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अब लद रहे हैं अजीत जोगी के दिन

बीती 14 जनवरी को छत्तीगढ़ के पूर्व मुख्य मंत्री अजीत जोगी जब ट्रेन द्वारा रायपुर से बिलासपुर पहुंचे तो बेहद तमतमाए हुये थे. आक्रोश, ग्लानि, प्रतिशोध, क्षोभ और बेबसी जैसे दर्जनों साहित्यिक शब्द मनोभाव बनकर उनके चेहरे पर साफ पढ़े जा सकते थे, लेकिन उन्हे देख स्टेशन आए उनके समर्थकों ने अंदाजा लगा लिया कि इस बार दिल्ली मे बात नहीं बनी। वैसे भी सभी को मालूम था कि राहुल –सोनिया गांधी ने जोगी समर्थकों को खाली हाथ टरका दिया है ऐसे में जोगी के मुंह से कोई शुभ समाचार सुनने की उनकी ख़्वाहिश अधूरी रह गई.

छग कांग्रेस मे घमासान तो जनवरी के पहले हफ्ते मे ही शुरू हो गया था जब प्रदेश इकाई ने मारवाही से विधायक अमित जोगी को एक प्रस्ताव पारित करते बाहर का रास्ता दिखा दिया था. अमित पर आरोप है  कि उन्होने 2014 के अंतरगढ़ विधान सभा उप चुनाव मे मुख्यमंत्री रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता से सौदेबाजी की थी जिसके तहत कांग्रेस प्रत्याशी मंतू राम ने एन वक्त पर अपना नाम वापस ले लिया था और भाजपा बगेर किसी जद्दोजहाद के जीत गई थी.

जैसे ही नए साल की शुरुआत मे अमित-पुनीत की बात चीत का आडियो टेप जारी हुआ तो प्रदेश कांग्रेस ने हरकत मे आते न केवल अमित को निष्काषित कर दिया बल्कि अजीत जोगी के निष्काशन की भी सिफ़ारिश आलाकमान से कर डाली. इसके बाद जोगी समर्थकों और विरोधियों की जो दिल्ली दौड़ शुरू हुई तो अभी तक थमी नहीं है. अजीत जोगी के धुर विरोधी भूपेश बघेल से तो राहुल गांधी मिल लिए और मामले की सारी जानकारी ली, लेकिन जोगी समर्थको को कोई भाव नहीं दिया, यहाँ तक कि अजीत जोगी की विधायक पत्नी रेणु जोगी को भी सोनिया गांधी ने मिलने समय नहीं दिया. 15 जनवरी को जब यह स्पष्ट हो गया कि जोगी परिवार की नहीं सुनी जा रही है और अमित का मामला हाल फिल-हाल अधर मे ही रहेगा, तो लगने वालों को गलत नहीं लगा कि जोगी जी के दिन अब लद रहे हैं.

ट्रेन से उतर कर अजीत जोगी सीधे अमित के वेयर हाउस रोड स्थित निवास पर पहुंचे और पत्रकारों से कहा कि प्रदेश कांग्रेस मे रोज नया टेप आ रहा है और प्रदेश कांग्रेस चलाने बाले नेता ( जाहिर है प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ) अपने तरह की संस्कृति ला रहे हैं पर अब षड्यंत्र का पर्दाफाश हो गया है सच सबके सामने है , 2 करोड़ मे प्रदेश कांग्रेस मे महामंत्री बनाया जा रहा है. जोगी के अतीत को देखें तो लगता नहीं कि वे आसानी से हथियार डालेंगे, उनकी राजनीति मे एंट्री बड़े नाटकीय अंदाज मे हुई थी इंदौर कलेक्टर रहते उन्हे फोन पर तत्कालीन प्रधान मंत्री  राजीव गांधी ने कहा था कि इस्तीफा दो और राज्यसभा का नामांकन भर दो.

इसके बाद जोगी ने कभी मुड़ कर नहीं देखा. अर्जुन सिंह के बाद उन्होने दिग्विजय सिंह को अपना गुरु बनाया और ठाकुर लाबी के इशारे पर नाचने लगे. उन्हे छग का पहला मुख्यमंत्री बनवाने बाले अर्जुन सिंह ने इस राज्य से शुक्ला बंधुओं की राजनीति समेट कर रख दी थी. अव्वल दर्जे के जुगाडु नेता अजीत जोगी ने एक वक्त मे भाजपा के दर्जन भर विधायक फोड़कर सनसनी मचा दी थी तो छग विधान सभा चुनाव मे कांग्रेस को मिली पहली हार के बाद ही एक साल के लिए राजनीति से सन्यास ले लिया था पर विवाद हमेशा उनके साथ लगे रहे.

