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आरती कीजै टीचर लला की

अपने गांव के स्कूल के टीचरजी की पता नहीं किस दुश्मन ने शिकायत कर दी कि इन दिनों वे बरगद के पेड़ के नीचे बच्चों को बैठा कर अपनेआप कुरसी पर स्कूल की प्रार्थना के बाद से स्कूल छूटने तक ऊंघते रहते हैं. बच्चों को ही उन्हें झकझोरते हुए बताना पड़ता है, ‘टीचरजी, स्कूल की छुट्टी का समय हो गया है. बच्चों का शोर सुन कर टीचरजी कुरसी पर पसरे हुए जागते हैं, तो बच्चे कहते हैं, ‘टीचरजी जाग गए, भागो…’

मैं ने टीचरजी के विरोधी टोले से कई बार कहा भी, ‘‘अरे, इतनी भयंकर गरमी पड़ रही है. आग बुझाने के लिए आग पर पानी भी डालो, तो वह भी घी का काम करे. गरमी के दिन हैं, टीचरजी सोते हैं, तो सोने दो. गरमी के दिन होते ही सोने के दिन हैं, क्या जनता के क्या सरकार के.

‘‘पता नहीं, गांव वाले हाथ धो कर टीचरजी और पटवारी के पीछे क्यों पड़े रहते हैं? यह तो टीचरजी की शराफत है कि वे कम से कम बच्चों की क्लास में तो जा रहे हैं. बरगद के पेड़ के नीचे बच्चे ज्ञान नहीं तो आत्मज्ञान तो पा रहे हैं. क्या पता, कल इन बुद्धुओं में से कोई बुद्ध ही निकल आए.’’ पर टीचरजी के विरोधी नहीं माने, तो नहीं माने. कल फिर जब टीचरजी रोज की तरह कुरसी पर दिनदहाड़े सो रहे थे कि जांच अफसर तभी बाजू चढ़ाए स्कूल में आ धमके.

तो साहब, विरोधियों का सीना फूल कर छप्पन हुआ कि टीचरजी तो रंगे हाथों पकड़े गए. जांच अफसर आए, तो उन्होंने कुरसी पर सोए टीचरजी को जगाया. वे नहीं जागे, तो क्लास के मौनीटर से पास रखे घड़े से पानी का जग मंगवाया और टीचरजी के चेहरे पर छिड़कवाया, तब कहीं जा कर टीचरजी जागे. देखा तो सामने यमदूत से जांच अफसर. पर टीचरजी ठहरे ठूंठ. वे टस से मस न हुए.

जिले से आए जांच अफसर ने उन्हें डांटते हुए कहा, ‘‘हद है, जरा तो शर्म करो. पूरी पगार नहीं, तो कम से कम कुछ पैसा तो इन बच्चों पर खर्च करो.‘‘अगर आप ऐसे ही अपना स्कूल चलाएंगे, तो ये बच्चे जहां पैदा हुए हैं, बूढ़े हो कर भी वहीं के वहीं रह जाएंगे. ऐसे में ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ का नारा फेल हो जाएगा.’’ 

टीचरजी पहले तो सब चुपचाप सुनते रहे, जब बात हद से आगे बढ़ गई, तो वे विनम्र हो कर बोले, ‘‘साहब, गुस्ताखी माफ. दरअसल, मैं इन बच्चों को कुंभकरण के बारे में पढ़ा रहा था. कुंभकरण कैसे सोता था, बस यही इन बच्चों को सो कर दिखा रहा था.

‘‘अब इस गांव में कोई सोने वाला न मिला, तो बच्चों को खुद ही कुरसी पर सो कर बता रहा था कि कुंभकरण इस तरह 6 महीने सोया रहता था, पर आप ने मुझे हफ्तेभर बाद ही जगा दिया.

‘‘अब बच्चे कैसे जानेंगे कि महीने में कितने दिन होते हैं? उन्हें तो लगेगा कि एक दिन का एक महीना होता है.’’

इतना कह कर टीचरजी मुसकराते हुए अपने विरोधी टोले को देखने लगे.

जांच अफसर ने टीचरजी की पीठ थपथपाते हुए गांव वालों से कहा, ‘‘हे गांव वालो, तुम धन्य हो, जो तुम ने ऐसा होनहार टीचर पाया. ‘‘इन्होंने किताब में लिखे को सही माने में सच कर दिखाया. महीने में 30 दिन ही होते हैं, आप बच्चों को शान से बताइए. जब तक कुंभकरण की नींद पूरी नहीं होती, तब तक बच्चों के हित में आप भी इस सिस्टम की तरह सो जाइए.

‘‘हमारी सरकार भी सोती ही रहती है. प्रशासन भी सोता रहता है. यहां तक कि अकसर सांसद और विधायक भी होहल्ले के बीच सो रहे होते हैं. ‘‘टीचरजी, हम अभी आप का नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नौमिनेट करते हैं. अच्छा तो हम चलते हैं.’’

तो सब मिल कर बोलो, ‘आरती कीजै टीचर लला की, स्टूडैंट्स दलन, फेंकू कला की…’   

युवाओं को न भटकाएं

मेक इन इंडिया का स्लोगन अभी हवा में ही था कि नरेंद्र मोदी ने नया गुब्बारा स्किल डैवलपमैंट का छोड़ दिया है. नई सरकार की यह खासीयत तो है कि हर थोड़े दिन बाद कोई नया नारा देशभर के इश्तिहारों की जगह पर चमकने लगता है. सवाल यह है कि क्या यह आज की प्रौढ़ पीढ़ी या युवा पीढ़ी को कुछ दे पा रहा है? मेक इन इंडिया कहना बड़ा आसान है पर इसे जमीन पर उतारना कठिन है. क्या मेक करें, पहला सवाल तो यही है. दुनिया भर में जहां भी भारी उद्योग लगे हैं, ज्यादातर ने या तो नई चीजों का आविष्कार किया है या पुरानी चीजों को नए तरीके से बनाने के ढंग ढूंढ़े हैं. यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान और कोरिया ने इसी तरह उन्नति की है.

हमारे यहां तो नए के प्रति गहरी हेट है. हम तो पुरातनवादी हैं जो योग को, वंदेमातरम को, यज्ञहवन को, जाति को, पूजापाठ को, कुंडली और औजार पूजन को पहला काम मानते हैं.

मेक तो हम तब करें न जब हम समझें कि यह बनाने का काम हमें खुद करना है. हम अपना मन ही मेक यानी बना नहीं पा रहे कि बनाने का काम हमारा है ग्रहों का और पूजापाठ का नहीं.

इसी तरह स्किल का काम हम ने उन दलित शूद्रों को दे रखा है जिन्हें मूलत: पढ़नेलिखने का मौलिक स्वाभाविक अधिकार अभी तक नहीं मिल पाया है. वे अगर आरक्षण के नाम पर कुछ पा सके हैं तो सरकारी नौकरियां, जहां न कुछ मेक किया जाता है और न ही स्किल की जरूरत होती है. कामगारों की जो जमात सरकार में नहीं घुस पाई अब भी सिर्फ पुराने पेचकश लिए घूम रही है. यहां तक कि इस मेक इन इंडिया व स्किल का प्रचार करने वाले जो विज्ञापन बन रहे हैं उन में वे औजार दिखाए जा रहे हैं जिन की आज के औद्योगिक युग में कोई जगह है ही नहीं.

भारत की प्रगति पर हम फूल लें पर हम यह छिपा जाते हैं कि भारत जनसंख्या की वृद्धि में भी बड़े देशों में से सब से आगे है. हमारे यहां जितने अनपढ़ व बीमार हैं उतने पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में भी नहीं हैं.

हमारा युवा आज 17 साल का होते ही अंधेरी गुफा में धकेल दिया जाता है. उस के पास भविष्य की कोई रूपरेखा नहीं होती. पढ़ाई मुश्किल ही नहीं महंगी और ऊपर से बेकार है. उसे छोटी नौकरियों के लिए भटकना पड़ता है. धन्ना सेठों के पास कौडि़यों में काम करना पड़ रहा है, क्योंकि उस की कला, कौशल व कर्मठता की पहचान करने वाला कोई मेड इन इंडिया फार्मूला बना ही नहीं है.

