Download App
Home » पृष्ठ 3522

भारत भूमि युगे युगे

ब्रैंड एंबैसेडर

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पास कितनी संपत्ति है, इस का ठीकठाक आंकड़ा आने में वक्त लगेगा पर बीती 26 सितंबर को उन की बेटी के विवाह के दिन सुबहसुबह सीबीआई ने उन के घर सहित 11 ठिकानों पर छापामार कार्यवाही की तो यह भी पता चला कि उन्होंने 6.1 करोड़ रुपए जीवन बीमा पौलिसियों में लगा रखे हैं. यह राजनीतिक द्वेष हो या वाकई वीरभद्र ने गोलमाल किया है, इस का निबटारा सीबीआई दूसरे सैकड़ों मामलों की तरह सालों तक करती रहेगी पर इस से उजागर यह हुआ कि पैसा कालासफेद, नीलापीला जैसा भी हो, जीवन बीमा पौलिसियों में जरूर लगाया जाता है और लगाने वाला जागरूक होता है. वह चाहता है कि देश का पैसा देश में ही रहे. ऐसे लोगों को तो जीवन बीमा निगम को पुरस्कृत करना चाहिए जो करोड़ों की पौलिसियां लेते हैं. इस से उस का निशुल्क प्रचार भी होगा. दूसरी अहम बात यह है कि कोई भी कानून या अदालत निवेश किए पैसे को नाजायज मान कर पौलिसी को रद्द नहीं कर सकती.

दामादवाद

यूपी, बिहार की राजनीति में जिन लोहियावादी नेताओं ने दबदबा बना रखा है. शरद यादव उन में से एक हैं जिन के उत्थान के बारे में लोग कम ही जानते हैं. राजनीति की प्रयोगशाला में जयप्रकाश नारायण ने उन पर पहला प्रयोग किया था जब मध्य प्रदेश की जबलपुर सीट से उन्हें संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी बनाया गया था. तब युवा शरद यादव कांग्रेस को पछाड़ कर जीते तो पीछे मुड़ कर देखने की नौबत नहीं आई. जनता पार्टी के टुकड़े हजार हुए, कुछ इधर गिरे कुछ उधर गिरे की तर्ज पर शरद यादव कब मध्य प्रदेश छोड़ कर बिहार के जा हुए, किसी को पता ही नहीं चला. अब बूढ़े हो चले शरद यादव ने अपने दामाद राजकमल राव को राजनीतिक उत्तराधिकारी बना दिया है. राजकमल बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू के प्रमुख प्रचारक हैं. उन की इकलौती योग्यता शरद यादव का दामाद होना है. नतीजे कुछ भी आएं लेकिन बिहार का यह चुनाव दामादों की वजह से भी याद किया जाएगा. रामविलास पासवान अपने दामाद की नाराजगी से परेशान हैं तो शरद यादव अपने दामाद की ताजपोशी से खुश हैं.

राग भावुक

सार्वजनिक रूप से भावुकता व्यक्त कर खुद को महान दिखाने का सिलसिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कायम रखा है. 27 सितंबर को वे कैलिफोर्निया में गला भर जाने की हद तक भावुक हुए तो मानने वालों ने मान लिया कि भावुकता से बड़ी कोई तकनीक नहीं पर कुछ लोगों ने यह भी सोचा कि अब इस हीनता से मोदी को उबर जाना चाहिए. गरीबी और अभावों का राग अलापने के लिए अपने देश में भी स्टेज और संभावनाएं हैं. भावुकता की हदें नहीं होतीं. आदमी चाहे तो बेवजह भी भावुक हो कर सहानुभूति बटोर सकता है, फिर नरेंद्र्र मोदी तो काफी कुछ सौगातें बटोर लाए हैं. उन की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपए जनता का फुंकता है, इस पर लोग एतराज भी जताने लगे हैं कि विदेश जा कर अपनी जीवनी और संघर्षगाथा सुनाना बंद करो.

आडवाणी की मनोदशा

बिहार विधानसभा चुनाव कुरुक्षेत्र नहीं है, यह साबित करने को इतना ही काफी है कि भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची में लालकृष्ण आडवाणी शामिल नहीं हैं. आजकल आडवाणी हैं कहां, हर किसी को नहीं मालूम. उन की हालत उस उपेक्षित बुजुर्ग जैसी कर दी गई है जो घर के कोने में पड़ा अपनी खांसी को यथासंभव काबू करने की कोशिश करता रहता है. आडवाणी क्यों इस दृश्य में नहीं हैं, यह सवाल अब धार खोता जा रहा है. लेकिन इस का जवाब यह है कि नरेंद्र मोदी खतरों और जोखिमों को खुद से दूर रखते हैं और वे बूढ़े भाजपाइयों की अनुपयोगिता सिद्ध कर रहे हैं. रही बात आडवाणी की मनोदशा की, तो तय है कि उसे वे आज नहीं तो कल कभी भी व्यक्त करेंगे ही.    

फतवों में फंसा मुसलिम समाज

ऐसे दौर में जब बच्चे मांबाप की बात नहीं मानते, छात्र अध्यापकों की बात नहीं सुनते, कर्मचारी अपने मालिकों की बात एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देते हैं, उस दौर में भी धर्मभीरु मुसलिम समाज मध्यकालीन सोच वाले मुल्लाओं के फतवों को मान कर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को तो मुश्किल में डालते ही हैं, ऊपर से हंसी का पात्र भी बनते हैं. लोग कहते हैं कि जब दुनिया रौकेट की रफ्तार से सफर कर रही है, उस दौर में मुसलिम समाज फतवों में फंस कर रेंग रहा है. पिछले दिनों ऐसा ही कुछ देखने को तब मिला जब हिंदुस्तान के मुसलिमों के सब से बड़े मदरसे दारुल उलूम, देवबंद की तरफ से दाढ़ी व शेविंग के संदर्भ में एक फतवा आया. फतवे तो हमेशा आते रहे हैं मगर इन दिनों अगर वे देशव्यापी बहस का मुद्दा बन जाते हैं तो इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया महज कुछ घंटों में उन्हें देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचा देता है. इस फतवे के चलते भी सोशल मीडिया व अन्य मंचों पर जबरदस्त बहस छिड़ गई.

