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Family Story in Hindi : पश्चात्ताप – पछतावा करते पति के उथलपुथल मन की मार्मिक कहानी

Family Story in Hindi : अनंत ने बस इतना ही तो कहा था फोन पर कि आज रात तक पहुंच जाऊंगा, फिर क्यों इतने बेचैन हो उठे थे अखिलेश भैया.

अनंत आ रहा है शिमला से. आते ही न जाने कितने प्रश्न पूछेगा कि मेरा कमरा गंदा क्यों है. यूनिफौर्म ठीक से क्यों नहीं धुली. इस घर में इतना शोर क्यों है. आजकल उस का हर सवाल इतना अजीब होता है कि भैया को समझ नहीं आता कि वे क्या जवाब दें. कुछ कहने की कोशिश करते भी हैं तो पूरा घर ज्वालामुखी के मुहाने पर जा बैठता है.

कब से आराम कुरसी पर निश्चेष्ट से पड़े थे भैया. कहने को सामने अखबार खुला पड़ा था, पर एक भी पंक्ति नहीं पढ़ी गई थी उन से. शाम घिर आई थी, थकेमांदे पक्षी अपनेअपने नीड़ को लौट चुके थे.

हर बार यही होता. जब भी भैया परेशान होते हैं, इसी तरह वीराने में आ कर बौखलाए से चक्कर लगाते रहते हैं या फिर अखबार खोल कर एकांत में बैठ जाते हैं. तब मैं ही आ कर उन्हें इस संकट से उबारता हूं और वे नन्हे, अबोध बालक की तरह चुपचाप मेरे पीछेपीछे चले आते हैं.

लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. सुबह से वे यहीं बैठेबैठे न जाने कितनी बार, टेपरिकौर्डर में ‘यों हसरतों के दाग मोहब्बत में धो लिए, खुद दिल से दिल की बात कही और रो दिए…’ गीत रिवाइंड कर के सुन चुके थे. जैसे, घर के अंदर जाने का मन नहीं कर रहा था उन का. सिर्फ अनंत के कमरे की बत्ती जल रही थी. घर की एक चाबी अब उस के पास भी रहती है. खुद ही दरवाजा खोल कर चला आता है. वैसे भी, अब उमा भाभी तो रही नहीं जो उन की प्रतीक्षा में भूखीप्यासी बैठी रहें.

‘‘कब से पड़े हैं आरामकुरसी पर, ठंडी हवाओं ने कहीं हड्डियों में छेद कर दिया तो लकवा मार जाएगा. पड़े रहेंगे फिर बिस्तर पर,’’ अनंत ने घर में घुसते ही कमर पर हाथ रख कर पुलिसिया अंदाज में कहा तो भैया ने मुंह दूसरी ओर फेर लिया.

‘‘क्यों ऐसे कड़वे शब्द मुंह से निकाल रहा है. तुझे तो मालूम है आज भाभी की पुण्यतिथि है.’’

‘‘हुंह, जब तक जिंदा थीं तब तक तो चोंच लड़ाने की फुरसत नहीं थी, मरने के बाद अब मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं,’’ अनंत ने टेपरिकौर्डर पर लगा कैसेट निकाल कर भजन का कैसेट लगा दिया तो भैया की आंखों से निराधार अश्रुधारा बह निकली.

‘‘यह क्या किया तू ने. मां की पसंद की गजल को कुछ देर सुन लेता तो तेरा कद क्या छोटा हो जाता?’’

‘‘सुननी ही थी तो मां जब गाती थीं तब सुनते. घडि़याली आंसू बहा कर दुनिया को क्या दिखाना चाह रहे हैं. भजन सुनिए, मां की आत्मा को शांति तो मिलेगी.’’

‘‘जरा धीरे बोल, अनंत. भैया को बुरा लगेगा. वैसे ही उन का मन छोटा हो रहा होगा.’’

‘‘जैसा बोलेंगे वैसा ही तो सुनेंगे,’’ बेटे के मुंह से निकले व्यंग्यबाणों से भैया का अंतर्मन तक बुरी तरह घायल हो गया. वे रोंआसे हो उठे.

‘‘इसे इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं, कोई मरे या जिए. इस समय उमा होती तो गरम दोशाला कंधों पर डाल कर जबरन घर के अंदर ले जाती,’’ भैया बोल पड़े.

‘‘अगर होती तब न. अब तो वे नहीं हैं इस दुनिया में,’’  अनंत भी रोंआसा सा हो उठा.

मैं सोच रही थी, इंसान मरने के बाद क्या इतना महान हो जाता है. जीतेजी पत्नी में दोष निकालने वाले भैया को देख कर लगता, इन्हें पत्नी कभी सुहाई ही नहीं. प्यार, ममता, सामंजस्य, सहानुभूति, समर्पण की प्रतिमूर्ति, गौरवर्णा भाभी पति के सिवा परिवार के हर सदस्य की चहेती थीं पर भैया के हृदय की कभी साम्राज्ञी नहीं बन पाईं. (1)

भैया स्वभाव से ही अहंकारी थे. स्वयं को सुपरमैन समझाना उन की आदत में शुमार था. इसीलिए वे उन के हरेक काम में मीनमेख निकालते थे.

भैया की इसी आदत से परेशान हो कर एक दिन मां ने उन्हें समझया था, ‘तेरे ऐसे व्यवहार से बहू का दिल टूट जाएगा, अखिल. कितना मानसम्मान देती है वह हम सब को. तेरे मुंह से प्यार के दो शब्द कभी नहीं निकलते, फिर भी हम सब को हंसाती रहती है. खुद भी हंसती रहती है. घृणा, मनमुटाव जैसे विचार तो कभी हावी होते ही नहीं उस पर.’

भैया को उपदेश सुनने की आदत नहीं थी. बाबूजी मां को हमेशा समझते, पत्थर पर सिर पटकोगे तो चोट खुद को ही लगेगी पर मां न जाने किस मृगतृष्णा में जीती थी.

भैया को भाभी के मायके वालों का अनादर करते देख बाबूजी ने आगाह किया था, ‘अगर उस के घर वालों का अनादर करोगे तो उसे भी हम सब का अनादर करते देर नहीं लगेगी.’ पर भैया तो अहंकार के मद में झमते थे.(2)

जब भैया का विवाह हुआ था तब मैं बहुत छोटी थी, फिर भी कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो मेरे मानसपटल पर जस की तस अंकित हैं.

भैया के विवाह की पहली वर्षगांठ थी. भाभी यह दिन बड़ी धूमधाम से मनाना चाह रही थीं. भैया को घूमनेफिरने, सभासोसाइटियों में जाने का शौक नहीं था. स्वभाव चिड़चिड़ा था, इसीलिए मित्रों व परिचितों का दायरा भी सीमित था. भाभी सुबह से ही रोमांचित और उत्साहित थीं. भैया के कठोर स्वभाव को देख कर मां हमेशा भाभी की हर छोटीबड़ी खुशियों का ध्यान जरूर रखती थीं. आननफानन फोन पर ही मित्रों व परिजनों को निमंत्रण भेज दिया गया. भाभी ने तरहतरह के व्यंजन खुद तैयार किए. उस के बाद दौड़तीभागती, पसीना पोंछती वे घर को नए सिरे से सजाने में जुट गईं. मैं भी अपने नन्हेनन्हे और भोलीभाली समझ से, उन का हाथ बंटाती रही.

शाम को भैया दफ्तर से लौटे तो उन का मुंह फूल कर कुप्पा हो गया. मां कुरेदती रहीं, भाभी पूछती रहीं लेकिन उन के मुंह से एक भी शब्द न निकला था.

कुछ ही देर में पूरा घर मेहमानों से भर गया. भाभी सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थीं. तभी एक धमाका हुआ.

भाभी के कालेज के दिनों के एक मित्र ने भैया को घेर लिया, जो भैया के भी मित्र थे.

‘आज तो हम उमा से गजल सुनेंगे. अरे भई, बहुत कशिश है उन की आवाज में,’ भाभी के सहपाठी ने बड़े उत्साह से बताया तो भैया आश्चर्य से केवल उस का चेहरा भर देखते रह गए, ‘क्या कह रहे हो!’

‘सही कह रहा हूं, बहुत बार सुनी है.’

‘अरे, नहीं भाई, कोई और होगी,’ भैया बोले, मगर मित्र की आवाज से आश्चर्य की परिसीमा और एक अतिरिक्त आवेग झलक रहा था, जो वास्तव में भैया को नहीं सुहाया था. बस, कुछ ही देर में, ‘यों हसरतों के दाग…’ गजल भाभी ने गाई तो सभी ने मुक्तकंठ से उन की तारीफ की.

सुवीरा भी उस पार्टी में आई थी. भैया के औफिस में ही तो काम करती थी, बोली, ‘आप बहुत खुशहाल हैं अखिलेश साहब, आप की पत्नी जितनी सुंदर हैं उतनी ही सुशील और गुणवान भी हैं.’

सभी से तारीफ बटोरने और मेहमानों से विदा लेने के बाद भाभी कमरे में पहुंची ही थीं कि भैया के चीखने का स्वर उभरा. वे बारबार भाभी का रिश्ता उन के उस सहपाठी से जोड़ रहे थे जिस ने पार्टी में गजल सुनने की उन से फरमाइश की थी.

भाभी जब सुबह उठीं तो उन की आंखें सूजी हुईर् थीं, चेहरा बुझ हुआ था. किसी से शिकायत भी तो नहीं करती थीं, लेकिन उस दिन मां ने दुलारा तो वे छलक उठीं थीं. भैया को इस बात से चिढ़ थी कि उन की इजाजत बिना पार्टी का आयोजन क्यों किया गया. भाभी ने सार्वजनिक रूप से गजल क्यों गाई. भाभी का उस दिन भैया के शंकालु स्वभाव से पहली बार सामना हुआ था.

अगले दिन रविवार था. भैया बहुत अच्छे मूड में थे. कोई सुंदर सी धुन गुनगुना रहे थे. काफी देर तक उन के कमरे से हंसीठट्ठा की आवाज सुनाई देती रही. अम्माबाबूजी के चेहरे पर संतोष की चिलमन छाई हुई थी.

कुछ ही समय में हम सब भैयाभाभी के कमरे में पहुंच गए. मां ने भैया को मीठी सी ?िड़की दी, ‘खुद गीत गुनगुना रहा है, बहू ने गाया तो चिढ़ गया.’

‘तो, सुन लो अपनी बहू से गाना,’ भैया ने चहक कर कहा तो भाभी ने दूसरा गीत गाया, ‘रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह…’ हम सब भावविभोर हो कर गीत सुन रहे थे. अचानक भैया को क्रोध आ गया और वे तेजी से भुनभुनाते हुए सीढि़यां उतर गए, ‘जब गाएगी दुखभरा गीत ही गाएगी.’ उस समय भाभी की सिसकियां रसमय वातावरण को गमगीन बना गई थीं. उस दिन तो अम्मा के मन में अपनी बहू के प्रति ऐसी संवेदना उपजी कि वे फूटफूट कर रो पड़ी थीं, लेकिन उस के बाद भाभी ने हमेशाहमेशा के लिए सुरताल से नाता तोड़ लिया.

‘इस घर में उमा को अनादर, अपमान, अवहेलना के अलावा कभी कुछ नहीं मिलेगा. मैं तो हीरा चुन कर लाई थी पर अखिलेश ने पत्थर समझ कर रौंद डाला मेरी बहू को,’ मां ने अफसोस जताया.

‘धीरज रखो, सुमन. एक बच्चा होगा तो सब ठीक हो जाएगा,’ बाबूजी बोल पड़े थे.

‘इसी बात की तो चिंता है. उमा मां बनने वाली है. ऐसे वातावरण में बच्चों को क्या संस्कार मिलेंगे.’

गर्भवती भाभी की सेवाटहल करतीं मां अब उन्हें पहले से दोगुना प्यार देने लगी थीं. मां ने भैया को भी समझया कि अपनी पत्नी के साथ नम्रता से पेश आए लेकिन भैया न डरे न झोंपे बल्कि ऊंची आवाज में चिंघाड़े, ‘बहुत सिर चढ़ा रखा है तुम ने अपनी बहू को, अम्मा. इसे समझ दो, रहना है तो मेरे तरीके से रहे.’ (3)

‘क्या मतलब?’

‘इस घर में मेरी मरजी चलेगी. मेरी पसंद का भोजन पकेगा. मेरी पसंद से घूमनाफिरना, पहननाओढ़ना होगा.’

‘क्यों?’

मां, भैया का इशारा साफ समझ

गई थीं.

‘क्योंकि मैं मर्द हूं. उमा मेरी पत्नी है.’

उस दिन तो बेटे की आंखों के लाल डोरे देख मां का भी स्वर कांप उठा था, ‘वही तो करती है बहू.’

‘हां, उस के बाद ‘यों हसरतों के दाग…’ गा कर सब के सामने आंसू भी तो बहाती है,’ भैया ने मुंह बिचका कर कहा तो मां सर्पणी की तरह फुंफकार उठी थीं, ‘जब समझाता ही है तो दुख क्यों देता है बेचारी को.’

‘हुंह, बेचारी, दुख मैं नहीं तुम सब देते हो मुझे.’

7 महीने का अंतराल चुपचाप दरक गया आहिस्ता से. प्रसव पीड़ा झेलती भाभी ने भैया से अस्पताल साथ चलने की अनुनय की तो जीवन की हर सचाई को सूक्ष्मता से निरखनेपरखने की शक्ति रखने वाली मां अच्छी तरह समझ पा रही थीं. ऐसे समय में जीवनमृत्य के बीच उलझ औरत हर अच्छेबुरे परिणाम के लिए तैयार रहती है, इसलिए अपने सिरहाने पति का चेहरा ही देखना पसंद करती है, लेकिन संवेदनहीन भैया को भला ऐसी बातें कैसे समझ आतीं. एक बार उन्होंने ठान ली नहीं जाने की तो नहीं ही गए.

कठोर व्यवस्था के बोझ तले दबती चली गईं भाभी. सालदरसाल इसी ऊहापोह में बीतते रहे- मेरा ब्याह हुआ, अनंत का सरकना, घुटनों चलना, तुतला कर बोलना चलनाफिरना. मां को पूरा विश्वास था कि अनंत अपनी नटखट अदाओं से मातापिता के बीच गहराती खाई को पाट देगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उस का किंडरगार्टन से ले कर 8वीं कक्षा तक का लंबा सफर भाभी ने अपने ही बलबूते पर काटा. भैया तो उन्हें अपने हुक्मों के चक्रवात में ही उलझाए रखते.

ऐसा वे पितृत्व की भावना के तहत करते थे पुरुषदंभ के वशीभूत हो कर. इतना तो भाभी नहीं समझ पाती थीं लेकिन मातृत्वबोध की भावना से भी वंचित नहीं थीं वे. कभी दबी जबान से प्रतिकार किया भी तो भैया को सहन नहीं हुआ. जब भी मौका मिलता वे पत्नी पर बीस होने का प्रयास ही करते.

अकेली पड़ती चली गईं भाभी. पिता के रौद्र रूप से पुत्र को बचाने के लिए वे अनंत को दादादादी के पास या स्वयं से चिपका कर रखती तो थीं पर इतना जानती थीं कि व्यावहारिकता के धरातल पर अपने पिता से दूर रह कर अनंत का सर्वांगीण विकास रुक जाएगा.

बेटे की शैक्षणिक प्रतिभा और व्यक्तित्व निर्माण के प्रति पूरी तरह से सजग भाभी, जब दूसरे बच्चे को अपने पिता के साथ हंसतेखेलते देखतीं तो उन के सीने में कसक सी उठती. खुद को समझ कर बेटे को दुलारपुचकार कर पति के पास पहुंचतीं भी तो उन का उग्र स्वभाव और कठोर रुख उन्हें पलभर के लिए भी ठहरने नहीं देता था.

एक ही साल के अंतराल में मांबाबूजी दोनों का देहांत हो गया. जिस कंधे पर सिर रख कर प्यार, दुलार, अपनत्व की उम्मीद करती आई थीं भाभी वही छिन गया तो मानसिक अवसाद से घिरती चली गई थीं. न ढंग से खातीं न ही किसी से बातें करतीं.(4)

उन का अब पूरा ध्यान अनंत पर ही केंद्रित रहता था. भैया औफिस से लौटते तो सुवीरा भी कई बार साथ चली आती थी. थोड़ाबहुत समय उस के साथ अच्छा बीत जाता था उन का. सुवीरा के साथ, भैया भी घंटों हंसते, चुटकुले सुनाते तो भाभी हैरान रह जाती थीं तो इस का मतलब, अखिलेश हंस भी सकते हैं. अपने मन की बात दूसरे से कह सकते हैं और दूसरे की सुन भी सकते हैं. तो क्या उन का पूरा पौरुष, पूरा अहंकार पत्नी के लिए ही है.

आत्मबल, आत्मचेतना रहित भाभी के सुप्त मनोबल को उठाने का प्रयास किया था मैं ने एक दिन, ‘कब तक घुटती रहेंगी भाभी आप. घरगृहस्थी निभातेनिभाते आप ने अपनी प्रतिभा तक को रौंद डाला.’

‘प्रतिभा, कौन सी प्रतिभा.’

‘गायन प्रतिभा, लेखन प्रतिभा. पति ने वर्जनाएं लगाईं तो गाना बंद कर दिया.’

‘मेरी मां गाती हैं?’ अनंत ने आंखें फैला कर पूछा. मेरी बात पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था उसे.

‘हां, सरस्वती का वास है इन के कंठ में. तुम्हारे पापा को बुरा लगता है, इसलिए नहीं गातीं.’

‘सुम्मी, अनंत को ऐसी शिक्षा मत दो. उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने में मैं ने अपने जीवन का अहम हिस्सा लगा दिया है. एक बार इस के मन में नफरत की जड़ें पैठ गईं तो पित्रापुत्र के बीच ऐसी दूरी पैदा होगी जो मिटाए नहीं मिटेगी,’ भाभी ने समझया था.

जिन हाथों में अपमानित होती रहीं, उसी के सुख की कामना करती भाभी को देख मैं सोच रही थी, क्या भाभी का मन कभी दुखी नहीं होता होगा. अंतरात्मा कभी चीत्कार नहीं करती होगी. सिर्फ यही देखदेख कर खुश होती रहती थीं कि उन का बेटा तो उन की भावनाओं, संवेदनाओं को समझता है.

घंटों मांबेटे को एकसाथ बोलतेबतियाते देख ईर्ष्यालु भैया ऐसा रौद्र रूप धारण कर लेते कि वे दोनों बुरी तरह सहम जाते, लेकिन अपने स्वभाववश ही तो स्वयं को पत्नी और पुत्र से अलग कर के भैया ने उन्हें अपना बनाने का मौलिक अधिकार खोया था.

एक दिन इस असहनीय परिस्थिति से स्वयं को बचाने के लिए भाभी ने लिखना शुरू कर दिया. बहुत खुश हुई थी उस दिन मैं कि कम से कम उस घुटनभरे माहौल से मुक्ति तो मिलेगी भाभी को. धीरेधीरे डायरी के पन्नों पर मोती से अक्षर टंकते गए. इंद्रधनुष के सात रंग भाभी की कविता में सिमटते गए.

अब तो भाभी कहानियां भी लिखने लगी थीं. उन की प्रकाशित कृतियों से घर भर गया. लोग पढ़ते, प्रशंसा पत्र भेजते.

एक दिन 11 हजार रुपए का पुरस्कार भी मिला था उन्हें, ‘आरोही’ पत्रिका की ओर से. मैं दौड़ी चली गई थी. भैया घर पर ही थे. सुवीरा भी पास बैठी थी. आजकल वह अकसर यहीं बैठी रहती थी. मैं ने उन्हें सारी बात बताई.

‘ इतना मानसम्मान मिल रहा है आप की पत्नी को और आप यों गुमसुम बैठे हैं. मिठाई खिलाइए. इन्हें प्रथम पुरस्कार मिला है,’ सुवीरा बोली.

भैया ऐसे चौंके जैसे न जाने किस की बात हो रही थी. फिर बोले, ‘क्या कविता कहानी लिखने से पेट भरता है?’

कब से आस लगाए बैठी थीं भाभी कि शायद तारीफ के दो शब्द पति से भी मिल सकें लेकिन भैया ने तो बिना कुछ पढ़े ही अपना अहं शांत कर लिया. आलू को प्याज की टोकरी में डाल कर, लहसुन को अदरक से अलग कर के, पत्नी के कपड़े अपनी अलमारी में ठूंस कर, अपने धुले कपड़े बाथरूम में पटक कर, ऐसे मौकों पर अपनी मर्दानगी का सुबूत देने से कब चूकते हैं वे. (5)

कहते हैं, मनुष्य स्वभाव के वश में नहीं होता. भाभी स्वभाव से ही सहिष्णु थीं. किसी का अपमान करना तो दूर, किसी का दिल भी दुखाना नहीं आता था उन्हें. अपने स्वभाव का यह आकस्मिक परिवर्तन वे स्वयं ही बरदाश्त नहीं कर पाईं और कई तरह के रोगों से घिरती चली गईं. ऊपरी तौर पर चाहे प्रतिकार न करतीं हों, मन में खुद को कोसती रहती थीं.

भैया ने भाभी की बीमारियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. वैसे भी, वे भाभी में दिलचस्पी लेते ही कब थे. वे तो अपनी ही जिंदगी से दुखी थे. पत्नी की कमियों का बखान सुवीरा से कर के इस तरह सहानुभूति बटोरते कि मासूम अनंत, कभी मां के चेहरे पर उभर आई आड़ीतिरछी रेखाओं को देखता तो कभी सुवीरा के चेहरे पर आए संतुष्टि के भाव देख चिड़चिड़ाता.