मूलतः खुद को आदिवासी बताने बाले जोगी पर आरोप यह भी है कि वे आदिवासी समुदाय के हैं ही नहीं. फर्जी जाति का यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट मे चल रहा है . अपनी बेटी की ख़ुदकुशी का सदमा झेल चुके अजीत जोगी को  दूसरा बड़ा झटका तब लगा था जब उनका बेटा अमित प्रदेश कांग्रेस कोषाध्यक्ष जग्गी हत्याकांड मे गिरफ्तार हुआ था, यानि अमित की उद्दंडताएं नई नहीं हैं लेकिन इस दफा दिक्कत गांधी –नेहरू परिवार की तरफ से अनदेखी की है, वरना तो छग कांग्रेस से निबटने और उसे मेनेज करने के कई टोटके वे जानते हैं. इधर भूपेश बघेल गुट आलाकमान को यह समझा पाने मे कामयाब रहा है सूबे के स्थानीय निकाय चुनावों मे पार्टी को मिली भारी सफलता से सत्ता तक पहुँचने का रास्ता खुला है. ऐसे मे इस तरह की सौदेबाजी उजागर होने से पार्टी की छवि बिगड़ती है.

दलित-पिछड़ों में मुकाबला, अगडे रहेगें तमाशाई

कोका-कलर के डिजाइनर कोट, कंधे पर रंगीन उफनी दुपट्टा और कान में लटकते लंबे झुमके पहने मायावती ने अपने 60वें जन्मदिन पर विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला. भारतीय जनता पार्टी के बाद बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी रणनीति का खुलासा कर दिया है. जिससे साफ जाहिर होता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्य मुकाबला दलित-पिछडों के बीच ही रहेगा. अगडी जातियों के लोग तमाशाई रहेगें.

अपने 60वें जन्मदिन पर बसपा प्रमुख मायावती ने अपना सबसे बड़ा हमला समाजवादी पार्टी पर किया. मायावती ने कहा कि सपा खुद डाक्टर राम मनोहर लोहिया के आदर्शो पर नहीं चल रही. मायावती ने सपा सरकार द्वारा सैफई में किये गये उत्सव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर होने वाले खर्च पर सवाल उठाये. मायावती ने दलित समाज को यह बताने की पूरी कोशिश की जिससे उनको यह पता चल सके कि सपा सरकार ने दलित महापुरूषों के नाम पर बने स्मारकों से छेडछाड कर उसका अपमान किया है. मायावती ने भारतीय जनता पार्टी पर भी आरोप लगाते कहा कि भाजपा ने झूठे वादे करके चुनाव जीता है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति ही देश की राजनीति की दशा दिशा तय करती है. विधानसभा और लोकसभा चुनावों में करारी मात खाने के बाद लोगों ने बसपा को प्रदेश की राजनीति पर हाशिये पर समझ लिया था. पंचायत चुनावों में बसपा को जो समर्थन मिला, उससे मायावती बहुत उत्साहित है. मायावती जानती है कि चुनाव की मुख्य लडाई सपा-बसपा के बीच होगी. सपा बसपा के लिये अपने वोट बैंक को बचा रखने की चुनौती है साथ के अगडी जातियों को अपने साथ लेना है.

मायावती ने जोर देकर इस बात को कहा कि उनकी सरकार गरीब सवर्णो के आरक्षण को भी लागू करने की योजना बनायेगी. मायावती को लगता है कि ब्राहमण दलित की सोशल इंजीनियरिंग उनको काम देगी. ऐसे में वह अपनी लडाई को दलित पिछडो के स्वाभिमान पर केंद्रित कर रही है. मायावती के पक्ष में उनकी सरकार के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था का मजबूत होना है. जिससे आम शहरी भी मायावती के शासनकाल की तारीपफ करते है.

उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण दलित-पिछडों के बीच रहता है. इसी वजह से अगडी जातियां पावर बैलेंस रखने के बाद भी हाशिये पर रहते हुये तमाशा देखने को मजबूर होती है. लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बडी चतुराई से पिछडों और दलित वर्ग के बडे हिस्से को अपने साथ मिला लिया था. जिसकी वजह से उसे उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 73 पर जीत हासिल हुई थी. सपा, बसपा और कांग्रेस सभी का सूपडा साफ हो गया था. लोकसभा चुनाव के बाद गंगा यमुना में जिस तरह से बहुत सारा पानी बह गया है उसी तरह से केन्द्र की भाजपा सरकार की कलई खुल गई है.

ऐसे में अब समीकरण बदल चुके है. बिहार में नीतीश कुमार की जीत से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव में आत्मविश्वास बढ गया है. वह मान रहे है कि सत्ता में उनकी वापसी भी हो सकती है. ऐसे में चुनावी लडाई दलित-पिछडों के बीच दिख रही है. बैलेंस पावर रखने वाला अगडा वर्ग संगठित न होने के कारण तमाशाई बना नजर आयेगा.

