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अब दूध के खाली पाउच बनेंगे कमाई का जरिया

बिहार में रहने वाले सुधा दूध के उपभोक्ताओं के लिए खुशखबरी है. दूध निकाल लिए जाने के बाद सुधा का पाउच अब तक डस्टबिन की शोभा बढ़ाता है. लेकिन शायद अब यह कमाई का जरिया बन जाए. पर्यावरण संरक्षण को लेकर वन विभाग ने जो नई स्कीम बनाई है उससे यह संभव हो सकता है. ग्राहकों को दूध के दाम में राहत देकर जेब भरने के साथ पर्यावरण की सुरक्षा की भी प्लानिंग है.

क्या है नई स्कीम

इस स्कीम में सुधा दूध के पाउच को डस्टबिन में फेंकने से रोकने के लिए अनूठी योजना तैयार की गई है. इसके तहत सुधा दूध का खाली पाउच वापस दुकान पर लौटाना होगा. इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ बचत भी होगी.इस योजना में एक लीटर वाला खाली पाउच लौटाने पर सुधा दूध के मूल्य में एक रुपये की राहत देने की योजना है.

इसी तरह आधा लीटर का पैकेट लौटाने पर पचास पैसे की राहत दी जाएगी. अगर दूध नहीं लेना हो तो नकद पैसे वापस किए जाएंगे. काम्फैड और वन विभाग दोनों में इस प्रस्ताव पर सहमति बन गई है. अब पाउच पर दो तरह के दाम प्रिंट होंगे. इसमें पाउच लौटाने वाल के लिए अलग दाम और नहीं लौटाने वालों के लिए अलग मूल्य प्रिंट होगा.

पाउच संग्रह की योजना अनूठी

वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान मुख्य संरक्षक डीके शुक्ला ने बताया कि देश में बिहार पहला राज्य बनेगा जो सुधा दूध के पाउच का संग्रह करवायेगा. इसके कई लाभ होंगे. सबसे बड़ा लाभ नगर निगम को मिलेगा क्योंकि नाले प्लास्टिक से जाम हो जाते हैं. खाली पाउच वापस करने पर नियत पैसे वापस हो जाएंगे या दूध लेने पर दाम कम हो जाएगा. खाली दूध पाउच के संग्रहण का जिम्मा दूध लाने वाले वाहन का होगा.

पाउच लौटाने वालों के लिए अलग दाम

सुधा डेयरी बिहार में एक दिन में नौ लाख लीटर दूध का उत्पादन करती है. एक साल में 32.85 करोड़ खाली पॉलीथिन थैलियां निकलती हैं. इस खाली पाउच का वजन एक साल में 14 हजार 122.5 क्विंटल होगा.

शुक्ला ने बताया कि विभाग पौधरोपण के लिए प्रतिवर्ष 200 क्विंटल प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल करता है.अब पौधरोपण में प्लास्टिक इस्तेमाल के लिए कॉम्फेड 200 क्विंटल प्लास्टिक मुफ्त में उपलब्ध कराएगा. शेष बचे 13900 क्विंटल पॉली बैग को रिसाइकिलिंग यूनिट में भेजा जाएगा.प्राप्त राशि को पर्यावरण से संबंधित कार्यों जैसे पौधरोपण, जागरूकता कार्यक्रम आदि में इस्तेमाल किया जाएगा.

‘उड़ता पंजाब’ के विरोध पर क्या बोली आलिया भट्ट

मशहूर फिल्मकार महेश भट्ट की ही तरह उनकी बेटी व अभिनेत्री आलिया भट्ट भी मुंहफट और निडर हैं. इन दिनों वह मादक पदार्थ/ड्रग्स की समस्या से जूझ रहे लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाने के मकसद से बनायी गयी फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ को लेकर चर्चा में हैं. इस फिल्म का कई स्तर पर विरोध किया जा रहा है.

फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ के विरोध को गलत ठहराते हुए हाल ही में आलिया भट्ट ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका के संग एक्सक्लूसिव बात करते हुए कहा-‘‘ड्रग्स का मुद्दा सिर्फ पंजाब के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए अति महत्वपूर्ण मुद्दा है. लोगों के लिए जानना जरुरी है कि हमारे देश या राज्य या विश्व में ड्रग्स का सेवन करने वाले लोग किस तरह की मानसिकता, किस तरह की शारीरिक बीमारी आदि से जूझते हैं. किस तरह वह असमय मौत के मुंह में समा रहे हैं.’’

आलिया भट्ट ने आगे कहा-‘‘मैं भी लोगों से सवाल पूछ रही हूं कि जब ड्रग्स से हर इंसान को सिर्फ नुकसान होता है, तो फिर क्यो लोगो को लग रहा है कि फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ से पंजाब की छवि धूमिल होगी? मेरी राय में ड्रग्स के अवैध कारोबार और ड्रग्स की वजह से इंसान को होने वाले नुकसान का चित्रण करने वाली फिल्म का विरोध होना ही नहीं चाहिए. हमारी फिल्म तो लोगों को सही शिक्षा व सही जानकारी देने का काम करने वाली है. लोगो को तो इस फिल्म का जरुर देखना चाहिए. पर फिल्म का ट्रेलर देखकर जो लोग हमारी फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उससे उनकी नीयत पर ही सवाल उठता है.’’

पंजाब के कुछ राजनीतिक संगठनों के साथ साथ फिल्म अभिनेत्री नीतू चंद्रा ने भी फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ के विरोध में आवाज उठायी है. नीतू चंद्रा ने तो बाकायदा अपना विरोध जताते हुए आलिया भट्ट के नाम सोशल मीडिया पर खुला पत्र भी लिखा है. जब हमने इस तरफ आलिया भट्ट का ध्यान खींचा, तो आलिया भट्ट ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका से नीतू चंद्रा के विरोध को गलत करार देते हुए कहा-‘‘उनका विरोध गलत है. उन्होने फिल्म का ट्रेलर देखकर पता नहीं क्या समझा कि इस तरह विरोध पर उतर आयी हैं. उन्हे पूरी फिल्म देखनी चाहिए. मैं उन्हें इतना ही आश्वस्त कर सकती हूं कि फिल्म के अंदर बिहारियों को कमतर नहीं दिखाया गया है. बिहारियों का अपमान नहीं किया गया है. बिहारियों को किसी भी तरह की ठेस पहुंचाने की हमने कोशिश नहीं की है.