एक दिन पलंग पर लेटेलेटे ही भाभी ने दम तोड़ दिया. यह सब अप्रत्याशित भी तो नहीं था. भाभी की शांत देह, टिकठी पर रखी थी. भैया की आंखों से नि?र्ार अश्रुधारा बह निकली. लोगों की भीड़ जमा थी. अचानक अनंत जोरजोर से रोने लगा, ‘बूआ, इन से कहो, मां की रस्सियां खोल दें. कितना कस कर बांधा है. दर्द हो रहा होगा इन्हें.’ पिता के प्रति उस की दृष्टि में घृणा की परछाइयां तैरने लगी थीं, ‘इन्होंने मारा मेरी मां को, इन्होंने.’

मां की आंखें मुंदते ही पिता पराए हो गए अनंत के लिए. खुद को घर के अंधियारे कोने में कैद कर लिया था उस ने. न कुछ कहता न किसी से मिलता. तिमाही परीक्षा में ही उसे 50 प्रतिशत अंक मिले थे. स्कूल के प्रिंसिपल ने विशेष रूप से भैया को बुलवा भेजा था और कहा था, ‘कितना कमजोर हो गया आप का बेटा पढ़ाई में. आप की पत्नी के रहते हर क्षेत्र में अव्वल रहता था अनंत. थोड़ा ध्यान दीजिए. अगर छमाही का परीक्षा फल ऐसा रहा तो स्कूल से निकलवाना पड़ेगा.’

अपना अपमान सह सकें, ऐसा तो स्वभाव ही नहीं था भैया का, लगे सुवीरा पर चिल्लाने, ‘नियमित रूप से आती हो अब. कितना ध्यान रखा तुम ने अनंत का.’

‘जैसा बीज बोया वैसा ही तो फल मिलेगा. इस की जड़ें ही कमजोर हैं,’ सुवीरा ने भैया की तेजी से अपनी तेजी एक डिगरी बढ़ा कर रखी तो वे सहम गए थे.

अनंत ने मां की तारीफ सुनी तो भला लगा था उसे, परंतु पिता के मुख से छिछली टिप्पणियां सुन कर क्रोध में कांपने लगा था. काश, मां ने भी इसी तरह पलट कर जवाब दिया होता. पढ़ातेपढ़ाते मां के माथे पर पसीने की बूंदें छलछला जाती थीं, काली घुंघराली लटें बिखर जाती थीं पर तब तो पापा ने कभी मां से धीमी आवाज में बात नहीं की.

भैया का घर बिखर गया था. न ढंग से खाना पकता, न ही कोई खाता. अकेली भाभी कितने सुचारु रूप से घर की व्यवस्था बनाए रखती थीं. मैं अकसर भैया के पास आ जाती थी. अपने घर से कुछ भी पका कर लाती और दोनों को खिलाती, लेकिन ऐसे कोई कब तक अपनी गृहस्थी छोड़ कर दूसरे का घर व्यवस्थित कर सकता है.

‘इसे होस्टल में डाल दें.’ हैरानपरेशान से भैया ने अपने अव्यवस्थित हो गए घर को सुव्यवस्थित करने के लिए सुवीरा को अपनी पत्नी बना कर घर लाने के लिए भूमिका बनाई थी या सच में वे बेटे के भविष्य के प्रति चिंतित थे, यह तो वे ही जानें लेकिन सुवीरा के सूखे कपोलों की आभा और भैया की उम्र देख कर मैं इतना तो अच्छी तरह समझ गई थी कि 40 वर्ष की उम्र में पेट की भूख के साथ ही शारीरिक क्षुधा शांत करने का एकमात्र उपाय पुनर्विवाह ही तो है और भैया के हृदय के किसी कोने में यह कामना, लालसा अब भी शेष थी.

कुछ दिनों तक तो सब ठीक चलता रहा लेकिन भैया अपने पुरातन स्वरूप में जल्दी ही लौट आए थे. सुवीरा के सामने प्रणय निवेदन करतेकरते वैसा ही रोब जताने लगे जैसा उमा भाभी पर जताते थे. कभी नमक कम, कभी सब्जी में तेल ज्यादा. पका कर लाती तो सुवीरा अपने घर से ही थी और प्रेम से परोसती भी थी, लेकिन भैया का अनर्गल संभाषण सुन कर उमा भाभी की तरह पत्ते की तरह कांपने के बजाय ईंट का जवाब पत्थर से देने से भी नहीं चूकती थी. तब भैया का चेहरा उतर जाता. मगर वे प्यार करते थे सुवीरा से, अर्धांगिनी बनाने की कसम ली थी, इसलिए चुप थे लेकिन ऐसा महसूस होने लगा था कि मन ही मन वे अपने इस निर्णय पर पछता भी रहे थे.

मन बहलाने के लिए भैया दूध वाले से मोलभाव करते, दुकानदार से ढंग से सामान तुलवाते, समय बिताने के लिए अलमारी खोल कर उमा भाभी का अलबम देखते. उन के साथ अपने फोटो देख कर मंदमंद मुसकराते.

एक दिन अचानक सुवीरा न जाने कहां से आ टपकी, ‘अजीब किस्म के इंसान हो तुम, अखिलेश. जब तक पत्नी जीवित थी, जोंक की तरह खून चूसते रहे. पैरों की जूती समझते रहे. अब मरने के बाद आंसू बहा रहे हो. हो सकता है ब्याह के बाद मेरे साथ भी ऐसा ही व्यवहार करो, फिर तो मेरे संकल्प रेत की दीवार की तरह बिखर जाएंगे न.’

सुवीरा का रौद्र रूप ऐसा लग रहा था जैसे अंधी सुरंग के बीच अग्निशिखा दमक उठी हो.

कितना समझाती थीं भाभी लेकिन अहंकार के मद में चूर अपने सामने दूसरे को कुछ न समझाने की भैया की आदत ने उन्हें बराबरी का दरजा देना तो दूर, पायदान से ज्यादा कुछ न समझ.

2 महीने बाद ही सुवीरा के विवाह का कार्ड भैया के हाथ में फड़फड़ा रहा था. हर दिन की तरह अपने घर का काम निबटा कर मैं अनंत को अपने साथ ले कर भैया के घर चली आई थी. भावनात्मक रूप से जुड़ी थी मैं इस परिवार से. भैया का उदास चेहरा देख कर मुझे उन पर तरस आने लगा था. आत्मग्लानि से अभिभूत उन का चित्त शोकविह्लल हो गया. पश्चात्ताप ने उन्हें अर्धविक्षिप्तता जैसी स्थिति में पहुंचा दिया था.

रसोई में जा कर मैं ने वही पकाया जो हमेशा उमा भाभी पका कर भैया को खिलाती थीं. उन की पुण्यतिथि के अवसर पर इस से बड़ी श्रद्धांजलि क्या होती मेरे लिए. टेप रिकौर्डर पर चल रही गजल का एकएक शब्द सुन कर रोते जा रहे थे भैया, मानो कह रहे हों, ‘काश, मैं ने उमा के साथ वैसा बरताव न किया होता.’

मैं उन बुझती, बेजान आंखों में पहचान की कोमल कौंध देख रही थी. दर्द के उस दरिया में मोहममता की एक झलक भी नहीं मिली. मैं ने सांत्वना के लिए उन के सिर पर हाथ रखा तो मानो संयम के सारे तटबंध ही टूट गए. रोतेबिलखते बोले, ‘‘मन नहीं लग रहा, सुम्मी. उमा के पास जाना है.’’

यह सुन कर हैरान रह गई. सोचने लगी कि इंसान अपने सोच के दायरे में जब तक कैद रहता है उसे अपना दुख ही बड़ा लगता हैं, किंतु जब वह अपनी सोच की दिशा बदल देता है तब उसे समझ में आता है कि दूसरे का दुख उस से कहीं ज्यादा है.

काश, भैया ने जीतेजी उमा भाभी की भावनाओं को समझ होता तो यों भीड़ में अकेले न होते कभी भी. पश्चात्ताप की अग्नि में जलते भैया को सांत्वना देने के लिए मेरे सारे शब्द ही चुक गए थे. टेपरिकौर्डर पर उमा भाभी की पसंद की गजल अब भी बज रही थी. Family Story in Hindi :

Social story in Hindi : शिणगारी – आखिर क्यों आज भी इस जगह से दूर रहते हैं बंजारे ?

Social story in Hindi : बंजारों के एक मुखिया की बेटी थी शिणगारी. मुखिया के कोई बेटा नहीं था. शिणगारी ही उस का एकमात्र सहारा थी. बेहद खूबसूरत शिणगारी नाचने में माहिर थी. शिणगारी का बाप गांवगांव घूम कर अपने करतब दिखाता था और इनाम हासिल कर अपना व अपनी टोली का पेट पालता था. शिणगारी में जन्म से ही अनोखे गुण थे. 17 साल की होतेहोते उस का नाच देख कर लोग दांतों तले उंगली दबाने लगे थे.ऐसे ही एक दिन बंजारों की यह टोली उदयपुर पहुंची. तब उदयपुर नगर मेवाड़ राज्य की राजधानी था. महाराज स्वरूप सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे थे. उन के दरबार में वीर, विद्वान, कलाकार, कवि सभी मौजूद थे.

एक दिन महाराज का दरबार लगा हुआ था. वीर, राव, उमराव सभी बैठे थे. महफिल जमी थी. शिणगारी ने जा कर महाराज को प्रणाम किया. अचानक एक खूबसूरत लड़की को सामने देख मेवाड़ नरेश पूछ बैठे, ‘‘कौन हो तुम?’’

‘‘शिणगारी… महाराज. बंजारों के मुखिया की बेटी हूं…’’ शिणगारी अदब से बोली, ‘‘मुजरा करने आई हूं.’’

‘‘ऐसी क्या बात है तुम्हारे नाच में, जो मैं देखूं?’’ मेवाड़ नरेश बोले, ‘‘मेरे दरबार में तो एक से बढ़ कर एक नाचने वालियां हैं.’’

‘‘पर मेरा नाच तो सब से अलग होता है महाराज. जब आप देखेंगे, तभी जान पाएंगे,’’ शिणगारी बोली.

‘‘अच्छा, अगर ऐसी बात है, तो मैं तुम्हारा नाच जरूर देखूंगा. अगर मुझे तुम्हारा नाच पसंद आ गया, तो मैं तुम्हें राज्य का सब से बढि़या गांव इनाम में दूंगा. अब बताओ कि कब दिखाओगी अपना नाच?’’ मेवाड़ नरेश ने पूछा.

‘‘मैं सिर्फ पूर्णमासी की रात को मुजरा करती हूं. मेरा नाच खुले आसमान के नीचे चांद की रोशनी में होता है…’’ शिणगारी बोली, ‘‘आप अपने महल से पिछोला सरोवर के उस पार वाले टीले तक एक मजबूत रस्सी बंधवा दीजिए. मैं उसी रस्सी पर तालाब के पानी के ऊपर अपना नाच दिखाऊंगी.’’ शिणगारी के कहे मुताबिक मेवाड़ नरेश ने अपने महल से पिछोला सरोवर के उस पार बनेरावला दुर्ग के खंडहर के एक बुर्ज तक एक रस्सी बंधवा दी.पूर्णमासी की रात को सारा उदयपुर शिणगारी का नाच देखने के लिए पिछोला सरोवर के तट पर इकट्ठा हुआ. महाराजा व रानियां भी आ कर बैठ गए.

चांद आसमान में चमक रहा था. तभी शिणगारी खूब सजधज कर पायलें छमकाती हुई आई. उस ने महाराज व रानियों को झुक कर प्रणाम किया और दर्शकों से हाथ जोड़ कर आशीर्वाद मांगा. फिर छमछमाती हुई वह रस्सी पर चढ़ गई. नीचे ढोलताशे वगैरह बजने लगे. शिणगारी लयताल पर उस रस्सी पर नाचने लगी. एक रस्सी पर ऐसा नाच आज तक उदयपुर के लोगों ने नहीं देखा था. हजारों की भीड़ दम साधे यह नाच देख रही थी. खुद मेवाड़ नरेश दांतों तले उंगली दबाए बैठे थे. रानियां अपलक शिणगारी को निहार रही थीं. नाचतेनाचते शिणगारी पिछोला सरोवर के उस पार रावला दुर्ग के बुर्ज पर पहुंची, तो जनता वाहवाह कर उठी. खुद महाराज बोल पड़े, ‘‘बेजोड़…’’कुछ पल ठहर कर शिणगारी रस्सी पर फिर वापस मुड़ी. बलखातीलहराती रस्सी पर वह ऐसे नाच रही थी, जैसे जमीन पर हो. इस तरह वह आधी रस्सी तक वापस चली आई.

अभी वह पिछोला सरोवर के बीच में कुछ ठहर कर अपनी कला दिखा ही रही थी कि किसी दुष्ट के दिल पर सांप लोट गया. उस ने सोचा, ‘एक बंजारिन मेवाड़ के सब से बड़े गांव को अपने नाच  से जीत ले जाएगी. वीर, उमराव, सेठ इस के सामने हाथ जोड़ेंगे. क्षत्रियों को झुकना पड़ेगा और ब्राह्मणों को इस की दी गई भिक्षा ग्रहण करनी पड़ेगी…’ और तभी रावला दुर्ग के बुर्ज पर बंधी रस्सी कट गई. शिणगारी की एक तेज चीख निकली और छपाक की आवाज के साथ वह पिछोला सरोवर के गहरे पानी में समा गई.

सरोवर के पानी में उठी तरंगें तटों से टकराने लगीं. महाराज उठ खड़े हुए. रानियां आंसू पोंछते हुए महलों को लौट गईं. भीड़ में हाहाकार मच गया. लोग पिछोला सरोवर के तट पर जा खड़े हुए. नावें मंगवाई गईं. तैराक बुलाए गए. तालाब में जाल डलवाया गया, पर शिणगारी को जिंदा बचा पाना तो दूर उस की लाश तक नहीं खोजी जा सकी अगले दिन दरबार लगा. शिणगारी का पिता दरबार में एक तरफ बैठा आंसू बहा रहा था.मेवाड़ नरेश बोले, ‘‘बंजारे, हम तुम्हारे दुख से दुखी हैं, पर होनी को कौन टाल सकता है. मैं तुम्हें इजाजत देता हूं कि तुम्हें मेरे राज्य का जो भी गांव अच्छा लगे, ले लो.’’ ‘‘महाराज, हम ठहरे बंजारे. नाच और करतब दिखा कर अपना पेट पालते हैं. हमें गांव ले कर क्या करना है. गांव तो अमीर उमरावों को मुबारक हो…’’ शिणगारी का बाप रोतेरोते कह रहा था, ‘‘शिणगारी मेरी एकलौती औलाद थी. उस की मां के मरने के बाद मैं ने बड़ी मुसीबतें उठा कर उसे पाला था. वही मेरे बुढ़ापे का सहारा थी. पर मेरी बेटी को छलकपट से तो नहीं मरवाना चाहिए था अन्नदाता.’’मेवाड़ नरेश कुछ देर सिर झुकाए आरोप सुनते रहे, फिर तड़प कर बोले, ‘‘तेरा आरोप अब बरदाश्त नहीं हो रहा है. अगर तुझे यकीन है कि रस्सी किसी ने काट दी है, तो तू उस का नाम बता. मैं उसे फांसी पर चढ़वा कर उस की सारी जागीर तुझे दे दूंगा.’’

‘‘ऐसी जागीर हमें नहीं चाहिए महाराज. हम तो स्वांग रच कर पेट पालने वाले कलाकार हैं,’’ शिणगारी के पिता ने कहा.

‘‘तो तुम जो चाहो मांग लो,’’ मेवाड़ नरेश गरजे.

‘‘नहीं महाराज…’’ आंसुओं से नहाया बंजारों का मुखिया बोला, ‘‘जिस राज्य में कपटी व हत्यारे लोग रहते हैं, वहां का इनाम, जागीर, गांव लेना तो दूर की बात है, वहां का तो मैं पानी भी नहीं पीऊंगा. मैं क्या, आज से उदयपुर की धरती पर बंजारों का कोई भी बच्चा कदम नहीं रखेगा महाराज.’’

यह सुन कर सभा में सन्नाटा छा गया. वह बंजारा धीरेधीरे चल कर दरबार से बाहर निकल गया. इस घटना को बीते सदियां गुजर गईं, पर अभी भी बंजारे उदयपुर की जमीन पर कदम नहीं रखते हैं.

पीढ़ी दर पीढ़ी बंजारे अपने बच्चों को शिणगारी की कहानी सुना कर उदयपुर की जमीन से दूर रहने की हिदायत देते हैं. Social story in Hindi :

Bangladesh Crisis : बंगलादेश की आग पर पाकिस्तानी तूफान

Bangladesh Crisis : भारत ने जिस पड़ोसी को कभी पाकिस्तानी टैंकों के नीचे से निकाल कर खड़ा किया, वही बंगलादेश आज नफरत की आग में झुलस रहा है और दिल्ली से ढाका तक सत्ता और सियासत मानो उस आग पर पानी नहीं, पैट्रोल डालने की होड़ में लगी हैं. शेख हसीना को पनाह, मुहम्मद यूनुस की कमजोर अंतरिम हुकूमत, जमात ए इसलामी और पाकिस्तान के कट्टरपंथी तूफान के बीच फंसा बंगलादेश जब विकास से विनाश की तरफ लुढ़क रहा है तब भारत आईपीएल की नीलामी, टीवी प्रसारण और ‘देशद्रोह’ के नारों में उलझ हुआ है.

1947 में आजाद होने के बाद से ही पाकिस्तान अपने पूर्वी हिस्से पर जबरन भाषा और तहजीब थोपना चाहता था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान की जनता अपने ऊपर थोपी जा रही इस भाषाई गुलामी के खिलाफ थी. दशकों तक संघर्ष चला. 1971 से पहले के पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की क्रूरता से लाखों लोग मारे गए और लाखों शरणार्थी भारत में आए. भारत ने न केवल इन शरणार्थियों को अपनाया बल्कि बंगलादेश की आजादी के सिपाहियों को ट्रेनिंग दी और हथियार दिए.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश के मुद्दे को उठाया और बंगलादेश की आजादी के लिए पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जो 13 दिनों में समाप्त हो गया. इस तरह बंगलादेश को पाकिस्तान से आजादी मिल गई. यही कारण है कि बंगलादेश 2024 तक भारत का सब से हिमायती मुल्क बना रहा.

1971 में बंगलादेश को आजादी दिलाने के बाद भारत ने बंगलादेश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में भी मदद की. भारत ने बंगलादेश को लगभग 8 अरब डौलर का कर्ज दिया. भारत की ओर से भेंट की गई यह मदद बंगलादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और ट्रेड को बढ़ाने में इस्तेमाल की गई. बंगलादेश की 15 प्रतिशत बिजली भारत से जाती है, इस से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है. भारत ने बंगलादेश में रेल, सड़क और पोर्ट के प्रोजैक्ट्स में भी मदद की जिस से बंगलादेश की इकोनौमी और मजबूत हुई. 2021 से 2023 के बीच भारत ने सालाना 200-300 करोड़ रुपए की मदद दी. हालांकि, बंगलादेश की इकोनौमी में तेजी मैन्युफैक्चरिंग की वजह से आई है लेकिन भारत ने बड़े भाई की तरह हर मुश्किल वक्त में बंगलादेश की मदद की है पर बीते 2 वर्षों में हालात बिलकुल बदल चुके हैं.

2024 में तख्तापलट के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली और बंगलादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी, तब से दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब हुए हैं. बंगलादेश में कट्टरपंथियों के बेलगाम होने से हिंदुओं की हत्याएं हुईं जिस से हालात और खराब हो गए.

आग में पैट्रोल डालता भारतीय कट्टरपंथ

दोनों देशों के बीच लगातार खराब होते हालात को मोदी सरकार की विदेश नीति का फेलियर कहा जा रहा है. शेख हसीना को भारत में शरण देने से बंगलादेश की नई सरकार के साथ विश्वास की कमी हुई है और इस से बंगलादेश में कट्टरपंथियों को भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने का मौका मिल गया.

भारत में भी दक्षिणपंथी सरकार ने अपने कट्टरपंथियों को खुला छोड़ दिया है जो हालात की गंभीरता को समझने के बजाय आग में पैट्रोल डालने जैसा बरताव कर रहे हैं. भारतीय मीडिया इस आग को और भड़काने में अहम भूमिका निभा रही है.

पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के फ्यूनरल में भारत का प्रतिनिधित्व करने विदेश मंत्री एस जयशंकर 31 दिसंबर, 2025 को बंगलादेश गए. वहां वे बंगलादेशी नेताओं से मिले और पाकिस्तानी स्पीकर अयाज सादिक से भी हाथ मिलाया लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हुआ. इस पर कोई सवाल नहीं किया गया.

गौतम अदानी की कंपनी अदानी पावर 2017 से बंगलादेश को कोल बेस्ड बिजली सप्लाई करती है. यह डील 1.6 गीगावाट की है और दोनों देशों के बीच खराब होते रिश्तों के मध्य भी यह डील जारी है. इस पर भी कोई उंगली नहीं उठा रहा लेकिन आईपीएल 2026 औक्शन में शाहरुख खान की कोओनरशिप वाली टीम कोलकाता नाइट राइडर्स यानी केकेआर ने बंगलादेशी क्रिकेटर मुस्तफीजुर रहमान को 9 करोड़ रुपए में खरीदा. इस से भारत में सियासत गरमा गई. संगीत सोम जैसे भाजपा नेता और देवकीनंदन ठाकुर जैसे बाबाओं ने इसे ‘देशद्रोह’ बताया. यहां गौरतलब बात यह है कि आईपीएल औक्शन तो बीसीसीआई करती है और बंगलादेशी प्लेयर्स को शामिल करने की अनुमति बीसीसीआई ने ही दी थी.