हर युवा एक रास्ता चाहता है जिस पर चल कर, भाग कर या दौड़ कर वह किसी लक्ष्य पर पहुंच सके पर यहां तो रास्तों में रुकावटें पड़ी हैं, मोड़ हैं और रास्तों में गहरे गड्ढे हैं. न जाने हम कौन सी स्किल की बात कर रहे हैं जबकि स्किल देने वालों को गायत्री मंत्रों से ही फुरसत नहीं है. युवाओं को भटकाएं नहीं. नया रास्ता खोलें उन के लिए. उन्हें नारेबाजी और खोलले प्रोग्राम न दें. उन्हें अपनेआप भविष्य की इबारत लिखने दें.

 

क्या आप भी ऑनलाइन शॉपिंग एडिक्ट हैं…?

या तो लोगों को ठगी की आदत पड़ चुकी है या फिर लोगों के पास खर्चने के लिए ढेर सारा पैसा आ गया है. शायद इसीलिए रिंगिंग बेल्स कम्पनी के 251 रुपए के गड़बड़झाले और ऑनलाइन शौपिंग प्लेटफोर्म की बेवकूफ बनाती स्कीमों के बावजूद लोग ऑनलाइन शौपिंग का चस्का नहीं छोड़ पा रहे हैं.

उद्योग संघ एसोचैम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत में इस वर्ष यानी 2016 में ऑनलाइन शॉपिंग में 78 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान है. एसोचैम और प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स की जॉइंट स्टडी की मानें तो बाजार में सुस्ती के बावजूद लोग जमकर ऑनलाइन खरीददारी करेंगे. जबकि 2015 में यह आंकड़ा 66 फीसदी था.

आकर्षक ऑफर और आक्रामक विपणन व विज्ञापन नीति के चलते ऑनलाइन खरीदारी का ट्रेंड भले ही उछाले मार रहा हो, लेकिन बाजार जाकर मोलभाव कर खरीदारी करने का वो पुराना तरीका ही ठीक था. जहाँ गलीमोहल्ले के गुप्ता जी या जैन साड़ी सेंटर्स से शौपिंग कर चाय की दो चुस्कियां लग जाती थी. खरीदारी के बहाने मेलजोल की सामाजिकता भी पूरी हो जाती थी और सामान की गुणवत्ता और कीमत को लेकर निश्चिंतता भी रहती थी.

अब वेबसाइटों पर फोटोशोप की कलाकारी से प्रोडक्ट की चिकनी चमकीली तस्वीर लगा दी जाती है. बाद में ऑर्डर कर जब सामान हाथ में आता है तो तस्वीर के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता. मन मारकर या तो सामना रख लो या फिर लौटाने की बोझिल प्रकिया में कई दिन बर्बाद करो.देश के 14 शहरों में 12,365 किशोरों पर किये गये एक हालिया सर्वेक्षण में सामने आया है कि अधिकतर किशोर अपनी पसंद की चीजें मंगाने के लिए अकसर ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं.

लोगों के लिए ऑनलाइन शॉपिंग नशा बन गई है. खासकर युवा आकर्षक ऑफर के फंदे में फंसकर गैरजरूरत या देखादेखी में ज्यादा खर्च कर डालते हैं. कई बार क्रेडिट कार्ड या ईएमई के आसान भुगतान की बैसाखी पर मोटी खरीदारी कर लेते हैं. बाद में अनियमित भुगतान के चलते पेनाल्टी तक भरने कीनौबत आ जाती है. अगर आप सावधानी के साथ क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल नहीं करते तो ये आपको कर्ज के चंगुल में फंसाने का सबसे खतरनाक माध्यम है.

न्यूयार्क की एक स्टडी के मुताबिक़ अगर आप जरूरत से ज्यादा ऑनलाइन खरीदारी करते हैं तो यह आपकाबजट खाली कर आपको मानसिक तौर सेपरेशान भी कर सकता है.

ऐसे पाएं नजात —            

•       ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स के विज्ञापनों पर क्लिक करने से बचें.

•       सिर्फ बोरियत से बचने के लिए शॉपिंग ना करें

•       ईकोमर्स के मेल्स को अन्सब्स्क्राइब कर दें.

•       क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल समझदारी के साथ करें:

•       उत्साह में खरीदारी से बचें

•       ऑनलाइन शॉपिंग ई-मेल से खुद को बचाएं

मोटरसाइकिल ने बदली गांव की दुनिया

शादी के बाद रमेश पहली बार अपनी दुलहन को फिल्म दिखाने गांव से तकरीबन 30 किलोमीटर दूर शहर ले जा रहा था. सवारी के लिए उस के पास मोटरसाइकिल थी. लोक रिवाजों के चलते घर के सामने से वह पत्नी को मोटरसाइकिल पर बैठा नहीं सकता था. पत्नी गांव से बाहर तक पैदल आई, फिर रमेश ने सड़क पर उसे मोटरसाइकिल पर बैठाया और फर्राटा भरते हुए शहर की ओर चल पड़ा. फिल्म देखने और शहर घूमने के बाद वे दोनों रात में अपने गांव वापस आ गए. केवल पत्नी को फिल्म दिखाने की ही बात नहीं है, किसी बीमार को अस्पताल ले जाना हो या घर और खेत के लिए जरूरी सामान लाना हो, तो मोटरसाइकिल सब से उपयागी सवारी हो गई है. हाल ही के कुछ सालों में मोटरसाइकिल गांव में रोजगार का आसान साधन बन कर उभरी है. 

मोटरसाइकिल पर सवारी करने के साथसाथ जरूरत का सामान भी ले जाया जाता है. गांव के लोगों की ज्यादातर नातेरिश्तेदारी 50 से 60 किलोमीटर के बीच ही होती है. मोटरसाइकिल की सवारी से यह दूरी तय करना काफी आसान हो गया. शहर से 30 किलोमीटर दूर रह कर दूध की डेरी चलाने वाले नरेश यादव ने शुरुआत में मोटरसाइकिल पर दूध के डब्बे लाद कर शहर पहुंचाना शुरू किया था. वह अपनी मोटरसाइकिल पर दूध के 4 डब्बे ले कर शहर जाता था.

सब्जी का कारोबार करने वाले श्याम प्रसाद कहते हैं, ‘‘अब कम सब्जी पैदा होने पर भी मोटरसाइकिल से शहर की सब्जी मंडी में सब्जी को पहुंचाया जा सकता है. पहले इस के लिए ज्यादा सब्जी के तैयार होने का इंतजार करना पड़ता था या फिर बिचौलिए को ही बेच दिया जाता था.’’

दरअसल, हाल के कुछ सालों में गांवों को बड़े पैमाने पर सड़कों से जोड़ने का काम किया गया है. जहां पक्की सड़कें नहीं हैं, वहां भी खड़ंजा या ऐसा पक्का रास्ता जरूर बन गया है, जिस पर मोटरसाइकिल से आनाजाना आसान हो गया है. ज्यादातर गांव पक्की सड़कों से जुड़ चुके हैं.

पहले गांवों में पुराने टाइप की ज्यादा तेल की खपत वाली बुलेट, यजदी और राजदूत मोटरसाइकिलें चलती थीं, जिन को चलाना महंगा होता था, लेकिन अब 100 सीसी इंजन वाली कम पैट्रोल से चलने वाली मोटरसाइकिल आने से इन का इस्तेमाल करना किफायती होता है.

दिनोंदिन बदले दोपहिया

मोटरसाइकिल से पहले साइकिल गांव में आनेजाने का अहम साधन होती थी. पहले देश में साइकिलें बनाई नहीं जाती थीं. विदेशों से बन कर साइकिलें यहां आती थीं. साल 1944 में मुंजाल ब्रदर्स ने साइकिल के पार्ट बनाने की कंपनी खोली थी. साल 1951 में एटलस कंपनी ने भारत में साइकिलें बनानी शुरू की थीं. तब से ले कर अब तक तमाम तरह के बदलावों के बाद साइकिल मोटरसाइकिल हो गई है.

