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इस साल फेसबुक में आ सकते हैं ये 6 हाईटेक फीचर्स

साल 2016 में गूगल के बाद यदि किसी टेक कंपनी पर लोगों की सबसे ज्यादा नजर होगी, तो वह फेसबुक है. फेसबुक की खासियत है कि वह हर साल कोई न कोई नया फीचर जरूर एड करती है.

इस साल होंगे ये नए फीचर…

1. वर्चुअल रिएलिटी कंटेंट
फेसबुक ने साल 2015 में वर्चुअल रिएलिटी कंपनी ऑक्युलस रिफ्ट को टेकओवर किया था. ऐसे में माना जा रहा है कि फेसबुक में इस साल वर्चुअल रिएलिटी कंटेंट आ सकता है. इसके अलावा ऑक्युलस रिफ्ट गैमिंग के क्षेत्र में एक बड़ा नाम हो सकती है.

2. फेसबुक इंस्टेंट आर्टिकल्स में सुधार
फेसबुक ने साल 2015 में इंस्टेंट आर्टिकल फीचर लॉन्च किया था. हालांकि ये केवल 9 पब्लिशर्स के लिए ही था. इस फीचर के जरिए आर्टिकल्स दस गुना ज्यादा तेजी से लोड होते हैं. इस फीचर का मकसद था कि यूजर को ज्यादा तेजी से कंटेंट और पब्लिशर को ज्यादा रीडर मिले. साथ ही फेसबुक के यूजर्स की संख्या भी बढ़े. हालांकि इसे पब्लिशर्स का अच्छा रिस्पांस नहीं मिला था. ऐसे में फेसबुक इस साल अपने इंस्टेंट आर्टिकल फीचर में सुधार करेगा.

3. डिजिटल असिस्टेंट सर्विस
एप्पल के सीरी और गूगल के गूगल नाउ के बाद फेसबुक अपनी वॉइस असिस्टेंट सर्विस फेसबुक M पर काम कर रहा है. ये सर्विस फेसबुक मैसेंजर के अंदर होगी. फेसबुक M के जरिए यूजर्स को ह्यूमन असिस्टेंट सर्विस दी जाती है. जैसे अगर आपको किसी शब्द को बोलने में तकलीफ हो रही है तो ये बताएगा कि इसे किस तरह से बोलें.

4. वॉट्सऐप वीडियो कॉलिंग
फेसबुक ने साल 2014 में वॉट्सऐप का टेकओवर कर लिया था. इसके बाद अप्रैल 2015 में वॉट्सऐप ने कॉलिंग की सुविधा लोगों को देनी शुरू की थी. पिछले दिनों वेबसाइट ने वॉट्सऐप के iOS ऐप का स्क्रीनशॉट शेयर किया है जिसमें वॉट्सऐप पर होने वाले ऑनगोइंग वीडियो कॉल को दिखाया गया है. वेबसाइट के मुताबिक iOS यूजर के लिए बने वॉट्सऐप के 2.12.16.2 वर्जन को टेस्ट किया जा रहा है. इस वर्जन में वीडियो कॉल सपोर्ट मौजूद है. उम्मीद की जा रही है कि यह फीचर मार्च 2016 तक लॉन्च कर दिया जाएगा.

5. 2G में बेहतर स्पीड
इस साल फेसबुक 2G नेटवर्क कनेक्शन में और बेहतर स्पीड दे सकता है. पिछले साल अगस्त में 2G को ध्यान में रखते हुए फेसबुक लाइट लॉन्च किया गया था. इसके अलावा कंपनी ने अपने सभी कर्मचारियों के लिए एक नया रूल निकाला था जिसमें हर मंगलवार फेसबुक के ऑफिस में एक घंटे 2G स्पीड पर काम करना होगा.

6. ब्रेकअप फीचर
फेसबुक ने पिछले साल के आखिर में अपने ब्रेकअप फीचर का ट्रायल शुरू किया था. इस फीचर के जरिए जैसे ही यूजर अपना रिलेशनशिप स्टेटस बदलेगा, वैसे ही उसमें पुराने पार्टनर की प्रोफाइल का See Less का ऑप्शन आएगा. इसके बाद आपकी न्यूज फीड में पुराने पार्टनर की प्रोफाइल पिक्चर या कोई दूसरी अपडेट नहीं मिलेगी.

मेरी लड़ाई स्टार के स्टाफ की फीस को लेकर है: आकाश

बौलीवुड में छोटे व करेक्टर आर्टिस्टों के मुकाबले कहीं ज्यादा पैसा स्टार कलाकारों के स्टाफ को दिए जाने का मुद्दा गरमाता जा रहा है. फिल्मों के लिए कलाकारों का चयन करने वाले मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबरा के साथ बतौर एसोसिएट डायरेक्टर के रूप में कार्यरत आकाश दहिया तीस से अधिक फिल्मों के लिए कास्टिंग कर चुके हैं.

इतना ही नहीं वह अब तक ‘कमीने’,‘चिल्लर पार्टी’,‘साहब बीबी गैंगस्टर’, ‘फोर्स’, ‘रॉक स्टार’, ‘डी डे’, ‘हाइवे’, ‘बॉबी जासूस’, ‘पीके’, ‘मेरठिया गैंगस्टर’ और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. पर छोटे व करेक्टर आर्टिस्टों की पारिश्रमिक राशि के मुद्दे पर वह खुलकर बात करते हैं.

पारिश्रमिक राशि के मुद्दे पर आकाश दहिया कहते हैं-‘‘बौलीवुड में सही मायनों में कलाकार को पैसा एक खास मुकाम पर ही मिलता है. और जब कलाकार को अच्छा पैसा मिलता है, तो उसके पूरे स्टाफ को अच्छा पैसा मिलता है. आप शायद यकीन न करें, पर स्टार कलाकार के स्टाफ को हम करेक्टर आर्टिस्टों से कहीं ज्यादा पैसा मिलता है. मैंने देखा है कि तीस तीस हजार रूपए स्टार कलाकार के स्टाफ को मिल रहे हैं. स्टार के ट्रेनर को अच्छे पैसों के साथ साथ रहने के लिए फाइव स्टार होटल मिलता है.

एक कलाकार,जिसके पीछे निर्देशक लड़ाई कर रहा होता है कि फिल्म में छोटा किरदार है, पर मुझे इसके लिए अच्छा कलाकार चाहिए, उस कलाकार को अच्छे पैसे नहीं मिलते हैं. मैं एसोसिएट कास्टिंग डायेरक्टर के रूप में काम करता हूं. यानी कि कास्टिंग से जुड़ा हुआ हूं. तो मैंने देखा है कि कास्टिंग के वक्त निर्देशक हमसे कहता है कि उसे फलां किरदार के लिए अच्छा कलाकार चाहिए.

जब हम उन्हे अच्छा कलाकार तलाश करके देते हैं,तब बात प्रोडक्शन में पहुंचती है और वहां से कहा जता है कि, ‘हमारे पा सिर्फ इतना पैसा ही है.’ तब कलाकार असमंजस में पड़ जाता है. उसे काम भी करना है, कास्टिंग एजेंसी के साथ भी संबंध बनाकर रखना है, पर पैसे अच्छे नहीं मिल रहे हैं. इतना ही नही कलाकार को जितने पैसे मिलते हैं, उसी अनुपात में सेट पर यानी कि शूटिंग के दौरान उसे ट्रीटमेंट भी मिलता है. मैंने खुद देखा है कि सेट पर एक ही वैनिटी में पांच करेक्टर आट्रिस्टों को रहना पड़ता है. होटल में तीन लोगों के साथ रूम शेअर करना पड़ता है.

यह सब चलता रहता है. जैसे जैसे हम ग्रो होते हैं, वैसे वैसे अच्छे पैसे मिलने शुरू होते हैं. यह सब चलता रहता है. पर उम्मीद है कि चीजें बदलेंगी. नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे कलाकार आ रहे हैं. काम कर रहे हैं और अच्छा पैसा भी ले रहे हैं. तो उम्मीद है कि धीरे धीरे चीजें बदलेंगी.’’

