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वॉर्न के आरोपों पर बोले स्टीव वॉ, नहीं बनाया ‘बलि का बकरा’

स्टीव वा ने महान स्पिनर शेन वार्न पर पलटवार किया है, जिन्होंने दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को यह कहकर बढ़ा दिया था कि आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान एक स्वार्थी क्रिकेटर हैं.

वा ने अपने जवाब में कहा कि वेस्टइंडीज में 1999 में हुए टेस्ट के लिए जब उन्होंने इस लेग स्पिनर को टीम से बाहर किया था तो वह सिर्फ एक कप्तान के रूप में अपना काम कर रहे थे.

वार्न ने इससे पहले कहा था कि वह जिन क्रिकेटरों के साथ खेले उनमें वा सबसे स्वार्थी थे. इस लेग स्पिनर ने यह भड़ास 17 साल पहले वेस्टइंडीज दौरे के दौरान अंतिम टेस्ट की अंतिम एकादश से उन्हें बाहर किए जाने को लेकर निकाली थी.

वा ने इसके बाद अगले दिन सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘मैं जवाब के साथ उसके बयान को सही नहीं ठहराना चाहता.’ वा ने हालांकि इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वार्न को बाहर करना कड़ा फैसला था लेकिन कप्तान के रूप में उनके काम का हिस्सा था. ट्रिपल एम कमर्शियल रेडियो ने वा के हवाले से कहा, ‘ईमानदारी से कहूं तो शेन को ही नहीं बल्कि किसी भी खिलाड़ियों को बाहर होने के लिए कहना आसान नहीं होता.’

वा ने कहा, ‘एडम डेल या ग्रेग ब्लेवेट को भी यह कहना आसान नहीं था कि उन्हें टेस्ट मैच के लिए बाहर किया गया है. मुझे कई खिलाड़ियों को यह कहना होता था कि वे नहीं खेल रहे.’ उन्होंने कहा, एक कप्तान के रूप में यह सबसे मुश्किल काम था. लेकिन यही कारण है कि आप कप्तान हो, लोग आपसे उम्मीद करते हैं कि आप टीम के फायदे के लिए कड़े फैसले करोगे.’

वा कहा, ‘आपको कई बार ऐसा करना पड़ता है और आपको तैयार रहना चाहिए कि सभी लोग आपको पसंद नहीं करेंगे.’ वार्न ने रीयलिटी टीवी शो ‘आई एम सेलीब्रिटी. गेट मी आउट आफ हियर’ में हिस्सा लेने के दौरान कहा था कि वह उन्हें बाहर करने के फैसले से ‘काफी निराश’ थे और महसूस कर रहे थे कि वा ने उन्हें ‘बलि का बकरा’ बनाया 

लगातार 100 टेस्ट खेल ब्रैंडन मैक्कुलम ने रचा इतिहास

न्यूजीलैंड के कप्तान ब्रैंडन मैक्कुलम लगातार सौ टेस्ट मैच खेलने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए हैं. शुक्रवार को वेलिंगटन के बेसिन रिजर्व पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला टेस्ट शुरू होते ही उन्होंने यह इतिहास रच दिया.

वैसे पदार्पण के बाद से लगातार सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने का कीर्तिमान अभी भी मैक्कुलम के नाम पर ही दर्ज है. ब्रैंडन ने जब पिछले वर्ष दिसंबर में श्रीलंका के खिलाफ दूसरा टेस्ट खेला था तो उन्होंने एबी डी'विलियर्स के रिकॉर्ड को तोड़ा था. उनका वह पदार्पण के बाद से लगातार 99वां टेस्ट मैच था.

34 वर्षीय मैक्कुलम ने 10 मार्च 2004 को हैमिल्टन में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट पदार्पण किया था. आज के टेस्ट से पहले वे लगातार 99 टेस्ट मैच खेल चुके हैं. इसमें उन्होंने 38.48 की औसत से 6273 रन बनाए हैं. इनमें 11 शतक और 31 अर्द्धशतक शामिल हैं.

विकेटकीपर के रूप में उन्होंने टेस्ट मैचों में 205 शिकार (194 कैच और 11 स्टम्पिंग) किए हैं. वे टेस्ट मैचों में एक विकेट भी हासिल कर चुके हैं. उनका वन-डे और टी-20 करियर समाप्त हो चुका है. उन्होंने 260 वन-डे में 30.41 की औसत से 6083 रन बनाए और 71 टी-20 मैचों में 35.66 की औसत से 2140 रन बनाए.

राहुल द्रविड़ चौथे नंबर पर
– दक्षिण अफ्रीका के एबी डी'विलियर्स ने दिसंबर 2004 में टेस्ट पदार्पण के बाद से लगातार 98 टेस्ट खेले.

– इस सूची में तीसरे क्रम पर पूर्व ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर एडम गिलक्रिस्ट हैं, जिन्होंने नवंबर 1999 में टेस्ट पदार्पण के बाद से लगातार 96 टेस्ट मैच खेले.

– भारत के राहुल द्रविड़ इस मामले में 93 टेस्ट के साथ चौथे स्थान पर है.

– वैसे यदि करियर के दौरान कभी भी लगातार सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने की बात की जाए, तो यह रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया के एलन बॉर्डर के नाम दर्ज है जिन्होंने लगातार 153 टेस्ट मैच खेले थे. इस मामले में इंग्लैंड के कप्तान एलिस्टेयर कुक 124 टेस्ट खेलकर दूसरे स्थान पर है.

 

 

 

 

गेहूं का जहरीला प्रोटीन ग्लूटेन शरीर के लिए घातक

अगर अचानक डाक्टर किसी से गेहूं की रोटी खाना बंद करने के लिए कहे और बताए कि यह आप के लिए जहर है तो एकबारगी सुनने वाला चौंक जाएगा. सदियों से तो लोग गेहूं की ही रोटी खाते आ रहे हैं. भला रोजरोज मक्का, रागी, ज्वार, बाजरा या चने की रोटी खाई जाती है क्या?

गेहूं की रोटी खाने से मना करने की वजह है गेहूं में पाया जाने वाला एक प्रोटीन जो गेहूं के अलावा जौ, राई व टिट्रिकेल (गेहूं और राई के संयोग से तैयार एक प्रजाति) में भी पाया जाता है. इस प्रोटीन को ग्लूटेन कहते हैं. यही वह प्रोटीन है, जो गेहूं के आटे को गूंधने पर उसे बांध देता है और उसे बेल कर रोटी या पूरी वगैरह बनाई जाती हैं.

जिन अनाजों में यह ग्लूटेन प्रोटीन नहीं पाया जाता है, उन का आटा गूंधना और रोटी बनाना कठिन होता है. लेकिन भारत के गांवों में ऐसे अनाजों की रोटियां भी खूब खाई जाती हैं. अब सेहत का खयाल रखने वाले शहरी लोगों ने भी ऐसे अनाजों को अपने भोजन में शामिल कर लिया है ग्लूटेन प्रोटीन सीलिएक रोग से पीडि़त लोगों के लिए काफी खतरनाक होता है. सीलिएक रोग से पीडि़त लोगों को गेहूं की रोटी खाने से पेट में अफरा, गैस, डायरिया, उल्टी, माइग्रेन (सिर दर्द) और जोड़ों के दर्द की तकलीफ हो सकती है.

सीलिएक रोग सीधे छोटी आंत की पाचनक्रिया को प्रभावित करता है. डाक्टरों के मुताबिक सीलिएक रोग एक लाइलाज बीमारी है, जिस से बचने के लिए परहेज ही इकलौता रास्ता है. यही वजह है कि आज बाजार में ग्लूटेनफ्री आटा भी मिलता है, जिसे सफेद चावल के आटे, आलू के स्टार्च, टैपियोका के स्टार्च, ग्वार गम और नमक मिला कर बनाया जाता?है. गेहूं खाने का खास अनाज है, जो 20 फीसदी से ज्यादा ऊर्जा व पोषक तत्त्वों की आपूर्ति करता है. इनसान कम से कम पिछले 10 हजार सालों से गेहूं के साथ ग्लूटेन को भी इस्तेमाल करता चला जा रहा है. अमेरिकी वैज्ञानिक डा. डेविड पर्लमुटर ग्लूटेन के सख्त विरोधी हैं. उन का कहना है कि आज 40 फीसदी अमेरिकी लोग ग्लूटेन को नहीं पचा सकते. बाकी 60 फीसदी भी इस की चपेट में आ रहे हैं. डा. डेविड ने गेहूं, चीनी व दूसरी कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों को इनसानों लिए घातक बताया है. डा. विलियम डेविस ने अपनी किताब ‘व्हीट बेली’ में गेहूं के ग्लूटेन को भोजन का जहर मानते हुए इसे दमा, अस्थिरोगों, रक्त वाहिनियों के रोगों व दिमाग के रोगों की वजह बताया है.

गेहूं से होने वाले रोगों से बचने के लिए चौलाई, कुटू, मक्का, काला चना, तिल, रामदाना, चावल, बाजरा, ज्वार, सोयाबीन, अखरोट, बादाम, पिस्ता आदि से बनी चीजें खाने की सलाह दी जाती है. डबलरोटी बनाने में वाइटल व्हीट ग्लूटेन का इस्तेमाल किया जाता है, जो पेट के लिए खतरनाक होता?है. लिहाजा डबलरोटी खाने से बचना ही बेहतर है.

ड्रिप इरिगेशन : फायदे का सौदा

आजकल खेतीबारी में हो रही रिसर्च से खाद, बीज, दवा और तकनीक में तरक्की जारी है, जिस से खेती  की क्वालिटी व पैदावार में भी काफी इजाफा हो रहा है. लेकिन देश में अभी भी कुछ किसान ऐसे हैं, जो इन नई सहूलियतों में होने वाले खर्चों से बचने के लिए खेती के पुराने तरीकों को ही अपनाए रखना चाहते हैं. वहीं कुछ किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने समय के साथ चल कर नए तरीकों को अपनाया. नतीजतन, इन किसानों ने अपने खेतों को कारोबार जैसा बना दिया है और कम खर्च में ही पहले से अच्छी क्वालिटी की ज्यादा पैदावार पा रहे हैं.

इन्हीं नई तकनीकों में से एक है ड्रिप इरिगेशन सिस्टम, जो बूंदबूंद कर के सभी फसलों को बराबर से और उन की जरूरत के मुताबिक पानी देता है. यह पुराने तरीकों के मुकाबले बहुत कम पानी में ही कई गुना ज्यादा उत्पादन देता है. साथ ही, खेती में होने वाले कई तरह के खर्चों को भी कम कर देता है. यानी एक बार होने वाले थोड़े से ज्यादा खर्च के बाद हमेशा के लिए हर तरह से ज्यादा मुनाफा.

पैसों की बचत

इस तकनीक से सिंचाई करने से 60 से 70 फीसदी पानी की बचत होती है. इस सिस्टम को लगवाने के बाद किसानों ने महसूस किया कि ड्रिप इरिगेशन से और भी फायदे हैं. सरकार अगर इस के लिए सब्सिडी नहीं देती, तब भी वे इसे लगवाते, क्योंकि कुछ फसलों के बाद होने वाली बचत और फायदे से इस का पूरा खर्च निकल आता है. खजोड़ मल कहते हैं कि यहां खेतों में पानी देने के लिए मेंड़ बनवाने में मजदूरों पर काफी पैसा खर्च होता है. इस के अलावा मेंड़ों पर खरपतवार उग आते हैं, जिन की निराईगुड़ाई के लिए अलग से खर्चा करना पड़ता है. वहीं ड्रिप सिस्टम से पैसों की बचत होती है. इस के अलावा फसल 15-20 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है. सभी फसलों को बराबर और जरूरत के मुताबिक पानी मिलने से सभी पौधों में ज्यादा उत्पादन होता है. यानी ड्रिप इरिगेशन से 20 से 30 फीसदी खर्च की बचत होती है.

कैसे काम करता है यह

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम में खेत या बगीचे में कतार में बिछे पाइपों से उन में लगे छोटेछोटे ड्रिपर के जरीये पूरी फसल या पेड़ों को बूंदबूंद पानी से सींचा जाता है. इस सिस्टम में कुएं या बोरिंग पाइप से मोटर द्वारा पानी बाहर निकाला जाता है, जो सैंड फिल्टर से छनता हुआ गुजरता है. इस के बाद पानी एक दूसरे स्क्रीन फिल्टर से गुजरता है, जिस से बारीक मिट्टी भी छन जाती है. छनने के बाद यह पानी मोटे पीवीसी पाइप से होता हुआ खेतों में बिछे हुए लेटरल पाइपों तक पहुंचता है. ये लेटरल पाइप थोड़ीथोड़ी दूरी पर फसल के साथसाथ कतार में बिछाए जाते हैं. लेटरल पाइपों में थोड़ीथोड़ी दूरी पर ड्रिपर लगे रहते हैं, जिन से बूंदबूंद पानी बाहर निकलता है.

