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दीदी से मात खा गए भाजपा के चाणक्य

‘मैं हूं अमित शाह. दीदी सुनिए, आप की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए मैं यहां आया हूं.’ 2014 के नवंबर के महीने में पश्चिम बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की यह हुंकार अब शायद कहीं दब सी गई लगती है. लोकसभा चुनाव में भाजपा की सफलता में जिस अमित शाह ने ममता बनर्जी पर सारदा चिटफंड घोटाले के आरोपियों को बचाने का आरोप लगाते हुए अगले विधानसभा चुनाव में ‘भ्रष्ट’ तृणमूल कांगे्रस को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था, अब वही अमित शाह 2016 के विधानसभा चुनाव को छोड़ कर 2019 के लोकसभा चुनाव को जीतने की बात करने लगे हैं. पिछले 2 महीनों में बंगाल में अमित शाह की जितनी भी जनसभाएं हुईं, उन से अंदाजा लगने लगा कि भाजपा धीरेधीरे आगामी विधानसभा चुनाव से अपने पैर खींचने लगी है.

2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में 18 प्रतिशत मत प्राप्त करने के साथ भाजपा ने ममता बनर्जी के विधानसभा चुनाव क्षेत्र में भी बढ़त हासिल की थी, इस के बाद प्रदेश भाजपा का गुमान में मदमस्त होना लाजिम ही था. होता भी क्यों न, यही 18 प्रतिशत मत राज्य में भाजपा का अब तक का सब से बड़ा प्रदर्शन जो था. इस से पहले राज्य में भाजपा की हैसियत कभी ऐसी नहीं बन पाई कि इसे गंभीरता से लिया जाए. हां, कोलकाता नगरनिगम में गिनती की कुछ सीटें जरूर मिलती रही हैं. लेकिन 2014 में लोकसभा चुनाव में जब नरेंद्र मोदी की लहर पूरे देश में चलने का दावा किया जा रहा था, तब 18 अप्रैल, 2015 को हुए कोलकाता नगरनिगम चुनाव में भाजपा को महज 7 सीटें ही मिल पाईं. यही भाजपा का सब से अच्छा प्रदर्शन रहा है. तथाकथित मोदी लहर में पिछले कोलकाता नगरनिगम चुनाव में 3 सीटों से आगे जा कर भाजपा महज 7 सीटें निकाल पाई. यानी खास कोलकाता में, वह भी यहां के नगर निगम चुनाव में, भाजपा अतिरिक्त 4 सीटों तक ही पहुंच सकी. जाहिर है मोदी की भारी लहर में भी राज्य में भाजपा कोई खास करिश्मा नहीं दिखा सकी.

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में भाजपा को 18 प्रतिशत वोट मिलने के बाद 2015 में हुए 91 नगरनिगम और नगरपालिका चुनावों से भाजपा को बड़ी उम्मीद थी, जिस पर पानी फिर गया. इन 91 नगरपालिका चुनावों में तृणमूल के खाते में 69 नगरपालिकाएं आईं. वहीं, वाममोर्चा ने जंगीपुर, दिनहाटा, दाईहाट, सिलीगुड़ी और ताहेरपुर की 5 नगरपालिकाओं पर कब्जा किया. कांगे्रस ने भी मुर्शिदाबाद, कांदी, झालदा, कालियागंज और इस्लामपुर की 5 नगरपालिकाओं पर अपनी धाक जमा ली. जबकि भाजपा के हिस्से में एक भी नगरपालिका नहीं आई. शेष 12 नगरपालिकाओं में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. अब अगर विधानसभा चुनाव की बात करें तो 1996 से ले कर 2011 तक के विधानसभा चुनावों में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली. लोकसभा चुनाव 2014 में आसनसोल से बाबुल सुप्रियो और एस एस अहलुवालिया की जीत हुई.

इस के अलावा कोलकाता दक्षिण संसदीय सीट से भाजपा के तथागत राय को सुब्रत बक्शी के 4,31,715 वोट के मुकाबले महज 2,95,376 मत मिले और अब उन्हें त्रिपुरा का राज्यपाल बना दिया गया. बहरहाल, इस आधार पर तो कहा जा ही सकता है कि राज्य में भाजपा की हैसियत महानगर निगम जितनी भी नहीं है. राज्य के तमाम स्थानीय निकाय चुनावों में भी तृणमूल की आंधी में भाजपा के परखचे उड़ गए. हालांकि 2014 लोकसभा चुनाव के बाद राज्य के उपचुनाव में पहली बार भाजपा ने अकेले अपने दम पर बशीरहाट दक्षिण विधानसभा में जीत हासिल की. लेकिन भाजपा की उम्मीद के विपरीत अन्य सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही. जाहिर है बंगाल भाजपा का आधार बन ही नहीं पा रहा है. भाजपा और अमित शाह को इस धुर सत्य का आभास हो चुका है कि कम से कम 2016 में बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने पांव कहीं रख नहीं पाएगी. इसीलिए भाजपा 2019 का लक्ष्य ले कर चलने का मन बना चुकी है.

राजनीति में जाति समीकरण

ऊपरी तौर पर बंगाल में देश के बाकी राज्यों की तरह जातिवाद समीकरण नजर नहीं आता पर राज्य की राजनीति में सवर्णों का ही दबदबा है. 34 सालों तक राज करने वाले वाममोरचा की बागडोर ज्यादातर सवर्णों के हाथों में ही रही है. ज्योति बसु अगर कायस्थ थे तो बुद्धदेब भट्टाचार्य ब्राह्मण. इस के अलावा वाममोरचा के घटक दलों में भी स्थिति ऐसी ही रही है. फिर वे चाहे मनोज भट्टाचार्य, कांति विश्वास, सीताराम येचुरी, अशोक बोस या क्षिति गोस्वामी हों. वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी ब्राह्मण परिवार से ही हैं. इन के अलावा सुब्रत मुखर्जी, दिनेश त्रिवेदी, पार्थ चटर्जी, सौगत राय चौधुरी उच्चवर्ण से ही हैं. अन्य पार्टियों की बात की जाए तो प्रदेश कांगे्रस में प्रदीप भट्टाचार्य, दीपा दासमुंशी, मानस भुंइया, अधीर चौधुरी से ले कर भाजपा में राहुल सिन्हा, शमीक भट्टाचार्य, असीम सोम सवर्ण ही हैं. लेकिन कुल मिला कर यहां की जमीनी राजनीति में न तो ब्राह्मणों का बोलबाला है और न कायस्थों का. शायद यह भी एक कारण है कि भाजपा की राजनीति यहां नहीं चल पा रही है.

भाजपा में नेतृत्व का अभाव

सब से पहले तो सांगठनिक तौर पर प्रदेश भाजपा कभी मजबूत नहीं रही है. यहां हमेशा से ही पुख्ता नेतृत्व का अभाव रहा है. पार्टी में अंतर्कलह, उठापटक भी एक बड़ी समस्या रही है. रहा सवाल भाजपा मुख्यालय से बंगाल के प्रभारी का, तो अब तक जितने भी बंगाल के प्रभारी हुए हैं, उन में से किसी को भी सफलता नहीं मिली है. जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए भाजपा ने लोकसभा का चुनाव लड़ा, तब अमित शाह को सेनापति मुकर्रर किया गया था. इसी समय मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी को भी बंगाल का प्रभारी नियुक्त किया गया. इस के बाद सिद्धार्थ नाथ सिंह को भेजा गया. लेकिन बंगाल की मिट्टीहवा में जाने क्या बात है कि सांप्रदायिक तमगे वाली भाजपा को राज्य में कोई भी प्रभारी स्वीकृति नहीं दिला पाया.

तृणमूल भाजपा का समझौता

बंगाल के मामले में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व दोराहे पर आ कर खड़ा हो गया है. गौरतलब है कि तृणमूल कांगे्रस वाजपेयी सरकार में एनडीए का हिस्सा रही थी. लेकिन यह वह समय था जब तृणमूल कांगे्रस राज्य में अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही थी. अब ममता राज्य की मुख्यमंत्री हैं और वे मुसलिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रही हैं. ऐसे में सांप्रदायिक भाजपा से हाथ मिलाना पार्टी के राजनीतिक ग्राफ के लिए कतई अच्छा नहीं होगा. 2014 के लोकसभा चुनाव में बंगाल की 42 सीटों में से तृणमूल की 34 सीटें हैं और राज्यसभा की कुल 245 सीटों में तृणमूल के खाते में 12 सीटें. फिलहाल राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है. भाजपा की 48 सीटों समेत एनडीए की कुल 64 सीटें ही हैं. बाकी 163 सीटों में कांगे्रस की 68 सीटों के साथ यूपीए की 70 सीटें, जनता परिवार की 30 सीटें हैं और अन्य विभिन्न पार्टियों की 51 सीटें हैं जो किसी भी गठबंधन के साथ नहीं हैं. इस में भी तृणमूल 12 सीटों के साथ सब से बड़ी पार्टी है. यहां यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि जमीन अधिग्रहण बिल का ममता बनर्जी समर्थन नहीं कर रही हैं, इस का तो वे विरोध ही करती रहेंगी. प्रदेश कांगे्रस और वाममोरचा में यह कयास लगाया जा रहा है कि हो न हो, तृणमूल और भाजपा के बीच कहीं कोई समझौता हो गया है. इसीलिए न सिर्फ सारदा चिटफंड का मामला ठंडा पड़ गया है बल्कि मदन मित्र की गिरफ्तारी के बाद और कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. हाल ही में सीबीआई ने अदालत में दाखिल चार्जशीट में जिन लोगों के नाम हैं, उन की जिम्मेदारी राज्य पुलिस को दे दिए जाने की बात कही है. माना जा रहा है कि सारदा चिटफंड मामले में केंद्र के इशारे पर सीबीआई द्वारा ढील दे दी गई है. वहीं, केंद्र से राज्य को आर्थिक मदद के मद्देनजर तृणमूल के साथ भाजपा का कोई समझौता हो गया हो, जिस के तहत कुछ मुद्दों पर तृणमूल भाजपा का सहयोग कर भी सकती है. यही कारण है कि अमित शाह भी 2016 विधानसभा चुनाव के प्रति नरम रवैया अपना रहे हैं.

