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साला खड़ूस: बाक्सिंग पर फिल्म, बाक्सिंग ही गायब

‘‘खेलों से राजनीति को हटा दो, गली गली में चैम्पियन मिलेंगे.’’ इस मूल मंत्र को प्रचारित करने के लिए आर माधवन ने राज कुमार हिरानी के साथ मिलकर महिला बाक्सरों की स्थिति वगैरह को चित्रित करने के लिए हिंदी में फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’ और तमिल में ‘‘इरूद्धि सुत्तरू’’ का निर्माण किया है. माना कि यह फिल्म है, इस वजह से निर्माता व निर्देशक को सिनेमाई स्वतंत्रता का हक है. मगर जब आप किसी खेल पर केंद्रित फिल्म बना रहे हैं, तो उस खेल की कुछ सच्चाई व उस खेल की तकनीक से आप समझौता करें, यह तो पूरी तरह से गलत है.

फिल्म देखने के बाद निर्माता आर माधवन और निर्देशक सुधा कोंगरा की यह बात गले नहीं उतरती कि इस फिल्म का निर्माण करने से पहले उन्होंने महिला बाक्सिंग पर कई माह तक रिसर्च कर स्केच वगैरह बनाए थे. सबसे बड़ी लाजिक की बात यह है कि एक बाक्सर या बाक्सिंग का कोच लंबे बाल नहीं रखता और न ही दाढ़ी रखता है. क्योंकि लंबे बाल होने पर पसीने के साथ उसके बाल की लतें चेहरे पर या आंख पर आती है, जिससे खिलाड़ी का ध्यान भंग हो जाता है. दूसरी बात चेहरे पर दाढ़ी होने पर चेहरे पर लगी चोट के अहसास नहीं हो सकता. पूरी फिल्म में बाक्सिंग मैच के जो भी सीन हैं, उनमें भी बाक्सिंग का खेल सही ढंग से उभर नहीं पाता है. इसकी वजह फिल्म का कम बजट होना भी हो सकता है. फिल्म देखकर लगता है कि आर माधवन ने अपनी ‘लवर ब्वाय’ की ईमेज को बदलने के लिए यह फिल्म बनायी है और इस फिल्म से वह साबित करना चाहते हैं कि वह भी गुस्सैल किरदार निभा सकते हैं. पर आर.माधवन कहीं से भी एक स्पोर्ट्स मैन या बाक्सिंग कोच के किरदार में फिट नजर नहीं आते हैं. पर वह एक गुस्सैल गुरू जरुर नजर आते हैं. इसी के साथ गुरू –शिष्य परंपरा के साथ गुरू व शिष्य के बीच जो रिश्ता होना चाहिए, उसका सही चित्रण है.

फिल्म की कहानी के केंद्र में खेल में व्याप्त राजनीति के साथ ही बाक्सिंग में लड़कियों की रूचि न हेना है. फिल्म की कहानी आदि तोमर (आर माधवन) से शुरू होती है, जिस पर बाक्सिंग एसोसिएशन के देव खत्री (जाकिर हुसेन) लड़कियों के शारीरिक शोषण का आरोप लगाकर चेन्नई तबादला कर देते हैं. आगे पता चलता है कि आदि तोमर बहुत बेहतरीन बाक्सर थे, पर देव खत्री एक मंत्री के रिश्तेदार होने के नाते ऐसा कुछ करते हैं कि आदि तोमर की आंख में चोट लग जाती है. दस साल तक वह खेल से बाहर रहते है. तब तक देव खत्री बाक्सिंग में कई अवार्ड जीतकर अब एसोसिएशन में उच्च पद पर आसीन हो चुके हैं. और आदि तोमर कोच बन गए हैं. पर दोनों की जमती नहीं है.

इसलिए देव, आदि को सजा देता रहता है. वैसे भी आदि तोमर गुस्सैल और अक्खड़ स्वभाव का है. चेन्नई पहुंचने पर आदि तोमर नई प्रतिभा की खोज शुरू करते हैं. उन्हे चेन्नई में बाक्सिंग कर रही लक्ष्मी उर्फ लक्स (मुमताज सरकार) में प्रतिभा नहीं दिखती. लक्ष्मी तो खेल कोटे से पुलिस की नौकरी पाने के लिए बाक्सिंग कर रही हैं. पर एक दिन आदि तोमर की नजर लक्स की छोटी बहन तथा मछली बेचने वाली मधी (रितिका सिंह) पर पड़ती है. अब आदि तोमर, लक्स और मधी दोनों को जूनियर कोच पंडयन (नासिर) के सहयोग से बाक्सिंग की ट्रेनिंग देता है. मधी सभी को पछाड़ते हुए तेजी से आगे निकलती है. इधर देव को इसकी भनक लगती है, तो वह चाल चलते हुए आदि को पुनः दिल्ली वापस बुलाने की बात करता है. मगर आदि चेन्नई की सभी महिला बाक्सरों को लेकर हिसार पहुंचकर वहां की एसोसिएशन के अंदर ट्रेनिंग देने लगता है. एक दिन लक्स को गलतफहमी हो जाती है कि मधी कोच आदि तोमर से संबंध बनाकर उसे पछाड़ रही है. जलनवश वह उसके हाथ में चोट पहुंचाकर उसे टूर्नामेंट से बाहर करवा देती है.

तब आदि, मधी को बुरा भला कहता है और मधी वापस चेन्नई आ जाती है. चेन्नई में पंडयन उसके साथ है. इधर देव खत्री, मधी को दिल्ली बुलाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाने के लिए बुलाता है. पर वह हार जाती है. वापसी में ट्रेन के अंदर देव, मधी के साथ सेक्स संबंध बनाने का असफल प्रयास करता है. फिर गुस्से में देव चाल चलकर मधी के लाकर से बड़ी रकम जप्त करवाकर उस पर एसोसिएशन के पैसे चुराने का आरोप लगवा देता है.