साधारण साइकिल से ले कर स्पोर्ट्स की साइकिल तक बहुत सारे प्रयोग किए गए. साल 1956 में मुंजाल ब्रदर्स से हीरो ग्रुप बनाया. साल 1975 तक हीरो कंपनी ने रोजाना 75 सौ साइकिल बनाने का रिकौर्ड बना लिया था. इस के बाद हीरो देश की सब से बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी के रूप में उभरी थी. 

इस समय तक देशभर में मोटरसाइकिल भी आ चुकी थी. साल 1955 में भारत सरकार ने पहली बार सेना और पुलिस के लिए ब्रिटेन से रौयल एनफील्ड मोटरसाइकिल को मंगवाया था. इन को चेन्नई में असैंबल किया जाता था. इन में बुलेट, जावा, यजदी और राजदूत प्रमुख थीं.

पुराने जमाने की ये मोटरसाइकिलें नए जमाने में नौजवानों को अपनी ओर खींच नहीं पा रही थीं. साल 1972 में लैंब्रैटा स्कूटर बाजार में आया. इस के बाद वैस्पा, बजाज सुपर और बजाज चेतक स्कूटर बाजार में आए. स्कूटरों को गांव में बाजार नहीं मिल सका.

साल 1984 में हीरो कंपनी ने जापानी होंडा कंपनी के साथ हाथ मिलाया और हीरो होंडा मोटरसाइकिल बाजार में उतारी. 100 सीसी इंजन वाली यह मोटरसाइकिलें एक लिटर पैट्रोल में 70 किलोमीटर की दूरी तय करती थी. उस समय तक भारत में चलने वाली मोटरसाइकिलें एक लिटर पैट्रोल में 35 किलोमीटर से ज्यादा नहीं जाती थीं. टीवीएस की विक्की भी इस दौर में आई, जिस को पैडल से स्टार्ट किया जाता था. इस की शुरुआती कीमत 35 सौ रुपए थी.

दमदार मोटरसाइकिल की मांग

हीरो होंडा ने मोटरसाइकिल को बहुत लोकप्रिय कर दिया. 100 सीसी की हीरो होंडा मोटरसाइकिल ज्यादा वजन उठाने में दमदार नहीं थी. इस को समझते हुए साल 1994 में हीरो होंडा ने स्प्लैंडर बनाई. इस के बाद दमदार मोटरसाइकिल को बाजार में उतारने की होड़ लग गई.

साल 2000 के बाद तो 100 सीसी पावर वाले इंजन की जगह पर 150 सीसी इंजन वाली मोटरसाइकिल को ज्यादा पसंद किया जाने लगा.

साल 2001 में बजाज पल्सर ने दमदार मोटरसाइकिल में अपना अलग बाजार बना लिया था. कुछ नौजवानों को 250 सीसी पावर वाली यमहा फे्रजर भी खूब पसंद की जाने लगी.

बजाज कंपनी ने 125 सीसी पावर वाली डिस्कवर को भी गांव के बाजार को ध्यान में रख कर तैयार किया. हीरो होंडा के बाद सब से कामयाब मोटरसाइकिल में डिस्कवर गिनी जाती है.

नए जमाने की मोटरसाइकिल सेल्फ स्टार्ट इंजन वाली आने लगी हैं. इस के बावजूद लोग किक स्टार्ट वाली मोटरसाइकिल को पसंद करते हैं.

वाहन बाजार पर लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं, ‘‘पूरी दुनिया में तमाम तरह की मोटरसाइकिलों का कारोबार बढ़ रहा है. गांव के यातायात में मोटरसाइकिल तेजी से अपना दबदबा बढ़ाती जा रही है.

‘‘पिछले कुछ समय से यह भी देखा गया है कि केवल लड़के ही नहीं, लड़कियां भी मोटरसाइकिल का जम कर इस्तेमाल करने लगी हैं. स्कूटर के मुकाबले मोटरसाइकिल से सफर करना आसान होता है. थकान कम लगती है और खराब रास्तों पर भी यह स्कूटर से बेहतर चलती है.’’

जरूरत व शौक का बाजार

शौक के लिए मोटरसाइकिल रखने वाले लोग दमदार मोटरसाइकिल को पसंद करते हैं. जौन अब्राहम और दूसरे फिल्मी कलाकारों की तरह नौजवान मोटरसाइकिल का शौक रखते हैं.

लखनऊ शहर में ही बुलेट मोटरसाइकिल के 6 से ज्यादा शोरूम हैं. इस के बाद भी बुलेट खरीदने के लिए 4 से 6 महीने तक का इंतजार करना पड़ता है. रौयल एनफील्ड की एक लाख, 25 हजार से ले कर एक लाख, 75 हजार रुपए के बीच कीमत की मोटरसाइकिलें बाजार में मुहैया हैं.

दिल्ली के बाजार में स्पोर्टी और भारीभरकम मोटरसाइकिल देखने को मिलती हैं. दिल्ली के आसपास गुड़गांव, नोएडा के गांवों तक में अपने रईसी शौक के चलते लोगों ने लग्जरी मोटरसाइकिल भी खरीदी हैं.

पहाड़ों पर दमदार मोटरसाइकिल को ज्यादा पसंद किया जाता है. मोटरसाइकिल का बीमा और सर्विस दोनों ही जब से मोटरसाइकिल बेचने वाली एजेंसी से ही होने लगी है, तब से लोगों को आरटीओ दफ्तर के चक्कर नहीं लगाने पड़ते, जिस से इन की खरीदारी बढ़ी है

कारों से महंगी मोटरसाइकिलें

हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में महंगी मोटरसाइकिलें भी दिखने लगी हैं. थंडरबर्ड एलटी जैसी मोटरसाइकिल होंडा सिटी, फौक्सवैगन वैंटो, हुंडई वरना और स्कौडा रैपिड जैसी फुलसाइज सिडान कारों से महंगी है. 1699 सीसी की क्षमता वाली थंडरबर्ड 15 लाख, 75 हजार की कीमत वाली है. महंगी मोटरसाइकिल में कावासाकी, हार्ले डेविडसन और डुकाटी मौजूद हैं. अब इटली की बेनेली कंपनी ने 3 लाख से 11 लाख के बीच की कीमत वाली 5 मोटरसाइकिलों के मौडल लौंच किए हैं.

महंगी मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनियों की नजरें भी देश के गांवदेहात के बाजार पर हैं. जिस तरह से गांवों में फार्म हाउस कल्चर बढ़ रहा है, उस से इस तरह की महंगी मोटरसाइकिलों का चलन भी बढ़ने लगा है. महंगी कारों के बाद अब गांवों में महंगी मोटरसाइकिलें भी दिखने लगी हैं. जिन गांवों में पहले 100 सीसी इंजन वाली 35 से 40 हजार कीमत वाली मोटरसाइकिलें खरीदी जाती थीं, वहीं अब 150 से 250 सीसी इंजन वाली महंगी मोटरसाइकिलें खरीदी जाने लगी हैं.

बदलती लाइफ स्टाइल का असर

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन पूनम दुबे कहती हैं, ‘‘फिल्मों में भी लड़केलड़कियों को मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते दिखाया जाता है, जिस से नौजवानों में इस के प्रति रुझान बढ़ रहा है. अब छोटे शहरों और गांवों में भी सब से ज्यादा मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल हो रहा है.’’

 

नौजवानों में बढ़ा है क्रेज

 

वाहन बाजार पर लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं, ‘‘तकरीबन 70 फीसदी नौजवान मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करते हैं. कम तेल के खपत वाली मोटरसाइकिल आने के बाद गांवों में लोगों का इस पर सवारी करना आसान हो गया. अब गांव के पास से सड़कें और हाईवे निकलने लगे हैं, जहां पर पैट्रोल की सुविधा मिलने लगी है. अब तो जगहजगह पैट्रोल पंप खुल गए हैं.’’  