तो क्या निर्देशक की तरफ से भी कलाकार की पारिश्रमिक राशि पर कैंची चलायी जाती है?इस सवाल पर आकाश दहिया कहते हैं-‘‘जी नही! निर्देशक हमेशा चाहता है कि वह अपनी फिल्म में अच्छे कलाकार के साथ काम करे. पर उस फिल्म के लिए निर्देशक को खुद फीस मिल रही होती है, इसलिए वह कलाकारों की पारिश्रमिक राशि के मुद्दे पर ज्यादा जुड़ा नहीं रहता. निर्माता अपनी जगह सही है. क्योंकि उसे स्टार के स्टाफ को भी पैसा देना होता है. अतः वह कहीं तो कटौती करेगा.

मेरी लड़ाई जो है,वह स्टार के स्टाफ को दिए जाने वाले पैसे को लेकर है. यदि स्टार अपनी पारिश्रमिक राशि में से अपने स्टाफ को पैसा देना शुरू करें, तो निर्माता की तरफ से स्टार के स्टाफ को दिया जाने वाला पैसा छोटे या करेक्टर आर्टिस्ट के हिस्से आ सकता है. इससे होगा यह कि जो अच्छे कलाकार कम पारिश्रमिक राशि की वजह से किसी फिल्म से हट जाते हैं,वह नहीं हटेंगे और फिल्म ज्यादा बेहतर बन सकेगी.’’

कलाकारों की पारिश्रमिक राशि में कारपोरेट कंपनियों की दखलंदाजी के सवाल पर आकाश दहिया कहते हैं-‘‘सिर्फ निर्माता और लाइन प्रोड्यूसर की दखलंदाजी होती है. आखिर लाइन प्रोड्यूसर को भी अपना हिस्सा बचाना होता है. इससे हमेशा कलाकार और वह भी छोटे आर्टिस्टों की ही पारिश्रमिक राशि पर कैंची चलती है. तकनीशियन की पारिश्रमिक राशि पर कभी कैंची नहीं चलती.’’

सिनेमा में आ रहे बदलाव के साथ ही धीरे धीरे बौलीवुड ‘‘फैमिली बिजनेस’’ के टैग से बाहर निकल रहा है. इसी के साथ पिछले दो तीन सालों से एक ही फिल्म के हीरो और हीरोइन की पारिश्रमिक राशि के अंतर को खत्म करने का मसला गर्माया हुआ है. कुछ अभिनेत्रियों ने तो खुलेआम हीरो के समकक्ष पारिश्रमिक राशि हीरोइनो को दिए जाने की मांग बुलंद कर रखी है. अब बौलीवुड की हीरोइने चाहती हैं कि पूरे समाज व देश की ही तरह बौलीवुड में भी नर नारी समानता की बात होनी चाहिए.

तो वहीं दीपिका पादुकोण इस मुद्दे को थोड़ा सा अलग अंदाज में बयां करते हुए कहती हैं-‘‘मुझे लगता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान हीरोईनों को भी काफी अच्छे पैसे मिलने लगे हैं. सच यह है कि हीरो व हीरोईन की पारिश्रमिक राशि के बीच लंबा अंतर है. आगे यह अंतर कम हो सकता है, यह अच्छी बात है. मेरी राय में हीरो व हीरोईन की पारिश्रमिक राशि के बीच अंतर होना चाहिए. जिस तरह से खान या अक्षय कुमार, जो फिल्म इंडस्ट्री में पिछले बीस या पच्चीस वर्षों से कार्यरत है, उनके साथ तो हम अपनी तुलना कर ही नहीं सकते. पर नई पीढ़ी के कलकारों के बीच तो समानता होनी चाहिए.’’

निजी जिंदगी की बॉक्सर बनी ‘साला खड़ूस’ की हीरोईन

बौलीवुड में कौन, कब और कैसे फिल्म कलाकार बन जाए, कहा नहीं जा सकता. जब स्पोर्टस खासकर बाक्सिंग पर आधारित फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’ की पटकथा के साथ अभिनेता आर माधवन मशहूर फिल्मकार राज कुमार हिरानी से मिले और उन्होने बताया कि वह इस पटकथा पर आधारित फिल्म को नवोदित निर्देशक सुधा कोंगरा के निर्देशन में करने जा रहे हैं, और वह चाहते हैं कि राज कुमार हिरानी इसका निर्माण करे. पटकथा पढ़ने के बाद जब राज कुमार हिरानी फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’ का निर्माण करने के लिए तैयार हुए, तो उन्होने सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हे इस फिल्म की हीरोईन के रूप में किसी बॉक्सर को ही चुनना पड़ेगा.

फिल्म के कंटेंट की मांग का ख्याल रखते हुए राज कुमार हिरानी और सुधा कोंगरा ने करीबन 700 नवोदित कलाकारों के आडीशन लिए, पर संतुष्ट नहीं हुए. अंततः उनकी तलाश निजी जिंदगी की बाक्सर रितिका सिंह पर जाकर रूकी. जी हां! रितिका सिंह राष्ट्रीय स्तर की बाक्सर हैं. उन्होने बाक्सिंग के साथ साथ मार्शल आर्ट में भी ट्रेनिंग ले रखी है. वह राज कुंद्रा और संजय दत्त की ‘सुपर फाइट लीग’ का हिस्सा रही हैं.

रितिका सिंह ने किक बाक्सिंग, कराटे और एमएमए में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. लेकिन फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’में अभिनय करने के लिए रितिका सिंह को काफी मेहनत करनी पड़ी. खुद रितिका सिंह बताती हैं- ‘‘फिल्म की हीरोइन और निजी जिंदगी के बाक्सर की शारीरिक बनावट के साथ साथ दोनों की बॉडी लैंगवेज में काफी अंतर होता है. इसलिए मुझे वर्कशाप करना पड़ा और काफी मेहनत करनी पड़ी. इस फिल्म में मैने एक ऐसी मच्छीमार लड़की का किरदार निभाया है, जिसे बाक्सर कोच बने आर माधवन ट्रेनिंग देकर राष्ट्रीय स्तर का बाक्सर बनाते हैं. 

फिल्म रिव्यू: चौरंगा

जाति उत्पीड़न, भ्रष्ट आचरण और लालच के इर्द गिर्द घूमते कथानक वाली फिल्म ‘‘चौरंगा’’ में नवोदित निर्देशक बिकास रंजन मिश्रा ने सब कुछ बहुत ही ज्यादा सतही स्तर पर पेश किया है. गांव के अंदर रोजमर्रा की जिंदगी में जातिगत भेदभाव, नारी शोषण, गरीबों के अपमान का भी चित्रण है. मगर जाति उत्पीड़न के मुद्दे को अपने कंधे पर ढोने के लिए संतू बहुत ही ज्यादा छोटा है.

जाति उत्पीड़न को दर्शाने की बजाय इस फिल्म में उंची जाति के जमींदार पुरूष को नीची जाति की औरत के साथ सेक्स/मैथुन करते हुए ही ज्यादा दिखाया गया है. फिल्म में जमींदार व भूमिहीन मजदूरों के बीच का अंतर, अमीरी व गरीबी के बीच विभाजित समाज का चित्रण करने का प्रयास किया गया है, पर सब कुछ बहुत ही सतही स्तर पर है. फिल्म में मंदिर के अंधे पुजारी (ध्रतमान चटर्जी)के माध्यम से धार्मिकता की आड़ में पनप रही बुराई का नग्न चित्रण भी है.

