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न बनने दें बच्चों को ‘साइलेंस विक्टिम’

कुछ समय पहले की बात है. कोलकाता के एक उपनगर चौथी कक्षा की एक बच्ची हर रोज पढ़ने जाता थी. बल्कि उसे जबरन भेजा जाता था. माता-पिता यही समझते थे कि दूसरे छोटे बच्चों की तरह उनकी बच्ची भी ट्यूशन पढ़ने जाने में आनाकानी करती है. मां उसे रोज बहला-फुसला कर ट्यूटर के घर छोड़ आया करती थी. अचानक एक दिन वह बच्च जख्मी हालत में रोते-रोते घर पहुंच जाती है. बच्ची ने बताया ट्यूटर ने उसके साथ गलत हरकत की. दरअसल, बच्ची को प्यार-दुलार करने के बहाने ट्यूटर अक्सर उसके बदन में इधर-उधर हाथ लगाने की कोशिश किया करता था. इसकी शिकायत बच्ची ने अपने माता-पिता से कई बार की थी. लेकिन घरवाले बच्ची का आशय समझ नहीं पाए थे.

मुंबई अंधेरी में एक स्कूल के प्रिंसिपल को छह साल के बच्चे का यौन शोषण करने के मामले पोकसो के तहत गिरफ्तार किया गया. बच्चे ने मां को बताया कि दोपहर को जब वह टौयलेट गया तो प्रिंसिपल ने उसके प्राइवेट पार्ट्स को हाथ लगाया.

मालदह में 13 साल की एक लड़की के साथ उसी के स्कूल के एक छात्रों के एक दल ने स्कूल परिसर में यौन उत्पीड़न की कोशिश की. लड़कों के दल में से एक छात्र लगभग हर रोज उसे फब्तियां कसता था. फिर एक दिन उसने लड़की को प्रेम निवेदन किया. जवाब में लड़की ने उसे बुरी तरह झिड़क दिया था. इससे नाराज लड़कों के दल ने छुट्टी के समय मौका देखकर लड़की को उसकी सहेली के साथ घेर लिया. पहले तो लड़की को थप्पड़ मारा और फिर सब उन दोनों के साथ छेड़खानी करने लगे.

दिल्ली रोहिणी के मैक्सफोर्ट स्कूल में आठ साल की एक लड़की के साथ शिक्षक ने स्कूल परिसर में छेड़खानी करने की कोशिश की. ऐसा एक बार नहीं दो बार हुआ. पहली बार लड़की ने अपनी खुद की आशंका को झिड़क दिया. लेकिन जब उसके साथ दोबारा ऐसा ही हुआ तो लड़की ने घरवालों को इसक शिकायत की. इसके बाद अभिभावकों ने स्कूल में प्रदर्शन किया.

एक अन्य घटना में मुंबई के प्रभादेवी स्कूल बधिर और शारीरिक रूप से विकलांग बच्चे के प्रभादेवी स्कूल में प्रिंसिपल और एक टीचर ने मिलकर एक बधिर बच्ची का यौन शोषण किया. बच्ची ने बताया कि स्कूल की और भी छह बच्चियों के साथ भी इस तरह की घटना घट चुकी है. बाद में पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया.

कोलकाता के जादवपुर इलाके में एक स्कूल में एक लड़के ने टौयलेट में एक लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश की. लड़का स्कूल की दीवार फांद कर परिसर में घुस आया था. इसका घटना के बाद अभिभावकों ने जमकर हंगामा किया.

ये तो स्कूल में बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं हैं. पिंकी विरानी ने अपनी किताब ‘बीटर चौकलेट: चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज इन इंडिया’ में एक सर्वे का जिक्र किया है, जो बताता है कि 90 फीसदी मामलों में पिता, भाई, चाचा, मामा जैसे परिजन और पारिवारिक मित्र, ड्राइवर, नौकर-चाकर, दरवान भी प्यार-दुलार के बहाने अक्सर बच्चों यौन उत्पीड़न करते हैं. सहूलियत भरी जिंदगी जीने के लिए माता-पिता दोनों सर्विस करते हैं. जाहिर है भाग-दौड़ की जिंदगी में बच्चे जल्द ही आया व पारिवारिक सदस्यों के हवाले कर दिए जाते हैं. ऐसे करीबी लोगों के के चेहरे के पीछे कोई मुखौटा है, बच्चे और माता-पिता समझ नहीं पाते हैं. माता-पिता के सामने दादा, ताऊ, काका, चाचा, मामा चौकलेट या टौफी देकर स्नेह जताते हों, लेकिन माता-पिता के पीठ पीछे या टैरेस या किसी सूनसान जगह में बच्चों को ले जाकर अपनी विकृत लालसा पूरा करते हैं.

यूनिसेफ, सेव द चिल्ड्रन, केंद्रीय समाज कल्याण मंत्रालय और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से समय-समय पर जितनी भी सर्वे हुए हैं, उनका लब्बोलुआव यही है कि समाज के हर स्तर पर पांच से लेकर 18 साल के बच्चों का शारीरिक शोषण हो रहा है. प्रयास नामक स्वयंसेवी संस्था ने 13 राज्यों में कराए गए सर्वेक्षण में समाज के हर तबके के 18 साल के 12500 बच्चों से बातचीत का नतीजा भी यही कहता है कि प्रति तीन में से दो का कभी-न-कभी यौन शोषण हुआ है. वहीं 18 से 24 साल के 2324 लड़के-लड़कियों माना कि इसमें बहुतों के साथ उम्र के विभिन्न पड़ाव पर यौन शोषण हुआ है. पूरे सर्वे में पाया गया कि 99 प्रतिशत बच्चे ‘साइलेंट विक्टिम’ बनते हैं. 70 प्रतिशत बच्चे चाहे लड़का हो या लड़की यौन उत्पीड़न की बात छिपा लेते हैं. किसको नहीं बताते या किसी को पता नहीं चल पाता है. कई बार बच्चे इतने छोटे होते हैं कि या तो समझ नहीं पाते हैं, या बता नहीं पाते हैं. 20 प्रतिशत मामले में बच्चों की शिकायत करने पर भी माता-पिता मामले को पचा जाते हैं या छिपा लेते हैं. समाज में बदनामी से डर कर आरोपी पर कोई कार्रवाई नहीं करते हैं.

मुंबई की भी एक अन्य स्वयंसेवी संस्था ने देश के 500 शहरों में शिक्षित और संभ्रांत मध्यवर्गीय परिवार की महिलाओं पर सर्वे किया. जिन महिलाओं से इस बारे में बात की गयी उनमें से 450 महिलाएं ‘हाईवे’ फिल्म की वीरा त्रिपाठी पायी गयीं, जिसका चाचा उसका यौन शोषण किया करता था और उसकी मां उसकी शिकायत को दबा देती थी. अक्सर ये महिलाएं बचपन में कभी-न-कभी, किसी-न-किसी उम्र में एक बार या एक से अधिक कई बार यौन उत्पीड़न की शिकार हो चुकी थीं. इनमें 40 प्रतिशत महिलाएं करीबी रिश्तेदारों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं. 70 प्रतिशत का यौन शोषण पारिवारिक मित्रों या दूर के उम्रदराज रिश्तेदारों ने किया था. आजकल तो लड़कों का भी यौन उत्पीड़न आम है. एक सर्वे में 150 लड़कों से इस मुद्दे पर बात हुई, ‍इनमें से 15 प्रतिशत लड़के बचपन में पिता, ताऊ, काका और पड़ोसी द्वारा लांक्षित होते थे. 

मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट कहता है कि पूरे देश में हर 23 मिनट में एक बच्चे का अपहरण होता है. अपहृत बच्चों में ज्यादातर का किसी-न-किसी रूप में यौन शोषण होता है. कुछ मामलों में तो अपहरण का मकसद यौन उत्पीड़न और विकृत यौन लालसा की प्राप्ति होता है. केवल और केवल फिरौती के लिए भी अपहरण होता है, लेकिन उन बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न होता है. अपहृत बच्चे खाड़ी के देशों में भी भेज दिए जाते हैं.

गंभीरता से लें बच्चों की बातों को

कोलकाता के नेशनल इंस्टीट्यूट औफ विहेवियरल साइंस की मनोचिकित्सक श्रीलेखा विश्वास का कहना है कि भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में पिडोफिल नामक मानसिक विकार वाले लोगों की बड़ी जमात सक्रिय है. बड़े पैमाने पर बच्चों का कभी पा‍रिवारिक सदस्यों, कभी पारिवारिक मित्रों, कभी सगे-संबंधियों तो कभी ड्राइवरों, रसोइयों, दरवानों और नौकर-चाकरों जैसे परिवार के अन्य परिचितों द्वारा सेक्सुअल शोषण होता है. श्रीलेखा का कहना है कि समाज में बच्चे आमतौर पर ‘वल्नरबल’ यानि अरक्षित होते हैं. कि हमारे आसपास मुखौटाधारी रिश्तेदार व मित्र होते हैं. माना ऐसे लोगों से की पहचान मुश्किल है और इन लोगों से बच्चों को दूर रखना भी एक चुनौती भरा काम है. लेकिन माता-पिता इतना तो कर सकते हैं कि बच्चों को हमेशा अपनी निगरानी में रखें. निगरानी का इंतजाम करें. और जब कभी बच्चा ऐसा कुछ बताने की कोशिश करे तो उसे गंभीरता से लेते हुए उसकी बात को तरजीह दें. अनसुना न करे. न ही वहम बता कर टाल दें.

बच्चों को बनाएं जागरूक

वे यह भी कहती हैं कि बच्चों में थोड़ी समझदारी आने के साथ या फिर उनके परिचितों का दायरा बढ़ने के साथ उन्हें यह समझना जरूरी है कि छिपा कर किया गया कोई भी काम गलत होता है. अगर कोई उनके साथ कुछ इस तरह पेश आए जो उनके मन को अच्छा न लगे. कोई कुछ ऐसा काम करने को कहे जो जो करने से उनके मन का साथ न हो, या हिचक मन में आए तो यह बात वे माता-पिता को जरूर बताएं. उन्हें यह भी बताएं कि अगर कोई प्यार-दुलार करते हुए उनके गुप्तांग या बदन के किसी हिस्से को हाथ लगाएं तो तुरंत माता-पिता को बताना चाहिए. बच्चों को जागरूक बनाने का दायित्व माता-पिता का है, क्योंकि बच्चे ‘साइलेंट विक्टिम’ बनेंगे. बच्चों के उम्र के हिसाब से खुलेतौर पर या सहज रूप से बातचीत के जरिए बच्चों को सचेत करना जरूरी है.

ऐसे करें अपने नए पड़ोसी का स्वागत

कई महीनों से आप अपने सामने के फ्लैट पर ‘फौर सेल’ का बोर्ड देख रही थीं और आज अचानक उस पर ‘सोल्ड’ का बोर्ड देखा, तो सब से पहले मन में यही खयाल आया होगा कि इसे किस ने खरीदा और कौन हमारा पड़ोसी बनने आ रहा है? नए पड़ोसी के आने से मन में वैसी ही खुशी होती है जैसी मनपसंद कार गिफ्ट में मिलने पर. पड़ोसियों से मधुर संबंध सभ्य समाज की निशानी होता है. हम दोस्त तो नए बना सकते हैं, मगर पड़ोसी बदलना हमारे बस में नहीं होता.

प्रधानमंत्री की कुरसी संभालने के बाद से नरेंद्र मोदी भी पड़ोसियों से संबंध बेहतर करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. दुनिया भर के देशों में दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं. फिर हमें अपनी यानी भारतीय संस्कृति भी यही सिखाती है कि हमें अपने पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते बना कर रखने चाहिए, क्योंकि एक अच्छा पड़ोसी 10 रिश्तेदारों के बराबर होता है.

आइए, जानते हैं नए पड़ोसियों से संबंधों की शुरुआत की कहानी कहां से लिखी जा सकती है:

कौन है नया पड़ोसी

सब से पहले यह जानकारी हासिल करें कि आप का नया पड़ोसी कौन है? कोई बच्चों वाली फैमिली है, वृद्ध दंपती हैं, सिंगल पर्सन है या फिर नयानवेला जोड़ा है. इस बात की जानकारी लेने से आप को यह समझने में आसानी होगी कि आप के नए पड़ोसी को नए घर में शिफ्ट होने पर सब से पहले किस चीज की जरूरत पड़ सकती है. नए पड़ोसी को वैल्कम करने को ले कर टीवी पर आप ने एक ऐड जरूर देखा होगा, जिस में एक वृद्ध दंपती अपनी गाड़ी में सामान ले कर आते हैं और बिल्डिंग के सारे लोग एकदूसरे को उन के फोटो मैसेज कर सामान शिफ्ट करने में उन की मदद करते हैं. अगर यह सच हो तो उस वृद्ध दंपती के लिए नए घर का अनुभव कितना सुखद हो सकता है, यह आप सोच भी नहीं सकते हैं.

चायकौफी औफर करें

यदि आप ने कभी नए घर में सामान शिफ्ट किया हो तो आप को अवश्य पता होगा कि नए घर में जाना और सैटल होना कितना थका देने वाला काम होता है. नए घर में पहुंच कर अकसर ऐसा होता है कि 1 कप चाय या कौफी बनाने का इंतजाम भी एकदम से नहीं हो पाता है. ऐसे में आप के नए पड़ोसी के आने पर आप उन्हें 1 कप गरमगरम चाय या कौफी औफर कर जानपहचान शुरू कर सकती हैं. आप चाहें तो उन के लिए दोपहर या रात का खाना भी बना कर दे सकती हैं. खाना देते समय एक बात का ध्यान जरूर रखें कि पैक खाने के साथ डिस्पोजेबल प्लेट्स और गिलास भेजें ताकि अगर वे अपने बरतन न निकाल पाएं, तो खाना खाने में असुविधा न हो.