चाटुकारों से घिरते नरेंद्र मोदी

साधारण से बहुत असाधारण हो जाने तक  के लंबे सफर मे प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी ने बहुत उतार चढ़ाव और तरह तरह के लोग देखे हैं पर चाटुकारों से उनका वास्ता पहली बार पड़ रहा है और यह चाटुकारिता भी इतने अव्वल दर्जे की है कि इन्दिरा युग के वे लोग भी शर्मा जाएँ जो इन्दिरा इज इंडिया और इंडिया इज इन्दिरा का नारा बुलंद करते थकते नहीं थे,  क इयों ने तो इन्दिरा गांधी को देवी तक का दर्जा दे दिया था.

अब इसी तर्ज पर नरेंद्र मोदी को अवतार कहने बालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है. उनमे ताजा नाम मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का है, जिनहोने भोपाल मे कहा कि नरेंद्र मोदी जो काम कर रहे हैं वह किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं. एक तरह से शिवराज ने मोदी को अवतार घोषित कर दिया है. ठीक इसके 4 दिन पहले वेंकइया नायडू ने भाजपा की एक मीटिंग मे मोदी को भगवान का तोहफा बताया था और इसके कुछ पहले अभिनेता अनुपम खेर ने कहा था कि प्रधानमंत्री का चमचा कहलाने पर उन्हे  फख्र महसूस होता है. इसमे कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी के नाम की इन दिनो तूती बोल रही है उनकी कृपा दृष्टि जिस पर पड़ जाए उसकी ज़िंदगी सँवर जाती है. इसकी जीती जागती मिसाल मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी हैं और जिस पर उनकी भोंहे तिरछी हो जाएँ उसको सियासी तौर पर मिटने मे कुछ दिन ही लगते हैं. भाजपा के पितृ पुरुष लालकृष्ण आडवाणी से लेकर शत्रुधन सिन्हा तक एक लंबी श्रृंखला है, जिसमें जाने कितने जोशी, जेठमलानी, और जसवंत जड़े दिख जाते हैं.

खतरा न पालने मे यकीन रखने बाले नरेंद्र मोदी के लिए अब ये नए चाटुकार बड़ा खतरा हैं जो उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले दुआ यह मांगते थे कि कैसे भी हो यह आदमी पीएम नहीं बनना चाहिए लेकिन मोदी बन गए और पूरी शान से डटे हैं, तो इन लोगों को भगवान याद आ रहा है. हालांकि मोदी को भगवान कहने की शुरुआत सबसे पहले साध्वी उमा भारती ने एक साल पहले की थी जिनके मंत्री होने के बाद भी कहीं अते पते नहीं हैं.

इन्दिरा गांधी  के डूबने की एक बड़ी वजह इसी प्रजाति के चाटुकार और खुशामदिए थे, मोदी को यह बात मालूम है लेकिन अपनी तारीफ हर किसी को अच्छी लगती है. लिहाजा वे इन लोगों से यह नहीं कह पा रहे की मुझे आदमी ही रहने दो भगवान या अवतार मत बनाओ. इन चाटुकारों के अपने स्वार्थ मोदी को लेकर हैं, जिनहे ये ज्यादा दिन छुपाकर नहीं रख पाएंगे, लेकिन लोकतन्त्र मे असली भगवान आखिरकार जनता ही साबित होती है, जो एक झटके मे राजा को रंक और रंक को राजा बना देती है. चाय बेचने बाले मोदी खुद इसकी मिसाल हैं लिहाजा उन्हे कुकुरमुत्ते से उग रहे इन चाटुकारों से खबरदार तो रहना पड़ेगा, जिनहोने उन्हे भगवान बनाने का ठेका ले रखा है और इनमे से अधिकांश आडवाणी गुट के हैं यानि खतरा दो तरफा है .

जोकोविक का बड़ा बयान, टेनिस वर्ल्‍ड में आ सकता है तूफान

दुनिया के नंबर वन टेनिस खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच ने एक ऐसा बयान दे डाला है जिसके बाद दुनिया भर के टेनिस फैंस को निराशा हो सकती है. जोकोविक ने इंडियन वेल्‍स टूर्नामेंट के सीईओ रेमंड मूर के उस बयान को एक तरह से समर्थन दिया है जिसमें उन्‍होंने कहा था कि आज अगर डब्‍ल्‍यूटीए टूर का अस्तित्‍व बरकरार है तो इसकी वजह हैं टेनिस के पुरुष खिलाड़ी.

जोकोविच ने इस बयान के बाद कहा कि पुरुष खिलाड़ियों को महिला खिलाड़ियों की तुलना में ज्‍यादा सैलरी मिलनी चाहिए. जोकोविच ने ऐसा इसलिए कहा क्‍योंकि उनका मानना है कि लोग महिला खिलाड़ियों से ज्‍यादा पुरुष खिलाड़ियों का मैच देखते हैं.

इससे पहले मूर ने बयान दिया था कि वह अगर कोई महिला टेनिस खिलाड़ी होते तो रोज सोने से पहले भगवान को शुक्रिया अदा करना नहीं भूलते क्‍योंकि उसने टेनिस की दुनिया को रोजर फेडरर और राफेल नडाल जैसे खिलाड़ियों से नवाजा है. मूर के इस बयान की काफी आलोचना हुई और उन्‍हें आखिर में माफी तक मांगनी पड़ गई. वर्ल्‍ड नंबर वन महिला टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियमस ने मूर के बयान को आपत्तिजनक और गलत बताया था.

जोकोविच ने भले ही मूर के बयान को गलत बताया हो, लेकिन वह पुरुष खिलाड़ियों को महिला खिलाड़ियों की तुलना में बेहतर बनाने की ओर इशारा भी कर गए. जोकोविच ने कहा कि यह काफी संवेदनशील परिस्थति है और महिलाएं सम्मान की अधिकारी हैं. लेकिन एक समान पुरस्कार राशि पिछले सात-आठ सालों से चर्चा में है.

अनोखी मैटरनिटी ड्रैस

अनोखा प्रयोग हो तो दुनिया हैरान तो हो ही जाती है. अभी तक आप ने विभिन्न ड्रैसेज व कौस्ट्यूम्स के बारे में सुना होगा जिन्हें पार्टीज व थीम पार्टीज वगैरा में कैरी किया जाता है. लेकिन अभी हाल ही में ब्राजील की मेगाडोस कंपनी ने गर्भवती महिलाओं को मच्छरों से बचाने के लिए मैटरनिटी ड्रैसेज की नई रेंज लौंच की. कंपनी के दिमाग में ऐसा अनोखा आइडिया इसलिए आया क्योंकि अभी तक जीका वायरस से निबटने का कोई ठोस इलाज सामने नहीं आया है और वो अपनी बनाई ड्रैसेज द्वारा गर्भवती महिलाओं व उन के गर्भ में पल रहे शिशुओं को सुरक्षा प्रदान करना चाहते हैं.

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इस ड्रैस में ऐसा क्या खास है जो मच्छर भी गर्भवती महिलाओं के पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए तो आप को बता दें कि इस एंटी जिका ड्रैसेज में मौस्किटो रेपेलंट सिट्रोनेला का प्रयोग किया गया है जो मच्छरों को दूर भगाने का काम करता है. वैसे अगर बौडी पर डायरैक्ट सिट्रोनेला अप्लाई किया जाता है तो इस का असर कुछ मिनटों तक ही रह पाता है.

लेकिन नए प्रयोग में इस खास तत्त्व को माइक्रोकैप्सूल के रूप में तैयार किया गया है और फिर उस कैप्सूल को कपड़ों के फाइबर में ऐंटर करवा कर सिल दिया. मच्छरों से तो रक्षा करें ही साथ ही ये ड्रैसेज दिखने में भी हौट हैं.