मेरी राय में ट्रेलर देखकर इस तरह की प्रतिक्रिया देना बहुत ही गलत है. उन्हे भी पता है कि ट्रेलर दो मिनट का होता है और फिल्म दो घंटे की होती है. नीतू चंद्रा ने आरोप लगाया है कि फिल्म ‘उड़ता पंजांब’ में बिहारियों को स्टीरीयो टाइप किया है. हमें नहीं लगता कि हमने बिहारियों को स्टीरियो टाइप किया है. फिल्म देखने के बाद यदि उन्हे लगे कि हमने गलत किया है, तो वह अपनी बात को कह सकती हैं.’’

भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास की मृगमरीचिका

हाल ही में 2015 में विश्व के ‘अच्छे देशों’ की एक सूची मीडिया में सामने आयी, जिसमें स्वीडेन 163 देशों की सूची में सबसे अव्वल रहा. अगर टौप दस अच्छे देशों की बात की जाए तो इस सूची में दूसरा स्थान डेनमार्क का रहा. इसके बाद नीदरलैंड, ब्रिटेन, जर्मनी, फिनलैंड, कनाडा, फ्रांस, औस्ट्रिय और न्यूजीलैंड का नाम आया है. यह सूची जैसे ही सामने आयी, देश के नामी-गिरामी अर्थशास्त्रियों से लेकर सरकारी महकमे के मंत्री-संत्री तक भारत का नाम ढूंढ़ने में जुट गए. पता चला सूची में बहुत नीचे भारत का स्थान 70वां दिखाया गया है. बताया जाता है कि इस सूची का निर्माण वर्ल्ड बैंक और राष्ट्रसंघ के 35 विभिन्न पैमाने के आधार पर हुआ है.

अब मोदी सरकार कितना ही दावा करे कि हमारा देश बदल रहा है और आगे बढ़ रहा है. विश्व के अच्छे देशों के सूचकांक ने मोदी सरकार के दावे पर सवालिया निशान लगा ही दिया है. सबका साथ सबका विकास का जहां तक समृद्धि और समानता का सवाल है उसमें भारत का स्थान 163 देशों में 124 वां है. आजकल आर्थिक मामले में बार-बार चीन से भारत की तुलना हो रही है. समग्र रूप से अच्छे देशों के सूचकांक में भारत का स्थान चीन के नीचे ही हैं. लेकिन जहां तक भुखमरी का सवाल है तो 2014-15 वित्त वर्ष में राष्ट्रसंघ की सालाना रिपोर्ट कहती है कि चीन और भारत में भुखमरी बड़ी समस्या है. लेकिन भारत की समस्या चीन की तुलना में जरा बड़ी ही है. विश्व में सबसे अधिक आबादीवाले चीन में जहां 13.38 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं; वहीं विश्व की दूसरी सबसे घनी आबादी वाले भारत में 19.46 करोड़ लोगों को न्यूनतम भोजन नसीब नहीं होता. इसे और भी खुलासा करके कहा जाए तो विश्व के 97.5 करोड़ भुखमरी में जाने वाली आबादी का एक चौथाई भारतीय आबादी हैं. अच्छे देशों की सूची वाले सूचकांक में समानता और विकास के लिहाज से भारत का स्थान 124 वां है. तो यह है मोदी के विकास का कड़वा सच!

मोदी सरकार ने अपनी पहली सालगिरह पर नारा दिया – साल एक-शुरूआत अनेक. फिर नारा दिया – सबका साथ, सबका विकास और मोदी सरकार विकास लगातार. उद्योगपतियों को मोदी सरकार का साथ है, विकास जो कुछ भी हो रहा है वह कारोबारियों का ही हो रहा है – अब यह बात किसीसे छिप नहीं रह गयी है. कांग्रेस के जमाने में ये मामले थोड़े-बहुत दबे-छिपे थे. अब यह ‘सिक्रेट’ नहीं रही और सच्चाई खुल्लमखुल्ला सबके सामने आ गयी है.

बैंकिंग सेक्टर की दुर्दशा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. मोदी राज के दो सालों में सबसे ज्यादा नुकसान बैंकिंग सेक्टर का हुआ है. आज यह बात साबित हो चुकी है. उद्योगपतियों की बदौलत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जबरदस्त घाटे में चल रहे हैं. और बंद होने या विलय होने के कगार में हैं. निजी बैंक की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. वहीं भारी कर्ज लेकर देश की आम जनता को चूना लगाकर एक के बाद एक उद्योगपति अपने आपको दिवालिया घोषित करने में फख्र महसूस कर रहे हैं. माल्या के बाद देश में यह एक नया ट्रेंड चालू हो गया है. नामी-गिरामी उद्योगपति इस होड़ में उतर चुके हैं.

इस साल मोदी सरकार ने दूसरी सालगिरह बड़े धूमधाम से मनाया और इसके तुरंत बाद सरकार ने अपनी पीठ थपथपाते हुए यह एलान किया ‍कि वित्त वर्ष में 2015-16 में देश का आर्थिक वृद्धि का प्रतिशत 7.6 था, लेकिन 2016-17 वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि की दर 7.9 प्रतिशत हो गयी. मोदी सरकार के प्रचारकों ने यह जताने में जरा भी कोताही नहीं की कि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में चीन जैसे विश्व के वृहत्तम अर्थव्यवस्था की आर्थिक वृद्धि की दर 6.7 प्रतिशत था. लब्बोलुआब यह कि भारत ने चीनी अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ दिया और हमारा देश विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था में बनने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है.