आदि को खबर मिलती है और वह पुलिस अफसर को डेढ़ लाख रूपए घूस देकर मधी को लेकर हिसार जाता है. इस बार वह मधी को इंटरनेशनल चैंपियनशिप में उतारता है. सेमीफाइनल में वह पास हो जाती है. पर फाइनल में देव उसका नाम हटवा देता है. तब देव के कहने पर आदि कोच से त्यागपत्र देता है. अब देव खुद मधी का कोच बनकर उसे मैदान में उतारता है. मधी, रशियन बाक्सर को हराकर गोल्ड मैडल जीतती है. जब देव उसे अपना स्टूडेंट बताता है, तो मधी स्टेडियम के अंदर ही देव को मारकर अधमरा कर देती है.

सुधा कोंगरे की यह पहली फिल्म है. इसमें पटकथा व निर्देशन की काफी खामियां हैं. पूरी फिल्म सपाट लहजे में चलती है, कहीं भी इमोशन में उतार चढ़ाव नजर नहीं आता. निर्माता, लेखक व निर्देशक की यह सोच भी गलत है कि झोपड़पट्टी में रहने वाला परिवार अपनी बेटियों को बाक्सिंग के खेल में महज इसलिए भेजता है कि वह सरकारी नौकरी पा जाए और पूरे परिवार का भविष्य उज्ज्वल हो जाएगा. यदि वास्तव में लेखक व निर्देशक ने महिला बाक्सरों पर रिसर्च की है, तो उन्हें इस बात का अहसास हुआ होगा कि बाक्सिंग में लड़कियों के आने की मूल वजह यह रहती है कि उनकी परवरिश किस माहौल में हो रही है. हरियाणा, पंजाब या उत्तरपूर्वी राज्यों का माहौल यहां की लड़कियों को  बाक्सिंग के प्रति रूचि पैदा करता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो आर माधवन अच्छे अभिनेता हैं, मगर हर किरदार में वह फिट बैठे, यह आवश्यक नहीं. पहली फिल्म के तौर पर रितिका सिंह और मुमताज सरकार उम्मीदे बंधाती हैं. फिल्म के कथानक में कुछ भी नयापन नहीं है. यह फिल्म कई अंग्रेजी फिल्मों से प्रेरित लगती है. फिल्म के कुछ सीन बहुत घिसे पिटे हैं. फिल्म के कैमरामैन शिवकुमार विजयन ने कमाल का काम किया है.

फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’ का निर्माण एस. शशिकांत, सीवी कुमार, आर माधवन, राज कुमार हिरानी, लेखक व निर्देशक सुधा कोंगरा, संगीतकार संतोष  नारायणन, कैमरामैन शिवकुमार विजयन तथा कलाकार हैं -आर माधवन, रितिका सिंह, मुमताज सरकार, नासिर, राधा रवि, काली वेंकट व संजना मोहन और जाकिर हुसेन.

पांच साल, 651 मैचों में बने पांच दोहरे शतक

एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहले दोहरे शतक के लिये 39 साल और 50 दिन तथा 2962 मैचों का इंतजार करना पड़ा लेकिन इसके बाद पिछले पांच वर्ष और 651 मैचों के अंदर क्रिकेट के इस प्रारूप में पांच दोहरे शतक लग चुके हैं. यह भी संयोग है कि पहले चार दोहरे शतक भारतीय बल्लेबाजों ने लगाये. रोहित शर्मा दो बार ऐसा कारनामा कर चुके हैं जबकि क्रिस गेल पहले गैर भारतीय बल्लेबाज हैं जो इस सूची में शामिल हुए हैं. गेल ने विश्व कप में दोहरा शतक जड़ा और वह इस टूर्नामेंट में यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले बल्लेबाज हैं.

पहला एकदिवसीय मैच पांच जनवरी 1971 को खेला गया था और वनडे में पहला शतक 24 अगस्त 1972 को डेनिस एमिस ने लगाया था. इसके बाद तेंदुलकर के दोहरे शतक बनाने तक वनडे में 1051 शतक लगे लेकिन इनमें कोई भी दोहरा शतक नहीं था. दो बल्लेबाज ऐसे थे जो एक छक्का जड़ने पर 200 रन पर पहुंच जाते लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. पाकिस्तान के सईद अनवर 1997 में भारत के खिलाफ 194 रन बनाकर आउट हो गये जबकि 2009 में जिम्बाब्वे चार्ल्स कावेंट्री बांग्लादेश के खिलाफ इसी स्कोर पर नाबाद रहे थे. इस बीच वनडे क्रिकेट में कई धुरंधर बल्लेबाज देखे गये. मसलन वि​व रिचर्ड्स, सनथ जयसूर्या, मैथ्यू हेडन, कपिल देव, वीरेंद्र सहवाग, एडम गिलक्रिस्ट आदि. ये सभी 170 रन की संख्या के पार भी पहुंचे लेकिन दोहरे शतक से महरूम रहे. यहां तक कि तेंदुलकर ने जब पहला दोहरा शतक लगाया तो यही कहा गया कि उन्होंने इस मुकाम पर पहुंचने में देर लगायी. आखिर तब तक भारत की तरफ 172, आस्ट्रेलिया की तरफ से 152, पाकिस्तान की तरफ से 142, वेस्टइंडीज की तरफ से 130, श्रीलंका की तरफ से 106, इंग्लैंड की तरफ से 91, दक्षिण अफ्रीका की तरफ से 88 और न्यूजीलैंड की तरफ से 71 शतक वनडे क्रिकेट में लग चुके थे. तेंदुलकर ने यह मुकाम अपने 37वें जन्मदिन से दो महीने  पहले किया.

यह भी संयोग है कि तेंदुलकर ने 24 फरवरी 2010 को वनडे का पहला दोहरा शतक लगाया था और गेल ने इसके ठीक पांच साल बाद 24 फरवरी 2015 का विश्व कप का पहला और वनडे का पांचवां दोहरा शतक जड़ दिया. इन पांच वर्षों में वनडे में कुल 345 शतक लगे जिनमें पांच दोहरे शतक शामिल है. जाहिर है इस बीच मैचों की संख्या बढ़ी और उसी अनुपात में शतकों की संख्या में भी इजाफा हुआ. दक्षिण अफ्रीका ने इन पांच वर्षों में सर्वाधिक 55, भारत ने 54, श्रीलंका ने 44, आस्ट्रेलिया ने 33, इंग्लैंड ने 31, न्यूजीलैंड ने 29, वेस्टइंडीज ने 27 और पाकिस्तान ने 24 शतक लगाये. बांग्लादेश ने 11 और आयरलैंड ने 10 शतक लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी लेकिन भारत के तीन बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर (200 नाबाद), वीरेंद्र सहवाग (219) और रोहित शर्मा (209 और 264) चार दोहरे शतक जमाने में सफल रहे.