क्या हम गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं?

विश्व के कई देशों में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है. भारत गृहयुद्ध की आग में तो नहीं जल रहा लेकिन देश के तकरीबन हर हिस्से में अकसर हिंसा हो जाती है. इस हिंसा के भिन्नभिन्न कारण होते हैं. इन में धर्म, जाति, भेदभाव की भूमिकाएं ज्यादा शामिल रहती हैं. हिंसा के बाद सरकारी रवैया ऐसा उभरता है कि जिस के चलते माहौल में तनाव और भी ज्यादा हो जाता है. देशविदेश के कुछ ऐसे ही हालात पर यहां एक सरसरी नजर डालते हैं. हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव में मसजिद निर्माण को ले कर जाटों और मुसलमानों के मध्य हुए झगड़े में कई लोग घायल हो गए. गांव की मसजिद, दुकानों, घरों में तोड़फोड़ की गई. सैकड़ों लोगों को गांव से पलायन करना पड़ा.अटाली की आग ठंडी होने को थी कि पलवल में आगजनी, तोड़फोड़, पत्थरबाजी और हिंसा शुरू हो गई. इसी बीच महाराष्ट्र के नासिक के निकट हरसुल में आदिवासियों और मुसलमानों के बीच हुई लड़ाई में 2 लोग मारे गए और कई जख्मी हुए. 20 दुकानें जला दी गईं और कई घरों को लूट लिया गया.

जमशेदपुर के मानगो क्षेत्र में छेड़छाड़ की एक घटना ने तोड़फोड़, बंद, जुलूस, कर्फ्यू का रूप अख्तियार कर लिया. शहर के लोगों को 2 हफ्ते तक तनाव व दहशत में रहना पड़ा.जूनजुलाई महीनों में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में पिछड़े वर्ग की एक लड़की द्वारा दलित युवक से प्रेमविवाह करने पर गांव में दोनों वर्गों के बीच झगड़ा फैल गया. पिछले साल मुजफ्फरनगर, मेरठ जिलों में जाटों और मुसलमानों के बीच हुए झगड़े में 47 लोग मारे गए थे. 10 हजार लोग गांवघर छोड़ कर अन्यत्र चले गए. हजारों लोगों को महीनों तक शरणार्थी कैंपों में रहना पड़ा. इन इलाकों में महीनों तक सुरक्षा बलों को तैनात रहना पड़ा.देश के 18 राज्यों में नक्सली फैले हुए हैं. आएदिन हिंसक वारदातें हो रही हैं. आरक्षण को ले कर देश के कई हिस्सों में तनाव बरकरार है. गुजरात में पटेल (पाटीदार) पिछड़े वर्ग में शामिल होने के लिए सड़कों पर हैं तो हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में जाट ओबीसी का दरजा हासिल करने के लिए रेल, सड़क रोकने के लिए आमादा हैं. पहले से जो जातियां ओबीसी में हैं उन जातियों का जाटों और पटेलों से टकराव चल रहा है. राजस्थान में गुर्जर और मीणा जातियों का आरक्षण के लिए टकराव बना हुआ है. यह टकराव पिछले 7 सालों की देन है जब गुर्जरों ने खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग पर आंदोलन शुरू कर दिया था. मीणा जाति वाले नहीं चाहते कि उन के हक का आरक्षण बंटे. अपने ही देश में, अपने ही लोगों से पुलिस व अन्य सुरक्षा बलों को निबटना पड़ता ही है, कई जगहों पर तो सेना को लगाना पड़ा है.

पिछले ढाईतीन दशक से देश में इस तरह की जातीय, धार्मिक हिंसा की वारदातों में वृद्धि हुई है. अब आएदिन इस तरह की घटनाएं आम हो गई हैं. आंकड़े बताते हैं कि देश के भीतर हर साल जातीय, धार्मिक घटनाओं में हजारों लोग मारे जाते हैं, हजारों घायल होते हैं, सैकड़ों के घरबार छूट जाते हैं, वे दरबदर होने पर मजबूर हो जाते हैं. और इन सब से अरबों की संपत्ति नष्ट हो रही है. ताजा सर्वे बताता है कि भारत में पिछले 2 सालों से धार्मिक हिंसा के मामले तेजी से बढे़ हैं. पिछले साल की तुलना में 24 प्रतिशत घटनाएं बढ़ी हैं और 65 प्रतिशत मौतों में वृद्धि हुई है. केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से मई तक 43 मामले केवल सांप्रदायिकता से जुड़े हैं. इन में 961 लोग जख्मी हुए जबकि मई 2014 में ऐसी घटनाएं 26 थीं और घायलों की संख्या 701 थी. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और हरियाणा में ज्यादा घटनाएं हुईं. एक ही धर्म में होने वाले मामले इस में शामिल नहीं हैं. इस के आंकड़े ज्यादा मिलेंगे. देश की शिक्षण संस्थाओं पर धार्मिक, जातीय भेदभाव, विचारधाराओं को संरक्षण देने के आरोप लगते रहते हैं. पहले आईआईटी दिल्ली और अब पुणे स्थित भारतीय फिल्म एवं टीवी प्रशिक्षण संस्थान पर भगवाकरण के आरोप हैं. भारतीय इतिहास अनुसंधान संस्थान तो हमेशा निशाने पर रहा है.

हिंसा और नस्लभेद

यह हालत गृहयुद्ध जैसी है जो अभी पनप रही है. भारत में ही नहीं, ऐसी स्थिति दुनियाभर में है. अमेरिका में आएदिन नस्लीय हिंसा की वारदातें सामने आ रही हैं. ताजा घटनाक्रम में दक्षिण कैरोलिना के चार्ल्सटन शहर में अश्वेतों के पुराने चर्च में डायलन रूफ नाम का एक श्वेत युवक घुस गया और उस ने गोलियां बरसा कर 9 लोगों को मार डाला. पिछले साल फर्ग्युसन शहर में अश्वेत युवक माइकल ब्राउन की पुलिस द्वारा हत्या और फिर ग्रै्रंड ज्यूरी के आए फैसले के मद्देनजर कई शहरों में आग भड़क उठी थी. अमेरिकी अदालतों पर नस्लीय मानसिकता से ग्रस्त हो कर फैसले सुनाने के आरोप लगने लगे थे. शायद  इसीलिए बराक ओबामा को कहना पड़ा था कि अश्वेत अमेरिकियों और न्यायिक प्रक्रिया के बीच अभी और सुधारों की जरूरत है पर इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है.

भारतीयों के साथ भी लगातार नस्लभेद की घटनाएं सामने आ रही हैं. 2 साल पहले विस्कोंसिन गुरुद्वारे (अमेरिका) पर हुए हमले में खून बहा था. इस तरह की बढ़ती घटनाओं के बाद ओबामा ने देश में बंदूक रखने के अधिकार पर सवाल उठाया. अमेरिका में इन घटनाओं के बाद एक अमेरिकी थिंक टैंक का कहना है कि अमेरिका में आतंकवाद से ज्यादा नस्लभेद में लोग मारे जा रहे हैं. हैरानी यह है कि अपने ही धर्म के लोग आपस में ऊंचनीच के भेद के चलते भी एकदूसरे को मार रहे हैं. बराक ओबामा दूसरी बार जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तब धारणा बनी थी कि गोरों और कालों के बीच नस्लभेद खत्म हो जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ. ओबामा को मूल अमेरिकियों के मात्र 20 फीसदी वोट मिले थे. इस के विपरीत 39 प्रतिशत वोट गैर गोरे अमेरिकियों के मिले थे. उन में अफ्रीकी और एशियाई लोगों के थे. बावजूद इस के, नस्लीय वारदातों में बढ़ोतरी हुई है.

अमेरिका में हुए एक सर्वे के अनुसार वोटों के हिसाब से आशंका पैदा हुई थी कि वहां रंगभेद की खाई निरंतर चौड़ी हो रही है. रंगभेद वहां नई बात नहीं है. पिछले 125 से अधिक सालों से अमेरिका नस्लवाद का दंश झेल रहा है. 1965 से पहले तक अश्वेतों को नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया. इस साल पहली बार उन्हें मताधिकार दिया गया. कालों के साथ बुरा बरताव बरता जाता रहा है. दोनों के बीच सामाजिक, आर्थिक असमानता बनी हुई है. वहां गरीबी रेखा से नीचे गुजरबसर करने वाले 80 प्रतिशत लोग अश्वेत हैं. वहां की जेलों में अपराधियों की कुल तादाद में करीब आधे काले लोग हैं, इसीलिए भेदभाव, गैरबराबरी को ले कर आएदिन आपस में हिंसा होती रहती है. भारत में भी यही हाल है. यहां मृत्युदंड पाए तीनचौथाई कैदी पिछले वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यक हैं. जेलों में बंद 75 प्रतिशत आर्थिक तौर पर कमजोर और 93.50 प्रतिशत सजायाफ्ता दलित व अल्पसंख्यक ही हैं. अमेरिका की तरह भारत के लीगल सिस्टम में भी जाति, धर्म, अमीर, गरीब का भेदभाव है.

ओबामा को देश के सर्वोच्च पद पर बैठाने के बावजूद गोरों को श्रेष्ठ ठहराने का संगठित आंदोलन चल रहा है. यहां ‘एंड एपैथी’ जैसे श्वेतों के कट्टर संगठन नफरत, हिंसा फैलाने में लगे हैं. कहा जा रहा है कि ऐसे संगठनों को दक्षिणपंथी बंदूक लौबी का समर्थन मिल रहा है. लिहाजा, अमेरिका में उग्रवादी श्वेतों के निशाने पर अफ्रीकी, हिंदू, सिख और मुसलिम आ रहे हैं. नस्लभेद की खाई कम होने के बजाय, और चौड़ी हो रही है. सामाजिक विज्ञानियों का मानना है कि इस नफरत के पीछे गैरअमेरिकियों यानी अफ्रीकी और एशियाईर् देशों से वहां जा बसे लोगों का वहां के बौद्धिक क्षेत्र में लगातार कब्जा करते जाना है. इन गैरअमेरिकी लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. जाहिर है नस्लभेद की सोच से अमेरिका मुक्त नहीं हो पा रहा है. यूएस डिपार्टमैंट औफ जस्टिस के तहत ब्यूरो औफ स्टैटिस्टिक्स, 2010 के अनुसार, 62,593 काले लोग गोरों की हिंसा से पीडि़त हुए थे.

