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पाठकों की समस्याएं

मैं 28 वर्षीय विवाहिता हूं. विवाह को 1 वर्ष हुआ है. समस्या यह है कि मुझे सैक्स संबंध बनाने से डर लगता है. पति मेरी समस्या को समझते हैं और मेरे साथ सहयोग करते हैं. मैं जानती हूं कि यह गलत है पर न जाने क्यों मुझे सैक्स के दौरान होने वाले दर्द से डर लगता है. क्या यह सेफ सैक्स होगा? कहीं ज्यादा ब्लीडिंग तो नहीं होगी? जैसे डर की वजह से मैं पति के साथ सैक्स संबंध बनाने से डरती हूं. क्या मेरा यह डर बेवजह है? समस्या का समाधान करें.

आप की जैसी समस्या कई महिलाओं को होती है. कई महिलाओं में यह डर दर्द का, किसी को अधिक ब्लीडिंग का तो किसी को अन्य किसी तरह की तकलीफ होने की शंका का होता है. इस के अलावा कई महिलाओं को उत्तेजना भी नहीं होती. वहीं कुछ महिलाएं अपने प्राइवेट पार्ट के प्रति इतनी इनसिक्योर होती हैं कि संक्रमण से डरती हैं. लेकिन ये सभी डर समय के साथ समाप्त हो जाते हैं.

जहां तक सैक्स संबंध बनाते समय दर्द की बात है, वह वेजाइनल व पेनिस की ड्राइनैस की वजह से होता है. इस से बचने के लिए सैक्स संबंध बनाने से पूर्व फोरप्ले करें. आप अपने मन में पहले से सैक्स के प्रति बैठे मिथकों को दूर करें. इस के लिए चाहें तो सैक्स काउंसलर से भी मिलें. सैक्स संबंध एक नैचुरल प्रक्रिया है, इसे बिना किसी भ्रांति के, बिना डरे एंजौय करें. कई बार इस का कारण बचपन में किसी परिचित या अपरिचित की कोई कुचेष्टा भी होती है जिस से मन में डर बैठ जाता है.

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मैं 32 वर्षीय विवाहित महिला हूं, 4 माह की गर्भावस्था है. पति चाहते हैं कि हम इस दौरान भी सैक्स संबंध बनाएं. मैं डरती हूं. क्या इस दौरान संबंध बनाना उचित होगा? कहीं इस से होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य पर तो कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा? गर्भावस्था के दौरान अगर सैक्स संबंध बनाने हों तो किनकिन बातों का ध्यान रखना चाहिए? जानकारी दें.

आम महिला की तरह गर्भावस्था में सैक्स से जुड़ा आप का डर वाजिब है. अधिकांश माएं इस दौरान सैक्स संबंध बनाने से डरती हैं क्योंकि उन्हें लगता है इस से उन के होने वाले शिशु को नुकसान हो सकता है. कुछ स्थितियों को छोड़ कर आप गर्भावस्था के दौरान सैक्स कर सकते हैं. अगर आप को पेट में किसी प्रकार का दर्द या ऐंठन हो, पहले कभी गर्भपात हुआ हो, पहले कभी प्रीमैच्योर डिलीवरी हुई हो या योनि से अधिक रक्तस्राव होने आदि स्थिति में सैक्स न करें.

अगर थकावट या चक्कर आने जैसी स्थिति महसूस हो तो भी सैक्स न करें. सामान्यतया डाक्टर गर्भावस्था के प्रारंभिक 2 महीने और गर्भावस्था के अंतिम 1 महीने में सैक्स से दूर रहने की सलाह देते हैं. लेकिन अगर शिशु व मां पूरी तरह स्वस्थ हैं तो चिकित्सक से सलाह ले कर सही सैक्स पोजीशन अपनाकर सैक्स संबंध बनाए जा सकते हैं.

