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किसना

झारखंड का एक बड़ा आदिवासी इलाका है अमानीपुर. जिले के नए कलक्टर ने ऐसे सभी मुलाजिमों की लिस्ट बनाई, जो आदिवासी लड़कियां रखे हुए थे. उन सब को मजबूर कर दिया गया कि वे उन से शादी करें और फिर एक बड़े शादी समारोह में उन सब का सामूहिक विवाह करा दिया गया. दरअसल, आदिवासी बहुल इलाकों के इन छोटेछोटे गांवों में यह रिवाज था कि वहां पर कोई भी सरकारी मुलाजिम जाता, तो किसी भी आदिवासी घर से एक लड़की उस की सेवा में लगा दी जाती. वह उस के घर के सारे काम करती और बदले में उसे खानाकपड़ा मिल जाता. बहुत से लोग तो उन में अपनी बेटी या बहन देखते, मगर उन्हीं में से कुछ अपने परिवार से दूर होने के चलते उन लड़कियों का हर तरह से शोषण भी करते थे.

वे आदिवासी लड़कियां मन और तन से उन की सेवा के लिए तैयार रहती थीं, क्योंकि वहां पर ज्यादातर कुंआरे ही रहते थे, जो इन्हें मौजमस्ती का सामान समझते और वापस आ कर शादी कर नई जिंदगी शुरू कर लेते. मगर शायद आधुनिक सोच को उन पर रहम आ गया था, तभी कलक्टर को वहां भेज दिया था. उन सब की जिंदगी मानो संवर गई थी. मगर यह सब इतना आसान नहीं था. मुखिया और कलक्टर का दबदबा होने के चलते कुछ लोग मान गए, पर कुछ लोग इस के विरोध में भी थे. आखिरकार कुछ लोग शादी के बंधन में बंध गए और लड़कियां दासी जीवन से मुक्त हो कर पत्नी का जीवन जीने लगीं. मगर 3 साल बाद जब कलक्टर का ट्रांसफर हो गया, तब शुरू हुआ उन लड़कियों की बदहाली का सिलसिला. उन सारे मुलाजिमों ने उन्हें फिर से छोड़ दिया और  शहर जा कर अपनी जाति की लड़कियों से शादी कर ली और वापस उसी गांव में आ कर शान से रहने लगे.

तथाकथित रूप से छोड़ी गई लड़कियों को उन के समाज में भी जगह नहीं मिली और लोगों ने उन्हें अपनाने से मना कर दिया. ऐसी छोड़ी गई लड़कियों से एक महल्ला ही बस गया, जिस का नाम था ‘किस बिन पारा’ यानी आवारा औरतों का महल्ला. उसी महल्ले में एक ऐसी भी लड़की थी, जिस का नाम था किसना और उस से शादी करने वाला शहरी बाबू कोई मजबूर मुलाजिम न था. उस ने किसना से प्रेम विवाह किया था और उस की 3 साल की एक बेटी भी थी. पर समय के साथ वह भी उस से ऊब गया, तो वहां से ट्रांसफर करा कर चला गया. किसना को हमेशा लगता था कि उस की बेटी को आगे चल कर ऐसा काम न करना पड़े. वह कोशिश करती कि उसे इस माहौल से दूर रखा जाए.

लिहाजा, उस को किसना ने दूसरी जगह भेज दिया और खुद वहीं रुक गई, क्योंकि वहां रुकना उस की मजबूरी थी. आखिर बेटी को पढ़ाने के लिए पैसा जो चाहिए था. बदलाव बस इतना ही था कि पहले वह इन लोगों से कपड़ा और खाना लेती थी, पर अब पैसा लेने लगी थी. उस में से भी आधा पैसा उस गांव की मुखियाइन ले लेती थी. उस दिन मुखियाइन किसना को नई जगह ले जा रही थी, खूब सजा कर. वह मुखियाइन को काकी बोलती थी. वे दोनों बड़े से बंगले में दाखिल हुईं. ऐशोआराम से भरे उस घर को किसना आंखें फाड़ कर देखे जा रही थी.

तभी किसना ने देखा कि एक तगड़ा 50 साला आदमी वहां बैठा था, जिसे सब सरकार कहते थे. उस आदमी के सामने सभी सिर झुका कर नमस्ते कर रहे थे. उस आदमी ने किसना को ऊपर से नीचे तक घूरा और फिर रूमाल से मोंगरे का गजरा निकाल कर उस के गले में डाल दिया. वह चुपचाप खड़ी थी. सरकार ने उस की आंखों में एक अजीब सा भाव देखा, फिर मुखियाइन को देख कर ‘हां’ में गरदन हिला दी. तभी एक बूढ़ा आदमी अंदर से आया और किसना से बोला, ‘‘चलो, हम तुम्हारा कमरा दिखा दें.’’

किसना चुपचाप उस के पीछे चल दी. बाहर बड़ा सा बगीचा था, जिस के बीचोंबीच हवेली थी और किनारे पर छोटे, पर नए कमरे बने थे. वह बूढ़ा नौकर किसना को उन्हीं बने कमरों में से एक में ले गया और बोला, ‘‘यहां तुम आराम से रहो. सरकार बहुत ही भले आदमी हैं. तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है…’’ किसना ने अपनी पोटली वहीं बिछे पलंग पर रख दी और कमरे का मुआयना करने लगी. दूसरे दिन सरकार खुद ही उसे बुलाने कमरे तक आए और सारा काम समझाने लगे. रात के 10 बजे से सुबह के 6 बजे तक उन की सेवा में रहना था. किसना ने भी जमाने भर की ठोकरें खाई थीं. वह तुरंत समझ गई कि यह बूढ़ा क्या चाहता है. उसे भी ऐसी सारी बातों की आदत हो गई थी.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘हम अपना काम बहुत अच्छी तरह से जानते हैं सरकार, आप को शिकायत का मौका नहीं देंगे.’’

कुछ ही दिनों में किसना सरकार के रंग में रंग गई. उन के लिए खाना बनाती, कपड़े धोती, घर की साफसफाई करती और उन्हें कभी देर हो जाती, तो उन का इंतजार भी करती. सरकार भी उस पर बुरी तरह फिदा थे. वे दोनों हाथों से उस पर पैसा लुटाते. एक रात सरकार उसे प्यार कर रहे थे, पर किसना उदास थी. उन्होंने उदासी की वजह पूछी और मदद करने की बात कही.

‘‘नहीं सरकार, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ किसना बोली.

‘‘देख, अगर तू बताएगी नहीं, तो मैं मदद कैसे करूंगा,’’ सरकार उसे प्यार से गले लगा कर बोले.

किसना को उन की बांहें किसी फांसी के फंदे से कम न लगीं. एक बार तो जी में आया कि धक्का दे कर बाहर चली जाए, पर वह वहां से हमेशा के लिए जाना  चाहती थी. उसे अच्छी तरह मालूम था कि यह बूढ़ा उस पर जान छिड़कता है. सो, उस ने अपना आखिरी दांव खेला, ‘‘सरकार, मेरी बेटी बहुत बीमार है. इलाज के लिए काफी पैसों की जरूरत है. मैं पैसा कहां से लाऊं? आज फिर मेरी मां का फोन आया है.’’

‘‘कितने पैसे चाहिए?’’

‘‘नहीं सरकार, मुझे आप से पैसे नहीं चाहिए… मुखियाइन मुझे मार देगी. मैं पैसे नहीं ले सकती.’’

सरकार ने उस का चेहरा अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मुखियाइन को कौन बताएगा? मैं तो नहीं बताऊंगा.’’

‘‘एक लाख रुपए चाहिए.’’

‘‘एक… लाख…’’ बड़ी तेज आवाज में सरकार बोले और उसे दूर झटक दिया. किसना घबरा कर रोने लगी. ‘‘अरे… तुम चुप हो जाओ,’’ और सरकार ने अलमारी से एक लाख रुपए निकाल कर उस के हाथ पर रख दिए, फिर उस की कीमत वसूलने में लग गए. बेचारी किसना उस सारी रात क्याक्या सोचती रही और पूरी रात खुली आंखों में काट दी. शाम को जब सरकार ने किसना को बुलाने भेजा था, तो वह कमरे पर नहीं मिली. चिडि़या पिंजरे से उड़ चुकी थी. आखिरी बार उसे माली काका ने देखा था. सरकार ने भी अपने तरीके से ढूंढ़ने की कोशिश की, पर वह नहीं मिली. उधर किसना पैसा ले कर कुछ दिनों तक अपनी सहेली पारो के घर रही और कुछ समय बाद अपने गांव चली गई.

किसना की सहेली पारो बोली, ‘‘किसना, अब तू वापस मत आना. काश, मैं भी इसी तरह हिम्मत दिखा पाती. खैर छोड़ो…’’ किसना ने अपना चेहरा घूंघट से ढका और बस में बैठते ही भविष्य के उजियारे सपनों में खो गई. इन सपनों में खोए 12 घंटों का सफर उसे पता ही नहीं चला. बस कंडक्टर ने उसे हिला कर जगाया, ‘‘ऐ… नीचे उतर, तेरा गांव आ गया है.’’ किसना आंखें मलते हुए नीचे उतरी. उस ने अलसाई आंखों से इधरउधर देखा. आसमान में सूरज उग रहा था. ऐसा लगा कि जिंदगी में पहली बार सूरज देखा हो. आज 30 बसंत पार कर चुकी किसना को ऐसा लगा कि जैसे जिंदगी में ऐसी सुबह पहली बार देखी हो, जहां न मुखियाइन, न दलाल, न सरकार… वह उगते हुए सूरज की तरफ दोनों हाथ फैलाए एकटक आसमान की तरफ निहारे जा रही थी. आतेजाते लोग उसे हैरत से देख रहे थे, तभी अचानक वह सकुचा गई और अपना सामान समेट कर मुसकराते हुए आगे बढ़ गई. किसना को घर के लिए आटोरिकशा पकड़ना था. तभी सोचा कि मां और बेटी रोशनी के लिए कुछ ले ले, दोनों खुश हो जाएंगी. उस ने वहां पर ही एक मिठाई की दुकान में गरमागरम कचौड़ी खाई और मिठाई भी ली.

किसना पल्लू से 5 सौ का नोट निकाल कर बोली, ‘‘भैया, अपने पैसे काट लो.’’ दुकानदार भड़क गया, ‘‘बहनजी, मजाक मत करिए. इस नोट का मैं क्या करूंगा. मुझे 2 सौ रुपए दो.’’

‘‘क्यों भैया, इस में क्या बुराई है.’’

‘‘तुम को पता नहीं है कि 2 दिन पहले ही 5 सौ और एक हजार के नोट चलना बंद हो गए हैं.’’

किसना ने दुकानदार को बहुत समझाया, पर जब वह न माना तो आखिर में अपने पल्लू से सारे पैसे निकाल कर उसे फुटकर पैसे दिए और आगे बढ़ गई. अभी किसना ढंग से खुशियां भी न मना पाई थी कि जिंदगी में फिर स्याह अंधेरा फैलने लगा. अब क्या करेगी? उस के पास तो 5 सौ और एक हजार के ही नोट थे, क्योंकि इन्हें मुखियाइन से छिपा कर रखना जो आसान था. रास्ते में बैंक के आगे लगी भीड़ में जा कर पूछा तो पता लगा कि लोग नोट बदल रहे हैं. किसना को तो यह डूबते को तिनके का सहारा की तरह लगा. किसी तरह पैदल चल कर ही वह अपने घर पहुंची. बेटी रोशनी किसना को देखते ही लिपट गई और बोली, ‘‘मां, अब तुम यहां से कभी वापस मत जाना.’’

किसना उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘अब तेरी मां कहीं नहीं जाएगी.’’बेटी के सो जाने के बाद किसना ने अपनी मां को सारा हाल बताया. उस की मां ने पूछा, ‘‘अब आगे क्या करोगी?’’

किसना ने कहा, ‘‘यहीं सिलाईकढ़ाई की दुकान खोल लूंगी.’’

दूसरे दिन ही किसना अपने पैसे ले कर बैंक पहुंची, मगर मंजिल इतनी आसान न थी. सुबह से शाम हो गई, पर उस का नंबर नहीं आया और बैंक बंद हो गया. ऐसा 3-4 दिनों तक होता रहा और काफी जद्दोजेहद के बाद उस का नंबर आया, तो बैंक वालों ने उस से पहचानपत्र मांगा. वह चुपचाप खड़ी हो गई. बैंक के अफसर ने पूछा कि पैसा कहां से कमाया? वह समझाती रही कि यह उस की बचत का पैसा है. ‘‘तुम्हारे पास एक लाख रुपए हैं. तुम्हें अपनी आमदनी का जरीया बताना होगा.’’

बेचारी किसना रोते हुए बैंक से बाहर आ गई. किसना हर रोज बैंक के बाहर बैठ जाती कि शायद कोई मदद मिल जाए, मगर सब उसे देखते हुए निकल जाते. तभी एक दिन उसे एक नौजवान आता दिखाई पड़ा. जैसेजैसे वह किसना के नजदीक आया, किसना के चेहरे पर चमक बढ़ती चली गई. उस के जेहन में वे यादें गुलाब के फूल पर पड़ी ओस की बूंदों की तरह ताजा हो गईं. कैसे यह बाबू उस का प्यार पाने के लिए क्याक्या जतन करता था? जब वह सुबहसुबह उस के गैस्ट हाउस की सफाई करने जाती थी, तो बाबू अकसर नजरें बचा कर उसे देखता था.

वह बाबू किसना को अकसर घुमाने ले जाता और घंटों बाग में बैठ कर वादेकसमें निभाता. वह चाहता कि अब हम दोनों तन से भी एक हो जाएं. किसना अब उसे एक सच्चा प्रेमी समझने लगी और उस की कही हर बात पर भरोसा भी करती थी, मगर किसना बिना शादी के कोई बंधन तोड़ने को तैयार न थी, तो उस ने उस से शादी कर ली, मगर यह शादी उस ने उस का तन पाने के लिए की थी. किसना का नशा उस की रगरग में समाया था. उस ने सोचा कि अगर यह ऐसे मानती है तो यही सही, आखिर शादी करने में बुराई क्या है, बस माला ही तो पहनानी है. उस ने आदिवासी रीतिरिवाज से कलक्टर और मुखिया के सामने किसना से शादी कर ली, लेकिन उधर लड़के की मां ने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था. एक दिन बिना बताए किसना का बाबू कहीं चला गया. इस तरह वे दोनों यहां मिलेंगे, किसना ने सोचा न था.