‘‘चौरंगा’’कहानी एक युवा 14 वर्षीय  दलित किषोर संतू (सोहम मैत्रा) के गुस्से की है. संतू का गुस्सा इस बात को लेकर है कि उसकी मां धनिया (तनिष्ठा चटर्जी) उसे उसके बड़े भाई बजरंगी (रिधि सेन) की तरह स्कूल पढ़ने के लिए नहीं भेजती है. धनिया का गांव के जमींदार धवल (संजय सूरी) के साथ गुप्त रूप से सेक्स संबंध चल रहे हैं. संतू दिन भर पेड़ पर चढ़कर धवल की बेटी मोना (इना झा) को स्कूटर पर स्कूल जाते हुए देखता रहता है और उससे प्रेम कर बैठता है. बजंरगी स्कूल की छुट्टियों में गांव आता है, तो गांव की उंची जाति के दो युवक उसे बेमतलब पीटते हैं. इनमें से एक युवक रघु (अंषुमन झा) है. एक युवक को संतू थप्पड़ मार देता है. एक तरफ धनिया व धवल की रात के अंधेरे में गौशाला के अंदर मैथुन लीला चल रही है, तो दूसरी तरफ दिन में पेड़ पर चढ़े संतू की नजरें मोना का पीछा करती रहती है.

शहर में पढ़ाई कर रहा बजरंगी गांव आने के बाद अपने भाई संतू को अच्छी सीख देने की बजाय वह उसे लड़कियों की अर्धनग्न तस्वीरें दिखाता है और प्रेम का पाठ ही पढ़ाता है, जिससे उत्साहित होकर बजरंगी से मोना के नाम प्रेमपत्र लिखवाकर संतू, मोना को देता है. इधर रात में पूरे गांव वासियों के लिए सिनेमा का प्रबंध किया गया है. उधर रात के अंधेरे में धवल, धनिया के साथ मैथुन में इस कदर मस्त है कि उसी दौरान एक सांप धनिया को काट लेता है और धनिया की मौत हो जाती है.

धनिया की लाश को ठिकाने लगाने के बाद धवल ठंड में स्नान करता है और बीमार हो जाता है. बीमारी की हालत में ही धवल को संतू द्वारा मोना को दिया गया प्रेम पत्र मिल जाता है और वह बौखला जाता है. धवल, बजरंगी को पीटता है. बजरंगी भागता है. जिसका पीछा दोनो युवक करते हैं. इनके पीछे संतू भागता है. फिर एक युवक संतू को मारने के लिए दौड़ाता है. संतू भागकर चलती ट्रेन में चढ़ जाता है. इधर दूसरा युवक बजरंगी का खून कर देता है.

कथानक के स्तर पर भी निर्देशक बिकास रंजन मिश्रा भ्रमित नजर आते हैं. या यॅूं कहें कि उनकी कहानी में विरोधाभास है. जमींदार अपनी पत्नी की उपेक्षा कर दलित नारी धनिया के संग गुप्त सेक्स संबंध बनाता रहता है और इसी वजह से वह धनिया के बड़े बेटे बजरंगी की शिक्षा का खर्च वहन करता है, तो फिर सवाल उठता है कि वह धनिया के दूसरे बेटे संतू की शिक्षा का खर्च क्यों नहीं वहन करता. जबकि जमींदार के पास धन की कमी नहीं है.

इतना ही नहीं फिल्म के शुरू होने पर जब गांव की उंची जाति के दो युवक संतू के भाई बजरंगी (रिधि सेन) को पीटते हैं, तो संतू एक युवक को थप्पड़ मार देता है, और वह दोनो युवक वहां से चले जाते हैं. मगर फिल्म के क्लायमेक्स में जब वही दोनों युवक बजंरगी को पीटते हैं, तो संतू विरोध नहीं करता है, बल्कि उन दोनों में से एक युवक उसके पीछे पड़ जाता है और संतू उनसे भागकर चलती मालगाड़ी में चढ़ जाता है, इधर दूसरा युवक बजरंगी को खत्म कर देता है. जमींदार की बेटी मोना और संतू के बीच का प्रेम  भी परदे पर ठीक से नहीं उभर पाया है.

फिल्म में तनिष्ठा चटर्जी, संजय सूरी सहित किसी के भी पात्र सही ठंग से उभरकर नहीं आते हैं. फिल्म कई मुद्दे उठाती है, मगर गांव की सभ्यता, संस्कृति व गांव वासियों के बीच जो आपसी रिश्ते होते हैं, उनकी अनदेखी की गयी है. सामाजिक ताने बाने और उसकी गतिशीलता को चित्रित करने में निर्देशक बुरी तरह से असफल रहे. फिल्म ‘‘चैंरगा’’ में कमर्शियल वैल्यू का अभाव है. यह फिल्म मल्टी प्लैक्स कल्चर की भी नहीं है.

सामाजिक वहशीपन

ज्योति सिंह के 16 दिसंबर, 2012 को हुए बलात्कार मामले के बाद मुख्य अपराधी, जो उस समय नाबालिग था, के छूटने पर होहल्ला मचाने का औचित्य नहीं है. हम भावना में बह कर सामूहिक रूप से उसी तरह का वहशीपन दिखाने में लग गए हैं जैसे उस ने चलती बस में युवती का बलात्कार करते हुए दिखाया था, उस ने गुप्तांगों में लोहे का सरिया तक डाल दिया था.

वह नाबालिग अब छूट रहा है तो देश का एक वर्ग कानून के गलत होने का मुद्दा खड़ा करने लगा है कि नाबालिग है तो क्या, है तो अपराधी ही. उसे सजा मिलनी ही चाहिए. जूवेनाइल जस्टिस ऐक्ट कानून गलत नहीं है, सही है. उसे केवल एक अपराधी के लिए बदल कर संसद ने ठीक नहीं किया है. समाज की आत्मा लगता है कुंद हो गई है कि वह बदले की भावना में एक किशोर को सदासदा के लिए सींखचों में बंद देखना चाहता है. वह समझता है कि उस के खुद के मातापिता, बड़े लोग, स्कूलकालेज, नौकरी देने वाले यहां तक कि कोई भी उसे अनुशासन में न रख पाएगा.

यह सोच अपनेआप में एक समाज की आंतरिक कमजोरी की पोल खोलती है. हम मान कर चल रहे हैं कि एक बार का अपराधी हमेशा का अपराधी. तभी बारबार यह मांग की जाती है कि ऐसे अपराधियों को तो फांसी पर चढ़ा देना चाहिए. यह समाज की विकृत विचारधारा है.

ज्योति सिंह, जिसे निर्भया कह कर पुकारा गया क्योंकि बलात्कार के पीडि़त का नाम लेने पर बंदिश है, की मां अब चाहती है कि उस की कुरबानी को गुमनामी में न रखा जाए. सच है कि उस के साथ जो हुआ वह गलत था पर इस का कोई उत्तर जेल के सींखचों के पीछे नहीं है. एक को जेल में बंद कर के 120 करोड़ लोगों को सुरक्षा नहीं दी जा सकती. बलात्कार के अपराधी हर रोज पैदा होते हैं. उसी तरह का वहशीपन सैकड़ों बार दोहराया जाता है. ज्यादातर मामलों में तो अपराधी पकड़ा भी नहीं जाता. जब कोई पकड़ा भी जाता है तो वह छूट भी जाता है.

ऐसी दशा में किसी एक पर पूरा गुस्सा उतारना समाज की कमजोरी जताता है. यह वैसे ही है जैसे पाकिस्तान के साथ होने वाली खटपट का बदला पड़ोस के दादरी के मुसलिम परिवार को मारपीट कर लेना.

सरकार ने जूवेनाइल जस्टिस ऐक्ट में जो परिवर्तन किया है वह गलत है. बलात्कार जिस का अंत हत्या में हो, कोई अन्य जघन्य अपराध हो, किशोर को तो किशोर माना ही जाना चाहिए. नाबालिगों को जिंदगी भर के लिए बंद कर देना गलत है. नाबालिग अपराध करते हैं, इस के लिए दोषी तो समाज, मातापिता, सरकार, सामान्य कानून व्यवस्था है. अपनी कमजोरी को एक असहाय, अकेले पड़ गए किशोर के मत्थे मढ़ना गलत है. यह धार्मिक पौराणिक दंड व्यवस्था की याद दिलाती है जिस में आरोप लगा कर मार डालना हाकिम का अधिकार माना जाता रहा है.

