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कूल और फंकी गैजेट्स से लैस टीनएजर्स

किशोरों की सुबह मोबाइल अलार्म से शुरू हो कर आईपैड व वीडियोगेम्स, कंप्यूटर और वीडियोचैट, मूवी लैपटौप आदि के इर्दगिर्द गुजरती है. दिनभर वे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप जैसी सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर व्यस्त रहते हैं. इन्हें नएनए गैजेट्स अपनी जीवनशैली में सब से अहम लगते हैं. शायद इसलिए मार्केट में टीनएजर्स के लिए नए साल की शुरुआत यानी न्यू ईयर पर नएनए गैजेट्स लौंच होते हैं. किशोर भी नए साल की शुरुआत एक नए गैजेट को खरीद कर रखना चाहते हैं. कई बार तो टीनएजर्स साल भर अपनी पौकेटमनी से पैसे बचा कर जमा करते हैं ताकि नए साल पर अपना पसंदीदा गैजेट खरीद सकें. ये गैजेट्स किशोरों को न सिर्फ लुभाते हैं बल्कि इन को खरीद कर वे खुद को मौडर्न भी समझने लगते हैं. यही कारण है कि वे हमेशा गैजेट्स को ले कर क्रेजी रहते हैं और हर साल नएनए गैजेट्स बहुत शौक से खरीदते हैं.

आजकल टीनएजर्स के पसंदीदा गैजेट्स हैं, स्टाइल और कूल लुक वाले स्मार्टफोन, टैबलेट, आईपैड, वायरलैस हैडफोन, किंडले ईबुक रीडर्स, ब्लूटूथ स्पीकर, ऐक्सबौक्स और पीएसपी गेम डिवाइस, फिटनैस वाच आदि. आइए, इन गैजेट्स की खासीयत, जरूरत, कीमत, और मौजूदा ट्रैंड्स को समझने की कोशिश करते हैं :   

ईबुक रीडर्स डिवाइस
किसी जमाने में किशोरों में पढ़ने की आदत को काफी अच्छा समझा जाता था. साहित्य से लगाव रखने वाले ये किशोर मेधावी और रचनात्मकशीलता से लैस होते थे, लेकिन बदले वक्त और तकनीकी क्रांति ने इस आदत को छुड़वा कर इन्हें टीवीकंप्यूटर की दुनिया में बिजी कर दिया. हालांकि तकनीक के आने से पढ़ने की कला को भी टैक्नोफ्रैंडली होने का मौका मिला और अब बाकायदा पढ़ने के लिए ईबुक्स रीडर्स डिवाइस बाजार में मौजूद हैं.

इस फील्ड में किंडले बड़ा नाम है. दुनिया भर के किशोर इसी में बैस्टसैलर नावेल से ले कर अपने सिलेबस की किताबें तक पढ़ते हैं. किंडले की तरह ही कोबो ब्रैंड ने पढ़ने की आदत को आसान और रोचक बनाते हुए अपना नया ईरीडर गैजेट लौंच किया है. 6.8 इंच स्क्रीन वाले इस गैजेट की एचडी और 1,440× 1,080 रिजोल्यूशन क्वालिटी इस को बेहतर क्लियरिटी देती है. इस की बेहतर तकनीक स्क्रीन को स्क्रैच फ्री बनाती है.

कोबो के इस ईरीडर की इंटरनल मैमोरी 4 जीबी की है जिसे माइक्रोएसडी कार्ड के जरिए 32 जीबी तक ऐक्सपैंड किया जा सकता है. इस में सब से अच्छी सुविधा यह है कि इस की मदद से यूजर ईबुक के फौंट्स को अपनी सुविधानुसार बदल भी सकते हैं और पढ़ते समय टैक्स्ट को हाइलाइट भी कर सकते हैं. यही नहीं इसे आप फेसबुक के जरिए शेयर भी कर सकते हैं. कंपनी के मुताबिक़ प्रतिदिन औसतन 30 मिनट चलाने पर इस की बैटरी 2 महीने तक चलती है. किंडले और कोबो की तरह और भी कई कंपनियां इस दिशा में प्रयासरत हैं.

आईपैड और टैबलेट का किलर कौंबो 
ईबुक्स पर किताब पढ़तेपढ़ते किशोर जब बोरियत महसूस करने लगते हैं तो मनोरंजन के लिए  आईपैड और टैबलेट का रुख करते हैं, जहां उन को फिल्म संगीत और गपशप की नई दुनिया मिलती है. महानगरों में बस और मैट्रो में सफर करते हुए किशोरों के हाथों में आईपैड और टैबलेट नजर आते हैं. हर तिमाही किशोरों को केंद्र में रख कर कंपनियां नए डिजाइंस, कलर्स और फीचर्स से लैस टैबलेट मार्केट में उतारती हैं.

आजकल वही वर्जन डिमांड में हैं, जो  पूरी तरह से डिटैचेबल और फुल एचडी हैं. ज्यादातर टैबलेट और आईपैड 5 फिंगर टच फीचर्स के साथ मिलते हैं. अगर फिल्म और वीडियो देखने के बाद इस में स्कूल का प्रोजैक्ट बनाना चाहें तो टैबलेट के साथ कीबोर्ड जोड़ कर यह काम कर सकते हैं. बाजार में मौजूद विकल्पों की तर्ज पर इस में इंटेल कोर आई 5 और आई 7 प्रोसैसर वी-प्रो टैक्नोलौजी के साथ है जो इसे फास्ट डिवाइस बनाता है.   

ब्लूटूथ स्पीकर और वायरलैस हैडसैट
चाहे पढ़ाई का वक्त हो या फिर जोगिंग और जिम का, किशोर हर काम गाने सुन कर ही करना चाहते हैं. किशोरों की इसी पसंद को ध्यान में रख कर जेबीएल, सोनी, फिलिप्स, एलजी से ले कर बीटेल जैसे ब्रैंड्स ने बेहद आकर्षक तकनीक से लैस ब्लूटूथ स्पीकर और वायरलैस हैडसैट बाजार में उतारे हैं. इन की खासीयत है कि ये मोबाइल से ले कर आईपैड  और लैपटौप यहां तक कि टीवी में भी आसानी से फिट हो कर संगीत का मजा दोगुना कर देते हैं. ब्लूटूथ स्पीकर वह डिवाइस होती है जो बिना किसी बूफर या ऐक्सटर्नल डिवाइस के असैंबल होती है जो बिना किसी वायर के कनैक्शन के सिर्फ ब्लूटूथ के एपेयरिंग के साथ चल पड़ती है. अच्छी बात यह है कि इस के लिए किसी इलैक्ट्रौनिक इनपुट की जरूरत नहीं होती, क्योंकि इस के अंदर रिचार्जेबल बैटरी लगी होती है.  

आज वायरलैस हैडसैट भी उसी तरह बदल चुके हैं जैसे वौकमैन से ले कर किसी भी एमपी थ्री प्लयेर से गाने सुनने के लिए कानों में हैंडफ्री डाली जाती थीं, लेकिन कई बार तार के उलझ जाने या खराब हो जाने के कारण गाने सुनने का मजा बेकार हो जाता था, लेकिन अब वायरलैस हैडसैट से यह समस्या लगभग खत्म हो गई है. बिना तार के सिर्फ ब्लूटूथ की कनैक्टिविटी से इसे मोबाइल या म्यूजिकल डिवाइस से कनैक्ट कर बिना किसी वायर के संगीत का मजा लेना आसान हो गया है.

पीएसपी, ऐक्स बौक्स और 3डी गेमर्स
अमेरिकन टैक्नोफ्रीक संस्था से जुड़ी रिसर्च की मानें तो दुनिया के टीनएजर्स अपना सब से ज्यादा समय जिस चीज में बिताते हैं वह है गेमिंग. जी हां, न टीवी और न ही कार्टून. इसलिए गारा गेमिंग डिवाइस की मार्केट में कीमत लाखों में और एक डीवीडी गेम की कीमत हजारों में है तो ताजुब नहीं होना चाहिए. गेमिंग से जुड़ा एक अध्ययन यह भी बताता है कि आजकल किशोरों में हिंसक प्रवृत्ति के बढ़ने के पीछे भी गेमिंग का हाथ है.

स्मार्ट वाच, नोटबुक और स्टाइल गैजेट्स
इन के अलावा आजकल मार्केट में स्मार्ट वाच भी आ गई हैं जिन में स्मार्टफोन सरीखे सारे फीचर्स हैं. कलाई पर बांध कर इस स्मार्ट वाच से आप न सिर्फ मेल चैक कर सकते हैं बल्कि कौल भी कर सकते हैं. इस के अलावा म्यूजिक से ले कर फिल्में भी इसी पर देख सकते हैं. कुछ ही ब्रैंड्स हैं, जो स्मार्ट वाच बनाते हैं मसलन एपल, एडिडास और नाइकी, लेकिन इन की कीमत भी ज्यादा है, इसलिए देश में इन की बिक्री उतनी नहीं है. लैपटौप का मिनी रूप ही नोट बुक है, जो टीनएजर्स के हिसाब से लैपटौप का काम करता है. इस में असल काम रैम, हार्डडिस्क और प्रोसैसर का है.

