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रज्जो – सुरेंद्र और माधवी की चाल

रज्जो रसोईघर का काम निबटा कर निकली, तो रात के 10 बज रहे थे. वह अपने कमरे में जाने से पहले सुरेंद्र के कमरे में पहुंची. वह उस समय बिस्तर पर आंखें बंद किए लेटा था.

‘‘साहबजी, मैं कमरे पर सोने जा रही हूं. कुछ लाना है तो बताइए?’’ रज्जो ने सुरेंद्र की ओर देखते हुए पूछा.

सुरेंद्र ने आंखें खोलीं और अपने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रज्जो, आज सिर में बहुत दर्द हो रहा है.’’

‘‘मैं आप के माथे पर बाम लगा कर दबा देती हूं,’’ रज्जो ने कहा और अलमारी में रखी बाम की शीशी ले आई. वह सुरेंद्र के माथे पर बाम लगा कर सिर दबाने लगी.

कुछ देर बाद रज्जो ने पूछा, ‘‘अब कुछ आराम पड़ा?’’

‘‘बहुत आराम हुआ है रज्जो, तेरे हाथों में तो जादू है,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने अपना सिर रज्जो की गोद में रख दिया.

रज्जो सिर दबाने लगी. वह महसूस कर रही थी कि एक हाथ उस की कमर पर रेंग रहा है. उस ने सुरेंद्र की ओर देखा.

सुरेंद्र बोला, ‘‘रज्जो, यहां रहते हुए तू किसी बात की चिंता मत करना. तुझे किसी चीज की कमी नहीं रहेगी. जब कभी जितने रुपए की जरूरत पड़े, तो बता देना.’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘आज तेरी मैडम लखनऊ गई हैं. वहां जरूरी मीटिंग है. 4 दिन बाद वापस आएंगी,’’ कह कर सुरेंद्र ने उसे अपनी ओर खींच लिया.

रज्जो समझ गई कि सुरेंद्र की क्या इच्छा है. वह बोली, ‘‘नहीं साहबजी, ऐसा न करो. मुझे तो मां-काका ने आप की सेवा करने के लिए भेजा है.’’

‘‘रज्जो, यह भी तो सेवा ही है. पता नहीं, आज क्यों मैं अपनेआप पर काबू नहीं रख पा रहा हूं?’’ सुरेंद्र ने रज्जो की ओर देखते हुए कहा.

‘‘साहबजी, अगर मैडम को पता चल गया तो?’’ रज्जो घबरा कर बोली.

‘‘उस की चिंता मत करो. वह कुछ नहीं कहेगी.’’

रज्जो मना नहीं कर सकी और न चाहते हुए भी सुरेंद्र की बांहों समा गई.

कुछ देर बाद जब रज्जो अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटी, तो उस की आंखों से नींद भाग चुकी थी. उस की आंखों के सामने मां-काका, 2 छोटी बहनों व भाई के चेहरे नाचने लगे.

यहां से 3 सौ किलोमीटर दूर रज्जो का गांव चमनपुर है. काका राजमिस्त्री का काम करता है. महीने में 10-15 दिन मजदूरी पर जाता है, क्योंकि रोजाना काम नहीं मिलता.

रज्जो तो 5 साल पहले 10वीं जमात पास कर के स्कूल छोड़ चुकी थी. उस की 2 छोटी बहनें व भाई पढ़ रहे थे. मां ने उस का नाम रजनी रखा था, पर पता नहीं, कब वह रजनी से रज्जो बन गई.

एक दिन गांव की प्रधान गोमती देवी ने मां को बुला कर कहा था, ‘मुझे पता चला है कि तेरी बेटी रज्जो तेरी तरह बहुत बढि़या खाना बनाती है. तू उसे सुबह से शाम तक के लिए मेरे घर भेज दे.’

‘ठीक है प्रधानजी, मैं रज्जो को भेज दूंगी,’ मां ने कहा था.

2 दिन बाद रज्जो ने गोमती प्रधान के घर की रसोई संभाल ली थी.

एक दिन एक बड़ी सी कार गोमती प्रधान के घर के सामने रुकी. कार से सुरेंद्र व उस की पत्नी माधवी मैडम उतरे. कार पर लाल बत्ती लगी थी. गोमती प्रधान की दूर की रिश्तेदारी में माधवी मैडम बहन लगती थीं.

दोपहर का खाना खा कर सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को बुला कर कहा, ‘तुम बहुत अच्छा खाना बनाती हो. हमें तुम जैसी लड़की की जरूरत है. क्या तुम हमारे साथ चलोगी? जैसे तुम यहां खाना बनाती हो, वैसा ही तुम्हें वहां भी रसोई में काम करना है.’

रज्जो चुप रही.

गोमती प्रधान बोल उठी थीं. ‘यह क्या कहेगी? इस के मां-काका को कहना पड़ेगा.’

कुछ देर बाद ही रज्जो के मां-काका वहां आ गए थे.

गोमती प्रधान बोलीं, ‘रामदीन, यह मेरी बहन है. सरकार में एक मंत्री की तरह हैं. इस को रज्जो के हाथ का बना खाना बहुत पसंद आया, तो ये लोग इसे अपने घर ले जाना चाहते हैं रसोई के काम के लिए.’

‘रामदीन, बेटी रज्जो को भेज कर बिलकुल चिंता न करना. हम इसे पूरा लाड़प्यार देंगे. रुपएपैसे हर महीने या जब तुम चाहोगे भेज देंगे,’ माधवी मैडम ने कहा था.

‘साहबजी, आप जैसे बड़े आदमी के यहां पहुंच कर तो इस की किस्मत ही खुल जाएगी. यह आप की सेवा खूब मन लगा कर करेगी. यह कभी शिकायत का मौका नहीं देगी,’ काका ने कहा था.

सुरेंद्र ने जेब से कुछ नोट निकाले और काका को देते हुए कहा, ‘लो, फिलहाल ये पैसे रख लो. हम लोग हर तरह  से तुम्हारी मदद करेंगे. यहां से लखनऊ तक कोई भी सरकारी या गैरसरकारी काम हो, पूरा करा देंगे. अपनी सरकार है, तो फिर चिंता किस बात की.’

रज्जो उसी दिन सुरेंद्र व माधवी के साथ इस कसबे में आ गई थी.

सुरेंद्र की बहुत बड़ी कोठी थी, जिस में कई कमरे थे. एक कमरा उसे भी दे दिया गया था. माधवी मैडम ने उस को कई सूट खरीद कर दिए थे. उसे एक मोबाइल फोन भी दिया था, ताकि वह अपने घरपरिवार से बात कर सके.

रज्जो को पता चला था कि सुरेंद्र की काफी जमीनजायदाद है. एक ही बेटा है, जो बेंगलुरु में पढ़ाई कर रहा है.

माधवी मैडम बहुत बिजी रहती हैं. कभी पार्टी मीटिंग में, तो कभी इधरउधर दूसरे शहरों में और कभी लखनऊ में.

इन्हीं विचारों में डूबतेतैरते रज्जो को नींद आ गई थी. अगले दिन सुरेंद्र ने रज्जो को कमरे में बुला कर कुछ गोलियां देते हुए कहा, ‘‘रज्जो, ये गोलियां तुझे खानी हैं. रात जो हुआ है, उस से तेरी सेहत को नुकसान नहीं होगा.’’

‘‘जी…’’ रज्जो ने वे गोलियां देखीं. वह जान गई कि ये तो पेट गिराने वाली गोलियां हैं.

‘‘और हां रज्जो, कल अपने घर ये रुपए मनीऔर्डर से भेज देना,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने 5 हजार रुपए रज्जो को दिए.

‘‘इतने रुपए साहबजी…?’’ रज्जो ने रुपए लेते हुए कहा.

‘‘अरे रज्जो, ये रुपए तो कुछ भी नहीं हैं. तू हम लोगों की सेवा कर रही है न, इसलिए मैं तेरी मदद करना चाहता हूं.’’

रज्जो सिर झुका कर चुप रही.

सुरेंद्र ने रज्जो का चेहरा हाथ से ऊपर उठाते हुए कहा, ‘‘तुझे कभी अपने गांव जाना हो, तो बता देना. ड्राइवर और गाड़ी भेज दूंगा.’’

सुन कर रज्जो बहुत खुश हुई.

‘‘रज्जो, तू मुझे इतनी अच्छी लगती है कि अगर मैडम की जगह मैं मंत्री होता, तो तुझे अपना पीए बना लेता,’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘रहने दो साहबजी, मुझे ऐेसे सपने न दिखाओ, जो मैं रोटी बनाना ही भूल जाऊं.’’

‘‘रज्जो, तू नहीं जानती कि मैं तेरे लिए क्या करना चाहता हूं,’’ सुरेंद्र ने कहा.

खुशी के चलते रज्जो की आंखों की चमक बढ़ गई.

4 दिन बाद माधवी मैडम घर लौटीं. इस बीच हर रात को सुरेंद्र रज्जो को अपने कमरे में बुला लेता और रज्जो भी पहुंच जाती, उसे खुश करने के लिए.

अगले दिन रज्जो एक कमरे के बराबर से निकल रही थी, तो सुरेंद्र व माधवी की बातचीत की आवाज आ रही थी. वह रुक कर सुनने लगी.

‘‘कैसी लगी रज्जो?’’ माधवी ने पूछा.

‘‘ठीक है, बढि़या खाना बनाती है,’’ सुरेंद्र का जवाब था.

‘‘मैं रसोई की नहीं, बैडरूम की बात कर रही हूं. मैं जानती हूं कि रज्जो ने इन रातों में कोई नाराजगी का मौका नहीं दिया होगा.’’

‘‘तुम्हें क्या रज्जो ने कुछ बताया है?’’

‘‘उस ने कुछ नहीं बताया. मैं उस के चेहरे व आंखों से सच जान चुकी हूं.

‘‘खैर, मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. तुम कहा करते थे कि मैं बाहर चली जाती हूं, तो अकेले रात नहीं कटती, इसलिए ही तो रज्जो को इतनी दूर से यहां लाई हूं, ताकि जल्दी से वापस घर न जा सके.’’

‘‘तुम बहुत समझदार हो माधवी…’’ सुरेंद्र ने कहा, ‘‘लखनऊ में तुम्हारे नेताजी के क्या हाल हैं? वह तो बस तुम्हारा पक्का आशिक है, इसलिए ही तो उस ने तुम्हें लाल बत्ती दिला दी है.’’

‘‘इस लाल बत्ती के चलते हम लोगों का कितना रोब है. पुलिस या प्रशासन में भला किस अफसर की इतनी हिम्मत है, जो हमारे किसी भी ठीक या गलत काम को मना कर दे.’’

‘‘नेताजी का बस चले तो वह तुम्हें लखनऊ में ही हमेशा के लिए बुला लें.’’

‘‘अगले हफ्ते नेताजी जनपद में आ रहे हैं. रात को हमारे यहां खाना होगा. मैं ने सोचा है कि नेताजी की सेवा में रात को रज्जो को उन के पास भेज दूंगी.

‘‘जब नेताजी हमारा इतना खयाल रखते हैं, तो हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नेताजी को खुश रखें. अगले महीने रज्जो को लखनऊ ले जाऊंगी, वहां 2-3 दूसरे नेता हैं, उन को भी खुश करना है,’’ माधवी ने कहा.

सुनते ही रज्जो के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. वह चुपचाप रसोई में जा पहुंची. उस ने तो साहब को ही खुश करना चाहा था, पर ये लोग तो उसे नेताओं के पास भेजने की सोच बैठे हैं. वह ऐसा नहीं करेगी. 1-2 दिन बाद ही वह अपने गांव चली जाएगी.

तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. वह बोली, ‘‘हैलो…’’

‘‘हां रज्जो बेटी, कैसी है तू?’’ उधर से काका की आवाज सुनाई दी.

काका की आवाज सुन कर रज्जो का दिल भर आया. उस के मुंह से आवाज नहीं निकली और वह सुबकने लगी.

‘‘क्या हुआ बेटी? बता न? लगता है कि तू वहां बहुत दुखी है. पहले तो तू साहब व मैडम की बहुत तारीफ किया करती थी. फिर क्या हो गया, जो तू रो रही है?’’

‘‘काका, मैं गांव आना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है रज्जो, मेरा 2 दिन का काम और है. उस के बाद मैं तुझे लेने आ जाऊंगा. मैं जानता हूं कि मैडम व साहब बहुत अच्छे लोग हैं. तुझे भेजने को मना नहीं करेंगे. तू हमारी चिंता न करना. यहां सब ठीक है. तेरी मां, भाईबहनें सब मजे में हैं,’’ काका ने कहा.

रज्जो चुप रही.

अगले दिन सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को कमरे में बुलाया.