जब वह किसना के बिलकुल नजदीक आया, तो किसना चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे बाबू… आप यहां?’’

वह नौजवान छिटक कर दूर चला गया और बोला, ‘‘क्या बोल रही हो? कौन हो तुम?’’

‘‘मैं तुम्हारी किसना हूं? क्या तुम अब मुझे पहचानते भी नहीं हो? मुझे तुम्हारा घर नहीं चाहिए. बस, एक छोटी सी मदद…’’

‘‘अरे, तुम मेरे गले क्यों पड़ रही हो?’’ वह नौजवान यह कहते हुए आगे बढ़ गया और बैंक के अंदर चला गया. अब तो किसना रोज ही उस से दया की भीख मांगती और कहती कि बाबू, पैसे बदलवा दो, पर वह उसे पहचानने से मना करता रहा. ऐसा कहतेकहते कई दिन बीत गए, मगर बाबू टस से मस न हुआ. आखिरकार किसना ने ठान लिया कि अब जैसे भी हो, उसे पहचानना ही होगा. उस ने वापस आ कर सारा घर उलटपलट कर रख दिया और उसे अपनी पहचान का सुबूत मिल गया. सुबह उठ कर किसना तैयार हुई और मन ही मन सोचा कि रो कर नहीं अधिकार से मांगूंगी और बेटी को भी साथ ले कर बैंक गई. उस के तेवर देख कर बाबू थोड़ा सहम गया. उसे किनारे बुला कर किसना बोली, ‘‘यह रहा कलक्टर साहब द्वारा कराई गई हमारी शादी का फोटो. अब तो याद आ ही गया होगा?’’

‘‘हां… किसना… आखिर तुम चाहती क्या हो और क्यों मेरा बसाबसाया घर उजाड़ना चाहती हो?’’

किसना आंखों में आंसू लिए बोली, ‘‘जिस का घर तुम खुद उजाड़ कर चले आए थे, वह क्या किसी का घर उजाड़ेगी, रमेश बाबू… वह लड़की जो खेल रही है, उसे देखो.’’ रमेश पास खेल रही लड़की को देखने लगा. उस में उसे अपना ही चेहरा नजर आ रहा था. उसे लगा कि उसे गले लगा ले, मगर अपने जज्बातों को काबू कर के बोला, ‘‘हां…’’

किसना तकरीबन घूरते हुए बोली, ‘‘यह तुम्हारी ही बेटी है, जिसे तुम छोड़ आए थे.’’

रमेश के चेहरे के भाव को देखे बिना ही बोली, ‘‘देखो रमेश बाबू, मुझे तुममें कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं एक नई जिंदगी जीना चाहती हूं. अगर इन पैसों का कुछ न हुआ, तो लौट कर फिर वहीं नरक में जाना पड़ेगा. ‘‘मैं अपनी बेटी को उस नरक से दूर रखना चाहती हूं, नहीं तो उसे भी कुछ सालों में वही कुछ करना पड़ेगा, जो उस की मां करती रही है. अपनी बेटी की खातिर ही रुपया बदलवा दो, नहीं तो लोग इसे वेश्या की बेटी कहेंगे. ‘‘अगर तुम्हारे अंदर जरा सी भी गैरत है, तो तुम बिना सवाल किए पैसा बदलवा लाओ, मैं यहीं तुम्हारा इंतजार कर रही हूं.’’ रमेश ने उस से पैसों का बैग ले लिया और खेलती हुई बेटी को देखते हुए बैंक के अंदर चला गया और कुछ घंटे बाद वापस आ कर रमेश ने नोट बदल कर किसना को दे दिए और कुछ खिलौने अपने बेटी को देते हुए गले लगा लिया. तभी किसना ने आ कर उसे रमेश के हाथों से छीन लिया और बेटी का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर बोली, ‘‘रमेश बाबू… चाहत की अलगनी पर धोखे के कपड़े नहीं सुखाए जाते…’’ और बेटी के साथ सड़क की भीड़ में अपने सपनों को संजोते हुए खो गई.

सोच

हर व्यक्ति के सोचने का तरीका अलग होता है. जरूरी नहीं कि एक व्यक्ति जिस तरह सोचता हो, दूसरा भी उसी तरह सोचे. इसी तरह यह भी जरूरी नहीं कि एक व्यक्ति की सोच को दूसरा पसंद करे. हां, सार्थक सोच से जीवन की धारा जरूर बदल जाती है जहां एक स्थिरता मिलती है, मन को सुकून मिलता है. यह बात मैं ने उस दिन अच्छी तरह से जानी जिस दिन मैं श्रीमती सान्याल के घर किटी पार्टी में गई थी. उस एक दिन के बाद मेरी सोच कब बदली यह खयाल कर मैं अतीत में खो सी गई.

दरवाजे पर उन की नई बहू मानसी ने हम सब का स्वागत किया. मिसेज सान्याल एकएक कर जैसेजैसे हम सभी सदस्याओं का परिचय, अपनी नई बहू से करवाती जा रही थीं वह चरण स्पर्श कर के सब से आशीर्वाद लेती जा रही थी. मानसी जैसे ही मेरे चरण छूने को आगे बढ़ी मैं ने प्यार से उसे यह कह कर रोक दिया, ‘बस कर बेटी, थक जाएगी.’

‘क्यों थक जाएगी?’ श्रीमती सान्याल बोलीं, ‘जितना झुकेगी उतनी ही इस की झोली आशीर्वाद के वजनों से भरती जाएगी.’

श्रीमती सान्याल तंबोला की टिकटें बांटने लगीं तो मानसी सब से पैसे जमा कर रही थी. खेल के बीच में मानसी रसोई में गई और थोड़ी देर में सब के लिए गरम सूप और आलू के चिप्स ले कर आई, फिर बारीबारी से सब को देने लगी.

तंबोला का खेल खत्म हुआ. खाने की मेज स्वादिष्ठ पकवानों से सजा दी गई. मानसी चौके में गरम पूरियां सेंक रही थी और श्रीमती सान्याल सब को परोसती जा रही थीं. दहीबड़े का स्वाद चखते समय औरतें कभी सास बनीं सान्याल की प्रशंसा करतीं तो कभी बहू मानसी की.

थोड़ी देर बाद हम सब महिलाओं ने श्रीमती सान्याल से विदा ली और अपनेअपने घर की ओर चल दीं.

घर लौट कर मेरे दिमाग पर काफी देर तक सान्याल परिवार का चित्र अंकित रहा. सासबहू के बीच न किसी प्रकार का तनाव था न मनमुटाव. प्यार, सम्मान और अपनत्व की डोर से दोनों बंधी थीं. हो सकता है यह सब दिखावा हो. मेरे मन से पुरजोर स्वर उभरा, ब्याह के अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं टकराहट और कड़वाहट तो बाद में ही पैदा होती हैं, और तभी अलगअलग रहने की बात सोची जाती है. इसीलिए क्यों न ब्याह होते ही बेटेबहू को अलग घर में रहने दिया जाए.

श्रीमती सान्याल मेरी बहुत नजदीकी दोस्त हैं. पढ़ीलिखी शिष्ट महिला हैं. मिस्टर सान्याल मेरे पति अविनाश के ही दफ्तर में काम करते हैं. उन का बेटा विभू और मेरा राहुल, हमउम्र हैं. दोनों ने एक साथ ही एम.बी.ए. किया था. अब दोनों अलगअलग बहु- राष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे हैं.

श्रीमती सान्याल शुरू से ही संयुक्त परिवार की पक्षधर थीं. विभू के विवाह से पहले ही वह जब तब बेटेबहू को अपने साथ रखने की बात कहती रही थीं. लेकिन मेरी सोच उन से अलग थी. पास- पड़ोस, मित्र, परिजनों के अनुभव सुन कर यही सोचती कि कौन पड़े इन झमेलों में.
मैं ने एक बार श्रीमती सान्याल से कहा था, हर घर तो कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ है. सौहार्द, प्रेम, घनिष्ठता, अपनापन दिखाई ही नहीं देता. परिवारों में, सास बहू की बुराई करती है, बहू सास के दुखड़े रोती है.

इस पर वह बोली थीं, ‘घर में रौनक भी तो रहती है.’ तब मैं ने अपना पक्ष रखा था, ‘समझौता बच्चों से ही नहीं, उन के विचारों से करना पड़ता है.’
‘शुरू में सासबहू का रिश्ता तल्खी भरा होता है किंतु एकदूसरे की प्रतिद्वंद्वी न बन कर एकदूसरे के अस्तित्व को प्यार से स्वीकारा जाए और यह समझा जाए कि रहना तो साथसाथ ही है, तो सब ठीक रहता है.’’

ब्याह से पहले ही मैं ने राहुल को 3 कमरे का एक फ्लैट खरीदने की सलाह दी पर अविनाश चाहते थे कि बेटेबहू हमारे साथ ही रहें. उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा भी था कि राधिका नौकरी करती है. दोनों सुबह जाएंगे, रात को लौटेंगे. कितनी देर मिलेंगे जो विचारों में टकराहट होगी. ‘विचारों के टकराव के लिए थोड़ा सा समय ही काफी होता है,’ मैं अड़ जाती, ‘समझौता और समर्पण मुझे ही तो करना पड़ेगा. बहूबेटा, प्रेम के हिंडोले में झूमते हुए दफ्तर जाएं और मैं उन के नाजनखरे उठाऊं?’

अविनाश चुप हो जाते थे.

फ्लैट के लिए कुछ पैसा अविनाश ने दिया बाकी बैंक से फाइनेंस करवा लिया गया. राधिका के दहेज में मिले फर्नीचर से उन का घर सज गया. बाकी सामान खरीद कर हम ने उन्हें उपहार में दे दिया. कुल मिला कर राहुल की गृहस्थी सज गई. सप्ताहांत पर वे हमारे पास आ जाते या हम उन के पास चले जाते थे.

मैं इस बात से बेहद खुश थी कि मेरी आजादी में किसी प्रकार का खलल नहीं पड़ा था. अविनाश सुबह दफ्तर जाते, शाम को लौटते. थोड़ा आराम करते, फिर हम दोनों पतिपत्नी क्लब चले जाते थे. वह बैडमिंटन खेलते या टेनिस और मैं अकसर महिलाओं के साथ गप्पगोष्ठी में व्यस्त रहती या फिर ताश खेलती. इस सब के बाद जो भी समय मेरे पास बचता उस में मैं बागबानी करती.

पिछले कुछ दिनों से श्रीमती सान्याल दिखाई नहीं दी थीं. क्लब में भी मिस्टर सान्याल अकेले ही आते थे. एक दिन पूछ बैठी तो हंस कर बोले, ‘आजकल घर में ही रौनक रहती है. आप क्यों नहीं मिल आतीं?’

अच्छा लगा था मिस्टर सान्याल का प्रस्ताव. एक दिन बिना पूर्व सूचना के मैं उन के घर चली गई. वह बेहद अपनेपन से मिलीं. उन के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव तिर आए. कुछ समय शिकवेशिकायतों में बीत गया. फिर मैं ने उलाहना सा दिया, ‘काफी दिनों से दिखाई नहीं दीं, इसीलिए चली आई. कहां रहती हो आजकल?’

मैं सोच रही थी कि इतना सुनते ही श्रीमती सान्याल पानी से भरे पात्र सी छलक उठेंगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. वह सहज भाव में बोलीं, ‘विभू के विवाह से पहले मैं घर में बहुत बोर होती थी इसीलिए घर से बाहर निकल जाती थी या फिर किसी को बुला लेती थी. अब दिन का समय घर के छोटेबड़े काम निबटाने में ही निकल जाता है. शाम का समय तो बेटे और बहू के साथ कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता.’

संतुष्ट, संतप्त, मिसेज सान्याल मेरे हाथ में एक पत्रिका थमा कर खुद रसोई में चाय बनाने के लिए चली गईं.

चाय की चुस्की लेते हुए मैं ने फिर कुरेदा, ‘काफी दुबली हो गई हो. लगता है, काम का बोझ बढ़ गया है.’

‘आजकल मानसी मुझे अपने साथ जिम ले जाती है’, और ठठा कर वह हंस दीं, ‘उसे स्मार्ट सास चाहिए,’ फिर थोड़े गंभीर स्वर में बोलीं, ‘इस उम्र में वजन कम रहे तो इनसान कई बीमारियों से बच जाता है. देखो, कैसी स्वस्थ, चुस्तदुरुस्त लग रही हूं?’

कुछ देर तक गपशप का सिलसिला चलता रहा फिर मैं ने उन से विदा ली और घर लौट आई.

लगभग एक हफ्ते बाद फोन की घंटी बजी. श्रीमती सान्याल थीं दूसरी तरफ. हैरानपरेशान सी वह बोलीं, ‘मानसी का उलटियां कर के बुरा हाल हो रहा है. समझ में नहीं आता क्या करूं?’

‘क्या फूड पायजनिंग हो गई है?’

‘अरे नहीं, खुशखबरी है. मैं दादी बनने वाली हूं. मैं ने तो यह पूछने के लिए तुम्हें फोन किया था कि तुम ने ऐसे समय में अपनी बहू की देखभाल कैसे की थी, वह सब बता और जो भूल गई हो उसे याद करने की कोशिश कर. तब तक मैं अपनी कुछ और सहेलियों को फोन कर लेती हूं.’

अति उत्साहित, अति उत्तेजित श्रीमती सान्याल की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गई. ब्याह के एक बरस बाद राधिका गर्भवती हुई थी. शुरू के 2-3 महीने उस की तबीयत काफी खराब रही थी. उलटियां, चक्कर फिर वजन भी घटने लगा था. लेडी डाक्टर ने उसे पूरी तरह आराम करने की सलाह दी थी.

राधिका और राहुल मुझे बारबार बुलाते रहे. एक दिन तो राहुल दरवाजे पर ही आ कर खड़ा हो गया और अपनी कार में मेरा बैग भी ले जा कर रख लिया. अविनाश की भी इच्छा थी कि मैं राहुल के साथ चली जाऊं. पर मेरी इच्छा वहां जाने की नहीं थी. उन्होंने मुझे समझाते हुए यह भी कहा कि अगर तुम राहुल के घर नहीं जाना चाहती हो तो उन्हें यहीं बुला लो.

सभी ने इतना जोर दिया तो मैं ने भी मन बना लिया था. सोचा, कुछ दिन तो रह कर देखें. शायद अच्छा लगे.