एक ड्रिपर पौधों के आसपास चारों ओर 30 सेंटीमीटर इलाके को सिंचित कर देता है. इतना ही नहीं, सैंड फिल्टर और स्क्रीन फिल्टर के बीच में एक फर्टिलाइजर टैंक भी लगा रहता है, जिस में खाद या दवा डाल सकते हैं. यह दवा पानी के साथ घुल कर फसल या पेड़ों तक पहुंचती है. इस तकनीक से पानी केवल पौधों में ही जाता है. इस तरह पानी की 60 से 70 फीसदी तक की बचत होती है. खेतों में लगाए गए ये पाइप 12 से 15 साल तक खराब नहीं होते हैं. इस के ड्रिप को साल में 1 या 2 बार साफ कर लेना चाहिए. किसानों को यह ड्रिप सिस्टम लगवाना थोड़ा महंगा जरूर लगता है, लेकिन कई राज्यों की सरकारें इसे लगवाने में सब्सिडी भी देती हैं. ड्रिप सिस्टम से होने वाली कई तरह की बचतों के साथ पैदावार में होने वाले फायदे से 2-3 फसलों में ही इस पूरे सिस्टम का खर्च वसूल हो जाता है. कंपनी के कर्मचारी खुद आ कर इसे लगा जाते हैं. किसान इस सिस्टम को हासिल करने या इस के बारे में जानकारी लेने के लिए नीचे दिए गए नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं:

* किसान इरिगेशन लिमिटेड, मुख्य कार्यालय, मुंबई, फोन नंबर : 022 28478505.

* राजस्थान कार्यालय, जयपुर, फोन नंबर : 0141-2372495, 3246336.   

फायदे

  1.  ड्रिप इरिगेशन से 60 से 70 फीसदी पानी की बचत होती है. बचे पानी से दूसरी फसल की सिंचाई की जा सकती है.
  2.  सभी पौधों को बराबर और जरूरत के मुताबिक पानी मिलता है और पहले से 25 से 30 फीसदी  ज्यादा पैदावार होती है.
  3.  सभी पौधे एकसमान और जल्दी बढ़ते हैं.
  4.  खाद और दवा पौधों को बराबर मिलती है और उन की बरबादी नहीं होती.
  5.  पहाड़ी व ऊंचीनीची जमीन पर भी ड्रिप से सिंचाई कर के अच्छी फसल तैयार की जा सकती है.
  6.  जहां पानी की कमी हो, वहां के लिए यह सिस्टम बहुत ही फायदेमंद है.
  7.  इस से खरपतवार पूरे खेत में न हो कर केवल पौधों के पास ही उगते हैं, जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है.
  8.  इस सिस्टम को चलाने में केवल 1 आदमी की जरूरत होती है.
  9.  इस सिस्टम से पौधों में होने वाली बीमारियों की रोकथाम होती है, क्योंकि पुराने तरीके से खुला पानी देने से बीमारी एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलती है

फितूरः कन्फ्यूज निर्देशक की घटिया फिल्म

चार्ल्स डिकेन के उपन्यास ‘‘ग्रेट एक्सपेक्टैशन’’ पर अभिषेक कपूर फिल्म ‘‘फितूर’’ लेकर आए हैं, जिसे देखने का अर्थ खुद को सजा देना है. यह एक घटिया फिल्म है, जो कि कहानी के स्तर पर भी दर्शक को कन्फ्यूज करती है. निर्देशक अभिषेक कपूर भी पूरी तरह से कन्फ्यूज नजर आते हैं. उन्हे समझ में नही आ रहा है कि वह कहानी व अपने किरदारों को किस दिशा में ले जाएं.

फिल्म की कहानी एक तेरह वर्षीय लड़के नूर (आदित्य रॉय कपूर) से शुरू होती है, जो कि अपनी बहन व जीजा जुनेद के साथ रहता है. एक दिन वह एक आतंकवादी (अजय देवगन) को उसकी धमकी से डरकर खाना खिला देता है, इस बात से वह आतंकवादी सुधर कर दिलदार के नाम से लंदन में बस जाता है. दूसरी तरफ नूर की मुलाकात बेगम हजरत की बेटी फिरदौस (कटरीना कैफ) से होती है. फिरदौस को नूर के जूते पसंद आ जाते हैं. इसी बात से प्रभावित होकर बेगम हजरत नूर को अपने अस्तबल में घोड़ों की देखभाल करने का काम दे देती हैं और उसे धमकी देती हैं कि वह काम पर ध्यान दे, प्यार के चक्कर में ना पडे़.

बाद में बेगम हजरत को फिरदौस और नूर के बीच बढ़ती नजदीकियां पसंद न आने पर वह फिरदौस को लंदन भेज देती हैं. इधर नूर की गरीबी का मजाक उड़ाते हुए उससे कहती हैं कि यदि फिरदौस को पाना है, तो उसके काबिल बनो. लंदन में फिरदौस की मुलाकात पाकिस्तान सरकार के मंत्री मुफ्ती (अक्षय ओबेराय) के बेटे बिलाल (राहुल भट्ट) से होती है और दोनो के बीच प्यार हो जाता है. इधर नूर बड़ा होकर एक बेहतरीन चित्रकार बन चुका है. बेगम हजरत नूर से मिलने आती है और उसकी चित्रकारी देखकर प्रभावित हो जाती है. तभी एक अंजान इंसान की तरफ से नूर के पास संदेश आता है कि उसे वजीफा दिया गया है और वह दिल्ली जाकर चित्रकारी के क्षेत्र में कुछ कारनामा करे.