देखा जाए तो इस पूरे मामले में शाहरुख खान की कोई गलती नहीं थी. यह क्रिकेट का कमर्शियल फैसला था लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों से इसे बड़ा मुद्दा बना दिया गया जिस से बंगलादेश के साथ रिश्ते और खराब होते चले गए. नतीजा यह हुआ कि आईपीएल में बंगलादेशी खिलाड़ी मुस्तफीजुर रहमान को केकेआर से हटाने के बाद बंगलादेश ने आईपीएल की टैलीकास्ंिटग पर रोक लगा दी.

इस के अलावा, बंगलादेश ने  टी-20 2026 वर्ल्ड कप के लिए बंगलादेशी खिलाडि़यों के भारत जाने पर भी रोक लगा दी. अमित शाह के बेटे जय शाह आईसीसी चेयरमैन हैं. आईपीएल में बंगलादेशी प्लेयर्स को शामिल करने की अनुमति बीसीसीआई ने दी थी जो जय शाह के नेतृत्व में हुई लेकिन जब विवाद बढ़ा तो बीसीसीआई ने फैसला वापस लेने को कह दिया.

असल में शाहरुख खान को टारगेट करना आसान है क्योंकि वे पब्लिक फिगर हैं और मुसलिम बैकग्राउंड से आते हैं जबकि जय शाह, अदानी और जयशंकर सत्ता से जुड़े लोग हैं. पश्चिम बंगाल में चुनाव वर्ष 2026 में होने हैं. वोटबैंक को ध्यान में रख कर ही शाहरुख खान को निशाना बनाया गया जबकि मामला बंगलादेश और पाकिस्तान से सीधा जुड़ चुका था.

इस में दोराय नहीं कि बंगलादेश में हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों पर हमले हुए हैं और इस पर भारत की जनता का गुस्सा जायज है लेकिन क्रिकेट को बंद करना जायज नहीं. औपरेशन सिंदूर के बाद भी पाकिस्तान के साथ क्रिकेट संभव है तो बंगलादेश के साथ क्यों नहीं? अगर क्रिकेट बंद करने से शांति आ सकती तो फिर ट्रेड को भी क्यों न बंद किया जाए? गौतम अदानी पर प्रैशर क्यों नहीं बनाया जाए कि वे बंगलादेश को बिजली देना बंद करें.

बंगलादेश को लगा पाकिस्तानी करंट

पिछले 2 सालों से बंगलादेश में हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं. ढाका जल रहा है. बंगलादेश के दूसरे शहरों का भी यही हाल है. अल्पसंख्यकों में डर का माहौल है. इकोनौमी बरबादी के कगार तक पहुंच चुकी है. शेख हसीना के साम्राज्य को खत्म हुए 2 साल बीत चुके हैं लेकिन हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि एशिया में सब से तेज इकोनौमिकल ग्रोथ वाले देश का ऐसा हाल क्यों हुआ? क्या यह सब बंगलादेश को बरबाद करने की साजिश का नतीजा है? क्या बंगलादेश की इस अराजकता के पीछे पाकिस्तान का हाथ है? क्या बंगलादेश को पाकिस्तानी करंट लग चुका है? आइए जानते हैं-

1947 में भारत का विभाजन हुआ. पाकिस्तान के रूप में एक नया देश वजूद में आया. 1971 तक पाकिस्तान एक मुल्क होने के बावजूद 2 अलगअलग हिस्सों में बंटा हुआ था. पूर्वी बंगाल का इलाका ही पूर्वी पाकिस्तान बना था जो आजादी के बाद इसलामाबाद से कंट्रोल होता था. कहने को पाकिस्तान का विभाजन धर्म के नाम पर हुआ था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान का कल्चर और भाषा पश्चिमी पाकिस्तान से बिलकुल अलग थी, फिर भी भाषा और तहजीब को पूर्वी पाकिस्तान पर जबरन थोपा जाने लगा. यहीं से दिक्कतें शुरु हुईं और पूर्वी पाकिस्तान आजाद होने को छटपटाने लगा. 1971 में इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान को आजादी दिलाई और बंगलादेश के रूप में एक नया देश वजूद में आया.

बंगलादेश की आजादी के बाद से ही इसे एक कमजोर और अस्थिर देश माना जाता रहा. बंगलादेश 70 के दशक तक दुनिया के सब से गरीब देशों में शुमार था. उस दौर में बंगलादेश को ‘बौटमलैस बास्केट’ कहा जाता था लेकिन बंगलादेश ने दुनिया के सारे भ्रम तोड़ दिए. आजादी के बाद लगभग हर दशक में बंगलादेश ने तरक्की के कीर्तिमान स्थापित किए और 2024 तक यह दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती इकोनौमी में से एक बन गया. इतना ही नहीं, कई मामलों में तो यह भारत और पाकिस्तान से भी आगे निकल गया. यही कारण है कि 2022 में विश्व बैंक ने बंगलादेश को ‘विकास की महान गाथाओं में से एक’ बताया था.

प्रतिव्यक्ति आय यानी जीडीपी की बात करें तो 1971 में बंगलादेश की जीडीपी दुनिया में सब से निचले स्तर पर थी लेकिन आजादी के बाद हर दशक में जीडीपी ग्रोथ बढ़ी और 2021 तक यह लगभग 2,700 अमेरिकी डौलर तक पहुंच गई. 2021 तक बंगलादेश ने प्रतिव्यक्ति आय में भारत को भी पीछे छोड़ दिया. 1971 में बंगलादेश की 80 प्रतिशत आबादी गरीबीरेखा से नीचे थी. 1991 में यह 44 प्रतिशत पर थी और 2021 तक घट कर महज 13 प्रतिशत रह गई.

बिजनैस के लिए सेफ इकोनौमिकल जोन के कारण ही दुनियाभर की इंडस्ट्रीज बंगलादेश का रुख करने लगीं. कई कंपनियां पाकिस्तान से अपना बोरियाबिस्तर समेट कर बंगलादेश में शिफ्ट हो गईं. 2022 तक बंगलादेश दुनिया का दूसरा सब से बड़ा कपड़ा निर्यातक देश बन गया. दुनिया की टौप 100 ग्रीन गारमैंट फैक्टरियों में सब से ज्यादा बंगलादेश की हैं. इस दौरान रेमिटैंस और विदेशी निवेश भी बढ़े. विदेशी कंपनियों ने बंगलादेश की बढ़ती ग्रोथ पर भरोसा किया और कई बड़ी विदेशी कंपनियों ने बंगलादेश में अपनी फैक्ट्रियां लगाईं.

बंगलादेश का मानव विकास सूचकांक 1990 में 0.397 था, जो 2023 तक बढ़ कर 0.685 हो गया. इस से यह देश एशिया में सब से तेज प्रगति करने वाले देशों में शामिल हो गया. औसत आयु जो 1971-72 में 50 वर्ष से कम थी, 2023-24 में 75 वर्ष के करीब हो गई.

शिक्षा के मामले में भी बंगलादेश ने अपने पड़ोसी देशों को पीछे छोड़ दिया. यहां प्राइमरी स्तर पर एडमिशन रेश्यो 100 पहुंच गया और महिला शिक्षा में भी खासा प्रगति हुई. स्कूलिंग वर्ष दोगुने से ज्यादा हो गए. मातृ मृत्युदर में 70 प्रतिशत की कमी आई और बिजली 100 प्रतिशत घरों तक पहुंच गई.

बंगलादेश में लगातार प्राकृतिक आपदाएं आईं. जलवायु परिवर्तन की मार सब से ज्यादा बंगलादेश ने ही ?ोली. इस के बावजूद 2024 तक बंगलादेश न केवल जीवित रहा बल्कि विकास की दौड़ में अपने पड़ोसी देशों से भी आगे निकल गया. 1975 से लिस्टेड लीस्ट डैवलप्ड कंट्री से बंगलादेश 2026 में ग्रेजुएट होने वाला था क्योंकि यह 2024 तक जीएनआई, ह्यूमन डैवलपमैंट इंडैक्स और इकोनौमिकल स्टैबिलिटी के मानकों को पूरा कर चुका था.

बंगलादेश अपने से ज्यादा समृद्ध पश्चिम बंगाल से तो हर पैमाने पर कहीं आगे चला गया जबकि 1947 में वह बंगाल का फिसड्डी इलाका था. सारे उद्योग, रेलें, भद्रलोग कोलकाता राजधानी के चारों ओर थे. आज पश्चिम बंगाल की प्रतिव्यक्ति आय 2,200 डौलर है और पूर्वी बंगाल (बंगलादेश) की 2025 डौलर लेकिन 2024 आतेआते सबकुछ उलट गया.

बंगलादेश की राजनीतिक बरबादी की शुरुआत कैसे हुई?

बंगलादेश में 2009 से 2024 तक शेख हसीना की आवामी लीग की सरकार थी. इस दौरान देश में आर्थिक विकास तेजी से हुआ. जीडीपी ग्रोथ लगातार बढ़ी. शेख हसीना ने बेरोजगारी और गरीबी को भी कंट्रोल में रखा लेकिन कई मामलों में शेख हसीना ने किसी डिक्टेटर की तरह काम किया. विपक्षी दलों को निबटाया जाने लगा. उन पर तरहतरह के आरोप लगा कर परेशान किया जाने लगा. चुनावों में धांधली के आरोप लगे और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बढ़े. इन सभी कारणों से युवाओं में शेख हसीना सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ना शुरू हुआ और धीरेधीरे अराजकता का माहौल खड़ा हो गया. इस से कट्टरपंथियों को मौका मिला और उन्होंने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए माहौल तैयार कर दिया.

2024 में सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को फायदा पहुंचाने के लिए कानून बनाया गया. इस के खिलाफ बंगलादेश की यूनिवर्सिटीज से छात्रों ने विरोध शुरू किया. शुरुआत में शांतिपूर्ण आंदोलन हुए लेकिन जुलाई 2024 में ये विरोध बेकाबू हो गए. पुलिस और शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के समर्थकों ने छात्रों पर हमला किया जिस से सैकड़ों मौतें हुईं. इस के बाद यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और अगस्त 2024 में शेख हसीना को इस्तीफा दे कर भारत भागना पड़ा.

शेख हसीना के पतन के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. मुहम्मद यूनुस बंगलादेश के कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बन गए. उन्होंने जमाते इसलामी जैसी कट्टर संस्थाओं के आगे घुटने टेक दिए. नतीजा यह हुआ कि 2025 में स्थिति और बिगड़ गई. इसलामी कट्टरपंथी ताकतों के उभार का नतीजा यह हुआ कि बंगलादेश के हालात बेकाबू हो गए. मुहम्मद यूनुस हालात को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले और लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती चली गईं.

19 दिसंबर, 2025 को एक कट्टरपंथी छात्र नेता और प्रो-डैमोक्रेसी आंदोलन के कार्यकर्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद बंगलादेश की स्थिति इतनी खराब हुई कि पूरा बंगलादेश हिंसा की आग में दहक उठा.

जगहजगह पर दंगे हुए. कई जगहों पर आगजनी की गई. सांस्कृतिक धरोहरों पर हमले किए गए और इस दौरान बंगलादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ भी हिंसा जारी रही. एक हिंदू नौजवान की हत्या कर दी गई. बंगलादेश की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि मौजूदा हालात का फायदा उठा कर बाहरी ताकतें बंगलादेश को बरबाद करने को तुली हैं.

हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे

एक कहावत है, हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे. पाकिस्तान यही कर रहा है. सच यह है कि बंगलादेश को आज के हालात तक पहुंचाने में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है. 2022 तक पाकिस्तान की इकोनौमी

और बंगलादेश की इकोनौमी में जमीनआसमान का अंतर आ गया था. पाकिस्तान कर्ज में डूबने के कगार पर था और बंगलादेश हर मामले में पाकिस्तान से आगे निकल रहा था.

2022 तक आर्थिक और सामाजिक ग्रोथ में बंगलादेश की तुलना में पाकिस्तान काफी पीछे छूट चुका था. 2022 के आसपास बंगलादेश की प्रतिव्यक्ति जीडीपी लगभग 2,695 डौलर थी जबकि पाकिस्तान की महज 1,479 डौलर. इस से साफ है कि बंगलादेश ने 2010 के बाद पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया था, जहां बंगलादेश की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर औसतन 7 प्रतिशत रही वहीं पाकिस्तान की 5 प्रतिशत. इस दौरान गारमैंट्स एक्सपोर्ट पर आधारित इकोनौमी की वजह से बंगलादेश कुल जीडीपी में भी पाकिस्तान से आगे निकल गया.

2022 तक बंगलादेश में 3 डौलर प्रतिदिन की गरीबीरेखा पर लगभग 6 प्रतिशत आबादी गुजारा कर रही थी जबकि पाकिस्तान में 3 डौलर प्रतिदिन पर लगभग 17 प्रतिशत आबादी निर्भर थी. राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश की गरीबी दर 20 प्रतिशत के आसपास थी जबकि पाकिस्तान की 24 प्रतिशत.

पाकिस्तान बनने के बाद से यहां लगातार राजनीतिक उठापटक और इसलामिक आतंकवाद हावी रहा जिस की वजह से कट्टरता में तो ग्रोथ हुई लेकिन इकोनौमी मरती चली गई. हर नई सरकार ने इकोनौमी को सुधारने के नाम पर विदेशों से मोटा कर्ज लिया. भारत का डर दिखा कर हर सरकार ने सेना का खर्च बढ़ाया और आम जनता के टैक्स के पैसों को विदेशों से हथियार खरीदने में लगाया. इस का नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान परमाणु संपन्न तो हो गया लेकिन बंगलादेश की तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया.

पाकिस्तान में लगातार हिंसा की वजह से ही यहां विदेशी या देशी निवेश के लिए जमीन तैयार नहीं हो पाई. जियाउल हक ने कट्टरता का जो बीज बोया उस से आगे चल कर आतंक की फसल तैयार हुई.

पूरी दुनिया की नजर में पाकिस्तान आतंकियों का अड्डा बन कर उभरा. ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों को पनाह देने का मामला हो या तालिबानी और कश्मीरी टैररिज्म से जुड़े संगठनों को पोसने का मामला हो, हर बार पाकिस्तान आतंक की नर्सरी के रूप में सामने आया और पाकिस्तान ने अपनी इस छवि को दुरुस्त करने के लिए कोई ऐसा प्रयास नहीं किया जिस से पाकिस्तान पर निवेशकों का भरोसा कायम हो सके.

पाकिस्तान में कट्टरता हावी होने का नतीजा यह हुआ कि मजहबी हिंसा और आतंकवाद से 2019-2000 के बीच 63,898 लोग मारे गए. आतंकवाद और इस से जुड़े संगठनों को बंगलादेश ने ज्यादा तवज्जुह ही नहीं दी. यही कारण है कि किसी भी आतंकी घटना के तार बंगलादेश से जुड़े नजर नहीं आए. हालांकि बंगलादेश में जमात ए इसलामी और तब्लीगी जमात जैसे कट्टरपंथी संगठन हमेशा से रहे लेकिन 2022 तक बंगलादेश ने इन कट्टरपंथियों को हावी नहीं होने दिया.

दूसरी ओर, आतंकवाद और कट्टरपंथ के हावी होने के कारण पाकिस्तान में निवेश घटा. टूरिज्म में लगातार गिरावट आई. धार्मिक कट्टरता के कारण शिक्षा भी दूषित हुई. आधी आबादी के लिए स्कूल और कालेज के दरवाजे बंद होने लगे. लड़कियों का कालेज तक पहुंचना सिर्फ एलीट तबके तक सिमट गया. कट्टरता के कारण मदरसे ताकतवर हुए जिस से जिहादी विचारधाराओं को ताकत मिली और इस तरह कट्टरता लगातार हावी होती चली गई.

पाकिस्तान 2022 तक बंगलादेश के मुकाबले आर्थिक रूप से 50 प्रतिशत और सामाजिक रूप से 30 प्रतिशत तक पीछे था और इस का सिर्फ एक ही कारण था इसलामिक कट्टरता.

पाकिस्तान के उलट बंगलादेश ने सैकुलरिज्म को ज्यादा महत्त्व दिया. इस से बंगलादेश को सामाजिक तौर पर ज्यादा स्टैबिलिटी मिली. इस का फायदा इकोनौमी को हुआ और बंगलादेश ने तरक्की के मामले में इतिहास रच दिया.

2022 तक दोनों देशों की स्थिति में अंतर साफ था. एक तरफ परमाणु संपन्न देश पाकिस्तान था जो दुनिया की नजर में फिसड्डी और भिखारी देशों की कतार में खड़ा था तो दूसरी ओर बंगलादेश था जो अपने बूते तरक्की के नए कीर्तिमान बना रहा था. पाकिस्तान के लिए यह स्थिति शर्मनाक थी. बेटा बाप से आगे निकल जाए, इस में शर्म कैसी? लेकिन पाकिस्तान के लिए यह डूब मरने की स्थिति थी. अपनी लकीर बड़ी न कर पाओ तो दूसरे की लकीर छोटी कर दो. पाकिस्तान के पास, बस, एकमात्र रास्ता यही बचा था.

बंगलादेश की बरबादी के पीछे पाकिस्तान

बंगलादेश की बरबादी में पाकिस्तान की भूमिका के बारे में कई चौंकाने वाली रिपोर्ट्स आ चुकी हैं. बंगलादेश के कुछ ईमानदार मीडिया हाउसेस ने इस बात को उजागर किया है. मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई बंगलादेश में अशांति फैलाने में शामिल है. मुहम्मद यूनुस खुद एक कट्टरपंथी हैं और पाकिस्तान के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं.

पाकिस्तान 1971 की हार का बदला लेने की कोशिश में बंगलादेश को अस्थिर करने की रणनीति अपनाए हुए है. इस मकसद को पूरा करने के लिए पाकिस्तान जमात ए इसलामी जैसे कट्टरपंथी समूहों की मदद कर रहा है. जमात ए इसलामी जैसे गिरोह बंगलादेश में चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और भारतविरोधी भावनाओं को भड़काने में लगे हैं. कुल मिला कर बात यह है कि बंगलादेश को पाकिस्तान का इसलामिक करंट लग चुका है जिस से उबरना बंगलादेश के लिए मुश्किल है.

बंगलादेश में हालिया हिंसा के लिए जमात ए इसलामी पूरी तरह जिम्मेदार है. जमात ए इसलामी की स्थापना 1941 में ब्रिटिश काल में हुई थी और इस गिरोह का मकसद शरिया आधारित इसलामी राज्य की स्थापना करना है.

1971 के बंगलादेश मुक्ति आंदोलन के दौरान जमात ए इसलामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था और बंगाली हिंदुओं व मुसलमानों पर अत्याचार किए थे. यह बंगलादेश के लिए एक गद्दार गिरोह था, इसलिए शेख हसीना ने इस गिरोह को कंट्रोल में रखा लेकिन शेख हसीना सरकार के पतन के बाद मुहम्मद यूनुस की सरकार ने इस संगठन पर लगे प्रतिबंध हटा दिए. जमात ए इसलामी को आईएसआई से फंडिंग और रणनीतिक मदद मिल रही है. इस से यह गिरोह पूरी तरह उद्दंड हो गया है.

पाकिस्तान का सपोर्ट मिलने के बाद तो यह संगठन बंगलादेश में नंगा नाच करने लगा है. माइनौरिटीज पर हमले तेज हो गए, मौबलिंचिंग हिंसा बढ़ गई. ब्लास्फेमी के नाम पर किसी की भी लिंचिंग कर दी जा रही है.

2025 में 2,200 से अधिक हिंदू विरोधी घटनाएं दर्ज की गईं हैं जिन में मंदिरों पर हमले और घरों को जलाना भी शामिल हैं. जमात ए इसलामी के लोग अब खुलेतौर पर अल्पसंख्यकों को इसलाम अपनाने या देश छोड़ने की धमकी दे रहे हैं, जिस से भय का माहौल फैल रहा है.

बरबादी की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरता

पाकिस्तानी तर्ज वाली धार्मिक कट्टरता किस तरह किसी राष्ट्र को तबाही के कगार पर ला कर खड़ा कर सकती है, पाकिस्तान और अब बंगलादेश इस बात के उदाहरण हैं. अफगानिस्तान, ईरान और सीरिया की आम जनता भी कट्टरता का खमियाजा भुगत रही है. इस मामले में सभी धर्म एकजैसे ही हैं. मुसीबत यह है कि भारत में भी भगवा कट्टरता लगातार बढ़ रही है. मीडिया और सरकार पूरी मेहनत से बहुसंख्यकों के भीतर धार्मिक कट्टरता ठूंसने में लगे हैं. प्रतिक्रियात्मक रूप से अल्पसंख्यकों के अंदर भी धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ी है. यही कारण है कि लोगों को स्कूल, कालेज और अस्पतालों से ज्यादा मंदिरों और मसजिदों की जरूरत पड़ रही है.

धर्म दरअसल आम जनता को ठगने का सब से आसान जरिया है. आम आदमी धर्म के नाम पर ठगा जा रहा है लेकिन उसे इस का एहसास भी नहीं हो रहा है. धार्मिक कट्टरता के कारण पाकिस्तान पहले से बरबाद था, बंगलादेश बरबाद हो रहा है और भारत भी इसी रास्ते पर है. कोई भी धर्म आम जनता के हितों के लिए बना ही नहीं है. आम आदमी सिर्फ भक्त होता है. भक्तों की भावनाओं को भुनाने वाले गिरोह ही धर्म का फायदा उठाते हैं.