सुरेंद्र ने कहा, ‘‘रज्जो, 4-5 दिन बाद लखनऊ से बहुत बड़े नेताजी आ रहे हैं. यह हमारा सौभाग्य है कि वे हमारे यहां खाना खाएंगे और रात को आराम भी यहीं करेंगे.’’

‘‘जी…’’ रज्जो के मुंह से निकला.

‘‘रात को तुम्हें नेताजी की सेवा करनी है. उन को खुश करना है. देखना रज्जो, अगर नेताजी खुश हो गए तो…’’ माधवी की बात बीच में ही अधूरी रह गई.

रज्जो एकदम बोल उठी, ‘‘नहीं मैडमजी, यह मुझ से नहीं होगा. यह गलत काम मैं नहीं करूंगी.’’

‘‘और मेरे पीठ पीछे साहबजी के साथ रात को जो करती रही, क्या वह गलत काम नहीं था?’’

रज्जो सिर झुकाए बैठी रही, उस से कोई जवाब नहीं बन पा रहा था.

‘‘रज्जो, तू हमारी बात मान जा. तू मना मत कर,’’ सुरेंद्र बोला.

‘‘साहबजी, ये नेताजी आएंगे, इन को खुश करना है. फिर कुछ नेताओं को खुश करने के लिए मुझे मैडमजी लखनऊ ले कर जाएंगी. मैं ने आप लोगों की बातें सुन ली हैं. मैं अब यह गलत काम नहीं करूंगी. मैं अपने घर जाना चाहती हूं. 2 दिन बाद मेरे काका आ रहे हैं,’ रज्जो ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा.

‘‘अगर हम तुझे गांव न जाने दें तो…?’’ माधवी ने कहा.

‘‘तो मैं थाने जा कर पुलिस को और अखबार के दफ्तर में जा कर बता दूंगी कि आप लोग मुझ से जबरदस्ती गलत काम कराना चाहते हैं,’’ रज्जो ने कड़े शब्दों में कहा.

रज्जो के बदले तेवर देख कर सुरेंद्र ने कहा, ‘‘ठीक है रज्जो, हम तुझ से कोई काम जबरदस्ती नहीं कराएंगे. तू अपने काका के साथ गांव जा सकती है,’’ यह कह कर सुरेंद्र ने माधवी की ओर देखा.

उसी रात सुरेंद्र ने रज्जो की गला दबा कर हत्या कर दी और ड्राइवर से कह कर रज्जो की लाश को नदी में फिंकवा दिया. दिन निकलने पर इंस्पैक्टर को फोन कर के कोठी पर बुला लिया.

‘‘कहिए हुजूर, कैसे याद किया?’’ इंस्पैक्टर ने आते ही कहा.

‘‘हमारी नौकरानी रजनी उर्फ रज्जो घर से एक लाख रुपए व कुछ जेवरात चुरा कर भाग गई है.’’

‘‘सरकार, भाग कर जाएगी कहां वह? हम जल्द ही उसे पकड़ लेंगे,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और कुछ देर बाद चला गया.

दोपहर बाद रज्जो का काका रामदीन आया. सुरेंद्र ने उसे देखते ही कहा, ‘‘अरे ओ रामदीन, तेरी रज्जो तो बहुत गलत लड़की निकली. उस ने हम लोगों से धोखा किया है. वह हमारे एक लाख रुपए व जेवरात ले कर कल रात कहीं भाग गई है.’’

‘‘नहीं हुजूर, ऐसा नहीं हो सकता. मेरी रज्जो ऐसा नहीं कर सकती,’’ घबरा कर रामदीन बोला.

‘‘ऐसा ही हुआ है. वह यहां से चोरी कर के भाग गई है. जब वह गांव में अपने घर पहुंचे तो बता देना. थाने में रिपोर्ट लिखा दी है. पुलिस तेरे घर भी पहुंचेगी.

‘‘अगर तू ने रज्जो के बारे में न बताया, तो पुलिस तुम सब को उठा कर जेल भेज देगी.

‘‘और सुन, तू चुपचाप यहां से भाग जा. अगर पुलिस को पता चल गया कि तू यहां आया है, तो पकड़ लिया जाएगा.’’

यह सुन कर रामदीन की आंखों में आंसू आ गए. रज्जो के लिए उस के दिल में नफरत बढ़ने लगी. वह रोता हुआ बोला, ‘‘रज्जो, यह तू ने अच्छा नहीं  किया. हम ने तो तुझे यहां सेवा करने के लिए भेजा था और तू चोर बन गई.’’

रामदीन रोतेरोते थके कदमों से कोठी से बाहर निकल गया.

मजबूर

थाने के करीब आते ही उस की चाल में धीमापन आ गया.  तेजतेज चलने से मेवा का कसा हुआ ब्लाउज पसीने से तरबतर हो कर गोलाइयों से चिपक गया था. सामने गेट पर बड़ीबड़ी मूंछों वाला संतरी खड़ा था. उस की कामुक नजरें मेवा के बदन से चिपके ब्लाउज पर फिसल रही थीं. उस ने सुलगती बीड़ी का गहरा कश भरा और धीरेधीरे चलता हुआ डरीसहमी मेवा के करीब आ गया. यह देख मेवा घबरा गई. उस की काली चमकती आंखों में दहशत भर उठी थी. उस ने कई जवान औरतों से सुना भी था कि पुलिस वाले बहुत बदमाश होते हैं. फिर भी डरते हुए वह थाने तक आ गई थी.

पुलिस वाले की प्यासी नजरें उस की गदराई जवानी पर फिसल रही थीं.

‘‘यहां क्यों आई है. मुझे बता.’’

वह वहीं चुपचाप खड़ी रही.

‘‘अरे, बोलती क्यों नहीं? गूंगी है क्या?’’ सामने खड़े पुलिस वाले ने कड़कती आवाज में पूछा, ‘‘किसी ने तंग किया है तुझ को? बता मुझे.’’

‘‘थानेदार साहब, ऐसा नहीं है,’’ मेवा ने कांपती आवाज में कहा.

‘‘फिर रास्ते में अकेली देख कर किसी ने पकड़ लिया होगा? तू डर मत, मुझे साफसाफ बता दे. एक घंटे बाद मेरी ड्यूटी खत्म हो रही है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है थानेदारजी, मैं तो दूसरी फरियाद ले कर आई हूं जी,’’ मेवा सहज आवाज में बोली.

पुलिस वाला अभी जाल फेंक ही रहा था कि अंदर से असली थानेदार राम सिंह जीप स्टार्ट कर के निकला.

थानेदार राम सिंह जीप रोकते हुए  बोला, ‘‘अरे नफे सिंह, यह लड़की कौन है?’’

‘‘साहबजी, यह… यह…’’ पहरे पर खड़ा संतरी कुछ बोलता, उस से पहले ही मेवा ने कहा, ‘‘साहबजी, मैं हरिया की घरवाली हूं. उसे पुलिस ने पकड़ रखा है. हुजूर, मेरे हरिया को छोड़ दो. वह बेकुसूर है.’’

‘‘ओह… तुम चरसगांजा और नकली नोटों की सप्लाई करने वाले हरिया की जोरू हो.’’

‘‘हां साहब… हां,’’ कहते हुए मेवा की आंखों में चमक उभरी.

थानेदार ने देखा कि मेवा के गोलगोल उभारों पर जवानी हिलोरें ले रही थी.

‘‘चल, अपनी झोंपड़ी की तलाशी लेने दे. जरूर तुम ने माल छिपा रखा होगा. चल बैठ गाड़ी में,’’ थानेदार ने रोब जमाया.

‘‘साहबजी… अगर झोंपड़ी से कुछ नहीं मिला, तो मेरे हरिया को छोड़ देंगे?’’ मेवा ने हाथ जोड़ते हुए पूछा.

‘‘हां, छोड़ देंगे…’’ थानेदार ने कहा, तो मेवा गाड़ी में बैठ गई.

संतरी ने मन ही मन थानेदार को भद्दी सी गाली दी.

थानेदार राम सिंह ने अगले चौराहे पर ड्राइवर को उतार दिया. फिर वह अकेला ही मेवा को ले कर झोंपड़पट्टी की ओर चल दिया.

दोपहरी में सभी अपनीअपनी झोंपड़ी में आराम कर रहे थे. एक मामूली सी झोंपड़ी के सामने जीप रुकी.

थानेदार ने उतर कर सारी झोंपड़ी की तलाशी ली. वहां उसे कोई भी गलत चीज नहीं मिली.

मेवा सोच रही थी कि अब थानेदार उस के हरिया को छोड़ देगा. वह हाथ जोड़ कर फरियाद करने लगी.

‘‘देख छोकरी, यह दुनिया कुछ लेदे कर चलती है. तुम अगर अपने हरिया को छुड़ाना चाहती हो, तो इन पर से परदा उठा दो,’’ राम सिंह का संकेत उस के कसे उभारों की तरफ था.

‘‘मेरा हरिया घर आ जाएगा न?’’ मेवा गिड़गिड़ा उठी.

‘‘हां… हां, जरूर आ जाएगा,’’ कहते हुए राम सिंह आगे बढ़ा.

थोड़ी देर बाद थानेदार अपने कपड़े दुरुस्त करता हुआ झोंपड़ी से बाहर आया, जीप स्टार्ट की और चला गया.

मेवा बेचारी लुट गई थी, मगर करती भी क्या. उस की अपनी मजबूरी थी.

उस की बूढ़ी मां बीमार थी. घर में कोई इलाज कराने वाला नहीं था. उस का बड़ा भाई जहरीली शराब पीने से मर गया था. छोटा भाई नशीली चीजें बेचने के जुर्म में जेल में था. घर में कमाई करने वाला कोई नहीं था. हरिया ने उसे बीवी बनाने के एवज में मां के इलाज की जिम्मेदारी ली थी. मेवा ने जिंदगी से समझौता कर लिया था.

मेवा ने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि असल में हरिया क्या काम करता  है. अब उस ने सोच लिया था कि हरिया एक बार घर लौट आए, तो उसे गलत काम करने से रोकेगी.

आज जोकुछ हुआ, मेवा उसे एक बुरा सपना समझ कर भूलना चाहती थी.

मेवा भूखीप्यासी पति को छुड़ाने के लिए मारीमारी फिर रही थी. उस ने हाथ जोड़े, पैर पकड़े, फिर भी थानेदार ने उसे मजबूर कर दिया था.

मेवा अगली सुबह तड़के ही थाने के गेट पर पहुंच गई. उस समय पहरे पर दूसरा संतरी खड़ा था.

मेवा ने महसूस किया कि उस की भी कामुक निगाहें उस के उभारों पर फिसल रही हैं. लेकिन वह बेपरवाह हो कर आगे बढ़ी. उस ने तो बड़े थानेदार से बात कर रखी थी. कल उस की झोंपड़ी में कैसे मिमिया रहा था…

‘‘अरे… रे… कौन है तू… अंदर कहां भागी जा रही है?’’ संतरी गुर्राते हुए आगे लपका. तब तक मेवा भाग कर थानेदार के दफ्तर तक पहुंच गई थी.

दफ्तर के बाहर शोर सुन कर थानेदार बाहर आ गया. वह मेवा को पहचान तो गया था, फिर भी अनजान बनते हुए दहाड़ा, ‘‘अरे धूल सिंह, यह औरत कौन है? इसे बाहर निकालो.’’

मेवा ने थानेदार की दहाड़ की तरफ ध्यान नहीं दिया. वह गिड़गिड़ाते हुए फरियाद करने लगी, ‘‘साहबजी, मेरे हरिया को छोड़ दो… 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला. मां बीमार है. हमारा दूसरा कोई सहारा नहीं है. मुझ पर दया करो साहबजी. कल आप ने कहा भी था…’’ मेवा थानेदार के पैरों में झुक गई.

‘‘अरे भई… यहां शोर न करो… यह थाना है… मैं कोशिश कर के देखता हूं. मेरे ऊपर भी अफसर हैं,’’ थानेदार राम सिंह कहते हुए दफ्तर में घुसा, तभी फोन की घंटी घनघना उठी.

‘हैलो थानेदार राम सिंह…’

‘‘बोल रहा हूं सर… क्या हरिया को सीबीआई के हवाले कर दूं… कोई खास बात सर?’’ थानेदार ने पूछा.

वह तो हरिया के बारे में बात करना चाहता था, मगर यहां तो पासा ही पलट गया था.

‘‘राम सिंह, सीबीआई से सूचना मिली है कि हरिया माफिया सरगना इब्राहिम के गैंग से ताल्लुक रखता है. हरिया को छुड़ाने के लिए थाने पर हमला भी हो सकता है. तुम्हारे पास जवान भी कम हैं, इसलिए फौरन हरिया को थाने से निकाल लाओ,’’ दूसरी तरफ से सख्त आदेश था.