असल में जिस दोहरे शतक को कभी वनडे में मुश्किल मुकाम माना जा रहा था, टी20 क्रिकेट के आगमन के बाद वह कुछ आसान बन गया. इस बीच बल्लेबाजों के पक्ष में बने क्षेत्ररक्षण और बाउंसर के नियमों ने भी मदद पहुंचायी. बल्ले के निचले भाग की मोटाई विशेषकर 'स्वीट स्पॉट' में भी ताकत भर दी गयी. इससे बड़े शाट खेलने में मदद मिली. गेल सरीखों से तो बहुत पहले से उम्मीद की जा रही थी लेकिन उनके बारे में भी यही कहा जाएगा कि वह देर से इस मुकाम तक पहुंचे. वैसे सिर्फ मददगार परिस्थितियों के दम पर ही दोहरे शतक तक नहीं पहुंचा जा सकता. इसके लिये संयम की भी जरूरत पड़ती है. जैसे कि आज गेल ने दिखाया. उन्होंने अपने पहले 50 रन 51 गेंदों और फिर शतक 105 गेंदों में पूरा किया. मतलब उन्होंने अगले 50 रन के लिये 54 गेंद खेली. वह 100 से 150 रन तक 21 गेंदों में और फिर 150 से 200 रन तक केवल 12 गेंद में पहुंचे. दोहरा शतक इसी तरह से पूरा किया जा सकता है.

तेंदुलकर ने भी जब पहला दोहरा शतक लगाया था तो उन्होंने पहले 100 रन 90 गेंद पर बनाये लेकिन अगले 100 रन के लिये उन्होंने केवल 57 गेंदें खेली थी. सहवाग ने अपनी लय एक जैसी बनाये रखी थी. उन्होंने शतक 69 गेंदों में पूरा किया जबकि अगले 100 रन बनाने के लिये भी 71 गेंदों का सामना किया था. रोहित ने जब 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना पहला दोहरा शतक लगाया था तो उन्होंने बेहद धीमी शुरूआत की थी और पहले 100 रन के लिये 114 गेंद खेल ली थी लेकिन इसके बाद उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए तेजी दिखायी और अगली 42 गेंदों पर 200 रन पर पहुंच गये. उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ 264 रन की रिकार्ड पारी के दौरान भी यही रणनी​ति अपनायी. रोहित ने तब शतक 100 गेंद पर पूरा किया लेकिन उनका दोहरा शतक 151 गेंदों पर बना. मतलब अगले शतक के लिये उन्होंने केवल 51 गेंदे खेली थी.

और हां अंत में ….. 24 फरवरी को वनडे में दो दोहरे शतक लग चुके हैं. क्या आप जानते हैं कि इस दिन पहला वनडे शतक किस बल्लेबाज ने बनाया था? आस्ट्रेलिया के रिकी ​पोंटिंग ने 2008 में भारत के खिलाफ सिडनी में. बाद में गौतम गंभीर ने भी इस मैच में सैकड़ा जड़ा था. संयोग देखिये कि इससे ठीक 100 साल पहले 24 फरवरी को टेस्ट मैचों में पहला शतक पूरा किया गया था. यह शतक 1908 में इंग्लैंड के जार्ज गुन ने बनाया था.

क्रिकेट में जब पाकिस्तान से पहली बार हारा भारत

क्या आप जानते हैं पाकिस्तान ने इंडिया को पहली बार कब हराया था? ये लड़ाई सरहद पर नहीं, मैदान पर लड़ी गई थी. हम आपको बताते हैं पाकिस्तान ने पहली बार किस देश को हराकर जीत का स्वाद चखा था.

जनाब बात है पाकिस्तान-इंडिया टेस्ट क्रिकेट सीरीज की. साल था 1952. पाकिस्तानी क्रिकेट टीम पहली बार इंटरनेशनल मैच खेल रही थी. वो भी उस मुल्क के खिलाफ, जिसके साथ बंटवारे के कड़वे अनुभव थे. इंडिया पाकिस्तान के बीच अक्टूबर 1952 से दिसंबर 1952 तक 5 टेस्ट मैच खेलने तय हुए. पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की कमान मिली एएच करदार को और इंडियन टीम की कप्तानी की लाला अमरनाथ ने. पहला मैच दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में हुआ. पाकिस्तान को शिकस्त का सामना करना पड़ा. पर 4 टेस्ट मैच अभी बाकी थे.

इंडिया को हराकर पाकिस्तान को मिली पहली जीत

भारत पाकिस्तान के बीच दूसरा टेस्ट मैच लखनऊ की यूनिवर्सिटी ग्राउंड में खेला गया. पहली पारी में भारतीय बल्लेबाज महज 106 रन बना पाए. सबसे ज्यादा 30 रन पंकज रॉय ने बनाए. पाकिस्तानी बॉलर फजल महमूद ने पहली पारी में पांच विकेट लिए. अब बारी आई पाकिस्तान की. पाक बल्लेबाज नजर मोहम्मद ने शानदार 124 रन बनाए. पाकिस्तान ने इंडिया के 106 रनों के जवाब में 331 रन बनाए. भारतीय बॉलर गेंदबाजी में कमाल नहीं दिखा पाए. भारतीय बॉलर्स में एस नयालचंद और गुलाम अहमद को 3-3 विकेट मिले.

दूसरी पारी में मौका मिला भारत को. लेकिन पाकिस्तानी गेंदबाजों के आगे भारतीय बल्लेबाज अपना कमाल नहीं दिखा पाए. फजल महमूद ने 11 मेडेन ओवर देते हुए 27.3 ओवर में 7 भारतीय बल्लेबाजों को चलता किया. दूसरी पारी में भारतीय बल्लेबाजों में सबसे ज्यादा कप्तान लाला अमरनाथ ने नाबाद 61 रन बनाए. भारतीय क्रिकेट टीम 182 रनों पर सिमट गई थी. टॉस जीतकर बल्लेबाजी चुनने वाली भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान से मैच हार चुकी थी. पाकिस्तान 43 रनों से इंडिया से जीत चुकी थी.