क्या रणबीर के लिए अनलकी साबित हुईं कटरीना कैफ

फिल्म ‘‘तमाशा’’ की रिलीज के दो माह पहले से ही बालीवुड में यह चर्चाएं गर्म हो गयी थी कि रणबीर कपूर को यह बात समझ में आ चुकी है कि कटरीना कैफ उनके लिए ‘अनलक्की’ है. रणबीर कपूर के अति नजदी की सूत्रों की माने तो कटरीना कैफ को अनलक्की समझकर ही रणबीर कपूर ने ‘‘तमाशा’’ के प्रमोशन के दौरान कटरीना कैफ से दूरी बनानी शुरू कर दी थी. इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान रणबीर कपूर ने ‘‘लक्की चार्म’’ दीपिका पादुकोण के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने का प्रयास किया. पर वह अनलक्की कटरीना कैफ से ज्यादा समय तक दूर नहीं रह पाए और फिर बाक्स आफिस पर ‘तमाशा’ की जो दुर्गति हुई, उससे रणबीर कपूर को नए सिरे से अपने करियर, अपनी जिंदगी के बारे में सोचना पड़ा.

इसी सोच में डूबे रणबीर कपूर पिछले साल की भांति इस साल नव वर्ष और क्रिसमस की छुट्टियां कटरीना कैफ और उनके परिवार के सदस्यों के साथ मनाने के लिए लंदन नहीं गए. सूत्रों के अनुसार मशहूर फिल्म निर्देषक अनुराग बसु के साथ मिलकर रणबीर कपूर ने फिल्म‘‘जग्गा जासूस’’ का निर्माण लगभग डेढ़ साल पहले शुरू किया था.पर यह फिल्म अब तक पूरी नहीं हो पायी.जबकि इस फिल्म के निर्देशक अनुराग बसु हैं और फिल्म में कटरीना कैफ व रणबीर कपूर की ही मुख्य भूमिकाएं हैं. इस फिल्म के कई सीन रीशूट किए जा चुके हैं.

मजेदार बात यह है कि नवंबर 2015 में अनुराग बसु ने स्वीकार किया था कि कटरीना कैफ और रणबीर कपूर के साथ शूटिंग करना बहुत मुश्किल हो रहा है. अनुराग बसु चाहते हैं कि यह फिल्म जल्द से जल्द पूरी होकर रिलीज हो जाए. इसी के चलते जनवरी माह में फिल्म ‘‘जग्गा जासूस’’ की पुनः शूटिंग शुरू हुई. लेकिन 9 जनवरी के बाद से रणबीर कपूर और कटरीना कैफ इस फिल्म की शूटिंग के लिए सेट पर नही पहुंचे हैं. कटरीना कैफ के अति नजदीकी सूत्रो की माने तो नौ जनवरी को फिल्म‘‘जग्गा जासूस’’ की शूटिंग खत्म करके कटरीना कैफ सीधे सलमान खान से मिलने गयी थी. दोनों के बीच क्या बात हुई, यह तो पता नही, मगरउसी दिन से बालीवुड में चर्चाएं गर्म हो गयी थी कि रणबीर कपूर और कटरीना कैफ के बीच जो भी रिश्ता था, उसका अंत हो चुका है.

सूत्रों के अनुसार रणबीर कपूर ने कटरीना के साथ मुंबई के बांदरा इलाके के जिस डुपलेक्स फलैट में रहना शुरू किया था, उसे छोड़कर पुनः अपने माता पिता के बांदरा के पाली हिल स्थिति कृष्णा बंगले में रहने पहॅंच गए हैं. जबकि कटरीना कैफ ने भी रणबीर कपूर के घर से अपना बोरिया बिस्तर बांधकर दूसरी जगह रहने चली गयी हैं.

बालीवुड से जुड़े सूत्रों की माने तो कटरीना कैफ एक कलाकार और एक इंसान के तौर पर अनलक्की हैं. कटरीनाकैफ ने 2003 में कैजाद गुस्ताद की असफल फिल्म ‘‘बूम’’ से अपने करियर की शुरूआत की थी. इस फिल्म के बाद वह सलमान खान के नजदीक पहुंच गई. जब तक कटरीना कैफ और सलमान खान के बीच रिश्ते रहे, तब तक कटरीना कैफ का करियर आगे बढ़ता रहा, मगर सलमान खान की जिंदगी में हादसे होते रहे, उन्हे बदनामी मिलती रही. इतना ही नहीं सलमान खान की फिल्में बाक्स आफिस पर असफल होती रही. जैसे ही सलमान खान की जिंदगी से कटरीना कैफ बाहर हुई, वैसे ही सलमान खान का करियर तेजी से आगे बढ़ने लगा.उनकी फिल्में बाक्स आफिस पर नए नए रिर्काड बनाने लगी.