विश्व के सब से पुराने लोकतंत्र में नस्लभेद की यह सब से बदरंग तसवीर है. इस तरह के हालात देख कर राष्ट्रपति ओबामा को कहना पड़ा था कि अमेरिका में काफी तरक्की के बाद भी नस्लभेद हमारे डीएनए में बना हुआ है. यह अमेरिका के विघटन का कारण बन सकता है. नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग उठ रही है. वहां सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता हिंदू हैं. वे संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाना चाहते हैं. वहां निचली और पिछड़ी जातियों के बीच खूनी घटनाएं हो रही हैं. नेपाल में माओवाद ऊंचनीच से उत्पन्न हुआ है. वहां 2 दशकों में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. यूक्रेन बहुसांस्कृतिक देश है. वहां यहूदी, रशियन और रोमनी समुदायों के बीच गृहयुद्ध के हालात हैं. यहां ईसाई समुदाय के 2 गुटों में हिंसा इसलिए हो रही है कि दोनों अलगअलग चर्चों को मानने वाले हैं. पूर्वी यूरोप में स्थित यूक्रेन की सीमा एक तरफ पूर्व में रूस की तरफ लगती है. अरसे पहले रूस से यहां जा बसे लोग और पश्चिम में रहने वाले नागरिक दोनों अलगअलग चर्चों को मानते हैं. इस कारण उन के बीच हिंसा चल रही है. रब्बी और यहूदी छात्रों के बीच झगड़ा है. दोनों के अलगअलग चर्च और कब्रिस्तान हैं और एकदूसरे के सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़फोड़ रहे हैं.

स्कौटलैंड में 2009-10 में नस्लीय हिंसा के 5 हजार मामले दर्ज हुए थे और अब ये बढ़ रहे हैं. फ्रांस में जातीय, नस्लीय भेदभाव की घटनाएं हो रही हैं. अरब देशों में मुसलमानों में शिया और सुन्नी के बीच पुरानी खूनी रंजिश चली आ रही है. सीरिया, सूडान, मिस्र, इराक, लीबिया में एक ही धर्म के लोग आपस में लड़ रहे हैं.

धर्मजनित खूनी संघर्ष

इराक शिया और सुन्नी में बंटा हुआ है. इराक में कर्बला और नजफ शियाओं के 2 पवित्र नगर माने जाते हैं. प्रथम विश्व युद्ध के बाद शिया बाहुल्य वाले इराक पर सुन्नियों का शासन था. इराक पर अमेरिकी हमले में सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद अमेरिका ने यहां शियाओं का शासन कायम करा दिया. इस के बाद इन दोनों के बीच खूनी संघर्ष चल रहा है. सीरिया में अल्पसंख्यक शियाओं की सरकार है. शिया खुद को इसलामिक स्टेट का विरोधी कहते हैं. वहां आईएस जैसे संगठन दूसरे धर्म के अनुयायियों को तो मार ही रहे हैं, अपने धर्म के दूसरे पंथ वालों को भी खत्म कर रहे हैं. नाइजीरिया में 1990 से 2007 तक 20 हजार लोग धर्म के नाम पर मरमिटे. मुसलिम और ईसाई तथा आपस के एक ही धर्म की 2 संस्कृतियों के बीच झगड़ा आम है.

इसराईल, लेबनान, जोर्डन इसलामिक स्टेट की खूनी गिरफ्त में हैं. श्रीलंका में 1983 से सिंहली और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच युद्ध चल रहा है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं. पाकिस्तान में आतंकवादियों के निशाने पर हर कोई है. शिया और सुन्नी का संघर्ष जारी है ही. पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कियानी को कहना पड़ा कि आतंकवाद से लड़ें, नहीं तो गृहयुद्ध की स्थिति हो सकती है. आस्ट्रेलिया में जुलाई में नस्लभेद का मामला सुर्खियों में रहा. 3 साल की समारा अपनी मां रसेल मुई के साथ डिज्नी की थीम पर आधारित एक प्रतियोगिता में महारानी एल्सा बनी पहुंची थी. वह कतार में खड़ी हो कर जजों के बुलावे का इंतजार कर रही थी. तभी एक महिला आई और उस से बदसलूकी करने लगी. बच्ची को झिंझोड़ते हुए कहा कि तुम ने महारानी एल्सा का वेश क्यों धारण किया. एल्सा तो तुम्हारी तरह अश्वेत नहीं थीं. बच्ची की मां रसेल ने जब महिला का विरोध किया तो उस की बेटियां आगे आ गईं और समारा की ओर उंगली दिखाते हुए बोलीं कि तुम अश्वेत हो और अश्वेत लोग बदसूरत होते हैं. महिला और उस की बेटियों का सलूक देख कर बच्ची रोने लगी और प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से मना कर दिया. मामला मीडिया में खूब उछला और दुनियाभर में नफरत व नस्लभेद की इस घटना की खूब आलोचना की गई.

ईसाइयों में कैथोलिक और प्रोटैस्टैंट के बीच ही नहीं, इन के भीतर और्थोडौक्स, इवैंजल चर्चों के बीच भी हिंसा व्याप्त है.

श्रेष्ठता की होड़

भारत के हिंदुओं में लगभग 60 हजार जातियां, उपजातियां हैं. पिछड़ी, निचली जातियों में कई भेद हैं और ये आपस में खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में लगी रहती हैं. धर्मों में हिंदू के अलावा मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी, जैन में एकदूसरे के बीच नहीं, एक ही धर्म में कई पंथ हैं और ये एकदूसरे के कुप्रचार, आपसी मारपीट में लगे रहते हैं. बौद्धों में हीनयान, महायान, जैनियों में श्वेतांबर और दिगंबर भारतभूमि में शैव और वैष्णवों के बीच हिंसा का इतिहास रहा है. रामायण में ब्राह्मण परशुराम द्वारा 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से मुक्त करने की बात कही गई है. 1947 में भारत विभाजन के वक्त हजारों का कत्लेआम गृहकलह का नतीजा था. 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन में हजारों लोग मारे गए थे. बाद में इंदिरा गांधी की हत्या से उपजे आक्रोश में 10 हजार से ज्यादा लोगों की हत्या हुई.

फरवरी 1981 में फूलन देवी ने उत्तर प्रदेश के बेहमई गांव के 22 ठाकुरों को गोलियों से भून दिया था. बाद में दलित फूलन समर्थकों और ठाकुरों के बीच वर्षों बदले की भावना में कई खून हुए. आखिर एक ठाकुर युवक ने सांसद बन चुकी फूलन की गोली मार कर हत्या कर दी. बिहार में सालों से ऊंची जाति के भूमिहारों के संगठन रणवीर सेना की दलितों के साथ खूनी रंजिश चलती रही है. जुलाई 1996 में रणवीर सेना ने 21 दलितों को भोजपुर के बढ़ानी टोला में मार दिया था. 1997 में बाथेपुर और संकरबीघा में अगड़ों की इस सेना ने 81 दलितों को मार डाला था. इस से पहले निचली जातियों के नक्सलियों ने ऊंची जाति के भूमिहार व अन्य जातियों के 500 लोगों की जानें ले ली थीं. महाराष्ट्र में मुंबई की रमाबाई दलित कालोनी में अंबेडकर की प्रतिमा तोड़ने पर पुलिस फायरिंग में 10 लोग मारे गए और 26 घायल हो गए थे. अगड़ी और निचली जातियों के बीच प्रदेश में आएदिन झगड़े की वारदातें होती रहती हैं. सितंबर, 1996 में महाराष्ट्र की बहुचर्चित खैरलांजी घटना में पिछड़ी कुनबी जाति के लोगों ने 4 महार दलितों की नृशंस हत्या कर दी थी. भंडारा जिले में खैरलांजी गांव में दलित महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाया गया था. दोनों जातियों के बीच तनाव कायम रहा.

पंजाब में सिखों में ही जटसिख और रामदासिया के बीच खूनखराबा जारी है. दोनों के अलगअलग गुरुद्वारे बने हुए हैं. 2011 में हरियाणा के मिर्चपुर में जाटों की भीड़ ने 2 दलितों को जिंदा जला दिया था. दर्जनों घरों में आग लगा दी गई और लूटपाट की गई. गांव के दलित आज तक वापस लौटने की हिम्मत नहीं कर पाए हैं. राजस्थान में 1999 से 2002 के बीच दलितों पर अत्याचार के औसत 5024 मामले सामने आए. इन में 44 हत्याएं और 138 बलात्कार की घटनाएं थीं. गुजरात में 2002 के दंगों में एक हजार लोग मारे गए थे. इन में ज्यादातर मुसलिम थे. इस से पहले गोधरा में 50 हिंदू मारे गए. बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद मुंबई में हुए बम विस्फोटों में 200 से अधिक लोग मारे गए.