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मैं 18 वर्षीय कालेज में पढ़ने वाली छात्रा हूं. पिछले दिनों फेसबुक पर मेरी दोस्ती एक लड़के से हुई. शुरूशुरू में हम दोनों के बीच औपचारिक बात होती थी, बाद में हमारे बीच खुल कर बात होने लगी. हम दोनों जब भी खाली होते, चैटिंग करते. मुझे उस से बात करना अच्छा लगता था. लेकिन अचानक उस लड़के ने मुझ से चैटिंग करनी बंद कर दी. मैं ने जानने की कोशिश की तो उस ने कोई वाजिब जवाब नहीं दिया. मुझे उस का यह व्यवहार अजीब लगा. फिर अचानक उस ने बात करनी शुरू कर दी है. मैं तय नहीं कर पा रही हूं कि उस से बातचीत जारी रखूं या उस से नाता तोड़ लूं. मैं उसे खोना भी नहीं चाहती और उस के व्यवहार के कारण दुखी भी नहीं होना चाहती. क्या करूं, सलाह दीजिए.

अगर वह लड़का आप के पूछने के बाद भी आप से बात न करने, दूरी बनाने का कारण नहीं बताना चाहता तो आप जबरदस्ती न करें. दरअसल, फेसबुक पर होने वाली चैटिंग मात्र आकर्षण है जिसे अधिकांश युवा प्यार समझने की भूल कर बैठते हैं और उस के पीछे अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाते हैं. वह लड़का आप की भावनाओं से खेल रहा है, आप के साथ टाइमपास कर रहा है. आप उस से बात करना बंद कर दें. शुरुआती दौर में यह आप के लिए थोड़ा कठिन होगा लेकिन धीरेधीरे आप उसे भूल जाएंगी. आप जितनी जल्दी उस से दूरी बना लेंगी, आप के लिए अच्छा होगा. इस समय आप के लिए फेसबुक से ज्यादा जरूरी आप का कैरियर है, उस ओर ध्यान दें. इसी में आप की भलाई है.

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मैं और मेरा बौयफ्रैंड एकदूसरे को बेहद प्यार करते हैं और विवाह करना चाहते हैं लेकिन हमारे परिवार वाले मांगलिक दोष को ले कर विवाह में समस्या पैदा कर रहे हैं. कृपया इस दोष का कोई समाधान बताएं. हालांकि हम दोनों इन बातों में विश्वास नहीं करते हैं लेकिन घर वालों को कैसे समझाएं? उपाय बताएं.

वैवाहिक मामलों में मांगलिक दोष जैसी अड़चनें पंडितपुजारियों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए गढ़ी जाती हैं. कई बार तो परिवार वाले जिस रिश्ते के लिए राजी नहीं होते, उस के लिए वे पंडितों से कहलवा कर रिश्ते जुड़ने में इस तरह से अड़चनें पैदा करते हैं. ये सब पंडितों द्वारा लोगों को गुमराह कर के पैसा ऐंठने का जरिया मात्र है. विवाह की सफलता या असफलता पतिपत्नी की आपसी समझ और सामंजस्य पर निर्भर करती है न कि व्यर्थ के अंधविश्वासों पर. आप अपने घर वालों को इस सच से अवगत कराएं और बिना किसी वहम के विवाह कर के वैवाहिक जीवन की शुरुआत करें.  

भारत के खिलाफ डेविड वार्नर को मिल सकता है आराम

भारत के खिलाफ वनडे सीरीज के दौरान ऑस्ट्रेलिया के उपकप्तान डेविड वॉर्नर को आराम दिया जा सकता है. वॉर्नर की जगह टीम में शॉन मार्श को शामिल करने की खबर है.