पाकिस्तानी मौलवियों ने बिगाड़े बंगलादेश के हालात

जुलाई 2024 को बंगलादेश में हुई क्रांति के बाद शेख हसीना जान बचा कर भारत भाग आईं और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. यूनुस ने हालात को सुधारने और लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा कायम करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. मुहम्मद यूनुस ने बंगलादेश में इसलामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले संगठनों को पूरा मौका दिया. जमात ए इसलामी जैसे संघठनों को खुला छोड़ दिया और पाकिस्तान से कट्टर मौलवियों को आयात किया जिन्होंने बंगलादेश में बचीखुची डैमोके्रसी और सैकुलरिज्म को भी तहसनहस कर दिया.

1 फरवरी, 2025 को पाकिस्तान के एक बड़े मौलवी इबतिशाम इलाही जहीर बंगलादेश के दौरे पर आए. इस दौरे में उन्होंने बंगलादेश के जमात ए इसलामी के बड़े उलेमाओं से मुलाकात की. 25 अक्तूबर, 2025 को इबतिशाम जहीर फिर से बंगलादेश पहुंचे. पाकिस्तान का यह मौलाना मरकजे जमात अहले हदीस का जनरल सैक्रेटरी है और आतंकी संगठन लश्करे तोयबा के संस्थापक हाफिज सईद का नजदीकी है. अपनी दूसरी बंगलादेश यात्रा में इबतिशाम जहीर ने मसजिदों, मदरसों और धार्मिक संगठनों के साथ बैठकें कीं.

नवंबर 2025 में बंगलादेश में आयोजित एक बड़े इसलामी सम्मेलन में पाकिस्तान से 35 मौलवी शामिल हुए. उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी नेता मौलाना फजलुर रहमान भी शामिल था जो भड़काऊ स्पीच के कारण जाना जाता है. इस सम्मेलन में अहमदिया समुदाय को गैरमुसलिम घोषित करने और ईशनिंदा (ब्लास्फेमी) कानून को और सख्त करने की मांग की गई. साथ ही, बंगलादेश में पाकिस्तान जैसे सख्त ब्लास्फेमी कानून लागू कराने के लिए दबाव बनाया गया.

इन पाकिस्तानी मौलवियों ने ‘मुसलिम एकता’ की बात की और काबुल से बंगलादेश तक ‘एक कलमा की जीत’ का नारा दिया. पाकिस्तानी मौलवियों ने बंगलादेश के जमात ए इसलामी के साथ मिल कर यह बयानबाजी की. जमात ए इसलामी की छात्र शाखा इसलामी छात्र शिविर ने ही 2024 के छात्र आंदोलन को हाईजैक कर हिंसा भड़काई, जिस में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की बड़ी भूमिका थी. लश्कर ए तोयबा जैसे आतंकी संगठनों के साथ जमात ए इसलामी की छात्र शाखा का संबंध अब कोई छिपी बात नहीं है.

पाकिस्तानी मौलवियों के अलावा 2025 में पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार और जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की बंगलादेश यात्राएं हुईं. बंगलादेशी नेता पाकिस्तानी सैनिक अधिकारियों से भी रावलपिंडी में मिल कर आ चुके हैं.

पाकिस्तानी घुसपैठ के बाद ही बंगलादेश में हिंदू, अहमदिया, ईसाइयों पर हमले बढ़े. दिसंबर 2025 में एक हिंदू व्यक्ति की ब्लास्फेमी के आरोप में लिंचिंग कर दी गई. दिसंबर 2025 में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद पूरा बंगलादेश हिंसा की आग में जल उठा.

इस बात में रत्तीभर भी शक की गुंजाइश नहीं बचती कि बंगलादेश के हालात को बिगाड़ने में पाकिस्तान का हाथ है. वर्ष 2024 की क्रांति भी स्वाभाविक नहीं थी बल्कि वह पाकिस्तान की प्लानिंग का हिस्सा थी.

कठिनाई यह है कि यह सब समझते हुए भी भारत के राजनेता वोटों की खातिर देश में हर समय बंगलादेशी घुसपैठियों की बात करते रहते हैं. ऐसा लगता है कि अगर बंगलादेशी घुसपैठिए न होते तो हम सिंगापुर बन गए होते. एक आम बंगलादेशी आखिर कैसे इन भारतीय नेताओं पर भरोसा

कर सकता है जो अपनी चुनावी सभाओं में बंगलादेशीबंगलादेशी चिल्लाते हैं और बाद में ढाका से उम्मीद करते हैं कि वह दोस्ती का हाथ बढ़ाए.

पाकिस्तान इस बात का पूरा फायदा उठा रहा है. Bangladesh Crisis :

Hindi Family Story : दीक्षा – प्राची के पति के व्यवहार में बदलाव क्यों आने लगा था ?

Hindi Family Story : प्राची अपने कमरे में बैठी मैथ्यू आरनल्ड की कविता ‘फोरसेकन मरमैन’ पढ़ रही थी. कविता को पढ़ कर प्राची का मन बच्चों के प्रति घोर अशांति से भर उठा. उस के मन में सवाल उठा कि क्या कोई मां इतनी पत्थर दिल भी हो सकती है. वह सोचने लगी कि यदि धर्म का नशा वास्तव में इतना शक्तिशाली है तो उस का तो हंसताखेलता परिवार ही उजड़ जाएगा.

‘नहीं, वह अपने जीतेजी ऐसा कदापि नहीं होने देगी,’ प्राची ने मन ही मन यह फैसला किया कि धर्म के दलदल में फंसे पति को जैसे भी होगा वह वापस निकाल कर लाएगी.

पिछले कुछ महीनों से प्राची को अपने पति साहिल के व्यवहार में बदलाव नजर आने लगा था. कल तक उसे अपनी बांहों में भर कर जो साहिल जीवन के सच को उस की घनी जुल्फों के साए में ढूंढता था आज वह उस से भागाभागा फिरता है. कुछ कहो तो उपदेश के लहजे में कहता है, ‘‘जीवन क्षणभंगुर है. माया से छुटकारा पाने के लिए मोह का त्याग तो करना ही पड़ेगा, प्राची.’’

साहिल अपने दोस्त सुधीर के गुरुजी के प्रवचनों से बेहद प्रभावित था. रहीसही कसर टेलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले उपदेशकों के प्रवचनों से पूरी हो गई थी. अब तो साहिल को एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह स्वामीजी से दीक्षा ली जाए और इस के लिए साहिल आफिस से निकलते ही सीधा स्वामीजी के पास चला जाता. वहां से आने के बाद वह प्राची सेयह तक नहीं पूछता कि तुम कैसी हो या बेटा अक्षय कैसा है.

रोज की तरह साहिल उस दिन भी रात को 9 बजे घर आया. खाना खाने के बाद सीधे सोने की तैयारी करने लगा. एक सुंदर सी बीवी भी घर में है, इस का उसे कोई एहसास ही नहीं था.

आज प्राची इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार थी. वह एक झटके से उठी और अपना हाथ साहिल के माथे पर रख दिया. इस पर साहिल हड़बड़ा कर उठा और पूछ बैठा, “क्या कोई काम है?”

‘‘क्या सिर्फ काम के लिए ही पति और पत्नी का रिश्ता बना है?’’ प्राची ने दुखी स्वर में पूछा और फिर सुबकते हुए बोली, ‘‘तुम ने तो इस सहज स्वाभाविक व रसीले रिश्ते को नीरस बना डाला है. पिछले 2 महीने से तुम ने मेरी इस कदर उपेक्षा की है जैसे कि तुम्हारे जीवन में मेरा कोई स्थान ही नहीं है.

‘‘देखो प्राची, मैं स्वामीजी से

दीक्षा लेना चाहता हूं और इस के लिए उन्होंने मुझे हर प्रकार से शुद्ध रहने

को कहा है….’’

साहिल की बात को बीच में काटते हुए प्राची बोली, ‘‘इसीलिए तुम अपनी पत्नी की अवहेलना कर रहे हो. तुम ने सोचा भी कैसे कि पत्नी की उपेक्षा कर के तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी? मुक्ति की ही चाह थी तो शादी के बंधन में ही क्यों पड़े?’’

प्राची की तल्ख बातें सुन कर साहिल हतप्रभ रह गया. उस ने पत्नी के इस रौद्र रूप की कल्पना भी नहीं की थी. फिर किसी तरह अपने को संभाल कर बोला, ‘‘प्राची, मैं तो बस आत्म अन्वेषण का प्रयास कर रहा था. मैं तुम्हें छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकता.’’

‘‘ठीक है, तो तुम्हें बीवी या स्वामीजी में से किसी एक को चुनना होगा.’’ यह कह कर प्राची ने मुंह घुमा लिया.

अगले दिन साहिल दफ्तर न जा कर सीधा अपने दोस्त सुधीर के घर गया जहां स्वामीजी आसन जमा कर बैठे थे और उन के पास भक्तों की भीड़ लगी थी. साहिल को परेशान हाल देख कर स्वामीजी ने पूछा, ‘‘क्या बात है? बड़े परेशान दिख रहे हो, वत्स.’’

‘‘मुझे आप से एकांत में कुछ बात करनी है,’’ साहिल बोला.

स्वामीजी का इशारा होते ही कमरा खाली हो गया तो साहिल ने पिछली रात की सारी घटना ज्यों की त्यों स्वामीजी को सुना दी. इस पर स्वामीजी शांत भाव से बोले, ‘‘वत्स, घबराने की कोई बात नहीं है. साधना के मार्ग में तो इस तरह की विघ्न- बाधाएं आती ही हैं. शास्त्र कहता है कि यदि साधना के मार्ग में पत्नी, मां या सगेसंबंधी बाधक बनें तो उन्हें त्याग देना चाहिए.’’

स्वामीजी की यह बात सुन कर साहिल सोच में पड़ गया कि बिना किसी कुसूर के अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़ देना क्या उचित होगा?

साहिल को चिंतित देख कर स्वामीजी बोले, ‘‘वत्स, एक उपाय है. अपनी पत्नी को भी यहां ले आओ. यहां आ कर उस का हृदय परिवर्तन भी हो सकता है और तब वह तुम्हें दीक्षा लेने से नहीं रोक सकती.’’

यह उपाय कारगर हो सकता है. ऐसा सोच कर साहिल स्वामीजी के चरणों में 501 रुपए रख कर चला गया.

साहिल के जाने के बाद सुधीर ने कमरे में आ कर स्वामीजी को देखते हुए जोर का ठहाका लगा कर कहा, ‘‘मान गए, स्वामीजी. अब तो यह आप की आंखों से देखता और आप के कानों से सुनता है.’’

साहिल घर जा कर प्राची को मनाने की कोशिश करने लगा. पहले तो प्राची साहिल को मना करती रही. फिर उस ने सोचा कि चल कर देखा जाए कि आखिर वहां का माजरा क्या है? उस ने साहिल से कहा कि हम रविवार की सुबह स्वामीजी के पास चलेंगे. साहिल ने फौरन इस बात की सूचना फोन पर सुधीर को दे दी.

अगले दिन साहिल के दफ्तर जाने के बाद प्राची ने फोन कर के सुधा को बुलाया. सुधा उस की बचपन की सहेली थी और उस के पति अरुण वर्मा शहर के एस.पी. थे. घर आने पर प्राची ने गर्मजोशी से अपनी सहेली सुधा का स्वागत किया.

बातोंबातों में जब सुधा ने कहा कि प्राची, जैसा मैं ने तुम्हें शादी में देखा था वैसी ही तुम आज भी दिखती हो तो प्राची फफकफफक कर रो पड़ी.

‘‘अरे, क्या हुआ, मैं ने कुछ गलत कह दिया क्या?’’ सुधा घबरा कर बोली.

प्राची शुरू  से ले कर अब तक की साहिल की कहानी सुधा के आगे बयान करने के बाद बोली, ‘‘अब तू ही बता सुधा, मैं अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए क्या करूं?’’

‘‘तू चिंता मत कर. मैं हूं न,’’ सुधा बोली, ‘‘ऐसा करते हैं, पहले चल कर अरुण से बात करते हैं. फिर जैसी वह सलाह देंगे वैसा ही करेंगे.’’

इस के बाद सुधा प्राची को ले कर अपने घर गई और फोन कर अरुण को भी बुला लिया.

प्राची की सारी बात सुन कर अरुण बोले, ‘‘आप चिंता न करें. मैं अब उस स्वामी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने दूंगा. इस के बारे में अभी तक जितनी जानकारी मेरे हाथ लगी है, उस से यही लगता है कि ऐसा कोई अपराध नहीं जो उस ने न किया या करवाया हो. पहले वह तुम्हारे पति जैसे अंधविश्वासी लोगों को हाथ की सफाई से दोचार चमत्कार दिखा कर प्रभावित करता है. इस के बाद दान के नाम पर पैसे ऐंठता है, फिर युवा महिलाओं को दीक्षित करने के बहाने उन की इज्जत लूटता है. अभी कुछ दिन पहले इसी स्वामी की काली करतूतों के बारे में एक गुमनाम पत्र मेरे पास भी आया था जिस में इज्जत लूटने के बाद ब्लैकमेल करने की बात लिखी गई थी. प्राची, अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं एक बहुत बड़े ढोंगी का परदाफाश कर सकता हूं.’’

‘‘मैं इस अभियान में आप के साथ हूं. बताइए, मुझे क्या करना होगा?’’ प्राची आत्मविश्वास के साथ बोली.

अरुण ने प्राची को अपनी योजना बता दी और उसे चिंतामुक्त हो कर घर जाने के लिए कहा.

शाम को साहिल ने प्राची को बताया कि स्वामीजी अपने आश्रम में चले गए हैं. अब उन के आश्रम में जा कर आशीर्वाद लेना होगा.

रविवार को जाने से पहले प्राची ने अरुण को फोन किया और बेटे को पड़ोसिन के पास छोड़ कर वह पति के साथ आश्रम के लिए रवाना हो गई.

ठीक 10 बजे दोनों आश्रम पहुंच गए. आश्रम बहुत भव्य था. अंदर जाते ही उन्हें सुधीर मिल गया. वह उन्हें एक वातानुकूलित कमरे में बैठाते हुए बोला, ‘‘स्वामीजी ने कहा है कि 1 घंटे के बाद वह तुम लोगों से मिलेंगे.’’

सुधीर उन्हें स्वागत कक्ष में बैठा कर चला गया. फिर कुछ देर बाद आ कर उन दोनों को स्वामीजी के निजी कमरे में ले गया. साहिल और प्राची ने हाथ जोड़ कर स्वामीजी का अभिवादन किया और उन के आसन के सामने बिछी दरी पर बैठ गए.

प्राची को संबोधित करते हुए स्वामीजी बोले, ‘‘मैं ने सुना है कि तुम साहिल के दीक्षा लेने के खिलाफ हो.’’

प्राची ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, “महाराज, आजकल के माहौल को देखते हुए ही मैं साहिल की दीक्षा के खिलाफ थी, लेकिन यहां आ कर मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. अब मेरे पति की दीक्षा में मेरी ओर से कोई बाधा नहीं होगी.’’

‘‘क्यों नहीं तुम भी अपने पति के साथ दीक्षा ले लेतीं,’’ स्वामीजी बोले, ‘‘इस से तुम दोनों का जल्दी ही उद्धार होगा.’’

प्राची ने कहा, ‘‘मेरा अहोभाग्य, जो आप ने मुझे इस लायक समझा.’’

अगले रविवार को दीक्षा का दिन निर्धारित कर दिया गया. स्वामीजी ने सुधीर से कहा कि उन्हें ले जा कर दीक्षा की औपचारिकताओं के बारे में बता दो. प्राची को पता चला कि दीक्षा लेने से पहले भक्त को 10 हजार रुपए जमा करवाने पड़ते हैं.

प्राची ने घर आ कर सुधा को फोन पर सारी बात बताई और फिर देखते ही देखते उन के दीक्षा लेने का दिन भी आ गया.

दीक्षा वाले दिन स्वामीजी के निजी कमरे में प्राची और साहिल जब पहुंचे तो 3 पुरुष और 2 महिलाएं वहां पहले ही मौजूद थे.

साहिल भावविभोर हो कर प्रणाम करने के लिए आगे बढ़ा तो स्वामीजी बोले, ‘‘वत्स, जाओ, तुम दोनों पहले स्नान कर के शुद्ध हो जाओ. उस के बाद श्वेत वस्त्र धारण कर के यहां मेरे पास आओ.’’

इस के बाद प्राची को किरण नाम की एक महिला स्नान कराने के लिए ले गई.

उस ने स्नानघर का दरवाजा खोला और किरण को श्वेत वस्त्र देने के लिए कहा. किरण ने बताया कि स्नानघर के कोने में बनी अलमारी में श्वेत वस्त्र रखे हैं.

प्राची बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर सतर्कता के साथ वहां का जायजा लेने लगी. अचानक उस की नजर शावर के ऊपर लगी एक छोटी सी वस्तु पर पड़ी. उस के दिमाग में बिजली सी कौंध गई कि कहीं यह कैमरा तो नहीं. फिर हिम्मत से काम लेते हुए प्राची ने अपना दुपट्टा निकाल कर कैमरे को ढक दिया और कमीज की जेब से मोबाइल निकाल कर अरुण को फोन मिला कर बोली, ‘‘हैलो, जीजाजी, यहां बहुत गड़बड़ लग रही है. आप फौरन आ जाइए.’’

अरुण ने जवाब में कहा, ‘‘घबराओ नहीं, प्राची, मैं आश्रम के पास ही हूं.’’

उसी समय फटाक की आवाज के साथ अलमारी का दरवाजा खुला और सुधीर ने प्राची का हाथ पकड़ कर उसे अलमारी के अंदर खींच लिया.

प्राची ने प्रतिरोध करने की बहुत कोशिश की, पर सब व्यर्थ. सुधीर उसे जबरन खींचता हुआ स्वामी के निजी कमरे में ले गया जहां उस को देखते ही स्वामीजी फट पड़े, ‘‘लड़की, तू ने मुझ से झगड़ा मोल ले कर अच्छा नहीं किया. तेरी इज्जत की अभी मैं चिंदीचिंदी किए देता हूं.’’

‘‘बदमाश, धोखेबाज, तेरी इज्जत की धज्जियां तो अब उड़ेंगी,’’ प्राची बेखौफ हो कर बोली, ‘‘जरा बाहर निकल कर तो देख. पुलिस तेरे स्वागत में खड़ी है.’’

तभी फायर होने की आवाज के साथ ही स्वामी के कमरे के दरवाजे पर जोर से थपथपाहट होने लगी. इस से पहले कि स्वामी और सुधीर कुछ कर पाते प्राची ने भाग कर दरवाजा खोल दिया.

सामने अरुण पुलिस बल के साथ खड़े थे. स्वामीजी लड़खड़ाते हुए बोले, ‘‘अच्छा हुआ, एस.पी. साहब, आप यहां आ गए अन्यथा यह कुलटा मुझे पथभ्रष्ट करने ही यहां आई थी.’’

अरुण ने खींच कर एक तमाचा स्वामी के मुंह पर मारा और पुलिस वाले लहजे में गाली देते हुए बोला, ‘‘तू क्या चीज है मैं अच्छी तरह जानता हूं. तेरे तमाम अपराधों की सूची मेरे पास है. बता, साहिल कहां है?’’

स्वामी ने एक कमरे की ओर इशारा किया तो पुलिस वाले साहिल को ले आए. वह अर्धबेहोशी की हालत में था.

अरुण ने स्वामी और सुधीर को पुलिस स्टेशन भेजने के बाद साहिल को अस्पताल भिजवाने का इंतजाम किया.

रात को अरुण प्राची और साहिल का हाल जानने आए तो साथ में सुधा भी थी. उन के जाने के बाद साहिल प्यार से प्राची की ओर देख कर बोला, ‘‘भई, दीक्षा तो मुझे अब भी चाहिए, तुम्हारे प्रेम की दीक्षा.’’

‘‘उस के लिए तो मैं सदैव तैयार हूं,’’ कहते हुए प्राची ने साहिल के सीने में अपना सिर छिपा लिया. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : हिमशैल – सगे भाइयों पर चाचा की कुटिलता से नेहा पर क्या पड़ा असर ?

Hindi Family Story : चाचाचाची की कुटिलता ने सगे भाइयों विजय व अजय के आपसी रिश्तों में दरार डाल दी थी फिर भी अजय की पत्नी आरती को उम्मीद थी कि नेहा की गोदभराई पर तो उन्हें जरूर कोई बुलाने आएगा.

‘‘अजय, अब केवल तुम्हारे लिए हम चाचाजी के परिवार को तो छोड़ नहीं सकते. उन्हें तो अपनी बेटी नेहा के विवाह में बुलाएंगे ही.’’

बड़े भाई विजय के पिघलते शीशे से ये शब्द अजय के कानों से होते हुए सीधे दिलोदिमाग तक पहुंच कर सारी कोमल भावनाओं को पत्थर सा जमाते चले गए थे, जो आज कई महीने बाद भी उन के पारिवारिक सौहार्द को पुनर्जीवित करने के प्रयास में शिलाखंड से राह रोके पड़ेथे.

आपसी भावनाओं के सम्मान से ही रिश्तों को जीवित रखा जा सकता है पर जब दूसरे का मान नगण्य और अपना हित ही सर्वोपरि हो जाए तो रिश्तों को बिखरते देर नहीं लगती. अजय ने अपने स्वाभिमान को दांव पर लगाने के बजाय संयुक्त परिवार से निर्वासन स्वीकार कर लिया था.

