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Holi 2026 : इस बार मनाएं हेल्दी होली

Holi 2026 : होली का त्योहार उत्साह, उमंग और उल्लास का त्योहार है. इस दिन रंग-गुलाल उड़ा कर और मिठाइयां खा व खिला कर खुशियां बांटी जाती हैं. लेकिन कई बार जरा सी लापरवाही के चलते इस खूबसूरत त्योहार में रंग में भंग पड़ जाता है और खुशियों व उमंगों वाला यह त्योहार सेहत के साथ खिलवाड़ बन जाता है.

1 बनाएं हैल्दी पकवान :

होली में जहां एक ओर रंगों की फुहार का लोग मजा लेते हैं वहीं दूसरी तरफ बिना मिठाइयों के होली अधूरी लगती है. वहीं, कई बार बाजार की मिलावटी मिठाइयों और गलत खानपान के चलते सेहत की अनदेखी हो जाती है. एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसैज की डाइटीशियन शिल्पा ठाकुर  के अनुसार, ‘‘होली का सही माने में मजा लेना है तो स्वाद और सेहत दोनों को ध्यान में रखते हुए होली के व्यंजन घर पर ही बनाएं. होली पर घर में बनी ठंडाई, शरबत, गुझिया, कांजी वडा, पापड़ खाएं और इस त्योहार का मजा उठाएं. अगर आप अपने बढ़ते वजन को ले कर परेशान हैं लेकिन साथ ही होली का मजा भी लेना चाहती हैं तो हर चीज खाएं लेकिन सीमित मात्रा में.

‘‘दरअसल, यह बदलता मौसम होता है जब ठंडक जा रही होती है और गरमी का आगमन हो रहा होता है. ऐसे में ठंडा खाने का मन करता है. इस समय होली खेलने के दौरान व होली के समय अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए तलाभुना व ज्यादा मीठा खाने की जगह फलों का अधिक से अधिक प्रयोग करें. फ्रूटचाट बनाएं और खुद खाएं व मेहमानों को भी खिलाएं.’’

2 पेट का रखें ध्यान :

मिलावटी मिठाइयों का सेवन आप को अस्पताल पहुंचा सकता है. इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि बाजार की मिलावटी मिठाई खाने से बचें क्योंकि मिलावटी दूध, पनीर व घी से बनी मिठाई खाने से लिवर को नुकसान हो सकता है और आंतों में सूजन, फूड पौइजनिंग, उलटी, दस्त, सिरदर्द, पेटदर्द व त्वचा रोग जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. रौकलैंड अस्पताल के गैस्ट्रोलौजिस्ट डा. एम पी शर्मा कहते हैं, ‘‘होली में अकसर लोग रंगगुलाल लगे हाथों से खाना खा लेते हैं. गंदे हाथों से खाना खाने से इन्फैक्शन होता है. इन्फैक्शन की वजह से डायरिया, उलटी, दस्त आदि होने लगते हैं.

‘‘होली के दिन कई तरह के तेलों में फ्राइड पकौड़े वगैरा खाने से पेट में गैस बनने लगती है या फिर पेट फूलने लगता है. इसलिए होली के दिन घर से जब भी निकलें तो खाना खा कर निकलें या फिर हाथों में रंग लगाने से पहले खाना खा लें. भांग व शराब का सेवन कतई न करें क्योंकि भांग के रिऐक्शन कई तरह से होते हैं. इसलिए मादक पदार्थों से दूर रहें. होली को मस्ती से मनाएं. पेट को कबाड़ न समझें और खानपान को ठीक रखें.’’

3 रंग में न हो भंग :

अब रंगों का रूप बदल गया है. जहां पहले अबीर, गुलाल, टेसू, केसर आदि रंगों से होली खेली जाती थी, वहीं आज पेंट मिले पक्के रंगों से खेली जाती है. ये रंग शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं.

होली खेलने से पहले पूरे शरीर पर वैसलीन या कोल्डक्रीम लगा लें. इस से आप की त्वचा पर रंगों का सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा. बालों पर रंगों का दुष्प्रभाव न पड़े, इस के लिए रात को ही बालों में कोई तेल लगा लें. रंगों से नाखूनों को भी जरूर बचाएं. नाखूनों पर रंग न चढ़े, इसलिए पहले से ही कोई नेलपौलिश नाखूनों पर लगा लें. इस से रंग नाखूनों पर न चढ़ कर नेलपौलिश पर ही चढ़ेगा. यदि रंग नाखूनों के अंदर या आसपास की त्वचा पर चढ़ जाए तो उसे साबुन से रगड़ने के बजाय 2-3 बारी नीबू से रगडें़. होली खेलने के बाद सब से बड़ी परेशानी जिद्दी रंग को साफ करने की होती है. जिद्दी रंग को साफ करने के लिए साबुन के बजाय कच्चे दूध का उपयोग कर त्वचा की धीरेधीरे मसाज करें या मौइश्चराइजिंग क्रीम का उपयोग कर रंग को साफ करने की कोशिश करें. त्वचा में अगर जलन हो रही हो तो जलन को खत्म करने के लिए आप खीरे के रस का प्रयोग करें. बेसन के साथ कच्चे दूध से बना पेस्ट आप के चेहरे के रंग को दूर करने का सब से आसान तरीका है. अगर आंखों में रंग जाने की वजह से आंखों पर जलन महसूस हो रही हो तो खीरे को काट कर थोड़ी देर के लिए पलकों के ऊपर रख लें. इस से आंखों को ठंडक मिलेगी और जलन से भी काफी रहत मिलेगी.

4 गर्भवती महिलाएं ध्यान दें :

यों तो कैमिकलयुक्त रंग और मिलावटी मिठाइयां किसी के लिए भी खतरनाक हो सकती हैं पर गर्भवती महिलाओं को खास खयाल रखने की सलाह दी जाती है. कैमिकलयुक्त रंग और मिलावटी मिठाइयां गर्भवती महिला और उस के गर्भ में पल रहे बच्चे, दोनों ही के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं.

एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसैज की गाइनीकोलौजिस्ट डा. पूजा ठकुराल के अनुसार, ‘‘गर्भावस्था में महिलाओं की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. ऐसे में, होली के समय गर्भावस्था में कैमिकल आधारित रंगों का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरनाक हो सकता है. इन से गर्भवती महिला के रिप्रोडक्टिव सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है और उसे समयपूर्व प्रसव व बच्चे के विकास से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. अगर गर्भवती महिला को होली पर रंग खेलना ही है तो वह गीले रंगों के बजाय सूखे हर्बल रंगों का इस्तेमाल करे. जहां तक होली के समय मिठाइयों के सेवन की बात है, गर्भवती महिलाएं घर की बनी मिठाइयां, नमकीन आदि खा सकती हैं, साथ ही नारियल पानी वगैरा ले सकती हैं.’’

5 दिल के रोगी रखें खयाल :

इंडियन मैडिकल एशोसिएशन के अध्यक्ष व जानेमाने कार्डियोलौजिस्ट डा. के के अग्रवाल कहते हैं, ‘‘दिल के मरीजों को हमेशा चीनी, चावल व मैदा से दूर रहना चाहिए. मिठाइयों का सीमित मात्रा में सेवन करें क्योंकि इन में अत्यधिक मीठा और ट्रांस फैट होता है. साथ ही, उन्हें डीप फ्राइड चीजें और नमक के अधिक सेवन से भी परहेज करना चाहिए. दिल के रोगी होली खेलते समय ज्यादा दौड़भाग न करें व नशे से दूर रहें. नशा करने से दिल की धड़कन बढ़ने, रक्तचाप बढ़ने और कार्डियक अरेस्ट जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जो दिल के रोगियों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती हैं.

‘‘इस के अलावा विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत यह है कि जो रंग या गुलाल ज्यादा चमकदार होगा उस में ज्यादा कैमिकल मौजूद होते हैं. इसलिए ऐसे रंगों से बचें. अब तो रंगों व गुलाल को चमकीला बनाने के लिए उन में घटिया अरारोट या अबरक पीस कर मिला दिया जाता है. बाजार में घटिया क्वालिटी के जो रंग बेचे जाते हैं वे ज्यादातर औक्सीडाइज्ड मैटल होते हैं. हरा रंग कौपर सल्फेट, काला रंग लेड औक्साइड से तैयार किया जाता है. ये रंग बहुत ही खतरनाक होते हैं. आंखों को हरे रंग से बचाना बहुत ही जरूरी है. बेहतर यही है कि हर्बल रंगों से होली का लुत्फ उठाएं.’’ Holi 2026

Satirical Story In Hindi : मिशन छिपकली – कामयाबी के नए कीर्तिमान रच रहा है

Satirical Story In Hindi : 45 साल की ढलती उम्र में हमारी जुड़वां संतानें हुई थीं. मुझे नन्हींमुन्नी गुडि़या का मनचाहा उपहार मिला था और वाइफ को उन का दुलारा गुड्डा, लेकिन वाइफ को बिटिया की भी चाहत थी. वे बिटिया को साइंटिस्ट बनाना चाहती थीं. मुझे बेटे के साथ नुक्कड़ पर क्रिकेट खेलने की तमन्ना थी. हम ने महल्ले में मिठाई बंटवाई. अनाथालय के बच्चों के लिए मिठाईनमकीन के पैकेट और कपड़ों के उपहार भिजवाए. हमारी खुशी का ठिकाना न था.

हम ने अपने बच्चों को भरपूर प्यार दिया. उन की सभी इच्छाएं पूरी कीं. कभी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया. मोबाइल, लैपटौप, स्कूटी, बाइक, कार, ब्रैंडेड ड्रैसेज, ट्यूटर सबकुछ उन के पास थे. दोनों अब बड़े हो चुके थे. 9वीं कक्षा की परीक्षा दे चुके थे.

‘‘पापा, एडवांस बुकिंग करानी है,’’ बिटिया ने मुझ से रिक्वैस्ट की.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, ‘संजू’ लगी है. यह फिल्म काफी पसंद की जा रही है,’’ मैं ने बिटिया का हौसला बढ़ाया. मैं खुद फिल्म देखने के मामले में आगे रहता हूं.

‘‘पापा, अगले साल हम दोनों 10वीं बोर्ड की परीक्षा देंगे. परीक्षा में हैल्प के लिए मिशन की बुकिंग चल रही है,’’ बिटिया ने मुझे बताया.

‘‘बोर्ड की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. सेहत पर बुरा असर पड़ता है. सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी में एडवांस बुकिंग कराना सही होगा. अभी औफर चल रहा है,’’ साहबजादे ने मुझे समझाया.

अपनी समझदानी थोड़ी छोटी है. पूरी बात समझ आने में थोड़ी देर लगी. अपनी संतान को 10वीं में नकल करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई स्पैशल चिटों की जरूरत होगी. मुझे इस संबंध में जानकारी कम थी.

‘‘वैज्ञानिक बनाने के लिए अच्छे कालेज में दाखिला दिलाना होगा. 10वीं कक्षा में अच्छे मार्क्स की जरूरत होगी,’’ वाइफ ने चिंता जताई. बच्चों को उन से झिझक नहीं थी. उन को सबकुछ पता था.

औलाद के भविष्य की चिंता मुझे भी थी. वैज्ञानिक बनने के लिए अच्छे कालेज में दाखिले की जरूरत भी थी. अच्छे कालेज में दाखिले के लिए कक्षा 10 में 90 प्रतिशत मार्क्स आने भी जरूरी थे.

परिवार के साथ मैं सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी से मिला. उन से रेट्स और औफर्स की जानकारी ली.

‘‘साइंस के एक पेपर और मैथ्स के लिए 8 हजार रुपए तथा दूसरे पेपरों के लिए 5 हजार रुपए. हमारी एजेंसी प्रीमियर एजेंसी है. एडवांस बुकिंग में 25 प्रतिशत की छूट दी जा रही है. ये रेट केवल प्रश्नोत्तर चिट के लिए हैं. और हां, मिशन छिपकली के लिए डबल रेट से रुपए देने होंगे. इस के अलावा दूसरी सेवाएं तथा कौम्बो औफर भी हैं,’’ प्रीमियर एजेंसी के रिसैप्शन पर तैनात मैडम ने जानकारी दी.

‘‘यह मिशन छिपकली क्या बला है?’’ मैं ने पूछ ही लिया. वैसे कुछकुछ अंदाजा हो रहा था.

पिछले महीने मैं ने पाटलीपुत्र सुसंवाद समाचारपत्र में खबर पढ़ी थी कि ईस्टर्न इंडिया के महानगरों के चिडि़याघरों से बहुत ही खास प्रजाति की कुछ छिपकलियों की चोरी हो गई थी. ये प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर थीं. इस इमारत की दीवार पर कई मानव आकृतियां चिपकी थीं. मैं ने बाद में इस न्यूज को चश्मा लगा कर पढ़ा था.