टीम इंडिया के खिलाफ वनडे सीरीज के दौरान वॉर्नर दूसरी बार पिता बनने वाले हैं और ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें किसी भी वक्त छुट्टी लेने की छूट दे दी है. वॉर्नर की पत्नी केंडिस फॉलजोन के जनवरी के तीसरे हफ्ते में मां बनने की उम्मीद है. 29 साल के वॉर्नर इससे पहले 2014 में बच्चे के जन्म की वजह से जिम्बाब्वे का दौरा छोड़ चुके हैं.

धमाकेदार बल्लेबाज वॉर्नर की जगह मार्श को शामिल करने की खबर है. वहीं, मार्श ने पिछले 12 महीने से कोई वनडे मैच नहीं खेला है. हालांकि बांए हाथ के इस बल्लेबाज़ का पिछले 7 मैचों में औसत 76 का रहा है. अगर मार्श को मौका मिलता है, तो वो एरॉन फिंच के साथ पारी की शुरुआत कर सकते हैं.

जहां तक कप्तानी की बात है, तो वनडे क्रिकेट में जॉर्ज बेली ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी कर चुके हैं, लेकिन इस बार स्टीवन स्मिथ ही ये जिम्मेदारी निभाएंगे और जॉर्ज बेली को नंबर चार पर बल्लेबाजी करने को कहा जा सकता है.

स्मिथ पिछले 18 महीने से लगातार क्रिकेट खेल रहे हैं. भारत के खिलाफ अहम सीरीज होने की वजह से उन्हें आराम मिलना मुश्किल है और वो खुद सीरीज में खेलने की इच्छा क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को जता चुके हैं. स्मिथ को बिग बैश लीग के दो मैचों में आराम दिया गया था.

हम आजाद हैं

हम आजाद हैं

कहीं भी जा सकते हैं

कुछ भी कर सकते हैं

कहीं भी थूक सकते हैं

कुछ भी फेंक सकते हैं

हम आजाद हैं

घर का कूड़ा छत पर से

किसी पर भी फेंक सकते हैं

गंगा की सफाई योजना की

कर के सफाई

हम किसी भी पवित्र नदी में

घर की गंदगी बहा सकते हैं

अरे, कहां रहते हैं आप?

यह इंडिया है

यहां जितने कानून बनते हैं

उतने ही विकल्प खुलते हैं

कानून तोड़ने के बहाने बनते हैं

नएनए तरीके बनते हैं

अरे, हम आजाद हैं

आजादीपसंद है नियति हमारी

पड़ोसी के दरवाजे पर

अपना कूड़ा फेंकने को

आजाद हैं हम

अपने स्पीकर

कानफोड़ू संगीत लगा कर

महल्ले वालों को चौबीस घंटे तक

भजनकीर्तन सुना कर

आलसी जो पूजापाठ में हैं

उन्हें रातभर जगा कर

उन का उद्धार करते हैं

हां, हम आजाद हैं.

                 –  केदारनाथ ‘सविता’

 

अरुणिमा ने एवरेस्ट के बाद अब अर्जेंटीना में फहराया तिरंगा

कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट फतेह करने वाली वर्ल्ड रिकॉर्डहोल्डर पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा ने एक और नई उपलब्धि हासिल कर ली है. अरुणिमा ने एशिया के बाहर सबसे ऊंची पर्वत चोटी कही जाने वाली माउंट अकोनकागुआ पर भी पहुंचने का कीर्तिमान हासिल कर लिया है. कृत्रिम पैर के सहारे यह उपलब्धि हासिल करने वाली वह दुनिया की पहली महिला बन गई हैं.