कब लेंगे सबक

दक्षिण भारत में भी निचली और पिछड़ी जातियों के बीच संघर्ष चला आ रहा है. यह सब धर्म की सीख के प्रचारप्रसार के बावजूद हो रहा है. हर धर्म में हजारों नए धर्मगुरु पैदा हो गए हैं जो अपने अनुयायियों को धर्म के रास्ते पर चलने की सीख देते रहते हैं. यह धर्म का रास्ता कैसा है जहां आपस में प्रेम, शांति, भाईचारे की जगह परस्पर एकदूसरे की जानें ली जा रही हैं. साफ है जातीय, धार्मिक, नस्लभेद दुनिया की कड़वी सचाईर् है. धर्म ने मानवता को अलगअलग ही नहीं किया, खत्म भी किया. भारत में गृहयुद्ध जैसी यह स्थिति मुगलों और अंगरेजों के समय भी थी लेकिन उन शासकों ने गृहयुद्ध को थामे रखा. जाट, मराठा शासकों ने कुछ नहीं किया. मराठा तो ब्राह्मणों के पिछलग्गू बने रहे. हिंदू शासक खुद बंटे रहे और अपनाअपना साम्राज्य विस्तार तथा एकदूसरे को लूटने में जुटे रहे. आजादी के बाद आई सरकारों ने जाति, धर्म की हिंसा से कोई सबक नहीं लिया जबकि वोटों के लिए जातिवाद को प्रश्रय दिया. जातीय, धार्मिक संगठन खड़े हो गए. हिंदुओं में आजादी से पहले की हिंदू महासभा, मुसलिम लीग, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, जमात-ए-इस्लाम के साथसाथ अन्य कई जातियों के संगठन बने और मजबूत होते गए. इन के नेता बेखौफ हो कर एकदूसरे के खिलाफ आग उगलने लगे.

दलितों और पिछड़ों को लीडरशिप तो मिल गई पर वे खुद को ब्राह्मण समझने लगे और अपनी ही जातियों के अंदर एक नई वर्णव्यवस्था कायम कर ली. दलितों में जो थोड़ा ऊपर उठ गए वे सवर्ण बन बैठे, पिछड़ों में जिन के पास पद, पैसा आ गया, वे ब्राह्मण बन गए. वे अपनी जाति के गरीबों पर अत्याचार करने में जुट गए. असल में यह हिंसा इसलिए बढ़ रही है क्योंकि अब समाज में विचारकों की कमी हो गई है. जो बचे हैं उन की आवाज दबी पड़ी है. आगे बढ़ने की अंधी होड़ में हम अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं. दूसरा, सरकारों ने निचली जातियों की परवा करनी छोड़ दी है. अब सरकारें अमीरों, कौर्पोरेटों के साथ हो गई हैं. हिंसा करने वाली जातियां और संप्रदायों को रोकना अब मुश्किल है. 18 फीसदी मुसलिमों को रोकना आसान नहीं है, पिछड़ों में ताकतवर जाटों, यादवों, ऊंचे पद और पैसा पा गए दलितों को दबाना अब मुश्किल हो गया है. जातियों की आपसी हिंसा पैसा और राजनीतिक ताकत के बल पर बढ़ रही है. क्या अब देश में गृहयुद्ध के हालात को रोका जा सकेगा?

बदलाव की दरकार

हर देश में धार्मिक, जातीय, सांप्रदायिक संगठन मजबूत हो रहे हैं. इन्हें सरकारों और राजनीतिक दलों का भरपूर समर्थन मिल रहा है. लोग धर्र्म परिवर्तन कर लेते हैं पर वे अपनी सोच नहीं बदलते. एक ही धर्म होने के बावजूद अलगअलग जातियों का अलगअलग आंगन, मैदान, कुआं, नल, तालाब, पूजा का स्थान होगा. यह हर धर्म में है. मजे की बात यह है कि मजहब, जाति, हिंसा की प्राचीनतम मानसिकता, विचारों को नए वैज्ञानिक युग की आधुनिक विचारधारा भी नहीं तोड़ पाईर् है. ऐसे में भारत सहित दुनिया में चल रहे गृहयुद्ध के हालात कैसे खत्म होंगे, यह सवाल बना हुआ है. गृहयुद्ध की स्थिति से उबरने के लिए देश को जातियों, धर्मों के बीच व्याप्त असंतोष को खत्म करना होगा. हर व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ग से ताल्लुक रखता हो, बराबरी का हक मिले. समानता का व्यवहार मिले लेकिन धर्म, जाति का स्वभाव इस के विपरीत गैर बराबरी वाला है. इस व्यवहार में बदलाव से ही शांति, तरक्की कायम हो सकती है.                     

जनता का भगवापन

याकूब मेमन को फांसी देने पर विवाद उठाने वालों के खिलाफ जिस तरह से भारत की भगवारंगी जनता बौखलाई और फांसी का विरोध करने वालों को देशद्रोही व न जाने और क्याक्या कहने लगी, वह यह दर्शाता है कि भारत की तथाकथित प्रबुद्ध जनता को केवल धर्म का रंगीन चश्मा पहनने की आदत है और वह भारत की विश्व की प्रगति की रेस में पिछड़ने, गरीबों की बढ़ती गिनती, चीन की छलांगों, शासन की दुर्व्यवस्था के प्रति उतना चिंतित नहीं हैं जितना धार्मिक मामलों में भारत विश्व के मुकाबले हर निशान पर पीछे नहीं, कहीं पीछे है और जो देश, 20-30 साल पहले भारत से पीछे थे, आज तेजी से आगे दौड़ रहे हैं. हमारी गति तेज हुई है पर जो हम से आगे हैं, उन की गति इतनी है कि हमारी तेजी के बावजूद हमारा अंतर बढ़ रहा है.

अगर कुछ अच्छा होता दिख रहा है तो केवल यही कि हमारे यहां के अमीर गरीबों का पैसा और ज्यादा सफाई से टैक्सों, मुनाफों, मनोरंजन के साधनों, शराब, लौटरी आदि के जरिए लूट पा रहे हैं और एक विशिष्ट समाज बना पा रहे हैं जो काफी बड़ा है और जिसे दिखा कर विश्व में भारत की धाक जमाई जा सकती है. वरना कहीं भी देख लें, हम पीछे हैं. कृषि उत्पादन को लें. चीन एक हेक्टेअर से 6.5 टन चावल और 4.7 टन गेहूं पैदा करता है, हमारा किसान क्रमश: 3.1 टन और 2.9 टन. इसे पैदा करने के लिए चीन प्रति हेक्टेअर 92 किलो खाद इस्तेमाल करता है तो भारतीय किसान 138.6 किलो. जाहिर है भारतीय किसान की तकनीकी जानकारी और जेब में पूंजी कहीं कम है. किसान ही नहीं, व्यापारी भी पीछे हैं. व्यापार करने की सहूलियतों में भारत का स्थान 189 देशों में 142 है जो पिछले 1 साल में 2 स्थान नीचे और गिर गया. चीन ने पिछले 10-12 सालों में 13 करोड़ नई नौकरियां पैदा कीं पर भारत में पिछले 8 सालों में कोई नौकरी नहीं पैदा हुई. हमारे यहां जो नौकरी पर हैं उन की उत्पादकता कम है, वे झगड़ालू हैं, नया सीखना नहीं चाहते. इन मुद्दों पर हम भारतीयों का खून नहीं खौलता. हिंदूमुसलिम मुद्दे पर हमारा सोशल मीडिया भरा पड़ा है. आप को एक पोस्ट नजर नहीं आएगी कि जो काम करो ढंग से करो, पूरा करो, लग कर करो. एक जन भी सलाह नहीं देगा कि 24 घंटों में 10 घंटे तो काम करो. एक जना यह नहीं बताएगा कि मशीनों से काम ज्यादा कैसे लें. पेड़ों से फल ज्यादा कैसे लें, खेती की उपज कैसे बढ़ाएं. बस, सस्ते चुटकुले सुनवा लो, विधर्मी को गाली दिलवा लो. आजकल भगवारंगी कुछ ज्यादा ही मुखर हो रहे हैं पर इस से बनना नहीं है, सिर्फ बिगड़ना है.

मेमन को फांसी

मुंबई में 1993 में हुए सीरियल बम धमाकों के लिए साधन जुटाने के जुर्म में याकूब मेमन को फांसी दे कर सरकार ने कानून का चाहे अक्षरश: सम्मान किया हो, लेकिन इस के साथ उस ने सामाजिक खाई को और चौड़ा करने का काम भी कर डाला है. आमतौर पर देश में फांसी की सजा देने पर कोई उंगली नहीं उठाता पर इस बार यह मामला तूल पकड़ गया और बहुतों को लगने लगा कि कहीं कुछ गलत हो रहा है जबकि फांसी से कुछ घंटे पहले तक सुप्रीम कोर्ट ने रात 3 बजे विशेष अदालत लगा कर पक्षों को सुना. एक व्यक्ति की मौत की सजा पर इतना विवाद खड़ा नहीं होता चाहे अन्याय ही क्यों न हो रहा हो पर यह मामला इसलिए विशेष हो गया क्योंकि राममंदिर बनाने के आंदोलन को ले कर जो हजारों मौतें हुई हैं उन में अब तक केवल याकूब मेमन को पहली और शायद आखिरी मौत की सजा हुई है.

राममंदिर आंदोलन ने देश के समाज को 2 हिस्सों में ऐसा बांट दिया जो शायद 1947 के विभाजन ने भी नहीं बांटा था. 1947 के विभाजन से पहले देश में छिटपुट धार्मिक दंगे हुए थे पर विभाजन के बाद जिस ने जिस देश में रहना सही समझा, रहता रहा. हिंदू व मुसलमान दोस्त तो न बने पर एकदूसरे को आराम से झेलते रहे. राममंदिर को अयोध्या में बाबरी मसजिद के स्थान पर बनाने की जिद की वजह से पुराने जख्म फिर हरे हो गए और अब तक रिस रहे हैं. हर थोड़े दिन बाद कोई ऐसी घटना हो जाती है जिस के चलते राममंदिर के तेजाब के छींटे किसी पर आ गिरते हैं. याकूब मेमन के प्रति किसी तरह की दया या सहानुभूति दिखाने की वैसे जरूरत नहीं है क्योंकि अगर धार्मिक दंगों को कराने और निर्दोषों की जान लेने जैसा कोई काम किया गया है तो सजा देना गलत नहीं है पर यह सरकार कैसी है जो हजारों हत्याओं के लिए केवल 1 को पकड़ पाई? यह कानून व्यवस्था कैसी, जो बीसियों सालों में हुए धार्मिक दंगों और उन में होने वाली हत्याओं के लिए केवल 1 को सजा दिला पाती है?