तो दूसरी तरफ कटरीना कैफ, रणबीर कपूर की जिंदगी में आयी और फिर वह रणबीर कपूर के लिए अनलक्की होने लगी. जी हां! बालीवुड में चर्चाएं हैं कि कटरीना कैफ का साथ पकड़ने से पहले रणबीर कपूर का करियर तेजी से उपर की ओर जा रहा था. वह आम कमर्शियल फिल्मों से थोड़ा सा हटकर बेहतरीन फिल्में कर रहे थे. फिल्में सफल हो रही थीं. लोग उनके अभिनय प्रतिभा की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. लेकिन कटरीना का संग पकड़ते ही रणबीर कपूर का करियर डांवाडोल होने लगा. वह विवादों में घिरने लगे. एक तरफ दुबई के एक बीच पर बिकनी पहने कटरीना कैफ व रणबीर कपूर की तस्वीरें आम हुई, दूसरी तरफ रणबीर कपूर की फिल्म ‘‘बेशरम’’ ने बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा. उसके बाद रणबीर कपूर की फिल्म ‘रॉय’ को दर्शक नहीं मिले. उनकी फिल्म ‘‘बांबे वेल्वेट’’ भी मुंह की खा गयी. तब रणबीर कपूर ने इम्तियाज अली के निर्देशन में दीपिका पादुकोण के साथ फिल्म ‘‘तमाशा’’ की. मगर रणबीर कपूर की जिंदगी में कटरीना कैफ थी, इसी वजह से दीपिका पादुकोण का साथ भी रणबीर कपूर को नहीं बचा पाया और ‘‘तमाशा’’ का भी बाक्स आफिस पर बुरा हाल हुआ. जबकि दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ बाक्स आफिस पर सफलता के झंडे गाड़ रही है.

रणबीर कूपर के नजदीकी सूत्रों की माने तो ‘‘तमाशा’’ के दौरान ही रणबीर कपूर ने कटरीना कैफ से दूरियां बढ़ानी षुरू कर दी थी और इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान जिस तरह रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण के संग पुनः नजदीकियां बढ़ा रहे थे, उससे रणवीर सिंह को दीपिका पादुकोण के संग अपने तथाकथित रिश्ते के टूटने के आसार नजर आने लगे थे. जिसके चलते रणवीर सिंह ने बयान दे डाला था कि रणबीर कपूर और दीपिका की जोड़ीकी बनिस्बत उनकी और दीपिका पादुकोण की जोड़ी ज्यादा हॉट है.

यॅूं तो रणबीर कपूर और कटरीना कैफ के अलगाव पर इन दोनों कलाकारों के प्रवक्ताओ ने चुप्पी साध रखी है. इस जोड़ी के टूटने पर कोई कुछ भी खुलकर कहने को तैयार नही है. मगर कुछ लोग दबी जुबान में यह कहने लगे हैं कि यदि भविष्य में रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण फिर से एक हो जाएं, तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए…..अब सच क्या है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

आर माधवन को क्यों बनना पड़ा निर्माता और लेखक

बीस साल के अपने अभिनय करियर में हिंदी और तमिल भाषाओं की ‘‘थ्री ईडिएट्स’’, ‘‘रंग दे बसंती’’, ‘‘रामजी लंदनवाले’’, ‘‘तनु वेड्समनु’ सहित पचास से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके आर माधवन हर हिन्दी फिल्म में वही रोमांटिक किरदार में नजर आते रहे हैं. उनकी पहचानएक डब्बू प्रेमी की ही बनकर रह गयी है. इतना ही नही उनकी हर फिल्म में उनके मुकाबले हीर्राइेनें ज्यादा सशक्त नजर आती रही हैं. इसी के चलते धीरे धीरे आर माधवन की अभिनय क्षमता को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे थे.

इन सवालों से तंग आकर आर माधवन ने ऐसी स्क्रिप्ट की तलाश शुरू की, जिससे जुड़ कर वह अपनी क्षमता को लेकर उठने वाले हर सवाल का जवाब दे सकें. वह महज ‘लवर ब्वाय’ नही हैं. बल्कि वह गुस्सैल व इतर किरदारों को निभाने की क्षमता रखते हैं. इसी के चलते आर माधवन ने ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ के बाद रोमांटिक किरदार न करने की ठान ली. चुनौतीपूर्ण स्क्रिप्ट की उनकी तलाश उन्हें दक्षिण भारतीय निर्देषक सुधा कोंगरा प्रसाद तक खींच ले गयी. सुधा के पास स्पोर्ट्स फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’ की कहानी थी. इस कहानी को सुनकर आर माधवन को अहसास हुआ कि इस फिल्म से वह अपनी अभिनय प्रतिभा पर सवालिया निशान लगाने वालों को सटीक जवाब दे सकते हैं.

बस फिर क्या था, उन्होने इस फिल्म की स्क्रिप्ट व संवाद लिखने के साथ साथ इसका निर्माण करने की ठान ली. पूरे तीन साल के अथक प्रयास व कई तरह की मुसीबतों का सामना करते हुए आर माधवन ने सुधा कोंगरा प्रसाद की कहानी पर उन्ही के निर्देशन में हिन्दी में ‘‘साला खड़ूस’’ और तमिल में ‘‘इरूद्धि सुतरू’’ नाम से फिल्म बना डाली, जो कि अब 29 जनवरी को रिलीज होगी.दो भाषाओं में बनी इस फिल्म में बाक्सिंग कोच की मुख्य भूमिका आर माधवन ने खुद निभायी है.

