Download App

जब महिला हो ड्राइविंग सीट पर

‘‘करीब 50 वर्षीय उस व्यक्ति ने जब मेरी बाइक के पास से अपनी कार निकाली और फिर अपनी विंडो का ग्लास नीचे किया तो मुझे उस का गुस्से वाला चेहरा साफसाफ दिखाई दिया. मुझे उस के द्वारा कहे जा रहे अपशब्द भी साफ सुनाई दे रहे थे. फिर अचानक वह मेरे नजदीक आया और गुस्से से ऊंचे स्वर में बोला कि यू बिच, रुक जाओ वरना मैं तुम्हें बहुत मारूंगा.

‘‘मैं ने अपनी बाइक रोकी और कहा कि ठीक है शुरू हो जाओ, पर जो भी करना है जल्दी करो. मुझे काम पर जाना है. फिर जैसे ही मैं ने अपना हैलमेट उतार कर अपने लंबे बालों को लहराया तो मुझे देख कर उस के होश उड़ गए. उस समय उस का चेहरा देखने लायक था. फिर बिना एक पल रुके मेरी नजरों से वह ओझलहो गया.’’

यह आपबीती न्यूयौर्क के प्रोफैशनल बीएमएक्स रेसर और औटो जर्नलिस्ट जैक बरुथ की है. जैक बरुथ कहते हैं कि जब से उन्होंने अपने बालों को लड़कियों की तरह लंबा रखना शुरू किया तब से जाना कि कैसे अमेरिकी सड़कों पर कायर रोड रेजर्स महिलाओं की बुलिंग करते हैं. इस घटना में जैक बरुथ के लंबे बालों को देख कर उस कार ड्राइवर को उन के महिला होने का मुगालता हो गया था, इसलिए उस ने जैक बरुथ के साथ दुर्व्यवहार किया था.

जैक बरुथ कहते हैं, ‘‘मेरे साथ ऐसी घटनाएं कई बार घटित हो चुकी हैं, जब सड़क पर मुझे महिला समझ कर मेरे साथ दुर्व्यवहार हुआ है. हालांकि मेरे लंबे बालों को देख कर अगर किसी को मेरे महिला होने का धोखा होता है तो यह उस की गलती है, क्योंकि मैं 6 फुट 2 इंच लंबा और करीब 109 किलोग्राम वजन का बांका जवान हूं.’’

आगे वे कहते हैं, ‘‘दरअसल, होता यह है कि जब मैं सड़क पर पुरुष ड्राइवरों को परेशान करने के लिए उन के सामने से लेन चेंज करते हुए उन्हें ओवरटेक करता हूं तो पीछे से मेरे लंबे बालों को देख कर वे बरदाश्त नहीं कर पाते कि एक महिला भला इतनी अच्छी ड्राइविंग कैसे कर सकती है और फिर वे मेरा पीछा करते हैं, हौकिंग करते हैं, मेरा ध्यान बंटाने की कोशिश करते हैं. लेकिन जैसे ही मैं अपना हैलमेट उतारता हूं और वे अपने सामने एक पुरुष को देखते हैं तो डर कर बिना कुछ कहे आगे निकल जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो.

‘‘अमेरिकी सड़कों पर महिलाओं के साथ बुलिंग की एक और घटना मैं आप के साथ शेयर करना चाहता हूं. एक बार मैं अपने औफिस की पार्किंग से अपनी गाड़ी निकालने की कोशिश कर रहा था. मेरी गाड़ी तीसरे नंबर पर थी. मेरे आगे की गाड़ी में एक महिला ड्राइवर और उस के आगे एक पुरुष ड्राइवर अपनी गाड़ी में था. पुरुष ड्राइवर पर्याप्त जगह होने के बावजूद अपनी गाड़ी निकाल नहीं पा रहा था. मैं परेशान हो कर हौर्न बजा रहा था. तभी मैं ने देखा कि वह पुरुष ड्राइवर बाहर निकला और पिछली कार में बैठी महिला ड्राइवर की कार की खिड़की को गुस्से से जोरजोर से पीटना शुरू कर दिया. तभी मैं अपनी गाड़ी से बाहर निकला और उसे समझाया कि हौर्न मैं बजा रहा था न कि यह महिला. मुझे समझ नहीं आता कैसे कुछ पुरुष ट्रैफिक जोन का फायदा उठा कर महिलाओं को परेशान करते हैं और उन्हें डरातेधमकाते हैं.’’

जैक बरुथ का कहना है, ‘‘मैं कोई सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाला क्रांतिकारी नहीं हूं, लेकिन अपने लंबे बालों की वजह से जो मैं ने देखा और महसूस किया उस का खंडन नहीं किया जा सकता कि कैसे अमेरिकी सड़कों पर भी पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं रोजरोज अपशब्दों की मार का शिकार होती हैं. मेरे दोस्त मुझे कहते हैं कि मैं अपने बाल छोटे करवा लूं और अपना गर्ली हैलमेट बदल लूं, लेकिन मैं ऐसा हरगिज नहीं करने वाला हूं सिर्फ इसलिए कि मैं महिलाओं के साथ होने वाले बर्ताव और विद्वेष से बच सकूं, बल्कि मैं तो चाहूंगा कि मेरे लंबे बालों की वजह से जो मेरे साथ घटित होता है उस से पुरुष एक सबक लें और महिलाओं के प्रति अपना व्यवहार बदलें, उन्हें सम्मान दें.’’

भारतीय सड़कों पर महिलाओं की स्थिति

अगर भारतीय सड़कों पर महिला ड्राइवरों के साथ होने वाले व्यवहार की बात की जाए तो यहां भी हालात अमेरिका से कुछ इतर नहीं हैं. भारत जैसे पुरुषप्रधान देश में पहले महिलाएं घर की जिम्मेदारियां संभालती थीं और पुरुष के हाथों में स्टेयरिंग होता था. लेकिन अब समय बदल गया है. महिलाएं घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियां उठाने लगीं, तो उन्हेें स्टेयरिंग संभालने का भी अवसर मिला. लेकिन महिला ड्राइवरों को देख कर पुरुषों को उन की यह आजादी पची नहीं और आज भी जब वे किसी महिला ड्राइवर को ड्राइव करते देखते हैं तो उन से बरदाश्त नहीं होता और उन के मुंह से एक ही बात निकलती है कि पता नहीं क्यों दे देते हैं इन्हें गाड़ी चलाने को  अगर वह धीरे गाड़ी चला रही है तो कहेंगे कि अच्छा अभी नईनई सीखी है और अगर वह कौन्फिडैंटली स्पीड में गाड़ी चलाए तो उस का पीछा कर के उसे ओवरटेक करने की कोशिश करते हैं, उस के साथ रेस लगाते हैं.