‘‘ठीक है सर,’’ कहते हुए राम सिंह तेजी से दफ्तर से बाहर निकला, तो मेवा एक बार फिर से गिड़गिड़ा उठी. शायद उसे पूरी उम्मीद थी कि उस का हरिया छूट जाएगा.

फोन पर बातचीत के दौरान उस ने बारबार हरिया के नाम का जिक्र सुना था. साथ ही, कल उस ने साहब को खुश भी किया था.

‘‘अरे धूल सिंह, इसे धक्के मार कर गेट से बाहर निकाल दे. हम इस के बाप के नौकर थोड़े ही हैं. पहले तो अंडरवर्ल्ड के लिए काम करते हैं, फिर हाथपैर जोड़ते हैं,’’ राम सिंह ने सामने खड़े सिपाही से कहा.

‘‘नफे सिंह, जीप स्टार्ट करो… हरिया को सैंट्रल जेल ले जाना है. यह तो हमें भी मरवाएगा,’’ कहते हुए राम सिंह 3 जवानों के साथ हवालात की तरफ बढ़ गया.

रोतीचिल्लाती मेवा को पहरेदार ने गेट से बाहर धकिया दिया. उस ने मेवा को एकाध थप्पड़ मार कर चेतावनी दी, ‘‘अगर ज्यादा हंगामा करेगी, तो हरिया को उम्रकैद हो जाएगी. अगर चुपचाप चली जाएगी, तो 4-5 दिन बाद हरिया अपनेआप घर आ जाएगा. तुझे यहां आने की जरूरत नहीं.’’

बेचारी मेवा लुटीपिटी रोतेसिसकते हुए गेट से बाहर निकाल दी गई थी.

पुलिस मददगार के बजाय दुश्मन बन गई थी. हरिया ने भी उसे धोखा दिया था. अगर उसे अपराध करना था, तो मेवा को जिंदगी के सपने दिखाने और उस की बीमार मां की जिम्मेदारी लेने की क्या जरूरत थी?

मेवा को थानेदार और हरिया में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा था. दोनों ने उसे धोखा दिया था. दोनों ने उस की जवानी को लूटा और गुम हो गए.

सोमालिया में सौंदर्य प्रतियोगिता यानी धार्मिक कट्टरता से निकलने की छटपटाहट

मुसलिम रूढ़िवादी देश सोमालिया जहां औरतें सिर से पांव तक नकाब में लिपटी होती हैं वहां रैंप पर जिस्म उघाडू पोशाक में कैटवौक की कल्पना करना मुश्किल है, मगर औरतों ने इसे मुमकिन कर दिखाया.

 

15 जुलाई की रात जब 2024 यूरो कप का फाइनल मुकाबला इंगलैंड और स्पेन के बीच बर्लिन के ओलम्पिया स्टेडियम में खेला जा रहा था और पूरी दुनिया अपने घरों में टीवी स्क्रीन में मुंह घुसाए बैठी थी, उस समय मुसलिम देश सोमालिया में 2 घटनाएं एकसाथ घटीं. पहली सोमालिया की राजधानी मोगादिशु के समुद्रतट पर बने एक होटल में सौंदर्य प्रतियोगिता और दूसरी उस होटल से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर टौप कौफ़ी रैस्टोरैंट के बाहर हुआ कार बम धमाका जिस में 5 लोग मारे गए और 20 से ज्यादा घायल हुए.

सोमालिया एक ऐसा मुसलिम देश है जो जीवन की विखंडित प्रकृति को उजागर करता है. उग्रवादी इसलामी समूह अलशबाब, जो वहाबी इसलाम का समर्थक है और जिस ने 15 वर्षों से अधिक समय से सोमालिया के अधिकांश भाग पर नियंत्रण कर रखा है, का मकसद सोमालिया सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकना है. अलशबाब का पूरा नाम हरकत अलशबाब अलमुजाहिदीन है. यह चरमपंथी गुट वर्ष 2006 में अस्तित्व में आया था और इस ने कई आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया. अमेरिका ने 2008 में अलशबाब को एक दुर्दांत आतंकी संगठन घोषित किया था. वर्ष 2012 में अलकायदा में इस का विलय हो गया था. अलशबाब अरबी भाषा का शब्द है, जिस का अर्थ है ‘युवावस्था या तरक्की का दौर’. लेकिन यह अपने नाम से बिलकुल उलट सोमालिया की तरक्की में लगातार बाधा बन रहा है. सोमालिया में सौंदर्य प्रतियोगिता के वक़्त हमले की जिम्मेदारी इसी गुट ने ली.

अलशबाब की गिनती दुनिया के खतरनाक आतंकी संगठनों में होती है. इस का नाता पाकिस्तानी आतंकी संगठन अलकायदा, नाइजीरिया के बोको हरम और आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों के साथ भी माना जाता है. इस संगठन में कई खूंखार और खतरनाक आतंकवादी हैं. इस के कई आतंकियों पर करोड़ों डौलर का इनाम घोषित है. ये ऐसे आतंकी हैं जो आत्मघाती हमलों को भी अंजाम देने के लिए तैयार रहते हैं. यानी, इन्हें फर्क नहीं पड़ता कि हमले में इन की जान चली जाए. अपने मकसद के लिए ये किसी भी हद तक गुजरने को तैयार होते हैं.

ऐसे में आतंकवादियों से भरे और सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी देश सोमालिया में स्त्री सौंदर्य प्रतियोगिता करवाना एक बहुत बड़े साहस का काम है. जहां औरतें सिर से पांव तक नकाब में लिपटी होती हैं वहां रैंप पर जिस्मउघाडू पोशाक में कैटवौक की कल्पना करना मुश्किल है, मगर औरतों ने इसे मुमकिन कर दिखाया.
गौरतलब है कि सोमालिया नियमित रूप से महिलाओं के लिए दुनिया की सब से खराब जगहों की सूची में सब से ऊपर रहा है. लेकिन जिस तरह पाकिस्तान के ख़ैबरपख़्तूनख़्वा प्रांत के स्वात जिले में स्थित मिंगोरा शहर की मलाला यूसुफजई ने 11 वर्ष की नन्ही सी उम्र में स्वात पर क्रूर और रूढ़िवादी तालिबान के कब्जे के दौरान स्त्रीजीवन की हकीकत को उजागर करने के लिए छद्म नाम गुल मकाई के तहत ब्लौग लिखने की शुरुआत की थी और 17 साल की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते अपनी मातृभूमि स्वात में महिलाओं व बच्चों की शिक्षा के लिए एक मशाल बन गई थी, बिलकुल वैसे ही सोमालिया में इसलामी कट्टरवाद को ललकारते हुए हनी आब्दी गैस ने 2021 में मिस सोमालिया प्रतियोगिता की शुरुआत की थी.

हनी आब्दी गैस केन्या के दादाब शरणार्थी शिविर में पलीबढ़ी, जहां हज़ारों अन्य सोमालियाई लोग युद्ध और सूखे से बच कर भागे थे व शरणार्थी के रूप में रह रहे थे. गैस 2020 में अपने वतन लौट आईं. महिलाओं की मुक्ति के लिए गैस लगातार काम कर रही हैं और इस सौंदर्य प्रतियोगिता के आयोजन का मकसद भी महिलाओं की आवाज को उठाना और उन्हें धार्मिक कट्टरता व अलगाव से बाहर निकालना है. गैस मानती हैं कि इस तरह की प्रतियोगिताओं से एकता और सशक्तीकरण को बढ़ावा मिलता है.

गैस चाहती हैं कि सोमालिया की औरतें भी बाकी दुनिया के साथ विश्व स्तर पर होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं में शामिल हों. वे अलगअलग पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं की आकांक्षाओं और उन के सपनों का जश्न मनाना चाहती हैं. उन के अंदर आत्मविश्वास बढ़ाना चाहती हैं और दुनियाभर में सोमाली संस्कृति की पहचान कायम करना चाहती हैं. उन के इस मकसद से सैकड़ों सोमाली महिलाएं जुड़ चुकी हैं. जान कर आश्चर्य होता है कि उस रात रैंप पर अपने सौंदर्य का जलवा बिखेरने वाली महिलाओं में एक महिला पुलिसकर्मी भी शामिल थी.

इस सौंदर्य प्रतियोगिता का ताज आइशा इकोव नाम की सुंदरी के सिर सजा. आइशा विश्वविद्यालय की स्टूडैंट हैं और साथ ही, मेकअप कलाकार भी हैं. उन्होंने इस प्रतियोगिता में दक्षिणपश्चिम राज्य का प्रतिनिधित्व किया था. 24 वर्षीया आइशा इकोव ने उस रात भड़कीला, चुस्त और उभारों को रेखांकित करने वाला फुल आस्तीन का सुनहरा गाउन पहना था. उन के साथ अन्य प्रतियोगियों के गाउन भी कुछ ऐसे ही भड़कीले व शरीर के कर्व्स को उजागर करने वाले थे, जो आमतौर पर सोमाली महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले गहरे, उदास रंग के वस्त्रों और नकाब से बिलकुल उलट थे.

आइशा इकोव ने जब प्रतियोगिता में जीत का ताज अपने सिर पर पहना तो उन का पहला वाक्य जो हौल में गूंजा, वह था- “मैं इस उपलब्धि का इस्तेमाल कम उम्र में महिलाओं के होने वाले विवाह के ख़िलाफ़ लड़ने और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के अवसर के रूप में करूंगी.”

उन्होंने कहा- ”यह प्रतियोगिता महिलाओं के उज्ज्वल भविष्य को न केवल आकार देती है बल्कि सोमाली संस्कृति व सुंदरता का जश्न भी मनाती है.”

जाहिर है, सोमालिया में औरतें इसलामी कट्टरवाद से निकलने के लिए छटपटा रही हैं. वे घरों से बाहर निकल कर पढ़ना चाहती हैं, काम करना चाहती हैं. सिर्फ मर्दों के बिस्तर सजाने और उन के बच्चे पालने की त्रासदी से वे अब उबरना चाहती हैं. वे अपनी काबिलीयत का प्रदर्शन करना चाहती हैं और अपने मुल्क को उन तरक्कीपसंद मुल्कों के बराबर खड़ा करने के लिए लालायित हैं जो धार्मिक कट्टरता की बेड़ियां तोड़ कर विज्ञान के रास्ते पर हैं.

गौरतलब है कि धार्मिक कट्टरता का जुल्म सब से ज्यादा औरतें सहती हैं. औरत धर्म की सब से आसान शिकार है. धर्म कोई हो- हिंदू, मुसलिम, ईसाई, उस को ढोने व उस के रीतिरिवाज निभाने का काम औरत के जिम्मे जबरन डाला गया है. वह न करे तो मारीपीटी जाए, जलील की जाए, उस के साथ सामूहिक बलात्कार हो या उसे पत्थर मारमार कर मौत की नींद सुला दिया जाए. हर धर्म में औरत को ही नकाब, घूंघट, स्कार्फ जैसे परदों में लपेट कर उस से जबरन धार्मिक कृत्य कराए जाए हैं. धर्म के जरिए उस को मर्दों का गुलाम बनाया जाता है जो उस के गोश्त के साथसाथ उस की आत्मा तक नोच डालें. तो जो सब से ज्यादा पीड़ित है वही एक दिन सब से ज़्यादा विस्फोटक हो सकता है. यही हो रहा है सोमालिया में.

संयुक्त राष्ट्र के लैंगिक असमानता सूचकांक में सोमालिया नीचे से चौथे स्थान पर है. इस देश में लगभग 52 फीसदी महिलाओं को लैंगिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. वहीं करीब 98 फीसदी महिलाएं खतना जैसी क्रूर प्रथा से गुज़रती हैं. सोमालिया में जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ बलात्कार करता था, तो परंपरागत रूप से उस की ‘सज़ा’ यह होती थी कि उसे उस महिला से शादी करनी होती थी, जिस का उस ने यौन उत्पीड़न किया है. वीभत्स!

अमेरिका समर्थित सरकार होने के बावजूद बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अन्य प्रकार के दुर्व्यवहार के प्रति उन के दृष्टिकोण में बहुत अधिक बदलाव देखने को नहीं मिला है. स्वघोषित गणराज्य सोमालीलैंड में धार्मिक नेताओं ने 2018 के यौन अपराध कानून के पारित होते ही उसे रद्द कर दिया था. कानून का संशोधित संस्करण भी महिलाओं को बाल विवाह, जबरन विवाह, बलात्कार या अन्य प्रकार के यौनशोषण से सुरक्षा प्रदान नहीं करता है. ऐसे में अपनी मुक्ति की राह महिलाओं को स्वयं बनानी है, जिस के लिए वे धीरेधीरे सिर उठा भी रही हैं.