आर माधवन कहते हैं- ‘‘मैंने‘तनु वेड्स मनु’ के बाद सोच लिया था कि मेरी लवर ब्वाय की ईमेज है,उससे हटकर कुछ करना है. आप जैसे कई लोग अक्सर मुझसे कहते रहते थे कि तू अब तक अपनी क्षमता को लोगों के बीच दिखा नहीं पाया. मैंने सोचा कि इस तरह के सवाल लोग मुझसे क्यों पूछते हैं? तब मुझे अहसास हुआ किया कि मुझे बार बार लवर ब्वाय में देखकर सभी को लग रहा है कि मैं इसके अलावा कुछ नहीं कर सकता हूं. इसलिए मैने ऐसी स्क्रिप्ट वाली फिल्म की तलाश शुरू की, जिससे लोग समझ सके कि मैं कुछ अलग काम कर सकता हूं.

तभी मेरे सामने ‘‘साला खड़ूस’’ की स्क्रिप्ट आ गयी. और वह भी एक महिला निर्देशक की तरफ से. तो मुझे लगा कि अब यही मुझे बचा सकती है. यह फिल्म बाक्सिंग पर है. मुझे स्क्रिप्ट इतनी पसंद आ गयी कि मैने उनसे कहानी खरीद ली और मैने उनसे कहा कि आप आराम से बैठिए, अब मैं इस पर फिल्म बनाउंगा. मैने स्क्रिप्ट को नए सिरे से लिखा. संवाद लिखे. मैंने इस फिल्म को बनाने की जिम्मेदारी ले ली,पर फिल्म बनते बनते मेरी हालत बहुत खराबहो गयी.’’

आर माधवन की निर्माता के तौर ‘‘साला खड़ूस’’ पहली फिल्म है. मगर वह पहले भी ‘‘रामजी लंदनवाले’ और ‘‘13 बी’’ सहित कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट लिख चुके है. ऐसे में सवाल उठता है कि उन्होने अपने करियर को संवारने के लिए इससे पहले कोई स्क्रिप्ट क्यों नहीं लिखी? इस सवाल पर आर माधवन कहते हैं- ‘‘मुझमें इतनी क्षमता नही है. यदि मुझमें लिखने की क्षमता होती. तो मैं इतना दर दर क्यों भटकता? मुझे कोई कहानी दे दे, तो मैं स्क्रीनप्ले अच्छा लिख सकता हूं. मैं बता सकता हूं कि स्क्रीनप्ले में कहां क्या गड़बड़ी है? स्क्रीन प्ले में कहां क्या बदलाव करके उसे और अच्छा बनाया जा सकता है. आपको मेरी फिल्मों में स्क्रीन प्ले हमेशा अच्छा मिला होगा. मैंने ‘साला खड़ूस’ की स्क्रिप्ट में कुछ बदलाव कर बेहतर बनाया है.’’

पहलीबार फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखते हुए फिल्म को एक साथ हिन्दी और तमिल भाषा में बनाने की वजह पर रोशनी डालते हुए आर माधवन कहते हैं-‘‘दोनों फिल्मों की निर्देशक एक ही हैं. दोनो फिल्मों में मैं अभिनय कर रहा हूं. मगर दोनो फिल्मों की हीरोइने अलग अलग हैं. पर यदि हिन्दी में यह फिल्म सौ रूपए में बनती है और मैं इसे हिन्दी और तमिल में बनाता हूं तो दोनो फिल्में चालिस रूपए में बन जाती हैं. इसी वजह से मैने इसे हिंदी व तमिल में बनाया. मगर हर फिल्म को हम एक साथ दोनो भाषाओं में नहीं बना सकते. ‘तनु वेड्स मनु’ तमिल में नही बन सकती. दोनो फिल्में एक साथ फिल्माते हैं, तो बजट में साठ प्रतिशत का अंतर पड़ता है.’’

‘‘वीरम’’ में पहली बार एक्शन करेंगे कुणाल कपूर

‘‘रंग दे बसंती’, ‘लागा चुनरी में दाग’ ‘कौन कितने पानी में’’ जैसी फिल्मों में अति संजीदा किरदार निभा चुके अभिनेता कुणाल कपूर अब दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके फिल्म निर्देशक जयराज के निर्देशन में हिंदी, अंग्रेजी और मलयालम इन तीन भाषाओं में एक साथ बन रही फिल्म ‘‘वीरम’’ में एक्शन प्रधान किरदार निभा रहे हैं, जो कि शेक्सपियर के नाटक ‘‘मैकबेथ’’ पर आधारित है. जी हां! इस फिल्म में एक विजयी योद्धा चंदू चेकावर के किरदार में कुणाल कपूर नजर आएंगे. यह पहला अवसर होगा, जब कुणाल कपूर अपनी चिरपरिचित संजीदा कलाकार की इमेज से हटकर एक्शन करते हुए नजर आएंगे. इतना ही नही यह पहला मौका है जब कुणाल कपूर किसी दक्षिण भारतीय निर्देशक के साथ दक्षिण भारतीय मलयालम भाषा की फिल्म कर रहे हैं.