आगरा: ताजमहल से लेकर लाल किला, सब कुछ है शानदार

दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आगरा एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है. यह शहर जहां उर्दू के मशहूर शायर ‘मिर्जा गालिब’ की जन्मस्थली रहा है वहीं मशहूर संगीतज्ञ उस्ताद फैयाज खान भी आगरा घराने के थे. मुगलकाल में आगरा मुगल साम्राज्य की राजधानी बन कर प्रसिद्ध हुआ. 1526 में यह मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के हाथों में आया था. 1571 में अकबर ने आगरा में एक किले का निर्माण करवाया. जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल में आगरा नगर चारदीवारी से घिरा था जिस में 16 प्रवेशद्वार थे. 1803 में आगरा ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे में आ गया. उत्तर भारत में ब्रिटिश शासन का विस्तार होने पर आगरा को उत्तरपश्चिम सूबों की राजधानी बना दिया गया. यों तो इस का क्रमबद्ध इतिहास लोदी काल से ही शुरू होता है पर इस के वर्तमान रूप को सजानेसंवारने का श्रेय मुगलों को जाता है.

दर्शनीय स्थल

ताजमहल : आगरा के दर्शनीय स्थलों में यह सब से अधिक लोकप्रिय है. यमुना तट पर सफेद संगमरमर से बनी यह इमारत शाहजहां और उस की बेगम मुमताज के प्यार की यादगार है, जो 1653 में बन कर तैयार हुई थी. इस के निर्माण में लगभग 22 वर्ष का समय लगा था. ताजमहल के प्रवेशद्वार पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण हैं और ऊपर की ओर कई छोटेछोटे गुंबद बने हैं. ताजमहल की रूपरेखा ईरान के वास्तुविद उस्ताद ईसा ने बनाई थी. इस महल की अद्वितीय नक्काशी देखने लायक है. महल में बनी छतरियों पर कीमती पत्थर और रत्न जड़े थे ताजमहल के चारों तरफ लाल पत्थरों की ऊंची चारदीवारी है जिस में पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशा में खुलने वाले 3 दरवाजे हैं. इस का मुख्यद्वार दक्षिणी दरवाजा ही है.

ताजमहल की मुख्य इमारत एक विशाल चबूतरे पर बनी है जिस के चारों कोनों पर 4 विशाल मीनारें हैं. इन मीनारों के बीच में ही शाहजहां और मुमताज का मकबरा स्थित है जहां उन्हें दफनाया गया था. इन के मकबरों पर कलात्मक ढंग से पच्चीकारी की गई है. ये दोनों मकबरे चारों तरफ से महीन जालियों से घिरे हैं. यहां के मुख्यद्वार और केंद्रीय इमारत के बीच ईरानी डिजाइन का एक भव्य फौआरेदार बगीचा है जहां पर्यटकों को एक अलग ही सुकून मिलता है. ताजमहल बनाने के लिए श्रमिक तक जहां रहते थे, वह स्थान एक छोटे से कसबे ‘ताजगंज’ के नाम से जाना जाता है.

लाल किला : अकबर ने यमुना नदी के किनारे पर इस किले का निर्माण शुरू करवाया जो लगभग 8 साल में बन कर तैयार हुआ. यह आगरा की दूसरी महत्त्वपूर्ण इमारत है. इस के ज्यादातर भवनों का निर्माण अकबर के बाद शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में हुआ था. इस किले के निर्माण में अधिकतर लाल पत्थर का निर्माण हुआ. किले के बाहरी दरवाजे पर एक घुड़सवार की प्रतिमा है जो राजपूत सरदार अमर सिंह राठौर की उस बहादुरी की याद दिलाती है जब वह किले की ऊंची दीवार से अपने घोड़े सहित कूदा था. किले के अंदर कई भव्य इमारतें हैं जिन में शीशमहल, जहांगीर महल, दीवाने आम, दीवाने खास, रंगमहल नूरजहां महल आदि खासतौर से देखने लायक हैं. पर्यटकों के लिए यह किला सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है. यह किला ताजमहल से 3 किलोमीटर की दूरी पर है. किले में बने सम्मान बुर्ज से ताजमहल का नजारा देखा जा सकता है. शाहजहां ने इसी किले में अपने जीवन के आखिरी दिन बिताए.

सिकंदरा : इस भव्य इमारत का निर्माण सम्राट अकबर ने शुरू करवाया था जिसे 1613 में उस के बेटे जहांगीर ने पूर्णता प्रदान की. सिकंदरा में अकबर की कब्र है, जिस के लिए सीढि़यों से हो कर नीचे जाना पड़ता है. यह इमारत लाल पत्थर तथा संगमरमर की बनी है. यह हिंदूमुसलिम स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है. यह शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जहां रिकशा, आटो, टैक्सी आदि वाहनों से पहुंचा जा सकता है.

चीनी का रोजा : यह फारसी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है. इस आयताकार मकबरे का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने दीवान तत्कालीन विद्वान और कवि शकुल्लाह की याद में करवाया था. पर्यटक इसे देखने जरूर आते हैं.

एतमादुद्दौला  का मकबरा : सफेद संगमरमर से बनी यह भव्य इमारत फारसी स्थापत्य कला का शानदार नमूना है जिसे बेगम नूरजहां ने अपने पिता गयासुद्दीन बेग की याद में बनवाया था. यहीं पर नूरजहां की मां भी दफनाई गई थी. ताजमहल से पहले बनी यह इमारत ताजमहल बनाने की प्रेरणा भी रही थी. इमारत के चारों ओर उद्यान हैं और इस की जालीदार खिड़कियां इसे अलग ही खूबसूरती प्रदान करती हैं.

जामा मसजिद : इस का निर्माण शाहजहां की अविवाहित बेटी जहांआरा ने करवाया था. यह आगरा के किनारी बाजार जाने वाले रास्ते पर स्थित है.

सेंट पीटर्स चर्च : यह ऊंची मीनारों वाला चर्च है. इस की मीनारों को आगरा के किसी भी भाग से देखा जा सकता है. इस भव्य चर्च के बगल में ही अकबर द्वारा बनवाया गया ऐतिहासिक अकबरी चर्च भी है जिस को देखने का पर्यटकों में काफी उत्साह रहता है.

वायु मार्ग :

आगरा के लिए देश के मुख्य शहरों से सरकारी एवं प्राइवेट सभी प्रकार की सीधी विमान सेवा उपलब्ध है.

रेल मार्ग :

आगरा दिल्ली-चेन्नई रेल मार्ग पर स्थित होने के कारण देश के सभी प्रमुख नगरों से रेल द्वारा जुड़ा है.

कहां ठहरें :

क्लार्क शिराज होटल (पांचसितारा) 54 ताज रोड, आगरा, फोन : 282001; आईटीसी मुगल आगरा (पांचसितारा) ताजगंज आगरा, जयपी पैलेस होटल आगरा (पांचसितारा) फतेहाबाद रोड, आगरा, ओबेराय अमरविलास होटल आगरा (पांचसितारा) ताज ईस्ट गेट रोड, आगरा; ताज व्यू होटल आगरा (पांचसितारा) ताजगंज फतेहाबाद रोड, आगरा; दी ओबेराय अमरविलास आगरा (पांचसितारा) ताज ईस्ट गेट रोड, ताज नगरी स्कीम आगरा; हालिडे इन आगरा (चारसितारा) एमजी रोड, संजय प्लेस आगरा; हावर्ड पार्क प्लाजा इंटरनेशनल होटल आगरा (चारसितारा) फतेहाबाद रोड, आगरा;

अतिथि होटल (तीनसितारा) टूरिस्ट काम्प्लेक्स एरिया, फतेहाबाद रोड, आगरा; गंगा रतन होटल (तीनसितारा) फतेहाबाद रोड, नेशनल कैपिटल टेरेटरी आफ दिल्ली; होटल अमर (तीनसितारा) फतेहाबाद रोड, टूरिस्ट काम्प्लेक्स एरिया, आगरा, होटल ताज प्लाजा (तीनसितारा) ताजमहल ईस्ट गेट शिल्पग्राम वीआईपी रोड, आगरा; पुष्पविला होटल (तीनसितारा) वीआईपी रोड से ताजमहल फतेहाबाद रोड, आगरा; अमर यात्री निवास होटल, (साधारण) 181/1 फतेहाबाद रोड, आगरा.