‘‘मिशन छिपकली के अंतर्गत एजेंसी बहुमंजिली इमारतों में परीक्षार्थियों को स्पैशल चिट उपलब्ध कराती है. पुलिस, केंद्र अधीक्षक, न्यूजपेपर रिपोर्टर सब को मैनेज करना मुश्किल जौब है. मिशन छिपकली के लिए औनजौब ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है. भगदड़ में दुर्घटना भी हो जाती है. परीक्षा केंद्र ग्राउंडफ्लोर पर होने की हालत में भुगतान की गई रकम का 50 प्रतिशत लौटा दिया जाता है. अप्रत्याशित और कठिन परिस्थितियों के लिए 2 साल की वारंटी का प्रावधान रखा गया है,’’ रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मिशन छिपकली के टैरिफ वाउचर्स का बखान किया.

हम ने शहर की दूसरी सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों से भी संपर्क किया. गोल्डन सर्विस एजेंसी में बालिकाओं के लिए फीस में 30 प्रतिशत की छूट का औफर था. लेकिन एजेंसी की बहुमंजिली सर्विस काफी महंगी थी.

बैस्ट सर्विस प्रोवाइडर ने रजिस्टर्ड परीक्षार्थियों के लिए शहरी इलाकों से परीक्षा केंद्रों तक ले जाने के लिए वीडियो सुविधायुक्त फ्री बस का औफर दिया था.

इन सभी एजेंसियों की शाखाएं राज्य के सभी छोटेबड़े शहरों में होने की भी जानकारी मिली. एजेंसीज ने प्रश्नोत्तर के लिए राजधानी व राज्य के दूसरे शहरों के नामीगिरामी स्कूलों के शिक्षकों व खास कोचिंग संस्थानों के विशेषज्ञों से भी अपने जुड़े होने की बात कही.

इस संपर्क मुहिम के दौरान कई दूसरी सर्विसेज की मौजूदगी के बारे में जाननेसमझने का मौका मिला. उन की सेवाओं की जानकारी मिली. कई खुलासे हुए. ये सुविधाएं परीक्षार्थियों, अभिभावकों के व्यापक हित में हैं, इस का भी ज्ञान हुआ.

मुझे इस उद्योग की पूरी जानकारी नहीं थी. मुझे पता नहीं था कि कभी शिक्षा का केंद्र रहे अपने पुराने शहर में कक्षा-10 स्पैशल चिट सप्लाई के धंधे ने बड़े कारोबार का दर्जा हासिल कर लिया है और इस कारोबार से बड़े घराने भी आकर्षित हो रहे हैं.

परीक्षाएं लंबे समय तक चलती हैं. इस दौरान खेलकूद, मूवी, मौजमस्ती, गेम्स, फेसबुक, चैटिंग, यारदोस्तों से गपें और सभी खिलंदड़ी व मनोरंजक गतिविधियां बंद हो जाती हैं. महीनों किताबों, नोट्स में घुसे रहने से बोरियत होती है. टैंशन से सेहत खराब हो जाती है. ऐसे में परीक्षाओं से जुड़ी सर्विसेज एजेंसियां हमारी आम दिनचर्या के साथसाथ ही कैरियर विकल्पों को आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं.

इन सुविधाओं से गुप्तरूप से जुड़े शिक्षकों व सहायक कर्मियों को होने वाली कमाई, उन को कठिन हालात से उबारने में सहायक होती है. राज्य में शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन भुगतान की समस्या हमेशा बनी रहती है. त्योहार के महीनों में भी वेतन भुगतान नहीं हो पाता है. इस तरह सर्विस एजेंसीज उन की वित्तीय समस्याओं का समाधान भी करती हैं.

अभिभावक सर्विस एजेंसीज की बुकिंग के बाद बेफिक्र हो जाते हैं. उन्हें बहुमंजिली इमारतों पर छिपकली बन कर चिपकने से मुक्ति मिल जाती है. अच्छे कालेजों में दाखिले की राह आसान हो जाती है. शिक्षक उत्तरपुस्तिका पर, अपने द्वारा तैयार उत्तर पा कर, मार्क्स लुटाते हैं. एजेंसी विभिन्न कोलेजों व तकनीकी संस्थानों में ऐडमिशन भी दिलवाती है.

‘‘विशिष्ट संस्थानों में ऐडमिशन के लिए आप हमारी एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं,’’ ब्राइट सर्विस एजेंसी की सुंदर रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मुझे बताया.

कई स्रोतों से जानकारी मिली कि सर्विस एजेंसीज अपनी सीक्रेट सर्विस के तहत राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर पर होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रश्नपत्र, उत्तर के साथ उपलब्ध कराती हैं. प्रश्नपत्र लीक कराने के लिए कई वैज्ञानिक राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. एडवांस बुकिंग कराने से पहले ठोकबजा कर पूरी तसल्ली करने की अपनी पुरानी आदत रही है. सो, मैं ने छानबीन की, कई एजेंसियों से जानकारी ली-

‘‘हमारी एजेंसी एक सर्विस एजेंसी है. यह जनसुविधाएं मुहैया कराती है.’’

‘‘अभिभावकों के हितों की सुरक्षा का काम कर रहे हैं. उन के सपने पूरे हों, इस के लिए कोशिश जारी है.’’

‘‘हमारी इंडस्ट्री बेरोजगारों को रोजगार देती है.’’

‘‘लंबे समय तक पूरी रात किताबों से चिपके रहने से गरदन अकड़ जाती है. ओनली बुक्स ऐंड नो प्ले मेक्स पप्पू ए डल बौय इस का हमारे पास कारगर इलाज है.’’

‘‘नाकामी से जूझते हुए बच्चे कई बार गलत फैसले भी ले लेते हैं. हमारी एजेंसी उन्हें कामयाबी दिलाने का काम करती है.’’

अब मुझे पूरी तसल्ली हो चुकी थी. स्पैशल चिट बनाना, बहुमंजिली इमारतों की दीवार से चिपकना मेरे बूते से बाहर की बात थी. लंबी पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा से लंबी जुदाई बच्चों के लिए तकरीबन नामुमकिन था. मिशन छिपकली मुझे जंच रही थी. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : बदलाव – प्रमोद की जिंदगी में कैसे आया बदलाव?

Romantic Story in Hindi : प्रमोद को सरकारी काम के सिलसिले में सुबह की पहली बस से चंड़ीगढ़ जाना था, इसलिए वह जल्दी तैयार हो कर बसस्टैंड पहुंच गया था. प्रमोद टिकट खिड़की पर लाइन में खड़ा हो गया था. दूसरी लाइन, जो औरतों के लिए थी, में 23-24 साल की एक लड़की खड़ी थी.

बूथ पर बस पहुंचते ही टिकट मिलनी शुरू हो गई. लेकिन तब तक लाइन भी काफी लंबी हो चुकी थी. खैर, प्रमोद को तो टिकट मिल गई और बस में वह इतमीनान से सीट पर जा कर बैठ गया. थोड़ी देर में वह लड़की भी प्रमोद के बगल की सीट पर आ कर बैठ गई. उन्हें 3 सवारी वाली सीट पर इकट्ठा नंबर मिल गया था.

ठसाठस भरने के बाद बस अपनी मंजिल की ओर रवाना हुई. लड़की ने अपना ईयरफोन और मोबाइल फोन निकाला और गाने सुनने लगी. बीचबीच में झटके खा कर वह प्रमोद से टकराती भी रही. बस जैसे ही शहर से बाहर निकली और सुबह की ठंडी हवा शरीर से टकराई तो प्रमोद 5 साल पहले की यादों में खो गया.

उस दिन भी प्रमोद बस से दफ्तर के काम से चंडीगढ़ ही जा रहा था. बसअड्डा पहुंचने में उसे थोड़ी देर हो गई थी. उस दिन किसी नौकरी के लिए चंडीगढ़ में लिखित परीक्षा थी. पहली बस होने के चलते भीड़ बहुत ज्यादा थी. जहां एक ओर मर्दों की बहुत लंबी लाइन थी, वहीं दूसरी ओर औरतों की लाइन छोटी थी.

प्रमोद को यह अहसास हो चला था कि आज इस बस में शायद ही सीट मिले, लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है, यह सोच कर वह लाइन में खड़ा रहा.

तभी औरतों की लाइन में एक लड़की आ कर खड़ी हो गई. उम्र यही कोई 25 साल के आसपास. खुले बाल, पैंटटीशर्ट पहने, वह हाथ में एक बैग लिए हुए खड़ी थी. प्रमोद ने अपनी लाइन से बाहर आ कर उस लड़की से पूछा, ‘मैडम, आप कहां जाएंगी?’

उस लड़की ने प्रमोद की तरफ गौर से देखा, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘चंडीगढ़.’ प्रमोद ने कहा, ‘मैं भी चंडीगढ़ ही जा रहा हूं, अगर आप मेरी थोड़ी मदद कर दें तो…’

वह लड़की बोली, ‘कहिए, मैं आप की क्या मदद कर सकती हूं?’ प्रमोद ने 500 का एक नोट उसे थमाते हुए कहा, ‘आप मेरी भी एक टिकट चंडीगढ़ की ले कर मेरी मदद कर सकती हैं.’

‘ठीक है. आप बैठिए, मैं ले कर आती हूं,’ लड़की ने कहा. प्रमोद बूथ पर लगी बस के पास

आ कर खड़ा हो गया और थोड़ी देर में वह लड़की टिकट ले कर उस के पास आ गई. उन्हें अगले दरवाजे के बिलकुल साथ वाली 2 सवारियों की सीट मिली थी.

बस शहर से निकल पड़ी थी. प्रमोद ने उस लड़की का शुक्रिया अदा किया. बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो प्रमोद ने उस से पूछ लिया, ‘आप का क्या नाम है और चंडीगढ़ में क्या काम करती हैं?’ उस लड़की ने अपना नाम रीमा बताया और वह वहां एक फर्म में सेल्स ऐक्जिक्यूटिव थी. काम के सिलसिले में वह यहां आई थी. काम खत्म कर के वह वापस लौट रही थी.

प्रमोद ने उसे बताया कि वह यहां लोकल दफ्तर में काम करता है और सरकारी काम से महीने 2 महीने में उस का चंडीगढ़ आनाजाना लगा रहता है. बस चलती रही तो बातों का सिलसिला भी चलता रहा. रीमा ने बताया कि वह मूल रूप से पहाड़ी है. यहां चंडीगढ़ में किराए का मकान ले कर रह रही है. घर में मम्मीपापा और छोटी बहन हैं, जो गांव में रहते हैं. बड़ा भाई नोएडा में एक प्राइवेट फर्म में सौफ्टवेयर इंजीनियर है.

प्रमोद ने बताया कि वह भी किराए का मकान ले कर रह रहा है. बीवीबच्चे सब गांव में हैं. महीने में 2-4 बार ही घर का चक्कर लग पाता है. अभी रिटायरमैंट में 12-13 साल का वक्त पड़ा है, इस के बाद ही जिंदगी शायद सैट हो पाए. बातोंबातों में कब पेहवा आ गया, पता ही नहीं चला. बस वहां 15 मिनट के लिए रुकी.

प्रमोद नीचे उतर कर चाय और सैंडविच ले आया. जब तक चाय पी तब तक बस चलने को तैयार हो गई. बातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया. उन दोनों ने घरपरिवार व दफ्तर तक की तमाम बातें कर लीं. एकदूसरे को टैलीफोन नंबर भी दे दिए.

हालांकि प्रमोद की उम्र उस लड़की की उम्र से तकरीबन दोगुनी रही होगी, फिर भी उस ने उसे अपना दोस्त मान लिया था और उस से घर चलने को कहा था.

प्रमोद ने उसे बताया, ‘इस बार तो घर नहीं चल पाऊंगा, क्योंकि जरूरी काम है. अगली बार जब भी मैं यहां आऊंगा, तो सुबह नहीं शाम को आऊंगा. रातभर आप के यहां रुक कर जाऊंगा और अगर आप को हमारे यहां आना हो तो वैसा ही आप भी करना,’ इसी वादे के साथ वे दोनों रुखसत हुए. प्रमोद ने सुबहसुबह चंडीगढ़ दफ्तर पहुंच कर काम निबटाया और वापस बस में बैठ कर घर की तरफ रवाना हुआ.

बस रात के तकरीबन 10 बजे वापस पहुंची. बसअड्डे पर उतर कर प्रमोद अपने मकान में पहुंचा ही था कि फोन की घंटी बजी, देखा तो रीमा का ही फोन था. उठाया तो रीमा ने पूछा, ‘घर पहुंच गए ठीकठाक?’ प्रमोद ने कहा, ‘हां, अभीअभी घर पहुंचा हूं.’

रीमा ने कहा, ‘चलो, ठीक है. नहाओधोओ, खाओपीयो, थक गए होगे,’ और फोन काट दिया. अब रीमा से हफ्ते में एकाध बार

तो फोन पर बात हो ही जाती थी. धीरेधीरे यह दोस्ती गहरी हो रही थी.

एक महीने बाद फिर से प्रमोद को दफ्तर के काम से चंडीगढ़ जाना पड़ रहा था. प्रमोद ने रीमा से बात की तो उस ने कहा, ‘आप शाम को ही आ जाओ. सुबह जल्दी उठने में दिक्कत नहीं होगी और इसी बहाने आप के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.’ प्रमोद ने दोपहर की बस पकड़ी तो रात 8 बजे चंडीगढ़ उतार दिया. बसअड्डे पर रीमा स्कूटी लिए खड़ी थी. स्कूटी के पीछे बैठ प्रमोद उस के मकान पर चला गया.