जरूरत सोच बदलने की

40 वर्षीय आकृति बंसल जो कालेज टाइम से ड्राइविंग कर रही हैं और परफैक्ट ड्राइविंग करती हैं, का इस बारे में कहना है, ‘‘सड़कों पर महिला ड्राइवरों के प्रति पुरुषों का रवैया बहुत खराब होता है. वे हमेशा महिला ड्राइवरों का ध्यान बंटाने की कोशिश करते हैं. अगर पुरुष ड्राइवर उन के साथ रेस लगा रहे हों और उन्हें अपनी स्पीड कम कर के आगे बढ़ने दे दिया जाए तो वे खुश हो कर इसे अपनी जीत समझते हैं. कई पुरुष तो महिला ड्राइवर को ड्राइविंग सीट पर देख कर उस का फोटो खींचने लगते हैं. इस के पीछे उन की मंशा महिला को ड्राइविंग सीट पर देख कर हैरान या तारीफ करने के बजाय उसे विचलित करने की होती है. उन के इस चाइल्डिश व्यवहार पर हंसी आती है. ड्राइव करती महिला कोई अजूबा नहीं है. वह भी आप ही की तरह है. ऐसे में उस का हौसला बढ़ाने के बजाय अंडरएस्टिमेट करने की कोशिश उन के छोटेपन को दर्शाती है. जरूरत है कि पुरुष महिला ड्राइवरों के प्रति अपनी सोच में बदलाव लाएं और उन्हें कमतर न समझें.’’

सड़कों पर झेले जाने वाले झटके

सलाम है उन लड़कियों और महिलाओं को जो पुरुषों की बुलिंग के बाद भी सक्षमता से सड़कों पर ड्राइविंग कर रही हैं. पुरुषों को महिलाओं का ड्राइविंग करते देखना बरदाश्त नहीं होता. महिलाओं के आत्मविश्वास को कम करने के लिए वे सड़कों पर ऐसी हरकतें करते हैं, जो महिला ड्राइवरों के लिए किसी झटके से कम नहीं होतीं.

आइए, जानते हैं भारतीय सड़कों पर पुरुषों द्वारा महिला ड्राइवरों के साथ किए जाने वाले आम दुर्व्यवहार के कुछ नजारे:

– अगर कोई महिला ड्राइवर पुरुष ड्राइवर की गाड़ी को ओवरटेक कर ले तो उस के अहम को ठेस पहुंचती है और वह भिन्नभिन्न तरीकों से महिला ड्राइवर के मन में घबराहट पैदा करने की कोशिश करता है. मसलन, वह ओवरटेक करता है, बिना सिग्नल दिए मुड़ जाता है, भले ही इस में उस की जान को भी खतरा क्यों न हो. लेकिन महिला ड्राइवर के मन में घबराहट पैदा करने में उसे मजा आता है और वह उसे अपनी जीत समझता है.

– अगर कोई महिला एक बार में पार्किंग में गाड़ी पार्क कर दे तो पुरुष उसे ऐसे घूरते हैं कि उस ने इतनी आसानी से गाड़ी कैसे पार्क कर दी. यहां भी वे महिलाओं को कम आंकते हैं. महिलाओं का परफैक्ट ड्राइव करना उन्हें पचता नहीं.

– अगर कोई महिला ड्राइवर पुरुष की गाड़ी को ओवरटेक कर दे तो यह उस के लिए प्रैस्टिज इश्यू बन जाता है और वह स्पीड बढ़ा कर महिला ड्राइवर को जरूर ओवरटेक करता है. जब कोई महिला लेन चेंज करती है, तो उसे जज करते हैं और सभी पुरुष ड्राइवर उस की तरफ हैरानी से देखते हैं जैसे उस की काबीलियत पर भरोसा न हो.

– अगर कोई महिला ड्राइवर गाड़ी को पार्किंग में लगा रही होती हो तो पुरुष उस की मदद के लिए आ जाते हैं. उन्हें लगता है कि यह काम उस के बस का नहीं. वे उसे दिशानिर्देश देने लगते हैं. अगर महिला जाल में फंस जाए तो सुनने को मिल जाएगा कि आप से नहीं होगा, मैं कर देता हूं.

– कुछ पुरुष तो बस इस मौके की तलाश में रहते हैं कि महिला ड्राइवर कोई गलती करे और उन्हें उस का मजाक उड़ाने का मौका मिले.

– कुछ सड़कछाप तो पीछा करने तक से बाज नहीं आते. इस चक्कर में भले ही वे अपना रास्ता भूल जाएं.

– कुछ पुरुष ड्राइवर सड़क पर साथ चलती महिला ड्राइवर को देख कर उस की गाड़ी के पास अपनी गाड़ी ला कर विंडो से कमैंट पास करने से भी बाज नहीं आते, तो कुछ पुरुष अपना म्यूजिक सिस्टम हाई वौल्यूम पर कर के महिला ड्राइवर का ध्यान बंटाने की कोशिश करते हैं.

– कुछ पुरुष सड़क पर यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें महिला ड्राइवर का पीछा करना है या ओवरटेक, बस वे अपनी गाड़ी उस की गाड़ी के पीछे रखते हैं और लगातार डिपर मारते रहते हैं और दिन हो तो हौकिंग कर के परेशान करते हैं.            

सुरक्षित ड्राइवर

हाल ही में न्यू साउथ वेल्स ट्रांसपोर्ट और रोड सेफ्टी यूनिट द्वारा हुई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि महिला ड्राइवर अधिक सुरक्षित ड्राइविंग करती हैं. यातायात के नियमों का पालन करती हैं. कम ओवरटेक करती हैं. पुरुषों की तरह तेज स्पीड में गाड़ी नहीं चलातीं. सीट बैल्ट और हैलमेट पहनने में भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. वे पूरी सतर्कता के साथ

महिलाओं की ड्राइविंग पर जोक्स

मैं लड़कियों की ड्राइविंग के हरगिज खिलाफ नहीं, लेकिन ऐक्सीडैंट के समय ब्रेक मारने की जगह चीख मारना, यह कहां का इंसाफ है

डाक्टर: जब तुम्हें पता था कि कार एक लड़की चला रही है तो तुम्हें सड़क से दूर चलना चाहिए था.

मरीज: कौन सी सड़क, डाक्टर साहब  मैं तो बाग में बैठा भुट्टा खा रहा था.

जब बहकने लगें इनके कदम

पुलिस की 25 साल से भी ज्यादा नौकरी कर चुके 59 साला सबइंस्पैक्टर मोहन सक्सेना को मध्य प्रदेश के मालवा इलाके के शहर शाजापुर में हर कोई जानता था. इस की एकलौती वजह यह नहीं थी कि वे पुलिस महकमे में थे और वरदी पहन कर शहर में निकलते थे, तो लोग इज्जत से सिर झुका कर उन्हें सलाम ठोंकते थे. दूसरी वजह थी उन का एक इज्जतदार कायस्थ घराने से होना. तीसरी अहम वजह जो बीते 2 साल में पैदा हुई थी, वह उन की बहू मालती (बदला नाम) थी, जिस के बारे में हर कोई जानता था कि वह ड्राइवर अंकित चौरसिया से अकसर चोरीछिपे मिला करती थी.

