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गूगल को जासूसी करने से ऐसे रोकें!

क्या आपको पता है कि गूगल क्रोम, क्रोम पर चलने वाले कंप्यूटर्स पर होने वाली बातचीत को गुपचुप तरीके से सुनता है और इस बातचीत का ऑडियो डाटा गूगल को भेज देता है?

गूगल का दावा है कि कंपनी को इस रिकॉर्डिंग्स से अपने लैंग्वेज रिकॉग्निशन टूल्स और सर्च रिजल्ट को बेहतर बनाने में मदद मिलती है.

लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है, यदि आप चाहते हैं कि गूगल क्रोम आपकी बातों को न सुने और उसे किसी तक न पहुंचाए तो इसका एक उपाय है. इसके लिए आपको अपनी हिस्ट्री क्लियर रखनी होगी और वॉयस सर्च से बचना होगा.

अपने वॉयस सर्च को मैनेज करने के लिए आपको एक्टिविटी कंट्रोल पेज पर जाना होगा. यहां आपको अपने गूगल अकाउंट में साइन करने के लिए कहा जा सकता है. यहां टर्न द स्विच को ऑफ करें. वॉयस एवं ऑडियो एक्टिविटी बटन के ऑफ हो जाने पर वॉयस सर्च अनानिमस आइडेंटीफार्यस का इस्तेमाल करते हुए स्टोर हो जाएगी. ऐसा करने पर सूचनाएं गूगल अकाउंट में सेव नहीं होंगी.  

अखिलेश की छवि पर दाग है अफसरों की चुप्पी

दो साल तक मथुरा के जवाहर बाग में रामवृक्ष यादव के अवैध कब्जे को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के आला अफसर चुप्पी साधे रहे. अब मथुरा जिला प्रशासन और एलआईयू के सिर पर सारा दोष मढ कर राजधानी लखनऊ में बैठे पुलिस और प्रशासन के आला अफसर पाक साफ बच निकलना चाहते हैं. यही वह पेंच है जो बता रहा है कि सरकार के दुलारे यह आला अफसर खुद से ही चुप्पी साधे थे या इसके पीछे कोई वजह थी. अखिलेश सरकार ऐसे आरोपों के राजनीतिक जवाब तो दे सकती है, पर उन तथ्यों का क्या करेगी, जो किसी जिन्न की तरह एक एक कर बाहर आ रहे है.

समाजवादी पार्टी और रामवृक्ष यादव के संबंधों को नकारना सरल नहीं है. भारतीय जनता पार्टी सहित सभी विरोधी दल प्रदेश सरकार के आला अफसरों की चुप्पी की वजह राजनीतिक दबाव को मान रहे हैं. यही वजह है कि मथुरा प्रकरण में सीबीआई जांच की मांग उठ रही है. उत्तर प्रदेश सरकार अभी भले ही सीबीआई जांच को तैयार न हो रही हो, पर देर सबेर उसे सीबीआई या एसआईटी जैसी जांच का फैसला करना ही पडेगा. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सामने है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छवि को जवाहरबाग कांड से जबरदस्त धक्का लगा है.

स्वाधीन भारत सुभाष सेना ने मध्य प्रदेश के सागर जिले से 14 जनवरी 2014 को मकर संक्राति के दिने अपनी जनजागरण यात्रा शुरू की. 14 मार्च को मथुरा हाइवे स्थित बाबा जयगुरूदेव पेट्रोल पंप पर मारपीट करने के बाद 15 मार्च 2014 को रामवृक्ष यादव ने बिना अनुमति के मथुरा जवाहर बाग जिला राजकीय उद्यान पर कब्जा किया. जवाहर बाग रिजर्व पुलिस लाइन, जज कालोनी और एसपी आफिस के बीच बसी जगह थी. जवाहर बाग अवैध कब्जे को लेकर जिला प्रशासन ने प्रमुख सचिव गृह को 16 बार पत्र लिखा. 2 फरवरी 2016 को कमीशनर प्रदीप भटनागर ने मुख्य सचिव आलोक रंजन को पूरे मामले की जानकारी देते हुये अवैध कब्जा हटाने के लिये पुलिस बल की मांग की गई. 18 अप्रैल को डीएम राजेश कुमार ने प्रमुख सचिव गृह को पत्र लिखा. उद्यान विभाग ने 96 नोटिस दिये. 10 बार जिला प्रशासन और सत्याग्रहियों के साथ बातचीत हुई. इंटेलिजेंस विभाग 2014 से लगातार अपनी रिपोर्ट भेज रहा था. 200 पन्नों की महत्वपूर्ण रिपोर्ट को नजर अंदाज किया गया.

उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी साफ तौर पर कहते हैं ‘बिना प्रदेश सरकार की शह के किसी का भी इस तरह 2 साल तक सरकारी संपत्ति पर कब्जा करना संभव ही नहीं, नामुमकिन है. रामवृक्ष यादव के खिलाफ तमाम मुकदमे कायम थे, जिनकी प्रवृत्ति आंदोलनकारी न होकर आपराधिक थी. इसके बाद भी उसे लगातार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लोकतांत्रिक सेनानी पेंशन का दिया जाना गंभीर चूक की निशानी है. बाबा जय गुरूदेव के उत्तराधिकार की लडाई में भी रामवृक्ष यादव और पंकज यादव के बीच विवाद था. दोनो ही पक्षों को समाजवादी पार्टी के नेता का संरक्षण मिल रहा था. यह बात मथुरा का बच्चा बच्चा जानता है. हमारी मांग है कि पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई या कोर्ट की मॉनिटरिंग में एसआईटी द्वारा की जाये. तभी यह सच सामने आयेगा. जवाहर बाग प्रदेश का सबसे बडा नरसंहार है. इसमें मारे गये सभी दोषी नहीं थे. यह भोले भाले बरगलाये हुये लोग थे, जिनको समझा बुझाकर बचाया जा सकता था.’ 