सूत्रोंके अनुसार पांच जनवरी से केरला में इस फिल्म की शूटिंग शुरू हो चुकी है. कुणाल कपूर अपने किरदार के साथ न्याय करने के लिए पिछले चार माह से मार्शल आर्ट में माहिर गुरू शिवकुमार गुरूक्कल से कलारियापट्टू की ट्रेनिंग ले रहे थे.

तीन भाषाओं में बन रही फिल्म ‘‘वीरम’’ करने की चर्चा करते हुए कुणाल कपूर कहते हैं- ‘‘यह वीरता, लालच, जरुरत और धोखे की बड़ी रोचक कथा है. यह ऐसे योद्धा की कहानी है, जिसे लगता है कि वह एक दिन राजा बन सकता है. हर कलाकार का सपना होता है कि वह शेक्सपियर के ‘मैकबेथ’ को करे. इतना ही नहीं मैं लंबे समय किसी एक्शन फिल्म का हिस्सा बनना चाहता था. इसलिए जैसे ही मेरे पास इस फिल्म का आफर आया, मैने बिना समय गंवाए इसे लपक लिया. और अब तो मैं कोचीन में इसकी शूटिंग भी कर रहा हूं. कुछ दिन बाद मैं इसी फिल्म की शूटिंग के लिए आगरा भी जाने वाला हूं.’’

तो ये है फिल्म ‘‘वजीर’’ की सफलता का सच

फिल्म ‘वजीर’ की रिलीज के तीन दिन बाद अमिताभ बच्चन ने फिल्म ‘‘वजीर’’ की सफलता के लिए ट्विटर पर दर्शकों को धन्यवाद अदा करते हुए लिखा-‘‘फिल्म ‘वजीर’ की सफलता के लिए आपके प्यार, सराहना और संरक्षण के लिए धन्यवाद.’’अमिताभ बच्चन के इस ट्वीट के बाद से ही बालीवुड के पंडितों के बीच फिल्म की सफलता को लेकर चर्चाएं शुरू हो गयी. फिल्म ‘‘वजीर’’ ने पहले सप्ताह में साढ़े उन्तीस करोड़ रूपए कमाए. यह बाक्स आफिस का ग्रास कलेक्शन है. सूत्रों के अनुसार ग्रास क्लेक्शन में से मनोरंजन टैक्स व अन्य खर्चे निकालने के बाद निर्माता के हाथ में मुश्किल से पैंतीस प्रतिशत ही आता है. इस हिसाबसे साढ़े उन्तीस करोड़ में से निर्माता के हाथ में कितने रूपए आए होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

यहां यह भी याद रखना होगा कि फिल्म ‘‘वजीर’’ के निर्माण की लागत पैंतीस करोड़ रूपए है. तो अब यह फिल्म वास्तव में कितनी सफल है, इसका आकलन करने में बौलीवुड पंडित अपना दिमाग लगा रहे हैं. क्या फिल्म की लागत वसूल हुए बगैर भी फिल्म सफल मानी जानी चाहिए? यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि गत वर्ष रिलीज हुईअमिताभ बच्चन की फिल्म ‘‘पीकू’’ ने पहले सप्ताह में 41 करोड़ बयालिस लाख रूपए कमाए थे.

यदि बाक्स आफिस कलेक्शन पर गौर किया जाए, तो मजेदार बात यह है कि अमिताभ बच्चन के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘वजीर’’ ने पहले सप्ताह में सिर्फ साढ़े उन्तीस करोड़ कमाए. जबकि रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ ने ‘वजीर’ को जबरदस्त टक्कर देते हुए चौथे सप्ताह में दस करोड़ से अधिक कमा लिए.

‘‘दिलवाले’’से हिले रोहित शेट्टी, अब कम करेंगे अपना खर्च

 ‘‘गोलमाल’’, ‘‘सिंघम’’ जैसी फिल्मों में गाडि़यां उड़ाने व एक्शन दृश्यों में अनाप शनाप धन खर्च कर अपनी एक अलग पहचान बना लेने वाले फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी को भी अब अपनी कार्यशैली बदलने पर विचार करना पड़ रहा है. सूत्रों के अनुसार बॉक्स आफिस पर फिल्म ‘‘दिलवाले’’ की दुर्गति के बाद रोहित शेट्टी और शाहरुख खानकी प्रोडक्शन कंपनी ‘रेड चिल्ली’ के बीच जिस तरह से गर्मा गर्म बहस हुई, और ‘रेड चिल्ली’ के अधिकारियों ने जिस तरह से रोहित शेट्टी को उनकी कमियां गिनायी. उससे रोहित शेट्टी को अहसास हुआ कि उन्हे अपनी कार्यशैली में बदलाव लाकर अपनी कंपनी के मुनाफे के बारे में सोचना ही पड़ेगा.

