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सावधान पुरुषों: आ रही है पावर ऐंजल

यह सच है कि आज के समय में औरत आदमी से कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं पर इस सफर में उन के सामने कई चुनौतियां आती रहती हैं. राह चलते कार्यस्थलों आदि मिंमहिलाएं शोषण कह शिकार न हों. दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा जैसे अपराध महिलाओं  खिलाफ न हों, इसके लिए उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग की महिला पावर लाइन 1090 के कर्मियों द्वारा ‘पावर ऐंजल’ प्रेजेंटेशन ने महिलाओं की जिंदगी की दिशा बदलने का बीड़ा उठाया है

प्रदेश में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर लगाम कसने के लिए 10 अप्रैल को महत्त्वाकांक्षी ‘पावर ऐंजल’ योजना की भी शुरुआत की जा रही है. इस के तहत 2 लाख युवतियों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाने का लक्ष्य तय किया गया है.

पहली कोशिश

देश में इस तरह की यह पहली कोशिश है जब शैक्षणिक संस्थानों, पुलिस थानों और ग्राम प्रधानों के माध्यम से लगभग 4 लाख आवेदन फार्म को प्रदेश भर में बांटा गया है. अब तक 86,000 युवतियों ने आवेदन किया है. इस के लिए नियुक्ति प्रक्रिया जारी है.

महिला पावर लाइन की प्रभारी और आई जी नवनीत सेकेरा ने बताया, ‘‘10 अप्रैल को हम इन युवतियों को प्रशिक्षण खत्म होने के बाद एसपीओ कार्ड देंगे और उन्हें पावर ऐंजल के तौर पर तैनात किया जाएगा.’’

मालूम हो कि परेशान महिलाओं की मदद के लिए साल 2012 में महिला पावर लाइन की शुरुआत की गई थी. डब्ल्यू पी एल की डिप्युटी एसपी बबीता सिंह ने बताया हमें पावर ऐजेंलों की जरूरत महसूस हुई. दरअसल युवतियां मुख्य रूप से अपने मुद्दों के लिए आवाज उठाने से झिझकती हैं और साथ ही उन में संबंधित कानूनों को ले कर जागरूकता भी नहीं होती हैः

पावल ऐंजल के कार्य करने का अलग अंदाज

पावर ऐंजलो को अपने इलाके और शैक्षिणित संस्थानों में हो रही घटनाओं पर नजर रखनी होगी और वहीं उन्हें महिलाओं से शोषण या फिर घरेलू हिंसा की जानकारी मिलती है तो वे पुलिस को इस बारे में जानकारी देगी. इस के बाद पुलिस अपना काम करेगी. ये पावर ऐंजल अपने साथ की महिलाओं को महिलाओं से जुड़े अधिकारों और कानूनों की जानकारी देगीं. पुलिस इन की पहचान को गुप्त रखेगी.

पावर ऐंजल की योग्यता

पावर ऐंजल बनने के लिए न्यूनतम 9वीं तक की शैक्षिक योग्यता रखी गई है मगर इसके लिए उनके स्कूल, कालेजों और अभिभावकों की रजामंदी भी जरूरी है.

कार्यकाल

एक एसपीओ का कार्यकाल 3 से ले कर 5 साल तक का होगा. सभी एसपीओ को पहचान पत्र दिया जाएगा. इस में युवतियां मुखबिरों के तौर पर काम करेंगी. इन का प्रशासकीय कामों में लेनादेना नहीं होगा वे अपनी पहचान का इस्तेमाल 1090 पर या फिर पुलिस अधिकारियों को किसी घटना की जानकारी देते वक्त करेंगी.

पावर ऐंजल डेटा बैंक

आईजी नवनीत सेकेरा ने बताया, ‘‘हमारे पास सभी पावर ऐंजल का एक कंप्यूटरीकृत डेटा बैंक भी होगा. दूसरे चरण में ये पावर ऐंजल कम से कम 10 और युवतियों को शामिल करेगी. इस से प्रदेश की 20 लाख युवतियां सशक्त बनेंगी.’’

ददुआ का मंदिर जातीयता की राजनीति

उत्तर प्रदेश का फतेहपुर जिला 4 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा इलाके में फैला हुआ है. चित्रकूट और बांदा बौर्डर से लगे होने की वजह से यहां अपराध का हमेशा से बोलबाला रहा है. 3 तहसील और 13 ब्लौक वाले इस जिले में तकरीबन 30 लाख की आबादी रहती है. तकरीबन 70 फीसदी साक्षरता वाले इस जिले में एक लोकसभा और 6 विधानसभा क्षेत्र हैं. राज्य हैडक्वार्टर से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर चित्रकूट और कौशांबी बौर्डर पर नरसिंहपुर कबरहा गांव है. इस गांव तक धाता से रोडवेज की बसों से सफर कर के पहुंचा जा सकता है. धाता से नरसिंहपुर कबरहा गांव तक का सफर तय करने के लिए साढे़ 3 किलोमीटर दूर का रास्ता टैंपो या दूसरी सवारी गाडि़यों के जरीए भी तय किया जा सकता है. नरसिंहपुर कबरहा गांव में ही 2 सौ हत्याओं के आरोपी दस्यु सरगना ददुआ का मंदिर बनाया गया है. नरसिंहपुर कबरहा गांव के शिवहरे रामजानकी मंदिर को बनाने का काम खुद ददुआ ने किया था. साल 1992 में पुलिस ने ददुआ को फतेहपुर जिले के हरसिंहपुर कबरहा गांव के पास मार गिराया था. एक पुलिस मुठभेड़ में ददुआ बुरी तरह से फंस गया था. उस के बचने की उम्मीद नहीं थी. उस समय ददुआ ने मन्नत मांगी थी कि अगर वह इस मुठभेड़ से जिंदा बच गया, तो कबरहा में हनुमान मंदिर को विशाल बनाएगा.

ददुआ पुलिस मुठभेड़ में बच गया. इस के बाद उस ने यहां मंदिर बनवाया था. साल 2007 में मारे गए ददुआ की मूर्ति इसी मंदिर में उस के भाई बालकुमार ने फरवरी, 2016 में लगवाई. इस मंदिर में ददुआ को देखने वालों की भीड़ जुटने लगी है. गांव के लोग मंदिर में ददुआ की मूर्ति पर अपने जेवर और पैसे चढ़ा रहे हैं. इस में ज्यादातर लोग उस की ही जाति के हैं. उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी डकैत का मंदिर बना कर उस का महिमामंडन शुरू किया जा रहा है. अब एक दूसरे डकैत निर्भय गुर्जर का मंदिर बनाने की मांग भी उठ रही है. ददुआ के भाई बालकुमार कहते हैं कि मंदिर उन की निजी संपत्ति है. ऐसे में किसी तरह का विवाद ठीक नहीं है. वे अपने पुरखों की मूर्तियां लगा रहे हैं. इस में किसी को एतराज नहीं करना चाहिए.

ददुआ डकैत भले ही था, पर वह इस इलके में गरीबों की मदद भी करता था. कई लड़कियों की शादियां भी उस ने कराई थीं. डकैतों के मंदिर केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी बनते रहे हैं. कई गांवों में इन के स्वागत द्वार तक बने हैं. डकैत मान सिंह और उस की साथी रूपा की मूर्तियां आगरा से 60 किलोमीटर दूर खेड़ा राठौर गांव में आज भी बनी हुई हैं. चंबल के दूसरे डकैतों मोहर सिंह, माधो सिंह, तहसीलदार सिंह और मलखान के गांव में भी उन के स्मारक बने हैं. जिस भव्य तरीके से ददुआ की मूर्ति मंदिर में लगा कर उस का महिमामंडन किया जा रहा है, वह इन सब की आगे की कड़ी मात्र है. ददुआ के मंदिर के बाद इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हुई है, जिस से पता चलता है कि जातीय राजनीति में मंदिरों का प्रयोग किसी हथियार से कम नहीं है. जिस तरह से ददुआ के मंदिर को गरीब तबके का समर्थन मिल रहा है, उस से साफ पता चलता है कि वह इस इलाके लिए किसी रौबिनहुड से कम नहीं था. मरने के 8 साल बाद भी लोग उस को उतना ही प्यार करते हैं.

ऊंची जातियों से हिफाजत की उम्मीद करने वाली कमजोर जातियों के लिए ऐसे लोग ही सहारा बनते रहे हैं, जो जातीय नाइंसाफी के खिलाफ उन का साथ देते थे. इसी वजह से डकैत भी मंदिर में पूजे जाने लगे हैं.

भैंस की चोरी से…

देश में जातीय भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस का दबदबा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. जातीय गोलबंदी के जरीए वोट हासिल करने की सोच को समझते हुए चंबल के डकैत शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ ने अपने जीतेजी राजनीतिक सरपरस्ती हासिल कर ली थी. साल 1978 में कौशांबी जिले के पश्चिम सरीरा इलाके में पहली बार ददुआ पर डकैती डालने का मुकदमा दर्ज हुआ था. इस के पहले उस के जेल जाने की शुरुआत साल 1975 में हुई थी, जब उस पर भैंस चोरी जैसा छोटा आरोप लगा कर जेल भेजा गया था. साल 1985 के करीब ददुआ का नाम चंबल के बडे़ डकैतों में शामिल होने लगा था. अपनी ताकत को राजनीतिक शक्ल देने के लिए ददुआ ने अब तक नेताओं को संरक्षण देना शुरू कर दिया था. उस के नाम पर वोट डाले जाने लगे थे. ददुआ का चित्रकूट और फतेहपुर की राजनीति में अच्छा दबदबा बन गया था. साल 1985 में कांग्रेस के उम्मीदवार ने बाकायदा चुनाव आयोग को इस बारे में शिकायत भी की थी.

ददुआ दलित और कमजोर जातियों की मदद करता था. ऐसे में उस ने इन्हीं तबकों के नेताओं को मदद देनी शुरू की. ददुआ खुद कुर्मी बिरादरी का था. उत्तर प्रदेश में कुर्मी बिरादरी पिछड़े तबके में शुमार की जाती है. ददुआ फतेहपुर का रहने वाला था. जहां खेती की जमीन थी, पर वहां बहुत अच्छी खेती नहीं होती थी. ऐसे में पिछड़ी जातियों में शुमार की जाने वाली कुर्मी जाति के लोग भी दलितों सरीखी जिंदगी जीते थे. ददुआ ने सब से ज्यादा बहुजन समाज पार्टी के सांसदों और विधायकों को चुनाव जितवाने में मदद की या बसपा के पक्ष में ददुआ का खुला नारा होता था, ‘वोट पड़ेगा हाथी पर, वरना गोली खाओ छाती पर’.

नेताओं को वोट दिलाने वाले ददुआ को जल्दी ही पता चल गया था कि वोट ले कर नेता बदल जाते हैं. ऐसे में उस ने अपनी ताकत का फायदा अपने भाई और बेटों को देने की योजना बनाई. यही वह दौर था, जब पंचायती राज कानून लागू हुआ था और ग्राम प्रधानों को गांव की तरक्की के लिए बड़ा बजट दिया जाने लगा था. मौके का फायदा उठाने के लिए ददुआ ने अपने करीबियों को कई गांवों में प्रधानी का चुनाव लड़ाया और उन में से तमाम लोगों को चुनाव जितवा भी दिया था. बडे़ नेता ददुआ का फायदा चोरीछिपे लेते थे. ददुआ इस बात को समझ हा था. वह चाहता था कि नेता उस के पक्ष में खडे़ नजर आएं. ऐसे में नेताओं पर उस ने दबाव डालना शुरू किया था. साल 2000 में ददुआ ने अपने बेटे वीर सिंह की शादी कराई और उस में कई दलों के बडे़ नेताओं को बुलाया था.

साल 2005 में ददुआ के प्रभाव से ही उस का बेटा वीर सिंह निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुना गया था. साल 2007 में ददुआ के भाई बालकुमार ने प्रतापगढ़ की पट्टी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था. वे 4 सौ वोटों से चुनाव हार गए थे. बाद में बालकुमार मिर्जापुर से सांसद चुने गए थे. ददुआ जब तक नेताओं के संरक्षण में काम कर रहा था, तब तक उस पर कोई खतरा नहीं था. बाद में उस ने राजनीतिक दलबदल भी शुरू कर दिया था. बसपा के बाद उस ने सपा यानी समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया था. यही खेल ददुआ पर भारी पड़ा था. साल 2007 में उत्तर प्रदेश में पूरे बहुमत से बसपा की सरकार बनी थी. उस समय की मायावती सरकार ने ददुआ को मारगिराने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफ को लगा दिया था. सरकार बनने के 3 महीने के अंदर ही एसटीएफ ने एसपी अमिताभ यश की अगुआई में ददुआ को चित्रकूट जिले के कुशमही गांव में मुठभेड़ में मार गिराया.

वोट की राजनीति

ददुआ का चित्रकूट और फतेहपुर में दबदबा तो था ही, चंबल इलाके से लगे इलाकों में भी उस का पूरा असर था. इस की वजह से वहां वही नेता चुनाव जीतता था, जिसे ददुआ चाहता था. जब तक ददुआ नेताओं की मदद करता रहा, तब तक नेता उस की हिफाजत का काम करते रहे थे. जैसे ही ददुआ ने अपने परिवार के लोगों को नेता बनाना शुरू किया, वह नेताओं के निशाने पर आ गया. फतेहपुर और चित्रकूट जिले में कुर्मी वोटर तकरीबन 3 लाख के आसपास हैं. सपाबसपा सहित बाकी दलों की निगाह इन के वोटों पर लगी रहती हैं. समाजवादी पार्टी आने वाले चुनावों में कुर्मी वोटों को हासिल करने के लिए ददुआ के नाम का सहारा लेना चाहती है. फतेहपुर जिले के खागा तहसील के गांव नरसिंहपुर करबहा में रामजानकी मंदिर की स्थापना ददुआ ने साल 1995 में की थी. ददुआ के मारे जाने के बाद साल 2016 में तकरीबन 8 साल के बाद ददुआ के भाई बालकुमार ने रामजानकी मंदिर में ही ददुआ और उस की पत्नी केतकी की मूर्ति लगवाई है.

ददुआ की मूर्ति स्थापना कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव के जाने की संभावना थी, पर राजनीतिक दबाव में वे वहां नहीं गए, पर रामजानकी मंदिर में ददुआ और उस की पत्नी केतकी की मूर्ति लग गई. इस मंदिर में ददुआ की पत्नी केतकी के अलावा ददुआ के मातापिता की मूर्तियां भी लगाई गई हैं. राजस्थान के जयपुर में रहने वाले मूर्तिकार ने इन मूर्तियों को बनाया है. मूर्तियों को बनाने में तकरीबन 80 लाख रुपए का खर्च बताया जाता है. पुलिस या समाज के दूसरे लोगों के पास ददुआ का कोई नया फोटो नहीं था. एक बहुत पुराने फोटो के आधार पर ही लोग उस की शक्ल का अंदाजा लगाते थे.

ददुआ के भाई बालकुमार अब बांदा, फतेहपुर, चित्रकूट और आसपास के इलाकों में अपना राजनीतिक जनाधार बढ़ाना चाहते हैं. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में फतेहपुर से भाजपा की साध्वी निरंजन ज्योति सांसद चुनी गई थीं. केंद्र सरकार में वे राज्यमंत्री हैं. उन्होंने सपा के पूर्व उम्मीदवार राकेश सचान को यहां से हराया था. राकेश सचान की कुर्मी वोटों पर पकड़ कमजोर पड़ते देख ददुआ के भाई बालकुमार यहां अपना इलाका तैयार करना चाहते हैं. दलित और कमजोर तबके में ददुआ का अपना असर है और बड़ी जातियों में ददु का डर है. ददुआ की इसी पहचान का फायदा उस के भाई बालकुमार पटेल उठाना चाह रहे हैं.

आंग सान सू की: जीतने तक हार नहीं मानी

आंग सान सू की का जन्म 19 जून, 1945 में हुआ था. उन के पिता आंग सान बर्मा की स्वाधीनता सेना में कमांडर थे. मां रिवन की रंगून जनरल अस्पताल में नर्स थीं. आंग सान इन की तीसरी संतान थीं. आंग सान के पिता बर्मा को स्वतंत्रता दिलाने वाले खास व्यक्ति थे. बर्मा की जनता के लिए वे सदैव राष्ट्रपिता रहेंगे. 1947 में जब आंग सान सू की मात्र 2 वर्ष की थीं तब राजनीतिक षड्यंत्र की वजह से उन के पिता की हत्या कर दी गई थी. 1960 में आंग सान दिल्ली आईं और लेडी श्रीराम कालेज से बी.ए. की डिगरी ली. फिर औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से फिलौस्फी और राजनीतिशास्त्र व अर्थशास्त्र में डिगरी ली.1972 में उन का विवाह माइकल एरिस से हुआ.

संघर्ष की शुरुआत

घर के कामों से बचे वक्त को आंग सान लेखन में लगाती थीं. हिमालय स्टडीज पर वे पति की मदद भी करती थीं. 1988 में उन की मां काफी बीमार हो गईं. उन के जीवन का यह निर्णायक मोड़ था. अपने पति व बच्चों को छोड़ कर वे एक ऐसी राह चल पड़ीं जो ऊबड़खाबड़ व पथरीली थी. उन्होंने तानाशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. सैनिक प्रशासन उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा था. उन्हें तरहतरह से डरा रहा था. मगर बिना किसी खौफ के वे तानाशाही के खिलाफ लड़ती रहीं. सैनिक सरकार ने बिना वजह बताए उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया. एक बार एक राजनीतिक रैली के वक्त एक सैनिक ने उन की तरफ राइफल तान दी तो वे तन कर खड़ी हो गईं. बोलीं, ‘‘कर लो जो भी जुल्म करना चाहते हो, मगर मुझे मेरे मकसद से नहीं हटा पाओगे.’’

इस घटना के 3 माह के बाद आंग सान सू की अपने घर में छात्रों के एक समूह को संबोधित कर रही थीं. तभी सैनिकों ने उन के घर में घुस कर छात्रों को पकड़ कर जेल में बंद कर दिया तथा आंग सान सू की को उन्हीं के घर में नजरबंद कर दिया. इस अत्याचार के खिलाफ आंग सान सू की ने भूख हड़ताल कर दी. भूख हड़ताल के वक्त उन के दोनों बेटे उन्हीं के पास रहने आ गए. बाद में उन के पति भी भूख हड़ताल के तीसरे दिन रंगून पहुंच गए. भूख हड़ताल से कोई बड़ा हादसा न हो जाए, इस डर के चलते सरकार ने छात्रों को जल्द ही रिहा कर दिया.

सरकार के सामने समस्या थी कि चुनाव सिर पर थे. आंग सान सू की नजरबंद थीं. सरकार को यह गलतफहमी थी कि उन की गैरमौजूदगी में विपक्ष के लोग टूट जाएंगे. मगर आंग सान की नजरबंदी के बावजूद उन की पार्टी संसद में 82% सीटें जीत गई. तब भी सेना ने कहा कि वह आंग सान को सत्ता नहीं देंगे. इस ज्यादती से कई देशों के विरोधी स्वर उभरे. आंग सान के इस महान काम को देख कर अक्तूबर, 1990 को उन्हें ‘राफ्तों ह्यूमन राइट्स पुरस्कार’ से नवाजा गया. इस के अगले साल उन्हें यूरोपीय पार्लियामैंट ने ‘सखारोव ह्यूमन राइट्स पुरस्कार’ से नवाजा.10 जुलाई, 1991 को नोबेल समिति ने उन्हें शांति पुरस्कार देने की घोषणा की. बाद में म्यांमार की सैनिक सरकार ने आंग सान के सामने यह शर्त रखी कि यदि वे राजनीति और बर्मा छोड़ कर चली जाएं तो वह उन्हें आजाद कर देगी. मगर आंग सान अपने देशवासियों की उन उम्मीदों को तोड़ कर नहीं जा सकती थीं जो उन्हें उन से थीं. आंग सान ने नोबेल पुरस्कार की रकम बर्मी लोगों के स्वास्थ्य व शिक्षा के लिए बनाई गई एक ट्रस्ट को दे दी.

हिम्मत नहीं हारी

जब उन के बच्चे छोटे थे और मां को लकवा मार गया था तब वे घरबार छोड़ मां के पास चली गई थीं. उन की खूब सेवा की. इस के बाद जब वे बर्मा लौटीं तो उस समय क्रूर शासन के खिलाफ लोगों में विद्रोह फूट रहा था. इसी दौरान आंग सान ने आम चुनाव की मांग रखी. अपनी जीत निश्चित समझ शासन ने उन की यह मांग स्वीकार कर ली. अब सरकार का दमनचक्र शुरू हो गया. सरकार ने 4 से ज्यादा लोगों के एक स्थान पर एकत्र होने पर पाबंदी लगा दी व बिना कारण बताए वह किसी को भी जेल में डाल सकती है, इस बात का भी ऐलान कर दिया. तब आंग सान सू की ने ‘नैशनल लीग फौर डैमोक्रेसी’ दल का गठन किया. वे खुद इस की महासचिव बनीं. उन का कहना था कि वे अहिंसा की पुजारी हैं और हिंसा के खिलाफ उन की लड़ाई जारी रहेगी. चुनाव में उन्होंने भारी मतों से विजय हासिल की. उन्होंने दर्द भरे दिनों में ‘फ्रीडम फ्रौम फीयर’ किताब भी लिखी.

आंग सान सू की को कई बार बंदी बनाया गया और कई बार रिहा किया गया. देश में कहीं भी वे आ जा नहीं सकती थीं. एक बार सरकार ने इन की सभा पर हमला किया और इन पर हिंसा भड़काने का इलजाम लगा दिया गया. इन्हें जेल में बंद कर दिया गया. इन्हें पति व बेटों से मिलने की इजाजत भी न थी. पति कैंसर से पीडि़त थे. 1999 में पति की मृत्यु हो गई पर उन्हें पत्नी से नहीं मिलने दिया. 2012 में चुनाव में भाग ले 45 में से 43 सीटें जीत कर इन्होंने साबित कर दिया कि जनता का इन पर कितना भरोसा है. 24 सालों के बाद वे विदेश गईं. अमेरिकी सरकार ने उन्हें अपनी संसद के स्वर्ण पदक से नवाजा. यह वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है.

लंबे संघर्ष के बाद अपने देशवासियों को उन का मूलभूत अधिकार दिला कर आंग सान सू की ने यह साबित कर दिया कि सच की सदैव जीत होती है.

अमीरी की जयजयकार

नेताजीके  झांसों में हम पहले आ जाते थे. उन के खोखले वादों को सच सम झ लेते थे. पर आजकल सभी कहते हैं कि आज के वोटर बहुत सम झदार हो गए हैं. तभी शायद वे ज्यादातर करोड़पति उम्मीदवारों को ही जिताते हैं. रिसर्च के अनुसार आप का 50 मिलियन या उस से ज्यादा का मूल्य है तो आप के 75 गुना चांसेज और बढ़ जाते हैं कि आप लोक सभा के चुनाव जीतें. विश्वास नहीं होता तो आंकड़े पढ़ लीजिए- 2009 में लोक सभा में जहां 300 करोड़पति थे, वहीं 2014 लोक सभा में बढ़ कर 442 हो गए हैं.

बात भी ठीक है, जो बंदा करोड़ों में खेल रहा हो उसी का दिमाग औडी की रफ्तार पर चलता है. आखिर उसी को ही तो सोचना है कि अपनी ब्लैक मनी को कैसे इनकम टैक्स वालों से बचाया जाए  बैंक के अकाउंट की ऐंट्रीज को कैसे आगेपीछे किया जाए और कैसे उस की कमाई के पीछे लगातार जीरो की संख्या बढ़ती रहे  एक आम आदमी का दिमाग क्या खाक चलेगा, जो सारा दिन नौकरी कर के शाम को आलू खरीद कर सब्जी बना कर खुश हो जाता हो और चैन की नींद सो जाता हो. उस की तो सब से बड़ी खुशी तब होती है जब 100-200 रुपए गैस सिलैंडर की सब्सिडी उस के अकाउंट में आ जाती है.

स्कैम तो दिल बहलाने के तरीके हैं

किसी भी राज्य की आर्थिक स्थिति इस बात से जज होती है कि उस के नुमाइंदे अमीर हो रहे हैं कि गरीब. अगर ज्यादा करोड़पति जीतने वाली पार्टी में हों तो फिर सोचो कि बहती गंगा में सभी ने हाथ धो लिए. ऐसे लीडर्स को बिजनैस स्कूलों का रोल मौडल ले कर चलना चाहिए, जो 5 साल रूल कर के अपनी पूंजी दोगुना या तिगुना कर लेते हैं. नेता तो नेता बीजेपी की छत्रछाया में योग गुरु बाबा रामदेव भी एक नामी बिजनैसमैन हो गए, क्योंकि उन के बिजनैस का टर्नओवर करोड़ों के मुनाफे में गया.

लोगों की सेवा करतेकरते बेचारे हमारे लीडर्स थक कर एकाध स्कैम में हिस्सा ले ही लेते हैं. आखिर 5 सालों में कुछ अपना भी बेड़ा पार कर लें तो इस में क्या हरज है. स्कैम तो दिल बहलाने के तरीके हैं इन के. आज तक हम ने किसी भी लीडर को किसी भी स्कैम का आरोपी घोषित होने के बावजूद यह कभी नहीं सुना कि बेचारा तबाह हो गया या बेचारे को बड़ा सदमा लगा. किसी भी लीडर का कैसा भी घोटाला कर के राजनीतिक कैरियर खत्म नहीं हुआ होगा.

सिर्फ सपने ही दिखाएंगे

सोचने वाली बात यह है कि अगर हमारे लीडरों की जेबें भरी रहेंगी तभी तो वे अपने घर अपने चमचों का लंगर जारी रख सकेंगे. और पेट भरे होंगे, तभी तो अपने लीडर के जिंदाबाद के नारे लगेंगे. खाली पेट तो मुंह से सिर्फ यही निकल सकता है, ‘हाय रोटी, हाय रोटी, हाय रोटी.’ जो चाहे कहिए हम सभी को सफेद स्टार्च वाले कुरतापायजामे में 100-200 समर्थकों के साथ बड़ी गाड़ी से उतरते हुए, उंगलियों में बेशकीमती अंगूठियां पहने हुए और हाथ में महंगे स्मार्ट फोन पकड़े हुए नेता ही अच्छे लगते हैं. तभी वे जब आप की तरफ रुख करते हैं तो आप विनम्रता से हाथ जोड़ कर, पीठ  झुका कर उन्हें सलाम करते हैं. ऐसे स्मार्ट लीडर्स से आप को आस होती है कि ये कुछ करेंगे. यही अब आप को और देश को बचाएंगे. अगर वह चाय वाले से पीएम बन सकता है तो आप भी जिंदगी के रास्ते पर आगे जा सकते हैं. दूसरी तरफ जो साइकिल पर ांडा टांग कर अपना प्रचार खुद ही कर रहा हो वह किसी और का क्या खयाल रख पाएगा  जब उस का अपना गुजारा ही मुश्किल से हो पा रहा है तो वह आप को क्या सपने दिखाएगा

वोट सिर्फ अमीरी को ही

अत: जिस देश में इनसानियत, काबिलीयत, ईमानदारी, देश सेवा से ज्यादा पैसे का बोलबाला हो, तो वोटर बेचारा भी तो हमेशा अमीरी को ही वोट देगा. एक चुनाव के उम्मीदवार ने अपने सीए से कहा कि उस की जायदाद और पूंजी को 10 करोड़ घोषित कर दे. सीए ने परेशान होते हुए कहा, ‘‘सर, पर आप के पास तो 10 लाख भी नहीं हैं.’’ इस पर उम्मीदवार बोला, ‘‘मैं ऐडवांस में ही सच बोल रहा हूं. अगर मैं जीत गया तो 10 करोड़ तो बना ही लूंगा.’’

स्वस्थ हड्डियों के लिए ये खाएं

मजबूत हड्डियों के लिए जरूरी तत्त्व किस तरह के खानपान से मिल सकते हैं, जानिए जरूर:

कैल्सियम: कैल्सियम शरीर में सब से अधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्त्व है. शरीर के 99% कैल्सियम का संचय हड्डियों में होता है जबकि शरीर की विभिन्न क्रियाओं में केवल 1% ही इस का उपयोग किया जाता है. एक औसत व्यक्ति को प्रतिदिन 1,000 से 1,200 मिलिग्राम कैल्सियम की आवश्यकता होती है. हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्सियम का अच्छा स्रोत होती हैं. इन के अलावा मछलियां, साबूत अनाज, केले, ब्रैड, पास्ता सोया मिल्क, टोफू और बादाम भी कैल्सियम के अच्छे स्रोत हैं. कम वसायुक्त डेयरी प्रोडक्ट्स में वसायुक्त डेयरी प्रोडक्ट्स की तुलना में अधिक कैल्सियम होता है.

विटामिन डी: विटामिन डी की कमी से हड्डियां कमजोर और मुलायम हो जाती हैं. सूर्य का प्रकाश विटामिन डी का सब से अच्छा स्रोत है. सूर्य की रोशनी के अलावा दूध, अंडा, चिकन, मछली आदि भी विटामिन डी के अच्छे स्रोत हैं.

पोटैशियम: जो लोग पर्याप्त मात्रा में पोटैशियम का सेवन करते हैं उन की हड्डियों की सेहत बेहतर रहती है. शकरकंद, आलू छिलके सहित, दही और केले पोटैशियम के अच्छे स्रोत हैं.

मैग्नीशियम: पालक, चुकंदर, टमाटर, आलू, शकरकंद, किशमिश आदि खाइए, क्योंकि इन में भरपूर मात्रा में मैग्नीशियम पाया जाता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है.

प्रोटीन: प्रोटीन शरीर का निर्माण करने वाले तत्त्वों में सब से महत्त्वपूर्ण है. यह हड्डियों को मजबूत रखता है. प्रोटीन हड्डियों के लिए ही नहीं उतकों और लिंगामैंट्स के लिए भी बेहद जरूरी है. मेनोपौज के बाद जिन महिलाओं के भोजन में प्रोटीन की मात्रा कम होती है उन में औस्टियोपोरोसिस का खतरा 30% तक बढ़ जाता है.

विटामिन सी और के: हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन सी और के भी बहुत आवश्यक हैं. लालमिर्च, हरीमिर्च, संतरा, अंगूर, ब्रोकली, स्ट्राबैरी, अंकुरित अनाज, पपीता और पाइनऐप्पल विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं. शलगम, पालक, सरसों और मैथी में भी विटामिन के भरपूर मात्रा में पाया जाता है.

फैशन के रंग में रंगे धार्मिक धारावाहिक

धर्म को ले कर समाज की सोच बदल रही है. धर्म की अंधभक्ति अब खत्म होने के कगार पर है. अब लोग धर्म को ले कर पहले से कहीं ज्यादा लचीली सोच रखने लगे हैं. धर्म को ले कर किया जाने वाला पहले जैसा पाखंड अब कम हो रहा है. धर्म का विरोध भले ही लोग न कर रहे हों पर उस की कट्टरता के समर्थकों में तेजी से कमी आ रही है. यही वजह है कि धार्मिक तीजत्योहार ही नहीं धर्म पर आधारित बनने वाले टीवी सीरियलों में भी कट्टरवादी धर्म की जगह धर्म के सामाजिक पहलू को दिखाने की कोशिश शुरू हो रही है. जिस तरह से समाज में महिलाओं के मुद्दों पर सोच बदली है उस हिसाब से धार्मिक सीरियल भी अब धर्म की चाश्नी में डूबी सामाजिकता परोस रहे हैं. सामाजिकता के साथ ही साथ इन पर फैशन और ग्लैमर का रंग भी चढ़ाया जा रहा है. पहले वाले सीरियलों की तरह पहनावा और रंगढंग इन में नहीं दिख रहा है. इस के बावजूद ये सीरियल अभी भी धार्मिक प्रचार का ही सहारा ले रहे हैं.

सामाजिक मुद्दों को प्राथमिकता

धार्मिक सीरियलों में ‘रामायण’ पर अब तक सब से ज्यादा सीरियल बने हैं. हर सीरियल को देख कर यह लगता है कि अब इस में नया कुछ दिखाने को नहीं रह गया है. स्टार प्लस पर दिखाए जा रहे ‘रामायण’ पर आधारित सीरियल ‘सिया के राम’ में सीता और रामायण में उपेक्षित पड़ी महिला किरदारोें की आड़ में महिलाओं से जुड़े सामाजिक मुद्दों को उठाया जा रहा है ताकि धार्मिक सीरियल को नई पहचान के साथ पेश किया जा सके.

दरअसल, जिस तरह से लगातार धार्मिक सीरियल बन रहे थे उन से ये सीरियल दर्शकों को खो चुके थे. धार्मिक सीरियलों से दर्शकों को फिर से जोड़ने के लिए उन्हें सामाजिकता और फैशन के रंग में रंगा जा रहा है. सीरियल ‘सिया के राम’ में सीता तमाम तरह के ऐसे सवाल करती है, जो पहले के ‘रामायण’ पर आधारित किसी सीरियल में नहीं दिखाए गए थे.

आमतौर पर ऐसे धार्मिक सीरियलों की शूटिंग स्टूडियो में ही अब तक होती रही है. ‘सिया के राम’ की शूटिंग हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी में की गई, जिस से दर्शकों को सचाई का यकीन हो सके. अयोध्या और मिथिला नाम से 2 अलगअलग शूटिंग लोकेशन बनाई गईं. इस सीरियल में एक तरफ यह कहा जा रहा है कि उस समय की सामाजिकता को दिखाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ इस का प्रचार करने के लिए अभी भी ‘धनुष यात्रा’ जैसे आयोजन किए जा रहे हैं. इस ‘धनुष यात्रा’ का मकसद केवल सीरियल का प्रचार करना मात्र है. देश के कई बड़े शहरों में इस का आयोजन किया गया. सीरियल के कलाकारों को इस यात्रा के प्रचार का काम सौंपा गया. शूटिंग करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि सीरियल में धर्म और धार्मिकचिह्नों को प्रमुखता से दिखाया जा सके ताकि लोग धर्म के नए स्वरूप में उलझे रहें. सीरियल को फिल्मों की भव्यता दे कर दर्शकों को चकाचौंध में फंसाने का पूरा प्रबंध किया गया है.

फैशन का रंग

‘सिया के राम’ में सीता के लुक को खास अंदाज में पेश किया गया तो उन के साथ दूसरे महिला किरदार जैसे सुनैना का किरदार निभाने वाली भार्गवा चिरमुले, कौशल्या का किरदार निभाने वानी स्निग्धा अकोल्कर, सुमित्रा बनी संपदा वाजे और कैकेयी का रोल निभाने वाली ग्रूशा कपूर ही नहीं गार्गी का किरदार निभाने वाली रिचा सोनी की ड्रैस को भी आधुनिक ग्लैमरस लुक दिया गया है. मुकुट लगाए, तीर से फुलझड़ी सी छोड़ते चमत्कार दिखाने वाले दृश्यों की जगह हकीकत वाले दृश्य दिखाए हैं. ऐसा बदलाव धार्मिक सीरियलों को दर्शकों से जोड़ने के लिए किया जा रहा है. इस कारण ऐसे सवालों के दृश्यों को प्रमुखता के साथ दिखाया जा रहा है. अब ऐसे धार्मिक सीरियलों पर सामाजिकता ही नहीं फैशन का भी रंग चढ़ाया जा रहा है.

धार्मिक कहानियों के उतरते रंग

धार्मिक सीरियलों में जिस तरह की कहानियां अब तक पेश की जाती रही हैं, उन्हें ले कर अब समाज में जागरूकता आ गई है. ऐसी कहानियों को दर्शक सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. सब से अधिक परेशानी महिला मुद्दों को ले कर आ रही है. धर्म में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अब तक उपेक्षित रूप में दिखाया जाता रहा है. आज के दर्शकों को तर्क सहज नहीं लगते और वे कहानी से अपने को जोड़ नहीं पाते हैं. ऐसे में धार्मिक सीरियलों की टीआरपी फीकी रहती है. धार्मिक सीरियलों के उतरते रंग के चलते इन में सामाजिकता और फैशन के रंग को जोड़ा गया है. अब सीरियलों में धार्मिक कहानियों को दिखाया तो जाता है पर उन के कट्टर रूप को ढकने का काम शुरू हो गया है.

अब यह कहा जा सकता है कि धार्मिक सीरियल नाममात्र के धार्मिक हैं. इन का स्वरूप बदल चुका है. हमारे समाज में धर्म की आलोचना खुल कर करना मुसीबत का सबब बन जाता है. इस वजह से सीरियलों में धर्म पर सवाल न उठाते हुए उन मुद्दों को हवा दी जा रही है, जिन्हें पहले दरकिनार किया जाता था. ऐंड टीवी कर दिखाए जा रहे ‘संतोषी मां’ नामक सीरियल में संतोषी मां से अधिक संतोषी नामक साधारण लड़की की कहानी को दिखाया जा रहा है. संतोषी का किरदार निभा रही रतन राजपूत कहती हैं कि इस सीरियल में समाज की बातों को ज्यादा प्रमुखता दी गई है.

टीवी मनोरंजन पर लगातार लिखने वाले रजनीश राज कहते हैं कि नई पीढ़ी धर्म की कट्टरता को स्वीकार नहीं कर पा रही है. ऐसे में इन कहानियों को सामाजिकता की चाश्नी में डाल कर पेश किया जा रहा है. इन्हें इस तरह दिखाया जा रहा है जिस से ये युवाओं की समझ में आसानी से आ सकें. यह भी माना जा सकता है कि धार्मिक सीरियलों को छोटे परदे पर पेश करने की यह नई शैली है. इन कहानियों को आज की परेशानियों और रहनसहन को सामने रख कर पेश किया जा रहा है. धार्मिक सीरियलों की कथावस्तु के जरीए अभी भी पाखंड, पूजापाठ और भाग्यवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. आज के लोगों को यह दिखाया जा रहा है कि ऋषियों के श्राप देने से बहुत कुछ हो जाता था. देवीदेवताओं को खुश रखने के लिए व्रत करने चाहिए. ‘संतोषी मां’ सीरियल में एक तरफ संतोषी का किरदार है, तो दूसरी तरफ ईर्ष्या की देवी पलौमी का किरदार भी दिखाया जा रहा है. ऐसे में धर्म के कट्टरपन को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक डर को लोगों के दिलों में बैठाया जा रहा है. दिखावे के लिए धार्मिक सीरियल सामाजिकता और नएपन की बात कर रहे हैं. सीरियल तभी सामाजिकता की बात कर सकता है जब यह धर्म के पाखंड को पूरी तरह से त्याग दे.

नई शैली का आडंबर

धार्मिक सीरियलों में पहले बहुत ही कठिन हिंदी का प्रयोग किया जाता था. अब धार्मिक सीरियलों में हिंदी के सरल रूप को पेश करने की शुरुआत की गई है. संवाद लेखकों ने इस काम को कुछ इस तरह से किया है कि हिंदी के शब्द सामान्य शब्दों से अलग हों पर पहले जैसे कठिन हिंदी के न हों. गैरहिंदी भाषी कलाकारों से भी हिंदी के ऐसे शब्दों को सुन कर दर्शकों को एक अलग अनुभूति हो रही है. सुनैना का किरदार निभा रही भार्गवा चिरमुले कहती हैं, ‘‘शुद्ध हिंदी शब्दों के प्रयोग पहले जैसे कठिन नहीं हैं. हम गैरहिंदी भाषी कलाकारों को भी ऐसे डायलौग बोलते समय अच्छा अनुभव हुआ. ऐसे डायलौग इतने सरल ढंग से पेश किए जा रहे हैं, जिन्हें बोलना ही नहीं सुनना भी बहुत अच्छा लगता है.’’

धार्मिक सीरियल अपनी शैली और नए रंग में धार्मिक कट्टरता का त्याग करते तो नजर आ रहे हैं पर अभी भी वे धर्म के आडंबर पर सवाल उठाने से कतरा रहे हैं. जब तक धार्मिक कहानियों में दिखाई गई महिला और उपेक्षित समाज के सच को स्वीकार कर नहीं दिखाया जाएगा, इन कहानियों पर समाज की बात कहने की बात को स्वीकारा नहीं जा सकता है. धार्मिक सीरियलों की नई शैली में केवल कहने भर से समाज का भला नहीं होने वाला. जरूरत इस बात की है कि इन कहानियों के जरीए धर्म के पाखंड और आडंबर पर सवाल खड़े किए जाएं ताकि समाज को सचाई का एहसास हो सके. बिना इस के ऐसे बदलाव को सार्थक नहीं कहा जा सकता.

चींटियों से निबटने के घरेलू उपाय

बहुत बार कुछ अनचाहे मेहमान आप की दरारें पड़ी छतों, खिड़कियों आदि से रेंगते रेंगते घर में आ जाते हैं और ये हैं चींटियां. चींटियों को खाना बहुत आकर्षित करता है. अत: आप को अपने खाने को सुरक्षित रखने की चेतावनी दी जाती है. आप इन से बचाव के लिए अगर कोई रसायन इसलिए नहीं छिड़कना चाहतीं क्योंकि आप को रसायनों से ऐलर्जी है, तो हम आप को चींटियों आदि से बचाव के कुछ घरेलू उपाय बता रहे हैं:

पुदीने की पत्तियां: चींटियां अपने वजन से 50 गुना अधिक वजन उठा सकती हैं. अत: ये पुदीने की पत्तियां भी उठा सकती हैं, लेकिन जब ये उन्हें खाती हैं तो मर जाती हैं.

साबुन और पानी का घोल: यह घोल चींटियों से छुटकारा पाने का सब से अच्छा तरीका है. 2 बड़े चम्मच साबुन के पानी को थोड़े से सादे पानी में मिला कर एक बोतल में भर लें. फिर इस घोल को अपने घर की खिड़कियों, दरवाजों और जहांजहां भी दरारें हों वहां छिड़कें. इसे पोंछें नहीं. यह घोल खाने की खुशबू को समाप्त कर देता है, जिस से चींटियां खाने तक नहीं पहुंच पाती हैं. आप इस घोल को चींटियों पर छिड़केंगी तो वे मर भी जाएंगी.

कौर्नमील: यह चींटियों के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल हो सकता है. यह इनसानों, जानवरों के लिए नुकसानदायक भी नहीं होता है. इस को खाते ही चींटियां मर जाती हैं.

चौक या बेबी पाउडर: यह चींटियों से बचने का सब से पुराना घरेलू तरीका है. इन दोनों में टैलकम पाउडर होता है, जो चींटियों को भगाने का प्राकृतिक समाधान है. बेबी पाउडर में कौर्नस्टार्च होता है, जो चींटियों को भगाने में मदद करता है. जहां चींटियां बारबार आती हैं आप इन्हें उस जगह भी डाल सकती हैं.

कंटेनर और कटोरे: अपने खाने को किसी एअरटाइट कटोरे में ही रखें. इस से आप खाने को ताजा भी रख पाएंगी, साथ कीड़ेमकोड़ों से भी बचा रहेगा. एक बड़े कटोरे में पानी डाल कर अपने खाने के आसपास एक खाई जैसी बना दें. इस से चींटियां आप के खाने तक नहीं पहुंच पाएंगी.

सिरका: सिरका खाने में प्रयोग होता है. पर क्या आप को पता है कि यह चींटियों को भगाने में भी मदद करता है  अपने खट्टेपन के कारण सिरका बैक्टीरिया और कीटाणुओं को खत्म करने में भी मदद करता है. इस की गंध के कारण चींटियां इस के पास नहीं फटकतीं. इस के प्रयोग से घर साफ और चींटियों से मुक्त रहता है.

खाने के स्रोत को हटा दें: कई बार आप फ्रिज के नीचे या ऐसी ही अन्य किसी जगह फल आदि गिरी खाने की वस्तु को ढूंढ़ते होंगे क्योंकि उस वस्तु को खाने के लिए जाती बहुत सारी चीटियां आप को दिखाई दी होंगी. अत: जब कभी भी कोई खाने की चीज गिरे तो उसे उसी वक्त उठा लें.

अगर कोई भी समाधान 100% सफल नहीं हो रहा हो तो आप परेशान न हों, क्योंकि चींटियों का आगमन घर में मौसम के कारण भी होता है. अधिकतर चींटियां बारिश और अधिक सूखे के मौसम में घर में आती हैं. तब कोई भी समाधान काम नहीं आता है, तब स्वयं ही इन के जाने का इंतजार करना पड़ता है.

अंशिका

प्रशांत और मैं पटना शहर के एक ही महल्ले में रहते थे और एक ही स्कूल में पढ़ते थे. यह भी इत्तफाक ही था कि दोनों अपने मातापिता की एकलौती संतान थे. एक ही गली में थोड़ी दूरी के फासले पर दोनों के घर थे. प्रशांत के पिता रेलवे में गोदाम बाबू थे तो मेरे पिता म्यूनिसिपल कौरपोरेशन में ओवरसियर. दोनों अच्छेखासे खातेपीते परिवार से थे. पर एक फर्क था वह यह कि प्रशांत बंगाली बनिया था तो मैं हिंदी भाषी ब्राह्मण थी. पर प्रशांत के पूर्वज 50 सालों से यहीं बिहार में थे.

हम एक ही स्कूल में एक ही कक्षा में पढ़ते थे. प्रशांत मेधावी विद्यार्थी था तो मैं औसत छात्रा थी. हमारा स्कूल आनाजाना साथ ही होता था. हम दोनों अच्छे दोस्त बन चुके थे.

ऐसा नहीं था कि मेरी कक्षा में और लड़कियां नहीं थीं, पर मेरी गली से स्कूल में जाने वाली मैं अकेली लड़की थी. हमारा स्कूल ज्यादा दूर नहीं था. करीब पौना किलोमीटर दूर था, इसलिए हम पैदल ही जाते थे. मैं प्रशांत को शांत बुलाया करती थी, क्योंकि वह और लड़कों से अलग शांत स्वभाव का था. प्रशांत मुझे तनुजा की जगह तनु ही पुकारता था. हमारी दोस्ती निश्छल थी. पर स्कूल के विद्यार्थी कभी छींटाकाशी भी कर देते थे. उन की कुछ बातें उस समय मेरी समझ से बाहर थीं तो कुछ को मैं नजरअंदाज कर देती थी.

जब मैं 9वीं कक्षा में पहुंची तो एक दिन मां ने मुझ से कहा कि तू अब प्रशांत के साथ स्कूल न जाया कर. तब मैं ने कहा कि इस में क्या बुराई है  वह हमेशा कक्षा में अव्वल रहता है… पढ़ाई में मेरी मदद कर देता है.

जब मैं 10वीं कक्षा में पहुंची थी तो एक दिन शांत ने पूछा था कि आगे मैं क्या पढ़ना चाहूंगी तब मैं ने कहा था कि इंजीनियरिंग करने का मन है, पर मेरी मैथ थोड़ी कमजोर है. उस दिन से शांत गणित के कठिन सवालों को समझने में मेरी सहायता कर देता था. कभीकभार नोट्स या किताबें लेनेदेने मेरे घर भी आ जाता, पर घर के अंदर नहीं आता था, बाहर से ही चला जाता था. मेरी मां को वह अच्छा नहीं लगता था, इसलिए मैं चाह कर भी अंदर आने को नहीं कहती थी. पर मुझे उस का साथ, उस का पास आना अच्छा लगता था. मन में एक अजीब सी खुशी होती थी.

देखते ही देखते बोर्ड की परीक्षा भी शुरू हो गई. 3 सप्ताह तक हम इस बीच काफी व्यस्त रहे. शांत की सहयाता से मेरा मैथ का पेपर भी अच्छा हो गया. अब स्कूल आनाजाना बंद था तो शांत से मिले भी काफी दिन हो गए थे. अब तो बोर्ड परीक्षा के परिणाम का बेसब्री से इंतजार था.परीक्षा परिणाम भी घोषित हो गया. मैं अपनी मार्कशीट लेने स्कूल पहुंची. वहां मुझे प्रशांत भी मिला. जैसे कि पूरे स्कूल को अपेक्षा थी शांत अपने स्कूल में अव्वल था. मैं ने उसे बधाई दी. मुझे भी अपने मार्क्स पर खुशी थी. आशा से अधिक ही मिले थे. जब प्रशांत ने भी मुझे बधाई दी तो मैं ने उस से कहा कि इस में तुम्हारा भी सहयोग है. तब शांत ने कहा था कि मुझे भी इसी स्कूल में प्लस टू में साइंस विषय मिल जाना चाहिए.