धीरेधीरे नेहा की गोदभराई की तिथि नजदीक आती जा रही थी पर दोनों भाइयों के बीच की स्थिति ज्यों की त्यों थी और जब आज सुबह से ही विजय के घर में लाउडस्पीकर पर ढोलक की थापों की आवाज रहरह कर कानों में गूंजने लगी तो अजय की पत्नी आरती न चाहते हुए भी पुरानी यादों में खो सी गई.

वक्त कितनी जल्दी बीत जाता है पता ही नहीं चलता. पता तब चलता है जब वह अपने पूरे वजूद के साथ सामने आता है. कल तक छोटी सी नेहा उस के आगेपीछे चाचीचाची कह कर भागती रहती थी. उस का कोई काम चाची के बिना पूरा ही नहीं होता था और आज वह एक नई जिंदगी शुरू करने जा रही है तो एक बार भी उसे अपनी चाची की याद नहीं आई. शायद अब भी उस की मां ने उसे रोक लिया हो पर एक फोन तो कर ही सकती थी…ऊंह, जब उन लोगों को ही उस की याद नहीं आती तो वह क्यों परेशान हो. उस ने सिर झटक कर पुरानी यादों को दूर करना चाहा, पर वे किसी हठी बालक की तरह आसपास ही मंडराती रहीं. उस ने ध्यान हटाने के लिए खुद को व्यस्त रखना चाहा पर वे शरारती बच्चे की तरह उंगली पकड़ कर उसे फिर अतीत में खींच ले गईं.

तीनों भाइयों, विजय, अजय व कमल में कितना प्यार था. उस के ससुर रायबहादुर पत्नी के न होने की कमी महसूस करते हुए भी उन के द्वारा लगाई फुलवारी को फलताफूलता देख खुशी से भर उठते थे. उच्चपदासीन बेटे, आज्ञाकारी बहुएं व पोतेपोतियों से भरेपूरे परिवार के मुखिया अपने छोटे भाई के परिवार को भी कम मान व प्यार नहीं देते थे. जो उसी शहर में कुछ ही दूरी पर रहते थे.

हर तीजत्योहार पर दोनों परिवार जब एकसाथ मिल कर खुशियां मनाते तो घर की रौनक ही अलग होती थी. उन के खानदानी आपसी प्यार का शहर के लोग उदाहरण दिया करते थे पर न तो समय सदैव एक सा रहता है और न ही एक हाथ की पांचों उंगलियां बराबर होती हैं.

रायबहादुर के छोटे भाई भी उन्हीं की तरह सज्जन थे परंतु कलेक्टर पति के पद के मद में डूबी उन की पत्नी जानेअनजाने अपने बच्चों में भी अहंकार भर बैठी थीं. पिता के पद का दुरुपयोग उन्हें घर में विलासिता व कालिज में यूनियन का नेता तो बना गया पर न तो पढ़ाई में अव्वल बना सका और न ही मानवीय मूल्यों की इज्जत करने वाला संस्कारशील स्वभाव दे सका. जीवन में आगे बढ़ने के अवसर, व्यर्थ के कामों में समय गंवा कर वे खुद ही अपना रास्ता अवरुद्ध करते गए. बीता समय तो लौट कर आता नहीं, आखिर मन मार कर उन्हें साधारण नौकरियों पर ही संतोष करना पड़ा.

संतान ही मांबाप का सिर गर्व से ऊंचा कराती है. जब कलेक्टर की बीवी अपने जेठ रायबहादुर के परिवार पर निगाह डालतीं तो अपने बच्चों के साधारण भविष्य का एहसास उन्हें मन ही मन कुंठित कर देता पर उन्होंने इसे कभी जाहिर नहीं होने दिया था. उन जैसे लोग अपने सुख से इतना सुखी नहीं होते जितना कि दूसरे के सुख से दुखी. उन के अंदर के ईर्ष्यालु भाव से अनजान रायबहादुर की दोनों बहुएं आरती व भारती, जो देवरानीजेठानी कम, बहनें ज्यादा लगती थीं, अपनी सास की कमी चचिया सास की निकटता पा कर भूल जाती थीं. यद्यपि विवाह के कुछ वर्ष बाद ही आरती को चचिया सास का वैमनस्य से भरा व्यवहार उलझन में डालने लगा था. चाचीजी अकसर उस के कामों में कोई न कोई कमी निकाल कर उसे शर्मिदा करने का बहाना ढूंढ़ती रहती थीं और हर झिड़की के साथ वह यह जरूर कहती थीं, ‘अजय अपनी पसंद की लड़की ब्याह तो लाया है, देखते हैं कितना निभाती है. इतनी अच्छी लड़की बताई थी पर जरा कान नहीं दिया.’

अपनी बात न रखे जाने का मलाल वाणी से स्पष्ट झलकता था. शायद इसीलिए वह चाची की आंख में सदैव कांटा सी खटकती रही. चोट खाए अहं के कारण ही शायद चाची कभी किसी बात के लिए उस की प्रशंसा न कर सकीं. घर में शांति बनाए रखने के लिए व्यर्थ के वादविवाद में न पड़ कर, छोटीछोटी बातों को नजरअंदाज कर के वह उन के मनमुताबिक ही कर देती.

आरती जितनी झुकती गई उतना ही वे अजय व आरती के खिलाफ जहर घोलते हुए एक कूटनीति के तहत विजय व भारती के प्रति प्रेमप्रदर्शन करती गईं. दूध चाहे कितना ही शुद्ध क्यों न हो, विष की एक बूंद ही उसे विषैला बनाने के लिए काफी होती है. शुरू में तो भारती व आरती एकदूसरे का सुखदुख बांट लेती थीं पर विजय व भारती का चाची के परिवार के प्रति बढ़ता झुकाव, साथ ही अपने सगे भाई अजय व पिता की उपेक्षा से उन के आपसी रिश्तों में दूरियां आने लगीं.

अच्छाई से अधिक बुराई अपना असर जल्दी दिखाती है. उन के इस पक्षपातपूर्ण रवैए का असर घर के निर्मल वातावरण को भी दूषित करने लगा था. आपसी प्यार का स्थान प्रतिस्पर्धा ने ले लिया. चचिया सास के प्रपंच से अनजान उन की आंखों का तारा बनी भारती को भी अब अजय व आरती की हर बात में स्वार्थ ही नजर आता. उन के भले के लिए कही गई सही बात भी गलत लगती.

कई कलाओं की जानकार आरती के पास जब जेठानी के बच्चे नेहा, नीतू व शिशिर अपने स्कूल की हस्तकला प्रतियोगिता के लिए वस्तुएं बनाना सीख रहे होते तो खुद को उपेक्षित समझ भारती इसे अपना अपमान समझती. अपने बच्चों का उन लोगों के प्रति स्नेह भी उसे आरती का षड्यंत्र ही लगता.

‘अब तो हर चीज बाजार में मिलती है, खरीद कर दे देना. समय क्यों खराब कर रहे हो तुम लोग, उठो यहां से और पढ़ने जाओ,’ कहती हुई भारती बच्चों को स्वयं कुछ करने या सीखने की प्रेरणा से विलग करती जा रही थी.

रायबहादुर घर में आए इस बदलाव को महसूस तो कर रहे थे पर कारण समझने में असमर्थ थे इसलिए केवल मूकदर्शक ही बन कर रह गए थे. इनसान बाहर के दुश्मनों से तो लड़ सकता है किंतु जब घर में ही कोई विभीषण हो तो कोई क्या करे. अपनों से धोखा खाना बेहद सरल है. कहते हैं कि औरत ही घर बनाती है और वही बिगाड़ती भी है. यदि परिवार में एक भी स्त्री गलत मंतव्य की आ जाए तो विनाश अवश्यंभावी है.

उम्र बढ़ने के साथसाथ आरती की चचिया सास के निरंकुश शासन का साम्राज्य भी बढ़ता रहा. इस बात का तकलीफदेह अनुभव तब हुआ जब चाचीजी के सौतेले भाई ने अपने बेटे के विवाह में बहन की नाराजगी के डर से अजय व रायबहादुर को विवाह का आमंत्रणपत्र ही नहीं भेजा. लोगों द्वारा उन के न आने का कारण पूछने पर उन का पैसों का अहंकार प्रचारित कर दिया गया. हालांकि चाचाजी ने इस का विरोध किया था किंतु तेजतर्रार चाची के सामने उन की आवाज नक्कारखाने में तूती बन कर रह गई थी.

मृतप्राय रिश्तों के ताबूत में आखिरी कील उन्होंने तब ठोंक दी जब अजय के बेटे अंशुल के जन्मदिन की पार्टी में रायबहादुर द्वारा सानुरोध सपरिवार आमंत्रित होने के बाद भी केवल चाचाजी थोड़ी देर के लिए आ कर रस्म अदायगी कर गए. केवल लोकलाज के लिए रिश्तों को ढोते रहने का कोई अर्थ नहीं रह गया था. इसीलिए सगी भतीजी नेहा के विवाह आमंत्रण पर अजय ने साफ कह दिया कि यदि चाचाजी के परिवार को बुलाया गया तो हमारा परिवार नहीं जाएगा.

हमेशा की तरह बिना कारण पूछे विजय छूटते ही बोला, ‘अजय, तुम तो लड़ने का बहाना ढूंढ़ते रहते हो, इसीलिए सब तुम से दूर होते जा रहे हैं.’

‘अपने दूर क्यों हो रहे हैं, यह आप नहीं समझ सकते क्योंकि समझना ही नहीं चाहते. मैं न किसी से लड़ने जाता हूं और न अहंकारी हूं. हां, साफ कहने का माद्दा रखता हूं और गलत बात बरदाश्त नहीं करता. मुझे तो भाई आश्चर्य इस बात का है कि जब वे आप को गलत नहीं लगे तो मैं क्यों लग रहा हूं या तो आप को पूरी बातें पता ही नहीं हैं या मेरी इज्जत आप के लिए कोई माने नहीं रखती है. कोई हो या न हो पर पिताजी मेरे साथ हैं और यही मेरे लिए काफी है,’ अजय एक सांस में बोल गया.

‘तुम्हीं लोगों को शिकायतें रहती हैं. पिताजी तो मेरे यहां हर फंक्शन पर आते हैं और चाचाजी व अन्य सब से ठीक से बोलते भी हैं.’

‘संतान का मोह ही उन्हें खींच कर ले जाता है. संतान चाहे कितना भी दुख दे मांबाप का प्यार तो निस्वार्थ होता है. आप ने कभी उन का दर्द महसूस ही नहीं किया. रही बात चाचाजी से पिताजी के बोलने की, तो हम लोग उस स्तर तक असभ्य नहीं हो सकते कि कोई बात करे तो जवाब न दें या अपने घर फंक्शन पर बुला कर खाने तक के लिए न पूछें. क्या आप के लिए चाचाजी, सगे भाई व पिता की खुशी से भी ज्यादा बढ़ कर हैं?’

‘जो भी हो…पर अजय…अब केवल तुम्हारे लिए मैं चाचाजी के पूरे परिवार को तो नहीं छोड़ सकता. उन्हें तो अपनी बेटी नेहा के विवाह में बुलाऊंगा ही,’ विजय जैसे कुछ सुननेसमझने को तैयार ही न था.

‘तो ठीक है, हमें ही छोड़ दीजिए,’ भारी मन से कह अजय सब के बीच से उठ कर चला गया था. पर इस एक पल में अंदर कितना कुछ टूट गया, कौन जान सका. एक क्षण को विजय अपने ही शब्दों की चुभन से आहत हो उठा था. किंतु बंदूक से निकली गोली और मुंह से निकली बोली तो वापस नहीं हो सकती.

उस दिन का व्याप्त सन्नाटा आज तक नहीं टूट पाया था. तभी महरी की आवाज से आरती की तंद्रा भंग हो गई.

‘‘बीबीजी, आप नहीं जाएंगी नेहा बिटिया की गोदभराई पर?’’ आंखों में कुटिल भाव लिए पल्लू से हाथ पोंछती महरी ने पूछा था.

‘‘तुम्हें इस से क्या मतलब है…जाओ, अपना काम करो,’’ उस की चुगलखोरी की आदत से अच्छी तरह परिचित आरती ने उसे झिड़क दिया. वह मुंह बनाती हुई चली गई. आरती ने जा कर दरवाजा बंद कर लिया. मन की थकान से तन भी क्लांत हो उठा था. वह कुरसी पर अधलेटी सी आंखें बंद कर बैठ गई.

घर में फैले तनाव को भांप कर दोनों बच्चे अंशुल व आकांक्षा स्कूल से आ कर चुपचाप खाना खा कर अपने कमरे में पढ़ने का उपक्रम कर रहे थे. अजय के आने में देर थी. विजय का बेटा शिशिर जब बुलाने आया तो पिताजी न चाहते हुए भी उस के साथ नेहा की गोदभराई में चले गए थे. घर के एकांत में लाउडस्पीकर पर गानों की आवाज से ज्यादा पुरानी यादों की गूंज थीं.

आपसी रिश्तों में खिंचाव व नया मकान बन जाने पर अजय अपने परिवार व पिता के साथ पुश्तैनी मकान, जिस में विजय का परिवार भी रहता था, छोड़ कर पास ही बने अपने नए बंगले में शिफ्ट हो गया था. दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार होते हुए भी न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति उन के संबंधों को पुन: मधुर बनने से रोकती रही. स्थान की दूरी तो इनसान तय कर सकता है पर दिलों के फासले दूर करना इतना आसान नहीं है.

तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. अन्यमनस्क सी आरती ने उठ कर द्वार खोला तो सगे देवर कमल व उस की पत्नी पूजा को आया देख सुखद आश्चर्य से भर उठीं.

‘‘आइए, अंदर आइए, कमल भैया. पूजा…कब आए लंदन से?’’ अपनों से मिलने की प्रसन्नता आंखें नम कर गई.

‘‘भाभी, बस, अभी 2 घंटे पहले ही पहुंचे हैं. पर यह सब हम क्या सुन रहे हैं. आप लोग सगाई में शरीक नहीं होंगे?’’

अंदर आ कर कमल और पूजा ने आरती को पेर छूते हुए पूछा तो अनायास ही उस की आंखें भर आईं. पूजा को उठा कर गले से लगाती हुई बोली, ‘‘लोग तो अपने देश में रह कर भी आपसी सभ्यता व संस्कार याद नहीं रखते. तुम लोग विदेश जा कर भी भूले नहीं हो.’’

‘‘हां, भाभी, विदेश में सबकुछ मिलता है. हर चीज पैसों से खरीदी जा सकती है पर बड़ों का आशीर्वाद और प्यार बाजार में नहीं बिकता. सच, आप सब की वहां बहुत याद आती है. चलिए, तैयार हो जाइए. ऐसा भी कहीं हो सकता है, घर में शादी है और आप लोग यहां अकेले बैठे हैं,’’ पूजा मनुहार करती सी बोली.

आरती के चेहरे पर कई रंग आ कर चले गए. तभी अजय भी आ गए. बरसों बाद मिले सब एकदूसरे का सुखदुख बांटते रहे. आखिर, कमल के बहुत पूछने पर अजय ने उन को अपने न जाने की वजह बता दी.

‘‘यहां इतना कुछ हो गया और आप लोगों ने हमें कुछ बताया ही नहीं. उन सब की ज्यादतियों का हिसाब तो हम लोग ले ही लेंगे पर अभी तो आप लोग चलिए वरना हम भी नहीं जाएंगे और आप खुद को अकेला न समझें भैया. मैं हूं न आप के साथ,’’ कमल उत्तेजित हो कर बोला.

‘‘जहां इज्जत न हो वहां न जाना ही बेहतर है. यह हमारा अहंकार या जिद नहीं स्वाभिमान है. हद तो यह है कि चाचीजी के भाई सौतेले हो कर भी उन की गलत बात मान लेते हैं और हम अपने सगे भाइयों से सही बात मानने की आशा न रखें. वे मुझे ही गलत समझते हैं. और तो और पिताजी की इच्छा का भी उन के लिए कोई महत्त्व नहीं है,’’ उदासी अजय की आवाज से साफ झलक उठी थी. एक नजर सब पर डाल वह फिर कहने लगे, ‘‘इस निर्णय तक मुझे पहुंचने में तकलीफ तो बहुत हुई पर अब कोई दुख नहीं है. इसी बहाने मुझे अपने और बेगानों की पहचान तो हो गई.’’

‘‘हम लोगों के जाने न जाने से वहां किसी को क्या फर्क पड़ रहा है? एक बार भी किसी को इस परिवार की याद आई?’’ आरती कह ही रही थी कि…उस के कानों में नेहा के ये शब्द पड़े, ‘‘चाचीजी मुझे तो आप की बहुत याद आ रही थी…आना तो मैं बहुत पहले ही चाहती थी पर…बस…सोचती ही रह गई…अब तो जल्द ही मैं यह घर छोड़ कर चली जाऊंगी. मुझ से कैसी शिकायत?’’ नेहा की आवाज सुन कर सब चौंक कर दरवाजे की तरफदेखने लगे.

सितारों जड़ी गुलाबी साड़ी में सजी नेहा बेहद सुंदर लग रही थी. अचानक उसे यों अपनी छोटी बहन के साथ आया देख सब हतप्रभ रह गए थे.

‘‘पगली…तुझ से कैसी शिकायत. तुम तो हमारी बच्ची ही हो. पर तुम इस समय यहां…घर में तुम्हारी ससुराल वाले आते ही होंगे,’’ आरती ने प्यार से नेहा को अंदर ला कर सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘नहीं, चाचीजी, उन को बता कर आई हूं, सब आप लोगों का ही इंतजार कर रहे हैं. पापा अपने चाचाचाची को नहीं छोड़ सकते तो मैं भी अपने चाचाचाची को नहीं छोड़ सकती. जब तक आप लोग नहीं आएंगे, मैं भी गोदभराई पर नहीं बैठूंगी,’’ नेहा ने अपना निर्णय सुनाते हुए पास ही खड़े छोटे चचेरे भाईबहन को गले से लगा लिया, ‘‘और तुम भी तैयार हो जाओ. फेरों पर जीजाजी के जूते नहीं चुराओगी?’’

आकांक्षा व अंशुल आशा भरी नजरों से अजय व आरती को देखने लगे जो असमंजस में थे. तभी कमल उत्साहित हो कर बोल उठा, ‘‘ये हुई न बात. अब तो भैया आप को चलना ही होगा.’’

नेहा के प्यार व अपनत्व ने सब के दिलों को झकझोर दिया था. एकाएक नेहा कितनी समझदार व बड़ी लगने लगी थी. उस के आत्मविश्वास व प्यार भरे अधिकार ने एकबारगी सब को अभिभूत कर दिया था, कोई भी नफरत की दीवार अपनों के रिश्तों के प्यार से ज्यादा मजबूत नहीं होती, ढह ही जाती है. जरूरत केवल समय पर एक ईमानदार प्रयास करने की होती है. वर्षों तक हिमाच्छादित हिमखंड के अंदर बहते निर्मल जल के सोते जैसे अचानक राह मिलते ही बह निकलते हैं, यत्नपूर्वक अब तक रोके गए बहते आंसू ही उन के प्यार की अभिव्यक्ति बन गए थे.

‘‘हां, तुम लोगों को आना ही

होगा,’’ तभी दरवाजे से अंदर आते चाचाजी का स्वर सुनाई दिया, ‘‘जाने- अनजाने तुम लोगों के साथ बहुत अन्याय हुआ है. मुझे इस का दुख है. खैर, अब दिल में कुछ न रखो. यह सबकुछ ठीक नहीं हो रहा है. याद रखो. बंद मुट्ठी ही सवा लाख की होती है.’’

‘‘मुझे माफ कर दो, बहू,’’ चचिया सास पश्चात्ताप भरे स्वर में कह रही थीं, ‘‘नेहा ने मेरी आंखें खोल दी हैं. ईर्ष्या ने मुझे विवेकहीन बना दिया था…कहो तो मैं तुम दोनों के पैर भी…’’

सकपका कर आरती पीछे हट गई, ‘‘अरे, अरे, आप यह क्या कर रही हैं. आप तो हमारी बड़ी हैं.’’

‘‘हां, बड़ी तो हैं पर इन्हें बड़ों के फर्ज नहीं केवल अधिकार ही याद रहे,’’ पहली बार सब ने चाचाजी को गरजते सुना, ‘‘बड़प्पन बनाए रखने के लिए आचरण भी तो मर्यादित होना चाहिए.’’

चाचाजी के और अधिक उग्र क्रोध का लक्ष्य बनने से चाचीजी को बचाते हुए अजय बोला, ‘‘अब छोडि़ए भी, चाचाजी. पश्चात्ताप का एक आंसू ही सारे गिलेशिकवे दूर कर देता है. अपनी गलती का एहसास कर के क्षमाप्रार्थी होना ही सब से बड़ा बड़प्पन है. आप लोगों ने मेरे लिए इतना सोच लिया यही पर्याप्त है.’’

शाम का अंधेरा घिर आया था. कुरसी से जल्दी उठ कर उस ने स्विच आन किया तो कमरा दूधिया प्रकाश से नहा उठा. रात्रि के 9 बज रहे थे. बाहर शाम से चीख रहे लाउडस्पीकर शांत हो चुके थे. सपनों की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर आने में उसे कुछ ही पल लगे थे. तब तक टेलीविजन देख रहे बच्चों ने दरवाजा खोल दिया था. अजय अंदर आते हुए उसे उनींदा सा देख पूछ रहे थे, ‘‘क्या हुआ…सो रही थीं?’’

‘‘हां…शायद झपकी सी आ गई थी…पर अब जाग गई हूं. आइए, खाना लगाती हूं.’’

रसोई की तरफ बढ़ती आरती सोच रही थी कि अवचेतन ने स्वप्न में उन की आशाओं को मूर्तरूप तो दे दिया था पर यथार्थ कितने कठोर होते हैं…बिलकुल हिमशैल की तरह जिस का केवल एकचौथाई भाग ही नजर आता है, शेष जलमग्न रहता है. जिंदगी स्लेट पर लिखी इबारत तो नहीं जिसे पसंद न आने पर मिटा कर पुन: लिख

दें. यह तो अमिट शिलालेख है, जिसे चाहते न चाहते हुए भी हमें पढ़ना ही है. Hindi Family Story :

Hindi Romantic Story : अब  आओ  न मीता

Hindi Romantic Story :

ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी थी. मीता भीड़ के बीच खड़ी अपना टिकट कनफर्म करवाने के लिए टी.टी.ई. का इंतजार कर रही थी. इतनी सारी भीड़ को निबटातेनिबटाते टी.टी.ई. ने मीता का टिकट देख कर कहा, ‘‘आप एस-2 कोच में 12 नंबर सीट पर बैठिए, मैं वहीं आऊंगा.’’

मीता अपना सूटकेस और बैग उठाए एस-2 कोच में आ गई. गरमी के मारे बुरा हाल था. ऊपर से मीता की सीट पर सूरज की सीधी रोशनी पड़ रही थी.

5 दिन हो गए उसे घर छोड़े. आशा दी से मिलने को मन बहुत छटपटा रहा था. बड़ी मुश्किल से फैक्टरी से एक हफ्ते की छुट्टी मिल पाई थी. अब वापसी में लग रहा है कि ट्रेन के पंख लग जाएं और वह जल्दी से घर पहुंच जाए. दोनों बेटों से मिलने के लिए व्याकुल हो रहा था उस का मन…और सागर? सोच कर धीरे से मुसकरा उठी वह.

यह ट्रेन उसे सागर तक ही तो ले जा रही है. कितना बेचैन होगा सागर उस के बिना. एकएक पल भारी होगा उस पर. लेकिन 5 युगों की तरह बीते 5 दिन. उस की जबान नहीं बल्कि उस की गहरीगहरी बोलती सी आंखें कहेंगी…वह है ही ऐसा.

मीता अतीत में विचरण करने लगी.

‘परसों दीदी के पास कटनी जा रही हूं. 4-5 दिन में आ जाऊंगी. दोनों बच्चों को देख लेना, सागर.’

‘ठीक है पर आप जल्दी आ जाना,’ फिर थोड़ा रुक कर सागर बोला, ‘और यदि जरूरी न हो तो…’

‘जरूरी है तभी तो जा रही हूं.’

‘मुझ से भी ज्यादा जरूरी है?’

‘नहीं, तुम से ज्यादा जरूरी नहीं, पर बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिल पाई है एक हफ्ते की. फिर अगले माह बच्चों के फाइनल एग्जाम्स हैं, अगले हफ्ते होली भी है. सोचा, अभी दीदी से मिल आऊं.’

‘तो एग्जाम्स के बाद चली जाना.’

‘सागर, हर चीज का अपना समय होता है. थोड़ा तो समझो. मेरी दीदी बहुत चाहती हैं मुझे, जानते हो न? मेरी तहसनहस जिंदगी का बुरा असर पड़ा है उन पर. वह टूट गई हैं भीतर से. मुझे देख लेंगी, दोचार दिन साथ रह लेंगी तो शांति हो जाएगी उन्हें.’

‘तो उन्हें यहीं बुला लीजिए…’

‘हां, जाऊंगी तभी तो साथ लाऊंगी. एक बार तो जाने दो मुझे. मेरे जाने का मकसद तुम ही तो हो. दीदी को बताने दो कि अब अकेली नहीं हूं मैं.’

इतने में नीलेश और यश आ गए, अपनी तूफानी चाल से. अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाने की दोनों में होड़ लगी थी. मीता ने दोनों की प्रोग्रेस रिपोर्ट देखी. टेस्ट में दोनों ही फर्स्ट थे. दोनों को गले लगा कर मीता ने आशीर्वाद दिया…पर उस की आंखें नम थीं…कितने अभागे हैं राजन. बच्चों की कामयाबी का यह गौरव उन्हें मिलता पर…

दोनों बच्चों ने अपने कार्ड उठाए. वापस जाने को पीछे मुड़ते इस के पहले ही दोनों सागर के पैरों पर झुक गए, ‘…और आप का आशीर्वाद?’

‘वह तो सदा तुम दोनों के साथ है,’ कहते हुए सागर ने दोनों को उठा कर सीने से लगा लिया और कहा, ‘तुम दोनों को इंजीनियर बनना है. याद है न?’

‘हां, अंकल, याद है पर शाम की आइसक्रीम पक्की हो तो…’

‘शाम की आइसक्रीम भी पक्की और कल की एग्जीबिशन भी. वहां झूला झूलेंगे, खिलौने खरीदेंगे, आइसक्रीम भी खाएंगे और जितने भी गेम्स हैं वे सब खेलेंगे हम तीनों.

‘हम तीनों मीन्स?’ यश बोला.

‘मीन्स मैं, तुम और नीलेश.’

‘और मम्मी?’

‘वह तो बेटे, कल तुम्हारी आशा मौसी के पास कटनी जा रही हैं. 4-5 दिन में लौटेंगी. मैं हूं ना. हम तीनों धूम मचाएंगे, नाचेंगे, गाएंगे और मम्मी को बिलकुल भी याद नहीं करेंगे. ठीक?’

दोनों बच्चे खुश हो कर बाहर चल दिए.

मीता आश्चर्यचकित थी. पहले बच्चों के उस व्यवहार पर जो उन्होंने सागर से आशीर्वाद पाने के लिए किया, फिर सागर के उस व्यवहार पर जो उस ने बच्चों के संग दोहराया. सागर की गहराई को अब तक महसूस किया था आज उस की ऊंचाई भी देख चुकी वह.

किस मिट्टी का बना है सागर. चुप रह कर सहना. हंस कर खुद के दुखदर्द को छिपा लेना. कहां से आती है इतनी ताकत? मीता शर्मिंदा हो उठी.

‘नहीं, सागर, तुम्हें इस तरह अकेला कर के नहीं जा सकती मैं. एक हफ्ता हम घर पर ही रहेंगे. माफ कर दो मुझे. तुम्हारा मन दुखा कर मुझे कोई भी खुशी नहीं चाहिए. मैं बाद में हो आऊंगी.’

‘माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. मुझ से पहले तो आप पर आप के परिवार का हक है. फिर रोकने का हक भी तो नहीं है मुझे…आप की अपनी जिम्मेदारियां हैं जो मुझ से ज्यादा जरूरी हैं. फिर आशा दी को यहां बुलाना भी तो है…’

एकाएक झटके से ट्रेन रुक गई. आसपास फिर वही शोर. पैसेंजरों का चढ़नाउतरना, सब की रेलपेल जारी थी.

मीता पर सीधी धूप आ रही थी. हलकी सी भूख भी उसे महसूस होने लगी. एक कप कौफी खरीद कर वह सिप लेने लगी. सामने की सीट पर बैठे 3-4 पुलिस अफसर यों तो अपनी बातों में मशगूल लग रहे थे लेकिन हरेक की नजरें उसे अपने शरीर पर चुभती महसूस हो रही थीं.

सागर और मीता का परिचय भी एक संयोग ही था. कभी- कभी किसी डूबते को तिनका बन कर कोई सहारा मिल जाता है और अपने हिस्से का मजबूत किनारा तेज बहाव में कहीं खो जाता है. यही हुआ था मीता के संग. अपने बेमेल विवाह की त्रासदी ढोतेढोते थक गई थी वह. पूरे 11 सालों का यातनापूर्ण जीवन जिया था उस ने. जिंदगी बोझ बनने लगी थी पर हारी नहीं थी वह. आत्महत्या कायरता की निशानी थी. उस ने वक्त के सामने घुटने टेकना तो सीखा ही न था. एक मजबूत औरत जो है वह.

मगर 11 सालों में पति रूपी दीमक ने उस के वजूद को ही चाटना शुरू कर दिया था.

तानाशाह, गैरजिम्मेदार और क्रूर पति का साथ उस की सांसें रोकने लगा था. प्रेम विवाह किया था मीता ने, लेकिन प्रेम एक धोखा और विवाह एक फांसी साबित हुआ आगे जा कर. पति को पूजा था बरसों उस ने, उस की एकएक भावना की कद्र की थी. उसे अपनी पलकों पर बैठाया, उसे क्लास वन अफसर की सीट तक पहुंचाने में भावनात्मक संबल दिया उस ने. यह प्रेम की पराकाष्ठा ही तो थी कि मीता ने अपनी शिक्षा, प्रतिभा और महत्त्वाकांक्षाओं को परे हटा कर सिर्फ  पति के वजूद को ही सराहा. सांसें राजन की चलतीं पर उन सांसों से जिंदा मीता रहती, वह खुश होता तो दुनिया भर की दौलत मीता को मिल जाती.

पुरुष प्रधान समाज का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राय: हर सफल व्यक्ति के पीछे कोई महिला होती है, लेकिन सफल होते ही वही पुरुष किसी और मरीचिका के पीछे भागने लगता है. प्रेम विवाह करने वाला प्रेम की नई परिभाषाएं तलाशने लगा. एक के बाद दूसरे की तलाश में भटकने लगा.

पद के साथ प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है यह भूल ही गया था राजन. यहां तो पद के साथसाथ शराब, ऐयाशी और ज्यादतियां आ जुड़ी थीं. प्रतिष्ठा को ताख पर रख कर राजन एक तानाशाह इनसान बनने लगा था, मीता का जीवन नरक से भी बदतर हो गया था. पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. मीता की सारी कोशिशें बेकार हो गईं. उस का स्वाभिमान उसे उकसाने लगा. दोनों बेटों की परवरिश, उन का भविष्य और ममता से भारी न था यह नरक. नतीजा यह हुआ कि शहर छूटा, कड़वा अतीत छूटा और नरक सा घर भी छूट गया. धीरेधीरे आत्मनिर्भर होने लगी मीता. नई धरती, नए आसमान, नई बुलंदियों ने दिल से स्वागत किया था उस का. फैशन डिजाइनिंग का डिप्लोमा काम आ गया सो एक एक्सपोर्ट गारमेंट फैक्टरी में सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई. दोनों बच्चों की परवरिश और चैन से जीने के लिए पर्याप्त था इतना कुछ. जिंदगी एक ढर्रे पर आ गई थी.

मारने से मन नहीं मरता न? मीता का भी नहीं मरा था. बेचैन मीता रात भर न सो पाती. नैतिकता की लड़ाई में जीत कर भी औरत के रूप में हार गई थी वह. लेकिन जीवन तो कार्यक्षेत्र है जहां दिल नहीं दिमाग का राज चलता है. मीता फिर अपनी दिनचर्या से जूझने को कमर कस कर खड़ी हो जाती, चेहरे पर झूठा मुखौटा लगा कर दुनियादारी की भीड़ में शामिल हो जाती.

लेकिन पति से अलग हो कर जीने वाली अकेली औरत को तो कांटों भरा ताज पहनाना समाज अपना धर्म समझता है. अपने अस्तित्व, स्वाभिमान और आत्मविश्वास की रक्षा करना यदि किसी नारी का गुनाह है तो बेशक समाज की दोषी थी वह…

नीलेश अब चौथी और यश दूसरी कक्षा में पढ़ रहा था. उस दिन पेरेंट्सटीचर्स  मीटिंग में जाना था मीता को. जाहिर है छुट्टी लेनी पड़ती. सागर दूसरे डिपार्टमेंट में उसी पद पर था. मीता ने जा कर उसे अपनी स्थिति बताई और न आने का कारण बता कर अपना डिपार्टमेंट संभालने की रिक्वेस्ट भी की. सागर ने मीता को आश्वासन दिया और मीता निश्चिंत हो कर मीटिंग में चली गई.

पिछले 3 साल से सागर इसी फैक्टरी में सुपरवाइजर था…अंतर्मुखी और गंभीर किस्म का व्यक्तित्व था सागर का… सब से अलग था, अपनेआप में सिमटा सा.

दूसरे दिन मीता सब से पहले सागर से मिली. पिछले दिन की रिपोर्ट जो लेनी थी और धन्यवाद भी देना था. पता चला, सागर आया जरूर है लेकिन कल से वायरल फीवर है उसे.

‘तो आप न आते कल… जब इतनी ज्यादा तबीयत खराब थी तो एप्लीकेशन भिजवा देते,’ मीता ने कहा.

‘तो आप की दी जिम्मेदारी का क्या होता?’

‘अरे, जान से बढ़ कर थी क्या यह जिम्मेदारी.’

‘हां, शायद मेरे लिए थी,’ जाने किस रौ में सागर के मुंह से निकल गया. फिर मुसकरा कर बात बदलते हुए बोला, ‘आप सुनाइए, कल पेरेंट्सटीचर्स मीटिंग में क्या हुआ?’ फिर सागर खुद ही नीलेश और यश की तारीफों के पुल बांधने लगा.

आश्चर्यचकित थी मीता. सागर को यह सब कैसे पता?

‘हैरान मत होइए, क्योंकि जब मां आइडियल होती है तो बच्चे जहीन ही होते हैं.’

फिर वह बीते दिन की रिपोर्ट देने लगा. थोड़ी देर बाद मीता अपने डिपार्ट- मेंट में चली गई. सारे दिन उस के भीतर एक अजीब सी हलचल होती रही थी. सागर का अप्रत्याशित व्यवहार उसे आंदोलित किए हुए था. 30-32 साल की उम्र होगी सागर की, लेकिन इस उम्र का सहज सामान्य व्यक्तित्व न था उस का. जो गंभीरता और सौम्यता 36-37 वर्ष में मीता को खुद में महसूस होती, वही कुछ सागर को देख कर महसूस होता था. उसे न जाने क्यों वह किसी भीतरी मंथन में उलझा सा लगता. वह किसी और की व्यक्तिगत जिंदगी में न दखल देना पसंद करती न ही इस में उस की रुचि थी. पर सागर की आज की बातों ने उसे अंदर से झकझोर दिया था.

रात बड़ी देर तक वह बेचैन रही. सागर सर के शब्द कानों में गूंजते रहे. सच तो यह है कि मीता सिर्फ शब्दों पर ही विश्वास नहीं करती, क्योंकि शब्द जाल तो किसी अर्थ विशेष से जुड़े होते हैं.

ट्रेन अपनी रफ्तार से चली जा रही थी. मीता सोच रही थी, ‘मेरे जैसा इनसान जिस ने खुद को समेटतेसमेटते अब किसी से एक इंच भी फासले के लायक न रखा वह किसी भावनात्मक संबंध के लिए सोचेगा तो सब से बड़ी सजा देगा खुद को. मेरी जिंदगी तो खुला पन्ना है जिस के हाशिए, कौमा, मात्राएं सबकुछ उजागर हैं. बस, नहीं है तो पूर्णविराम. होता भी कैसे? जब जिंदगी खुद ही कटापिटा वाक्य हो तो पूर्णविराम के लिए जगह ही कहां होगी?’

आज अचानक सागर सर की गहरी आंखों ने दर्द की हदों को हौले से छू दिया तो भरभरा कर सारे छाले फूट गए. मजाक करने के लिए किस्मत हर बार मुझी को क्यों चुनती है. सोचतेसोचते करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगी थी मीता.

दूसरे दिन सुबह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर रही थी कि कालबेल बज उठी. दरवाजा खोला तो सागर सर खड़े थे…

‘अरे, सागर सर, आप? भीतर आइए न?’

बीमार, परेशान सागर ने कहा, ‘माफ कीजिए, मीताजी, मैं आप को परेशान कर रहा हूं. मैं 3-4 दिन फैक्टरी न जा सकूंगा. प्लीज, यह एप्लीकेशन आफिस पहुंचा दीजिएगा.’

‘हांहां, ठीक है. पहुंचा दूंगी. आप अंदर तो आइए, सर.’

‘नहीं, बस ठीक है.’

शायद चक्कर आ रहे थे सागर को. लड़खड़ाते हुए दीवार से सिर टकरातेटकराते बचा. मीता ने उन्हें जबरदस्ती बिठाया और जल्दी से चायबिस्कुट टे्र में रख कर ले आई.

‘डाक्टर को दिखाया, सर, आप ने?’

‘नहीं. ठीक हो जाऊंगा एकाध दिन में.’

‘बिना दवा के कोई चमत्कार हो जाएगा?’

‘चमत्कार तो हो जाएगा… शायद…दवा के बिना ही हो.’

‘आप की फैमिली को भी तो चिंता होगी?’

‘मां और भाई गांव में हैं. भाई वहीं पास के मेडिकल कालिज में है.’

‘और यहां?’

‘यहां कोई नहीं है.’

‘आप की फैमिली…यानी वाइफ, बच्चे?’

‘जब कोई है ही नहीं तो कौन रहेगा,’ सागर का अकेलापन उस की आवाज पर भारी हो रहा था.

‘यहां आप कहां रहते हैं, सर?’

‘यहीं, आप के मकान की पिछली लाइन में.’

‘और मुझे पता ही नहीं अब तक?’

‘हां, आप बिजी जो रहती हैं.’

फिर आश्चर्यचकित थी मीता. सागर उस के रोजमर्रा के कामों की पूरी जानकारी रखता था.

चाय पी कर सागर जाने के लिए खड़ा हुआ. दरवाजे से बाहर निकल ही रहा था कि वापस पलट कर बोला, ‘एक रिक्वेस्ट है आप से.’

‘कहिए.’

‘प्लीज, बुरा मत मानिए… मुझे आप सर न कहिए. एक बार और रिक्वेस्ट करता हूं.’

‘अरे, इतने सालों की आदत बन गई है, सर.’

‘अचानक कभी कुछ नहीं होता. बस, धीरेधीरे ही तो सबकुछ बदलता है.’

जवाब सुने बिना ही वह वापस लौट गया. हाथ में ट्रे पकड़े मीता खड़ी की खड़ी रह गई. सागर की पहेलियां उस की समझ से परे थीं.

धीरेधीरे 4-5 दिन बीत गए. सागर का कोई पता, कोई खबर न थी. छुट्टियां खत्म हुए भी 2 दिन बीत चुके थे. मैनेजर ने मीता को बुलवा कर सागर की तबीयत पता करने की जिम्मेदारी सौंपी.

घर आने से पहले उस ने पीछे की रो में जा कर सागर का घर ढूंढ़ने की कोशिश की तो उसे ज्यादा परेशानी नहीं हुई.

बहुत देर तक बेल बजाती रही लेकिन दरवाजा न खुला. किसी आशंका से कांप उठी वह. दरवाजे को एक हलका सा धक्का दिया तो वह खुल गया. मीता भीतर गई तो सारे घर में अंधेरा ही अंधेरा था. टटोलते हुए वह स्विच तक पहुंची. लाइट आन की. रोशनी हुई तो भीतर के कमरे में बेसुध सागर को पड़े देखा.

3-4 आवाजें दीं उस ने, पर जवाब नदारद था, सागर को होश होता तब तो जवाब मिलता.

उलटे पैर दरवाजा भेड़ कर मीता अपने घर आ गई. सागर का पता बता कर नीलेश को सागर के पास बैठने भेजा और खाना बनाने में जुट गई. खिचड़ी और टमाटर का सूप टिफिन में डाल कर छोटे बेटे यश को साथ ले कर वह सागर के यहां पहुंची. इनसानियत के नाते तो फर्ज था मीता का. आम सामाजिक संबंध ऐसे ही निभाए जाते हैं.

घर पहुंच कर देखा, शाम को जो घर अंधेरे में डूबा, वीरान था अब वही नीलेश और सागर की आवाज से गुलजार था. मीता को देखते ही नीलेश उत्साहित हो कर बोला, ‘मम्मी, अंकल को तो बहुत तेज फीवर था. फ्रिज से आइस निकाल कर मैं ने ठंडी पट्टियां सिर पर रखीं, तब कहीं जा कर फीवर डाउन हुआ है.’

प्रशंसा भरी नजरों से उसे देख कर वह बोली, ‘मुझे पता था, बेटे कि तुम्हारे जाने से अंकल को अच्छा लगेगा.’

‘और अब मैं डाक्टर बन कर अंकल को दवा देता हूं,’ यश कहां पीछे रहने वाला था. मम्मी के बैग से क्रोसिन और काम्बीफ्लेम की स्ट्रिप वह पहले ही निकाल चुका था.

‘चलिए अंकल, खाना खाइए. फिर मैं दवा खिलाऊंगा आप को.’

यश का आग्रह न टाल सका सागर. आज पहली बार उसे अपना घर, घर महसूस हो रहा था… सच तो यह था कि आज पहली बार उसे भूख लगी थी. काश, हर हफ्ते वह यों ही बीमार होता रहे. घर ही नहीं उसे अपने भीतर भी कुछ भराभरा सा महसूस हो रहा था.

खाना खातेखाते मीता से उस की नजरें मिलीं तो आंखों में छिपी कृतज्ञता को पहचान लिया मीता ने. इन्हीं आंखों ने तो बहुत बेचैन किया है उसे. मीता की आंखों में क्या था सागर न पढ़ सका. शायद पत्थर की भावनाएं उजागर नहीं होतीं.

सागर धीरेधीरे ठीक होने लगा. नीलेश और यश का साथ और मीता की देखभाल से यह संभव हो सका था. उस की भीतरी दुनिया भी व्यवस्थित हो चली थी. अंतर्मुखी और गंभीर सागर अब मुसकराने लगा था. नीलेश और यश ने भी अब तक मां की सुरक्षा और छांव ही जानी थी. पापा के अस्तित्व को तो जाना ही न था उन्होंने. सागर ने उस रिश्ते से न सही लेकिन किसी बेनाम रिश्ते से जोड़ लिया था खुद को. और मीता? एक अनजान सी दीवार थी अब भी दोनों के बीच. फैक्टरी में वही औपचारिकताएं थीं. घर में नीलेश और यश ही सागर के इर्दगिर्द होते. मीता चुप रह कर भी सामान्य थी, लेकिन सागर को न जाने क्यों अपने करीब महसूस करती थी.

दिनोंदिन घर का सूनापन भरने लगा था. मीता ने इस बदलाव पर आशा दी को पत्र लिखा. तुरंत उन का जवाब आया, ‘शायद कुदरत अपनी गलती पर पछता रही हो…मीता, जो होगा, अच्छा होगा.’

सागर के रूप में उसे अपना एक हमदर्द मिला तो जीवन जीना सहज होने लगा, फिर भी हर वक्त एक आशंका और डर छाया रहता…सब कुछ वक्त के हवाले कर के आंखें मूंद ली थीं मीता ने.

‘‘आंटी, आप का पर्स नीचे गिरा है बहुत देर से,’’ आवाज से स्मृतियों की यात्रा में पड़ाव आ गया. सामने की सीट पर बैठी एक युवती मीता को जगा रही थी. उसे लगा मीता सो रही है. मीता ने पर्स उठाया और उसे थैंक्यू बोला.

कितनी अजीब होती हैं सफर की स्थितियां. या तो हम अतीत में होते हैं या भविष्य में. गाड़ी के  पहिए आगे बढ़ते और यादें पीछे लौटती हैं. पीछे छूटे लोगों की गंध और चेहरे साथ चलते महसूस होते हैं.

चलते वक्त आशा दी की आंखें रोरो कर लाल हो गई थीं. फिर किसी तरह स्वयं को संयत कर बोली थीं, ‘आज पहली बार लग रहा है मीता कि मैं अपनी बहन नहीं, बेटी को बिदा कर रही हूं. अब जब आएगी तो अपने परिवार के संग आएगी…तेरा सुख देखने को आंखें तरस गईं, मीता. सागर तो फरिश्ता बन कर आया है मेरे लिए वरना राजन ने तो…’

‘छोड़ो न आशा दी… मत याद करो वह सब. मत दिल दुखाओ.’ मीता रो उठी. दोनों बहनें एकदूसरे के गले लग कर बहुत देर तक रोती रहीं.

‘आशा दी, आप एक बार आ कर सागर से मिलो तो. अब कुछ पा कर भी खो देने का डर बारबार मन में समा जाता है. अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं रहा अब.’

‘पगली, जिंदगी में सच्ची चाहत सब को नसीब नहीं होती. चाहत की, चाहने वाले की कद्र करनी चाहिए. उम्र के फासले को भूल जा, क्योंकि  प्यार उम्र को नहीं दिल को जानता है…सच के सामने सिर झुका दे मेरी बहन…नीलेश और यश के लिए भी सागर से बेहतर और कोई नहीं हो सकता.’

सागर को डाक्टर के पास चेकअप के लिए ले जाना था. मीता फैक्टरी से सीधी सागर के घर चली आई. आज फिर घर में अंधेरा था…भीतर वाले कमरे में सागर सोफे पर लेटे थे. टेप रिकार्डर आन था :

‘तुझ बिन जोगन मेरी रातें,

तुझ बिन मेरे दिन बंजारे…’

अंधेरे में गूंजता अकेलापन मीता की बरदाश्त से बाहर था. लाइट आन की तो सागर की पलकों की कोरें गीली थीं. मीता को देखा तो उठ कर बैठ गए.

‘यह गाना क्यों सुन रहे हो?’

‘हमेशा यही तो सुनता रहा हूं.’

‘जो चीज रुलाए उसे दूर कर देना चाहिए कि उसे और गले लगा कर रोना चाहिए?’

‘लेकिन जो चीज आंसू के साथ शांति भी दे उस के लिए क्या करे कोई?’

‘क्या मतलब?’

‘अच्छा छोडि़ए, डाक्टर के यहां चलना है न? मैं तैयार होता हूं…’

‘नहीं, पहले बात पूरी कीजिए.’

‘पिछले 3 सालों से…’ सागर की गहरी आंखें मीता पर टिकी थीं.

‘आगे बोलिए.’

‘मुझे आप के आकर्षण ने बांध रखा है… मैं ने पागलों की तरह आप के बारे में सोचा है. आप के अतीत को जान कर, आप के संघर्ष, आप के जिंदगी जीने के अंदाज को मन ही मन सराहा है. पिछले 3 सालों का हर पल आप के पास आने की ख्वाहिश में बीता है…ये गीत मेरे दर्द का हिस्सा हैं…’

‘यह जानते हुए भी कि मैं उम्र में आप से बड़ी, 2 बच्चों की मां और एक शादीशुदा औरत हूं. मेरी शादी सफल नहीं हो पाई. मैं ने अकेले ही अपने बच्चों के भविष्य को संभाला है और किसी सहारे की दूरदूर तक गुंजाइश नहीं मेरे जीवन में. अपने बच्चों की नजरों में मैं अपना सम्मान नहीं खोना चाहती. हमारे बीच जो कुछ भी है, वह जो कुछ भी हो पर प्यार नहीं हो सकता.’

‘मैं ने कब कहा कि आप की चाहत चाहिए मुझे…प्यार का बदला प्यार ही हो यह जरूरी नहीं…यश, नीलेश और आप का साथ जो मुझे अपनी बीमारी के दौरान मिला, उस ने मेरा जीवन बदल दिया है. आप मेरे करीब, मेरे सामने हों. मैं जी लूंगा इसी सहारे से.’

‘मेरे साथ आप का कोई भविष्य नहीं. आप की जिंदगी में अच्छी से अच्छी लड़कियां आ सकती हैं. अपना घर बसाइए…मेरी जिंदगी जैसे चल रही है चलने दीजिए, सागर. ओह, सौरी.’

‘नहीं, सौरी नहीं. आप ने मेरा नाम लिया. इस के लिए शुक्रिया.’

फिर सागर तैयार होने भीतर चला गया और मीता वहीं सोफे पर बैठी कुछ सोचती रही.

सागर को सिविल इंजीनियर बनाना चाहते थे उस के डाक्टर पापा. असमय ही सिर से पिता का साया क्या उठा सागर रातोंरात बड़प्पन की चादर ओढ़ घर का बड़ा और जिम्मेदार सदस्य हो गया. 2-3 साल तक इंजीनियरिंग की डिगरी का इंतजार, फिर नौकरी की तलाश करना उस के लिए नामुमकिन था, इसलिए अपनी मंजिल को गुमनामी में धकेल कर सब से पहले फाइनल में पढ़ रही छोटी बहन सोनल के हाथ पीले किए उस ने…पापा के अधूरे कामों को पूरा करने का बीड़ा उठाया था सागर ने. सारी जमीनजायदाद का हिसाब कर के सारा पैसा बैंक में जमा कर रोहित का मेडिकल में एडमीशन करा कर वह यहां आ गया. मां को सारा उत्तरदायित्व सौंप कर वह निश्चिंत था. अपने लिए कुछ सोचना उस की फितरत में न था. बहन अपने घर में खुश थी राहुल का कैरियर बनना निश्चित था. मां को आर्थिक सुरक्षा दे वह अकेला हो कर जिंदगी जीने लगा.

बिल्डिंग, पुल और सड़क बनाने वाली आंखें यहां शर्ट बनते देखने लगी थीं. मशीनों के शोर में वह सबकुछ भूल जाना चाहता था. कपड़ों की कतरनों में उसे अपने ध्वस्त सपनों के अक्स नजर आते. किनारे पर आ कर जहाज डूबा था उस का… बड़ा जानलेवा दर्द होता है किनारे पर डूबने का…

फिर यहां मीता को देखा. उस की समझौते भरी जिंदगी का हश्र देखा तो ठगा सा रह गया वह. एक अकेली औरत का साहस देख कर कायल हो गया उस का मन. उस की प्रतिभा, शिक्षा और संस्कार का एहसास हर मिलने वाले को पहली नजर में ही हो जाता. दूसरों के मन को समझने वाली पारखी नजर मीता की विशेषता थी, न होती तो सागर के भीतर बसा खालीपन वह कैसे महसूस कर पाती भला?

मीता अपनी सीमा जानती थी. उस ने सबकुछ वक्त और हालात पर छोड़ दिया था. लेकिन मीता जानने लगी थी, सागर वह नहीं है जो नजर आता है, कई बार उस की गहरी आंखें कुछ सोचने पर विवश कर देतीं मीता को. मीता झटक देती जल्दी से अपना सिर…नहीं, उसे यह सब सोचने का हक नहीं. पर सिर झटकने से क्या सबकुछ छिटक जाता है. इनसान अकेलापन तो बरदाश्त कर लेता है लेकिन भीड़ के बीच अकेलापन बहुत भारी होता है.

पहले कम से कम उस का जीवन एक ढर्रे पर तो था. अपने बारे में उस ने सोचना ही बंद कर दिया था. लेकिन सागर का साथ पा कर कमजोर होने लगी थी वह. दूसरी ओर एक जिम्मेदार मां है वह…यह भी नहीं भूलती थी. अनिश्चय के झूले में झूल रही थी मीता. भावनाओं का चक्रवात उसे निगलने को आतुर था.

फैक्टरी की गोल्डन जुबली थी उस दिन. सुबह से ही कड़ाके की सर्दी थी. 6 बजने को थे. मीता जल्दीजल्दी तैयार हो कर फैक्टरी की ओर चल दी. घर से निकलते ही थोड़ी दूर पर सागर उसी ओर आता दिखाई दिया.

‘अरे आप तो तैयार भी हो गईं…मैं आप ही को देखने आ रहा था.’

‘तुम तैयार नहीं हुए?’

‘धोबी को प्रेस के लिए कपड़े दिए हैं. बस, ला कर तैयार होना बाकी है. चलिए, आप को स्पेशल कौफी पिलाता हूं, फिर हम चलते हैं.’

दोनों सागर के घर आ गए. मीता ने कहा, ‘मैं जब तक कौफी बनाती हूं, तुम कपड़े ले आओ.’’

बसंती रंग की साड़ी में मीता की सादगी भरी सुंदरता को एकटक देखता रह गया सागर.

‘एक बात कहूं आप से?’

मीता ने हामी भरते हुए गरदन हिलाई…

‘बड़ा बदकिस्मत रहा आप का पति जो आप के साथ न रह पाया. पर बड़ा खुशनसीब भी रहा जिस ने आप का प्यार भी पाया और फिर आप को भी.’

‘और तुम, सागर?’

‘मुझ से तो आप को मिलना ही था.’

एक ठंडी सांस ली मीता ने.

उस दिन सागर के घर पर ही इतनी देर हो गई कि उन्हें फैक्टरी के फंक्शन में जाने का प्रोग्राम टालना पड़ा था. उफ, यह मुलाकात कितने सारे सवाल छोड़ गई थी.

दूसरे दिन सागर जब मीता से मिला तो एक नई मीता उस के सामने थी…सागर को देखते ही अपने बदन के हर कोने पर सागर का स्पर्श महसूस होने लगा उसे. भीतर ही भीतर सिहर उठी वह. आंखें खोलने का मन नहीं हो रहा था उस का, क्योंकि बीती रात का अध्याय जो समाया था उस में. इतने करीब आ कर, इतने करीब से छू कर जो शांति और सुकून सागर से मिला था वह शब्दों से परे था…जिंदगी ने सूद सहित जो कुछ लौटाया वह अनमोल था मीता के लिए. सागर ने बांहें फैलाईं और मीता उन में जा समाई… दोनों ही मौन थे…लेकिन उन के भीतर कुछ भी मौन न था…जैसे रात की खामोशी में झील का सफर…कश्ती अपनी धीमीधीमी रफ्तार में है और चांदनी रात का नशा खुमारी में बदलता जाता है.

शाम का अंधेरा घिरने लगा था. जंगल, गांव, पेड़ और सड़क सब पीछे छूटते जा रहे थे. टे्रन अपनी गति में थी. अधिकांश यात्री बर्थ खोल कर सोने की तैयारी में थे. मीता ने भी बैग से कंबल निकाल कर उस की तहें खोलीं. एअर पिलो निकाल कर हवा भरी और आराम से लेट गई. अभी तो सारी रात का सफर है. सुबह 10 बजे के आसपास घर पहुंचेगी.

कंबल को कस कर लपेटे वह फिर पिछली बातों में खोई हुई थी. मन की अंधेरी सुरंग पर तो बरसों से ताला पड़ा था. पहले वह मानती थी कि यह जंग लगा ताला न कभी खुलेगा, न उसे कभी चाबी की जरूरत पड़ेगी. लेकिन ऐसा हुआ कि न सिर्फ ताला टूटा बल्कि बरसों बाद मन की अंधेरी सुरंग में ठंडी हवा का झोंका बन कर कोई आया और सबकुछ बदल गया.

सफर में एकएक पल मीता की आंखों से गुजर रहा था.

जिंदगी के पाताल में कहां क्या दबा है, क्या छुपा है, कब कौन उभर कर ऊपर आ जाएगा, कौन नीचे तल में जा कर खो जाएगा, पता नहीं. विश्वास नहीं होता इस अनहोनी पर, जो सपनों में भी हजारों किलोमीटर दूर था वह कभी इतना पास भी हो सकता है कि हम उसे छू सकें…और यदि न छू पाएं तो बेचैन हो जाएं. जिंदगी की अपनी गति है गाड़ी की तरह. कहीं रोशनी, कहीं अंधेरा, कहीं जंगल, कहीं खालीपन.

यहां आशा दी के पास आना था. होली भी आने वाली है. बच्चों के एग्जाम भी थे और इस बीच किराए का मकान भी शिफ्ट किया था. उसे सेट करना था. सागर 3-4 दिन से अस्पताल में दाखिल था.

पीलिया का अंदेशा था. वह सागर को भी संभाले हुए थी. एक ट्रिप सामान मेटाडोर में भेज कर दूसरी ट्रिप की तैयारी कर सामान पैक कर के रख दिया. सोचा, सामान लोड करवा कर अस्पताल जाएगी, सागर को देख कर खाना पहुंचा देगी फिर लौट कर सामान सेट होता रहेगा. लेकिन तभी सागर खुद वहां आ पहुंचा.

‘अरे, तुम यहां. मैं तो यहां से फ्री हो कर तुम्हारे ही पास आ रही थी. लेकिन तुम आए कैसे? क्या डिस्चार्ज हो गए?’

‘डिस्चार्ज नहीं हुआ पर जबरदस्ती आ गया हूं डिस्चार्ज हो कर.’

‘क्यों, जबरदस्ती क्यों?’

‘आप अकेली जो थीं. इतना सारा काम था और आप के साथ तो कोई नहीं है मदद के लिए…’

‘खानाबदोश जिंदगी ने आदी बना दिया है, सागर. ये काम तो जिंदगी भर के हैं, क्योंकि कोई भी मकान मालिक एक या डेढ़ साल से ज्यादा रहने ही नहीं देता है.’

‘नहीं, जिंदगी भर नहीं. अब आप को एक ही मकान में रहना होगा. बहुत हो गया यह बंजारा जीवन.’

‘हां, सोच तो रही हूं… फ्लैट बुक कर लूंगी, साल के भीतर कहीं न कहीं.’

सागर खाली मकान में चुपचाप दीवार से टिका हुआ था. मीता को उस ने अपने पास बुलाया. मीता उस के करीब जा खड़ी हुई.

सागर पर एक अजीब सा जुनून सवार था. उस ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि इस घर से आप यों न जाएं, क्योंकि इस से हमारी बहुत सी यादें जुड़ी हैं.’

‘तो कैसे जाऊं, तुम्हीं बता दो.’

‘ऐेसे,’ सागर ने अपना पीछे वाला हाथ आगे किया और हाथ में रखे सिंदूर से मीता की मांग भर दी.

अचानक इस स्थिति के लिए तैयार न थी मीता. सागर की भावनाएं वह जानती थी…सिंदूर की लालिमा उस के लिए कालिख साबित हुई थी और अब सागर…उफ. निढाल हो गई वह. सागर ने संभाल लिया उसे. मीता की थरथराती और भरी आंखें छलकना चाह रही थीं.

ट्रेन की रफ्तार कम होने लगी थी. अतीत और भविष्य का अनोखा संगम है यह सफर. सागर और राजन. एक भविष्य एक अतीत. कल सागर से मिलूंगी

तो पूछूंगी, क्यों न मिल गए थे 14 साल पहले. मिल जाते तो 14 सालों

का बनवास तो न मिलता. जिंदगी की बदरंग दीवारें अनारकली की तरह तो न चिनतीं मुझे.

मुसकरा उठी मीता. सागर से माफी मांग लूंगी दिल तोड़ कर जो आई थी उस का. सागर की याद आई तो उस की बोलती सी गहरी आंखें सामने आ गईं. 5 दिनों में 5 युगों का दर्द बसा होगा उन आंखों में.

ट्रेन रुकी तो चायकौफी वालों की रेलपेल शुरू हो गई. मीता ने चाय पी और फिर कंबल ओढ़ कर लेट गई इस सपने के साथ कि सुबह 10 बजे जब टे्रन प्लेटफार्म पर रुकेगी…तो सागर उस के सामने होगा. नीलेश और यश उसे सरप्राइज देने आसपास कहीं छिपे होंगे.

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. सुबह भी हुई, मीता की आंखें भी खुलीं, उस ने प्लेटफार्म पर कदम भी रखा, पर वहां न सागर, न नीलेश और न यश. थोड़ी देर उस ने इंतजार भी किया, लेकिन दूरदूर तक किसी का कोई पता न था. रोंआसी और निराश मीता ने अपना सामान उठाया और बाहर निकल कर आटो पकड़ा. क्या जिंदगी ने फिर मजाक के लिए चुन लिया है उसे?

पूरे शहर में होली का हुड़दंग था. इन रंगों का वह क्या करे जब इंद्रधनुष के सारे रंग न जाने कहां गुम हो गए थे.

बहुत भीड़ थी रास्ते में. घर के सामने आटो रुका तो घर पर ताला लगा था. वह परेशान हो गई. अचानक घर के ऊपर नजर गई तो वहां ‘टुलेट’ का बोर्ड लगा था. उसी आटो वाले को सागर के घर का पता बता कर वापस बैठी मीता. अनेक आशंकाओं से घिरा मन रोनेरोने को हो गया.

सागर के घर के आगे बड़ी चहलपहल थी. टैंट लगा था. सजावट, वह भी फूलों की झालर और लाइटिंग से…गार्डन के सारे पेड़ों पर बल्बों की झालरें

लगी थीं…

खाने और मिठाइयों की सुगंध चारों ओर बिखरी थी. आटो के रुकते ही लगभग दौड़ती बदहवास मीता भीतर की ओर दौड़ी. भीतर पहुंचने से पहले ही जड़ हो कर वह जहां थी वहीं खड़ी रह गई.

दरवाजे पर आरती का थाल लिए सागर की मां और सुहाग जोड़ा, मंगलसूत्र और लाल चूडि़यों से भरा थाल पकड़े सागर की छोटी बहन खड़ी थी. नीचे की सीढ़ी पर हाथ जोड़ कर स्वागत करता सागर का छोटा भाई मुसकरा रहा था.

मीता ने देखा झकाझक सफेद कुरतापाजामा पहने, लाल टीका लगाए सागर उसी सोफे पर बैठा यश को तैयार कर रहा था जहां उस शाम दोनों की जिंदगी ने रुख बदला था.

रोहित मस्ती में झूमता मीता की ओर आने लगा…

सागर ने मीता को देखते ही आवाज लगाई, ‘‘नीलेश बेटे.’’

‘‘जी, पापा.’’

‘‘जाओ, आटो से मम्मी का सामान उतारो और आटो वाले को पैसे भी दे दो.’’

‘‘जी, पापा.’’

नीलेश बाहर आने लगा तो सागर ने फिर आवाज दी, ‘‘और सुनो, आटो वाले को मिठाई जरूर देना…’’

‘‘जी, पापा.’’

मीता बुत बनी सागर को एकटक देख रही थी. सागर की गहरी आंखें कह रही थीं…इंजीनियर जरूर आधा हूं लेकिन घर पूरा बनाना जानता हूं. है न? अब आओ न मीता…

Hindi Romantic Story :

Hindi Social Story : आंखें – ट्रायल रूम में ड्रैस बदलती श्वेता की तसवीरें क्या हो गईं वायरल ?

Hindi Social Story :

‘‘इस अलबम में ऐसा क्या है कि तुम इसे अपने पास रखे रहते हो?’’ विनोद ने अपने साथी सुरेश के हाथ में पोर्नोग्राफी का अलबम देख कर कहा.

‘‘टाइम पास करने और आंखें सेंकने के लिए क्या यह बुरा है?’’

‘‘बारबार एक ही चेहरा और शरीर देख कर कब तक दिल भरता है?’’

‘‘तब क्या करें? किसी गांव में नदी किनारे जा कर नहा रही महिलाओं का लाइव शो देखें?’’ सुरेश ने कहा.

‘‘लाइव शो…’’ कह कर विनोद खामोश हो गया.

‘‘क्या हुआ? क्या कोई अम्मां याद आ गई?’’

‘‘नहीं, अम्मां तो नहीं याद आई. मैं सोच यह रहा हूं कि यहां दर्जनों लेडीज रोज आती हैं. क्या लाइव शो यहां नहीं हो सकता?’’

‘‘अरे यहां लेडीज कपड़े खरीदने आती हैं या लाइव शो करने?’’

दोपहर का वक्त था. इस बड़े शोरूम का स्टाफ खाना खाने गया हुआ था. विनोद और सुरेश इस बड़े शो रूम में सेल्समैन थे. इन की सोचसमझ बिगड़े युवाओं जैसी थी. खाली समय में आपस में भद्दे मजाक करना, अश्लील किताबें पढ़ना और ब्लू फिल्में व पोर्नोग्राफी का अलबम रखना इन के शौक थे.

लाइव शो शब्द सुरेश के दिमाग में घूम रहा था. रात को शोरूम बंद होने के बाद वह अपने दोस्त सिकंदर, जो तसवीरों और शीशों की फिटिंग की दुकान चलाता था, के पास पहुंचा.

ड्रिंक का दौर शुरू हुआ. फिर सुरेश में उस से कहा, ‘‘सिकंदर, कई कारों में काले शीशे होते हैं, जिन के एक तरफ से ही दिखता है. क्या कोई ऐसा मिरर भी होता है जिस में दोनों तरफ से दिखता हो?’’

‘‘हां, होता है. उसे टू वे मिरर कहते हैं. क्या बात है?’’

‘‘मैं फोटो का अलबम देखतेदेखते बोर हो गया हूं. अब लाइव शो देखने का इरादा है.’’

सुरेश की बात सुन कर सिकंदर हंस पड़ा. अगले 2 दिनों के बाद सिकंदर शोरूम के ट्रायल रूम में लगे मिरर का माप ले आया. फिर 2 दिन बाद जब मैनेजर और अन्य स्टाफ खाना खाने गया हुआ था, वह साधारण मिरर हटा कर टू वे मिरर फिट कर आया. एक प्लाईवुड से ढक कर टू वे मिरर की सचाई भी छिपा दी.

फिर यह सिलसिला चल पड़ा कि जब भी कोई खूबसूरत युवती ड्रैस ट्रायल या चेंज करने के लिए आती, विनोद या सुरेश चुपचाप ट्रायल रूम के साथ लगे स्टोर रूम में चले जाते और प्लाईवुड हटा न्यूड बौडी का नजारा करते.

‘‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस लाइव शो को कैमरे में भी कैद कर लिया जाए?’’ विनोद के इस सवाल पर सुरेश मुसकराया.

अगले दिन उस के एक फोटोग्राफर मित्र ने एक कैमरा स्टोररूम में फिट कर दिया. अब विनोद और सुरेश कभी लाइव शो देखते तो कभी फोटो भी खींच लेते.

काफी दिन यह सिलसिला चलता रहा. गंदे दिमाग में घटिया विचार पनपते ही हैं, इसलिए विनोद और सुरेश यह सोचने लगे कि जिन की फोटो खींचते हैं उन को ब्लैकमेल कर पैसा भी कमाया जा सकता है.

उन के द्वारा बहुत से लोगों के फोटो खींचे गए थे, जिन में से एक श्वेता भी थी. श्वेता एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम करती थी. उस के पति प्रशांत भी एक बड़ी कंपनी में मैनेजर थे, इसलिए घर में रुपएपैसे की आमद खूब थी. श्वेता द्वारा फैशन परिधान अकसर खरीदे जाते थे और कुछ दिन इस्तेमाल होने के बाद रिटायर कर दिए जाते थे. कौन सा परिधान कब खरीदा और उसे कितना पहना था श्वेता को कभी याद नहीं रहता था.

आज वह जल्दी घर आ गई थी. अभी बैठी ही थी कि कालबैल बजी. दरवाजा खोला तो देखा सामने कूरियर कंपनी का डिलिवर बौय था. श्वेता ने यंत्रचालित ढंग से साइन किया तो वह लड़का एक लिफाफा दे कर चला गया. श्वेता ने लिफाफा खोला तो

अंदर पोस्टकार्ड साइज के 2 फोटो थे. उन्हें देखते ही वह जड़ हो गई.

एक फोटोग्राफ में वह कपड़े उतार कर खड़ी थी, तो दूसरे में झुकती हुई एक परिधान पहन रही थी. फोटो काफी नजदीक से खींचे गए थे. लेकिन कब खींचे थे, किस ने खींचे थे पता नहीं चल रहा था.

चेहरा तो उसी का था यह तो स्पष्ट था, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं था कि किसी दूसरी युवती के शरीर पर उस का चेहरा चिपका दिया गया हो?

तभी कालबैल बजी. उस ने फुरती से लिफाफे में फोटो डाल कर इधरउधर देखा. कहां छिपाए यह लिफाफा वह सोच ही रही थी कि उसे अपना ब्रीफकेस याद आया. लिफाफा उस में डाल उस ने उसे सोफे के पीछे डाल दिया.

फिर की होल से देखा तो बाहर उस के पति प्रशांत खड़े मंदमंद मुसकरा रहे थे. दरवाजा खुलते ही अंदर आए और दरवाजा बंद कर के पत्नी को बांहों में भर लिया.

‘‘श्वेता डार्लिंग, क्या बात है, सो रही थीं क्या?’’

श्वेता बेहद मिलनसार और खुले स्वभाव की थी. पति से बहुत प्यार करती थी और प्यार का भरपूर प्रतिकार देती थी. मगर आज खामोश थी.

‘‘क्या बात है, तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘जरा सिर भारी है. आप आज इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘कंपनी के टूर पर गया था. काम जल्दी निबट गया इसलिए सीधा घर आ गया. चाय पियोगी? तुम आराम करो मैं किचन संभाल लूंगा.’’

प्रशांत किचन में चला गया. तभी श्वेता का मोबाइल बज उठा. एक अनजान नंबर स्क्रीन पर उभरा. क्या पता उसी फोटो भेजने वाले का नंबर हो सोचते हुए श्वेता ने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया.

तभी प्रशांत ट्रे में चाय और टोस्ट ले आए.

‘‘श्वेता यह सिर दर्द की गोली ले लो और टोस्ट खा लो. चाय भी पी लो. आज किचन का जिम्मा मेरा.’’

ट्रे थमा प्रशांत किचन में चले गए. इतने प्यारे पति को बताऊं या न बताऊं यह सोचते हुए श्वेता ने सिरदर्द की गोली बैड के नीचे डाल दी और टोस्ट चाय में भिगो कर खा लिया. फिर चाय पी और लेट गई. समस्या का क्या समाधान हो सकता है? यह सोचतेसोचते कब आंख लग गई पता ही नहीं चला. आंखें खुली तो देखा पास ही लेटे प्रशांत पुस्तक में डूबे थे.

‘‘कैसी तबीयत है?’’ प्यार से माथे पर हाथ फिराते हुए प्रशांत ने पूछा.

‘‘आई एम फाइन,’’ मुसकराते हुए श्वेता ने कहा.

‘‘खाना तैयार है.’’

‘‘अच्छा, क्याक्या बनाया है?’’

‘‘जो हमारी होममिनिस्टर को पसंद है.’’

हंसती हुई वह किचन में गई. कैसरोल में उस के पसंदीदा पनीर के परांठे थे और चिकनकरी और मिक्स्ड सब्जी थी. सलाद भी कटा हुआ प्लेट में लगा था.

प्रशांत नए जमाने के उन पतियों जैसे थे, जो पत्नी पर रोब न जमा हर काम में हाथ बंटाते हैं. श्वेता का तनाव काफी कम हो चला था.

अगले दिन सुबह वह किचन में थी कि प्रशांत तैयार हो कर आ गए.

‘‘श्वेता डार्लिंग, मुझे कंपनी के काम से हैदराबाद जाना है. 1 घंटे बाद की फ्लाइट है. शाम को थोड़ा लेट आऊंगा,’’ कहते हुए प्रशांत बाहर निकल गए.

उन के जाने के बाद उसे मोबाइल फोन का ध्यान आया. वह लपक कर बैडरूम में गई और मोबाइल का स्विच औन किया. चंद क्षणों के बाद कल शाम वाला नंबर फिर स्क्रीन पर उभरा. सुनूं या न सुनूं सोचते हुए उस ने मोबाइल को बजने दिया. थोड़ी देर बाद तो उस ने फोटो निकाल कर देखे पर ड्रैस कौन सी थी स्पष्ट नहीं था. कैबिन भी जानापहचाना नहीं था. ऐसी कैबिन लगभग हर शोरूम में होती है. यह ड्रैस कौन सी है यह समझ में आता तो पता चल जाता कि यह कब और कहां से खरीदी थी. तभी मोबाइल की घंटी फिर से बजी. वही नंबर फिर उभरा. उस ने इस बार मोबाइल औन कर मोबाइल कान से लगा लिया मगर बोली कुछ नहीं.

‘‘हैलो, हैलो,’’ दूसरी तरफ से कोई बोला लेकिन वह खामोश रही.

‘‘जानबूझ कर नहीं बोल रही,’’ किसी ने किसी दूसरे से कहा.

‘‘हम से चालाकी महंगी पड़ेगी. हम ये फोटो इंटरनैट पर जारी कर देंगे,’’ उन में से कोई एक बोला.

श्वेता ने औफ का बटन दबा दिया. थोड़ी देर बाद फिर मोबाइल की घंटी बजी. इस बार स्क्रीन पर वही बात मैसेज के रूप में उभरी, जो फोन पर बोली गई थी. उस ने फिर औफ का बटन दबा दिया. उस के बाद मोबाइल की घंटी कई बार बजी लेकिन उस ने ध्यान नहीं दिया. अब क्या करें? आज काम पर जाएं? मगर काम कैसे हो सकेगा? सोचते हुए उस ने थोड़ी देर बाद कंपनी में फोन कर दिया.

फिर उस ने फोटो के लिफाफे को गौर से देखा, तो जाना कि फोटो मलाड के एक फोटो स्टूडियो में बने थे. स्टूडियो के पते के नीचे 2 फोन नंबर भी थे. अपने मोबाइल से उस ने दोनों नंबर पर फोन किया मगर दोनों के स्विच औफ थे. अब यह देखना था कि मलाड वाला पता भी असली है या नहीं. उस के लिए मलाड जाना पड़ेगा, उस ने सोचा. उस ने फोटो फिर ध्यान से देखे. ड्रैस कौन सी है यही पता चल जाए तब याद आ जाएगा कि ड्रैस कहां से खरीदी थी. फोटो के इनलार्ज प्रिंट द्वारा शायद पता लग सके कि ड्रैस कौन सी है.

उस के घर में नई तकनीक का डिजिटल कैमरा था. उस ने उस से हाथ में पकड़ी ड्रैस का नजदीक से एक फोटो खींचा. अब इस का बड़ा प्रिंट निकलवाना था.

वह कार से मलाड के लिए चल दी. अभी तक उस ने कई थ्रिलर और जासूसी नौवल पढ़े थे. जासूरी फिल्में और सीरियल भी देखे थे. मगर आज एक जासूस बन कर अश्लील फोटो खींचने वाले का पता लगाना था.

पौन घंटे बाद वह मलाड में थी. जैसी उस को उम्मीद थी, लिफाफे पर लिखे पते वाला फोटो स्टूडियो कहीं नहीं था. कूरियर सर्विस से पता करना बेकार था. हजारों लिफाफे रोजाना बुक करने वाले को कहां याद होगा कि यह लिफाफा कौन बुक करवा गया था.

अब क्या करें? सोचती हुई वह वापस अपनी कालोनी में पहुंची और एक परिचित फोटोग्राफर की दुकान में जा कर फोटो का डिजिटल प्रिंट निकालने के लिए कहा.

जब प्रिंट तैयार हो रहा था वह दुकान के सोफे पर बैठ कर दुकान में रखी फ्रेमों में जड़ी तसवीरें देख रही थी. तभी मोबाइल फिर बजा. वही नंबर था. सुनूं या न सुनूं सोचते हुए उस ने रिसीविंग बटन पुश किया तो ‘‘हैलो… हैलो,’’ दूसरी तरफ से आवाज आई पर वह खामोश रही.

‘‘वह चालाकी कर रही है. हम इस के फोटो इंटरनैट पर जारी कर देते हैं और

इस के औफिस में भेज देते हैं, तब इस को पता चलेगा.’’

श्वेता ने आवाजें सुन कर पहचान लिया कि कल वाले ही थे. उस ने फोन काट दिया और सोचने लगी कि इन के पास उस का मोबाइल नंबर तो है ही, यह भी जानते हैं कि कौन है और कहां काम करती है. इस का मतलब यही था कि वे या तो कोई परिचित हैं या किसी ने उस के पीछे लग उस का पता लगाया होगा और बाद में उस को फोटो भेज ब्लैकमेलिंग का इरादा बनाया होगा.

फोटोग्राफर फोटो का बड़ा प्रिंट निकाल कर लाया तो वह पेमैंट कर प्रिंट ले कर घर चली आई. घर आ कर आंखों पर जोर डाल कर उस ने फोटो देखा तो उसे समझ में आया कि वह फोटो मोंटे कार्लो के स्कर्ट टौप का था. उस की आंखों ने उन्हें पहचान लिया था. फिर वह याद करने लगी कि इन की शौपिंग कहां से की थी. दिमाग पर जोर देतेदेते उसे याद आ ही गया कि बड़ा नाम है उस शोरूम का. हां शायद पारसनाथ है, जो जुहू के पास है. फिर उसे सब याद आ गया.

अब उस शोरूम में जा कर उस के फोटो वगैरह भेजने का काम करने वालों का पता लगाना था. कैसे जाए? अकेली? मगर साथी हो भी तो कौन? कोई भी सहेली आजकल खाली नहीं थी. रिश्तेदार? न बाबा न.

उस ने यही निश्चय किया कि अकेली ही जाएगी. कैसे जाए, इसी तरह? इस से तो अपराधी सावधान हो जाएंगे, तो क्या भेस बदल कर जाए? लेकिन क्या भेस बदले? तभी उसे प्यास लगी. पानी पीते रिमोट दबा उस ने टीवी औन कर दिया. वही घिसापिटा सासबहू का रोनेधोने वाला सीरियल आ रहा था. उस के मन में विचार आया कि अगर वह प्रौढ उम्र की सास के समान बन जाए तो…

वह घाटकोपर पहुंची. वहां सिनेमा व टीवी कलाकारों को ड्रैस, कौस्टयूम्स आदि किराए पर देने वाली कई दुकानें थीं. उस ने एक दुकान से सफेद विग, पुराने जमाने की साड़ी और एक प्लेन शीशे वाला चश्मा लिया और पहना. इस से वह संभ्रांत परिवार की प्रौढ स्त्री लगने लगी. वह जब बाहर निकली और कार के शीशे में अपना रूप देखा तो मुसकरा पड़ी. वहां से जुहू पहुंच उस ने कार एक पार्किंग में खड़ी की और उसी शोरूम में पहुंची. शोरूम 4 मंजिला था और दर्जनों कर्मचारी थे. अब पता नहीं किस की हरकत थी. तभी उसे याद आया कि स्कर्ट टौप सैकंड फ्लोर से खरीदा था. वह सैकंड फ्लोर पर पहुंची. वहां सब कुछ जानापहचाना था. सेल्स काउंटर खाली था. 2 लड़के एक तरफ खड़े गपशप मार रहे थे.

‘‘यस मैडम,’’ उस के पास आते ही विनोद बोला. श्वेता ने उस की आवाज को पहचान लिया. यही मोबाइल फोन पर बोलने वाला था.

‘‘मुझे भारी कपड़े का लेडीज सूट चाहिए. सर्दी में हवा से सर्दी लगती है.’’

सुरेश और विनोद मोटे कपड़े से बने कई सूट उठा लाए. एक सूट उठा उस ने पूछा, ‘‘यहां ट्रायल रूम कहां है?’’

सुरेश ने एक तरफ इशारा किया तो पहले से देखे ट्रायल रूम की तरफ वह बढ़ गई. फिर कैबिन बंद कर नजर डाली कि यहां कैमरा कहां हो सकता था. शायद टू वे मिरर के उस पार हो. स्थान और अपराधियों का पता तो चल गया था. अब इन को रंगे हाथ पकड़ना था. फिर वह बिना कुछ ट्राई किए वह बाहर निकल आई.

‘‘सौरी, फिट नहीं आया.’’

‘‘और देखिए.’’

‘‘नहीं अभी टाइम नहीं है,’’ यह कह कर वह सूट काउंटर पर रख कर सधे कदमों से बाहर चली आई. घाटकोपर जा कर सब सामान वहां वापस किया फिर घर चली आई.

शाम को प्रशांत वापस आया.

‘‘तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक है, आज मैं ने रैस्ट के लिए छुट्टी ले ली थी.’’

अगले दिन वह औफिस गई. वहां सारा दिन काम में लगी रहने पर भी सोचती रही कि अपराधियों को कैसे पकड़े. पतिदेव को साथ ले? अगर अपराधी पकड़े जाते हैं तब क्या होगा? उन से कैसे निबटेगी? पुलिस तब भी बुलानी पड़ेगी. तब क्या अभी से पुलिस से मिल कर कोई कारगर योजना बनाए?

वह शाम तक उधेड़बुन रही. फिर शाम को कार में बैठतेबैठते इरादा बना लिया. उस के 100 नंबर पर रिंग करने पर तुरंत उत्तर मिला.

एक लेडी बोली, ‘‘फरमाइए क्या प्रौब्लम है?’’

‘‘एक ऐसी प्रौब्लम है जिसे फोन पर नहीं बता सकती.’’

‘‘तब आप पुलिस हैडक्वार्टर आ जाइए. वहां पहुंच कर आप मिस शुभ्रा सिन्हा, स्पैशल स्क्वैड पूछ लीजिएगा.’’

श्वेता कभी पुलिस हैडक्वार्टर नहीं आई थी. मगर कभी न कभी पहल तो होनी ही थी. वह पुलिस हैडक्वार्टर पहुंची. फिर कार पार्क कर रिसैप्शन काउंटर पर पहुंची.

स्पैशल स्क्वैड चौथी मंजिल पर था. श्वेता वहां पहुंची तो देखा कि शुभ्रा सिन्हा 2 सितारे लगी चुस्त शर्ट और पैंट पहने बैठी थीं. वह लगभग श्वेता की ही उम्र की थी. दरवाजा बंद कर उस ने गंभीरता से सारा मामला समझा. फिर प्रशंसात्मक नजरों से उस की

तरफ देखते हुए कहा, ‘‘कमाल है, आप ने मात्र 24 घंटे में पता लगा लिया कि बदमाश कौन हैं. अब आगे क्या स्ट्रैटेजी सोची है आप ने?’’

‘‘मैं वहां नया रूप धारण कर ड्रैस ट्रायल करूंगी. तब पुलिस धावा बोले और उन को रैड हैंडेड पकड़ ले.’’

‘‘ठीक है.’’

फिर कौफी पीतेपीते दोनों सहेलियों के समान योजना पर विचार करने लगीं. कौफी पी कर श्वेता वापस चली आई. अगले दिन सिविल ड्रैस में साधारण स्त्री की वेशभूषा में अन्य लेडी पुलिसकर्मियों के साथ ग्राहक बन शुभ्रा सिन्हा शोरूम देख आईं. 3 दिन बाद श्वेता एक ब्यूटीपार्लर पहुंची. वहां नए किस्म का हेयरस्टाइल बनवा, चमकती कीमती शरारा ड्रैस पहने वह शोरूम में पहुंच गई.

‘‘नया विंटर कलैक्शन देखना है.’’

‘‘जरूर देखिए मैडम,’’ कह कर सुरेश ने तरहतरह के परिधान काउंटर पर फैला दिए. तभी शुभ्रा सिन्हा भी काउंटर पर आ कर फैले नए आए परिधान देखने लगीं.

एक शरारा और चोली को उठाते श्वेता ने कहा, ‘‘इस का ट्रायल लेना है. ट्रायल रूम किधर है?’’

सुरेश ने कैबिन की तरफ इशारा किया और विनोद की तरफ देखा. उस का आशय समझ विनोद काउंटर से निकल पिछवाड़े चला गया. कैबिन का दरवाजा बंद कर श्वेता ने ट्रायल के लिए लाया परिधान एक हैंगर पर टांग मिरर की तरफ देखा. फिर नीचे झुक कर अपने सैंडल उतारने लगी. सैंडल उतार एक तरफ किए. फिर अपनी चोली के बटन खोलने का उपक्रम किया.

स्टोर रूम में छिपे नजारा कर रहे विनोद ने मुसकरा कर कैमरे का फोकस सामने कर क्लिक के बटन पर हाथ रखा. तभी श्वेता ने हाथ पीछे कर नीचे झुकाया और एक सैंडल उठा कर उस से तगड़ा वार शीशे पर किया.

तड़ाक की आवाज के साथ शीशे के परखच्चे उड़ गए. सकपकाया सा सामने दिखता विनोद पीछे को हुआ तभी शुभ्रा सिन्हा ने कैबिन का दरवाजा खोल हाथ में रिवौल्वर लिए कैबिन में कदम रखा और रिवौल्वर विनोद की तरफ करते रोबीली आवाज में कहा, ‘‘हैंड्सअप.’’

फिर चंद क्षणों में सारे शोरूम में खाकी वरदी में दर्जनों पुलिसकर्मी, जिन में लेडीजजैंट्स दोनों थे फैल गए. कैमरे के साथ विनोद फिर सुरेश और फिर सिलसिलेवार ढंग से सिकंदर व फोटोग्राफर सब पकड़े गए. दर्जनों न्यूड फिल्में भी मिलीं. सब को केस दर्ज कर जेल भेज दिया गया. मामले को पुलिस ने इस तरह हैंडल किया कि श्वेता और किसी अन्य स्त्री का नाम सामने नहीं आया. प्रशांत अपनी पत्नी द्वारा इस तरह की विशेष समस्या को अकेले सुलझा लेने से हैरान थे. प्यार से उन्होंने कहा, ‘‘माई डियर, आप तो होममिनिस्टर के साथ शारलाक होम्ज भी हैं.’’ श्वेता मंदमंद मुसकरा रही थी. Hindi Social Story :

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