यह नहीं भूलना चाहिए कि चाहें या न चाहें हिंदुओं और मुसलमानों को साथसाथ तो रहना ही पड़ेगा. दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं, जहां अल्पसंख्यकों को निकाला जा सका हो. हिटलर ने लाखों यहूदियों को मरवाया और फाइनल सौल्यूशन के नाम पर उन्हें गैस चैंबरों में ठूंसा पर फिर भी वह पूरी तरह उन का सफाया न कर सका, खुद समाप्त हो गया. कम्युनिस्टों ने अमीरों का नामोनिशान मिटाने की कोशिश की पर हरेक को मारना या भगाना उन के लिए भी संभव न हुआ. उन्हें अमीरों को फिर जगह देनी पड़ी. समय तो आया है जब धर्म की कपोल कल्पित श्रेष्ठता का पीछा छोड़ कर हम अपने भौतिक सुखों के लिए काम करें पर लगता है कि सरकार, पार्टियों और बुद्धिजीवियों सब को धर्म से जुड़े बदबूदार घावों को कुरेदने में ज्यादा संतोष मिलता है. भारत ही नहीं, विश्व के कितने ही हिस्से इस बेमतलब के झगड़ों में गले तक डूबे हैं. याकूब मेमन को मौत की सजा उस कीचड़ की एक बूंद भर भी नहीं है विवाद उठाने वालों के खिलाफ जिस में पूरा विश्व लिपटा है.

फिर वही पैंतरे

लोकसभा में बहस के बाद लगता है कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान को अपने पदों से फिलहाल तो इस्तीफे नहीं देने होंगे क्योंकि कांग्रेस का दूसरे विपक्षी साथी दलों ने साथ नहीं दिया. पर इस का अर्थ यह नहीं कि यह मामला सुलझ गया है. इन तीनों पर लगे आरोपों को कांग्रेस लोगों के मन पर बैठाने में कामयाब हो गई है. उधर, इस्तीफे न दिलवा कर भारतीय जनता पार्टी ने साबित कर दिया है कि राजनीति के खेल में वह वही पैंतरे अपनाएगी जो कांग्रेस की सरकारें अपनाती रही हैं. भ्रष्टाचार या गलती के लिए चुने हुए नेता त्यागपत्र नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं कि चुनाव जीतना और मंत्री पद पाना आसान काम नहीं होता और इस स्थिति तक पहुंचने में उन्हें 15-20 साल लगते हैं. आई शक्ति को सत्ता के सिद्धांतों और आरोपों के नाम पर तो छोड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता. आज राजनीति में जो शामिल है वह देश या समाज सेवा के लिए नहीं है. यह तो धंधा है, व्यवसाय है, पैसा कमाने का जरिया है. इस में पूरे घर का पैसा लगता है और समय भी. अगर आप राजनीति में हैं तो अब और कुछ नहीं कर सकते और जाहिर है कि आप को घर चलाने के लिए, शानोशौकत के लिए, बुरे दिनों को काटने के लिए, चुनाव लड़ने के लिए, आनेजाने के लिए, बच्चों को सैटल करने के लिए पैसा तो चाहिए ही.

ललित मोदी को बचाने व व्यापमं स्कैंडल को छिपाने के लिए भाजपा नेताओं ने जो किया वह अनूठा नहीं था. जो इस गुमान में रहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के नेता किसी और मिट्टी के बने हैं, क्योंकि वे मंदिरों के चक्कर लगाते हैं, हवन करते हैं, स्वामियों के चरण छूते हैं, तिलक लगाए राज चलाते हैं, इसलिए शरीफ हैं, सरासर गलत है. न गांधी टोपी किसी को शुद्ध करती है न भगवा दुपट्टा और न मफलर. ये तो दिखावे हैं. आरोपों के नाम पर इस्तीफे देने का अर्थ है कि दुकान या व्यवसाय बंद कर देना. यह कोई भी नहीं करेगा. सहीगलत की बात बाद में आएगी. हां, जिस दिन आप से ऊपर वाले को लगेगा कि आप उस पर बोझ बन रहे हैं उस दिन आप का जाना तय है. सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे व शिवराज सिंह चौहान को अभी निकालने का अर्थ है विपक्ष और कांग्रेस के हाथ को मजबूत करना और नरेंद्र मोदी यह नहीं करना चाहेंगे.

कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि वह जब दूसरों पर आरोप लगाती है तो दूसरे गड़े मुरदे उखाड़ लाते हैं और बहस का मुद्दा बन जाता है कि कौन बड़ा बेईमान है. जनता बेचारी तो ठगी रह जाती है. वह तो दोनों तरफ के नेताओं की ज्यादतियों की मारी हो गई है और उस के पास विकल्प न के बराबर हैं. कांग्रेस ने इस बार फिर भी खासी हिम्मत दिखाई. चुनावों में भारी पराजय मिलने के बाद उस ने उसी तरह हिम्मत नहीं हारी जैसे भारतीय जनता पार्टी ने 1984 में नहीं हारी थी जब लोकसभा में उस के केवल 2 सांसद रह गए थे. राजनीति में बने रहना ही कला है. और ये दोनों पार्टियां अब इस में माहिर हैं. राजनीति सुधरेगी, यह उम्मीद जनता अब छोड़ दे क्योंकि वोटिंग मशीनों से एक ही तरह का सड़ा सामान बनेगा.

फैंटम बनाम हाफिज सईद

निर्देशक कबीर खान की फिल्में मसाला फिल्में होने के साथसाथ कहीं न कहीं आतंकवाद के मसलों को भी छूती रही हैं. ‘बजरंगी भाईजान’ के बाद अब उन की फिल्म ‘फैंटम’ रिलीज होने को है. यह फिल्म भी ग्लोबल टेरेरिज्म पर आधारित है. कहानी 26/11 के हमले के बाद कुछ बहादुर एजेंट्स के कवर्ट मिशन पर बेस्ड है. खबर है कि इस फिल्म पर जमात उद दावा के सरगना हाफिज सईद को कड़ा एतराज है. इसलिए हाफिज ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर पाकिस्तान में इस फिल्म को बैन करने की मांग की है. इस मामले पर फिल्म के लीड कलाकार सैफ अली खान का कहना है कि सब को पता है कि इस हमले का मास्टरमाइंड कौन था, इसलिए पाकिस्तान में फिल्म का विरोध होगा, उन्हें पहले से ही पता था.

जिंदगी में संतुलन की अहमियत

जीवन में संतुलन का बड़ा महत्त्व है. खानेपीने, सांस लेने जैसा यह भी जरूरी है ताकि जीवन चैन से जिया जा सके. संतुलन का मतलब हर चीज में उचित तालमेल बिठा कर चलना होता है. जहां सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. दुर्घटना घटती ही तब है जब हम अपना रास्ता छोड़ कर किसी और रास्ते पर चल पड़ते हैं. उत्तराखंड में भयावह तूफान ने 10 हजार से ज्यादा लोग लील लिए. हजारों घर उजड़ गए जिन्हें आजीवन इस पीड़ा के साथ जीना पड़ेगा मगर यह कड़वा सत्य है कि वहां जो हुआ वह इसलिए कि मनुष्य ने प्रकृति का रास्ता रोक रखा था. इतने वर्ष अगर नदी ने उधर का रुख नहीं किया तो मनुष्य ने उसी रास्ते को व्यापार का स्थान बना लिया. नदी के रास्ते में यदि मनुष्य न आया होता तो ऐसा होता ही नहीं.

24 छात्र व्यास नदी में बह गए. 24 घर उजड़ गए. मांबाप का जीवन अंधेरे में डूब गया. जो हुआ दुखद हुआ. इसे ले कर दोषारोपण भी हुए. कुछ अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया गया. नतीजा क्या होगा? जो गए सो वापस नहीं आएंगे. सवाल यह है, बच्चे नदी के रास्ते में गए ही क्यों? जिस तरह ट्रेन की पटरी पर चलने का रास्ता सिर्फ ट्रेन के लिए है, उसी का पहला अधिकार है उस पर, उसी तरह मनुष्य को अपने रास्ते का पूरी गंभीरता से पता होना चाहिए. समाज का ढांचा इसी तर्ज पर चलता है कि हर जीने वाला अपनाअपना दायित्व ईमानदारी से निभाए. नेता ईमानदार हो तो देश की समूल पीड़ा ही समाप्त हो जाए. जनता वोट देने की अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाए. बेईमानी और लापरवाही का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है. हादसा तभी होता है जब कार या बस ट्रेन के रास्ते पर आ जाती है. हवाई रास्ता हवाई जहाज के लिए है और सड़क मार्ग बसों, कारों और पैदल चलने वालों के लिए. इसी तरह सब का अपनाअपना रास्ता है. प्रकृति ने सब को सब का रास्ता दे रखा है. फर्क सिर्फ इतना सा है कि हम अपना रास्ता देखनासमझना ही नहीं चाहते, अनदेखा कर जाते हैं, जानबूझ कर उसे नकारते हैं.

नतीजा हमारे सामने है-कश्मीर में बाढ़ की जो इतनी बड़ी त्रासदी हुई उस में किस का दोष है? क्या हमारा ही नहीं? झीलों के शहर को हम ने ईंटपत्थरों का घर बना दिया. पहाड़ों से आने वाला पानी जो झेलम नदी में नहीं समा पाता था, वह झीलों में भर जाता था. और वही तो हुआ. बेचारा पानी, अपनी झीलों में ही तो आया. उसे क्या पता था उस के घर में किसी और ने डेरा लगा रखा है. घुसपैठ किस ने की है? क्या पानी ने? नहीं तो, वह तो अपने ही घर आया था न. अनचाहे मेहमान तो हम लोग थे जिन्हें सेना की कृपा से बचाया गया. बचाया गया या कहिए पानी को सहज घर से बाहर खदेड़ा गया. खदेड़ा गया शब्द अप्रिय लग रहा है, लिखने में भी और पढ़ने में भी. शायद सुनने में भी खदेड़ना का अर्थ है छड़ी की नोंक पर किसी को बाहर निकालना. क्या हम लोग आंखें होते हुए भी अंधों सा व्यवहार नहीं कर रहे? कबूतर की तरह आंख बंद कर के जीते हैं कि बिल्ली कहीं नहीं है. जबकि आसपास ही विचरती बिल्ली कब उसे ग्रास बना लेती है, पता ही नहीं चलता. जिस शाख पर घरौंदा है उसी शाख को धीरेधीरे काटने का हुनर भला हम से अच्छा किसे आता होगा.

