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एस्सार स्टील को बैंकों ने दिया अल्टीमेटम

एस्सार स्टील को कर्ज देने वाले बैंकों ने कंपनी से 15 दिनों के अंदर कर्ज चुकाने की को कहा है. बैंक इस महीने के मध्य में मीटिंग कर एस्सार स्टील से 40,000 करोड़ रुपये के अपने लोन की रिकवरी के सभी ऑप्शंस पर विचार करेंगे. दो सीनियर बैंकर्स ने बताया कि 30 मई को एसबीआई के हेडक्वॉर्टर में बैंकों की कोर कमेटी की मीटिंग के बाद कंपनी को इसकी जानकारी दे दी गई है. लेकिन एस्सार स्टील के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी को इस तरह की किसी मीटिंग की जानकारी नहीं है.

एस्सार स्टील ने 30 बैंकों से 40,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है. बैंकों ने कंपनी के लोन एकाउंट को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) में डाल दिया है क्योंकि कंपनी निर्धारित तिथियों पर पेमेंट नहीं कर सकी है. एस्सार स्टील के पास देश का सबसे मॉडर्न स्टील प्लांट है, जिसकी कैपेसिटी एक करोड़ टन सालाना है. कंपनी ने इसमें लगभग 55,000 करोड़ रुपये का इनवेस्टमेंट किया है.

कंपनी ने मार्च में लेंडर्स को 'रिस्ट्रक्चरिंग' का प्रपोजल दिया था. एक सीनियर बैंकर ने बताया, 'बैंकों के ग्रुप ने इसके लिए सहमति नहीं दी थी. अब वे चाहते हैं कि एस्सार स्टील डेडलाइन के साथ एक स्वीकार्य रीपेमेंट प्लान पेश करे.' मीटिंग में शामिल एक अन्य बैंकर ने कहा, 'हमने कहा है कि हम टेबल पर रकम देखना चाहते हैं. प्रमोटर्स को बड़ा योगदान देना होगा. इसके बाद ही लेंडर्स किसी प्रपोजल पर विचार करेंगे.' नवंबर में दो इनवेस्टमेंट बैंकों- एसबीआई कैप्स और आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज को एस्सार स्टील के लिए स्ट्रैटेजिक पार्टनर्स या फाइनेंशियल इनवेस्टर्स खोजने का काम दिया गया था, लेकिन इन्हें अभी तक इसमें कोई सफलता नहीं मिली है.

कुछ बैंक इस बात से नाराज हैं कि 5:25 स्कीम के तहत एक आसान रीपेमेंट पैकेज की पेशकश किए जाने के बावजूद कंपनी लोन रिस्ट्रक्चरिंग की शर्तों में और छूट चाहती है. बैड लोन बढ़ने की वजह से बहुत से बैंकों को पिछले फाइनेंशियल ईयर में लॉस हुआ है. बैंकों ने अब कड़े कदम उठाकर अपनी बकाया रकम की वसूली की योजना बनाई है. इससे पहले एसबीआई की अगुवाई में बैंकों ने एस्सार स्टील को बताया था कि उसे अपनी बकाया रकम चुकानी होगी या मैनेजमेंट में बदलाव को स्वीकार करना होगा.

अपने स्मार्टफोन को बना सकते हैं CCTV कैमरा

आप अपने घर में CCTV कैमरा लगाना चाहते हैं लेकिन एक्स्ट्रा पैसे खर्च नहीं करने? तो चिंता की कोई बात नहीं. हम आपको बता रहे हैं एंड्रॉयड स्मार्टफोन से CCTV कैमरा बनाने की ट्रिक, जिससे आप कहीं भी रह कर अपने घर ऑफिस या बच्चों पर निगरानी रख सकते हैं. सबसे पहले करें ये काम…

– आपके पास 2  एंड्रॉयड  स्मार्टफोन होने चाहिए.

– दोनों फोन में Home Security Camera-Alfred  एप डाउनलोड करें.

– प्ले स्टोर पर ये  एप पूरी तरह से फ्री हैं.

– दोनों फोन में इंटरनेट एक्सेस होना जरूरी है.

स्टेप नंबर 1-

दोनों स्मार्टफोन्स में Home Security Camera-Alfred  एप को डाउनलोड कर इंस्टॉल करें.

स्टेप नंबर 2-

इंस्टॉल हो जाने के बाद स्क्रीन को राइट में स्क्रॉल करके Start बटन पर क्लिक करें.

स्टेप नंबर 3-

स्टार्ट होने के लिए ये आप से कुछ डिटेल्स मांगेगा. जैसे कि आपकी ई-मेल आईडी. डिटेल्स फिल करके आपको रिकॉर्डिंग स्टार्ट करनी है.

नोट- दोनों फोन (कैमरा और रिसीवर) में आपको एक ही ई-मेल आईडी से लॉगइन करना है.