अगली सुबह अखबार में एक खबर पढ़ी, ‘कृष्णा नगर में एक बहू ने आत्म- हत्या कर ली. बहू को प्रताडि़त करने के अपराध में सास गिरफ्तार.’
‘तौबातौबा’ मैं ने अपने दोनों कानों को हाथ लगाया. मुंह से स्वत: ही निकल गया कि आज के जमाने में जितना हो सके बहूबेटे से दूरी बना कर रखनी चाहिए.

मां के प्राण, बेटे में अटकते जरूर हैं, मोह- ममता में मन फंसता भी है. आखिर हमारे ही रक्तमांस का तो अंश होता है हमारा बेटा. लेकिन वह भी तो बहू के आंचल से बंधा होता है. मां और पत्नी के बीच बेचारा घुन की तरह पिसता चला जाता है. मां तो अपनी ममता की छांव तले बहूबेटे के गुणदोष ढक भी लेगी लेकिन बहू तो सरेआम परिवार की इज्जत नीलाम करने में देर नहीं करती. किसी ने सही कहा है, ‘मां से बड़ा रक्षक नहीं, पत्नी से बड़ा तक्षक नहीं.’

मैं गर्वोन्नत हो अपनी समझदारी पर इतरा उठी. यही सही है, न हम बच्चों की जिंदगी में हस्तक्षेप करें न वह हमारी जिंदगी में दखल दें. राधिका बेड रेस्ट पर थी. उस ने अपनी मां को बुला लिया तो मैं ने चैन की सांस ली थी. ऐसा लगा, जैसे मैं कटघरे में जाने से बच गई हूं.

प्रसव के समय भी मजबूरन जाना पड़ा था, क्योंकि राधिका के पीहर में कोई महिला नहीं थी, सिर्फ मां थी, उन्हें भी अपनी बहू की डिलीवरी पर अमेरिका जाना पड़ रहा था.

3 माह का समय मैं ने कैसे काटा, यह मैं ही जानती हूं. नवजात शिशु और घर के छोटेबड़े दायित्व निभातेनिभाते मेरे पसीने छूटने लगे. इतने काम की आदत भी तो नहीं थी. राधिका की आया से जैसा बन पड़ता सब को पका कर खिला देती. रात में भी शुभम रोता तो आया ही चुप कराती थी.

3 माह का प्रसूति अवकाश समाप्त हुआ. राधिका को काम पर जाना था. बेटेबहू दोनों ने हमारे साथ रहने की इच्छा जाहिर की थी.

अविनाश भी 3 माह के शिशु को आया की निगरानी में छोड़ कर जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मेरी नकारात्मक सोच फिर से आड़े आ गई. मन अडि़यल घोड़े की तरह एक बार फिर पिछले पैरों पर खड़ा हो गया था. मन को यही लगता था कि बहू के आते ही इस घर की कमान मेरे हाथ से सरक कर उस के हाथ में चली जाएगी.

राधिका ने शुभम को अपने ही दफ्तर में स्थित क्रेच में छोड़ कर अपना कार्यभार संभाल लिया. लंच में या बीचबीच में जब भी उसे समय मिलता वह क्रेच में जा कर शुभम की देखभाल कर आती थी. शाम को दोनों पतिपत्नी उसे साथ ले कर ही वापस लौटते थे. दुख, तकलीफ या बीमारी की अवस्था में राधिका और राहुल बारीबारी से अवकाश ले लिया करते थे. मुश्किलें काफी थीं लेकिन विदेशों में भी तो बच्चे ऐसे ही पलते हैं, यही सोच कर मैं मस्त हो जाती थी.

मिसेज सान्याल अकसर मुझे अपने घर बुला लेती थीं. मैं जब भी उन के घर जाती, कभी वह मशीन पर सिलाई कर रही होतीं या फिर सोंठहरीरे का सामान तैयार कर रही होतीं. मानसी का चेहरा खुशी से भरा होता था.

एक दिन उन्होंने, कई छोटेछोटे रंगबिरंगे फ्राक दिखाए और बोलीं, ‘बेटी होगी तो यह रंग फबेगा उस पर, बेटा होगा तो यह रंग अच्छा लगेगा.’
मैं उन के चेहरे पर उभरते भावों को पढ़ने का प्रयास करती. न कोई डर, न भय, न ही दुश्ंिचता, न बेचैनी. उम्मीद की डोर से बंधी मिसेज सान्याल के मन में कुछ करने की तमन्ना थी, प्रतिपल.

एक दिन सुबह ही मिस्टर सान्याल का फोन आया. बोले, ‘‘मानसी को लेबर पेन शुरू हो गया है और उसे अस्पताल ले कर जा रहे हैं. मिसेज सान्याल थोड़ा अकेलापन महसूस कर रही हैं, अगर आप अस्पताल चल सकें तो…’’

मैं तुरंत तैयार हो कर उन के साथ चल दी. मानसी दर्द से छटपटा रही थी और मिसेज सान्याल उसे धीरज बंधाती जा रही थीं. कभी उस की टांगें दबातीं तो कभी माथे पर छलक आए पसीने को पोंछतीं, उस का हौसला बढ़ातीं.

कुछ ही देर में मानसी को लेबररूम में भेज दिया गया तो मिसेज सान्याल की निगाहें दरवाजे पर ही अटकी थीं. वह लेबररूम में आनेजाने वाले हर डाक्टर, हर नर्स से मानसी के बारे में पूछतीं. मिसेज सान्याल मुझे बेहद असहाय दिख रही थीं.

मानसी ने बेटी को जन्म दिया. सब कुछ ठीकठाक रहा तो मैं घर चली आई पर पहली बार कुछ चुभन सी महसूस हुई. खालीपन का अहसास हुआ था. अविनाश दफ्तर चले गए थे. रिटायरमेंट के बाद उन्हें दोबारा एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई थी. मेरा मन कहीं भी नहीं लगता था. घर बैठती तो कमरे के भीतर भांयभांय करती दीवारें, बाहर का पसरा हुआ सन्नाटा चैन कहां लेने देता था. तबीयत गिरीगिरी सी रहने लगी.

स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया. मन में हूक सी उठती कि मिसेज सान्याल की तरह मुझे भी तो यही सुख मिला था. संस्कारी बेटा, आज्ञाकारी बहू. मैं ने ही अपने हाथों से सबकुछ गंवा दिया.

डाक्टर ने मुझे पूरी तरह आराम की सलाह दी थी. राहुल और राधिका मुझे कई डाक्टरों के पास ले गए. कई तरह के टेस्ट हुए पर जब तक रोग का पता नहीं चलता तो इलाज कैसे संभव होता? बच्चों के घर आ जाने से अविनाश भी निश्ंचिंत हो गए थे.

राधिका ने दफ्तर से छुट्टी ले ली थी. चौके की पूरी बागडोर अब बहू के हाथ में थी. सप्ताह भर का मेन्यू उस ने तैयार कर लिया था. केवल अपनी स्वीकृति की मुहर मुझे लगानी पड़ती थी. मैं यह देख कर हैरान थी कि शादी के बाद राधिका कभी भी मेरे साथ नहीं रही फिर भी उसे इस घर के हर सदस्य की पसंद, नापसंद का ध्यान रहता था.

राहुल दफ्तर जाता जरूर था लेकिन जल्दी ही वापस लौट आता था.

शुभम अपनी तोतली आवाज से मेरा मन लगाए रखता था. घर में हर तरफ रौनक थी. रस्सियों पर छोटेछोटे, रंगबिरंगे कपड़े सूखते थे. रसोई से मसाले की सुगंध आती थी. अविनाश और मैं उन पकवानों का स्वाद चखते थे जिन्हें बरसों पहले मैं खाना तो क्या पकाना तक भूल चुकी थी.

कुछ समय बाद मैं पूरी तरह से स्वस्थ हो गई. मिसेज सान्याल हर शाम मुझ से मिलने आती थीं. कई बार तो बहू के साथ ही आ जाती थीं. अब उन पर, नन्ही लक्ष्मी को भी पालने का अतिरिक्त कार्यभार आ गया था. वह पहले से काफी दुबली हो गई थीं, लेकिन शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ दिखती थीं.

एक शाम श्रीमती सान्याल अकेली ही आईं तो मैं ने कुरेदा, ‘अब तक घर- गृहस्थी संभालती थीं, अब बच्ची की परवरिश भी करोगी?’
‘संबंधों का माधुर्य दैनिक दिनचर्या की बातों में ही निहित होता है. घरपरिवार को सुचारु रूप से चलाने में ही तो एक औरत के जीवन की सार्थकता है,’ उन्होंने स्वाभाविक सरलता से कहा फिर शुभम के साथ खेलने लगीं.

राधिका पलंगों की चादरें बदल रही थी. सुबह बाई की मदद से उस ने पालक, मेथी काट कर, मटर छील कर, छोटेछोटे पौली बैग में भर दिए थे. प्याज, टमाटर का मसाला भून कर फ्रिज में रख दिया था. अगली सुबह वे दोनों वापस अपने घर लौट रहे थे.

इस एक माह के अंदर मैं ने खुद में आश्चर्यजनक बदलाव महसूस किया था. अपनेआप में एक प्रकार की अतिरिक्त ऊर्जा महसूस होती थी. तनावमुक्ति, संतोष, विश्राम और घरपरिवार के प्रति निष्ठावान बहू की सेवा ने मेरे अंदर क्रांतिकारी बदलाव ला दिया था.

‘मिसेज सान्याल मुझे समझा रही थीं, ‘देखो, हर तरफ शोर, उल्लास, नोकझोंक, गिलेशिकवे, प्यारसम्मान से दिनरात की अवधि छोटी हो जाती है. 4 बरतन जहां होते हैं, खटकते ही हैं पर इन सब से रौनक भी तो रहती है. अवसाद पास नहीं फटकता, मन रमा रहता है.’

पहली बार मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरी सोच बदल गई है और अब श्रीमती सान्याल की सोच से मिल रही है. सच तो यह था कि मुझे अपने बच्चों से न कोई गिला था न शिकवा, न बैर न दुराव. बस, एक दूरी थी जिसे मैं ने खुद स्थापित किया था.

आज बहू के प्रति मेरे चेहरे पर कृतज्ञता और आदर के भाव उभर आए हैं. हम दोनों के बीच स्थित दूरी कहीं एक खाई का रूप न ले ले. इस विचार से मैं अतीत के उभर आए विचारों को झटक उठ कर खड़ी हो गई. कुछ पाने के लिए अहम का त्याग करना पड़ता है. अधिकार और जिम्मेदारियां एक साथ ही चलती हैं, यह पहली बार जान पाई थी मैं.

राहुल और राधिका कार में सामान रख रहे थे. शुभम का स्वर, अनुगूंज, अंतस में और शोर मचाने लगा. राहुल, पत्नी के साथ मुझ से विदा लेने आया तो मेरा स्वर भीग गया. कदम लड़खड़ाने लगे. राधिका ने पकड़ कर मुझे सहारा दिया और पलंग पर लिटा दिया फिर मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘क्या हुआ मां?’’

‘‘मैं तुम लोगों को कहीं जाने नहीं दूंगी,’’ और बेटे का हाथ पकड़ कर मैं रो पड़ी.

‘‘पर मां…’’

‘‘कुछ कहने की जरूरत नहीं है. हम सब अब साथ ही रहेंगे.’’

मेरे बेटे और बहू को जैसे जीवन की अमूल्य निधि मिल गई और अविनाश को जीवन का सब से बड़ा सुख. मैं ने अपने हृदय के इर्दगिर्द उगे खरपतवार को समूल उखाड़ कर फेंक दिया था. शक, भय आशंका के बादल छंट चुके थे. बच्चों को अपने प्रति मेरे मनोभाव का पता चल गया था. सच, कुछ स्थानों पर जब अंतर्मन के भावों का मूक संप्रेषण मुखर हो उठता है तो शब्द मूल्यहीन हो जाते

सत्संग – कैसे रजनी बन बैठी गुरू बाबा की वासना का शिकार

कुछ दिनों से गांव में हर रविवार के दिन एक सत्संग मंडली आना शुरू हो गई थी. मंडली में कुलमिला कर 3 लोग थे, एक मंडली के प्रमुख गुरु बाबा और बाकी 2 बूढ़ी बाईजी. गुरु बाबा की उम्र 45 साल के आसपास थी, लेकिन तंदुरुस्ती उन्हें जवान दिखाती थी. शुरुआत में गांव में केवल मीना का ही एक घर था, जिस में गुरु बाबा सत्संग करने आते थे, लेकिन कुछ ही दिनों में आधे गांव की औरतें गुरु बाबा की भक्त हो गईं. गुरु बाबा इन दिनों शहर के किसी मंदिर में रहते थे और रविवार का दिन आते ही इस गांव में मीना के घर सत्संग करने आ पहुंचते थे.

मीना का गुरु बाबा से परिचय अपने मायके में सत्संग के  दौरान हुआ था. उसी वक्त मीना ने गुरु बाबा की वाणी से प्रभावित हो कर उन्हें इस गांव में आने का न्योता दे डाला था. जिस दिन गुरु बाबा मीना के घर आए, उस दिन मीना ने अपनी शेखी बघारने के लिए पड़ोस की कुछ औरतों को भी वहां बुला लिया था. मीना के घर पर पहले दिन ही गुरु बाबा ने ऐसा सत्संग किया कि सारी औरतें उन की मुरीद हो गईं. धीरेधीरे सब औरतों ने उन्हें अपना गुरु मान कर गुरु मंत्र भी ले लिया. गुरु बाबा केवल रविवार के दिन ही आते थे. यह बात अब उन के भक्तों को खासा अखरती थी.

एक बार रविवार आने से पहले ही औरतों में इस बात पर चर्चा हुई कि गुरु बाबा को गांव के बाहर बने मंदिर में जगह दे दी जाए, जिस से उन का सत्संग रोज सुनने को मिल जाया करे. सभी औरतें इस बात पर एकमत थीं. रविवार के दिन जब गुरु बाबा गांव में सत्संग के लिए आए, तो उन औरतों ने उन के सामने यह प्रस्ताव रख दिया. गुरु बाबा कुछ कहते, उस से पहले ही उन के साथ आने वाली बाईजी ने इस गांव के मंदिर में रुकने से मना कर दिया. वे कहती थीं कि साधुसंन्यासी को लालच के चलते कहीं नहीं रुकना चाहिए. लेकिन बाईजी की सुनता कौन था. औरतों को तो वैसे ही बाईजी से कोई मतलब न था. वे तो गुरु बाबा के साथ आती थीं, इसलिए उन की इज्जत होती थी.