हालाकि फतवा शरीअत में ऐसी राय को कहते हैं जो प्रश्नकर्ता के सवाल पर मुफ्ती ए इसलाम अपने ज्ञान की रोशनी में देते हैं. इसे मानना या न मानना आवश्यक नहीं होता क्योंकि यह काजी न्यायाधीश का फैसला नहीं होता है. लेकिन आम मुसलिम इसे धार्मिक आदेश के रूप में ही देखता और समझता है. देवबंद के महल्ला बाड़ा जियाउल हक निवासी मुहम्मद इरशाद व मुहम्मद फुरकान ने अपने फ्रैंड्स हेयर कटिंग सैलून की तरफ से यह फतवा मांगा था कि दाढ़ी मूंडना व शेव बनाना इसलाम में हलाल यानी वैध है? उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या इस से की गई कमाई हलाल है? इस पर दारुल उलूम के मुफ्ती वकार अली, मुफ्ती जैनुल कासमी और मुफ्ती फखरुल इसलाम ने फतवा दिया कि इसलाम में दाढ़ी मुंडवाना व शेविंग कराना हराम है. यही नहीं, उन के मुताबिक इस से जो आमदनी होती है वह भी हराम है. फतवे के अनुसार, शेविंग चाहे मुसलिम की की जाए या हिंदू की, वह गैरइसलामी है. इस शेविंग से होने वाली आमदनी भी हराम है. हालांकि मुहम्मद इरशाद व मुहम्मद फुरकान ने तो इस फतवे को स्वीकार करते हुए इसे फ्लैक्स बोर्ड में लिखवा कर अपने सैलून पर लगा दिया, साथ ही उन्होंने सार्वजनिक घोषणा भी कर दी कि आइंदा से वे शेविंग नहीं करेंगे, सिर्फ खत व बाल ही बनाएंगे, लेकिन नाई के पेशे से जुड़े अन्य लोगों ने इस फतवे पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की है.

मजाक बनता फतवा

इन लोगों का कहना है कि यह उन की रोजी छीनने की एक साजिश है. फतवे के खिलाफ दारुल उलूम के मुफ्तियों को नोटिस देने का ऐलान भी कुछ नाइयों द्वारा किया गया है, खासकर मेरठ के नाइयों द्वारा. सवाल है कि यह फतवा इतनी बहस व विवाद का विषय क्यों बना हुआ है? दरअसल, इस के कई कारण हैं. सब से पहली बात तो यह है कि मुसलिम का एक बड़ा वर्ग फतवा देने के ही खिलाफ है. उस का कहना है कि बेतुके और बेसिरपैर के फतवे दिए जाते हैं. इन फतवों से किसी सामाजिक समस्या का समाधान तो होता नहीं उलटे परेशानियां खड़ी हो जाती हैं. यही नहीं, इन से जमानेभर में मुसलिमों का मजाक बनता है. जहां तक दाढ़ी व शेविंग की बात है तो इन दोनों का ही कोई धार्मिक आदेश कुरआन में नहीं है. यह व्यक्ति की अपनी मरजी की बात है कि वह अपने चेहरे पर दाढ़ी रखना चाहता है या शेविंग कराना चाहता है. दाढ़ी रख कर वह ज्यादा बड़ा मुसलिम नहीं हो जाता और शेविंग कर के छोटा मुसलिम नहीं हो जाता.

इसलिए दारुल उलूम का फतवा ठीक नहीं है, क्योंकि कुरआन में शेविंग को हराम घोषित नहीं किया गया है. इंसानी आजादी, इसलाम की बुनियाद है. इस की तरफ से किसी इंसान को अधिकार हासिल नहीं कि किसी दूसरे इंसान पर कोई ऐसी पाबंदी लगाए जिस से उस की आजादी में बाधा आती हो. हां, यह सही है कि इंसान की सामाजिक जिंदगी की कुछ पाबंदियों को लागू करना आवश्यक होता है, मसलन, यह पाबंदी कि सड़क पर बाईं तरफ चलना चाहिए, सामाजिक आवश्यकता है. इस किस्म की पाबंदियां सरकार लोकतांत्रिक तरीकों से लागू करती है. मुसलिम समाज में मुफ्ती भी हिंदू समाज के पंडों की तरह धर्म को तर्क के बजाय अंधविश्वास और नासमझी की जंजीर बनाने में तुले रहते हैं. दाढ़ी से संबंधित हाल में जो फतवा आया वह इस तरह का कोई पहला या आखिरी हास्यास्पद फतवा नहीं है. एक से बढ़ कर एक ध्यानखींचू और मुसलमानों की खिल्ली उड़ाने वाले फतवे समयसमय पर आते रहे हैं.

इसीलिए कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था कि फतवों की कोई संवैधानिक वैधता नहीं है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला चर्चित इमराना कांड की पृष्ठभूमि में देना पड़ा था. सिर्फ हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हो रहा बल्कि पूरी दुनिया में बेसिरपैर के फतवे जबतब आते रहते हैं और पूरी दुनिया में मुसलमानों का मजाक उड़ाते रहते हैं. यहां ऐसे सभी फतवों का उल्लेख करना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ एक को दोहराना प्रासंगिक होगा. ईरान के अयातुल्लाह खुमैनी ने ‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुश्दी के खिलाफ जो मौत का फतवा दिया था और बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ जो बंगलादेश व भारत में मौत के फतवे जारी किए गए, जिन की रोशनी में एक भारतीय मुसलिम संगठन ने तसलीमा का सिर कलम करने के लिए 5 लाख रुपए का इनाम भी घोषित किया, उन के बारे में सभी लोग जानते हैं. इसी तरह फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी के खिलाफ भी कई फतवे जारी किए जा चुके हैं कि उन्होंने जनता के समक्ष नेल्सन मंडेला का चुंबन लिया और फिर ‘पार’ फिल्म में सूअरों के साथ अभिनय किया.

फतवे का असर नहीं

ध्यान रहे कि मुसलिम समाज में गैर व्यक्ति को चूमना और सूअर का मांस खाना प्रतिबंधित है. इसलिए शबाना आजमी के खिलाफ फतवे जारी हुए कि वह शुद्धीकरण कर के फिर अपने शिया धर्म में शामिल हों. इसी प्रकार अभिनेता सलमान खान को भी फतवे के जरिए मुसलिम समाज से निष्कासित किया गया कि उन्होंने अपने घर पर गणेश पूजा का आयोजन किया व उस में सम्मिलित हुए. विख्यात टैनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ भी स्कर्ट पहन कर खेलने को ले कर फतवा जारी किया गया था कि वे जिस्म को ढकने के शरीअत के आदेश का पालन नहीं कर रही हैं.

हालांकि इन बड़ेबड़े नामों के खिलाफ जो फतवे जारी किए गए उन का इन के ऊपर कोई असर नहीं हुआ, लेकिन समाज के जो कमजोर तबके के खिलाफ फतवे जारी होते हैं, व्यक्तिगत व सामान्य तौर पर, उन का परिणाम अकसर दुखद या चिंताजनक निकलता है. मसलन, इमराना कांड की शिकार गुडि़या के मामले को ही लें. कारगिल की जंग में भारतीय फौजी आरिफ को पाकिस्तानी सेना ने कैद कर लिया था. इधर, भारतीय सेना को उस के बारे में कोई खबर नहीं थी. इसलिए पहले तो उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया और फिर मृत. इन्हीं खबरों की रोशनी में उस की पत्नी गुडि़या ने मुंडाली गांव (जिला मेरठ) में 4 वर्ष तक इंतजार किया, लेकिन जब आरिफ की कोई खबर न मिली तो गुडि़या के मातापिता ने उस की शादी पटौदी गांव के तौफीक से कर दी. जब गुडि़या तौफीक से 8 माह की गर्भवती थी तो आरिफ की वापसी हो गई. मुल्लाओं ने फतवा दिया कि दूसरे निकाह के लिए गुडि़या को 120 वर्ष तक इंतजार करना चाहिए था, जो उस ने नहीं किया, इसलिए तौफीक से उस का विवाह अवैध है और उसे वापस आरिफ के पास लौटना होगा. लेकिन बच्चा जायज होगा व तौफीक का होगा. इस अजीबोगरीब फतवे से जहां तौफीक का घर बरबाद हुआ वहीं आरिफ के पास फिर लौटने के कारण गुडि़या पर इतना गहरा सदमा छाया कि वह अपने बच्चे को जन्म देने के कुछ दिन बाद ही दुनिया से चल बसी. और भी तमाम फतवे मुसलिमों, विशेषकर आम मुसलमानों को गहरे तक प्रभावित करते हैं. मसलन, महिलाओं का मसजिद में नमाज पढ़ने के खिलाफ फतवा, महिलाओं का नौकरी करने के खिलाफ फतवा, सहशिक्षा के खिलाफ फतवा, कृत्रिम गर्भधारण के खिलाफ फतवा, चुनाव में बेपरदा महिलाओं की हिस्सेदारी के खिलाफ फतवा, योग व परदे के खिलाफ फतवा, विभिन्न निवेश व बीमा योजनाओं में शामिल होने के खिलाफ फतवा आदि.