आप को बता दें कि इस ड्रैस का प्रभाव तब तक ही रहेगा जब कि सिट्रोनेला कोटिंग इस ड्रैस में स्टे करेगी और इस का पता आप को ऐसे लगेगा कि अगर आप ने 6-8 टाइम्स इस ड्रैस को वौश कर लिया है तो इस का मतलब अब यह मच्छरों को आप के करीब आने में सक्षम नहीं होगी. इसलिए आप को दूसरी ड्रैस खरीदनी ही पड़ेगी.

भले ही इस की कीमत थोड़ी ज्यादा है लेकिन हैल्थ के लिए कुछ भी करेंगे के सामने आप को ये कीमत मामूली ही लगेगी.

एलआईसी में बनाएं कैरियर

वक्तबदल चुका है. आजकल स्कूली पढ़ाई समाप्त होते ही नौजवान आत्मनिर्भर बनने की चाह रखते हैं. यह एक ऐसा समय होता है जब नौजवान अपने भविष्य को संवारने के लिए प्रयास कर रहे होते हैं. ऐसे में पढ़ाई और खर्चों में तालमेल बैठाने के लिए वे कुछ ऐसे काम की तलाश में होते हैं जिसमें उन्हें पैसा भी मिले और पढ़ाई करने के लिए समय भी. उनकी इस तलाश को पूरा करती हैं एलआईसी. जी हां, एलआईसी को अपने कैरियर की शुरुआत के लिए चुना जा सकता है.

एलआईसी एजेंट बन कर आप अच्छा पैसा कमा सकते हैं.  इसके लिए बस आपकी स्कूली शिक्षा का पूरा होना और 18 वर्ष की आयु का होना जरूरी है. दरअसल, एलआईसी में कैरियर की प्रगति अच्छी तरह परिभाषित होती है. साथ ही एलआईर्सी में अपने पेशवर जीवन की योजना को भी आप अच्छी तरह से बना सकते हैं.

हम आपको ऐसे 10 कारण बता सकते हैं कि आप को क्यों एलआईसी एजेंट बनना चाहिए? ये कारण आपके जीवन को बदल सकते हैं, इसलिए एक बार जरूर गौर करें:

1. खुशी देने वाला व्यवसाय: लोग कैरियर का चुनाव हमेशा अपनी या अपने परिवार की खुशी को ध्यान में रख कर करते हैं. खासतौर पर कैरियर के चुनाव में हर कोई अपना फायदा देखता है. औैर अधिकतर जॉब ऐसी ही होती हैं जिनमें सिर्फ नौकरी करने वाले को ही फायदा हो रहा होता है. लेकिन एक एलआईसी एजेंट अपने साथ एलआईसी पॉलिसी खरीदने वाले का भी फायदा कराता है. एलआईसी एजेंट ही वह व्यक्ति होता है जो लोगों को यह एहसास कराता है कि उन्हें अपने आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने और अपने सपनों को साकार करने के लिए अपने धन को कहां निवेश करना चाहिए. ऐसा करने में जब आपको सफलता मिलती है तो जो सकून मिलता है वह किसी और व्यवसाय में नहीं मिलता.

2. एक सफल टीम का हिस्सा बनें: एलआईसी से जुड़ने पर आपको एक सफल टीम का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा. पिछले वर्ष एलआईसी ने मिलियन डॉलर राउंड टेबल में अपने 1317 सदस्यों की हिस्सेदारी दर्ज कराते हुए ग्लोबल फोरम में विश्व के चुनिंदा सफल बीमा एजेंट तैयार करने का खिताब हासिल किया था.

3. आकर्षक पारिश्रमिक: महंगाई के इस दौर में हर चीज की कीमत में बढ़ोत्तरी हो चुकी है. ऐसे में वेतन अच्छा होगा तभी एक अच्छी जीवनशैली का अनुसरण किया जा सकेगा. ऐसे में एलआईएसी एजेंट का कैरियर चुनना एकदम सही है क्योंकि यह सिर्फ आपका वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य की कमाई को भी सुनिश्चित करता है. यह एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें आप अपनी क्षमता के अनुसार अपने लक्ष्यों को तय कर सकते हैं और जिंदगी भर जितना चाहें उतना कमा सकते हैं.

4. स्वतंत्रता: एक एजेंट के रूप में आप एक अच्छे व्यवसायी बन सकते हैं. इस व्यवसाय में आप खुद के बॉस होते हैं, खुद के लिए काम करते हैं, इतना ही नहीं आप अपने क्लाइंट्स भी खुद चुन सकते हैं और जितने चाहें उतने पैसे बना सकते हैं.  सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए आपको किसी भी तरह से अपनी पूंजी लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, जो कि अन्य व्यवसायों में संभव नहीं है.

5. वर्ल्ड क्लास ट्रेनिंग: एलआईसी अपने एजेंट्स को दुनिया का सबसे बेहतरीन प्रशिक्षण देता है. प्रशिक्षण की यह शैली आपको किसी दूसरी कंपनी में देखने को

नहीं मिलेगी. कोई भी कंपनी अपने उत्पाद को बेचने के लिए अनुभवी व्यक्ति चाहती है लेकिन एलआईसी में आपको बिना किसी अनुभव के ही प्रवेश मिल सकता है क्योंकि एलआईसी में अनुभवी ट्रेनरों के द्वारा शामिल हुए सदस्यों को मल्टी डाइमेंशनल ट्रेनिंग दी जाती है जो उन्हें जीवन बीमा पॉलसियों को बेचने में माहिर बना देती हैं.

6. कैरियर एजेंसी प्रणाली के प्रति प्रतिबद्घता: एलआईसी आपके द्वारा किए गए प्रयासों को केवल आज ही नहीं बल्कि जिंदगी के हर मोड़ पर सराहती है और आपको व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है. इतना ही नहीं यदि आपकी परफॉर्मेंस अच्छी होती है तो एलआईर्सी आपको अपनी मैनेजमेंट टीम का हिस्सा बना कर आपके कैरियर को नए स्तर पर पहुंचाता है.

7. बुनियादी सुविधाएं: एलआईसी की सभी ब्रांचों में उसके सदस्यों और कर्मचारियों को बुनियादी सुविधाएं दी गई हैं, जिनके प्रयोग से उन्हें अपना व्यवसाय चलाने औैर उसे आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है.

8. उत्पाद और सेवाओं की फुल रेंज: एलआईसी आपको अपने कस्टमर्स के लिए उत्पाद और सेवाओं की एक बड़ी रेंज उपलब्ध कराता है. आप अपने ग्राहकों की आर्थिक क्षमता को समझते हुए उनके लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उन्हें एलआईसी के विशेष उत्पाद और विभिन्न राइडर्स सेवाएं लेने में उनकी मदद कर सकते हैं. एलआईसी हमेशा अपने कस्टमर्स के लिए उत्पादों की नई और अभिनव श्रृंखला लाती रहती है.

9. बिक्री एंव विपणन समर्थन: किसी भी व्यवसायी के लिए यह सबसे बड़ी सुविधा होती है कि वे अपने उत्पाद की बिक्री के लिए उसे ग्राहकों के मध्य विज्ञापनों के द्वारा पहुंचा सकें. लेकिन यह उतना आसान नहीं होता. मगर यदि आप एलआईसी एजेंट हैं तो यह आपके लिए बेहद आसान है, क्योंकि एलआईसी की अपनी सेल्स और मार्केटिंग टीम होती है, जो उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए समय समय पर उसके विज्ञापनों को प्रकाशित करवाती रहती है.

10. वित्तीय शक्ति: एलआईसी आपको औैर आपके ग्राहकों को बेजोड़ वित्तीय ताकत और दृढ़ता प्रदान करता है.

परिनीता संजय धामापुरकर

18 बरस पहले परिनीता एक एक्सपोर्ट कंपनी में एकाउंटेंट का जॉब करती थीं. रोज घर से ऑफिस और ऑफिस से घर. यही उनका रुटीन था . मेहनत करने के बावजूद अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में और एक सकून भरी जिंदगी जीने में उन्हें कठिनाईयां आ रही थी.