ये पहला मौका था, जब पाकिस्तान ने इंटरनेशनल लेवल पर कोई मैच जीता था. ये जीत दो वजहों से पाकिस्तान की बड़ी जीत साबित हुई.

1. पाकिस्तान ने अपने दूसरे इंटरनेशनल मैच में ही जीत हासिल की.

2. ये जीत भारत के खिलाफ थी. रोमांच तब भी आज जितना ही हुआ करता था.

हालांकि अगले मैच में पाकिस्तान को हार हाथ लगी. मुंबई टेस्ट में इंडिया ने पाकिस्तान को हराकर सीरीज जीत ली थी. 5 मैचों की सीरीज में कोलकाता और मद्रास में खेले आखिरी के दो मैच ड्रा हो गए थे.

‘अलीगढ़’ हमारे समाज के लिए जरूरी फिल्म: करण जौहर

दो बेहतरीन कलाकार मनोज बाजपई और राजकुमार राव एक साथ ‘अलीगढ़’  फिल्म में नजर आने वाले हैं. इस फिल्म का पोस्टर हाल ही में रिलीज हुआ था. पोस्टर भर से ही फिल्मी कीड़ों के कान खड़े हो गए थे. और अब आ गया है फिल्म का ट्रेलर. जिसको बेहतरीन रिस्पॉन्स मिला है.

फिल्म अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के डॉक्टर श्रीनिवास सिरास पर आधारित है जिन्हें गे होने की वजह से सस्पेंड कर दिया गया था. मनोज बाजपई श्रीनिवास का किरदार निभा रहे हैं, राजकुमार जर्नलिस्ट बने हैं.

‘अलीगढ़’ को पिछले साल कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया गया. जहां फिल्म ने खूब वाहवाही बटोरी. सेक्स के बारे में बात करते फिल्म बनाने वाले जरा हिचकते हैं. क्योंकि सेक्स इशू पर बनी फिल्में बाद में आती हैं, बवाल पहले चला आता है. ऐसे टाइम पर समलैंगिकता पर फिल्म बनाने के लिए हंसल मेहता को सलाम है. लेकिन हर ऑफ-बीट फिल्म बहुत सारी उम्मीद भी लेकर आती है. जिन पर फिल्म खरी उतरेगी या नहीं, ये तो 26 फरवरी को पता चलेगा.

कोल्डप्ले के वीडियो में बियॉन्से संग दिखेंगी सोनम कपूर

सोनम कपूर अंग्रेजी रॉक बैंड कोल्डप्ले के नए गाने A Head Full of Dreams के वीडियो में ‘म्यूज’ यानी इंस्पायर करने वाली औरत का रोल निभाएंगीं. वीडियो में मशहूर सिंगर बियॉन्से भी होंगी, जिन्होंने गाने में बैंड के साथ गाया भी है. वीडियो में सोनम पहनेगीं घागरा चोली, मांग टीका और नाक में नथ.

सोनम की बहन रिया, जो अक्सर उनकी स्टाइलिंग किया करती हैं, ने ही इस बार भी सोनम को तैयार किया है. सोनम ने बताया, “मुझे कोल्डप्ले का म्यूजिक बहुत पसंद है. जैसे दुनिया में सभी कोल्डप्ले को पसंद करते हैं. इस वीडियो में काम करना मेरे लिए सम्मान की बात है. वीडियो का कॉन्सेप्ट बढ़िया है और काम करते हुए मुझे मजा आया.”

वीडियो के डायरेक्टर है बेन मोर. और शूटिंग मुंबई के गोल्फा देवी मंदिर और वसई फोर्ट में हुई है. लगता है कोल्डप्ले को हो गया है इंडिया से प्यार. पिछली जुलाई में आए थे तो दिल्ली के हौज खास के एक पब में मौज में परफॉर्म कर गए थे. फिर अक्टूबर में अपने गाने Hym For The Weekend का म्यूजिक वीडियो भी मुंबई में शूट किया. और अब आ गई सोनम कपूर वाली खबर.

 

पाकिस्तानी फिजा में खिला सुरीला ‘गुल’ हैं पनारा

चेहरे पर झीनी सी मुस्कान लिए पश्तो सिंगर गुल पनारा. पाकिस्तानी कोक स्टूडियो के सीजन-8 में जब आतिफ असलम के साथ ‘मन अमादेहा अम’ गाना गाती हैं तो मन में पनारा की ‘गुल’ सी आवाज घुलने लगती है. ‘मन अमादेहा अम’ गाने की शुरुआती लाइन इश्क की राह पर चल रहे मुसाफिरों को सुकूं भरे घूंट पिलाती है. ऊपर पश्तो में लिखी लाइन का मतलब है- ‘मैं आ गई हूं. इश्क की फरियाद पर. मैं आ गई हूं, ताकि हमारा मिलन हो सके.’

26 साल की पाकिस्तानी पश्तो कुड़ी गुल पनारा. 20 से ज्यादा पश्तो फिल्म और तीन स्टू़डियो एलबम में आवाज. यूनिवर्सिटी ऑफ पेशावर से सोशल वर्क की पढ़ाई लेकिन पहचान बनी सिंगिंग से. ऐसा नहीं है कि सिर्फ पाकिस्तान या कोक स्टूडियो में ‘मन अमादेहा अम’ गाने के हिट होने के बाद गुल को इंडिया या दूसरे देशों में पहचान मिली. अफगानिस्तान, यूएई और कतर जाकर भी गुल परफॉर्म कर चुकी हैं. इस गाने को ओरिजनली गाया था सिंगर घूघूस ने.

गुल सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव हैं . ट्विटर हैंडल है @gullpanra और वेबसाइट gulpanra.net और इंस्टाग्राम पर Thegulpanra नाम से. इन ई-पतों पर गुल के गाने, तस्वीरों का दीदार किया जा सकता है. गुल को फेम मिला 16 अगस्त 2015 के बाद. जब कोक स्टूडियो सीजन 8 का गाना ‘मन अमादेहा अम’ हुआ रिलीज.