वैल्कम बास्केट

आप अपने पड़ोसी के लिए एक वैल्कम बास्केट बना कर भी उन का स्वागत कर सकती हैं. आप बाजार से एक प्यारी सी बास्केट खरीदें, उस में कुछ शोपीस सजा कर एक वैल्कम कार्ड रखें और नए पड़ोसी को औफर करें. आप इसे पड़ोसी के आने के फौरन बाद दे सकती हैं. लेकिन जिस दिन वे आएं हो सकता है शिफ्टिंग के कारण बहुत व्यस्त हों, तो आप दूसरे दिन इसे दे सकती हैं.

कोई पौधा या डायरैक्टरी भेंट करें

आप अपने पड़ोसी को कोई पौधा भी भेंट कर सकती हैं. कोई शोपीस या फूल का प्लांट एक पौट के साथ दे कर आप उन्हें अपना गार्डन बनाने में मदद कर सकती हैं. अगर वे किसी दूसरे शहर से आए हैं, तो आप उन्हें अपने शहर का मैप या अन्य जानकारी जैसे सोसाइटी में रहने वाले लोगों के फोन नंबर व पते से संबंधित डायरैक्टरी, बुक या सामान भेंट कर सकती हैं. हो सके तो पहली बार अपने पड़ोसी के साथ वहां की मार्केट या शौपिंग कौंप्लैक्स में जाएं. ऐसा करने से आप के पड़ोसी को अच्छा लगेगा और उसे सुविधा भी होगी.

व्यक्तिगत रूप से मिलें

अपने नए पड़ोसी के सैटल हो जाने के बाद जब आप उन से व्यक्तिगत रूप से मिलें तो उन के परिवार के बारे में पूछें. यदि आप घर में खिलौने देख रही हैं, तो बच्चों के बारे में पूछ सकती हैं और अपने बारे में बता सकती हैं. आप वहां टंगी किसी तसवीर के व्यक्ति के बारे में भी पूछ सकती हैं. उन के गार्डन में उगने वाले पौधों के बारे में बात कर सकती हैं और यह बता सकती हैं कि गार्डनिंग का शौक आप भी रखती हैं. अगर उन के घर में हौबी इक्यूपमैंट देख रही हैं, तो उस के बारे में जानकारी ले सकती हैं या कोई पैट हो तो उस के बारे में चर्चा कर सकती हैं. बस यह ध्यान रहे कि उन की निजी जिंदगी में दखल की जो सीमा होती है उस के भीतर ही चर्चा हो.

वैल्कम डिनर

आप अपने नए पड़ोसी को अपने घर बुला कर एक वैल्कम डिनर भी दे सकती हैं. अगर आप को उन की डाइट की चिंता है, तो आप पहले से ही उन की पसंदनापसंद पूछ कर उन के मुताबिक खाना बना सकती हैं. उन को पहले से ही आश्वस्त करें कि यह डिनर कैजुअल है. उन्हें कुछ भी गिफ्ट लाने की कोई आवश्यकता नहीं है.

इन टिप्स पर गौर कर आप जल्द ही पाएंगी कि अपने पड़ोसी से आप ने अच्छी दोस्ती कर ली है और किसी जरूरत के वक्त आप अकेली नहीं हैं.

40 के बाद भी कुछ इस तरह दिखें जवां

बेशक महिला हमेशा खूबसूरत और जवां दिखना चाहती हैं, लेकिन उम्र बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे रोका नहीं जा सकता. हालांकि मेकअप ऐसा विकल्प है, जो चेहरे से कुछ साल तक की उम्र छिपा सकता है, लेकिन चेहरे पर हमेशा मेकअप लगा कर रखना भी संभव नहीं है. 40 की उम्र पार होते ही चेहरे पर बढ़ती उम्र की लकीरें नजर आनी शुरू हो जाती हैं, जो 50 तक पहुंचतेपहुंचते गहरी होती जाती हैं. लेकिन उम्र बढ़ने के बावजूद चमकती और कसी हुई त्वचा सभी की चाहत होती है.

आमतौर पर लोग सुंदरता को कायम रखने के लिए घरेलू उपाय अपनाते हैं, लेकिन अगर घरेलू उपायों के साथ ही आज के नए जमाने की ब्यूटी टैक्नीक का भी सहारा लिया जाए तो लंबे समय तक सैलिब्रिटीज जैसी खूबसूरती बरकरार रह सकती है, जो उम्रदराज होने पर भी अपनी उम्र से छोटी नजर आती हैं. इतना ही नहीं, इस तरह की तकनीक से त्वचा की रंगत भी उजली की जा सकती है, जिसे कई बौलीवुड ऐक्ट्रैस अपना चुकी हैं. इस के लिए आप को किसी ऐक्सपर्ट और ऐक्सपीरियंस्ड डर्मैटोलौजिस्ट और कौस्मैटोलौजिस्ट का चयन करना होता है, जो आप की त्वचा और उम्र के हिसाब से उचित तकनीक का प्रयोग करे.

आइए, जानते हैं कि 40 के पार की महिलाओं के लिए कौनकौन सी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं:

त्वचा की कसावट के लिए बोटोक्स: बोटोक्स का इंजैक्शन मसल्स में लगाया जाता है. यह त्वचा पर उभरी झुर्रियों और लकीरों को मिटाने का काम करता है, इसलिए इस से उम्र कम लगने लगती है. हालांकि इस इंजैक्शन का असर स्थाई नहीं रहता. समयसमय पर इसे लगवाते रहना पड़ता है. 30 से 60 साल तक की उम्र के लोग इस का इस्तेमाल कर रहे हैं और 40 से अधिक उम्र के लोगों में इस का प्रचलन अधिक है. इस में एक सिटिंग में 8 हजार से 12 हजार तक का खर्च आता है.

फिलर्स: त्वचा में कसाव लाने व झुर्रियों को मिटाने के लिए फिलर्स का प्रयोग किया जाता है. यह भी एक तरह का इंजैक्शन होता है और त्वचा की ऊपरी सतह को ही छूता है. यह बोटोक्स की तरह त्वचा के अंदर नहीं जाता. इस की सहायता से चेहरे को आकर्षक शेप में लाया जा सकता है.

लेजर थेरैपी: उम्र के हिसाब से बनने वाले त्वचा के दागधब्बे व गड्ढे मिटाने में यह लेजर थेरैपी कारगर साबित होती है. चेहरे के अनचाहे बालों को हटाने के लिए भी इस थेरैपी का प्रयोग किया जाता है.