दिल्ली में उसे रहने के लिए आलीशान मकान मिला है. लीना (लारा दत्ता) वहां उसकी मेंटर बनी होती हैं. देखते ही देखते नूर बहुत बड़ी हस्ती बन जाता है. नूर की पेंटिग्स की एक्जबीशन लगती है, जहां फिरदौस से नूर की की मुलाकात होती है. नूर को फिरदौस बताती है कि वह बिलाल से सगाई करने जा रही है. पर नूर, फिरदौस से सेक्स संबंध स्थापित करता है, जिसकी खबर बेगम हजरत को मिलती है और बेगम हजरत का फोन पाकर फिरदौस तुरंत दिल्ली से कश्मीर पहुंच जाती है. यहां बीमार बेगम हजरत, फिरदौस को याद दिलाती हैं कि उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक लावारिस बच्ची थी, जिसे उन्होंने अपनी हवेली के लिए एक बेटी की जगह दी और अब वह हवेली के लिए एक नया वारिस भी चाहती हैं. तब फिरदौस का दिल्ली में बैठे नूर को पत्र मिलता है कि वह वापस लंदन जा रही है और यदि जिंदगी रही तो कभी मुलाकात होगी.

फिरदौस ने पत्र मे लिखा है कि उसके साथ उसने जो समय बताया, उसे भी वह भूल जाए. नूर वापस कश्मीर आकर बेगम हजरत की हवेली पहुंचता है, जहां फिरदौस के साथ साथ बेगम हजरत से मुलाकात होती है. यहीं पर बेगम हजरत अपने अतीत को याद करती हैं कि वह मुफ्ती से प्यार करती थी और उसके पिता ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी थी. वह मुफ्ती के साथ घर से भागते समय अपने साथ लाखों रूपए के जेवर लेकर जाती हैं. मगर बेगम हजरत से सारे जेवर अपने हाथ में लेकर उसे धोखा देकर मुफ्ती गायब हो जाता है. इधर बेगम हजरत मां बनने वाली हैं, तो उसके पिता डॉक्टरों को बुलाने के बजाए चाहते हैं कि उसका बेटा मर जाए. अब बेटा कहां गया, इसका पूरी तरह से खुलासा नहीं होता है, पर पता चलता है कि वह नूर ही है. उधर यह बात भी खुलती है कि बेगम हजरत की हवेली के नौकर की बेटी है फिरदौस, जिसे जन्म देते ही नौकर की पत्नी मर गयी थी और बेगम ने अपना लिया था.

यह भी स्पष्ट होता है कि मुफ्ती को अपनी गलती का अहसास हैं और वह अभी भी बेगम हजरत से प्यार करते हैं. इसीलिए वह अपने बेटे बिलाल की शादी फिरदौस से कराना चाहता है. उधर एक बार फिर अंजान मददगार नूर को एक पेंटिग एक्जबीशन का हिस्सा बनने के लिए लंदन जाने के लिए कहता है. लंदन में नूर से मिलने बेगम हजरत आती हैं. यहीं पर नूर की मुलाकात उस आतंकवादी से होती है, जिसे उसने बचपन में एक दिन खाना खिला दिया था. वह आतंकवादी यानी कि दिलदार बताता है कि  उसकी वजह से वह सुधर गया और वह उसकी मदद कर रहा है. नूर को उसकी मदद से इस उंचाई पर पहुंचने पर कोफ्त होती है. कहानी तेजी से बदलती है. बेगम हजरत की मौत के बाद एक लॉकेट फिरदौस को मिलता है, उससे फिरदौस को सारा सच पता चलता है. वह बिलाल के साथ अपनी सगाई तोड़कर नूर के पास पहुंच जाती है.

फिल्म की गति बहुत धीमी है. इसलिए भी बोरियत होती है. कहानी कन्फ्यूजन पैदा करती रहती है. दर्शक की समझ में नहीं आता कि बेगम हजरत, नूर के साथ हैं या उसके खिलाफ हैं. फिल्म में नूर का संवाद है-‘‘दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’’ की आवश्यकता समझ से परे है. फिल्म के कुछ सीन भी बेवजह और जबरन पिरोए गए लगते हैं. फिल्म देखकर लगता है कि फिल्म निर्देशक अपनी इस फिल्म के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी को प्रभावित करना चाहते हैं, इसीलिए इसमें पाकिस्तानी एंगल पिरोया गया है. फिल्म देखते समय इस बात का अहसास होता है कि इस फिल्म की कुछ दिन शूटिंग करने के बाद रेखा ने यह फिल्म क्यों छोड़ दी थी.

मगर निर्देषक अभिषेक कपूर के सिर पर रेखा का भूत सवार नजर आता है. इसलिए उन्होने तब्बू को रेखा का ही लुक देने की कोशिश की है. बेगम हजरत का अतीत बताते समय युवा बेगम हजरत के किरदार में अदिति राव हादरी को पेश करने का औचित्य भी समझ से परे है. इंटरवल के पहले दर्शकों को कश्मीर के कुछ खूबसूरत सीन नजर आ जाएंगे, मगर इंटरवल के बाद दर्शक सोचेगा कि वह कब बाहर चला जाए.

आदित्य रॉय कपूर ने नूर के किरदार के साथ न्याय करने का पूरा प्रयास किया है. मगर कटरीना कैफ निराश करती है. उनके अमरीकन एसेंट वाली हिंदी विचलित करती है. फिल्म में आदित्य व कटरीना की केमिस्ट्री कहीं से प्रभावित नहीं करती. यह दोनो प्रेमी प्रेमिका के रूप में ठीक नहीं लगते हैं. संजीदा प्रेम कहानी का अभाव है. तब्बू ने फिर से साबित किया है कि वह बेहतरीन अदाकारा हैं. मगर लारा दत्ता, अदिति राव हादरी व अजय देवगन को जाया किया गया है. यह फिल्म दर्शकों की सहनशक्ति की परीक्षा लेने के अलावा कुछ नहीं है.

सिरैमिक टैक्नोलौजी: अपनी सोच से गढ़ें कुछ नया

सिरैमिक टैक्नोलौजी इंजीनियरिंग एवं टैक्नोलौजी की एक ऐसी उभरती शाखा है, जिस के अंतर्गत सिरैमिक मैटीरियल की प्रौपर्टी, मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइनिंग और उस के कार्यों का विधिवत अध्ययन किया जाता है. एक सिरैमिक डिजाइनर का वास्ता इंडस्ट्री, घरगृहस्थी, शिक्षण संस्थान, कौरपोरेट हाउस तथा अन्य जगहों पर प्रयोग होने वाले सिरैमिक बरतनों के विभिन्न डिजाइनों से पड़ता है. ये सिरैमिक बरतन न सिर्फ देखने में सुंदर होते हैं बल्कि उपयोग की दृष्टि से भी लाभकारी साबित होते हैं.