गुरु बाबा इस बात को सुन कर जोश में थे, लेकिन बाईजी की वजह से कुछ कह न सके. वे आज जिस जगह पर थे, वहां तक लाने में बाईजी का बहुत बड़ा योगदान था. पर गांव की औरतों द्वारा किया गया अनुरोध गुरु बाबा को बाईजी के खिलाफ बगावत करने के लिए मजबूर कर गया. जब गुरु बाबा ने बाईजी से अपनी दिली इच्छा जाहिर की, तो दोनों बाईजी उन से नाराज हो गईं और फिर कभी इस गांव में न आने को कह कर अपने आश्रम लौट गईं. गुरु बाबा को इस बात से कोई फर्क न पड़ा. उन्हें इस गांव की औरतों से जो आश्वासन मिला था, वह बाईजी के साथ से कई गुना बड़ा था. उसी दिन औरतों ने खुद जा कर गांव के बाहर बने मंदिर के कमरे को झाड़पोंछ कर गुरु बाबा के रहने के लिए तैयार कर दिया.

शाम तक गुरु बाबा के लिए मंदिर में बढि़या भोजन बना कर भेज दिया गया. आज सालों बाद बाबाजी के लिए किसी ने इतना स्वादिष्ठ खाना भेजा था, जबकि बाईजी के आश्रम में तो हमेशा संन्यासियों वाला खाना ही मिलता था. गुरु बाबा ने फैसला किया कि अब वे इसी गांव में रहेंगे. यह बात जब औरतों को पता चली, तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. अब हर रोज मंदिर में पूजा होने लगी थी. लोग इस बात से खुश हो कर मंदिर में चढ़ावा चढ़ाने लगे थे. मर्द भी यह सोच कर खुश थे कि चलो मंदिर में गुरु बाबा के रहने से वहां का सूनापन खत्म हो जाएगा.

अब मीना के घर के बजाय मंदिर की धर्मशाला में ही सत्संग होना शुरू हो गया था. बड़ी जातियों के साथसाथ छोटी कही जाने वाली जातियों के लोग भी गुरु बाबा का सत्संग सुनने आने लगे थे.गुरु बाबा के पास चढ़ावे के पैसों का भी ढेर लगता जा रहा था. पिछड़ी जाति की एक लड़की रजनी को गुरु बाबा का सत्संग सुनने की ऐसी लत पड़ी कि घर के सब काम छोड़ कर वह रोज सत्संग में आ बैठती थी.  रजनी की उम्र 19 साल थी, लेकिन जिस दिन उस ने गुरु बाबा का सत्संग सुना, तो भक्ति से सराबोर हो गई. घर में बूढ़ी दादी के अलावा कोई और नहीं था, जो उसे रोकता या टोकता. मांबाप उसे बचपन में ही छोड़ कर चल बसे थे.

गुरु बाबा की खातिरदारी और रोब देख कर उस के मन में खयाल आता था कि वह भी साध्वी हो जाए. लेकिन उस की राह में एक अड़चन थी कि वह पिछड़ी जाति की थी. भला पिछड़ी जाति की लड़की को कौन साध्वी मानेगा? यह खयाल मन में दबाए रजनी रोज गुरु बाबा का सत्संग सुनने आती रही. सर्दियों के दिन थे. गुरु बाबा ने आग जलाने के लिए उपले और लकडि़यों का इंतजाम करने की बात भक्तों से कही, तो रजनी उछल कर बोल पड़ी कि इन सब चीजों का इंतजाम वह खुद कर देगी.गुरु बाबा की नजर रजनी पर पड़ी, तो भरे बदन की ठीकठाक दिखने वाली रजनी उन के दिल को भा गई. लेकिन चाह कर भी वे कुछ न कह सके.

शाम के वक्त रजनी एक गठरी में उपले और लकड़ी भर कर मंदिर जा पहुंचीं. उस वक्त मंदिर में गुरु बाबा के अलावा कोई और नहीं था. रजनी ने सिर से गठरी उतारी ही थी कि गुरु बाबा मंदिर के  कमरे से बाहर निकल आए. रजनी ने गुरु बाबा को देखा तो हाथ जोड़ कर प्रणाम कर लिया. गुरु बाबा ने इधरउधर नजर घुमाई, फिर रजनी के सिर, कंधे और गाल पर बड़े प्यार से हाथ फेरा.

गुरु बाबा जानते थे कि रजनी पिछड़ी जाति की है, लेकिन उन की वासना को जातबिरादरी की दीवार कतई मंजूर न थी. गुरु बाबा खीसें निपोरते हुए बोले, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

वह बोली, ‘‘जी… रजनी.’’

गुरु बाबा फिर से बोले, ‘‘और कौनकौन लोग हैं घर में?’’

रजनी ने उसी अंदाज में जवाबदिया, ‘‘मैं और मेरी दादी हैं… और कोई नहीं.’’

गुरु बाबा मन ही मन खुश हो उठे और बोले, ‘‘कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा. किसी बात की चिंता मत करो. चलो, तुम्हारी शादी में हम मदद कर देंगे.’’

रजनी शरमा कर बोली, ‘‘बाबाजी, मुझे अभी शादी नहीं करनी. मैं तो साध्वी बनना चाहती हूं.’’

गुरु बाबा खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह, क्या बढि़या विचार है. तो फिर बन क्यों नहीं जातीं साध्वी? देर किस बात की है?’’

रजनी शरमाते हुए बोली, ‘‘बाबाजी, मैं पिछड़ी जाति की हूं न, इसलिए सोच कर रह जाती हूं.’’

गुरु बाबा खुद इस बात के खिलाफ थे कि कोई छोटी जाति का आदमी संत बने, लेकिन रजनी को पाने के लिए वे बेफिक्र हो कर बोले, ‘‘ऐसा कौन बोला? हम बनाएंगे तुम्हें साध्वी. आओ, अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’ रजनी गुरु बाबा के कमरे में जाने से थोड़ा हिचक रही थी, लेकिन उन के दोबारा कहने पर वह अंदर चली गई. अंदर कमरे में गुरु बाबा के लिए सुखसुविधा का हर सामान मौजूद था. कमरे में पड़े तख्त पर गुरु बाबा ने खुद बैठते हए रजनी को भी बिठा लिया और उस के शरीर पर जहांतहां हाथ फिरा कर बोले, ‘‘देखो रजनी, हम तुम्हें साध्वी तो बना सकते हैं, लेकिन यह बनना इतना आसान नहीं होता. इस के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. पहले शिष्या बन कर मेरी सेवा करनी पड़ेगी.

‘‘मैं जो भी कहूंगा, वह आंख मूंद कर करते रहना होगा, तब जा कर तुम साध्वी बन पाओगी. अगर यह सब मंजूर हो तो बताओ, फिर मैं इस बारे में सोचूं भी.’’

रजनी को दुनियादारी की समझ नहीं थी. संतगीरी की चमक ने उसे दीवाना बना दिया था. इस सब के लिए वह कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार थी. रजनी बोली, ‘‘बाबाजी, आप जो कहो मैं वही करने को तैयार हूं. आप मेरी जान मांगो, तो वह भी मैं दे दूं. बस, आप मुझे साध्वी बना दो.’’ रजनी का साध्वी बनने के  प्रति इतना जोश देख कर गुरु बाबा खुश हो उठे. अब उन्हें अपनी इच्छा पूरी करने से कोई नहीं रोक सकता था. गुरु बाबा ने रजनी को अपने करीब किया और उस का मुंह चूम लिया. रजनी को थोड़ा अटपटा तो लगा, लेकिन इसे उन का प्यार समझ कर सह गई. गुरु बाबा ने उठ कर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. रजनी के दिल की धड़कनें बढ़ गईं, लेकिन कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी.

गुरु बाबा ने रजनी को अपनी बांहों में भरा और चूम लिया. रजनी का सारा जिस्म डर से कांप उठा, मुंह से निकला, ‘‘बाबाजी, यह आप…’’ रजनी विरोध में बस इतना ही कह पाई, क्योंकि गुरु बाबा ने उसे यह बोल कर चुप कर दिया, ‘‘रजनी, हम ने तुम से क्या कहा था. तुम तो कहती थीं कि जान भी दे दूंगी. तुम्हें साध्वी बनना है या नहीं?’’

रजनी चुप हो कर सब सहती गई. बाबा अपनी हवस मिटा चुके थे. उन्होंने एक बार फिर से रजनी को साध्वी बनाने का आश्वासन दे कर घर भेज दिया. रजनी अपनी इज्जत लुटा कर घर को चल दी. उसे बुरा तो लग रहा था, लेकिन मन में साध्वी बनने का खयाल तसल्ली दिए जा रहा था. अगले दिनों में रजनी इसी तरह गुरु बाबा के पास आती रही और बाबा इसी तरह उस का शोषण करते रहे. एक दिन रजनी ने गुरु बाबा से साध्वी बनने की जिद कर दी. बाबा रजनी को और ज्यादा दिनों तक टाल नहीं सके. उन्होंने अगले ही दिन रजनी को गेरुए कपड़े मंगवा कर दे दिए और विधिविधान से उसे साध्वी बना दिया. रजनी के साध्वी बनने की बात सुन कर गांव के लोगों ने इस बात पर कड़ा एतराज दर्ज किया, लेकिन गुरु बाबा के आगे उन की एक न चली. कुछ दिन तक तो रजनी साध्वी के वेश में रात के वक्त अपने घर पर ही रही, लेकिन जल्दी ही गुरु बाबा के बारबार कहने पर उस के साथ ही मंदिर के दूसरे कमरे में रहने लगी.

गुरु बाबा के भक्तों को तो इस बात में कोई खराबी न दिखती थी, क्योंकि उन्हें अपने गुरु बाबा की नीयत पर पूरा भरोसा था. गांव के छिछोरे लड़के, जो दिनभर रजनी को ताका करते थे, वे अब दिनभर मंदिर में डेरा जमाए रहते. गुरु बाबा ने इस बात का फायदा भी उठाना शुरू कर दिया था. वे अब इन लोगों के लिए साध्वी रजनी का अलग से प्रवचन रखवाते और इन लोगों से मनमाना पैसा भी वसूलते थे. धीरेधीरे प्रवचन छिछोरी बातों के प्रवचन में तबदील होता चला गया, साथ ही गुरु बाबा के पास पैसों की बरसात भी होती चली गई. एक शाम एक छिछोरे लड़के ने कैमरे से चुपके से गुरु बाबा और रजनी का आपत्तिजनक फोटो खींच लिया. जब गुरु बाबा को इस बात की खबर लगी, तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने तुरंत उस लड़के को बुलाया और उस के सामने गिड़गिड़ाने लगे कि यह बात वह किसी को न बताए, इस के बदले वह उस लड़के को मुंहमांगी रकम भी देने को तैयार हो गए.

लड़का चालाक था. उसे पता था कि इस बाबा ने खूब कमाया है. उस ने खींचे हुए फोटो वापस कर गुरु बाबा से मोटी रकम ऐंठ ली. यह रकम इतनी मोटी थी कि गुरु बाबा की जमापूंजी खत्म सी हो गई. सत्संग के नाम से कमाया गया पैसा गुरु बाबा के शौक और ऐयाशियों को छिपाने के काम आ रहा था. गुरु बाबा ने पैसा कम होते देखा, तो भक्तों से और ज्यादा दान करने के लिए बोल दिया. लड़के को पैसा दे कर गुरु बाबा और साध्वी रजनी अभी चैन की सांस भी न ले पाए थे कि और भी लड़के इन लोगों के अश्लील फोटो लिए घूमने लगे. यह सब देख गुरु बाबा अधमरे हो गए. उन्होंने आननफानन सभी लड़कों को बुला कर इस सब को बंद करने की प्रार्थना कर डाली. गुरु बाबा ने इन सभी लड़कों को धर्म के नाम पर जम कर लूटा था, फिर ये लोग बाबा को इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते. उन्होंने गुरु बाबा के सामने शर्त रख दी कि अगर वे अपनी साध्वी से उन लोगों को मस्ती करने देंगे, तो कोई कुछ नहीं कहेगा.

अब गुरु बाबा क्या करते, उन्होंने अपनी इज्जत बचाने की खातिर जैसेतैसे साध्वी रजनी को इस बात के लिए मना लिया. अब हालत यह हो गई कि भगवान के मंदिर के  ठीक बगल में दिनभर वासना का खेल चलने लगा. रजनी साध्वी इसलिए बनी थी कि आराम से जिंदगी गुजार सकेगी, लेकिन यहां तो उस की जिंदगी ही नरक सी हो गई थी. गांव में इस बात की चर्चा जोरों पर थी, लेकिन गुरु बाबा के अंधभक्त लोग अब भी इस बात पर यकीन न करते थे. लेकिन अब कुछ घरों की औरतों ने सत्संग में आना बंद कर दिया था. गुरु बाबा की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही थीं. एक रात गुरु बाबा चुपके से साध्वी रजनी को ले कर मंदिर से भाग गए. सोचते थे, अब दूर कहीं जा कर सत्संग किया करेंगे, जहां साध्वी रजनी उन की धर्मपत्नी के तौर पर रहा करेगी. गुरु बाबा और साध्वी रजनी के मंदिर से भागते ही लोगों को पूरी कहानी समझ आ गई. लेकिन अब भी उन के भक्तों को लगता था कि गुरु बाबा जरूर किसी और वजह से इस तरह गए होंगे, क्योंकि जिस तरह से गुरु बाबा सत्संग में प्रवचन देते थे, उस हिसाब से वे ऐसा कर ही नहीं सकते थे.

क्या विपक्षी दल सरकार को बरबादी से रोकेंगे? मोदी का नहीं, एनडीए का बजट

4 जून, 2024 के बाद देश के राजनीतिक हालात बदलेबदले नजर आ रहे हैं. तीसरी बार सरकार बनाने के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में पहले जैसा आत्मविश्वास नजर नहीं आ रहा. जून माह में संसद के संक्षिप्त सत्र में जिस तरह से प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान लगातार विरोध हुआ, वह विपक्ष की एकजुटता को दिखाता है. ढाई घंटे के भाषण में एक मिनट भी बिना विरोध के नरेंद्र मोदी बोल नहीं पाए. लोकसभा चुनाव में जनमत भाजपा के खिलाफ था. इस के बाद देश के 7 राज्यों की 13 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भी परिणाम भाजपा के खिलाफ आए. इंडिया ब्लौक जहां 10 सीटें जीतने में सफल रहा, वहीं भाजपा को केवल 2 सीटें ही मिलीं.