मरी नहीं, जिंदा हूं मैं: गुल

गुल पनारा के बारे में अफवाहें भी खूब उड़ी हैं. अगस्त 2014 में गुल पनारा की मौत की अफवाह भी सोशल मीडिया पर फैली. जिसके बाद गुल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, कभी मेरी शादी तो कभी मेरी मौत की झूठी खबरें फैलाई जाती हैं.’ बहरहाल गुल का करियर अभी शुरू हुआ है. शादी या अफेयर से फिलहाल दूर गुल अपने करियर पर कॉन्सन्ट्रेट करना चाहती हैं.

इनोवेशन के लिए सबसे खराब जगह है भारत

इनोवेशन के लिए भारत सबसे खराब देशों में से एक है. एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत 56 देशों की रैंकिंग में 54वें नंबर पर आया है. टेक्नोलॉजी पॉलिसी थिंक टैंक, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन फाउंडेशन (आईटीआईएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की पॉलिसी ग्लोबल इनोवेशन के लिए बेहद खराब है. यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में ‘स्टार्टअप इंडिया’ प्रोग्राम की शुरुआत कर चुके हैं और स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए आसान शर्तों पर बड़े कर्ज देने की बात कह रहे हैं.

लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस देश का माहौल इनोवेशन के लिए बेहद खराब हो, वहां स्टार्टअप कैसे सफल होंगे. इसकी सफलता संदेह के घेरे में आ सकती है. आईटीआईएफ ने जिन देशों को अपने सर्वे में शामिल किया है वह विश्व अर्थव्यवस्था में 90 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं.

थाईलैंड, चीन, भारत, अर्जेंटीना और रूस की पॉलिसी खराब

थाईलैंड, चीन, भारत, अर्जेंटीना और रूस की पॉलिसी ग्लोबल इनोवेशन सिस्टम में सबसे खराब है. रिपोर्ट के मुताबिक इन देशों में कारोबार को लेकर बहुत सारी बाधाएं हैं, जो इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी प्रोटेक्शन के लिए कमजोर वातावरण पैदा करता है. घरेलू इनोवेशन को बढ़ावा देने वाले टैक्स सिस्टम, रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश और ह्यूमन कैपिटल जैसे 14 फैक्टर्स को ध्यान में रखकर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है. आरएंडडी से जुड़े टैक्स इनसेंटिव्स के लिहाज से खराब देशों की लिस्ट में भारत टॉप पर है. इसके कारण देश में इनोवेशन का अभाव है.

आरएंडडी पर किसी भी इंसेंटिव की व्यवस्था नहीं

रिपोर्ट के अनुसार भारत में कंपनियों को आरएंडडी पर किसी भी इंसेंटिव की व्यवस्था नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कोई कंपनी अगर 100 रुपए रिसर्च एंड डेवलेपमेंट पर खर्च करती है तो उसे टैक्स क्रेडिट के रूप में सिर्फ 44 रुपए मिलते हैं. सर्वे में शामिल 56 में से 18 देशों में किसी प्रकार का टैक्स इंसेंटिव नहीं मिलता है. हालांकि, भारत सरकार प्रति व्यक्ति 31,600 रुपए आरएंडडी पर खर्च करती है, जो कि लिस्ट में शामिल 18 देशों से अधिक है.

रिपोर्ट के अनुसार कॉर्पोरेट टैक्स के मामले में भारत बाकी देशों से बेहतर है. भारत में इफेक्टिव कॉर्पोरेट टैक्स 26.8 फीसदी है, जो कि ऑस्ट्रिया, मेक्सिको, अमेरिका, जर्मनी, इटली और जापान के मुकाबले कम है.

पूरा हुआ लोन, तो बैंक से ये दस्तावेज लेना न भूलें

घर खरीदना हो या कार, या फिर कोई बड़ा खर्च आ जाए. हम लोन लेकर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं. लेकिन हम लोन लेकर बेहद शिद्दत से उसकी किस्‍तें जमा करते हैं. लेकिन एक बार जब लोन पट जाता है, तो अक्‍सर हम काफी लापरवाह हो जाते हैं. कई बार हमारे जरूरी दस्‍तावेज जैसे नो ड्यूज सार्टिफिकेट आदि बैंक से लेना भूल जाते हैं, जिसके चलते हमें अगली बार कर्ज लेने में मुश्किल होती है.

इसलिए बैंक से जरूरी दस्‍तावेज लेना न भूलें, क्‍योंकि नो ड्यूज सार्टिफिकेट के बिना हम यह साबित नहीं कर सकते कि हमने लोन पूरा कर लिया है. नो ड्यूज के साथ ही बैंक क्‍लोजर लैटर और स्‍टेटमेंट ऑफ अकाउंट भी जारी करते हैं, जिसे लेना बहुत ही जरूरी है. सरिता टीम आपको आज इन्‍हीं बिंदुओं के बारे में बताने जा रही है, जो आपको लोन पूरा करने के बाद याद रखनी चाहिए.

कर्ज खत्‍म होने के बाद जरूर लें एनडीसी

अगर आप लोन चुकाने के लिए समय से पहले नकद भुगतान करते हैं तो कर्जदाता बैंक लोन समाप्‍त होते ही एनडीसी ( नो ड्यूज सर्टिफिकेट) जारी कर देते हैं. एनडीसी के जरिये बैंक कर्ज लेने वाले को लिखित रूप में सूचित करता है कि वह अपने असली दस्‍तावेज बैंक से ले जाए. अगर कर्ज लेने वाले व्‍यक्ति को बैंक से एनडीसी नहीं हासिल हुआ है तो तुरंत बैंक में संपर्क करें. यदि आपका एनडीसी खो गया है तो बैंक से तुरंत डुप्‍लीकेट कॉपी ले लें.

होम लोन लिया है तो अपडेट करवा लें ईसी

यदि आपने होम लोन लिया है तो आपको लोन पूरा करने के बाद इंकम्‍ब्रेंस सर्टिफिकेट (ईसी) पर से मॉर्गेज हटवा कर अपडेट करवा लेना चाहिए. इसके लिए आप क्‍लोजर की एक प्रति के साथ रजिस्‍ट्रार से संपर्क कर सकते हैं. ईसी इस बात का सबूत होता है कि प्रॉपर्टी पर किसी तरह का लोन तो नहीं है. ईसी अपडेट की गई प्रॉपर्टी को हम आसानी से रीसेल कर सकते हैं. इसके अलावा आप बैंक से भी वे दस्‍तावेज जरूर ले लें, जो आपने लोन लेते वक्‍त जमा किए थे.