हालांकि फतवा बनाम नारीवाद पर अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय की जूही गुप्ता का प्रकाशित शोध मौजूद है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा ठोस डाटा उपलब्ध नहीं है जिस के आधार पर यह बताया जा सके कि फतवों से कितने प्रतिशत मुसलिम प्रभावित होते हैं, किस सामाजिक व आर्थिक वर्ग के और किस लिंग के लोगों पर इस का बुरा प्रभाव पड़ता है. इस के बावजूद, अकसर फतवों में इतना दम अवश्य होता है कि वे विवाद और मीडिया की सुर्खियों का हिस्सा बन कर कम से कम कमजोर मुसलिम समुदाय को हिला कर रख देते हैं.

पाठकों की समस्याएं

मैं 41 वर्षीय महिला हूं. मेरा वजन और लंबाई सामान्य है. पर मेरे स्तनों का आकार बहुत छोटा है जिस के कारण मेरा फिगर परफैक्ट नहीं दिखता और मैं कोई भी ड्रैस पहनती हूं तो वह मुझ पर फबती नहीं. मैं ऐसा क्या करूं जिस से मेरे स्तनों को सही आकार मिले और मुझ में आत्मविश्वास जगे?

स्तन का छोटा या बड़ा होना किसी भी महिला के जीन्स यानी आनुवंशिकता पर निर्भर करता है. इसी वजह से किसी के स्तनों का आकार छोटा तो किसी का बड़ा होता है. इस के अलावा छोटे स्तनों का एक अन्य कारण एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी व टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का अधिक उत्पादन होना होता है. स्तनों के सही आकार के लिए हार्मोंस बैलेंस करना जरूरी है. एस्ट्रोजन हार्मोन बे्रस्ट यानी स्तनों के ऊतकों के विकास में मदद करता है. कई बार वजन के घटनेबढ़ने से भी स्तनों के आकार में अंतर आता है. स्तनों के सामान्य आकार के लिए बैलेंस्ड डाइट लें. इस के अतिरिक्त स्तनों का साइज बदलने का एक अन्य तरीका प्लास्टिक सर्जरी भी है. हालांकि यह सर्जरी अत्यंत महंगी होने के साथसाथ इस के साइड इफैक्ट भी हैं. बे्रस्ट को खूबसूरत व सुडौल दिखाने के लिए आप चाहें तो पैडेड ब्रा भी पहन सकती हैं.

*

मैं 24 वर्षीय युवती हूं. मैं यह जानना चाहती हूं कि अगर मैं ने विवाह से पूर्व किसी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए हैं तो क्या विवाह के बाद मेरे पति को पता चल जाएगा कि मेरा विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध था?

विवाह से पूर्व किसी भी लड़की के शारीरिक संबंधों को जानने का एकमात्र तरीका यह माना जाता है कि लड़की को सुहागरात के दिन ब्लीडिंग होगी जबकि फैक्ट्स कहते हैं कि सिर्फ 42 फीसदी महिलाओं को पहले इंटरकोर्स के दौरान ब्लीडिंग होती है. इस का अर्थ यह है कि हो सकता है कि किसी लड़की को वर्जिन होने के बाद भी ब्लीडिंग न हो. साथ ही इस से यह भी साबित होता है कि फर्स्ट इंटरकोर्स के दौरान ब्लीडिंग न होना वर्जिनिटी की पहचान नहीं है. कई बार विवाह से पूर्व साइकिलिंग, खेलने के दौरान भी हाइमन टूट सकता है, इसलिए जब तक आप स्वयं अपने पति को अपने शारीरिक संबंध के बारे में नहीं बताएंगी, उन्हें कुछ पता नहीं चलेगा. आजकल हाइमनोप्लास्टी से आर्टिफिशियल हाइमन भी बनाई जा सकती है. इस के अलावा कुछ महिलाओं में जन्म से हाइमन नहीं होती. इसलिए बिना किसी टैंशन के वैवाहिक संबंधों की शुरुआत कीजिए.

*

मेरी समस्या यह है कि मेरी मां घर की आर्थिक समस्याओं के कारण बहुत परेशान रहती हैं. वे हंसना, खुश होना तक भूल गई हैं. मैं अपनी मां को इस हालत में नहीं देख सकता. मैं ऐसा क्या करूं जिस से अपनी मां की मदद कर सकूं और उन्हें खुश रख सकूं? सलाह दीजिए.

आप ने न तो यह बताया कि आप की उम्र क्या है और न ही यह बताया कि आप के पिताजी क्या करते हैं. क्या वे घर की आर्थिक समस्याओं को सुलझाने में आप की मदद नहीं करते? और अगर नहीं करते तो ऐसा वे किस कारण से करते हैं? अगर आप वयस्क हैं और सक्षम हैं तो अपनी मां की जिम्मेदारी में हाथ बंटाइए. जब समस्याएं दूर होंगी तो वे खुश भी रहेंगी और हंसेंगी भी.

*

मैं 48 वर्षीय पुरुष हूं. मैं हस्तमैथुन की आदत से पीडि़त हूं. मैं जानना चाहता हूं कि इस आदत से कैसे छुटकारा पा सकता हूं?

हस्तमैथुन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. हस्तमैथुन की आदत से छुटकारा पाने की कोई दवा या इलाज नहीं होता. संकल्प व दृढ़ इच्छाशक्ति द्वारा ही इस से छुटकारा पाया जा सकता है. आप सैक्स को रहस्य व गोपनीय मानने के बजाय इस के प्रति सकारात्मक सोच रखें व खुद को अपराधी व दोषी न मानें. स्वयं को सृजनात्मक कार्यों में व्यस्त करें व कामुक विचारों से बचें. इस के बाद भी अगर हस्तमैथुन की आदत नहीं छूटती है तो मनोचिकित्सक से मिलें.

*

मैं 32 वर्षीय विवाहित महिला हूं. मेरी समस्या यह है कि मेरे पीरियड्स अनियमित रहते हैं. कभीकभी तो 2 माह में 1 बार होता है. मैं जानना चाहती हूं कि पीरियड मिस होने का क्या कारण हो सकता है? पीरियड्स की अनियमितता के चलते मैं शंका में रहती हूं कि कहीं गर्भवती तो नहीं हो गई. प्रेग्नैंसी के अलावा पीरियड्स मिस होने के और क्या कारण हो सकते हैं?

मासिक धर्म की अवधि व रक्तस्राव हर महिला में अलगअलग होता है. कई बार तनाव, अत्यधिक डाइटिंग, अत्यधिक व्यायाम, गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन, ओवरी का सही तरीके से काम न करने व थायराइड के कारण भी मासिक धर्म अनियमित हो जाता है. आप के मामले में समस्या का क्या कारण हो सकता है, यह आप किसी गाइनीकोलौजिस्ट से मिल कर पता करें.

*

मैं 26 वर्षीय युवती हूं, नौकरी करती हूं. मुझे एक लड़का पसंद है. वह भी मुझे पसंद करता है और हम दोनों शादी करना चाहते हैं. समस्या यह है कि मेरे घर वाले इस रिश्ते के लिए राजी नहीं हैं क्योंकि लड़का हम से निम्न जाति का है. उन का कहना है कि इस रिश्ते से उन की समाज में इज्जत कम हो जाएगी.

उच्च व निम्न जाति की बात गुजरे जमाने की बात हो गई है. आप अपने घर वालों को समझाइए कि आप उस लड़के को पसंद करती हैं और उस के साथ खुश रहेंगी. उन से पूछिए कि उन के लिए उन की सामाजिक इज्जत ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या बेटी की खुशी. और वैसे भी इस बात की क्या गारंटी है कि जिस उच्च जाति में वे आप का रिश्ता तय करेंगे वहां आप खुश ही रहेंगी.  

मेरे पापा

गरमी की छुट्टियों में हम दादादादी के पास गांव गए थे. वहां पहुंच कर हम सभी खूब मजे करने लगे. अपने दूर तक फैले खेतों में घूमने जाते. हम दोनों बहनें रेत के टीलों पर मिट्टी के बड़ेबड़े घर बनाने की होड़ लगातीं. हमारी छुट्टियां खत्म होने वाली थीं. मम्मीपापा गांव से वापस शहर लौटने की तैयारी करने लगे थे. हम बच्चे भी अपना ज्यादा से ज्यादा समय गांव की बोली बोलते हुए दादादादी के साथ बिताने लगे थे. एक शाम अचानक पापा के सीने में दर्द की शिकायत हुई. थोड़ा आराम करने पर उन का दर्द ठीक हो गया. सुबह तड़के घर की औरतें विलाप करने लगीं. मैं हड़बड़ा कर उठी. पापा नींद में ही चल बसे, यह बाद में डाक्टर ने बताया कि उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था. जीवन की आपाधापी में कभीकभी मुझे पापा के दोस्त मिल जाते हैं. वे आज भी पापा के गुण गाते हैं. पापा को गए हुए बरसों बीत गए हैं पर ऐसा लगता है कि वे यहीं हैं, हम सब के बीच, हमारे साथ. जब कभी उदास होती हूं तो मुझे लगता है जैसे उन्होंने मेरे सिर पर अपना प्यारभरा हाथ रख कर कहा, ‘चिंता मत करो, मैं हूं न तुम्हारे साथ.’

ज्योति बरडि़या, बेंगलुरु (कर्ना.)

*

मेरे पापा रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी हैं. मैं 12वीं कक्षा में पढ़ती थी. हमारे स्कूल के भौतिकी के व्याख्याता हमारी कालोनी में ही रहते थे. प्रशासनिक कार्यों में सलाह व मदद के लिए कभीकभी मैं ने उन्हें अपने घर आते देखा था. मैं अल्हड़, नादान बालिका, पापा की दोस्ती के मद्देनजर प्रैक्टिकल में सब से ज्यादा अंक की चाह में पापा से यह जिद कर बैठी कि पापा, हमारे सर आप से मदद लेते रहते हैं, आप उन के कितने काम कराते हैं. आप उन से मुझे प्रैक्टिकल में पूरे अंक देने के लिए कहिए न. पापा शांत भाव से मुझे देखते रहे, फिर समझाते हुए बोले, ‘तुम मेधावी छात्रा हो. मेहनत करने से घबराती नहीं, फिर सफलता के लिए सिफारिश जैसे आसान और आधारहीन तरीके को क्यों चुन रही हो. मेरे कहने पर सर तुम्हें पूरे नंबर जरूर दे देंगे लेकिन इस एकदो नंबर की बढ़त से तुम्हारी पूरी मेहनत कलंकित हो कर सिफारिशी कहलाएगी. आवश्यकता हो तो ट्यूशन पढ़ो, थोड़ी और मेहनत करो पर इस तरह से अंक पाने की इच्छा त्याग दो.’ पापा का विश्वास साकार हुआ. मैं क्लास में प्रथम आई. पापा की नेक राह पर चलने की सलाह हमारी हर मुश्किल आसान कर देती है.

सुनीता पाठक, ग्वालियर, (म.प्र.)

उम्रभर रहती खुमारी

कल वो गए आज हमारी बारी है

ये आनाजाना तो जमाने की फनकारी है

दुआओं के भरोसे कौन जीता है

मेहनतकशों ने खुद जिंदगी संवारी है

पहले प्यार का नशा अजीब होता है

उम्रभर रहती उस की खुमारी है

मौत का डर किसे दिखाते हो यारो

मौत से अपनी बचपन से यारी है

साहिल के पास आ कर भी कश्ती डूब गई

डूबने वालों की तकदीर न्यारी है

मुश्किल है अब तो देव का बचना

इश्क की तलवार दोधारी है.

       – डा. तेजपाल सोढ़ी देव

बच्चों के मुख से

मेरी बेटी तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. हमारी कालोनी के कुछ बच्चे कौन्वैंट स्कूल में और कुछ डीएवी स्कूल में पढ़ते थे. मेरी बेटी डीएवी स्कूल में पढ़ती थी. शाम को सब बच्चे साथसाथ खेला करते थे. खेल के दौरान सब बच्चे अपनेअपने स्कूल की बातें शेयर किया करते थे. एक दिन मेरी बेटी रोतेरोते घर आई और कहने लगी, ‘‘ममा, आप को मालूम है आज ईशा मौसी का बर्थडे है और मौसी ने हमें नहीं बुलाया.’’ मैं ने उस से कहा, ‘‘नहीं बेटा, आज नहीं है ईशा मौसी का बर्थडे. तुम्हें किस ने बताया?’’ तो वह रोतेरोते बोली, ‘‘रीना ने बताया. उस के स्कूल के सब बच्चे आज बर्थडे में चर्च गए थे.’’ तब माजरा समझ आया क्योंकि उस दिन 25 दिसंबर था, ईसा मसीह का बर्थडे जिसे मेरी बेटी अपनी ईशा मौसी का बर्थडे, समझ बैठी थी. उस की मासूमियत पर मैं मन ही मन मुसकरा उठी.

उषा शर्मा, पौड़ी गढ़वाल (उ.खं.)

*

मेरे ससुराल में शादी थी. मैं, अपनी बेटी व अपने देवर की बेटी को डांस के स्टैप्स समझा रही थी. मैं ने कृति (देवर की बेटी) को समझाया कि तुम गणेश बनी हो, तुम्हारे हाथों की मुद्रा इस तरह से रहेगी. कृति थोड़ी देर तक अभ्यास करती रही, फिर हाथों का पोज देख कर पूछने लगी, ‘‘ताईजी, मेरा ‘मुरदा’ तो ऐसे ही रहेगा न?’’दरअसल वह मुद्रा बोलना चाहती थी पर मुरदा बोल गई. वहां उपस्थित सभी लोगों की हंसी छूट गई.

जया मालू, कोलकाता (प.बं.)

*

21 मार्च को सूर्यग्रहण हुआ. उस को ले कर फ्रांस के एक स्कूल में पढ़ने वाला मेरा 4 वर्षीय पोता रुद्र बहुत रोमांचित था. एक दिन स्कूल से आ कर उस ने अपने पापा अर्थात मेरे बेटे से कहा, ‘‘धरती पर ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा धरती की रोशनी को रोक देता है.’’ मेरे बेटे सौरभ ने उस को समझाया, ‘‘बेटा रुद्र, धरती ग्रहण कुछ नहीं होता है, क्योंकि धरती का प्रकाश नहीं होता है. प्रकाश सिर्फ सूर्य का होता है.’’ इस पर रुद्र ने अपने पापा से कहा, ‘‘धरती की भी रोशनी होती है. स्ट्रीट लाइट अर्थात खंभों पर जलने वाली रोशनी.’’ अब मेरे बेटे की हालत देखने लायक थी.

आशा कौशिक, ईस्ट औफ कैलाश (न.दि.)

खत जो तुम ने…

खत जो तुम ने लिखा नहीं होता

जख्म दिल का हरा नहीं होता

अपनाअपना खयाल है लेकिन

दर्द, दिल की दवा नहीं होता

++तू ने चाहा नहीं मुझे वरना

इस जमाने में क्या नहीं होता

बेखबर तुम रहो, परेशां हम

यूं कोई सिलसिला नहीं होता

दाग ही दाग जो दिखाए वो

आईनाआईना नहीं होता

सब हैं हालात के फरेब ‘आलोक’

कोई खोटा, खरा नहीं होता.

       – आलोक यादव

जीने की राह- भाग 4: उदास और हताश सोनू के जीवन की कहानी

मैं ने स्वयं ही मन में एक संकल्प लिया कि मैं नीता और रिया की यादों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दूंगा बल्कि उसे संबल बनाऊंगा और उस से प्रेरणा ले कर जिंदगी आगे जीऊंगा. एक पल बाद मैं सोचने लगा, मैं करूंगा क्या ऐसा, जिस से जीवन सार्थक महसूस हो. एकाएक सोनू की याद आ गई-तनहा, उदासीन, सोनू. मन में एक संकल्प उभर आया, हां, मैं नीता व रिया की अपनी यादों को अपने दिल में बसाए, अपने जीवन में संजोए, तनहा व उदासीन सोनू की जिंदगी संवारने की कोशिश करूंगा. इस उदास युवती को एक सामान्य खुशहाल जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करूंगा. अब मेरे जीवन का यही लक्ष्य होगा. मैं खुद को बेहद हलका महसूस करने लग गया, जीने की राह जो मुझे मिल गई थी.

अपने संकल्प की चर्चा मैं ने किसी से भी नहीं की थी. मैं ने कालेज भी जौइन कर लिया. मन में खयाल आया, अपने दुख के कारण विद्यार्थियों को हानि पहुंचाना गलत है, सो, अब सुबह कालेज जाने की व्यस्तता हो गई थी. सोनू ने भी स्कूल जौइन कर लिया था. दिन में हम अपनेअपने कार्यों में व्यस्त रहते थे किंतु शाम में अवश्य मौका निकाल कर हम मिल लेते थे. अचानक 5 दिनों के लिए उत्तम एवं भाभीजी को दिल्ली जाने का प्रोग्राम बनाना पड़ गया, परिवार में एक शादी पड़ गई थी. सोनू फ्लैट में अकेली रह गई थी, इसलिए मैं उस का ज्यादा खयाल रखने लगा था. अब वह भी मुझ से ज्यादा बातें करने लगी है. उस ने अपने मांपापा के विषय में विस्तार से बताया कि उस के मांपापा ने दोनों परिवारों के विरोध के बावजूद अंतर्जातीय विवाह किया था. इसलिए दोनों परिवार वालों ने उन लोगों से संबंध तोड़ लिए थे. उस ने बताया कि उस के मांपापा को उस से पहले भी एक बेटी हुई थी, जिस का नाम पापा ने बड़े प्यार से ‘संगम’ रखा था. 2 भिन्न जातिधर्म का संगम. उस की मां बहुत सरल स्वभाव की थीं, उन्होंने दोनों परिवारों को संगम के बहाने मिलाने का काफी प्रयास किया किंतु दोनों तरफ से कड़ा जवाब ही मिला कि वे संगम को नाजायज औलाद मानते हैं, उस के जन्म से उन्हें कोई खुशी नहीं है. सो, मेलमिलाप का तो सवाल ही नहीं उठता है. उस ने आगे बताया, ‘‘संगम 9 माह की हो कर खत्म हो गई. मां ने बताया था कि संगम को सिर्फ बुखार हुआ था, जो अचानक काफी तेज हो गया था. उसे डाक्टर के पास ले गए किंतु उस ने कम समय में ही आंखें उलट दीं एवं उस का शरीर ऐंठ गया. डाक्टर कुछ भी न कर सके.

‘‘मांपापा का प्यार सच्चा था, दोनों एकदूसरे का संबल बन एकदूसरे के लिए खुश रहते एवं एकदूसरे को खुश रखने की पूरी कोशिश करते. संगम की मृत्यु के 2 साल बाद मेरा जन्म हुआ. मां ने फिर दोनों परिवारों से मुझे स्वीकार करने की मिन्नतें कीं. उन्होंने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि इस नन्ही जान को स्वीकार कर लीजिए. आप लोगों ने मेरी पहली बच्ची को नहीं स्वीकारा, वह रूठ कर चली गई. किंतु मां की पुकार दोनों परिवारों के बीच की तपन को पिघला न सकी. दोनों परिवारों का एक ही जवाब था, जब हमारा तुम से ही कोई संबंध नहीं है तब तुम्हारी औलाद से हमें क्या मोह?

‘‘मां ने मुझे बताया था कि दोनों परिवारों के रुख के कारण पापा ने नाराज हो कर मां से वचन लिया था कि अब वह कभी भी दोनों परिवारों से मेलमिलाप का प्रयास नहीं करेगी. इस के बाद मां ने दोनों परिवारों के संबंध में सोचना बंद कर दिया,’’ मुझे यह सब बता कर सोनू फूटफूट कर रो पड़ी. मैं ने उसे सांत्वना देने के उद्देश्य से उस के कंधे थपथपाते हुए कहा, ‘‘सोनू, धैर्य रखो, आश्चर्य होता है लोग इतने निर्दयी क्यों हो जाते हैं जो अपने खून को पहचानने से, उसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं.’’ सोनू अपने आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘मनजी, मेरी समझ में नहीं आता, लोग प्यार से इतनी घृणा क्यों करते हैं. मेरे मांपापा अलगअलग जातिधर्म के थे, दोनों ने प्यार किया था, कोई अपराध तो नहीं किया था, किंतु दोनों परिवारों ने उन का बहिष्कार कर दिया. मां ने एक बार बताया था कि उन की मां ने उन्हें उलाहना देते हुए कहा था कि यह दिन दिखाने से तो अच्छा होता कि वे मर गई होतीं, तो उन्हें खुशी होती.’’

सोनू की जीवनगाथा सुननेसुनाने में हमें समय का खयाल ही नहीं रहा. रात के साढ़े 8 बज चुके थे. मैं ने कहा, ‘‘सोनू, काफी देर हो चुकी है. अब तुम घर जाओ. हम कल मिलते हैं. अपना खयाल रखना.’’ वह बिना कुछ बोले, धीरे से बाय, गुडनाइट कह कर चल दी. रविवार का दिन था, सोनू का फोन आया, ‘‘मनजी, मेरे साथ मार्केट चलिएगा, घर का थोड़ा जरूरी सामान खरीदना है.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, 4 बजे तक चलते हैं.’’ हम नजदीक के मौल में चले गए. उस ने चादरें, तौलिया तथा किचन का काफी सामान लिया. मैं ने भी किचन की कुछ चीजें खरीद लीं. यह सब खरीदारी नीता ही किया करती थी. सो, मुझे थोड़ी असुविधा हो रही थी. सोनू से मुझे खरीदारी में काफी मदद मिली. खरीदारी करते हुए हमें 8 से ऊपर बज गए. सो हम ने डिनर भी बाहर ही कर लिया. सोनू का सामान कुछ ज्यादा था, इसलिए मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारा सामान तो ज्यादा है, इसलिए कुछ सामान मैं तुम्हारे घर तक पहुंचा देता हूं.’’ उस ने सहमति में सिर हिला दिया. उस का सामान पहुंचा कर मैं लौटने लगा तब वह बोली, ‘‘मनजी, मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं.’’

‘‘हांहां, बोलो,’’ मैं ने कहा.

वह झिझकते हुए बोली, ‘‘मनजी, अब हम एकदूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं.’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘दरअसल, समान दुख के कारण हम एकदूसरे को जल्दी समझ सके.’’ ‘‘मनजी, हमें एकदूसरे को जानते हुए 6 माह से भी ऊपर हो चुके हैं. मैं इंतजार में थी कि आप ही इस संबंध में कुछ करते किंतु आप तो…’’ वह एक पल रुक कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘मनजी, आप बहुत भले इंसान हैं. इतनी बातें मैं मांपापा के सिवा सिर्फ आप से करती हूं.’’ मैं ने भी उस की हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘मैं भी इतनी बातें सिर्फ नीता और रिया से करता था. हम दोनों बातें कर ही रहे थे कि उत्तम और भाभीजी दिल्ली से लौट आए. घर के सामने उन की टैक्सी आ चुकी थी, हम दोनों उन की अगवानी में लग गए. उत्तम से सारी बातें जानने के लिए मैं अधीर हो रहा था, क्योंकि मैं ने उस से विशेष आग्रह किया था कि वह दिल्ली में समय निकाल कर मेरे बड़े भैया एवं भतीजे सुमन से अवश्य मिल ले तथा मैं ने शादी संबंधी जो भैया एवं सुमन से सलाह मांगी थी, वह प्रत्यक्षत: उस संबंध में राय जान ले एवं उन की प्रतिक्रिया प्रत्यक्षत: देख कर, उन के विचार साफतौर पर समझ ले. उत्तम ने बताया कि दोनों ही मेरे विचारों से सहमत हैं तथा इस सिलसिले में इसी हफ्ते आ जाएंगे. अगले दिन सोनू शाम को मेरे घर पर आई थी. हम दोनों चाय पी रहे थे एवं बातें कर रहे थे कि बड़े भैया का फोन आया. जरूरी बातें कर, मैं ने उन से थोड़ी देर बाद बात करने की बात कह कर फोन काट दिया.

भैया के फोन का जिक्र सुन कर सोनू मुझ से मेरे परिवार के बारे में पूछने लगी. मैं ने बताया कि अब मांपापा तो हैं नहीं, हम 2 भाई ही हैं. बड़े भैया दिल्ली में हैं. उन का एक बेटा सुमन है. पिछले साल भाभी का देहांत हो गया है. हम दोनों भाइयों में बहुत प्रेम है. सोनू ने कहा, ‘‘बड़े भैया और भतीजा, आप के इतने दुखद समय में आप के पास क्यों नहीं आए?’’ ‘‘दोनों ही आना चाहते थे किंतु बड़े भैया बीमार चल रहे थे, सो मैं ने ही दोनों को आने से मना कर दिया था. वे लोग मुझे अपने पास बुला रहे थे किंतु मैं नहीं गया क्योंकि मुझे दुखी देख कर दोनों बहुत दुखी होते, नीता और रिया पर दोनों जान छिड़कते थे. ‘‘नीता बड़े भैया का पिता समान मान रखती थी. जो बातें भैया को नापसंद हैं वह मजाल है कि कोई कर सके, नीता सख्ती से इस बात की निगरानी रखती थी.

‘‘सुमन और रिया का आपसी प्यार देख लोग उन्हें सगे भाईबहन ही समझ बैठते थे. दोनों के मध्य ढाई साल का ही फर्क था किंतु सुमन अपनी बहन का बहुत खयाल रखता था.’’ नियत समय पर बड़े भैया एवं सुमन आ गए. नीता और रिया के जाने के बाद हमारी पहली मुलाकात थी. वे दोनों मुझ से लिपट कर रोए जा रहे थे. मेरा भी वही हाल था. हम तीनों कुछ भी बोल पाने में असमर्थ थे, आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. मैं ने ही पहल करते हुए कहा कि हम लोगों को स्वयं को हर हाल में संभालना होगा. हम तीनों एकदूसरे की हिम्मत बनेंगे एवं विलाप कर एकदूसरे को कमजोर नहीं बनाएंगे. दोनों ने ही सहमति जताते हुए कस कर मुझे जकड़ लिया. भैया सोनू से जल्दी ही मिलना चाहते थे, सो मैं ने सोनू को फोन कर दिया, ‘‘सोनू, शाम को मेरे घर पर चली आना, हो सके तो साड़ी पहन कर आना.’’

सोनू ने कहा, ‘‘मनजी, मैं समय पर पहुंच जाऊंगी.’’

मैं ने फोन काटने से पहले कहा, ‘‘सोनू, डिनर हम साथ ही करेंगे, मेरे घर पर.’’

उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मनजी, पर एक शर्त है, आज आप मेरे हाथ से बने गोभी के परांठे और प्याज का रायता खाएंगे. हां, बनाने में थोड़ी मदद कर दीजिएगा. अरे हां, गोभी है न घर में?’’

‘‘हांहां, गोभी है, प्याज और दही भी है, चलो यही तय रहा,’’ मैं ने सहमति प्रकट करते हुए कहा.

सोनू शाम 7 बजे आ गई. उस ने गुलाबी रंग की साड़ी बड़े सलीके से बांधी हुई थी. मैं ने उस का परिचय बड़े भैया और सुमन से करवाया. मेरे घर पर 2 अजनबियों को देख वह थोड़ा असहज हुई, किंतु उस ने जल्दी ही स्वयं को संभाल लिया तथा बड़ी शिष्टता से दोनों से मिली. वह भी हमारे साथ ड्राइंगरूम में बैठ गई. बड़े भैया ने कहा, ‘‘सुमन बेटा, दिल्ली वाली मिठाइयां एवं नमकीन ले आओ. सोनू बेटा को भी टेस्ट करवाओ.’’ सुमन तुरंत मिठाइयां एवं नमकीन ले आया. मैं दोनों के व्यवहार से बहुत राहत महसूस कर रहा था, क्योंकि दोनों के व्यवहार से साफतौर पर  परिलक्षित था कि दोनों को ही सोनू पसंद आ रही है. इतने में ही उत्तम एवं भाभीजी भी आ पहुंचे. मैं ने ही दोनों को आने के लिए कह दिया था. सोनू को देख भाभीजी बोल पड़ीं, ‘‘साड़ी में कितनी प्यारी लग रही है, मुझे तो एकदम…’’ मेरी तरफ देख उन्होंने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया.

खाना भाभी एवं सोनू ने मिल कर बनाया, बेहद स्वादिष्ठ था. हमारे साथ बड़े भैया एवं सुमन ने बड़ी रुचि से खाना खाया. बड़े भैया बारबार कहते, ‘‘सही बात है, औरतों के हाथों में जादू होता है, कितने कम समय में इन दोनों ने इतना स्वादिष्ठ खाना तैयार कर दिया.’’ सुमन भी बोला, ‘‘सही बात है छोटे पापा, वहां पर वह कुक खाना बनाता है, इस स्वाद का कहां मुकाबला. बस, पेट भरना होता है, सो खा लेते हैं.’’

सुमन ने एक चम्मच रायता मुंह में डालते हुए स्वादिष्ठ रायते के लिए भाभीजी को थैंक्स कहा.

भाभीजी बोलीं, ‘‘सुमन पुत्तर, यह स्वादिष्ठ रायता सोनू ने बनाया है, उसे ही थैंक्स दें.’’

सुमन ने सोनू को थैंक्स कहा तथा उस ने भी मुसकराते हुए ‘इट्स माई प्लेजर’ कहा.

मैं ने सुबह 7 बजे के लगभग सोनू को फोन कर पूछा, ‘‘तुम फ्री हो तो मैं इसी वक्त तुम से मिलना चाहता हूं?’’

सोनू ने कहा, ‘‘आप तुरंत आ जाइए, दूसरी बातों के बीच कल तो आप से कुछ बात ही न हो सकी.’’

मैं जब पहुंचा, वह 2 प्याली चाय और स्नैक्स के साथ मेरा इंतजार कर रही थी.

मैं ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘सुमन और बड़े भैया तुम्हें कैसे लगे?’’

उस ने तुरंत जवाब दिया, ‘‘अच्छे हैं, दोनों ही बहुत अच्छे हैं. उन के व्यवहार में बहुत अपनापन है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘और सुमन?’’

उस ने सहजता से कहा, ‘‘बहुत अच्छा लड़का है, एकदम आप के साथ बेटे जैसा व्यवहार करता है. अच्छा स्मार्ट एवं हैंडसम है, अच्छी पढ़ाई की है उस ने और अच्छी नौकरी भी करता है, किंतु अभी तो हम अपनी बातें करें, कल रात भी हम कुछ भी बात न कर सके.’’

‘‘तुम ने ठीक कहा सोनू, मैं अभी तुम से अपने दिल की ही बात करने आया हूं,’’ मैं ने कहा.

सोनू ने अधीरता से कहा, ‘‘मनजी, कह दीजिए, दिल की बात कहने में ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहिए.’’

सकुचाते हुए मैं ने कहा, ‘‘सही कहा तुम ने, मैं बिना वक्त बरबाद किए तुम से दिल की बात कह देता हूं. मैं तुम्हारा हाथ सुमन के लिए मांगना चाहता हूं.’’

वह आश्चर्य से व्हाट कह कर खड़ी हो गई. सोनू की भावभंगिमा देख कर एक पल मुझे खुद पर ही खीझ होने लगी कि मैं ने यह अधिकार कैसे प्राप्त कर लिया जो उस के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप कर बैठा. शादी किस से करनी है, कब करनी है, इस संबंध में मैं क्योंकर हस्तक्षेप कर बैठा. मैं ने क्षणभर में ही स्वयं को संयत करते हुए कहा, ‘‘सोनू, बुरा मत मानो, शादी तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है, मैं ने हस्तक्षेप किया इस के लिए मैं तुम से माफी मांगता हूं. तुम्हें यदि सुमन पसंद नहीं है या तुम किसी और को पसंद करतीहो, यह तुम्हारा निजी मामला है. तुम यदि मेरे प्रस्ताव से इनकार करोगी, मैं अन्यथा न लूंगा. वैसे एक बात कहूं, मैं ने तो तुम्हें सारेसारे दिन भी देखा है, कभी ऐसा आभास नहीं हुआ कि तुम्हारा बौयफ्रैंड वगैरह है. खैर, कोई बात नहीं, मुझे साफतौर पर बता देतीं तो ठीक रहता.’’ सोनू धीरेधीरे मेरे नजदीक आई, उस ने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मनजी, मुझे लगा आप मुझे प्यार करने लगे हैं, मैं तो आप से प्यार करने लगी हूं तथा आप को जीवनसाथी मान बैठी हूं.’’

सोनू की बातें सुन मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया, स्वयं को संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘सोनू, तुम ने ठीक समझा, प्यार तो मैं बेइंतहा करता हूं, किंतु वैसा नहीं जैसा तुम ने समझा. प्यार तो एक सच्चीसाफ भावना है, उसे सही दिशा, मार्ग देना हमारा काम है. जिस तरह उफनती नदी पर बांध बना कर हम उसे सही मार्ग देते हैं वरना जो जल जीवनरक्षक होता है वही जीवन का नाश कर बैठता है.’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘सोनू, मैं 60 वर्ष का हो रहा हूं. तुम लगभग 22-24 की नवयुवती हो. मेरी रिया भी इसी उम्र की थी. मैं अपनी रिया के लिए मेरी उम्र का दामाद कभी भी पसंद नहीं करता फिर तुम्हारे लिए ऐसा कैसे सोच सकता हूं. ‘‘तुम्हें उस दुर्घटना में मातापिता को खो देने के बाद बहुत तनहा, उदास देखा, तुम्हारी तरह ही मेरी दशा भी थी. नीता और रिया के बिना जीवन निरर्थक मसूस होने लगा, तब मैं ने स्वयं से संकल्प लिया था कि स्वयं के जीवन को भी सार्थक बनाते हुए, उदासीन, तनहा सोनू के जीवन में फिर उल्लास, उमंग भरने का प्रयास कर, उसे सामान्य जीवन हेतु प्रोत्साहित करूंगा. तुम्हारे रूप में मुझे रिया मिल गई, मैं फिर जीवन के प्रति आशान्वित हो उठा.

‘‘सोनू, मैं इस सोच के एकदम खिलाफ हूं कि एक कमसिन, सुंदर नवयुवती को मजबूरी की हालत में देख पुरुषवर्ग सिर्फ और सिर्फ उसे भोग्या ही समझता है. आएदिन पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर इस तरह के दुष्कर्म पढ़नेसुनने के लिए मिल जाते हैं. मेरा दिल चिल्लाचिल्ला कर कहता है कि मजबूर लड़कियों को बेटी/बहन मान कर स्वीकार कर, मदद क्यों नहीं की जाती.

‘‘मेरा मानना है कि एक व्यक्ति अकेला नहीं होता है. उस के साथ अनेक लोगों का मानसम्मान जुड़ा होता है तथा हमें ऐसा कोई कृत्य नहीं करना चाहिए जिस से कि हम अपनों से नजरें चुराएं.

‘‘तुम्हारे मातापिता की भी तुम से बहुत सी उम्मीदें रही होंगी. वे तुम्हारे लिए जीवनसाथी कभी भी किसी भी सूरत में मुझ जैसा प्रौढ़ तो नहीं चुनते. यदि तुम चुन लेतीं, तब वे भी तुम्हें असहमति में ही समझाते. हां, इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सुमन जैसा दामाद पा कर वे स्वयं को धन्य समझते. सो, तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम उन की आधीअधूरी उम्मीदों को पूर्ण करो, यह तुम्हारी उन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी.

‘‘ऐसा ही मेरे साथ भी है. मैं अपनी बेटी रिया की उम्र की सोनू से विवाह रचा कर अपने दिल में बसी पत्नी और बेटी से नजरें कैसे मिला पाऊंगा. सोनू, वे दोनों मेरे दिल में बसी हुई हैं, जिन से मैं रोज बातें करता हूं,  हंसता हूं, रोता हूं. और अगर ऐसा कृत्य कर जाऊंगा तब तो दोनों से नजरें ही चुराता रह जाऊंगा.  

हमारी बेडि़यां

मेरी सहेली के भाई की शादी थी. बहुत दिनों से हम मिले नहीं थे. मैं ने सोचा, अच्छा मौका है इस बहाने गजाला से मुलाकात भी हो जाएगी और उस के भाई रेहान मीर की शादी में शिरकत भी कर लूंगी. एक दिन पहले मैं गजाला के घर पहुंच गई. उस दिन उबटन था, शाम को खूब हंगामा रहा. लड़के को हलदी लगाने के बाद सब लोग आपस में हलदी खेलने में लग गए. दूसरे दिन बरात उसी शहर में जानी थी. शाम को हम बरात ले कर दुलहन के घर की तरफ रवाना हो गए. एक मैरिजहोम में इंतजाम था. निकाह के बाद खाना हुआ. उस के बाद दुलहन हिना की विदाई हुई. हम लोग दुलहन ले कर घर पहुंचे. उन लोगों के यहां रिवाज है कि दरवाजे से कमरे तक दूल्हा दुलहन को गोद में उठा कर ले जाता है. दूल्हा थोड़ा हिचकिचा रहा था, जरा दुबलापतला था. दुलहन तंदुरुस्त थी. सारी औरतें और बड़ीबूढि़यां दूल्हे के सिर हो गईं कि तुम्हें तो दुलहन को गोद में उठा कर ही अंदर ले जाना पड़ेगा. ‘मरता क्या न करता’ कहावत के अनुसार दूल्हे ने उसे गोद में उठाया. शोर, चीख, हंसी से माहौल गूंज उठा. इस हंगामे से दूल्हा और घबरा गया, थोड़ी दूर चलने के बाद दुलहन उस के हाथों से छूट कर नीचे गिर गई. दूल्हे की चाची दुलहन को खड़ा कर उस का हाथ पकड़ कर धीरेधीरे उस के कमरे में ले गईं. जब दुलहन जरा संभली तो उसे एहसास हुआ कि उस के घुटने में दर्द है क्योंकि घुटना जमीन से टकराया था. दूसरे दिन रिसैप्शन था, उस में भी वह लंगड़ा कर चल रही थी. 15-20 दिनों तक दवाइलाज के बाद दर्द ठीक हुआ. एक बेहूदा रस्म को निबाहने के चक्कर में दुलहन को कितनी तकलीफ उठानी पड़ी.

शकीला एस हुसैन, भोपाल (म.प्र.)

*

हमारे एक परिचित के दादाजी की मृत्यु हो गई. उन की अंतिम इच्छा थी कि उन का अंतिम संस्कार नवद्वीप के श्मशान में किया जाए. ऐसी मान्यता थी कि नवद्वीप के श्मशान में दाह कर्म होने पर मृत व्यक्ति को ‘स्वर्गलाभ’ होता है. उन की इच्छा के अनुसार, उन के परिवार वाले शवदाह करने के लिए मेटाडोर से नवद्वीप जा रहे थे. उल्लासी के टेंगरा के पास वह मेटाडोर कुछ कार्यवश रुकी, तभी पीछे से तीव्रगति से आ कर दस पहियों वाले भारी ट्रक ने टक्कर मार दी. टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि मौके पर ही उन के मातापिता और एक बहन की मौत हो गई. घायल परिजनों की मौत अस्पताल में हो गई. एक दाह संस्कार करने गए थे, अब घर के 3 और सदस्यों का भी दाह संस्कार नवद्वीप में करना पड़ा. बलिहारी है अंधविश्वासों की.

अंजु सिंगड़ोदिया, हावड़ा (प.बं.)

मेरी कहानी

इक मोड़ पर ठिठकती

इक मोड़ पर सहमती

आदि ढूंढ़ती, अंत ढूंढ़ती

कभी खुशी की फुहार

कभी गम की साइत

तितरबितर, बिखरे हुए

पलों में खुशियां ढूंढ़ती

हसरतों के धागे जोड़

बनाती है ओढ़नी

उतर आती है और

मेरे आंगन में चांदनी

समय ने ली करवट

मांगा हिसाब बीते लमहों का

और शक्तिहीन हाथों में

शक्ति का संचार कर

इक नई दिशा देने को

मेरी कहानी भटकती है

इक नई शुरुआत को

इक सुंदर अंत देने

मेरी कहानी भटकती है.

              – हेमा महाडिक लोखंडे

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें