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ऐसा भी होता है

मेरे पति के औफिस में काम करने वाले एक सहकर्मी भट्टाचार्यजी का हृदयाघात से 9 वर्ष पूर्व निधन हो गया था. तब उन की एक लड़की स्नातक कर रही थी और लड़का इंजीनियरिंग में प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था. उन के हालात को देख कर मेरे पति और सहकर्मियों ने उन की आर्थिक मदद की थी. समय की मार थी, उन के परिवार को कालोनी का सरकारी मकान छोड़ कर बाहर किराए के मकान में जाना पड़ा था. समय गुजरता रहा उन का भी, फिर पता नहीं चला कि वे लोग कहां और कैसे हैं. एक दिन मिसेज भट्टाचार्य औफिस में आईं, मेरे पति से मिलीं और बताया कि उन के हालात अब अच्छे हैं. लड़की नौकरी कर रही है और उस की शादी भी हो चुकी है. लड़का मल्टीनैशनल कंपनी में इंजीनियर है. अब धन्यवाद के साथ उन तीनों के पैसे लौटाने आईं हैं. मेरे पति ने पैसे लेने से मना किया मगर उन्होंने कहा, ‘‘ये पैसे तो आप ले ही लीजिए, अगर इस्तेमाल नहीं करना चाहें तो मेरी ही तरह बहुत से जरूरतमंद होंगे, उन की इन पैसों से मदद कर दीजिएगा.

मंजू शर्मा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

*

मेरे ससुरजी डिप्टी कलैक्टर थे और उन की पोस्ंिटग हमारे ही शहर में हुई थी. बाबूजी अकेले ही रहते थे. एक दिन उन के औफिस का ही एक आदमी मिल गया जो नजदीक के गांव से आता था. दोपहर को खाना खाने व थोड़ा सा आराम करने के लिए उस को कोई ठिकाना चाहिए था. बाबूजी ने उसे आश्वस्त किया कि यहां अगर कोई ठौरठिकाना नहीं है तो तुम हमारे ही घर आ जाया करो. बाबूजी ने उस के लिए एक चारपाई निकाल कर दे दी और उस पर नई बैडशीट बिछवा दी. वह रोजाना आने लगा. एक दिन मेरे देवर बाबूजी से मिलने गए तो उन्होंने आदरसम्मान के साथ रेडियो और पैंटशर्ट का कपड़ा भेंट स्वरूप बाबूजी को दिए. उन्होंने वे चीजें अलमारी में रख दीं. उस के बाद शाम को देवर को छोड़ने स्टेशन चले गए. वह आदमी घर पर ही था. बाबूजी के घर से निकलते ही घर का सारा सामान अलमारी में से निकाल कर चलता बना. जब बाबूजी घर आए तो देखा कि घर खुला पड़ा है और अलमारी की सारी चीजें गायब हैं. पिताजी घबरा गए, उन को यकीन हो गया कि यह काम किस का है. दूसरे दिन से वह आदमी घर पर नहीं आया. भलमनसाई का बदला उस आदमी ने जिस थाली में खाया उसी में छेद कर के दिया.  

देविला गांधी

पिया की आस

तनहातनहा बेकरार
हर रुत से बेजार
दिल करे पी की पुकार
कैसे मन को चैन मिले?

मुख कमल क्योंकर खिले? 
जब तन विरहा में जले
खड़े पलक पांवड़े बिछाए
कब पिया लौट कर आएं?

रहरह कर नैन भर जाएं
कहीं टूट न जाए आस
थम न जाए चलती सांस
यूं ही गुजर न जाए मधुमास

आ जा कि आ गई बरसात
तुझे पुकारे नशीली रात
फिर हम दोनों हों साथ.

       – शकीला एस हुसै

तेरी याद रुला गई

शोलों की आंच दिल को पूरा जला गई
जब भी आई याद तेरी मुझ को रुला गई
कटती रही यह जिंदगी तेरे बगैर कुछ यूं
सांसों में मौत जैसे अपनी आहट मिला गई

मजबूरियां जिंदगी की बढ़ती गईं इतनी
हर सांस जिंदगी में और जहर मिला गई
आई बहार जग में तो दिल रोया जारजार
ताजा फूलों की खुशबू मेरे जख्म खिला गई

किए बहुत जतन हम ने खुश रहने के मगर
हर कोशिश गमों के समंदर में मिला गई.

                    – हरीश कुमार ‘अमित’

दुनिया पर छाने की तैयारी में बिहार ब्रांड

जल्दी ही बिहार में पैदा होने वाले खास जैव उत्पाद बिहार ब्रांड के नाम से दुनिया भर में डंका बजाएंगे. राज्य में जैविक खेती में आई तेजी को देखते हुए जैव उत्पादों की ब्रांडिंग की कवायद शुरू की गई है. बिहार में उपजाए गए जैव उत्पादों की ब्रांडिंग और उन के सर्टिफिकेशन की कवायद शुरू की गई है. इस के लिए बिहार राज्य बीज एवं जैविक प्रमाणीकरण एजेंसी का गठन किया जाएगा. कृषि विभाग का दावा है कि एजेंसी के गठन का काम अंतिम चरण में है. किसी भी कृषि उत्पाद के जैविक होने पर पहले उसे सी 1 और उस के बाद सी 2 सर्टिफिकेट दिया जाएगा. तीसरे साल उसे सी 3 का सर्टिफिकेट मिलेगा. उस के बाद से जैविक उत्पाद किसी भी बड़े बाजार में भेजे जा सकेंगे या उन का इंटरनेशनल लेबल पर निर्यात किया  जा सकेगा. इस से बिहार में जैविक खेती कर रहे किसानों को अच्छा मुनाफा मिलेगा और बाकी किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहन मिलेगा.