कार लोन पूरा होने पर रजिस्‍ट्रेशन करवा लें दुरस्‍त

जब हम लोन पर कार खरीदते हैं तो उस का रजिस्‍ट्रेशन बैंक के नाम पर होता है. अगर लोन की राशि चुका दी गई है तो रजिस्‍ट्रेशन पेपर गाड़ी के मालिक के नाम पर ट्रांसफर होने जरूरी होते हैं. इसके लिए आप रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस से संपर्क कर सकते हैं. यहां रजिस्‍ट्रेशन पेपर और इंश्‍योरेंस पॉलिसी आवेदन करने के लिए आपको बैंक से मिली क्‍लोजर रिपोर्ट पेश करनी होती है.

पर्सनल और क्रेडिट कार्ड या दूसरे लोन

यदि आपने लोन अगेंस्‍ट प्रॉपर्टी लिया है तो आप कर्ज पूरा होने के बाद बैंक से ये कागजात ले लें. ये कागजात बैंक डिफॉल्‍ट होने की दशा में ही अपने पास रखता है. इसके अलावा यदि आपने पर्सनल लोन लिया है तो यह भी क्‍लोजर रिपोर्ट मिलने के बाद ही खत्‍म माना जाता है. लोन अदा करने के बाद आप अपना क्रेडिट स्‍कोर जरूर जांच लें. कई बार लोन अपडेट नहीं होने के कारण आपका क्रेडिट स्‍कोर निगेटिव ही रहता है.

मस्तीजादेः एक स्तरहीन सेक्स कामेडी फिल्म

पिछले हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ के संवाद लेखक मिलाप मिलन झवेरी अब बतौर लेखक व निर्देशक एडल्ट व सेक्स कामेडी फिल्म ‘‘मस्तीजादे’’ लेकर आए हैं. मिलाप ने सारे द्विअर्थी संवादों का पिटारा ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ में पिरो दिया था. इस कारण उनके पास ‘‘मस्तीजादे’’ में द्विअर्र्थी संवाद पिरोने के लिए पिटारा खाली हो चुका था. जिसके चलते ‘‘मस्तीजादे’’ में कई अश्लील शब्द और संवाद ‘क्या कूल हैं हम 3’ से चुराए गए लगते हैं. इतना ही नहीं फिल्म ‘‘मस्तीजादे’’ में मिलाप मिलन झवेरी ने द्विअर्थी संवादो की बजाय अश्लील व फूहड़ अंग प्रदर्शन वाले दृश्यों को भरकर काम चलाने की कोशिश की. अफसोस की बात है कि ‘‘क्या कूल हैं हम 3’’ के मुकाबले’ ‘मस्तीजादे’ ज्यादा स्तरहीन, ज्यादा बेकार और बोर करने वाली फिल्म है.

यूं तो फिल्म ‘‘मस्तीजादे’’ में कहानी का घोर अभाव है. पर फिल्म के घटनाक्रमों के केंद्र में दो दोस्त सनी केले (तुषार कपूर) और आदित्य चोटिया (वीर दास) तथा सनी लियोनी की दोहरी भूमिका है. लैला (सनी लियोनी) और लिली (सनी लियोनी) जुड़वा बहने हैं. पर लैला और लिली के पहनावे व व्यक्तित्व में जबरदस्त विरोधाभास है. यह एक अलग बात है कि जब फिल्म आगे बढ़ती है, तो इंटरवल के बाद लैला और लिली दोनों के रूपों में  बदलाव भी होता है. सनी केले और आदित्य चोटिया दोनो एक विज्ञापन एजेंसी में नौकरी करते हैं. पर उनकी हरकतों की वजह से उन्हे इस कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. यह दोनो अपनी विज्ञापन एजेंसी खोल लेते हैं.तभी सनी केले को लैला और आदित्य को लिली से प्यार हो जाता है. मगर बीच में लिली का प्रेमी देशप्रेमी (शाद रंधावा) आ जाता है. लिली और देशप्रेमी की शादी पटाया में होनी है. इसलिए सारे पात्र पटाया पहुंच जाते हैं. फिर शुरू होता है कन्फ्यूजन का दौर. अंततः सनी केले को लैला और आदित्य को लिली मिल जाती है.

‘‘क्या कूल हैं हम 3’ ’की ही भांति ‘‘मस्तीजादे’’ में भी मिलाप मिलन झवेरी ने हास्य दृश्य पैदा करने के लिए ‘शोले’ सहित कुछ पुरानी फिल्मों का स्पूफ बनाया है. पटकथा के स्तर पर मिलाप झवेरी बुरी तरह से असफल रहे हैं. नग्न या अश्लील सीन को भी वह ठीक से चित्रित नहीं कर पाए. यह सारे सीन बड़े बचकाने, फूहड़ या यूं कहे कि गोबर की तरह थोपे गए लगते हैं. द्विअर्थी संवाद भी ऐसे नहीं है, जो कि दर्शकों को अपनी तरफ खींच सकें. फिल्म में पटकथा के साथ साथ निर्देशकीय कमियां भी नजर आती हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो सनी लियोनी ने अपनी ईमेज के अनुसार ही अभिनय किया है. वह एक सीन में पूर्ण नग्न नजर आती हैं. तो ज्यादातर दृश्यों में वह बिकनी में नजर आती हैं. पर दो चार सीन में जब वह साड़ी में आयी हैं, तो खूबसूरत लगी हैं. सनी लियोनी के प्रशंसक उनसे निराश नहीं होंगे. वीर दास तो अपनी कामिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका अभिनय ठीक ठाक रहा. तुषार कपूर तो हर सेक्स व एडल्ट कामेडी वाली फिल्मों में एक जैसे ही नजर आते हैं. फिल्म ‘‘शोले’’ में अंग्रेजों के जमाने के जेलर का किरदार निभाने वाले असरानी को तो शायद निर्देशक ने महज स्पूफ के लिए शामिल किया है. वह लैला व लिली के पिता के किरदार में हैं. मगर  निर्देशक ने उनसे फूहड़ हरकतें ज्यादा करायी हैं. सुरेश मेनन ने ‘गे’ का बहुत ही ज्यादा घिसा पिटा किरदार निभाया है. उनके अभिनय में भी कोई नवीनता नहीं है. शाद रंधावा,रितेश देशमुख, सुष्मिता मुखर्जी के लिए करने को कुछ था ही नहीं.

फिल्म के गीत संगीत भी आकर्षित नहीं करते. बल्कि फिल्म के गीत फिल्म की गति को रोकते ही हैं. बाक्स आफिस पर यह फिल्म सफलता बटोर सकेगी, इसकी उम्मीद तो की ही नहीं जा सकती. प्रितीश नंदी और रंगीता प्रितीश नंदी ने फिल्म ‘‘मस्तीजादे’’ का निर्माण ‘प्रितीश नंदी कम्यूनीकेशन’’ के बैनर तले किया है. फिल्म के पटकथा व संवाद लेखक तथा निर्देशक मिलाप मिलन झवेरी, फिल्म के संगीतकार मीत ब्रदर्स, अमाल मलिक और आनंद राज आनंद हैं.

 

कूल और फंकी गैजेट्स से लैस टीनएजर्स

किशोरों की सुबह मोबाइल अलार्म से शुरू हो कर आईपैड व वीडियोगेम्स, कंप्यूटर और वीडियोचैट, मूवी लैपटौप आदि के इर्दगिर्द गुजरती है. दिनभर वे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप जैसी सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर व्यस्त रहते हैं. इन्हें नएनए गैजेट्स अपनी जीवनशैली में सब से अहम लगते हैं. शायद इसलिए मार्केट में टीनएजर्स के लिए नए साल की शुरुआत यानी न्यू ईयर पर नएनए गैजेट्स लौंच होते हैं. किशोर भी नए साल की शुरुआत एक नए गैजेट को खरीद कर रखना चाहते हैं. कई बार तो टीनएजर्स साल भर अपनी पौकेटमनी से पैसे बचा कर जमा करते हैं ताकि नए साल पर अपना पसंदीदा गैजेट खरीद सकें. ये गैजेट्स किशोरों को न सिर्फ लुभाते हैं बल्कि इन को खरीद कर वे खुद को मौडर्न भी समझने लगते हैं. यही कारण है कि वे हमेशा गैजेट्स को ले कर क्रेजी रहते हैं और हर साल नएनए गैजेट्स बहुत शौक से खरीदते हैं.

आजकल टीनएजर्स के पसंदीदा गैजेट्स हैं, स्टाइल और कूल लुक वाले स्मार्टफोन, टैबलेट, आईपैड, वायरलैस हैडफोन, किंडले ईबुक रीडर्स, ब्लूटूथ स्पीकर, ऐक्सबौक्स और पीएसपी गेम डिवाइस, फिटनैस वाच आदि. आइए, इन गैजेट्स की खासीयत, जरूरत, कीमत, और मौजूदा ट्रैंड्स को समझने की कोशिश करते हैं :   

ईबुक रीडर्स डिवाइस
किसी जमाने में किशोरों में पढ़ने की आदत को काफी अच्छा समझा जाता था. साहित्य से लगाव रखने वाले ये किशोर मेधावी और रचनात्मकशीलता से लैस होते थे, लेकिन बदले वक्त और तकनीकी क्रांति ने इस आदत को छुड़वा कर इन्हें टीवीकंप्यूटर की दुनिया में बिजी कर दिया. हालांकि तकनीक के आने से पढ़ने की कला को भी टैक्नोफ्रैंडली होने का मौका मिला और अब बाकायदा पढ़ने के लिए ईबुक्स रीडर्स डिवाइस बाजार में मौजूद हैं.

इस फील्ड में किंडले बड़ा नाम है. दुनिया भर के किशोर इसी में बैस्टसैलर नावेल से ले कर अपने सिलेबस की किताबें तक पढ़ते हैं. किंडले की तरह ही कोबो ब्रैंड ने पढ़ने की आदत को आसान और रोचक बनाते हुए अपना नया ईरीडर गैजेट लौंच किया है. 6.8 इंच स्क्रीन वाले इस गैजेट की एचडी और 1,440× 1,080 रिजोल्यूशन क्वालिटी इस को बेहतर क्लियरिटी देती है. इस की बेहतर तकनीक स्क्रीन को स्क्रैच फ्री बनाती है.

कोबो के इस ईरीडर की इंटरनल मैमोरी 4 जीबी की है जिसे माइक्रोएसडी कार्ड के जरिए 32 जीबी तक ऐक्सपैंड किया जा सकता है. इस में सब से अच्छी सुविधा यह है कि इस की मदद से यूजर ईबुक के फौंट्स को अपनी सुविधानुसार बदल भी सकते हैं और पढ़ते समय टैक्स्ट को हाइलाइट भी कर सकते हैं. यही नहीं इसे आप फेसबुक के जरिए शेयर भी कर सकते हैं. कंपनी के मुताबिक़ प्रतिदिन औसतन 30 मिनट चलाने पर इस की बैटरी 2 महीने तक चलती है. किंडले और कोबो की तरह और भी कई कंपनियां इस दिशा में प्रयासरत हैं.

आईपैड और टैबलेट का किलर कौंबो 
ईबुक्स पर किताब पढ़तेपढ़ते किशोर जब बोरियत महसूस करने लगते हैं तो मनोरंजन के लिए  आईपैड और टैबलेट का रुख करते हैं, जहां उन को फिल्म संगीत और गपशप की नई दुनिया मिलती है. महानगरों में बस और मैट्रो में सफर करते हुए किशोरों के हाथों में आईपैड और टैबलेट नजर आते हैं. हर तिमाही किशोरों को केंद्र में रख कर कंपनियां नए डिजाइंस, कलर्स और फीचर्स से लैस टैबलेट मार्केट में उतारती हैं.

आजकल वही वर्जन डिमांड में हैं, जो  पूरी तरह से डिटैचेबल और फुल एचडी हैं. ज्यादातर टैबलेट और आईपैड 5 फिंगर टच फीचर्स के साथ मिलते हैं. अगर फिल्म और वीडियो देखने के बाद इस में स्कूल का प्रोजैक्ट बनाना चाहें तो टैबलेट के साथ कीबोर्ड जोड़ कर यह काम कर सकते हैं. बाजार में मौजूद विकल्पों की तर्ज पर इस में इंटेल कोर आई 5 और आई 7 प्रोसैसर वी-प्रो टैक्नोलौजी के साथ है जो इसे फास्ट डिवाइस बनाता है.   

ब्लूटूथ स्पीकर और वायरलैस हैडसैट
चाहे पढ़ाई का वक्त हो या फिर जोगिंग और जिम का, किशोर हर काम गाने सुन कर ही करना चाहते हैं. किशोरों की इसी पसंद को ध्यान में रख कर जेबीएल, सोनी, फिलिप्स, एलजी से ले कर बीटेल जैसे ब्रैंड्स ने बेहद आकर्षक तकनीक से लैस ब्लूटूथ स्पीकर और वायरलैस हैडसैट बाजार में उतारे हैं. इन की खासीयत है कि ये मोबाइल से ले कर आईपैड  और लैपटौप यहां तक कि टीवी में भी आसानी से फिट हो कर संगीत का मजा दोगुना कर देते हैं. ब्लूटूथ स्पीकर वह डिवाइस होती है जो बिना किसी बूफर या ऐक्सटर्नल डिवाइस के असैंबल होती है जो बिना किसी वायर के कनैक्शन के सिर्फ ब्लूटूथ के एपेयरिंग के साथ चल पड़ती है. अच्छी बात यह है कि इस के लिए किसी इलैक्ट्रौनिक इनपुट की जरूरत नहीं होती, क्योंकि इस के अंदर रिचार्जेबल बैटरी लगी होती है.  

आज वायरलैस हैडसैट भी उसी तरह बदल चुके हैं जैसे वौकमैन से ले कर किसी भी एमपी थ्री प्लयेर से गाने सुनने के लिए कानों में हैंडफ्री डाली जाती थीं, लेकिन कई बार तार के उलझ जाने या खराब हो जाने के कारण गाने सुनने का मजा बेकार हो जाता था, लेकिन अब वायरलैस हैडसैट से यह समस्या लगभग खत्म हो गई है. बिना तार के सिर्फ ब्लूटूथ की कनैक्टिविटी से इसे मोबाइल या म्यूजिकल डिवाइस से कनैक्ट कर बिना किसी वायर के संगीत का मजा लेना आसान हो गया है.

पीएसपी, ऐक्स बौक्स और 3डी गेमर्स
अमेरिकन टैक्नोफ्रीक संस्था से जुड़ी रिसर्च की मानें तो दुनिया के टीनएजर्स अपना सब से ज्यादा समय जिस चीज में बिताते हैं वह है गेमिंग. जी हां, न टीवी और न ही कार्टून. इसलिए गारा गेमिंग डिवाइस की मार्केट में कीमत लाखों में और एक डीवीडी गेम की कीमत हजारों में है तो ताजुब नहीं होना चाहिए. गेमिंग से जुड़ा एक अध्ययन यह भी बताता है कि आजकल किशोरों में हिंसक प्रवृत्ति के बढ़ने के पीछे भी गेमिंग का हाथ है.

स्मार्ट वाच, नोटबुक और स्टाइल गैजेट्स
इन के अलावा आजकल मार्केट में स्मार्ट वाच भी आ गई हैं जिन में स्मार्टफोन सरीखे सारे फीचर्स हैं. कलाई पर बांध कर इस स्मार्ट वाच से आप न सिर्फ मेल चैक कर सकते हैं बल्कि कौल भी कर सकते हैं. इस के अलावा म्यूजिक से ले कर फिल्में भी इसी पर देख सकते हैं. कुछ ही ब्रैंड्स हैं, जो स्मार्ट वाच बनाते हैं मसलन एपल, एडिडास और नाइकी, लेकिन इन की कीमत भी ज्यादा है, इसलिए देश में इन की बिक्री उतनी नहीं है. लैपटौप का मिनी रूप ही नोट बुक है, जो टीनएजर्स के हिसाब से लैपटौप का काम करता है. इस में असल काम रैम, हार्डडिस्क और प्रोसैसर का है.

होशियारी से खरीदें गैजेट्स
नए साल की शुरुआत नए गैजेट से करने में कोई बुराई नहीं हैं, लेकिन शुरुआत ही ठगी या पैसों के नुकसान से हो, तो मजा खराब हो जाता है. जी हां, साल की शुरुआत में गैजेट मार्केट नएनए इलैक्ट्रौनिक आइटम्स से भरा होता है. इसी भीड़ में कई बार लोकल और डुप्लीकेट प्रोडक्ट भी बेचे जाते हैं. जिन को इस बारे में अधिक जानकारी नहीं होती वे सस्ते के लालच में ऐसे गैजेट ले कर न सिर्फ ठगी के शिकार होते हैं बल्कि प्रोडक्ट में बाद में आने वाली खराबी को सर्विस सैंटर के अभाव में रिपेयर भी नहीं करा पाते. इसलिए किसी जानकार व्यक्ति के साथ जा कर जिसे क्वालिटी और फीचर्स की अच्छी परख हो, गैजेट खरीदें वरना अगर आप सस्ते के चक्कर में ग्रे मार्केट से उत्पाद खरीदते हैं और उस का कोई बिल भी नहीं मिलता, तो आप उस प्रोडक्ट के बारे में कोई कानूनी कार्यवाही भी नहीं कर सकते. आप को सर्विस और अन्य सुविधाएं भी नहीं मिलतीं. इसलिए उत्पाद सही स्थान से खरीद कर बिल जरूर लें. लोकल ब्रैंड के बजाय ब्रैंडेड कंपनी का सामान लेना बेहतर होता है, क्योंकि फोन और लैपटौप में विंडो का पायरेटेड वर्जन इस्तेमाल करते समय आप उस के औटोमैटिक अपडेट को चालू नहीं रख सकते. चाहे आप का फोन हो या कंप्यूटर इस के सौफ्टवेयर लगातार अपडेट होते रहते हैं. यह भी ध्यान रखें कि जो गैजेट्स आप ले रहे हैं उन के सर्विस सैंटर आप के आसपास हैं भी या नहीं. इन की खरीदारी में थोड़ी समझदारी दिखाएं वरना हैप्पी न्यू ईयर को हैप्पी लौस ईयर बनते देर नहीं लगेगी.     

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