो कर प्रिया की चोटी खोलने की तरफ लगा हुआ था.

आरती के साथ अंजलि भी रोज पापड़बडि़यां बनाने के काम पर जाती. मां शाम को लौटती पर बेटी 12 बजे तक लौट आती. दोनों इस दिनचर्या से बेहद खुश थीं. मोहित को याद कर के आरती कभीकभी उदास हो जातीं, नहीं तो बेटी के घर उन का समय बहुत अच्छा बीत रहा था.

आरती को वापस ले जाने में राकेश और सारिका पूरे 2 हफ्ते के बाद सफल हुए.

‘‘आया की देखभाल मोहित के लिए अच्छी नहीं है, मम्मी. वह चिड़चिड़ा और कमजोर होता जा रहा है. सारा घर आप की गैरमौजूदगी में बिखर सा गया है. मैं हाथ जोड़ कर प्रार्थना करती हूं…अपनी सारी गलतियां सुधारने का वादा करती हूं…बस, अब आप घर चलिए, प्लीज,’’ हाथ जोड़ कर यों विनती कर रही बहू को आरती ने अपनी छाती से लगाया और घर लौटने को राजी हो गईं.

अंजलि ने पहले ही यह सुनिश्चित करवा लिया कि घर में झाड़ूपोछा करने व बरतन मांजने वाली बाई आती रहेगी. वह तो आया को भी आगे के लिए रखवाना चाहती थी पर इस के लिए आरती ही तैयार नहीं हुईं.

‘‘मैं जानती थी कि आज मुझे लौटना पडे़गा. इसीलिए मैं शीला से 15 दिन की अपनी पगार ले आई थी. अब हम सब पहले बाजार चलेंगे. तुम सब को अपने पैसों से मैं दावत दूंगी…और उपहार भी,’’ आरती की इस घोषणा को सुन कर बच्चों ने तालियां बजाईं और खुशी से मुसकरा उठे.

आरती ने हर एक को उस की मनपसंद चीज बाजार में खिलवाई. संजीव और राकेश को कमीज मिली. अंजलि और सारिका ने अपनी पसंद की साडि़यां पाईं. प्रिया ने ड्रेस खरीदी. सोनू को बैट मिला और मोहित को बैटरी से चलने वाली कार.

वापस लौटने से पहले आरती ने अकेले संजीव को साथ लिया और उस आलीशान दुकान में घुस गइ्रं जहां औरतों की हर प्रसाधन सामग्री बिकती थी.

‘‘क्या आप यहां अपने लिए कुछ खरीदने आई हैं, मम्मी?’’ संजीव ने उत्सुकता जताई.

‘‘नहीं, यहां से मैं कुछ बरखा के लिए खरीदना चाहती हूं,’’ आरती ने गंभीर लहजे में जवाब दिया.

‘‘बरखा कौन?’’ एकाएक ही संजीव के चेहरे का रंग उड़ गया.

‘‘तुम्हारी दोस्त जो मेरी सहेली उर्मिला के फ्लैट के सामने वाले फ्लैट में रहती है…वही बरखा जिस से मिलने तुम अकसर उस के फ्लैट पर जाते हो..जिस के साथ तुम ने गलत तरह का रिश्ता जोड़ रखा है.’’

‘‘मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं…’’

‘‘संजीव, प्लीज. झूठ बोलने की कोशिश मत करो और मेरी यह चेतावनी ध्यान से सुनो,’’ आरती ने उस की आंखों में आंखें डाल कर सख्त स्वर में बोलना शुरू किया, ‘‘अंजलि तुम्हारे प्रति…घर व बच्चों के प्रति पूरी तरह से समर्पित है. पिछले दिनों में तुम्हें इस बात का अंदाजा हो गया होगा कि वह अन्याय के सामने चुप नहीं रह सकती…मेरी बेटी मानसम्मान से जीने को सब से महत्त्वपूर्ण मानती है.

‘‘उसे बरखा  की भनक भी लग गई तो तुम्हें छोड़ देगी. मेरी बेटी सूखी रोटी खा लेगी, पर जिएगी इज्जत से. जैसे मैं ने बनाया, वैसे ही वह भी पापड़बडि़यां बना कर अपने बच्चों को काबिल बना लेगी.