बिहार में दबंगई पर नकेल कसना सबसे बड़ी चुनौती

बिहार को अपराध और भ्रष्टाचार से निजात दिलाने का दावा कर रही महागठबंधन की सरकार पर पहला कलंक राजद के ही विधायक सरोज यादव ने लगा डाला. पिछले 20 नबंबर को नीतीश कुमार ने अपने कैबिनेट के साथ शपथ लिया और 23 नबंबर को राजद विधायक ने आरा के चारपोखरी थाना के थानेदार कुवंर गुप्ता को जान से मारने की धमकी दे डाली. थानेदार को कसूर यही था कि उसने पहली बार विधायक बने सरोज यादव की पैरवी सुनने से मना कर दिया था.

यादव ने 23 नबंबर को एक हत्याकंड के मामले में थानेदार को फोन किया और थानेदार ने इस मामले में पुलिस के सीनियर अफसरों से बात करने की सलाह दी. इससे विधयक का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और थानेदार को पटक कर मारने और जान लेने की धमकी दे डाली. विधायक ने बाद में सपफाई देते हुए कहा कि थानेदार ने उन्हें औकात में रहने की धमकी दी थी, जिसके बाद थानेदार को पटक कर मारने की बात कहीं.

नीतीश सरकार पर पकड़ बनाते लालू यादव

पिछले 3 जनवरी को राजद सुप्रीमो लालू यादव अपने लाव-लशकर के साथ आईजीआईएमएस (इंदिरा गांधी इंस्टीच्युट और मेडिकल साइंस) का मुआयना करने पहुंच गए. अस्पताल के अपफसरों में हड़कंप मच गया. अस्पताल के ओपीडी में डाक्टरों के गायब रहने और गंदगी को लेकर उन्होंने अपफसरों की जम कर क्लास लगाई. उसके बाद विरोधियों ने नीतीश की खिंचाई शुरू कर दी है.

इसके पहले 24 नवंबर को लालू ने नीतीश कुमार की महादलित की नीति को पलट दिया. उन्होंने ऐलान कर दिया कि बिहार की सभी दलित जातियों को महादलित की सुविधाएं मिलेंगी. इससे राज्य सराकर की विकास योजनाओं को आखिरी आदमी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी. राजद कार्यालय में पार्टी के विधायकों की बैठक में उन्होंने इस बात का ऐलान करते हुए नीतीश कुमार को सलाह दे डाली की सभी दलित जातियों को महादलित जातियों के बराबर सुविधएं मिलनी चाहिए. जदयू के कई नेता दबी जुबान से कह रहे हैं कि लालू को इस तरह के ऐलानों और सलाहों से बचना चाहिए, नहीं तो महागठबंधन में दरार पड़ सकती है. ऐसे मसलों को महागठबंधन के नेताओं विधायकों की बैठकों में उठाना चाहिए, न कि खुले मंच से मनमाने तरीके से ऐलान करना चाहिए.

नीतीश और लालू ने मिल कर चुनाव में कामयाबी तो हासिल कर ली है, लेकिन अब यह देखने वाली बात होगी कि सरकार चलाने मे दोनों के बीच कितना ओर कैसा तालमेल बन पाता है? नीतीश और लालू को जानने वाले साफ तौर पर कहते हैं कि लालू और उनके परिवार के महत्वाकांक्षाओं को बोझ उठाना नीतीश के लिए सबसे बड़ी चुनाती है.

नीतीश कुमार बात-बेबात दावा दावा करते रहे हैं कि महागठबंधन की सरकार सरपट चलेगी और कोई रूकावट नहीं आएगी. दूसरी ओर लालू यादव बार-बार सफाई दे रहे हैं कि अब बिहार की केवल तरक्की होगी और किसी को भी कानून को हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी.

जदयू के एक बड़े नेता को इस बात का डर है कि लालू नीतीश सरकार पर हावी हो सकते हैं. लालू की महत्वाकांक्षा को काबू में रखना नीतीश कुमार के लिए आसान नहीं होगा. अपने बेटों तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री के साथ पीडब्ल्यूडी मंत्री और तेजप्रताप यादव को हेल्थ मिनिस्टर बना लालू ने नीतीश सरकार पर अपना कब्जा बना लिया है.

लालू यादव अगर सच्चे मन से नीतीश का साथ देते हैं तो नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन का वादा पूरा होने में भले ही देर लगे लेकिन बिहार और बिहारियों के लिए अच्छे दिन आने में देर नहीं लगेगी. लालू यादव कहते हैं कि पिछले 10 सालों से नीतीश बिहार की तरक्की की कोशिशों में लगे हुए हैं, इसलिए उन्हें वह पूरा सहयोग देंगे. कभी लाठी रैली में यकीन रखने वाले लालू इस बात का पूरा ख्याल रख रहे हैं कि उनसे मिलने आए किसी भी नेता, समर्थक या कार्यकर्ता के हाथों में लाठी, पिस्तौल, रायपफल या बंदूक नहीं हो. इसके अलावा लालू ने पार्टी के झंडा और बैनरों को गाडि़यों पर लगाने के लिए भी सख्त मनाही की है.

यह सच है कि बिहार के 37वें मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश कुमार 5वीं बार राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पिछले 18 सालों से अपने धुर विरोधी लालू यादव की मदद से बैठे हैं. सूबे की सियासत में लालू को हाशिए पर ढकेलने वाले नीतीश ने ही उन्हें फिर से बिहार से लेकर दिल्ली तक सत्ता के केंद्र में ला दिया है. गौरतलब है कि लालू और नीतीश पिछले 24 सालों से लगातार बिहार की सियासत की धुरी बने हुए हैं और पिछले 20 सालों से वे एक दूसरे की विरोध की राजनीति करते रहे हैं. आज दोनों जिस किसी भी सियासी मजबूरियों की वजह से फिर से साथ मिले हैं और बिहार विधन सभा में उन्हें कामयाबी मिलने के बाद तो उत्तर भारत की सियासत में नया विकल्प पैदा करने की उम्मीद जगने लगी है.

ताजा विधन सभा चुनाव में लालू-नीतीश के गठजोड़ ने साबित कर दिया है कि उसके पास वोट है. 243 सदस्यों वाले बिहार विधन सभा में महागठबंधन के पाले में 178 सीट हैं. इसमें जदयू की झोली में 71, राजद के खाते में 80 और कांग्रेस के हाथ में 27 सीटें गई हैं. नीतीश की पार्टी जदयू को 16.8, राजद को 18.4 और कांग्रेस को 6.7 पफीसदी वोट मिले जो कुल 41.9 पफीसदी हो जाता है. ऐसे में महागठबंधन को फिलहाल किसी दल या गठबंधन से चुनौती मिलना दूर की कौड़ी ही होगी.

फिलहाल तो 90 के दशक वाले लालू और आज के लालू में काफी फर्क नजर आ रहा है. पहले लालू की सोच थी कि वोट तरक्की से नहीं, बल्कि जातीय गोलबंदी से मिलती है, पर इस बार लालू भी नीतीश के सुर में सुर मिला कर तरक्की की रट लगाने लगे हैं. लालू के बेटे और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि सरकार का इकलौता एजेंडा बिहार की तरक्की है. अभी तो सरकार ने काम करना शुरू ही किया है, जल्द ही अच्छे नतीजे सामने आएंगे तो सारे विरोध्यिों की जुबान पर ताला लग जाएगा.

बिहार के सियासी मामलों के जानकार और चिंतक हेमंत राव कहते हैं कि अपराध और भ्रष्टाचार पर नकेल कस कर ही नीतीश सरकार जनता की उम्मीदों पर खरे उतर सकती हैं. नीतीश के लिए सबसे बड़ी चुनौती और खतरा लालू यादव की महत्वाकांक्षा और उनके परिवार को आगे बढ़ाने की ललक होगी. अब यह देखना होगा कि लालू की महत्वाकांक्षाओं, उनके ठेठ गवंई अंदाज और मुंहपफट अंदाज को नीतीश कितना और कब तक बर्दाश्त कर पाते हैं? जिस नीतीश को भाजपा से 17 साल पुराना नाता तोड़ने में जरा भी देरी और हिचक नहीं हुई वह लालू कितने दिनों तक दोस्ती निभा पाते हैं?