होशियारी से खरीदें गैजेट्स
नए साल की शुरुआत नए गैजेट से करने में कोई बुराई नहीं हैं, लेकिन शुरुआत ही ठगी या पैसों के नुकसान से हो, तो मजा खराब हो जाता है. जी हां, साल की शुरुआत में गैजेट मार्केट नएनए इलैक्ट्रौनिक आइटम्स से भरा होता है. इसी भीड़ में कई बार लोकल और डुप्लीकेट प्रोडक्ट भी बेचे जाते हैं. जिन को इस बारे में अधिक जानकारी नहीं होती वे सस्ते के लालच में ऐसे गैजेट ले कर न सिर्फ ठगी के शिकार होते हैं बल्कि प्रोडक्ट में बाद में आने वाली खराबी को सर्विस सैंटर के अभाव में रिपेयर भी नहीं करा पाते. इसलिए किसी जानकार व्यक्ति के साथ जा कर जिसे क्वालिटी और फीचर्स की अच्छी परख हो, गैजेट खरीदें वरना अगर आप सस्ते के चक्कर में ग्रे मार्केट से उत्पाद खरीदते हैं और उस का कोई बिल भी नहीं मिलता, तो आप उस प्रोडक्ट के बारे में कोई कानूनी कार्यवाही भी नहीं कर सकते. आप को सर्विस और अन्य सुविधाएं भी नहीं मिलतीं. इसलिए उत्पाद सही स्थान से खरीद कर बिल जरूर लें. लोकल ब्रैंड के बजाय ब्रैंडेड कंपनी का सामान लेना बेहतर होता है, क्योंकि फोन और लैपटौप में विंडो का पायरेटेड वर्जन इस्तेमाल करते समय आप उस के औटोमैटिक अपडेट को चालू नहीं रख सकते. चाहे आप का फोन हो या कंप्यूटर इस के सौफ्टवेयर लगातार अपडेट होते रहते हैं. यह भी ध्यान रखें कि जो गैजेट्स आप ले रहे हैं उन के सर्विस सैंटर आप के आसपास हैं भी या नहीं. इन की खरीदारी में थोड़ी समझदारी दिखाएं वरना हैप्पी न्यू ईयर को हैप्पी लौस ईयर बनते देर नहीं लगेगी.     

जब अहमद की बनाई डिजिटल घड़ी ने मचाई धूम

कोई नया आविष्कार करने के लिए लोगों को क्या कुछ नहीं करना पड़ता. अकसर ऐसा हुआ है जब किसी ने कोई नई चीज ईजाद की, तो उसे शुरुआत में गलत समझ लिया गया. कई बार तो ऐसे लोगों को सनकी तक कहा जाता है. महान वैज्ञानिक आविष्कारक टामस एलवा एडिसन के साथ तो ऐसा कई बार हुआ. उन के कारनामों का मजाक उड़ाया जाता था और माना जाता था कि वे जिंदगी में कभी सफल नहीं होंगे. ऐसा ही एक वाकेआ वर्ष 2015 में अमेरिका के टैक्सास प्रांत में 9वीं कक्षा में पढ़ने वाले 14 वर्षीय लड़के अहमद मोहम्मद के साथ हुआ.

अहमद की घड़ी या बम
टैक्सास के इरविंग स्थित स्कूल में अहमद एक दिन पैंसिल बौक्स से खुद बनाई हुई एक डिजिटल घड़ी ले कर आया. उसे उम्मीद थी कि इस से उस के स्कूल टीचर प्रभावित होंगे और उसे शाबाशी मिलेगी. उस ने बड़े उत्साह से वह डिजिटल घड़ी अपने टीचर को दिखाई. टीचर ने उस की बनाई घड़ी को गौर से देखने के बजाय बम समझ लिया और इस के बारे में स्कूल प्रशासन व पुलिस को सूचित कर दिया. कुछ ही देर में पुलिस स्कूल में आई और अहमद के हाथों में हथकड़ी डाल कर उसे वहां से ले जाया गया. स्कूल प्रशासन ने इस बारे में दलील दी कि बम की सूचना पा कर वही कार्यवाही की गई, जो इस बारे में निर्धारित निर्देशों के तहत की जाती है.

गलती कैसे हुई
जिस स्कूल टीचर को अहमद की बनाई घड़ी बम दिखी थी, उसे अहमद एक आतंकवादी के रूप में नजर आया था. हालांकि बाद में उस टीचर ने दलील दी कि ऐसा भूलवश हुआ. लेकिन पूरे अमेरिका में उस के कृत्य की यह कहते हुए निंदा हुई कि उस की सोच समाज में प्रचलित इस नस्लवादी धारणा से प्रेरित थी कि एक मुसलिम आतंकवादी ही हो सकता है. इस ने पूरे अमेरिका और दुनिया के कई हिस्सों में नाराजगी पैदा कर दी. जब यह खबर और हथकड़ी पहने अहमद व उस की बनाई घड़ी का फोटो सोशल मीडिया पर डाला गया, तो उसे देखने व उस के बारे में जानने वालों की लाइन लग गई. घटना के बाद हाथ में हथकड़ी तथा अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लोगो वाली टीशर्ट पहने अहमद मोहम्मद का फोटो कुछ ही घंटे में हजारों बार रीट्वीट कर दिया गया और ट्विटर पर हैशटैग स्टैंड विद अहमद ट्रैंड करने लगा. लोगों ने जहां स्कूल प्रशासन व गलती से घड़ी को बम समझने वाले टीचर की निंदा की, वहीं यह अपेक्षा भी की कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा इस मामले में दखल देंगे.
ओबामा तक यह खबर पहुंचने की देर थी कि अहमद को फौरन हथकडि़यों से आजाद कराया गया. ओबामा ने अहमद को उस के कौशल के लिए बधाई दी. ओबामा की बधाई को इसलामोफोबिया के आरोपों के बीच स्कूल प्रशासन और पुलिस अधिकारियों के लिए सांकेतिक फटकार के तौर पर देखा गया.

कूल आविष्कार
ओबामा ने अहमद की बनाई घड़ी को एक बेहद दिलचस्प (कूल) आविष्कार बताते हुए पूछा कि क्या वह अपनी घड़ी को व्हाइट हाउस ला सकता है? साथ ही ओबामा ने उसे कई अन्य छात्रों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, खगोलविदों और जानीमानी हस्तियों के साथ ‘एस्ट्रोनौमी नाइट’ के विशेष मौके पर आमंत्रित किया. डैमोक्रैटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने भी अहमद के साथ हुए दुर्व्यवहार की निंदा करते हुए उस के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया. 20 अक्तूबर को जब अहमद व्हाइट हाउस पहुंचा तो उस का वहां भव्य स्वागत किया गया. वहां मीडिया के साथ हुए इंटरव्यू में अहमद ने कहा कि यह डिजिटल घड़ी उस का पहला आविष्कार जरूर है, लेकिन आखिरी नहीं. वह कई और नई चीजें बनाना चाहता है.

अहमद का सपना
सूडानी-अमेरिकी मांबाप की संतान अहमद का सपना अमेरिका के प्रतिष्ठित इंस्टिट्यूट, ‘मैसाच्युसैट्स इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी’ में दाखिला पाना है और वह इस के लिए प्रयासरत भी है. अहमद के प्रयास और सपनों की चर्चा इंटरनैट कंपनी गूगल द्वारा शहर माउंटेन व्यू में लगाए जाने वाले विज्ञान मेले में भी हुई. वहां आने वाले छात्रों ने अहमद से उस के आविष्कार के बारे में जानकारी ली और बताया कि स्कूलों में उस की कितनी चर्चा हो रही है.

रिश्वतखोरी और कोर्ट

क्या इस देश से रिश्वतखोरी को समाप्त करना संभव है? अगर देश की अदालतों का हाल यही रहा तो शायद कभी नहीं. आप चाहे जितना कठिन व कठोर कानून बना लें, मामला तो अदालतों में जाएगा ही और रिश्वतखोर लौबी बहुत ही चालाक, पैसेवाली होने के साथ इतनी पहुंच रखती है कि उसे हर मामले में साफ छूट जाने का विश्वास रहता है.

सुप्रीम कोर्ट के 24 जुलाई, 2015 को दिए गए एक फैसले को सिर्फ उदाहरण के लिए देखें. इस मामले में गुरजंत सिंह नामक व्यक्ति सरकारी कंपनी फूड कौर्पोरेशन औफ इंडिया में टैक्निकल असिस्टैंट के पद पर काम करता था. फूड कौर्पोरेशन की चावल की खरीद को वह तकनीकी प्रमाणपत्र जारी करता था. 30 मई, 2003 को एक व्यापारी के माल को पास करने के लिए उस ने 1 लाख रुपए मांगे पर 50 हजार रुपए में सौदा तय हुआ.