सिरैमिक प्रोडक्ट के अंतर्गत टेबल और किचन के बरतनों के साथसाथ सुंदर दिखने वाले फ्लावरपौट, बिल्डिंग मैटीरियल आदि को शामिल किया जाता है. सीमेंट को भी सिरैमिक मैटीरियल से जोड़ कर देखा जाता है. सिरैमिक टैक्नोलौजिस्ट सिरैमिक मैटीरियल के अध्ययन, शोध एवं विकास, विभिन्न इंजीनियर्स के साथ प्लांट व अन्य मशीनरी की डिजाइनिंग और निर्माण संबंधी प्रक्रिया को अंजाम देते हैं. इस के अलावा इस में प्लानिंग एवं विभिन्न प्रक्रियाओं को लागू करने, ग्लास, पोर्सिलेन, सीमेंट, इंसुलेटर्स, तामचीनी, कंपोजिट मैटीरियल आदि की डिजाइन तथा उन के विकास से जुड़े कार्य भी प्रमुखता से संपन्न होते हैं. कोई भी छात्र जो सिरैमिक टैक्नोलौजी के क्षेत्र में कैरियर बनाने का इच्छुक है, उसे रोजगार के अवसरों में आने वाली परेशानियों के लिए खुद को तैयार रखना होगा. बतौर प्रोफैशनल्स आप सिरैमिक बरतन बनाने वाली कंपनियों, स्टील फैक्टरी एवं किसी लैब में रिसर्चर के रूप में जौब पा सकते हैं.

कोर्स एवं संबंधित योग्यता

यदि आप सिरैमिक टैक्नोलौजी के बैचलर प्रोग्राम में दाखिला चाहते हैं तो आप को 12वीं की परीक्षा अच्छे अंकों सहित विज्ञान विषयों से पास होना जरूरी है. कई ऐसे इंजीनियरिंग कालेज भी हैं जो सिरैमिक में 4 वर्षीय बीई या बीटैक कोर्स कराते हैं. इन कोर्सों में चयन भी इंजीनियरिंग की अन्य शाखाओं की तरह प्रवेश परीक्षा के बाद ही मिल पाता है. बैचलर के बाद डेढ़ वर्षीय एमटैक का रास्ता खुलता है, जबकि पीएचडी डिगरी के लिए रिसर्च से जुड़े कार्य करने पड़ते हैं.

प्रचलित कोर्स

–       बीई/बीटैक इन सिरैमिक टैक्नोलौजी.

–       कौरैस्पौंडैंस कोर्स इन सिरैमिक (बीएससी के समकक्ष).

–       एमटैक इन सिरैमिक टैक्नोलौजी.

–       पीएचडी इन सिरैमिक टैक्नोलौजी.

रोजगार के पर्याप्त अवसर

कोर्स के पश्चात छात्रों को सरकारी और प्राइवेट दोनों सैक्टरों में रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं. प्राइवेट सैक्टर में डिग्रीधारक सिरैमिक बरतन बनाने वाली यूनिट एवं अन्य कंपनियों में सिरैमिक टैक्नोलौजिस्ट तथा सिरैमिक डिजाइनर के रूप में जौब पा सकते हैं. सिरैमिक डिजाइनर का काम जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं में आधारभूत सिरैमिक मैटीरियल का प्रयोग करना होता है. यदि कोई छात्र अपना व्यवसाय शुरू करना चाहे तो वह आगे चल कर स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकता है.

इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो), भाभा एटौमिक रिसर्च सैंटर, डिफैंस मैटेलौजिकल रिसर्च लेबोरेटरी एवं इंस्टिट्यूट फौर प्लाज्मा रिसर्च सहित अन्य संस्थानों में भी ट्रेंड लोगों की भारी मांग है.

प्रैजैंस औफ माइंड की दरकार

सिरैमिक टैक्नोलौजी के क्षेत्र में छात्र के पास कई तरह के अतिरिक्त गुणों का भी होना जरूरी है. जैसे कि उन्हें बिना किसी भय एवं लापरवाही के खतरों का सामना व उन को हैंडिल करना आना चाहिए. प्रोफैशनल बनने के लिए उन के पास एक अच्छा प्रैजैंस औफ माइंड होना जरूरी है. इस फील्ड में संस्थाएं अपने एंप्लाई से कार्य के प्रति समर्पण व अनुशासन मांगती हैं. आजकल तो कंप्यूटर व तकनीक के दखल के चलते उन का गहरा ज्ञान भी जरूरी हो गया है. परिस्थितियां यदि अपने पक्ष में नहीं भी हैं तो उन्हें अपने पक्ष में करने का कौशल अभ्यर्थी में होना चाहिए.

मिलने वाली सैलरी

इस क्षेत्र में वेतन सिरैमिक इंजीनियर की योग्यता, अनुभव, कार्यस्थल व जौब की प्रकृति पर निर्भर करता है. छात्र ग्रैजुएशन के पश्चात ही 25-30 हजार रुपए प्रतिमाह कमा सकते हैं. जैसेजैसे उन का अनुभव बढ़ता है, उसी हिसाब से वेतन में भी बढ़ोतरी होती है. अमूमन 3-4 साल के अनुभव के बाद 40-45 हजार रुपए मासिक आसानी से मिल जाते हैं. विदेशों में आमदनी की कोई निश्चित सीमा नहीं होती है

नृत्य और संगीत से सराबोर ‘सिरपुर महोत्सव’

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 85 किलोमीटर दूर बसे शहर सिरपुर की चर्चा अब उस के वैभवशाली अतीत के साथसाथ बीते 3 सालों से आयोजित हो रहे सिरपुर महोत्सव से भी होने लगी है, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना चुका है. महानदी के किनारे बौद्धविहारों और मंदिरों वाले इस शहर में अब नृत्य और संगीत की ध्वनि भी इस तरह गूंजने लगी है कि उस की तुलना अजंता और खजुराहो महोत्सवों से की जाने लगी है.

सिरपुर आने वाले पर्यटकों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है. इन में बड़ी संख्या में कलाप्रेमी हैं. नृत्य और संगीत को समर्पित सिरपुर महोत्सव में अब तक जो ख्यातिनाम कलाकार अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं, उन में पंडित बिरजू महाराज, छन्नूलाल मिश्र, हरिप्रसाद चौरसिया, माधवी मुद्गल, प्रहलाद सिंह तिपानिया के अलावा तीजनबाई, राहुल शर्मा, उस्ताद शुजात खान और विक्कू विनायक राम के नाम प्रमुख हैं. इस सूची में जार्ज बु्रकान, पीट लाकेट और लेनार्ड एरो के नाम भी शुमार हैं.