दुनियाभर के लोगों को सही रास्ते पर आने की नसीहत देने वाले दारोगाजी खुद अपनी बहू के बहकते कदम नहीं संभाल पा रहे थे. खून तो खूब खौलता था, लेकिन क्या करें यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

यों बहकी बहू

24 साला अंकित चौरसिया पेशे से ड्राइवर था, जो फिलहाल शाजापुर की ही एक मालदार व इज्जतदार औरत निर्मला गौर की कार चला रहा था. गोराचिट्टा खूबसूरत बांका अंकित खुशमिजाज और बातूनी था. जल्दी ही वह घर के सभी लोगों से घुलमिल गया था. इस के पहले वह मोहन सक्सेना की कार चलाता था. लेकिन 25 साला बहू मालती ड्राइवर अंकित चौरसिया से जरूरत से ज्यादा घुलमिल गई थी. शुरू में तो किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया, लेकिन जल्दी ही वे दोनों चोरीछिपे मिलनेजुलने लगे और उन के प्यार की सुगबुगाहट दारोगाजी के कानों में पड़ी, तो उन्होंने तुरंत अंकित को नौकरी से निकाल दिया और आइंदा मालती से दूर रहने की धमकी दे डाली. यह नसीहत और धौंस बेकार साबित हुई. अंकित की नौकरी छूटी थी, महबूबा नहीं. लिहाजा, वह मोहन सक्सेना और नितिन की परवाह किए बिना मालती से मिलता रहा.

और एक दिन…

बदनामी का पानी तो काफी पहले ही सिर से गुजर चुका था, पर अब इतना लबालब भर गया था कि मोहन सक्सेना को सांस लेना भी मुहाल हो चला था. लिहाजा, उन्होंने नए साल की शुरुआत में कसम खा ली थी कि अगर अंकित सीधे बात नहीं मानता है, तो उसे सबक सिखाने के लिए जो भी रास्ता अख्तियार करना पड़े वे करेंगे. जब किसी भी तरह मानमनोव्वल और धौंस के अलावा तंत्रमंत्र से भी बात नहीं बनी, तो मोहन सक्सेना का अक्ल और सब्र से नाता टूट गया. लेकिन इस बाबत उन्होंने जो रास्ता चुना, वह बेहद खतरनाक था.

झमेला तंत्रमंत्र का

संजय व्यास जैसे तांत्रिकों की छोटे शहरों में बड़ी धाक और पूछपरख रहती है, जिन के बारे में यह मशहूर रहा है कि उन के नीबू काटने की देर भर है,  अच्छेअच्छे रास्ते पर आ जाते हैं. इस मामले में एक बात बड़ी दिलचस्प रही कि मोहन सक्सेना और नितिन तो इस तांत्रिक के चक्कर काट ही रहे थे, लेकिन इस बात से अनजान अंकित भी उस के फेर में आ गया था, जिस की परेशानी यह थी कि मालती उस के वश में पूरी तरह नहीं आ रही थी. वह उसे पसंद तो करती थी, पर शादी करने के लिए राजी नहीं हो रही थी. कुछ दिन तो मजे ले कर संजय व्यास ने उन दोनों से पैसा झटका, पर अंकित गरीब था, इसलिए अनुष्ठानों के नाम पर ज्यादा चढ़ावा नहीं दे पा रहा था. इसी बीच काम हो जाने के लिए लगातार दबाव बना रहे मोहन सक्सेना को वह यह समझा पाने में कामयाब हो गया कि बहू के ऊपर कोई बड़ी बला है, इसलिए अंकित को रास्ते से हटाने का एकलौता उपाय उसे इस दुनिया से ही उठा देना है.

योजना के मुताबिक, संजय व्यास ने अंकित को यह झांसा दिया कि मालती हमेशा के लिए उस के वश में हो सकती है, लेकिन इस के लिए एक खास किस्म का अनुष्ठान करना पड़ेगा. उम्मीद के मुताबिक, मालती के लिए पगलाया अंकित पूजा कराने को तुरंत तैयार हो गया. संजय ने उसे बताया था कि यह खास किस्म की तांत्रिक क्रिया दूर किसी सुनसान सिद्ध जगह पर करनी पड़ेगी. इस पर अंकित ने एतराज नहीं जताया, न ही कोई सवाल किया. 17 जनवरी, 2016 की सुबह अंकित अपनी मालकिन निर्मला गौर के पास गया और उज्जैन जाने के लिए उन की कार मांगी. उस ने बहाना यह बनाया कि वह कुछ दोस्तों के साथ महाकाल मंदिर के दर्शन करने जाना चाहता है. उस की बात पर निर्मला गौर को कोई शक नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपनी कार उसे दे दी.

दोस्त तो नहीं, पर अपने कातिलों में से एक संजय व्यास को उस ने कार में बैठाया और बजाय उज्जैन जाने के तांत्रिक के बताए रास्ते पर गाड़ी दौड़ा दी. बैरसिया तहसील के पास भोजपुरा के घने जंगलों में संजय व्यास ने कार रुकवाई और कहा कि यहीं पूजा होगी. उधर पहले से ही बनाई योजना के मुताबिक, मोहन सक्सेना और नितिन बैरसिया होते हुए भोजपुरा पहुंच गए थे. एक सुनसान जगह को तांत्रिक क्रियाओं के लिए मशहूर बताते हुए संजय व्यास ने अंकित को पूजापाठ के लिए बैठाया. कुछ देर ऊलजलूल क्रियाएं करने के बाद तांत्रिक ने उसे आंखें बंद करने को कहा, तो अंकित ने तुरंत उस के हुक्म की तामील की. अंकित ने जैसे ही अपनी आंखें बंद कीं, तभी पीछे से मोहन सक्सेना और नितिन आ गए. अंकित ने आहट पा कर जैसे ही आंखें खोलीं, तो उन दोनों ने उस की आंखों में पिसी लाल मिर्च झोंक दी. तिलमिलाया अंकित समझ तो गया कि उस के साथ धोखा हुआ है, लेकिन कुछ कर पाता इस के पहले ही उन तीनों ने लोहे की छड़ उस के सिर पर दे मारी. कहीं वह जिंदा न बच जाए, इसलिए वहशी हो गए मोहन सक्सेना, नितिन और संजय ने उस पर पत्थरों से भी हमले किए. जब उस के मरने की तसल्ली हो गई, तो वे तीनों वहां से फरार हो गए.

यों पकड़े गए

17 जनवरी, 2016 की ही दोपहर को बैरसिया पुलिस को एक नौजवान की लाश जंगल में पड़ी होने की खबर मिली, तो लाश बरामद कर कातिलों को ढूंढ़ने का काम शुरू हो गया. हत्या की जगह से कुछ दूर ही खड़ी कार की पड़ताल से पता चला कि यह कार तो शाजापुर की निर्मला गौर नाम की औरत की है. जब उन से पुलिस ने पूछताछ की, तो उन्होंने तुरंत बता दिया कि उन का ड्राइवर अंकित उन से उज्जैन जाने की कह कर कार ले गया था. बैरसिया कैसे पहुंच गया, यह उन्हें नहीं मालूम. इधर मोहन सक्सेना इंदौर होते हुए शाजापुर लौट आए और थाने में शिकायत दर्ज करा दी. उन तीनों ने होशियारी दिखाते हुए मोबाइल फोन साथ नहीं रखे थे, क्योंकि इस से तुरंत लोकेशन पता चल जाती. लेकिन बैरसिया के पैट्रोल पंप पर अंकित ने कार में पैट्रोल डलवाया था. वहां के मुलाजिमों ने कार में संजय व्यास के होने की शिनाख्त की, तो पुलिस वालों के पास अब कहने और करने को ज्यादा कुछ नहीं रह गया था.