कंपनी के एक मसले को सुलझाने के लिए वो एक दिन एलआईसी के दफ्तर गईं. वह बताती हैं, कंपनी की एक पॉलिसी लैप्स हो रही थी मैं उसी की सर्विसिंग के लिए गई थी. वहीं एक सज्जन मिलें जिन्होंने मुझे एलआईसी के लिए यही काम करने के लिए कहा. उस वक्त मुझे समझ नहीं आया क्या करूं. फिर सोचा की कुछ नया करने में बुराई क्या है सो मैंने एलआईर्सी की सर्विसिंग का काम लेना शुरू किया.

शुरुआत में परिनीता जी को काम आसान नहीं लगा. वह कहती हैं, मुझे यह काम समझ में नहीं आ रहा था. लेकिन एक दिन एक महिला मेरे पास अपने स्वर्गवासी पति की पॉलिसी ले कर आई उसके दर्द को मैने अंदर तक महसूस किया. मैंने उसकी पूरी मदद की पॉलिसी के पैसे दिलवाने में और मैं सफल भी रही. तभी मेरे अंदर इस काम को करने की समझ और आत्मविश्वास दोनों आ गया.

इतना ही नहीं परिनीता की माने तो एलआईसी का काम दिल और दिमाग से किया जाए तो सफलता मिलना निश्चित है. इस सफलता को हासिल करने के लिए परिनीता ने एलआईसी द्वारा अपने एजेंट्स को दी जाने वाली सभी ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया. वह कहती हैं, ट्रेनिंग लेने मेरी जैसी ही कई महिलाएं आती थी.

उनके अनुभव को जान कर और भी हौसला मिलता था.

नॉर्मल एजेंट के रूप में मात्र 12 पॉलिसी की सर्विसिंग से हुई शुरुआत ने आज परिनीता को एक सफल प्रोफेशनल एजेंट बना दिया है. हाल ही में उन्हें अपनी सफलता के प्रमाण के रूप में एक वर्र्ष में लगभग 17000 पॉलिसी सर्विंसिंग और 4000 के करीब पॉलिसी करवाने के लिए एलआईसी द्वारा ऑल ओवर इंडिया सैकंड रैंक दी गई है. इन सब के अतिरिक्त परिनीता अब एक कॉर्पोरेट क्लब एजेंट भी हैं साथ ही उन्हें टॉप ऑफ दी टेबल एजेंट होने का भी खिताब प्राप्त है. बीते वर्ष उन्हें कॉर्पोरेट क्लब द्वारा टोकियों में हुए एजेंट्स के सैमिनार का हिस्सा बनने के लिए भी भेजा गया था.

एक कामयाब प्रोफेशनल एलआईसी एजेंट बनने के बाद परिनीता का कहना है, एलआईसी एजेंट बनने से अच्छा काम और कुछ नहीं.

खासतौर पर महिलाओं के लिए क्योंकि एक महिला ही घरगृहस्थी की जरूरतों को समझ सकती है और उसके हिसाब से आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के जरिए तलाश सकती है. युवा महिलाओं के लिए भी परिनीता का यही कहना है कि, एलआईसी एजेंट बन युवा महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकती हैं और आत्मसम्मान का जीवन जी सकती हैं.

मंजरी देवधर

एकविदेशी कंपनी में कॉस्ट एकाउंटेंट मंजरी देवधर को जब पता चला की उनकी कंपनी अब कहीं और शिफ्ट हो रही है औैर उनके घर से कंपनी तक पहुंचने में 2 घंटे से भी अधिक लगेगा तो जॉब छोड़ना ही उन्होंने उचित समझा. लेकिन घर पर खाली बैठना भी मुमकिन नहीं था. चार्टेड एकाउंटेंट पति ने अपनी ही फर्म में मैनेजमेंट का काम ऑफर किया तो मंजरी ने स्वीकार तो कर लिया लेकिन मंजरी को उस काम में मजा नहीं आया. वह बताती हैं, मुझे पति के फर्म में काम करने पर लग रहा था जैसे मेरे अपनी कोई पहचान नहीं है. मैं अपना काम करना चाहती थी. इसलिए मैं दूसरी जॉब की तलाश में थी.

तब ही एक दिन मंजरी के पति के एक दोस्त का घर आना हुआ. जो कि एलआईसी में एक ऊंचे औहदे पर थे. उन्होंने मंजरी की समस्या समझते हुए एलआईसी एजेंट बनने की सलाह दी. मंजरी को भी एलआईर्सी एजेंट बनने से एतराज नहीं था. वह बताती हैं, यह काम मुझे इसलिए अच्छा लगा क्योंकि इसमें शुरुआत करने के लिए मुझे अपनी पूंजी लगाने की आवश्यकता नहीं थी और न ही ज्यादा घर से बाहर जाने की. मैं घर के काम के साथ ही यह काम भी कर सकती थी.

मंजरी ने इसके लिए सबसे पहले एलआईसी द्वारा एजेंट्स को दी जाने वाली ट्रेनिंग में हिस्सा लिया. वह कहती हैं, एलआईसी की ट्रेनिंग करने से मुझे यह काम और भी आसान लगने लगा.

5 बरस बीत चुके हैं मंजरी को एलआईसी एजेंट के रूप में काम करते करते. इन 5 सालों में मंजरी ने सफलता के कई पैमानों को पार किया. वह अपनी सफलता की कहानी खुद ही बताती हैं, मेरे साथ एक प्लस प्वाइंट था. क्योंकि मेरे पति चार्टेड एकाउंटेंट हैं इसलिए मुझे उनके द्वारा ही क्लांट्स मिल जाते थें. यदि मैं दिनभर में 5 लोगों से भी मिलती थी तो 1 बंदा तो पॉलिसी करवाने के लिए तैयार हो ही जाता था. ऐसा करते करते मेरा 4 महीने में ही मिलियन डॉलर राउंड टेबल में नाम आ गया.

इसके बाद तो मंजरी ने पीछे मुड़ कर ही नहीं देखा. एलआईसी में 2 वर्र्ष पूरे करने पर मंजरी ने अपना कार्पोरेट क्लब मैंबर बनने का टारगेट पूरा किया. मंजरी बताती हैं, एलआईसी में कार्पोरेट क्लब मैंबर बनना बहुत बड़ी बात है क्योंकि इस के कई लाभ हैं. मुझे भी यह लाभ मिले जैसे कार लोन, वो भी बिना किसी सिक्योरिटी के, साथ ही एक विदेश की ट्रिप भी दी गई.

इतना ही नहीं मंजरी एलआईसी की कॉनफ्रैंस में हिस्सा लेने अब तक चाइना, साउथ अफ्रीका और जापान जैसे देश जा चुकी हैं. वह बताती हैं, एलआईसी की सारी कॉनफ्रैंस बड़ी ही मोटीवेशनल होती हैं. हमें यहां बहुत कुछ नया सीखने को मिलता है.

वर्तमान में 500 क्लाइंट्स के साथ डील कर रहीं मंजरी युवाओं को भी एलआईर्सी को करिअर के रूप में चुनने की सलाह देती हैं. वह कहती हैं, युवाओं के लिए एलआईसी एक बेहतर भविष्य का विकल्प हो सकता है क्योंकि एलआईसी एजेंट का काम वो फुल टाइम और पार्ट टाइम दोनों ही तरह से कर सकते हैं. साथ ही इस कार्य में वो अपने खुद के बॉस होते हैं इसलिए उन्हें बहुत कुछ नया अनुभव करने और सीखने को मिल सकता है. आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही एलआईसी एजेंट का काम आत्मसम्मान भी बढ़ाता है.

एलआईसी एजेंट बनने के चरणबद्ध निर्देश

कौन आवेदन करने योग्य है?

एक एलआईसी एजेंट बनने के लिए शैक्षिक योग्यता 12वीं पास अनिवार्य है. उम्मीदवारों को प्रामाणित बोर्ड से जरूरी परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहिए. इस के अलावा उस की उम्र 18 वर्ष या अधिक होनी चाहिए.