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही. सिरपुर महोत्सव में जनजातीय कलाकारों की मनमोहक व लुभावनी परंपरागत प्रस्तुतियां देखने का मौका भी पर्यटकों को इस अवसर पर मिलता है.सिरपुर महोत्सव का आयोजन हर साल जनवरी के महीने में होता है. इस साल यह महोत्सव 29 से 31 जनवरी, 2016 तक चलेगा. कलाप्रेमी पर्यटक पूरी शिद्दत से इस का इंतजार करते हैं. इस महोत्सव की एक खासीयत यह भी है कि जनवरी में छत्तीसगढ़ का मौसम बेहद सुहाना रहता है.छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा आयोजित सिरपुर महोत्सव को देख कर इस की तारीफ लाओस, श्रीलंका, कोरिया और वियतनाम के राजदूत भी कर चुके हैं.

जीवन बीमा : बचत ही नहीं जरूरत भी

समय के साथ अब जीवन बीमा में भी बदलाव आ चुका है. अब यह जरूरत और बचत दोनों को पूरा करता है. यह एक ऐसी आर्थिक सुरक्षा देता है, जो व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करती है. जीवन बीमा पौलिसी जितनी कम आयु में ले ली जाए प्रीमियम उतना ही कम देना पड़ता है और लाभ अधिक से अधिक मिलता है. वैसे जीवन बीमा को बचत की जगह जरूरत ज्यादा मानना चाहिए, क्योंकि इस से बड़े होते बच्चों की शिक्षा, रोजगार व शादी सहित जीवन की और नई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियों को उठाने में मदद मिलती है.

भारतीय जीवन बीमा निगम परिवार के हर सदस्य की जरूरत को समझते हुए उस के हिसाब से पौलिसी देता है. जिस से केवल घर के कमाऊ सदस्य को ही नहीं, दूसरे सदस्यों को भी पूरी सुरक्षा मिलती है.

ऐसे में यह जरूरी है कि जीवन बीमा को बचत से अधिक जरूरत समझना चाहिए. भारत में जीवन बीमा पौलिसी की शुरुआत भारतीय जीवन बीमा निगम ने की थी.

बीमा यानी इंश्योरैंस एक प्रकार का अनुबंध होता है. 2 या अधिक व्यक्तियों, संस्थाओं में ऐसा समझौता जिसे कानूनी रूप से लागू किया जा सके, उसे अनुबंध कहते हैं.

शुरूशुरू में भारत में सरकारी कंपनियां ही बीमा पौलिसियां बेचने का काम करती थीं. मगर अब बहुत सारी प्राइवेट कंपनियों को भी लाइफ इंश्योरैंस, हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसियां बेचने की अनुमति मिल गई है. हाल के कुछ सालों में देश में बीमा कारोबार ने काफी तरक्की कर ली है. बीमा केवल करने और कराने वाले के लिए ही लाभप्रद नहीं है, बीमा कंपनियां देश में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने का काम भी कर रही हैं.

जैसी जरूरत वैसी पौलिसी

भारतीय जीवन बीमा निगम, लखनऊ मंडल के वरिष्ठ मंडल प्रबंधक, आदित्य गुप्ता कहते हैं, ‘‘आजीवन बीमा पौलिसी कितनी कीमत की ली जाए इस का सरल सा फार्मूला यह है कि व्यक्ति की सालाना आय जितनी हो, उस की 10 गुना बीमा राशि हो. कई तरह की बीमा पौलिसियां आने से किसी तरह का बोझ पौलिसीधारक पर नहीं पड़ता है. बीमा एजेंट सही बीमा पौलिसी का चुनाव करने में मदद करता है.’’

हर बीमा योजना को चलाने के लिए एक पौलिसी का सहारा लिया जाता है. इस पौलिसी में ही अनुबंध की शर्तें लिखी होती हैं. बीमा कंपनियों का प्रयास होता है कि वे इस तरह की पौलिसियां बनाएं जिन में हर आदमी की जरूरत के हिसाब से पौलिसी चुनने की सुविधा मिल सके. बीमा पौलिसियां कई तरहकी होती हैं. बीमा को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए बचत योजना को भी बीमा पौलिसी में जोड़ा गया. बीमा का पैसा ली गई पौलिसी की तय समय अवधि पूरी होने के बाद मिलता है.

बीमा कराने वाले को उस की जरूरत के हिसाब से समयसमय पर कुछ पैसा मिलता रहे, इस के लिए मनी बैक पौलिसी का विकल्प भी उपलब्ध है. मनी बैक पौलिसी जीवन बीमा की सब से अधिक बिकने वाली पौलिसियों में आती है. यही नहीं, बीमा कंपनियां गारंटीशुदा पैसा देने वाली पौलिसी भी ले कर आ चुकी हैं.

रोजगार भी

बीमा से केवल जीवन की सुरक्षा ही नहीं मिलती है, यह रोजगार का भी एक बड़ा साधन है. जीवन बीमा एजेंट बन कर लाखों लोग अपनी रोजीरोटी चला रहे हैं. इस से आर्थिक लाभ मिलता है. बीमा रकम बीमाधारक के मरने के बाद भी और जिंदा रहते हुए भी काम आती है. रूढि़यों में जीने वाले हमारे देशवासी अपने मरने की कल्पना भी नहीं करना चाहता. इसी वजह से जीवन बीमा कंपनियों को अपने प्रचार में कहना पड़ता है कि जिंदगी के बाद भी और जिंदगी के साथ भी. बीमा कंपनियां पौलिसियां बनाते समय इस बात का पूरा ध्यान रखती हैं कि बीमाधारक की जरूरत के अनुसार बीमा पौलिसी बनाई जाए.

अभी भी हमारे देश में प्रति व्यक्ति आय दूसरे विकसित देशों के मुकाबले काफी कम है. इसी वजह से यहां बीमा की तरफ कम ध्यान दिया जाता है. बीमा के साथसाथ बचत योजनाओं को चलाने से ही बीमा की तरफ लोगों को ज्यादा से ज्यादा जोड़ा जा सकता है. प्रबंधक कार्यालय सेवा, मोनिका विकास जगधारी कहती हैं, ‘‘आज के दौर में महिलाएं नौकरी और रोजगार के अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं. ऐसे में महिला बीमा एजेंटों की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. बीमा एजेंट बन कर महिलाएं रोजगार कर सकती हैं. किसी महिला को बीमे की जरूरत के बारे में महिला एजेंट ज्यादा अच्छी तरह समझा सकती है. महिला के लिए बीमा एजेंट बन कर अपना कैरियर चलाना सरल काम है.’’