शराब: कमाई से सरकारें मालामाल, घर-परिवार बेहाल

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘अगर मैं 1 दिन के लिए तानाशाह बन जाऊं, तो बिना मुआवजा दिए शराब की दुकानों व कारखानों को बंद करा दूंगा.’’ गांधीजी ने पूरी सूझबूझ के साथ यह बात कही थी, क्योंकि बरबादी का बड़ा कारण यह शराब ही है. कुछ समय पहले केरल सरकार ने राज्य में शराबबंदी का ऐलान कर इस मुद्दे पर फिर बहस छेड़ दी है. भारत में आजादी के बाद से अब तक शराबबंदी के तमाम प्रयासों का सबक यही है कि पूर्ण शराबबंदी को लागू करना प्रदेश सरकारों के लिए संभव ही नहीं रहा. जिस भी राज्य में शराबबंदी लागू की गई, वहां शराब की तस्करी बढ़ गई.

देश में सब से पहले महाराष्ट्र में शराबबंदी लागू हुई. इस की खिलाफत में मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा. अप्रैल, 1950 में मुंबई के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने राज्य में शराब पर प्रतिबंध लगाया, तो अदालत में व्यक्तिगत आजादी के आधार पर इस अधिनियम को चुनौती दी गई.

सर्वोच्च न्यायालय ने द स्टेट औफ बौंबे वर्सेज एफएन बालसरा मामले में 1951 में फैसला सुनाते हुए अुनच्छेद 47 की विस्तार से व्याख्या की. इस का सार यह था कि सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक जीवन व स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार तथा राज्य के द्वारा शराबबंदी लागू करने में कोई परस्पर विरोध नहीं है. साथ ही शीर्ष अदालत ने अलकोहल का औषधीय प्रयोग और साफसफाई के रसायन के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी.

जहां शराबबंदी, वहां ये हाल

देश में गुजरात, मिजोरम व नागालैंड ऐसे प्रदेश हैं, जहां पूर्ण शराबबंदी है. गुजरात में तो आजादी के बाद से ही शराब पर पाबंदी है, पर अफसोस यह महज कहने को ही है. वहां शराब हर जगह आसानी से उपलब्ध है. अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस महकमा हर साल सवा सौ करोड़ की अवैध शराब जब्त करता है. हर साल जहरीली शराब पीने से मौतें होती हैं. 2009 में गुजरात में जहरीली शराब पीने से 148 लोग मारे गए थे.

मिजोरम राज्य में 1995 में शराबबंदी का कानून पारित किया गया था. मगर अगस्त, 2014 में शराबबंदी खत्म करने का फैसला कर नया कानून पारित कर दिया गया. सरकार का मानना था कि शराबबंदी से फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है. नागालैंड में भी करीब इसी समय से शराबबंदी लागू है. नागालैंड के मुख्यमंत्री ने अभी हाल ही में कहा है कि वे शराबबंदी की फिर से समीक्षा करने की सोच रहे हैं.

केरल सरकार ने भी 2014 में चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी करने का फैसला किया है. गौरतलब है कि देश में सब से ज्यादा शराब की खपत केरल में ही होती है. राज्य को 22 फीसदी राजस्व शराब से ही हासिल होता है. शराबबंदी लागू होने से यहां के पर्यटन पर गलत असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

कठोर फैसले की जरूरत

जब तक सरकारों की मौजूदा नीतियां कायम रहेंगी, तब तक शराब की लत की चपेट में आने से लोगों को नहीं बचा सकते. अगर हर गलीनुक्कड़ पर शराब की दुकानें खोल देंगे, तो लोग ज्यादा सेवन करेंगे ही. जहां शराब बंद करने का दिखावा किया जाता है, वहां अवैध बिक्री शुरू हो जाती है और खराब गुणवत्ता वाली शराब बिकने लगती है, जो जानलेवा साबित होती है. शराब के आदी लोग ज्यादा दाम पर भी घटिया शराब पीने लगते हैं, जो मौत के करीब ले जाती है.

इसलिए व्यक्ति से ज्यादा सरकार को कठोर फैसला करना चाहिए. इस मामले में भारत को सिंगापुर से सीखना चाहिए. वहां सिगरेट के सेवन से सेहत पर होने वाले नुकसान को देखते हुए सरकार ने बाकी देशों से सिगरेट की 7 गुना ज्यादा कीमत तय कर दी है. इस से लोगों ने सिगरेट खरीदना कम कर दिया है. सिगरेट के पैकेटों पर  भयानक चेतावनी छापने के साथसाथ सजा भी तय कर दी गई है. इस से लोगों में डर पैदा हो गया है. उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना बंद कर दिया है. सिगरेट का पैकेट फेंकते पकड़े जाने पर भी जेल भेज दिया जाता है.

लेकिन हमारे यहां सरकारों की नीतियां सिगरेट पीने से रोकने के बजाय उन्हें सहजता से उपलब्ध कराने वाली हैं. ऐसे में समाज का माली तानाबाना टूटना लाजिम है. यदि सरकारें उपलब्धता पर नियंत्रण करें, तब ही लोगों को इन के सेवन से रोका जा सकता है.

तेल की धार पर भारी शराब की धार

दरअसल, शराब का असली नशा तो इस धंधे की कमाई की चाशनी में डूबने वालों पर ही ज्यादा चढ़ता है. फिर चाहे वे सरकारें हों या शराब का धंधा करने वाले. सभी चाहते हैं कि शराब से उन की तिजोरियों की सेहत हर दिन दुरुस्त होती रहे. राजस्थान में वसुंधरा राजे की सरकार अपनी शराब नीतियों को ले कर खासी बदनाम रही है, तो पिछली गहलोत सरकार ने भी शराब से कमाई का खेल बड़ी चतुराई के साथ खेला है.

इस सरकार की ओर से शराब की दुकानों के खुलने का समय सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक सीमित कर के और अंगरेजी शराब की दुकानों में कमी कर के प्रचार तो यह किया गया था कि सरकार शराब पर लगाम लगा रही है, लेकिन शराब से होने वाली कमाई का मोह यह सरकार भी नहीं छोड़ पाई. दरअसल, सरकार ने इस के ऐवज में गलीगली में 24 घंटे खुलने वाले रैस्टोरैंट बार खोल दिए. राजस्थान सरकार का खजाना भरने के मामले में शराब का नंबर पहला है. दरअसल, मोटी कमाई के मामले में बाड़मेर में तेल से मिल रही 6 हजार करोड़ की रौयल्टी को ले कर जितना होहल्ला मचाया जा रहा है, उस से कहीं ज्यादा तो अब शराब उगल रही है. आर्थिक मामलों के सरकारी और गैरसरकारी माहिरों का मानना है कि तेल की रौयल्टी तो अब अगले कुछ सालों के लिए स्थायी हो गई है, लेकिन शराब का कारोबार प्रदेश सरकार के लिए राजस्व बढ़ाने के लिए एक खास जरीया बन गया है.

शराब का मोह क्यों

प्रदेश के आबकारी महकमे के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च, 2014 तक सरकार को शराब से तमाम तरह की चोरीचकारी के बाद कई हजार करोड़ रुपए मिल चुके हैं. अप्रैल, 2014 से अक्तूबर, 2014 के बीच कमाई का यह आंकड़ा लगभग क्व4,650 करोड़ का है. इस मोटी कमाई को देखते हुए सरकार ने नई शराब नीति में इस कमाई को दोगुना करने का टारगेट बनाया है. इस के लिए सरकार ने ठेका शुल्क व स्टांप ड्यूटी में बढ़ोतरी के साथसाथ शराब की कीमत में भी 20 फीसदी इजाफा कर दिया.