हालांकि इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है और यह एक अलग ही तथ्य पेश करता है. दरअसल, वित्त मंत्रालय की ओर से जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का जो ब्यौरा पेश किया है उससे यह साफ हो जाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा जो स्थिति है वह विनिवेश के लिए किसी भी देश का विज्ञापन नहीं हो सकता. अर्थशास्त्र के जानकार बताते हैं कि जिस आर्थिक वृद्धि का ढिूढ़ोरा पीटा जा रहा है, वह छलावा है. इसकी सच्चाई निवेश-विनिवेश नहीं, बल्कि इस आर्थिक वृद्धि का मौलिक संचालक गैरसरकारी व्यय है.

वित्त वर्ष 2014-15 में गैर सरकारी व्यय के कारण जीडपी की वृद्धि दर 57.6 प्रतिशत से बढ़ कर 59.5 प्रतिशत हो गयी थी. कारण गैरसरकारी व्यय की वृद्धि दर 2014-15 वित्त वर्ष में 6.2 प्रतिशत से बढ़ कर वित्त वर्ष में 2015-16 में यह बढ़कर 7.4 प्रतिशत हो गया. कोटक महिंद्रा बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री उपासना भरद्वाज ने अपने एक बयान में कहा देश की बड़ी कंपनियों द्वारा नए निवेश के बजाए ऊंची दर पर डिविडेंट दिए जाने से गैरसरकारी व्यय में इस कद्र वृद्धि देखने को मिल रही है. इसी की वजह से ग्रौस फिक्स्ड कैपिटल फौरमेशन (जीएफसीएफ) यानि सकल स्थायी पूंजी निर्माण पिछले साल की तुलना में 7.9 प्रतिशत से नीचे जाकर 3.3 प्रतिशत हो गया. वहीं 2014-15 वित्त वर्ष में जीडीपी 30.8 प्रतिशत से घटकर स्थायी पूंजी निर्माण जीडीपी का 29.3 प्रतिशत हो गया.

अर्थशास्त्र के जानकार सौमेन राय का कहना है कि देश में ऐसी कंपनियों की तादाद देश में दिनोंदिन बढ़ रही है जिनके सिर पर कर्ज के भारी भरकम पहाड़ है और ये अपनी उत्पादन क्षमता का भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. इसका सामानुपातिक प्रभाव सीधे देश की बैंकिंग क्षेत्र में पड़ा है। देश के विभिन्न बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज का लगभग 11 प्रतिशत ‘स्ट्रेस्ड एसेट्स’ में तब्दील हो गयी है, क्योंकि इसकी वापसी भी संभावना लगभग नहीं के बराबर है. जाहिर है अर्थव्यवस्था के लिए यह एक चिंता का विषय है. बैंकिंग क्षेत्र के इस संकट से उबरने में देश को सालों लग जाएंगे.

सौमेन राय कहते हैं कि जहां नए गैरसरकारी विनिवेश का सवाल है तो इस मामले में आजकल पूरे देश में आत्मविश्वास की कमी के कारण अनिश्चियता का माहौल है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली को इस स्थिति को बड़ी गंभीरता से लेना होगा. क्योंकि इस पूरी स्थिति का दूगामी प्रभाव यह है कि देश की अर्थव्यवस्था को की मजबूती का दावा करनेवाली बहुत सारी परियोजनाएं अधर में लटक गयी हैं. वहीं निर्यात उद्योग का ग्राफ पिछले 17 महीनों से लगातार नीचे की ओर लुढ़क रहा है.

इन सबका प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव यह है कि देश में बेरोजगारी बढ़ रही है. नए रोजगार की संभावना देश में लगभग नहीं के बराबर है. जबकि हमारे देश में हर साल पढ़े-लिखे नए बेरोजगारों की संख्या लाखों में बढ़ जाती है. लेबर ब्यूरो का आंकड़ा कहता है कि 2015 में नए रोजगार की संख्या घटकर महज एक लाख रह गयी है और यह पिछले छह सालों में सबसे कम है.

अब अगर किसानों की बात की जाए तो मोदी सरकार को किसानों से कोई सरोकार नहीं है, यह साफ नजर आने लगा है. बाकी जगह की बात जाने भी दें तो केंद्र और महाराष्ट्र दोनों में भाजपा की सरकार है. लेकिन वहां हर रोज किसान आत्महत्या कर रहे हैं. इस साल के शुरूआती 45 दिनों में अकेले मराठवाड़ा में 93 किसानों ने आत्महत्या कर ली. पिछले साल 2015 में यहां 569 किसानों ने आत्महत्या की. वहीं अगर पूरे देश की बात करें तो राष्ट्रीय नमूना सर्वे का आंकड़ा बताता है कि देश में कृषि पर निर्भर परिवार का 52 प्रतिशत कर्ज के बोझ तले हैं. और कज भी कितना? 80 हजार रु. से लेकर पांच लाख रु. तक का. फिर भी कर्ज न चुका पाने की स्थिति में देश के किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर हैं. वहीं देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों का लाखों करोड़ रु. का कर्ज बकाया है और वे अपने आपको दिवालिया घोषित करके बच निकल रहे हैं.

सामान्य किसानों से लेकर गन्ना किसान, कपास किसान, आलू किसान, प्याज किसान सब तक खून के आंसू रो रहे हैं. फसल कम हो तो किसान मारा जाता है, फसल ज्यादा हो जाए तो भी किसान ही मारा जाता है. बीज से लेकर खाद की सब्सिडी दिनों दिन कम होती जाती है, जाहिर है इनकी कीमत बढ़ रही है. यहां तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लगातार भाव गिरने के बाद भी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमत लगातार बढ़ रही है. देश के एक बड़े हिस्से में सालों से सूखा पड़ा हुआ है. बिजली पानी की सुविधा सरकार दे नहीं सकती. डीजल के भरोसे सिंचाई महंगी है. इस पर भी किसान से जो बन पड़ता है करता है और कर्ज में डूब जाता है.

किसानों को सरकार की ओर से दिया जाने वाले समर्थन मूल्य में वृद्धि नहीं की जा रही है. केंद्र सरकार ही नहीं, राज्य सरकार भी समर्थन मूल्य बढ़ाने में आनाकानी करती है. कृषि उत्पाद के वितरण का पुख्ता इंतजाम तक सरकार नहीं कर पायी है.  जबकि मोदी ने किसानों के हितों को लेकर बड़े-बड़े वादे किए थे. घोषणापत्र में भाजपा ने कहा था कि मोदी की सरकार बनी तो किसानों को उनकी फसल के लागत का 50 प्रतिशत लाभ दिलाएगी. सरकार की कृषि योजना कोई करामात नहीं दिखा पायी है.