बहुत बढि़या घर था. रीमा ने घर में तमाम सुखसुविधाएं जुटा रखी थीं. प्रमोद चाय पीने के बाद नहाधो कर फ्रैश हो गया. रीमा ने भी समय से पहले खाना वगैरह तैयार कर लिया था. प्रमोद के पास आ कर जुल्फें झटका कर उस ने पूछा, ‘आप का मनपसंद ब्रांड कौन सा है…?’

प्रमोद कुछ अचकचा गया, फिर थोड़ी देर में वह बोला, ‘जो साकी पिला दे…’

रीमा ने विदेशी ब्रांड की बोतल ली और पैग बनाने शुरू कर दिए. 2-2 पैग लेने के बाद उन्होंने खाना खाया और पतिपत्नी की तरह प्यार कर के उसी बिस्तर पर सो गए. प्रमोद सुबह उठा तो खुद को बहुत हलका महसूस कर रहा था. रीमा भी जल्दी उठ गई थी. उसे भी दफ्तर जाना था. उन दोनों ने तैयार हो कर नाश्ता किया और अपनेअपने काम पर निकल गए.

अब इसी तरह से जिंदगी चलने लगी. रीमा जब भी प्रमोद के पास आती तो वह उसे होटल में रख लेता. जब भी छुट्टियां होतीं तो वे शिमला, मोरनी हिल्स, धर्मशाला जैसी कम दूरी की जगहों पर घूमने निकल जाते.

एक रात जब प्रमोद रीमा के घर पर सोने की तैयारी कर रहा था, तो उस के मन में यह सवाल उठा कि रीमा जवान है, खूबसूरत है, अच्छा कमाती है. यह तो नएनए कितने ही लड़कों के साथ दोस्ती कर सकती है, मौजमस्ती कर सकती है, फिर यह उस जैसे अधेड़ को क्यों पसंद करती है? प्रमोद ने उस के बालों में उंगली घुमाते हुए पूछा, ‘रीमा, एक बात पूछूं, अगर आप बुरा न मानो तो…’

रीमा ने कहा, ‘मैं जानती हूं कि आप क्या पूछना चाहते हैं. आप यही जानना चाहते हैं न कि मैं यह सब अधेड़ उम्र के लोगों के साथ क्यों करती हूं, जबकि मेरे लिए जवान लड़कों की कोई कमी नहीं है? ‘मैं क्या हमारे यहां सब जवान लड़कियां यही करती हैं. इस की खास वजह यह है कि हम यहां वीकऐंड पर मौजमस्ती करना चाहती हैं. अधेड़ मर्द जिंदगी के हर तरह के रास्तों से गुजरे होते हैं. उन्हें हर तरह का अनुभव होता है. उन का अपना परिवार होता है, इसलिए वे चिपकू नहीं होते और जब जहां उन को कहा जाए वे दोस्ती वहीं छोड़ देते हैं. कमाई की नजर से भी ठीकठाक होते हैं.

‘नौजवान लड़के जिद्दी होते हैं. वे समझौता नहीं करते, बल्कि मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. कभी नस काट लेते हैं तो कभी पागलों जैसी हरकतें करने लगते हैं. यही वजह है कि हम आप जैसों को पसंद करती हैं.’ प्रमोद और रीमा की दोस्ती तकरीबन 5 साल तक चली. उस के बाद रीमा ने शादी कर अपना घर बसा लिया और दिल्ली शिफ्ट हो गई.

हमारे समाज में यह एक नया बदलाव आया है या आ रहा है. अच्छा है या बुरा है, यह तो अलग चर्चा की बात हो सकती है, लेकिन बदलाव हो रहा है. जीरकपुर बसस्टैंड पर बस रुकी तो झटका लगा और प्रमोद यादों से वर्तमान में लौटा. साथ बैठी लड़की उस के कंधे पर सिर रख कर सो रही थी.

प्रमोद ने उसे जगाया तो अपना बैग संभालते हुए वह बस से उतर गई. प्रमोद बस में बैठा कुछ सोच रहा था. थोड़ी देर में बस बसअड्डे की तरफ चल पड़ी थी. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : गठबंधन संस्कार – जब शादी के न्योते पर पड़ी नजर

Satirical Story In Hindi : गुलाबचंद महीनेभर के सफर के बाद थकेमांदे घर वापस आए थे. अटैची को रख कर सोफे पर अधलेटे हुए ही थे कि मेज पर रखे शादी के एक न्योते पर नजर पड़ गई.

गुलाबचंद ने पास बैठी अपनी श्रीमतीजी से पूछा, ‘‘यह न्योता किस का है?’’

श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘आप के बचपन के लंगोटिया यार मंत्रीजी आज ही दे गए हैं. उन के लाड़ले की शादी अपने इलाके के सांसदजी की बेटी से चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर तय हो गई है. आप को बरात में चलने के लिए कह गए हैं.’’

खुशी और हैरानी से न्योते के कार्ड को जैसे ही उठाया, लिफाफे पर लिखी गई इबारत पर नजर पड़ते ही गुलाबचंद के दिमाग में अजीब सी हलचल मच गई. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘छपाई में इतनी बड़ी गलती हो गई और मंत्रीजी का इस पर ध्यान ही नहीं गया…’’

श्रीमतीजी भी कुछ चौंक कर बोलीं, ‘‘क्या गलती हो गई? मैं ने तो इसे अभी तक छुआ भी नहीं है. आप के आने के तकरीबन घंटाभर पहले ही तो दे गए हैं मंत्रीजी.’’

गुलाबचंद ने वह कार्ड श्रीमतीजी को थमा दिया. देखते ही वे भी हैरानी से सन्न रह गईं.

बात थी ही कुछ ऐसी. लिफाफे के बाहर और भीतर ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ छपा था.

इस कमबख्त एक शब्द के चलते गुलाबचंद महीनेभर की थकान भूल से गए और उन्होंने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘मंत्रीजी को फोन मिलाओ.’’

श्रीमतीजी ने कहा, ‘‘अभीअभी थकेमांदे इतने दिनों बाद आए हो… पहले फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लो, बाद में आराम से मंत्रीजी से बात करना.’’

श्रीमतीजी की बात को तरजीह देते हुए गुलाबचंद फ्रैश होने चल दिए, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ दिमाग से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्होंने मंत्रीजी को मोबाइल फोन से नंबर मिला ही डाला.

फोन पर मंत्रीजी का छोटा सा वाक्य कानों में पड़ा, ‘गुलाबचंदजी, इस समय पार्टी की एक जरूरी मीटिंग चल रही है,

जो देर रात तक चलने की उम्मीद है. सुबह मुलाकात होगी…’

दूसरे दिन सुबह जब गुलाबचंद नाश्ता कर ही रहे थे कि मंत्रीजी का फोन आ गया, ‘हैलो गुलाबचंदजी, मैं आप का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं… जल्दी आ जाओ.’

मंत्रीजी का फोन सुन कर गुलाबचंद ने जल्दबाजी में नाश्ता किया और जैसेतैसे गरमगरम चाय पी. बड़े ही उतावलेपन के साथ, बिना कपड़े बदले, जिस हालत में थे, उसी हालत में वे मंत्रीजी के घर की ओर चल पड़े.

‘गठबंधन संस्कार’ शब्द उन्हें अब भी दुखी कर रहा था. ‘सोलह संस्कारों’ के बाद यह ‘सत्रहवां गठबंधन संस्कार’ कब से, कहां से आ गया है? जैसे नए जमाने के फिल्म वाले पुराने फिल्मी गीतों को ‘रीमिक्स’ कर के उन्हें मौडर्न बना रहे हैं, उसी तरह ‘सोलह संस्कारों’ को रीमिक्स कर के मौडर्न तो नहीं बनाया जा रहा है?

इसी उधेड़बुन में गुलाबचंद मंत्रीजी के दरवाजे पर पहुंचे. देखा कि मंत्रीजी दरवाजे पर ही खड़ेखड़े अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं से बतिया रहे थे. गुलाबचंद को देखते ही मंत्रीजी कार्यकर्ताओं से विदा लेते हुए उन्हें घर के अंदर ले गए.

उन्होंने मंत्रानी को आवाज लगाई, ‘‘देखो, आज घर पर कौन पधारा है?’’

मंत्रानी ने रसोई से निकलते हुए जैसे ही गुलाबचंद को देखा, बड़ी खुश हो कर बोलीं, ‘‘इतने दिनों तक कहां रहे गुलाबचंदजी? हम लोग बड़ी बेसब्री से आप का इंतजार कर रहे थे…’’

मंत्रानी कुछ और कहने जा रही थीं कि गुलाबचंद बीच में बोल पड़े, ‘‘भाभीजी, मुझे तो भाई साहब से कुछ दूसरी ही शिकायत है और इतनी बड़ी है कि घर आ कर जैसे ही शादी के कार्ड पर नजर पड़ी…’’

‘‘रहने दो गुलाबचंदजी…’’ मंत्रीजी ने उन की बात को काटते हुए कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हें किसकिस बात को ले कर मुझ से शिकायत है…’’

इसी बीच भाभीजी यानी मंत्रानी जलपान ले कर आ गईं.

जलपान करते हुए मंत्रीजी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहली बड़ी शिकायत तो यह है कि शादी के कार्ड को देखते ही तुम गुस्से में आपे से बाहर हो गए होंगे… और दूसरी शिकायत जिस में तुम उलझे हुए हो कि लड़की वाले विपक्षी पार्टी में होने के साथसाथ मेरे घोर राजनीतिक विरोधी ही नहीं, दुश्मन भी हैं. मेरा उन से हमेशा छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है. क्यों, है न यही बात?

‘‘बात यह थी कि एक दिन हमारे भावी समधी सांसदजी ने अपने एक भरोसेमंद हमराज द्वारा बातोंबातों में राजनीतिक स्टाइल की चाशनी में मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि अगर मैं सांसदजी की बेटी से अपने एकलौते लाड़ले की सगाई कर दूं तो सांसदजी अपने खास विधायकों से बिना शर्त मेरी पार्टी को समर्थन दिलवा देंगे. बाद में सही मौका आने पर वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय भी कर लेंगे.

‘‘तुम तो जानते ही हो कि मेरी पार्टी अल्पमत में रहते हुए कितनी मुश्किलों से सरकार चला रही है. मेरी सरकार की कुरसी के गठबंधन में इतनी बेमेल गांठें हैं कि अगर एक गांठ भी खुल जाए तो सबकुछ इस कदर बिखर जाएगा कि भविष्य में दोबारा कुरसी पर बैठने की शायद ही नौबत आए.

‘‘ऐसी मजबूर हालत में अगर समधी सांसदजी हमें समर्थन दे रहे हैं और वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो हमारी हालत ऐसी हो जाएगी कि गठबंधन की अगर 2-4 गांठें खुल भी जाएं, टूट जाएं तब भी सरकार चलाने में मेरी पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

‘‘और एक राज की बात तुम्हें चुपके से कह रहा हूं… मौका आने पर अपनी ही पार्टी में जोड़तोड़ करवा कर मैं खुद ही मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में लग गया हूं. इन्हीं सब राजनीतिक पैतरों को ध्यान में रखते हुए उन का ‘औफर’ आते ही मैं ने तुरंत हां कर दी और शादी का मुहूर्त निकलवा लिया.

‘‘गठबंधन संस्कार… यही शब्द तुम्हें दुखी कर रहा है न? चूंकि यह शादी राजनीति की बिसात पर हो रही है, जहां हर वक्त अपने फायदे के लिए मौके की तलाश रहती है, आज का दोस्त कल का दुश्मन और आज का विरोधी, कल का समर्थक बन जाता है, इसी माहौल में यह रिश्ता तय हुआ है.

‘‘इन बातों के ध्यान में आते ही मेरे दिमाग में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ का जन्म हुआ.

‘‘भावी समधी सांसदजी ने भी यह रिश्ता राजनीति की बिसात पर तय किया है और नेता का क्या भरोसा? काम सधने के बाद कब पलटी मार जाए? कौनसी नई शर्त थोप दे? इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ शब्द का इस्तेमाल किया है.

‘‘सांसदजी ने शर्त रखी थी कि अगर मैं उन की लड़की की सगाई अपने लड़के से कर दूं तो पहले वे अपने विधायकों का बिना शर्त समर्थन मेरी पार्टी को देंगे और मौका आने पर वे अपनी पार्टी का विलय मेरी पार्टी में करेंगे. अगर उन्हें सामान्य रूप में यह रिश्ता तय करना होता तो वे सीधेसीधे मुझ से कह सकते थे. राजनीति अपनी जगह, रिश्ता अपनी जगह. रिश्तों को तो राजनीति से संबंध रखना ही नहीं चाहिए. सामान्य रूप में मैं इस रिश्ते को नकार भी सकता था, लेकिन उन की इस बात पर मेरे नकारने की गुंजाइश ही न रही.