अब मैं 11वीं कक्षा में थी. मुझे भी साइंस विषय मिला पर मैं ने मैथ चुना था, जबकि शांत ने बायोलौजी ली थी. वह डाक्टर बनना चाहता था. अब मेरे और शांत के सैक्शन अलग थे. फिर भी ब्रेक में हम अकसर मिल लेते थे. कभीकभी प्रयोगशाला में भी मुलाकात हो जाती थी. उस की बातों से अब मुझे ऐसा एहसास होता कि वह मुझ में कुछ ज्यादा ही रुचि ले रहा है. इस बात से मैं भी मन से आनंदित थी पर दोनों में ही खुल कर मन की बात कहने का साहस न था. पर शांत कहा करता था कि हमारे विषय भिन्न हैं तो पता नहीं 12वीं कक्षा के बाद हम दोनों कहां होंगे. एक बार मुझे जो नोटबुक उस ने दिया था उस के पहले पन्ने पर लिखा था तनु ईलू. मैं ने भी उस के नीचे ‘शांत…’ लिख कर लौटा दिया था. देखते ही देखते हम दोनों की बोर्ड की परीक्षा खत्म हो गई. शांत ने मैडिकल का ऐंट्रेंस टैस्ट दिया और मैं ने इंजीनियरिंग का. 12वीं कक्षा का परिणाम भी आ गया था. प्रशांत फिर अव्वल आया था. मुझे भी अच्छे मार्क्स मिले थे. शांत मैडिकल के लिए कंपीट कर चुका था. मैं ने उसे बधाई दी, परंतु मैं इंजीनियरिंग में कंपीट नहीं कर सकी थी. शांत ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है. मुझे अपने मनपसंद विषय में औनर्स ले कर गै्रजुएशन की पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी थी. कुदरत ने एक बार फिर मेरा साथ दिया. मुझे पटना साइंस कालेज में फिजिक्स औनर्स में दाखिला मिल गया और शांत ने पटना मैडिकल कालेज में दाखिला लिया. दोनों कालेज में कुछ ही दूरी थी. यहां भी हम लौंग बे्रक में मिल कर साथ चाय पी लेते थे.

मुझे याद है एक बार शांत ने कहा था, ‘‘तनु, चलो आज तुम्हें कौफ्टी पिलाता हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘शांत यह कौफ्टी क्या बला है  कभीकभी तुम्हारी बातें मुझे मिस्ट्री लगती हैं बिलकुल वैसे ही जैसे ईलू.’’

उस ने कहा, ‘‘तो तनु मैडम को अभी तक ईलू समझ नहीं आया…कोई बात नहीं…उस पर बाद में बात करते हैं. फिलहाल कौफ्टी से तुम्हारा परिचय करा दूं,’’ और मुझे मैडिकल कालेज के गेट के सामने फुटपाथ पर एक चाय वाले ढाबे पर ले गया. फिर 2 कौफ्टी बनाने को कहा. ढाबे वाले ने चंद मिनटों में 2 कप कौफ्टी बना दिए. सच, गजब का स्वाद था. दरअसल, यह चाय और कौफी का मिश्रण था, पर बनाने वाले के हाथ का जादू था कि ऐसा निराला स्वाद था.

कुछ दिनों तक शांत और मैं एक ही बस से कालेज आते थे. वह तो शांत का संरक्षण था जो बस की भीड़ में भी सहीसलामत आनाजाना संभव था वरना बस में पटना के मनचले लड़कों की कमी न थी. फिर भी उन के व्यंग्यबाण के शिकार हम दोनों थे पर हम नजरअंदाज करना ही बेहतर समझते थे. चूंकि बस में आनेजाने में काफी समय बरबाद होता था, इसलिए शांत के पिता ने उस के लिए एक स्कूटर ले दिया. अब तो दोनों के वारेन्यारे थे. रास्ते में पहले मेरा कालेज पड़ता था. शांत मुझे ड्रौप करते हुए अपने कालेज जाता था. हालांकि लौटने में कभी मुझे अकेले ही बस या रिकशा लेना पड़ता था. ऐसा उस दिन होता था जब मेरे या शांत की क्लास खत्म होने के बीच का अंतराल ज्यादा होता था.

समय के भी पंख होते हैं. देखते ही देखते मेरी फाइनल परीक्षा भी खत्म हो गई. आखिरी पेपर के दिन शांत ने दोपहर को एक रैस्टोरैंट में मिलने को कहा. वहां हम दोनों कैबिन में बैठे और शांत ने कुछ स्नैक्स और कौफी और्डर की.

शांत ने कहा, ‘‘तनु, तुम ने ग्रैजुएशन के बाद क्या सोचा है  आगे पीजी करनी है ’’ मैं ने कहा, ‘‘अभी कुछ तय नहीं है. वैसे मातापिता को कहते सुना है कि तनुजा की अब शादी कर देनी चाहिए. शायद किसी लड़के से बात भी चल रही है.’’ मैं ने महसूस किया कि शादी शब्द सुनते ही उस के चेहरे पर एक उदासी सी छा गई थी.

फिर शांत बोला, ‘‘तुम्हारे मातापिता ने तुम से राय ली है  तुम्हारी अपनी भी तो कोई पसंद होगी  तुम्हें यहां बुलाने का एक विशेष कारण है. याद है एक दिन मैं ने कहा था कि तुम्हें इलू का मतलब बताऊंगा. आज मैं ने तुम्हें इसीलिए बुलाया है.’’

‘‘तो फिर जल्दी बताओ,’’ मैं ने कहा.

‘‘मेरे इलू का मतलब आई लव यू है,’’ शांत ने कहा.

मैं बोली, ‘‘तुम्हारे मुख से यह सुन कर खुशी हुई. पर हमेशा अव्वल रहने वाले शांत ने प्यार का इजहार करने में इतनी देर क्यों कर दी  मेरे आगे की पढ़ाई और शादी के बारे में अपने मातापिता का विचार जानने की कोशिश करूंगी, फिर आगे बात करती हूं. मुझे तो तुम्हारा साथ वर्षों से प्यारा है,’’ इस के बाद मैं ने उस का हाथ दबाते हुए घर ड्रौप करने को कहा.

मेरे मातापिता शांत को पसंद नहीं करते थे. मेरे गै्रजुएशन का रिजल्ट भी आ गया था और मैं अपने रिजल्ट से खुश थी. इस दौरान मां ने मुझे बताया कि मेरी शादी एक लड़के से लगभग तय है. लड़के की ‘हां’ कहने की देरी है. इसी रविवार लड़का मुझे देखने आ रहा है. मैं ने मां से कहा भी कि मुझे पीजी करने दो, पर वे नहीं मानीं. कहा कि मेरे पापा भी यही चाहते हैं. लड़का सुंदर है, इंजीनियर है और अच्छे परिवार का है. मैं ने मां से कहा भी कि एक बार मुझ से पूछा होता… मेरी पसंद भी जानने की कोशिश करतीं. अभी रविवार में 4 दिन थे. पापा ने भी एक दिन कहा कि संजय (लड़के का नाम) 4 दिन बाद मुझे देखने आ रहा था. मैं ने उन से भी कहा कि मेरी शादी अभी न कर आगे पढ़ने दें. पर उन्होंने सख्ती से मना कर दिया. मै ने दबी आवाज में कहा कि इस घर में किसी को मेरी पसंद की परवाह नहीं है. तब पापा ने गुस्से में कहा कि तेरी पसंद हम जानते हैं, तेरी पसंद प्रशांत है न  पर यह असंभव है. प्रशांत बंगाली बनिया है और हम हिंदी भाषी ब्राह्मण हैं.

मैं ने एक बार फिर विरोध के स्वर में पापा से कहा कि आखिर प्रशांत में क्या बुराई है  उन का जवाब और सख्त था कि मुझे प्रशांत या मातापिता में से किसी एक को चुनना होगा. इस के आगे मैं कुछ नहीं बोल सकी.

अगले दिन मैं ने शांत से उसी रैस्टोरैंट में मिलने को कहा. मैं ने घर की स्थिति से उसे अवगत कराया.

शांत ने कहा, ‘‘देखो तनु प्यार तो मैं तुम्हीं से करता हूं और आगे भी करता रहूंगा. पर नियति को हम बदल नहीं सकते. अभी मेरी पढ़ाई पूरी करने में समय लगेगा…और तुम जानती हो आजकल केवल एमबीबीएस से कुछ नहीं होता है…मुझे एमएस करना होगा…मुझे सैटल होने में काफी समय लगेगा. अगर इतना इंतजार तुम्हारे मातापिता कर सकते हैं, तो एक बार मैं उन से मिल कर बात कर सकता हूं…मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे मातापिता को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं होगा.’’

कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने कहा, ‘‘मुझे कोई फायदा नहीं दिखता, बल्कि मुझे डर है कि कहीं वे तुम्हारा अपमान न करें जो मुझे गंवारा नहीं.’’

इस पर शांत ने कहा था कि मेरे प्यार के लिए वह यह रिस्क लेने को तैयार है. आखिर वही हुआ जिस का डर था. पापा ने उसे दरवाजे से ही यह कह कर लौटा दिया कि उस के आने की वजह उन्हें मालूम है, जो उन्हें हरगिज स्वीकार नहीं. अगले दिन शांत फिर मुझ से मिला. मैं ने ही उस से कहा था कि मेरे घर कल उस के साथ जो कुछ हुआ उस पर मैं शर्मिंदा हूं और उन की ओर से मुझे माफ कर दे. शांत ने बड़ी शांति से कहा कि इस में माफी मांगने का सवाल ही नहीं है. सब कुछ समय पर छोड़ दो. मातापिता के विरुद्ध जा कर इस समय कोर्ट मैरिज करने की स्थिति में हम नहीं हैं और न ही ऐसा करना उचित है. मैं भी उस की बात से सहमत थी और फिर अपने घर चली आई. भविष्य को समय के हवाले कर हालात से समझौता कर लिया था.

रविवार के दिन संजय अपने मातापिता के साथ मुझे देखने आए. देखना क्या बस औपचारिकता थी. उन की तरफ से हां होनी ही थी. संजय की मां ने एक सोने की चेन मेरे गले में डाल कर रिश्ते पर मुहर लगा दी. 1 महीने के अंदर मेरी शादी भी हो गई. संजय पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर थे और पटना में ही पोस्टेड थे. चंद हफ्तों बाद मेरा जन्मदिन था. संजय ने एक पार्टी रखी थी तो मुझ से भी निमंत्रण पाने वालों की लिस्ट दिखाते हुए पूछा था कि मैं किसी और को बुलाना चाहूंगी क्या  तब मैं ने प्रशांत का नाम जोड़ दिया और उस का पता और फोन नंबर भी लिख दिया था. शांत अब होस्टल में रहने लगा था. संजय के पूछने पर मैं ने बताया कि वह मेरे बचपन का दोस्त है.

संजय ने चुटकी लेते हुए पूछा था, ‘‘ओनली फ्रैंड या बौयफ्रैंड…’’

मैं ने उन की बातचीत काट कर कहा था, ‘‘प्लीज, दोबारा ऐसा न बोलें.’’

संजय ने कहा, ‘‘सौरी, मैं तो यों ही मजाक कर रहा था.’’

खैर, संजय ने शानदार पार्टी रखी थी. शांत भी आया था. संजय और शांत दोनों काफी घुलमिल कर बातें कर रहे थे. बीचबीच में दोनों ठहाके भी लगा रहे थे. मुझे भी यह देख कर खुशी हो रही थी और मेरे मन में जो डर था कि शांत को ले कर संजय को कोई गलतफहमी तो नहीं, वह भी दूर हो चुकी थी.

समय की गति और तेज हो चली थी. देखते ही देखते 4 वर्ष बीत गए. शांत कोलकाता में अपना पीजी भी पूरा करने जा रहा था. इस बीच उस ने हम लोगों से लगातर संपर्क बनाए रखा था. खासकर मेरे और संजय के जन्मदिन पर और शादी की सालगिरह पर बधाई और तोहफा देना कभी नहीं भूलता था. शांत ने अभी तक शादी नहीं की थी. इन दिनों मेरे मातापिता और सासससुर काफी चिंतित रहते थे. हम दोनों पतिपत्नी भी, क्योंकि अभी तक हमारी कोई संतान न थी. मैं ने दिन भर के अकेलेपन से बचने के लिए पास का एक प्राइवेट स्कूल जौइन कर लिया था. एक दिन शांत पटना आया था, तो हम लोगों से भी मिलने आया. बातोंबातों में संजय ने हमारी चिंता का कारण बताते हुए कहा, ‘‘अरे डाक्टर, कुछ हम लोगों का भी इलाज करो यार. यहां तो डाक्टरों ने जो भी कहा वह किया पर कोई फायदा नहीं हुआ. यहां के डाक्टर ने हम दोनों का टैस्ट भी लिया और कहा कि मैं पिता बनने में सक्षम ही नहीं हूं…इस के बाद से हम से ज्यादा दुखी हमारे मातापिता रहते हैं.’’ मैं भी वहीं बैठी थी. शांत ने हम दोनों को कोलकाता आने के लिए कहा कि वहां किसी अच्छे स्पैशलिस्ट की राय लेंगे.

संजय ने बिना देर किए कहा, ‘‘हां, यह ठीक रहेगा. तनुजा ने अभी तक कोलकाता नहीं देखा है.’’

अगले हफ्ते हम कोलकाता पहुंच गए. अगले दिन शांत हमें डाक्टर के पास ले गया.

एक बार फिर से दोनों के टैस्ट हुए. यहां भी डाक्टर ने यही कहा कि संजय संतान पैदा करने में सक्षम नहीं है. शांत ने डाक्टर दंपती से अकेले में कुछ बात की, फिर संजय से कहा कि बाकी बातें घर चल कर करते हैं. उसी शाम जब हम तीनों शांत के यहां चाय पी रहे थे, तो उस ने मुझे और संजय दोनों की ओर देख कर कहा, ‘‘अब तो समस्या का मूल कारण हम सब को पता है, किंतु चिंता की बात नहीं है, क्योंकि  इस का भी हल मैडिकल साइंस में है. दूसरा विकल्प किसी बच्चे को गोद लेना है.’’ संजय ने कहा, ‘‘नहीं, तनु किसी और के बच्चे को गोद लेने को तैयार नहीं है…जल्दी से पहला उपाय बताओ डाक्टर.’’

‘‘तुम दोनों ध्यान से सुनो. तनु में मां बनने के सारे गुण हैं. उसे सिर्फ सक्षम पुरुष का वीर्य चाहिए. यह आजकल संभव है, बिना परपुरुष से शारीरिक संपर्क के. उम्मीद है तुम ने सैरोगेसी के बारे में सुना होगा…इस प्रक्रिया द्वारा अगर सक्षम पुरुष का वीर्य तनु के डिंब में स्थापित कर दिया जाए तो वह मां बन सकती है,’’ शांत बोला.

यह सुन कर मैं और संजय एकदूसरे का मुंह देखने लगे.

तभी शांत ने आगे कहा, ‘‘इस में घबराने की कोई बात नहीं है. डाक्टर विजय दंपती के क्लीनक में सारा प्रबंध है. तुम लोग ठीक से सोच लो…ज्यादा समय व्यर्थ न करना. अब आए हो तो यह शुभ कार्य कर के ही जाना ठीक रहेगा. सब कुछ 2-3 दिन के अंदर हो जाएगा.’’

थोड़ी देर सब खामोश रहे, फिर संजय ने शांत से कहा, ‘‘ठीक है, हमें थोड़ा वक्त दो. मैं पटना अपने मातापिता से भी बात कर लेता हूं.’’

मैं ने और संजय दोनों ने पटना में अपनेअपने मातापिता से बात की. उन्होंने भी यही कहा कि कोई और विकल्प नहीं है तो सैरोगेसी में कोई बुराई नहीं है. उस रात शांत ने जब पूछा कि हम ने क्या निर्णय लिया है तो मैं ने कहा, ‘‘हम ने घर पर बात कर ली है. उन को कोई आपत्ति नहीं है. पर मेरे मन में एक शंका है.’’ शांत के कैसी शंका पूछने पर मैं फिर बोली, ‘‘किसी अनजान के वीर्य से मुझे एक डर है कि न जाने उस में कैसे जीन्स होंगे और जहां तक मैं जानती हूं इसी पर बच्चे का जैविक लक्षण, व्यक्तित्व और चरित्र निर्भर करता है.’’

‘‘तुम इस की चिंता छोड़ दो. डाक्टर विजय और उन के क्लीनिक पर मुझे पूरा भरोसा है. मैं उन से बात करता हूं. किसी अच्छे डोनर का प्रबंध कर लेंगे,’’ कह शांत अपने कमरे में जा कर डाक्टर विजय से फोन पर बात करने लगा. फिर बाहर आ कर बोला, ‘‘सब इंतजाम हो जाएगा. उन्होंने परसों तुम दोनों को बुलाया है.’’

अगले दिन सुबह शांत ने कहा था कि उसे अपने अस्पताल जाना है. पर मुझे बाद में पता चला कि वह डाक्टर विजय के यहां गया था. डाक्टर विजय को उस ने मेरी चिंता बताई थी. उन्होंने शांत को अपना वीर्य देने को कहा था. पहले तो वह तैयार नहीं था कि तनु न जाने उस के बारे में क्या सोचेगी. तब डाक्टर विजय ने उस से कहा था कि इस बात की जानकारी किसी तीसरे को नहीं होगी. फिर शांत का एक टैस्ट ले कर उस का वीर्य ले कर सुरक्षित रख लिया. अगले दिन मैं, संजय और शांत तीनों डाक्टर विजय के क्लीनिक पहुंचे. उन्होंने कुछ पेपर्स पर मेरे और संजय के हस्ताक्षर लिए जो एक कानूनी औपचारिकता थी. इस के बाद मुझे डाक्टर शालिनी अपने क्लीनिक में ले गईं. उन्होंने मेरे लिए सुरक्षित रखे वीर्य को मेरे डिंब में स्थापित कर दिया. वीर्य के डोनर का नाम गोपनीय रखा गया था. सारी प्रक्रिया 2 घंटों में पूरी हो गई.

देखते ही देखते 9 महीने बीत गए. वह दिन भी आ गया जिस का हमें इंतजार था. मैं एक सुंदर कन्या की मां बनी. पूरा परिवार खुश था. पार्टी का आयोजन भी किया गया. शांत भी आया था. 6 महीने ही बीते थे कि संजय को औफिस के काम से 1 हफ्ते के लिए सिक्किम जाना पड़ा. इन के जाने के 3 दिन बाद सिक्किम में आए भूंकप में इन की मौत हो गई. शांत स्वयं सिक्किम से संजय के पार्थिव शरीर को ले कर आया. अब चंद मास पहले की खुशी को प्रकृति के एक झटके ने गम में बदल डाला था. पर वक्त का मलहम बड़े से बड़े घाव को भर देता है. संजय को गुजरे 6 माह बीत चुके थे. शांत जब भी पटना आता बेबी के लिए ढेर सारे खिलौने लाता और देर तक उस के साथ खेलता था. अब बेबी थोड़ा चलने लगी थी.

एक दिन शांत लौन में बेबी के साथ खेल रहा था. मैं भी 2 कप चाय ले कर आई और कुरसी पर बैठ गई. मैं ने एक कप उसे देते हुए पूछा, ‘‘बेबी तुम्हें तंग तो नहीं करती  तुम इसे इतना वक्त देते हो…शादी क्यों नहीं कर लेते ’’ शांत ने तुरंत कहा, ‘‘तुम्हारी जैसी अब तक दूसरी मिली ही नहीं.’’

मैं ने सिर्फ, ‘‘तुम भी न,’’ कहा.

इधर शांत मेरे मातापिता एवं सासससुर से जब भी मिलता पूछता कि तनु के भविष्य के बारे आप लोगों ने क्या सोचा है  मैं अभी भी उस से प्यार करता हूं और सहर्ष उसे अपनाने को तैयार हूं. एक बार उन्होंने कहा कि तुम खुद बात कर के देख लो.

तब शांत ने कहा था कि वह इस बात की पहल खुद नहीं कर सकता, क्योंकि कहीं तनु बुरा मान गई तो दोस्ती भी खटाई में पड़ जाएगी. एक बार मेरी मां ने मुझ से कहा कि अगर मैं ठीक समझूं तो शांत से मेरे रिश्ते की बात करेगी. पर मैं ने साफ मना कर दिया. इस के बाद उन्होंने शांत पर मुझ से बात करने का दबाव डाला.इसीलिए शांत ने आज फिर कहा, ‘‘तनु अभी बहुत लंबी जिंदगी पड़ी है. तुम शादी क्यों नहीं कर लेती हो  बेबी को भी तो पिता का प्यार चाहिए ’’

मैं ने झुंझला कर कहा, ‘‘कौन देगा बेबी को पिता का प्यार ’’

‘‘मैं दूंगा,’’ शांत ने तुरंत कहा.

इस बार मैं गुस्से में बोली, ‘‘मैं बेबी को सौतेले पिता की छाया में नहीं जीने दूंगी, फिर चाहे तुम ही क्यों न हो.’’

‘‘अगर उस का पिता सौतेला न हो सगा हो तो ’’

‘‘क्या कह रहे हो  पागल मत बनो,’’ मैं ने कहा.

शांत ने तब मुझे बताया, ‘‘डाक्टर विजय के क्लीनिक में जब तुम ने वीर्य के जींस पर अपनी शंका जताई थी, तो मैं ने डाक्टर को यह बात कही थी. तब उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं तुम्हारा सच्चा दोस्त हूं तो यह काम मैं ही करूं. तुम ने अपनी कोख में 9 महीने तक मेरे ही अंश को संभाला था. अगर संजय जिंदा होता तो यह राज कभी न खुलता.’’ मैं काफी देर तक आश्चर्यचकित उसे देखती रही. फिर मैं ने फैसला किया कि मेरी बेबी को पिता का भी प्यार मिले…मेरी बेबी जो हम दोनों के अंश से बनी है अब अंशिका कहलाती है.

अंत भला तो सब भला

संगीता को यह एहसास था कि आज जो दिन में घटा है, उस के कारण शाम को रवि से झगड़ा होगा और वह इस के लिए मानसिक रूप से तैयार थी. लेकिन जब औफिस से लौटे रवि ने मुसकराते हुए घर में कदम रखा तो वह उलझन में पड़ गई.

‘‘आज मैं बहुत खुश हूं. तुम्हारा मूड हो तो खाना बाहर खाया जा सकता है,’’ रवि ने उसे हाथ से पकड़ कर अपने पास बैठा लिया.

‘‘किस कारण इतना खुश नजर आ रहे हो ’’ संगीता ने खिंचे से स्वर में पूछा.

‘‘आज मेरे नए बौस उमेश साहब ने मुझे अपने कैबिन में बुला कर मेरे साथ दोस्ताना अंदाज में बहुत देर तक बातें कीं. उन की वाइफ से तो आज दोपहर में तुम मिली ही थीं. उन्हें एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने मैं ही ले गया था. मेरे दोस्त विपिन के पिताजी उस स्कूल के चेयरमैन को जानते हैं. उन की सिफारिश से बौस की वाइफ को वहां टीचर की जौब मिल जाएगी. बौस मेरे काम से भी बहुत खुश हैं. लगता है इस बार मुझे प्रमोशन जरूर मिल जाएगी,’’ रवि ने एक ही सांस में संगीता को सारी बात बता डाली. संगीता ने उस की भावी प्रमोशन के प्रति कोई प्रतिक्रिया जाहिर करने के बजाय वार्त्तालाप को नई दिशा में मोड़ दिया, ‘‘प्रौपर्टी डीलर ने कल शाम जो किराए का मकान बताया था, तुम उसे देखने कब चलोगे ’’

‘‘कभी नहीं,’’ रवि एकदम चिड़ उठा.

‘‘2 दिन से घर के सारे लोग बाहर गए हुए हैं और ये 2 दिन हम ने बहुत हंसीखुशी से गुजारे हैं. कल सुबह सब लौट आएंगे और रातदिन का झगड़ा फिर शुरू हो जाएगा. तुम समझते क्यों नहीं हो कि यहां से अलग हुए बिना हम कभी खुश नहीं रह पाएंगे…हम अभी उस मकान को देखने चल रहे हैं,’’ कह संगीता उठ खड़ी हुई.

‘‘मुझे इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाना है. अगर तुम में जरा सी भी बुद्धी है तो अपनी बहन और जीजा के बहकावे में आना छोड़ दो,’’ गुस्से के कारण रवि का स्वर ऊंचा हो गया था. ‘‘मुझे कोई नहीं बहका रहा है. मैं ने 9 महीने इस घर के नर्क में गुजार कर देख लिए हैं. मुझे अलग किराए के मकान में जाना ही है,’’ संगीता रवि से भी ज्यादा जोर से चिल्ला पड़ी. ‘‘इस घर को नर्क बनाने में सब से ज्यादा जिम्मेदार तुम ही हो…पर तुम से बहस करने की ताकत अब मुझ में नहीं रही है,’’ कह रवि उठ कर कपड़े बदलने शयनकक्ष में चला गया और संगीता मुंह फुलाए वहीं बैठी रही.

उन का बाहर खाना खाने का कार्यक्रम तो बना ही नहीं, बल्कि घर में भी दोनों ने खाना अलगअलग और बेमन से खाया. घर में अकेले होने का कोई फायदा वे आपसी प्यार की जड़ें मजबूत करने के लिए नहीं उठा पाए. रात को 12 बजे तक टीवी देखने के बाद जब संगीता शयनकक्ष में आई तो रवि गहरी नींद में सो रहा था. अपने मन में गहरी शिकायत और गुस्से के भाव समेटे वह उस की तरफ पीठ कर के लेट गई. किराए के मकान में जाने के लिए रवि पर दबाव बनाए रखने को संगीता अगली सुबह भी उस से सीधे मुंह नहीं बोली. रवि नाश्ता करने के लिए रुका नहीं. नाराजगी से भरा खाली पेट घर से निकल गया और अपना लंच बौक्स भी मेज पर छोड़ गया. करीब 10 बजे उमाकांत अपनी पत्नी आरती, बड़े बेटे राजेश, बड़ी बहू अंजु और 5 वर्षीय पोते समीर के साथ घर लौटे. वे सब उन के छोटे भाई के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए 2 दिनों के लिए गांव गए थे.

फैली हुई रसोई को देख कर आरती ने संगीता से कुछ तीखे शब्द बोले तो दोनों के बीच फौरन ही झगड़ा शुरू हो गया. अंजु ने बीचबचाव की कोशिश की तो संगीता ने उसे भी कड़वी बातें सुनाते हुए झगड़े की चपेट में ले लिया. इन लोगों के घर पहुंचने के सिर्फ घंटे भर के अंदर ही संगीता लड़भिड़ कर अपने कमरे में बंद हो गई थी. उस की सास ने उसे लंच करने के लिए बुलाया पर वह कमरे से बाहर नहीं निकली. ‘‘यह संगीता रवि भैया को घर से अलग किए बिना न खुद चैन से रहेगी, न किसी और को रहने देगी, मम्मी,’’ अंजु की इस टिप्पणी से उस के सासससुर और पति पूरी तरह सहमत थे. ‘‘इस की बहन और मां इसे भड़काना छोड़ दें तो सब ठीक हो जाए,’’ उमाकांत की विवशता और दुख उन की आवाज में साफ झलक रहा था.

‘‘रवि भी बेकार में ही घर से कभी अलग न होने की जिद पर अड़ा हुआ है. शायद किराए के घर में जा कर संगीता बदल जाए और इन दोनों की विवाहित जिंदगी हंसीखुशी बीतने लगे,’’ आरती ने आशा व्यक्त की.‘‘किराए के घर में जा कर बदल तो वह जाएगी ही पर रवि को यह अच्छी तरह मालूम है कि उस के घर पर उस की बड़ी साली और सास का राज हो जाएगा और वह इन दोनों को बिलकुल पसंद नहीं करता है. बड़े गलत घर में रिश्ता हो गया उस बेचारे का,’’ उमाकांत के इस जवाब को सुन कर आरती की आंखों में आंसू भर आए तो सब ने इस विषय पर आगे कोई बात करना मुनासिब नहीं समझा.

शाम को औफिस से आ कर रवि उस से पिछले दिन घटी घटना को ले कर झगड़ा करेगा, संगीता की यह आशंका उस शाम भी निर्मूल साबित हुई. रवि परेशान सा घर में घुसा तो जरूर पर उस की परेशानी का कारण कोई और था. ‘‘मुझे अस्थाई तौर पर मुंबई हैड औफिस जाने का आदेश मिला है. मेरी प्रमोशन वहीं से हो जाएगी पर शायद यहां दिल्ली वापस आना संभव न हो पाए,’’ उस के मुंह से यह खबर सुन कर सब से ज्यादा परेशान संगीता हुई.

‘‘प्रमोशन के बाद कहां जाना पड़ेगा आप को ’’ उस ने चिंतित लहजे में पूछा.

‘‘अभी कुछ पता नहीं. हमारी कंपनी की कुछ शाखाएं तो ऐसी घटिया जगह हैं, जहां न अच्छा खानापीना मिलता है और न अस्पताल, स्कूल जैसी सुविधाएं ढंग की हैं,’’ रवि के इस जवाब को सुन कर उस का चेहरा और ज्यादा उतर गया.

‘‘तब आप प्रमोशन लेने से इनकार कर दो,’’ संगीता एकदम चिड़ उठी, ‘‘मुझे दिल्ली छोड़ कर धक्के खाने कहीं और नहीं जाना है.’’ ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या  मैं अपनी प्रमोशन कैसे छोड़ सकता हूं ’’ रवि गुस्सा हो उठा.

‘‘तब इधरउधर धक्के खाने आप अकेले जाना. मैं अपने घर वालों से दूर कहीं नहीं जाऊंगी,’’ अपना फैसला सुना कर नाराज नजर आती संगीता अपने कमरे में घुस गई. आगामी शनिवार को रवि हवाईजहाज से मुंबई चला गया. उस के घर छोड़ने से

पहले ही अपनी अटैची ले कर संगीता मायके चली गई थी. रवि के मुंबई चले जाने से संगीता की किराए के अलग घर में रहने की योजना लंगड़ा गई. उस के भैयाभाभी तो पहले ही से ऐसा कदम उठाए जाने के हक में नहीं थे. उस की दीदी और मां रवि की गैरमौजूदगी में उसे अलग मकान दिलाने का हौसला अपने अंदर पैदा नहीं कर पाईं. विवाहित लड़की का ससुराल वालों से लड़झगड़ कर अपने भाईभाभी के पास आ कर रहना आसान नहीं होता, यह कड़वा सच संगीता को जल्द ही समझ में आने लगा. कंपनी के गैस्टहाउस में रह रहा रवि उसे अपने पास रहने को बुला नहीं सकता था और संगीता ने अपनी ससुराल वालों से संबंध इतने खराब कर रखे थे कि वे उसे रवि की गैरमौजूगी में बुलाना नहीं चाहते थे.

सब से पहले संगीता के संबंध अपनी भाभी से बिगड़ने शुरू हुए. घर के कामों में हाथ बंटाने को ले कर उन के बीच झड़पें शुरू हुईं और फिर भाभी को अपनी ननद की घर में मौजूदगी बुरी तरह खलने लगी. संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी की तो उन का बेटा उन से झगड़ा करने लगा. तब संगीता की बड़ी बहन और जीजा को झगड़े में कूदना पड़ा. फिर टैंशन बढ़ती चली गई. ‘‘हमारे घर की सुखशांति खराब करने का संगीता को कोई अधिकार नहीं है, मां. इसे या तो रवि के पास जा कर रहना चाहिए या फिर अपनी ससुराल में. अब और ज्यादा इस की इस घर में मौजूदगी मैं बरदाश्त नहीं करूंगा,’’ अपने बेटे की इस चेतावनी को सुन कर संगीता की मां ने घर में काफी क्लेश किया पर ऐसा करने के बाद उन की बेटी का घर में आदरसम्मान बिलकुल समाप्त हो गया. बहू के साथ अपने संबंध बिगाड़ना उन के हित में नहीं था, इसलिए संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी करना बंद कर दिया. उन में आए बदलाव को नोट कर के संगीता उन से नाराज रहने लगी थी.

संगीता की बड़ी बहन को भी अपने इकलौते भाई को नाराज करने में अपना हित नजर नहीं आया था. रवि की प्रमोशन हो जाने की खबर मिलते ही उस ने अपनी छोटी बहन को सलाह दी, ‘‘संगीता, तुझे रवि के साथ जा कर ही रहना पड़ेगा. भैया के साथ अपने संबंध इतने ज्यादा मत बिगाड़ कि उस के घर के दरवाजे तेरे लिए सदा के लिए बंद हो जाएं. जब तक रवि के पास जाने की सुविधा नहीं हो जाती, तू अपनी ससुराल में जा कर रह.’’ ‘‘तुम सब मेरा यों साथ छोड़ दोगे, ऐसी उम्मीद मुझे बिलकुल नहीं थी. तुम लोगों के बहकावे में आ कर ही मैं ने अपनी ससुराल वालों से संबंध बिगाड़े हैं, यह मत भूलो, दीदी,’’ संगीता के इस आरोप को सुन कर उस की बड़ी बहन इतनी नाराज हुई कि दोनों के बीच बोलचाल न के बराबर रह गई. रवि के लिए संगीता को मुंबई बुलाना संभव नहीं था. संगीता को बिन बुलाए ससुराल लौटने की शर्मिंदगी से हालात ने बचाया.

दरअसल, रवि को मुंबई गए करीब 2 महीने बीते थे जब एक शाम उस के सहयोगी मित्र अरुण ने संगीता को आ कर बताया, ‘‘आज हमारे बौस उमेश साहब के मुंह से बातोंबातों में एक काम की बात निकल गई, संगीता… रवि के दिल्ली लौटने की बात बन सकती है.’’

‘‘कैसे ’’ संगीता ने फौरन पूछा.

अनुंकपा के आधार पर उस की पोस्टिंग यहां हो सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं ’’ संगीता के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे.

‘‘मैं पूरी बात विस्तार से समझाता हूं. देखो, अगर रवि यह अर्जी दे कि दिल के रोगी पिता की देखभाल के लिए उस का उन के पास रहना जरूरी है तो उमेश साहब के अनुसार उस का तबादला दिल्ली किया जा सकता है.’’ ‘‘लेकिन रवि के बड़े भैयाभाभी भी तो मेरे सासससुर के पास रहते हैं. इस कारण क्या रवि की अर्जी नामंजूर नहीं हो जाएगी ’’

‘‘उन का तो अपना फ्लैट है न ’’

‘‘वह तो है.’’

‘‘अगर वे अपने फ्लैट में शिफ्ट हो जाएं तो रवि की अर्जी को नामंजूर करने का यह कारण समाप्त हो जाएगा.’’

‘‘यह बात तो ठीक है.’’

‘‘तब आप अपने जेठजेठानी को उन के फ्लैट में जाने को फटाफट राजी कर के उमेश साहब से मिलने आ जाओ,’’ ऐसी सलाह दे कर अरुण ने विदा ली. संगीता ने उसी वक्त रवि को फोन मिलाया.

‘‘तुम जा कर भैयाभाभी से मिलो, संगीता. मैं भी उन से फोन पर बात करूंगा,’’ रवि सारी बात सुन कर बहुत खुश हो उठा था. संगीता को झिझक तो बड़ी हुई पर अपने भावी फायदे की बात सोच कर वह अपनी ससुराल जाने को 15 मिनट में तैयार हो गई. रवि के बड़े भाई ने उस की सारी बात सुन कर गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘संगीता, इस से ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है कि रवि का तबादला दिल्ली में हो जाए पर मुझे अपने फ्लैट को किराए पर मजबूरन चढ़ाना पढ़ेगा. उस की मासिक किस्त मैं उसी किराए से भर पाऊंगा.’’ रवि और संगीता के बीच फोन पर 2 दिनों तक दसियों बार बातें हुईं और अंत में उन्हें बड़े भैया के फ्लैट की किस्त रवि की पगार से चुकाने का निर्णय मजबूरन लेना पड़ा.

सप्ताह भर के अंदर बड़े भैया का परिवार अपने फ्लैट में पहुंच गया और संगीता अपना सूटकेस ले कर ससुराल लौट आई. रवि ने कूरियर से अपनी अर्जी संगीता को भिजवा दी. उसे इस अर्जी को रवि के बौस उमेश साहब तक पहुंचाना था. संगीता ने फोन कर के उन से मिलने का समय मांगा तो उन्होंने उसे रविवार की सुबह अपने घर आने को कहा. ‘‘क्या मैं आप से औफिस में नहीं मिल सकती हूं, सर ’’ संगीता इन शब्दों को बड़ी कठिनाई से अपने मुख ने निकाल पाई.

‘‘मैं तुम्हें औफिस में ज्यादा वक्त नहीं दे पाऊंगा, संगीता. मैं घर पर सारे कागजात तसल्ली से चैक कर लूंगा. मैं नहीं चाहता हूं कि कहीं कोई कमी रह जाए. यह मेरी भी दिली इच्छा है कि रवि जैसा मेहनती और विश्वसनीय इनसान वापस मेरे विभाग में लौट आए. क्या तुम्हें मेरे घर आने पर कोई ऐतराज है ’’

‘‘न… नो, सर. मैं रविवार की सुबह आप के घर आ जाऊंगी,’’ कहते हुए संगीता का पूरा शरीर ठंडे पसीने से नहा गया था. उस के साथ उमेश साहब के घर चलने के लिए हर कोई तैयार था पर संगीता सारे कागज ले कर वहां अकेली पहुंची. उन के घर में कदम रखते हुए वह शर्म के मारे खुद को जमीन में गड़ता महसूस कर रही थी. उमेश साहब की पत्नी शिखा का सामना करने की कल्पना करते ही उस का शरीर कांप उठता था. रवि के मुंबई जाने से कुछ दिन पूर्व ही वह शिखा से पहली बार मिली थी. उस मुलाकात में जो घटा था, उसे याद करते ही उस का दिल किया कि वह उलटी भाग जाए. लेकिन अपना काम कराने के लिए उसे उमेश साहब के घर की दहलीज लांघनी ही पड़ी.

अचानक उस दिन का घटना चक्र उस की आंखों के सामने घूम गया. उस दिन रवि शिखा को एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने ले जा रहा था. रवि का बैंक उस स्कूल के पास ही था. उसे बैंक में कुछ पर्सनल काम कराने थे. जितनी देर में शिखा स्कूल में इंटरव्यू देगी, उतनी देर में वह बैंक के काम करा लेगा, ऐसा सोच कर रवि कुछ जरूरी कागज लेने शिखा के साथ अपने घर आया था. संगीता उस दिन अपनी मां से मिलने गई हुई थी. वह उस वक्त लौटी जब शिखा एक गिलास ठंडा पानी पी कर उन के घर से अकेली स्कूल जा रही थी. वह शिखा को पहचानती नहीं थी, क्योंकि उमेश साहब ने कुछ हफ्ते पहले ही अपना पदभार संभाला था.

‘‘कौन हो तुम  मेरे घर में किसलिए आना हुआ ’’ संगीता ने बड़े खराब ढंग से शिखा से पूछा था.

‘‘रवि और मेरे पति एक ही औफिस में काम करते हैं. मेरा नाम शिखा है,’’ संगीता के गलत व्यवहार को नजरअंदाज करते हुए शिखा मुसकरा उठी थी.

‘‘मेरे घर मेें तुम्हें मेरी गैरमौजूदगी में आने की कोई जरूरत नहीं है… अपने पति को धोखा देना है तो कोई और शिकार ढूंढ़ो…मेरे पति के साथ इश्क लड़ाने की कोशिश की तो मैं तुम्हारे घर आ कर तुम्हारी बेइज्जती करूंगी,’’ उसे यों अपमानित कर के संगीता अपने घर में घुस गई थी. तब उसे रोज लगता था कि रवि उस के साथ उस के गलत व्यवहार को ले कर जरूर झगड़ा करेगा पर शिखा ने रवि को उस दिन की घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं था. अब रवि की दिल्ली में बदली कराने के लिए उसे शिखा के पति की सहायता चाहिए थी. अपने गलत व्यवहार को याद कर के संगीता शिखा के सामने पड़ने से बचना चाहती थी पर ऐसा हो नहीं सका.

उन के ड्राइंगरूम में कदम रखते ही संगीता का सामना शिखा से हो गया.

‘‘मैं अकारण अपने घर आए मेहमान का अपमान नहीं करती हूं. तुम बैठो, वे नहा रहे हैं,’’ उसे यह जानकारी दे कर शिखा घर के भीतर चल दी.

‘‘प्लीज, आप 1 मिनट मेरी बात सुन लीजिए,’’ संगीता ने उसे अंदर जाने से रोका.

‘‘कहो,’’ अपने होंठों पर मुसकान सजा कर शिखा उस की तरफ देखने लगी.

‘‘मैं…मैं उस दिन के अपने खराब व्यवहार के लिए क्षमा मांगती हूं,’’ संगीता को अपना गला सूखता लगा.

‘‘क्षमा तो मैं तुम्हें कर दूंगी पर पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो…यह ठीक है कि तुम मुझे नहीं जानती थीं पर अपने पति को तुम ने चरित्रहीन क्यों माना ’’ शिखा ने चुभते स्वर में पूछा.

‘‘उस दिन मुझ से बड़ी भूल हुई…वे चरित्रहीन नहीं हैं,’’ संगीता ने दबे स्वर में जवाब दिया.

‘‘मेरी पूछताछ का भी यही नतीजा निकला था. फिर तुम ने हम दोनों पर शक क्यों किया था ’’

‘‘उन दिनों मैं काफी परेशान चल रही थी…मुझे माफ कर…’’

‘‘सौरी, संगीता. तुम माफी के लायक नहीं हो. तुम्हारी उस दिन की बदतमीजी की चर्चा मैं ने आज तक किसी से नहीं की है पर अब मैं सारी बात अपने पति को जरूर बताऊंगी.’’

‘‘प्लीज, आप उन से कुछ न कहें.’’

‘‘मेरी नजरों में तुम कैसी भी सहायता पाने की पात्रता नहीं रखती हो. मुझे कई लोगों ने बताया है कि तुम्हारे खराब व्यवहार से रवि और तुम्हारे ससुराल वाले बहुत परेशान हैं. अपने किए का फल सब को भोगना ही पड़ता है, सो तुम भी भोगो. शिखा को फिर से घर के भीतरी भाग की तरफ जाने को तैयार देख संगीता ने उस के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘‘मैं आप से वादा करती हूं कि मैं अपने व्यवहार को पूरी तरह बदल दूंगी…अपनी मां और बहन का कोई भी हस्तक्षेप अब मुझे अपनी विवाहित जिंदगी में स्वीकार नहीं होगा…मेंरे अकेलेपन और उदासी ने मुझे अपनी भूल का एहसास बड़ी गहराई से करा दिया है.’’

‘‘तब रवि जरूर वापस आएगा… हंसीखुशी से रहने की नई शुरुआत के लिए तुम्हें मेरी शुभकामनाएं संगीता…आज से तुम मुझे अपनी बड़ी बहन मानोगी तो मुझे बड़ी खुशी होगी.’’

‘‘थैंक यू, दीदी,’’ भावविभोर हो इस बार संगीता उन के गले लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उमेश साहब के प्रयास से 4 दिन बाद रवि के दिल्ली तबादला होने के आदेश निकल गए. इस खबर को सुन कर संगीता अपनी सास के गले  लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उसी दिन शाम को रवि के बड़े भैया उमेश साहब का धन्यवाद प्रकट करने उन के घर काजू की बर्फी के डिब्बे के साथ पहुंचे.

‘‘अब तो सब ठीक हो गया न राजेश ’’

‘‘सब बढि़या हो गया, सर. कुछ दिनों में रवि बड़ी पोस्ट पर यहीं आ जाएगा. संगीता का व्यवहार अब सब के साथ अच्छा है. अपनी मां और बहन के साथ उस की फोन पर न के बराबर बातें होती हैं. बस, एक बात जरा ठीक नहीं है, सर.’’

‘‘कौन सी, राजेश ’’

‘‘सर, संयुक्त परिवार में मैं और मेरा परिवार बहुत खुश थे. अपने फ्लैट में हमें बड़ा अकेलापन सा महसूस होता है,’’ राजेश का स्वर उदास हो गया.

‘‘अपने छोटे भाई के वैवाहिक जीवन को खुशियों से भरने के लिए यह कीमत तुम खुशीखुशी चुका दो, राजेश. अपने फ्लैट की किस्त के नाम पर तुम रवि से हर महीने क्व10 हजार लेने कभी बंद मत करना. यह अतिरिक्त खर्चा ही संगीता के दिमाग में किराए के मकान में जाने का कीड़ा पैदा नहीं होने देगा.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. वैसे रवि से रुपए ले कर मैं नियमित रूप से बैंक में जमा कराऊंगा. भविष्य में इस मकान को तोड़ कर नए सिरे से बढि़या और ज्यादा बड़ा दोमंजिला मकान बनाने में यह पैसा काम आएगा. तब मैं अपना फ्लैट बेच दूंगा और हम दोनों भाई फिर से साथ रहने लगेंगे,’’ राजेश भावुक हो उठा. ‘‘पिछले दिनों रवि को मुंबई भेजने और तुम्हारे फ्लैट की किस्त उस से लेने की हम दोनों के बीच जो खिचड़ी पकी है, उस की भनक किसी को कभी नहीं लगनी चाहिए,’’ उमेश साहब ने उसे मुसकराते हुए आगाह किया. ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा, सर. आप मेरी तरफ से शिखा मैडम को भी धन्यवाद देना. उन्होंने रवि के विवाहित जीवन में सुधार लाने का बीड़ा न उठाया होता तो हमारा संयुक्त परिवार बिखर जाता.’’

‘‘अंत भला तो सब भला,’’ उमेश साहब की इस बात ने राजेश के चेहरे को फूल सा खिला दिया था.

जाट आरक्षण की आग

जाटों का हरियाणा में आरक्षण के लिए संघर्ष कुछ ज्यादा ही उग्र और हिंसक हो गया. जाट आमतौर पर एक संपन्न जाति माने जाते रहे हैं और पुलिस व सुरक्षा क्षेत्रों में नौकरियों पर भी बने हुए हैं. उन को भूमि सुधारों के कारण दिल्ली, हरियाणा व उत्तर प्रदेश में खूब पैसा मिला है और राजनीति में उन का दबदबा रहा है. अचानक उन का पटेलों और कापुओं की तरह ऊंचे स्थान से उतर कर आरक्षण की मांग करना कुछ आश्चर्य की बात लग रही है.

गुजरात के हार्दिक पटेल को झूठे मामले में फंसा कर पटेल विद्रोह को फिलहाल दबा दिया गया है, पर दिल्ली के चारों ओर फैले जाटों के साथ यह संभव नहीं है, क्योंकि मूलत: जाट युवा लड़नेमरने से डरने वाले नहीं हैं. जाटों, पटेलों, कापुओं, गुर्जरों आदि के ये विद्रोह असल में समाजवादी पार्टियों के ढीलेपन के बाद तेज हुए हैं. पहले इन सब जातियों ने सोचा था कि समाजवाद के नारे के कारण वे ब्राह्मणबनियों के समकक्ष पहुंच जाएंगे और समाज में उन के पास पैसे के अलावा प्रतिष्ठा भी होगी, पर जैसेजैसे कमंडल की राजनीति फलीफूली ही नहीं, उस का व्यापारों, नौकरियों, शिक्षा संस्थाओं पर असर भी दिखने लगा, इन असवर्ण जातियों में छटपटाहट शुरू हो गई.

पौराणिक युग से ले कर प्राचीन काल, मध्य काल और आधुनिक काल तक इन्हें इस्तेमाल भर किया जाता रहा है. फौज और पुलिस में मरने वाले इन जातियों के लोग होते, खेतों पर ये काम करते, कारखानों में मजदूरी ये करते, ड्राइवरी का काम ये करते, पर जब सत्ता या पैसे की बात आती, तो इन्हें ठेंगा दिखा दिया जाता.

पिछड़े वर्ग के आयोगों ने आमतौर पर जाटों वगैरह को संपन्न जाति माना, पर शिक्षा में पिछड़े होने के कारण और सदियों से ग्रामीण वातावरण में रहने के कारण जाट, गुर्जर, पटेल आदि ब्राह्मणों और बनियों का सरकारी परीक्षाओं में मुकाबला नहीं कर पाते. पिछड़ी जातियों ने अपने पैसे के बल पर राजनीति में जगह बना ली, छोटे व्यापारों पर कब्जा कर लिया, दलितों और अतिपिछड़ों को दबा डाला, पर फिर भी हीनता की भावना उग्र होती गई.

अब जो विद्रोह हो रहा है, वह ऊंची सवर्ण जातियों के मध्य व उच्च वर्ग की एक बार फिर बढ़ती पहचान और दबदबे के कारण है. आज असली ताकत या तो अरबपतियों के हाथों में है या बहुत ही सक्षम योग्य प्रशासकों के हाथों में है और दोनों ही ज्यादातर सवर्ण हैं. आरक्षण पाने वाले तो यहां पहुंचने लगे हैं, पर उन से बेहतर सामाजिक स्थिति वाले और गिनती में प्रभावशाली, एक बार दिल्ली के आसपास राज किए जाटोंगुर्जरों को अधर में लटकना पड़ रहा है. आज उन का विद्रोह इस छटपटाहट का नतीजा है. 

यह मामला तो ठंडा हो जाएगा, पर चिनगारियां सुलगती रहेंगी. आरक्षण इस समस्या का हल नहीं है, सिर्फ बैंड एड है.

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