मुसलिम देशों में धार्मिक कट्टरता अधिक रही है. कोई कैसे जिए, कैसे कपड़े पहने, कैसे अपने जीवन के फैसले ले, ये फैसले कठमुल्लाओं ने अपने हाथों में ले रखे हैं बिलकुल वैसे ही जैसे भारत में पंडेपंडितों ने एक मनुष्य के जन्म से ले कर उस की मृत्यु तक हर सांस को धर्म की बेड़ियों में जकड़ रखा है. अभी तक दुनिया के अधिकांश मुसलिम देश अपनी जमीन में मौजूद तेल की बदौलत जीवित थे. उन का कट्टरवाद इसी तेल की कमाई पर सदियों तक फलाफूला और मजबूत हुआ. मगर अब धीरेधीरे मुसलिम देशों के पास यह तेल कम होता जा रहा है. कट्टरवाद को जीवित रखने के लिए एक तरफ उन्हें हथियार चाहिए तो दूसरी तरफ अवाम का पेट भरने के लिए रोटी. मगर दुनिया के दूसरे अमीर देश जो धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद के खिलाफ हैं, मुसलिम देशों को तब तक कोई मदद नहीं देंगे जब तक वे अपनी धार्मिक कट्टरता को कम नहीं करेंगे. यह बात बहुतेरे मुसलिम देश अब समझने भी लगे हैं और खुद को बदलने की दिशा में उन्होंने काम शुरू कर दिया है. क्योंकि पेट के दावानल के आगे धर्म की आग छोटी मालूम पड़ती है. सऊदी अरब, इंडोनेशिया, क़तर जैसे मुसलिम देश अब काफी उदार और आधुनिक हो चुके हैं. उन्हें पश्चिमी देशों की तरक्की ने भयभीत किया और जल्दी ही उन की समझ में आ गया कि इस से पहले कि धर्म के लबादे उन का गला घोंट दें, इसे उतारने में ही भलाई है.

आज दुबई जैसा कठोर इसलामिक देश बड़ीबड़ी इमारतों, चमकते बीच, बड़ी गाड़ियां, कैसीनो, ख़ूबसूरत रैस्तरां और सोने के जेवरों से लदी खूबसूरत औरतों का देश बन चुका है. दुनियाभर के अमीर दुबई में संपत्तियां खरीद रहे हैं. वहां तरक्की के नित नए द्वार खुल रहे हैं क्योंकि वहां धर्म का बोलबाला कम हुआ है. आज आधुनिक दुबई संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का सब से ज्यादा आबादी वाला शहर है और मध्यपूर्व का एक प्रमुख व्यापार केंद्र है. दुबई की अर्थव्यवस्था पर्यटन, विमानन, रियल एस्टेट और वित्तीय सेवाओं पर आधारित है. यह शहर अपनी ऊंची इमारतों और गगनचुंबी इमारतों के लिए भी जाना जाता है, जिन में से सब से ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा भी है. दुबई ने हाल ही में कई बड़ी निर्माण परियोजनाओं और खेल आयोजनों के ज़रिए भी दुनिया का ध्यान खींचा है.

काली की भेंट

शहर के किनारे काली माता का मंदिर बना हुआ था. सालों से वहां कोई पुजारी नहीं रहता था. लोग मंदिर में पूजा तो करने जाते थे, लेकिन उस तरह से नहीं, जिस तरह से पुजारी वाले मंदिर में पूजा की जाती है. एक दिन एक ब्राह्मण पुजारी काली माता के मंदिर में आए और अपना डेरा वहीं जमा लिया. लोगों ने भी पुजारीजी की जम कर सेवा की. मंदिर में उन की सुखसुविधा का हर सामान ला कर रख दिया.

पहले तो पुजारीजी बहुत नियमधर्म से रहते थे, सत्यअसत्य और धर्मअधर्म का विचार करते थे, लेकिन लोगों द्वारा की गई खातिरदारी ने उन का दिमाग बदल दिया. अब वे लोगों को तरहतरह की बातें बताते, अपनी हर सुखसुविधा की चीजों को खत्म होने से पहले ही मंगवा लेते.

काली माता की पूजा का तरीका भी बदल दिया. पहले पुजारीजी काली माता की सामान्य पूजा कराते थे, लेकिन अब उन्होंने इस तरह की पूजा करानी शुरू कर दी, जिस से उन्हें ज्यादा से ज्यादा चढ़ावा मिल सके.

धीरेधीरे पुजारीजी ने काली माता पर भेंट चढ़ाने की प्रथा शुरू कर दी. वे पशुओं की बलि काली माता को भेंट करने के नाम पर लोगों से बहुत सारा पैसा ऐंठने लगे. जब कोई किसी काम के लिए काली माता की भेंट बोलता, तो पुजारीजी उस से बकरे की बलि चढ़ाने के नाम पर 5 हजार रुपए ले लेते और बाद में कसाई से बकरे का खून लाते और काली माता को चढ़ा देते.

बकरे के नाम पर लिए हुए 5 हजार रुपए पुजारीजी को बच जाते थे, जबकि बकरे का मुफ्त में मिला खून काली माता की भेंट के रूप में चढ़ जाता था. धीरेधीरे दूरदूर के लोग भी काली माता के मंदिर में आने शुरू हो गए. पुजारीजी दिनोंदिन पैसों से अपनी जेब भर रहे थे. लोग सब तरह के झंझटों से बचने के लिए पुजारीजी को रुपए देने में ही अपनी भलाई समझते थे.

लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे, जो पुजारीजी की इस प्रथा का विरोध करते थे. लेकिन पुजारीजी के समर्थकों की तुलना में ये लोग बहुत कम थे, इसलिए उन्हें ऐसा काम करने से रोक न सके.

जब पुजारीजी के ढोंग की हद बढ़ गई, तो कुछ लोगों ने पुजारी की अक्ल ठिकाने लगाने की ठान ली. शहर में रहने वाले घनश्याम ने इस का बीड़ा उठाया.

घनश्याम सब से पहले पुजारीजी के भक्त बने और 2-4 झूठी समस्याएं उन्हें सुना डालीं. साथ ही बताया कि उन के पास पैसों की कमी नहीं है, लेकिन इतना पैसा होने के बावजूद भी उन्हें शांति नहीं मिलती. अगर किसी तरह उन्हें शांति मिल जाए, तो वे किसी के कहने पर एक लाख रुपए भी खर्च कर सकते हैं.

एक लाख रुपए की बात सुन कर पुजारीजी की लार टपक गई. उन्होंने तुरंत घनश्याम को अपनी बातों के जाल में फंसाना शुरू कर दिया.

पुजारी बोला, ‘‘देखो जजमान, अगर तुम इतने ही परेशान हो, तो मैं तुम्हें कुछ उपाय बता सकता हूं.

‘‘अगर तुम ने ये उपाय कर दिए, तो समझो तुम्हें मुंहमांगी मुराद मिल जाएगी. लेकिन इस सब में खर्चा बहुत होगा.’’

घनश्याम ने पुजारीजी को अपनी बातों में फंसते देखा, तो झट से बोल पड़े, ‘‘पुजारीजी, मुझे खर्च की चिंता नहीं है. बस, आप उपाय बताइए.’’

पुजारीजी ने काली माता की पूजा के लिए एक लंबी लिस्ट तैयार कर दी.

घनश्याम पुजारीजी की कही हर बात  मानता गया. पुजारीजी ने काली माता की भेंट के लिए 2 बकरों का पैसा भी घनश्याम से ले लिया. साथ ही, उन्हें घर में एक पूजा कराने को कह दिया.

पुजारीजी की इस बात पर घनश्याम तुरंत तैयार हो गए. तीसरे दिन घनश्याम के घर पर पूजा की तारीख तय हुई, जबकि भेंट चढ़ाने के लिए पैसे तो पुजारीजी उन से पहले ही ले चुके थे.

तीसरे दिन पुजारीजी घनश्याम के घर जा पहुंचे. पुजारीजी ने अमीर जजमान को देख हर बात में पैसा वसूला और घनश्याम अपनी योजना को कामयाब करने के लिए पुजारी द्वारा की गई हर विधि को मानते गए.

जोरदार पूजा के बाद घनश्याम ने पुजारीजी के लिए स्वादिष्ठ पकवान बनवाए, बाजार से भी बहुत सी स्वादिष्ठ चीजें मंगवाई गईं. पुजारीजी ने जम कर खाना खाया. उन्होंने आज तक इतना लजीज खाना नहीं खाया था.

जब पुजारीजी खाना खा चुके, तो उन्होंने घनश्याम से पूछा, ‘‘घनश्याम, तुम ने हमें इतना स्वादिष्ठ खाना खिला कर खुश कर दिया. ये कौन सा खाना है और किस ने बनाया है?

पुजारी के पूछने पर घनश्याम ने जवाब दिया, ‘‘पुजारीजी, कुछ खाना तो बाजार से मंगवाया था और कुछ यहीं पकाया था. सारा खाना ही बकरे के मांस से बना हुआ था.’’

घनश्याम ने बकरे के मांस का नाम लिया, तो पुजारीजी की सांसें अटक गईं, लेकिन उन्होंने सोचा कि शायद घनश्याम मजाक कर रहे हैं. वे बोले, ‘‘जजमान, आप मजाक बहुत कर लेते हैं, लेकिन हमारे सामने मांसाहारी चीज का नाम मत लो. हम तो मांसमदिरा को छूते भी नहीं, खाना तो बहुत दूर की बात है.’’

घनश्याम ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं पुजारीजी. आप चाहें तो जिस बावर्ची ने खाना बनाया है, उस से पूछ लें.’’

घनश्याम की बात सुन पुजारीजी का दिल बैठ गया. मन किया कि उलटी कर दें. नफरत से भरे मन में घनश्याम के लिए गुस्सा भी बहुत था.

घनश्याम ने आवाज दे कर बावर्ची को बुला कर कहा, ‘‘जरा पुजारीजी को बताओ तो कि तुम ने क्या बनाया था.’’

बावर्ची अपने बनाए हुए खाने को बताने लग गया. सारा खाना बकरे के मांस से बनाया गया था.

पुजारीजी पैर पटकते हुए गुस्से से भरे घनश्याम के घर से चले गए. घर के बाहर आ कर उन्होंने गले में उंगली डाली और खाए हुए खाने को अपने पेट से खाली कर दिया, लेकिन मन की नफरत इतने से ही शांत नहीं हुई.

पुजारीजी ने बस्ती में हंगामा कर लोगों को जमा कर लिया, जिन में ज्यादातर उन के भक्त थे. उन्होंने घनश्याम द्वारा की गई हरकत सब लोगों को बताई, तो हर आदमी घनश्याम की इस हरकत पर गुस्सा हो उठा.

अब लोग पुजारीजी समेत घनश्याम के घर जा पहुंचे. सब ने घनश्याम को भलाबुरा कहा.

घनश्याम ने सब लोगों की बातें चुपचाप सुनीं, फिर अपना जवाब दिया, ‘‘भाइयो, मैं किसी भी गलती के लिए माफी मांगने के लिए तैयार हूं, लेकिन आप पहले मेरी बात ध्यान से सुनें,

उस के बाद जो आप कहेंगे, वह मैं करूंगा.’’

सब लोग शांत हो कर घनश्याम की बात सुनने लगे. घनश्याम ने बोलना शुरू किया, ‘‘देखो भाइयो, जब मैं पुजारीजी के पास गया और अपनी परेशानी बताई, तो इन्होंने मुझ से 2 बकरों की भेंट काली माता पर चढ़ाने के लिए रुपए लिए थे. साथ ही, मुझ से यह भी कहा था कि मैं घर में पूजा कराऊं.’’

‘‘मैं ने पुजारीजी के कहे मुताबिक ही पूजा कराई और घर में बकरे के मांस से बना खाना परोसा. पुजारीजी ने मुझ से पूछा नहीं और मैं ने बताया नहीं.’’

भीड़ में से एक आदमी ने लानत भेजते हुए कहा, ‘‘तो भले आदमी, तुम को तो सोचना चाहिए कि पुजारी को मांस खिलाना कितना अधर्म का काम है. क्या तुम यह नहीं जानते थे?’’

घनश्याम ने शांत लहजे में जवाब दिया, ‘‘भाइयो, मुझे नहीं लगता कि यह कोई अधर्म का काम है. जब ब्राह्मण पुजारी अपनी आराध्य काली माता पर बकरे की बलि चढ़ा सकता है, तो उस बकरे के मांस को खुद क्यों नहीं खा सकता? क्या पुजारी की हैसियत भगवान से भी ज्यादा है या भगवान ब्राह्मण से छोटी जाति के होते हैं?’’

लोगों में सन्नाटा छा गया. घनश्याम की बात पर किसी से कोई जवाब न मिल सका.

पुजारीजी का सिर शर्म से झुक गया. उन्होंने यह बात तो कभी सोची ही नहीं थी. लोग खुद इस बात को सोचे ही बिना काली माता के लिए बकरे की बलि देते रहे थे.