व्यापारी ने हिम्मत दिखा कर फरीदकोट के विजिलैंस औफिसर से शिकायत कर दी और जाल बिछा कर पाउडर लगे, नंबर नोट किए गए नोटों के साथ गुरजंत सिंह को पकड़ लिया गया पर यह मामले का अंत नहीं था. 10-15 गवाह जिला न्यायाधीश के सामने बुलाए गए. उन से क्रौस एक्जामिनेशन किया गया. नवंबर 2005 में गुरजंत को 3 साल की सजा व उस पर 1 लाख रुपए का जुर्माना हुआ. लेकिन वह उच्च न्यायालय में गया.

उच्च न्यायालय ने 9 साल बाद यानी 24 दिसंबर 2014 को निर्णय सुनाया कि सजा बरकरार रखी जाए. गुरजंत सिंह को यह स्वीकार्य न था. उस की सोच के मुताबिक, रिश्वत लेना तो सरकारी व्यक्ति का हक है. वह सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा जहां उस की अपील सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली गई. निर्णय आया 24 जुलाई, 2015 में. निर्णय में सजा घटा कर 2 साल कर दी गई.

इस दौरान शिकायतकर्ता को क्या मिला? एक रिश्वतखोर को पकड़वाने के लिए उसे लगातार अदालतों में आना पड़ा. सरकारी वकीलों से मिन्नतें करनी पड़ीं. वह यह जानता था कि यदि रिश्वतखोर सरकारी नौकर छूट गया तो उस की खैर नहीं होगी.

रिश्वतखोर को जड़ से निकाल फेंकने वाले क्या इस 12 साल के अंतराल को 12 दिन का कर सकते हैं और वह भी न्याय को तानाशाही में बदले बिना? यदि नहीं तो रिश्वतखोरी को समाप्त करने की बात न ही की जाए. यह तो हमारे समाज का अंग है, सरकारी नौकरी का हिस्सा है. रिश्वत के बल पर मात्र टैक्निकल असिस्टैंट कुछ मिनटों में 1 लाख रुपए कमा सकता है और सुप्रीम कोर्ट तक वकीलों की फीसें दे सकता है, इस से साफ है कि रिश्वत के पैर बहुत बड़े हैं. उस के जूतों की मार से कोई नहीं बच सकता. सुप्रीम कोर्ट का रिश्वतखोर की सजा को कम करने वाला यह फैसला संतोष नहीं देता, बल्कि नागरिक को डराता है कि कभी शिकायत न करना, शिकायत करने वाला भी वर्षों भुगतेगा.

 

सफल होने के लिए चुनें अपना लक्ष्य

हर कोई सफलता प्राप्त करना चाहता है, पर सफलता हर किसी को नहीं मिलती. इस का मतलब यह नहीं कि आप सफलता के लिए प्रयास ही न करें. अगर आप भी सफल होने का स्वप्न देखते हैं तो आप के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि आप सब से पहले अपने लक्ष्य का चुनाव करें, उस के बाद उस क्षेत्र में सफल हुए व्यक्तियों से बात करें जिस से आप को सही मार्गदर्शन मिल पाएगा.

लक्ष्य का निर्धारण कर लेने से श्रम एवं समय दोनों की बचत होती है. इस से दीर्घकालीन प्रेरणा और दृष्टि मिलती है. इस के जरिए आप अपने सीमित संसाधनों को अपने लक्ष्य के अनुसार समायोजित कर सकते हैं. नियमित रूप से छोटेमोटे लक्ष्यों का निर्धारण और उस की समीक्षा करने से आप यह निर्धारित कर सकते हैं कि आप ने क्या कुछ हासिल किया. लक्ष्य निर्धारित करने से आप को यह निर्णय करने में मदद मिलती है कि आखिर जीवन में आप को करना क्या है? एक बार लक्ष्य निर्धारित हो जाने के बाद आगे जाने का मार्ग स्वत: दिखाई देने लगता है, जिस पर चल कर आप सफलता के द्वार खटखटा सकते हैं.

अब सवाल उठता है कि लक्ष्य का निर्धारण हम कैसे करें? और किन बातों का ध्यान रखें, जिस से कि हमें असफलता का मुंह न देखना पड़े. अपने जीवन का उद्देश्य बनाते समय सब से पहले खुद की क्षमता का आकलन कर लेना बहुत जरूरी है. हमें शेखचिल्ली के सपनों की तरह अपने जीवन का लक्ष्य नहीं चुनना चाहिए. यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हम ने जो भी बनने का स्वप्न देखा है उसे पूरा करने की हमारी क्षमता कितनी और कैसी हैं. अगर आप अपना आकलन करने में अपनेआप को असमर्थ पा रहे हैं तो किसी सीनियर से इस विषय पर बात कर लेनी चाहिए. उक्त व्यक्ति अपने अनुभवों से आप को पूरी जानकारी दे सकेगा. इस जानकारी का उपयोग कर के आप खुद का मूल्यांकन कर सकते हैं. खुद का मूल्यांकन करना इसलिए जरूरी होता है, क्योंकि आप को अपनी लड़ाई खुद लड़नी है.

 दूसरी बात लक्ष्य निर्धारण करते समय अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखना है. यह देख लें कि आप का परिवार आप की पढ़ाई, कोचिंग, ट्यूशन, किताबें, ट्रेनिंग जैसे तमाम खर्चे या जो आप बनना चाहते हैं उस से संबंधित खर्चे उठा सकता है या नहीं. इसलिए अपने लक्ष्य को अपने मातापिता को अवश्य बताएं और उन से सलाह लें कि वे आप की कितनी हैल्प कर सकते हैं.

अगर वे आप को आश्वस्त करते हैं कि पैसों की चिंता न करें तो आप पूरी तरह से अपनी तैयारी में लग जाएं. अगर आर्थिक रूप से वे असमर्थ हैं तो आप अपने लक्ष्य की प्राप्ति के बारे में पुनर्विचार करें और साथ ही आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करने के लिए तैयार हो जाएं.

तीसरी और सब से जरूरी बात समय सीमा को समझना है. सभी के लिए समय एक समान होता है यानी 24 घंटे. इसलिए समय की कीमत किसी प्रकार से धन से कम नहीं है. इसलिए आप के पास संघर्ष करने के लिए एक निश्चित समय है. आप अपने सपने को पूरा करने के लिए कितना समय दे सकते हैं?

इस प्रश्न पर अवश्य विचार करें. इस बात का पता कर लें कि आप की फील्ड में लोग कितने समय में सफल होते हैं और सफल होने में उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. आप के पास अपने लक्ष्य को पाने के लिए कितना समय है? क्योंकि समय एक बार चला जाता है तो वह फिर लौट कर नहीं आता.

अगर आप किसी कारण से सफल नहीं हो पाते हैं तो क्या आप दूसरे किसी प्रोफैशन में लौट सकते हैं या नहीं? इसलिए अपना लक्ष्य चुनते समय यह भी सोच कर रखें कि आप असफल भी हो सकते हैं और आप को दो कदम पीछे भी लौटना पड़ सकता है. इसलिए पीछे कहां तक लौट सकते हैं उस लकीर का निर्धारण कर के रखें.

वैसे समझदारी इसी में है कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई छोटेछोटे लक्ष्यों का निर्धारण कर के रखें ताकि अगर एक में असफल हो जाएं तो दूसरे लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास किए जा सकें.

इस तरह से अगर आप इन महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखते हैं तो आप को शतप्रतिशत सफलता मिलेगी. वैसे हमें सफलता हमेशा मेहनत और लगन के कारण ही मिलती है. जिस गति से आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं उसी गति से सफलता आप के कदम चूमती है, यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए.

बुरे काम का अच्छा नतीजा

शीर्षक देख कर किसी का भी चौंकना स्वाभाविक ही है कि ऐसा कैसे हो सकता है? अभी तक तो यही सुनते आए हैं कि बुरे काम का नतीजा भी बुरा ही होता है. इसलिए हर व्यक्ति को बुरे कामों से बचने की सलाह दी जाती है, उन के नुकसान गिनाए जाते हैं. लेकिन यकीन मानें, बुरे काम का नतीजा अच्छा भी हो सकता है बशर्ते इस से सबक लिया जाए, इस के नुकसान देखे जाएं, फिर चाहे वे खुद के हों या किसी और के. अगर यह समझ आ जाए कि किसी दूसरे के नुकसान से मेरा कोई भला या फायदा नहीं होने वाला तो तय है आप खुद के बुरे के प्रति भी सचेत हो जाएंगे.