प्रक्रिया

– अपने निकटतम शाखा कार्यालय में संपर्क करें और वहां विकास अधिकारी से मिलें.

– शाखा प्रबंधक एक साक्षात्कार आयोजित करेंगे और यदि वे आप को ठीक समझते हैं तो आप को प्रशिक्षण के लिए विभाग/ एजेंसी प्रशिक्षण केंद्र भेजा जाएगा.

– प्रशिक्षण 50 घंटों का होता है और इस में जीवन बीमा व्यवसाय के सभी पक्ष सम्मिलित होते हैं.

– प्रशिक्षण के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद आप को भारतीय बीमा नियामक एंव विकास प्राधिकरण के द्वारा आयोजित पूर्व भर्ती परीक्षा में बैठना होगा.

– परीक्षा सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद आप को शाखा कार्यालय द्वारा अभिकर्त्ता के रूप में नियुक्त किया जाएगा और आप अपने विकास अधिकारी के अधीन टीम का हिस्सा होंगे.

क्या मैं एजेंट बन सकता हूं?

आप बन सकते हैं, अगर-

– आपको बाहर आनेजाने में और लोगों से मिलने में कोई परेशानी न हो .

– आपकी अपना व्यवसाय करने की ख्वाहिश हो.

– आप सिर्फ अपने क्लाइंट्स को अपना बॉस बनाना चाहते हों.

– अपने कार्य समय को आप खुद निर्धारित करना चाहते हों.

– अपनी क्षमता को आंकना चाहते हों.

– अपनी इच्छा के अनुसार कमाना चाहते हों.

पुरस्कार औैर मान्यता

एजेंट्स संस्थान के लिए व्यवसाय करने का महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं और लगातार क्लाइंट्स से जुड़े रहते हैं. इसलिए एलआईसी अपने एजेंट्स की भर्ती को बहुत ही सर्तकता से करती है, ताकि एक अच्छी सर्विस और बेचने के कार्य का उच्च स्तर कायम किया जा सके. ज्ञान उन्मुख लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए, एलआईसी को युवाओं की तलाश रहती है, जो सेवा उन्मुख हों, अच्छे संचारक हों और नए लोगों के साथ उठने बैठने में आनंद लेते हों. और यदि उन्हें सेल्स का अनुभव हो तो इससे उन्हें अतिरिक्त लाभ मिलता है.

पात्रता परीक्षा

एलआईसी एजेंट बनने के लिए उम्मीदवारों को एलआईसी एजेंट प्री रिक्रूटमेंट टैस्ट जो कि भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के द्वारा आयोजित कराई जाती है, उसे पास करना होता है. इससे पहले उम्मीदवारों को एक प्रशिक्षण लेना होता है जिसके बाद ही वो परीक्षा दे सकता हैं. यह ट्रेनिंग विभागीय/एजेंसी प्रशिक्षण केंद्र द्वारा दी जाती है. यह प्रशिक्षण 50 घंटों का होता है और जिसमें जीवन बीमा व्यवसाय के सभी पक्ष सम्मिलित होते हैं.

महत्वपूर्ण बिंदु

– प्रमाणित बोर्ड से शैक्षिक योग्यता 12वीं पास होना अनिवार्य है.

– एलआईसी द्वारा दी गई 50 घंटे की ट्रेनिंग लेना भी जरूरी है.

– आईआरडीएआई प्री रिक्रूटमेंट टैस्ट को पास करना भी आवश्यक है.

आवश्यक योग्यता

– स्व प्रेरणा

– बातचीत करने में निपुण

– बाहर जाने को उत्सुक

एलआईसी एजेंट्स एलआईसी और एलआईसी क्लाइंट्स के बीच एक माध्यम होते हैं. एजेंट्स का काम क्लाइंट्स से मिलकर उन्हें एलआईसी की विभिन्न पॉलसियों को समझाना और उन्हें लेने के लिए क्लाइंट्स को प्रेरित करना होता है.

फर्जी फाइनैंस कंपनियों से रहें सावधान

मथुरा, उत्तर प्रदेश का रहने वाला विश्वेंद्र सिंह पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश करते करते थक चुका था. आखिरकार उस ने हार मान कर अपना खुद का कारोबार शुरू करने की ठानी.

इस के लिए विश्वेंद्र सिंह को पैसों की जरूरत थी. इस वजह से उस ने कई बैंकों से लोन लेने के लिए बातचीत की. लेकिन उसे वहां भी निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि इस के लिए उसे बैंक में सिक्योरिटी के रूप में अचल संपत्ति या गारंटर की जरूरत थी, लेकिन उस की बेरोजगारी के चलते कोई भी उस का गारंटर बनने को तैयार नहीं था. एक दिन विश्वेंद्र सिंह की अखबार पढ़ते हुए उस में छपे एक इश्तिहार पर नजर पड़ी. ‘गारैंटैड लोन, वह भी मात्र 2 घंटे में. नो फाइल चार्ज. नो गारंटर. खर्चा लोन पास होने के बाद.’

इसी तरह का एक इश्तिहार और था, जिस में मार्कशीट पर किसी भी कारोबार के लिए लोन देने की बात लिखी थी. विश्वेंद्र सिंह को इसी तरह के तमाम इश्तिहार उस अखबार में दिखाई पड़े, जिन में 10 लाख से ले कर करोड़ रुपए तक लोन देने की बात की गई थी. उस ने उस अखबार में दी गई मेरठ की एक फाइनैंस कंपनी, जिस का नाम सिक्योर इंडिया सर्विसेज लिमिटेड और पता अबू प्लाजा लेन का था, को फोन किया.

वहां से फोन रिसीव करने वाले शख्स ने उसे बहुत आसान शर्तों पर लोन देने की बात कही. इस के लिए विश्वेंद्र सिंह को मेरठ बुलाया गया. विश्वेंद्र सिंह जब उस लोन कंपनी के दफ्तर में पहुंचा, तो उस से पहले से बताए गए डौक्यूमैंट की फोटोकौपी व उस का फोटो जमा करवा कर 5 लाख रुपए के लोन की फाइल तैयार की गई और उस लोन की कुल रकम की सिक्योरिटी मनी के रूप मे उस से 30 हजार रुपए मांगे गए. इस पर विश्वेंद्र सिंह चौंका और बोला कि इश्तिहार में तो किसी भी तरह की गारंटी या प्रोसैसिंग फीस लेने की बात नहीं की गई थी, तो फिर यह कैसी गारंटी मनी?

इस पर उस लोन कंपनी की तरफ से कहा गया कि वे उसे 5 लाख रुपए बिना किसी गारंटर के दे रहे हैं और वह 30 हजार रुपए सिक्योरिटी मनी के रूप में नहीं दे सकता. इस के बाद विश्वेंद्र सिंह 30 हजार रुपए देने को तैयार हो गया और उस ने उस कंपनी के खाते में 10 हजार रुपए जमा करा दिए और बाकी के पैसे उस ने नकद जमा किए. इस के एवज में उसे बिना कंपनी का नाम पता लिखी एक रसीद थमा दी गई.

इस के बाद सादा कागज पर एक एग्रीमैंट करवाया गया, जिस में यह लिखा गया था कि स्थानीय तहसीलदार से जांच कराने के बाद ही उसे लोन देने की बात की गई थी. उस एग्रीमैंट में यह भी लिखा था कि तहसीलदार की रिपोर्ट अगर उस के पक्ष में होगी, तभी यह लोन दिया जाएगा. इस एग्रीमैंट के बाद विश्वेंद्र सिंह घर चला आया और वह लोन की रकम मिलने का इंतजार करता रहा, लेकिन जब 3 महीने बीत जाने पर भी कंपनी के लोगों ने उस से संपर्क नहीं किया, तो वह सीधे कंपनी के दफ्तर गया और लोन न मिलने की बात कही.

