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जीने की राह- भाग 4: उदास और हताश सोनू के जीवन की कहानी

मैं ने स्वयं ही मन में एक संकल्प लिया कि मैं नीता और रिया की यादों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दूंगा बल्कि उसे संबल बनाऊंगा और उस से प्रेरणा ले कर जिंदगी आगे जीऊंगा. एक पल बाद मैं सोचने लगा, मैं करूंगा क्या ऐसा, जिस से जीवन सार्थक महसूस हो. एकाएक सोनू की याद आ गई-तनहा, उदासीन, सोनू. मन में एक संकल्प उभर आया, हां, मैं नीता व रिया की अपनी यादों को अपने दिल में बसाए, अपने जीवन में संजोए, तनहा व उदासीन सोनू की जिंदगी संवारने की कोशिश करूंगा. इस उदास युवती को एक सामान्य खुशहाल जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करूंगा. अब मेरे जीवन का यही लक्ष्य होगा. मैं खुद को बेहद हलका महसूस करने लग गया, जीने की राह जो मुझे मिल गई थी.

अपने संकल्प की चर्चा मैं ने किसी से भी नहीं की थी. मैं ने कालेज भी जौइन कर लिया. मन में खयाल आया, अपने दुख के कारण विद्यार्थियों को हानि पहुंचाना गलत है, सो, अब सुबह कालेज जाने की व्यस्तता हो गई थी. सोनू ने भी स्कूल जौइन कर लिया था. दिन में हम अपनेअपने कार्यों में व्यस्त रहते थे किंतु शाम में अवश्य मौका निकाल कर हम मिल लेते थे. अचानक 5 दिनों के लिए उत्तम एवं भाभीजी को दिल्ली जाने का प्रोग्राम बनाना पड़ गया, परिवार में एक शादी पड़ गई थी. सोनू फ्लैट में अकेली रह गई थी, इसलिए मैं उस का ज्यादा खयाल रखने लगा था. अब वह भी मुझ से ज्यादा बातें करने लगी है. उस ने अपने मांपापा के विषय में विस्तार से बताया कि उस के मांपापा ने दोनों परिवारों के विरोध के बावजूद अंतर्जातीय विवाह किया था. इसलिए दोनों परिवार वालों ने उन लोगों से संबंध तोड़ लिए थे. उस ने बताया कि उस के मांपापा को उस से पहले भी एक बेटी हुई थी, जिस का नाम पापा ने बड़े प्यार से ‘संगम’ रखा था. 2 भिन्न जातिधर्म का संगम. उस की मां बहुत सरल स्वभाव की थीं, उन्होंने दोनों परिवारों को संगम के बहाने मिलाने का काफी प्रयास किया किंतु दोनों तरफ से कड़ा जवाब ही मिला कि वे संगम को नाजायज औलाद मानते हैं, उस के जन्म से उन्हें कोई खुशी नहीं है. सो, मेलमिलाप का तो सवाल ही नहीं उठता है. उस ने आगे बताया, ‘‘संगम 9 माह की हो कर खत्म हो गई. मां ने बताया था कि संगम को सिर्फ बुखार हुआ था, जो अचानक काफी तेज हो गया था. उसे डाक्टर के पास ले गए किंतु उस ने कम समय में ही आंखें उलट दीं एवं उस का शरीर ऐंठ गया. डाक्टर कुछ भी न कर सके.

‘‘मांपापा का प्यार सच्चा था, दोनों एकदूसरे का संबल बन एकदूसरे के लिए खुश रहते एवं एकदूसरे को खुश रखने की पूरी कोशिश करते. संगम की मृत्यु के 2 साल बाद मेरा जन्म हुआ. मां ने फिर दोनों परिवारों से मुझे स्वीकार करने की मिन्नतें कीं. उन्होंने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि इस नन्ही जान को स्वीकार कर लीजिए. आप लोगों ने मेरी पहली बच्ची को नहीं स्वीकारा, वह रूठ कर चली गई. किंतु मां की पुकार दोनों परिवारों के बीच की तपन को पिघला न सकी. दोनों परिवारों का एक ही जवाब था, जब हमारा तुम से ही कोई संबंध नहीं है तब तुम्हारी औलाद से हमें क्या मोह?

‘‘मां ने मुझे बताया था कि दोनों परिवारों के रुख के कारण पापा ने नाराज हो कर मां से वचन लिया था कि अब वह कभी भी दोनों परिवारों से मेलमिलाप का प्रयास नहीं करेगी. इस के बाद मां ने दोनों परिवारों के संबंध में सोचना बंद कर दिया,’’ मुझे यह सब बता कर सोनू फूटफूट कर रो पड़ी. मैं ने उसे सांत्वना देने के उद्देश्य से उस के कंधे थपथपाते हुए कहा, ‘‘सोनू, धैर्य रखो, आश्चर्य होता है लोग इतने निर्दयी क्यों हो जाते हैं जो अपने खून को पहचानने से, उसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं.’’ सोनू अपने आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘मनजी, मेरी समझ में नहीं आता, लोग प्यार से इतनी घृणा क्यों करते हैं. मेरे मांपापा अलगअलग जातिधर्म के थे, दोनों ने प्यार किया था, कोई अपराध तो नहीं किया था, किंतु दोनों परिवारों ने उन का बहिष्कार कर दिया. मां ने एक बार बताया था कि उन की मां ने उन्हें उलाहना देते हुए कहा था कि यह दिन दिखाने से तो अच्छा होता कि वे मर गई होतीं, तो उन्हें खुशी होती.’’