सूत्रों के अनुसार रोहित शेट्टी ने अपने निर्देशन में बनने वाली फिल्मों का बजट कम करने का निर्णय ले लिया है. सूत्र बताते हैं कि इसके चलते रोहित शेट्टी अब गाडि़यां उड़ाने व एक्शन दृश्यों पर कम धन खर्च करने के अलावा अपने साथ जु़ड़ी पूरी टीम के मेहनताने में भी कमी करने वाले है. सूत्रों के अनुसार अब वह हर फिल्म कब बजट में बनाकर साथी निर्माता को फायदा पहुंचाने की कोशिश करेंगे. अपना बजट कम करने के बाद रोहित शेट्टी अब अक्षय कुमार के साथ मिलकर एक फिल्म का निर्माण करने वाले हैं. मगर यह पहली बार होगा कि वह इस फिल्म के निर्माण से जुड़ेंगे, मगर निर्देशन नहीं करेंगे.

अक्षय कुमार व रोहित शेट्टी निर्मित इस फिल्म का निर्देशन प्रियदर्शन करेंगे. सूत्र यहां तक दावा कर रहे है कि रोहित शेट्टी अपनी हर नई फिल्म के सेटेलाइट राइट्स, संगीत के राइट्स आदि बेचने के लिए संबंधित कंपनियों से बात करने के बाद ही अपनी फिल्म का बजट तय किया करेंगे. काश! सभी को इसी तरह की सदबुद्धि आ जाए और फिल्म के निर्माण में बेवजह पैसा बहाने की बजाय उत्कृष्ट फिल्म बनाने के बारे में सोचना शुरू करें, तो शायद भारतीय सिनेमा का भला हो जाए.

इन 5 कारणों से ऑस्ट्रेलिया में डूबी टीम इंडिया की नैया

टीम इंडिया के कप्तान महेन्द्र धौनी ऑस्ट्रेलिया में जीत के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे है. धौनी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ लगातार तीन मैचों में मिली हार निराश हैं और हार की बड़ी वजह भारत की तेज गेंदबाजी. तेज गेंदबाजों के लचर प्रदर्शन को देखते हुए धौनी बल्लेबाजों से अधिक जिम्मेदारी लेने और अधिक रन बनाने की अपील की है. बल्‍लेबाजों ने दो मैचों में टीम को 300 से अधिक रन बनाकर दिए, लेकिन गेंदबाजों ने निराश किया और नतीजा ऑस्‍ट्रेलियाई टीम पांच मैचों की वन-डे सीरीज में 3-0 से आगे हो गई.

आइए जानते हैं टीम इंडिया को मिली करारी हार के पांच कारण-

कैच टपकाना

कहावत है कि कैचेस विन मैचेस यानी कैच पकड़ो मैच जीतो. मगर शुक्रवार को टीम इंडिया के खिलाडिय़ों में कैच टपकाने की कोई स्पर्धा चल रही थी. अजिंक्य रहाणे, ईशांत शर्मा, मनीष पांडे, बरिंदर सरन ने कैच पकडऩे के मौके गंवाए और नतीजा टीम इंडिया को शिकस्त झेलनी पड़ी. पिछले कुछ सालों में टीम इंडिया के युवा खिलाडिय़ों ने फील्डिंग का स्तर ऊंचा किया था, लेकिन शुक्रवार को फील्डर्स ने कैच टपकाने के साथ-साथ रन आउट के भी कई मौके गंवाए. यहीं कारण है कि टीम इंडिया को गाबा में हार झेलनी पड़ी.

गेंदबाजी विभाग बड़ी कमजोरी

टीम इंडिया को लगातार दूसरे मैच में गेंदबाजों की वजह से हार का सामना करना पड़ा. विदेशी पिच पर भारतीय गेंदबाज फीके साबित हो रहे है, जिससे आलोचकों को मौका मिल रहा है. भारतीय गेंदबाजों ने मैच में 12 वाइड गेंद फेंकी, जिसने विरोधी टीम पर दवाब हल्का कर दिया. उमेश यादव, ईशांत शर्मा और बरिंदर सरन अपनी गति से कोई प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं. स्पिन विभाग एशियाई उपमहाद्वीप के बाहर फीका साबित हो रहा है. धौनी ने मैच के बाद यह भी कहा कि अब बल्‍लेबाजों को 330 रन का स्‍कोर खड़ा करना होगा ताकि मैच जीता जा सके.

टीम चयन पर सवाल

टीम प्रबंधन और महेन्द्र सिंह अपनी रणनीति में कोई बदलाव करते नहीं दिख रहे हैं. भुवनेश्वर कुमार को बाहर रखना और तथा ऋषि धवन को मौका नहीं देना समझ से परे है. धौनी रक्षात्मक रवैया अपनाते दिखे जो घातक साबित हो सकता है. धौनी हमेशा नयापन करने के लिए मशहूर हैं, लेकिन दोनों मैचों में उनकी सोच एक जैसी नजर आई. टीम निदेशक रवि शास्त्री आक्रामक क्रिकेट को तवज्जो देते हैं, लेकिन उनके द्वारा भी कोई नया कदम उठाते देखने को नहीं मिल रहा.