‘‘रही रिश्तों की राजनीति की बात. मान लो कि शादी हो जाने के बाद वे ऊपर से समर्थन तो करते रहते लेकिन विलय वाली बात को यह कह कर नकारते रहते कि अभी सही समय नहीं आया या विलय तभी करेंगे जब मैं मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने करीबियों की बलि दे कर उन के विधायकों को मलाईदार पदों पर बैठा दूं. अगर मैं ऐसा मजबूरन कर भी दूं तब भी वे मुझे चैन से नहीं रहने देंगे. हमेशा समर्थन वापसी का डर दिखाते हुए एक न एक नई शर्त मुझ से मनवाते रहेंगे.

‘‘इन हालात में मैं क्या करता? इन्हीं सब पैतरों की काट करने के लिए मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ लिखवाया है.

‘‘हिंदू धर्म में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ होने के बाद आसानी के साथ रिश्ता तोड़ा नहीं जा सकता. भविष्य में सांसदजी के अडि़यलपन पर अगर रिश्ता तोड़ने के बारे में विचार करता तो दहेज के नाम पर सताने की तलवार आसानी से मेरा गला काट सकती है. मन मसोस कर समधीजी की ऊलजुलूल शर्त मुझे माननी पड़ती, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ में ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.

‘‘राजनीति में अलगअलग पार्टी की बेमेल गांठों का बंधन कब बंधे, कब खुले या टूटे, कहा नहीं जा सकता और इस जुड़ने, खुलने या टूटने में हमारा संविधान चुप है, कानून लाचार है…

‘‘इस समय हमारी पार्टी सरकार चला रही है, कल सुबह के अखबार में आप हैडिंग पढ़ सकते हैं कि कल की फलां विपक्षी पार्टी ने आज सत्ता हथिया ली है.

‘‘अब अगर राजनीति में इस ‘गठबंधन’ शब्द का इस्तेमाल न होता तो सत्ता का जोड़तोड़ भी इतनी आसानी से न होता. कानून इजाजत ही नहीं देता.

‘‘ठीक यही बात ‘गठबंधन संस्कार’ में है. ‘गठबंधन संस्कार’ कब तक दांपत्य जीवन में जुड़ा रहे और कब यह संस्कार दांपत्य जीवन से अलग हो जाए… इस पर कानून या समाज या फिर सरकार का कोई बंधन नहीं है, जबकि ‘पाणिग्रहण संस्कार’ में बंधन ही बंधन हैं. धर्म, समाज, कानून सब ‘पाणिग्रहण संस्कार’ को जकड़े हुए हैं.

‘‘अब अगर समधी सांसदजी पार्टी का समर्थन वापसी का जरा सा भी तेवर भविष्य में दिखाएंगे तो उन के तेवर को उन्हीं के ऊपर साधते हुए मैं भी ‘गठबंधन संस्कार’ को भंग करने, तोड़ देने की चेतावनी दूंगा. यह एक ऐसा हथियार होगा जिस के बलबूते मैं समधी सांसदजी को जब तक जीवन में राजनीति रहेगी, तब तक उन पर ताने रहूंगा और वे बेबस बने रहेंगे, चुप रह कर समर्थन देते रहेंगे.

‘‘मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं ‘गठबंधन संस्कार’ को सदन में एक नया विधेयक पास करा कर कानूनी जामा पहना दूंगा.’’

अपने नेता दोस्त के ऐसे विचार सुन कर गुलाबचंद सन्न रह गए और उलटे पैर घर लौट गए. Satirical Story In Hindi

Social Story in Hindi : मीठा जहर – कौलगर्ल्स से संबंध बनाते हुए रोहित के साथ क्या हुआ?

Social Story in Hindi : रविवार की सुबह 6 बजे अलार्म की आवाज ने मेरी नींद खोल दी. मेरा पार्क में घूमने जाने का मन तो नहीं था पर मानसी और वंदना के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के मजबूत इरादे ने मुझे बिस्तर छोड़ने की प्रेरणा दी. करीब 4 महीने पहले वंदना के पति रोहित से मेरा परिचय एक पार्टी में हुआ था. वह बंदा ऐसा हंसमुख और जिंदादिल निकला कि उसी दिन से हम अच्छे दोस्त बन गए थे. जल्द ही मानसी और वंदना भी अच्छी सहेलियां बन गईं. फिर हमारा एकदूसरे के घर आनाजाना बढ़ता चला गया.

करीब 2 हफ्ते पहले रोहित को अपने एक सहयोगी दोस्त की बरात में शामिल हो कर देहरादून जाना था. तबीयत ढीली होने के कारण वंदना साथ नहीं जा रही थी. ‘‘मोहित, तुम मेरे साथ चलो. हम 1 दिन के लिए मसूरी भी घूमने चलेंगे.’’ सारा खर्चा मैं करूंगा. यह लालच दे उस ने मुझ से साथ चलने की हां करवा ली थी.

घूमने के लिए अकेले उस के साथ घर से बाहर निकल कर मुझे पता लगा कि वह एक खास तरह की मौजमस्ती का शौकीन भी है. दिल्ली से बरात की बस चलने के थोड़ी देर बाद ही मैं ने नोट कर लिया था कि निशा नाम की एक स्मार्ट व सुंदर लड़की के साथ उस की दोस्ती कुछ जरूरत से ज्यादा ही गहरी है वे दोनों एक ही औफिस में काम करते थे.

‘‘इस निशा के साथ तुम्हारा चक्कर चल रहा है न?’’ रास्ते में एक जगह चाय पीते हुए मैं ने उसे एक तरफ ले जा कर पूछा. ‘‘मैं तुम्हें सच बात तभी बताऊंगा जब वापस जा कर तुम वंदना से मेरी शिकायत नहीं लगाओगे,’’ उस ने मेरी पीठ पर दोस्ताना अंदाज में 1 धौल जमा कर जवाब दिया.

‘‘तुम्हारा सीक्रेट मेरे पास सदा सेफ रहेगा,’’ मैं भी शरारती अंदाज में मुसकराया. ‘‘थैंकयू. आजकल इस शहंशाह की खिदमत यह निशा नाम की कनीज ही कर रही है. तुम्हारा भी इस की सहेली के साथ चक्कर चलवाऊं?’’

‘‘अरे, नहीं. ऐसे चक्कर चलाने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ मैं ने घबरा कर जवाब दिया. ‘‘चक्कर मत चलाना पर हंसबोल तो लो उस रूपसी के साथ,’’ शरारती अंदाज में मेरी कमर पर 1 और धौल जमाने के बाद वह निशा और उस की सहेली की तरफ चला गया.

निशा की सहेली शिखा ज्यादा सुंदर तो नहीं थी पर उस में गजब की सैक्स अपील थी. यात्रा के दौरान वह बहुत जल्दी खुल कर मेरी दोस्त बन गई तो बरात में शामिल होने का मेरा मजा कई गुना बढ़ गया. अगले दिन सुबह बरात के साथ वापस न लौट कर हम दोनों टैक्सी से मसूरी पहुंच गए. जिस होटल में हम रूके वहां निशा और शिखा को पहले से ही मौजूद देख कर मैं बहुत हैरान हो उठा.

‘‘इन दोनों के साथ मसूरी में घूमने का मजा ही कुछ और होगा,’’ ऐसा कह कर रोहित ने मेरे सामने पहली बार निशा को अपनी बांहों में भरा.

दोस्तों की सोच और व्यवहार का हमारे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ता है. अपनी पत्नी मानसी को धोखा दे कर कभी किसी और लड़की के साथ चक्कर चलाने का विचार मेरे मन में नहीं आया था. यह रोहित की कंपनी का ही असर था कि शिखा के साथ की कल्पना कर मेरे मन में गुदगुदी सी होने लगी थी. हम दिन भर उन दोनों साथ मसूरी में घूमे. रात को रोहित उन दोनों के कमरे में चला गया. फिर शिखा मेरे कमरे में आ गई.

रोहित के साथ मैं ने जो शराब पी थी उस के नशे ने मेरे मन की सारी हिचक और डर को गायब कर दिया. उस पल ये विचार मेरे मन में नहीं उठे कि मैं कोई गलत काम कर रहा हूं या मानसी को धोखा दे रहा हूं.

शिखा ने पूर्ण समर्पण से पहले ही अपने पर्स से 1 कंडोम निकाल कर मुझे थमा दिया. उस की इस हरकत से मुझे तेज झटका लगा. मेरे मन में फौरन यह विचार उठा कि वह कौलगर्ल है और फिर देखते ही देखते उस के साथ मौजमजस्ती करने का भूत मेरे सिर से उतर गया.

‘‘मेरा मन बदल गया है. प्लीज, तुम सो जाओ,’’ पलंग से उतर मैं बालकनी की तरफ चल पड़ा. ‘‘आर यू श्योर?’’ वह मुझे विचित्र सी नजरों से देख रही थी.

‘‘बिलकुल.’’ ‘‘सुबह रोहित से किसी तरह की शिकायत तो नहीं करोगे?’’

‘‘अरे, नहीं.’’ ‘‘ वैसे मन न माने तो मुझे कभी भी उठा लेना.’’

‘‘श्योर.’’ ‘‘पैसे वापस मांगने का झंझट तो नहीं खड़ा करोगे?’’

‘‘नहीं,’’ उस के प्रोफैशनल कौलगर्ल होने के बारे में मेरा अंदाजा सही निकला.

अगली सुबह मेरी प्रार्थना पर शिखा हमारे बीच यौन संबंध न बनने की बात रोहित व निशा को कभी न बताने के लिए राजी हो गई.

सुबह उठ कर रोहित ने आंखों में शरारती चमक भर कर मुझ से पूछा, ‘‘कैसा मजा आया मेरे यार? मसूरी से पूरी तरह तृप्त हो कर चल रहा है न?’’ ‘‘बिलकुल,’’ मैं ने कुछ शरमाते हुए जवाब दिया तो उस के ऊपर हंसी का दौरा ही पड़ गया.

‘‘अपना इस मामले में नजरिया बिलकुल साफ है, दोस्त महीने में 1-2 बार मुंह का स्वाद बदल लो तो पत्नी से ऊब नहीं होती है.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो, गुरूदेव.’’ ‘‘चेले, एक बात साफ कह देता हूं. अगली बार ऐसी ट्रीट तुम्हारी तरफ से रहेगी.’’

‘‘श्योर, पर…’’ ‘‘पर क्या?’’

‘‘मुझे इस रास्ते पर नहीं चलना हो तो तुम नाराज तो नहीं हो जाओगे न?’’ ‘‘अब तो तुम्हारे मुंह खून लग गया है. तुम मेरे साथ मौजमस्ती करने निकला ही करोगे,’’ अपने इस मजाक पर उस का ठहाका लगा कर हंसना मुझे अच्छा नहीं लगा.

हम दोनों वापस दिल्ली आए तो पाया कि वंदना की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई थी. ‘‘खांसीबुखार अभी भी था. रात से पेट भी खराब होने के कारण बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी,’’ अपने रोग के लक्षण बताते हुए वंदना की आवाज बहुत कमजोर लगा रही थी.

‘‘तुम ने जरूर कुछ गड़बड़ खा लिया होगा,’’ रोहित ने उस का माथा चूमते हुए कहा. ‘‘आप मेरी खराब तबीयत को हलके में ले रहो हो…. आप को मेरी चिंता है भी या नहीं?’’ कहतेकहते वंदना रो पड़ी.

‘‘मैं आराम करने से पहले तुम्हें डाक्टर को दिखा लाता हूं.’’ रोहित का यह आदर्श पति वाला बदला रूप देख कर मैं ने मन ही मन उस के कुशल अभिनय की दाद दी.

वंदना की तबीयत सप्ताह भर के इलाज के बाद भी नहीं सुधरी तो मैं उन दोनों को अपने इलाके के नामी डाक्टर उमेश के पास ले गया. डाक्टर उमेश ने वंदना की जांच करने के बाद कुछ टैस्ट लिखे और फिर गंभीर लहजे में रोहित से बोले, ‘‘एचआईवी का टैस्ट आप को भी कराना पड़ेगा.’’

डाक्टर की बात सुन कर वंदना ने जिस डर, गुस्से व नफरत के मिलेजुले भाव आंखों में ला कर रोहित को घूरा था, उस रोंगटे खड़े करने वाले दृश्य को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकूंगा. मैं तो डाक्टर की बात सुन कर मन ही मन बहुत बुरी तरह से डर गया था. मैं ने उसी रात मन ही मन कभी न भटकने का वादा खुद से कर लिया. क्षणिक मौजमस्ती

के लिए अपनी व अपनों की जान को दांव पर लगाना कहां की समझदारी हुई? रोहित और वंदना दोनों की एचआईवी की रिपोर्ट नैगेटिव आई थी. इस कारण उन के 3 साल के बेटे राहुल की एचआईवी जांच नहीं करानी पड़ेगी.