ऐसी विषम परिस्थिति के बीच एक हैरान करनेवाली खबर भी है और वह यह कि न्यू वर्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट की माने तो भारत का नाम अति धनवान दस देशों की सूची में शुमार हो चुका है और इस सूची में भारत का स्थान सातवां है. जबकि हकीकत यह है कि औसत भारतीय बहुत गरीब है. आजादी के बाद से ही देश गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है. गरीबी से आजतक देश को आजादी नहीं मिल पायी है. भले ही अति धनवान देशों की सूची में भारत ने अपना नाम लिखवा लिया है, लेकिन देश का मध्यवर्ग अब निम्न-मध्य वर्ग में तब्दील हो गया है और निम्न वर्ग गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गया है. देश की संपत्ति कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों के हाथों में सिमट गयी है. यही है मोदी सरकार की – नई सोच नई उम्मीद! आंकड़ों की बाजीगरी के बल पर विकास की मृगरीचिका का भुलावा दे रही है सरकार. जमीनी सच्चाई इसके उलट है और देश की आम जनता इस सच्चाई को भोगने को मजबूर है.

फ्रेंच ओपन: पुरुष एकल का खिताब जोकोविच के नाम

दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी सर्बिया के नोवाक जोकोविच ने पहला सेट गंवाने के बाद जोरदार वापसी करते हुए ब्रिटेन के एंडी मरे को हराकर पहली बार फ्रेंच ओपन का पुरुष एकल का खिताब जीता और साथ ही एक ही समय में चारों ग्रैंडस्लैम खिताब अपने नाम करने वाले टेनिस इतिहास के सिर्फ तीसरे खिलाड़ी बन गए. शीर्ष वरीय जोकोविच ने दूसरे वरीय मरे को 3-6, 6-1, 6-2, 6-4 से हराकर अपने करियर का 12वां ग्रैंडस्लैम खिताब जीता.

इसके साथ ही वे डान बज (1938) और रॉड लेवर (1962 और 1969) की श्रेणी में शामिल हो गए जिन्होंने एक ही समय में चारों ग्रैंडस्लैम आस्ट्रेलिया ओपन, फ्रेंच ओपन, अमेरिकी ओपन और विंबलडन के खिताब अपने नाम किए थे. जोकोविच ने साथ ही कैलेंडर स्लैम का आधा सफर भी तय कर लिया. पिछली बार यह कारनामा लेवर ने 47 साल पहले किया था.

ग्रैंडस्लैम फाइनल में जोकोविच और मरे के बीच यह सातवीं भिड़ंत थी और सर्बियाई खिलाड़ी पांचवीं बार जीतने में सफल रहा. ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंटों में दोनों खिलाड़ियों के बीच हुए 10 मुकाबलों में जोकोविच की यह आठवीं जीत है. कुल भिड़ंत में जोकोविच ने मरे के 10 के मुकाबले 24 मैच जीते हैं.

मरे 1935 में फ्रेड पैरी के बाद फ्रेंच ओपन खिताब जीतने वाले दूसरे ब्रिटिश खिलाड़ी बनने के लिए चुनौती पेश कर रहे थे लेकिन जोकोविच ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. वर्ष 1925 में इस टूर्नामेंट के अंतरराष्ट्रीय बनने के बाद से मरे सिर्फ तीसरे ब्रिटिश खिलाड़ी हैं जो रोलां गैरों में फाइनल में पहुंचे. वर्ष 1937 में बनी आस्टिन उपविजेता रहे थे.

जोकोविच ने इससे पहले 11 ग्रैंडस्लैम खिताब जीते थे. इसमें छह आस्ट्रेलिया ओपन (2008, 2011, 2012, 2013, 2015 और 2016), तीन विंबलडन (2011, 2014 और 2015) और दो अमेरिकी ओपन (2011 और 2015) खिताब शामिल हैं. जोकोविच से पहले आंद्रे अगासी, बज, राय एमर्सन, रोजर फेडरर, लेवर, राफेल नडाल और फ्रेड पैरी करियर ग्रैंडस्लैम पूरा कर चुके हैं. इनमें भी कैलेंडर ग्रैंडस्लैम पूरा करने का कारनामा सिर्फ बज (1938) और लेवर (1962 और 1969) ने ही किया है.

पेरिस में तीन बार फाइनल गंवाने वाले दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी जोकोविच ने मैच के बाद कहा, ‘यह विशेष लम्हा है, मेरे करियर का सबसे बड़ा पल. मैं आज रोलां गैरों पर वह महसूस कर रहा हूं जो इससे पहले कभी महसूस नहीं किया. मैं दर्शकों का प्यार महसूस कर रहा हूं.’

जोकोविच को हालांकि जीत के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा. चौथे सेट के आठवें गेम में उन्होंने खिताब के लिए सर्विस करते हुए अपनी सर्विस गंवाई. उन्होंने 10वें गेम में दो चैंपियनशिप प्वाइंट भी गंवाए लेकिन मरे के बैकहैंड नेट पर मारने पर खिताब जीत लिया. दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी ने पहले सेट के पहले ही गेम में मरे की सर्विस तोड़ी लेकिन अगले गेम में अपनी सर्विस भी गंवा दी. मरे ने इसके बाद चार गेम जीतकर स्कोर 4-1 किया और फिर आसानी से पहला सेट अपने नाम कर दिया. जोकोविच ने इस दौरान अंपायर के साथ बहस भी की और सेट के दौरान 13 सहज गलतियां की.

सर्बियाई खिलाड़ी ने दूसरे सेट में वापसी की. उन्होंने पहले गेम में ब्रेक प्वाइंट बचाया और फिर मरे की सर्विस तोड़कर 2-0 की बढ़त बनाई. जोकोविच ने चौथे गेम में मरे की सर्विस तोड़ने का मौका गंवाया लेकिन इसके बावजूद 4-1 की बढ़त बना ली.

उन्होंने इसके बाद मरे की सर्विस फिर तोड़ी और अपनी सर्विस बचाकर मुकाबला 1-1 से बराबर कर दिया. जोकोविच ने तीसरे सेट की शुरुआत में भी मरे की सर्विस तोड़ी और फिर 4-1 की बढ़त बनाई. सर्बियाई खिलाड़ी ने चार ब्रेक प्वाइंट बचाते हुए स्कोर 5-1 किया और फिर सेट जीत लिया. जोकोविच ने चौथे सेट के पहले गेम में भी मरे की सर्विस तोड़ी. उन्होंने इसके बाद स्कोर 5-2 किया और फिर अंतिम तीन गेम के रोमांच के बाद तीन घंटे से कुछ अधिक समय में खिताब जीत लिया.

आखिर पंकज त्रिपाठी को किसने बनाया अपना गुरु

मुंबई महानगर में पली बढ़ी कोंवेंट एज्यूकेटेड आलिया भट्ट के लिए शुद्ध हिंदी बोलना हमेशा कठिन होता है. ऐसे में जब आलिया भट्ट ने फिल्म निर्देशक अभिषेक चौबे की फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ में पंजाब के खेतों में काम करने वाली बिहारी मूल की लड़की कुमारी पिंकी का किरदार निभाने का आफर स्वीकार किया, तो आलिया भट्ट के सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि कुमारी पिंकी के किरदार के साथ न्याय करने के लिए बिहार की भाषा में न सिर्फ बात करना, बल्कि पूरी तरह से बिहार वासियों के लहजे में बात करना. पर हिम्मत न हारने का दावा करने वाली आलिया भट्ट ने बिहार राज्य की भोजपुरी भाषा को सीखने के लिए एक गुरू की तलाश शुरू की और उनकी यह तलाश जाकर थमी फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ में गणित पढ़ाने वाले शिक्षक पर.

जी हॉ! ‘निल बटे सन्नाटा’ मे गणित के शिक्षक का किरदार निभाकर पंकज त्रिपाठी काफी चर्चा में थे. दूसरी बात पंकज त्रिपाठी स्वयं बिहार राज्य में गोपाल गंज के रहने वाले हैं और खुद भी खेतों में किसान की तरह काम भी कर चुके हैं. तो आलिया भट्ट ने पंकज त्रिपाठी से कहा कि वह उन्हे बिहार की भाषा और उसका लहजा उन्हें सिखाएं. पंकज त्रिपाठी ने पूरे दो माह तक अपने अभिनय करियर से समय निकालकर आलिया भट्ट को बिहार की भाषा की ट्रेनिंग दी. मजेदार बात यह है कि पंकज त्रिपाठी ने फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ में अभिनय नहीं किया है.

‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते समय इस बात को स्वीकार करते हुए खुद आलिया भट्ट ने कहा-‘‘मैंने इसमें बिहारी लड़की का किरदार निभाया है. इसलिए मुझे सबसे पहले बिहारी भाषा और उसके एसेंट व लहजे को सीखना पड़ा. इसके लिए मैंने अभिनेता पंकज त्रिपाठी से पूरे दो माह तक बिहारी भाषा की ट्रेनिंग हासिल की. पंकज त्रिपाठी बहुत अच्छे कलाकार हैं और हिंदी व बिहार की भाषा पर भी उनका बहुत अच्छा अधिकार है.’’

जब हमने पंकज त्रिपाठी से बात की, तो पंकज त्रिपाठी ने कहा-‘‘मैंने फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ में अभिनय नहीं किया है. आलिया भट्ट से मेरा पहले से कोई परिचय भी नहीं था. लेकिन फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ के निर्देशक अभिषेक चौबे मेरे खास दोस्त हैं. एक दिन अभिषेक चौबे ने मुझे अपने आफिस में बुलाया, जहां आलिया भट्ट भी मौजूद थी. अभिषेक ने मुझसे कहा कि आलिया को मेरी मदद की जरुरत है और मैं आलिया को बिहार की भाषा व लहजा सिखा दॅूं. तो मैंने अपने मित्र अभिषेक चौबे की खातिर इस काम को करने के लिए तैयार हो गया. पूरे दो माह तक मैने आलिया भट्ट को बिहारी भाषा सिखायी. आलिया भट्ट ने भी पूरी एकाग्रता के साथ भाषा को सीखने में दिलचस्पी भी दिखायी.’’

क्या आप हैं स्मार्टफोन के स्मार्ट यूजर??

आजकल लगभग हर इंसान के हाथ में स्मार्टफोन होता है. फोन को हम दिनभर में कई बार इस्तेमाल करते हैं. लेकिन क्या हम अपने स्मार्टफोन को स्मार्टली यूज करते हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं वो 10 बेहद कॉमन गलतियां जो लगभग हर स्मार्टफोन यूजर करता है.

सिक्यूरिटी पासवर्ड

कोई नहीं चाहता कि उनकी प्राइवेसी में खलल पड़े. आप भी नहीं चाहते होंगे कि कॉलेज या ऑफिस का कोई साथी आपका फोन उठाकर सीधा आपकी गैलरी में जाए और फोटो देखने लगे. या फिर घर पर बच्चे बिना पूछे फोन में गेम खेलना शुरू कर दें. ये सब चीजें न हों, इसके लिए आपको फोन में पासवर्ड लगाना बेहद जरुरी है.

पब्लिक वाई-फाई का इस्तेमाल

मुफ्त वाई-फाई के साथ मुफ्त में रिस्क भी मिलता है. पब्लिक वाई-फाई संदेह के घेरे में भी होते हैं. हो सकता है उन्हें हैकर आपके फोन की इनफार्मेशन को चुराने के लिए इस्तेमाल कर रहे हों. इसलिए उन्हीं वाई-फाई कनेक्शन का इस्तेमाल करें जिन्हें आप जानते हों.

स्मार्टफोन को साफ न करना

रिसर्चर्स की मानें तो एक फोन में टॉयलेट सीट से भी ज्यादा कीटाणु होते हैं. स्मार्टफोन को समय समय पर साफ करते रहना सही होता है. इसके लिए आप हफ्ते में एक बार एंटी-बैक्टीरियल सोल्यूशन का इस्तेमाल कर सकते हैं.

स्मार्टफोन ठीक से चार्ज नहीं करना

स्मार्टफोन को जरुरत से ज्यादा चार्ज करने से इसकी बैटरी काफी खराब हो सकता है. फोन को रात-भर चार्ज पर लगाकर छोड़ने की गलती न करें. साथ ही फोन की बैटरी पूरी तरह खत्म होने पर उसे चार्ज करना भी सही नहीं होता है.

एंटी वायरस

आपका स्मार्टफोन असल में एक छोटा सा कंप्यूटर है. जैसे कंप्यूटर को सुरक्षित रखने के लिए एंटी वायरस की जरूरत पड़ती है वैसे ही फोन को भी. एक एंटी वायरस एप आपके फोन को मैलवेयर और वायरस से बचा कर रख सकती है.

एंटी थेफ्ट एप्स

यदि आपको लगता है कि आपका फोन कभी चोरी नहीं हो सकता है तो यह आपकी गलतफहमी है. क्योंकि ऐसी घटना किसी के साथ भी हो सकती है. एक एंटी थेफ्ट एप आपके फोन से सारा डाटा मिटा सकती है, जिससे वो किसी गलत हाथ में न पड़ जाए.

सॉफ्टवेयर अपडेट

सॉफ्टवेयर अपडेट आपके फोन के फंक्शन को बेहतर बनाता है. अपडेट के साथ फोन में कई नई इनफार्मेशन जुड़ती हैं साथ ही फोन की सिक्यूरिटी भी अच्छी होती है. इसलिए फोन में सॉफ्टवेयर अपडेट जरुर इंस्टॉल करना चाहिए.

कोई भी एप इंस्टॉल कर देना

स्मार्टफोन को और स्मार्ट बनाने के चक्कर में अक्सर यूजर्स कई तरह के एप इंस्टॉल कर देते हैं. फोन में अच्छी एप्स भी बेहद जरुरी हैं. लेकिन यूजर्स को कोई भी एप इंस्टॉल करने से पहले ये जरुर देखना चाहिए कि उसकी प्रोडक्ट रेटिंग और रिव्यु कैसे हैं.

रैंडम लिंक

यदि कोई आपको लिंक भेजता है तो बिना कुछ सोचे समझे उस पर क्लिक न करें. ये आपके फोन के लिए खासा दिक्कतें पैदा कर सकता है. बेहतर होगा कि आप ऐसे मैसेज पर ध्यान न दें.

ब्लूटूथ ऑन

फोन के ब्लूटूथ को हमेशा ऑन रखना सही नहीं है. इससे आपके फोन की बैटरी भी खर्च होती है और साथ ही ये हैकर को आपके फोन को एक्सेस करने का मौका भी देता है. ब्लूटूथ कनेक्शन की एवरेज रेंज 10 मीटर तक होती है. इससे हैकर आसानी से आपका फोन एक्सेस कर इनफार्मेशन चुरा सकता है.

मुश्किल लग रही है माल्या की ‘घर वापसी’

विलफुल डिफॉल्टर विजय माल्या को भारत लाने की प्रक्रिया में भारत सरकार को एक और झटका लगा है. इंटरपोल ने माल्या के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने से मना कर दिया है. इंटरपोल ने साफ तौर पर कहा है कि माल्या के खिलाफ अब तक कोई आपराधिक मामला साबित नहीं हुआ है. माल्या को रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने के लिए पर्याप्त सबूत भी मौजूद नहीं हैं.

ऐसे में माल्या के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी नहीं किया जा सकता है. इसका मतलब है कि कानूनी प्रक्रिया के तहत माल्या को भारत लाना मुश्किल है. गौरतलब है कि जब कोई आरोपी भारत छोड़ दूसरे देश चला जाता है तब इंटरपोल उसे वापस भेजने के लिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर सकता है.

माल्या के पास बचने के रास्ते ?

टैक्स एक्सपर्ट का कहना है कि माल्या के पास बचने के काफी रास्ते हैं. अब तक इंटरपोल ने माल्या मामले की आरंभिक समीक्षा की है. अगर इंटरपोल माल्या से कोई पूछताछ भी करता है तो माल्या यह कह सकते हैं कि वह तो बैंकों का कर्ज देना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने कभी मना नहीं किया.

इसके अलावा माल्या खुद को पहले ही एनआरआई साबित कर चुके हैं. अब अगर माल्या के खिलाफ आपराधिक मामला भारत सरकार दर्ज भी कराती है. माल्या के यूबी ग्रुप के बाद देश का एक और बड़ा ग्रुप मुश्किल में है. जेपी ग्रुप ने 4,460 करोड़ रुपये का डिफॉल्ट कर दिया है. जेपी ग्रुप बैंकों से लिए 2,905 करोड़ रुपए के लोन को नहीं चुका सका है.

आपराधिक मामला कब ?

भारत सरकार ने इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने का अनुरोध किया था. इस बाबत भेजे ब्यौरे में यह कहा गया था कि इनकी कंपनियों पर करोड़ों रुपये बकाया है. इनके खिलाफ कोर्ट में सुनवाई चल रही है.

अगर भारत सरकार ने यह कहा होता कि माल्या ने धोखाधड़ी की या किसी किस्म का फ्रॉड किया है तब तो इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने पर विचार करता. इसके लिए जरूरी था कि सरकार माल्या के खिलाफ वित्तीय आपराधिक मामला बनाती और माल्या के लिए खिलाफ दर्ज किया जाता.

2008 ओलंपिक गोल्ड मेडल गंवा सकते हैं बोल्ट…!

उसेन बोल्ट को 2008 ओलंपिक का चार गुणा 100 मीटर रिले का स्वर्ण पदक गंवाना पड़ सकता है. टीम के उनके साथी नेस्टा कार्टर उन 32 खिलाड़ियों में शामिल थे जो डोप टेस्ट पुनः परीक्षण में विफल रहे हैं.

जमैका के अखबार जमैका ग्लीनर ने अपनी रिपोर्ट में शुक्रवार को यह रहस्योद्घाटन किया. ग्लीनर ने कहा कि बीजिंग खेलों में कार्टर के "ए" नमूने के पुनः परीक्षण में प्रतिबंध पदार्थ मिथाइलएक्सानियामिन के अंश पाए गए हैं.अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया कि "बी" नमूने के पुनः परीक्षण के नतीजे का पता नहीं चल पाया है.

बीजिंग में जमैका की चार गुणा 100 मीटर रिले टीम की ओर से 30 वर्षीय कार्टर ने पहला चरण दौड़ा था. 37.10 सेकंड के विश्व रिकॉर्ड समय के साथ स्वर्ण पदक जीतने वाली इस टीम में बोल्ट, माइकल फ्रेटर और असाफा पावेल भी शामिल थे. त्रिनिदाद और टोबेगो दूसरे, जबकि जापान तीसरे स्थान पर रहा था.

कार्टर 2011, 2013 और 2015 विश्व चैंपियनशिप में जमैका को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम के भी सदस्य थे. अगर कार्टर पर प्रतिबंध लगता है तो बोल्ट को अपना रिले स्वर्ण गंवाना पड़ सकता है. पहले भी किसी सदस्य के डोप में पकड़े जाने पर पूरी टीम को पदक से हाथ धोना पड़ा है.

परीक्षा समाप्त अब क्या करें

परीक्षा की समाप्ति के बाद मिलने वाली लंबी छुट्टियां सिर्फ मौजमस्ती करने में ही बिताने से अच्छा है कि इन छुट्टियों में कुछ अच्छे, रचनात्मक कार्य कर के अपनी योग्यता बढ़ाएं, इस से छुट्टियों का आनंद भी मिलेगा और व्यक्तित्व का उज्ज्वल पक्ष भी उभर कर सामने आएगा.

प्रस्तुत हैं, कुछ ऐसे सुझाव जिन पर अमल कर के आप अपनी रचनात्मकता बढ़ा सकते हैं :

रुचि पर ध्यान दें

अगर आप की कोई रुचि है और समय की कमी के कारण आप अब तक उस पर अच्छी तरह ध्यान नहीं दे पाते थे तो यह सही समय है

कि आप अपनी उस रुचि पर ध्यान दे कर उसे बढ़ाएं. बागबानी, चित्रकारी, फोटोग्राफी, लेखन, पठनपाठन आदि जिस में भी आप की रुचि हो, उसे करने के लिए साधन जुटाने का प्रयास करें. अपनी रुचि से संबंधित पुस्तकों का अध्ययन करें.

इस से आप अपनी रुचि को अच्छी तरह समझ सकते हैं और अपने काम में अधिक मौलिकता ला सकते हैं. अगर आप को ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में पता हो जो आप ही की तरह रुचि रखता हो तो आप उस से मिलें, बातचीत करें और उस के काम करने का ढंग देखें. इस से आप को बहुतकुछ सीखने को मिलेगा.

जेबखर्च के लिए काम करें

जब आप को जेबखर्च के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ती है तो आप अपने मातापिता से मांगते हैं, पर अगर आप इन दिनों कोई काम कर के कुछ पैसे कमा लेते हैं तो आप को कभी अपने जेबखर्च के लिए उन से पैसे नहीं मांगने पड़ेंगे. छोटीछोटी कंपनियों में समयसमय पर सहायकों की आवश्यकता पड़ती रहती है. आप उन कंपनियों जाएं और वहां काम करने की अपनी इच्छा बताएं, शायद आप को वहां कोई छोटामोटा काम मिल जाए. इस के अलावा आप अपने घर में कोई वस्तु जैसे लिफाफे, पतंग आदि बना कर दुकानों में सप्लाई भी कर सकते हैं.

जब आप काम कर के पैसे कमाएंगे तो आप का आत्मविश्वास बढ़ेगा और आप में स्वयं के प्रति सम्मान की भावना भी पैदा होगी.

व्यावसायिक कोर्स सीखें

इन दिनों आप कोई व्यावसायिक कोर्स भी सीख सकते हैं. जैसे टाइपिंग, टीवी, वीडियो मैकेनिक, कंप्यूटर, व्यक्तित्व विकास, अंगरेजी बोलचाल आदि अनेक कोर्स हैं जिन्हें सीख कर आप अपनी योग्यता बढ़ा सकते हैं. अगर आज आप कोई कोर्स सीखते हैं तो निश्चित रूप से आप को भविष्य में इस का फायदा मिलेगा.

शारीरिक सौष्ठव बढ़ाएं

बहुत से किशोरकिशोरियां अपने शरीर के दुबलेपन और कम लंबाई के कारण हीनभावना का शिकार हो जाते हैं. अगर आप भी उन में से हैं तो आज से ही व्यायाम करना शुरू कर दें. जौगिंग, रस्सीकूद, दंडबैठक आदि कई व्यायाम हैं, जिन्हें आप आसानी से कर सकते हैं. आप घर के पास का कोई जिम भी जौइन कर सकते हैं. 2 महीने व्यायाम करने के बाद ही आप अपने को पहले से अधिक शक्तिशाली और आकर्षक पाएंगे. इस से जहां आप का शारीरिक सौष्ठव बढे़गा वहीं आप में आत्मविश्वास भी बढ़ेगा.

खेल में प्रशिक्षण लें

अगर किसी खेल में आप की रुचि है और आप एक अच्छा खिलाड़ी बनने और प्रसिद्धि पाने की सोचते हैं तो देर न करें. शीघ्र ही किसी प्रशिक्षण केंद्र का, जहां आप की पसंद के खेल का प्रशिक्षण दिया जाता हो, पता लगाएं और वहां प्रवेश ले लें. अगर आप के मातापिता आप के प्रशिक्षण का शुल्क वहन करने की स्थिति में नहीं हैं तो आप अपने शहर के किसी अच्छे खिलाड़ी से संपर्क करें. उसे अपनी इच्छा बताएं और उस से निवेदन करें कि वह आप को प्रशिक्षण दे. अगर आप गंभीर रहते हैं तो वह आप को निशुल्क प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हो जाएगा.

प्रशिक्षण से आप की प्रतिभा निखरेगी और आप को अपने खेल की बारीकियों का पता लगेगा जिस से आप एक अच्छे खिलाड़ी बन जाएंगे. वैसे भी आज खेलों में इतनी प्रतिस्पर्धा है कि बिना प्रशिक्षण लिए आप आगे बढ़ ही नहीं सकते.

अपनी पत्रिका निकालें

आप को कहानी व कविताएं लिखने का शौक है, पर जब आप की रचनाएं पत्रपत्रिकाओं से लौट आती हैं तब आप को बुरा लगता है. ऐसे में आप सोचते हैं कि काश, एक अपनी पत्रिका होती जिस में मेरी रचनाएं छपतीं.

अब जबकि आप के पास काफी समय है तो फिर देर किस बात की. झट से योजना बनाएं अपनी पत्रिका निकालने की. इस में आप अपनी कहानियां व कविताएं लिखें. अपने मित्रों को भी कुछ लिखने के लिए प्रेरित करें. आप अपनी पत्रिका हाथ से ही लिखें और फिर उस की फोटोकौपी निकाल कर लोगों में बांटें. अगर आप चाहें तो उन से सहयोग राशि के तौर पर कुछ रुपए भी ले सकते हैं. इस से आप की लेखन क्षमता का भी विकास होगा और आप की रचनाओं के छपने की संभावना भी बढ़ जाएगी.

सफाई अभियान चलाएं

जरा अपने कमरे में नजर दौड़ाइए, किताबें बेतरतीब रखी हुई हैं, अलमारियों में धूल जमी हुई है और कपड़े उलटेसीधे टंगे हैं. क्या आप को इन में कुछ सुधार की आवश्यकता महसूस नहीं होती? पहले आप के पास बहाना था पढ़ाई के कारण समय नहीं मिलने का, पर अब तो आप के पास समय ही समय है. चलिए, आज ही अपने कमरे की सफाई कर डालिए. प्रत्येक चीज को सजा कर उचित जगह पर रखिए. अपने कमरे की सफाई खुद ही रोज करने की आदत बना लें. तब आप देखेंगे कि आप के मम्मीपापा आप से कितना खुश होते हैं.

छुट्टियों में मौजमस्ती जरूर करें किंतु मौजमस्ती करने के अपने तरीके में बदलाव लाएं. मौजमस्ती करने में आप जितने रचनात्मक होंगे उतना ही आप को आनंद भी मिलेगा.           

कट्टरता की जड़ें

इसलामिक स्टेट का पेरिस में कहर ढाना एक तरह से डिप्लोमैसी यानी कूटनीति के लिए अच्छा रहा. अमेरिका, रूस, सऊदी अरब, फ्रांस, ईरान सब उस दुष्ट इसलामिक स्टेट यानी आईएस को निबटाने में अपने हितों को ज्यादा देख रहे थे, लाखों शरणार्थियों और विश्वशांति को कम देख रहे थे. सब की निगाह केवल यही थी कि पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका के अखाड़े के खूंखार मुक्केबाजों में वे जीतें जिन पर उन्होंने शर्त लगाई है और अरबोंखरबों खर्च किए हैं. ये मुक्केबाज मंच से उतर कर दर्शकों और स्टेडियम की परिधि पार कर आम लोगों पर कहर ढाएंगे, इस की उन्होंने सोची न थी. वे ट्रेंड लड़ाकू अब अपने आकाओं की नहीं, इसलामी सोच की सुन रहे हैं. बदलती स्थिति में अब इन खूंखारों को खत्म करने में किस का, कैसा नुकसान होगा, यह सब को भूलना होगा.

पश्चिमी एशिया की शांति के लिए यूरोप, चीन, अमेरिका, जापान, भारत आदि को भी सोचना होगा. यह समस्या हम से दूर है, यह न सोचें. इसलाम के नाम पर इस समस्या को कहीं भी निर्यात किया जा सकता है. द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू तो यूरोप में हुआ पर उस ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका को भी लपेटे में ले लिया था. वह समाप्त हुआ तब जब जरमनी, जापान और इटली पूरी तरह नष्ट हो गए. और तब यहूदियों को एक देश दिलाया गया जिसे वे अपना कह सकें. नई कूटनीति के तहत अब केवल सुरक्षा के इंतजाम काफी नहीं हैं, इसलाम को पटरी पर लाना जरूरी है. इस के लिए सऊदी अरब और ईरान, जो सुन्नी और शिया मुसलमानों की शक्ति के केंद्र हैं, लपेटे में लाए जाएं. इन के साथ ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नाइजीरिया, सोमालिया, टर्की भी मरम्मत मांगेंगे. कुल मिला कर कट्टर मुसलमानों जिन्हें इसलामिस्ट कहना ज्यादा सही रहेगा, को नाजियों की तरह एक कोने में न धकेला जाए.

विश्व की ताकतों को हर देश से इसलामिस्टों को निकाल बाहर करना होगा या उन के पर कतरने होंगे. उन की आय के स्रोत बंद करने होंगे. उन्हें पनाह देने वाले केंद्र नष्ट करने होंगे. इसलाम के प्रचार के नाम पर कू्ररता और जंगलीपन का पाठ पढ़ाने वालों को नष्ट करना होगा.इस के साथ ही, इन की प्रतिच्छाया वाले ईसाई, हिंदू व बौद्ध अतिवादियों को भी नियंत्रित करना जरूरी है. अत्याचार व अनाचार का वायरस ऐसा है जो किसी भी धर्म में घुस कर एकजैसा काम कराने लगता है. सभी धर्मों के कट्टर एकतरह से सोचते हैं. वे खुद को ईश्वर का ऐसा दूत मानने लगते हैं जिन के पास हर विरोधी का गला काट देने का लाइसैंस हो, धर्म चाहे कोई भी हो. विश्व की ताकतों को मुहिम शुरू करने से पहले अपने में झांकना होगा कि इसलामिक स्टेट वाले विषाणु उन के यहां भी तो नहीं पल रहे हैं.

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