फिलहाल अपने जैव उत्पादों को बाजार में भेजने के लिए किसानों को केंद्रीय एजेंसी ‘एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट एजेंसी’ से सर्टिफिकेट लेना पड़ता है. यह सर्टिफिकेट हासिल करने का काम काफी पेचीदा होने की वजह से किसान इस से कन्नी काटते रहे हैं. जल्द ही बिहार समेत पूरे देश में बिहार ब्रांड का गेहूं और चावल मिलने लगेगा. बिहार सरकार चावल और गेहूं के आटे की ब्रांडिंग कर के देश भर में इस की पहचान बनाने की मशक्कत में लगी हुई है. बिहार से काफी मात्रा में गेहूं और चावल दूसरे राज्यों में जाते हैं, पर उन की ब्रांडिंग नहीं हो पाती. कृषि विभाग और राज्य  के उद्यमियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद कतरनी, बासमती, आनंदी, गोविंदभोग और बादशाहभोग किस्म के चावलों की ब्रांडिंग पर सहमति बन गई है. राज्य सरकार इस बात पर भी जोर दे रही है कि जिन इलाकों में जिस अनाज, सब्जी और फल का ज्यादा उत्पादन होता है, वहां उन्हीं उत्पादों पर आधारित उद्योग लगाए जाएं. जो उद्यमी इसे ध्यान में रख कर उद्योग लगाएंगे उन्हें खास रियायत दी जाएगी. पिछले 6 सालों में 16 चावल मिलों, 5 गेहूं मिलों व 3 मकई मिलों के अलावा 4 फल आधारित, 2 शहद आधारित और 1 मखाना आधारित उद्योग लगाए गए हैं, जिन में उत्पादन चालू हो गया है.

इसी तरह बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की मशहूर शाही लीची बिहार ब्रांड के तहत विश्व बाजार में चीन और थाईलैंड को टक्कर देने की तैयारी में है. शाही लीची की क्वालिटी और उत्पादन में सुधार की कवायद का बेहतर नतीजा मिला है. इस के लिए किसानों को स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है, जिस के बाद किसानों को प्रति हेक्टेयर 10 लाख रुपए तक की आमदनी हो सकेगी. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र से मिली जानकारी के मुताबिक बिहार के लीची उत्पादकों के लिए साल भर की योजना तैयार की गई है. इस के तहत फसल काटने के दूसरे दिन से ही अगली फसल की तैयारी शुरू कर दी जाएगी. क्वालिटी में सुधार के लिए मिट्टी की सेहत और कीटप्रबंधन का पुख्ता इंतजाम किया गया है. इस योजना पर काम करने वाले किसानों को सरकार माली मदद भी देगी. गौरतलब है कि बिहार की शाही लीची पश्चिमी देशों में खूब पसंद की जाती है. सूबे में 30 लाख हेक्टेयर में लीची की खेती होती है और 10 लाख टन लीची का उत्पादन होता?है. वैज्ञानिक सलाहों की कमी और नई तकनीकों को नहीं अपनाने की वजह से शाही लीची चीन की लीची के मुकाबले क्वालिटी में थोड़ी कमजोर साबित होती है और 20 से 25 फीसदी लीची का नुकसान भी हो जाता है.

कृषि वैज्ञानिक वीएन सिंह कहते हैं कि वर्ल्ड मार्केट में बने रहने और बेहतर स्थिति बनाने के लिए बिहार सरकार ने कमर कसी है. आमतौर पर लीची उत्पादक फसल के समय ही खेतों पर ध्यान देते हैं, जबकि क्वालिटी के लिए पूरे साल काम करने की दरकार है. क्वालिटी में सुधार होने से बाजार में लीची  की मांग निश्चित रूप से बढ़ेगी और किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी. यूरोपीय देशों में 700 से 1500 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से लीची की बिक्री होती है. लीची के साथ ही बिहार में पिछले एक दशक से बड़े पैमाने पर मशरूम का उत्पादन हो रहा है. राज्य में फिलहाल 1500 टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है. किसानों को इस के उत्पादन के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल करने के लिए ट्रेंड किया जा रहा?है. मुख्यमंत्री नीतीश कई मौकों पर कहते रहे हैं कि बिहार के किसानों ने धान और आलू के उत्पादन का वर्ल्ड रिकार्ड तोड़ा है और अब हाई क्वालिटी के मशरूम उत्पादन की बारी है. बिहार के भागलपुर जिले के कतरनी चावल के दीवाने देशविदेश में हैं. यह एक किस्म का खुशबूदार चावल है, जिस के दाने लंबे व पतले होते हैं. भागलपुर के किसान इस चावल को सैकड़ों सालों से पैदा कर रहे हैं. इस किस्म के धान की रोपनी चाहे जब की जाए, मगर उस में फूल 20 अक्तूबर से 30 अक्तूबर के बीच ही आते हैं. दिसंबर के पहले हफ्ते तक फसल तैयार हो जाती है.