सोनू की जीवनगाथा सुननेसुनाने में हमें समय का खयाल ही नहीं रहा. रात के साढ़े 8 बज चुके थे. मैं ने कहा, ‘‘सोनू, काफी देर हो चुकी है. अब तुम घर जाओ. हम कल मिलते हैं. अपना खयाल रखना.’’ वह बिना कुछ बोले, धीरे से बाय, गुडनाइट कह कर चल दी. रविवार का दिन था, सोनू का फोन आया, ‘‘मनजी, मेरे साथ मार्केट चलिएगा, घर का थोड़ा जरूरी सामान खरीदना है.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, 4 बजे तक चलते हैं.’’ हम नजदीक के मौल में चले गए. उस ने चादरें, तौलिया तथा किचन का काफी सामान लिया. मैं ने भी किचन की कुछ चीजें खरीद लीं. यह सब खरीदारी नीता ही किया करती थी. सो, मुझे थोड़ी असुविधा हो रही थी. सोनू से मुझे खरीदारी में काफी मदद मिली. खरीदारी करते हुए हमें 8 से ऊपर बज गए. सो हम ने डिनर भी बाहर ही कर लिया. सोनू का सामान कुछ ज्यादा था, इसलिए मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारा सामान तो ज्यादा है, इसलिए कुछ सामान मैं तुम्हारे घर तक पहुंचा देता हूं.’’ उस ने सहमति में सिर हिला दिया. उस का सामान पहुंचा कर मैं लौटने लगा तब वह बोली, ‘‘मनजी, मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं.’’

‘‘हांहां, बोलो,’’ मैं ने कहा.

वह झिझकते हुए बोली, ‘‘मनजी, अब हम एकदूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं.’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘दरअसल, समान दुख के कारण हम एकदूसरे को जल्दी समझ सके.’’ ‘‘मनजी, हमें एकदूसरे को जानते हुए 6 माह से भी ऊपर हो चुके हैं. मैं इंतजार में थी कि आप ही इस संबंध में कुछ करते किंतु आप तो…’’ वह एक पल रुक कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘मनजी, आप बहुत भले इंसान हैं. इतनी बातें मैं मांपापा के सिवा सिर्फ आप से करती हूं.’’ मैं ने भी उस की हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘मैं भी इतनी बातें सिर्फ नीता और रिया से करता था. हम दोनों बातें कर ही रहे थे कि उत्तम और भाभीजी दिल्ली से लौट आए. घर के सामने उन की टैक्सी आ चुकी थी, हम दोनों उन की अगवानी में लग गए. उत्तम से सारी बातें जानने के लिए मैं अधीर हो रहा था, क्योंकि मैं ने उस से विशेष आग्रह किया था कि वह दिल्ली में समय निकाल कर मेरे बड़े भैया एवं भतीजे सुमन से अवश्य मिल ले तथा मैं ने शादी संबंधी जो भैया एवं सुमन से सलाह मांगी थी, वह प्रत्यक्षत: उस संबंध में राय जान ले एवं उन की प्रतिक्रिया प्रत्यक्षत: देख कर, उन के विचार साफतौर पर समझ ले. उत्तम ने बताया कि दोनों ही मेरे विचारों से सहमत हैं तथा इस सिलसिले में इसी हफ्ते आ जाएंगे. अगले दिन सोनू शाम को मेरे घर पर आई थी. हम दोनों चाय पी रहे थे एवं बातें कर रहे थे कि बड़े भैया का फोन आया. जरूरी बातें कर, मैं ने उन से थोड़ी देर बाद बात करने की बात कह कर फोन काट दिया.

भैया के फोन का जिक्र सुन कर सोनू मुझ से मेरे परिवार के बारे में पूछने लगी. मैं ने बताया कि अब मांपापा तो हैं नहीं, हम 2 भाई ही हैं. बड़े भैया दिल्ली में हैं. उन का एक बेटा सुमन है. पिछले साल भाभी का देहांत हो गया है. हम दोनों भाइयों में बहुत प्रेम है. सोनू ने कहा, ‘‘बड़े भैया और भतीजा, आप के इतने दुखद समय में आप के पास क्यों नहीं आए?’’ ‘‘दोनों ही आना चाहते थे किंतु बड़े भैया बीमार चल रहे थे, सो मैं ने ही दोनों को आने से मना कर दिया था. वे लोग मुझे अपने पास बुला रहे थे किंतु मैं नहीं गया क्योंकि मुझे दुखी देख कर दोनों बहुत दुखी होते, नीता और रिया पर दोनों जान छिड़कते थे. ‘‘नीता बड़े भैया का पिता समान मान रखती थी. जो बातें भैया को नापसंद हैं वह मजाल है कि कोई कर सके, नीता सख्ती से इस बात की निगरानी रखती थी.

‘‘सुमन और रिया का आपसी प्यार देख लोग उन्हें सगे भाईबहन ही समझ बैठते थे. दोनों के मध्य ढाई साल का ही फर्क था किंतु सुमन अपनी बहन का बहुत खयाल रखता था.’’ नियत समय पर बड़े भैया एवं सुमन आ गए. नीता और रिया के जाने के बाद हमारी पहली मुलाकात थी. वे दोनों मुझ से लिपट कर रोए जा रहे थे. मेरा भी वही हाल था. हम तीनों कुछ भी बोल पाने में असमर्थ थे, आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. मैं ने ही पहल करते हुए कहा कि हम लोगों को स्वयं को हर हाल में संभालना होगा. हम तीनों एकदूसरे की हिम्मत बनेंगे एवं विलाप कर एकदूसरे को कमजोर नहीं बनाएंगे. दोनों ने ही सहमति जताते हुए कस कर मुझे जकड़ लिया. भैया सोनू से जल्दी ही मिलना चाहते थे, सो मैं ने सोनू को फोन कर दिया, ‘‘सोनू, शाम को मेरे घर पर चली आना, हो सके तो साड़ी पहन कर आना.’’

सोनू ने कहा, ‘‘मनजी, मैं समय पर पहुंच जाऊंगी.’’

मैं ने फोन काटने से पहले कहा, ‘‘सोनू, डिनर हम साथ ही करेंगे, मेरे घर पर.’’

उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मनजी, पर एक शर्त है, आज आप मेरे हाथ से बने गोभी के परांठे और प्याज का रायता खाएंगे. हां, बनाने में थोड़ी मदद कर दीजिएगा. अरे हां, गोभी है न घर में?’’

‘‘हांहां, गोभी है, प्याज और दही भी है, चलो यही तय रहा,’’ मैं ने सहमति प्रकट करते हुए कहा.

सोनू शाम 7 बजे आ गई. उस ने गुलाबी रंग की साड़ी बड़े सलीके से बांधी हुई थी. मैं ने उस का परिचय बड़े भैया और सुमन से करवाया. मेरे घर पर 2 अजनबियों को देख वह थोड़ा असहज हुई, किंतु उस ने जल्दी ही स्वयं को संभाल लिया तथा बड़ी शिष्टता से दोनों से मिली. वह भी हमारे साथ ड्राइंगरूम में बैठ गई. बड़े भैया ने कहा, ‘‘सुमन बेटा, दिल्ली वाली मिठाइयां एवं नमकीन ले आओ. सोनू बेटा को भी टेस्ट करवाओ.’’ सुमन तुरंत मिठाइयां एवं नमकीन ले आया. मैं दोनों के व्यवहार से बहुत राहत महसूस कर रहा था, क्योंकि दोनों के व्यवहार से साफतौर पर  परिलक्षित था कि दोनों को ही सोनू पसंद आ रही है. इतने में ही उत्तम एवं भाभीजी भी आ पहुंचे. मैं ने ही दोनों को आने के लिए कह दिया था. सोनू को देख भाभीजी बोल पड़ीं, ‘‘साड़ी में कितनी प्यारी लग रही है, मुझे तो एकदम…’’ मेरी तरफ देख उन्होंने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया.

खाना भाभी एवं सोनू ने मिल कर बनाया, बेहद स्वादिष्ठ था. हमारे साथ बड़े भैया एवं सुमन ने बड़ी रुचि से खाना खाया. बड़े भैया बारबार कहते, ‘‘सही बात है, औरतों के हाथों में जादू होता है, कितने कम समय में इन दोनों ने इतना स्वादिष्ठ खाना तैयार कर दिया.’’ सुमन भी बोला, ‘‘सही बात है छोटे पापा, वहां पर वह कुक खाना बनाता है, इस स्वाद का कहां मुकाबला. बस, पेट भरना होता है, सो खा लेते हैं.’’

सुमन ने एक चम्मच रायता मुंह में डालते हुए स्वादिष्ठ रायते के लिए भाभीजी को थैंक्स कहा.

भाभीजी बोलीं, ‘‘सुमन पुत्तर, यह स्वादिष्ठ रायता सोनू ने बनाया है, उसे ही थैंक्स दें.’’

सुमन ने सोनू को थैंक्स कहा तथा उस ने भी मुसकराते हुए ‘इट्स माई प्लेजर’ कहा.

मैं ने सुबह 7 बजे के लगभग सोनू को फोन कर पूछा, ‘‘तुम फ्री हो तो मैं इसी वक्त तुम से मिलना चाहता हूं?’’

सोनू ने कहा, ‘‘आप तुरंत आ जाइए, दूसरी बातों के बीच कल तो आप से कुछ बात ही न हो सकी.’’

मैं जब पहुंचा, वह 2 प्याली चाय और स्नैक्स के साथ मेरा इंतजार कर रही थी.

मैं ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘सुमन और बड़े भैया तुम्हें कैसे लगे?’’

उस ने तुरंत जवाब दिया, ‘‘अच्छे हैं, दोनों ही बहुत अच्छे हैं. उन के व्यवहार में बहुत अपनापन है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘और सुमन?’’

उस ने सहजता से कहा, ‘‘बहुत अच्छा लड़का है, एकदम आप के साथ बेटे जैसा व्यवहार करता है. अच्छा स्मार्ट एवं हैंडसम है, अच्छी पढ़ाई की है उस ने और अच्छी नौकरी भी करता है, किंतु अभी तो हम अपनी बातें करें, कल रात भी हम कुछ भी बात न कर सके.’’

‘‘तुम ने ठीक कहा सोनू, मैं अभी तुम से अपने दिल की ही बात करने आया हूं,’’ मैं ने कहा.

सोनू ने अधीरता से कहा, ‘‘मनजी, कह दीजिए, दिल की बात कहने में ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहिए.’’

सकुचाते हुए मैं ने कहा, ‘‘सही कहा तुम ने, मैं बिना वक्त बरबाद किए तुम से दिल की बात कह देता हूं. मैं तुम्हारा हाथ सुमन के लिए मांगना चाहता हूं.’’

वह आश्चर्य से व्हाट कह कर खड़ी हो गई. सोनू की भावभंगिमा देख कर एक पल मुझे खुद पर ही खीझ होने लगी कि मैं ने यह अधिकार कैसे प्राप्त कर लिया जो उस के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप कर बैठा. शादी किस से करनी है, कब करनी है, इस संबंध में मैं क्योंकर हस्तक्षेप कर बैठा. मैं ने क्षणभर में ही स्वयं को संयत करते हुए कहा, ‘‘सोनू, बुरा मत मानो, शादी तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है, मैं ने हस्तक्षेप किया इस के लिए मैं तुम से माफी मांगता हूं. तुम्हें यदि सुमन पसंद नहीं है या तुम किसी और को पसंद करतीहो, यह तुम्हारा निजी मामला है. तुम यदि मेरे प्रस्ताव से इनकार करोगी, मैं अन्यथा न लूंगा. वैसे एक बात कहूं, मैं ने तो तुम्हें सारेसारे दिन भी देखा है, कभी ऐसा आभास नहीं हुआ कि तुम्हारा बौयफ्रैंड वगैरह है. खैर, कोई बात नहीं, मुझे साफतौर पर बता देतीं तो ठीक रहता.’’ सोनू धीरेधीरे मेरे नजदीक आई, उस ने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मनजी, मुझे लगा आप मुझे प्यार करने लगे हैं, मैं तो आप से प्यार करने लगी हूं तथा आप को जीवनसाथी मान बैठी हूं.’’

सोनू की बातें सुन मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया, स्वयं को संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘सोनू, तुम ने ठीक समझा, प्यार तो मैं बेइंतहा करता हूं, किंतु वैसा नहीं जैसा तुम ने समझा. प्यार तो एक सच्चीसाफ भावना है, उसे सही दिशा, मार्ग देना हमारा काम है. जिस तरह उफनती नदी पर बांध बना कर हम उसे सही मार्ग देते हैं वरना जो जल जीवनरक्षक होता है वही जीवन का नाश कर बैठता है.’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘सोनू, मैं 60 वर्ष का हो रहा हूं. तुम लगभग 22-24 की नवयुवती हो. मेरी रिया भी इसी उम्र की थी. मैं अपनी रिया के लिए मेरी उम्र का दामाद कभी भी पसंद नहीं करता फिर तुम्हारे लिए ऐसा कैसे सोच सकता हूं. ‘‘तुम्हें उस दुर्घटना में मातापिता को खो देने के बाद बहुत तनहा, उदास देखा, तुम्हारी तरह ही मेरी दशा भी थी. नीता और रिया के बिना जीवन निरर्थक मसूस होने लगा, तब मैं ने स्वयं से संकल्प लिया था कि स्वयं के जीवन को भी सार्थक बनाते हुए, उदासीन, तनहा सोनू के जीवन में फिर उल्लास, उमंग भरने का प्रयास कर, उसे सामान्य जीवन हेतु प्रोत्साहित करूंगा. तुम्हारे रूप में मुझे रिया मिल गई, मैं फिर जीवन के प्रति आशान्वित हो उठा.