बीमा देश के विकास में अपना अहम रोल अदा कर रहा है. भारत में अभी भी बीमा कारोबार की बड़ी संभावनाएं हैं. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इस को पहुंचाने से देश का लाभ होगा. बीमा एजेंट बन कर बेरोजगारी की समस्या को भी काफी हद तक दूर किया जा सकता है. 

खाने की कमी या बढ़ते दाम

खाने की कमी या बढ़ते दामों का एक पुराना इलाज एक मंत्री महोदय ने फिर दोहराया है कि मत खाओ. उन्होंने कहा है कि दालों की कीमत नरेंद्र मोदी सरकार की गलत नीतियों से नहीं बढ़ी, वह तो ज्यादा खाने से बढ़ी है. दालों की खपत 226 लाख मीट्रिक टन हो गई, पर उत्पादन 170 लाख मीट्रिक टन हो रहा है.

पूछा जा सकता है कि खपत क्या एक रात में बढ़ गई थी? खाद्य मंत्रालय या वित्त मंत्रालय में क्या घोड़े सो रहे हैं जो देख नहीं सकते कि प्रोटीन को देने वाली दालों की जरूरत बढ़ेगी, जैसेजैसे बच्चे बड़े हो कर युवा और जवान बनेंगे. मंत्रीजी ने यह भी कहा है कि दाल बाहर से आयात नहीं कर सकते, क्योंकि वहां दाल की जगह मीट खाते हैं और भारतीयों के लिए वे दालों का उत्पादन करेंगे, इस की गुंजाइश नहीं है.

मंत्रीजी की पार्टी ही गौहत्या के नाम पर देश में पहले से ही मौजूद मीट को खाने पर रोक लगाने की जरूरत पर जोर देती है, क्योंकि उसे गौदान का माहौल बनाए रखना है. गौदान ही तो हिंदू धर्म की जान है, क्योंकि सदियों से गृहस्थों से जो चीज बिना मेहनत किए दान के नाम पर छीनी जा सकती थी, वह गाय ही थी. उसे तो उठा कर भी ले जाना नहीं पड़ता, रामायणमहाभारत ऐसे राजाओं के गुणगानों से भरे हैं, जिन्होंने सुंदर गायों और सुंदर लड़कियों को दान में ऋषिमुनियों को दिया था. अब हिंदू राज तो तभी आएगा न जब यह दोहराया जाए, चाहे उस की वजह से आम आदमी भूखा रह जाए.

दालें हमें महंगी लगती हैं, क्योंकि हमारे आम किसानों में आज भी इतना दम नहीं कि चीनी, अमेरिकी किसानों की तरह मेहनत कर सकें. अमेरिका के आबादी के डेढ़ प्रतिशत से भी कम किसान अपनी जनसंख्या के लिए ही नहीं निर्यात के लिए भी खाना उगा लेते हैं और हम से दालें भी नहीं उगतीं. फिर बहानेबाजी कि क्यों खाते हो, अगर महंगी है.

मंत्रीजी ने हाथ झाड़ दिए हैं कि दालों के दाम कम हो सकते हैं. ठीक भी है. सरकार को गरीबों को खिलाने की नहीं, सेना को खरबों के हवाईजहाज, पनडुब्बियां दिलाने, बुलेट ट्रेन बनवाने, 8 या 12 लेन की सड़कें बनवाने, नए शहर बनवाने की चिंता है. उसे सूटबूट वालों को खुश रखना है, जो फाइव स्टार होटल में महीनेभर की गरीब की दाल का खर्च एक रात में कर सकते हैं.

जिस सरकार से बौर्डर नहीं संभल रहा हो, डौलर नहीं संभल रहा हो, शेयर बाजार नहीं संभल रहा हो, उस से दालों की चिंता करने की उम्मीद करना बेकार है. यह तो जनता को अपनेआप करना होगा, चाहे घर के गमले में दाल उगाए या महंगी ला कर खाए.

उपहार से कुछ इस तरह करें इजहार ए प्यार

‘हमें तुम से प्यार कितना ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना,’ ‘मेरी रगरग में तुम हो और उसी होने के आनंद को जीती हूं मैं’, ‘तुम एक शब्द हो, जिस का अर्थ है खुशी’, ‘कह नहीं पाती तुम से पर यह सच है कि तुम मेरा आधार हो, जिस के भरोसे मेरा वजूद है…’

जैसेजैसे फरवरी माह करीब आने लगता है, जोड़े अपने साथी को वैलेंटाइन डे पर एक अच्छे से तोहफे पर कुछ ऐसी ही पंक्तियां लिख कर देने की फिराक में रहते हैं. क्योंकि उन के लिए तो यह दिन खुशियां, उम्मीदें और उमंग ले कर आता है. आएं आप भी थोड़ा रूमानी हो जाएं और जानें क्या है वैलेंटाइन डे, जिस ने भारत की जमीन पर दबे पांव कदम रखा था पर धीरेधीरे सभी युवाओं को अपना मुरीद बना लिया.

इस पर्व को मनाने के तौरतरीके और रीतिरिवाज बड़े अनोखे और रोचक रहे हैं. इतिहास के पन्ने पलटें तो वे कहते हैं कि एक ऐसे व्यक्ति के बलिदान का दिन है वैलेंटाइन डे, जिस ने प्यार किया और प्यार करने वालों को एक पवित्र बंधन में बांधने का प्रयास किया. उन के वक्त में रोम का शासक क्लोडियम था जो कि बहुत कू्रर और सख्त स्वभाव का था. उस ने अपने शासनकाल में सभी सिपाहियों पर प्रतिबंध लगा दिया था कि कोई भी न तो अपनी प्रेमिका से मिलेगा और न ही शादी करेगा. मगर वैलेंटाइन ने राजा की मरजी के खिलाफ प्रेमी जोड़ों की छिपछिप कर शादी करवाई और प्रेम करने वालों को एकदूसरे से मिला दिया. यों कहें कि वह प्रेम का फरिश्ता बन गया. क्लोडियम से यह सब बरदाश्त न हुआ और वैलेंटाइन को मृत्युदंड दिया गया. यह बात 14 फरवरी, 269 ई. की है.