हत्या के जुर्म में गिरफ्तार होते ही संजय व्यास तमाम तंत्रमंत्र भूल गया और सारी बात सच उगल दी. जल्दी ही मोहन सक्सेना और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में मोहन सक्सेना ने अपने ही महकमे के मुलाजिमों को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन कहानी में दम नहीं रह गया था, इसलिए उन्होंने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया.

क्या करें घर वाले

जैसे ही बहू, बेटी या घर की दूसरी किसी औरत के बाहरी मर्द से संबंध पकड़े जाते हैं या बदनामी की वजह बनने लगते हैं, तो घर वालों को समझ नहीं आता कि ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. बहकी औरत अगर बहू है, तो ज्यादा रोकने या मारपीट करने पर दहेज का मुकदमा दर्ज कराने की धौंस देती है यानी ससुराल वालों की बेबसी का पूरा फायदा उठाती है और वहीं रह कर उन के सामने ही गलत रास्ते पर चलते रहना चाहती है, क्योंकि यह महफूज रहता है. अगर वह औरत बेटी है, तो डर उस के भागने या पेट से होने का बना रहता है. तीसरा बड़ा डर खुदकुशी कर लेने का होता है, जिस की धौंस पराए मर्द की मुहब्बत में पड़ चुकी औरत अकसर देती भी रहती है. जिस्मानी और जज्बाती तौर पर दूसरे की गिरफ्त में आ चुकी औरत किसी का कहना नहीं मानती और न ही उसे घर की इज्जत और समाज के कायदेकानूनों के अलावा नातेरिश्तों से कोई वास्ता रहता. बात उस समय और बिगड़ती है, जब उस का आशिक भी हौसले दिखाने लगता है. दोनों ही अपने मांबाप और दुनियाजहान के बारे में नहीं सोचते, तो साफ है कि उन्हें समझाने या रोकनेटोकने से कोई फायदा नहीं होता.

इसलिए बेहतर यही है कि जब औरत के कदम बहकने लगे और तमाम नसीहतों के बाद भी वह न माने तो बजाय जुर्म का रास्ता चुनने के उसे अपनी मरजी से जीने दिया जाना चाहिए. इज्जत और समाज की बात इसलिए माने नहीं रखती कि कोई इश्क कभी छिपता नहीं, बल्कि जितना छिपाया जाए उलटे ज्यादा ही विस्फोटक तरीके से दुनिया के सामने आता है. समझाने पर न माने जैसा कि ऐसे मामलों में अकसर होता है, तो कानूनी लिखापढ़ी कर औरत को उस के आशिक के साथ जाने दे कर अपना पिंड छुड़ा लेना एक बेहतर रास्ता है.

हालांकि इस में जगहंसाई भी होगी, पर वैसी और उतनी खतरनाक नुकसानदेह नहीं होगी, जैसी मोहन सक्सेना के मामले में हुई.

औरतें भी समझें हकीकत

पराए मर्द के प्यार में जिन औरतों के पैर संभाले नहीं संभलते हों, उन्हें इस मामले से सबक लेना चाहिए कि जो मर्द उन्हें ब्याह कर लाया है, उस में कोई कमी या कमजोरी हो सकती है, पर उस का यह मतलब कतई नहीं कि उस से इस तरह बदला लिया जाए. दूसरा, यह भी सोचसमझ लेना चाहिए कि ऐसे रिश्तों की उम्र ज्यादा नहीं होती और न ही अंजाम हमेशा अच्छा होता है. इस के अलावा दूसरा मर्द यानी आशिक वफादार ही होगा, इस की कोई गारंटी नहीं होती. कई मामलों से साफ हो चुका है कि वह जिस्म से खेलता है, पैसे ऐंठता है और जोर डालने पर बीच भंवर में छोड़ कर भाग भी जाता है. ऐसी औरत कहीं की नहीं रह पाती.

ऐसे ताल्लुकों से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, सिवाय तांत्रिकों के, जो दोनों पार्टियों से पैसा ऐंठते हैं और फिर बात न बनने पर कत्ल जैसे संगीन जुर्म के लिए उकसाते हैं और ज्यादा पैसों के लालच में उस में साथ भी देते हैं. अगर वे नहीं पकड़े जाते तो तय है कि तांत्रिक संजय व्यास जिंदगीभर सक्सेना परिवार को ब्लैकमेल कर उन से रकम ऐंठता रहता. सब से बड़ा तनाव झेलने वाले घर वालों को चाहिए कि वे चार लोगों को बैठा कर सारा सच खुद उगलें और औरत को भी साथ बैठा लें, जिस से वह कोई झूठ न बोल सके और न ही गलत इलजाम लगा सके. इस से बदनामी जो आज नहीं तो कल होती जरूर होगी, लेकिन जिंदगी बची रहेगी और औरत की गलती भी सामने आ जाएगी.                      

क्यों बहकती हैं औरतें

* पति से जिस्मानी सुख न मिल पाना और शर्म के मारे इस की बात किसी से न कर पाना.

* ससुराल वालों खासतौर से पति से जज्बाती लगाव का पैदा न हो पाना.

* कम उम्र में ही पराए मर्दों से घुलनेमिलने या सैक्स की आदत पड़ जाना.

* घर या ससुराल में बंदिशों का ज्यादा होना और रोजरोज कलह होना.

* दिलफेंक, खूबसूरत जवां मर्दों पर दिल आ जाना, उन की लच्छेदार बातों में फंस जाना, फिर छुटकारा पाने की कोशिश में और उस के जाल में और फंसते जाना.

* पति से समय न मिलना.

* पति का उम्मीद के मुताबिक रोमांटिक न हो पाना.

* इस बात का फायदा उठाना कि ससुराल या घर वाले तो इज्जत के लिए खामोश रहेंगे.

* घर में मन न लगना और हमेशा रोमांटिक और सैक्सी खयालों में डूबे रहना.

‘भारत माता की जय’ पर भागवत का यू-टर्न

भारत माता की जय बोलने को लेकर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं सहित अन्य संगठनों ने जिस तरह से देश में एक महौल बनाया उसका विरोध भी शुरू हो गया. औल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमिन यानि एआईएमआईएम के प्रमुख सांसद असुदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि कोई मेरी गरदन पर छुरा रख दे, तो भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा. ओवैसी ने संविधान का हवाला देते हुए तर्क दिया कि संविधान में भी कहीं भारत माता की जय बोलने को नहीं कहा गया है. ओवैसी ने भारत माता की जय की जगह पर जय हिंद के नारे लगाने का समर्थन किया. पूरे देश में एक तरह की बहस छिड गई. जिसमें भारत माता की जय बोलने और न बोलने को लेकर विवाद हो गया. लखनऊ में किसान संघ के के नवनिर्मित भवन का लोकापर्ण करने आये राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने साफ कहा ‘भारत माता की जय को किसी पर थोपने की जरूरत नहीं है. हमें अपने आदर्शो से ऐसे भारत का निर्माण करना है कि लोग खुद भारत माता की जय बोलने लगे’. इसे संघ प्रमुख के यू-टर्न के रूप में देखा जा रहा है.