इस पर कंपनी की तरफ से उसे यह कहा गया कि तहसीलदार ने उस के पक्ष में रिपोर्ट नहीं लगाई है, इसलिए अब उसे लोन नहीं दिया जा सकता है. जब विश्वेंद्र सिंह ने तहसीलदार की रिपोर्ट देखने के लिए मांगी, तो उसे यह कर मना कर दिया गया कि यह गोपनीय रिपोर्ट होती है. हम इसे नहीं दिखा सकते. इस के बाद विश्वेंद्र सिंह ने सिक्योरिटी मनी के अपने 30 हजार रुपए वापस मांगे, तो उसे भी कंपनी ने यह कर मना कर दिया वह रकम वापस नहीं की जा सकती है. इस तरह की फर्जी लोन कंपनियों से ठगे जाने का मामला सिर्फ बेरोजगार विश्वेंद्र सिंह का नहीं है, बल्कि हर रोज आसान तरीके से ऐसे लोन लेने के चक्कर में हजारों बेरोजगार ठगी के शिकार होते हैं.

ऐसे पहचानें फर्जी कंपनी

आसान शर्तों पर लोन देने का झांसा देने वाली इश्तिहार कंपनियां ज्यादातर मामलों में फर्जी ही होती हैं, जो भोलेभाले बेरोजगार लोगों को लोन देने के नाम पर शिकार बनाती हैं. ऐसे में अगर आप को आसान शर्तों पर लोन देने का दावा करता कोई इश्तिहार दिख जाए, तो यह समझ लेना चाहिए कि यह महज ठगी करने वाली कंपनी ही होगी, क्योंकि कोई भी कंपनी बिना अपने रुपए की वापसी की गारंटी जांच की पड़ताल किए किसी को भी लोन नहीं देती है.

फर्जी लोन कंपनियों की पहचान के मसले पर पंजाब नैशनल बैंक में मार्केटिंग अफसर अभिषेक पांडेय का कहना है कि कोई भी फाइनैंस कंपनी शुरू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक, सेबी व सिडबी जैसे वित्तीय संस्थानों से लाइसैंस लेना पड़ता है. ये संस्थाएं लाइसैंस देने के पहले खुलने वाली फाइनैंस कंपनी की कई तरीके से जांचपड़ताल करती हैं.

मानकों पर खरी पाए जाने पर उस कंपनी के लोन कैटीगरी को तय किया जाता है कि वह किस तरह का लोन देना चाहती है. इस में  घर का लोन, गाड़ी के लिए लोन, कारोबार वगैरह की अलगअलग कैटीगरी तय की जाती है. अभिषेक पांडेय के मुताबिक, कोई भी लोन देने वाली कंपनी एक फीसदी  सालाना के न्यूनतम ब्याज पर कर्ज दे कर नहीं चलाई जा सकती है, वह भी कर्ज वापसी के लिए बिना किसी छानबीन व गारंटी के तो यह एकदम मुश्किल है. अगर कोई कंपनी इस तरह के लोन देने का दावा करती है, तो वह धोखाधड़ी व ठगी के मकसद से ही ऐसा कर रही होती है.

इन से ही लें लोन

अगर आप बेरोजगार हैं और किसी तरह का लोन लेना चाहते हैं, तो इस के लिए बैंक व फाइनैंस कंपनी से ही आप का लोन लेना ज्यादा अच्छा होता है. एक वित्तीय सलाहकार मनमोहन श्रीवास्तव के मुताबिक, लोन देने के पहले बैंकों द्वारा लोन लेने वाले के पते की छानबीन कर पूरी गारंटी के साथ ही लोन दिया जाता है. बैंक द्वारा लोन के लिए सरकार व भारतीय रिजर्व बैंक की गाइडलाइन के मुताबिक ही फीस ली जाती है. अगर आप किसी कारोबार के लिए लोन ले रहे हैं, तो बैंक उस के लिए उस कारोबार का प्रोजैक्ट मांगता है. उस प्रोजैक्ट रिपोर्ट के संतुष्ट होने के बाद ही लोन देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है.

मनमोहन श्रीवास्तव का आगे कहना है कि बैंक द्वारा जो ब्याज की रकम ली जाती है, वह इश्तिहारी लोन कंपनियों के बजाय ज्यादा तो होती है, लेकिन यह भारतीय रिजर्व बैंक की गाइडलाइन के मुताबिक ही तय होती है, जिस में धोखाधड़ी का कोई डर नहीं होता है. उन का कहना है कि अगर अखबारों में आसान शर्तों पर लोन देने के इश्तिहार दिखाई दें, तो उस पर ध्यान न दे कर बैंकों से लोन लेने की कोशिश करें. इस लोन को हासिल करने में भले ही समय लगे, लेकिन इस में आप की जेब का पैसा डूबने का डर नहीं रहता है.

दलित देश की रीढ़

उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है और चूंकि पंचायत चुनावों में बहुजन समाज पार्टी को काफी सीटें मिली हैं, निगाहें मायावती की ओर लगी हैं. मायावती देश की एकमात्र दलितों की नेता बची हैं और उत्तर प्रदेश में खासी दमदार और खजाने में काफी पैसा रखने के बावजूद वे दलितों के लिए कहीं कुछ करती नजर नहीं आ रही हैं. उन का काम सिर्फ चुनाव जीतना, सीटें बांटना, दलितों पर कुछ होने पर बयान देना और अपने चमचमाते हीरे दिखाना भर रह गया है. काली वरदी वाले सुरक्षा बल से घिरी मायावती दूरदूर तक दलितों की नेता नजर नहीं आतीं.

यह जरूरी नहीं कि गरीबों का नेता गरीब नजर आए, पर अंधभक्तों के नेताओं को तो देखो, वे हर समय तिलक लगाए, भगवा गमछा ओढ़े, कमल का बिल्ला लगाए, हाथ में कलेवे बांधे नजर आते हैं और अंधभक्तों को बारबार एहसास दिलाते हैं कि अंधभक्ति ही उन की संपन्नता का राज है. मायावती से भी यही उम्मीद होनी चाहिए कि वह अछूत दलितों जैसी चाहे न लगें, पर कम से कम एक साधारण औरत तो लगें.

मायावती ने जब से शानशौकत को पाया है, दलितों की समस्याओं से दूर होती जा रही हैं. उन्हें दलितों, अछूतों, अति पिछड़ों, गरीब किसानों, कारीगरों की मुसीबतों से कुछ लेनादेना नहीं रह गया. लखनऊ में उन्होेंने जो महल बनवाए हैं, उन में फटेहाल गरीब क्या अपनी मुसीबतों की झलक देख पाते हैं? इतने भव्य तो अमीरों के, ऊंची जातियों के मंदिर भी नहीं हैं, जितने अंबेडकर के हैं.

दलित देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. उन का काम ही देश को ऊंचाइयों पर ले जा सकता है. 25-30 करोड़ दलित अगर अमेरिकियों और चीनियों की तरह काम करने लगें, तो देश सोने की चिडि़या बन सकता है. उन्हें ऐसा नेता चाहिए, जो उन की सोती हुई कर्मठता को झकझोर सके. जो उन्हें मेहनत पर मजबूर करे. जो उन्हें खुशहाली का रास्ता नई तकनीकों, नई पढ़ाई से बताए. जो पर्स न झुलाए, ठीक उस तरह उकसाए जैसे लाल कृष्ण आडवाणी राम मंदिर के लिए उकसाते थे, नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिनों के लिए बहकाया था. इन दोनों ने अपनी जमात को बहला कर 1998 व 2014 के चुनाव जीत लिए, पर दलितों को सिर्फ आरक्षण का लौलीपौप दिया जा रहा है.

मायावती को तो अगली पीढि़यों के लिए कुछ करना चाहिए. उन्हें दूसरा कांशीराम, अंबेडकर बनना चाहिए. उन्हें उत्तर प्रदेश से शुरू कर दलित सुधार की जोत सारे देश में जलानी चाहिए. उन्होंने राज बहुत कर लिया, अब कुछ बदलाव का काम करें. राज अपनेआप झोली में आ जाएगा.

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