कृषि वैज्ञानिक ब्रजेंद्र मणि बताते हैं कि कतरनी धान के पौधे 140 से 160 सेंटीमीटर लंबे होते हैं. खुशबूदार होने की वजह से इस का चावल और चूड़ा देश भर में काफी पसंद किया जाता है. इस के खुशबूदार पुलाव और बिरयानी का जायका लाजवाब होता है. विदेशों में इस की खासी मांग है. किसान और कतरनी चावल के व्यापारी सरकार से मांग कर रहे हैं कि भागलपुर में कतरनी चावल एक्सपोर्ट जोन बनाया जाए, जिस से विदेशों में आसानी से इस की सप्लाई की जा सके. बिहार में पैदा होने वाली देसी मछलियों की भी ब्रांडिंग का काम शुरू किया गया है. बिहार में मछली का उत्पादन भले ही कम हो, पर विदेशों में बिहार की देसी मछलियों की काफी मांग है. ‘पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग’ से मिली जानकारी के मुताबिक पूर्वी और पश्चिमी चंपारण से कतला और रोहू मछलियां नेपाल भेजी जा रही हैं, जबकि दरभंगा में पैदा होने वाली बुआरी और टेंगरा मछलियां भूटान में खूब पसंद की जा रही हैं. वहीं भागलपुर और खगडि़या जिलों में पैदा की जाने वाली मोए और कतला मछलियां सिलीगुड़ी भेजी जा रही हैं. मुजफ्फरपुर और बख्तियारपुर से बड़ी तादाद में मछलियां चंडीगढ़ और पंजाब के व्यापारियों के द्वारा मंगवाई जा रही हैं.

दरभंगा के मछलीउत्पादक रामचंद्र झा बताते हैं कि बिहार की मछलियों के लाजवाब स्वाद की वजह से दूसरे राज्यों और देशों के लोग इन के दीवाने बन रहे हैं. इस से जहां बिहार की मछलियों की दुनिया में डिमांड बढ़ रही है, वहीं उत्पादकों को तगड़ी कीमत भी मिल रही है. इसी वजह से मछलीउत्पादक भी मछलियों को दूसरे देशों और राज्यों में भेजने में दिलचस्पी ले रहे हैं. गौरतलब है कि बिहार में मछली की सालाना खपत 5 लाख 80 हजार टन है, जबकि सूबे का अपना उत्पादन 4 लाख 30 हजार टन है. बाकी मछलियों को आंध्र प्रदेश समेत दूसरे राज्यों से मंगवाया जाता है.

बिहार में धूम मचाएगी ‘रेड लेडी’

रेड लेडी बिहार में धूम मचाने के लिए पूरी तरह से तैयार है. ताइवान का मशहूर रेड लेडी पपीता अब बिहार के खेतों में लहलहाएगा. बिहार के कृषि विभाग ने ताइवान के पपीते की खेती के लिए बड़ी योजना तैयार की है. किसानों को इस का पौधा 8 रुपए में मुहैया कराया जाएगा. इस किस्म के पपीते की खेती बिहार के किसी भी हिस्से में की जा सकती है. ताइवान के पपीते की इस किस्म की खासीयत यह है कि इस से प्रति पेड़ 97 से 99 फीसदी तक फल पाए जा सकते हैं, जबकि सामान्य पेड़ों से 50 से 60 फीसदी तक ही फल मिल पाते हैं. इस का 1 पेड़ सामान्य पपीते की किस्म के 3 पेड़ों के बराबर होता है. इस पपीते के पेड़ की लंबाई 8 से 10 फुट होती है और पौधा लगाने के 1 साल बाद ही उस में फल आने शुरू हो जाते हैं. हर पेड़ से ढाई से 3 सालों तक फल मिलते हैं.

इस ताइवानी किस्म के 50 ग्राम बीजों को 1 हेक्टेयर खेत में लगाया जा सकता है, जबकि इतने ही रकबे में साधारण किस्म के पपीते के 400 ग्राम बीजों की खपत हो जाती है. फिलहाल सूबे के हर जिले में पपीते की खेती की जाती है, लेकिन गोपालगंज, पटना और उत्तर बिहार के जिलों में इस की ज्यादा खेती की जाती है. बिहार में पपीते का सालाना उत्पादन 1 लाख टन है.

जुर्म छोड़ खेती से संवारा जीवन

इनसान भूख से बेचैन हो कर कुछ भी कर सकता है. हालात तब और?भी खराब हो जाते हैं, जब परिवार का पालन करना हो और बुनियादी सहूलियतें भी न हों. कामधंधे के लिए लोग भूखे पेट गांव से निकल कर शहर पहुंचते हैं, लेकिन चोरीचकारी के डर से कोई दिहाड़ी मजदूरी पर भी नहीं लगाता. तकरीबन 8-10 साल पहले ऐसे ही हालात थे राजस्थान के सिरोही जिले के आबूरोड व पिंडवाडा में अरावली इलाके के भील व गरासिया समुदाय के लोगों के. लेकिन अब ये अरावलीपुत्र मेहनतकश बन चुके हैं और नकदी फसल की खेतीबारी कर के खुशहाली से जीवन गुजार रहे हैं. भील व गरासिया परिवारों के जीवन में यह बहार किसी तरह की सरकारी खैरात से नहीं आई है. यह मुमकिन हुआ है, जिले के सौंफ उत्पादक किसानों की कोशिशों से, जिन्होंने न केवल इन परिवारों को कामधंधा दिया, बल्कि उन्नत तरीके से सौंफ की खेती कर के पैसा कमाना भी सिखाया.

गौरतलब है कि एकडेढ़ दशक पहले तक सिरोही जिले का सौंफ उत्पादन में नामोनिशान भी नहीं था, लेकिन किसानों की मेहनत ने अब अमेरिका तक आबू व सिरोही की सौंफ के चर्चे कर दिए हैं. गुजरात की उंझा मंडी भी आबू की सौंफ से महकती है. सौंफ की महक को अमेरिका तक पहुंचाने में यहां के आम किसानों के साथसाथ भील व गरासिया समुदाय के लोगों की मेहनत भी जुड़ी हुई है. इस समुदाय के लोगों ने बड़े किसानों के खेतों पर दिहाड़ी मजदूरी करते हुए उन्नत तरीके से सौंफ उत्पादन का तरीका सीखा. इस के बाद इन लोगों ने अपनी 1-1, 2-2 बीघे छोटी जमीनों पर सौंफ की खेती शुरू की. यह इसी का नतीजा है कि आबूरोड व पिंडवाडा इलाके में सौंफ उत्पादन का रकबा लगातार बढ़ रहा है. सिरोही के पिंडवाडा व आबूरोड इलाके में 5.5 हजार हेक्टेयर रकबे में सौंफ का उत्पादन होता है. इलाके के खेतों में सौंफ का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 25 से 30 क्विंटल हो रहा है. इतना ही नहीं, सौंफ उत्पादन के बाद मिली रकम से आई खुशहाली का ही नतीजा है कि अब भील व गरासिया परिवारों के बच्चे भी पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगे हैं.

ऐसे आया बदलाव

तकरीबन 8-10 साल पहले किसानों ने सौंफ उत्पादन लेना शुरू किया. इशाक अली, गुलाम अली, सुलतान, नरेंद्र व बदरी वगैरह ऐसे किसान हैं, जिन्होंने सौंफ की खेती को जिले में बढ़ावा देने का काम किया. किसान इसाक बताते हैं कि शुरूशुरू में सौंफ की खेती करने के लिए कोई तैयार नहीं था. बंजर व पथरीली जमीन की वजह से लोग सिंचाई वाली फसलें करने को तैयार नहीं थे. लेकिन जो लोग पथरीली व बंजर भूमि में गुजरात से सौंफ के उत्पादन का काम सीख कर आए थे, उन्होंने सब को खेती में बदलाव लाने के बारे में बताया. इन लोगों की मदद से यहां के लोगों ने सौंफ की खेती करना सीखा. वे सौंफ के पौधों को पहले नर्सरी में तैयार करते हैं. फिर इस के बाद इन को 1 से डेढ़ फुट की दूरी पर रोप देते हैं. इस के बाद बूंदबूंद सिंचाई तकनीक से पौधों को सींचा जाता है.

दिलचस्प बात तो यह रही है कि बड़े किसानों के यहां दिहाड़ी मजदूरी का काम करने वाले भील व गरासिया परिवारों के लोगों ने भी सौंफ उत्पादन के काम को सीखा और अपने छोटेछोटे खेतों में सौंफ उपजाने लगे. सौंफ की रोपाई से ले कर कटाई तक भील व गरासिया परिवारों के लोग इस काम से जुड़े रहते हैं. इन्हें हर रोज 2-2 सौ रुपए दिहाड़ी मजदूरीके मिल जाते हैं. बाकी बचे समय में वे अपने खुद के खेतों में काम करते हैं.

पहले ये थे हालात

एक दशक पहले तक इलाके के भील व गरासिया परिवार के लोग चोरीचकारी कर के अपना व परिवार का पेट पालते थे. इन को इलाके में चोरों की कौम के नाम से जाना जाता था. एक समय तो इन की हालत ऐसी हो गई थी कि सिरोही व आबू शहर में इन्हें कोई रोजगार देने को तैयार नहीं होता था. ज्यादातर भील व गरासिया परिवारों की यही हालत थी. बाद में इलाके के लोग इन्हें दिहाड़ी मजदूरी पर अपने खेतों में काम पर रखने लगे. कई लोगों को तो जंगली जानवरों से फसल की हिफाजत के लिए भी रखा जाने लगा. धीरेधीरे मेहनत के बूते पर इन्होंने संपन्न किसान परिवारों का भरोसा जीता. अब हालत यह है कि ये परिवार चोरीचकारी के काम को पूरी तरह से छोड़ चुके हैं और इन्हें अब शराफत की नजरों से देखा जाने लगा है.         – 

सरसों कचरा डिसपोजल प्लांट फसल कचरे से किसान हो रहे मालामाल

यह वक्त के साथ हुई तरक्की का ही नतीजा है कि बीते जमाने में फसल की बोआई के लिए रुकावट व आफत बनने वाला सरसों का कचरा अब किसानों के लिए फायदे का सौदा बन रहा है. तकनीक के सहारे कचरे से प्रदूषण रहित कोयला बना कर किसानों ने कचरे का सही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. सरसों के कचरे के दाम हर साल बढ़ने से किसानों का मुनाफा भी लगातार बढ़ रहा है. किसान कोयले के लिए कचरे की गिट्टियां बन कर बेच रहे हैं. कई जगह किसान इस कचरे को ईंटभट्टों व प्लाईवुड फैक्टरियों को भी भेज रहे हैं. इस से किसानों को अच्छे दाम मिल रहे हैं. सरसों के कचरे का निस्तारण  यानी डिसपोजल (इस्तेमाल) कर के कमाई करने की दिशा में टोंक जिले की निवाई तहसील के भगवानपुरा गांव के किसान शिवराम जाट ने इलाके में सब से पहले पहल की. उन्होंने फरीदाबाद से कचरे की गिट्टियां बनाने की 16 लाख रुपए की मशीनें खरीदीं. ये मशीनें आज आसपास के इलाके के गांवों के रहने वाले किसानों की तकदीर संवार रही हैं. यह मशीन प्रतिघंटा 8 क्विंटल कचरे का निबटेरा कर के गिट्टियां बनाती है.

सरसों के कचरे से बनने वाले कोयले को प्रदूषण रहित माना गया है. इसी वजह से इस की मांग तेजी से बढ़ रही है. माहिरों का कहना है कि सरसों के कचरे से बनने वाली गिट्टियों में मोनो आक्साइड पाया जाता?है. इस कारण इस के कोयले से निकलने वाला धुआं प्रदूषणरहित होता है. किसानों को सरसों के कचरे से अच्छा मुनाफा मिलने के साथसाथ प्रदूषणरहित कचरा क्षेत्र के किसानों के लिए कमाई की नई राह खोल रहा है. गौरतलब है कि सरसों की फसल लेने के बाद आगे की फसल की बोआई को ले कर किसान समय पर खेत खाली नहीं कर पाते थे. ऐसे में किसानों के लिए परेशानी और खर्च दोनों बढ़ जाता था. इतना ही नहीं कचरा प्रबंधन की व्यवस्था नहीं होने से पहले किसान सरसों की फसल के कचरे को फेंकते या जलाते थे. इस से वायु प्रदूषण होता था और पैसा भी खर्च होता था. लेकिन अब किसान इस कचरे को बेच कर न केवल कमाई कर रहे हैं, बल्कि आबोहवा को भी साफ रख रहे हैं.