वैलेंटाइन की एक दोस्त थी जो जेलर की बेटी थी. उसे मृत्युदंड से पहले वैलेंटाइन ने एक खत लिखा था. इस के बाद हर साल 14 फरवरी को वैलेंटाइन की याद के दिन के रूप में मनाया जाने लगा और इसे नाम दिया गया वैलेंटाइन डे. शुरू में लोग इस मौके पर प्रेम भरा खत लिखते थे, तो बाद में अपने प्रिय को खत के साथ उपहार देने का चलन चला और आज तो बाजार में इस से जुड़े उपहारों की भरमार है. आइए, जानते हैं कि उन में खास उपहार कौन से हैं और उन की अहमियत किसलिए है:

गुलाब: प्यार के इजहार के लिए सब से बेहतर तरीका है लाल गुलाब. लेकिन यह भी याद रहे कि प्रेमी या प्रेमिका को दिए जाने वाले गुलाबों की संख्या भी कुछ हती है. जैसे प्यार के इजहार के लिए 1 गुलाब ही काफी है. अगर आभार प्रकट कर रहे हों तो 1, बधाई के लिए 25 और बिना शर्त के प्यार के लिए 50 गुलाबों का महकता गुलदस्ता उपयुक्त माना जाता है. बस शर्त यह है कि उसे लवर्स नौट में बांध कर दें.

दिल: वैलेंटाइन डे पर बाजार में लाल गुलाबों की भरमार के बाद दिल की शेप में बने विभिन्न प्रकार के कार्ड्स व गिफ्ट आइटम देखने को मिलते हैं. पहले कामदेव के तीर से बिंधा दिल रति के लिए प्रेम की अभिव्यक्ति का बेहद खूबसूरत जरीया था. प्यार करने वालों को वैलेंटाइन डे पर दिल शेप में बने हुए कार्ड्स, शोपीस, टैडी बियर, पाउच, इंयररिंग्स, रिंग्स, ज्वैलरी बौक्स, सिरैमिक कौफी मग, कुशन कवर, पिलो कवर तथा शोपीस मिल जाएंगे.

कबूतर का जोड़ा: ‘तुम्हारे बिना मैं मर जाऊंगी’, ‘तुम से बिछुड़ने से पहले मुझे मौत आ जाए’, ये जुमले प्रेमी युगल एकदूसरे से अकसर कहते हैं. शायद हम में से बहुत कम इस बात से वाकिफ होंगे कि कबूतरकबूतरी ऐसे प्यार के पर्याय होते हैं कि यदि इन दोनों में से एक की मौत हो जाए तो फिर दूसरा नए साथी की तलाश नहीं करता. प्यार तो समर्पण है. प्यार व उस के प्रति पूर्ण आस्था को दर्शाने के लिए, शौपिंग मौल्स व गिफ्ट शौप्स में ऐसे कबूतरों की जोडि़यों की विभिन्न मुद्राओं में गिफ्ट आइटम देखने को मिलते हैं.

मैपल लीफ: कनाडा के राष्ट्रीय वृक्ष मैपल ट्री की पत्तियां आज भी जापानी और चीनी सभ्यता में प्रेम को प्रतिबिंबित करती हैं. इन पत्तियों में मिठास होती है. शायद इसीलिए ऐसी मान्यता है. अमेरीका में कई प्रेमी युगल सच्चा प्यार पाने के लिए बैड के नीचे फर्श पर मैपल की पत्तियां रखते हैं. वैलेंटाइन डे पर मैपल पत्ती वाले कार्ड खूब मिलते हैं. उन पर लिखे होते हैं कुछ रोमांटिक शेर या फिर तीर से बिंधा दिल बना होता है.

ट्यूलिप फ्लावर: कहींकहीं शादी की 11वीं सालगिरह का प्रतीक माना गया है ट्यूलिप फ्लावर. ट्यूलिप फ्लावर के बीचोंबीच काले मखमली भाग को प्रेमी का दिल माना गया है. प्रेमियों की पहली पसंद कहलाने वाला ट्यूलिप फूल दरअसल मशहूर प्रेमी युगल शीरीफरहाद के इश्क की उपज माना जाता है. कहते हैं, फरहाद जो तुर्की का रहने वाला था, शीरी से बेपनाह मुहब्बत करता था. जब फरहाद को पता चला कि शीरी अब इस दुनिया में नहीं रही, तो वह दीवानों की तरह पहाड़ की चोटी पर चढ़ गया और प्यार में पागल हो कर उस चोटी से कूद गया. फिर जहांजहां उस के खून की बूंदें गिरीं, वहींवहीं सुर्ख ट्यूलिप का फूल खिला. बस तभी से यह इश्क के मतवालों के प्यार का प्रतीक बन गया. वैलेंटाइन डे पर प्रेमी युगल प्यार में मर मिटने के लिए ट्यूलिप गिफ्ट करते हैं.

डायमंड: प्यार को दर्शाने के लिए डायमंड यानी हीरे से बढ़ कर तोहफा और क्या हो सकता है. प्यार शिलालेख सा अमिट है. इसे दर्शाने के लिए हीरा एक अनुपम उपहार है. ग्रीक सभ्यता में तो हीरों को देवताओं के टपके हुए आंसू माना गया है. रोमन सभ्यता में इस का गुणगान आसमान से टूटा तारा मान कर किया गया है. बाजार इन मान्यताओं को भुनाने में वक्त नहीं लगाता. वैलेंटाइन डे पर आभूषण की दुकानों पर उपहार में देने के लिए डायमंड लेने की होड़ सी लगी रहती है. यों भी तो कहा जाता है कि जो हीरा पहनता है उस के व्यवहार में एक ठहराव और संतुलन झलकता है. प्रेमिका को इंप्रैस करने का सही दिन है वैलेंटाइन डे और सही तोहफा डायमंड.

दिलनुमा शेप के तोहफे: प्यार का इजहार करने का एक अच्छा तरीका यह भी है कि ऐसा कोई भी तोहफा देना जिस पर दिल बना हो. दिल से कीजै दिल की बात. बाजार में रेशमी या फिर वैलवेट कपड़े से बने दिल आकार के छोटेबड़े गिफ्ट बौक्स या डिब्बियां मिल जाती हैं. बाजार से न लेना हो तो अपनी कल्पनाशीलता की उड़ान को पंख दें और मनाएं वैलेंटाइन डे.

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