आज पंडितजी की समझ में आया कि भला भगवान किसी जानवर का मांस क्यों खाने लगे? वे तो किसी भी जीव की हत्या को बुरा मानते हैं, वहां मौजूद सभी लोग घनश्याम की बात का समर्थन करने लगे.

भीड़ के लोगों ने पुजारीजी को ही फटकार कर काली माता का मंदिर छोड़ देने की चेतावनी दे दी. उस दिन से काली माता के मंदिर पर पशु बलि की प्रथा बंद हो गई.

पुजारीजी का धर्म भ्रष्ट हो चुका था, ऊपर से लोगों की नजरों में उन की इज्जत न के बराबर हो गई थी. उन्होंने वहां से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी. अब मंदिर वीरान हो गया था. अब वहां जानवर बंधने लगे थे.

मेरी पत्नी अपने औफिस के यंग लड़कों के साथ छोटे कपड़ों में पार्टी करने जाती है. मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल – 

मेरी पत्नी मुझसे उम्र में 6 साल छोटी है और दिखने में बेहद खूबसूरत और सेक्सी है. उसे पार्टीज़ करने का बहुत शौंक है. वे हर वीकेंड अपने औफिस के कलीग्स के साथ पार्टीज़ करती है और उन्हीं के साथ रात को लेट घर आती है. अभी कुछ टाइम से ही उसको इन सब पार्टीज़ की आदत पड़ी है. ऐसे में जब वे वीकेंड्स पर पार्टी करने जाती है तब वन पीस और शोर्ट ड्रैसिज पहन कर जाती है. उसके औफिस में काफी लड़के यंग दिखते है जिनके साथ वे पार्टी करने जाती है. जब वे घर होती है तब भी वे ज्यादातर टाइम अपने फोन में लगी रहती है और मेरे पूछने पर कहती है कि वे औफिस के काम की बात कर रही है जबकि पहले ऐसा कभी नहीं होता था. मुझे काफी बार शक होता है कि मेरी पत्नी का अपने औफिस के लड़को के साथ संबंध है.

जबाव –

आज के समय में औफिस के कलीग्स के साथ पार्टीज करना आम बात है. ज्यादातर औफिस में लोग वीकेंड्स पर पार्टी करते हैं जिससे कि उनका आपस में बौंड अच्छा बन जाता है. आपकी बातों से ऐसा दिख रहा है कि अपकी पत्नी बेहद खुले वीचारों वाली इंडिपैंडेंट लड़की है. अगर वे पार्टीज करने अपने कलीग्स के साथ जाती भी है तो जरूरी नहीं है कि उनके मन में किसी के लिए कुछ गलत विचार हो या फिर उनका किसी के साथ संबंध हो.

आजकल के युवा नौजवान अच्छे से अपनी लिमिट्स जानते हैं और उन्हे इस बात की जानकारी होती है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. अगर आपको किसी बात का शक है तो आप एक बार उनके साथ उनके कलीग्स व दोस्तों से मिल सकते हैं, उनसे बात कर सकते हैं. आपको अपनी पत्नी का दोस्त बनना चाहिए और उनसे उनके औफिस की बातें पूछनी चाहिए. लड़कियों को अच्छा लगता है जब कोई उनकी बातों में इंट्रस्ट दिखाता है और उनसे पूछता है कि उनका दिन कैसा गया.

आपको एक दोस्त बन कर अपनी पत्नी से बात करनी चाहिए. ऐसे में आप अपनी पत्नी के दोस्तों के भी दोस्त बन सकते हैं. कभी अपनी पत्नी को कहें कि उनके कलीग्स को घर डिनर पर बुलाते हैं तो कभी आप भी उनके साथ चले जाएं. ऐसे में आप दोनों एक दूसरे के नज़दीक आने लगेंगे और आपके मन में जो शक है वे भी दूर हो जाएगा.

अगर आप उनकी बातों को समझेंगे और बिना लड़ाई-झगड़ा या बिना उनके ऊपर शक जताए उनसे बाते करेंगे तो वे भी आपकी बातों को समझेंगी. ऐसे में आपको उनके साथ थोड़ा मोडर्न होने की जरूरत है क्योंकि समय के साथ हम सबको बदलना पड़ता है.

अमानत – कहानी इमानदारी की

कानपुर सैंट्रल रेलवे स्टेशन के भीड़ भरे प्लेटफार्म से उतर कर जैसे ही मैं सड़क पर आया, तभी मुझे पता चला कि किसी जेबकतरे ने मेरी पैंट की पिछली जेब काट कर उस में से पूरे एक हजार रुपए गायब कर दिए थे. कमीज की जेब में बची 2-4 रुपए की रेजगारी ही अब मेरी कुल जमापूंजी थी. मुझे शहर में अपना जरूरी काम पूरा करने और वापस लौटने के लिए रुपयों की सख्त जरूरत थी. पूरे पैसे न होने के चलते मैं अपना काम निबटाना तो दूर ट्रेन का वापसी टिकट भी कैसे ले सकूंगा, यह सोच कर बुरी तरह परेशान हो गया. इस अनजान शहर में मेरा कोई जानने वाला भी नहीं था, जिस से मैं कुछ रुपए उधार ले कर अपना काम चला सकूं.

हाथ में अपना सूटकेस थामे मैं टहलते हुए सड़क पर यों ही चला जा रहा था. शाम के साढ़े 5 बजने को थे. सर्दी का मौसम था. ऐसे सर्द भरे मौसम में भी मेरे माथे पर पसीना चुहचुहा आया था. मुझे बड़ी जोरों की भूख लग आई थी. मैं ने सड़क के किनारे एक चाय की दुकान से एक कप चाय पी कर भूख से कुछ राहत महसूस की, फिर अपना सूटकेस उठा कर सड़क पर आगे चलने के लिए जैसे ही तैयार हुआ कि तकरीबन 9 साल का एक लड़का मेरे पास आया और बोला, ‘‘अंकलजी, आप को मेरी मां बुला रही हैं. चलिए…’’ इतना कहते हुए वह लड़का मेरे बाएं हाथ की उंगली अपने कोमल हाथों से पकड़ कर खींचने लगा.

मैं उस लड़के को अपलक देखते हुए पहचानने की कोशिश करने लगा, पर मेरी कोशिश बेकार साबित हुई. मैं उस लड़के को बिलकुल भी नहीं पहचान सका था.

अगले ही पल मेरे कदम बरबस ही उस लड़के के साथ उस के घर की ओर बढ़ चले. उस लड़के का घर चाय की उस दुकान से कुछ ही दूर एक गली में था.

मैं जैसे ही उस के दरवाजे पर पहुंचा, तो उस लड़के की मां मेरा इंतजार करती नजर आई.

मैं ने तो उसे पहचाना तक नहीं, पर उस ने बिना झिझकते हुए पूछा, ‘‘आइए महेशजी, हम लोग आप के पड़ोसी गांव सुंदरपुर के रहने वाले हैं. यहां मेरे पति एक फैक्टरी में काम करते हैं.

‘‘मैं अभी डबलरोटी लेने दुकान पर गई थी, तो आप को पहचान गई. आप रामपुर के हैं न?

‘‘जब आप गांव से कसबे के स्कूल में पढ़ाने के लिए साइकिल से आतेजाते थे, तब मैं सड़क से लगी पगडंडी पर घास काटती हुई आप को हर दिन देखती थी. कभीकभी तो आप मेरे कहने पर मेरा घास का गट्ठर भी उठवा दिया करते थे.’’

पलभर में ही मैं उस लड़के की मां को पहचान गया था. 10 साल पहले की बात है, तब मैं गांव से साइकिल चला कर कसबे के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने जाया करता था. उस समय शायद यह औरत तकरीबन 16-17 साल की थी. तब इस की शादी नहीं हुई थी. यह अकसर पगडंडियों पर अपने गांव की दूसरी औरतों और लड़कियों के साथ घास काटती रहती थी.

उस समय की एक घटना मुझे अब भी याद है. एक दिन मैं ने उन सभी घास वालियों को बहुत भलाबुरा कहते हुए उन पर चोरी का इलजाम लगाया था. हुआ यह था कि मुझे उस दिन स्कूल से तनख्वाह मिली थी. पूरे ढाई हजार रुपए थे तनख्वाह के.

मैं ने एक लिफाफे में उन रुपयों को रखा और अपनी कमीज की ऊपरी जेब में डालते हुए साइकिल से घर चल पड़ा था. उस दिन कई जगहों पर बीचबीच में साइकिल की चेन उतर जाने से उसे चढ़ाते हुए मैं घर आया था.

घर आने पर पता चला कि मेरा रुपयों वाला लिफाफा साइकिल की चेन चढ़ाते समय रास्ते में कहीं गिर गया था. मैं उसी समय साइकिल से रास्ते में अपना रुपयों वाला लिफाफा ढूंढ़ते हुए उन घास वालियों से जा कर पूछताछ करने लगा.

घास वालियों ने लिफाफा देखने से साफ इनकार कर दिया. मैं ने बारबार उन घास वालियों पर शक जताते हुए उन्हें बहुत ही बुराभला सुनाया था और तभी से नाराज हो कर फिर कभी उन के घास के गट्ठर को उठाने के लिए सड़क पर साइकिल नहीं रोकी. मैं ने उस औरत के यहां रह कर कुछ रुपए उधार मांग कर अगले 3 दिनों में अच्छी तरह अपना काम पूरा किया था.

उस औरत का पति बहुत अच्छे स्वभाव का था. वह मुझ से बहुत घुलमिल कर बातें करता था, जैसे मैं उस का कोई खास रिश्तेदार हूं. 3 दिनों के बाद जब मैं वापस जाने लगा, तो उस औरत का पति फैक्टरी के लिए ड्यूटी पर जा चुका था और छोटा बच्चा स्कूल गया था. घर में केवल वह औरत थी. मैं ने सोचा कि चलते समय किराए के लिए कुछ रुपए उधार मांग लूं और घर जा कर रुपया मनीऔर्डर कर दूंगा.

मैं उस औरत के पास गया और उस से उधार के लिए बतौर रुपया मांगने ही वाला था कि तभी वह बोली, ‘‘भाई साहब, अगर आप बुरा न मानें, तो मैं आप की एक अमानत लौटाना चाहूंगी.’’

मैं उस औरत की बात समझा नहीं और हकलाते हुए पूछ बैठा, ‘‘कैसी अमानत?’’

उस ने मुझे पूरे ढाई हजार रुपए लौटाते हुए कहा, ‘‘सालों पहले आप ने एक दिन सभी घास वालियों पर रुपए लेने का जो इलजाम लगाया था, वह सच था.

‘‘जब आप साइकिल की चेन चढ़ा रहे थे, तो आप के रुपए का लिफाफा जमीन पर गिर पड़ा था और आप को रुपए गिरने का पता नहीं चला था. मैं ने दूसरी घास वालियों की नजर बचा कर वह लिफाफा उठा लिया था.

‘‘उस समय मेरे बापू की तबीयत बहुत ज्यादा खराब चल रही थी. दवा के लिए रुपयों की सख्त जरूरत थी और कहीं से कोई उधार भी देने को तैयार न था.

‘‘मैं ने बापू की दवा पर वे रुपए खर्च करने के लिए झूठ बोल दिया कि मैं ने रुपयों का कोई लिफाफा नहीं उठाया है. फिर तो उन रुपयों से मैं ने अपने बापू का अच्छी तरह इलाज कराया और वे बिलकुल ठीक हो गए, उन की जान बच गई.

‘‘इस के बाद मुझे आज तक यह हिम्मत नहीं हुई कि सच बोल कर अपने झूठ का पछतावा कर सकूं.’’

मैं उन रुपयों को अपने हाथ में थामे हुए उस औरत की आंखों में झांकते हुए यह सोच रहा था कि वह झूठ जो कभी किसी की जान बचाने के लिए बोला गया था, झूठ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि वह तो इस औरत ने सच की पोटली में अमानत के रुपए बतौर बांध कर अपने पाकसाफ दिल में महफूज रखा हुआ था.

मैं उस औरत के मुसकराते हुए चेहरे को एक बार फिर सच के आईने में झांकते हुए, उस के नमस्ते का जवाब देता हुआ तेज कदमों से रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ गया.

वंशबेल

रामलीला मैदान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान एक स्त्री महाराजजी के आगे ‘बेटा’ न होने का दुखड़ा रोती है तो वह उसे गुरुमंत्र और कुछ पुडि़या देते हैं. कार्यक्रम की समाप्ति पर महाराज विदेशी कार में अपने पूरे काफिले के साथ आश्रम चले जाते हैं. थोड़ी देर आराम करने के बाद अपने खास सेवकों के साथ कार्यक्रम की चर्चा करते हैं तभी एक सेवक कहता है कि गुरुजी इस वंशबेल को बढ़ाने के लिए कोई उत्तराधिकारी तो होना ही चाहिए. लोग कहते हैं कि यदि बेटा होने की कोई दवाई या मंत्र होता तो क्या महाराज का कोई बेटा नहीं होता. उन की बातें सुन कर महाराज दुखी हो जाते हैं.