वंदना के लगातार चल रहे बुखारखांसी का कारण उसे टीबी हो जाना था. अंदाजा यह लगाया गया कि यह बीमारी उसे अपने ससुरजी से मिली थी, जिन का देहांत कुछ महीने पहले ही हुआ था. यह देख कर मुझे बहुत अफसोस होता है कि रोहित ने पूरे घटनाक्रम से कोई सीख नहीं ली. कई बार शादी के बाद पतिपत्नी के रिश्ते बहुत ज्यादा मजबूत नहीं होते पर रोहित यह समझने को तैयार नहीं कि कौलगर्ल से संबंध बना कर अपनी व अपने जीवनसाथी की जिंदगी को दांव पर लगाना बहुत खतरनाक है.

आजकल वंदना से उस का बहुत झगड़ा होता है. ‘‘मैं इधरउधर मुंह मारने वाले इस इंसान को अपने साथ सोने का अधिकार अब कभी नहीं दूंगी.

मानसी से मुझे पता चला है कि वंदना अपने इस कठोर फैसले से हिलने को कतई तैयार नहीं है.

रोहित मुझ से मिलते ही वंदना की शिकायत करने लगता है, ‘‘वह मुझे अपने पास नहीं आने देती है. बेड़ा गर्क हो इस डाक्टर उमेश का जिस ने वंदना के मन में एचआईवी का वहम डाला. मेरी कमअक्ल पत्नी की जिद है कि मैं हर महीने उसे एचआईवी से मुक्त होने की रिपोर्ट ला कर दिखाऊं, नहीं तो अलग कमरे में सोऊं.’’ ‘‘उस का डरना व गुस्सा करना अपनी जगह ठीक है. एचआईवी का संक्रमण तुम्हारी पत्नी को ही नहीं, बल्कि आने वाली संतान को भी यह खतरनाक बीमारी दे सकता है.’’

‘‘तुम्हें तो पता ही है कि इस मामले में मैं बचाव का पूरा ध्यान रखता हूं.’’ ‘‘गलत काम करना पूरी तरह से छोड़ ही

दो न.’’ ‘‘तुम ऐसे दूध के धुले नहीं हो जो मुझे लैक्चर दो,’’ वह चिढ़ कर नाराज हो गया तो मैं ने चुप्पी साथ ली.

अब वंदना का स्वास्थ्य धीरेधीरे सुधर रहा था. वह अब हमारे साथ घूमने जाने लगी थी. मैं ने मानसी के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया है. मोटापा कम करने के लिए मैं उसे सदा उत्साहित करता रहता हूं. नियमित रूप से ब्यूटीपार्लर जाया करे, ऐसी जिद भी मैं करने लगा हूं.

अलार्म की आवाज सुन कर मानसी उठना चाहती थी पर मैं ने उसे बांहों में कैद कर के अपनी छाती से लगा लिया. कुछ मिनट के रोमांस के बाद ही मैं ने उसे बिस्तर छोड़ने की इजाजत दी. मानसी ने मेरे कान से मुंह सटा कर प्यार भरे स्वर में कहा, ‘‘आप बहुत बदल गए हो.’’

‘‘मुझ में आया बदलाव तुम्हें पसंद है न?’’ मैं ने शरारती लहजे में पूछा तो वह शरमाती हुई बाथरूम में चली गई. मानसी की बात में सचाई है. उसे देखते ही मेरा मन भावुक हो जाता है. फिर उसे छाती से लगाए बिना मन को चैन नहीं मिलता है.

मौजमस्ती का शौकीन रोहित परस्त्री से यौन संबंध बनाने से बाज नहीं आ रहा है. मेरे लाख समझाने के बावजूद वह इस मीठे जहर के खतरे को देखना ही नहीं चाहता है. जिस दिन उस की एचआईवी की रिपोर्ट पौजिटिव आ गई, उस दिन क्या वह बुरी तरह नहीं पछताएगा? उस जैसे जिंदादिल आदमी का एड्स का शिकार बन अपनी जिम्मेदारियां अधूरी छोड़ कर दुनिया से विदा हो जाना सचमुच एक बहुत बड़ी ट्रैजेडी होगी. Social Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : प्रसाद – रधिया को क्या मिल पाया अपने सपनों का राजकुमार?

Romantic Story in Hindi : रधिया के मन में जो बात 16 सालों से दबी थी, उस के पूरा होने का समय आ गया था. उस के पिता दीनदयाल उस के लिए एक लड़का देख कर आए थे और उस के बारे में वे अपनी बीवी और बेटे को बता रहे थे. रधिया जब अपने सपनों के राजकुमार के बारे में सोचने लगती, तो वह खिल जाती और आईने में अपना चेहरा देखने लगती.

अब रधिया को न तो दिन को चैन था और न रात को नींद. उस के मन में एक नई उमंग, शरीर में गुदगुदी और दिल में हलचल मची रहती थी. दिन कटते गए. लड़की देखने का दिन तय हुआ.

रधिया को देखने आज उस का राजकुमार आने वाला था. वह सजसंवर कर तैयार हो रही थी. पिताजी स्वागत की तैयारी में लगे थे. ‘मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए, बात आज ही पक्की हो जाए,’ ये सब बातें सोच कर दीनदयाल परेशान थे.

दरअसल बात यह थी कि इस से पहले भी 2 लड़के रधिया को देख कर चले गए थे, पर बात नहीं बनी थी. रधिया को देखने शाम को तकरीबन 5 बजे सभी मेहमान आ गए थे और रधिया के परिवार वाले उन के स्वागत में जुट गए थे.

रधिया की मां मन ही मन बेटी की मंगनी खुशीखुशी होने के लिए दुआ मांग रही थीं. रधिया मेहमानों के पास चाय ले कर पहुंची. एक ही नजर में रधिया को लड़का पसंद आ गया. जैसा वह सोचती थी, वैसा ही था उस के सपनों का राजकुमार.

रमेश खूबसूरत और एक गंभीर नौजवान था. उसे भी रधिया बहुत अच्छी लगी. रधिया के कसे बदन और नशीली आंखों ने जैसे रमेश को घायल कर दिया. अब क्या था. बात बन गई. सबकुछ तय हो गया. शादी का मुहूर्त निकाला गया. शादी 10 दिन बाद थी. लड़के वाले चले गए.

आज दीनदयाल बहुत खुश थे. इतने खुश कि जैसे बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो. रधिया की मां फूली नहीं समा रही थीं. रधिया का तो हाल ही कुछ और था. जब से उस ने अपने सपनों के राजकुमार को देखा था, तब से वह सपनों में खो गई थी. हर तरफ वही नजर आ रहा था.

जब रधिया की सहेलियां उसे छेड़तीं तो उस का मन और मचल जाता. वह अपनी खिली जवानी को आईने में देख कर मुसकरा जाती और आने वाले दिनों के सपनों में खो जाती. किसी तरह 10 दिन बीत गए. आखिर वह दिन भी आ गया, जिस का रधिया को बेताबी से इंतजार था.

सुबह के 8 बजे थे कि मां ने आवाज लगाई, ‘‘बेटी, मेहंदी लगाने के लिए तुम्हारी सहेली शबनम आई है. जा, मेहंदी लगवा ले या यों ही खोईखोई रहेगी.’’ मेहंदी, हलदीचंदन लगाने और सजनेसंवरने के बाद रधिया किसी परी से कम नहीं लग रही थी.

शाम को धूमधाम से बरात आई. शादी की सारी रस्में पूरी हुईं. विदाई का समय आया. चारों तरफ उदासी का माहौल छा गया. दीनदयाल बेटी की विदाई पर फफक पड़े. ससुराल पहुंचने के बाद सब ने रधिया की खूब तारीफ की. रमेश की मां ने बहू को रूप और गुण दोनों से भरा पाया और वे उसे बहू की जगह लक्ष्मी कह कर पुकारने लगीं.

रमेश तो रधिया को रानी कह कर पुकारता था. रधिया के आने से चारों तरफ खुशियां छा गईं. 5 साल बीत गए. रधिया और रमेश का प्यार वैसा ही बना रहा, जैसा कि शादी के शुरुआती दिनों में था. मगर सास की नजर में रधिया खटकने लगी थी, क्योंकि वे अब एक पोता चाहती थीं.

इसी तरह 2 साल और गुजर गए. औलाद न होने की वजह से रमेश की मां परेशान हो कर रमेश से बोलीं, ‘‘क्यों बेटा, हमें तुम पोता नहीं दोगे? तुम्हारे बाबूजी बोल रहे थे कि शादी को 7 साल हो गए, मगर बहू के पैर भारी नहीं हुए. क्या बात है?’’ रमेश ने कहा, ‘‘मां, तुम क्यों घबराती हो? अगर ऐसी बात है तो मैं डाक्टर से सलाह लूंगा और इलाज…’’

रमेश की बात काटते हुए मां बोलीं, ‘‘अभी तक तो पड़ोसनें ही कहती हैं, अब पूरी बिरादरी को क्यों बताना चाहते हो. बेटा, हमारी बात मानो तो तुम दूसरी शादी कर लो.’’ रमेश को इस बात से बड़ी तकलीफ हुई. वह बोला, ‘‘मां, तुम ऐसी बात क्यों बोल रही हो? तुम्हारी बहू अगर सुनेगी तो जीतेजी मर जाएगी. हम लोग डाक्टर से मिल कर सही सलाह लेंगे. हो सकता है, मुझ में ही कोई कमी हो.’’

इस बात पर मां बोलीं, ‘‘तुम तो हट्टेकट्टे हो. हमें यकीन है कि हमारे बेटे में कोई खोट नहीं है. खोट है तो उसी में. जरूर उस पर किसी का साया है, जो हमारी खुशियों में आग लगा रहा है. ‘‘तुम ऐसा करो कि किसी अच्छे तांत्रिक का पता लगाओ. हो सकता है, उस से मिलने पर इस मसले का कोई हल मिल जाए और हमारे मन की मुराद पूरी हो जाए.’’

मां के आगे रमेश लाचार हो गया. उस ने तांत्रिक के बारे में पता लगाना शुरू कर दिया. कुछ भागदौड़ करने के बाद पता चला कि उन के घर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर रामपुर गांव में एक तांत्रिक आया है, जो ऐसे कामों के लिए जाना जाता है.

रमेश तांत्रिक से मिला. उस तांत्रिक ने कहा, ‘‘अभी मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता, तुम परसों दिन में आओ तो इस के बारे में सोच कर बताऊंगा कि इस के लिए सही समय कब होगा.’’

रमेश फिर तांत्रिक के पास गया. तांत्रिक ने रमेश को चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की पहली रात को सारा इंतजाम करने को कहा और जरूरी सामान का लंबा सा परचा उस के हाथ में थमा दिया, जिस में खुशबूदार तेल, तिल, चंदन वगैरह थे. पूजा की सारी तैयारियां हो गई थीं. तांत्रिक महाराज बताए गए समय पर रमेश के घर आ पहुंचे. चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की पहली रात को उन की पूजा शुरू हुई.

पहली रात की पूजा में रधिया को घंटों धुएं की धूनी दी गई. फिर तांत्रिक ने एक हाथ पकड़ कर पूरे हाथ पर खुशबूदार तेल की मालिश की. रधिया को गैर मर्द का छूना बहुत खराब लगा, मगर वह मजबूर थी. वह उसे रोक भी नहीं सकती थी.

इस तरह लगातार 8 रातों तक बारीबारी से वह तांत्रिक धूप दिखा कर खुशबूदार तेल से अलगअलग अंगों की रगड़ कर मालिश करता रहा.

9वीं रात थी. हमेशा की तरह 9 बजे पूजा शुरू हुई, आज रधिया के पूरे शरीर से कपड़े उतार कर धूप दिखाने और खुशबूदार तेल से मालिश करने के बाद पूजा पूरी होनी थी. आज भी रधिया कुछ न बोल सकी. तांत्रिक के कहने पर उस ने सारे कपड़े उतार दिए. वह साधु के सामने ऐसे खड़ी थी जैसे कोई भोग किसी के लिए परोसा गया हो.

साधु रधिया की मालिश करने लगा. थोड़ी देर के बाद उस ने अपनेआप को साधु के हवाले कर दिया. उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. ससुराल वाले साधु के पक्ष में जो थे. साधु जी भर कर भूखे भेडि़ए की तरह रधिया को सारी रात नोचता रहा. सुबह साधु की विदाई बड़ी इज्जत के साथ की गई.

रधिया को पूजा का फल मिल चुका था. समय पूरा होने पर उस की सास को तांत्रिक महाराज की मेहरबानी से चांद जैसा सुंदर और फूल जैसा प्यारा पोता मिला. सभी खुश थे. घर में घी के दीए जलाए गए. सास बहू को फिर से लक्ष्मी कह कर पुकारने लगीं, मगर रधिया का हाल ऐसा था, जैसे काटो तो खून नहीं. Romantic Story in Hindi

Social Story in Hindi : समझौता – क्या जूही ने अपने जिस्म का समझौता किया?

Social Story in Hindi : डाक्टर के हाथ से परचा लेते ही जूही की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. बेचारी आज बहुत परेशान थी. होती भी क्यों न, मां को कैंसर की बीमारी जो थी. इधर 6 महीने से तो उन की सेहत गिरती ही जा रही थी. वे बेहद कमजोर हो गई थीं.

