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सुनील शर्मा ने फिर गढ़ा नया इतिहास

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अभिनेता सुनील शर्मा हमेशा कुछ नया रिकार्ड बनाते रहे हैं. हिंदी भाषी सीरियलों, राजस्थानी व हिंदी के अलावा दक्षिण की हर भाषा की फिल्मों में अभिनय कर चुके सुनील शर्मा के नाम के साथ कई रिकार्ड जुड़ चुके है. सुनील शर्मा दक्षिण भारत के उन चंद दिग्गज कलाकारों में से हैं, जिन्होने 2007 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘बुद्धा’’ में शीर्ष भूमिका निभाकर एक नया रिकार्ड बनाया था. अप्रवासी भारतीय फिल्मकार के राजशेखर ने हिंदी, अंग्रेजी और तेलगू में अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्म ‘‘बुद्धा’’ का निर्माण किया था. इस फिल्म को ग्यारह विदेषी भाषाओं में डब किया गया था और इसका विश्व प्रीमियर 14 दिसंबर 2007 को अमरीका में हुआ था.

दक्षिण चर्चित फिल्मकारों बापू व रामोजी राव के साथ कई फिल्मों व धारावाहिकों में मुख्य भूमिका निभा चुके सुनील शर्मा अब पहली बार भोजपुरी भाषा की राजाराम कनौजिया की फिल्म ‘‘रानी हम हो गइली तोहार’’ में मुख्य विलेन बनकर आ रहे हैं. लेखक व निर्देशक प्रकाश आंनद की इस फिल्म में राजस्थानी फिल्मों की चर्चित अदाकारा नेहा श्री हीरोईन और गौरव झा हीरो हैं.

मजेदार बात यह है कि हर कलाकार किसी न किसी ईमेज में कैद हो जाता है. लेकिन भगवान शंकर, राम, कृष्ण जैसे धार्मिक किरदार निभाने के अलावा वह कई फिल्मों में खलनायक व नायक के किरदार निभा चुके हैं. सुनील शर्मा पहले भारतीय अभिनेता हैं, जिन्हे अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘मिशीमी’ के मुख्य पृष्ठ पर जगह मिली.

राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह

भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रवाद का नारा-धर्म खतरे में है, प्रलय निकट है, पाप का घड़ा भरने लगा है, इंद्र नाराज हैं, जैसा है. जैसे राम के युग में ब्राह्मणों ने राम के दरबार में दुहाई लगाई थी कि एक शूद्र के पढ़ने के कारण विनाशकाल आ रहा है, वैसा ही कुछ भारतीय जनता पार्टी आज कर रही है.

जहां तक देश की एकता, अखंडता, आंतरिक व्यवस्था का मामला है, देश में हर जगह शांति ही है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के गंगा ढाबा को छोड़ दें. हरियाणा में जाटों द्वारा उत्पात मचाया गया लेकिन उन के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का कोई मामला नहीं दर्ज हुआ, हैदराबाद में कापुओं ने तोड़फोड़ की लेकिन उन के खिलाफ भी राष्ट्रद्रोह का मामला नहीं बनाया गया. महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी शिवसेना गैरमराठियों के खिलाफ हल्ला मचा रही है जिसे भारत की एकता के खिलाफ कहा जा सकता है पर चूंकि शिवसेना वाले ‘भारत माता की जय’ का नारा लगा देते हैं इसलिए उन का जुर्म भी माफ हो जाता है.

देश के कई हिस्सों में पशुओं का शिकार करने वालों पर आक्रमण हो रहे हैं और आक्रमण करने वाले चूंकि भगवाधारी होते हैं इसलिए वे भी राष्ट्रवादी ही हैं, वे भी अखंडता के लिए खतरा नहीं हैं. जम्मूकश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पार्टी के साथ साझा सरकार है, इसलिए भारतीय जनता पार्टी को वहां भी राष्ट्र की अखंडता को कोई खतरा नजर नहीं आ रहा चाहे महबूबा ‘भारत माता की जय’ न कहें.

सरकारी नियमों और सरकारी निकम्मेशाही के कारण देश की अस्मिता, विकास पर हर रोज प्रहार होता है और जिस के चलते अरुण जेटली के भ्रम पैदा करने वाले आंकड़े सामने आते हैं. नतीजतन भारत दुनिया में धीरेधीरे नीचे खिसक रहा है, यह भी राष्ट्रविरोध के दायरे में नहीं आता.

धार्मिक रीतियों, साधुसंतों के कार्यक्रमों के चलते यमुना नदी का तट बरबाद हो जाए, फिर भी वह राष्ट्रविरोधी नहीं है चूंकि वह पुण्य का काम है. देशभर के सर्राफा व्यापारी कैसे हड़ताल पर हैं, यह राष्ट्रविरोधी फैसला है या नहीं, यह सवाल पूछा ही नहीं जा सकता.

तो फिर कौन से परमाणु बादल छाए हैं कि भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवाद को बचाने के लिए छाता ले कर खड़ी हो गई है? यह क्या नाटकबाजी है कि जिसे देखो उस का राष्ट्रप्रेम अचानक उबाल मारने लगा. विजय माल्या या ललित मोदी का भाग जाना देशविरोधी नहीं है, जिस के खिलाफ अमित शाह, शिवाजी वाला बख्तर पहन कर खड़े होने लगे हैं.

यह देशप्रेम असल में धर्मादेशप्रेम है. धर्म की तूती बोलती रहे और उस धर्म, जिसे पुराणों ने दिया, जिस में भेदभाव, पापपुण्य, पूजापाठ, हवन, व्रत, मंदिर निर्माण, नीचों व औरतों को स्थान पर रखना हो आदि, को हर व्यक्ति सिर पर रखे, उसे माने, यही भाजपा की इच्छा है.

भाजपा को स्वतंत्रता है कि वह इस तरह का नारा लगाए. उसे यह संवैधानिक स्वतंत्रता है कि वह हर व्यक्ति को राष्ट्रद्रोही कहे जो जय श्रीराम, जय राधेराधे, जय हरहर गंगे, भारत माता की जय न कहे. पर वह किसी को मजबूर नहीं कर सकती. दूसरा व्यक्ति इस का प्रतिवाद करने का हक रखता है. भारत को मां माना जाए या सिर्फ देश, यह हर व्यक्ति का राय रखने का अपना संवैधानिक अधिकार है.

हमारा राष्ट्रगान ‘जय हे, जय हे’ कहता है, भारत माता की जय नहीं. और जो नहीं कहा गया उसे आजादी के 69 साल बाद थोपा नहीं जा सकता. भाजपा इस मामले पर पुलिस या भीड़ के जरिए किसी तरह की जबरदस्ती कराने का अधिकार नहीं रखती.

फिल्म इंडस्ट्री को समझने में वक्त लगता है: पंकज त्रिपाठी

बौलीवुड में पिछले दो तीन वर्षों से सिनेमा में बदलाव की लंबी चौड़ी बातें की जा रही हैं. पर जमीनी हकीकत यह है कि बौलीवुड की कार्यशैली में अभी भी कोई खास बदलाव नहीं आया है. आज भी फिल्मकार लकीर के फकीर बने हुए हैं. आज भी हर फिल्मकार प्रपोजल बनाने में लगा हुआ है. जिसके चलते आज भी गैर फिल्मी परिवारों और छोटे शहरों से आने वाले प्रतिभाशाली कलाकारों को फिल्मों में काम मिलना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. यही वजह है कि ‘‘गैंग आफ वासेपुर’’ के दोनों भागों में सुल्तान का किरदार निभाकर चर्चा में आए अभिनेता पंकज त्रिपाठी का पूरे 12 साल बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ है. जबकि वह अब तक ‘‘फुकरे’, ‘सिंघम रिटर्न’, ‘दिलवाले’, ‘मसान’ सहित कई सफलतम व बड़े बजट की फिल्मों का हिस्सा रहे हैं. इन दिनों वह अश्विनी अय्यर तिवारी निर्देशित फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ में सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल व गणित के शिक्षक की भूमिका को लेकर चर्चा में हैं. पंकज त्रिपाठी का मानना है कि उन्हें फिल्म इंडस्ट्री की अतरंगी चाल समझने में 12 साल लग गए.

आखिर छोटे शहरों से आने वाले प्रतिभाशाली कलाकारों को उनकी प्रतिभा दिखाने का सही अवसर क्यों नहीं मिल पाता? इस पर अपने निजी अनुभवों व समझ के आधार पर अभिनेता पंकज त्रिपाठी कहते हैं- ‘‘संघर्ष करना पड़ा. इसकी मूल वजह यह है कि हम गैर फिल्मी परिवार से आए हैं. फिल्म इंडस्ट्री का हम हिस्सा नहीं थे, तो फिल्म इंडस्ट्री की कार्यशैली वगैरह को समझने में थोड़ा समय लगा. संघर्ष की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारे यहां सिनेमा में प्रोजेक्ट बनते हैं. मैं एक अच्छा अभिनेता हूं, यह बात निर्देशक जानता है. पर वह यह भी जानता है कि यदि वह मुझे लेकर चार करोड़ की फिल्म बनाएगा, तो उसे कोई निर्माता नहीं मिलेगा. तो यहां निर्माता और निर्देशक सभी फिल्म का निर्माण शुरू करने से पहले कागज पर ही लागत वसूल कैसे होगी? इसका गुणा भाग करते हैं.

हमें यह याद रखना चाहिए कि सिनेमा सिर्फ कला नहीं व्यवसाय भी है. इसलिए स्वाभाविक है कि निर्माता यानी जो पैसा लगाएगा, उसे वसूल करने के बारे में सोचेगा. वह दिमागी तौर पर खुद को सुरक्षित महसूस करता ही है. निर्माता सोचता है कि सलमान खान या फलां खान ने मेरी फिल्म करने के लिए हामी भर दी है. तो मैं सुरक्षित हो गया हूं. अब बाक्स आफिस पर क्या होता है? वह अलग मुद्दा है. क्योंकि बाक्स आफिस पर सफलता की गारंटी कोई दे ही नहीं सकता. सभी मान रहे है कि शाहरुख खान की बड़े बजट की फिल्म ‘दिलवाले’ फ्लाप हो गयी. पर उसे नुकसान नहीं हुआ. ‘दिलवाले’ ने विदेशों में बहुत कमायी की.’’

क्या स्टार संस या स्टार डाटर की वजह से गैर फिल्मी परिवार से आने वालों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है? इस पर पंकज त्रिपाठी कहते हैं-‘‘मैंने पहले ही कहा कि यहां प्रोजेक्ट बनते हैं. लोग सोचते हैं कि यदि उन्होने जैकी श्राफ के बेटे टाइगर श्राफ को लेकर फिल्म बनायी, तो उन्हें अपने आप थोड़ा प्रचार मिल जाएगा. मीडिया में चर्चा मिल जाएगी कि स्टार का बेटा आ रहा है. निर्माता सोचता है कि एक स्टार के बेटे का आकर्षण दर्शकों को उनकी फिल्म तक खींच लाएगा.’’

पंकज त्रिपाठी आगे कहते हैं- ‘‘दूसरी बात बालीवुड हो या पत्रकारिता हो या कोई अन्य क्षेत्र, कहीं भी कोई अपनी सही भूमिका नहीं निभा रहा है. मैं किसी को भी सही या गलत नहीं ठहरा रहा हूं. पत्रकारिता में भी एक उम्दा जगह बनाने में एक अच्छे पत्रकार को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उसी तरह फिल्म उद्योग में भी अपनी प्रतिभा को साबित करने के साथ साथ यहां टिकने की कला भी सीखनी पड़ती है. अपनी मार्केटिंग करने की भी कला आनी चाहिए. छोटे शहरों से आने वाले हम जैसे कलाकारों के पास अपनी प्रतिभा के अलावा कुछ नहीं होता है. 12 साल बाद मुझे मार्केटिंग की कला समझ में आयी है. हम 16 आने काम करने के बावजूद चार आने बात करते हैं. कुछ कलाकार ऐसे हैं, जो चार आने काम करते हैं और 16 आने बात करते हैं. एक शब्द में यदि मैं कहूं तो हर इंसान या हर कलाकार शोबाजी नहीं कर पाता. हम छोटे शहर वालों  को फिल्म इंडस्ट्री की आंतरिक कलाबाजीयां पता नहीं है. हमें यह समझने में 12 साल लगे कि फिल्मी पार्टी वगैरह में क्यों जाना चाहिए? सीखने समझने में वक्त लगता है. कई बार सीखने समझने के बाद भी कुछ लोगों को लगता है कि वह महज चर्चा में आने के लिए इतना नीचे नहीं गिर सकता. हर इंसान का अपना व्यक्तित्व होता है. मेरे अभिनय मे कुछ अलग बता नजर आती है, तो स्वाभाविक तौर पर मेरा व्यक्तित्व अलग है.’’

अद्भुत है हुबली की उन्कल झील

कर्नाटक राज्य का प्रमुख शहर हुबली. इसे धारवाड़ के जुड़वां शहर के नाम से भी जाना जाता है. यह कर्नाटक के धारवाड़ जिले का प्रशासनिक मुख्यालय, उत्तरी कर्नाटक का वाणिज्यिक केंद्र भी है. राज्य की राजधानी बेंगलुरु के बाद यह राज्य का विकासशील औद्योगिक, आटोमोबाइल और शैक्षणिक केंद्र है.

ऐतिहासिक शहर हुबली की उत्पत्ति चालुक्यों के समय की है. यह पूर्व में रायरा हुबली या इलेया पुरावदा हल्ली और पुरबल्ली के नामों से जाना जाता रहा है. यह साउथ वैस्टर्न रेलवे का डिवीजन भी है. इसलिए इस नगर का महत्त्व कुछ ज्यादा ही है. हुबली कमर्शियल सिटी है, इसलिए इस शहर को छोटा मुंबई भी कहा जाता है.

यहां की 110 साल पुरानी उन्कल झील का आनंद लेने के लिए पर्यटकों को जरूर जाना चाहिए. यह अपने शांत और सुरम्य वातावरण के लिए लोकप्रिय है. 200 एकड़ के क्षेत्र में फैली यह झील पर्यटकों द्वारा हुबली का सब से ज्यादा घूमा जाने वाला आकर्षण है. मनोरंजक गतिविधियों के अलावा पर्यटक यहां पर शाम को सूर्यास्त का सुंदर दृश्य भी देख सकते हैं. इस स्थान का प्रमुख आकर्षण झील के बीच में स्थित स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा है. झील के आसपास हराभरा बगीचा देख कर पर्यटकों का मन प्रफुल्लित हो उठता है.

नौकायान के शौकीन लोगों को बोट में घूमने का मौका दिया जाता है. छोटी बोट में 4-5 लोग बैठ कर पैडल मारते हुए खुशी से आगे बढ़ते हैं. बड़ी बोट में बहुत सारे लोग एकसाथ बैठ कर खुशी से झूम उठते हैं. झील के किनारे पैदल जाना मन को खुशी से भर देता है. वहां बैठ कर झील के विहंगम दृश्य का नजारा ले सकते हैं. झील के चारों ओर आकर्षक रोशनी की व्यवस्था की गई है.

इंदिरा गांधी ग्लास हाउस: अगर आप हुबली जाएं तो इंदिरा गांधी ग्लास हाउस की प्रसिद्ध पुष्प प्रदर्शनी अवश्य देखने जाएं. यह ग्लास हाउस बेंगलुरु के लाल बाग गार्डन की तरह है. यहां स्केटिंग ग्राउंड के अलावा घास के हरेभरे मैदान हैं.

मारुति वाटर पार्क और वर्ल्ड पार्क : हुबली शहर में स्थित मारुति वाटर पार्क और वर्ल्ड पार्क पर्यटकों को आराम व मनोरंजन का बेहतर औप्शन देते हैं. ये पार्क करवार रोड पर ईएसआई अस्पताल के नजदीक हैं. यहां के वाटर गेम्स व राइड्स को बच्चे खासा पसंद करते हैं.

बूंद गार्डन

उन्कल झील को देखने आए पर्यटकों को जानेमाने बूंद गार्डन को देखने की सलाह दी जाती है. हुबली से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह बगीचा उन्कल झील का ही भाग है, जहां के शांत वातावरण में पर्यटक आनंदित हो सकते हैं.

कुल मिलाकर हुबली की उन्कल झील ही सैलानी का पसंदीदा ठौर इसलिए भी है क्योंकि वहां आ कर न सिर्फ शहरों की भागदौड़ भरी नीरस जिंदगी से ताजगी भरा बे्रक मिलता बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य के अद्भुत खजाने से रूबरू होने का मौका मिलता है. अगर अब तक आप ने पर्यटन का आगामी प्रोग्राम नहीं बनाया है तो निश्चित तौर पर उन्कल झील का प्लान बना लीजिए.  

कैसे जाएं

वायुमार्ग : प्रमुख भारतीय शहरों से जोड़ने वाला हुबली हवाई अड्डा यहां का सब से नजदीकी हवाई अड्डा है. यह शहर के केंद्र से लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर है. 186 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोआ का डबोलिक हवाई अड्डा सब से नजदीकी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है. यह हवाई अड्डा प्रमुख भारतीय शहरों के साथसाथ अंतर्राष्ट्रीय स्थानों से भी भलीभांति जुड़ा है. डबोलिक हवाई अड्डे से यहां पहुंचने के लिए कई मौसमी चार्टर्ड उड़ानें भी उपलब्ध रहती हैं.

रेलमार्ग : हुबली रेलवे स्टेशन यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन है. यह मुख्य शहर से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर है. बेंगलुरु और मैंग्लौर जैसे भारत के प्रमुख शहरों से हुबली भलीभांति जुड़ा है. यहां पहुंच कर यात्री टैक्सी ले कर मुख्य शहर तक पहुंच सकते हैं.

सड़कमार्ग : हुबली बस सेवाओं द्वारा मैंग्लौर, पुणे, मैसूर, बेंगलुरु, गोआ और मुंबई से भलीभांति जुड़ा है. प्राइवेट निजी बसों, वोल्वो बसों और एन डब्लू के आरटीसी (नौर्थवेस्ट कर्नाटक सड़क परिवहन निगम) की बसें इन स्थानों से हुबली के लिए नियमित रूप से चलती हैं.

पर्यटकों को रिझाता भूटान

हरियाली चादर ओढ़े पर्वतमालाएं, गहरी घाटियां, कलकल करती नदियां, पगपग पर गिरते पहाड़ी झरने, पहाड़ों से अठखेलियां करते रूई के फाहे जैसे बादल, सर्पाकार टेढ़ेमेढ़े पहाड़ी रास्ते, चावल के हरेभरे खेत, फलों से लदे सेब के बगीचे, भव्य, सुंदर चित्रकारी से सजे बौद्ध मंदिर, मठ, स्तूप, पारंपरिक स्थापत्य शैली में बनी इमारतें, भव्य प्रवेशद्वार, शानदार पुल और बहुत कुछ. ये सब नजारे भूटान की खासीयतें हैं. यहां के लोग अपनी विरासत, संस्कृति, परंपराओं और रीतिरिवाजों पर न केवल गर्व करते हैं बल्कि उन का दिल से सम्मान भी करते हैं.

हिमालय के पहाड़ों में बसे भूटान का कुल क्षेत्रफल 38,390 वर्ग किलोमीटर और आबादी 7,53,900 है. भूटान की मुद्रा नगूलट्रम है जिस की विनिमय दर एक भारतीय रुपए के बराबर है. वहां की राष्ट्रभाषा जोंगखा है. वहां की राष्ट्रीय पोशाक पुरुषों के लिए घो और महिलाओं के लिए कीरा है. भूटान बज्रयानी बौद्ध धर्म वाला देश है. ज्यादातर लोग भूटानी पोशाक पहनना ही पसंद करते हैं. तीरंदाजी के साथ फुटबौल का खेल भी भूटान में काफी लोकप्रिय है. भूटान का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पारो में है. आमतौर पर पर्यटक थिंपू, पुनाखा एवं पारो तक ही अपना भ्रमण सीमित रखते हैं. इन तीनों जगहों को अच्छी तरह से घूमने के लिए 7 दिन का समय काफी है. 2 दिन थिंपू, 1 दिन पुनाखा और 3 दिन पारो में रुक कर पर्यटक इन जगहों के दर्शनीय स्थलों को आसानी से देख सकते हैं.

थिंपू के ठाट

भूटान की राजधानी थिंपू है. यह शहर वांगछू नदी के किनारे समुद्रतल से 2,400 मीटर की ऊंचाई पर बसा है. शहर के केंद्र में 4 समानांतर सड़कें हैं. इन्हीं सड़कों पर मुख्य बाजार, होटल, रेस्तरां, शासकीय कार्यालय, स्टेडियम, बगीचे आदि हैं. रिहायशी इलाका घाटी में काफी दूर तक फैला है. आधुनिकता की दौड़ में शामिल इस शहर में बहुमंजिली इमारतें एवं अपार्टमैंट्स काफी तादाद में बन रहे हैं पर इन का निर्माण भूटान की पारंपरिक स्थापत्य शैली में हो रहा है जिस से शहर का पारंपरिक सांस्कृतिक परिवेश सुरक्षित एवं संरक्षित है. थिंपू में कई दर्शनीय स्थल हैं.

मैमोरियल चोरटन : इस स्तूप का निर्माण भूटान के तीसरे राजा जिगमे दोरजी वांगचुक की स्मृति में 1974 में कराया गया. राजा जिगमे दोरजी वांगचुक को आधुनिक भूटान का जनक माना जाता है. इस स्मारक की मूर्तियां एवं चित्र दर्शनीय हैं.

सिमटोका जोंग : इस बौद्ध मंदिर का निर्माण 1627 में शबदरूंग नगवांग नामग्याल द्वारा कराया गया. मंदिर के बाहरी कौरिडोर में प्रार्थनाचक्रों के पीछे लगे 300 से ज्यादा बौद्ध धर्म के कलात्मक चित्र इस मंदिर की खासीयतें हैं.

ताशीछोए जोंग : 1641 में बनी इस इमारत का पुनर्निर्माण राजा जिगमे दोरजी वांगचुक द्वारा 1965 में कराया गया. वर्तमान में इस इमारत में दरबार हौल एवं सचिवालय हैं. शनिवार एवं रविवार को पर्यटकों के लिए यह पूरे दिन खुला रहता है. बाकी दिनों में शाम 5 बजे के बाद ही पर्यटक इस में प्रवेश कर सकते हैं.

चांग का लहखांग : इस बौद्ध मंदिर एवं मठ की स्थापना 12वीं शताब्दी में लामा फाजो रूजौम शिगपो द्वारा की गई. मंदिर परिसर से थिंपू शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.

बुद्धा पौइंट : थिंपू शहर के निकट एक ऊंची पहाड़ी पर बुद्ध की 51.5 मीटर की विशालकाय धातु प्रतिमा एक ऊंचे अधिष्ठान पर स्थापित है. इसे बुद्धा पौइंट कहते हैं. यहां से थिंपू शहर काफी सुंदर दिखाई देता है.

नेचर पार्क : बुद्धा पौइंट के पास ही नेचर पार्क है. यह पार्क भूटान के हालिया राजा के शाही विवाह को समर्पित है. पर्यटक इस उद्यान के प्राकृतिक परिवेश में कुछ समय गुजार सकते हैं.

द फौक हेरीटेज म्यूजियम : इस संग्रहालय में भूटान की ग्रामीण संस्कृति की झलक देखने को मिलती है. संग्रहालय में 19वीं सदी के एक तीनमंजिला घर को उस के मूल स्वरूप में ही संरक्षित किया गया है. यह घर मिट्टी एवं लकड़ी से बना है.संग्रहालय में एक म्यूजियम एवं कैंटीन भी है.

नैशनल टैक्सटाइल म्यूजियम : इस संग्रहालय में भूटान की पारंपरिक वस्त्र निर्माण कला के इतिहास, कपड़ों की बुनाई की तकनीक तथा वस्त्रों पर की गई कलात्मक चित्रकारी की जानकारी मिलती है. संग्रहालय की संरक्षिका भूटान की रानी हैं.

क्राफ्ट बाजार : इस बाजार में 100 से ज्यादा दुकानें हैं जहां पर्यटक भूटानी हैंडीक्राफ्ट की कलात्मक कलाकृतियां, भूटानी परिधान, भूटानी संस्कृति से संबंधित सामग्री, सजावटी सामान खरीद सकते हैं.

राष्ट्रीय ग्रंथालय : इस ग्रंथालय में भूटान के इतिहास, संस्कृति से संबंधित दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ, अभिलेख, आधुनिक ज्ञानविज्ञान के ग्रंथ बड़ी संख्या में संगृहीत हैं. इतिहास में रुचि रखने वालों एवं शोधकर्ताओं के लिए यह ग्रंथालय बहुत ही अहम है.

चिडि़याघर : यहां का चिडि़याघर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है. इस चिडि़याघर का खास आकर्षण टेकिन है जो भेड़ एवं याक का मिलाजुला रूप है.

पुनाखा

पुनाखा भूटान का एक प्रमुख शहर है जो समुद्रतल से 1,300 मीटर की ऊंचाई पर पोछू (पितृरूप) एवं मोछू (मातृरूप) नदियों के किनारे बसा है. पुनाखा भूटान की पहली राजधानी रही है. पुनाखा थिंपू से 77 किलोमीटर दूर है. पुनाखा के दर्शनीय स्थल हैं :

दोचूला पास : थिंपू से पुनाखा के रास्ते पर 25 किलोमीटर दूर दोचूला पास है. समुद्रतल से इस स्थान की ऊंचाई 3,020 मीटर है. यहां पहुंचते ही ठंडी हवा के झोंके पर्यटकों का स्वागत करते हैं. यहां पर बौद्ध मंदिर एवं 108 स्तूपों का समूह देखने लायक है. पर्यटक यहां से खुले मौसम में हिमालय की बर्फीली चोटियों का दिलकश नजारा देख सकते हैं.

चिमी लहखांग : थिंपू से पुनाखा आते समय पुनाखा से पहले, सड़क से लगभग 1 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर यह लहखांग बौद्ध मंदिर एवं मठ स्थित है. सड़क से यहां तक आने के लिए पर्यटकों को पगडंडीनुमा रास्ते से हो कर गुजरना पड़ता है जो धान के खेतों के बीच से हो कर जाता है, जिस का अपना अलग ही मजा है. यह बौद्ध मंदिर 15वीं सदी की बौद्ध भिक्षुणी लामा ड्रकपा कुअनले को समर्पित है.

पुनाखा जोंग : यह पुनाखा का ही नहीं बल्कि भूटान का सब से बड़ा और प्रमुख बौद्ध मंदिर है. भूटान की 2 प्रमुख नदियों (पोछू एवं मोछू) के संगम पर स्थित बौद्ध मंदिर एवं मठ का निर्माण 1637 में शबदरूंग नगवांग नामग्याल द्वारा प्रशासकीय कार्यों के संपादन के लिए कराया गया था. इस बौद्ध मंदिर एवं मठ तक पर्यटक नदी पर पारंपरिक शैली में बने बेहद खूबसूरत पुल से हो कर जाते हैं. यह पुल अपनेआप में दर्शनीय है.

लहखांग नन्नोरी : इस बौद्ध मंदिर में अवलोकितेश्वर की 14 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थापित है जो भूटान की बड़ी बौद्ध प्रतिमाओं में से एक है. इस के अलावा इस मंदिर में स्थापित गुरु पद्मसंभव, गौतम बुद्ध, शबदरूंग नगवांग नामग्याल एवं अन्य बौद्ध प्रतिमाएं भी दर्शनीय हैं. इस मंदिर परिसर में बौद्ध ननों को सिलाई, कढ़ाई, मूर्तिकला एवं थंका चित्रकला भी सिखाई जाती है. पुनाखा के आसपास टालो, रितशा गांव, खमसुम युली, नामग्याल चोरटन आदि भी दर्शनीय स्थल हैं.

नंबर वन पारो

पारो भूटान का तीसरा बड़ा शहर एवं पर्यटन के लिहाज से नंबर एक शहर है. पारो समुद्रतल से 2,200 मीटर की ऊंचाई पर पाछू (पारो) नदी के किनारे बसा है. भूटान का एकमात्र हवाई अड्डा पारो में ही है. यदि पर्यटक पारो के दर्शनीय स्थलों को अच्छी तरह एवं पूरा मजा लेते हुए देखना चाहते हैं तो पारो में कम से कम 3 दिन रुकना जरूरी है.

तकशांग लहखांग : टाइगर नैस्ट के नाम से मशहूर बौद्ध मठों का यह समूह पारो घाटी की सतह से लगभग 900 मीटर की ऊंचाई पर एक दुर्गम पहाड़ी के आखिरी सिरे पर बना है. यह भूटान का राष्ट्रीय स्मारक है. यहां तक पहुंचने के लिए पहाड़ी चढ़ाई वाला दुर्गम रास्ता है जो पर्यटकों को पैदल ही तय करना पड़ता है. पगडंडीनुमा कच्चे रास्ते से पहाड़ के ऊपर पहुंच कर सीढि़यों से काफी नीचे उतर कर फिर ऊपर चढ़ने के बाद इस स्मारक तक पहुंचते हैं. पर्यटक चाहें तो आधी चढ़ाई टट्टू द्वारा कर सकते हैं लेकिन बाकी रास्ता तो पैदल ही तय करना पड़ेगा. हालांकि इस स्थल का पहुंचमार्ग अत्यंत दुर्गम एवं कष्टप्रद है पर इसे देखे बिना पर्यटकों का भूटान भ्रमण अधूरा ही माना जाएगा.

रिनपंग जोंग : यह पारो का प्रमुख मठ है. इस का निर्माण 1646 में शबदरूंग नगवांग नामग्याल द्वारा कराया गया. मठ होने के साथसाथ इस में जिला प्रशासनिक प्रमुख का कार्यालय एवं जिला न्यायालय भी लगता है.

ता जोंग : इस इमारत का निर्माण 17वीं सदी में रिनपंग जोंग की सुरक्षा हेतु वाच टावर के रूप में किया गया. 1967 में इस में भूटान का राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किया गया.

दंगसे लहखांग : स्तूपनुमा इस बौद्ध मंदिर का निर्माण 1433 में लौहपुल निर्माता थंगटोंग गैलपो द्वारा कराया गया. इस मंदिर में बने चित्र भूटान की उत्कृष्ट चित्रकला के शानदार नमूने हैं.

राष्ट्रीय संग्रहालय : नए भवन में स्थानांतरित राष्ट्रीय संग्रहालय में 4 दीर्घाएं-मुखौटा दीर्घा, थंगका दीर्घा, हेरीटेज दीर्घा एवं नैचुरल हिस्ट्री दीर्घा हैं.

हा वैली : हा वैली पारो से 67 किलोमीटर दूर है. हा वैली कुदरत के दिलकश नजारों से भरपूर है.

चेलेला पास : पारो से हा जाते समय पारो से लगभग 45 किलोमीटर दूर चेलेला पास है. चेलेला पास की अधिकतम ऊंचाई समुद्रतल से 4,200 मीटर है. चेलेला पास से गुजरता सड़क मार्ग भूटान का सब से ज्यादा ऊंचाई वाला सड़क मार्ग है. यहां हा वैली एवं चारों ओर के विहंगम दृश्य बड़े ही मनमोहक हैं. यहां पहुंचते ही ठंडी हवा के झोंके न केवल पर्यटकों का स्वागत करते हैं बल्कि शरीर में ठिठुरन भी पैदा कर देते हैं. यहां की पहाडि़यों में रंगबिरंगी लहराती पताकाएं इस जगह की खूबसूरती में चारचांद लगाती हैं.

ध्यान देने योग्य बातें

भूटान में हिंदुस्तानी पर्यटकों को टूरिस्ट परमिट लेना जरूरी है. सड़क मार्ग से भूटान जाने वाले पर्यटकों को भारतभूटान सीमा पर स्थित भूटानी शहर फुनशोलिंग से टूरिस्ट परमिट लेना होगा. इस के लिए पर्यटकों के पास पासपोर्ट या मतदाता परिचयपत्र होना अनिवार्य है. साथ ही, पर्यटक के 2 पासपोर्ट साइज के फोटो होने अनिवार्य हैं. यहां से पर्यटकों का पारो एवं थिंपू के लिए 7 दिन की अवधि का टूरिस्ट परमिट जारी किया जाता है. यदि पर्यटक पारो एवं थिंपू के अलावा दूसरी जगह भी जाना चाहते हैं तो उन्हें उन जगहों पर जाने एवं पर्यटन अवधि बढ़ाने के लिए परमिट थिंपू कार्यालय से जारी किए जाते हैं. हवाई मार्ग से भूटान जाने वाले पर्यटकों को पारो हवाई अड्डे से टूरिस्ट परमिट जारी किए जाते हैं. टूरिस्ट परमिट निशुल्क जारी किए जाते हैं.

मेक इन इंडिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशों के दौरे जम कर कर रहे हैं. वे जहां भी जाते हैं वहां से करोड़ों अरबों का सामान खरीद कर लाते हैं. उन्होंने कहीं भारतीय व्यापारियों के लिए दरवाजे खोले, ऐसा नहीं लगता. नेपाल, जो भारत के व्यापारियों के लिए अच्छा बाजार था, मधेशी विवाद के कारण अब बंद हो गया है. यह जो सामान खरीदा जा रहा है, इस के लिए गरीब भारत को पैसा कहां से मिल रहा है? जब से भारत में नई सरकार बनी है, हमारा निर्यात कम होता जा रहा है. फिर भी अगर हमारे पास विदेशी मुद्रा का भंडार है तो हमारे मजदूरों के कारण, जो दुनियाभर में अपने परिवारों से दूर रह कर ठंडेगरम देशों में शरीर घिस रहे हैं और पैसा भेज रहे हैं. इस पैसे पर नरेंद्र मोदी हर जगह कुछ खरीद रहे हैं. देशी राजा भी, आजादी से पहले, जब भी विदेश जाते थे, भरभर कर सामान लाते थे जिस का भुगतान उन की गरीब जनता करती थी.

अभी रूस में मोदी ने हथियार खरीदे हैं और परमाणु संयंत्र भी. क्यों भई, अपने मेक इन इंडिया का क्या हुआ? उद्योगपति अनिल अंबानी और गौतम अदानी ऐसे दौरों पर बेचने नहीं, खरीदने जाते हैं. देश के मजदूरों से मिले पैसे का उपयोग देश की गरीबी को दूर करने के लिए किया जाना चाहिए पर ज्यादातर पैसा या तो हथियारों की खरीद में लग रहा है या विलासिता की चीजों पर. भारतीय मजदूर देश को हर साल 70 अरब रुपए देते हैं और बदले में उन्हें क्या मिलता है, यह किसी भी एअरपोर्ट पर उन के लौटने पर उन की तलाशी लेते हुए दिख जाएगा.

किन्नर की आशनाई में जान गंवाई

लखनऊ के पानदरीबा इलाके में होटल कृष्णा पैलेस की देखभाल करने वाले 23 साल के राहुल ओझा से मिलने हर तरह के लोग आते थे. इनमें से एक महक नाम का किन्नर भी था. महक का असल नाम जीशान था. वह मूल रूप से बाराबंकी जिले का रहने वाला था. कुछ समय से वह हुसैनगंज थानाक्षेत्रा के दादामियां कर मजार के पास रहने लगा था. जीशान बेरोजगार था. उसके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था. रोजगार की तलाश में लखनऊ में उसकी मुलाकात कुछ किन्नर साथियों से हुई. देखने सुनने में जीशान भी किसी लडकी की ही तरह सुदंर दिखता था. किन्नर साथियों की सलाह पर वह अपना पहनावा और बोलचाल में बदलाव करके किन्नर बन गया और अपना नाम महक रख लिया. अब वह किन्नर गैंग में शामिल होकर घरघर जाकर नेग की वूसली करने लगा. किन्नर बने जीशान ने जब अपना नाम महक रखा तो वह दुकानो और होटलों में भी वूसली के लिये जाने लगा. लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के आसपास यह लोग रात में आने वाले यात्रियों को लडकी होने का झांसा देकर अपने साथ देहसबंध बनाने के नाम फंसा कर पैसा वूसल करते थे.

जीशान बने महक की मुलाकात कृष्णा होटल के राहुल ओझा से हुई. महक के साथ उसकी दोस्ती बढने लगी. महक के लिये यह दोस्ती फायदेमंद थी. राहुल और महक के बीच दोस्ती नजदीकी रिश्तो में बदल गई. लंबे समय तक यह संबंध चलने लगे. महक को एक जगह बंधकर रहने की आदत नहीं थी. इस बीच महक की दोस्ती इमरान के साथ हो गई. बहराइच का रहने वाला इमरान लखनऊ में टैंपों चलाने का काम करता था. वह भी महक के साथ दादा मियां की मजार के पास रहने लगा. एक साथ रहने से इमरान महक के ज्यादा करीब हो गया. इस बात को लेकर राहुल महक से नाराज होता था. असल में इमरान के करीब आने के बाद महक अब राहुल से दूरी बनाने लगा था.

जब राहुल की टोकाटाकी ज्यादा बढ गई तो 11 अप्रैल सोमवार की रात महक और इमरान ने राहुल को सदर इलाके मे बुलाया. पहले उन लोगों ने शराब पी. इसके बाद आपसी बातचीत में झगडा शुरू हो गया. महक और इमरान ने राहुल को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया. राहुल का बांया पैर 3 जगह से टूट चुका था. चेहरा पहचान में न आये इसलिये उसको कुचल दिया था. राहुल की बांयीं आंख पफोड दी थी. सिर में लोहे का सरिया घुसा दिया गया था. इसके बाद राहुल को रेलवे लाइन के किनारे डाल दिया गया. राहगीरों की सूचना पर पुलिस ने उसे सिविल अस्पताल पहुंचाया. जहां डाक्टरों ने उसको मरा घोषित कर दिया. उधर राहुल के घर वालों ने उसे तलाश किया पर उसका कोई पता नहीं चला. मंगलवार को 11 बजे राहुल के दोस्त मिथुन के नम्बर पर रिजवान नाम के आदमी ने फोन करके सूचना दी कि राहुल की लाश दादामियां की मजार के पास रेलवे लाइन पर पडी  है.

घर वालों को वहां कोई लाश नहीं मिली पर यह जानकारी मिली की कल एक घायल आदमी को पुलिस ले गई है. राहुल के घर वाले गौतमपल्ली पुलिस स्टेशन गयेख, तो वहां राहुल की मौत का पता चला. पुलिस ने बताया कि राहुल का शव सिविल अस्पताल में रखा है. घर वालों ने उसको देखा और राहुल के पिता दूधनाथ ओझा ने किन्नर महक और दूसरे लोगों के खिलाफ मुकदमा लिखाया. पुलिस ने जब महक को पकडा तो उसने बताया कि राहुल उसके साथ अनैतिक संबंध बनाता था. जब इमरान से उसकी दोस्ती बढ गई तो राहुल झगडा करता था. इससे परेशान होकर इमरान के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी.

संत चला रहे हैं अरबों की दुकान: लालू

सच में बदल गए हैं लालू यादव! कभी बाबाओं, ज्योतिषियों, संतो और तांत्रिकों से घिरे रहने वाले लालू यादव को अब बाबाओं की असलियत समझ में आ गई हैं. चारा घोटाले में फंसने के बाद वह ‘सेटेलाइट बाबा’ के चक्कर में खूब फंसे थे. उस ठग बाबा ने लालू का आशीर्वाद पाकर अपना धंधा तो चमका लिया, पर उस बाबा का आशीर्वाद लालू के काम नहीं आया और उन्हें चारा घोटाला के मामले में जेल जाना ही पड़ा था. अब लालू में यह हिम्मत आ गई है कि धर्म की दुकान चलाने वाले ठग बाबाओं को खुले आम ठग कह सकें. बाबा रामदेव, रविशंकर और आसाराम जैसे बाबाओं पर उन्होंने जम कर तीर चलाया.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर की 125 जयंती के मौके पर राजद कार्यालय में आयोजित जलसे में लालू अपनी रौ में दिखे और कुछ बदले-बदले भी नजर आए. राजद सुप्रीमो लालू ने बाबा रामदेव, रविशंकर, आसाराम सहित तथाकथित धर्मगुरूओं पर निशाना साधते हुए कहा कि साजिश के तहत धर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है. बाबा रामदेव खुद को संत और योग गुरू कहते हैं, पर वह आज सबसे बड़े उद्योगपति और पूंजीपति बने बैठे हैं. उनसे बड़ा मौकापरस्त तो चिराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. जब उत्तर प्रदेश में उन्हें अपना योग और जड़ी-बूटियों की दुकान चलानी थी, तो वह मुलायम सिंह यादव के गुण गाते नहीं थकते थे और आज अपना उद्योग चलाने और फैलाने के लिए नरेंद्र मोदी की गोद में जा बैठे हैं. ऐसा आदमी बाबा कैसे हो सकता है?

उन्होंने कहा कि एक संत है रविशंकर. वह कहते हैं कि जो देश से प्यार नहीं करता है, उसे देश छोड़ कर बाहर चले जाना चाहिए. लालू ने रविशंकर से सवाल पूछा है कि वह किस आधार पर रट लगा रहे हैं कि कुछ लोग देश से प्यार नहीं करते हैं? आखिर उनके देशप्रेम का मापदंड क्या है? जो भाजपा और आरएसएस के खिलाफ बोले वह देशद्रोही हो जाता है क्या? लालू साफ लहजे में कहते हैं कि ऐसे बाबा और संत धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बना रहे हैं और अपना उल्लू सीधा कर करोड़ों-अरबों रूपये की धर्म की दुकानें चला रहे हैं. समाजसेबी प्रभात कुमार कहते हैं कि लालू की सोच, समझ, और सियासत में बदलाव का असर दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक राजनीति पर भी पड़ेगा. इससे दलितों-अल्पसंख्यकों की सही तरक्की होने के संकेत मिलते हैं. 10 साल के पहले के और आज के लालू यादव में जमीन-आसमान का फर्क दिख रहा हैं.

उन्होंने दलितों और अल्पसंख्यकों को आगाह करते हुए कहा कि आएसएस और भाजपा के लोग देश में तिरंगा झंडा की जगह भगवा झंडा लहराने की साजिश रच रहे हैं. वोट के लिए हिंदू राष्ट्र की बातों को हवा दी जा रही है. ऐसी बातों के बहकावे में दलितों को हरगिज नहीं आना है. आगे उन्होंने प्रधनमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि वह दलित और अल्पसंख्यक विरोधी हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव की वजह से उनका दलित और अल्पसंख्यक प्रेम कुछ समय के लिए जाग उठा है, जो पूरी तरह से दिखावा और छलावा है.

प्रधानमंत्री, भाजपा, आरएसएस ओर बाबाओं को ठिकाने लगाने के बाद लालू ने वैसे लोगों को भी ठिकाने लगाने की पुरजोर कोशिश की जो यह हवा बना रहे हैं कि लालू नीतीश से नाराज है और वह सरकार को ज्यादा दिनों तक नहीं चलने देंगे. उन्होंने कहा कि कुछ लोग यह भरम फैला रहे हैं कि लालू नीतीश सरकार को नहीं चलने देगें, ऐसे लोग अपना भरम पाले बैठे रहें. हमारी सरकार को कुछ नहीं होगा. नीतीश सरकार चलेगी और खूब अच्छी तरह से चलेगी.

पिछले 5 अप्रैल से बिहार को पूरी तरह से ड्राई स्टेट घोषित किए जाने के बाद राजनितिक गलियारों में यह हवा तेजी से चल रही थी कि नीतीश के इस फैसले से लालू नाराज हैं. इस मसले पर लालू ने चुटकी लेते हुए कहा- ‘हाथी चले बाजार और कुत्ता भौंके हजार’. अफवाह फैलाने वाले कुछ भी कहें पर शराबबंदी का फैसला क्रांतिकारी फैसला है. आगे उन्होंने जोड़ा कि दूध-दही खाओ, शराब को भगाओ. उसके बाद हंसते हुए धीरे से बोले-‘यादव के गुण आओ’.

VIDEO: …और इस तरह एक भारतीय से हार गये क्रिस गेल

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के लेग स्पिनर यजुवेंद्र चाहल ने एक आर्म रेसलिंग मुकाबले में लंबे-लंबे दर्शनीय छक्के लगाने के लिये मशहूर क्रिस गेल को हरा दिया. दरअसल, दोनों क्रिकेट स्टार खाली समय में मजाकिया अंदाज में आर्म रेसलिंग कर रहे थे. गेल ने यह मजेदार वीडियो अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है.

वीडियो में देखिये किस तरह चाहल से हार गये क्रिस गेल

 

धोनी ने मानी बात, छोड़ दिया आम्रपाली का साथ

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने रियल एस्टेट फर्म आम्रपाली के ब्रांड एंबैसडर के पद से इस्तीफा दे दिया है चूंकि नोएडा में एक हाउसिंग प्रोजेक्ट के रहवासियों ने सोशल मीडिया पर मुहिम चलाकर धोनी को इस बिल्डर से खुद को अलग करने के लिये कहा था.

कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अनिल शर्मा ने कहा, 'धोनी अब हमारे ब्रांड एंबैसडर नहीं हैं. मैं नहीं चाहता कि आम्रपाली से जुड़े रहने के कारण उनकी छवि पर कोई असर पड़े. धोनी और हमने मिलकर यह फैसला लिया है.' धोनी पिछले छह सात साल से कंपनी के ब्रैंड एंबैसडर थे.

 

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