कचरा डिसपोजल प्लांट लगने के बाद किसानों के दिन बदल गए हैं. अब तो हाल यह है कि सरसों की फसल निकालने के समय ही कचरा खरीदने वाले कारोबारियों की लाइन लग जाती है. 3 से 4 सौ रुपए प्रति क्विंटल के भाव से ये कचरा हाथोंहाथ बिक जाता है. कहना गलत नहीं होगा कि किसानों को आम के आम गुठलियों के भी दाम मिल रहे हैं. सरसों से मिली उपज के साथसाथ कचरे के भी मिल रहे अच्छे दामों ने किसानों की तकदीर ही संवार दी है. भगवानपुरा में कचरा निस्तारण (डिसपोजल) प्लांट व मशीन लगाने से पहले कचरे के भाव 50 रुपए प्रति क्विंटल थे, जो अब 3 सौ से 4 सौ रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं. वहीं गिट्टियां बनने के बाद इस के भाव 6 सौ से 7 सौ रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच जाते हैं. बड़े कारोबारियों तक पहुंचने पर इस के भाव और भी ऊंचे हो जाते हैं. कचरा इस्तेमाल करने व कचरे से अच्छा मुनाफा कमाने की यह तकनीक किसानों के फायदे की सब से बढि़या तकनीक है. मगर अफसोस की बात यह है कि यह प्लांट बड़े किसान या करोबारी ही लगा सकते हैं. मशीनें महंगी होने से छोटे किसान इन्हें खरीद नहीं सकते. अगर सरकार प्लांट लगाने पर सब्सिडी की व्यवस्था करे तो किसानों को व्यापारियों के हाथों लुटना नहीं पड़ेगा.

सरकार वैसे तो उद्योगों, कारखानों व मिलों वगैरह को चलाने के लिए खूब सब्सिडी दे रही है, लेकिन किसानों के लिए फायदेमंद इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कोई रुचि नहीं दिखा रही. किसानों का कहना है कि अगर सरकार मदद करे तो हर गांव में कचरा डिसपोजल के प्लांट लग सकते हैं, जिस से किसानों की कमाई तो बढ़ेगी ही साथ आबोहवा भी साफसुथरी होगी.

सुधरे तरीकों से मुरगीपालन ज्यादा कमाई का साधन

हमारे देश में मुरगीपालन का सिलसिला बहुत पुराना है. इस काम में सहूलियत यह है कि 2-4 मुरगियों से ले कर सैकड़ों मुरगियों तक अपनी कूवत के मुताबिक पूंजी लगाई जा सकती है. खेती के साथ सहायक रोजगार के रूप में मुरगीपालन बहुत फायदेमंद है, बशर्ते उसे बेहतर तरीकों से किया जाए. ज्यादातर मुरगीपालक मुरगियों के आहार में खनिजों पर पूरा ध्यान नहीं देते. इस लापरवाही से अंडे कम बनते हैं, अंडों की परत कमजोर बनती है, चूजों की बढ़त रुक जाती है व मुरगियां बीमार हो कर मरने लगती हैं. इस से फायदे की जगह नुकसान होता है. लिहाजा माहिरों से हमेशा तालमेल बना कर रखें व उन से राय लेते रहें. कृषि विज्ञान केंद्र या रिसर्च स्टेशनों के वैज्ञानिकों की सलाह से मुरगियों के आहार में कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीज, जस्ता, तांबा, नमक, सल्फर, आयरन, आयोडीन, कोबाल्ट, सेलेनियम व फ्लोरीन की सही मात्रा शामिल करें. अगर किसी मुरगी में बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत दूसरी मुरगियों से अलग कर दें.

मुरगीपालन का कारोबार करने के लिए मुरगेमुरगियों की नस्ल, उन के रहने की जगह, उन के दानापानी व बीमारियों से बचाव आदि का पुख्ता इंतजाम होना बेहद जरूरी है. तभी मुरगेमुरगियों से ज्यादा अंडे व उम्दा मीट मिल सकेगा. फिलहाल अंडा उत्पादन में भारत दुनिया भर में तीसरे व पोल्ट्री मीट के मामले में 5वें नंबर पर है. नई तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ने से मुरगीपालन के पुराने तरीके पीछे छूट गए हैं. देश में अंडों का उत्पादन साल 2011-12 में 66 बिलियन व साल 2012-13 में 69.73 बिलियन था. साल 2014 में पोल्ट्री की सालाना बढ़त दर 5 फीसदी रही और प्रति आदमी अंडों की उपलब्धता 57 व मुरगे के मांस यानी चिकन का उत्पादन 326 लाख टन आंका गया.

पोल्ट्री प्रोसेसिंग

मुरगीपालन से मिलने वाले अंडे व मांस जल्द इस्तेमाल करने लायक चीजें हैं. इन्हें ज्यादा दिनों तक रोक कर नहीं रखा जा सकता. वैसे भी अब जमाना हाईटेक डिजाइनर अंडों व पोल्ट्री मीट की प्रोसेसिंग का है, लेकिन ज्यादातर लोग अभी तक सिर्फ आमलेट, अंडे की भुजिया व एग करी पर ही अटके हैं. लिहाजा मुरगीपालन के कामधंधे में तकनीकी सुधार व तौरतरीकों में बदलाव करना लाजिम है, ताकि अंडे व मीट ज्यादा दिनों तक खाने लायक रहें. बरेली के इज्जतनगर इलाके में चल रहे केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, सीएआरआई के माहिरों ने अंडों से एल्बूमिन रिंग्स, एग रिंग्स, एग पेन केक, एग पैटीज, एग क्रस्ट पिज्जा, बटेर के अंडों का अचार, बेक्ड अंडा, एगरोल, भरवां लेपित अंडा, एग स्ट्रिप व एग मीट पैटीज बनाने की कामयाब तकनीकें निकाली हैं. किसान उन्हें अपना कर कामयाब करोबारी बन सकते हैं.

इस संस्थान ने पोल्ट्री मीट से मीट वैफर्स, मीट फिंगर चिप्स, चिकन स्टिक्स, मिक्स चिकन लोफ, चिकन सासेज, चिकन गिजार्ड सिरके का अचार, चिकन गिजार्ड सरसों के तेल का अचार, चिकन गिजार्ड स्नैक्स और कुक्ड चिकन रोल आदि बहुत सी ऐसी चीजें बनाने की तकनीकें निकाली हैं, जिन से पोल्ट्री उत्पादों की मियाद बढ़ जाती है. ज्यादातर मुरगीपालक नहीं जानते कि सीएआरआई के माहिरों ने लहसुन, दालचीनी व लौंग की मदद से मुरगे के मांस को 8-10 दिनों तक खाने लायक बनाए रखने की तकनीक निकाली है. उन्होंने पोल्ट्री मीट को ज्यादा मुलायम करने की नायाब तकनीक भी निकाली है. इस संस्थान के 5 पोल्ट्री उत्पादों को पेटेंट मिल चुका है.

कचरा भी बेकार न हो

आमदनी बढ़ाने के लिए पोल्ट्री में बचे हुए कचरे का भी बेहतर इस्तेमाल करना जरूरी है. मसलन पंख छोड़ कर पोल्ट्री मीट के बचे हुए हिस्सों से कुत्तों के लिए उम्दा आहार बनाया जा सकता है. सीएआरआई, बरेली के माहिरों ने इस का उम्दा तरीका खोजा है, ताकि कचरे को भी कीमती बना कर कमाया जा सके. इसी तरह मुरगेमुरगियों की बीट सड़ा कर खाद के तौर पर खेती में काम आ सकती है. इसे बेच कर भी पैसे कमाए जा सकते हैं. देश के कुल अंडा उत्पादन का करीब 30 फीसदी हिस्सा पिछड़े हुए ग्रामीण इलाकों से आता है. यदि छोटे व कमजोर मुरगीपालकों को पोल्ट्री प्रोसेसिंग की सुधरी व किफायती तकनीक सिखा कर उन्हें सहूलियतें दी जाएं, तो उस से अंडा उत्पादों की क्वालिटी बढ़ेगी. साथ ही छोटे किसानों की आमदनी व गांवों में रोजगार के मौकों में भी इजाफा होगा.

हाईटेक अंडे

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शामली की हाईटेक लेयर्स फार्म्स कंपनी ने बिना बदबू के ब्राउन व 4 तरह के सफेद अंडे 30 व 10 की पैकिंग में बाजार में उतारे हैं. चाइल्ड ग्रो बच्चों की बढ़त के लिए, स्ट्रांग बोन स्वाइनफलू से बचाव व हड्डियों की मजबूती के लिए, हाईटेक प्लस विटामिनों व खनिजों की कमी पूरी करने के लिए और हैपी हार्ट कोलेस्ट्राल घटाने व दिल के मरीजों के लिए है. इन अंडों की पैकिंग पर उत्पादन की तारीख व खाने की मियाद छपी रहती है. ये अंडे बर्डफ्लू, एंटीबायोटिक हारमोंस, सेलमोनेला व कोलिफोर्म बैक्टीरिया आदि से बेअसर बताए जाते हैं.

‘संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे’ का नारा बुलंद कर के अंडों की मांग व खपत बढ़ाने वाली नेशनल एग कोर्डीनेशन कमेटी, एनईसीसी दुनिया भर में मुरगीपालकों का सब से बड़ा संगठन है. मुरगीपालकों को अंडों की वाजिब कीमत दिलाने के मकसद से यह संस्था साल 1982 में बनी थी. आज 25 हजार से भी ज्यादा मुरगीपालक इस संस्था के मेंबर बन चुके हैं.

सरकारी इंतजाम

पोल्ट्री को बढ़ावा दे कर सालाना 200 अंडे लेने के मकसद से चंडीगढ़, भुवनेश्वर, मुंबई व हैस्सरघट्टा में केंद्र सरकार के 4 संगठन काम कर रहे हैं. वहां किसानों को तकनीकी जानकारी, ट्रेनिंग व चूजे दिए जाते हैं. गुड़गांव में केंद्रीय कुक्कट कार्य निष्पादन परीक्षण केंद्र, सीपीपीटीसी है, जो अंडे व मीट देने वाली किस्मों की जांचपरख करता है. इस के अलावा मिल्क बूथों की तरह जल्द ही देश भर में अंडा बिक्री की आटोमैटिक मशीनें भी लगेंगी. साल 2009-10 से गांवों में घरेलू मुरगीपालन बढ़ाने की स्कीम चल रही है. इस में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों को मुरगीपालन के लिए माली इमदाद दी जाती है. खेती मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013-14 में 1.16 लाख मुरगीपालकों को 40 करोड़ रुपए दिए गए. इस स्कीम के तहत 31 मार्च, 2014 तक 6 लाख 13 हजार मुरगीपालकों की मदद की जा चुकी है. कुक्कुट उद्यम पूंजी कोष, पीवीसीएफ की स्कीम साल 2011-12 से चल रही है. इस में पोल्ट्री कारोबार की कूवत बढ़ाने व तकनीकी अपनाने के लिए छूट पर पूंजी मुहैया कराई जाती है. इस की मदद से लोग पोल्ट्री फार्म चालू कर सकते हैं या मुरगीदाना बनाने का कारखाना लगा सकते हैं. इस स्कीम की मदद से मुरगीपालन से जुड़े और भी तमाम काम किए जा सकते हैं.

केंद्र सरकार के खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने मीट व पोल्ट्री उद्योग को बढ़ावा देने के लिए साल 2009 में राष्ट्रीय मांस एवं पोल्ट्री प्रसंस्करण बोर्ड, एनएमपीपीबी बनाया था. यह बोर्ड मीट व पोल्ट्री कारोबारियों की कई तरह से मदद करता है, ताकि प्रसंस्करण के काम में तकनीकी सुधार हो और देश में ऐसे उम्दा क्वालिटी के मीट व पोल्ट्री उत्पाद बनें, जिन्हें दूसरे मुल्कों को निर्यात भी किया जा सके. राष्ट्रीय मांस एवं पोल्ट्री प्रसंस्करण बोर्ड, मीट व पोल्ट्री के कारोबार में लगे लोगों को सफाई व बेहतर पैकेजिंग आदि के नए तौरतरीके सिखाने के लिए ट्रेनिंग व सलाह देता है, ताकि पोल्ट्री उद्योग में बदलाव आ सके.

पोल्ट्री को बढ़ावा

उत्तर प्रदेश में मुरगीपालन को बढ़ावा देने के मकसद से पशुपालन महकमा कई तरह की स्कीमें चला रहा है, मसलन कारोबारी लेयर्स, ब्रायलर पैरेंट व हैचरी फार्म खोलने की योजना. सघन कुक्कुट विकास योजना, कुक्कुट प्रशिक्षण योजना और आहार परीक्षण व रोग निदान की प्रयोगशाला भी पशुपालन महकमे की स्कीमों में शामिल हैं. पशुपालन महकमा लोगों को ट्रेनिंग दिलाने के साथसाथ कर्ज भी मुहैया कराता है. इस के अलावा उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीण इलाकों में घूमघूम कर बीमार मुरगियों का इलाज करने के लिए मोबाइल वैनें भी चला रखी हैं, ताकि इस काम में लगे किसानों व उद्यमियों को दिक्कत न हो. जरूरत सिर्फ जानकारी होने व फायदा उठाने की है.

हैचरी

किसान मशीनों की मदद से गैस की गरमी के जरीए अंडों से चूजे निकालने का काम भी कर सकते हैं. लेकिन इस के लिए ट्रेनिंग लेना जरूरी है. हैचरी के काम में तय तापमान पर साफसुथरे अंडे करीने से गरमाहट में रखे जाते हैं. अनउपजाऊ अंडों को छांट कर निकाला जाता है व निकले हुए चूजों को संभाला जाता है. पोल्ट्री का दायरा दिनोंदिन बढ़ रहा है. मुरगी के अलावा बतख, ईमू, बटेर, तीतर व कई दूसरे देशीविदेशी पंछी भी पाले जा रहे हैं. किसानों को पहले इन के बारे में पूरी जानकारी हासिल करनी चाहिए. इस के बाद ट्रेनिंग भी जरूर लेनी चाहिए. पोल्ट्री फार्म के लिए किसान बैंकों से कर्ज ले सकते हैं. आपस में मिल कर स्वयं सहायता समूह या कोआपरेटिव सोसायटी भी बना सकते हैं. किसान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, पोल्ट्री वेंचर कैपिटल फंड या राष्ट्रीय वाटरशेड विकास स्कीम से भी फायदा उठा सकते हैं. मुरगीपालन के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए किसान अपने ब्लाक, जिले के लघु उद्योग, ग्रामोद्योग व पशुपालन महकमे से संपर्क कर सकते हैं. मुरगीपालन से जुड़ी नई से नई बातें जानने के लिए नीचे दिए तों पर भी संपर्क किया जा सकता है :

* निदेशक, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, सीएआरआई, इज्जत नगर, बरेली  : 243122 (उत्तर प्रदेश)

* सचिव, राष्ट्रीय मांस एवं पोल्ट्री प्रसंस्करण बोर्ड, एनएमपीपीबी, 7/6 एएमडीए बिल्डिंग, सीरी फोर्ट, अगस्त क्रांति मार्ग, नई दिल्ली : 110049    

सर्दियों में ‘जिप्सम समृद्ध’ खाद से सुधारें ऊसर

आमतौर पर ऊसर सुधार का काम गरमी के मौसम में किया जाता है, मगर हाल के सालों में कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत से दूसरे मौसमों में भी ऊसर सुधार मुमकिन हो सका है. देश में हरियाणा के करनाल स्थित ‘केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान’ के वैज्ञानिकों ने धान के पुआल व जिप्सम के संयोग से ‘जिप्सम समृद्ध’ नाम से एक गुणकारी खाद बनाने का तरीका खोज निकाला है. इस से न केवल सर्दियों में काफी मात्रा में पाए जाने वाले धान के पुआल का सदुपयोग होगा, बल्कि लवणीय जमीन के ऊसर सुधार का काम भी आसानी से हो सकेगा. खास बात यह है कि यह खाद मिट्टी को कई जरूरी पोषक तत्त्वों की पूर्ति करने की कूवत रखती है.

खाद बनाने का तरीका : धान की कटाई के बाद पुआल को जलाने के बजाय छोटेछोटे टुकड़ों में काटें. इस के बाद कटे हुए टुकड़ों को पूरी रात पानी में डुबो कर रखें ताकि खाद आसानी से बन सके. अगली सुबह भीगे हुए टुकड़ों को निकाल कर 150-200 लीटर वाली टंकी में डालें. पुआल के गीले टुकड़े टंकी में डालने से खाद बनाने में आसानी होगी और पोषक तत्त्व जमीन के बहुत नीचे नहीं जाएंगे. टंकी में पुआल को गोबर से अच्छी तरह लेप देते हैं. खाद सड़ने की गति बढ़ाने के लिए टंकी में ट्राइकोडर्मा कवक 50 ग्राम प्रति 100 किलोग्राम पुआल की दर से मिलाया जाता है. इस के साथ ही 0.25 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति 100 किलोग्राम पुआल के हिसाब से मिलाते हैं. इस के अलावा 25 किलोग्राम जिप्सम प्रति 100 किलोग्राम पुआल की दर से मिलाते हैं.

खाद में नमी बरकरार रखना बहुत जरूरी है, लिहाजा समयसमय पर पानी का छिड़काव जरूर करते रहें. करीब 1 महीने बाद टंकी के मिश्रण को खूब अच्छी तरह से मिलाएं ताकि भरपूर मात्रा में हवा बनी रहे. हवा के बने रहने से खाद को जल्दी तैयार होने में मदद मिलती है. 3 से 4 महीने में यह खाद बन कर तैयार हो जाती है.

प्रयोग विधि : इस संबंध में ‘केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल’ के निदेशक डाक्टर दिनेश कुमार शर्मा ने बताया कि 100 किलोग्राम पुआल से तैयार खाद को खूब अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की 1 टन खाद में मिला कर खेत में इस्तेमाल करना चाहिए. यह पूरी मात्रा 1 एकड़ खेत के लिए काफी है.

खाद के फायदे : भारत में काफी मात्रा में धान का पुआल पाया जाता है. देश में लगभग 600-700 मिलियन टन खेती से निकलने वाले फालतू पदार्थ पाए जाते हैं. इस में तकरीबन 300 मिलियन टन पुआल होता है. धान का पुआल जला दिए जाने से पर्यावरण व मिट्टी की सेहत को काफी नुकसान पहुंचता है. ‘केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान’ के एक अंदाजे के मुताबिक यदि धान को जला दिया जाता है, तो तकरीबन 20 फीसदी नाइट्रोजन, 25 फीसदी फास्फोरस व 20 फीसदी पोटाश का नुकसान उठाना पड़ता है. ‘जिप्सम समृद्ध’ खाद से यह नुकसान नहीं हो पाता है. इस के अलावा ‘जिप्सम समृद्ध’ खाद से होने वाले खास फायदे निम्न प्रकार हैं :

* ऊसर (खासकर लवणीय भूमि में) का सुधार होता?है.

* जिप्सम एक प्रमुख लवणीय भूमि सुधारक है. ऐसे में जिप्सम की घुलनशीलता को बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि इस में कई प्रकार के अम्ल पाए जाते हैं, जो इस की घुलनशीलता बढ़ाने में मदद करते हैं.

* यह कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में इजाफा करता है, क्योंकि इस में  कार्बनिक पदार्थ साधारण खाद के मुकाबले ज्यादा पाया जाता है, जोकि मिट्टी की संरचना में सुधार करता है.

* यह मिट्टी में पोषक तत्त्वों की मात्रा में इजाफा ही नहीं करता, बल्कि मिट्टी की उर्वरा कूवत को भी लंबे समय तक बनाए रखता है.

पिस्ता नानखटाई सब के मन को भाई

नानखटाई एक तरह का बिस्कुट होता है, जो बेकरी में बनाया जाता है. अब इसे बनाने के लिए ओवन का प्रयोग किया जाने लगा है. भारत भर में नानखटाई मिलती है. अब इसे बड़ेबड़े होटलों में भी लोगों को चाय के साथ दिया जाता है. इसे बनाना सरल होता है. इसे घर में भी बना कर इस का स्वाद लिया जाता है. जो लोग बेकरी का रोजगार करते हैं, नानखटाई उन के लिए बेहद मुनाफे वाली साबित होती है. इस का बिजनेस करने वालों को कभी नुकसान नहीं होता है. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में बनने वाली नानखटाई बेहद मशहूर है. मेरठ में छोटीबड़ी सभी दुकानों में थाल में सजा कर नानखटाई को बेचा जाता है. यहां की नानखटाई की डिमांड पूरे देश में रहती है. मेरठ आने वाले लोग यहां से नानखटाई जरूर ले जाते हैं. मेरठ में 150 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 600 रुपए प्रति किलोग्राम तक की नानखटाई मिलती है. आमतौर पर यह 30 मिनट में बन कर तैयार हो जाती है. देशी घी और मेवों की नानखटाई महंगी होती है. अब तरहतरह की नानखटाई बनने लगी है. काजू नानखटाई, काजूबादाम नानखटाई, पिस्ता नानखटाई व मूंग नानखटाई की मार्केट में काफी डिमांड है. नानखटाई गरमगरम खाने में ज्यादा स्वाद मिलता है. आमतौर पर इस का सीजन बरसात के बाद जाड़ों से शुरू होता है और गरमी भर रहता है. बरसात में यह कम बिकती है. अब अच्छी पैकिंग आने के बाद पूरे साल नानखटाई बिकती है. हर छोटेबड़े शहर में बेकरी वालों के यहां नानखटाई  मिल जाती है. खानपान के कारोबार से जुड़ी लखनऊ की रहने वाली सुनीता सिंह कहती हैं कि नानखटाई अब बिस्कुट से अधिक पसंद की जाने लगी है.

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