पिछले महीने मां को अस्पताल में भरती कराना पड़ा. ऐसे में पूरा खर्चा जूही के ऊपर आ गया था. मां का उस के अलावा और कौन था. पिता तो बहुत पहले ही चल बसे थे. तब से मां ने ही जूही और उस के दोनों भाइयों को पालापोसा था.

तभी जूही के कानों में मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘बेटी जूही, जरा पानी तो पिला दे. होंठ सूखे जा रहे हैं मेरे.’’

अपने हाथों से पानी पिला कर जूही मां के पैर दबाने लगी. परचा पकड़ते ही वह परेशान हो गई, ‘अब क्या करूं?’

रिश्तेदारों ने भी धीरेधीरे उन से कन्नी काट ली थी. जैसेजैसे वक्त बीतता जा रहा था, खर्चे तो बढ़ते ही जा रहे थे. सबकुछ तो बिक गया था. अब क्या था जूही के पास?

तभी जूही को सुभाष का ध्यान आया. उस की परचून की दुकान थी. वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. जूही उस की दुकान की तरफ चल दी.

सुभाष जूही को देख कर चौंका और उस के अचानक इस तरह से आने की वजह पूछी, ‘‘आज मेरी याद कैसे आ गई?’’ कह कर सुभाष उस की कमर पर हाथ फेरने लगा.

जूही ने कहा, ‘‘वह… लालाजी… मां की तबीयत काफी खराब है. मैं आप से मदद मांगने आई हूं. दवा तक के पैसे नहीं हैं मेरे पास,’’ कहते हुए वह हिचकियां ले कर रोने लगी.

जूही की मजबूरी में सुभाष को अपनी जीत नजर आई, ‘‘बोल न क्या चाहती है? मैं तो हर वक्त तैयार हूं. बस, तू मेरी इच्छा पूरी कर दे,’’ बोलते हुए सुभाष ने उस की तरफ ललचाई नजरों से ऐसे देखा, जैसे कोई गिद्ध अपने शिकार को देखता है.

जूही सुभाष की आंखों में तैर रही हवस को पढ़ चुकी थी. वह तो खुद ही समर्पण के लिए आई थी. हालात से हार मान कर वह उस के सामने जमीन पर बैठ गई. आखिर चारा भी क्या था, उस के पास समझौते के सिवा. जीत की खुशबू पा कर सुभाष की हवस दोगुनी हो गई थी. उस ने अपने मन की कर डाली.

थोड़ी देर बाद सुभाष ने जूही को रुपए देते हुए कुटिल मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘कभी भी, कैसी भी जरूरत हो, मैं तुम्हारी मदद के लिए तैयार हूं. बस, एक रात के लिए तू मेरे पास आ जाना.’’

खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए जूही वापस अस्पताल आ गई. उस ने दवा और अस्पताल के बिल चुकाए. वह मन ही मन सोच रही थी, ‘आज तो मैं ने समझौता कर के मां की दवाओं का इंतजाम कर दिया, लेकिन अब आगे क्या होगा?’

यही नहीं, जूही को अपने दोनों भाइयों की पढ़ाई और खानेपीने के खर्च की भी चिंता सताने लगी थी.

अब जब भी पैसों की जरूरत होती, जूही सुभाष के पास चली जाती और कुछ दिन के लिए परेशानी आगे टल जाती. वह अकसर अपने को दलदल में फंसा हुआ महसूस करती, लेकिन जानती थी कि रुपएपैसे के बिना गुजारा नहीं है.

धीरेधीरे मां की सेहत में सुधार होने लगा. भाइयों की पढ़ाई भी पूरी हो गई. नौकरी मिलते ही दोनों भाइयों ने अपनीअपनी पसंद की लड़कियों से शादी कर ली.

मां ने जब भाइयों से घर की जिम्मेदारी लेने को कहा, तो उन्होंने खर्चा देने से मना कर दिया. अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर वे अलग हो गए.

घर का खर्च, मां की बीमारी, डाक्टर की फीस व दवाओं का खर्च… इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जूही को बस एक सहारा दिखता था सुभाष.

लेकिन, जूही अब थक कर टूट चुकी थी. एक दिन मां ने उसे उदास देखा तो वे पूछे बिना न रह सकीं, ‘‘क्या हुआ आज तुझे? तू इतनी चुप क्यों हैं?’’ और उस की पीठ पर प्यार भरा हाथ फेरा.

जूही सिसकसिसक कर रोने लगी. वह मां से लिपट कर बहुत रोई. मां हैरान भी हुईं और परेशान भी, क्योंकि सिर्फ वे ही जानती थीं कि जूही ने इस घर के लिए क्याक्या कुरबानियां दी हैं.

कुछ दिन बाद जूही की मां हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं. उन के जाने के बाद जूही बहुत अकेली रह गई. इधर सुभाष को भी उस में कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी. जिस मकान में जूही रहती थी, वह भी बिक गया. सब सहारे साथ छोड़ कर जा चुके थे.

जूही ने एक कच्ची बस्ती में एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया और लोगों के घरों में रोटी बनाने लगी. रोज सपने बुनती, जो सुबह उठने तक टूट जाते थे, फिर भी उस ने हिम्मत नहीं हारी. पर शरीर भी कब तक साथ देता.

अब जूही बीमार रहने लगी थी. तेज बुखार होने की वजह से एक दिन सांसें थमीं तो दोबारा चालू ही नहीं हो पाईं. आज उस ने फिर एक नया समझौता किया था मौत के साथ. वह मौत के आगोश में हमेशाहमेशा के लिए चली गई थी… Social Story in Hindi

Filter Fashion : स्क्रीन में चमके, असल में फीके

Filter Fashion : सोशल मीडिया पर फिल्टर फैशन छाया हुआ है. डीपी देख कर लोग धोखा खा जाते है. फिल्टर के जरिए स्क्रीन पर जो चमक दिखती है असल में वह होती नहीं है. हर चमकती चीज सोना नहीं होती.

लखनऊ की रहने वाली प्रियंका और दिल्ली के रहने वाले निषांत की फेसबुक पर दोस्ती हुई. निषांत ने अपने को सेना में कार्यरत अफसर बताया था. उस की फेसबुक डीपी में लगी फोटो देख कर वह सेना का जवान लगता था. दोनों की आपस में मैसेंजर पर चैटिंग होने लगी. बात आगे बढ़ी तो दोनों ने एकदूसरे का मिलने का फैसला किया. निषांत ने एक दिन शताब्दी ट्रेन से लखनऊ आने का अपना कार्यक्रम बताया. प्रियंका ने कहा कि वह चारबाग रेलवे स्टेशन पर मिलेगी. तय समय पर वह स्टेशन पहुंच गई. कोच नंबर के सामने खड़ी प्रियंका निषांत को पहचान ही नहीं पा रही थी. जब मोबाइल किया तब दोनों मिल सके.

निषांत को देख कर प्रियंका सोच में डूब गई क्योंकि डीपी की फोटो से निषांत एकदम अलग था. उस की पर्सनैलिटी देख कर कहीं से यह नहीं लगता था कि निषांत सेना में होगा. दोनों स्टेशन के बाहर एक रेस्त्रां में बैठ गए. प्रियंका खुद को धोखा खाया समझ रही थी. इस कारण उस का मन नहीं लग रहा था. दूसरी तरफ निषांत प्रियंका के नजदीक जाने का लगातार प्रयास कर रहा था.

प्रियंका ने चाय और दोसा खाने के बाद वापस चलने का इरादा बनाया. निषांत ने अपने बारे में सेना की नौकरी से संबंधित जो डिटेल्स बताईं, उसे प्रियंका ने अपने किसी जानने वाले के जरिए क्रौस चैक कराया तो वे सही नहीं पाए गए.

निषांत उसे बारबार परेशान करने लगा. तब प्रियंका ने कहा कि, ‘तुम ने जो भी जानकारियां दी हैं वे झूठी हैं. अब हम इस रिश्ते में आगे नहीं बढ़ सकते.’ इस के बाद निषांत ने जब प्रियंका को कौल कर के परेशान करना चाहा तो उस ने 1090 नंबर पर महिला हैल्पलाइन की मदद ली.

महिला हैल्पलाइन में दारोगा ने फोन कर के निषांत को समझाया और न मानने पर मुकदमा कायम करने की धमकी दी. इस के बाद प्रियंका ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल बंद की और फोन नंबर भी बदल लिया, जिस से निषांत उस तक पंहुच न पाए.

अकसर लोग डीपी देख कर धोखा खा जाते हैं. असल में मिलने पर पता चलता है कि फिल्टर का कमाल था. मेघालय की लड़की को सोशल मीडिया पर प्यार हुआ और दोस्त से मिलने वह 2,500 किलोमीटर दूर से मिलने राजस्थान के झुंझुनू नवलगढ़ पहुंच गई. लड़की भटकती रही लेकिन उसे अपना दोस्त नहीं मिला. लोगों ने जब नवलगढ़ के चुणा चैक पर बदहवास युवती को घूमते देखा तो वहां की पुलिस को इस की सूचना दी.

सूचना के बाद नवलगढ़ पुलिस टीम मौके पर पहुंची. युवती से पूछताछ की गई, तो उस ने अपना नाम सैंगमीची ए मार्क, पुत्री सोहिता ए मार्क बताया. वह अपर बागान देहल री भोई, मेघालय की रहने वाली थी. उस ने बताया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर रमेश नाम के लड़के से उस की दोस्ती हुई थी. उस ने अपने को पुलिस आफसर बताया था. उस ने मिलने का वादा किया था. जब वह यहां पहुंची तो उसे रमेश नहीं मिला. उस ने जो नंबर दिया था वह बंद था. इस के बाद नवलगढ़ पुलिस ने मेघालय पुलिस और उस के परिजनों से संपर्क किया.

परेशान परिजनों ने लड़की की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. जब नवलगढ़ पुलिस ने सूचना दी कि लड़की सहीसलामत है, परिवार वालों ने राहत की सांस ली. नवलगढ़ पुलिस ने युवती को सांगानेर एयरपोर्ट, जयपुर से गुवाहाटी एयरपोर्ट के लिए एयर टिकट बुक करा कर वापस भेज दिया. डिजिटल दोस्ती कभीकभी असल में बहुत जोखिमभरी साबित होती है. सैंगमीची जैसी लड़की इस का उदाहरण है.

सोशल मीडिया पर ब्यूटी फिल्टर और एडिटिंग टूल्स का उपयोग कर के लोग अपनी तसवीरों को इतना बदल देते हैं कि देखने वाले असलियत और झूठ में फर्क नहीं कर पाते. वैसे, यह कोई नया काम नहीं है. ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के जमाने में हर शहर में शादी के लिए लड़के लड़कियों की फोटो को खूबसूरत बनाने का काम स्टूडियो में काम करने वाले फोटोग्राफर करते थे. लखनऊ के अमीनाबाद में इलैक्ट्रिक फोटो स्टूडियो था. वहां लोग शादीविवाह के अलावा अपनी यादगार फोटो खिंचवाने आते थे. इलैक्ट्रिक फोटो स्टूडियो की खासीयत यह थी कि वह फोटो को हकीकत से अधिक खूबसूरत बना देता था. इस के लिए वह 15 से 20 दिन का समय लेता था.

मोबाइल ऐप्स के जरिए अब यह काम सैकंडों में होने लगा है. इंस्ट्रग्राम और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर न केवल फोटो बल्कि वीडियो भी इस तरह एडिट कर दिए जाते हैं कि वे हकीकत से दूर हो जाते हैं. इस को ही ‘फिल्टर फैशन‘ या ‘फिल्टर डिस्मोर्फिया’ कहा जाता है. फिल्टर न केवल रंग बदलते हैं, बल्कि चेहरे के नैननक्श को भी बदल देते हैं. इस से लोग वास्तविक जीवन के मुकाबले तसवीरों में एकदम से अलग दिखने लगते हैं. यह प्रवृत्ति लोगों को यह महसूस कराती है कि वे बिना फिल्टर के अच्छे नहीं हैं. इस से उन के आत्मविश्वास में कमी आती है.

फोटो या वीडियो को देखने वाले लोग इस विश्वास में फंस जाते हैं कि फिल्टर की गई तसवीरें वास्तविक हैं, जो औनलाइन डेटिंग और सोशल नैटवर्किंग में गलतफहमी का कारण बनती हैं. इस के कारण ही सोशल मीडिया पर ‘नो फिल्टर’ मुहिम भी चलाई जाती है. लेकिन इस का असर ज्यादा होता नहीं है. बिना फिल्टर के अपनी ही फोटो खुद को अच्छी नहीं लगती है. ऐसे में उन मोबाइल का क्रेज अधिक होता है जिन से फोटो अच्छे क्लिक होते हैं. अब हर मोबाइल में फोटो क्लिक करते समय भी फिल्टर का प्रयोग किया जा सकता है.

दुनियाभर में 5.58 अरब लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं. स्नैपचैट सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स में से एक है, जो कई तरह के फिल्टर और एडिटिंग टूल्स उपलब्ध कराता है, जिन की मदद से लोग अपनी तसवीरों को अपनी कल्पना के अनुसार किसी भी रूप में बदल सकते हैं. 2025 तक औसतन प्रतिदिन 8 अरब से अधिक स्नैप बनाए जाते हैं. स्नैपचैट के दुनियाभर में 552 मिलियन उपभोगक्ता हैं. स्नैपचैट पर महिलाओं की संख्या सब से अधिक है. करीब 64 फीसदी महिलाएं या लडकियां स्नैपचैट का प्रयोग करती हैं.

महिलाएं सोशल मीडिया पर कई बार अपने फोटो अपलोड करती हैं. फोटो एडिटिंग ऐप्स द्वारा फिल्टर की गईं फोटो महिलाओं को अधिक अच्छी लगती हैं. जो लोग एकदूसरे को औफलाइन जानते हैं, वे जब औनलाइन और औफलाइन फोटो के बीच अंतर को समझते हैं तो उन के अंदर का भरोसा खत्म हो जाता है. स्नैपचैट फिल्टर की मदद से बड़ी आंखें, बड़े होंठ, नुकीली जौलाइन, सफेद दांत और पतला चेहरा पाया जा सकता है. साथ ही, त्वचा का रंग भी चिकना और एकसमान हो जाता है. इस के अलावा फोटो को क्रौप, शेड और कलर भी कर सकते हैं. इस के जरिए वे अपनी खामियों को छिपाने का काम करती हैं.

फोटो और वीडियो एडिटिंग ऐप्स

फोटो और वीडियो एडिटिंग के लिए कई शानदार ऐप्स हैं. ये एंड्रौयड और आईफोन दोनों पर काम करते हैं. इन में डिजाइन और वीडियो के लिए कैनवा, फोटो के लिए ‘पिक आर्ट’, ‘वीटा’, वीडियो के लिए ‘वीएन’ और ‘कैपकट’ प्रमुख हैं. ये एआई फीचर्स, फिल्टर्स और आसान एडिटिंग टूल प्रदान करते हैं. ‘स्नैपसीड’ गूगल द्वारा तैयार किया गया है. इस में एडवांस एडिटिंग टूल जैसे कि कवर्स और सेलैक्टिव एडिटिंग मोड मिलते हैं. ‘कैनवा’ फोटो कोलाज और ग्राफिक्स के लिए सब से अचछा है. लाइटरूम कलर एडजस्टमेंट और प्रोफैशनल एडिटिंग के लिए सब से अच्छा माना जाता है.

इसी तरह वीडियो एडिटिंग के लिए सब से अच्छे ऐप्स में ‘वीटा’ आसान इंटरफेस के साथ फुल एचडी वीडियो एडिटिंग और ट्रांजिशन के लिए सब से अच्छा माना जाता है. वीएन वीडियो एडिटर प्रोफैशनल लैवल की एडिटिंग के लिए बेहतरीन माना जाता है. ‘कैपकैट’ ट्रैंडिंग टेंपलेट्स और रील्स एडिटिंग के लिए सब से लोकप्रिय माना जाता है. ‘कैनवा’ सोशल मीडिया के लिए वीडियो और एनिमेशन बनाने के लिए बेहतर माना जाता है. ‘इजी कट’ वीडियो एडिटिंग और मेकर माना जाता है. यह फोटो और वीडियो दोनों के लिए उपयोगी होता है.

‘कैनवा’ तो यह एक ही स्थान पर फोटो डिजाइनिंग और वीडियो एडिटिंग दोनों कर देता है. ‘पिक आर्ट’ भी वीडियो और फोटो एडिटिग दोनों के लिए एआई के जरिए काम करता है. ये ऐप्स नए एडिट करने वालों से ले कर प्रोफैशनल कंटैंट क्रिएटर्स के बेहतरीन काम आते हैं. इन का उपयोग कर के फोटो और वीडियो को मनचाहा रूप दिया जा सकता है. Filter Fashion

O’Romeo (2026) Movie Review : “फिल्म की कहानी बिखरी, कलाकारों की भीड़ इकट्ठी”

O’Romeo (2026) Movie Review : बौलीवुड में अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मों की कमी नहीं है. शाहिद कपूर की यह फिल्म भी मुंबई के अंडरवर्ल्ड के एक कुख्यात अनुबंधित हत्यारे और ऐयाश उस्तरा (शाहिद कपूर) के इर्दगिर्द घूमती है. विशाल भारद्वाज के साथ शाहिद कपूर की जोड़ी फिल्म ‘कमीने’से बनी. यह फिल्म 2009 में रिलीज हुई थी और दर्शकों का खासा रिस्पौंस फिल्म को मिला था. उस के बाद कई फ्लौप फिल्में देने वाले शाहिद कपूर ने ‘हैदर’ फिल्म में अभिनय के लिए फिल्मफेयर अवार्ड जीता.

‘कबीर सिंह’शाहिद कपूर की एक और चर्चित फिल्म थी जिस में उस ने एक असंतुष्ट प्रेमी का किरदार निभाया. कियारा आडवाणी के साथ की गई इस फिल्म में उस ने वायलैंट प्रेमी का किरदार निभाया. उस की अन्य कर्ई फिल्मों में भी वायलैंट लव दिखाई दिया. विशाल भारद्वाज के साथ ‘कमीने’के बाद अब वह चौथी बार ‘ओ रोमियो’में विशाल भारद्वाज के साथ आया है.

‘ओ रोमियो’ साधारण गैंगस्टर पर बनी फिल्म नहीं है. यह फिल्म शोर नहीं रचाती, मगर धीरेधीरे अपनी पकड़ मजबूत बनाती है. फिल्म पहले किरदारों को करीब लाती है. दूसरे हिस्से में उन के छिपे राज खोलती है.

विशाल भारद्वाज की ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’और ‘हैदर’ शेक्सपियर के नाटकों की भारतीय रूपांतर थीं. उस की नई फिल्म ‘ओ रोमियो’हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया औफ मुंबई’से प्रेरित है. इस किताब में मुंबई अंडरवर्ल्ड में सक्रिय रही महिलाओं की दुनिया का जिक्र है.

फिल्म की कहानी बिखरीबिखरी सी है. विशाल भारद्वाज ने फिल्म में कलाकारों की भीड़ इकट्ठी की है. फिल्म की लंबाई ज्यादा है, लगभग 3 घंटे. कहानी 1995 के मुंबई अंडरवर्ल्ड की पृष्ठभूमि पर है. उस्तरा (शाहिद कपूर) एक गैंगस्टर है, जिसे के सिर पर खुफिया विभाग के अधिकारी इस्माइल खान (नाना पाटेकर) का हाथ है. इस्माइल खान अंडरवर्ल्ड सरगना जलाल (अविनाश तिवारी) के ड्रग्स नैटवर्क को खत्म कर देना चाहता है. उस्तरा पहले स्पेन में जलाल के साथ काम कर चुका है. वह स्पेन में अपनी पत्नी राबिया (तमन्ना भाटिया) के साथ रहता है.

वह खूंखार और हैवान है. वहीं से मुंबई में ड्रग्स और अंडरवर्ल्ड के धंधों को कंट्रोल करता है. छोटू (हुसैन दलाल) उस्तरा का खास आदमी है. बार डांसर जूली (दिशा पाटनी) उस्तरा की गर्लफ्रैंड है. एक दिन अफ्शा (तृप्ति डिमरी) अपने पति महबूब (विक्रांत मैसी) की हत्या का बदला लेने के लिए उस्तरा के पास आती है. वह जलाल, इंस्पैक्टर पठारे (राहुल देश पांडे) सहित 4 लोगों की सुपारी देना चाहती है. पहले तो उस्तरा इनकार कर देता है लेकिन फिर उस की हिम्मत देख कर उस की मदद करने को तैयार हो जाता है और इन चारों को मारने में उस की मदद करता है. वह अफ्शा को भी ट्रेंड करता है. इसी दौरान वह अफ्शा को चाहने लगता है.

मध्यांतर से पहले कहानी गैंगस्टर वार और पुलिस के बीच ऐक्शन ड्रामा लगती है. मगर मध्यांतर के बाद कहानी लवस्टोरी और बदले की हो जाती है. लोगों को मिनटों में मौत के घाट उतारने वाला उस्तरा अचानक रोमियो बन जाता है. वह अफ्शा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है. इधर उस्तरा, अफ्शा, जलाल और खान सभी की अलगअलग कहानी है जो बीचबीच में आती रहती है.

विशाल भारद्वाज ने शाहिद कपूर को चौकलेटी इमेज से बाहर निकाला है. कई जगह शाहिद सनकी और खूंखार लगा है जैसा वह ‘कमीने’और ‘हैदर’में दिखा था. शाहिद और नाना पाटेकर की नोकझोंक मजेदार है. नाना पाटेकर ने खान के किरदार में खूब मसखरी की है. तृप्ति डिमरी ने खूबसूरत होने के साथसाथ रोमांस और ऐक्शन भी किया है. अविनाश तिवारी ने आश्चर्यचकित किया है. उस की एंट्री ठीक इंटरवल से पहले होती है. विक्रांत मैसी, तमन्ना भाटिया और दिशा पाटनी के रोल ठीक हैं.

‘आशिकों की कालोनी…’गाने में दिशा पाटनी ने अपनी हौट फिगर दिखाई है. उस के बोल्ड स्टैप्स पर शाहिद कपूर ने बढिय़ा डांस किया है. गुलजार के गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत बढिय़ा है. गाने कहानी में अखरते नहीं. 90 के दशक के गानों का इस्तेमाल हुआ है. निर्देशन, ऐक्शन सीन बढिय़ा हैं, सिनेमेटोग्राफी भी अच्छी है. O’Romeo (2026) Movie Review

Rajpal Yadav : हंसी के मुखौटे के पीछे का सच

Rajpal Yadav : एक कलाकार जो अपनी प्रतिभा से दर्शकों का दिल जीतता है, उस से उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं. राजपाल यादव का कर्ज विवाद यह दिखाता है कि लोकप्रियता के साथ मिली छवि और जिम्मेदारी को निभाना किसी स्टार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, और यहां वे पूरी तरह विफल रहे.
यों तो बौलीवुड में हर कलाकार सदैव खुद को खबरों में बनाए रखना चाहता है लेकिन अपने अभिनय के बल पर लोगों को हंसाने में माहिर और अपनी बेमिसाल कौमेडी से करोड़ों दिलों को जीतने वाले अभिनेता राजपाल यादव इन दिनों अपनी किसी फिल्म की वजह से नहीं, बल्कि सलाखों के पीछे बिताए गए समय और एक दशक पुराने कर्ज के विवाद को ले कर चर्चा में हैं. 5 फरवरी, 2026 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में सरैंडर करने से ले कर 17 फरवरी को मिली अंतरिम जमानत तक, यह पूरा घटनाक्रम किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है.
यों तो दिल्ली हाईकोर्ट की जज स्वर्णकांता शर्मा की बैंच ने 17 फरवरी को उन्हें 18 मार्च तक के लिए अंतरिम जमानत दे दी है. 19 फरवरी को राजपाल यादव अपने पैतृक गांव शाहजहांपुर पहुंच कर अपनी भतीजी की शादी में शामिल हुए. लेकिन 17 फरवरी को ही माधव गोपाल अग्रवाल, जिन से राजपाल यादव ने 2010 में पांच करोड़ रुपए का कर्ज लिया था, ने अपनी अब तक की चुप्पी को तोड़ते हुए ‘न्यूज पिंच’ यूट्यूब चैनल सहित कुछ चैनलों पर इंटरव्यू दे कर राजपाल यादव की सारी पोल दी. भले ही बौलीवुड उन के साथ खड़ा नजर आ रहा हो लेकिन राजपाल यादव की नैतिक हार तो हो ही चुकी है.
अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च को होनी है, तब तक राजपाल यादव क्या करते हैं, यह तो वे ही जानें. एक माह के वक्त में राजपाल यादव जो कदम उठाएंगे, वो तय करेंगे कि 18 मार्च के बाद भी वे अपने घर पर रहेंगे या फिर से तिहाड़ जेल पहुंचेंगे.
कौन हैं राजपाल यादव?
(हास्य कलाकार के रूप में पहचान)
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के अंतर्गत कुंडरा बंडा गांव के निवासी राजपाल यादव ने भारतेंदु नाट्य अकादमी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण लेने के बाद 1999 में दूरदर्शन पर प्रसारित टीवी सीरियल ‘मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत की थी, जिस का निर्माण व निर्देशन प्रकाश झा ने किया था. इसी से वे हास्य अभिनेता के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए थे. उस के बाद राम गोपाल वर्मा ने उन्हें फिल्म ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं’ में अंतरा माली के अपौजिट हीरो बना दिया. हम याद दिला दें कि उन दिनों अंतरा माली के पिता बौलीवुड के मशहूर फोटोग्राफर जगदीश माली थे. अब इस फिल्म के निर्माण में किस का पैसा लगा था, यह आज तक रहस्य बना हुआ है. मगर यह फिल्म बौक्स औफिस पर सफलता के झंडे नहीं गाड़ सकी और अंतरा माली की यह पहली व अंतिम फिल्म साबित हुई. लेकिन राजपाल यादव लगातार व्यस्त रहे. ‘चांदनी बार’, ‘रोड’, ‘हंगामा’, ‘डरना मना है’, ‘चोर मचाए शोर’ ‘भूलभुलैया’, ‘मालामाल वीकली’ सहित कई सफलतम फिल्में कीं.
पारिवारिक जिंदगी में उथलपुथल
एक तरफ राजपाल यादव का फिल्मी कैरियर सफलता की डगर पर दौड़ रहा था, तो दूसरी तरफ उन की जिंदगी में भूचाल व तूफान सा आया हुआ था. उन की पहली पत्नी बच्चे के जन्म देते समय इस संसार को अलविदा कह गई. फिर सुर्खियां गर्म हुईं कि राजपाल यादव ने किसी फिरंगी यानी कि विदेशी लड़की को अपना दिल दे दिया है. आखिरकार, एक दिन राजपाल यादव ने उसी विदेशी लड़की से 10 जून, 2003 में विवाह कर लिया. उस वक्त कहा गया कि राधा भारतीय मूल की कनाडाई नागरिक हैं, जिन का जन्म व परवरिश कनाडा में हुआ. 2001 में फिल्म ‘द हीरो’ की शूटिंग के दौरान कनाडा के कैलगरी शहर के एक आइस्क्रीम पार्लर में दोनों की मुलाकात हुई थी. 2003 से वे भारत में ही रह रही हैं.
Rajpal Yadav (1)
फिल्म ‘काम चालू है’ भले ही बौक्स ऑफिस पर धमाल नहीं मचा पाई लेकिन राजपाल के अभिनय ने दर्शकों का दिल जीत लिया.
चर्चाएं तो यह भी रहीं कि अपनी पत्नी राधा यादव को खुश करने के लिए ही राजपाल यादव को फिल्म ‘अता पता लापता’ बनाने का निर्णय लेना पड़ा था. मगर इस बात को आज तक राजपाल यादव ने स्वीकार नहीं किया.
‘अता पता लापता’ का निर्माण और पांच करोड़ का कर्ज
2010 में राजपाल यादव ने श्री नौरंगी गोदावरी एंटरटेनमैंट कंपनी के बैनर तले फिल्म ‘अता पता लापता’ का निर्माण शुरू किया, जिस में अभिनय करने के साथ वे निर्देशन भी कर रहे थे. बताया जाता है कि आधी फिल्म बनने के बाद पैसे का संकट पैदा हो गया. तब राजपाल यादव ने शाहजहांपुर के एक स्थानीय नेता मिथलेश की मदद से एक व्यापारी माधव गोपाल अग्रवाल की दिल्ली स्थित कंपनी मेसर्स मुरली प्रोजैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपए का कर्ज लिया.
Rajpal Yadav (2)
राजपाल यादव द्वारा निर्देशित और अभिनीत फिल्म ‘अता पता लापता’ ने न केवल बौक्स ऑफिस पर उन्हें बुरी तरह फ्लॉप किया, बल्कि उन्हें कानूनी और आर्थिक मुसीबतों में भी घेर लिया.
लगभग 30 करोड़ रुपए की लागत में बनी यह फिल्म जब 2012 में बनी तो इस ने बौक्स औफिस पर केवल 40 लाख रुपए ही एकत्र किए. यानी, राजपाल यादव की सारी रकम डूब गई और वे माधव गोपाल अग्रवाल का पैसा लौटा नहीं पाए.
फिल्म के संगीत लोकार्पण में गड़बड़
2012 में फिल्म को रिलीज करने से पहले राजपाल यादव ने फिल्म के संगीत लोकार्पण का भव्य समारोह मुंबई में आयोजित किया. फिल्म के संगीत का लोकार्पण करने के लिए खुद अमिताभ बच्चन आए थे. इस खबर ने माधव गोपाल अग्रवाल को ऐसा गुस्सा दिलवाया कि 2013 में यह मामला अदालत पहुंच गया.
दावा बनाम हकीकत
अदालत में 2013 से मुकदमा शुरू हुआ. अदालत में राजपाल यादव यही कहते रहे कि जैसे ही उन के पास पैसे आएंगे, वे दे देंगे. इसी आधार पर उन्होंने माधव गोपाल के साथ कई बार अलगअलग समझौते करते हुए उन्हें 7 चेक भी दिए और सभी चेक बाउंस हो गए. उधर राजपाल यादव मीडिया में कहते रहे कि यह पैसा कर्ज नहीं बल्कि एक ‘इन्वैस्टमैंट’ (निवेश) था, जो माधव गोपाल अग्रवाल ने अपने पोते को फिल्म में लौंच करने के लिए लगाया था.
पिछले 14 वर्षों से राजपाल यादव के साथ गुप्त रह कर अदालती लड़ाई लड़ रहे माधव गोपाल अग्रवाल ने अचानक 17 फरवरी को उस वक्त सब से पहले ‘न्यूज पिंच’ के यूट्यूब चैनल पर लंबाचौड़ा इंटरव्यू दे कर राजपाल यादव के सारे दावे को झूठा करार दिया. यह उन्होंने तब किया जब दिल्ली हाईकोर्ट ने राजपाल यादव को 18 मार्च तक अंतरिम जमानत देते हुए उन से उन का पासपोर्ट जमा करवा लिया.
माधव गोपाल अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि एग्रीमैंट में साफ लिखा था कि यह ‘पर्सनल गारंटी’ पर लिया गया कर्ज था, जिस का फिल्म की सफलता या विफलता से कोई लेनादेना नहीं था. उन्होंने यह भी साफ किया कि इंवैस्टमैंट करने का कोई सवाल ही नहीं उठता. उन्हें व उन के बेटे की फिल्मों में रुचि नहीं है और पोते को फिल्म में लौंच करने का कोई मामला ही नहीं था. उन का पोता तो अब 12 साल का हुआ है.
अपने इंटरव्यू में माधव गोपाल यादव ने साफ किया कि उन्होंने यह कर्ज शाहजहांपुर के स्थानीय सांसद मिथिलेश के कहने पर दिया था, जो कि तब समाजवादी पार्टी में थे. अब वे भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं. माधव गोपाल अग्रवाल ने चैनल पर इंटरव्यू में यह भी कहा कि उन्होंने राजपाल को पैसा उधार दिया था, वह पैसा उन्होंने खुद दूसरों से ब्याज पर लिया था.
अपने इंटरव्यू में माधव गोपाल अग्रवाल काफी भावुक भी हुए. उन्होंने कहा कि वे मुंबई जब राजपाल यादव के घर अपना पैसा मांगने आए थे, तो वे राजपाल यादव के सामने बच्चों की तरह रोए. लेकिन उन्हें उन के पैसे वापस नहीं मिले.
तिहाड़ जेल में सरैंडर
7 चेक बाउंस होने और दिल्ली हाईकोर्ट की कड़ी फटकार तथा राजपाल यादव को किसी भी तरह की रियायत देने से हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया. न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने स्पष्ट किया कि ‘कानून आज्ञाकारिता को पुरस्कृत करता है, अवमानना को नहीं.’ कोर्ट ने नोट किया कि 9 करोड़ रुपए के बकाया में से उन्होंने केवल 1.5 करोड़ रुपए ही चुकाए थे. तब राजपाल यादव ने 5 फरवरी की शाम 4 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में सरैंडर किया था.
मदद के लिए बौलीवुड व कुछ नेता आए सामने
7 फरवरी को सब से पहले बिहार के राजनेता तेज प्रताप यादव ने राजपाल यादव को 11 लाख रुपए की मदद की पेशकश की. उस के बाद बौलीवुड में भी हलचल हुई. सब से पहले सोनू सूद ने मुंबई के एक बड़े अखबार के मुख्य पन्ने पर इंटरव्यू देते हुए राजपाल यादव की आर्थिक मदद करने की पेशकश की. कुछ दूसरे कलाकारों ने भी ऐसा करने की बात कही. राव राजेंद्र सिंह ने तो सवा करोड़़ रुपए की मदद करने की पेशकश करते हुए सोशल मीडिया पर ‘क्यूआर कोड’ डाल कर लोगों से भी पैसे मांगे. अब किस ने कितने पैसे क्यूआर कोड़ के माध्यम से राव राजेंद्र सिंह को दिए कि वह राजपाल यादव तक पैसा पहुंचा दे, इस की कहीं से कोई जानकारी नहीं मिल रही है.
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राजपाल यादव अपनी बेटियों को अपनी सब से बड़ी खुशी मानते हैं. वे सोशल मीडिया पर अकसर उनके साथ तसवीरें साझा करते हैं.
16 फरवरी को एक इंग्लिश अखबार को दिए इंटरव्यू में राजपाल यादव की पत्नी ने कह दिया था कि उन के पास अब तक कहीं से कोई मदद नहीं पहुंची. जेल से अंतरिम जमानत पर बाहर आने के बाद राजपाल यादव ने भी कुछ नहीं कहा. उन्होंने भतीजी की शादी के बाद बात करने की ही बात की.
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फिल्म ‘हंगामा’ में उन के हास्यपूर्ण रोल ने दर्शकों का दिल जीता. उन की डायलॉग डिलीवरी और चेहरे के एक्सप्रैशन ऐसे होते हैं कि बिना बोले ही हंसी छूट जाए.
बौलीवुड की कार्यशैली से नजदीकी से परिचित लोग तो समझते हैं कि कौन किस की कितनी मदद करता है? वैसे भी, अखबार को इंटरव्यू देने के 2 दिन बाद ही सोनू सूद बदल गए. सोनू सूद ने कहा, ‘हम राजपाल यादव के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते, इसलिए हम सभी उन्हें अपनी फिल्म में काम देने के बदले में पैसा देंगे.’ अब सभी को याद रखना होगा कि सोनू सूद फिल्म ‘फतेह’ में बुरी तरह से हाथ जला चुके हैं और अब वे जल्द कोई फिल्म बनाएंगे, इस की उम्मीद नजर नहीं आती. उन का अभिनय कैरियर भी पूरी तरह से ठप है.
17 फरवरी को मिली अंतरिम जमानत
जेल में 12 दिन बिताने के बाद राजपाल यादव को 17 फरवरी, 2026 को उस वक्त बड़ी राहत मिली जब दिल्ली हाईकोर्ट ने राजपाल यादव को उन की भतीजी की शादी में शामिल होने तथा माधव गोपाल अग्रवाल को 1.5 करोड़ रुपए देने पर 18 मार्च तक अंतरिम जमानत दे दी. राजपाल यादव को अपना पासपोर्ट कोर्ट में जमा करना पड़ा है और अब वे बिना अदालत से अनुमति लिए विदेश नहीं जा सकते. 18 मार्च को उन्हें खुद या वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के माध्यम से कोर्ट में मौजूद रहना होगा. राजपाल यादव को एक लाख रुपए का बेल बौंड और इतनी ही राशि की श्योरिटी देनी पड़ी.
रिहाई के बाद क्या कहा?
जेल से बाहर आने के बाद राजपाल ने देश, अपने प्रशंसकों और बौलीवुड के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मुझे सहानुभूति से ज्यादा समय की जरूरत है. समय सब से बड़ा न्यायाधीश है और वह दूध का दूध और पानी का पानी कर देगा.’’
क्या है राजपाल यादव की आय?
कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि राजपाल यादव सफल कलाकार हैं तो फिर वे पैसा क्यों नहीं चुका देते. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राजपाल यादव एक फिल्म के लिए 2 करोड़ से 3 करोड़ रुपए लेते हैं. हालिया फिल्मों की बात की जाए तो ‘भूल भुलैया 2’ के लिए उन्हें 1.25 करोड़ और ‘चंदू चैंपियन’ के लिए 2 करोड़ रुपए मिले थे. एक विज्ञापन करने के लिए वे एक करोड़ रुपए लेते हैं. मगर बौलीवुड में सफल कलाकार की इमेज को बनाए रखने की लिए दिखावटी जीवनशैली भी जीनी पड़ती है. तो वहीं, वे मजबूरों की मदद करना नहीं छोड़ते. भूखों को खाना खिलाना नहीं छोड़़ते. नवाजुद्दीन सिद्दीकी सहित कई कलाकार स्वीकार कर चुके हैं कि वे अपने स्ट्रगल के दिनों में राजपाल यादव के ही घर पर मुफ्त में खाना खाते थे. राजपाल यादव ने सही मायनों में अपने घर पर फिल्म इंडस्ट्री के स्ट्रगलों के लिए लंगर खोल रखा है, यह बात कई लोग स्वीकार करते हैं.
राजपाल यादव के सामने रास्ता?
अब राजपाल यादव के पास 18 मार्च तक का समय है. यदि वे शेष राशि को चुकाने के लिए कोई ठोस योजना या रकम पेश नहीं कर पाते, तो उन की अंतरिम जमानत रद्द की जा सकती है. बौलीवुड से आर्थिक सहयोग की उम्मीद करना तो मूर्खता ही है. यदि बौलीवुड में लोग अपने सहकलाकारों की आर्थिक मदद करते तो भारत भूषण सहित कई कलाकारों को भूखा न मरना पड़ता. Rajpal Yadav
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