दरअसल संघ प्रमुख मोहन भागवत के यू-टर्न की अपनी कुछ खास वजहें हैं. सबसे बडी वजह जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की सरकार का बनना है. जम्मू कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार पहले बनी थी. उस समय के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद करीब 2 माह तक यह गठबंधन अधर में लटका रहा. पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर एकमत नहीं थी. 2 माह बाद यह गठबंधन वापस पटरी पर आ रहा था, इसी बीच भारत माता की जय के नारे का विवाद उठ खडा हुआ. संघ और भाजपा अब इस तरह की विवादित नारे को किनारे रखकर आगे बढना चाहते हैं. केरल, पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में ऐसे नारे नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारत माता की जय के नारे पर सही समय पर यूटर्न लेना ही सही समझा.

संघ प्रमुख ने कहा कि ‘संघ का काम किसकी को जीतना या उस पर अपने विचारों को थोपना नहीं है. अटल बिहारी वाजपेई और रज्जू भैया जैसे संघ और भाजपा के नेताओं ने कभी अपने विचारों को थोपने का काम नहीं किया. इन लोगों ने संघ के विचारों को इस तरह से सामने रखा कि लोग खुद इससे जुडते गये. इस विचारधारा पर काम करने वाले बहुत सारे संगठन है, इनको संघ परिवार के रूप में देखा जाता है. बिहार में विधान सभा चुनाव के पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण के समर्थन में बयान देकर पार्टी के सामने असहज हालात पैदा कर दिये थे. बिहार चुनाव में हार के लिये इस बयान को काफी हद तक जिम्मेदार माना जाता है. ऐसे में केरल, पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के पहले संघ प्रमुख कोई गलती दोहराना नहीं चाहते हैं. ऐसे में भारत माता की जय पर यूटर्न लेना ही सही कदम है.

भारत माता का मंदिर बनायेगी भाजपा

उज्जैन मे आगामी 22 अप्रेल से शुरू होने जा रहे सिंह्स्थ मेले मे इस बार भारत माता का मंदिर भी आकर्षण का केन्द्र रहेगा, जिसे कोई साधु संत नहीं, बल्कि भाजपा बनवा रही है. सिंह्स्थ मेला स्थल पर कोई साढ़े चार एकड़ ज़मीन पर मध्य प्रदेश भाजपा दीनदयाल शहर बसा रही है, जहाँ भारत माता का भव्य मंदिर बनाया जायेगा. इस मंदिर मे भारत माता की 51फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित की जायेगी. भारत माता मंदिर परिसर मे साधु संतों और महात्माओं के प्रवचन होंगे जिनके जरिये वे श्रद्धलुओं को राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ायेंगे. पाठ भक्तो को भाव पूर्ण ढंग से समझ आये इसके लिये 108 कुन्डीय हवन भी समानांतर चलेगा, लोग चाहें तो दान दक्षिणा भी श्रद्धानुसार चढ़ा सकते हैं. उम्मीद की जानी चहिये कि इससे राष्ट्रीयता और धर्म को लेकर बढ़ रहा भ्रम का कोहरा छंट जायेगा और लोग धर्म को राष्ट्रीयता या फ़िर इस नई राष्ट्रीयता को धर्म मान लेने मे हिचकिचायेंगे नहीं.

भारत मंदिर बनाने का आइडिया दरअसल मे आरएसएस का है जो चाहती है कि सभी लोग भारत माता की जय निसंकोच बोलें. भाजपा ने इस मुहिम को शिविर नाम दिया है, जिसमे देश भर से छाँट कर बुलाये कोई 2 हजार कार्यकर्ता सामाजिक समरसता की जवाबदेही निभायेंगे. इतना ही नहीं चौबीसों घंटे लंगर भी शिविर मे चलेगा. श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिये सांस्कृतिक आयोजन भी होंगे. कुम्भ मे राजनीति कतई हैरत की वात नहीं है, लेकिन उज्जैन से कोशिश यह की जा रही है कि लोग संघ और भाजपा के विचारों को ह्रदय से आत्मसात कर लें जिसके तहत धर्म और राष्ट्रीयता की खाई पाट दी जायेगी.

अगर भारत माता बतौर देवी स्वीकार लीं गईं तो राम मंदिर का झंझट ख़त्म हो जायेगा और मुसलमान या सिख अगर इस पर एतराज जताये, जिसकी सम्भावनाये ज्यादा हैं, तो उन्हे देशद्रोही करार दिया जा सके और आम लोगों को बताया जा सके कि देखो हम तो भारत माता के नाम पर जो एक गैर धर्मिक देवी है लोगों को एक झंडा तले इक्कट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं पर ये लोग धर्म को बीच मे घसीटकर एक पवित्र विचार को दूषित कर रहे हैं. इसलिये अब यह आप लोग तय करें कि हकीकत मे सामप्रदयिक कौन है. संघ और भाजपा दोनो ही इस शिविर और मंदिर को लेकर खासे उत्साहित हैं, जो उनके धार्मिक एजेंडे का राष्ट्रीय संस्करण है.

डेटिंग एप चुनेगा आपके लिए लाइफ पार्टनर

जब किसी को कोई पसंद आता है तो उसकी दिल की धडकनें तेज़ होने लगती हैं और सिग्नल देती है कि यही बन सकता आपका लाइफ पार्टनर. लेकिन अब आया है एक ऐसा डेटिंग एप, जो आपकी दिल की धडकनों को सुनकर चुनेगा आपके लिए लाइफ पार्टनर .

‘वन्स’ नाम का यह डेटिंग एप एक ऐसा ही एप है, जो दिल की धड़कनें पढ़कर आपके लिए पार्टनर चुनता है ,यह एप बताएगा कि आपके लिए किसका दिल धड़क रहा है. अब तक यह डेटिंग एप दिन भर में आपको एक संभावित मैच बताता था लेकिन अब इस एप ने एक कदम आगे बढ़कर दिल की धड़कनों के हिसाब से मैच ढूंढना शुरू किया है. तेजी से 6 लाख यूजर्स तक पहुंचने वाले इस ऐप ने हाल में एक अपडेट जारी किया है. इसके जरिए यह फिटबिट और ऐंड्रॉयड वेअर जैसे फिटनस ट्रैकर्स से लिंक हो जाता है. इससे यह यूजर की दिल की धड़कनों को ट्रैक करता रहता है.

वन्स एप देखता है कि यूजर जिसकी प्रोफाइल देख रहा है, उसे देखकर दिल के धड़कने की रफ्तार में कोई बदलाव आया या नहीं. रिसर्च में यह बात साबित हो चुकी है कि जब अगर आप किसी के प्रति आकर्षित होते हैं तो आपकी दिल की धड़कनें बढ़ती हैं. यह एप इसी आधार पर काम करता है. वन्स नामक यह डेटिंग एप यूके, फ्रांस और स्पेन में आईओएस और एंड्रॉयड दोनों प्लैटफॉर्म्स के लिए उपलब्ध है और जल्द ही यह अमरीका में लॉन्च होने जा रहा है. उम्मीद है उसके बाद यह भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी लॉन्च होगा.

अब ऐप करेगा आपका मोटापा कम

आप का वजन ज्यादा है और आप बिना जिम गए अपना वजन कम करना चाहती हैं लेकिन समय की कमी के कारण नहीं कर पा रही हैं तो आप के लिए एक अच्छी खबर है. अब बिना किसी परेशानी के आप आसानी से अपने मोबाइल फोन की मदद से अपना वजन कम कर सकती हैं.

आप यह सुन कर हैरान जरूर होंगी कि भला मोबाइल फोन से कैसे मोटापा कम किया जा सकता है. पर यह सच है, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक ऐसा मोबाइल ऐप तैयार किया है जो आप के मोटापे को कम करने में मदद करेगा.

मैसेसुचेट्स इंस्टीट्यूट औफ टैक्नोलौजी ने एक मोबाइल ऐप विकसित किया है जो आप की एक आवाज से चलेगा और आवाज से संकेत देने पर आप के मोटापे को भी कम करने में मदद करेगा.

इस के लिए बस आप को ऐप औन करने के बाद यह बताना होगा कि आप ने क्या क्या खाया है, इस के बाद ऐप आप को बताएगा कि आप ने कितनी कैलोरी कंज्यूम की है और अब आप को कितने घंटे के बाद कितनी कैलोरी लेना चाहिए.

इस ऐप में यह भी व्यवस्था है कि आप खाना खाने से पहले खाने का मैनू बताएंगे तो यह ऐप आप को बता देगा कि आप को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं और कितनी मात्रा में खाना चाहिए जैसे आप ने एप को बताया कि ब्रेकफास्ट में आप ने दो केला, एक गिलास संतरे का जूस और एक कटोरी लुआ ले रहे हैं तो इस पर सुझाव मांगने पर ऐप आप को बताएगा कि एक केला कम करें.

थोड़ा हम बदलें, थोड़ा आप

पल्ल्वी अपने बेटे चेतन के 12वीं कक्षा पास करने पर बहुत खुश थी, क्योंकि चेतन के अच्छे नंबर आए थे और उस का दाखिला भी मशहूर कालेज में हो गया था. लेकिन चेतन के कालेज शुरू होते ही मांबेटे के बीच दूरी बढ़ने लगी. चेतन कालेज और पढ़ाई में व्यस्त रहने लगा. जो खाली समय मिलता उस में दोस्तों से बातें करता या फिर टीवी देखता. घर में उस की मां भी हैं, वह इस बात को भूल सा गया.

पहले पल्लवी पूरा दिन चेतन के काम में व्यस्त रहती थी, मगर अब खाली बैठी रहती हैं. चेतन के घर में रहते हुए भी उन्हें अकेलापन महसूस होता. वे जब भी चेतन से बात करने उस के कमरे में जातीं तो चेतन हमेशा एक ही जवाब देता कि कि मम्मी, मैं अभी थोड़ा बिजी हूं. थोड़ी देर बाद आप से बात करता हूं.

चेतन की बातें सुन कर पल्लवी पुरानी बातें याद करने लगती कि कैसे सुबह उठ कर उस के लिए टिफिन तैयार करती थी, उस की यूनीफौर्म, नाश्ता सब कुछ समय से पहले ही तैयार रखती ताकि उसे स्कूल के लिए देर न हो. उस के स्कूल से आने से पहले ही जल्दीजल्दी उस का पसंदीदा खाना तैयार करती ताकि बेटे को गरमगरम खाना खिला सके. शाम को कैसे दोनों बातें करते थे, कैसे साथ खाना खाते थे. मगर समय के साथ सब कुछ बदल गया.

पेरैंट्स में बढ़ता अकेलापन

आज पल्लवी की तरह बहुत से पेरैंट्स अकेलेपन की स्थिति से गुजर रहे हैं. आज इंटरनैट, मोबाइल व सोशल मीडिया ने युवाओं की जीवनशैली को इतना व्यस्त बना दिया है कि उन के पास अपने पेरैंट्स के लिए समय ही नहीं रहा. वे अपने कैरियर व दोस्तों में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उन्हें अपने पेरैंट्स के अकेलेपन से कोई वास्ता नहीं रहा. ऐसे में पेरैंट्स के जीवन में खालीपन आने लगता है.

जमशेदपुर की लालिका चौधरी कहती हैं, ‘‘मेरे पति और मेरे बेटे के बीच दूरी इतनी बढ़ गई है कि वे दोनों कईकई दिनों तक एकदूसरे से बात तक नहीं करते. आशुतोष जब छोटा था तब तो ठीक था, लेकिन जैसे ही कालेज जाने लगा बहुत बिजी रहने लगा. हमारे लिए उस के पास टाइम ही नहीं रहता. कालेज से आता तो अपने लैपटौप व फोन में ही व्यस्त रहता. शाम को दोस्तों के साथ घूमने निकल जाता. हम सोचते चलो कोई बात नहीं संडे को हमारे साथ समय बिताएगा, लेकिन संडे को वह काफी देर से सो कर उठता. हम कहीं बाहर चलने के लिए कहते तो मना कर देता. कभीकभी उस के इस व्यवहार पर मेरे पति को गुस्सा आ जाता और वे उसे डांट देते, जिस से घर का माहौल खराब हो जाता.’’

टैक्नोलौजी से बढ़ी दूरियां: आज हम फेस टू फेस बात करना पसंद नहीं करते, लेकिन हमारी फेसबुक पर टैग, पोस्ट व लाइक करने में पूरी रुचि होती है. भले ही टैक्नोलौजी हमें लोगों के पास ले आई हो, लेकिन उस ने हमें अपनों से दूर भी कर दिया है. हम अपने फोन में इतने व्यस्त रहते हैं कि पेरैंट्स से बात करने का समय ही नहीं मिलता. अब तो बच्चे मां से व्हाट्सऐप पर मैसेज कर के ही पूछते हैं कि मां खाना बन गया क्या? प्लीज बन जाए तो मेरे कमरे में ले आना या फिर व्हाट्सऐप पर मैसेज कर देना. मैं खुद ले आऊंगा. इस टैक्नोलौजी ने तो अब साथ बैठ कर खाना खाने की परंपरा को भी खत्म सा कर दिया है. अब बच्चे अपने कमरे में लैपटौप पर पिक्चर देखते हुए या फेसबुक पर गपशप करते हुए खाना खाना पसंद करते हैं. अगर उन्हें डांट कर अपने साथ खाना खिलाया जाए तो वे बेमन से खाते हैं. खाने की मेज पर एकदम शांत बैठे रहते हैं. उन्हें ऐसे बैठे देख कर पेरैंट्स सोचते हैं कि इस से तो अच्छा था कि अकेले ही खा लेते.