18 वर्षीय अभिजीत एक शाम जब दोस्तों के साथ कोचिंग में पढ़ाई कर के बाहर निकला तो सामने गली में गोलगप्पे वाले का ठेला देख ललचा गया. चारों दोस्तों ने तय किया कि घर जाने से पहले गोलगप्पे खाए जाएं.

जेब में पैसे तो थे ही, बातें करतेकरते चारों पहुंच गए ठेले पर और हाथ में प्लेट ले कर यहांवहां की गपें हांकते गोलगप्पे खाने शुरू कर दिए. बातोंबातों में शर्त लग गई कि कौन कितने गोलगप्पे खा सकता है? शर्त के नाम पर अभिजीत की बांछें खिल गईं और वह डींग मारता बोला, ‘‘सब से ज्यादा मैं खाऊंगा.’’

उधर, उस का सहपाठी अरमान भी जोश में था सो चैलेंज दे दिया कि नहीं मैं ज्यादा खाऊंगा. तय हुआ कि जो शर्त हारेगा वह पेमैंट करेगा. बस, फिर क्या था, देखते ही देखते दोनों भरभर कर गोलगप्पे गटकने लगे.

बाकी 2 दोस्त तो इन दोनों की दिलचस्प होड़ देखते रहे पर ठेले वाला अधेड़ चुप न रहा. उस ने इन दोनों को समझाने की कोशिश की कि बेटा ज्यादा गोलगप्पे खाना सेहत के लिए ठीक नहीं. 8-10 ही काफी होते हैं.

इस पर अभिजीत उसे हिकारत से झिड़कते हुए बोला, ‘‘तुम्हें क्या दादा, तुम तो अपने पैसों से मतलब रखो, हमारी शर्त की वजह से आज आप को ज्यादा पैसे मिलेंगे.’’ 

गोलगप्पे वाला बेचारा इस झिड़की के चलते अपना सा मुंह ले कर रह गया और अपने काम में लग गया.

आखिरकार अरमान ने हाथ खड़े कर दिए. वह 35 गोलगप्पे ही खा पाया जबकि अभिजीत ने 40 खाए. जीतने पर अभिजीत ने विजेताओं की तरह चारों तरफ देखा और बोला, ‘‘देखा, इसे कहते हैं विनर. चलो, अब पेमैंट करो.’’

‘मान गए, क्या बात है,’ जैसे जुमले दोस्तों ने फेंके तो अभिजीत फूला न समाया. ‘बाय, कल मिलते हैं,’ कह कर चारों अपनेअपने घर रवाना हो गए. घर जा कर अभिजीत को महसूस हुआ कि पेट से गुड़गुड़ की आवाजें आ रही हैं. ‘गोलगप्पे ज्यादा खा लिए हैं. कुछ देर में पानी अपनेआप सैट हो जाएगा,’ सोच कर उस ने खुद को तसल्ली दी.

लेकिन बात बिगड़ने लगी थी. अपने कमरे में पहुंचा तो सीधा बिस्तर पर जा गिरा. अब गुड़गुड़ के साथ पेट में दर्द भी शुरू हो गया था. डर की वजह से उस की मम्मीपापा से दवा मांगने की हिम्मत नहीं हुई. डिनर के समय मम्मी ने आवाज दी तो जैसेतैसे उठ कर डाइनिंगरूम तक आया और खाने से मना कर दिया. इस पर मम्मीपापा ने हैरानी जताई तो उसे सच बताना ही पड़ा.

सुन कर मम्मीपापा चिंतित हो उठे और पापा ने तो डांट तक दिया कि क्या मूर्खों जैसी शर्तें लगाते हो, जो खुद को ही नुकसान पहुंचाती हैं. जानते हो कि इन दिनों पीलिया फैल रहा है इसलिए बाजार का सड़ागला मत खाया करो.

पापा की डांट पूरी भी नहीं हुई थी कि अभिजीत को उलटियां शुरू हो गईं जिस से मम्मीपापा घबरा गए और उस की पीठ पर हाथ फेरने लगे. आधी रात को मम्मीपापा उसे नजदीक के नर्सिंगहोम में ले गए, जहां उसे भरती कर लिया गया. डाक्टर ने बताया कि फूड पौइजनिंग हुई है और उलटीदस्त के कारण पानी भी काफी निकल गया है. दोचार दिन यहीं रहना पड़ सकता है.

अब तक अभिजीत पस्त पड़ चुका था उस का सिर भी चकरा रहा था. मम्मीपापा की हालत देख उसे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आ रहा था कि कौन सी मनहूस घड़ी थी जब शर्त लगाई थी. आंखों में बजाय नींद के चिंता और आशंका लिए रात भर मम्मीपापा उस की देखभाल करते रहे.

सुबह तक हालत कुछ सुधरी तो अभिजीत को गोलगप्पे वाले की नसीहत याद आई जो घाटा उठाने को तैयार था लेकिन उस की नसीहत पर ध्यान न देने का नतीजा ही था कि तकलीफ उठाई. मांबाप को भी परेशानी में डाला और इलाज पर 4 हजार रुपए खर्च हुए सो अलग.

चटपटा और जायकेदार खाना गलत या बुरी बात नहीं लेकिन उस की अति कितनी नुकसानदेह होती है यह सबक दोस्तों को भी मिल गया था जो उसे देखने आए थे. उन्होंने अभिजीत के मम्मीपापा को सौरी भी कहा. हालांकि इस में पूरी गलती उन की नहीं थी, अभिजीत भी बराबर का जिम्मेदार था जो जानतासमझता था कि ज्यादा खाना बुरी बात है, जिस का नतीजा अच्छा नहीं निकलता.

ऐसी ही एक और सच्ची घटना भोपाल की है. एक नामी इंजीनियरिंग कालेज की फर्स्ट ईयर की छात्रा स्नेहा (बदला हुआ नाम) को 3 साल पहले 31 दिसंबर की कड़ाके की ठंड में तड़के उस के 2 दोस्त रैडक्रौस अस्पताल में इलाज के लिए लाए थे. स्नेहा की हालत इतनी खराब थी कि उसे आईसीयू में भरती करना पड़ा था.

स्नेहा अचेत थी और उस के दोस्त घबराए हुए थे. डाक्टर आए और इलाज शुरू किया. दरअसल, नए साल के जश्न में आयोजित पार्टी में स्नेहा ने काफी शराब पी ली थी और चूंकि पहली बार पी थी इसलिए हालत बिगड़ गई थी. बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी, दोस्तों की जेब में उसे भरती कराने, रजिस्ट्रेशन फीस और दवा तक के लिए पैसे नहीं थे इसलिए डाक्टरों से यह कह कर वहां से खिसक लिए कि अभी हम एटीएम से पैसे निकाल कर लाते हैं, तब तक आप इलाज शुरू कीजिए. लड़की की नाजुक हालत देख डाक्टरों ने उसे भरती कर लिया था.

बहरहाल, इलाज से धीरेधीरे स्नेहा की हालत सुधरी उस की दवा का पैसा वहां एडमिट एक बुजुर्ग महिला के बेटे ने दिया जो पेशे से पत्रकार व लेखक था. सुबह जब स्नेहा को पता चला कि उस के साथी तो खिसक गए हैं तो वह रोंआसी हो उठी. इधर अस्पताल स्टाफ ने फरमान जारी कर दिया कि बगैर बिल भरे जाने नहीं देंगे और अपना सही नामपता बताओ ताकि तुम्हारे मांबाप को खबर दी जा सके.

लेखक की मध्यस्थता की वजह से मामला निबटा, उन्होंने दवा के बाद बिल भी भरा और स्टाफ को समझाया कि क्या होगा सही नामपता ले लेने से, जब लड़की के घर खबर लगेगी तो घबराए मांबाप भागेभागे आएंगे और उस की यह हालत देख अपना सिर ही पीटेंगे. हो सकता है लड़की की पढ़ाई छुड़वा दें इस से लड़की का भविष्य खराब होगा. उसे सुधरने का एक मौका मिलना चाहिए.

बाद में स्नेहा ने बताया कि नए साल की खुशी में दोस्तों ने पार्टी रखी थी. एक स्थानीय दोस्त का घर खाली था. उस के मम्मीपापा बाहर गए हुए थे. पार्टी में लड़केलड़कियां सभी थे तभी पीनेपिलाने का दौर शुरू हो गया, स्नेहा से पूछा गया तो उस ने मना कर दिया, इस पर उस के दोस्तों ने उसे देहाती, बैकवर्ड और घरेलू जैसे तानों से नवाजा. स्नेहा ने पहले कभी शराब नहीं पी थी इसलिए दोस्तों के कारण उस ने शराब पी ली.

फिर डांस और तेज म्यूजिक की मस्ती में वह कितनी पी गई यह उसे भी पता नहीं. लेकिन जब थोड़ी देर बाद शराब ने असर दिखाया तो स्नेहा झूमने लगी और उस की हालत बिगड़नी शुरू हो गई. यह देख कर बाकी दोस्तों की हालत खराब हो गई.

स्नेहा बेहोश हो कर जब धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ी तो सभी घबरा कर एकदूसरे का मुंह ताकने लगे फिर जैसेतैसे उसे नजदीक के अस्पताल लाए.

स्नेहा अब चौथे साल में है लेकिन सभी जूनियर्स व सीनियर्स को शराब पीने के नुकसान बताती रहती है कि पढ़नेलिखने और कैरियर बनाने की उम्र में इस से बच कर रहो और बेहतर है जिंदगी में इसे कभी न ही छुओ.

सिखाता है सबक

अब स्नेहा कहती है अगर उस रात घर पर पता चल जाता तो मैं कहीं की न रहती. जिंदगी भर घर वालों और खासतौर से मम्मीपापा से नजरें नहीं मिला पाती. जाने कैसे मैं दोस्तों के झांसे में आ गई और अपना अच्छाबुरा नहीं सोच पाई. मम्मीपापा की दी गई नसीहतें भूल गई, नशे में कुछ उलटासीधा हो जाता तो… यह सोचते ही वह कांप जाती है और वे दोस्त जो उसे भरती करा कर मुंह छिपा कर भाग निकले थे, क्या वे दोस्त थे.

स्नेहा को जो सबक मिला वह उसे जिंदगी भर याद रहेगा और बुराइयों से दूर रखेगा कि शराब तो बुरी चीज है ही पर उस से बुरे वे दोस्त हैं जो आप को बुरे रास्ते पर ले जाने को उकसाते हैं. इन से बचे रहना जरूरी है.

अभिजीत को अगर फूड पौइजनिंग न होती और स्नेहा शराब के ओवरडोज में अस्पताल में भरती न होती तो वे कभी इन बुराइयों को समझ नहीं पाते. पर जरूरी यह है कि हम हर दिन एक नए बुरे काम को पहचानें तो यकीनन हम बुरे काम को नहीं उस के एक अच्छे नतीजे को अपना रहे होगे.

कमजोर को सताना, छोटीमोटी चोरी, दूसरे को परेशान करना, पढ़ाईलिखाई में लापरवाही बरतना, तेज रफ्तार से बाइक चलाना, शराब, सिगरेट, तंबाकू या गुटके की लत, स्मार्टफोन या कंप्यूटर पर गैरजरूरी साइट्स तलाशना जैसी कई बातें हैं जो बुराइयों के दायरे में आती हैं बशर्ते हम इन्हें दूसरे की या किसी भुक्तभोगी की नजर से देखें तो ये एक सबक और अच्छाई बन हमारे सामने आ खड़ी होती हैं. इसी तरह अनियमित खानपान, देर रात तक जागना, कसरत न करना और पढ़ाई से जी चुराना भी इसी तरह की बुरी बातें हैं.

इस के बाद भी कोई बुरा या गलत काम हो भी जाए तो बहुत ज्यादा पछतावा भी अच्छी बात नहीं, अच्छी बात है उस बुराई की स्वीकारोक्ति और यह प्रण कि अब ऐसा नहीं करेंगे. किसी दुविधा में पड़ जाएं तो पेरैंट्स पर भरोसा करना चाहिए जो बच्चों की हर गलती सुधारने की जिम्मेदारी लेते हैं. उन में ही इतनी सामर्थ्यऔर समझ होती है कि वे जरूरत के मुताबिक डांट कर या समझाबुझा कर सही रास्ता दिखाते हैं. चूंकि वे इस दौर से गुजर चुके होते हैं.

नेलआर्ट बढ़ाए आपके हाथों की खूबसूरती

किशोरियां आजकल फैशन को ले कर बहुत क्रेजी हैं फिर बात चाहे ड्रैस की हो या मेकअप की. यहां तक कि अब वे नेलआर्ट करवाने में भी पीछे नहीं हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर नेल्स खूबसूरत नहीं होंगे तो उन की फिगर्स ब्यूटीफुल नजर नहीं आएंगी.

पहले ओवल शेप्ड नेल्स रखने का चलन था लेकिन जब से नेलआर्ट का फैशन आया है तब से गर्ल्स स्क्वायर शेप्ड नेल्स ज्यादा रखने लगी हैं. उन्हें लगता है कि ऐसे शेप पर नेलआर्ट ज्यादा बेहतर लगती है.

मार्केट में आप को ग्लिटर, स्माइली, स्टार आदि डिजाइंस की नेलआर्ट आसानी से मिल जाएंगी. यहां तक कि अब दोनों हाथों की एक फिंगर पर गोल्डन कलर और बाकी पर डिफरैंट शेड्स का फैशन भी है. इस से नेल्स को भी स्टाइलिश लुक मिलता है.

नेलआर्ट का फैशन आने से अब आप को नेल्स के टूटने पर भी टैंशन नहीं होगी, क्योंकि आप आर्टिफिशियल नेल्स लगा कर उन की खूबसूरती को बरकरार रख सकती हैं.

बस, इस दौरान आप को यह ध्यान रखना होगा कि अगर आप 2 कलर्स से नेलआर्ट कर रही हैं तो दोनों ही डार्क या फिर दोनों ही लाइट न हों और साथ ही नेलआर्ट ज्यादा समय तक टिकी रहे, इस के लिए उन पर अपर कोट अप्लाई करना न भूलें, क्योंकि इस से नेल्स पर शाइनिंग आती है.

इस बात को ले कर भी परेशान न हों कि आप को नेलआर्ट करने में दिक्कत होगी. बाजार में आप को नेलआर्ट किट मिल जाएगी या फिर आप घर पर ही 3-4 नेलपेंट्स को मिला कर नेलआर्ट कर सकती हैं. तो फिर हो जाइए तैयार अपनी फिंगर्स को ब्यूटीफुल लुक देने के लिए.

देश सफाई बनाम जेब सफाई

नई सरकार से उम्मीद की गई थी कि वह ज्यादा कुशलता दिखा कर बरबाद होता पैसा बचाएगी और देश को महंगाई के आतंक से बचाएगी पर वह अपने लंबेचौड़े वादे दूर करने के नाम पर टैक्स बढ़ाने में लगी है जैसे समृद्ध और शांति के लिए यज्ञहवन कराने की सलाह तक तो दी जाती है पर पहले मोटा दानपुण्य वसूल लिया जाता है.

स्वच्छ भारत के लिए सेवा कर को आधा प्रतिशत बढ़ाना देश पर तमाचा मारना है. साल सवा साल में देश कहीं से साफ नहीं हुआ जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश की सफाई देखते रहे और उन के चेलेचपाटे दिमागसफाई में लग गए. अब सफाई के नाम पर आधा प्रतिशत कर बढ़ा कर देशवासियों की जेब साफ कर दी गई है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली का यह कहना कि यह कर तो योगदान है, बहकावा है. सरकार इतना पैसा करों से एकत्र करती है कि इस आधे प्रतिशत से कुछ ज्यादा बनताबिगड़ता नहीं है, यह तो सिर्फ बहाना है.

असल में भारतीय जनता पार्टी सरकार का स्वच्छ भारत का नारा खोखला साबित हुआ है क्योंकि इसे जनसमर्थन न के बराबर मिला. देश गंदा इसलिए है कि यहां गंदगी से प्रेम है, जो कर देने से नहीं जाएगा. सरकार चाहे तो भी, 120 करोड़ लोगों को साफसफाई का पाठ नहीं पढ़ा सकती.

सफाई नागरिकों का अपना कर्तव्य है पर यहां घरों, दफ्तरों, दुकानों, बाजारों, होटलों सब में गंदगी बसी रहती है और लोग ठाट से गंदगी बिखेरते चलते रहते हैं और चिंता नहीं करते. शहरी पढ़ेलिखों और ग्रामीण गंवारों में कोई खास फर्क नहीं है. दोनों बेहद गंदगी फैलाते हैं. कुछ शान से कूड़ेदान का इस्तेमाल करते हैं पर कूड़ेदान को कौन साफ करेगा, इस की कोई चिंता नहीं करता.

सरकार आमदनी बढ़ाने के लिए नएनए कर नएनए नामों से लगा रही है. और स्वच्छता कर ऐसा ही है. जो देश अपने राजपथ तक को साफ न रख पाए तो वह कब क्यों कैसे साफ होगा, यह पहेली ही है.

सपनों से पहले हर बाधा को पार करें: आइरिस मजू

ज्यादातर युवतियां शादी के बाद अपनी दुनिया घरपरिवार तक ही समेट लेती हैं, पर कुछ अपनी मेहनत, लगन और महत्त्वाकांक्षा के चलते अपने जीवन में कुछ ऐसा हासिल करती हैं, जो उन की अलग पहचान बनाता है. ऐसी ही पहचान बनाई है कोचीन में जन्मी आइरिस मजू ने. इन का विवाह आर्मी के कर्नल मजू से हुआ. इन का एक 13 साल का बेटा भी है.

आइरिस मजू आर्मी स्कूल में अंगरेजी टीचर के साथसाथ गोग्रीन नामक कैंपेन में भी बहुत सक्रिय रही हैं. इन्होंने अपने छात्रों के साथ मिल कर बहुत सी रैलियों का आयोजन कर लोगों को वातावरण संरक्षण की जरूरत के बारे में बताया. इन का नारा था कि मोटापे को जलाओ न कि तेल.

रंग लाई मेहनत

विवाहित महिलाओं की इस राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए 300 से भी अधिक प्रविष्टियां आई थीं, जिन में केवल 34 महिलाओं को भाग लेने के लिए चुना गया था. यह प्रतियोगिता केवल ग्लैमर देखने की नहीं थी, बल्कि उन महिलाओं को चुनने की थी, जो किसी सामाजिक अभियान से जुड़ी हों और आइरिस मजू इस से संबंधित सभी मुद्दों का काफी लंबे समय से प्रचार करती आ रही थीं. देश भर में अलगअलग जगहों में रह चुकीं आइरिस को बहुत कुछ जानने को मिला. वातावरण की सुरक्षा व उस के बारे में इन की चाह ने ही इन्हें इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रेरित किया.

इन्होंने अपनी उपलब्धियों की सूची में एक और उपलब्धि तब जोड़ी जब इन्हें एशिया इंटरनैशल के लिए कम्यूनिटी ऐंबैसेडर चुना गया. आइरिस मजू पुणे में आयोजित ईआरएम ग्रुप औफ कंपनीज द्वारा आयोजित ‘मिसेज इंडिया इंटरनैशनल 2015’ की मिसेज इंडिया प्लैनेट प्रतियोगिता की सैकेंड रनरअप रह चुकी हैं.

नई पहचान

दूसरी सौंदर्य प्रतियोगिताओं की तरह इस में भी रैंप वाक था पर यह इस प्रतियोगिता का बहुत छोटा हिस्सा था. जब इन्होंने पहली बार रैंप पर वाक किया तो अपना सारा ध्यान इसी पर केंद्रित किया. इस के लिए सभी प्रतियोगियों को एक विषय दिया गया जिस के बारे में उन्हें कुछ देर बात करनी थी और उस से संबंधित परियोजनाओं की पहचान भी करनी थी. आइरिस ने उन सब चीजों के बारे में सोचा जो हमारे वातावरण को और अच्छा बना सकें. आइरिस ने इन सब चीजों के लिए बहुत मेहनत की. उन्होंने टेलैंट सैगमैंट के लिए माउथऔर्गन बजाना भी सीखा. समाज के प्रति प्रतिबद्धता इस खिताब का बहुत अहम हिस्सा था. पर प्रतियोगियों का स्वस्थ होना भी जरूरी था.

आइरिस कहती हैं, ‘‘अगर पति और बेटा मदद न करते तो मेरे लिए यह काम बहुत कठिन हो जाता. मैं अपने काम को ले कर बहुत ऐक्साइटेड हूं.’’

आइरिस मजू ने बताया कि एक बार उन के एचओडी ने उन से कहा कि तुम मुझे ‘ए टीचर फौर औल सीजन्स’ कविता की याद दिलाती हो, मुझे उन की यह प्रशंसा आज भी याद है और यह मेरे लिए अब तक की सब से बड़ी प्रशंसा है.

आइरिस को एक ऐसा अवसर मिला, जिस में इन्होंने सभी जवानों के परिवार कल्याण के लिए छोटाबड़ा काम किया. इसे ये अपनी उपलब्धि बताती हैं. इन का कहना है कि जब तक आप का सपना पूरा न हो तब तक आने वाली हर बाधा को पार करें.  li

आम को खास बनाते स्पैशलाइज्ड डिग्री कोर्स

आज भला साधारण भूगोल की पढ़ाई क्यों की जाए जब कामकाज की जरूरतें भूगोल के नएनए क्षेत्र निर्धारित कर रहे हैं और उन्हें समझ कर कुछ विश्वविद्यालय ज्योग्राफिक टूरिज्म या ज्योग्राफिक एनवायरमैंट की डिग्री औफर कर रहे हों? लेकिन यह सिर्फ भूगोल का ही किस्सा नहीं है, यही हाल लगभग हर विषय का है. दरअसल, आज जितने भी विषय विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे हैं, उन सब की परंपरा कम से कम 100 साल पुरानी है, सिवा एक प्रबंधन कोर्स को छोड़ कर. हम जानते हैं कि जिंदगी लगातार बदलती रहती है और उस की जरूरतें भी बदलती रहती हैं. यही कारण है कि आज से 50 साल पहले रसायन विज्ञान पढ़ने के जो उद्देश्य हुआ करते थे आज वे बदले भी हैं और कई मानों में बहुत व्यापक भी हो गए हैं.

स्नातक स्तर के बाद की पढ़ाई का मतलब जीवन को समृद्ध और परिपूर्ण बनाना है. इसलिए हर अध्ययन के पीछे संबंधित क्षेत्र के कामकाज को बेहतर बनाना प्रमुख उद्देश्य होता है. यों तो बिना चर्चा किए ही कई बार विभिन्न विषयों में परिवर्तन होता रहता है. लगातार नए विकास के साथ उन में अपडेट होता रहता है. बदलते मानकों, नियमों का उन में समावेश भी होता रहता है, लेकिन कई बार ये सब बड़े पैमाने पर और एकसाथ ही करना पड़ता है तब ये सब नए विषय के रूप में नजर आता है.

इसलिए इन दिनों अगर तमाम पारंपरिक पाठ्यक्रमों में विभिन्न नए समायोजनों के साथ विकसित किए गए नए पाठ्यक्रमों का बोलबाला चारों तरफ दिख रहा है तो इस का मतलब है कि अचानक कामकाजी जीवन और जीवन जीने के रंगढंग में बदलाव या नएनए विकास हुए हैं, इसलिए तमाम पुराने पारंपरिक पाठ्यक्रमों में भी नए कौंबिनेशन जरूरी हो गए हैं.

यह अकारण नहीं है कि देश की अग्रणी यूनिवर्सिटी मानी जा रही दिल्ली यूनिवर्सिटी ने पिछले 2 साल में 8 नए डिग्री पाठ्यक्रम पेश किए हैं. ये सभी पाठ्यक्रम सहयोगी विषयों के मिश्रण से विकसित हुए हैं, जो बाजार, रोजगार और उद्योग क्षेत्रों के लिए काफी उपयोगी हैं.

डीयू ने पिछले साल बीटैक लैवल पर जो कंप्यूटर साइंस, फूड टैक्नोलौजी, इंस्ट्रूमेंटेशन, इलैक्ट्रौनिक्स, पौलिमर साइंस, साइकोलौजिकल साइंस और फोरेंसिक साइंस जैसे पाठ्यक्रम पेश किए हैं, वे नए उपयोगी विषयों के मिश्रण से बने पाठ्यक्रम हैं. इसी क्रम में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने एमएससी फोरेंसिक साइंस कोर्स शुरू किया है, जिसे कैमिस्ट्री, फिजिक्स, बौटनी, जूलौजी, एंथ्रोपौलिजी, बायोकैमिस्ट्री, बायोफिजिक्स, बायोटैक जेनेटिक, माइक्रोबायोलौजी, बीफार्मा, बीटैक, एमबीबीएस, बीडीएस और लाइफसाइंसेज के बीएससी कोर्सेस करने वाले छात्र कर सकते हैं.

मतलब यह नया एमएससी फोरेंसिक साइंस पाठ्यक्रम इतने किस्म के विषय वाले छात्रों से खुद को जोड़ेगा. भले ही यह व्यापक होने की वजह से बहुत सटीक न दिखे, लेकिन फोरेंसिक क्षेत्र में जिस तरह की जरूरतें और बहुआयामी जटिलताएं पैदा हुई हैं, उन सब को देखते हुए यह पाठ्यक्रम बाजार, रोजगार और आधुनिक कानून व्यवस्था जैसे क्षेत्रों के लिए काफी लाभदायक साबित होगा.

हाल के वर्षों में जिस तेजी से बाजार, रोजगार और बदलती लाइफस्टाइल के चलते विभिन्न पाठ्यक्रमों में बदलाव किया गया है वे तमाम पाठ्यक्रम, नएनए विषय क्षेत्र के रूप में सामने आए हैं. ऐसे विषय क्षेत्र काफी व्यापक और बहुपयोगी हैं. हम यहां इन्हीं पुराने पाठ्यक्रमों की चर्चा कर रहे हैं जो अपने नए रूप में विभिन्न समायोजनों के साथ बिलकुल नए और बहुपयोगी पाठ्यक्रम बन कर उभरे हैं.

इन्हीं नए पाठ्यक्रमों में से एक पाठ्यक्रम है, टूरिज्म ईकोफ्रैंडली इनिशिएटिव, जो कुछ वर्ष पहले आस्ट्रेलिया की चार्ल्स स्टुअर्ट यूनिवर्सिटी में शुरू हुआ था, लेकिन इस साल बेंगलुरु और मुंबई के कुछ कालेजों ने भी इस पाठ्यक्रम को शुरू किया है. हालांकि सच है कि नए पाठ्यक्रमों को व्यवस्थित ढंग से बाजार और विकास के साथ जोड़ना अभी हमारे यहां उतना संभव नहीं हो पा रहा है, जितना कि विदेशी विश्वविद्यालयों में. फिर भी देश के कुछ विश्वविद्यालय मसलन, दिल्ली यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, बंगलौर विश्वविद्यालय, मद्रास यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, दिल्ली, जाधवपुर यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल, काकतिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद जैसे शीर्ष विश्वविद्यालय इस क्षेत्र में पहल कर रहे हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय इन में सब से आगे है.

आमतौर पर पाठ्यक्रमों में अपडेट की परंपरा विज्ञान वर्ग के पाठ्यक्रमों में कहीं ज्यादा सहज है. इसलिए बिना किसी बदलाव के दावे के भी आमतौर पर विज्ञान क्षेत्र के पाठ्यक्रम डेढ़ से 2 दशक के भीतर अपनी आंतरिक बनावट में काफी कुछ बदल जाते हैं, लेकिन एक अच्छी और कदाचित हैरान करने वाली बात यह भी है कि हाल के सालों में विज्ञान वर्ग से अगर ज्यादा नहीं तो लगभग कदम से कदम मिलाते हुए कला, कानून और समाज विज्ञान के पाठ्यक्रमों में भी बदलाव बड़े पैमाने पर देखा गया है.

मसलन, कानून के क्षेत्र को ही लें. दिल्ली विश्वविद्यालय ने इसी साल से एक साल का एलएलएम पाठ्यक्रम शुरू किया है, जिस की अवधि पहले 2 और 3 साल हुआ करती थी. यह पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय के दावे के मुताबिक ज्यादा सटीक और आज की जरूरतों के हिसाब से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित होगा.

गौरतलब है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की ला फैकल्टी में अभी मास्टर लैवल पर जो एलएलएम कोर्स पढ़ाया जाता है वह 2 साल का है, लेकिन इसे ही जब ईवनिंग शिफ्ट के छात्र पढ़ते हैं तो यह 3 साल का हो जाता है. ला फैकल्टी ने अब एक साल का नया कोर्स तैयार किया है, जिस के बारे में दिल्ली यूनिवर्सिटी को यूजीसी ने भी लिखा था. इस नए पाठ्यक्रम के प्रपोजल और कोर्स स्ट्रक्चर को मंजूरी मिल चुकी है.

मगर कानून में डिग्री हासिल करने वालों के लिए देश में नए और बेहतर उपयोगी स्पैशलाइज्ड डिग्री कोर्सेज की कमी नहीं है. देश के तमाम विश्वविद्यालयों और ला स्कूलों ने कानून की मौजूदा जरूरतों के हिसाब से अपने पाठ्यक्रमों में बदलाव किया है. इन्होंने अब पहले से कहीं ज्यादा सटीक एकेडमिक डिग्रियां तैयार की हैं. यह जरूरी भी है, क्योंकि आज अदालतें महज सिनेमाई परदे पर दिखने वाली जैसी नहीं रह गई हैं.

आज के तेज रफ्तार समाज में न सिर्फ अपराधों में बढ़ोतरी हुई है बल्कि वे बहुत जटिल भी हुए हैं. अपराधों में विविधता भी खूब आई है. अब पुराने कानून और उन की पारंपरिक व्याख्याएं कमजोर पड़ गई हैं. यही कारण है कि देशविदेश के तमाम विश्वविद्यालयों और ला इंस्टिट्यूट ने समय के हिसाब से पाठ्यक्रमों को बदला है.

हाल के वर्षों में पूरी दुनिया में राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं जबरदस्त ढंग से बढ़ी हैं. इंटरनैट ने पूरी दुनिया को एकदूसरे से जोड़ दिया है. यह जुड़ाव महज तकनीकी संवाद तक ही सीमित नहीं है बल्कि साझे लक्ष्यों, उद्देश्यों, साधनों और योजनाओं तक बढ़ा है. अगर स्पष्ट शब्दों में कहें तो पूरी दुनिया में आम लोगों के भीतर लोकतंत्र की चाह बढ़ी है और इस के लिए संघर्ष करने की भावना भी मजबूत हुई है.

जाहिर है कि लोकतंत्र की इस चाहत और उस के लिए बढ़े आंदोलनों के चलते सरकारों द्वारा दमन भी बढ़ा है. इन सब के चलते कानून के सिपाहियों की मांग न सिर्फ अब पहले से ज्यादा बढ़ गई है बल्कि इस मांग ने कानून के जानकारों को जन महत्त्वाकांक्षाओं को समझने और सत्ता के दमन से उन के लिए सुरक्षित कानूनी रास्ता विकसित करने का दबाव भी डाला है.

इस के चलते कानून के नए पाठ्यक्रमों की जबरदस्त जरूरत पैदा हो गई है. यह अकारण नहीं है कि पुणे के सिंबायोसिस ला कालेज ने 2 साल पहले साइबर ला पर डिग्री देनी शुरू की और आज इसे चाहने वालों की लंबी कतार लगी है. इसी तरह खड़गपुर आईआईटी ने इंटैलैक्चुअल प्रौपर्टी राइट पर डिग्री देना शुरू किया है तो उस के यहां भी सीटों से तकरीबन दसगुना ज्यादा डिग्री की चाह रखने वाले आवेदन कर रहे हैं.

वक्त के हिसाब से नई जरूरतों को समझने में हैदराबाद का एनएएलएसएआर ला स्कूल भी पीछे नहीं रहा, उस ने मीडिया ला पर डिग्री देनी शुरू की है. बिहार की तिलकामाझी भागलपुर यूनिवर्सिटी ने इसी क्रम में टौर्ट्स एंड कौंट्रैक्ट्स जैसे विषय पर डिग्री की शुरुआत की है. इन सभी संस्थानों का अनुभव है कि छात्र इन नए कानून पाठ्यक्रमों का हाथोंहाथ स्वागत कर रहे हैं.

अखबार के फीचर पेज हों, टैलीविजन चैनलों में दिखाई जाने वाली डौक्यूमैंट्री फिल्में या रोजमर्रा के डिस्कशंस, हर जगह राजनीति के बाद अगर किसी दूसरे विषय की सर्वाधिक धूम रहती है तो वह पर्यावरण ही है. दुनिया का बिगड़ता पर्यावरण अगर आज वैश्विक चिंता का विषय है तो जाहिर है इस चिंता पर पठनपाठन के तमाम पाठ्यक्रम भी विकसित होने ही थे. चूंकि रोजगार और बाजार की विभिन्न गतिविधियों में अब पर्यावरण की चिंता एक जरूरी हिस्सा बन गई है, इसलिए आने वाले समय में इस क्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा रोजगार या फिर विभिन्न रोजगार इस क्षेत्र के साथ जुड़ने तय हैं. अमेरिका, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया और यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों में पर्यावरण पिछले एक दशक से हौट डिग्री कोर्स बना हुआ है पर अब हिंदुस्तान में भी यह अपनी पूरी रूपरेखा के साथ मौजूद है.

छात्र समाज का हिस्सा पहले हैं, अध्ययनअध्यापन का बाद में. इसलिए वे समझते हैं कि पर्यावरण में हासिल की गई डिग्री उन्हें रोजगार दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. मगर आज के छात्र पर्यावरण पाठ्यक्रम के घिसेपिटे तौरतरीकों व उपदेशात्मक विषय क्षेत्र में रुचि नहीं रखते. इसलिए पर्यावरण संबंधी पाठ्यक्रमों को ज्यादा व्यावहारिक और रचनात्मक बनाने की कोशिशें हो रही हैं.

पर्यावरण पाठ्यक्रम में डिग्री हासिल करने वाले एक छात्र के मुताबिक यह लगातार महत्त्वपूर्ण हो रहा है कि पर्यावरण क्षेत्र के विभिन्न जिम्मेदार हिस्सों को विशेषज्ञ नजदीक से पहचानें और उस के साथ इंटेरैक्ट करें, तभी कोई बदलाव हो सकता है. यही कारण है कि अब पर्यावरण को सैद्धांतिक से ज्यादा व्यावहारिक और फील्ड में जा कर काम करने वाले पाठ्यक्रम में बदला जा रहा है.

इस क्षेत्र में अलगअलग महत्त्वपूर्ण डिग्रियां विकसित की गई हैं, जैसे पुणे का आईएनओआरए संस्थान और्गेनिक फार्मिंग पर डिग्री दे रहा है तो इंस्टिट्यूट औफ जैनेटिक इंजीनियरिंग कोलकाता जैनेटिक्स पर डिग्री पाठ्यक्रम दे रहा है. तमिलनाडु के फिशरीज कालेज ने फिशरीज साइंस पर महत्त्वपूर्ण डिग्री देनी शुरू की है जबकि अगर इसी क्रम में हम इंगलैंड और अमेरिका को भी रखें तो लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स एनवायरमैंट पौलिसी पर अमेरिका का नौर्थलैंड कालेज, एनवायरमैंट कैमिस्ट्री पर और अमेरिका की ही कौर्नेल यूनिवर्सिटी लैंडस्केप मैनेजमैंट पर डिग्री दे रही है.

कुल मिला कर आज पढ़ना सिर्फ पारंपरिक ढंग से डिग्री हासिल करना भर नहीं है बल्कि रोजगार और ज्ञान के मामले में ज्यादा सामयिक, ज्यादा उपयोगी और ज्यादा रुचिकर होना है. इसलिए पुराने घिसेपिटे डिग्री पाठ्यक्रमों की जगह आज पूरी दुनिया में विभिन्न सहयोगी विषयों में समायोजित कर के नएनए पाठ्यक्रम विकसित हो रहे हैं. यह न सिर्फ व्यावहारिक है बल्कि ये बुद्धिमत्ता भी दर्शाते हैं.   

सैलरी नेगोशिएशन जरूरी, इन बातों का रखें ध्यान

अक्षत मिठाई का डब्बा ले कर घर लौटा, तो घर में सभी उसे देखते ही समझ गए कि उस की नौकरी लग गई है. सब ने बड़ी गर्मजोशी से उसे बधाई दी. अक्षत भी बहुत खुश था.

तभी अक्षत का सहपाठी राजन उस के घर आया और बोला, ‘मैं गैलेक्सी इंटरनैशनल में मार्केटिंग ऐग्जीक्यूटिव अपौइंट हो गया हूं और सैलरी का पैकेज है पूरे 6 लाख, 60 हजार रुपए. लो मिठाई खाओ,’ कहते हुए उस ने मिठाई का डब्बा अक्षत की तरफ बढ़ा दिया.

अक्षत उस की बात सुन कर हैरान रह गया. वह बोला, ‘‘अरे, क्या बात कर रहा है. गैलेक्सी इंटरनैशनल में तो मैं भी अपौइंट हुआ हूं. वह भी 6 लाख के पैकेज पर… बधाई तू मुझे दे…’’

दोनों की खुल कर बातें हुईं तो पता चला कि दोनों एक ही कंपनी की अलगअलग शाखाओं के लिए मैनेजर अपौइंट हुए हैं, लेकिन सैलरी के मामले में राजन ने बाजी मार ली थी, क्योंकि उस ने मैनेजर के साथ अच्छी तरह नेगोशिएट किया था, जबकि अक्षत ने कंपनी द्वारा बताई गई सैलरी को बिना कुछ कहे स्वीकार कर लिया था. सचाई का पता चलने पर अक्षत उदास हो गया, लेकिन अब कोई उपाय नहीं था.

आप भी अपने संभावित एंप्लौयर से बातचीत करते समय सैलरी के मामले में जरा खुल कर बात कर लें. ध्यान रहे, नौकरी हासिल करने की उतावली में कंपनी द्वारा दिए गए औफर को बिना मोलभाव के स्वीकार कर लेने से आप को अपने दीर्घअवधि के कैरियर में लाखों रुपए का नुकसान हो सकता है. बात पक्की करने जाएं तो इन बातों का ध्यान जरूर रखें :

मार्केट की अपडेट जानकारी रखें

कोई भी नया बिजनैस शुरू करने से पहले मार्केट में डिमांड और सप्लाई, मौजूदा प्रतिद्वंद्वियों की संख्या, कच्चे माल की उपलब्धता और रिस्क का आकलन करने की जरूरत होती है, वैसे ही जौब के मामले में भी कुछ रिसर्च वर्क करना पड़ता है. आप जहां नौकरी करने जा रहे हैं उस कंपनी के बारे में पूरी जानकारी रखें, अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर जिस पद के लिए आप अप्लाई कर रहे हैं उस की दूसरी कंपनियों में क्या स्टैंडर्ड सैलरी है आदि चीजों की जानकारी अवश्य रखें. जानकारी एकत्रित करने के कई सोर्स हो सकते हैं, लाइन में मौजूद परिचित, कैरियर या रिकू्रटमैंट सलाहकार या इंटरनैट.

गरज न दिखाएं

माना कि आप को काम की काफी जरूरत है, लेकिन अच्छी तनख्वाह चाहिए, तो गरज दिखाने से काम नहीं चलने वाला. आप फलसब्जी या साड़ी खरीदने जाते हैं, तो भाव कम करवाने के लिए ‘जरूरत नहीं’ वाले अंदाज में आगे बढ़ जाते हैं न. तभी तो भाव कम होते हैं. लेकिन आप वहां खड़े ही रहेंगे, तो भाव कम होने वाले नहीं. कुछ ऐसा ही रवैया यहां दिखाना पड़ता है. आप की गरज का संकेत मिलते ही एंप्लौयर सैलरी घटा कर बोलेगा. बातचीत या पत्राचार नपेतुले अंदाज में करने पर ही आप सर्वोत्तम वेतन पाने की उम्मीद कर सकते हैं.

कंपनी को बताएं अपना मोल

अच्छा वेतन पाना है, तो आप को अपनी भावी कंपनी को यह बात बतानी होगी कि आप इस पद के लिए कैसे एक योग्य कर्मचारी साबित होंगे और कंपनी के मौजूदा कार्य को कैसे इम्प्रूव कर सकते हैं. आप को नियुक्त करने से कंपनी को क्याक्या फायदे हो सकते हैं और आप जो वेतन लेंगे वह किस तरह कंपनी को मिले लाभ के सामने नगण्य है.

अपने पैर मजबूत रखें

जाहिर सी बात है कि पैरों तले की जमीन ठोस न हो तो व्यक्ति ज्यादा देर नहीं टिक सकता. आप किसी रोजगारदाता का शुरुआती औफर ठुकराने का साहस तभी बटोर सकते हैं, जब आप की वित्तीय स्थिति इस लायक हो कि आप दोचार महीने बिना नौकरी के बिता सकें. इसलिए कुछ महीने की बचत हाथ में होना या आय के वैकल्पिक स्रोत का होना बेहद जरूरी है वरना आप को ‘जो मिल रहा है वह तो लपको’ के फार्मूले पर ही काम करना पड़ेगा.

अपने सारे पत्ते न खोलें

भावी एंप्लौयर को अपनी पिछली सैलरी व नौकरी के बारे में अन्य बातें खुल कर बताने की गलती न करें. अपनी योग्यताओं जौब प्रोफाइल आदि के बारे में बताएं. घुमाफिरा कर एंप्लौयर आप के घर खर्च, किराए आदि के बारे में जानकारी हासिल करना चाहे, तो गोलमोल जवाब दें.

पगार की पहल एंप्लौयर को करने दें

वेतन से संबंधित चर्चा रोजगारदाता को शुरू करने दें. कई बार नौसिखिए उम्मीदवार खुद सैलरी की बात पूछ कर अपना अनाड़ीपन जाहिर कर देते हैं. अनुभवी एंप्लौयर समझ जाता है कि सामने वाला इस मैदान का नया खिलाड़ी है, सस्ते में पटेगा. वहगेंद आप के पाले में डाल कर आप से एक फिगर उगलवाएगा और फिर उसे कम करने की कोशिश करेगा, जबकि शुरुआत उस के द्वारा करने से आप को नेगोशिएट करने का चांस मिलता है.

मौखिक बात पर भरोसा न करें

कई बार हायरिंग मैनेजर चिकनीचुपड़ी बातें कर के उम्मीदवार को सातवें आसमान पर चढ़ा देते हैं. वे कुछ इस तरह कहते हैं, ठीक है, आप शुरुआत तो कीजिए, हम 6 महीने बाद आप की सैलरी बढ़ा देंगे. अगर वह ऐसा कमिटमैंट करे, तो उस से लिखित में मांगें. लिखित न दें तो समझ जाएं कि यह सिर्फ वादा ही है, जो निभाने के लिए नहीं है.

इन बातों पर भी चर्चा करें

नौकरी पक्की करते वक्त बोनस, छुट्टियां, छमाही रिव्यू, फ्लैक्सी टाइम आदि विषयों पर भी चर्चा कर लें. बोनस या वेतनवृद्धि की पौलिसी, 3 साल में एक बार लंबी छुट्टी, पेड लीव, मैटरनिटी लीव आदि के संबंध में भी खुल कर बात करना फायदेमंद रहता है.        

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