लोकसभा चुनाव में अयोध्या की हार कसक बन कर दिल में अब तक चुभ ही रही थी, कि उपचुनाव में सोने पे सुहागा यह हो गया कि बद्रीनाथ धाम सीट भी भाजपा हार गई. अयोध्या और बद्रीनाथ की हार ने भाजपा के पूरे धार्मिक एजेंडे को कुंद कर दिया. लोकसभा चुनाव के बाद उपचुनाव की हार ने भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया है. 22 जुलाई से संसद के मानसून सत्र के पहले दिन जिस तरह से विपक्ष ने नीट, रेल दुर्घटना और कांवड़ यात्रा में दुकानों पर नाम लिखने के मुद्दे पर सत्ता पक्ष को घेरा, उस से साफ हो गया कि विपक्ष अब सत्तापक्ष को मनमानी नहीं करने देगा.

सरकार पर रहेगा विपक्ष का दबाव

विपक्ष ने जिस तरह से सत्ता पक्ष को दबोच लिया है, उस से नरेंद्र मोदी बौखला गए हैं. उन का आरोप है कि विपक्ष ने चुने गए प्रधानमंत्री को ढाई घंटे तक बोलने नहीं दिया. उन का गला घोंटा. 2014 से ले कर 2019 की पिछली 2 सरकारों में केंद्र ने विपक्ष को बोलने नहीं दिया. 145 से अधिक सांसदों का एक बार में निलंबन कर दिया गया था. 2024 की तीसरी सरकार के बाद सत्तापक्ष का ऊंट पहाड़ के नीचे आया है. अब सत्तापक्ष विपक्षी दलों पर आरोप लगा रहा है कि वे हमें बोलने नहीं दे रहे हैं. इस से साफ हो गया है कि विपक्ष सरकार को रचनात्मक कार्य करने के लिए विवश करेगा. उसे धर्म पर खर्चों के जरिए जनता के टैक्स के पैसों को बरबाद नहीं करने देगा.

2014 और 2019 की दोनों सरकारों में नेता विपक्षी दल नहीं था. उस दौर में बड़े से बड़े फैसले में सत्ता पक्ष ने विपक्षी दलों की किसी मसले पर सहमति नहीं ली. विपक्ष तो छोड़िए, एनडीए के सहयोगी दलों को भी नहीं पूछा. 2024 में नरेंद्र मोदी अपने भाषण में विपक्षी दलों से अपील कर रहे हैं कि वे चुनावी मोड से बाहर आएं और मिलजुल कर काम करें. 2029 के चुनाव से पहले चुनावी मोड में आएं और एकदूसरे का विरोध करें. एक तरह से नरेंद्र मोदी की शांति अपील है, जैसे युद्ध में हारा हुआ योद्धा शांति की अपील करता है.

पिछली 2 सरकारों में नरेंद्र मोदी ने पूरी चमक और धमक से अपनी सरकार चलाई. विपक्ष की परवा नहीं की. किसी भी बजट या बिल पर बहस नहीं होने दी. दो सरकारों के कार्यकाल में कोई ऐसा काम नहीं हुआ जिस में सत्ता पक्ष और विपक्ष एकमत रहा हो. विपक्ष के विरोध और सुझाव दोनों को कभी तवज्जुह नहीं दी.

दो कार्यकालों से अलग है तीसरा कार्यकाल

मोदी की 2 सरकारों में कोई ऐसा निर्माण कार्य नहीं हुआ जिस में विपक्ष से राय ली गई हो और वह जनता के हित का हो. चाहे सरदार पटेल की मूर्ति हो, नया संसद भवन हो, राम मंदिर हो या चारधाम यात्रा मार्ग, सभी में विपक्ष को अपमानित करने वाला काम हुआ. संसद में जो काम हुए वे भी ऐसे ही रहे. जीएसटी में सुधार की बात हो या नोटबंदी, विपक्ष तो विपक्ष, कभी विभाग के मंत्री से भी नरेंद्र मोदी ने सलाह नहीं ली. मोदी और उन के मंत्री इस तरह की बात करते रहे कि विपक्ष वौकआउट ही कर जाए. इसी तरह से कश्मीर में अनुच्छेद 370 और राम मंदिर निर्माण का हाल रहा. किसानों के आंदोलन को ले कर पूरे एक साल मसला चलता रहा, प्रधानमंत्री ने कोई सुझाव नहीं माना. चुनाव के समय कृषि कानून वापस लिए.

4 जून से पहले नरेंद्र मोदी को लगता था कि विपक्ष अब रह ही नहीं जाएगा. भाजपा कांग्रेसमुक्त भारत का सपना देख रही थी. उसे लग रहा था कि अब लोकसभा चुनाव के बाद यह पूरा हो जाएगा. लोकसभा चुनाव के समय जब मीडिया राहुल गांधी का नाम ले कर कोई सवाल करती थी तो नरेंद्र मोदी कहते थे, ‘कौन राहुल?’ अपने चुनावी भाषणों में नरेंद्र मोदी कहते थे, ‘कांग्रेस राहुल गांधी की उम्र से भी कम सीटों पर सिमट जाएगी.’ अपनी पार्टी के लिए 400 प्लस की बात करते थे. 4 जून को सारे परिणाम बदल दिए.

लोकसभा के पहले सत्र और मानसून सत्र में विपक्ष ने दिखा दिया कि वह चुनाव जीता है. अब पहले जैसा मनमाना काम मोदी सरकार नहीं कर पाएगी. विपक्ष की धमक का असर यह हुआ कि हमेशा दहाड़ने वाले नरेंद्र मोदी का 56 इंच वाला सीना कमतर दिखने लगा है. उन की तरफ से लोकतंत्र की हत्या और गला दबाने जैसी बातें आने लगी हैं. प्रधानमंत्री की कुरसी पर भले ही नरेंद्र मोदी बैठे हों पर विपक्ष अपनी तरह से सरकार चला रहा है. अब सरकार का ध्यान इंडिया ब्लौक गर्वनेंस की तरफ जा रहा है.

मोदी सरकार को अपनी योजनाओं में फेरबदल करना होगा. अग्निवीर, रेल दुर्घटना, नीट एग्जाम और दुकानों पर नाम लिखने जैसे विवादित फैसले अब नहीं चलने वाले. विपक्ष का रूल चलने वाला है. अब विपक्ष का रूल चालू हो गया है. वह मोदी सरकार को काम नहीं करने देगा. लोकसभा के दोनों सत्रों को देख कर साफ अंदाजा लग रहा है कि सरकार अब घुटनों के बल आ गई है. मोदी सरकार के नए बजट को देख कर यह साफ हो गया है कि सरकार विपक्ष से डरी हुई है. विपक्ष लगातार कह रहा है कि मोदी सरकार में सहयोग कर रही दोनों पार्टियां जदयू और टीडीपी कभी भी अपनी बैसाखी खींच सकती हैं.

बजट के जरिए बैसाखी मजबूत की

इस डर का असर बजट पर देखने को मिल रहा है. पहले 2 कार्यकालों के 10 बजट में कभी बिहार और आंध्र प्रदेश को इतना महत्त्व नहीं दिया गया, जितना इस बार दिया गया है. बजट में सब से अधिक मलाई आंध्र प्रदेश और बिहार को मिली है. सब से अलग बात इस बजट में देखने को मिली है कि धर्म पर खर्च नहीं किया गया है. मोदी सरकार ने तीसरे कार्यकाल का अपना पहला आम बजट पेश किया. इस बजट में बिहार और आंध्र प्रदेश की बहार दिखी. 48 लाख 21 हजार करोड़ रुपए के मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले कुल बजट में अकेले बिहार और आंध्र प्रदेश को ही 1 लाख करोड़ से ज्यादा की सौगात मिली है.

बिहार को 58,500 करोड़ रुपए और आंध्र प्रदेश को 15,000 करोड़ रुपए विकास परियोजनाओं के लिए देने का ऐलान हुआ है. इस की झलक तो पहले ही मिल चुकी थी. 4 जून को नतीजों के बाद एनडीए की पहली बैठक में ही नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि ‘आप ने इतनी सेवा की है, जो मौका मिला है, आगे बिहार और देश आगे बढ़ेगा. बिहार के सब काम हो ही जाएंगे, जो काम बचा है, हो जाएगा. हम लोग पूरे तौर पर जो चाहेंगे, उस काम के लिए लगे रहेंगे.’

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आम बजट को ‘कुरसी बचाओ’ बजट कहा है. राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि यह बजट सहयोगी दलों के तुष्टिकरण का बजट है. बजट में दूसरे राज्यों की शर्त पर सहयोगी दलों से खोखले वादे किए गए हैं. यह पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने वाला बजट है. इस से ‘ए-ए’ को फायदा होगा जबकि आम लोगों के लिए बजट में कोई राहत नहीं है. बजट के कई प्रावधानों में कांग्रेस के घोषणापत्र और पुराने बजट की नकल की गई है.

बिहार में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि आम बजट ने बिहार के लोगों को फिर निराश किया है. बिहार को प्रगति पथ पर ले जाने के लिए एक रिवाइवल प्लान की जरूरत थी जिस के लिए विशेष राज्य के दर्जे के साथ विशेष पैकेज की सख्त जरूरत है. उन्होंने बजट में बिहार के लिए हुए ऐलान को रूटीन आवंटन और पहले से स्वीकृत, निर्धारित व आवंटित बताया है. पुराने आवंटन को नई सौगात बता कर बिहार का अपमान किया जा रहा है. पलायन रोकने, प्रदेश का पिछड़ापन हटाने और उद्योग धंधों के साथ युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए हम विशेष राज्य के दर्जे की मांग से इंच भर भी पीछे नहीं हटेंगे.

बिहार और आंध्र प्रदेश के बाद देखें कि आम लोगों को इस बजट में क्या मिला है? आम आदमी को बजट में मामूली राहत मिली है जिस से विपक्ष की बात का जवाब दिया जा सके. इस बार के बजट में इनकम टैक्स को ले कर आम आदमी को राहत दी गई है. न्यू टैक्स रिजीम चुनने वालों के तहत अब 3 से 7 लाख रुपए तक की आय पर 5 फीसदी के हिसाब से टैक्स देना होगा. पहले यह 6 लाख रुपए तक था. इसी तरह 6-9 लाख रुपए तक पहले 10 फीसदी टैक्स लगता था जो अब 7 से 10 लाख रुपए तक के स्लैब के लिए हो गया है. पहले 9-12 लाख रुपए पर 15 फीसदी टैक्स देना होता था जो अब 10 से 12 लाख रुपए के लिए होगी. 12 से 15 और 15 लाख रुपए से ज्यादा कमाई पर टैक्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

विपक्ष जिस तरह से युवाओं पर फोकस कर रहा है, बेरोजगारी की बात कर रहा है, उस के दबाव में उन के लिए इंटरनल स्कीम दी गई है. इस से कोई लाभ तो नहीं दिखता लेकिन युवाओं की परेशानियों की तरफ सरकार का ध्यान गया है. कुल मिला कर मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का यह बजट पहले दोनों कार्यकालों जैसा तानाशाही वाला नहीं है. बजट से ही लग रहा है कि यह मोदी सरकार का नहीं, एनडीए सरकार का बजट है. सरकार विपक्ष और सहयोगी दलों के दबाव में काम करेगी. सरकार गिरने का डर बजट पर दिख रहा है. कुल मिला कर तीसरे कार्यकाल की सरकार दबाव में ही काम करेगी. इस के एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई.

आम बजट: नरेंद्र मोदी का बैसाखी बजट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के पहले बजट सत्र में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट पर बड़ा गंभीर आरोप लगा है कि ‘यह बजट नरेंद्र मोदी की कुरसी बचाओ अभियान है.’ यह एक कौपीपेस्ट बजट है. इस में कांग्रेस की घोषणा की नकल है. इस में ओडिशा के साथ अन्याय है. कुल मिला कर यह देश के लिए एक ‘सिरदर्द बढ़ाओ बजट’ है.

इस का अभिप्राय यह है कि बिहार और आंध्र प्रदेश को पैकेज दे कर अपनी दोनों बैसाखियों को नरेंद्र मोदी ने मजबूत करने का काम किया है. दरअसल, इस से होगा यह कि थाली का अगर अधिकांश भोजन अपने दुलारे बच्चों को मां खिला दे तो दूसरे बच्चे भूखे रह जाएंगे, और यही बजट के दरमियान दिखाई दिया. यही कारण है कि वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा कि कोई विशेष पैकेज बिहार या आंध्र प्रदेश को नहीं दिया जा रहा है. यह कहने का मतलब ही साफ है कि वित्त मंत्री गलतबयानी कर रही हैं. पैकेज तो दिया गया है, अगर नहीं दिया गया है तो फिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अपनीअपनी प्रतिक्रियाओं में खुशी क्यों जाहिर की?

सारा देश जानता है, देख रहा है इस के बाद भी सच को नकारने का माद्दा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिखाया है. अच्छा होता उस की जगह सरकार सामने आती और स्वीकार करती कि हां, हम ने अपने सहयोगियों को मदद की, इस में कोई बुराई नहीं है.

सच यह है कि बिहार और आंध्र प्रदेश दोनों स्टेट आज नरेंद्र मोदी सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए सक्षम हैं. और इन प्रदेशों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं कहीं जा सकती.

इधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया- सरकार ने ‘कुरसी बचाओ’ बजट पेश किया है, जिस में भारतीय जनता पार्टी को खुश करने के लिए दूसरे राज्यों की कीमत पर खोखले वादे किए गए हैं. यह बजट कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र और पिछले कुछ बजटों की नकल है.

राहुल गांधी के मुताबिक, बिहार व आंध्र प्रदेश के अपने सहयोगियों को खुश करने के लिए अन्य राज्यों की कीमत पर उन से खोखले वादे किए गए हैं. अपने मित्रों को खुश किया गया और उन को लाभ दिया गया. लेकिन आम भारतीय को कोई राहत नहीं दी गई. वित्त मंत्री सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2024-25 में प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना की घोषणा की है जिस के तहत युवाओं को इंटर्नशिप के साथ 5,000 रुपए का मासिक भत्ता मिलेगा. यह एक मजेदार बात है और शायद इतिहास में पहली बार हुई है कि कांग्रेस ने हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के लिए जारी अपने घोषणापत्र (न्यायपत्र) में प्रशिक्षुता के अधिकार का वादा किया था जिस के तहत उस ने डिप्लोमा एवं डिग्रीधारक बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण के साथ एक साल तक हर महीने 8,500 रुपए देने का वादा किया था. कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को ‘पहली नौकरी पक्की’ नाम भी दिया था. इसे ही सीधेसीधे नरेंद्र मोदी सरकार ने इस बजट में अमली जामा पहना दिया. स्पष्ट है कि कांग्रेस की दशा और दिशा मजबूत है और इस से नरेंद्र मोदी सरकार भयभीत है.