स्‍लॉग ओवर्स में बने मजह 75 रन

टीम इंडिया 40 ओवर की समाप्ति पर दो विकेट खोकर 233 रन बनाकर सुखद स्थिति में था. भारतीय टीम यहां से आराम से 330 रन का स्‍कोर बना सकती थी. मगर टीम इंडिया अंतिम 10 ओवर में मजह 75 रन बना सकी. रोहित शर्मा के आउट होने के बाद अन्‍य बल्‍लेबाज बड़े शॉट नहीं लगा पाए, जिसका खामियाजा टीम को भुगतना पड़ा. आखिरी के पांच ओवर्स में तो टीम इंडिया ने केवल 38 रन बनाए और इस दौरान पांच बल्‍लेबाज आउट हुए.

बल्‍लेबाजों को सुधारनी होगी अपनी कॉलिंग

रोहित शर्मा और विराट कोहली रनआउट हुए. पिछले काफी समय से भारतीय बल्‍लेबाजों में कॉलिंग का अभाव देखने को मिल रहा है. आज भी जिस अंदाज में रोहित और विराट रनआउट हुए वह टीम के लिए हानिकारक साबित हुआ. भारतीय बल्‍लेबाज जहां एक को दो रन में तब्‍दील कर सकते थे, वहां खिलाड़ी एक-दूसरे की तरफ देख भी नहीं रहे थे. अब टीम को बैठकर चिंतन करने की जरूरत है कि अगले तीनों मैच लगातार कैसे जीते जाए ताकि वन-डे सीरीज जीतकर इतिहास रचे.

300 मैचों में कप्तानी करने वाले तीसरे खिलाड़ी बने धौनी

भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भले ही तीसरे वनडे में महज 23 रन बनाए, लेकिन यह मैच उनके लिए यादगार बन गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि धौनी का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट (टेस्ट, वनडे और टी-20) में कप्तान के रूप में यह 300वां मैच था. धौनी से पहले कप्तानों के इस विशिष्ट समूह में ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग और न्यूजीलैंड के स्टीफन फ्लेमिंग शामिल है.

पॉन्टिंग ने 2002 से 2012 के बीच 324 अंतरराष्ट्रीय मैचों में ऑस्ट्रेलिया की कमान संभाली. ऑस्ट्रेलिया के सबसे सफल कप्तानों में शुमार पॉन्टिंग के नेतृत्व में कंगारूओं ने 230 मैचों में जीत दर्ज की जबकि मात्र 77 में उसे हार का सामना करना पड़ा. उनके नेतृत्व में टीम की सफलता का प्रतिशत 67.90 रहा. इस सूची में फ्लेमिंग 303 मैचों में न्यूजीलैंड की कमान संभालकर दूसरे स्थान पर है. उनकी अगुआई में कीवी टीम को 128 मैचों में जीत तथा 135 मैचों में हार का सामना करना पड़ा. उनकी सफलता का प्रतिशत 42.24 रहा.

धौनी ने 300 मैचों में टीम की कमान संभाली. ब्रिस्बेन में 15 जनवरी को हुए दूसरे वनडे तक के आंकड़ों की बात की जाए तो धोनी की अगुआई में खेले 299 मैचों में 156 मैचों में टीम इंडिया ने जीत दर्ज की. 111 मैचों में टीम को हार का मुंह देखना पड़ा. धौनी ने टीम इंडिया की कमान 60 टेस्ट मैचों में संभाली. 188 वनडे और 51 टी-20 मैचों में भी वे टीम की कमान संभाल चुके हैं.

अक्षय-अभिषेक ने ज्वाला-सिंधु के साथ खेला बैडमिंटन

बॉलीवुड स्टार अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन और रितेश देशमुख ने प्रीमियर बैडमिंटन लीग (पीबीएल) के फाइनल के दौरान बैडमिंटन मैच खेलकर दर्शकों का मनोरंजन किया.

पीबीएल के ब्रांड एंबेसडर और मुंबई रॉकेट्स के सह मालिक अक्षय ने जहां विश्व चैंपियनशिप में दो बार की रजत पदक विजेता पीवी सिंधु के साथ जोड़ी बनायी वहीं अभिषेक ने 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन ज्वाला गुट्टा के साथ जोड़ी बनाकर मैच खेला.

रितेश ने चेयर अंपायर और भारतीय बैडमिंटन संघ के अध्यक्ष अखिलेश दासगुप्ता सर्विस जज बने. अक्षय और अभिषेक ने प्रदर्शनी मैच के दौरान अपना कौशल दिखाया और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. ये तीनों फिल्म स्टार इसके बाद कोर्ट के एक साइड में चले गये और उन्होंने ज्वाला, अश्विनी पोनप्पा और सिंधु के साथ मैच खेले जबकि बाई प्रमुख चेयर अंपायर बन गये और उन्होंने मैच के दौरान प्रत्येक अंक की घोषणा की.

मैच के बाद बाई अध्यक्ष ने उन्हें प्रतीक चिन्ह भेंट किये. अक्षय, अभिषेक, ज्वाला और सिंधु ने इसके बाद बैडमिंटन प्रेमियों को कुछ रैकेट भी दिये.

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