मां की बातें लगती हैं उबाऊ: जैसे ही बच्चे स्कूल से कालेज जाने लगते हैं उन्हें मां की बातें भी उबाऊ लगने लगती हैं. मां की चौइस अच्छी नहीं लगती है. मां अगर कह दें कि बेटा यह क्या पहन रखा है, वह शर्ट पहनो, जो हम ने तुम्हें बर्थडे पर दिलवाई थी तो तुरंत उलटा जवाब देते हैं कि मां, आप को फैशन की बिलकुल समझ नहीं है. वैसी शर्ट पहन कर भला कौन कालेज जाता है?

यह तो कुछ भी नहीं है, मां अगर घर से निकलते समय टिफिन पैक कर के दें तो तुरंत गुस्से में जवाब देते हैं कि अब मैं बड़ा हो गया हूं. हर वक्त मां को मौडर्न जमाने के बारे में बताते रहते हैं कि मां अब आप का जमाना नहीं रहा. यह मौडर्न जमाना है. आप के समय की चीजें पुरानी हो चुकी हैं. अब तो हाईटैक जमाना आ गया है. अब फोन व व्हाट्सऐप से ही पढ़ाई की जाती है. इसलिए आप अपने जमाने को अपने तक ही सीमित रखा करें.

जब अच्छे लगने लगते हैं हमउम्र: कई बार ऐसा भी देखा जाता है जब हमें कोई हमउम्र अच्छा लगने लगता है, तो हम हर समय उसी के साथ व्यस्त रहते हैं. अपने पेरैंट्स को भूल जाते हैं. घर आने पर भी फोन पर उसी से बातें करते हैं. उसी के बारे में सोचते रहते हैं.

दोस्तों के लिए टाइम है, पैरेंटस के लिए नहीं: दिन भर दोस्तों के साथ रहने के बावजूद घर आने पर भी पैरेंट्स से बात करने के बजाय दोस्तों के साथ ही फोन पर लगे रहते हैं. देर रात तक दोस्तों के साथ चैट करते हैं, सुबह लेट उठते हैं फिर फटाफट तैयार हो कर कालेज के लिए भाग जाते हैं. मां कुछ भी बोलें तो कहते हैं कि मां अभी टाइम नहीं है, शाम को बात करेंगे. पेरैंट्स के लिए उन की शाम कब आएगी यह वे ही जानें.

ऐसा बिलकुल नहीं है कि इस अकेलेपन के लिए केवल युवा ही जिम्मेदार हैं. कहीं न कहीं पेरैंट्स भी ऐसी छोटीछोटी गलतियां कर बैठते हैं, जिन की वजह से इन के बीच दूरी बढ़ती जाती है. हम आज बच्चों के करीब तभी रह सकते हैं जब हम थोड़ा उन की तरह व्यवहार करें, उन्हें समझें.

कभी तुलना न करें: अकसर मातापिता अपने बच्चों से कहते रहते हैं कि हम जब तुम्हारी उम्र के थे तो सारा काम अकेले ही करते थे. इस तरह की बातें न करें. आप को यह बात समझनी होगी कि आप का समय अलग था, आज का समय अलग है. इस तरह से तुलना करने की वजह से बच्चे आप से दूर होने लगते हैं. वे आप की बात नहीं सुनते. हर समय अपने में व्यस्त रहने लगते हैं. फिर उन के इस तरह के व्यवहार के कारण आप को अकेलापन महसूस होने लगता है.

प्रतिक्रिया से बिगड़ती है बात: बच्चों के कुछ गलत करने पर मातापिता तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं. उन्हें डांटने लगते हैं. आप जल्दबाजी में ऐसा बिलकुल न करें, प्यार से समझाएं. अगर आप उन के साथ सख्ती से पेश आएंगे, तो वे आप से दूर होने लगेंगे.

थोड़ी स्वतंत्रता दें: पेरैंट्स ऐसा सोचते हैं कि बच्चों को स्वतंत्रता दी तो वे बिगड़ जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं है. आप उन्हें जितना नियंत्रण में रखेंगे वे आप से उतना ही दूर होते जाएंगे.

खुद को भी बदलें: आज हर चीज तेजी से बदल रही है, इसलिए आप भी खुद को थोड़ा बदलने की कोशिश करें. आप के बच्चे आप को जिस चीज में सुधार लाने के लिए कहें, उस में थोड़ा बदलाव लाएं, बच्चों को अच्छा लगेगा. अकसर ऐसा होता है कि अगर घर में बच्चे के दोस्त आए हैं तो पेरैंट्स जिस ड्रैस में होते हैं, उसी में उन के सामने चले जाते हैं. ऐसा न करें. पेरैंट्स के इस तरह से आने से हो सकता है कि उन के बेटे के दोस्त बाद में उस का मजाक उड़ाएं और फिर इस वजह से आप का बेटा घर पर अपने दोस्तों को बुलाना ही बंद कर दें.

आप ने घर पर कैसी भी ड्रैस क्यों न पहनी हो. लेकिन बच्चे के दोस्त के सामने अच्छे कपड़ों में ही जाएं. कई बार बच्चे चाहते हैं कि आप भी उस के दोस्त की मां की तरह जींस पहनें. अगर आप मोटी हैं और आप के ऊपर वैस्टर्न कपड़े अच्छे नहीं लगते तो अपनी पर्सनैलिटी में सुधार लाएं. माना कि आप अपना मोटापा तुरंत कम नहीं कर सकतीं, लेकिन आप ऐसी ड्रैस तो पहन ही सकती हैं जिस में आप का बच्चा आप को अपने दोस्तों से मिलवाने में हिचकिचाए नहीं.

क्या हो बच्चों की भूमिका

अगर आप पढ़ाई के सिलसिले में दूसरे शहर में हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आप के और आप के घर वालों के बीच दूरी न बढ़े. आप उन से दूर हैं तो क्या हुआ? आप उन से फोन से जुड़े रहें. उन के फोन का जवाब दें. कई युवाओं के साथ यह भी देखा गया है कि वे कैरियर की टैंशन में इतने परेशान रहते हैं कि पेरैंट्स से उन का लगाव कम होने लगता है. वे हर समय अपने कैरियर की चिंता करते रहते हैं. आप को यह बात समझनी जरूरी है कि कैरियर अपनी जगह है और घर वाले अपनी जगह. कुछ बच्चे जब छुट्टियों में घर आते हैं तो उस वक्त भी दोस्तों के साथ ही व्यस्त रहते हैं, लेकिन आप ऐसा न करें. आप ज्यादा से ज्यादा समय पेरैंट्स के साथ बिताएं, उन से बातें करें, उन के साथ शौपिंग पर जाएं, उन के लिए सरप्राइज प्लान करें.

अगर घर में अपने पेरैंट्स के साथ रहते हैं तो अपनी पढ़ाई, दोस्त व कालेज से थोड़ा समय निकाल कर अपने घर वालों के साथ बिताएं. कालेज में हैं तो एक बार फोन कर पेरैंट्स का हालचाल पूछ लें. अपने लैपटौप पर अकसर फिल्म देखते रहते हैं. किसी दिन पेरैंट्स को साथ ले कर उन की पसंदीदा फिल्म देखें. इस तरह पेरैंट्स और बच्चों के बीच दूरी नहीं बनेगी और रिश्तों में मिठास बनी रहेगी.  