अरुणिमा ने यह कामयाबी बीते 25 दिसंबर को हासिल की है. उन्होंने 6,992 मीटर ऊंची माउंट अकोनकागुआ पर्वत चोटी पर पिछले माह 12 दिसंबर को चढ़ाई शुरू की थी और 25 दिसंबर को शाम 4:30 बजे यह उपलब्धि हासिल करके वहां तिरंगा फहरा दिया था. अरुणिमा मिशन 7 समिट के तहत अब तक दुनिया की पांच सबसे ऊंची पर्वत चोटियों पर पहुंच चुकी हैं

उन्होंने कहा, वह बची हुई दो पर्वत चोटियों पर भी जल्द ही फतेह हासिल कर लेंगी. अरुणिमा ने बताया कि एशिया के बाहर सबसे ऊंची पर्वत चोटी माने जाने वाली अकोनकागुआ पर आरोहण के दौरान उनके सहयोगी ओम प्रकाश और गाइड के तौर पर मारिया उनके साथ मौजूद थे.

आपको बता दें कि अरुणिमा ने साल 2011 में एक ट्रेन हादसे में अपना बायां पैर गंवा दिया था. इसके बाद उन्होंने सभी को चौंकाते हुए कृत्रिम पैर के सहारे 21 मई 2013 को एवरेस्ट फतेह किया था. उनकी इस उपलब्धि का सम्मान करते हुए भारत सरकार उन्हें पद्यश्री के सम्मान से नवाजा गया था.

तुम्हारे एहसास

समेट लिया है हम ने

एक टुकड़ा आसमान

एक बरसता बादल

एक ठिठुरती शाम और

सुरीली चांदनी रात

चिडि़यों की चुनचुन और

पहाड़ से झरता सुकून

रंगबिरंगे नन्हे फूल और

चीड़ों की गुपचुप सरगोशी

बल खाती लहराती सड़क और

झरने का मधुर संगीत

तुम्हारे एहसासों में

लिपटी सुबह और

तुम्हारी आगोश में

मदहोश शाम.

                   – डा. प्रिया सूफी

जिम्बाब्वे की जीत से क्रिकेट का 34 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा

नया साल जिम्बाब्वे क्रिकेट टीम के गेंदबाजों के लिए सौभाग्यशाली बनकर आया. एक रोमांचक मुकाबले में जिम्बाब्वे और अफगानिस्तान की टीमों ने एक ऐसा रिकॉर्ड भी बना दिया, जो वनडे क्रिकेट के 34 सालों के इतिहास में कोई टीम नहीं बना सकी.

जी हां, कम स्कोर वाले इस मुकाबले में दोनों टीमों के मिलाकर कुल 18 बल्लेबाज दहाईं रन संख्या का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाए. यानी मैच में 18 बल्लेबाज 10 रन भी नहीं बना सके. यह क्रिकेट के इतिहास में पहला मौका है जब 22 में से 18 बल्लेबाज 10 से कम पर आउट हुए हो.

इससे पहले साल 1981 में वेस्टइंडीज और इंग्लैंड के बीच मुकाबले में 17 बल्लेबाज 10 से कम रन बनाकर आउट हुए थे. पिछले सप्ताह पहली बार अंतरराट्रीय क्रिकेट परिषद (आइसीसी) की वनडे रैंकिंग में शीर्ष-10 में जगह बनाने वाली अफगान टीम सिर्फ 16.1 ओवर खेल सकी और मोहम्मद शहजाद (31) दहाई का आंकड़ा पार करने वाले एकमात्र बल्लेबाज रहे. जबकि जिम्बाब्वे के 3 बल्लेबाज दहाई के आंकड़े में पहुंचे.

जिम्बाब्वे ने तीसरे वन-डे में अफगानिस्तान को 117 रन के बड़े अंतर से हराकर पांच मैचों की सीरीज में अपनी उम्मीदें कायम रखी है. टॉस जीतकर 48.3 ओवरों में मात्र 175 रन बना सकी जिम्बाब्वे के गेंदबाजों ने बेहद धारदार गेंदबाजी की और अफगानिस्तान को उनके न्यूनतम स्कोर 58 रनों पर ढेर कर दिया. जिम्बाब्वे के ल्यूक जोंगवे ने पहली बार पांच विकेट लिए जबकि नेविल मादजिवा ने तीन विकेट लेकर अफगानिस्तान को मात्र 16.1 ओवर में ऑलआउट कर दिया.

यह भी खूब रही

दीवाली की छुट्टियों में बच्चे भी घर आए थे, तो सभी ने साथ में फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया. जब हम टाकीज में पहुंचे तो फिल्म शुरू हो गई थी और हाल में अंधेरा था. हम सभी अंधेरे में ही जा कर सीट पर बैठ गए.

लगभग 15 मिनट बाद मुझे लगा कि मेरे पैरों में दर्द हो रहा है. मैं ने सोचा, ऐसे ही हो रहा होगा क्योंकि कभीकभी कमर व पैरों में मुझे दर्द हो जाता है. सो, मैं ने फिल्म में ध्यान लगाने की कोशिश की. 15 मिनट और बीते, अब ऐसा लग रहा था जैसे दर्द पैरों से कमर की तरफ जा रहा है. कुछ देर बाद तेज जलन भी होने लगी. अब बैठना भी मुश्किल हो रहा था. बड़ी अजीब हालत थी. मैं दर्द व जलन से परेशान हो रही थी और सभी लोग फिल्म के मजे ले रहे थे. मैं उन का मजा खराब नहीं करना चाहती थी.

इस तरह आधा घंटा मैं और बैठी रही लेकिन जब स्थिति असहनीय हो गई तो मैं ने सोचा कि मुझे घर जाना चाहिए. बिटिया पास में बैठी थी, मैं ने उस से अपनी परेशानी बताई. उस ने कहा, ‘‘आई, जरा खड़ी होना,’’ और उस ने मोबाइल की टौर्च जला कर सीट का मुआयना किया व जोर से हंस पड़ी. मैं ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’ वह बोली, ‘‘आई, खुद ही देख लो.’’ और मैं ने देखा वहां सीट पर कागज में ढेर सारी तली मिर्चें पड़ी थीं, मैं अंधेरे में उन पर ही बैठ गई थी.

– वंदना मानवटकर, सिवनी (म.प्र.)

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मेरा भांजा कोलकाता से पुरी जा रहा था. उस के कंपार्टमैंट में उस के हमउम्र की एक लड़की भी चढ़ी थी. उस की खिड़की वाली बर्थ थी. लड़की को उस के पिता बैठाने आए थे, उसे भागलपुर उतरना था. वह वहां पढ़ रही थी. भांजा खिड़की वाली सीट पर बैठा था तो लड़की के पिता ने बर्थ नंबर दिखा कर कहा कि यह उस की बेटी की सीट है. भांजा बोला कि ठीक है, जब उसे (लड़की को) लेटना होगा तो मैं यहां से उठ जाऊंगा.

लड़की का पिता माना नहीं, तो मजबूरन वह वहां से उठ कर दूसरी सीट पर बैठ गया. जब ट्रेन चलने लगी तब भी लड़की का पिता बारबार इशारे से खिड़की की ओर अपनी बेटी का ध्यान केंद्रित करवा रहा था कि खिड़की की सीट पर तुम ही बैठना, नहीं तो यह लड़का बैठ जाएगा.

लड़की ने सिर हिला कर तसल्ली दी, तब जा कर उस के पिता ने बायबाय कह कर हाथ हिलाया. इधर, गाड़ी स्टेशन से चली, उधर उस लड़की का बौयफ्रैंड आया और उसे अपने साथ ले कर दूसरे कंपार्टमैंट में चला गया और मेरा भांजा पूरे रास्ते आराम से खिड़की वाली सीट पर बैठ कर बाहर के नजारे देखते हुए रात में भी मजे से सोते हुए गया.

– अंजु सिंगड़ोदिया, हावड़ा (प.बं.)