प्रदेश के तमाम शहरी व ग्रामीण इलाकों में शराब का साया बरकरार रहे, इस के लिए सरकार ने चतुराई भरा खेल खेला है. नई शराब नीति से शहरों में जहां रैस्टोरैंट बारों की बाढ़ सी आ गई है, वहीं देहाती इलाकों की 6,680 दुकानों को कंपोजिट कैटेगरी में रख कर देशी शराब की आड़ में अंगरेजी शराब भी मुहैया करा दी है. कंपोजिट कैटेगरी का मतलब है कि देशी शराब की दुकान में अंगरेजी शराब व बीयर भी बेची जा सकती है.

अब जब सरकारी आमदनी के खास बड़े जरीए तेल की धार के बराबर ही शराब की धार है, तो ऐसे में भला सरकार शराब का मोह क्यों छोड़ेगी? वैसे भी सत्ता पर काबिज हर सरकार की कोशिश रहती है कि वह राजस्व बढ़ाने के लिए शराब के धंधे का ज्यादा से ज्यादा दोहन कर ले. जाहिर है, ऐसे में सरकारें नशाबंदी का कदम उठाने के बारे में सोच भी नहीं सकतीं.

शराब का सरकारी अर्थशास्त्र

प्रशासन की सरपरस्ती में शराब का कानूनी व गैरकानूनी धंधा खूब फूलफल रहा है, जिस में पुलिस, सरकार सब शामिल हैं. सरकार के पास पढ़ेलिखे, अनपढ़, अमीरगरीब, हर तबके के लिए देशी से ले कर अंगरेजी शराब तक का बंदोबस्त है. शराब को घरघर पहुंचाने के लिए गांवों व शहरों में ठेका देने का काम भी बड़ी सूझबूझ के साथ किया जाता है ताकि कोई इलाका अछूता न रह जाए.

दरअसल, पैसे कमाने की सहूलियत के लिए इसे कानूनी और गैरकानूनी बता दिया गया है यानी जो सरकार बेचे, वह कानूनी है और जिस से उस का फायदा न हो, वह गैरकानूनी. जबकि शराब तो सिर्फ शराब है, जो इनसान को तिलतिल कर मारने का काम करती है. कच्ची शराब हो या शराब की लाइसैंसी दुकानें, दोनों से आम आदमी की बरबादी और सरकार व सरकारी आदमियों का मुनाफा हो रहा है. लाइसैंसी शराब से सरकारें हर साल अरबों रुपए का राजस्व हासिल करती हैं और गैरकानूनी घोषित की गई शराब में सरकारी लोगों का हिस्सा होता है.

शराब का नशा करना इनसान की कुदरती भूख नहीं है. इसलिए इस का होना या न होना कोई माने नहीं रखता. अगर इस की कुदरती भूख होती तो दुनिया के हर शख्स में नशाखोरी की लत पड़ गई होती. भारत में तो कई तथाकथित देवताओं तक को शराब पिलाई जाती है. यहां शराब पीनेपिलाने का इतिहास बहुत पुराना है. राजामहाराजाओं के जमाने से ही यहां शराब का खूब चलन रहा है. शराब की वजह से कई रियासतें, राजामहाराजा बरबाद हो गए, तो भला आम आदमी की क्या बिसात है? सरकार एक तरह से वही काम कर रही है, जो अंगरेजों ने नवाबों के साथ किया था. उन्हें नशे में डुबोए रखा और अंदर ही अंदर उन की जड़ें खोखली कर समूचे भारत को गुलामी की बेडि़यों में जकड़ लिया.

भ्रम की स्थिति

चोरी, डकैती, हत्या, लूट, बलात्कार जैसे अपराधों को रोकना सरकार का फर्ज है, तो फिर सरकार लोगों को नैतिक बुराई शराब को पीने की दावत क्यों देती है? मसलन, भ्रूण हत्या भी तो अपराध है, फिर भी अनेक बार लड़कियों को पैदा होने से पहले ही कोख में मार दिया जाता है. ऐसे में सरकारें इस अपराध को रोकने में नाकाम हैं, तो इस का मतलब यह कतई नहीं कि वे लाइसैंस जांच केंद्र खुलवा कर इसे कानूनन सही ठहरा दें. अगर कोई पति अपनी पत्नी को मारने से बाज नहीं आता, तो उस के खिलाफ कानूनी काररवाई करने के बजाय क्या उसे पत्नी को मारनेपीटने का कानूनी लाइसैंस दे दिया जाए? शराब के मामले में सरकारों ने ठीक ऐसा ही किया है. नशाबंदी लागू करने के बजाय उन्होंने गांवों, शहरों, कसबों में लाइसैंसी दुकानें खुलवा कर शराब पर कानूनी होने का ठप्पा लगा दिया है.

भले ही सरकारों ने शराब को राजस्व हासिल करने का सब से बड़ा जरीया बना रखा है, लेकिन सच तो यह है कि इस मामले में सरकारें भ्रम की स्थिति में हैं. उन्हें इस का अर्थशास्त्र समझने की जरूरत है. पिछले साल राजस्थान सरकार ने क्व7 हजार करोड़ आबकारी राजस्व तय किया था. इस में से करीब क्व5 सौ करोड़ शराब की लौबी ने चुकाए ही नहीं. करीब 2 हजार करोड़ आबकारी विभाग, आबकारी पुलिस थाने वगैरह पर खर्च हो गए यानी आधा पैसा तो इन की मशीनरी पर ही खर्च हो जाता है. बाकी बचे 50 फीसदी राजस्व के बदले में 80 फीसदी अपराध, हत्याएं, लूट, बलात्कार व दूसरे तरह के कई अपराध शराब पीने से होते हैं और लाखों परिवारों की बरबादी होती है, वह अलग.

असली फायदा तो तब माना जाए जब शराबबंदी पर अमल हो. इस से जो पैसा लोगों के पास बचेगा वह बाजार में जाएगा. लोग जरूरत की चीजों पर टैक्स चुकाएंगे, जो सीधेसीधे सरकारों के खातों में जाएगा. इस से सरकारों का राजस्व बढ़ेगा, लेकिन सरकारें इस हिसाबकिताब को समझने में चूक कर रही हैं.

पूरे देश पर चढ़ा सरूर

भले ही आज भी शराब पीने के नाम पर लोग नाकभौं सिकोड़ते हों, लेकिन बाजार झूठ नहीं बोलता. जोश ए जवानी, नोटों से भरी जेबें और तेजी से बदलते माहौल के चलते शराब का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है. भारतीय अलकोहल पेय बाजार जिस तेजी से सालाना बढ़ रहा है, वह काफी चिंताजनक है और स्पष्ट है कि देश की बड़ी आबादी शराब की गिरफ्त में है. देश में बीयर पीने वालों की भी कमी नहीं है और व्हिस्की पीने के मामले में तो भारतीयों ने व्हिस्की के सब से बड़े बाजार माने जाने वाले अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है.

एक रिसर्च के मुताबिक, भारत में शराब पीना 16 से 18 साल की उम्र से शुरू हो कर 25 से 30 साल की उम्र में चरम पर पहुंच जाता है. इस समय भारत की 35 करोड़ की आबादी 18 से 35 साल की है और अगले 5 साल में इस में 5 से 7 करोड़ का इजाफा होने का अंदाजा है. यही वजह है कि दुनिया के तमाम शराब के कारोबारी भारत की ओर रुख कर रहे हैं.

नशा नहीं, रोग है शराब

भारत समेत दुनिया भर में शराब का सेवन करने से होने वाली बीमारियों की वजह से 33 लाख लोग हर साल मौत को गले लगाते हैं. इतना ही नहीं भारत में सड़क हादसों में हर साल करीब 1,38,000 लोग मारे जाते हैं. अलकोहल ऐंड ड्रग इन्फौर्मेशन सैंटर के एक अध्ययन के मुताबिक, इन में से 40 फीसदी हादसे शराब पी कर वाहन चलाने की वजह से होते हैं.शराबखोरी कितना भयानक रोग बनता जा रहा है, यह इस से समझा जा सकता है कि दुनिया में बीमारियों, विकलांगता व मौत की वजह के जो कारण बताए जाते हैं, उन में शराबखोरी 2010 तक छठा कारण थी, लेकिन अब तीसरे पायदान पर आ पहुंची है. इंसान में 2 सौ से ज्यादा बीमारियों का खतरा शराब के सेवन से बढ़ता है.

पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन नामक संस्था ने राजस्थान समेत 6 राज्यों के बारे में एक अध्ययन किया है और उस की रिसर्च के मुताबिक, शराब पर टैक्स व उस के दाम बढ़ने के बावजूद शराब की खपत बढ़ रही है. इस रिसर्च में राजस्थान, तमिलनाडु, ओडिशा, सिक्किम, मेघालय व बिहार शामिल हैं. रिसर्च से पता चला है कि 28 फीसदी शराबी आत्महत्या करते हैं. आत्महत्या के सभी मामलों में से 50 फीसदी शराब या अन्य नशे पर निर्भरता से जुड़े होते हैं. शराब के सेवन से आत्महत्या करने वालों में किशोरों की संख्या ज्यादा है, जो कुल आत्महत्या के मामलों में से 70 फीसदी है. शराब की लत इतनी आसानी से नहीं छूटती पर इसे छोड़ना नामुमकिन भी नहीं. आप के बेहतर स्वास्थ्य व भविष्य के लिए इस लत को छोड़ना बेहद जरूरी है.

फिल्म रिव्यू: वजीर.. रहस्य और रोमांच की अनोखी कहानी

रहस्य और रोमांच प्रधान फिल्म ‘‘वजीर’’ की कहानी का ताना बाना ‘वजीर’ जो मौजूद नही है, के इर्द गिर्द बुना गया है. और यह रहस्य बहुत जल्द दर्शकों की समझ में आ जाता है. कुल मिलाकर फिल्म की कहानी यह है कि एक व्हीलचेअर पर बैठा शतंरज का माहिर खिलाड़ी किस तरह अपने मकसद को हासिल करने के लिए एक एटीएस आफिसर को अपना मोहरा बनाकर चालें चलता है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है एटीएस ऑफिसर दानिश अली (फरहान अख्तर) की कत्थक डांसर रूहाना (अदिति राव हैदरी) के संग शादी, खुशहाल जिंदगी और एक चार साल की बेटी नूरी का पिता बनने से. एक दिन जब यह परिवार रूहाना के एक शो में जा रहा होता है, तभी अपने घुंघरू ठीक कराने के लिए एक दुकान के सामने गाड़ी रूकवा कर रूहाना दुकान के अंदर जाती है, तभी दानिश अली की नजर एक अपराधी पर पड़ती है.

दानिश अपनी कार से उसका पीछा करने लगता है. दोनो तरफ से बंदूक की गोलियां चलती है. जिसमें दानिश की बेटी नूरी मारी जाती है. इसके लिए रूहाना, दानिष को अपराधी मानकर उसे छोड़कर अपनी मां के पास चली जाती है. इतना ही नहीं एटीएस के उच्च अफसरों को यकीन है कि यह अपराधी किसी नेता से मिलने दिल्ली आया है, पर दानिश के हाथों यह अपराधी मारा जाता है. इसके चलते दानिश को सस्पेंड कर दिया जाता है.

फिर दानिश की मुलाकात व्हील चेअर पर रहने वाले, शतरंज के माहिर खिलाड़ी व टीचर पं. ओमकार नाथ धर (अमिताभ बच्चन) से होती है. दोनों के बीच दोस्ती हो जाती है. पं.ओमकार नाथ धर अपने पत्नी व बेटी की मौत की कहानी सुनाकर दानिश को यकीन दिला देते हैं कि उन दोनों का असली अपराधी एक ही है. यहीं पता चलता है कि रूहाना अपनी बेटी नीरू को शतरंज सिखाने के लिए पं.धर के पास लाती थी, जबकि पं. धर की बेटी, सामाजिक मंत्री कुरेषी (मानव कौल) की बेटी को पेंटिग सिखाने जाती थी और मंत्री कुरेषी उसे मौत के घाट उतार देते हैं.

कहा जाता है कि सीढि़यों पर फिसलकर मौत हुई. इससे पं.धर सहमत नहीं है. पं.धर अपनी बेटी की हत्यारे को सजा दिलाने के लिए दानिश को मोहरा बनाते हैं. वह दानिश को शतरंज का खेल सिखाते हुए शतरंज के खेल के साथ ही वजीर की दास्तान सुनाते हुए नकली वजीर की कथा सुनाते हैं कि वजीर (नील नितिन मुकेष) उन्हे मारना चाहता है. फिर हर दिन एक नई कहानी सुनाकर वजीर की आवाज में दानिश को फोनकर पं. धर एक घटनाक्रम रचते हैं, जिसमें वह खुद को बम से उड़ा लेते हैं, पर वजीर की तलाश में दानिशस अली, श्रीनगर में मंत्री कुरेषी तक पहुंच जाता है, जहां पता चलता है कि कुरेषी की बेटी मुन्नी उनकी बेटी नहीं है. बल्कि कुरेषी एक आतंकवादी है, जिसने कुछ साल पहले कश्मीर में तबाही मचायी थी और मुन्नी के माता पिता के सहित कईयों को मौत के घाट उतारा था.

पर अचानक सेना के पहुंच जाने पर उसने मुन्नी को अपने सीने से चिपकाकर कहानी सुनायी थी कि आतंकवादियों ने सब कुछ लूट लिया. सिर्फ वह और उनकी बेटी किसी तरह बच गयी.उसके बाद मुन्नी को वह डराकर रखते थे. कुरेषी खुद नेता बनकर मंत्री बन गए थे. पर आतंकवादियों से उनके संपर्क बने हुए थे. सच जानने के बाद दानिश, कुरेषी को मौत के घाट उतार देता है. फिर मुन्नी सारा सच टीवी चैनलों के सामने सुनाती है और अंत में पता चलता है कि वजीर कोई और नहीं, बल्कि खुद पं. धर ही वजीर की काल्पनिक कहानी दानिश को सुनाया करते थे और शतरंज का नियम बताते हैं कि शतरंज के खेल में हारने वाला हार कर भी जीतता है.

यॅूं तो यह कुशलता से बनायी गयी फिल्म है. फोटोग्राफी अच्छी है. लोकेशन और कलाकारों का चयन काफी कुशलता के साथ किया गया है. मगर रहस्य और रोमांच रूपी  कथानक काफी कमजोर व लचर है. फिल्म में नील नितिन मुकेश और अदिति राव हैदरी ने क्या सोचकर अभिनय किया, यह समझ से परे हैं. पूरी फिल्म में फरहान अख्तर सपाट चेहरे के साथ ही नजर आते हैं. अभिनेता के रूप में फरहान अख्तर और मानव कौल दोनों काफी निराश करते हैं.

फिल्म में जॉन अब्राहम का भी दुरूपयोग किया गया है. दर्शक अमिताभ बच्चन की वजह से ही ‘वजीर’ देखना चाहेगा. पूरी फिल्म में बदला लेने का आतुर पिता का भाव उनकी आंखों में स्पष्ट रूप से नजर आता है.

कहानी पूरी तरह से जोड़तोड़ पर आधारित है. फिल्म देखने के बाद यह बात समझ में नहीं आती कि इसकी कथा व पटकथा लिखने में विधु विनोद चोपड़ा को 14 साल का लंबा वक्त क्यों लगा. कहानी में कुछ भी नयापन नही है. राजनेता और आंतक वादियों या राजनेता व अपराधियों के गठजोड़ के कथानक पर कई फिल्में बन चुकी हैं. निर्देशक के तौर पर बिजॉय नांबियार कहीं से भी प्रभावित नहीं करते. तकनीकी स्तर पर तमाम खामियां नजर आती हैं. इंटरवल के बाद फिल्म बहुत कमजोर हो जाती है. लगता है जैसे कि फिल्म को बेवजह खींचा जा रहा है. रोमांच का अता पता नहीं रहता. फिल्म की कहानी व घटनाक्रम में तमाम कमियां हैं.

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