‘‘आज के बाद तुम कभी बरखा के फ्लैट पर गए तो मैं खुद तुम्हारा कच्चा चिट्ठा अंजलि के सामने खोलूंगी. तुम्हें मुझे अभी वचन देना होगा कि तुम उस से संबंध हमेशा के लिए समाप्त कर लोगे. अगर तुम ऐसा नहीं करते हो, तो अ%

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Hindi Satire Story : अपनी धरती-अपना देश : हमारे देश का जवाब नहीं

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‘‘कसम ऊपर वाले की, जो दोबारा कभी यूरोप गया. न तो वहां किसी में सिविक सेंस है और न ही नागरिक अधिकारों के बारे में कोई जागरुकता,’’ वह आज ही यूरोप की यात्रा से लौटे थे और पानी पीपी कर यूरोप को कोसे जा रहे थे.

‘‘लेकिन इन मामलों में तो अंगरेज अग्रदूत माने जाते हैं,’’ मैं ने टोका.

‘‘क्या खाक माने जाते हैं,’’ वह गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छनछना उठे, ‘‘यह बताइए कि सांस लेना और खानापीना मनुष्य का मौलिक अधिकार है या नहीं?’’

‘‘है,’’ मैं ने सिर हिलाया.

‘‘तो फिर उगलना और विसर्जन करना भी मौलिक अधिकार हुआ,’’ उन्होंने विजयी मुद्रा में घोषणा की फिर बोले, ‘‘एक अपना देश है जहां चाहो विसर्जन कर लो. आबादी हो या निर्जन, कहीं कोई प्रतिबंध नहीं, लेकिन वहां पेट भले फट जाए पर मकान व दुकान के सामने तो छोड़ो सड़क किनारे भी विसर्जन नहीं कर सकते.’’

‘‘लेकिन वहां सरकार ने जगहजगह साफसुथरे टायलेट बनवा रखे हैं, उन में जाइए,’’ मैं ने समझाया.

‘‘बनवा तो रखे हैं लेकिन अगर हाजत आप को चांदनी चौक में लगी हो और फारिग होने कनाट प्लेस जाना पड़े तो क्या बीतेगी?’’ उन्होंने आंखें तरेरीं फिर तमकते हुए बोले, ‘‘आप को कुछ पता तो है नहीं. घर से बाहर निकलिए, दुनिया देखिए तब अच्छेबुरे में फर्क करने की तमीज पैदा हो पाएगी. तब तक के लिए फुजूल में टांग घुसेड़ने की आदत छोड़ दीजिए.’’

मुझे डपटने के बाद शायद उन्हें कुछ रहम आया. अत: थोड़ा मधुर कंठ से बोले, ‘‘यह बताइए कि आप को जुकाम हो और नाक गंदे नाले की तरह बह रही हो तो क्या करेंगे?’’

‘‘जुकाम की दवा खाएंगे,’’ मैं ने तड़ से बताया.

वह पल भर के लिए हड़बड़ाए. शायद मनमाफिक उत्तर नहीं मिला था. अत: अपने प्रश्न को थोड़ा और संशोधित करते हुए बोले, ‘‘डाक्टर की दुकान में घुसने से पहले क्या करेंगे आप?’’

‘‘जेब टटोल कर देखेंगे कि बटुआ है कि नहीं,’’ मैं ने फिर तड़ से उत्तर दिया.

इस बार उन के सब्र का पैमाना छलक गया. वह हत्थे से उखड़ते हुए बोले, ‘‘क्या बेहूदों की तरह नाक बहाते भीतर घुस जाएंगे और सुपड़सुपड़ कर सब के सामने नाक सुड़किएगा?’’

‘‘जी, नहीं, पहले नाक छिनक कर साफ करूंगा फिर भीतर जाऊंगा,’’ मैं ने कबूला. उन का प्रश्न वाजिब था. पर मेरी ही समझ में कुछ विलंब से आया.

‘‘तो गोया कि आप पहले घर जाएंगे और राजा बेटा की तरह नाक साफ करेंगे फिर वापस आ कर डाक्टर की दुकान में जाएंगे,’’ वह रहस्यमय ढंग से मुसकराए.

‘‘खामखां मैं घर क्यों जाऊंगा? वहीं नाक साफ करूंगा फिर डाक्टर से दवा ले कर घर लौटूंगा,’’ इस बार उखड़ने की बारी मेरी थी.