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने यह दावा भी किया कि इस बजट में महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं को ले कर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तथा आम लोगों को कोई राहत प्रदान नहीं की गई. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के मुताबिक, वित्त मंत्री ने देश की तरक्की वाला नहीं, बल्कि ‘मोदी सरकार बचाओ’ बजट पेश किया है. उन्होंने कहा कि यह ‘नकलची बजट’ है जिस में सरकार कांग्रेस के ‘न्याय’ के एजेंडे की ठीक तरह से नकल भी नहीं कर पाई है. कांग्रेस के बड़े चेहरे पी चिदंबरम ने केंद्रीय बजट को निराशाजनक करार देते हुए  कहा- ‘महंगाई एवं बेरोजगारी को ले कर कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं तथा आम लोगों को कोई राहत नहीं दी गई है.’ सचमुच यह बजट अपनेआप में यह संकेत दे गया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार किस तरह बैसाखियों पर आगे चलेगी. यह संदेश यह भी बताता है कि आने वाले समय में नरेंद्र मोदी के लिए सिरदर्द बढ़ने वाला है.

ब्रेस्ट को ले कर महिलाओं में हैं ये मिथक

मिथ – दोनों स्तनों के साइज में फर्क होना एक मैडिकल समस्या है.

फैक्ट – आमतौर पर महिलाओं के ब्रेस्ट के आकार में मामूली अंतर चिंता का विषय नहीं होता है. दोनों ब्रेस्ट का आकार कभी एकसा नहीं होता बल्कि उन में थोड़ाबहुत अंतर होना सामान्य है. ब्रेस्ट के आकार में अंतर हार्मोनल बदलाव के कारण भी हो सकता है. यह उम्र बढ़ने के साथ होता है. इस स्थिति में एक ब्रेस्ट की ग्रोथ पहले होने लगती है. लेकिन दोनों की ग्रोथ रुकती एक साथ ही. ऐसे में एक ब्रेस्ट छोटी ही रह जाती है. ऐसे में महिलाओं को असहज महसूस होता है. स्तनों के आकार में बदलाव आनुवंशिक कारण की वजह से भी हो सकता है. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि आप को किसी मैडिकल उपचार की आवश्यकता है.

मिथ – ब्रेस्टफीडिंग की वजह से ब्रेस्ट लूज़ हो कर लटक जाते हैं.

फैक्ट – यही वजह कि कुछ महिलाएं अपने बच्चों को ब्रेस्टफीडिंग करवाने से डरती हैं और उन्हें वे अपना दूध पिलाने के बजाय बोतल का दूध पिलाती हैं जोकि बच्चे के लिए अच्छा नहीं है. जबकि सच यह है कि ब्रेस्ट का आकर प्रेग्नेंसी में महिलाओं का वजन बढ़ने से बढ़ता है न कि दूध पिलाने से. बढ़ती उम्र के साथ त्वचा अपनी इलास्टिसिटी खोने लगती है, जिस की वजह से भी स्किन ढीली पड़ सकती है. ब्रेस्टफीडिंग करना वास्तव में आप के ब्रेस्ट के आकार को सुडौल बनाए रखने में मदद करता है और उन्हें वापस अपने शेप में लाता है, शेप बिगड़ता नहीं है.

मिथ – ब्रेस्ट कैंसर की एक वजह ब्रा भी है.

फैक्ट – ऐसे कोई वैज्ञानिक तथ्य मौजूद नहीं हैं जो ये साबित करें कि टाइट ब्रा या अंडरवायर पहनने से ब्रेस्ट कैंसर हो सकता है. दिल्ली के शालीमार बाग इलाके के मैक्स हौस्पिटल के सीनियर औंकोलौजिस्ट डाक्टर अजय शर्मा ने बताया कि कैंसर और ब्रा का सीधा संबंध नहीं है. आज तक प्रमाण नहीं मिला है. अभी तक डाक्टरों को ऐसा तथ्य नहीं मिला है जिस से कहा जा सके कि अंडरवायर ब्रा रात को पहन कर सोने से स्तन कैंसर हो जाता है. ब्रा के रंग या उस के प्रकार का ब्रेस्ट कैंसर से कोई लेनादेना नहीं है. कहने का मतलब यह है कि पैडेड, अंडरवायर्ड या डार्क रंगों वाली ब्रा से आप की स्किन पर रैशेज हो सकते हैं लेकिन इन का ब्रेस्ट कैंसर से कोई लेनादेना नहीं होता. यहां तक कि इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि निप्पल पियर्सिंग से ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन यह भी सच है कि अगर ब्रा अपने साइज की न पहनी जाए या फिर कसी हुई हो तो उस से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं.

मिथ – प्रेस करने से ब्रैस्ट साइज बढ़ जाता है.

फैक्ट – इस मिथ की वजह से महिलाएं सैक्स का भी पूरा आनंद नहीं ले पातीं और अपने पार्टनर को ब्रेस्ट छूने से रोक देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा कर के उन की ब्रेस्ट का साइज बढ़ जाता है. यह सिर्फ एक मिथक है. महिला के ब्रेस्ट हार्मोन इंबैलेंस की वजह से बड़े हो सकते हैं लेकिन इस का ब्रेस्ट प्रेस करने से कोई लेनादेना नहीं है. इसलिए अगर आप का पार्टनर आप के ब्रेस्ट प्रेस करना चाहता है तो आप बेफिक्र हो कर उन्हें ऐसा करने दें, क्योंकि ऐसा करने से आप के ब्रेस्ट का आकार नहीं बढ़ता.

मिथ – ब्रेस्टफीडिंग कराना काफी असुविधाजनक होता है.

फैक्ट – ब्रेस्टफीडिंग करने से पेन होता है, यह बात पूरी तरह से सही नहीं है. ब्रेस्टफीडिंग कराने का भी एक तरीका होता है जिसे एकदो बार अपनी डाक्टर से सीख लेने पर कोई परेशानी नहीं होती. कुछ महिलाओं को शुरुआत के कुछ हफ्ते थोड़ा ब्रेस्ट में दर्द हो सकता है लेकिन कुछ ही दिनों में यह ठीक हो जाता है. बल्कि ब्रेस्टफीडिंग न करने से ब्रेस्ट में भारीपन हो जाता है लेकिन ब्रेस्टफीडिंग कराने पर ब्रेस्ट में काफी हलकापन आता है.

मिथ – मालिश करने से छोटे ब्रेस्ट बड़े हो जाते हैं.

फैक्ट – कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि मालिश करने से छोटे ब्रेस्ट बड़े हो जाते हैं. लेकिन इस का कोई साइंटिफिक तरीका नहीं है. बहुत सी महिलाएं अपने ब्रेस्ट का आकार बढ़ाने के लिए कई तरह की क्रीम या औषधियों या फिर तेल का प्रयोग करती हैं. लेकिन एक स्टडी के मुताबिक यह पता चलता है कि इन औषधियों से शरीर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.

वामपंथी कमला हैरिस के पक्ष में बह रही है अमेरिका की हवा

अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन के चुनाव मैदान से हटने की घोषणा के बाद कई डैमोक्रेटिक नेताओं के लिए राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनने का दरवाजा खुल गया है, लेकिन राष्ट्रपति जो बाइडन ने पार्टी उम्मीदवार के तौर पर देश की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को अपना समर्थन दिया है तथा कई अन्य प्रमुख डैमोक्रेटिक नेता भी उन की उम्मीदवारी के पक्ष में आगे आए हैं. बाइडन ने 2020 में हैरिस को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनते हुए उन्हें निडर योद्धा कहा था.

कमला हैरिस जनवरी 2021 से अमेरिका में उपराष्ट्रपति के पद पर विराजमान हैं. वे अमेरिका की पहली महिला, पहली अश्वेत और दक्षिण एशियाई मूल की पहली ऐसी नागरिक हैं जो इस पद पर आसीन हैं. 59 वर्षीया हैरिस ने 2 बार कैलिफोर्निया की अटौर्नी जनरल चुने जाने के बाद 2016 में अमेरिकी सीनेट में अपनी सीट जीती थी.

भारत और जमैका से आए अप्रवासियों की बेटी कमला हैरिस ने अपना कैरियर एक अभियोक्ता के रूप में शुरू किया था और लगभग 3 दशक कानून प्रवर्तन में बिताए. उन्होंने स्थानीय अभियोक्ता के रूप में कैरियर की शुरुआत की, फिर 2011 में कैलिफोर्निया अटौर्नी जनरल चुने जाने से पहले सैन फ्रांसिस्को की जिला अटौर्नी बनीं. वर्ष 2003 में उन की जिला अटौर्नी की दौड़ में उन्हें उस वर्ष शहर-व्यापी कार्यालय के लिए दौड़ने वाले किसी भी अन्य उम्मीदवार की तुलना में अधिक वोट मिले थे, जिस में उन्होंने 2 बार के मौजूदा उम्मीदवार को हराया था. हैरिस ने आज तक कभी भी आम चुनाव नहीं हारा है, जिस में 2017 में सीनेट का चुनाव भी शामिल है.

कैलिफोर्निया के औकलैंड में जन्मी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस नागरिक अधिकार वकील एवं न्यायविद दिवंगत थरगुड मार्शल को अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं और अपने जीवन पर नागरिक अधिकार आंदोलन से जुड़े रहे अपने मातापिता के प्रभाव का अकसर जिक्र करती हैं. लौसएंजिलिस के वकील डगलस एमहौफ कमला हैरिस के पति हैं.

उम्मीद जाहिर की जा रही है कि डैमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से कमला हैरिस ही राष्ट्रपति पद की सब से प्रबल उम्मीदवार होंगी. हालांकि डैमोक्रेटिक उम्मीदवार बनने के प्रमुख दावेदारों में कमला हैरिस के अलावा जे बी प्रिट्जकर, ग्रेचेन व्हिटमोर, गेविल न्यूजौम और जोश शापिरो भी शामिल हैं.

इलिनोइस के गवर्नर जे बी प्रिट्जकर अमेरिका में पद पर आसीन सब से अमीर नेता हैं. वे ‘हयात होटल’ के उत्तराधिकारी, पूर्व निजी इक्विटी निवेशक और परोपकारी नेता के तौर पर जाने जाते हैं. उन की कुल संपत्ति 3.4 अरब अमेरिकी डौलर है. उन्हें ‘फ़ोर्ब्स 400’ की सब से अमीर अमेरिकियों की सूची में 250वें स्थान पर रखा गया. इस सूची में मिशिगन की गवर्नर ग्रेचेन व्हिटमोर भी शामिल हैं. वे राज्य विधायिका में डेढ़ दशक तक सेवाएं देने के बाद 2018 में गवर्नर पद के चुनाव में पहली बार जीत हासिल कर डैमोक्रेटिक पार्टी में तेजी से उभरीं. कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूजौम सैन फ्रांसिस्को के मूल निवासी हैं, जो 1995 में मेयर पद के लिए विली ब्राउन के प्रचार अभियान में स्वयंसेवक के तौर पर राजनीति में शामिल हुए थे.

मेयर ब्राउन ने 2 साल बाद न्यूजौम को सैन फ्रांसिस्को बोर्ड औफ़ सुपरवाइजर्स की एक खाली सीट पर नियुक्त किया और बाद में उन्हें इस सीट पर फिर किया गया. न्यूजौम ने बाद में मेयर पद का चुनाव जीता और 2004 में सैन फ्रांसिस्को क्लर्क को समलैंगिक जोड़ों को विवाह लाइसैंस जारी करने का निर्देश दे कर वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए. पेंसिल्वेनिया के गवर्नर जोश शापिरो को पार्टी का एक उभरता नेता माना जाता है. उन्होंने गवर्नर पद के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समर्थित उम्मीदवार को करारी शिकस्त दी थी. वे अटौर्नी जनरल के तौर पर भी सेवाएं दे चुके हैं.

लेकिन इन सभी में कमला हैरिस दौड़ में सब से आगे नजर आ रही हैं. जो बाइडन के बाद रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप को मात देने का माद्दा सब से ज्यादा कमला हैरिस में ही है. राष्ट्रपति जो बाइडन को बारबार अनेक मंचों से बूढ़ाबूढ़ा कह कर उन को अपमानित करने और उन का हौसला डिगाने की कोशिश करने वाले डोनाल्ड ट्रंप कमला हैरिस के संबंध में ऐसी बातें नहीं कर पाएंगे क्योंकि वे खुद 78 वर्ष के हैं और कमला की उम्र 59 वर्ष ही है. कहीं ऐसा न हो कि अब उन का दांव उन पर ही उलटा पड़ जाए.

गौरतलब है कि 20 जनवरी, 2021 को अमेरिका में डैमोक्रेट जो बाइडन के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के साथ पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पूरे सिस्टम को दक्षिणपंथी उग्र विचारधारा का गुलाम होने से बचा लिया था. एक बददिमाग, बड़बोले, दंभी और खुद को श्रेष्ठ समझने की खुशफहमी पालने वाले गोरे के हाथों बरबाद होने के बजाय देश की कमान जो बाइडेन के हाथों में सौंप कर अमेरिकी जनता ने बता दिया कि उस को शांति, प्रेम, सद्भावना और भाईचारे की ज्यादा जरूरत है. जो बाइडन ने अमेरिका की बागडोर बखूबी संभाली और उन के हर फैसले को उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का समर्थन रहा.

बता दें कि जो बाइडन से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए अपने 4 साल के कार्यकाल में पूरे सिस्टम पर हावी होने और उस को अपने इशारे पर चलाने की भरसक कोशिश की. दुनिया के ताकतवर लोकतंत्र पर अपनी तानाशाही दिखाने का जनून इस कदर सिर चढ़ा कि जब 2021 के चुनाव हुए तो चुनाव हार जाने के बावजूद ट्रंप अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए और लोकतांत्रिक तरीके से संपन्न हुए चुनाव पर धांधली के आरोप लगाते रहे. अपनी जीत मनवाने के लिए उन्होंने अदालतों पर हावी होने और उन को अपने पक्ष में करने की भी कोशिश की. ट्रंप ने जोरजबरदस्ती की. हठ दिखाया. यहां तक कि लोकतंत्रविरोधी तरीके से सत्ता हथियाने का नंगा नाच भी किया.

डोनाल्ड ट्रंप के चुनावप्रचार के घटियापन का आलम यह था कि वे लगातार अमानवीय, अलोकतांत्रिक तरीके से चुनावप्रचार करते हुए हर इलाके के श्वेत गुंडों को बढ़ावा देते रहे. इन्हीं श्वेत गुंडों की फ़ौज ने 6 जनवरी, 2021 को अमेरिकी संसद पर उस वक़्त हमला किया जब वहां इलैक्टोरल कालेज के वोटों की गिनती चल रही थी. डोनाल्ड ट्रंप के लिए शर्म की बात यह है कि जो बदमाश आए थे, वे वहीं व्हाइट हाउस के पास बने हुए डोनाल्ड ट्रंप के होटल में ही ठिकाना बनाए हुए थे. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया की नज़र में ही नहीं, बल्कि अमेरिका की बहुत बड़ी आबादी की नजर में भी अपनेआप को बहुत घटिया इंसान साबित कर लिया था. उन की इस करतूत से लोकतंत्र को गहरा झटका लगा था और उस का असर अब भी कायम है. डोनाल्ड ट्रंप के आह्वान पर हुए इस हमले ने अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में हमेशा के लिए एक काला पन्ना जोड़ दिया.

जो बाइडन के सत्ता में आने से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते अपने 4 साल के कार्यकाल में अमेरिकी समाज को श्वेतअश्वेत में बांटने का ही काम किया. हिंसा, उद्दंडता और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया. उन के समर्थकों में ऐसे बहुत लोग हैं जो अमेरिका में श्वेत लोगों के आधिपत्य के समर्थक हैं. उल्लेखनीय है कि जब अमेरिका में मानवाधिकारों के आंदोलन ने जोर पकड़ा और ब्राउन बोर्ड औफ एजुकेशन द्वारा कानूनी लड़ाइयां लड़ने व ब्राउन के पक्ष में फैसला आने के बाद काले बच्चों को भी स्कूलों में दाखिला देना अनिवार्य कर दिया गया तो संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण के राज्यों में श्वेत अधिनायकवादियों के कई गिरोह बन गए थे. उन हथियारबंद बदमाशों के गिरोह को ‘क्लू क्लैक्स क्लान’ के नाम से जाना जाता है.

साठ के दशक में राष्ट्रपति केनेडी और उन के भाई बौब केनेडी ने मानवाधिकारों के लिए बहुत काम किया. तब अमेरिका में महिलाओं और काले लोगों के मताधिकार के कानून बने. उस के बाद क्लू क्लैक्स क्लैन वाले धीरेधीरे तिरोहित हो रहे थे, उन का जोर कम हो रहा था, लेकिन जब रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उम्मीदवार बने तो उन्होंने फिर इन क्लू क्लैक्स क्लैन के दबंगों को आगे किया और काले लोगों को औकात दिखाने के नाम पर चुनाव जीत लिया. रिचर्ड निक्सन का जो हश्र हुआ वह दुनिया को मालूम है. वे महाभियोग की चपेट में आए और अपमानित हो कर उन को गद्दी छोड़नी पड़ी. रिचर्ड निक्सन की तरह अमेरिका में एक बार फिर श्वेत अधिनायकवाद का सहारा ले कर डोनाल्ड ट्रंप चुनाव जीतना चाहते थे. उन्होंने अपने पूरे चुनावप्रचार के दौरान काले लोगों पर निशाना साधा और गोरों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में किया. चुनाव के दौरान वो पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल की निंदा को अपना प्रमुख एजेंडा बनाए रहे और अश्वेत, अफ्रीकी-भारतीय-अमेरिकी कमला हैरिस के खिलाफ भी जहर उगलते रहे.

इस तरह की हिंसक गतिविधियों के जरिए सत्ता पर काबिज होने की चाहत बिलकुल वैसी है जैसी भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा की भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं की मनोवृत्ति है. लेकिन देश कोई भी हो, इस तरह की मनोवृत्ति को जनता आखिरकार नकार ही देती है. जनता अमूमन शांति और भाईचारे की समर्थक होती है, चाहे वह किसी भी देश की हो.

अयोध्या में राम मंदिर के प्राणप्रतिष्ठा के भव्य समारोह के बाद भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा दिया था. उस वक़्त पूरा देश ही नहीं, दुनिया भी यह मान रही थी कि मोदी हैं तो मुमकिन है और लोकसभा चुनाव में भाजपा 400 से ऊपर सीटें ला कर देश को न सिर्फ कांग्रेस मुक्त कर देगी बल्कि अन्य विपक्षी पार्टियों का भी कोई अस्तित्व नहीं बचेगा. पर 3 महीने भी पूरे नहीं हुए कि जनता ने भाजपा को आसमान से जमीन पर ला दिया. लोकसभा चुनाव का जब रिजल्ट आया तो जनता ने दक्षिणपंथी विचारधारा की भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदों पर मनों घड़े पानी उंड़ेल दिया और उस की उछाल मारती आकांक्षाओं को इतने सीमित दायरे में बांध दिया कि उस की अपने बूते सरकार बनाने की कूवत भी नहीं बची.

फ्रांस के आम चुनाव में भी वामपंथी दलों के एलायंस को सब से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल हुई है. फ्रांस के चुनाव से एक महीने पहले तक न्यू पॉपुलर फ्रंट (एनएफपी) नामक इस गठबंधन का कोई अस्तित्व नहीं था. चुनाव के ऐलान के बाद सब को चौंकाते हुए कई दलों ने साथ आ कर न्यू पौपुलर फ्रंट (एनएफपी) बनाया और इस एलायंस ने फ्रांस की संसद में सब से ज्यादा सीटें जीतीं.  इस चुनाव में एनएफपी ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के मध्यमार्गी गठबंधन को दूसरे और धुर दक्षिणपंथी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया. फ़्रांस में एक हफ्ते में वामपंथ ने लोगों का दिल जीत लिया और सत्ता में आ गया. जाहिर है, दुनियाभर के लोग दक्षिणपंथी उग्र, आक्रामकता पूर्ण विचारों से दूर एक सभ्य और शांत वातावरण चाहते हैं.

मेरे पति की सरकारी नौकरी है पर वे मेरे मना करने के बाद भी लोगों से रिश्वत लेते हैं. मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल –

मेरे पति सरकारी नौकरी करते हैं और वे कभीकभी लोगों का अटका हुआ सरकारी काम रिश्वत ले कर करवा देते हैं. मुझे बहुत डर लगता है कि कहीं किसी दिन रिश्वत लेने के कारण वे किसी मुसीबत में ना फंस जाएं. उन की सैलेरी अच्छी है और हमारा घर उन की सैलेरी से अच्छा चल जाता है तो जब मैं उन्हें यह सब करने से मना करती हूं तो वे मुझे यह कह कर चुप करवा देते हैं कि सरकारी काम में यह सब करना पड़ता है. मुझे समझ नहीं आता कि मुझे क्या करना चाहिए.

जवाब –

यह बात तो पक्की है कि आज के समय में बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता. हमारा सिस्टम बिना रिश्वत के चल ही नहीं सकता क्योंकि लोगों को रिश्वत लेनेदेने की ऐसी लत लग चुकी है कि बिना पैसे के कोई भी काम करा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है.

हो सकता है आपके पति भी इस सिस्टम में मजबूर हों क्योंकि रिश्वत का पैसा केवल एक व्यक्ति के पास नहीं जाता बल्कि छोटे पोस्ट से लेकर बड़े पोस्ट पर बैठे हर व्यक्ति को रिश्वत का पैसा चाहिए होता है. जितनी बड़ी पोस्ट उतनी ज्यादा ज़रूरतें और उससे भी ज्यादा रिश्वत.

यह बात आपकी बहुत अच्छी है कि आप को यह पैसा बिल्कुल अच्छा नहीं लगता और आप चाहते हैं कि आप के पति रिश्वत लेना छोड़ दें पर ऐसा भी तो हो सकता है कि उन के ऊपर जो व्यक्ति हो उसके लिए उन्हें रिश्वत लेनी पड़ती हो या किसी के दबाव में आ कर वे रिश्वत लेते हों. अब इसे सही कहो या गलत लेकिन हमारा सिस्टम चलता ही ऐसे है.

आप उन्हें समझा सकते हैं कि वे सिर्फ मजबूरी में ही रिश्वत लेने वाले काम करें क्योंकि गलत तरीके से आया हुआ पैसा हर किसी को नहीं फलता. अगर आपको ज्यादा बुरा लगता है तो आप उन रिश्वत से आए पैसों से गरीबों की भूख मिटा सकती हैं और किसी की मदद के काम में लगा सकते हैं पर कोशिश कीजिए कि उन पैसों को जल्दी से जल्दी खर्च कर दें. बहुत पैसे होते हैं, तो कई बार व्यक्ति गलत संगति में भी पड़ जाता है. बेहतर होगा इस तरह की बुरी आदत से दूर रहें और अपने पति को भी इसके प्रति अलर्ट करती रहें. एक बात याद रखें कि मजबूरी में रिश्वत लेना तो ठीक है लेकिन अपने लालच को कभी भी मजबूरी पर हावी नहीं होने दें.

Monsoon Season : कम बजट में घूम आएं कोई एक दिलकश आईलैंड

मौनसून सीजन अपने साथ साथ लोगों के दिलों में एक नई ताज़गी और एक्साइटमेंट लेकर आता है. बारिश को देख अच्छे अच्छों का दिल ललचा जाता है और हर कोई सोचने पर मजबूर हो जाता है कि बारिश में क्यूं ना अपने फ्रेंड्स, पार्टनर या फिर अपनी फैमिली के साथ किसी अच्छी सी जगह घूमने का प्लैन किया जाएं. ऐसे में हम आपके लिए लेकर आए हैं 5 कमाल के आईलैंड जिसे आप मौनसून सीजन में विजिट कर अपने लाइफ के कुछ हसीन पल यादगार बना सकते हैं. तो चलिए हम आपको बताते हैं कि बारिश में आप कौन कौन से आईलैंड घूम सकते हैं जो कि बिल्कुल एफौरडेबल और मज़ेदार हैं.

वेतनाम (Vietnam)

वेतनाम के नज़ारों के तो क्या ही कहने. अगर आप किसी ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहां आपको थोड़ा शांत माहौल मिल सके और आप अच्छे से रिलैक्स हो पाएं तो वेतनाम आपके लिए सकसे बेस्ट औप्शन है. वेतनाम साउथ ईस्ट एशिया का सबसे शांत और कम भीड़-भाड़ वाला इलाका है. मौनसून सीज़न में आप वेतनाम के कैफे, म्यूजियम्स, शानदार मंदिर और यहां तक की उनके हिस्टोरिक मौन्यूमेंट्स का भी मज़ा अठा सकते हैं. आप पूरा वेतनाम आराम से 4 से 5 दिन में कवर सकते हैं जिसका बजट 30 से 50 हज़ार रूपए तक हो सकता है जिसमें आपका होटल और ब्रेकफास्ट इक्लूडिड रहेगा.

गिली आईलैंड (Gili Island)

गिली आईलैंड इंडोनेशिया का सबसे बेस्ट आईलैंड माना जाता है. माउनटेंस के नज़ारों के बीच बना यह आईलैंड आपके लिए अब तक को सकसे बेस्ट एक्सीपिसयंस साबित हो सकता है. अगर आप मौनसून सीजन में स्वीमिंग और पानी का मजा उठाने और बेहतरीन नज़ारे देखने के शौकीन है तो गिली आईलैंड आपको बेहद पसंद आएगा. गिली आईलैंड पर बैठ आप अपने मनपसंद खाने का भी लुत्फ उठा सकते हैं. अगर आप एडवैंचर करने के शौकीन हैं तो गिली आईलैंड पर आप कई सारे वौटर स्पोर्ट्स और एडवैंचर एक्टिविटीज़ कर सकते हैं. गिली आइलैंड में आप 3 दिन आराम से रिलैक्स कर सकते हैं जिसके लिए आपको 40 से 50 हज़ार रूपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं.

कोस्टा रीका (Costa-Rica)

कोस्टा रीका सेंट्रल अमेरीका का सबसे बेस्ट और सबसे शांत आईलैंड माना जाता है. यहां के ग्रीन फोरेस्ट को देख आप चाह कर भी इस जगह को कभी भूल नहीं पाएंगे. कोस्टा रीका जाने का सबसे बेस्ट समय मई से सेकर नवंबर तक है क्योंकि इसी बीच यहां बारिश का मौसम रहता है और इस मौसम में यहां की ग्रीनरी और बारिश अच्छे अच्छों को दीवाना बना देती है. कोस्टा रीका में आपको खर्च लगभग 30 से 40 हज़ार रूपए तक आ सकता है.

मैक्सिको (Mexico)

मैक्सिको नोर्थ अमेरिका की सबसे पौपुलर जगहों में से एक है. मैक्सिको का नाम आप सबने एक ना एक बार तो जरूर सुना होगा. मैक्सिको ने नज़ारों के बारे में क्या ही बात करें. मैक्सिको अपने म्यूज़ियम्स और हिस्टौरिक बिल्डिंग्स के लिए जाना जाता है. बारिश के समय मैक्सिको में करने के लिए बहुत ही सीज़े हैं. बारिश के मौसम में आप मैक्सिको में लौंग ड्राइव एक्सपीरियंस कर सकते हैं जिससे कि आप मैक्सिको के माइंड ब्लोइंग व्यूज़ का मज़ा ले सकते हैं. मैक्सिको के मौनसून सीजन का मज़ा लेने के लिए सबसे अच्छा समय मई से अक्टूबर तक है. मैक्सिको में आप 3-4 दिन रुक सकते हैं जिसमें आपका खर्च 50 से 70 हज़ार रूपए तक आ सकता है जिसमें आपका होटल और ब्रेकफास्ट इन्कलूडिड रहेगा.

कैनेरी आईलैंड (Canary Island)

कैनेरी आईलैंड स्पेन का बेहद ही खूबसूरत और बजट-फ्रेंडली आईलैंड है. कैनेरी आईलैंड का हसीन मौसम किसी को भी दीवाना बना सकता है. कैनेरी आईलैंड बहुत ही एफौरडेबल आईलैंड है और यहां आप कार रेंट पर ले कर घूम सकते हैं जिसका रेंट साधारण 7 यूरो प्रतीदिन के आसपास है. यहां पहाड़ों पर बने गांव और बीच के नज़ारे बहुत ही पौपुलर है. स्पेन की ब्यूटी अपने आप में ही काफी चर्चित रही है तो स्पेन के इस खूबसूरत आईलैंड पर आपको जरूर जाना चाहिए. कैनेरी आईलैंड में आप 40 से 50 हज़ार के अंदर अच्छे से एंजौय कर सकते हैं जिसमें आपके वौटर स्पोर्टस और होटल्स भी इंकलूडिड रहेंगे.

और भी हैं नोट छापने की मशीनें

कुदरतउल्लाह ऐसा आदमी था, जिसे कहीं भी पहचाना जा सकता था. लंबे कद और दुबलेपतले शरीर वाले कुदरतउल्लाह की आंखें छोटीछोटी थीं और गालों की हड्डियां उभरी हुईं. उन उभरी हड्डियों के बीच में एक काला मस्सा था, जो किसी तालाब के टापू की तरह उभरा था, लेकिन माथा काफी ऊंचा था. उस की गरदन काफी छोटी, जो लंबे कद पर बड़ी विचित्र लगती थी.

चपटी नाक के नीचे घनी मूछों की वजह से उस का चेहरा आम चेहरों से अलग लगता था. वह हुलिया भी ऐसा बनाए रहता था कि दूर से पहचान में आ जाता था. कुल मिला कर उस का डीलडौल ऐसा था कि उस से मिलने आने वालों को उस के बारे में किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती थी. निसार चौधरी भी बिना किसी से कुछ पूछे उस के पास जा पहुंचे थे. कुदरतउल्लाह ने उन्हें नीचे से ऊपर तक देखते हुए पूछा, ‘‘आप की तारीफ?’’

‘‘मुझे निसार चौधरी कहते हैं.’’ निसार ने बिना इजाजत लिए सामने रखी कुरसी खींच कर बैठते हुए कहा, ‘‘आप के बारे में मुझे सब पता है. फरजंद अली ने मुझे सब बता दिया था.’’

‘‘मैं भी आप का ही इंतजार कर रहा था.’’ कुदरतउल्लाह ने अपने पतले होंठों पर मुसकराहट सजाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा, ‘‘फरजंद अली ने मुझे भी आप के बारे में सब बता दिया था.’’

‘‘इधरउधर की बातों में समय बेकार करने के बजाए सीधे काम की बात करनी चाहिए,’’ निसार ने कुदरतउल्लाह से चाय मंगाने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे इस कारोबार में आए अभी 2 साल ही हुए हैं. वैसे तो मेरे पास अभी 4 मशीनें हैं, लेकिन उन में एक ही मशीन ऐसी है, जो ठीकठाक प्रोडेक्शन देती है. मैं ने यह बात फरजंद अली से कही तो उन्होंने आप के बारे में बताया कि आप के यहां तैयार मशीनें और कारखाने में तैयार मशीनों से अच्छा काम करती हैं.’’

‘‘मुझे जानने वालों का यही खयाल है.’’ कुदरतउल्लाह ने कहा, ‘‘इस समय मेरे पास 3 मशीनें हैं, जिन्हें मैं एक साथ बेचना चाहता हूं. जो आदमी तीनों मशीनें एक साथ खरीदेगा मैं उसी को बेचूंगा.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’ निसार ने हैरानी से कहा, ‘‘भई मुझे तो 2 ही मशीनें चाहिए.’’

‘‘बाकी बची एक मशीन का मैं क्या करूंगा? दरअसल मैं अपना कारखाना कहीं और शिफ्ट करना चाहता हूं.’’

‘‘क्यों…? लोग बाहर से आ कर यहां कारखाने लगाते हैं और आप यह शहर छोड़ कर कहीं और जा रहे हो. मशीनें तैयार करने के लिए यहां जैसा कच्चा माल शायद कहीं और नहीं मिलेगा?’’

‘‘कच्चा माल तो वाकई यहां बड़ी आसानी से और सस्ता मिल जाता है, लेकिन यहां के कच्चे माल से तैयार की गई मशीनें जल्दी बिकती नहीं. लोग इन्हें कम ही खरीदते हैं. वजह शायद यह है कि यहां की मशीनें उन के दिल में नहीं उतरतीं.’’

‘‘खैर, यह लंबी बहस का विषय है,’’ निसार ने कहा, ‘‘चूंकि मैं पहली बार आप के यहां आया हूं, इसलिए मुझे मालूम नहीं कि आप की मशीनों की कीमत क्या है. अगर आप बताए तो…’’

‘‘कीमत मशीन के हिसाब से होती हैं. इस समय मेरे पास जो मशीनें हैं, उन में से केवल एक 20 हजार रुपए की है, बाकी की 2 मशीनें 50-50 हजार की हैं.’’

‘‘कीमत कुछ ज्यादा नहीं हैं?’’

‘‘ज्यादा नहीं हैं भाई, मैं बहुत कम बता रहा हूं.’’

‘‘इतनी रकम वसूलने में ही सालों लग जाएंगे. उस के बाद फायदे का नंबर आएगा.’’ निसार ने कहा, ‘‘मेरे पास जो मशीनें हैं, वे 10-15 हजार से ज्यादा की नहीं हैं.’’

‘‘इसीलिए तुम ऐसी बात कर रहे हो,’’ कुदरतउल्लाह ने कहा, ‘‘मेरी मशीनें ऐसी हैं, जिन के प्रोडेक्शन पर लोग गर्व करते हैं. 3-4 महीने में ही लाभ देने लगती हैं. मेरे साथ जो कारीगर काम करते हैं, उन्हें मेरी मशीनों का बहुत अच्छा अनुभव है.’’

‘‘मैं ने यह तो नहीं कहा कि तुम्हारी मशीनें फायदा नहीं देंगी.’’ निसार ने दबे लहजे में कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास उतनी रकम नहीं हैं, जितनी तुम मांग रहे हो. तीनों मशीनों की कीमत एक लाख 20 हजार रुपए होती है ऊपर से आप तीनों मशीनें एक साथ बेचना चाहते हैं.’’

‘‘इस कारोबार में उधार बिलकुल नहीं चलता. वैसे भी मैं यह शहर ही छोड़ कर जा रहा हूं, इसलिए पैसे भी नकद चाहिए.’’

‘‘क्या तुम मुझे मशीनें दिखा सकते हो?’’

‘‘कारखानों में ले जा कर दिखाना तो मुश्किल है, क्योंकि कारखाना दिखाना हमारे उसूल के खिलाफ है.’’ कुदरतउल्लाह ने कहा, ‘‘मेरे पास मशीनों की तसवीरें हैं, उन्हें देख कर आप को अंदाजा हो जाएगा कि मेरे कारीगरों ने इन पर कितनी मेहनत की हैं.’’

निसार चौधरी कुदरतउल्लाह से तसवीरें ले कर एक एक कर के ध्यान से देखने लगा. वाकई उन मशीनों को तैयार करने में काफी मेहनत की गई थी. निसार ने तसवीरों को उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता कि अभी आप मुझ से 70 हजार रुपए ले लें और बाकी की रकम बाद में.’’

‘‘मेरी एक बात मानोगे?’’ कुदरतउल्लाह ने कहा.

‘‘एक नहीं, आप की 10 बातें मानूंगा.’’ निसार ने खुशदिली से कहा.

‘‘फरजंद अली आप का दोस्त है न?’’

‘‘हां, मेरे उन से बहुत अच्छे संबंध हैं.’’

‘‘तो ऐसा करो कि उधार करने के बजाए बाकी रकम उस से उधार ले कर दे दो.’’

‘‘भाई साहब, वह ऐसे ही रुपए नहीं देता, मोटा ब्याज लेता है. जबकि मैं ब्याज पर रकम ले कर कारोबार करना ठीक नहीं समझता. क्योंकि जो कमाई होगी, वह ब्याज अदा करने में ही चली जाएगी.’’

‘‘फिर तो आप का आना बेकार गया,’’ कुदरतउल्लाह ने कहा.

निसार चौधरी उठने ही वाले थे कि उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘अच्छा, आप एक काम करो, 30 हजार रुपए का इंतजाम कर के एक लाख रुपए में सौदा कर लो. उस के बाद मुझे बता दो कि मशीनें कहां पहुंचानी है.’’

‘‘ठीक है कोशिश करता हूं. इस वक्त मेरे पास 50 हजार रुपए हैं, इन्हें रख लीजिए.’’ निसार ने 5 सौ रुपए की एक गड्डी निकाल कर कुदरतउल्लाह की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बाकी रुपए मैं कल पहुंचा दूंगा.’’

‘‘आप शायद मेरी मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं?’’ कुदरतउल्लाह ने गड्डी जेब में रखते हुए कहा, ‘‘वैसे मशीनें कहां पहुंचानी होंगी?’’

‘‘बंदर रोड पर त्रिभुवनलाल जगमल का जो बोर्ड लगा है, उस के सामने वाली गली में मशीनें पहुंचानी हैं.’’ निसार ने कहा, ‘‘बाकी पैसे भी मैं वहीं दे दूंगा.’’

‘‘मशीनें कल रात 11 बजे पहुंच जाएंगी. लेकिन रुपए आप को दिन में देने होंगे. दोटांकी के पास एक शानदार कैफे है. कल दोपहर को मैं वहां पहुंच जाऊंगा. वहीं आ जाना.’’

‘‘क्या आप को मुझ पर विश्वास नहीं है.’’

‘‘यहां विश्वास की बात नहीं है. कारोबार के अपने नियम होते हैं. हमारा कारोबार परचून की दुकान नहीं है कि बेच कर पैसे अदा कर दोगे. इस कारोबार में लेनदेन का अपना अलग नियम है.’’ कुदरतउल्लाह ने एकएक शब्द पर जोर दे कर कहा, ‘‘अभी आप की मशीनें कहां लगी हैं?’’

‘‘मेरी मशीनें अच्छी जगहों पर लगी हैं. बड़ी मुश्किल से उन जगहों को मैं ने पगड़ी की मोटी रकम दे कर हासिल किया था. मुंबई में आजकल जगह की बड़ी कमी है. लोगों ने पहले से ही अच्छी जगहों पर कब्जा जमा रखा है.’’

‘‘मेरे पास अपनी एक जगह भी है, अगर आप वहां अपनी मशीन लगाना चाहें तो…?’’

‘‘उस जगह के भी आप मुंहमांगे दाम लेंगे?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है,’’ कुदरतउल्लाह ने मुसकराने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘अगर आप चाहें तो मैं उसे किराए पर भी दे सकता हूं. किराया आप मेरे घर पहुंचा दिया करना.’’

‘‘जगह की बात मैं अभी नहीं कर सकता. इस बारे में फरजंद अली से मेरी बात चल रही है. उस के पास भी अच्छी…’’

‘‘अगर फरजंद अली से आप की बात चल रही है तो ठीक है.’’ कुदरतउल्लाह ने निसार की बात काटते हुए कहा, ‘‘चलो, अब चला जाए. सौदा तय हो ही गया है.’’

दोनों कमरे से बाहर आए तो उन का स्वागत ट्रैफिक के शोर ने किया. वे दोनों फुटपाथ पर आ कर खडे हो गए. निसार ने कहा, ‘‘आप  कहां से बस पकड़ोगे?’’

‘‘मुझे तो उस सामने के चौराहे से बस मिल जाएगी.’’ कुदरतउल्लाह ने सामने इशारा करते हुए कहा, ‘‘और आप को?’’

‘‘चलिए पहले आप को बस पर बैठा दूं.’’

‘‘इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं चला जाऊंगा.’’ कुदरतउल्लाह ने लालबत्ती की ओर देखते हुए कहा.

‘‘इंसानियत के भी कुछ फर्ज होते हैं जनाब,’’ निसार चौधरी ने गंभीरता से कहा.

फुटपाथ के दाईं ओर एक पतली सी गली के नुक्कड़ पर एक जूस की दुकान के जगमग करते बोर्ड के पास वाले खंभे पर पोलियो से सुरक्षित रखने के संदेश वाला बोर्ड टंगा था. कुदरतउल्लाह उसे ध्यान से पढ़ने लगा, इसलिए उस ने निसार को जवाब में कुछ नहीं कहा. दोनों खामोशी से आगे बढ़ने लगे. जैसे ही वे चौराहे पर पहुंचे तो मसजिद में अजान की आवाज सुनाई दी.

‘‘मेरा खयाल है, कहीं आसपास ही मसजिद है?’’ कुदरतउल्लाह ने निसार की ओर देखते हुए कहा.

‘‘हम लोग जहां जा रहे हैं, उसी चौराहे के दाईं ओर मसजिद है.’’

‘‘तो पहले वहीं चलें…’’

तभी दर्द में डूबी एक आवाज सुनाई दी, ‘‘अल्लाह के नाम पर कुछ दे दे बाबा.’’

‘‘चलो हरी बत्ती हो गई है.’’ चौधरी ने आगे बढ़ते हुए कहा तो कुदरतउल्लाह का ध्यान भंग हुआ.

कुदरतउल्लाह रुक गया. उस के सामने थोड़ी दूर पर 10-11 साल का एक लड़का चौराहे के कोने में गंदे से कपड़े पर लेटा था. उस के दोनों पैर घुटनों से नीचे लकड़ी की तरह सूखे हुए थे. बायां हाथ भी लकड़ी जैसा हो गया था.

उस मासूम का ऊपरी होंठ आधे से अधिक कटा हुआ था, जिस से उस के पीलेपीले दांत नजर आ रहे थे. उस की एक आंख का पपोटा कटा हुआ था, जिस से उस की आंख बड़े भयानक अंदाज में बाहर निकली हुई थी. उसे देख कर घृणा और दया के भाव गड्डमड्ड हो रहे थे.

कुदरतउल्लाह ने उस लड़के की ओर अंगुली से इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसे देख रहे हो चौधरी?’’

‘‘हां हां, देख रहा हूं.’’

‘‘यह मेरे कारखाने की तैयार की हुई मशीन हैं.’’ कुदरतउल्लाह ने गर्व से सीना फुलाते हुए कहा, ‘‘यह मशीन पिछले साल मैं ने ही फरजंद अली को बेची थी. यह सुबह से देर रात तक बड़ी आसानी से हजार 2 हजार रुपए छाप लेती है. तुम्हें जो 2 मशीन दे रहा हूं वे भी इस मशीन से किसी भी तरह कम नहीं हैं. अगर तुम उन्हें अच्छी जगह फिट कर दोगे तो वे भी इसी तरह नोट छापेंगी.’’

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