अत: सभी शिष्य मिल कर महाराज के दूसरे विवाह की योजना बनाते हैं. कुछ दिनों के बाद उन के शिष्य एक स्त्री के बारे में अफवाह फैला देते हैं कि एक गर्भवती स्त्री को उस के शराबी पति ने घर से निकाल दिया है और अब वह महाराज की शरण में है. एक दिन सभा के दौरान भक्तों की चुनौती पर महाराज उसे अपनाने को तैयार हो जाते हैं लेकिन जब यह बात महाराज की पहली पत्नी सावित्री को पता चलती है तो वह तिलमिला जाती है. महाराज अपनी दूसरी नवविवाहिता पत्नी सुनीता के साथ दूसरे आश्रम में रहने लगते हैं. सावित्री की नाराजगी दूर करने के लिए उस को ‘गुरु मां’ का दरजा दे देते हैं. कुछ महीनों के बाद सुनीता के गर्भवती होने की खबर पा कर महाराजजी उसे डाक्टर के पास ले जाते हैं और उस के गर्भस्थ शिशु का लिंगभेद जानने के लिए अल्ट्रासाउंड करने को कहते हैं तभी सुनीता, डाक्टर और महाराज के बीच हुई सारी बातें सुन लेती है.

अब आगे…

सुनीता से यह सब सहा नहीं गया और वह बेहद विचलित हो उठी. महाराज का असली रूप देख कर उस का मन घृणा से भर उठा. वह चाहती तो थी कि उसी समय उस कमरे में जा कर उन दोनों को खूब खरीखरी सुना दे लेकिन महाराज का पद, पैसा, प्रतिष्ठा देख कर वह रुक गई. वह जान गई थी कि महाराज और उन के सेवक उसे क्षण भर में ही मसल कर रख देंगे. महाराज कोई न कोई आरोप लगा कर उसे लांछित और प्रताडि़त कर सकते हैं, क्योंकि अपनी छवि और प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं. हार कर वह पुन: बाहर बैठ गई.

तब तक महाराज बाहर आ चुके थे. सुनीता को देखते ही उन्होंने कुटिल मुसकान उस पर डाली. सुनीता बडे़ सधे कदमों से उन तक पहुंची और बोली, ‘‘क्या कहा डाक्टर ने, सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, सब ठीक है,’’ वह थोड़ा चिंतित हो कर बोले, ‘‘यहां की मशीनें इतनी आधुनिक नहीं हैं… कहीं और चल कर दिखाएंगे.’’

‘‘आज तो मैं बहुत थक चुकी हूं. थोड़ा आराम करना चाहती हूं…आप कहें तो आश्रम चलें?’’ सुनीता ने स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए बेहद विनम्रता से पूछा.

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ कहतेकहते महाराज बाहर आ गए. तब तक उन की विदेशी कार पोर्च में आ चुकी थी. सेवकों ने द्वार खोला और वह उस में मुसकराते हुए प्रवेश कर गए. सुनीता ज्यों ही उन के पास आ कर बैठी, कार चल पड़ी.

कार आश्रम में आ गई. सुनीता फौरन महाराजजी के लिए ठंडा पानी ले कर आई. वह जानती थी कि इस समय महाराजजी निजी कमरे में विश्राम करते हैं और उस के बाद भक्तों की भीड़ लग जाती है. फिर कुछ सोचते हुए वह महाराज के पास जा कर बैठ गई और उन के घुंघराले बालों में हाथ फेरते हुए बेहद मुलायम स्वर में बोली, ‘‘आज मैं आप को कहीं नहीं जाने दूंगी. आप के भोजन की व्यवस्था भी यहीं कर देती हूं. मेरा भी तो मन करता है कि अपने महाराजजी, अपने पति परमेश्वर को अपने सामने बैठा कर भोजन कराऊं.’’

इतना कह कर सुनीता उन से लिपट गई. इस से पहले कि महाराज कुछ कहते सुनीता ने जानबूझ कर अपनी साड़ी का पल्लू गिरा कर अपने दोनों वक्षों में महाराज के मुंह को छिपा लिया. सुनीता के गुदाज और गोरे बदन की भीनीभीनी खुशबू में महाराज धीरेधीरे डूबने लगे. उन्होंने सुनीता को कस कर अपने बाहुपाश में जकड़ लिया. सुनीता ने उन की कमजोर नस को दबा रखा था और जानबूझ कर अपने शरीर को उन के शरीर के साथ लपेट लिया. इस से पहले कि महाराज उस के तन से कपड़े अलग करते उस ने महाराज की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘अब तो मैं आप के बच्चे की मां बनने जा रही हूं. मैं ने आज तक आप से कभी कुछ नहीं मांगा…’’

‘‘तो तुम्हें क्या चाहिए रानी?’’ महाराज ने उस के कपोलों पर चुंबन अंकित कर के पूछा.

‘‘मैं भला क्या चाहूंगी… सभी सुखसुविधाएं तो आप की दी हुई हैं, पर थोडे़ से पैसे और अपने रहनसहन के लिए हर बार आप के सामने प्रार्थना करनी पड़ती है, जो मुझे अच्छा नहीं लगता. आप तो हमेशा बाहर ही रहते हैं और मैं…’’ सुनीता ने जानबूझ कर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
‘‘तो ठीक है. मेरे कमरे के सेफ में कुछ रुपए रखे रहते हैं. मैं उस की चाबी तुम को दे देता हूं. बस, अब तो खुश हो न,’’ कह कर महाराज उस के आगोश में सिमट कर लेट गए.

शाम को जब महाराजजी आश्रम की गतिविधियों को देखने के लिए वहां से जाने लगे तो सुनीता ने खुद ही बात शुरू कर दी :

‘‘महाराज, अब तो आप पिता बनने वाले हैं. आज मैं इनाम लिए बिना नहीं मानूंगी.’’

‘‘इनाम?’’ महाराज चौंक कर उसे देखने लगे.

‘‘क्यों…क्या आप को बच्चे की खुशी नहीं है.’’

‘‘हां, खुशी तो है पर पता नहीं बेटा होगा या…’’ महाराज कुछ सोचते हुए बोले.

‘‘आप को क्या चाहिए…बेटा या बेटी?’’

‘‘बेटा…पहले तो बेटा ही होना चाहिए,’’ महाराज तपाक से बोले.

‘‘तो फिर बेटा ही होगा,’’ कह कर सुनीता हंसने लगी.

‘‘और अगर बेटी हुई तो?’’

‘‘फिर आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा. मैं आप की पत्नी हूं. मेरा सुख तो आप के साथ ही है. आप नहीं चाहेंगे तो बेटी पैदा नहीं होगी. मैं बस, आप को सुखी और खुश देखना चाहती हूं,’’ कह कर वह उन्हें प्यार से देखने लगी.

इधर महाराज को 6 दिन के लिए एक विशेष शिविर में भाग लेने मध्य प्रदेश जाना पड़ गया. सुनीता को तो ऐसे मौके की ही तलाश थी. इसी बीच सुनीता ने अपने रहने के स्थान पर अभूतपूर्व परिवर्तन कर दिया. इतालवी झूमर व लाइटें, बेहद खूबसूरत नक्काशीदार पलंग, शृंगार की मेज पर विदेशी इत्र एवं पाउडर, गद्देदार सोफे और इंच भर धंसता कालीन…यह सबकुछ इसलिए कि सुनीता चाहती थी कि महाराज जब वापस यहां आएं तो बस, यहीं के हो कर रह जाएं.

उस दिन शाम को जब महाराज शिविर से लौट कर थकेहारे आए तो सुनीता बेहद आकर्षक बनावशृंगार के साथ आभूषणों से लदी खूबसूरत कपड़ों में महाराज का स्वागत करने के लिए आगे बढ़ी. वह उसे देखते ही रह गए. उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि सुनीता इतनी खूबसूरत भी हो सकती है.

‘‘बहुत थक गए होंगे आप,’’ महाराज के एकदम पास आ कर सुनीता बोली, ‘‘पहले फ्रैश हो जाइए, तब तक मैं चाय ले कर आती हूं.’’

सुनीता जब तक चाय ले कर आई तब तक महाराज आसपास की वस्तुओं को बडे़ ध्यान से देखते रहे. उन की आंखों की भाषा को पढ़ते हुए वह बोली, ‘‘अब यह मत कहिएगा कि इतना सामान कहां से लिया और महंगा है. आप कमाते किस लिए हैं…उस भविष्य के लिए जो आप ने देखा ही नहीं या उस वर्तमान के लिए जो आप जी नहीं पा रहे हैं. बस, सुबह से शाम तक आश्रम और साधकों को लुभाने के लिए सफेद कुर्ताधोती या गेरुए वस्त्र. इस से बाहर भी कोई दुनिया है,’’ इतना कह कर सुनीता उन्हें प्यार से सहलाने लगी, ‘‘अच्छा, अब आप स्नान कर लीजिए. मैं अपने हाथ से आप के लिए खाना लगाती हूं. बहुत हो गया सेवकों के हाथ से खाना खाते हुए,’’ सुनीता ने अलमारी से एक सिल्क का कुरता निकाला और महाराज को पकड़ा दिया.

‘‘अरे, यह सब?’’ आश्चर्य और प्रसन्नता से उन्होंने पूछा.

‘‘क्यों, अच्छा नहीं है क्या? यहां पर आप कोई महंत या महात्मा तो हैं नहीं. मैं जैसा चाहूंगी वैसा आप को रखूंगी,’’ कह कर उस ने महाराज के गालों पर चुंबन अंकित कर दिया.

महाराज आज सुबह बहुत ही तरोताजा लग रहे थे. कमरे के साथ लगे लान में वह अखबार पढ़ रहे थे. तभी सुनीता चाय की ट्रे करीने से सजा कर उन के पास ले आई और महाराज की तरफ तिरछी नजर से देखते हुए बोली, ‘‘आज तो आप बहुत ही फ्रेश लग रहे हैं. कैसी लगी आप को मेरी पसंद और घर का बदला हुआ स्वरूप?’’

‘‘घर से ज्यादा तो तुम्हारे बदले हुए रूप ने मुझे प्रभावित किया है,’’ महाराज ने शरारत भरी नजरों से सुनीता को देखते हुए कहा, ‘‘आज मैं सचमुच तुम्हारी पसंद से बहुत खुश हूं. तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं.’’

‘‘महाराजजी, मेरा बस चले तो आश्रम की व्यवस्था और सुंदरता की कायापलट कर दूं. इतनी दूरदूर से लोग आप से मिलने आते हैं. उन्हें भी सुखसुविधाएं मिलनी चाहिए. आते ही ठंडा पानी, बैठने के लिए आरामदायक स्थान और भोजन आदि की व्यवस्था…आप का भी मान बढे़गा और लोग भी खुशीखुशी आएंगे.’’

‘‘पर इस के लिए इतना धन चाहिए कि…’’

‘‘आप को धन की क्या कमी है, महाराज,’’ सुनीता बीच में बात काटते हुए बोली, ‘‘लक्ष्मी तो आप पर विशेष रूप से मेहरबान है.’’

महाराज अपनी प्रशंसा सुन कर मुसकराने लगे…फिर बोले, ‘‘अच्छा, मैं अपनी समिति के सदस्यों और अंतरंग सेवकों से सलाह ले लूं.’’

‘‘अंतरंग सदस्यों से? महाराज, यह आश्रम आप का है. सलाह सब की लें पर निर्णय आप का ही होना चाहिए. यदि हर काम उन से सलाह ले कर करेंगे तो देखना एक दिन सब आप को लूट खाएंगे. आप तो बस, अपना निर्णय सुनाइए.’’

‘‘सुनीता, इस आश्रम के नियमों में तो मैं कोई परिवर्तन नहीं कर सकता हूं, हां, शहर के दूसरी तरफ मुझे एक भक्त ने 2 बीघा जमीन दान मेें दी है. तुम उस पर जैसा चाहो वैसा करो. उस के डिजाइन, रखरखाव में जैसा परिवर्तन चाहोगी वैसा कर सकती हो. तुम चाहोगी तो कुछ सेवक भी वहां नियुक्त कर दूंगा.’’

सुनीता को तो जैसे मनचाही खुशी मिल गई. महाराज तैयार हो कर आश्रम जाने लगे तो सुनीता सहमे स्वर में बोली, ‘‘कल मैं आप के पीछे आप की आज्ञा के बिना पास के क्लीनिक में गई थी. बाकी तो सब ठीक है पर महाराज, बडे़ खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि गर्भस्थ शिशु लड़की ही है.’’

‘‘लड़की…ओफ,’’ महाराज ने ऐसे कहा जैसे कुछ जानते ही न हों.

‘‘मैं जानती थी कि आप को यह सुन कर दुख होगा क्योंकि आप बेटा चाहते हैं, इसलिए मैं ने डाक्टर को कह दिया कि हमें लड़की नहीं चाहिए. डाक्टर ने कहा है कि इस काम के लिए कुछ दिन और इंतजार करना पडे़गा और 5 हजार रुपए का खर्चा आएगा.’’

सुनीता अच्छी तरह जानती थी कि यदि खुद उस ने ऐसा नहीं कहा तो किसी दिन वह स्वयं उसे किसी न किसी बहाने किसी बडे़ क्लीनिक या अस्पताल में ले जाएंगे. तब वह दीनहीन बन कर अपना सर्वस्व समाप्त कर लेगी.

महाराज ने सोचा भी नहीं था कि इतनी आसानी से सुनीता गर्भपात के लिए तैयार हो जाएगी. उन्होंने एक भेदभरी नजर से उस को देखा फिर अंक में भर कर बोले, ‘‘तुम दुख न मनाओ…हां, अपना ध्यान रखना. मैं तुम जैसी पत्नी को पा कर धन्य हो गया हूं.’’

धीरेधीरे समय बीतता गया. महाराज से अति निकटता प्राप्त करने का सुनीता ने कोई भी अवसर नहीं गंवाया. नए आश्रम की बागडोर भी महाराज ने उसे दे दी, जैसा कि वह चाहती थी. इतना ही नहीं दिनप्रतिदिन उस के चेहरे पर निखार आता गया और वह नएनए गहनों में इठलाती, इतराती घूमती रहती.

एक दिन वही हुआ जो होना था. दोपहर को सुनीता अपने कमरे में बैठी फोन पर बात कर रही थी कि तभी महाराज तेजी से आए और सेफ की चाबियां मांगने लगे.

‘‘क्यों, ऐसा क्या हो गया आज. आप 2 मिनट विश्राम तो कीजिए,’’ कह कर वह तेजी से स्थिति को भांप गई और फोन को पास ही में रख कर खड़ी हो गई.

‘‘होना क्या था. मेरा एक 10 लाख का चेक बैंक से वापस आ गया है. समझ में नहीं आता कि ऐसा कैसे हो गया जबकि बैंक में बैलेंस भी था.’’

‘‘इतने बडे़ अमाउंट का चेक आप ने किसे दे दिया? आप ने तो कभी बताया ही नहीं.’’

‘‘यह सब बताने का समय मेरे पास नहीं है. पैसा आज न दिया तो मेरे हाथ से बहुत बड़ी जमीन निकल जाएगी.’’

‘‘पर सेफ में इतने रुपए कहां हैं,’’ सुनीता ने कहा.

‘‘क्यों?’’ महाराज की भौंहें तन गईं. 20 लाख से अधिक रकम होनी चाहिए वहां तो.

‘‘महाराजजी, आप को याद नहीं कि आप से पूछ कर ही तो यहां की साजसज्जा और अपने लिए रुपए लिए थे…और फिर नए आश्रम का काम भी तो…’’

‘‘सुनीता,’’ महाराज अपने क्रोध को नियंत्रित न कर पाए, ‘‘मैं कल उस आश्रम में भी गया था. वहां सब मिला कर 5 लाख से ऊपर खर्च नहीं हुए होंगे.’’

‘‘तो मैं ने कौन से अपने लिए रख लिए हैं. सबकुछ तो आप के सामने है. तब तो आप की जबान मेरी तारीफ करते नहीं थकती थी और अब…’’ सुनीता तुनक कर बोली.

‘‘अब समझ में आया कि इन सारे खर्चों की आड़ में तुम ने मेरा काफी पैसा ले लिया है,’’ कह कर महाराजजी तेजी से सेफ खोल कर देखने लगे. वहां केवल 50 हजार रुपए कैश रखे थे. वह माथा पकड़ कर वहीं बैठ गए फिर तेज स्वर में बोले, ‘‘सचसच बताओ, सुनीता, तुम ने ये सारे रुपए कहां रखे हैं. एक तो मेरा सारा बैंक का रुपया सावित्री ने न जाने कहांकहां खर्च कर दिया और ऊपर से तुम ने.’’

‘‘सावित्री…ये सावित्री कौन है?’’

‘‘सावित्री, मेरी पत्नी… तुम नहीं जानतीं क्या?’’

‘‘तो मैं कौन हूं? आप ने कभी बताया नहीं कि आप ने दूसरा विवाह भी किया है. मुझे भी धोखे में रखा है.’’

‘‘तो तुम उसी धोखे का बदला ले रही हो मुझ से? जितना मानसम्मान, धन, ऐश्वर्य मैं ने तुम को दिया है तुम्हें सात जन्मों में भी नसीब न होता.’’

‘‘आप की पत्नी होने से तो अच्छा था मेरे पिता कोई अंधा, बहरा, लूलालंगड़ा दूल्हा ढूंढ़ देते तो मैं खुद को ज्यादा तकदीर वाली समझती.’’

‘‘मैं ने इतनी मेहनत से जो पैसा जमा किया है अब समझ में आया, तुम ने क्या किया.’’

‘‘मेहनत से या लोगों को बेवकूफ बना कर. आप महात्मा हैं या ढोंगी. अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कैसा घिनौना खेल खेल रहे हैं,’’ सुनीता का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज हो गया, ‘‘लोगों को पुत्र होने के मंत्र और भस्म देते हैं. जरा स्वयं पर भी तो उसे आजमाइए तो पता चले. आप की जानकारी के लिए बता दूं कि स्त्री केवल एक उपजाऊ भूमि होती है. और बेटा या बेटी पैदा करने के लिए जिस बीज की जरूरत होती है वह पुरुष के पास होता है, स्त्री के पास नहीं… तुम दोष स्त्री को देते हो. मैं इन सारे तथ्यों को लोगों को बताऊंगी ताकि लोगों के विश्वास को धक्का न पहुंचे, जो अपना एकएक पैसा जोड़ कर बड़ी श्रद्धा से आप के चरणों में भेंट चढ़ाते हैं.

‘‘आप ने सारे तथ्यों को छिपा कर मुझ से विवाह किया. मुझे पहले ही मालूम होता कि आप विवाहित और 3 लड़कियों के पिता हैं तो मैं कभी भी विवाह न करती और आप ने मुझ से केवल इसीलिए विवाह किया कि मैं बेटा पैदा कर सकूं. आप के शिष्यों ने पता नहीं क्याक्या झूठ बोल कर मेरे गरीब मातापिता को भ्रम में रखा और जब तक मुझे सचाई का पता चलता, बहुत देर हो चुकी थी.

‘‘जिस औरत ने मुझे सहारा दिया और मुसीबत के क्षणों में मेरा साथ दिया, जिस के कहने पर यह सारा प्रेम प्रपंच रचा गया वह आप के पीछे खड़ी है. मैं तो एक साधारण औरत ही थी.’’

महाराज ने पीछे मुड़ कर देखा तो उन की पत्नी सावित्री खड़ी थी. महाराज एकदम अचंभित से हो गए.

सावित्री उन्हें तीखी नजरों से देखने लगी, ‘‘महाराज, जिस तरह आप ने लोगों से धन जमा किया है, हम ने भी उसी प्रकार आप से ले लिया है. आप जहां शिकायत करना चाहें करें पर इतना ध्यान जरूर रखें कि आप के कारनामे सुनने के लिए बाहर समाचारपत्र और टीवी चैनल वाले आप का इंतजार कर रहे हैं.’’

महाराज को ऐसा कोई रास्ता नहीं मिल रहा था कि वह बाहर जा सकें. खिड़की का परदा हटा कर देखा तो आश्रम के बाहर हजारों व्यक्तियों की भीड़ उमड़ पड़ी थी जो काफी गुस्से में थी.

सावित्री ने सुनीता के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘अब तुम मेरे संरक्षण में हो. तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है. जिस इनसान को भीड़ से बचने की चिंता है वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता.’’

लग सकता है लाखों का चूना अगर करते हैं औनलाइन बेटिंग, हो जाइए सावधान

आज के दौर में हर इंसान का बस एक ही सपना है कि वह जल्द से जल्द ढ़ेर सारा पैसा कमाना चाहता है. आजकल के ज्यादातर युवा मेहनत से नहीं बल्कि किस्मत के भरोसे पैसा कमाना चाहते हैं. औनलाइन बेटिंग (Online Betting) के बारे में तो आप सब ने सुना ही होगा. हमारे समाज में जुआ खेलने को अपराध माना जाता है और जुआ खेलने वाले लोगों को गलत ठहराया जाता है. आज के समय में जहां हर चीज़ डिजिटल हो गई है वहीं जुआ खेलना भी डिजिटल हो चुका है.

स्मार्टफोन आज सबके पास है. एक आंकड़े पर विश्वास किया जाए, तो साल 2023 में 1 बिलियन यानी करीब 100 करोड़ और साल 2040 तक स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या 155 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है. स्मार्टफोन समाज के हर तबके और हर आयुवर्ग की जरूरत बन गया है, बच्चे की स्टडी से ले कर बुजुर्गों के एंटरटैनमेंट तक के लिए लोग इस गैजेट के आगे खुद को सरेंडर कर चुके हैं. जब बात आसानी से पैसा कमाने की आती है, तो इस मामले में स्मार्टफोन एक स्मार्ट गैजेट का रूप ले चुका है. सभी स्मार्टफोन्स में ऐसे कई एप्स हैं जिससे आप घर बैठेबैठे जुआ खेल कर पैसा कमा सकते हैं. अब कमा सकते हैं या गवा सकते हैं यह बोलना थोड़ा मुश्किल है.
साल 2024 में Online Sports Betting मार्केट का करीब 200 करोड़ डौलर पहुंचने का अनुमान लगाया गया. स्टैटिस्टा की रिपोर्ट के अनुसार हर साल यह करीब 6.51 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान लगाया गया. इस ग्रोथ के हिसाब से यह बाजार साल 2029 तक बढ़ कर 270 करोड़ डौलर तक पहुंच जाएगा यही वजह है कि इस तरह की एप्स बनाने वाली कंपनीज़ इसको खुल्लमखुल्ला प्रोमोट भी कर रही हैं और इन्हें रोकने वाला कोई नहीं है.

आज कई फिल्मस्टार्स को इसका प्रचार करते देखा जा सकता है, स्टार्स को प्रचार करता देख, सामान्य व्यक्ति आकर्षित होता है, पिछले साल महादेव बैटिंग ऐप मामले में स्टार्स का इनवौल्वमेंट इसी का उदाहरण है. आप देखिए सड़कों पर बड़ेबड़े बैनर्स से लोग अपनी एप्स का प्रोमोशन कर रहे हैं जिसमें साफ लिखा होता है कि जुआ खेलो और पैसे कमाओ. यह सब देखते हुए महसूस होता है कि आजकल जुआ खेलना आम बात है और ऐसी कंपनीज अपने फायदे के लिए इन सब चीज़ों को बढ़ावा दे रही हैं.

ज़ुपी (Zupee), विंज़ो (WinZo), एमपीएल (MPL), एविएटर्स (Aviators), जैसी ना जाने एसी कितनी औनलाइन बेटिंग एप्स हैं जिसमें आजकल ये युथ अपने पैरेंट्स के या अपनी मेहनत के पैसे को जुआ जीतने की लालच में गवां रहे हैं. उदाहरण के तौर पर कहें तो अगर इन एप्स से कोई 50 या 100 रुपए भी जीत जाता है तो वह अपने साथसाथ न जाने कितने लोगों को इसकी खबर करता है और उनसे खेलने को कहता है. ऐसे में वे अपने साथसाथ और लोगों को भी इसकी आदत लगवा देता है. इन एप्स में आसान आसान गेम्स होती हैं जिसमे पैसा लगा कर कोई भी इस गेम को खेल सकता है.

इस एप्स की आदत बहुत ही बुरी होती है और इंसान जीत के लालच में इसमें पैसा हारता चला जाता है. इस तरीके की एप्स का एक उद्देश्य होता है कि पहले तो ये आपको 50-100 रुपए जिता कर आपको कौंफिडैंस देगी और फिर जब आपको इसकी आदत लग जाएगी तो आप इसमें हारते भी जाओगे और आपको महसूस तक नहीं होगा. जब इंसान को इन एप्स की लत लग जाती है तब उसका ध्यान किसी और काम में नहीं लगता और हर समय वह अपने फोन में ऐसी गेम्स खेल कर पैसे जीतने में लगा रहता है.

देखा जाए तो लोग किस्मत के या फिर चमत्कार के भरोसे पैसा कमाना चाहते हैं. ऐसा देखा गया है कि हिंदु, इसलाम और क्रिश्चयन धर्म के लोग चमत्कार पर भरोसा करते हैं और मानते हैं कि भगवान हमें पैसे जितवा सकता है या कभी ऐसा सोचते हैं कि आज भगवान हमारे साथ है तो आज तो हम पक्का जीत जाएंगे. ऐसे लोग शर्त लगाने में भी बहुत इंट्रस्टिड रहते है और बेफजूल कि बातों पर पैसों कि शर्त लगाने लगते हैं जिसमें उन्हें लगता है कि हम जीत ही जाएंगे. लोगों को समझना चाहिए कि शर्त केवल अंधविश्वास की देन है, जो मन में ईश्वर की शक्ति के प्रति विश्वास जगाती है. अगर आप भी एसी शर्ते लगाते हैं या फिर औनलाइन बेटिंग एप्स पर जुआ खेलते हैं तो आपको यह सब बंद करना चाहिए.

मेरा बौस मेरे साथ आउट औफ स्टेशन जाना चाहता है पर मुझे उसकी नीयत पर शक है. मैं क्या करूं?

सवाल –

मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करती हूं और काम के सिलसिले में मुझे अपना ज्यादातर टाइम बौस के साथ बिताना पड़ता है. इसके बावजूद वे कभी मुझे अपने कैबिन में लंच करने बुला लेते हैं तो कभी रात को डिनर के लिए पूछते हैं. मैं हर बार कोई ना कोई बहाना बना कर मना कर देती हूं. औफिस की एक कौंफ्रैंस के लिए मेरे बौस को आउट औफ स्टेशन जाना है 4 दिन के लिए और वे चाहते हैं कि मैं इस कौंफ्रैंस में उनके साथ चलूं. मुझे उनकी नीयत सही नहीं लगती और मुझे ऐसा लगता है कि अगर उन्हों ने वहां मेरे साथ कुछ करने की कोशिश की तो मैं क्या करूंगी? कभीकभी मेरा मन करता है कि मैं ये जौब छोड़ दूं.

जवाब –

आज के समय में हर जगह ऐसा ही माहौल बना हुआ है फिर चाहे मल्टीनेशनल कंपनी हो या फिर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री. पिछले दिनों ऐसे कई इंसिडेंट्स सामने आए हैं जिसमें किसी ना किसी डायरेक्टर या प्रोड्यूसर ने अपने शो या अपनी फिल्म की एक्ट्रेस से साथ ऐसे ही पेशकश कोशिश की है. हर इंडस्ट्री में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो प्रोमोशन का लालच दे कर या फिर काम देने का बोल कर खूबसूरत लड़कियों के साथ संबंध बनाने की कोशिश करते हैं.

यह कहानी सिर्फ आप की ही नहीं बल्कि आप जैसी कई लड़कियों की है. आप को ऐसे लोगों को टैकल करना सीखना होगा. आप को ऐसी सिचुएशंस को इग्नोर करना होगा. अपने बौस के साथ सिर्फ काम की बात करें. सिर्फ काम की बात से मतलब यह नहीं है कि आप उन से रूडली बात करें बल्कि उन के साथ प्रोफेशनली पेश आएं. अगर आप उन से रूडली बात करने लग जाएंगी तो हो सकता है कि वे आप को नौकरी से निकाल दें.

आप को जौब छोड़ने का तो बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए क्योंकि आप को ऐसे लोग हर जगह मिलेंगे. क्या पता इस कंपनी को छोड़ आप कोई दूसरी कंपनी ज्वाइन करें और वहां आप को इससे भी बुरा बौस मिले तो फिर आप क्या करेंगी? कब तक जौब बदलती रहेंगी?

आप को अपने बौस की बात माननी चाहिए पर सिर्फ वही बात जो जायज़ हो. कभीकभी अपने बौस के साथ लंच या डिनर करने में कोई बुराई नही है. लेकिन ऐसी जगह पर लंच या डिनर करे, जहां बहुत सारे लोग हो. वे चाहते हैं कि कौंफ्रैंस में आप उनके साथ जाओ तो आप को जाना चाहिए क्योंकि ऐसे एक्सपीरियंस आप के करियर के लिए अच्छे साबित हो सकते हैं. अगर वहां आप को लगे कि आप का बौस आप के साथ कुछ गलत करने की कोशिश कर रहा हा जो कि आप को अच्छा नहीं लग रहा तो आप अपने बौस को साफ शब्दों में मना करें और उन्हें समझाएं कि आप को यह सब बिल्कुल नहीं पसंद.

रेस्टोरैंट में किसी ऐसी सीट पर बैठे, जो सबकी निगाहों में हो, ऐसे में बौस आप को टच करने से डरेगा. अगर किसी कौंफ्रैंस की वजह से होटल में स्टे कर रही हैं, तो ऐसे कमरे को चूज करें जहां वीडियो कैमरा लगे हो, इसे होटल मैनेजर से पहले ही कंफर्म कर लें. अगर बौस के साथ बैठ कर अकेले मीटिंग करनी हो, तो लौबी की उस जगह को चूनें, जहां आप दोनों सीसीटीवी कैमरे की जद में हो, आप का कौंफिडेंस बरकरार रहेगा. बौस भी आप से फ्री होने की कोशिश नहीं करेगा.

आखिर कब तक

राम रहमानपुर गांव सालों से गंगाजमुनी तहजीब की एक मिसाल था. इस गांव में हिंदुओं और मुसलिमों की आबादी तकरीबन बराबर थी. मंदिरमसजिद आसपास थे. होलीदीवाली, दशहरा और ईदबकरीद सब मिलजुल कर मनाते थे. रामरहमानपुर गांव में 2 जमींदारों की हवेलियां आमनेसामने थीं. दोनों जमींदारों की हैसियत बराबर थी और आसपास के गांव में बड़ी इज्जत थी. दोनों परिवारों में कई पीढि़यों से अच्छे संबंध बने हुए थे. त्योहारों में एकदसूरे के यहां आनाजाना, सुखदुख में हमेशा बराबर की साझेदारी रहती थी. ब्रजनंदनलाल की एकलौती बेटी थी, जिस का नाम पुष्पा था. जैसा उस का नाम था, वैसे ही उस के गुण थे. जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. उस की उम्र नादान थी. रस्सी कूदना, पिट्ठू खेलना उस के शौक थे. गांव के बड़े झूले पर ऊंचीऊंची पेंगे लेने के लिए वह मशहूर थी.

शौकत अली के एकलौते बेटे का नाम जावेद था. लड़कों की खूबसूरती की वह एक मिसाल था. बड़ों की इज्जत करना और सब से अदब से बात करना उस के खून में था. जावेद के चेहरे पर अभी दाढ़ीमूंछों का निशान तक नहीं था.

जावेद को क्रिकेट खेलने और पतंगबाजी करने का बहुत शौक था. जब कभी जावेद की गेंद या पतंग कट कर ब्रजनंदनलाल की हवेली में चली जाती थी, तो वह बिना झिझक दौड़ कर हवेली में चला जाता और अपनी पतंग या गेंद ढूंढ़ कर ले आता.

पुष्पा कभीकभी जावेद को चिढ़ाने के लिए गेंद या पतंग को छिपा देती थी. दोनों में खूब कहासुनी भी होती थी. आखिर में काफी मिन्नत के बाद ही जावेद को उस की गेंद या पतंग वापस मिल पाती थी. यह अल्हड़पन कुछ समय तक चलता रहा. बड़ेबुजुर्गों को इस खिलवाड़ पर कोई एतराज भी नहीं था.

समय तो किसी के रोकने से रुकता नहीं. पुष्पा अब सयानी हो चली थी और जावेद के चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आने लगी थीं. अब जावेद गेंद या पतंग लेने हवेली के अंदर नहीं जाता था, बल्कि हवेली के बाहर से ही आवाज दे देता था.

पुष्पा भी अब बिना झगड़ा किए नजर झुका कर गेंद या पतंग वापस कर देती थी. यह झुकी नजर कब उठी और जावेद के दिल में उतर गई, किसी को पता भी नहीं चला.

अब जावेद और पुष्पा दिल ही दिल में एकदूसरे को चाहने लगे थे. उन्हें अल्हड़ जवानी का प्यार हो गया था.

कहावत है कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. गांव में दोनों के प्यार की बातें होने लगीं और बात बड़ेबुजुर्गों तक पहुंची.

मामला गांव के 2 इज्जतदार घरानों का था. इसलिए इस के पहले कि मामला तूल पकड़े, जावेद को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया गया. यह सोचा गया कि वक्त के साथ इस अल्हड़ प्यार का बुखार भी उतर जाएगा, पर हुआ इस का उलटा.

जावेद पर पुष्पा के प्यार का रंग पक्का हो गया था. वह सब से छिप कर रात के अंधेरे में पुष्पा से मिलने आने लगा. लुकाछिपी का यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. उन की रासलीला की चर्चा आसपास के गांवों में भी होने लगी.

आसपास के गांवों की महापंचायत बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि गांव में अमनचैन और धार्मिक भाईचारा बनाए रखने के लिए दोनों को उन की हवेलियों में नजरबंद कर दिया जाए.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली को हिदायत दी गई कि बच्चों पर कड़ी नजर रखें, ताकि यह बात अब आगे न बढ़ने पाए. कड़ी सिक्योरिटी के लिए दोनों हवेलियों पर बंदूकधारी पहरेदार तैनात कर दिए गए.

अब पुष्पा और जावेद अपनी ही हवेलियों में अपने ही परिवार वालों की कैद में थे. कई दिन गुजर गए. दोनों ने खानापीना छोड़ दिया था. आखिरकार दोनों की मांओं का हित अपने बच्चों की हालत देख कर पसीज उठा. उन्होंने जातिधर्म के बंधनों से ऊपर उठ कर घर के बड़ेबुजुर्गों की नजर बचा कर गांव से दूर शहर में घर बसाने के लिए अपने बच्चों को कैद से आजाद कर दिया.

रात के अंधेरे में दोनों अपनी हवेलियों से बाहर निकल कर भागने लगे. ब्रजनंदनलाल और शौकत अली तनाव के कारण अपनी हवेलियों की छतों पर आधी रात बीतने के बाद भी टहल रहे थे. उन दोनों को रात के अंधेरे में 2 साए भागते दिखाई दिए. उन्हें चोर समझ कर दोनों जोर से चिल्लाए, पर वे दोनों साए और तेजी से भागने लगे.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली ने बिना देर किए चिल्लाते हुए आदेश दे दिया, ‘पहरेदारो, गोली चलाओ.’

‘धांयधांय’ गोलियां चल गईं और

2 चीखें एकसाथ सुनाई पड़ीं और फिर सन्नाटा छा गया.

जब उन्होंने पास जा कर देखा, तो सब के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. पुष्पा और जावेद एकदूसरे का हाथ पकड़े गोलियों से बिंधे पड़े थे. ताजा खून उन के शरीर से निकल कर एक नई प्रेमकहानी लिख रहा था.

आननफानन यह खबर दोनों हवेलियों तक पहुंच गई. पुष्पा और जावेद की मां दौड़ती हुई वहां पहुंच गईं. अपने जिगर के टुकड़ों को इस हाल में देख कर वे दोनों बेहोश हो गईं. होश में आने पर वे रोरो कर बोलीं, ‘अपने जिगर के टुकड़ों का यह हाल देख कर अब हमें भी मौत ही चाहिए.’

ऐसा कह कर उन दोनों ने पास खड़े पहरेदारों से बंदूक छीन कर अपनी छाती में गोली मार ली. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि कोई उन को रोक भी नहीं पाया.

यह खबर आग की तरह आसपास के गांवों में पहुंच गई. हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी. सवेरा हुआ, पुलिस आई और पंचनामा किया गया. एक हवेली से 2 जनाजे और दूसरी हवेली से 2 अर्थियां निकलीं और उन के पीछे हजारों की तादाद में भीड़.

अंतिम संस्कार के बाद दोनों परिवार वापस लौटे. दोनों हवेलियों के चिराग गुल हो चुके थे. अब ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की जिंदगी में बच्चों की यादों में घुलघुल कर मरना ही बाकी बचा था.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की निगाहें अचानक एकदसूरे से मिलीं, दोनों एक जगह पर ठिठक कर कुछ देर तक देखते रहे, फिर अचानक दौड़ कर एकदूसरे से लिपट कर रोने लगे.

गहरा दुख अपनों से मिल कर रोने से ही हलका होता है. बरसों का आपस का भाईचारा कब तक उन्हें दूर रख सकता था. शायद दोनों को एहसास हो रहा था कि पुरानी पीढ़ी की सोच में बदलाव की जरूरत है.

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