‘‘यही तो…यही तो…मैं सुनना चाहता था आप की जबान से,’’ वह यों उछले जैसे बहुत बड़ा मैदान मार लिया हो. फिर मेरे कंधों पर हाथ रख भावुक हो उठे, ‘‘वहां जुकाम हो तो सड़क पर नाक नहीं छिनक सकते. कहते हैं रूमाल में पोंछ कर जेब में रख लो. छि…छि…सोच कर भी घिन आती है. उसी रूमाल से मुंह पोंछो, उसी से नाक. दोनों हैं अगलबगल में पर कुदरत ने कुछ सोच कर ही दोनों के छेद अलगअलग बनाए हैं. वह फर्क तो बरकरार रखना चाहिए.’’

‘‘तो 2 रूमाल रख लीजिए,’’ मैं ने उन की भीषण समस्या का आसान सा हल सुझाया फिर समझाने लगा, ‘‘सड़क पर एक इनसान गंदगी करता है तो दूसरे को उस की गंदगी साफ करनी पड़ती है. कितनी गलत बात है यह.’’

‘‘बात गलत नहीं, बल्कि सोच गलत है तुम्हारी,’’ वह शोले से भड़के. फिर मेरी अज्ञानता पर तरस खा शांत स्वर में बोले, ‘‘वैसे देखा जाए तो गलती तुम्हारी नहीं है. गलती तुम्हारी उस शिक्षा की है जो अंगरेजों की देन है.’’

इतना कह कर वह पल भर के लिए ठहरे फिर सांस भरते हुए बोले, ‘‘हम भारतवासी सदा से दयालु रहे हैं. जितना खाते हैं उतना गिराते भी हैं ताकि कीड़ेमकोड़ों और पशुपक्षियों का भी पेट भर सके. लेकिन ये जालिम अंगरेज तो इनसानों का भी भला नहीं सोचते.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं.’’

उन्होंने मुझ पर तरस खाती दृष्टि डाली फिर समझाने की मुद्रा में बोले, ‘‘बरखुरदार, अपने देश में हम लोग परंपरापूर्वक मूंगफली और केला खा कर प्लेटफार्म पर फेंकते हैं, पूर्ण आस्था के साथ पान खा कर आफिस में थूकते हैं. श्रद्धापूर्वक बचाखुचा सामान पार्क में छोड़ देते हैं. इस से समाज का बहुत भला होता है.’’

‘‘समाज का भला?’’

‘‘हां, बहुत बड़ा भला,’’ वह अत्यंत शांत मुद्रा में मुसकराए फिर पूर्ण दार्शनिक भाव से बोले, ‘‘गंदगी मचाने से रोजगार का सृजन होता है क्योंकि अगर गंदगी न हो तो सफाई कर्मचारियों को काम नहीं मिलेगा. बेचारों के परिवार भूखे नहीं मर जाएंगे? लेकिन अंगरेजों को इस से क्या? वे तो हमेशा से मजदूरों के दुश्मन रहे हैं. इतिहास गवाह है कि जब भी किसी इनसान ने अधिकारों की मांग की है, अंगरेजों ने उसे बूटों तले कुचल डाला है. अब दूसरे मुल्कों में उन की हुकूमत तो रही नहीं, इसलिए अपने ही नागरिकों को गुलाम बना लिया. बेचारे अपने ही घर के सामने कूड़ा नहीं फेंक सकते, अपने ही महल्ले में सड़क घेर कर भजनकीर्तन नहीं कर सकते, सुविधानुसार गाड़ी पार्क नहीं कर सकते, अपने ही आफिस में पीक उगलने का आनंद नहीं ले सकते. जरूरत पड़ने पर इच्छानुसार विसर्जन नहीं कर सकते. काहे का लोकतंत्र जहां हर पसंदीदा चीज पर प्रतिबंध हो? सच्चा लोकतंत्र तो अपने यहां है. अपना देश, अपनी धरती. जहां चाहो थूको, जहां चाहो फेंको, जहां चाहो विसर्जन करो, कोई रोकटोक नहीं. इसीलिए तो कहते हैं, मेरा देश महान…’’

वह बोले जा रहे थे और मैं टकटकी बांधे देखे जा रहा था. लग रहा था कि शायद वह सही हैं.

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Hindi Satire Story : आधा है चंद्रमा, रात आधी – कोई जादुई चिराग तो है नहीं

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‘‘मान्यवर, महंगाई के बारे में आप से कुछ बात करनी थी.’’

वह गुस्से से थर्रा उठे थे. कुरसी उन से टकराई थी या वह कुरसी से, मैं नहीं बता सकता.

‘‘इस के लिए आप ने कितनी बार लिख डाला? गिनती में आप बता सकते हैं?’’

‘‘जी, जितनी बार वामपंथियों ने समर्थन वापस लेने की धमकियां दे डालीं,’’ मैं ने विनम्रता से कहा.

‘‘इस मुद्दे पर आप हमारा कितना कीमती समय बरबाद कर चुके हैं, कुछ मालूम है. आप को तो मुल्क की कोई दूसरी समस्या ही नजर नहीं आती… पाकिस्तानी सीमा पर आएदिन गोलीबारी होती रहती है. चीनी सीमा अभी तक विवादित पड़ी है. हम देश की अस्मिता बचाने में परेशान हैं. हमारी आधी सेना उन से लोहा लेने में लगी हुई है…’’

उन के इस धाराप्रवाह उपदेश के दौरान ही मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘और बाकी आधी…’’

उन्होंने गुर्रा कर कहा, ‘‘मुल्क के तमाम हिस्सों में बोरवेलों में गिरने वाले बच्चों को निकालने में…कभी आप ने यह जानना नहीं चाहा कि अंदरूनी हालात भी कम खराब नहीं चल रहे हैं. मुंबई, बनारस, अक्षरधाम, हैदराबाद, बंगलौर, जयपुर के बाद अभी हाल में दिल्ली में आतंकवादी हमलों से देश कांप उठा है. हमारे आधे सुरक्षाबल तो उन्हीं से जूझ रहे हैं.’’

मैं ने प्रश्नवाचक मुंह बनाया, ‘‘बाकी आधे…’’

उन्होंने खट्टी डकार लेते हुए बताया, ‘‘वी.आई.पी. सुरक्षा में मालूम नहीं क्यों लोग अधिकारियों और मंत्रियों का घेराव करते रहते हैं. हमारे पास जादुई चिराग तो है नहीं. किसान कहते हैं अनाज की कीमतें बढ़ाइए, आप कहते हैं घटाइए. आप ही बताइए हम इसे कैसे संतुलित करें? हम तो बीच में कुछ अनाज धर्मकर्म पर या व्यवस्था के नाम पर ही तो लेते हैं. शेष का आधा आप लोगों की सेवा में ही लगाया जाता है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘और बाकी आधा…’’

वह बहुत जोर से झल्ला उठे, ‘‘बाकी आधा सरकारी गोदामों में सड़ जाता है. आप लोग यह जो नेतागीरी करते रहते हैं, हमें काम करने का समय ही नहीं मिल पाता. गोदाम से अनाज निकलवाने के लिए हमें सुप्रीम कोर्ट तक बेकार की दौड़ करनी पड़ती है. यह काम सुप्रीम कोर्ट का है कि दिल्ली की सड़कों की सफाई के लिए भी लोग वहां पहुंच जाते हैं. उस का आधा समय तो यों ही निकल जाता है.’’

‘‘और शेष आधा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आतंकवादियों के मुकदमे सुनने में, पुलिस वालों के मुकदमे सुनने में और सरकारी व संवैधानिक संकट के समय उन को सलाहमशविरा देने में.

‘‘हमारी तो दिली इच्छा है कि हम सरकारों या सियासी पार्टियों को इस दलदल से निकालें. पर ये दोनों ही जनता की आड़ ले कर निकलना ही नहीं चाहते. जो बच्चे बोरवेल से निकलना चाहते थे, निकल लिए. जिन कपड़ों को मौडलों के बदन से निकलना था, निकल लिए. जो आतंकवादी मुल्क से निकलना चाहते थे, निकल लिए. जो अपराधी जेल से निकलना चाहते थे, निकल लिए. जो नेता पार्टी से निकलना चाहते थे, निकल लिए जो ‘बड़े’ घोटालों से निकलना चाहते थे, निकल लिए. स्वाभाविक नींद सोने वालों को तो जगाया जा सकता है, पर जो बन के सो रहे हों, उन्हें कौन जगा सकता है? क्योंकि तेल कंपनियां मुसीबत से निकलना चाहती थीं, प्रधानमंत्री से अपना रोना रोईं, उन्होंने आश्वासन दिया कि वे उन को परेशान नहीं देखना चाहते, कुछ दाम तो बढ़ाने ही होंगे. इस के बाद ‘ब्रांडेड’ पेट्रोल और बढ़े हुए दामों पर आ गया, रसोई गैस के नए कनेक्शन मिलने बंद हो गए हैं, आप जानते हैं कि आप मिट्टी के तेल, रसोई गैस आदि के असली मूल्य का आधा ही चुकाते हैं.’’

‘‘और आधा…’’ मेरे मुंह से आदतानुसार निकल गया.

‘‘अभी तक हम चुका रहे थे, अब बंद कर देंगे. आप का समय ‘पूरा’ खत्म हो गया.’’

मैं बाहर निकलते समय सोच रहा था कि वह सचमुच कितनी कंजूसी से काम चलाते हैं. आधे सांसदों से भी कम खर्च कर के सरकार बना भी लेते हैं और चला भी लेते हैं. जो तनाव ले कर मैं उन से मिलने गया था, आधा कम हो चुका था. ‘आधा है चंद्रमा रात आधी…’ गीत गुनगुनाते हुए मैं लौट पड़ता हूं क्योंकि अच्छा संगीत तनाव को आधा कर देता है.

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Hindi Satire Story : पकौडों का सैंपल फेल : क्या हुआ जब मैंने बनाए पकौड़े ?

Hindi Satire Story : दोस्तो, मुझे पकौड़े बनाने का कोई तजुरबा नहीं है. मैं ने तो कभी घर में भी पकौड़े नहीं बनाए थे. पर जब सरकार ने कहा है कि पकौड़ों में लखपति बनाने की ताकत है तो मैं ने सरकार के पकौड़ों का हिस्सा होने के लिए आव देखा न ताव, घर के स्टोर से टूटीफूटी कड़ाही निकाली, दादा के वक्त का कैरोसिन का चूल्हा साफ किया और एक परात में बेसन के बदले मक्के का आटा, नमक, मिर्च पता नहीं किस के स्वाद के हिसाब से मिला, सड़े आलू काट अपने महल्ले के किनारे की सरकारी जमीन पर शान से पकौड़ा भंडार खोल दिया और उस का नाम रखा ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’.

पकौड़ों के उस भंडार का नाम सरकारी था इसलिए किसी भी सरकारी मुलाजिम की मुझ से यह पूछने की हिम्मत न हुई कि सरकारी जमीन पर पकौड़ा भंडार क्यों खोला? मुझे पता था कि कोई सरकारी मुलाजिम सब से पंगा ले सकता है पर अपनी सरकार के बंदों से नहीं.

दोस्तो, सरकारी जमीन पर सरकारी नाम का पकौड़ा भंडार नहीं खुलेगा, तो क्या अपने घर में खुलेगा? सरकार के नाम की दुकानें सरकार की गैरकानूनी तौर पर कब्जाई जगह पर ही खुल कर शोभा पाती हैं. नियमानुसार सरकारी जमीन पर सरकारी बंदे ही कब्जा कर सकते हैं. आम आदमी सरकारी जमीन पर कब्जा करना तो दूर, उस ओर देखने की भी हिम्मत करे तो उस की आंखें निकाल दी जाएं.

अपने पकौड़ा भंडार का ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ नाम रखने के चलते सब ने यही सोचा कि मैं सरकार का राइट नहीं तो लैफ्ट हैंड जरूर हूं, बल्कि थानेदार साहब ने तो मेरे कच्चे पकौड़ों की तारीफ करते हुए मेरी पीठ थपथपा कर यहां तक कह डाला कि ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ के लिए फर्नीचर की जरूरत हो तो बता देना. आधे रेट में दिलवा दूंगा.

अगर कोई विपक्ष वाला मेरे ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ की ओर आंख उठा कर भी देखे तो वह थानेदार उस की आंख तो आंख, आंत तक निकाल कर हाथ में दे देगा.

हफ्तेभर में ही सरकार के पकौड़ों के साथ अपने अधकच्चे, अधपके पकौड़ों का कदमताल करवाने का यह फायदा हुआ कि हर कोई अपने को सरकारी पकौड़ों का ग्राहक बताने के चक्कर में मेरे पकौड़ों को बिन दांतों के भी चटकारे लेले कर अपने पेट में धकियाता रहा. सब को यही लगता रहा कि जैसे वे मेरे पकौड़े नहीं, बल्कि सरकार के पकौड़े खा रहे हों. मुझ से किसी की यह भी कहने की हिम्मत नहीं हुई कि पकौड़ों में नमक नहीं है, पकौड़ों में मिर्च ज्यादा है.

मैं देखते ही देखते सरकारी पकौड़ों का अहम हिस्सा हो गया. विपक्ष वाले भी अपने को सरकार का हिस्सा साबित करने के बहाने अपने मुंह पर नकाब लगाए आते और मेरे पकौड़ों को सरकारी पकौड़ों का हिस्सा मान कर अपने को सरकार के बंदे घोषित करवा कर चुपचाप पकौड़े खा जाते.

चटनी की जगह पानी होता तो उसे भी चटकारे लेले पीते. यह सरकार की मुहर का प्रोडक्ट भी बड़ा अजीब होता है दोस्तो, सरकार के प्रेमी उसे यों चाटते हैं कि…

मैं मजे से बेखौफ हो कर जितना मन करता, पकौड़ों में बेसन के बदले मक्के का आटा मिला देता. तेल हुआ तो हुआ, वरना खाली कड़ाही में ही पकौड़े तल दिए.

महीनेभर से इसी तरह सरकारी पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगने का अपना काम बुलंदियों पर था. सौ ग्राम के बदले 75 ग्राम तोलो तो भी कोई पूछने वाला नहीं. सरकार अपनी, तो तराजू भी अपनी. सरकार अपनी, तो मिर्च भी अपनी. सरकार अपनी, तो सड़े आलू भी अपने.

सब मजे से ठीकठाक चल रहा था कि पता नहीं कहां से एक हाथी पर, दूसरा साइकिल पर, तो तीसरा दिन में ही लालटेन जलाए अपने को सैंपल भरने वाले बता कर आ धमके.

सैंपल भरने वाले पहले भी आते थे पर ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ का मुकुट मेरी दुकान के माथे पर लगा पढ़ दुम दबाए माफी मांगते आगे हो लेते थे.

सैंपल भरने वालों में से एक ने मेरी सरकारी पकौड़ों की परात को घूरते हुए पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘सरकारी पकौड़े हैं और क्या…’’ मैं ने गुर्राते हुए कहा.

‘‘कच्चे? जनता को बीमार करना

है क्या?’’

‘‘जनता तो जन्मजात ही बीमार है सर, इसलिए इस व्यवस्था में उस के सेहतमंद होने की सोचना भी फुजूल है. अब रही बात मेरे पकौड़ों की, तो सरकारी मुहर और नाम वाले पकौड़े चाहे कैसे भी हों, वे पके ही होते हैं. हर कोण से सेहत के लिए बढि़या ही होते हैं,’’ मैं ने सरकार के पक्ष में कहा, पर फिर भी वे चुप न हुए.

मन किया सरकार को फोन लगा दूं कि ये बेतुके से सैंपल भरने वाले कहां से भेज दिए आप ने जो सरकारी मुलाजिम होने के चलते सरकार के ‘मेड इन इंडिया’ पकौड़ों पर ही सवाल उठा रहे हैं.

‘‘पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगते हो?’’ लालटेन वाले ने मुंह में पकौड़ा डाल कर मुंह बिचकाते हुए पूछा.

‘‘सर, लुट चुकी जनता का अब और क्या ठगना…’’ मैं ने दोनों हाथ जोड़े कहा तो साइकिल पर बैठा सैंपल भरने वाला नीचे उतरा और बोला, ‘‘अब ये पकौड़े नहीं चलेंगे,’’ फिर उस ने हाथी पर से पकौड़ों की क्वालिटी चैक करने वाली मोबाइल किट निकाली और उस में 2 सरकारी पकौड़े डाले.

5 मिनट तक वह उस किट में उन पकौड़ों को हिलाता रहा. उस के बाद पकौड़ों का घोल देख कर उस ने कहा, ‘‘पकौड़ों का सैंपल फेल…’’

‘‘पर सर, ये मेरे निजी नहीं, सरकारी पकौड़े हैं.’’

‘‘होते रहें. बहुत खिला लिए जनता को कच्चे, मिलावटी पकौड़े. कल से पकौड़ों की दुकान बंद.’’

‘‘तो मेरा क्या होगा साहब?’’

‘‘सरकार की जनता को उल्लू बनाने वाली अगली स्कीम का इंतजार करो,’’ उन में से एक ने कहा और वे तीनों मदमाते आगे हो लिए. Hindi Satire Story :

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