एक्सरसाइज़ के दौरान दिल की सुनें

सेहत की बात हो तो सभी सबसे पहली सलाह एक्सरसाइज़ यानी कसरत की देते हैं  लेकिन क्या आप जानते हैं जिस तरह जरूरत से ज्यादा दवाइयां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं, ठीक उसी तरह जरूरत से ज्यादा कसरत करना सेहत के लिए हानिकारक भी  हो सकता है.

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न के बेकर आईडीआई हार्ट एंड डायबिटिक इंस्टीट्यूट द्वारा हुए शोध के अनुसार ज्यादा कसरत करने से हृदय संबधी परेशानियां होती हैं, इस शोध में शोधकर्ताओं ने उन अध्ययनों की समीक्षा की जो कसरत और हृदय संबंधी परेशानियों के संबंध में किए गए हैं और पाया कि इसके पुख्ता सबूत हैं कि खूब सारा कसरत करने से कार्डियो संबंधी और हृदय संबंधी स्थायी परेशानियां पैदा हो जाती हैं.

माना कि स्वस्थ शरीर के लिए व्यायाम ज़रूरी है लेकिन सेहत के लिए घंटो जिम में पसीना बहाने से पहले  इतना अवश्य जान लें कि कहां रुकना है. व्यायाम के दौरान अकड़न, अधिक दर्द, नसें खिंचना, सूजन या बारबार चोटिल होना कुछ ऐसे लक्षण हैं, जहां अपने शरीर की सुन कर व्यायाम में बदलाव करने की जरूरत होती है.

1 रुपये में मिल रहा है डेल का लैपटॉप, आप भी लीजिए

डेल इंडिया ने भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद कमाल का ऑफर पेश किया है. इस ऑफर का नाम है 'बैक टू स्कूल'. जहां उपभोक्ता मात्र एक रुपए देकर नया लैपटॉप घर ले जा सकते हैं. यह ऑफर मई माह तक ही सीमित है.

आईटी कंपनी डेल ने अपना एक नया प्रोग्राम बैक टू स्कूल सीजन शुरू किया है. यह प्रोग्राम 22 मार्च से 31 मई तक जारी रहेगा. इस प्रोग्राम के चलते डेल यूज़र्स डेल इंस्पायरॉन डेस्कटॉप, या इंस्पायरॉन 3000 सीरीज का लैपटॉप खरीद सकते हैं वो भी केवल एक रुपए में. इसके बाद लैपटॉप की अतिरिक्त राशि इंस्टालमेंट में दी जा सकती है.

जो उपभोक्ता इंस्पायर डेस्कटॉप लैपटॉप की खरीद में 999 रुपए अतिरिक्त देंगे, उन्हें इसके साथ दो साल की वारंटी भी मिलेगी व बाटा का एक शॉपिंग वाउचर भी मिलेगा. जबकि इंस्पायरॉन 3000 सीरीज का लैपटॉप खरीदने पर 999 रुपए अतिरिक्त देने पर उपभोक्ताओं को दो साल कि वारंटी मिलेगी.

बैक टू स्कूल ऑफर ऑफर पूरे देश में वैलिड है. आप भारत में कहीं से भी इस स्कीम के अंतर्गत लैपटॉप खरीद सकते हैं.

‘नो बेड आफ रोजेस’ का निर्माण कर रहे हैं इरफान खान

बौलीवुड के साथ साथ हौलीवुड में भी सक्रिय अभिनेता इरफान खान को फिल्म निर्माण में मजा आने लगा है. इसी के चलते ईशान नायर निर्देशित फिल्म ‘‘काश’’ का निर्माण करने के बाद इरफान खान अब बतौर सह निर्माता दूसरी फिल्म भी बनाने जा रहे है. जी हां! अब इरफान खान अंतरराष्ट्रीय स्तर की अंग्रेजी व बांगला भाषा की द्विभाषी फिल्म ‘‘नो बेड आफ रोजेस’’ का सह निर्माण कर रहे हैं, जिसका लेखन व निर्देशन मशहूर बांगलादेशी फिल्मकार मुस्तफा सरवर फारूकी करने वाले हैं. बंगला भाषा में इस फिल्म का नाम ‘‘देबू’’ होगा. इन द्विभाषी फिल्मों का सह निर्माण करने के साथ साथ इरफान खान इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले हैं. जबकि इस फिल्म के निर्माण से कोलकता की प्रोडक्शन कंपनी ‘‘इस्काय मूवीज’’ और बांगलादेश की प्रोडक्शन कंपनी ‘‘जैज मल्टी मीडिया’’ भी जुड़ी हुई हैं.

फिल्म के लेखक व निर्देशक मुस्तफा सरवर फारूकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक हैं. उनकी फिल्म ‘‘थर्ड पर्सन सिंगुलर नंबर’’ 2011 में बांगलादेश की आस्कर में भेजी गयी फिल्म थी.

आस्कर में 2011 में बांगलादेश की प्रतिनिधित्व वाली फिल्म ‘‘थर्ड पर्सन सिंगुलर नंबर’’ के अलावा 2014 की बांगलादेशी प्रतिनिधित्व वाली फिल्म ‘‘टेलीवीजन’’ मे मुख्य भूमिका निभा चुकी बंगलादेश की चर्चित अदाकारा नुसरत इमरोज तिषा अब फिल्म ‘‘नो बेड आफ रोजस’’ की नायिका होंगी. इसके अलावा हालीवुड फिल्म ‘‘एक्सः पास्ट इज प्रजेंट’’ की हीरोईन पर्नो मित्रा व ‘‘द क्ले बर्ड’’ की हीरोईन रोकेया प्रचय भी ‘‘नो बेड आफ रोजेस’’ में अभिनय करने वाली हैं.

उत्तर बंगाल, ढाका और बांगलादेश में फिल्मायी जाने वाली फिल्म ‘‘नो बेड आफ रोजेस’’ का जिक्र छिड़ने पर अभिनेता इरफान खान कहते हैं-‘‘यह फिल्म विश्व सिनेमा का परिदृश्य बदलने वाली फिल्म साबित होगी. इस फिल्म के निर्देशक मुस्तफा सरवर फारूकी का मैं पुराना प्रशंसक हूं. मैं तो इनकी पहली फिल्म ‘‘एंट स्टोरी’’ देखकर ही प्रशंसक बन गया था. उसके बाद भी वह कई उत्कृष्ट फिल्में बनाते आए हैं. मैं उनकी फिल्मों की कहानी व उनकी कथा कथन की शैली का मुरीद बन चुका हूं. उनकी फिल्मों में मानवीय पहलुओं को उजागर किया जाता है, जिसके चलते उनकी फिल्मों के किरदार मल्टीलेअर वाले होते हैं. इसी के चलते मैं उनके साथ जुड़ने के लिए उत्सुक हुआ.’’

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें