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पनामा पेपर्स: काली कमाई के किले में मीडिया की घुसपैठ

समूचे विश्व को सकते में डाल देने वाले पनामा पेपर्स लीक मामले में दुनिया भर के देशों में तहलका मचा हुआ है. इसे लेकर कई राष्ट्राध्यक्षों समेत भ्रष्ट शख्सीयतों में बेचैनी है तो ईमानदारी से टैक्स चुकाने वाले लोग स्तब्ध हैं. पिछले 10 सालों में नेताओं, कारपोरेट, अपराधियों, बिचौलियों और दूसरे नामीगिरामी लोगों द्वारा काली कमाई छिपाने वाले नापाक गठजोड़ का यह सब से बड़ा खुलासा है. पनामा पेपर्स में भ्रष्ट नेताओं, कारपोरेट्स और ला फर्म का ऐसा बेनाम गठबंधन सामने आया है जिस ने दुनिया के प्रभावशाली लोगों ने बेनामी शैल कंपनियों के माध्यम से अकूत दौलत छुपाने का काम किया है.

पनामा पेपर्स लीक मामला आर्थिक अपराध की दुनिया का अब तक का सब से बड़ा पर्दाफाश है. इस खुलासे ने दुनिया के आर्थिक तंत्र के पीछे छिपी खामियों को उजागर किया  है. यह दुनिया भर के मीडिया की सामूहिक ताकत का इतिहास का सब से बड़ा उदाहरण है जिस ने एक साथ विश्व के भ्रष्ट नेताओं, उद्योगपतियों, खिलाडि़यों, अभिनेताओं, कुख्यात अपराधियों और नामीगिरामी शख्सीयतों की कमाई के काले कारनामों को उजागर किया है.

मामले के खुलासे के बाद शासकों के इस्तीफे हो रहे हैं. सरकारों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं पर भारत में खामोशी है. पनामा पेपर्स में भारत के भी 500 लोगों के नाम उजागर हुए हैं पर इस राष्ट्रद्रोह पर कोई अंगुली नहीं उठा रहा है. भारत के मीडिया में भी चुप्पी है.

दुनिया भर के रसूखदार लोगों के नाम सामने आने के बाद यह बातें कही जा रही है कि ये सभी गुप्त बैंक खाते और औफशोर कंपनियां गैरकानूनी नहीं हैं पर माना जा रहा है कि जिन लोगों के नाम आए हैं उन्होंने मनी लौंड्रिंग करते हुए रकम यहां लगाई और अपने देशों में टैक्स चोरी की है.

दरअसल जरमनी के म्युनिख शहर ने निकलने वाले ‘ज्यूडडायचे जाइटुंग’ अखबार ने अपने सूत्रों से पनामा की मोसैक फोंसेका नाम की ला फर्म के 1.15 करोड़ टैक्स दस्तावेज हासिल किए. यह फर्म कानूनी सेवा देने वाली कंपनी है जो कंपनियों की खरीदबिक्री में मदद करती है.

कहा जाता है कि 1977 में स्थापित इस कंपनी ने कई फर्जी कंपनियों को बिकवाने का खेल खेला जिस के जरिए विश्व के बड़े लोगों ने अपना पैसा सरकार से छिपा कर पनामा में जमा कराया ताकि टैक्स न देना पड़े. इस अखबार को 1970 से ले कर 2015 तक 2 लाख से ज्यादा कागजी कंपनियों के दस्तावेज मिले. विश्व के कई देशों से जुड़ी इतनी बड़ी संख्या वाली कंपनियों और उन के करोड़ों दस्तावेजों को पढना और जांचपरख करना आसान न था इसलिए इन दस्तावेजों को ‘इंटरनैशनल कंसोर्टियम औफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट’[आईसीआईजे] से साझा किया गया. अंतर्राष्ट्रीय खोजी पत्रकारों के इस संगठन में दुनिया भर के 100 से ज्यादा मीडिया संस्थानों के 370 पत्रकार जुड़े हुए हैं.  लीक डाटा का साइज 2.6 टेराबाइट है. यह जूलियन असांजे के विकीलिक्स और सीआईए एजेंट एडवर्ट स्नोडेन के जारी किए डाटा से कई गुना ज्यादा हैं.

पनामा पेपर्स सब से पहले हासिल करने वाले जरमन अखबार ने कहा कि वह सभी 1.15 करोड़ पेपर्स सार्वजनिक नहीं करेगा. अखबार ने कहा कि दस्तावेजों में 2.10 लाख लोगों, कंपनियों, संस्थानों और ट्रस्टों की कमाई की जानकारी है. दुनिया भर के पत्रकार इन कागजातों की जांचपरख में जुटे हैं और आए दिन नए खुलासे हो रहे हैं.

भ्रष्टों की काली कमाई के अभेद्य किले में मीडिया की इस घुसपैठ की विश्व भर में प्रशंसा हो रही है. हालांकि फंसे हुए लोग मीडिया को कोस रहे हैं और खुद को पाक साफ बताते हुए बेतुके तर्क दिए जा रहे हैं.

पत्रकारों की इस पड़ताल से यह जाहिर हुआ है कि हर दौर में ताकतवर और अमीर लोग अपने देश का पैसा पनामा, कैमरून, बरमूडा, आइलैंड, ब्रिटिश वर्जिन, जिब्राल्टर, मकाऊ, स्विट्जरलैंड, लाइबेरिया और माल्टा जैसे देशों में छिपा कर रखता आया है.

आज जब लोकतंत्र का चौथ स्तंभ दुनिया भर में कारपोरेट और सत्ता तंत्र के आगे नतमस्तक नजर आ रहा है, ऐसे में जरमन अखबार और इंटरनैशनल कंसोर्टियम औफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स अपने दायित्व को निभाने में खरा उतरा है. भारत में तो मीडिया दिनरात धर्म, सत्ता तंत्र और व्यक्ति भक्ति में लीन दिख रहा है.

भारत में पिछले वर्षों में कौमनवेल्थ घोटाला, 2जी स्पैक्ट्रम, कोयला घोटाला जैसे मामलों का मीडिया ने पर्दाफाश नहीं किया. ये मामले सीएजी ने उजागर किए. ऐसे में जरमन अखबार और अंतर्राष्ट्रीय खोजी पत्रकार संघ जैसे पत्रकारीय दायित्व पर खरे उतरने वाले पत्रकारों की प्रशंसा करनी चाहिए. यही उम्मीद लोकतंत्र को बचा रही है.

जो काम सरकारों, विपक्षी पार्टियों और सरकारी एजेंसियों को करना चाहिए था, इस मामले में कहीं नहीं लगता कि ये अपना दायित्व निभा रहे थे. यह जोखिम भरा काम  मीडिया ने कर दिखाया. यह काम खतरनाक है क्योंकि पनामा पेपर्स से पता चलता है कि मोजैक फोंसेका ने आतंकवादी संगठनों की मदद करने वाले, ड्रग माफिया से ले कर बैंक लूटने वाले और माफिया डौन दाऊद इब्राहिम जैसे खूंखार अपराधियों तक के पैसे यहां ठिकाने लगाए गए थे. यह सच है कि आज विश्व भर में मीडिया के दायित्व पर सवाल उठ रहे हैं. उसे कारपोरेट की गोद में जा बैठने वाला, पैसों का गुलाम बताया जा रहा है लेकिन फिर भी हर जगह ऐसी स्थिति नहीं है.

अब तो हमारे ज्यादातर मीडिया मालिक, संपादक, पत्रकार लगभग मुफ्त की जमीन, पदम पुरस्कार, राज्य सभा की मेंबरी के लिए लपलपाती लालसा में अपना दायित्व, पत्रकारिता के मूल उद्देश्य भूल गए हैं और सत्ता के साथ नाजायज संबंध कायम कर लिए हैं. मानो उसे अब जनता से समाज से कोई सरोकार नहीं रह गया है. इसीलिए लोग इसे प्रेस्टीट्यूट जैसे शब्द कहने पर मजबूर होने लगे हैं.

1977 में बने इंटरनेशनल कंसोर्टियम औफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स [आईसीआईजे] 76 देशों के विश्व के 109 मीडिया संस्थानों के खोजी पत्रकारों का ग्रुप है. इस संगठन का मकसद ग्लोबल दौर में पत्रकारिता किसी देश की सीमा के भीतर सिमट कर न रह जाए, बढते अपराध, भ्रष्टाचार किसी एक देश तक सीमित नहीं है इसलिए जरूरी था कि कई देशों के पत्रकार मिल कर काम करें. इस संगठन में कई तरह के अनुभवी लोग काम करते हैं जो खासतौर से सरकारी रिकार्ड पढने में माहिर होते हैं. तथ्यों की पड़ताल करने वाले वकील पत्रकार भी होते हैं.

पत्रकार संगठन ने बहुराष्ट्रीय तंबाकू कंपनियों द्वारा नशे की तस्करी और चोरी को उजागर किया. आईसीआईजे ने 2008 से 2011 में वैश्विक तंबाकू उद्योग की फिलिप मौरिस इंटरनैशनल व अन्य कंपनियों केरूस, मैक्सिको, उरुग्वे और इंडोनेशिया में अवैध कारोबार विकसित करने का खुलासा किया था. निजी सैन्य उत्पादक संघ, अभ्रक कंपनियों और जलवायु परिवर्तन वाले लौबिस्टों का भंडाफोड किया था.

पर उधर मोसैक फोंसेका ने हैकिंग का मामला दर्ज कराया है. कहा गया है कि यह  इस फर्म के नेटवर्क में घुसपैठ का आपराधिक मामला है. उन के पास टैक्निकल रिपोर्ट है कि इसे विदेश के सर्वरों ने हैक किया है.

पनामा के वित्तीय सेवा सेक्टर को बुरी तरह हिला देने वाले इस मामले को कानूनी फर्म मोसेक फोंसेका और सरकार गैरकानूनी नहीं मानती. इन का कहना है कि औफशोर कंपनियां अपनेआप में कानून जायज हैं. मोसैक फोंसेका उस के ग्राहकों द्वारा किए गए कामों के लिए जिम्मेदार नहीं है इसीलिए दुनिया भर के राजनीतिबाज और दूसरे रसूखदार लोग अपने बचाव में यही राग अलाप रहे हैं कि उन्होंने कुछ भी गैर कानूनी नहीं किया.

पनामा पेपर्स खुलासे के बाद आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिंगमुदुर दावी गुनलुन और चिली के ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल के मुखिया की कुर्सी छीन ली. आइसलैंड में तो लोग प्रधानमंत्री के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे पर भारत में न तो मीडिया में, न राजनीतिक क्षेत्र में ज्यादा हलचल है. टेलीविजन चैनलों पर कोई बहस नहीं है न सोशल मीडिया में क्योंकि जिन लोगों के नाम सामने आए हैं वे तो इस देश के भगवानों के बराबर हैं, सत्ता के नजदीकी हैं और महान देशभक्त भी. विश्व प्रेस आजादी दिवस पर ह रिपोटर्स बिदाउट बौर्डर्स की ओर से जारी रैंकिंग में भारत का स्थान 180 देशों में 136वां है. अंदाज लगाया जा सकता है हम पत्रकारिता में कहां हैं.

अब भारत सरकार ने जांच की बात कही है जिस में एक बहुपक्षीय जांच समूह उन नामों से जुड़े देश और विदेश स्थित खातों की छानबीन करेगा और धन लगाने के स्रातों के बारे में पता करेगा. यह तय है कि इस से किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा.  हालांकि अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्र्या राय, अडाणी जैसे फंसे हुए लोग ढुलमुल तर्कों से खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें पता है कि उन का बाल भी बांका नहीं होगा. सरकार ने पहले ही काले धन की घोषणा करने वालों के साथ रियायत दिखा रही है. उन के घोषित धन के करीब आधे पर टैक्स छूट देने की बात कही थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में काले धन को देश में लाने  की खूब बातें की थीं. हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपए डालने का उन का चुनावी भाषण चर्चा में रहा था. सरकार ने काले धन को वापस लाने के मकसद से 13 देशों के साथ टैक्स इनफोरमेशन एक्सचैंज एग्रीमेंट भी किए लेकिन मोदी सरकार के दो साल के कार्यकाल में बात केवल स्वैच्छिक घोषणा से आगे नहीं बढ पाई. हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि विदेशों में जमा धन का खुलासा न करने वालों के खिलाफ कड़ी काररवाई की जाएगी पर ये मामले वर्षों जांच और फिर अदालतों में पड़े रहेंगे. कुछ ठोस नतीजा निकलेगा इस में संदेह है.

हालांकि पिछले साल सरकार ने काला धन विधेयक पास किया था जिस में भारी जुर्माने और आपराधिक मुकदमे की काररवाई का प्रावधान है. अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत वित्तीय संस्थानों को ग्राहकों की वित्तीय जानकारियां सरकार से साझा करनी होती है, जहां उस पर टैक्स देना पड़ता है. नियमों के तहत किसी भी देश में कानूनी रूप से अवैध संपत्ति रखने वाला व्यक्ति दोषी कहलाता है इसलिए वित्तीय पारदर्शिता लाना जरूरी है. अमेरिका में फोरेन अकाउंट टैक्स कंप्लायंस एक्ट के कारण देश का पैसा अवैध रूप से बाहर नहीं जा पाता. इस के तहत प्रत्येक व्यक्ति को विदेश में मौजूद अपने खातों की सही जानकारी देना आवश्यक होता है.

दुनिया के कई देशों में कमाई छिपाने, टैक्स चोरी करने और किसी सुरक्षित जगह पर पैसा रखने के लिए वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है. इन देशों को टैक्स हैवन कहा जाता है. यह कारोबार बहुत बड़ा है. इस का अंदाज भी नहीं लगाया जा सकता. कई देशो की तो समूची अर्थव्यवस्था ही इसी पैसे पर  टिकी है.

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गेब्रियल जकमैन लिखते हैं कि इन द्वीपों की शैल कंपनियों का पैसा न्यूयार्क के रियल एस्टेट से ले कर बांड इक्विटी और यूरोप तक निवेश होता है. प्रतिबंध की गतिविधियां रोकी जा सकती हैं. मनी लौंड्रिंग पर रोक लगाने से आतंकवाद और अपराध को वित्तीय मदद बंद करने में सहायता मिलेगी.

अनेक देशों में काला धन रोकने के लिए कानून भी बने हुए हैं. विश्व भर में टैक्स जानकारी साझा करने के लिए 500 से ज्यादा समझौतों और अमेरिकी कानून फोरेन अकाउंट टैक्स कंप्लायंस ऐक्ट के लागू होने की तैयारियों के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह साबित कर पाना बड़ा मुश्किल हो गया है कि टैक्स हैवन देशों में इकट्ठा खरबों डौलर चोरी के हैं या कानूनी तौर पर जमा किए गए हैं.

ऐसे खुलासे पहले भी हुए हैं. 2011 में विकीलिक्स ने भारतीयों समेत विश्व के कई नाम उजागर किए थे जिन्होंने स्विस बैंकों में धन जमा कराया था. विकीलिक्स मामला 5 अखबारों ने मिल कर किया था. इस में भारत के 22 लोगों के नाम सामने आए. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर स्पेशल इंवेस्टिगेटिव टीम बनाई. सीआईए के एक पूर्व कर्र्मचारी एडवर्ट स्नोडेन ने कई पत्रकारों के साथ मिल कर दस्तावेज जारी किए थे जिस से विश्व भर में खलबली मची रही.

भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में चोरी से जमा किए गए धन का कोई निश्चित आंकड़ा तो नहीं है पर जानकारों का अनुमान है कि यह लगभग 7,280,000 करोड़ रुपए हैं.

भारत और दूसरे देशों में जहां पनामा पेपर्स खुलासे को सराहा जा रहा है वहीं चीन के राष्ट्रपति शीन जिनपिंग और उन के जीजा डेंग जियागुई सहित कई नेताओं के नाम सामने आने पर वहां की लाइव जानकारी दिखाने वाली वेबसाइटों पर सेंसर लगा दी गई है. इन में इकोनोमिस्ट और टाइम भी शामिल हैं ताकि चीन की जनता अपने नेतओं के भ्रष्टाचार के बारे में न जान सके. शी जिनपिंग के जीजा और उन की पत्नी ने अरबों डौलर रियल एस्टेट , शेयर होल्डिंग और अन्य निवेश क्षेत्र में लगाए थे. इस बात का 2012 में ब्लूमबर्ग न्यूज ने भी खुलासा किया था.

ओलिंपिक खिलाड़ी तात्याना नावका का नाम आने पर उन्होंने कहा कि मीडिया को कोई और काम नहीं है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मोदी से पूछ रहे हैं, मोदी सरकार पनामा पेपर्स पर क्यों नहीं बोल रहे हैं. वे काला धन रखने वालों पर काररवाई नहीं करेंगे क्योंकि अरुण जेटली हाल ही में नई फेयर एंड लवली स्कीम लाए हैं जहां कोई भी डाकू, लुटेरा, ड्रग डीलर, गैगस्टर अपने काले धन को कुछ टैक्स दे कर सफेद बना सकता है.

सोशल मीडिया पर पनामा पेपर्स में आ रहे नामों को महान देशभक्त कह कर कटाक्ष किए जा रहे हैं. अमिताभ बच्चन के बारे में कहा गया है कि वह देशभक्ति के गीत गाते हैं, कविताएं सुनाते हैं और टैक्स चोरी कर विदेशों में धन को छुपाते हैं.

मामले में दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. कुछ लोग इस में सीआईए का हाथ देख रहे हैं. कहा जा रहा है कि यह आपरेशन रूस और सीरिया के खिलाफ है जिस के पीछे वाशिंगटन और उस के पश्चिम पार्टनर हैं क्योंकि  वे दोनों जगह सत्ता बदलना चाहते हैं. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन का नाम भी सामने आया है. हालांकि वह स्वयं शामिल नहीं हैं पर उन के रिश्तेदार के नाम हैं. उधर सीरिया के राष्ट्रपति अल बशर असद का नाम भी है. इंटरनेशनल कंसोर्टियम औफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स को ओपन सोसायटी फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन का भी समर्थन हासिल बताया जा रहा है. फोर्ड फाउंडेशन द्वारा आईसीआईजे को आर्थिक मदद के दावा भी किया जा रहा है.

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पनामा पेपर्स खुलासे के दो दिन बाद कहा कि टैक्स चोरी से बचने के ये तरीके दुनिया भर के लिए समस्या है. इन में से बहुत से खाते और कंपनियां कानूनी हैं पर समस्या तो यही है. समस्या यह है कि ये कानून ही क्यों बने हैं.

ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी की काउंसल लिज कोंफालोन कहती हैं कि पनामा पेपर्स मामला बिचौलियों का ऐसा चित्रण है जिस में पनामाई ला फर्म मोजैक फोंसेका बेनाम मालिकों और कंपनियों के बीच स्क्रीन की तरह है. वह अमेरिका समेत कई देशों में सेवा देती है. अमेरिका में कोई भी व्यक्ति सही व्यक्ति का नाम उजागर किए बिना कंपनी खोल सकता है. अधिकारियों को पता होता है कि कंपनी गलत काम कर रही है पर उसे यह पता नहीं होता है कि गलत काम कौन कर रहा है. अगर उस का पता चल भी जाए तो राशि का पता नहीं चलता. इस तरह बेनामी कंपनी के मालिक को सजा से मुक्त होने का लाइसेंस मिल जाता है. यहां बेनामी कंपनी खोलना लाइब्रेरी कार्ड बनवाने से भी ज्यादा आसान है.

सोशल मीडिया में तरुण कहते हैं, ‘‘पनामा घोटाले में शामिल लोगों पर मोदी कोई काररवाई नहीं करेंगे. ज्यादातर उन के परिचित और करीबी हैं. सभी भ्रष्ट लोगों और काला बाजार करने वालों के लिए भाजपा सुरक्षित पनाहगाह है. अगर कोई भाजपा में शामिल होता है तो उस के सारे अपराध माफ हो जाते हैं.’’

सचिन ने लिखा है, ‘‘लालची, भ्रष्ट और सत्ता से ताकतवर बने लोग गैरकानूनी माध्यम से पैसे को दूसरे देशों में पहुंचाते हैं और बेनामी कंपनियों के जरिए उस पैसे का हस्तांतरण होता है. यह देश के साथ गद्दारी है. ऐसे लोगों को कड़ी सजा मिले.’’

नितिन धारीवाल ने सवाल उठाया है कि टैक्स चोरी करते वक्त तमाम सरकारी एजेंसियां कहां चली जाती हैं? इंफोर्समेंट डिपार्टमेंट, सीबीआई, सीआईडी, इंकम टैक्स विभाग क्या कर रहे होते हैं? जब किसी मामले का खुलासा होता है तभी सारे विभाग जागते हैं.

पनामा जैसी जगह पर हम ऐसी वित्तीय गतिविधियां क्यों चलने दे रहे हैं जिस के पैसों का उपयोग अपराध को बढावा देने में हो रहा है. एक सज्जन लिखते हैं कि बेनाम वाली कंपनियां अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होती हैं.

आज जब पत्रकारिता दम तोड़ रही है, निश्चित ही पनामा पेपर्स लीक मामला विश्व में जवाबदेही पत्रकारिता का बड़ी मिसाल है.जरमन अखबार और पत्रकारों के इस संगठन के अपने दायित्व से जिम्मेदार पत्रकारिता के मापदंड स्थापित हुए हैं.

अंतर्राष्ट्रीय खोजी पत्रकार संघ के सहयोगी

आईसीआईजे के साथ विश्व भर के जो अखबार और न्यूज एजेंसियां जुड़ी हुई हैं उन में ये प्रमुख हैं,

बीबीसी, ले मोंडो, फ्रांस, अल मुंडो, स्पेन, अल पेइस, स्पेन, द हफ्फिंगटन पोस्ट, अमेरिका, द एज, आस्ट्रेलिया, फोल्हा द साओ पाउलो, ब्राजील, ले सोइर, बेल्जियम, द साउथ चाइना मोर्निंग पोस्ट, हांगकांग, स्टर्न, जरमनी, द गार्जियन, ब्रिटेन, द संडे टाइम्स, ब्रिटेन, प्रोसेको, मैक्सिको, 24 चासा, बुल्गारिया, एबीसी कलर डिजिटल, पैरागुआ, द असाही शिंबुन, जापान, कनाडियन ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन, कनाडा, सीआईएन-आईजेसी, क्रोशिया, कौमनवेल्थ मैगजिन, हांगकांग, अल कोमेरियो, एक्वाडोर, अल कांफिडेंशिल, स्पेन, फिन्निश ब्राडकास्टिंग कंपनी, फिनलैंड, फोकस, स्वीडन, द इंडियन एक्सप्रैस, भारत, इसरा न्यूज एजेंसी, थाइलैंड,  द आइरिश टाइम्स, आयरलैंड, न्यूजटपा, दक्षिण कोरिया, कीव पोस्ट, उक्रैन, ला नैशियन, अर्जेंटीना, ला नैशियन, क्रोशिया, ले मैटिन डामांचे व सोन्नटंग्स जेइटुंग, स्विट्जरलैंड, ले एस्प्रैसो, इटली, मलेशियन किनी, मलेशिया, मिंग पाओ, हांगकांग, एनडीआर, जरमनी, न्यू एज, बंगलादेश, न्यूज, आस्ट्रेलिया, नोर्वेजियन ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन, नोर्वे, नोवाया गजट, रूस, नोवी मैगजिन, सर्बिया, ओरिगो, हंगरी, पाक ट्रिब्यून, पाकिस्तान, पाकिस्तान न्यूज सर्विस, पाकिस्तान, प्रिमियम टाइम्स, नाइजीरिया, रेडिया फ्री यूरोप, रेडिया लिबर्टी, अजरबेजान, रुस्टवी टीवी, जार्जिया,  सुडडायचे जाइटुंग, जरमनी, द न्यूयार्क टाइम्स, द सिडनी मोर्निंग हैराल्ड, आस्ट्रेलिया, टा निया, ग्रीक, ट्राउ, नीदरलैंड, द वाशिंगटन पोस्ट.

21 ज्यूरिस्डिक्शन में फैला काला कारोबार

मोसैक फोंसेका विश्व की 5 सब से बड़ी औफशोर कंपनियों में से एक है जिस का कारोबार दुनिया के 21 देशों में फैला हुआ है. इन में ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड में सब से ज्यादा 1,13,000 कंपनियां हैं. दूसरा स्थान पनामा का है जहां मोसैक फोंसेका का हैडक्वार्टर है. इन में ये देश हैं, बहामास, ब्रिटिश अंगुएला, कोस्टारिका, हांगकांग, जर्सी, नेवादा, नीए, रास अल खेमाह, सेसेल्स, ब्रिटेन, वायोमिंग, बेलिज, ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड, साइप्रस, एसले औफ मैन, माल्टा, न्यूजीलैंड, पनामा, समोआ, सिंगापुर, उरुग्वे.

मेरे पेट और नितंबों पर चमकीली सफेद धारियां उभर आई हैं. बताएं क्या करूं.

सवाल

मैं 19 साल की युवती हूं. बीए में पढ़ रही हूं. कुछ महीनों से मेरे पेट और नितंबों पर चमकीली सफेद धारियां उभर आई हैं. जब मैं ने अपनी एक सहेली से इस संबंध में चर्चा की तो उस ने बताया कि ऐसी धारियां तो स्त्री के मां बनने पर होती हैं. मेरे साथ तो ऐसी कोई भी बात नहीं है. कभी कोई ऊंचनीच भी नहीं हुई है. मैं मन ही मन बहुत परेशान हूं. कृपया बताएं कि क्या करूं?

जवाब

आप बिलकुल परेशान न हों. पेट और नितंबों पर उभरी ये चमकीली सफेद धारियां, जिन्हें स्ट्राया ऐल्बिकेंस कहते हैं, कई स्थितियों में प्रकट हो सकती हैं. इन की उपज त्वचा के अंदरूनी ऊतकों पर खिंचाव पड़ने से होती है. अंदरूनी ऊतकों में आए फटाव को जब कुदरत भीतर ही भीतर भरती है तब ये धारियां दिखने लगती हैं.

किशोर उम्र में किसी युवती का वजन जब अचानक बढ़ता है तब भी यह स्थिति अपनेआप बन जाती है. लेकिन कहीं आप अपनी सहेली को गलत न समझ बैठें, इसलिए आप के लिए यह बात जान लेनी जरूरी है कि अनेक स्त्रियों में ये धारियां पहली बार गर्भवती होने पर ही प्रकट होती हैं. उन के उभरने के पीछे वही मैकेनिज्म काम करता है. गर्भावस्था में पेट और नितंबों पर चरबी बढ़ने पर अंदरूनी ऊतकों में फटाव आता है और उस के भरने पर ये उभर आती हैं.

इन धारियों के बारे में मन में किसी प्रकार की दुविधा न रखें. आप ही नहीं, बहुत सी कुंआरी कन्याओं में ये धारियां किशोरावस्था में पड़ जाती हैं.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

इंजमाम उल हक ने अफगान कोच का पद छोड़ा

पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इंजमाम उल हक ने अफगान टीम के कोच पद से इस्तीफा दे दिया है. इंजमाम को पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की चयन समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया है. इंजी ने अफगान टीम के साथ तय समय से आठ महीने पहले करार समाप्त किया है. अफगान क्रिकेट बोर्ड ने इसकी पुष्टि कर दी है.

इंजमाम को पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की चयन समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया है. इंजी की देखरेख में अफगान टीम ने हाल ही में भारत में आयोजित टी-20 विश्व कप में हिस्सा लिया और ग्रुप-10 स्तर पर वेस्टइंडीज को हराने में सफल रहा.

 

दीपा कर्माकर ने किया ओलंपिक के लिए क्वालिफाई

भारतीय जिम्नास्टिक्स के लिए एक बेहद अच्छी खबर है. पहली बार भारत से किसी महिला जिमनास्ट ने ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कर लिया है. त्रिपुरा की 22 वर्षीय जिम्नास्ट दीपा कर्माकर पहली भारतीय महिला जिमनास्ट हैं, जिन्होंने ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया.

उन्होंने 52.698 अंक पाकर रियो ओलिंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया. अपने पहले इवेंट प्रोडुनोवा वॉल्ट में कर्माकर को 15.066 अंक मिले जो बाकी 14 प्रतियोगियों से ज्यादा थे लेकिन अनीवन बार्स के दूसरे इवेंट में कर्माकर के खराब प्रदर्शन से उनका कुल स्कोर कम हो गया.

उन्हें 11.700 अंक मिले और वह इस इवेंट में अंतिम से महज़ एक पायदान ऊपर रहीं. बीम और फ़्लोर एक्सरसाइज़ के अगले दो दौर में कर्माकर ने 13.366 और 12.566 अंक बटोरकर इतिहास रच दिया. उनके कुल अंक 52.698 ने उनका स्थान रियो ओलंपिक्स के लिए पक्का कर दिया. पिछले महीने उन्हें प्रतियोगियों की सूची में शॉर्टलिस्ट किया गया था.

इससे पहले दीपा कर्माकर पहली ऐसी भारतीय महिला जिमनास्ट थीं जिन्होंने 2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेल में कांस्य पदक जीता. इसके बाद वह ऐसी पहली भारतीय महिला जिमनास्ट भी बनीं जिसने पिछले साल नवंबर में हुए वर्ल्ड जिमनास्टिक्स चैंपियनशिप्स फ़ाइनल्स के लिए क्वालिफ़ाई किया.

बड़ी बात यह कि पहले इस टूर्नामेंट के लिए दीपा को सेकंड रिज़र्व श्रेणी में रखा गया था लेकिन पिछले महीने उन्हें इसकी जानकारी दी गई कि उन्हें प्रतियोगियों की सूची में शॉर्टलिस्ट कर लिया गया है.

दीपा से पहले 11 जिमनास्ट भी ओलिंपिक में हिस्सा ले चुके हैं…

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ओलिंपिक में जिमनास्टिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली दीपा कर्माकर पहली खिलाड़ी हैं, लेकिन यह सच नहीं है. इससे पहले 1956 मेलबर्न ओलंपिक खेलों में 3 सदस्यीय पुरुष टीम- प्रीतम सिंह, शाम लाल, अनंत कुमार ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था, तो 1964 में 6 सदस्यीय पुरुष टीम ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था. लेकिन उस समय जिमनास्टिक्स में कोई क्वॉलिफ़िकेशन नहीं होता था, उस समय प्रतिनिधित्व कोई भी जाकर कर सकता था. इस तरह से जिमनास्टिक में क्वालिफ़ाइंग राउंड को देखते हुए दीपा ऐसा करने वाली पहली भारतीय ज़रूर  बन पड़ी हैं.

सचिन-गावस्कर को पीछे छोड़ जडेजा ने किया ये कारनामा

रवींद्र जडेजा इंटरनेशनल क्रिकेट में ऑलराउंडर की छवि रखते हैं, लेकिन उन्हें उनकी गेंदबाजी के लिए अधिक जाना जाता है. पर क्या आप जानते हैं कि घरेलू क्रिकेट में बल्लेबाजी में उनके नाम एक ऐसा रिकॉर्ड है, जिसमें महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर और मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर भी पीछे हैं.

जडेजा प्रथम श्रेणी क्रिकेट के इतिहास में 3 तिहरे शतक लगाने वाले भारत के पहले और दुनिया के आठवें बल्लेबाज हैं. आइए जानते हैं उन्होंने कब-कब तिहरे शतक लगाए हैं और विश्व में उनके अलावा अन्य बल्लेबाज कौन हैं, जिनके नाम यह उपलब्धि दर्ज है-

जडेजा ने सौराष्ट्र की ओर से खेलते हुए नवंबर, 2011 में पहला तिहरा शतक लगाया था. उन्होंने उड़ीसा (अब ओडिशा) के खिलाफ 375 गेंदों में 314 रन (29 चौके, 9 छक्के) की पारी खेली थी. इसके बाद अगले दो तिहरे शतक तो उन्होंने रणजी ट्रॉफी के एक ही सत्र (2012-13) में बना दिए थे. जडेजा ने दूसरा तिहरा शतक नवंबर, 2012 में गुजरात के खिलाफ बनाया था, जिसमें उन्होंने सूरत के मैदान पर 561 गेंदों में 303 रन (37 चौके, 4 छक्के) की नाबाद पारी खेली थी. तीसरा तिहरा शतक उन्होंने दिसंबर, 2012 में रेलवे के खिलाफ बनाया, जिसमें उन्होंने 331 रन (501 गेंद, 29 चौके और 7 छक्के) की पारी खेली थी.

विश्व स्तर पर ये बल्लेबाज भी हैं खास

अब हम वर्ल्ड लेवल पर ऐसे बल्लेबाजों पर नजर डालते हैं, जिन्होंने अपने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में तीन या अधिक तिहरे शतक लगाए हैं. ये हैं सर डॉन ब्रैडमैन (6), बिल पॉन्सफोर्ड (4), वॉली हैमन्ड (4), डब्ल्यूजी ग्रेस (3), ग्रीम हिक (3), ब्रायन लारा (3) और माइक हसी (3).

भारत के 4 बल्लेबाजों के नाम 2 तिहरे शतक

रवींद्र जडेजा के इस रिकॉर्ड से पहले भारत के 4 बल्लेबाजों ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दो तिहरे शतक जमाए थे. ये भारतीय बल्लेबाज हैं- विजय हजारे, वीवीएस लक्ष्मण, रमन लाम्बा और वसीम जाफर. वहीं इंटरनेशनल लेवल पर भारत की ओर से वीरेंद्र सहवाग (309 और 319) के नाम दो तिहरे शतक हैं. महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर के नाम फर्स्ट क्लास क्रिकेट में एक तिहरा शतक (340 रन) है, वहीं सचिन तेंदुलकर के नाम घरेलू क्रिकेट और इंटरनेशनल क्रिकेट दोनों में कोई भी तिहरा शतक नहीं है और उनका सर्वाधिक स्कोर 248 रन है.

रवींद्र जडेजा के करियर के उतार-चढ़ाव

गौरतलब है कि जडेजा 17 अप्रैल को राजकोट में एक समारोह में मंगेतर रीवा सोलंकी के साथ विवाह बंधन में बंध गए. यदि जडेजा के जीवन की पहली पारी यानी क्रिकेट पर नजर डालें, तो यह संघर्षों से भरी रही है. पूरे करियर में वह टीम से अंदर-बाहर होते रहे, वहीं उन पर बैन भी लग चुका है.

मां की मौत का सदमा, छोड़ने वाले थे क्रिकेट

रवींद्र जडेजा के पिता अनिरुद्ध सिंह जडेजा एक प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी में वॉचमैन थे. जाहिर है उनके परिवार की आय कुछ खास नहीं थी. फिर भी परिवार ने जडेजा के क्रिकेट के शौक को पूरा करने के लिए भरपूर मदद की. उन्होंने क्रिकेटर बनने के सपने को संजोना शुरू ही किया था कि 2005 में उनकी मां लता की एक दुर्घटना में मौत हो गई. इसके बाद वह क्रिकेट छोड़ने पर विचार करने लगे थे. हालांकि बाद में उन्होंने परिवार और दोस्तों की समझाइश के बाद फिर से क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया और शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की ओर से खेलने का गौरव हासिल कर लिया.

दिलीप ट्रॉफी में मिला मौका, अंडर-19 वर्ल्ड कप भी खेले

जडेजा ने 2006-07 में दिलीप ट्रॉफी से अपना प्रथम श्रेणी क्रिकेट करियर की शुरू किया. वह रणजी ट्रॉफी में सौराष्ट्र के लिए खेलते हैं. इसके बाद उन्हें 2006 और 2008 में भारत की ओर से अंडर-19 क्रिकेट वर्ल्ड कप में खेलने का भी अवसर मिला. उन्होंने बॉलिंग और फील्डिंग से अंडर-19 वर्ल्ड कप 2008 जीतने में अहम भूमिका निभाई.

आईपीएल-2008 में छोड़ी छाप, बने रॉकस्टार

जडेजा के करियर में उस समय नया मोड़ आया जब उन्हें आईपीएल के पहले सीजन (2008) में खेलने का मौका मिला. उन्हें राजस्थान रॉयल्स ने खरीदा और उसके कप्तान शेन वॉर्न ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर आगे बढ़ाया. वॉर्न ने उन्हें रॉकस्टार का नाम भी दिया. इस सीजन में जडेजा के बल्ले से 14 मैचों में 135 रन निकले और उनका स्ट्राइक रेट 131.06 रहा. इस सीजन के फाइनल में उन्होंने अपनी टीम को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आईपीएल 2009 में उन्होंने 13 मैचों में 6 विकेट लिए और 295 रन बनाए.

मिला टीम इंडिया का टिकट, प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं हुई पक्की

फरवरी, 2009 में जडेजा को श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो में पहली बार टीम इंडिया की ओर से वनडे में खेलने का मौका मिला. जडेजा को कई मौके मिले, लेकिन फिर भी वह प्लेइंग इलेवन में अपनी जगह पक्की नहीं कर सके. दरअसल उन पर यह तमगा लग गया कि वह लंबे शॉट नहीं खेल पाते.

लगा एक साल का बैन

आईपीएल में जडेजा के करियर को उस समय तगड़ा झटका लगा, जब उन्हें आईपीएल सीजन-3 (2010) में एक साल के लिए बैन कर दिया गया. दरअसल उन पर नियम तोड़कर दूसरी फ्रेंचाइजी से संपर्क करने का दोषी पाया गया था.

2012 में फिर चमका सितारा

जडेजा लगभग दो साल तक टीम इंडिया से अंदर-बाहर होते रहे, लेकिन बड़ी सफलता नहीं मिली. इस बीच 2012 में धोनी की कप्तानी वाली चेन्नई सुपर किंग्स ने उन पर जबर्दस्त बोली लगाई. डेक्कन चार्जर्स और चेन्नई सुपरकिंग्स के बीच जडेजा को खरीदने के लिए टाई-ब्रेकर हुआ था, बाद में चेन्नई सुपरकिंग्स ने 9.72 करोड़ रुपए की बोली लगाकर उन्हें लिया था.

टेस्ट डेब्यू, जगह की पक्की

जडेजा ने दिसंबर, 2012 में इंग्लैंड के खिलाफ नागपुर में टेस्ट में डेब्यू किया था लेकिन उन्हें वास्तविक पहचान 2013 के ऑस्ट्रेलिया के भारत दौरे में मिली. जडेजा ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इस सीरीज के 4 टेस्ट मैचों में सिर्फ 17.45 की औसत से 24 विकेट झटके. 58 रन देकर 5 विकेट उनका बेस्ट रहा. यहीं से कप्तान धोनी ने उन्हें 'सर जडेजा' कहना शुरू कर दिया. उन्होंने 16 टेस्ट में अभी तक 68 विकेट लिए हैं और 473 रन बनाए हैं.

14 माह टीम से रहे बाहर

इसके बाद विदेशी धरती पर उनका प्रदर्शन ठीक नहीं रहा और बांग्लादेश के खिलाफ जून, 2015 में वनडे सीरीज के बाद उनको खराब प्रदर्शन के कारण वनडे टीम से बाहर कर दिया गया था. वह लगभग 14 महीने टेस्ट टीम से भी बाहर रहे. उस दौरान कहा जाता था कि वह अपने प्रदर्शन के कारण नहीं बल्कि धोनी के कारण टीम में बने हुए हैं. बात भी सही थी, क्योंकि धोनी के टेस्ट कप्तानी से हटने के बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया.

नहीं लगाया बैट को हाथ

जडेजा ने टीम से बाहर रहने के दौरान न तो बैट को हाथ लगाया और न ही बॉल को. उन्होंने अपना सारा समय दोस्तों और घोड़ों के साथ बिताया. उनका मानना है कि इससे उनमें आत्मविश्वास आया और इसी वजह से वे रणजी में अच्छा प्रदर्शन कर सके और वापसी संभव हुई.

दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हुई वापसी

दिसंबर 2015 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट सीरीज में टीम इंडिया की 3-0 से जीत में आर. अश्विन और रवींद्र जडेजा का बड़ा योगदान रहा. उन्होंने 4 मैचों में 23 विकेट लेकर शानदार वापसी की. इतना ही नहीं दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ इस प्रदर्शन के बाद आईसीसी की टेस्‍ट ऑलराउंडर्स की सूची में उनको पांचवां स्थान मिला था. वहीं आईपीएल 2016 में नई फ्रेंचाइजी के रूप में शामिल हुई राजकोट टीम ने उन्हें 9.5 करोड़ रुपए में खरीदा है.

जबरा और जबरदस्ती का ‘फैन’

शाहरुख़ खान अपने फैंस के लिए एक हिंदी मूवी लेकर आएं हैं 'फैन'. यह एक ऐसे लड़के गौरव चानना की कहानी है, जो फिल्म सुपरस्टार आर्यन खन्ना का जबरा फैन है और उस का इतना बड़ा दीवाना है कि उस से मिलने दिल्ली से मुंबई जा पहुंचता है. वहां उसे तब निराशा हाथ लगती है, जब वह लाख कोशिशों के बाद भी अपने हीरो से नहीं मिल पता है और उस से इस हद तक नफरत करने लगता है कि खुद विलेन बन जाता है.

ऐसा नहीं है कि इस तरह की फ़िल्में हिंदी सिनेमा में पहले नहीं बनी हैं. पर उन मे थोड़ा सा अंतर यह था कि हीरो और उस का फैन दोनों अलगअलग किरदार होते थे. साल 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी ने 'गुड्डी' नामक फिल्म बनाई थी, जिस में जया भादुड़ी बच्चन को सुपरस्टार धर्मेंद्र की फैन के तौर पर दिखाया गया था. इस फिल्म में जया ने एक स्कूल की लड़की का किरदार निभाया था, जो बड़े परदे पर धर्मेंद्र के कारनामों से इतनी प्रभावित हो जाती है की उन्हें अपना सुपर हीरो समझ लेती है. उसे लगता है कि यह सुपर हीरो चाहे तो कुछ भी कर सकता है, लेकिन धर्मेंद्र खुद उस से मिल कर यह बताने की कोशिश करते हैं कि वे भी एक सामान्य आदमी इनसान हैं और फ़िल्मी दुनिया की चमकधमक इतनी भी उजली नहीं है.

ऐसा ही कुछ हिंदी फिल्म 'बॉंबे टाकीज' में भी देखने को मिला था. अनुराग कश्यप ने अपनी कहानी में अमिताभ बच्चन के साथ उन के फैंस के रिश्ते को बड़ी खूबी से दिखाया था.

इस फिल्म की कहानी का मुख्य किरदार है इलाहाबाद का एक नौजवान विजय, जिसे उस का बीमार पिता एक मुरब्बा दे कर कहता है कि वह मुंबई जाए और अमिताभ बच्चन को वह मुरब्बा चखाए. उस पिता ने एक बर्नी में बंद कर के उस मुरब्बे को कई दिनों से संभाल कर रखा था. पिता को यकीन था कि  अगर अमिताभ बच्चन उस मुरब्बे को चख लेंगे और बाकी बचा मुरब्बा वह खुद खा लेगा, तो उस की बीमारी ठीक हो जाएगी.

विजय मुंबई जाता है और अमिताभ बच्चन के घर के बाहर डेरा डाल लेता है, जिस से कि वह अपने पिता का सपना पूरा कर सके.

दरअसल, फिल्म कलाकारों और उन के प्रशंसकों के बीच कभीकभार एक अजीब सा रिश्ता बन जाता है कि स्टार की हर अदा फैन को उस का  दीवाना बनाती जाती है. फैन अपने हीरो या हीरोइन में अपना अक्स देखने लगता है. वह हर काम उसकी तरह करने कि कोशिश करता है, कभीकभार तो उस से प्यार तक करने लगता है. उसकी हर छोटी से छोटी बात को गांठ बांध लेता है.

अपने ज़माने के सुपर स्टार राजेश खन्ना ने लड़कियों को अपना दीवाना बना रखा था. सुनते हैं कि लड़कियां खून से प्रेम पत्र लिख कर उन को भेजती थीं. कई लड़कियों ने तो उन के नाम का टैटू बना लिया था.

मुंबई घूमने आए बहुत से सैलानी अपने पसंदीदा फिल्म कलाकार का घर देखते हैं. अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान, सलमान खान के घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा रहता है और मौका मिलते ही ये कलाकार भी घर से निकल कर अपने फैंस का शुक्रिया अदा करते हैं.

लेकिन  कई बार फैंस अपनी हद पार कर जाते हैं. कुछ सिरफिरे तो हीरोइनों का पीछा करते हैं. उन के घर तक पहुंच जाते हैं. क्या ऐसे लोगों को फैन कहा जा सकता है? जो अपने पसंदीदा फिल्म सितारे को तकलीफ पहुंचाए वो काहे का फैन. वह तो जबरा नहीं बल्कि ज़बरदस्ती का  फैन ही कहा जाएगा.

स्मार्ट छुट्टियों के लिए ये हैं स्मार्ट एप्स

रोजाना की आवाजाही और पर्यटन के लिए हम जिस प्रकार सूचनाएं जुटाते हैं उसमें स्मार्टफोन ऐप क्रांतिकारी बदलाव लाने लगे हैं. चाहे सीट पक्की करनी हो या अपनी सीट पर खाना मंगवाना हो, यहां बताए जा रहे मोबाइल ऐप आपके रेल के सफर को बेहतर व सुविधाजनक बना देंगे. अगर आप के पास स्मार्टफोन है और आप अक्सर रेल यात्रा करते हैं तो संभव है कि आपके मोबाइल में यहां बताए गए एक-दो ऐप तो होंगे ही.

20 अरब डालर का ऐप बाजार विस्फोटक ढंग से प्रगति पर है और ट्रैवल ऐप बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं जिससे दैनिक यात्रियों व सैलानियों दोनों को बहुत फायदा हो रहा है. लगभग 2 लाख लोग हर रोज रेल से सफर करते हैं यहां कुछ पसंदीदा ट्रेन ट्रैवल ऐप्स के बारे में जानकारी दी जा रही है जिन्हें गूगल प्लेस्टोर से मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है और आगामी गर्मियों की छुट्टियों में सफर के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. चूंकि इन दिनों लोग परिवार के साथ घूमने जाते हैं ऐसे में ये ऐप बहुत उपयोगी सिद्ध होंगे.

ट्रेन पता कीजिए व उनकी उपलब्धता जानिए या पता लगाईए कि आपके पीएनआर नंबर के कन्फर्म होने की कितनी संभावना है

ट्रेनमैन – ट्रेनमैन आईआरसीटीसी की पुरानी प्रतीक्षा सूचियों के डेटाबेस के आधार पर तुलना कर के बताता है कि आपकी वेटिंग टिकट के कन्फर्म होने की कितनी संभावना है. यह ऐप वेटिंग टिकट की शुरुआती व अंतिम स्थिति को ट्रैक करता है, दोनों के बीच दिनों की गणना करता है व यात्रा के दिन को जानकारी में लेता है.

भारत में कहीं भी रेल में सफर करते हुए मनपसंद खाना प्राप्त करना है तो ट्राई कीजिए ट्रैवलखाना.

ट्रैवलखाना – अब कोई भी रेल यात्रा उम्दा भोजन के बगैर पूरी नहीं होगी और सबसे बढ़िया बात तो यह है कि गर्मागर्म स्थानीय पकवान अच्छी पैकिंग के साथ आपकी सीट पर पहुंचाए जाएंगे. ट्रैवल खाना एक ऐसा ही ऐप है जो आपकी सुविधानुसार स्वादिष्ट क्षेत्रीय खानपान आप तक पहुंचाता है उदाहरण के लिएः आगरा कैंट स्टेशन पर पंछी प्लेन ड्राई पेठा, भोपाल जंक्शन पर छैना मैंगो बर्फी, सवाई माधोपुर जंक्शन पर लस्सी व दाल कचैड़ी, पुणे जंक्शन पर लोनावाला चिक्की व मगनलाल चिक्की तथा और भी बहुत कुछ. आप मोबाइल ऐप से आर्डर कर सकते हैं और तुरंत वह आप तक पहुंचा दिया जाएगा. यह सेवा 160 स्टेशनों पर उपलब्ध है और वर्तमान में 3000-4000 भोजन प्रतिदिन डिलिवर किए जा रहे हैं. ट्रैवल खाना ने हाल ही में आईआरसीटीसी से ई-कैटरिंग के लिए गठजोड़ किया है.

किसी अन्य ट्रेन में टिकट की तलाश व बुकिंग करनी है तो  टिकट जुगाड़ भी बड़े जुगाड़ की एप है. इसके जरिये आपकी कई प्रोब्लम हल हो सकती हैं.

टिकट जुगाड़ – अगर अपने रूट पर आपको कन्फर्म टिकट नहीं मिल पाई तो टिकट जुगाड़ आपका मददगार बन सकता है. आपके बोर्डिंग स्टेशन से पहले या बाद वाले स्टेशन से उपलब्ध टिकट को यह स्वतः खोज लेता है और शेष टिकट कोटा भी बताता है. यह इन सभी को संयोजित कर के आपको वह अधिकतम रास्ता बताता है जिसे कन्फर्म टिकट पर तय किया जा सकता है.

रेल यात्रा का फैसला करने में सलाहकार रेलयात्री भी बेहतरीन विकल्प हैं.

रेलयात्री – रेलयात्री डाट इन एक ऐसा ऐप है विभिन्न मुसाफिरों को विविध सेवाएं प्रदान करता है. ऐप का दावा है कि वेटिंग टिकट के कन्फर्म होने या न होने की संभावना पर इसकी जानकारी की सटीकता 93 प्रतिशत है. यह रेलगाड़ी की रफ्तार मालूम करने, सीट पर खाना आर्डर करने, कैब बुक करने, यात्रा पूर्व सीटों की उपलब्धता पता करने और रेलवे टाईम टेबल जांचने आदि की सेवाएं देता है.

बेसब्री से इंतजार है मेडिसिनल चौकलेट का

चौकलेट खाना किसे अच्छा नहीं लगता. कोई भी, कितना भी कैलोरी का हौवा पैदा करे, चौकलेट से मुंह फेरना बड़ा मुश्किल है. अक्सर चौकलेट में पाए जानेवाले फैट और शुगर को मोटापे का कारण बता कर इससे दूर रहने की सलाह दी जाती है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक – चौकलेट के मुंह में घुलते रेश्म से नरम-मुलायम एहसास के सभी कायल हैं. चौकलेट सामने हो तो सेहत के प्रति सचेत लोग भी फैट और शुगर की चिंता छोड़ बेईमान करने पर आमादा हो जाते हैं.

वैसे यह भी सच है कि चौकलेट खाने के बहुत सारे फायदे भी हैं. सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि चौकलेट मुड को तरोताजा कर देता है. इसीलिए निराशा, अवसाद और तनाव ग्रस्त लोगों के लिए इंस्टैंट लाभ पहुंचाता है. ऐसे मरीजों को मनोचिकित्सक चौकलेट खाने की भी सलाह देते हैं. दरअसल, वैज्ञानिक तथ्य यह है कि इसमें पाया जानेवाले तरह-तरह के एंटी-औक्सीडेंट तत्व और कई तरह के खनिज स्नायूतंत्र को तरोताजा करते हैं. इतना ही नहीं, यह स्ट्रोक की गुंजाइश को कम करता है और हाई बल्ड प्रेशर के मामले में इसे कारगर माना जाता है. कहते हैं कि बल्ड प्रेशर को सामान्य बनाए रखने में सहायक माना जाता है.

सामान्य चौकलेट की तुलना में डार्क चौकलेट को सेहत के लिए गुणकारी माना जाता है. कुकिंग डार्क चौकलेट में कृत्रिम मिठास लगभग नहीं के बराबर होता है. जबसे डार्क चौकलेट की खूबियों का प्रचार होने लगा है तबसे बड़े-बड़े ब्रांड डार्क चौकलेट लेकर बाजार में उतर आए हैं. बहुत सारे ब्रांड के डार्क चौकलेट उपलब्ध आजकल बाजार में उपलब्ध हैं. पर इनमें डार्क चौकलेट की कितनी खूबियां हैं, यह अपने आपमें शोध का विषय है.

बहरहाल, अब न तो चिंता करने करने की जरूरत है और न ही बेईमानी की. जल्द ही बाजार में मेडिसिनल चौकलेट आ रहा है और इसे लेकर आ रही है एक अमेरिका के बोस्टन की एक कंपनी है कुका जोको. जिसने कुछ समय पहले मेडिसिनल चौकलेट बनाने का दावा किया है, जिसे शौक या स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि दवा की तरह ‍खाया जा सकता है. भारत में इस मेडिसिनल चौकलेट का बेसब्री से इंतजार हो रहा है.

आमतौर पर सामान्य चौकलेट में लगभग 70 प्रतिशत फैट और सुगर होता है. बाकी 30 प्रतिशत ककोआ और दूसरी अन्य सामाग्रियां. लेकिन वर्ल्ड चौकलेट फोरम में अमेरिकी कंपनी कुका जोको ने अपने मेडिसिनल चौकलेट के लिए दावा किया है कि इनके चौटलेट में फैट की मात्रा बहुत कम है. फिलहाल कंपनी ने सामान्य चौकलेट की तुलना में फैट और सुगर की मात्रा को 50 प्रतिशत घटा कर महज 35 प्रतिशत करने का दावा किया है कुका जोको ने. साथ में कंपनी का दावा यह भी है कि सेहत के लिहाज से इस चौकलेट को दवा के तौर पर भी नियमित रूप से खाया जा सकता है.

कुका जोको के प्रवक्ता और कंपनी के मुख्य वैज्ञानिक ग्रेगरी अहारोनियन ने वर्ल्ड चौकलेट फोरम में इस मेडिसिनल चौकलेट की खूबिया गिनाते हुए कहा कि सेहत के लिए जितना फैट नुकसानदेह है, उतना ही सुगर भी. आनेवाले समय में सुगर निकोटिन जितना खतरनाक साबित हो सकता है. इसीलिए सुगर बगैर चौकलेट को मीठा बनाने के लिए कुछ तरीके इजाद करना जरूरी था. इसी दिशा में लगातार कई वर्षों तक काम करने के लिए कंपनी को इसमें सफलता मिली है. 

गौरतलब है कि किसी भी तरह का चौकलेट क्यों न हो, उसका सबसे प्रमुख उपादान होता है ककोआ. जिस तरह कौफी बिन्स से कौफी प्राप्त किया जाता है, उसी तरह ककोआ बिन्स से भी चौकलेट प्राप्त किया जाता है. अपने आपमें ककोआ स्वाद में बहुत कडुवा होता है. इसके कड़वेपन को दूर करने के लिए चौकलेट निर्माता और कंफेक्शनर कंपनियां इसमें ढेर सारा सुगर, जो कि आमतौर पर कृत्रिम स्वीटनर होता है, मिलाती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि स्वादिेस्ट बनाने और इसके टेक्सचर को सिल्की बनाने के लिए जिस पैमाने पर सुगर और फैट मिलाया जाता है, उसके नतीजा यह होता है कि ककोआ में पाए जाने वाले पोषक तत्व बड़े पैमाने पर नष्ट हो जाते हैं और तथाकथित तौर पर इसमें केवल स्वाद रह जाता है, जिसका ‘हेल्थ बेनिफिट’ लगभग नहीं के बराबर होता है.

अमेरिकी कुका जोको ककोआ की कहुवाहट को दूर करने के लिए बोलिविया और पेरू में पाया जानेवाला कुछ खास तरह के हर्ब का इस्तेमाल करती है. इसके अलावा ककोआ के पत्ते भी इसके बिन्स की कड़वाहट दूर करने के लिए काम में लाए जाते हैं. कंपनी का दावा है कि लंबे समय से शोध का नतीजा है कि कंपनी को इसमें सफलता मिली है. बोलिविया और पेरू के इन हर्बों का इस्तेमाल करने से एक तरफ ककोआ की कडुवाहट दूर हुई और दूसरी तरफ इसके पोषक तत्वों को भी बरकरार रखना संभव हो पाया है.

हालांकि कंपनी फैट और सुगर की मात्रा को और भी घटने के लिए लगातार शोध कर रही है. कंपनी का लक्ष्य इसे 10 प्रतिशत करने का है, जो फिलहाल 35 प्रतिशत है. जाहिर है सामान्य चौकलेट से नुकसानदेह सामग्रियों को कम कर दिया जाए तो मेडिसिनल चौकलेट का मजा अब बेरोकटोक के लिया जा सकता है. लेकिन अभी थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा. बाजार में पहुंचने से पहले यह औनलाइन पर उपलब्ध होगा.

जब मध्य प्रदेश के राज्यपाल को होना पड़ा बीमार

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के 2 दिवसीय भोपाल दौरे के दौरान उनके आगमन से लेकर प्रस्थान तक प्रोटोकाल के लिहाज से माहौल कुछ कुछ सूना सूना सा था. एयरपोर्ट पर उनकी अगवानी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की, तब राजनैतिक हस्तियों के आगमन प्रस्थान पर ड्यूटी बजाने का लम्बा तजुर्बा रखने वाले अधिकारियों को अहसास हुआ कि कमी राज्यपाल रामनरेश यादव की है, जिन्हें यहां होना चाहिए था और राष्ट्रपति को राजभवन तक ससम्मान ले जाना चाहिए था. पर रामनरेश यादव राष्ट्रपति के आने के एक दिन पहले ही एक स्थानीय प्रायवेट नर्सिंग होम बंसल हास्पिटल में भर्ती हो गए थे क्योंकि उनकी ‘तबियत’ खराब थी.

कोई मानने के लिए तैयार नहीं कि वे सचमुच में बीमार हुए थे बल्कि चर्चा यह रही कि राज्य के चर्चित महाघोटाले व्यापम में नाम होने के चलते राष्ट्रपति उनसे मिलना नहीं चाहते थे. गौरतलब है कि जब रामनरेश का नाम इस घोटाले में आया आया था तब वे भागे भागे राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे पर बेरूखी और सख्ती दिखाते प्रणब मुखर्जी ने उन्हें मिलने के लिए वक्त नहीं दिया था. राज्यपाल हो या मुख्यमंत्री किसी को भी राष्ट्रपति की आगवानी करने का मौका मिलना किस्मत की बात होती है पर रामनरेश की बदकिस्मती की तो यह इंतहा है कि उन्हें बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और 2 दिन ठाठ से राष्ट्रपति भोपाल के राजभवन में रूके और जाते जाते राजभवन की व्यवस्थाओं की भी तारीफ करते वहां के कर्मचारियों को नसीहत यह दे गए कि अपने राज्यपाल की सेहत का ख्याल रखना. यह मशवरा था या ताना, शायद ही कोई राजनैतिक विश्लेषक तय कर पाए.

जब पृथ्वीराज कपूर ने दबाए थे दिलीप कुमार के पैर

दिलीप कुमार के सामने रणबीर कपूर चौथी पीढ़ी के कलाकार है. इतना ही नहीं दिलीप कुमार और रणबीर कपूर के बीच सिर्फ दो मुलाकाते ही हुई हैं. पर इन मुलाकातों ने रणबीर कपूर के दिलो दिमाग में ऐसा असर किया है कि वह कभी उन्हे भुला नही सकते. दिलीप कुमार के साथ अपनी मुलाकात को याद करते हुए रणबीर कपूर कहते हैं, मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मेरी पहली फिल्म ‘‘सांवरिया’’ रिलीज हुई थी, तो दिलीप साहब फिल्म के प्रीमियर पर आए थे. उस वक्त उनसे मेरी लंबी मुलाकात नहीं हो पायी थी. दूसरे ही दिन सुबह वह अपनी गाड़ी में मेरे घर के बाहर आए. घर के अंदर नहीं आए. उन्होंने हमारे घर के चैकीदार से कहा कि, ‘साहबजादे रणबीर को बाहर बुलाकर लाओ.’ मैं बाहर गया. उन्होंने मुझे नीचे बैठाया. फिर मेरे दादाजी, परदादाजी को लेकर कई किस्से सुनाए. फिल्मों को लेकर उन्होंने बहुत सी बातें सुनायी. उन्होंने परफार्मेंस को लेकर कई बातें कही. कुछ टिप्स भी दे दिए. दिलीप कुमार जैसे दिग्गज कलाकार का आशीर्वाद जब मिलता है, तो अपने आप आपके अंदर एक ऐसा आत्म विश्वास आ जाता है कि फिर आपको लगता है कि अब आपकी सारी राह आसान हो गयी है.

इस मुलाकात में कम से कम तीन घंटे हमारे बीच बातचीत होती रही. दिलीप कुमार साहब ने मेरे पापा या मेरे दादाजी को लेकर कुछ किस्से सुनाए. पर मुझे उनका सुनाया हुआ वह किस्सा मेरे दिलो दिमाग में बैठ गया, जो कि उन्होने मेरे ग्रैंड दादाजी यानी मेरे परदादा स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर को लेकर सुनाया.

दिलीप कुमार साहब और मेरे परदादा पृथ्वीराज कपूर ने एक साथ फिल्म ‘‘मुगल ए आजम’’ में काम किया था. फिल्म की शूटिंग चल रही थी. एक दिन दिलीप कुमार साहब सेट पर पहुंचे, तो कुछ बीमार थे. वह मेकअप रूम में जाकर बैठ गए. जब यह बात मेरे परदादा स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर को पता चली, तो वह दिलीप साहब के मेकअप रूम में गए और दिलीप कुमार साहब को अपनी गोद में बिठाया तथा उनके पैर दबाने लगे. फिर अपने चरित्रों की भी बात की. दिलीप कुमार साहब ने बताया कि यह वह दौर था, जब पृथ्वीराज कपूर और वह दोनों बहुत लोकप्रिय थे. दोनों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी. इसके बावजूद उस दौर में यह कलाकार आपस में बड़े दिल के साथ व्यवहार करते थे. जबकि अब तो सभी कलाकार सेल्फिश हो गए हैं. सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं.

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