ऐसा भी होता है

पड़ोस में शादी थी. शादी के हर कार्यक्रम में दूल्हे की चाची, जो दूसरे शहर में रहती थीं, सजधज कर ढोलक बजाने बैठ जातीं या फिर एकदम चटक मेकअप और गहरे गले के ब्लाउज पहन अदाएं दिखलाती रहतीं. जब दुलहन विदा हो कर आ गई तो मंडप के नीचे गानेबजाने का कार्यक्रम चल पड़ा.

मेरे पति घर चलने का इशारा कर रहे थे. उन का इशारा देख कर दूल्हे की मां बोल पड़ीं कि विदा करा कर बहू को घर लाए हैं, आप लोगों को बिना डांस देखे हम जाने नहीं देंगे. इस पर चाचीजी भी हाथ हिला कर बोलीं, ‘चलिए, आइए मैदान में, प्रतियोगिता हो जाए.’

सभी आ कर बैठ गए. कोई गाने लगा तो कोई ठुमके लगाने लगा. एक ने तो जेब से नोट निकाल कर चाची को दिखाए. फिर होंठ में नोट रख गरदन हिलाहिला कर पकड़ने का इशारा करने लगे.

उस की इस हरकत पर मैं ने अपने पति से गुस्से में कहा, ‘यह क्या तमाशा है.’ वे बोले, ‘अरे, नाचनेगाने वाली जो बुलाई गई है उसी को तो वे नोट देंगे.’ मैं ने जब उन्हें बताया कि वे दूल्हे की चाची हैं. यह सुनते ही उन के होश उड़ गए और बोले, ‘अरे, हम लोग तो कुछ और ही समझे थे.’ अब तो वहां से खिसकने में ही सब ने भलाई समझी.

– दीपा पांडे, लखनऊ (उ.प्र.)

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हम एक विवाह समारोह में इंदौर गए. वहां वधू को गिफ्ट देने के लिए एक दुकान से रोटीमेकर खरीदा. उसी में उस का वारंटी कार्ड भी डलवा दिया, ताकि कभी कोई परेशानी हो तो वे स्वयं सर्विसिंग करवा सकें.

कुछ दिनों के बाद मैं अपने बौस के साथ एक रिसैप्शन में भोपाल गया. वहां उन्होंने मेरी राय से एक रोटीमेकर खरीद कर वधू को गिफ्ट किया.

मेरे भांजे की शादी शुजालपुर में तय हुई. जब हम सगाई कर के लौट रहे थे तो हमारे हाथ में उन के द्वारा दिए गए गिफ्ट थे. कोई गिफ्ट छोटा, कोई बड़ा था. मुझे जो गिफ्ट मिला था वह कौन सा था, मैं भूल गया. दीदी ने जो दिया, मैं ले आया. घर पहुंचा तब रात हो गई थी. गिफ्ट डिक्की में ही रह गया.

2-3 दिन बाद हमारी मैरिज एनिवर्सरी थी. बौस के साथ जहां रिसैप्शन में गया था, उन की कंपनी वहां नए प्रोडक्ट को लौंच कर रही थी. उन्होंने हमें विश किया और गिफ्ट भी दिया. दूसरे दिन बच्चों के साथ बातें करते हुए गिफ्ट खोले तो दंग रह गए. दोनों रोटीमेकर, जिन के वारंटी कार्ड हम ने ही डलवाए थे, हमारे सामने रखे थे. ये सब कैसे हुआ, पता नहीं, पर ऐसा भी होता है.

– मोनाली हरीश जैन, मुंबई (महा.)

ये पति

मेरे पति बहुत भुलक्कड़ हैं. कार की चाबी, मोबाइल, घड़ी, चश्मा इधरउधर रख कर भूल जाते हैं.

मेरे पति बहुत भुलक्कड़ हैं. कार की चाबी, मोबाइल, घड़ी, चश्मा इधरउधर रख कर भूल जाते हैं. कई बार तो कार की चाबी कार में लगी रहती है और कार का दरवाजा बंद कर देते हैं, जिस से कार लौक हो जाती है. बाजार शौपिंग करने चले जाते हैं. वापस आने पर जेब में चाबी ढूंढ़ते हैं. याद आने पर कि चाबी तो कार में ही लगी है. घर पर फोन कर दूसरी चाबी मंगवाते हैं.