…तो यहां के लोगों ने फोकट के पैसों को कहा ‘नो’

स्विट्जरलैंड के देशवासियों ने देश के हर नागरिक को जीवनयापन के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है. दुनिया में पहली बार है ऐसे किसी प्रस्ताव को किसी देश ने अपने नागरिकों के बीच रखा था. इस प्रस्ताव में लोगों से पूछा गया था कि क्या वे देश के नागरिकों के लिए एक तय इनकम के प्रावधान का समर्थन करते हैं या नहीं? इन नागरिकों में वे लोग भी शामिल थे, जो स्विट्जरलैंड में पांच साल से ज्यादा लंबे समय से बतौर कानूनी निवासी के तौर पर रह रहे हैं.

क्षेत्रीय वोटिंग सेवा के मुताबिक, शनिवार सुबह 10 बजे शुरू हुई इस वोटिंग को दोपहर तक चलना था, लेकिन यह शाम तक चली. जिनीवा में 47.4% लोगों ने वोटिंग की. इस प्रस्ताव पर स्विस सरकार और देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने लोगों से इसके विरोध में वोटिंग करने का अनुरोध किया था. ताजा नतीजों में लोगों ने जमकर इसके खिलाफ वोटिंग की और इसे सिरे से खारिज कर दिया.

बेसिक इन्कम (यूबीआई) के समर्थकों का कहना था कि आज के समय में जब जॉब ढूंढ़ना मुश्किल है, इस तरह की आय से देश को गरीबी और गैरबराबरी से लड़ने में मदद मिलेगी.

प्रस्ताव मंजूर होने पर लोगों को कितनी धनराशि तय बेसिक इनकम के तौर पर दी जाएगी, यह तय नहीं था. लेकिन इस पूरे कार्यक्रम के पीछे काम करने वाले संगठन ने यह इन्कम 2500 स्विस फ्रैंक्स (करीब 1,71,100 रुपए) और बच्चों के लिए 625 स्विस फ्रैंक्स (42,775 रुपए) प्रतिमाह निर्धारित करने की मांग की थी.

विरोधियों ने इस प्रस्ताव को एक 'मार्क्सवादी सपना' करार दिया था. उन्होंने प्रस्ताव के मंजूर होने पर कीमतों में बेतहाशा वृद्धि और बड़ी तादाद में लोगों के जॉब छोड़ने की आशंका जताई थी. वहीं, इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना था कि लोग प्राकृतिक तौर पर एक तय बेसिक इनकम चाहते हैं, जिससे वे अपने मनपसंद का काम कर सकेंगे.

वोटिंग से पहले इस प्रस्ताव के मुख्य प्रचारकों में से एक राल्फ कंडिग ने एएफपी से बातचीत में कहा था, 'सदियों से बेसिक इन्कम के इस कॉन्सेप्ट को एक आदर्श के तौर पर देखा गया है, लेकिन आज के समय में न सिर्फ यह संभव है बल्कि बेहद जरूरी भी है.'

लेटनाइट पार्टी का जम कर लें मजा

‘4 बज गए, लेकिन पार्टी अभी बाकी है…’ हनी सिंह का गाया यह गाना पार्टियों में न चले और युवा इस पर न थिरकें ऐसा हो ही नहीं सकता. खासकर लेटनाइट पार्टीज में तो यह गाना युवाओं की जान है.

मौडर्न युग में लेटनाइट पार्टीज युवाओं के लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा बनती जा रही हैं और हों भी क्यों न, तनाव भरी लाइफ में कुछ पल सुकून से गुजारने के लिए लेटनाइट पार्टीज ऐंजौयमैंट का बैस्ट जरिया जो हैं. जहां डांस, मस्ती, गेम्स व दोस्तों के साथ लाइफ का मजा लेने का चांस मिलता है, वहां कोई रोकनेटोकने वाला नहीं होता. तो फिर क्यों न लिया जाए ऐसी पार्टीज का मजा? कुछ युवाओं की भी लेटनाइट पार्टीज के बारे में ऐसी ही राय है

दिल्ली की रहने वाली रुचि सिंह का कहना है कि वह तो लेटनाइट पार्टीज में खूब ऐंजौय करती है. इस तरह की पार्टियों में हर तरह के लोग होते हैं. जहां आप ऐंजौय करने के साथसाथ अपनी पसंद को ध्यान में रख कर दोस्त भी बना सकते हैं.

जबकि नेहा के अनुसार आप लेटनाइट पार्टीज में जम कर मस्ती करने के कारण खुद को काफी फ्रैश भी फील करते हैं. सुमित भी लेटनाइट पार्टीज को ले कर बहुत उत्साहित रहता है. वह कहता है कि जवानी चार दिन की होती है. इसलिए इस का खुल कर मजा लेना चाहिए. जो ऐसा सोचते हैं कि लेटनाइट पार्टीज में जाने वाले लोग गलत होते हैं व ऐसी पार्टियों में दुर्घटनाएं भी ज्यादा घटित होती हैं तो उन की ऐसी सोच गलत है. दुर्घटना तो कभी भी व कहीं भी घटित हो सकती है.

ड्रैसेज

जब भी आप लेटनाइट पार्टी में जाएं अपनी ड्रैस का खास ध्यान रखें. ऐसी ड्रैस न पहनें जिस से अंगप्रदर्शन हो वरना आप के साथ छेड़खानी हो सकती है. जरूरी नहीं कि आप शौर्ट ड्रैस में ही स्टाइलिश लग सकती हैं बल्कि जींस, कैपरी, प्लाजो के साथ क्रौप टौप और हैमर भी काफी फैशन में हैं जिन में आप खुद को बोल्ड व हौट लुक दे सकती हैं.

मेकअप

लेटनाइट पार्टी में आप का मेकअप ऐसा हो जो आप के रूप को रात में और निखारे. ऐसे में ग्लिटरी व शिमरी मेकअप करें. बेस वाटरपू्रफ ही रखें. आई मेकअप पर ज्यादा ध्यान दें. लिपस्टिक के शेड्स का चुनाव अपनी ड्रैस के अनुसार ही करें. आइज और लिप्स में से किसी एक का मेकअप लाइट रखें.

फुटवेयर

फुटवेयर का चुनाव ऐसा करें जो कंफर्टेबल होने के साथसाथ स्टाइलिश भी हो. इस के लिए आप प्लेटफौर्म हील वाली सैंडिल का चुनाव कर सकती हैं.

लेटनाइट पार्टी के लिए अगर आप इन सब बातों पर गौर करेंगी तो पार्टी का भरपूर मजा ले सकेंगी. जिंदगी न मिलेगी दोबारा इसलिए हर पल को ऐंजौय करें. लेटनाइट पार्टीज को बेहतर बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण टिप्स

– अगर आप लेटनाइट पार्टीज को और बेहतर बनाना चाहते हैं तो कुछ खास बातों का खयाल रखें, जिस से पार्टी का मजा दोगुना हो जाएगा.

– अगर आप लेटनाइट पार्टी और्गेनाइज कर रहे हैं तो शैड्यूल बना कर चलें, जैसे 11-12 डांस, 12-3 स्नैक्स व ऐसे ही गेम्स, मस्ती के लिए शैड्यूल सैट कर लें, जिस से आप अच्छे से ऐंजौय कर पाएंगे.

द्य स्नैक्स व खाने का प्रौपर अरेंजमैंट करें.

– फुलनाइट ऐंजौय करें. इस से देर रात को ट्रैवलिंग के झंझट से भी छुटकारा मिलेगा.

– अगर आप पार्टी और्गेनाइजर हैं तो सिर्फ फ्रैंड्स को ही पार्टी में इनवाइट करें, अनजान लोगों को नहीं. इस से किसी अनहोनी की आशंका नहीं रहेगी.

– किसी भी फ्रैंड से कोई भी काम जबरदस्ती न करवाएं, क्योंकि इस से माहौल खराब होने का डर रहता है.

– ध्यान रखें कि लेटनाइट पार्टी की जगह घर से ज्यादा दूरी पर न हो.

– पेरैंट्स को पार्टी के बारे में पूरी जानकारी दें जैसे पार्टी की जगह, पार्टी में कौनकौन फ्रैंड्स आ रहे हैं व उन का फोन नंबर भी दें ताकि जरूरत पड़ने पर आप के पेरैंट्स आप की मदद कर पाएं.

– जहां पार्टी कर रहे हैं उस जगह की जानकारी पहले से ही एकत्रित कर लें.

– पार्टी के दौरान अपनी कीमती चीजों जैसे पर्स, वौच, मोबाइल आदि का ध्यान रखें. अगर वे पार्टी के समय खो गईं तो न केवल पार्टी का मजा किरकिरा होगा बल्कि आप का मूड भी औफ हो जाए

जानवरों में भगवान देखने का खामियाजा

धर्म की नगरी काशी ऐसी जगह है जहां जानवरों में भी भगवान बसते हैं. वैसे तो हर मनुष्य में भगवान बसते हैं, ऐसा धर्मगुरुओं का कहना है. पर जब एक आदमी दूसरे आदमी की हत्या करता है तब उसे भगवान क्यों  नजर नहीं आते. वहीं पशुओं में भगवान का रूप देख कर हर हिंदू उन्हें मारने से बचता है. भले ही वे जानवर इनसानों को मारने या क्षति पहुंचाने में कोताही न बरतते हों मगर हिंदू बरतते हैं. इसी का कुपरिणाम है कि ऐसे जानवरों का उपद्रव बढ़ता जा रहा है. मंदिरों के शहर काशी में भले ही मेहनत से कुछ न मिले पर धर्म के नाम पर अच्छी कमाई हो जाती है. कुछ नहीं तो एक मरे हुए बंदर को सड़क पर रख दीजिए. फिर देखिए आननफानन में सैकड़ों रुपए उस बंदर की अंत्येष्टि के नाम पर जमा हो जाएंगे. फिर कीजिए न ऐश, कौन देखता है?

जानवरों में भगवान देखने का ही नतीजा है कि यहां ऐसे जानवरों की भरमार हो गई है, जो आएदिन इनसानों को मारते या काटते रहते हैं. जैसे बंदरों को ही लें. ये हर धर्मस्थलों पर बेखौफ घूमते हैं. अब भला किस में हिम्मत है, जो इन्हें मारने की जुरअत करे?

इनसानों से ज्यादा जानवरों को अहमियत

आज काशी में बंदरों की संख्या जिस तरीके से बढ़ गई है, उस से आम आदमी का जीना हराम हो गया है. समूह में रहने वाले ये बंदर मनुष्यों द्वारा काटे गए जंगलों से भाग कर शहरों में आ धमकते हैं और खानेपीने के सामानों के लिए इनसानों पर आएदिन हमला करते हैं. उस पर तुर्रा यह कि कोई इन्हें मार नहीं सकता. मारने का लाइसैंस लिया जा सकता है, तो भी रुद्रावतार हनुमान के वंशज को मार कर कोई पाप का भागीदार नहीं बनना चाहता. एक अध्यापक महोदय ने कुछ बंदरों को गोली मार दी. यह समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया. धर्मभीरु जनता के लिए यह महापाप था, इसलिए स्थानीय पार्षद की अगुआई में लोग थाने के बाहर धरनाप्रदर्शन करने लगे. फिर जब उस अध्यापक महोदय के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, तब लोगों ने चैन की सांस ली. इनसानों से ज्यादा जानवरों और पत्थरों को अहमियत देने वाले समाज से इस से बेहतर और कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती.

काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के कई बंदरों को मधुमेह था, जिस के चलते वे चिड़चिड़े हो गए थे. मधुमेह होने का कारण, दर्शनार्थियों द्वारा इन्हें खिलाए जाने वाला प्रसाद यानी पेड़ा था. इन की वजह से आसपास के लोगों का जीना हराम हो गया था. जनता की परेशानियों को देखते हुए नगर निगम ने मथुरा से इन्हें पकड़ने के लिए एक खास टीम बुलवाई. टीम द्वारा लगभग 200 से ज्यादा बंदरों को पकड़ कर करीब के जंगल में छोड़ दिया गया. तब जड़बुद्धि धर्मभीरु इस का विरोध करने लगे. विरोध का कारण यह था कि रुद्रावतार हनुमान के वंशजों को कैसे जिलाबदर किया जा रहा है? जब विरोध कुछ ज्यादा हो गया, तो धर्म के नाम पर प्रशासन ने आखिर में पकड़े गए 75 बंदरों को वाराणसी में ही छोड़ दिया.

कुत्तों की आबादी भी दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. दिन में तो लोग किसी तरह चलफिर लेते हैं मगर जब शाम ढल कर अंधेरे का रूप लेती है, तब इन का आतंक देखते ही बनता है. हाल ही में एक 10 वर्षीय लड़के को कुत्तों की एक फौज ने घेर करनोच डाला. काशी में इन्हें विशेष दर्जा प्राप्त है, क्योंकि ये काशी के धार्मिक कोतवाल कालभैरव की सवारी हैं. आज भी काशी में जब कोई नया कोतवाल आता है, तो सब से पहले इन्हीं का आशीर्वाद लेने जाता है. आशीर्वाद से क्या मिलता है यह तो वही बता सकते हैं, मगर कहीं न कहीं इस से यही जाहिर होता है कि हम में आत्मविश्वास की कमी है. अब जरा सोचिए जब कोतवाल की सवारी कुत्ता हो तो उसे कौन छेड़ सकता है? जड़बुद्धि धार्मिक लोग कुत्तों की फौज को बिस्कुट खिलाने में गर्व महसूस करते हैं. इस तरह से वे इन जानवरों को अपने वश में कर लेते हैं, जो उन के इशारे पर किसी पर भी टूट पड़ते हैं. इन के लिए कुत्ता आतंक का सुरक्षा कवच होता है, जिसे वे अपने दुश्मनों के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं. कालभैरव का ही एक रूप है बटुकभैरव. इन के मंदिर में कुत्तों की फौज ऐसे टहलती है मानों किसी के रिसैप्शन में आई हों. कहीं भी किसी भी जगह ये मंदिर में बैठ सकते हैं कोई मनाही नहीं है.

गली गली में घूमते हैं सांड

इस के अलावा सांड़ काशी की पहचान हैं ऐसा प्रबुद्ध लोगों का कहना है. स्मार्ट सिटी बनने की राह में क्या इन्हें भी सरकार स्मार्ट बनाएगी? लेकिन बनाएगी कैसे? काशी में सांड़ों के बढ़ने का कारण है अंधविश्वास. लोग मनौती पूरी होने पर सांड़ को काशी में छोड़ देते हैं.

एक और कारण यह है कि अब बैलगाड़ी का प्रयोग कम हो गया है, जिस की वजह से इन की संख्या काशी में बढ़ गई है. जगहजगह इन की फौज बड़े ही इतमीनान से घूमती नजर आती है. चाहे बड़े से बड़ा वीआईपी आ जाए, इन पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं. उलटे धर्म के नाम पर इन्हें हर कोई पूजता है. मस्ती का आलम यह है कि जब भी बाहर के व्यस्त इलाकों में 2 सांड़ों में युद्ध छिड़ जाए, तो उन्हें रोकने कोई नहीं आएगा. उलटे हर कोई उन की लड़ाई का आनंद ले कर अपने भद्र शौक पर गर्व करेगा. शोर ऐसे मचाएंगे मानों स्पेन में रह रहे हों. शोर सुन कर सांड़ और भी उद्दंड हो जाता है और उस की उद्दंडता लोगों के मनोरंजन का साधन बन जाती है. पुलिस भी मजा लेती है. धर्मगुरुओं के अनुसार सांड़ शिव की सवारी है. विश्वनाथ मंदिर में सांड़ यानी नंदी की भी एक पाषाण प्रतिमा है जिस पर धर्मभीरु जनता अपना सिर नवाती है. सांड़ में शिव का अंश है इसलिए कोई सांड़ को नहीं मारता. वहीं आएदिन सांड़ कहीं न कहीं लोगों को पटकते रहते हैं.

वहीं चूहे गणेश की सवारी कहा जाता है. यहां चूहे को भी कोई नहीं मारता. अधिक से अधिक चूहेदानी में पकड़ कर दूर कहीं छोड़ देंगे. बनारस के कैंट स्टेशन पर इतने बड़ेबड़े चूहे हैं, जिन्हें देख कर बिल्ली भी भाग जाए. अब सांप को ही लें. सांप के बारे में यह धारणा है कि पूर्व जन्म में सांप के ही मारने की वजह से कालसर्प योग होता है. इसलिए सांप भले ही काट ले मगर कालसर्प योग के डर से लोग सांप मारने से गुरेज करते हैं. उलटे नागपंचमी के दिन सांपों की पूजा करते हैं.

माता पिता से बढ़ कर नहीं

इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक तरफ जहां बुजुर्ग, अपंग, अशक्त लोगों के प्रति हमारा नजरिया बेगानों जैसा होता है, वहीं गाय को मां मान कर उस के लिए मरनेमारने तक के लिए उतारू हो जाते हैं. क्या उस मां के बारे में भी सोचेंगे, जो 9 माह गर्भ में रख कर पालतीपोसती है. शिशु के लिए रातरात भर जागती है. होता तो यही है कि बुढ़ापे में उसी मां को हम दरदर की ठोकरें खाने के लिए विवश कर देते हैं. इस तरह से तो मच्छरों को भी मारा नहीं जा सकता, क्योंकि उन में भी भगवान बसते हैं. सूअर स्वाइन फ्लू नामक बीमारी फैलाते हैं. हमारे धर्मग्रंथों में एक देवता वराहमिहिर का उल्लेख है, जिस की शक्ल सूअर जैसी थी. लोग क्यों नहीं सूअरों के साथ बंदरों जैसा व्यवहार करते? क्या वे पूजनीय नहीं? उलटे कुछ लोग सूअर का मांस खाते हैं.

गधा मां शीतला देवी की सवारी है. इस के साथ भी उचित व्यवहार किया जाना चाहिए. मेरे हिसाब से गधा सब से शांतिप्रिय जानवर है. जीने का अधिकार सभी को है मगर एकदूसरे को क्षति पहुंचा कर नहीं. यदि कोई जानवर इनसानों के लिए खतरा बनता है, तो उसे जान से मारने का कानूनी अधिकार सभी को मिलना चाहिए. जानवरों को धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. हम गाय को मां के रूप में लेते हैं, तो उस की देखभाल भी करनी होगी. न कि जब तक दूध दिया सिरमाथे पर लगाया, नहीं तो सड़क पर धर्म का धंधा चमकाने वालों के लिए छोड़ दिया. हम पहले उन इनसानों के बारे में सोचें जो बूढ़े, अशक्त, लाचार और बीमार हैं. इस की शुरुआत अपने मांबाप से की जा सकती है

फ्लिपकार्ट ने किए रिटर्न पॉलिसी में बड़े बदलाव

फ्लिपकार्ट ने ज्यादातर टॉप-सेलिंग प्रॉडक्ट्स के लिए 'रिटर्न पॉलिसी' बदल दी है. पहले वह कस्टमर को ऐसे प्रॉडक्ट्स लौटाने के लिए 30 दिन का समय देती थी, जिसे अब घटाकर 10 दिन कर दिया गया है. कंपनी ने सेलर्स को यह भी बताया है कि 20 जून के बाद उन्हें अधिक कमीशन देना पड़ेगा.

ई-कॉमर्स कंपनियां बिना सवाल पूछे प्रॉडक्ट्स लौटाने का ऑप्शन कस्टमर्स को देती हैं, लेकिन इससे लॉजिस्टिक्स लेवल पर उनकी दिक्कतें बढ़ गई हैं. वहीं, कस्टमर्स के प्रॉडक्ट्स लौटाने से सेलर्स की लागत भी बढ़ती है. इसमें उन्हें रिटर्न शिपिंग का बोझ खुद उठाना पड़ता है. रिटर्न पॉलिसी में बदलाव से फ्लिपकार्ट के सेलर्स की चिंता कुछ हद तक दूर होगी. वहीं, कमीशन बढ़ाने का फैसला मुनाफे में आने के लिए किया गया है.

देश की ज्यादातर टॉप ई-कॉमर्स कंपनियां अब तक मुनाफे में नहीं आ पाई हैं. फ्लिपकार्ट की प्रतिद्वंद्वी एमेजॉन ने भी हाल में कमीशन बढ़ाया था. सेलर्स का कहना है कि फ्लिपकार्ट की रिवाइज्ड पॉलिसी के चलते उसके प्लेटफॉर्म पर सामान के दाम में 9% के करीब बढ़ोतरी हो सकती है. नई रिटर्न पॉलिसी इलेक्ट्रॉनिक्स, बुक्स और मोबाइल फोन जैसी कैटेगरी पर लागू होगी. फ्लिपकार्ट की सेल्स में इन सेगमेंट्स की बड़ी हिस्सेदारी है. 30 दिन की रिटर्न पॉलिसी सिर्फ कपड़ों, फुटवियर, वॉचेज एंड आईवियर, ज्वैलरी, फैशन एक्सेसरीज और बड़े अप्लायंसेज के लिए रहेगी.

इस दिग्गज ने एक ही पारी में बना डाले 501 रन

जिस ज़माने में टी20 क्रिकेट का कोई ज़िक्र भी नहीं करता था उस दौर में टी20 अंदाज़ में क्रिकेट के इस दिग्ग्ज ने नाबाद 501 रन बनाकर क्रिकेट में सनसनी फैला दी थी.

साल 1994, 06 जून, जी हां आज ही की तारीख पर 22 साल पहले क्रिकेट के दिग्गज ब्रायन लारा ने काउंटी क्रिकेट में विस्फोटक अंदाज़ में 501 रन बनाकर खुद को क्रिकेट जगत की नई खोज साबित कर दिया था.

काउंटी क्रिकेट में वार्किशायर के लिए खेलते हुए लारा ने 12 और 18 रन के योग पर मिले जीवनदान का फायदा उठाते हुए महज़ 427 गेंदों पर 117 के स्ट्राईक रेट से नाबाद 501 रन बना दिए थे. अपनी इस पारी में लारा ने 62 चौके और 10 छक्के लगाए थे.

डरहम के साथ खेला गया ये मैच ड्रॉ पर खत्म हुआ, जिसमें डरहम की टीम ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने का फैसला किया और जॉन मोरिस के दोहरे शतक की मदद से 556 रन बनाए. जिसके जवाब में लारा की 501 रनों की नाबाद पारी की मदद से वार्किशायर ने 810 रन बना डाले.

लारा ने टेस्ट क्रिकेट करियर में 34 शतक और 48 अर्धशतकों की मदद से 11953 रन बनाए, जबकि वनडे में 19 शतक और 63 अर्धशतकों की मदद से 10405 रन बनाए.

पेनड्राइव से डिलीट हुई फाइल्स को यूं करें रिकवर

अक्सर डाटा ट्रांसफर करने के लिए लोग Pendrive का इस्तेमाल करते हैं. या फिर किसी के स्मार्टफोन में डाटा ज्यादा हो जाता है, तो आमतौर पर लोग उस डाटा को फोन से निकाल कर Pendrive में सेफ रख देते हैं. पर तब क्या हो जब गलती से ही सही, लेकिन Pendrive का डाटा डिलीट हो जाए. क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है? अगर हां, तो चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है. अब आपकी Pendrive का डिलीट हुआ सारा डाटा चंद मिनटों में ही रिकवर किया जा सकता है. इसके लिए आपको कुछ स्टेप्स फॉलो करने होंगे.

1.इसके लिए सबसे पहले आपको गूगल प्ले स्टोर पर जाना होगा और Pandora Recovery सॉफ्टवेयर डाउनलोड करन होगा.

2.डाउनलोड करने के बाद इस सॉफ्टवेयर को ओपन करें.

3.अब जो विंडो आपके सामने खुली होगी उसमें आपको नीचे की तरफ दिए गए next ऑप्शन पर टैप करना है. क्लिक करते ही आपके सामने Terms and Condition की विंडो ओपन हो जाएगी.

4.इसके बाद एक बार फिर से आपको next ऑप्शन मिलेगा, उस पर क्लिक कर दें.

5.अब आप Pandora एप किसी भी फोल्डर में इंस्टॉल कर सकते हैं.

6.अपनी पेनड्राइव को कम्प्यूटर या लैपटॉप से कनेक्ट करें. अब सिस्टम में दिख रहे Pandora Recovery सॉफ्टवेयर के आइकन पर क्लिक करें.

7.अब आपको पेनड्राइव का ऑप्शन दिखाई देगा उस पर टैप करें और फिर recovery को सेलेक्ट करें.

8.क्लिक करते ही आपको पेनड्राइव से डिलीट हुई फाइल्स दिखाई देने लगेंगी.

9.इन फाइल्स पर राइट क्लिक करें और recovery को सेलेक्ट करें. अब जहां भी आप इन फाइल्स को सेव करना चाहते हैं उसे सेलेक्ट करें.

10.चंद मिनटों में ही आपकी पेनड्राइव का सारा डाटा सेव हो जाएगा.

सच एअरलाइंस फूड का

हजारों मील का सफर कुछ ही घंटों में तय कर लेना आज के तकनीकी युग की सब से बड़ी देन है. मगर हवाई यात्रा जितनी रोमांचक होती है उतना ही आकर्षक होता है उस में मिलने वाला भोजन. लेकिन कुछ मिथक इस मजेदार खाने की खुशी को कम करते हैं. क्या वास्तव में हवाईजहाज में दिया जाने वाला खाना अच्छा नहीं होता? बड़ेबड़े ऐक्सपर्ट शैफ के द्वारा तैयार किया गया खाना क्या वास्तव में उपयोगी नहीं होता? इस बारे में हम ने एअर इंडिया के कैबिन कू्र अशोक संधू से बात की, जो पिछले 25 सालों से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आइए, जानें क्या कहना है उन का इस बारे में:

हवाईजहाज का भोजन जमा होता है और घंटों बाद पुन: गरम किया जाता है?

हवाईजहाज का खाना वास्तव में जमा होता है. उसे फिर से गरम कर सर्व किया जाता है. भारत से अमेरिका पहुंचने में एक उड़ान को 16-17 घंटे लगते हैं. इस में कई बार कुछ उड़ानें बीच में 7-8 घंटे हौल्ट करती हैं. उड़ान के दौरान यात्रियों को रात या दिन का खाना देना पड़ता है. यह खाना उस स्थान के समय के हिसाब से दिया जाता है. कुछ फूड फ्रोजन होते हैं, जिन्हें हलका गरम कर सर्व किया जाता है. सलाद या सैंडविच अकसर उसी वक्त तैयार किए जाते हैं. यह कहना गलत होगा कि फ्रोजन फूड का स्वाद या रंग अच्छा नहीं होता. फ्रोजन फूड लैब में परीक्षण के बाद सही तापमान में पैक किया जाता है ताकि उस की गुणवत्ता और स्वाद बना रहे. भारत से उड़ान भरने पर उस में अधिकतर यहां के लोग होते हैं, जो मसालेदार खाने के आदी होते हैं, ऐसे में उन्हें जहाज में मसालेदार भोजन मिले, यह कोशिश भी की जाती है.

सारा खाना अलगअलग स्थानों पर फ्लाइट किचन से उड़ान भरने से कुछ समय पहले इकट्ठा किया जाता है. अगर सीफूड या नौनवैज है, तो उसे भी सही तरह से पका कर पैक किया जाता है ताकि उस में बैक्टीरिया पैदा न हो. खाने की गुणवत्ता की जांच फ्लाइट के पहुंचने पर फिर से की जाती है. यही वजह है कि आज तक कोई शिकायत नहीं आई. ताज फ्लाइट किचन, ओबेराय फ्लाइट किचन, ऐंबैसेडर फ्लाइट किचन आदि कई बड़ेबड़े होटलों में फ्लाइट किचन होती हैं, जो हजारों मील दूर खाना परोसती हैं. इतनी दूर, इतनी ऊंचाई पर भी 3 दिन के बाद भी वही न्यूट्रीशनल वैल्यू, कैलोरीज, विटामिन, प्रोटीन आदि सब की पूरीपूरी गारंटी होती है. बचे खाने को स्क्रैपयार्ड में भेजा जाता है. केवल बटर चिपलेट्स, अचार, ब्रैड रोल्स, जैम, मार्मालेड आदि जो खराब नहीं होते, उन्हें चैरिटी में डाला जाता है.

बिजनैस और प्रथम श्रेणी के यात्रियों को अच्छा खाना मिलता है?

यह सही है कि वे अधिक पैसा देते हैं, तो उन्हें अच्छी चौइस मिलती है. मगर खाना सभी को उत्तम क्वालिटी की ही दिया जाता है. कई बार ऐसा भी होता है कि बिजनैस क्लास में सफर करने वाले अधिक यात्री शाकाहारी व्यंजन मांगते हैं. ऐसे में उन्हें इकोनौमी क्लास से ला कर भोजन देना पड़ता है. कई बार तो वे खुद मांग कर भी खाते हैं. अधिकतर गुजराती या जैनी लोग पनीर पसंद करते हैं और वे वैसा ही खाना मांगते हैं. वे खुद चल कर इकोनौमी क्लास के खाने को देखते हैं. आमतौर पर विदेशी विमानों खासकर टर्किस एअरलाइंस, स्विस एअरलाइंस में अच्छा भोजन दिया जाता है. स्विस एअरलाइंस में अकसर यात्रा करने वाली रेशमा बताती हैं कि वे जब भी अमेरिका से भारत आती हैं, तो स्विस एअरलाइंस में ही यात्रा करती हैं. इस की वजह है अच्छा खाना मिलना. लेकिन वहां से आते वक्त विदेशी खाना मिलता है और यहां से जाते वक्त भारतीय खाना. लेकिन दोनों ही तरफ के खाने की क्वालिटी अच्छी होती है.

कुछ एअरवेज ऐसी भी हैं, जो कुछ अधिक पैसा, इकोनौमी क्लास में बिजनैस क्लास का खाना देने के लिए मांगती हैं, जो करीब 15 डौलर तक होता है. एअर फ्रांस, केएलएम, औस्ट्रियन एअरलाइंस, ब्रिटिश एअरवेज आदि उन्हीं में शामिल हैं.

कुछ फूड को एअरलाइंस में नहीं परोसा जाना चाहिए. पर एअरलाइंस हमेशा सर्व करती हैं?

पोर्क मीट, चिकन आदि को पहले से पका कर फिर फ्रीज किया जाता है. अच्छी तरह मैरिनेट करने के बाद ही अधिकतर मांसाहारी व्यंजन पकाए जाते हैं ताकि उन का स्वाद, रंग और गुणवत्ता बनी रहे. अधिकतर नौनवैज आइटम बोनलैस होते हैं, इसलिए जल्दी खराब नहीं होते. यहां इतना कहना सही होगा कि 30 से 35 हजार फुट की ऊंचाई पर भी कोई भोज्यपदार्थ अपना स्वाद न खोए, इस का पूरापूरा ध्यान रखा जाता है. शैफ भी उसी भोजन को अपने मैन्यू में शामिल करते हैं, जो जल्दी खराब न हो.

फास्ट फूड एअरलाइंस में सर्व किए जाने वाले भोजन से बेहतर है?

एअरलाइंस में उड़ान भरने से पहले उस के फूड, साफसफाई, एअरफ्रैशनैस आदि की चैकिंग की जाती है. बर्गर, फ्रैंचफ्राइज चाइल्ड मील, स्पैशल मील, लोकार्ब, सी फूड आदि सभी की गुणवत्ता का सर्टिफिकेट कैटरर से लिया जाता है. यह सही है कि कम समय की उड़ान पर खाना अधिकतर स्नैक्स होता है, जबकि लंबी उड़ान पर भोजन की वैराइटी अधिक होती है. यूरोप से आते वक्त खाना वहां के अनुसार होता है. यह कहना गलत होगा कि फास्ट फूड हवाई यात्रा के खाने से अच्छा होता है. नाइट फ्लाइट में तो कैबिन कू्र यात्रियों की जरूरत का बहुत ही ध्यान रखते हैं.

एअरलाइंस का भोजन रिलैक्स होने के लिए या फिर सो जाने के हिसाब से तैयार किया जाता है?

ऐसा कभी नहीं हो सकता. दरअसल, लंबी दूरी की उड़ान में अधिक समय तक आकाश में रहना पड़ता है. वहां एअरप्रैशर कम होता है, जिस से औक्सीजन कम मिलती है, जिस से लोग स्लीपी फील करते हैं या फिर थकान महसूस करते हैं. ऐसे में कई बार लोग ग्रीन टी पी कर सो जाते हैं. यह कहना गलत होगा कि भोजन में कुछ ऐसा होता है, क्योंकि अधिकतर उम्रदराज लोग ही सोते हैं, जबकि छोटे बच्चे या टीनऐजर्स जर्नी को ऐंजौय करते हैं. उड़ान में सर्व किया जाने वाला ड्रिंक या भोजन सौ फीसदी जांचपरख के बाद ही यात्रियों को दिया जाता है.

कनिका कपूर की निजी जिंदगी का उनके संगीत पर असर

संगीत महज तालीम से नहीं निखरता है. बल्कि संगीत, खासकर गायन में निखार उस गायक की निजी जिंदगी के अनुभवों, उतार चढ़ाव, उसकी अपनी भावनाओं से ही निखरता है. यह एक कड़वा सच है और इसका ताजातरीन उदाहरण  बौलीवुड की चर्चित गायिक कनिका कपूर हैं.

मूलतः उत्तर प्रदेश में लखनऊ के खत्री पंजाबी परिवार में जन्मी कनिका कपूर ने पं.गणेश प्रसाद मिश्रा के अलावा ‘‘भातखंडे संगीत विश्व विद्यालय’ से क्लासिकल संगीत की ट्रेनिंग हासिल की. ग्यारह बारह साल की उम्र से स्टेज शो में गाना शुरू कर दिया था. कनिका कपूर ने अनूप जलोटा के संग स्टेज पर कई भजन भी गाए. पर 1997 में महज अठारह साल की उम्र में अप्रवासी भारतीय व्यापारी राज चंडोक के साथ विवाह रचाकर वह संगीत को हमेशा के लिए तिलांजली देकर लंदन चली गई. लंदन में वह अपने वैवाहिक जीवन में खुश थी. पर तीन बच्चों कीं मां बनते ही उनके जीवन में तूफान आ गया और पति से अलगाव हो गया. अब सिंगल मदर की हैसियत से तीनों बच्चों की परवरिश कनिका कपूर के कंधों पर आ पड़ी. तब कनिका कपूर को अपनी क्लासिकल संगीत की तालीम याद आयी. मुंबई आकर उन्होंने संगीत के क्षेत्र में करियर बनाने के प्रयास शुरू किए.

फिर 2012 उनकी जिंदगी में सुख और दुःख दोनो एक साथ लेकर आया. 2012 में उनका पति से कानून तलाक हुआ, तो वहीं उनका पहला प्रायवेट अलबम ‘जुगनी’ के अलावा फिल्म ‘रागिनी एमएमएएस 2’ में उनका स्वरबद्ध गीत ‘बेबी डॉल’ हिट हुआ और वह रातों रात स्टार बन गयी. उसके बाद से संगीत क्षेत्र में उन्हे पीछे मुड़कर देखने की जरुरत महसूस नहीं हुई.

अब कनिका कपूर लंदन और मुंबई के बीच लगातार यात्राएं करती रहती हैं. उनके बच्चे लंदन में रह रहे हैं और वह मुंबई में संगीत के क्षेत्र में कार्यरत हैं. कनिका का मानना है कि उनकी जिंदगी में आए उतार चढ़ाव ने उनके संगीत पर भी असर डाला.

‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास बातचीत करते हुए कनिका कपूर ने कहा- ‘‘इंसान की जिंदगी के उतार चढ़ाव का उसके संगीत पर बहुत असर पड़ता है. जब मैं 18 साल की थी, तब मैं अपना संगीत का अलबम बनाने की कोशिश कर रही थी. उस वक्त मेरी आवाज में वह ठहराव या वह ‘सोल’/आत्मा नहीं थी, जो आज है. धीरे धीरे जैसे ही मेरी यात्रा आगे बढ़ी है, मेरे संगीत में ठहराव आ गया. देखिए,इंसान जब निजी जिंदगी में दुःख दर्द सहता है, तो उसकी अपनी भावनाएं जागृत होती हैं, जो कि कहीं न कहीं उसके गायन व संगीत में नजर आती हैं.’’

कनिका कपूर के अंदर काफी मैच्योरिटी आ चुकी है. वह तो ईश्वर का शुक्रिया अदा करती हैं कि उन्हें कम उम्र में ही सुख और दुःख दोनो अनुभव हो गए. वह सोशल मीडिया पर दुःख का रोना रोने की बजाय अच्छी बाते करना पसंद करती हैं. खुद कनिका कपूर ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बातचीत करते हुए कहा- ‘‘मैं सोशल मीडिया पर जीवन के प्रति संदेश देने के मकसद से कुछ लिखती रहती हूं. मैं हमेशा अच्छी बाते ही लिखती हूं. मैं अपनी यात्रा के बारे में लिखती हूं. अपने पहनावे के बारे में लिखती हूं. मैं सोशल मीडिया पर मटेरियलिस्टिक चीजें ही पोस्ट करती हूं. मेरी जिंदगी मिश्रण हैं. मैं कभी यह नहीं कहूंगी कि मेरी जिंदगी  मटेरियालिस्टिक नही है. मुझे लगता है कि हर इंसान मटेरियालिस्टिक होता है.’’

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