प्रकृति तो बेचारी लगातार संकेत देती रहती है मगर हम ही आंख के अंधे जो कुछ भी देखना, सुनना और समझना पसंद नहीं करते हैं और न ही हर पल अपने ही जीवन को पलपल मौत की तरफ बढ़ते देखनासमझना चाहते हैं. अपनी दुर्दशा का सारा का सारा इल्जाम हम बेचारी कुदरत पर लगा कर आंख मूंद लेते हैं मगर सत्य यही है कि बेचारी, प्रकृति नहीं बेचारे तो हम हैं. हम ही हैं जिन्हें अपना काले अंधकार से भरा भविष्य नजर नहीं आ रहा. आने वाली पीढ़ी को हम क्या सौंप कर जाने वाले हैं, उस का अंदाजा हमें आज ही हो जाना चाहिए. भावना से शून्य तो हम हो ही चुके हैं. किसी के कंधे पर पैर रख कर ऊपर जाने का हुनर तो हमें आ ही चुका है. अब लाशों के ढेर पर खड़े हो कर विजय उत्सव मनाना ही रह गया था जो पाकिस्तान के पेशावर में हो भी गया. वे लाशें किसी दुश्मन की नहीं थीं, मासूम बच्चों की थीं जिन्हें न सत्ता से कुछ लेना था न राजनीति या धनसंपदा से. हमें कल नजर ही नहीं आ रहा. आज का सत्यानाश करने वाले हम यही समझ नहीं पा रहे भविष्य समाप्त करने वालों का जनाजा किस के कंधे पर जाएगा. जो बच्चे जवान हो कर हमारे बुढ़ापे को श्मशान तक पहुंचाने वाले हैं, उन्हें ही समाप्त कर क्या हम ने अपना बुढ़ापा लावारिस नहीं बना लिया?

यहां भी रास्ता ही भटक गए हैं हम. बच्चों का बचपन और जवानों की जवानी निगल जाने वाले हम समझ क्यों नहीं पा रहे कि कल हमारा दाहसंस्कार कैसे होगा, कौन हमें सुपुर्देखाक करेगा. यह तो प्रकृति का नियम है जो आया है उसे जाना भी है. सही यही है जो पहले आया वह पहले जाए. दादा की अरथी पोते के कंधे पर खूब सजती है. जाने वाले की वेदना तो होती है मगर शवयात्रा में साथ चलने वाले कहते हैं, ‘मरने वाला अच्छा इंसान था, नातीपोतों का सुख भोग कर जा रहा है.’ क्या हमें वह सुख मिलेगा, जरा सोचिए. प्रकृति के हर काम में तो हमारा दखल होता जा रहा है, जिसे 60-70 साल में जाना है उसे हम पहले ही भेजते जा रहे हैं. अधूरी इच्छाएं दमित हो कर कैसा बवंडर खड़ा करती हैं, इस का सहज नतीजा हमारे सामने है, जो मिले उसे सहज स्वीकार कर लेना हमें अब याद ही नहीं रहा. हमारा असंतोष घर की दीवारों को तोड़ कहांकहां फैल गया है. शरारतें, जिसे बच्चों की शरारत समझा जाता था, अब बचपने की परिधि से बहुत दूर चली आई हैं. मरना या मार देना एक नया ही खेल बन गया है जिसे भीगी आंखों से, बेबसी के साथ देखा जा रहा है, सहा जा रहा है मगर रोका नहीं जा रहा.

अब नहीं तो कब

हर बिगड़ी व्यवस्था का बीज कहीं हम ने ही तो नहीं डाला था, यह सोचने का विषय है. हमारे ही रोपे संस्कार आज हमें शर्मसार कर रहे हैं, यह स्वीकार करने का समय है. आतंकवादी और बलात्कारी भी तो किसी मां की ही गोद से निकले हैं. प्रकृति से भी कहीं आगे निकल जाना, हमें किसी अन्य लोक में समय से पहले भेज रहा है. जहां 70-80-90 की उम्र में जाना था वहां 12-14-20 साल में ही भेज देना क्या प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं है? यहां भी प्रकृति के काम में दखल. कब हम एक नैसर्गिक संतुलन बनाना सीखेंगे? किसी की सीमा में हमारा हस्तक्षेप आखिर कब बंद होगा? कब आएगा वह दिन जब हम अपनी और दूसरे की मर्यादा का सम्मान करना सीखेंगे? कब हम संतुलन बनाना सीखेंगे? अब नहीं तो आखिर कब?

भारत भूमि युगे युगे

वेंकैया बनाम वरुण

अजमल आमिर कसाब की फांसी गुजरे कल की बात हो गई है लेकिन वरुण गांधी का बयान भाजपा के गले की फांस बन गया है जिस में उन्होंने कहा था कि अब तक ज्यादातर फांसियां अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों और दलितों को ही क्यों हुई हैं. इस फांस को बगैर सर्जरी के हटाने की कोशिश वरिष्ठ मंत्री वेंकैया नायडू ने यह कहते की कि क्या फांसी में भी आरक्षण व्यवस्था लागू की जानी चाहिए? हर कोई जानता है कि मुद्दा या लड़ाई कसाब, दलित या फांसी नहीं बल्कि भाजपा के अंदर वर्चस्व की है. वरुण गांधी के कांग्रेसी संस्कार कभीकभी शब्दों और विचारों में प्रकट हो जाते हैं तो मूल भाजपाई तिलमिला उठते हैं. लेकिन वे कर कुछ नहीं पाते. इस की पहली वजह तो यह है कि वरुण मेनका गांधी के बेटे हैं. उन की गंभीरता और परिपक्वता को ले कर संशय बना ही रहता है. और दूसरी, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की आहट है. ऐसे में कोई उन से पंगा नहीं लेना चाहता.

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मैगी रिटर्न्स

मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले से पहले ही केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने अपनी यह उम्मीद सार्वजनिक तौर पर जता दी थी कि मैगी जल्द ही दुकानों पर लौटेगी. इस के बाद अदालत की सी भाषा का इस्तेमाल करते उन्होंने कहा था कि तथ्यपरक निष्कर्ष आने तक अनावश्यक हंगामा नहीं होना चाहिए. पासवान की आवाज में दम इस बात का भी था कि टैक्नोलौजी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अपनी जांच में मैगी को सुरक्षित पाया है. इस विज्ञापन रूपी बयान के कोई खास माने होते अगर योग गुरु बाबा रामदेव देसी मैगी बाजार में लाने का एलान न कर चुके होते. रामदेवरामविलास के संबंधों पर इस बयान का फर्क पड़ना तय है जिस की मध्यस्थता करते नरेंद्र मोदी को तैयार रहना चाहिए क्योंकि बात मैगी की कम मुनाफे की ज्यादा है.

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कोर्ट को बख्शें

तेजतर्रार डी के अरुणा साल 2014 तक आंध्र प्रदेश की जनसंपर्क मंत्री हुआ करती थीं लेकिन जब तेलंगाना राज्य बना तो उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. यह एक साधारण सी सियासी बात है जिसे ले कर अरुणा सीधे सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचीं और एक जनहित याचिका खुद के मंत्री न बनाए जाने पर दायर कर दी. उन की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील यह दी कि तेलंगाना सहित उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, नागालैंड और मिजोरम में सरकारें समानता के अधिकार का पालन नहीं कर रही हैं. इस अद्भुत याचिका और तर्क पर सुप्रीम कोर्ट का हैरान हो जाना स्वाभाविक था. वजह न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के कामों व अधिकारों के बारे में हर कोई जानता है, इसलिए बड़ी शिष्टता व सभ्यता से यह याचिका जनहित में ही खारिज कर दी गई. वहीं, अदालत ने यह कहते मलहम लगा दिया कि अदालत विधायिका पर ऐसे दबाव नहीं डाल सकती. ऐसी मांग उठाने के और भी मंच हैं, अब अरुणा जो चाहें मंच चुन लें.

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किस का बजाज

देश के शीर्ष उद्योगपतियों में शुमार सांसद राहुल बजाज ने बड़ी दिलचस्प बातें बीते दिनों कहीं. वे भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के साथ हैं लेकिन कह वही रहे हैं जो बाकी सभी लोग कह रहे हैं. लाल बुझक्कड़ शैली में एक पहेली का समापन करते राहुल बजाज ने वह रहस्य खोला जो पहले से ही खुला पड़ा था कि पिछले साल ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली सरकार अपनी चमक खो रही है. सरकार यानी नरेंद्र मोदी और राहुल बजाज यानी उद्योग जगत, जिस के इशारों पर सरकारें बनती और गिरती हैं. अब इस उद्योग जगत ने एक चर्चा पर हां की मुहर लगा दी तो धड़ल्ले से कसबाई स्तर तक के सर्वे आने लगे कि नहीं, अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. नरेंद्र मोदी को और वक्त दिया जाना चाहिए. तय है इस धुंधलाती चमक के बारे में मध्यवर्गीय राय ज्यादा माने रखती है जो इतनी जल्दी अपने फैसले पर पछताना नहीं चाहता.

अनीता की दूसरी पारी

टीवी की दुनिया टीआरपी के घोड़े पर सवार रहती है. जरा सी टीआरपी क्या लुढ़की, इन के सीरियल्स में उठापटक होने लगती है. कभी किसी किरदार को विवाद की चादर ओढ़ा कर तो कभी गुजरे जमाने के मशहूर व आज रिटायर हो चुके अदाकारों को छोटे परदे पर लाया जाता है ताकि सीरियल्स से दर्शक को चिपकाए रखा जा सके. कई बार यह तरीका कामयाब भी हो जाता है. शेखर सुमन सालों पहले अपना फिल्मी कैरियर डूबता देख रहे थे तभी उन्हें टीवी में बुलावा आया और उन्होंने टीवी की दुनिया में लंबी पारी खेली. इसी तरह फारूख शेख भी टीवी पर आए. छोटे परदे पर इन दिनों 80-90 दशक की अभिनेत्रियों को लाया जा रहा है. पिछले साल सोनाली बेंद्रे ने जहां ‘अजीब दास्तान है ये’ धारावाहिक से टीवी पर कमबैक किया वहीं पूनम ढिल्लन, करिश्मा कपूर, माधुरी दीक्षित और प्रीटी जिंटा भी यह कर चुकी हैं और आज भी कर रही हैं.

जल्द ही अभिनेत्री अनीता राज भी ‘एक था राजा एक थी रानी’ धारावाहिक में महारानी प्रियंवदा के किरदार में नजर आएंगी. वैसे इस से पहले वे अनिल कपूर के साथ धारावाहिक ‘24’ में अहम किरदार निभा चुकी हैं. दरअसल अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्रियों को टीवी पर लाने के दोहरे फायदे हैं. पहला तो यह कि रिटायर हो चुकी इन अदाकारों में वापस कैमरे पर आने का उत्साह होता है जिस के चलते ये टीवी पर पहले से स्थापित हो चुके बड़े कलाकारों की तरह नखरे नहीं करते. दूसरा इन अभिनेत्रियों के जमाने से जुड़ा दर्शक वर्ग इन धारावाहिकों को बोनस की तरह मिलता है. यही वजह है कि अमोल पालेकर और रघुवीर यादव भी एक सीरियल से टीवी पर कमबैक कर रहे हैं. अनीता राज की बात करें तो वे अपने जमाने में बहुत कामयाब अभिनेत्री नहीं थी लेकिन कुछ ग्लैमरस स्टाइल और इक्कादुक्का हिट फिल्मों की बदौलत लोग उन्हें जानते हैं. पर उन की लोकप्रियता इस धारावाहिक को बहुत ज्यादा फायदा पहुंचाएगी, लगता नहीं है.

गौरतलब है कि अनीता राज की पहली फिल्म ‘प्रेमगीत’ आज से 33 साल पहले 1982 में बनी थी. इस फिल्म का गाना ‘होंठों से छू लो तुम’ आज भी अपना प्रभाव सुनने वालों पर छोड़ता है. अनीता राज के दौर की ही नहीं, उन के बाद की बहुत सारी अभिनेत्रियां आज गुम सी हो गई हैं. अनीता राज ने आज भी अपने को इस तरह से फिट रखा है कि उन को देख कर उन की उम्र का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. अनीता राज का हेयरस्टाइल फैशनेबल महिलाओं के बीच मशहूर था. हाल में जब इस प्रतिनिधि ने उन से आज के दौर की ज्यादातर अभिनेत्रियों की गुमनामी को ले कर सवाल पूछा तो उन का कहना था.’’ ‘‘नहीं ऐसा नहीं है. जिस ने वक्त के हिसाब से रोल निभाए और उम्र के प्रभाव को मैनेज किया वह आज भी फिल्मी परदे पर दिख रहा है. बढ़ती उम्र में अपने हिसाब के रोल कम मिलते हैं. अनीता का इशारा इस बात से है कि जो अभिनेत्रियां आज फिट हैं वही टीवी पर काम पा सकती हैं. लिहाजा उन से पूछने पर वे कहती हैं.

‘‘फिटनैस के लिए ऐक्सरसाइज और अपनी डाइट पर ध्यान देने के साथ ही साथ मानसिक रूप से सुकून का अनुभव भी करना चाहिए. मैं ने सही समय पर फिल्मों में काम किया. इस के बाद शादी और परिवार को समय दिया. जब मैं ने शादी की तो फिल्मों को छोड़ कर परिवार को समय दिया. मेरे पति का मुंबई में बिजनैस है. मैं उस में सहयोग देने लगी. मेरा बेटा बड़ा हो गया तो मैं ने फिर से ऐक्ंिटग की दुनिया में कदम रखा. मैं अपने बेटे और पति को उन के काम में सहयोग देती हूं. बेटा फिल्म एडिटिंग की लाइन में है. ‘अग्निपथ’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ इन दोनों फिल्मों को उस ने एडिट किया है. वह फिल्म डायरैक्शन का काम करना चाहता है. और रही बात फिट रहने की तो मेरी फिटनैस का राज मेरा प्रतिदिन दौड़ना है. मैं रनिंग ऐक्सरसाइज करती हूं. मुंबई में समुद्र के किनारे मुझे दौड़ने का बहुत शौक है. सप्ताह में 3 दिन मैं 20 किलोमीटर की रनिंग करती हूं. मैं 42 किलोमीटर लंबी मैराथन रेस में हिस्सा ले चुकी हूं. इस के अलावा मैंटल ऐक्सरसाइज करती हूं. मैं शुरू से ही सुबह जल्दी उठती रही हूं. सुबह हर दिन टलहने और दौड़ने का काम करती रही हूं. इस से मेरे शरीर में इस तरह की ऐक्सरसाइज करने की आदत पड़ी है.’’ हालांकि फिल्मी दुनिया में जहां मौजमस्ती और लेट नाइट पार्टी रोज होती हैं. फिटनैस के लिए टाइम निकालना बेहद मुश्किल है. लिहाजा ज्यादातर कलाकार या तो जिम साथ ले कर चलते हैं या फिर स्टीरौयड पर निर्भर रहते हैं. आप के पिताजी फिल्मों के सफल चरित्र अभिनेता थे, इस के बाद भी आप पार्टियों में नहीं जाती थीं. इस पर अनीता बताती हैं.

‘‘मेरे पिता जगदीश राज फिल्मों में काम करते थे. वे अपने बच्चों को पूरी आजादी देते थे. इस के बाद भी हम लोगों पर फिल्मी माहौल का असर नहीं हुआ. मेरे पति और बेटा भी फिल्मी पार्टियों से दूर ही रहते हैं. पार्टियों में शिरकत करने में समय का सब से अधिक नुकसान होता है.’’ अकसर देखा जाता है कि सीनियर कलाकार अपने से कम अनुभवी कलाकारों के साथ सही से पेश नहीं आते. ऐसे में सीरियल ‘एक था राजा एक थी रानी’ में आप जूनियर आर्टिस्टों के साथ में काम कर रही हैं, उन से तालमेल बैठाने में कोई परेशानी तो नहीं आती है? इस सवाल पर अनीता का रिएक्शन यो है. ‘‘हमारे दौर में फिल्मों के सैट पर शूटिंग के समय अपने शूट का इंतजार करते समय कलाकार एकसाथ पासपास ही बैठते थे. छोटेबडे़ सभी कलाकार ज्यादातर एकदूसरे से बात कर के ही समय पास करते थे. अब कलाकारों को वैनिटी वैन की सुविधा होती है. जहां वे अकेले अपना समय गुजारते हैं. हमें तो एकसाथ कलाकारों के साथ बैठने की आदत है. ऐसे में मुझे छोटेबडे़ कलाकारों के साथ तालमेल बैठाने में कोई परेशानी नहीं होती. कलाकार साथ बैठते हैं तो आपसी रिलेशन बनते हैं. आज के लोग स्मार्टफोन पर ज्यादा वक्त गुजारते हैं.’’ फिल्में भले ही अनीता की सफल नहीं रही हों लेकिन उन का ग्लैमरस लुक उस जमाने में काफी चर्चित था. जब उन से पूछा गया कि.

आप का हेयरस्टाइल बहुत मशहूर था. कैसे बना यह स्टाइल तो अनीता याद करती हैं ‘‘अनीता राज हेयरस्टाइल कैसे मशहूर हो गया, यह तो मुझे भी नहीं पता. जब मेरी फिल्मों को पसंद किया जाने लगा तो लोगों को मेरा हेयरस्टाइल पसंद आने लगा. जब भी शूटिंग पर लोग मिलते तो मेरे हेयरस्टाइल की तारीफ करते. तब मुझे लगा कि मैं भी कुछ स्टाइलिश हो गई हूं. सही बात यह है कि वह कोई स्टाइल नहीं था वह तो मेरा नैचुरल स्टाइल था. मेरे बाल लंबे थे, इस कारण यह स्टाइल मशहूर हो गया.’’

आज के दौर में पसंदीदा अभिनेत्री को ले कर अनीता राज प्रियंका चोपड़ा और कंगना राणावत का नाम लेती हैं. उन के मुताबिक ये दोनों ही अच्छा अभिनय कर रही हैं. इन की फिल्मों में अलगअलग रोल देखने को मिलते हैं. यही नहीं, ये फैशन और स्टाइल आइकौन भी हैं.  इन को दर्शक भी पसंद करते हैं. हमारे समय से आज के समय की फिल्मी दुनिया बदल गई है. पहले सभी कलाकार फैमिली की तरह आपस में रहते थे, अब ऐसा माहौल नहीं दिखता.’’ अकसर अभिनेत्रियां अपने किरदार की लेंथ व उस के शेड्स को ले कर बेहद सतर्क रहती हैं. जब अनीता से पूछा गया कि. इस दौर में आ कर किस तरह के रोल करने चाहिएं तो उन का कहना है कि उम्र के इस दौर में रोल का चुनाव करना ही सब से प्रमुख काम होता है. अब पहले वाले रोल न मिलेंगे और न ही उस तरह के रोल करना अच्छा लगेगा. वे रोल करें जो आप की उम्र और पर्सनैलिटी को अच्छे लगें. सीरियल ‘एक था राजा एक थी रानी’ में मुझे महारानी का रोल अच्छा लगता है. मंहगी ज्वैलरी, राजघराने की पोशाक, वैसे ही बोलने का अंदाज सब अच्छा लगता है. इस रोल को मैं मजे ले कर कर रही हूं. कई बार तो घर आ कर भी उसी अंदाज में बात करती हूं तो मेरे पति हंसते हुए कहते हैं कि अब यहां महारानी मत बनो.

बहरहाल, अनीता राज जो अपने फिल्मी कैरियर में औसत दरजे से कभी उठ नहीं पाईं, टीवी पर भी कुछ ऐसा ही कर रही हैं. हालांकि उन की मजबूरी भी है कि उन्हें जो रोल औफर हो रहे हैं, वही बड़े सीमित हैं. लिहाजा, चुइंगम सरीखे खींचे जा रहे सीरियल में अनीता कुछ यादगार कर पाएंगी, कहना जरा मुश्किल है.

डायरैक्ट सैलिंग, उभरता कैरियर

एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत अनुराधा गोयल, जो नोएडा की एक पौश कालोनी में रहती हैं, ने पिछले 2 सालों से किसी मौल या दुकान से अपने लिए ब्यूटी प्रोडक्ट्स नहीं खरीदे हैं. वे औरीफ्लेम डीलर को फोन कर देती हैं और घर बैठे ही उन्हें अपनी जरूरत के कौस्मैटिक्स उन्हीं दामों में मिल  जाते हैं. सब से अच्छी बात उन्हें यह लगती है कि जाने के झंझट से बचने के साथ कई बार फायदेमंद स्कीम और डिस्काउंट भी उन्हें मिल जाता है. कंपनी की बुकलैट से उन्हें नए प्रोडक्ट्स की जानकारी भी मिल जाती है और दामों को ले कर कोई चिकचिक भी नहीं करनी पड़ती. 

अनुराधा की तरह अन्य कामकाजी और घरेलू महिलाएं हैं जो डायरैक्ट सैलिंग से अपने काम की चीजों को घर बैठे मंगा लेती हैं फिर चाहे वे ब्यूटी प्रोडक्ट्स हों या हैल्थ प्रोडक्ट्स या टपरवेयर के कंटेनर या घर में काम आने वाली अन्य उपयोगी चीजें. यही नहीं, अगर अपने आसपास आप नजर घुमा कर देखेंगी तो पाएंगी कि डायरैक्ट सैलिंग एक फायदेमंद कैरियर की तरह भी अपनी जड़ें जमा चुका है, खासकर महिलाएं किसी न किसी डायरैक्ट सैलिंग नैटवर्क का हिस्सा जरूर होती हैं. केवल शहरों में ही नहीं, कसबों और ग्रामीण इलाकों में भी डायरैक्ट सैलिंग यानी प्रत्यक्ष बिक्री का चलन तेजी पकड़ रहा है.

कई ऐसी भी डायरैक्ट सैलिंग कंपनियां हैं जिन्हें लगता है कि उन के प्रोडक्ट्स को पर्सनल अटैंशन की आवश्यकता है और उस के लिए डायरैक्ट सैलिंग उन्हें सही प्लेटफौर्म लगता है. कुछ ऐसे उत्पाद होते हैं जिन्हें खरीदने से पहले दूसरों की सहमति या आश्वासन की आवश्यकता होती है, जैसे हैल्थ प्रोडक्ट्स. चूंकि अधिकांश हैल्थ सप्लीमैंट्स की कीमत 500 रुपए या अधिक होती है और लोग हैल्थ के मामले में कोई रिस्क नहीं उठाना चाहते हैं. इसलिए वे इन्हें डायरैक्ट सैलिंग कंपनियों से लेना पसंद करते हैं.

क्या है डायरैक्ट सैलिंग

यह एक ऐसा व्यापारिक माध्यम है जिस में उत्पादों और सेवाओं की मार्केटिंग सीधे उपभोक्ताओं के साथ की जाती है. इस में उपभोक्ता और विक्रेता सीधे जुड़े होते हैं और उत्पादों की सप्लाई उपभोक्ता जहां चाहे वहां की जा सकती है. इस में अपने निजी संपर्कों का प्रयोग करते हुए ‘पार्टी प्लान’ द्वारा बिजनैस किया जा सकता है. यानी कि किसी सोशल गैदरिंग के दौरान या फिर किटी पार्टी में अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया जाए और साथ ही अपने ग्राहक बना लिए जाएं. यह बिजनैस एक नैटवर्क की तरह चलाया जाता है.

डायरैक्ट सैलिंग करने वाली कंपनियां जैसे एमवे, ओरीफ्लेम, एवोन, टपरवेयर, मोदीकेयर, सामी डायरैक्ट आदि अपने प्रतिनिधि मैंबर बनाती हैं और वे मैंबर आगे अपने और मैंबर बनाते जाते हैं. और इस तरह यह नैटवर्क एक कड़ी की तरह बनता और बढ़ता जाता है. अधिकतर कंपनियां बहुस्तरीय लाभ योजना के तहत अपने एजेंट को उस की निजी बिक्री का लाभ देती हैं और उस एजेंट ने जिन मैंबर्स को जोड़ा होता है, उन्हें भी उस के द्वारा अर्जित लाभ का हिस्सा दिया जाता है. इस की सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस में उपभोक्ता और विक्रेता सीधे जुड़े होते हैं. इस में उत्पादों की सप्लाई उपभोक्ताओं के घर या कहीं पर भी की जा सकती है.

देता है मोटा मुनाफा

अगर इस समय बिक्री पर नजर डालें तो भिन्नभिन्न कारणों की वजह से भारतीय उपभोक्ता एमवे के शैंपू, टपरवेयर के कंटेनर, ओरीफ्लेम की क्रीम, सामी डायरैक्ट के हैल्थ सप्लीमैंट्स व स्किन केयर प्रोडक्ट्स आदि लगातार खरीद रहे हैं. जबकि आम एफएमसीजी कंपनियों की बिक्री दर में कमी आई है. डायरैक्ट सैलिंग बिजनैस को कम इन्वैस्टमैंट और ज्यादा रिटर्न के रूप में जाना जाता है. 

एमवे इंडिया (वेस्ट) के मैनेजर, कौर्पोरेट कम्युनिकेशंस, जिगनेश मेहता के अनुसार, ‘‘एक कंज्यूमर की नजर से देखें तो डायरैक्ट सैलिंग से उन्हें यह फायदा होता है कि चूंकि किसी भी उत्पाद को बहुत सोचसमझ कर, उस की पूरी जानकारी हासिल करने के बाद खरीदा जाता है, इसलिए धोखा खाने का सवाल ही नहीं उठता है. ऐसा रिटेल में संभव नहीं होता है. रिटेल में ज्यादातर कंज्यूमर विज्ञापनों, प्रमोशंस आदि पर निर्भर होता है, जिस से उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिल पाती. साथ ही, इतने सारे प्रोडक्ट बाजार में उपलब्ध होने के कारण कंज्यूमर को निर्णय लेने में कठिनाई होती है.’’

भारत में 16 वैधानिक डायरैक्ट सैलिंग कंपनियां हैं जो इंडियन डायरैक्ट सैलिंग एसोसिएशन का हिस्सा हैं. यह एसोसिएशन इस बिजनैस के मानक तय करता है. डायरैक्ट सैलिंग बिना किसी बड़े निवेश के किसी को भी अपना बिजनैस करने का अवसर देती है.

खुद बनें बौस

इस बिजनैस से हर वर्ग और हर उम्र के लोग जुड़ सकते हैं. इस के लिए किसी विशेष शैक्षिक योग्यता या अनुभव की आवश्यकता नहीं होती है. घरेलू महिलाएं इस बिजनैस में काफी आ रही हैं क्योंकि इस से वे अतिरिक्त कमाई तो कर ही पाती हैं, साथ ही वे रसोई का सामान या सौंदर्य उत्पादों की बिक्री भी आसानी से कर पाती हैं. इस बिजनैस का सब से बड़ा फायदा यह होता है कि आप खुद की अपनी बौस होती हैं और अपने समय व सुविधा के अनुसार काम कर सकती हैं. 

ओरीफ्लेम इंडिया की मार्केटिंग डायरैक्टर शर्मीली राजपूत के अनुसार, ‘‘यह कैरियर महिलाओं के लिए आजकल बहुत ही लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि यह उन्हें काम करने व समय की स्वतंत्रता देता है. साथ ही, कम पढ़ीलिखी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने व एक नियमित आय का अवसर प्रदान करता है. यह उन्हें अपने निजी व प्रोफैशनल जीवन में एक उचित बैलेंस भी रखने में सहायता करता है. ऐसी अनेक महिलाएं हैं जिन्होंने डायरैक्ट सैलिंग की कंसल्टैंट बन इसे फुलटाइम कैरियर की तरह अपनाया है. साथ ही ऐसी महिलाएं व पुरुष भी हैं जो इसे साइड बिजनैस की तरह कर रहे हैं.

‘‘चूंकि डायरैक्ट सैलिंग से एक स्थायी आय का जरिया बना रहता है, इसलिए लोग इस में अपना समय व ऊर्जा लगाने से हिचकिचा नहीं रहे हैं. यह बिजनैस महिलाओं को एक आत्मविश्वास देता है ताकि वे भी उत्पादों की बिक्री कर व एक सामाजिक दायरा विकसित कर अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं. महिलाओं में चूंकि एकदूसरे को समझनेसमझाने की योग्यता सहज रूप से होती है, इसलिए उन के लिए तो यह एक बढि़या और फायदेमंद कैरियर है.’’

तेजी से बढ़ता ट्रैंड

भारत में डायरैक्ट सैलिंग का ट्रैंड बहुत तेज गति से बढ़ रहा है. इंडियन डायरैक्ट सैलिंग एसोसिएशन और पीएचडी चैंबर के अनुमान के अनुसार, 2011-2012 में भारत में डायरैक्ट सैलिंग कंपनियों की बिक्री 5,320 करोड़ रुपए थी और अगले 4 सालों में इस में 20 प्रतिशत बढ़ोत्तरी होने की संभावना है. द वर्ल्ड फैडरेशन औफ डायरैक्ट सैलिंग एसोसिएशन का मानना है कि डायरैक्ट सैलिंग मार्केट लगभग 3 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करती है जिस में 2.1 करोड़ महिलाएं हैं. यह बिजनैस एक परिवार को अतिरिक्त आय कमाने का मौका देता है और स्वरोजगार में बढ़ोत्तरी करता है. जो लोग इसे करते हैं, यह बिजनैस उन की निपुणताओं को निखार कर उन में आत्मविश्वास पैदा करता है या और बढ़ाता है. एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह लौंग टर्म फाइनैंशियल सिक्योरिटी देता है.

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