उन के भुलक्कड़पन से मैं बहुत परेशान रहती हूं. जब भी उन के साथ बाजार जाती हूं, कार का दरवाजा बंद करने से पहले देख लेती हूं, कार की चाबी उन के हाथ में है या नहीं.

एक दिन मैं सपरिवार कार से अपने रिश्तेदार के घर गई. कार से वापस लौटते समय मैं ने पतिदेव से पूछा, ‘‘आप ने मोबाइल तो रख लिया था न?’’

पतिदेव ने घबराते हुए, गाड़ी चलाते हुए कहा, ‘‘अरे, मोबाइल तो रख लिया लेकिन गाड़ी की चाबी तो वहीं भूल गया.’’

फिर क्या था. मैं ने बिना सोचेसमझे अपना रटारटाया भाषण देना शुरू कर दिया. गुस्से के कारण ध्यान ही नहीं रहा कि ये मजाक कर रहे हैं, बिना चाबी के भला गाड़ी कैसे चल सकती है? करीब 5 मिनट चला यह लंबा भाषण तब समाप्त हुआ जब गाड़ी में बैठे बच्चे, सास, पति, जोरजोर से हंसने लगे. कुछ देर तक तो मैं समझ नहीं पाई हंसी का कारण, जब बात समझ में आई तो मैं भी खिलखिला कर हंस दी.

– भावना भट्ट, भोपाल (म.प्र.)

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मेरे पति की आदत रही है कि सारी नकारात्मक बातों को मेरे हिस्से में डाल कर स्वयं अच्छी बातों का श्रेय ले कर वाहवाही लूटते हैं. मेरे मौसेरे बहनोई के हाथ टूट जाने पर हम दोनों उन्हें देखने गए. वहां जाते ही मेरे पति शुरू हो गए, ‘‘अरे साहब, केवल एक बार गिरने से ही आप की हड्डी टूट गई.’’

फिर मेरी ओर इंगित करते हुए कहने लगे, ‘‘इन के कारण तो मैं न जाने कितनी बार जमीन पर गिरा. वह तो मेरे अच्छे खानपान के कारण मेरे शरीर की हड्डियां सहीसलामत रह गईं.’’

सभी को हंसते देख मारे शर्म के मेरी आंखें भर आईं, ‘‘क्या बेकार की बातें कर रहे हैं. मेरे कारण आप कब गिरे? बिना पीछे देखे बैठिएगा तो गिरना लाजिमी है.’’

पति हंसते हुए बोले, ‘‘घर में 2 बार पोंछा लगवाइएगा, मेरे बैड पर सिल्की बैडकवर डालिएगा तो गिरना ही है. जैसे भी मेरा गिरना हो, कारण तो आप ही हैं.’’

उन की बातों पर माथा पीटने के सिवा मेरे पास चारा न था.

– रेणु श्रीवास्तव, पटना (बिहार)

कजरिया

कम से कम कलाकारों को ले कर बनाई गई यह फिल्म डौक्यूमैंट्री सरीखी लगती है. फिल्म के सभी कलाकार नए हैं. फिल्म में कोई तड़कभड़क नहीं है, न ही इस में गाने हैं. फिल्म का अधिकांश हिस्सा हरियाणा के एक गांव में शूट किया गया है. फिल्म कुछ हद तक दर्शकों को बांधे तो रखती है परंतु उन के दिमागों पर असर नहीं छोड़ पाती.