लाइपोसक्शन: आमतौर पर 40 की उम्र के बाद से शरीर पर चरबी बढ़ने लगती है, जिस की वजह से शरीर का आकार बेडौल नजर आता है. लाइपोसक्शन ट्रीटमैंट चरबी की समस्या से मुक्ति दिलाता है, इसलिए मोटापा से परेशान लोग इस तकनीक का सहारा लेते हैं. इस के तहत एक छोटी सी सर्जरी के जरीए पेट या शरीर के दूसरे हिस्सों से फैट को गलाया जाता है. यह काम कई बार कुछ इंजैक्शनों की मदद से भी किया जाता है. इस ट्रीटमैंट में ज्यादा कष्ट नहीं होता.

स्किन पौलिशिंग: 40 की उम्र तक आतेआते हमारी त्वचा तमाम तरह के पर्यावरण और शारीरिक बदलाव संबंधी असर झेल चुकी होती है. धूप, टैनिंग, पिगमैंटेशन, दागधब्बे, झांइयां, मुंहासे, हर रोज का प्रदूषण और धूलमिट्टी हमारी त्वचा को धूमिल, अस्वस्थ, रूखी और बेजान बना देती है. धूमिल व बेजान हो चुकी त्वचा की ऊपरी परत को हटा कर इसे दोबारा जवां और निखरी बनाने में माइक्रोडर्माऐब्रोजन के जरीए स्किन पौलिशिंग की प्रक्रिया बेहद कारगर साबित होती है. इस प्रक्रिया में त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने के लिए उस में छोटेछोटे क्रिस्टल डाले जाते हैं और उन्हें तकनीकी तरीके से बेहद सौम्यता से त्वचा पर घुमाया जाता है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आप की त्वचा को ऐक्फोलिएट और पौलिश करती है और त्वचा की अशुद्धियां निकालने की प्राकृतिक क्षमता को बढ़ाती है. आमतौर पर इसे चेहरे, गरदन, पीठ और हाथों को खूबसूरत, मुलायम और दागरहित बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

औक्सीजन इन्फ्यूजन स्किन थेरैपी: औक्सीजन न सिर्फ हमारे जीवन बल्कि शरीर के सभी अंगों की जीवनरेखा होता है. रक्तसंचार के माध्यम से शरीर के सभी हिस्सों, जिस में त्वचा भी शामिल है, तक औक्सीजन पहुंचता है. यह त्वचा की रिपेयरिंग और नवीनीकरण प्रक्रिया को बढ़ाता है और उसे फ्री रैडिकल्स से मुक्त करने में सहायक होता है. पर्यावरण संबंधी कारणों जैसे कि यूवी रेडिएशन और प्रदूषण का हमारी त्वचा और इस के रिपेयर होने एवं नवीनीकरण की प्राकृतिक क्षमता पर असर पड़ता है. औक्सीजन इन्फ्यूजन थेरैपी में त्वचा के भीतर औक्सीजन की डोज दी जाती है, जिस से इस की रिपेयरिंग और नवीनीकरण की क्षमता बढ़ती है. परिणामस्वरूप त्वचा पर से झांइयां, दागधब्बे हटते हैं और यह जवां और निखरी हुई दिखती है. इस में माइक्रोनीडलिंग जैट का इस्तेमाल करते हुए, त्वचा की अंदरूनी परत में औक्सीजन की डोज दी जाती है. यह प्रक्रिया ठीक उसी तरह से काम करती है, जैसे त्वचा के ऊपर लगाया गया कोई नमी बढ़ाने वाला तत्त्व अथवा सीरम करता है.

ब्रोलिफ्ट: ब्रोलिफ्ट यानी भौंहों को तीखापन देने के लिए भी बोटोक्स का इस्तेमाल किया जाता है. बोटोक्स जब किसी मांसपेशी में लगाया जाता है, तब यह मांसपेशी को आराम पहुंचाता है और वहां की बारीक रेखाएं और झुर्रियां हटाता है. आईब्रोज का आकार ठीक करने के लिए जब इस का इस्तेमाल होता है तब डाक्टर उन मांसपेशियों में बोटोक्स लगाते हैं, जिन के चलते भौंहें नीचे की ओर झुकी होती हैं. इस से भौंहों को ऊपर खींचने वाली मांसपेशी फांटेलिस सही ढंग से काम करती है. इस प्रक्रिया में सिर्फ कुछ मिनटों का ही समय लगता है और बेहद आसानी से भौंहों को आर्च शेप दे कर चेहरे को आकर्षक बना दिया जाता है.

त्वचा की चमक के लिए फिलर्स: उम्र बढ़ने पर प्रतिदिन के काम और औफिस व परिवार की जिम्मेदारी निभाना काफी थका देने वाला होता है. साथ ही मौसम की मार, नींद पूरी न होने और खराब खानपान से भी त्वचा पर खराब असर पड़ता है. परिणामस्वरूप त्वचा अपनी प्राकृतिक चमक खो देती है और उस पर बारीक रेखाएं नजर आने लगती हैं. ह्यालुरौनिक ऐसिड बेस्ड फिलर जैसे कि जुवेडर्म रिफाइन का एक सैशन त्वचा की खोई रंगत और चमक लौटा सकता है. अगर त्वचा का उभार कम हो गया है, तो जुवेडर्म वौल्यूमा अपने हाइड्रेटिंग और फिलिंग ह्यालुरौनिक ऐसिड जैल के गुणों से इसे वापस जवां बना देता है. यह प्रक्रिया आंखों के नीचे से काले घेरे व बारीक लाइनें हटाने और आप के होंठों को दिलकश बनाने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है.

स्किन लाइटनिंग: स्किन लाइटनिंग के जरीए फ्रैश और ग्लोइंग लुक आसानी से मिल सकता है. त्वचा के प्रकार के अनुसार डाक्टर यह सुनिश्चित करता है कि स्किन लाइटिंग के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया जैसे टौपिकल कौस्मैटिक, कैमिकल पील या लेजर का प्रयोग किया जाएगा. स्किन लाइटनिंग ट्रीटमैंट की शुरुआत से पहले उस के फायदे और साइट इफैक्ट की जानकारी भी ले लेनी जरूरी होती है. ऐडवांस स्किन लाइटिंग ट्रीटमैंट के लिए स्किन टाइप के अनुसार 5-6 सैशन की आवश्यकता होती है. ट्रीटमैंट के कुछ दिनों बाद ही आप को अपनी त्वचा हलकी और उजली नजर आने लगेगी. इस के साथ ही अगर किसी को ऐक्ने, ओपन पोर्स, झुर्रियों या फोटो डैमेज जैसी समस्या है, तो लाइनिंग इफैक्ट के कारण इस में काफी फायदा नजर आएगा. ऐडवांस लेजर में विभिन्न प्रकार के पील्स और कौमेलन ट्रीटमैंट का प्रयोग किया जाता है.

ऐंटीऐजिंग: ऐंटीऐजिंग थेरैपी ओवरऔल फिजिकल कंडीशन को इंपू्रव करती है. परिणामस्वरूप थकान कम महसूस होती है. चाल और पोस्चर में परिवर्तन आता है और कार्यक्षमता बढ़ती है. ऐंटीऐजिंग ट्रीटमैंट के अंतर्गत चेहरे और शरीर के कुछ लक्षणों जैसे फाइन लाइंस, झुर्रियां, ऐज स्पौट, अनईवन स्किन टोन आदि का उपचार किया जाता है.

इलैक्ट्रोलिसिस: इस विधि के जरीए अनचाहे बालों को पूरी तरह जड़ से निकाल दिया जाता है. इस में एक बहुत महीन इलैक्ट्रिक सूई को बालों के रोम में डाल देते हैं, जो बालों को जला कर बाहर निकाल देती है. यह प्रक्रिया महंगी है और इसे विशेषज्ञ से ही करवाएं. जरा सी गलती आप की त्वचा खराब कर सकती है.

लेजर तकनीक: अनचाहे बालों को लेजर द्वारा स्थाई तौर पर हटाया जा सकता है. इस में लगभग 7 से 8 सिटिंग्स लगती हैं. लेजर हेयर रिमूवल की प्रक्रिया में हेयर फौलिकल्स को स्थाई रूप से हटा दिया जाता है. हेयर फौलिकल या बालों की जड़ ही वह जगह होती है जहां से बाल दोबारा उग जाते हैं. यही कारण है कि शेविंग या वैक्सिंग के बाद दोबारा बाल आ जाते हैं. इस प्रक्रिया में हाई ऐनर्जी वाले लेजर का इस्तेमाल कर के हेयर फौलिकल्स को स्थाई रूप से खत्म कर दिया जाता है. ऐसे में बाल वापस नहीं आते हैं. यह प्रक्रिया कई सिटिंग्स में पूरी होती है.

अनचाहे बालों के लिए: अनचाहे बाल महिलाओं की एक आम समस्या हैं. इन को हटाने के तमाम उपाय किए जाते हैं, लेकिन ये दोबारा आ जाते हैं. अनचाहे बालों से छुटकारा पाने के लिए ऐसे उपाय अपनाने चाहिए, जिस से आप की त्वचा को भी कोई नुकसान न पहुंचे और आप की खूबसूरती भी बरकरार रहे. अनचाहे बालों को हटाने का एक बहुत ही लाभकारी और सब से ज्यादा इस्तेमाल में आने वाला तरीका है वैक्सिंग. वैक्सिंग से अनचाहे बाल पूरी तरह साफ हो जाते हैं और त्वचा मुलायम हो जाती है. चेहरे के बाल हटाने के लिए कटोरी वैक्सिंग की जाती है. वैक्सिंग के बाद बाल लंबे समय तक दोबारा नहीं आते, क्योंकि इस में बालों को त्वचा के अंदर से जड़ों से निकाला जाता है.

– डा. रोहित बतरा

फेसबुक की दोस्ती में तबाह हुआ परिवार

28 साल की अर्चना को जेल में एक सप्ताह तक का समय बीत चुका था. उसे अपने किये काम पर अब तक कोई पछतावा नहीं हुआ था. 8 वें दिन उसे पता चला कि जेल में बंद उसके साथी अजय से मिलने उसका भाई आया था. जो जेल में उसके लिये जरूरत का सामान लाया था. जिसमें मंजन, दांत साफ करने का ब्रश और कपडे जैसे जरूरत के छोटे छोटे सामान थे. 22 जनवरी को जब पुलिस ने अर्चना को अपने पति 40 साल के ओमप्रकाश यादव और 4 साल के बेटे नितिन की हत्या के आरोप में पकडा तो कुछ समय तक अर्चना के पिता और दूसरे संबंधी उसके बचाव की कोशिश कर रहे थे. पुलिस ने जब अर्चना और अजय को पकड कर कचहरी में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया तो वहां केवल अर्चना की बहनें ही साथ थी. थाना और कचहरी तक अर्चना ने खुद को संभाल रखा था. जेल में समय बीता तो उसे लगा कि अब पूरी दुनिया में उसका कोई नहीं है. उस दिन अर्चना फूटफूट कर रोई.

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की रहने वाली अर्चना यादव की शादी ओमप्रकाश यादव से हुई थी. ओमप्रकाश गोरखपुर में आंखों के डाक्टर थे. अर्चना से उनकी दूसरी शादी थी. अर्चना का घरेलू काम में मन नहीं लगता था, वह राजनीति में अपना कैरियर बनाना चाहती थी. इसके लिये वह प्रयास करने मे लगी थी. अर्चना अपने खाली समय में सोशल मीडिया में काफी एक्टिव रहती थी. फेसबुक और वाट्सअप पर उसने कई दोस्त बना रखे थे. इनमें शिकोहाबाद का रहने वाला अजय यादव भी था. अजय ने अपने फेसबुक पर मुलायम सिंह यादव, शिवपाल, डिंपल और अखिलेश यादव के साथ अपनी फोटो लगा रखी थी. अजय अपने को मुलायम सिंह यादव यूथ बिग्रेड का सचिव बताता था. अर्चना ने उसे देखकर दोस्ती कर ली. फेसबुक से शुरू हुई यह दोस्ती फोन वाट्सअप से होते हुये शारीरिक संबंधों तक पहुच गई. अजय ने अर्चना को कहा था कि वह समाजवादी पार्टी में उसको जगह दिला देगा.

अर्चना के स्वभाव को उसका पति पंसद नहीं कर रहा था. वह बारबार अर्चना को मना कर रहा था. इससे अर्चना को परेशानी होने लगी. इससे दोनो के बीच टकराव होने लगा अजय से दोस्ती के बाद पति से अर्चना दूरियां बढ रही थी. 20 जनवरी को पति और और बेटे की हत्या करने के बाद अर्चना ने आरोप दूसरे पर लगाने शुरू किये. पुलिस ने फोन की जांच और दूसरे सबूतों के आधर पर अर्चना और अजय को जेल भेजा. अर्चना से जब यह सवाल किया गया कि तो उसने कहा ‘मेरा बेटा था मैने मार दिया’. जेल में रहने के बाद अब अर्चना को अपने किये पर पछतावा हो रहा है. अर्चना ने अपने मित्र अजय का बचाव करने का प्रयास भी किया. अब ऐसा पछतावा करने से क्या लाभ?

सरकार का किसानों को फसल बीमा का तोहफा

सरकार ने नए साल के मौके पर देश के किसानों को खास तोहफा दिया है. इस का लाभ देश भर के 14 करोड़ किसान उठा सकेंगे. सरकार की इस घोषणा से मकर संक्रांति व पोंगल जैसे त्योहारों पर किसानों की खुशी दोगुनी हो गई.

नई फसल बीमा योजना को ले कर सरकार पूरी सावधानी बरत रही है, ताकि इस योजना का हश्र भी पिछली योजनाओं जैसा ही न हो जाए. पिछले 3 दशकों से चलाई जा रहीं अलग अलग फसल बीमा योजनाएं केवल 23 फीसदी किसानों तक ही पहुंच पाई हैं. इन योजनाओं में ज्यादातर उन किसानों को ही शामिल किया गया है, जिन्होंने बैंकों से कृषि लोन लिया था. इसलिए इसे फसल बीमा की जगह बैंक ऋण बीमा योजना के तौर पर ही जाना गया. प्रस्तावित मसौदे में सभी किसानों को शामिल करने के लिए इस का दायदा बढ़ाया गया है. सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित नई फसल बीमा योजना में 50 फीसदी से अधिक किसान शामिल हो जाएंगे. इस के लिए बीमा प्रीमियम का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा केंद्र व राज्य सरकारें वहन करेंगी. बीमा योजना की घोषणा के बाद सब्सिडी का बोझ देख कर राज्य सरकारें विरोध जता सकती हैं. किसानों को प्रीमियम के रूप में बीमित राशि का डेढ़ से ढाई फीसदी ही देना होगा.

जमींकंद की खेती

जमींकंद को पहले छोटे पैमाने पर ही उगाया जाता था, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने लगातार खोज के बाद इस की कई उन्नतिशील प्रजातियां भी विकसित की हैं. अब इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से भी उगाया जाने लगा?है. जमींकंद की देशी प्रजातियों में कड़वापन व चरपरापन ज्यादा पाया जाता है, जबकि उन्नत प्रजातियों में चरपरापन व कड़वापन न के बराबर होता है. बाजार में जमींकंद की भारी मांग को देखते हुए इस की व्यावसायिक खेती बेहद लाभदायक साबित हो रही?है जमींकंद की खेती के लिए नमगरम व ठंडेसूखे दोनों मौसमों की जरूरत पड़ती है. इस से जमींकंद के पौधों व कंदों का सही तरीके से विकास होता है. बोआई के बाद जमींकंद के बीजों को अंकुरण के लिए ऊंचे तापमान की जरूरत होती है, जबकि पौधों की बढ़वार के लिए समान रूप से अच्छी बारिश जरूरी होती?है. कंदों के विकास के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है

जमीन का चयन : जमींकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है, क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों की बढ़ोतरी तेजी से होती है. जमींकंद के लिए जमीन की जलधारण कूवत अच्छी होनी चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि चिकनी व रेतीली जमीन में जमींकंद की फसल न ली जाए, क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों का विकास रुक जाता है.

जमीकंद की रोपाई से पहले खेत की कल्टीवेटर या रोटावेटर से जुताई कर के उस में पाटा लगा देना चाहिए. अच्छी पैदावार के लिए बोआई के समय ही 20 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद को खेत में बिखेर कर मिला देना चाहिए.

प्रजातियों का चयन : जमींकंद की देशी प्रजाति तो हमेशा उगाई जाती रही है, लेकिन व्यावसायिक रूप से इस की 3 प्रजातियां अभी तक ज्यादा सही पाई गई हैं.

गजेंद्र 1?: यह जमींकंद की सर्वाधिक उत्पादन वाली प्रजाति मानी जाती है. इस प्रजाति में चरपरापन नहीं होता है, क्योंकि इस में कैल्शियम व आक्सैट की मात्रा कम पाई जाती है. इस से जीभ व गले में जलन नहीं होती है. यह प्रजाति खाने में सब से अच्छी होती है, इसलिए इस का बाजार भाव अन्य प्रजातियों के मुकाबले ज्यादा होता है. इस प्रजाति के गूदे का रंग हलका गुलाबी होता है. इस के खाली खेत में गेहूं की बोआई समय से की जा सकती है. इस प्रजाति की औसत उपज 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

संतरा गाची : इस प्रजाति के पौधों की बढ़वार तेजी से होती है. इस के कंदों में चरपरापन ज्यादा पाया जाता है. इस की औसत उपज 50-75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

कोववयूर : यह ज्यादा उपज देने वाली प्रजाति है. इस के पौधों की बढ़वार संतरा गाची की तरह ही होती है. इस की औसत उपज 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

उपरोक्त तीनों प्रजातियों की बोआई का सही समय उत्तर भारत में फरवरी से मार्च के दौरान व दक्षिण भारत में मई में होता है.

बोआई विधि : जमींकंद की बोआई के लिए पहले से तैयार किए गए खेत में 3-3 फुट की दूरी पर 30 सेंटीमीटर गहरा, लंबा व चौड़ा गड्ढा खोद लिया जाता है. इस प्रकार प्रति हेक्टेयर करीब 10 हजार गड्ढे तैयार हो जाते?हैं. खेत में तैयार छोटे कंदों जिन का औसत भार 250 ग्राम का होता है या बड़े कंदों के 500 ग्राम तक के टुकड़े काट कर खोदे गए गड्ढों में रोप देते हैं. रोपे गए स्थान पर पिरामिड के आकार में मिट्टी चढ़ा देते हैं और उसे घासफूस से ढक देते हैं ताकि खेत में से नमी न खत्म होने पाए. इस से कंदों में अंकुरण जल्दी होता?है.

बीज की मात्रा : बोआई के लिए 500 ग्राम तक के बीज (कंदों के टुकड़े) ठीक रहते हैं. इस प्रकार 1 हेक्टेयर खेत के लिए 50 क्विंटल बीज की जरूरत पड़ती है. गरमियों में मानसून से पहले 1 बार सिंचाई जरूरी होती है. कम बारिश की हालत में समयसमय पर सिंचाई करते रहना चाहिए. नमी बनाए रखने के लिए बोआई के बाद खेत में भूसी की परत, पुआल या सूखी पत्तियां बिछा देनी चाहिए.

खरपतवार : जमींकंद की फसल के साथ खरपतवार का उग आना आम बात है. ऐसे में पूरी फसल के दौरान 2-3 बार निराईगुड़ाई जरूर करनी चाहिए. पहली निराईगुड़ाई 40-60 दिनों बाद व दूसरी 80-90 दिनों बाद करनी चाहिए. हर गुड़ाई के बाद पौधों पर मिट्टी जरूर चढ़ाएं.

कीट : कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया (बस्ती) के डा. प्रेमशंकर के अनुसार जमींकंद की फसल में जुलाई से सितंबर महीनों के दौरान तंबाकू की सूंडी का प्रकोप देखा गया है. यह पत्तियों को खा कर हानि पहुंचाती है. इस की रोकथाम के लिए मेथेमिल लिक्विड दवा का छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा एंडोकार्ग दवा का छिड़काव भी कारगर होता है.

रोग : जमींकंद की फसल को 2 तरह के रोग नुकसान पहंचाते हैं. झुलसा रोग फाइटोफ्थोरा कोलोकेमी नामक फफूंद के कारण लगता?है. इस से जमींकंद की पत्तियां झुलस जाती हैं और तना गलने लगता है. इस के अलावा कंदों की बढ़वार भी रुक जाती है. दूसरा रोग पत्ती व कंद विगलन का होता है. इस से पत्तियां व कंद सड़ने लगते हैं. इन दोनों रोगों की रोकथाम के लिए सिक्सर नाम के रसायन की 300 ग्राम मात्रा को 200-300 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए. दूसरी दवा क्यूरेट गोल्ड की

600 ग्राम मात्रा को 200-250 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई : जमींकंद की फसल अक्तूबर महीने से खुदाई के लिए तैयार हो जाती है. इसे हर हाल में नवंबर से दिसंबर तक खोद लेना चाहिए. खुदाई करते समय कंदों को कटने से बचाने पर पूरा ध्यान देना चाहिए. कंदों की खुदाई से 20 दिन पहले ही खेत की सिंचाई बंद कर देनी चाहिए.

उपज व लाभ : जमींकंद की उपज फसल की देखरेख व प्रजाति पर निर्भर करती है. अगर 500 ग्राम भार के बीजों की बोआई की गई है, तो प्रति हेक्टेयर 400 क्विंटल की उपज मिलती?है, जो 20-40 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बेची जा सकती है. जमींकंद की खेती के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए डा. दिनेश कुमार यादव के मोबाइल नंबर 9451997620 पर संपर्क करें. फसलसुरक्षा के बारे में डा. प्रेमशंकर के मोबाइल नंबर 9935668097 पर संपर्क किया जा सकता है.

फसल को दीमक से बचाने में कारगर सफेदा की लकड़ी

फसल को खेतखलिहान में दीमक से महफूज रखने और पैदावार को नुकसान से बचाने के लिए राजस्थान के सीकर जिले की एक महिला किसान भगवती देवी की देसी विधि कारगर साबित हुई है. यह विधि दूसरे किसान भी अपने खेतों में अपना कर दीमक से होेने वाले नुकसान से बच सकते हैं.

जयपुर में किसानों की एक गोष्ठी में भाग लेने आई भगवती देवी ने बताया, ‘सीकर जिले के दांता में मेरा खेत है. मेरे पति सुंडाराम खेती के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किसान हैं. उन के साथ रह कर मुझे भी बहुतकुछ सीखने, समझने और करने का मौका मिला है. खेतों में दीमक की समस्या आम बात है. मेरे खेत में भी यह समस्या थी, लेकिन अब नहीं है.

‘गांवों में जलाने के लिए खेतों व जंगलों से लकडि़यां इकट्ठा की जाती हैं. मैं भी जलाने के लिए लकडि़यां लाती थी. एक दिन मैं ने देखा कि जलाने के लिए जमा की गई बबूल, खेजड़ी, बेर, आड़ू, शीशम व यूकलिप्टस आदि की लकडि़यों में से यूकलिप्टस की लकड़ी में  दीमकें लगी हुई थीं और वह भी बहुत ज्यादा तादाद में. यह देख कर मेरे दिमाग में खयाल आया कि अगर यूकलिप्टस की लकडि़यों के टुकड़े खेत में खड़ी फसलों के आसपास डाल दिए जाएं, तो फसल में लगने वाली दीमक से फसल को बचाया जा सकता है.

‘मैं ने इस बारे में अपने पति से सलाहमशविरा किया और प्रयोग के तौर पर अपने खेत में खड़ी बाजरे की फसल के पास यूकलिप्टस (जिसे बोलचाल की जबान में सफेदा कहते हैं) की लकड़ी के छोटेछोटे टुकड़े कुछकुछ दूरी पर रख दिए. कुछ दिनों बाद मैं ने देखा कि डाले गए लकड़ी के टुकड़ों में काफी तादाद में दीमकें लगी हुई थीं और फसल दीमकों से बची हुई थी.

‘इस के बाद अगले रबी के मौसम में गेहूं की फसल के दौरान भी यह विधि इस्तेमाल की. गेहूं की फसल भी दीमकों से मुक्त रही. खेत में खड़ी फसल से 4 इंच दूरी पर रखी गई सफेदा की लकड़ी के नीचे बहुत ज्यादा संख्या में दीमकें थीं, पर गेहूं के पौधों के पास वे बिलकुल नहीं थीं. हम ने अपने खेत में गेहूं की बोआई मिर्ची की फसल के बाद की थी. इस लिहाज से गेहूं की फसल 1 महीना देरी से तैयार होनी थी. देरी से फसल तैयार होने पर गरमी बढ़ जाती है और ऐसी हालत में दीमक लगने का खतरा बढ़ जाता है. मगर गरमी बढ़ने के बावजूद हमारी फसल दीमक से बची रही. इस से यह बात पक्की हो गई कि यह विधि कारगर साबित हो सकती है.

‘आमतौर पर खेत में फसलों को दीमक से बचाने के लिए गोबर और मक्का निकालने के बाद बचे हुए खाली भुट्टों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन फिर भी दीमक का थोड़ाबहुत असर फसल पर हो ही जाता है. लेकिन हमारे द्वारा खेत में सफेदा की लकड़ी के टुकड़ों से किया गया बंदोबस्त एकदम सफल रहा. बाद में हम ने अपनी इस सफलता की जानकारी कृषि विभाग के स्थानीय अधिकारियों व कृषि विज्ञान केंद्र फतेहपुर शेखावटी के वैज्ञानिकों को भी दी.

‘दीमक रोधी इस विधि के लिए हम ने अपनी फसल की सिंचाई फव्वारा विधि से की, जिस में प्रति एकड़ में 32 टोटियां रखी. 1 टोंटी के क्षेत्र में सफेदा की लकड़ी का 2 फुट लंबा व 3 इंच मोटा टुकड़ा रखा.लकड़ी के ये टुकड़े बराबर दूरी पर रखे. इन टुकड़ों की कीमत करीब 10 रुपए प्रति टुकड़ा आई. इस तरह 1 एकड़ में रखे 32 टुकड़ों पर करीब 320 रुपए खर्च हुए. लकड़ी के इन टुकड़ों को 3 फसलों तक इस्तेमाल किया जा सकता है. इस के बाद सफेदा की नई लकड़ी के टुकड़े रखने पड़ते हैं.’  पूरी जानकारी के लिए इस पते पर संपर्क करें : भगवती देवी, पत्नी सुंडाराम वर्मा, गांव : दांता, तहसील: दांता रामगढ़, जिला : सीकर, राजस्थान. फोन नंबर : 01577-270074.

तरल जैविक उर्वरक से मिले फसल को फायदा

आज की खेती में रासायनिक खादों का बहुत इस्तेमाल किया जाने लगा?है, जिन से पैदावार में इजाफा जरूर होता है, लेकिन खेती को काफी नुकसान भी होते हैं. रासायनिक खादों से हमें केवल एकदो तरह के ही तत्त्व मिलते?हैं, जबकि हमारी खेती की जमीन को अन्य तत्त्वों की भी जरूरत होती?है. इन तत्त्वों की कमी के कारण मिट्टी की सेहत पर भी खराब असर पड़ता है. इसलिए खेती में हमें जैविक उर्वरक भी इस्तेमाल करने चाहिए.

क्यों जरूरी हैं जैविक उर्वरक

खेती की जमीन की पैदावार कूवत और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए रासायनिक खादों के साथ जैविक उर्वरकों का इस्तेमाल करने की भी खास जरूरत?है, जिस से खेत की मिट्टी की सेहत बनी रहे और फसल से अच्छी पैदावार मिले. पिछले कुछ समय तक जैविक उर्वरक पाउडर के रूप में आते?थे, लेकिन अब ये जैविक उर्वरक तरल रूप में भी आने लगे हैं.

क्या है तरल जैविक उर्वरक

जैविक तरल उर्वरक जीवाणुओं के ऐसे उत्पाद हैं, जो लंबे समय तक सक्रिय रह कर मिट्टी के पोषक तत्त्वों को बनाए रखते?हैं और खेत की फसल की पैदावार बढ़ाते?हैं. साथ ही मिट्टी की उर्वरक कूवत भी बढ़ाते हैं. तरल जैविक उर्वरक पाउडर वाले उर्वरकों से ज्यादा प्रभावी हैं. नेशनल फर्टीलाइजर्स 3 प्रकार के तरल जैविक उर्वरक बना रही?है, जो आने वाले वक्त में किसानों के लिए कारगर साबित होंगे.

किसान राइजोबियम तरल

* यह तरल उर्वरक खासकर दलहनी फसलों जैसे चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, बरसीम, सोयाबीन वगैरह के लिए उपयोगी है.

* इस तरल उर्वरक को बीजों के साथ मिला कर फसल बोने पर जीवाणु जड़ों में घुस कर छोटीछोटी गांठें बना लेते हैं, जिन में बहुत मात्रा में जीवाणु रहते हैं. इन से पौधों को पोषण मिलता है, जिस से उपज में बढ़त होती है.

* राइजोबियम जीवाणुओं से जमीन को पोषक तत्त्व मिलते हैं, जिन से पौधों की जड़ों का विकास होता है व पौधों को मजबूती मिलती है.

किसान एजोटोबेक्टर तरल

यह गैरदलहनी फसलों जैसे गेहूं, धान, ज्वार, बाजरा, कपास, गन्ना, मक्का, आलू, सब्जियों व फलों के लिए उपयोगी है.

* इस के प्रयोग से पौधों का अंकुरण जल्दी व स्वस्थ होता?है.

* फसल को अनेक रोगों से मुक्त रखता है.

* इस के प्रयोग से 20 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की बचत होती?है.

* फसल में 10 से 20 फीसदी की पैदावार बढ़ती?है.

किसान पीएसबी तरल उर्वरक

* मिट्टी के पीएच मान को मुनासिब रखता?है.

* इस के प्रयोग से फास्फोरस की 25 से 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की बचत होती है.

* जड़ों का अच्छा विकास होता है.

* पैदावार में 10 से 20 फीसदी बढ़ोतरी होती?है.

* सभी फसलों के लिए अच्छा है.

तरल जैविक उर्वरकों की खासीयतें

* तरल जैविक उर्वरक 3 गुना ज्यादा प्रभावशाली होते हैं व इन में 45 से 50 डिगरी तापमान सहने की कूवत होती?है.

तरल जैविक प्रयोग में खास सावधानियां

* राइजोबियम तरल जीवाणु का इस्तेमाल उसी फसल के लिए करें, जिस फसल का नाम इस पर लिखा हो.

* तरल जैविक उर्वरक को अन्य किसी कीटनाशक दवा या अन्य किसी रासायनिक खाद के साथ मिला कर इस्तेमाल न करें.

* तरल जैविक उपचारित बीज को छाया में ही रखें और बोआई वाले दिन ही बीज को उपचारित करें.

कॉमेडी क्लासेज में पहुंची ‘डायरेक्ट इश्क’ की टीम

प्रदीप शर्मा निर्मित फिल्म ‘डायरेक्ट इश्क’ 19 फरवरी को रिलीज़ होगी. इस फिल्म को प्रमोट करने रजनीश दुग्गल, निधि सुब्बैयह और स्वाति शर्मा ‘शो’ में पहुंचे, जिसे एंकर कर रहे थे करन वाही और सुगंधा मिश्रा.

शो में स्वाति ने ‘डायरेक्ट इश्क’ गाना गाया और रजनीश दुग्गल और निधि ने परफॉर्म किया. एपिसोड 14 फ़रवरी को दिखाया जायेगा. 

 

वॉर्न के आरोपों पर बोले स्टीव वॉ, नहीं बनाया ‘बलि का बकरा’

स्टीव वा ने महान स्पिनर शेन वार्न पर पलटवार किया है, जिन्होंने दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को यह कहकर बढ़ा दिया था कि आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान एक स्वार्थी क्रिकेटर हैं.

वा ने अपने जवाब में कहा कि वेस्टइंडीज में 1999 में हुए टेस्ट के लिए जब उन्होंने इस लेग स्पिनर को टीम से बाहर किया था तो वह सिर्फ एक कप्तान के रूप में अपना काम कर रहे थे.

वार्न ने इससे पहले कहा था कि वह जिन क्रिकेटरों के साथ खेले उनमें वा सबसे स्वार्थी थे. इस लेग स्पिनर ने यह भड़ास 17 साल पहले वेस्टइंडीज दौरे के दौरान अंतिम टेस्ट की अंतिम एकादश से उन्हें बाहर किए जाने को लेकर निकाली थी.

वा ने इसके बाद अगले दिन सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘मैं जवाब के साथ उसके बयान को सही नहीं ठहराना चाहता.’ वा ने हालांकि इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वार्न को बाहर करना कड़ा फैसला था लेकिन कप्तान के रूप में उनके काम का हिस्सा था. ट्रिपल एम कमर्शियल रेडियो ने वा के हवाले से कहा, ‘ईमानदारी से कहूं तो शेन को ही नहीं बल्कि किसी भी खिलाड़ियों को बाहर होने के लिए कहना आसान नहीं होता.’

वा ने कहा, ‘एडम डेल या ग्रेग ब्लेवेट को भी यह कहना आसान नहीं था कि उन्हें टेस्ट मैच के लिए बाहर किया गया है. मुझे कई खिलाड़ियों को यह कहना होता था कि वे नहीं खेल रहे.’ उन्होंने कहा, एक कप्तान के रूप में यह सबसे मुश्किल काम था. लेकिन यही कारण है कि आप कप्तान हो, लोग आपसे उम्मीद करते हैं कि आप टीम के फायदे के लिए कड़े फैसले करोगे.’

वा कहा, ‘आपको कई बार ऐसा करना पड़ता है और आपको तैयार रहना चाहिए कि सभी लोग आपको पसंद नहीं करेंगे.’ वार्न ने रीयलिटी टीवी शो ‘आई एम सेलीब्रिटी. गेट मी आउट आफ हियर’ में हिस्सा लेने के दौरान कहा था कि वह उन्हें बाहर करने के फैसले से ‘काफी निराश’ थे और महसूस कर रहे थे कि वा ने उन्हें ‘बलि का बकरा’ बनाया 

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