‘‘सोनू, मैं इस सोच के एकदम खिलाफ हूं कि एक कमसिन, सुंदर नवयुवती को मजबूरी की हालत में देख पुरुषवर्ग सिर्फ और सिर्फ उसे भोग्या ही समझता है. आएदिन पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर इस तरह के दुष्कर्म पढ़नेसुनने के लिए मिल जाते हैं. मेरा दिल चिल्लाचिल्ला कर कहता है कि मजबूर लड़कियों को बेटी/बहन मान कर स्वीकार कर, मदद क्यों नहीं की जाती.

‘‘मेरा मानना है कि एक व्यक्ति अकेला नहीं होता है. उस के साथ अनेक लोगों का मानसम्मान जुड़ा होता है तथा हमें ऐसा कोई कृत्य नहीं करना चाहिए जिस से कि हम अपनों से नजरें चुराएं.

‘‘तुम्हारे मातापिता की भी तुम से बहुत सी उम्मीदें रही होंगी. वे तुम्हारे लिए जीवनसाथी कभी भी किसी भी सूरत में मुझ जैसा प्रौढ़ तो नहीं चुनते. यदि तुम चुन लेतीं, तब वे भी तुम्हें असहमति में ही समझाते. हां, इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सुमन जैसा दामाद पा कर वे स्वयं को धन्य समझते. सो, तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम उन की आधीअधूरी उम्मीदों को पूर्ण करो, यह तुम्हारी उन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी.

‘‘ऐसा ही मेरे साथ भी है. मैं अपनी बेटी रिया की उम्र की सोनू से विवाह रचा कर अपने दिल में बसी पत्नी और बेटी से नजरें कैसे मिला पाऊंगा. सोनू, वे दोनों मेरे दिल में बसी हुई हैं, जिन से मैं रोज बातें करता हूं,  हंसता हूं, रोता हूं. और अगर ऐसा कृत्य कर जाऊंगा तब तो दोनों से नजरें ही चुराता रह जाऊंगा.  

हमारी बेडि़यां

मेरी सहेली के भाई की शादी थी. बहुत दिनों से हम मिले नहीं थे. मैं ने सोचा, अच्छा मौका है इस बहाने गजाला से मुलाकात भी हो जाएगी और उस के भाई रेहान मीर की शादी में शिरकत भी कर लूंगी. एक दिन पहले मैं गजाला के घर पहुंच गई. उस दिन उबटन था, शाम को खूब हंगामा रहा. लड़के को हलदी लगाने के बाद सब लोग आपस में हलदी खेलने में लग गए. दूसरे दिन बरात उसी शहर में जानी थी. शाम को हम बरात ले कर दुलहन के घर की तरफ रवाना हो गए. एक मैरिजहोम में इंतजाम था. निकाह के बाद खाना हुआ. उस के बाद दुलहन हिना की विदाई हुई. हम लोग दुलहन ले कर घर पहुंचे. उन लोगों के यहां रिवाज है कि दरवाजे से कमरे तक दूल्हा दुलहन को गोद में उठा कर ले जाता है. दूल्हा थोड़ा हिचकिचा रहा था, जरा दुबलापतला था. दुलहन तंदुरुस्त थी. सारी औरतें और बड़ीबूढि़यां दूल्हे के सिर हो गईं कि तुम्हें तो दुलहन को गोद में उठा कर ही अंदर ले जाना पड़ेगा. ‘मरता क्या न करता’ कहावत के अनुसार दूल्हे ने उसे गोद में उठाया. शोर, चीख, हंसी से माहौल गूंज उठा. इस हंगामे से दूल्हा और घबरा गया, थोड़ी दूर चलने के बाद दुलहन उस के हाथों से छूट कर नीचे गिर गई. दूल्हे की चाची दुलहन को खड़ा कर उस का हाथ पकड़ कर धीरेधीरे उस के कमरे में ले गईं. जब दुलहन जरा संभली तो उसे एहसास हुआ कि उस के घुटने में दर्द है क्योंकि घुटना जमीन से टकराया था. दूसरे दिन रिसैप्शन था, उस में भी वह लंगड़ा कर चल रही थी. 15-20 दिनों तक दवाइलाज के बाद दर्द ठीक हुआ. एक बेहूदा रस्म को निबाहने के चक्कर में दुलहन को कितनी तकलीफ उठानी पड़ी.

शकीला एस हुसैन, भोपाल (म.प्र.)

*

हमारे एक परिचित के दादाजी की मृत्यु हो गई. उन की अंतिम इच्छा थी कि उन का अंतिम संस्कार नवद्वीप के श्मशान में किया जाए. ऐसी मान्यता थी कि नवद्वीप के श्मशान में दाह कर्म होने पर मृत व्यक्ति को ‘स्वर्गलाभ’ होता है. उन की इच्छा के अनुसार, उन के परिवार वाले शवदाह करने के लिए मेटाडोर से नवद्वीप जा रहे थे. उल्लासी के टेंगरा के पास वह मेटाडोर कुछ कार्यवश रुकी, तभी पीछे से तीव्रगति से आ कर दस पहियों वाले भारी ट्रक ने टक्कर मार दी. टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि मौके पर ही उन के मातापिता और एक बहन की मौत हो गई. घायल परिजनों की मौत अस्पताल में हो गई. एक दाह संस्कार करने गए थे, अब घर के 3 और सदस्यों का भी दाह संस्कार नवद्वीप में करना पड़ा. बलिहारी है अंधविश्वासों की.

अंजु सिंगड़ोदिया, हावड़ा (प.बं.)

मेरी कहानी

इक मोड़ पर ठिठकती

इक मोड़ पर सहमती

आदि ढूंढ़ती, अंत ढूंढ़ती

कभी खुशी की फुहार

कभी गम की साइत

तितरबितर, बिखरे हुए

पलों में खुशियां ढूंढ़ती

हसरतों के धागे जोड़

बनाती है ओढ़नी

उतर आती है और

मेरे आंगन में चांदनी

समय ने ली करवट

मांगा हिसाब बीते लमहों का

और शक्तिहीन हाथों में

शक्ति का संचार कर

इक नई दिशा देने को

मेरी कहानी भटकती है

इक नई शुरुआत को

इक सुंदर अंत देने

मेरी कहानी भटकती है.

              – हेमा महाडिक लोखंडे

धार्मिक कट्टरता में उलझा देश

भारतीय जनता पार्टी के असली रंग अब सामने आने लगे हैं और विकास की बातों की जगह विनाश की बातें लेने लगी हैं. नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की इस परिवर्तन में रजामंदी है या नहीं यह तो पता नहीं चलेगा पर वैरभाव की जो हवा जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं ने तैयार की, जिस से पाखंडपने को पूरे तौर पर देश पर लागू करा जा सके, उस ने अपना काला रंग दिखाना शुरू कर दिया है. उत्तर प्रदेश के दादरी में गोमांस को ले कर मोहम्मद अखलाक की पीटपीट कर हुई हत्या के बाद मुंबई में भारतीय जनता पार्टी के चिंतक सलाहकार रहे सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर काला पेंट पोतने की घटना चाहे केंद्र सरकार की साजिश का नतीजा हो या न हो, यह उस व्यापक नीतिगत वातावरण का परिणाम है जिस में समाज को हिस्सों में बांटा जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने बहुत सरलता से गांवों और शहरों में पिछड़ों का एक ऐसा वर्ग तैयार कर लिया है जो धर्म के नाम पर आतंक फैलाने को तैयार है. चाहे ये पिछड़े वही हो जो खुद हिंदू वर्ण व्यवस्था के सदियों तक शिकार रहे हैं पर साथ ही जमींदारों और महंतों के लठैत भी रहे हैं और उन्हीं के बल पर राजाओं, उमरावों और मंदिरों ने अपना राज गांवगांव में कायम किया था.

यह वर्ग पहले कांगे्रस का साथ दे रहा था और वहां कुछ न पा कर समाजवादी दलों के पास चला गया था. अब इन के युवा भाजपा में घुस कर भगवा झंडे में अपने उद्धार की आस में मारपीट पर उतारू हो रहे हैं. पूरे देश में धर्म के नाम पर जो दंगे, फसाद व विवाद हो रहे हैं उन में यही वर्ग ज्यादा मुखर है जो खुद राजा से भी ज्यादा राजा का भक्त बनने की कोशिश कर रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के पहले आस जगाई थी कि देश के विकास का, आर्थिक विकास और प्रशासनिक विकास का मुद्दा उस के लिए मुख्य होगा और उन्हीं के सहारे भारत अपना गौरव प्राप्त कर लेगा. नरेंद्र मोदी ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जिस में काम करना आसान होगा, भ्रष्टाचार न होगा और जीवन स्तर सुधरेगा. अब हर रोज देश एक नए विवाद में उलझ रहा है. सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और व्यापमं कांडों ने जहां भ्रष्टाचार की पोल खोल दी वहीं हाल की धार्मिक कट्टरता की घटनाओं ने विकास की आशाओं को धूल में मिला दिया. नरेंद्र मोदी ने जिस मेहनत से दुनिया भर में नए उदय होते भारत की तसवीर खींची थी उस पर कुछ ही सप्ताहों ने तालिबानी रंग पोत दिया और दुनिया, जो पहले ही इसलामी आतंक से भयभीत थी, भारत के प्रति भी आशंकित होने लगी है.

यह कोई नई बात नहीं है. इस देश में यही होता रहा है. 1947 के बाद गांधी और नेहरू के वादे नेहरू की समाजवादी सोच और कांग्रेस के कट्टरवादी हिंदू नेताओं के कारण ढह गए थे. 1977 में आपात स्थिति के बाद जनरोष का लाभ जनता पार्टी उठा न पाई. 1984 में राजीव गांधी ने देश की अखंडता के लिए मिले समर्थन को डुबो दिया और वे बोफोर्स घोटाले का शिकार हो गए. 2014 के नरेंद्र मोदी के सपनों को उन्हीं की पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता पीटपीट कर अधमरा कर रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व नहीं जानता कि जिस धार्मिक कट्टरता के जिन्न को उन्होंने बोतल से निकाला था, उसे बोतल में फिर बंद कैसे करे.

किराए की कोख

कोख को उधार देना अब एक फलताफूलता व्यवसाय बन गया है और सैकड़ों क्लिनिक ऐसी औरतें खोजने लगे हैं जो फर्टिलाइज्ड एग को 9 माह गर्भ में रख कर शिशु पैदा कर सकें. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस पर कानून के अभाव पर चिंता जताई और एक तरह से इशारा किया कि यह कुछ गलत है. यह गलत बिलकुल नहीं है. यह हर औरत का अपना निजी हक है कि वह अपने शरीर का इस्तेमाल कैसे करे. कानून केवल तभी बीच में आ सकता है जब जोरजबरदस्ती हो या धोखाधड़ी. इस के लिए मौजूदा कानून काफी हैं. औरतों को मिलने वाली हर आजादी को सामाजिक सिद्धांतों के खिलाफ माना जाना गलत है और कानून बना कर इंस्पैक्टरों, पुलिस, अदालतों, अनुमतियों, कागजी कार्यवाहियों के जंजाल में फंसाना एकदम मौलिक अधिकार के खिलाफ है. किराए की कोख का इस्तेमाल वे युगल कर रहे हैं जो किसी कारण बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे. इन युगलों को हक है कि वे अपनी संतान पा सकें और जैसे आधुनिक तकनीक हजारों मील दूर बैठी घटना के चित्र सैकंडों में आप तक पहुंचा सकती है वैसे ही अगर चिकित्सा तकनीक सैकड़ों मील दूर बैठी औरत की कोख से बच्चे पैदा करा दे तो हर्ज क्या है!

सरकार जब भी कानून बनाती है उस में सरकारी कारिंदों को अधिकारों पर अधिकार दे देती है मानो वे देवदूत हों और आम आदमी दैत्यों के वंशज. सरकारी कानून अगर 2 आम व्यक्तियों की आपसी सहमति को नियंत्रित करने वाले ही हों तो ठीक है पर सरकार का कानून तो भारी दस्तावेजों का पुलिंदा बनवा देगा और सरोगेट मदरहुड की कीमत 4 गुनी कर देगा और बढ़ी हुई कीमत सिर्फ और सिर्फ सरकारी कारिंदों की जेब में जाएगी, प्रशासनिक खर्च के तौर पर या रिश्वत में. किराए पर कोख देना औरतों का हक है. यह डाक्टर का फर्ज है कि वह एक स्वस्थ औरत को ही इस के लिए तैयार करे. जब डाक्टर युगल से मोटी फीस लेगा तो वह नहीं चाहेगा कि बीमार औरत का चयन किया जाए. यह जिम्मा कि युगल जो अपना फर्टिलाइज्ड एग दे रहा है और सरोगेट मदर ठीक है, उन के अपने विवेक पर छोड़ दें. सरकार का पल्लू हर बात में खींचना गलत है. अदालतों को भी सरकार को हर काम में दखल देने के लिए कहना बंद करना चाहिए. वैसे ही हम पर सरकार बड़ी मेहरबान है और उस की मेहरबानी से आम आदमी कुचला जा रहा है.

एक पटेल के पीछे लाखों पटेल

हार्दिक पटेल भी अरविंद केजरीवाल की राह पर चलते हुए दिखाई पड़ रहे हैं क्योंकि उन के बयानों में विरोधाभास नजर आता है, जो कभी अन्ना आंदोलन के समय अरविंद केजरीवाल के बयानों में देखा जाता था. केजरीवाल भी अन्ना आंदोलन के समय कहते थे कि हम राजनीति में नहीं आएंगे, हम तो केवल जनलोकपाल बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं ताकि देश से भ्रष्टाचार को दूर किया जा सके. आज केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं लेकिन कभी अपनी सरकार बनने के तुरंत बाद जनलोकपाल कानून लाने की बात करने वाले केजरीवाल की सरकार आज भी जनलोकपाल कानून लाने पर विचारविमर्श ही कर रही है. आज हार्दिक पटेल ने भी अखिल भारतीय स्तर पर एक गैरराजनीतिक संगठन ‘पटेल नवनिर्माण सेना’ बना लिया जो देशभर में फैले पाटीदार समाज को संगठित कर के उन के हक की लड़ाई लड़ेगा. हार्दिक पटेल भी केजरीवाल की तरह पहले अपने आंदोलन के माध्यम से अपने संगठन को मजबूत करेंगे. बाद में हो सकता है ‘पटेल नवनिर्माण सेना’ भी एक राजनीतिक संगठन का रूप ले ले. दिल्ली में पत्रकारवार्ता में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने इस विकल्प को भी खुला रखा है कि भविष्य में अपनी मांगों की पूर्ति के लिए वे राजनीति में भी आ सकते हैं.

हार्दिक पटेल राष्ट्रीय स्तर के नेता बनें, इस में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को राजनीति में आने का पूर्ण हक है, जिस की इजाजत सभी को भारत का संविधान देता है. लेकिन हार्दिक पटेल को अगर राष्ट्रीय स्तर का नेता बनना है तो उन्हें अपनी जानकारियों को भी मजबूत करना पड़ेगा. एक तरफ तो वे यह कह रहे हैं कि झारखंड के कुर्मी समुदाय नेहरू के कारण बदहाली का शिकार हैं, जबकि हकीकत यह है कि झारखंड में वर्ष 1932 से ले कर वर्ष 2004 तक झारखंड के कुर्मी समुदाय के लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दरजा प्राप्त था, जिसे वर्ष 2004 में तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल कर दिया गया था.

तत्कालीन सरकार के इस फैसले का झारखंड के कुर्मी समुदाय ने जोरशोर से विरोध किया था. दूसरी तरफ उन्हें नीतीश कुमार और सुदेश महतो जैसे राजनीतिक लोगों का समर्थन लेने या देने में कोई परहेज नहीं है. लेकिन गुर्जर आंदोलन के नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला के राजनीति में आ जाने के कारण वे उन का सहयोग नहीं लेना चाहते हैं. हार्दिक पटेल ने पटेलों को इंसाफ दिलाने के लिए जो कदम उठाया है वह उन के समाज का मामला है. लेकिन अगर उन्हें राजनीति में आना ही है तो खुल कर सामने आएं न कि मुद्दों को तलाश करें क्योंकि उन्होंने भी केजरीवाल की तरह भष्टाचार को दूर करने के नाम पर देशभर के लोगों को इकट्ठा कर के अपनी पार्टी बना ली और हार्दिक भी पटेलों को आरक्षण दिलवाने के नाम पर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ बनाने की ओर अग्रसर हैं. हालांकि यह सब इतना आसान नहीं होगा. मौजूदा स्थिति यह है कि हार्दिक पटेल ने जो पटेलों को जमा कर आरक्षण पर आंदोलन खड़ा किया था उस की धार अब कुंद पड़ गई है. बीते दिनों न तो कोई बड़ी सरगर्मी दिखी और न ही हार्दिक के बगावती तेवर.   

नाबालिग का गर्भपात, कौन करे फैसला?

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर बसा बाराबंकी जिला चर्चा में है. चर्चा की वजह एक नाबालिग लड़की का गर्भपात है. बलात्कार की शिकार 13 साल की इस लड़की की कहानी कानून, समाज और व्यवस्था सब की लाचारी को दिखाती है. कानूनी पेचीदगी में फंसी नाबालिग लड़की प्रसव के बाद जिस बच्चे को जन्म देगी उस के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं. उस का पालनपोषण कैसे होगा? बच्चा नाबालिग लड़की के पास कैसे रह सकता है क्योंकि समाज में कुंआरी मां की स्वीकृति नहीं है. अगर बच्चा अलग रहता है तो क्या यह जायज है? इन सब के बीच एक सवाल यह भी है कि क्या शर्मिंदगी और सैक्स संबंधों की अज्ञानता के चलते ऐसे हालात बनते हैं? एक घटना के सहारे ऐसे व्यावहारिक पक्षों को देखना जरूरी है, जिस से घटना से सबक ले कर कुछ ऐसा सबक लिया जा सकता है जिस से आगे सतर्क रहा जा सके.

13 साल की रीना (बदला हुआ नाम) बाराबंकी जिले की रहने वाली है. उस का परिवार बहुत गरीब है. 17 फरवरी, 2015 को वह भागवत कथा सुनने गांव के बाहर बने मंदिर में गई थी. वहां गांव के एक युवक ने उस से जबरन देह संबंध बनाए. बलात्कार का शिकार हुई रीना को उस ने डरायाधमकाया और हिदायत दी कि घरपरिवार में किसी को कुछ न बताए. रीना ने देखा था कि गांव में जब कभी ऐसी घटना सुनी जाती थी तो लोग लड़की को ही दोष देते थे. ऐसे में उस ने किसी को घटना की जानकारी नहीं दी. जुलाई माह की शुरुआत में रीना के पेट में दर्द होने लगा. तब उस ने घर वालों को पेट दर्द की जानकारी दी. घर वाले उसे सरकारी अस्पताल में ले कर गए तो वहां पता चला कि रीना को 21 सप्ताह और 2 दिन का गर्भ है. तब रीना ने घर वालों को अपने साथ फरवरी में हुए बलात्कार की जानकारी दी. रीना के घर वालों ने पुलिस में शिकायत की. पुलिस ने रीना से बलात्कार करने वाले युवक को जेल भेज दिया.

कानूनी बाधा 

रीना का गर्भ 21 सप्ताह से अधिक का हो चुका था. ऐसे में कानून के हिसाब से उस का गर्भपात नहीं कराया जा सकता था. गर्भपात के लिए देश में बने एमटीपी ऐक्ट यानी मैडिकल टर्मिनेशन औफ प्रैग्नैंसीऐक्ट 1972 बना है. 1975 में यह कानून पूरे देश में लागू भी हो गया. इस में काफी सख्ती दिखाई जा रही है. कई डाक्टरों को जेल तक जाना पड़ा है. तमाम पैथोलौजी इस ऐक्ट का शिकार हो चुकी हैं. इस कानून में कहा गया है कि 12 सप्ताह से कम समय के गर्भ का गर्भपात केवल एक प्रशिक्षित डाक्टर द्वारा किया जा सकता है. 12 सप्ताह से अधिक और 22 सप्ताह से कम समय के गर्भ का गर्भपात करने के लिए कम से कम 2 डाक्टरों का पैनल गर्भपात कर सकता है. अगर गर्भ में पल रहे भू्रण का वजन 500 ग्राम से अधिक है तो गर्भपात की अनुमति नहीं दी जा सकती. 5 माह से अधिक समय के गर्भ का गर्भपात किसी सूरत में नहीं हो सकता.

रीना के मसले में जब उस के गरीब मातापिता हाईकोर्ट में गर्भपात की गुहार लगाने पहुंचे तब तक गर्भ की अवधि बढ़ चुकी थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के पास जब यह मसला पहुंचा तो 2 जजों की बैंच ने इस की सुनवाई की. न्यायमूर्ति सबीहुल हसन और न्यायमूर्ति डी के उपाध्याय की बैंच ने लखनऊ के किंग जौर्ज मैडिकल कालेज की स्त्री एवं प्रसूति विभाग के विभाग प्रमुख को आदेश दिया कि वह अस्पताल की 3 सीनियर डाक्टरों का पैनल बनाए. वह पैनल लड़की के स्वास्थ्य का परीक्षण करे. उस के जीवन के खतरे को देखते हुए गर्भपात का निर्णय ले. किंग जौर्ज मैडिकल कालेज की विभाग प्रमुख डा. विनीता दास ने 3 सदस्यों की समिति का गठन किया. इस में विभाग प्रमुख डा. विनीता दास के अलावा क्वीनमेरी अस्पताल की चिकित्सा प्रमुख डा. एस पी जैसवार और डा. उमा सिंह शामिल थीं.

लड़की की जांच के बाद रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेज दी गई. डाक्टर गर्भपात की राय को ले कर एकमत नहीं हैं. गोपनीय जांच के संबंध में डाक्टरों ने किसी भी तरह की जानकारी बाहर देने से मना कर दिया. 15 सितंबर, 2015 तक के घटनाक्रम मेंकिशोरी के परिजनों के अनुसार डाक्टरों का मानना है कि गर्भपात अब संभव नहीं है. चिकित्सा की विधियों से प्रसव ही कराया जा सकता है. इस में भी किशोरी और बच्चे की जान को खतरा हो सकता है. ऐसे में यही उम्मीद बचती है कि लड़की का प्रसव ही कराया जाए. मामला हाईकोर्ट में होने के कारण डाक्टर और प्रशासन हर तरह की सावधानी बरत रहे हैं. लड़की का परिवार खुद भी समाज के सवालों से दूर समय के बीतने का इंतजार कर रहा है.

जन्म के बाद की मुश्किलें

बाराबंकी की इस लड़की की यह अकेली कहानी नहीं है. पूरे देश में ऐसी घटनाएं समयसमय पर सामने आती हैं. विचार करने की जरूरत यह है कि क्या कोई ऐसा तरीका हो सकता है जिस में ऐसे मामलों में कानून कुछ नरम रुख अख्तियार करने पर विचार करे? ज्यादातर ऐसी परेशानियां बेहद गरीब तबके के लोगों के सामने आती हैं. बाराबंकी में रहने वाली लड़की का परिवार बेहद गरीब है. उस के लिए पुलिस, अदालत और अस्पताल के चक्कर काटना बहुत मुश्किल काम होता है. वह मेहनतमजदूरी छोड़ कर ऐसा काम करता है जिस का प्रभाव उस की रोजीरोटी पर पड़ता है. गरीब परिवारों की लड़कियां कम पढ़ीलिखी होती हैं. उन को सैक्स संबंधों की बात करने में बेहद हिचक होती है. अगर बाराबंकी की इस लड़की ने बलात्कार का शिकार होने पर पूरी बात घर में बताई होती तो ऐसे हालात नहीं बनते.

दरअसल, हमारा समाज औरतों और लड़कियों के प्रति बहुत कट्टरवादी सोच रखता है. लड़की शादी से पहले कौमार्य नहीं खो सकती. वह किसी परपुरुष से अकेले बात नहीं कर सकती. शादी से पहले अभी भी लड़की को सागसब्जी की तरह देखा जाता है. कुंआरी मां के नाम को भी सुनना समाज के बड़े तबके को गवारा नहीं है. पुरुष खुद कितने भी संबंध बना ले पर औरत को ले कर वह बहुत संकीर्ण विचारधारा रखता है. विधवा और तलाकशुदा औरतों को ले कर उस की सोच में बहुत बदलाव नहीं हुआ है. औरत को लाख तरक्की के बाद भी बराबरी का हक समाज ने नहीं दिया है. पुरुष प्रधान समाज की अवधारणा को खत्म नहीं किया जा सका है. महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उन पर लांछन लगाने के आरोप कम नहीं हुए हैं. जरूरत इस बात की है कि लोग कानून को धर्मादेशों की तरह न लें. इस के तर्क और व्यवहार को भी समझने की कोशिश करें.

बुनियादी सवालों पर ध्यान दें

खासकर जब मसला नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार और गर्भधारण का हो तो जरूर सावधानी बरतनी चाहिए. बेहतर होगा कि इस तरह के मसलों के लिए कानून में कुछ सुधार हो. लड़की के मातापिता और डाक्टरों को यह अधिकार हो कि वे अपनी सूझबूझ से कोई फैसला ले सकें. आज भी देश में लड़की के हर आरोप पर परिवार को ही सामने आना पड़ता है. बिना परिवार के लड़की की जिंदगी नर्क समान होती है. कानून के अधिकार को ले कर देश में तमाम ऐसे शैल्टर होम्स हैं जहां शोषित और परेशान लड़कियों को रखा जाता है. इन शैल्टर होम्स की हकीकत पूरे देश से छिपी नहीं है. रहना, खाना, सेहत जैसे बुनियादी मुद्दों तक की परवा शैल्टर होम्स में नहीं की जाती. शैल्टर होम्स एक तरह के कैदखाने बन कर रह गए हैं. ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं जहां शैल्टर होम्स ही शोषण का जरिया बन गए. कानून को बुनियादी ढांचों पर भी ध्यान देना चाहिए. नाबालिग लड़की के मसले में गर्भपात का अधिकार डाक्टर और लड़की के मातापिता पर छोड़ देना चाहिए. कानून को धर्म की तरह जिंदगी के हर पहलू में घुसने की आदत को छोड़ना चाहिए. कानून के सहारे ही पंडों की तरह से अफसर और थानेदार आम आदमी के हक में दखल देते हैं. ऐसे फैसले जनता के हित के नहीं होते.  इन से जनता परेशान ही होती है. नाबालिग लड़की के बच्चा होने के बाद उस को शैल्टर होम में ही रखा जा सकता है. समाज कुंआरी मां को स्वीकार नहीं करेगा. इस लड़की का दूसरा विवाह तभी संभव है जब उसे पहले के जीवनके बारे में पता न चले. खुद लड़की आत्मनिर्भर नहीं है. उसे अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए समाज और कानून को मिल कर पहल करनी चाहिए. सरकार इस में अहम भूमिका अदा कर सकती है. कई ऐसे मसले मुंह बाए खडे़ हैं. अगर बलात्कार के बाद लड़की ने कोई इमरजैंसी गर्भनिरोधक गोली समय पर ले ली होती तो बात वहीं पर खत्म हो जाती. 

चीन व भारत की प्रगति

चीन की आर्थिक प्रगति की रफ्तार अब थमने लगी है. 10 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि के बाद चीन अब 5 से 6 प्रतिशत की दर पर आ गया है और इस बात से भारतीय नीतिनिर्धारक खुश हैं क्योंकि भारत की आर्थिक प्रगति की दर ठीकठाक बनी हुई है. चीन की धीमी होती गति पर ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि चीन उस स्तर पर पहुंचने लगा है जिस पर प्रतिशत में कम वृद्धि होने पर भी डौलरों में वृद्धि काफी ज्यादा है और भारत उस से पिछड़ता जा रहा है. चीन में जहां 95 प्रतिशत लोग पढ़लिख सकते हैं, भारत में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत ही है जो बढ़ाचढ़ा कर दिया जाता है. भारत के 5 साल से कम उम्र के 43.5 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जबकि चीन के कुल 3.4 प्रतिशत कुपोषित हैं. भारत की प्रति व्यक्ति सालाना आय 3 हजार डौलर आंकी जा रही है जबकि चीन की 13 हजार डौलर है. भारत के गरीबों की संख्या 30 से 50 प्रतिशत आंकी जा रही है जबकि चीन में यह मात्र 6.1 प्रतिशत है.

चीन सरकार का बजट भारत सरकार के बजट से 10 गुना ज्यादा है. भारत का निर्यात चीन के मुकाबले 10वां ही है. चीन की प्रगति धीमी हो जाए तो भी वह रुपयों या डौलरों में भारत की वृद्धि से 2 से 3 गुना ज्यादा रहेगी और दोनों देशों के आर्थिक स्तर में अंतर बढ़ता जाएगा. चीन की प्रति व्यक्ति उत्पादकता भारत की प्रति व्यक्ति उत्पादकता से 3 गुना ज्यादा होने के कारण भारत में गरीबी रहेगी जबकि चीन का गरीब भी ठाट से रहेगा. हमारी कमजोरी है कि हम अपने गाल ज्यादा बजाते हैं. अपने को जगद्गुरु साबित करने के चक्कर में, अभी हाल तक हम से गरीब रहे चीन से हम बुरी तरह पिछड़ रहे हैं. चीन ने राजनीतिक सुधार चाहे न किए हों पर सामाजिक व प्रशासनिक सुधार जम कर किए हैं. साइकिलों वाला देश मोटरकारों वाला बन गया है और हमारे गरीबों से साइकिलें भी छिन गई हैं. चीन ही नहीं, श्रीलंका, कंबोडिया, वियतनाम आदि तेजी से आगे बढ़ रहे हैं जो हाल तक आंतरिक युद्धों के शिकार थे. हम अपने छोटे विवादों में फंसे हैं और आधी प्रतिशत वृद्धि पर झूम रहे हैं.

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