‘कजरिया’ जैसी फिल्में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाने के लिए ज्यादा बनती हैं. इस फिल्म को फोर्ब्स लाइफ मैगजीन ने साल की 5 बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया है. भ्रूण हत्याओं पर केंद्रित यह फिल्म चौंकाती है. हमारे देश में बच्चियों की हत्याओं का आंकड़ा इतना ज्यादा है कि 1986 से अब तक 10 लाख से ज्यादा बच्चियों को या तो जन्म देने से पहले या जन्म लेने के तुरंत बाद मार दिया गया.

फिल्म बताती है कि कन्या हत्याओं का यह सिलसिला सिर्फ गांवों तक ही सीमित नहीं है, बड़े शहरों के पढ़ेलिखे लोग भी लड़की पैदा करना पसंद नहीं करते. फिल्म का विषय सचमुच बहुत अच्छा है, बहुतकुछ सोचने को मजबूर करता है. इस विषय पर महिलाओं की सोच क्या है, इस पर भी रोशनी डाली गई है. परंतु फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है, वह सब सतही सा लगता है. ऐसा लगता नहीं कि फिल्म देख कर लोगों पर इस का कुछ असर होगा.

फिल्म की कहानी भारत के गांवों में फैले अंधविश्वासों को बयां करती है. आज गांवों के लोग भले ही पढ़लिख गए हों, फिर भी उन में अंधविश्वास कूटकूट कर भरे हुए हैं. आज भी गांवों में पुजारी और तांत्रिक गांव वालों का शोषण करते हैं. वे काली माता का खौफ दिखा कर गांव वालों का मालमता हड़पते हैं. आज भी गांव की औरतें यह मानती हैं कि बेटा ही कुल का तारक होता है.

फिल्म की निर्देशिका मधुरीता आनंद ने देश के छोटेछोटे गांवों में हो रही भू्रण हत्याओं को अलगअलग महिलाओं की कहानियों के साथ जोड़ कर पेश किया है.

कहानी हरियाणा के एक गांव की है, जहां के लोग लड़की को पैदा होते ही गांव के एक मंदिर में रहने वाली काली मां की पुजारिन कजरिया (मीनू हुडा) के हाथों में दे देते हैं और वह उन्हें मार डालती है. गांव का पुलिस इंस्पैक्टर भी इस में दखल नहीं देता. गांव में रहने वाला एक तांत्रिक बनवारी (कुलदीप रुहिल) कजरिया को अफीम खिलाता रहता है और कजरिया अफीम के नशे में हत्याएं करती जाती है.

गांव में हर पूर्णमासी के दिन लगने वाले मेले की कवरेज करने के लिए एक पत्रकार मीरा शर्मा (रिद्धिमा सूद) वहां जाती है. वह तहकीकात करती है तो उसे कजरिया के बारे में सचाई पता चलती है. वह कजरिया का इंटरव्यू लेती है और अपने चैनल पर दिखाती है. पूरा देश इसे देख कर सन्न हो जाता है. सरकारी तंत्र हरकत में आता है. कजरिया समेत बनवारी, गांव का पुजारी, पुलिस इंस्पैक्टर, ग्राम प्रधान सब पकड़ लिए जाते हैं. कजरिया को फांसी दे दी जाती है.

यह फिल्म भ्रूणहत्या समस्या को बिना सुलझाए ही खत्म हो जाती है. गांव की औरतों को बेटियों को बचाने के लिए अपने पतियों के आगे सीना तान कर खड़े होते दिखाया गया है परंतु यह भी कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता. निर्देशिका ने फिल्म में बेवजह रिद्धिमा सूद के बोल्ड सीन डाले हैं. उसे ड्रग्स लेते दिखाया गया है. उस के लिप टु लिप सीन भी जबरन डाले गए हैं. फिल्म में कजरिया के मुंह से गालियों की बौछार सी कराई गई है. फिल्म के बैकग्राउंड में 2 गाने बजते रहते हैं. छायांकन अच्छा है. संक्षेप में, यह अच्छे विषय की बेअसर फिल्म है.

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