स्टेप नंबर 4-

इसके बाद आपको सिलेक्ट करना होगा कि दोनों में से किस डिवाइस को आप CCTV कैमरा के तौर पर और किस डिवाइस को रिसीवर के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं.

स्टेप नंबर 5-

अब आपको कैमरा और रिसीवर दोनों स्मार्टफोन में फुटेज दिखाई देंगे. ये दोनों डिवाइसेस 2 अलग नेटवर्क से कनेक्टेड होते हैं. ऐसे में आप कहीं भी रह कर अपने घर, ऑफिस या बच्चों पर निगरानी रख सकते हैं.

स्टेप नंबर 6-

बारी आती है फोन के प्लेसिंग की. आप इसे पेन स्टैंड में, टंगी हुई जींस की पॉकेट में या फिर जहां आप प्लेस करना चाहें कर सकते हैं.

एक था ‘बैड मैन’, अब आएगा ‘बैड बैंक’

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अपने फंसे हुए कर्ज के पोर्टफोलियो को एक अलग कंपनी की शक्ल देने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है. मामले की जानकारी रखने वालों ने बताया कि ऐसा होने पर बैंक को बैड लोन के बड़े बोझ से मुक्ति मिल सकती है. एसबीआई को ऐसे तथाकथित ‘बैड बैंक’ में हिस्सा खरीदने में सॉवरन वेल्थ फंड्स और प्राइवेट इक्विटी फर्म्स की दिलचस्पी दिखी है.

इस 'बैड बैंक' में 1.37 लाख करोड़ रुपये के नॉन-परफॉर्मिंग ऐसेट्स होंगे, जो एसबीआई की ओर से दिए गए कुल कर्ज का 9% हिस्सा है. इस रकम के अलावा एसबीआई ने 31,000 करोड़ रुपये के लोन को भी निगरानी सूची में रखा है. ये लोन हैं तो स्टैंडर्ड ही, लेकिन मामला जरा सा फिसलने पर ये बैड लोन की कैटिगरी में जा सकते हैं. अगर एनपीए को मैनेज करने से मुक्ति मिल जाए तो एसबीआई अपनी मुख्य बैंकिंग सर्विसेज पर ज्यादा ध्यान दे सकेगा. एसबीआई अपने पांच असोसिएट बैंकों को अपने साथ मिलाकर ग्लोबल साइज का बैंक बनने पर विचार कर रहा है.

बैड लोन की बढ़ती मात्रा ने मैनेजमेंट को 'बैड बैंक' जैसे कई विकल्पों पर विचार करने के लिए मजबूर किया है. एसबीआई के एक सीनियर एग्जिक्युटिव ने कहा, 'अभी तो यह विचार के स्तर पर है. अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है.' हालांकि 'बैड बैंक' के कॉन्सेप्ट पर आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन आपत्ति जता चुके हैं. राजन ने पिछले साल सितंबर में कहा था कि इंडिया के लिए 'बैड बैंक' मुफीद नहीं होगा क्योंकि बैंकों ने जिन ऐसेट्स के आधार पर ये लोन दिए हैं, उनमें से ज्यादातर या तो उपयोगी हैं या उन्हें उपयोगी बनाया जा सकता है.

हालांकि कुछ एक्सपर्ट्स ने कहा कि यह कदम एसबीआई के लिए फायदेमंद हो सकता है. इंडिया में मिजुहो बैंक के चीफ स्ट्रैटिजिस्ट और रिसर्च हेड तीर्थंकर पटनायक ने कहा, 'यह एसबीआई का बहुत अच्छा कदम है. इससे उसकी पूंजी उसके हाथ आएगी और क्रेडिट ग्रोथ के लिए वह उसका इस्तेमाल कर सकेगा.

स्मार्टफोन यूजर्स में कॉमन हैं ये बीमारियां

स्मार्टफोन और लैपटॉप की आदत-सी हो गई है. लेकिन क्या आपको पता है कि रात को सोने से कम से कम 1 घंटे पहले मोबाइल फोन अपने पास से दूर कर देना चाहिए, नहीं तो हेल्थ से जुड़ी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. UCLA स्कूल ऑफ मेडिसिन के डॉक्टर डैन सीगल के अनुसार, रात में स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने से नींद से जुड़ी कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है. गैजेट्स का इस्तेमाल हमारे काम को आसान बनाने के लिए किया जाता है, लेकिन अगर आप इन्हें जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो इससे कई बीमारियां भी हो सकती हैं. हम आज आपको बताने जा रहे हैं गैजेट्स से होने वाली बीमारियों और उनसे बचने के तरीकों के बारे में.

1. कम्प्यूटर विजन सिंड्रोम

हमारी आंख इस तरह से नहीं बनीं कि हम किसी भी एक प्वाइंट पर घंटों देखते रहें और उसे कोई नुकसान न पहुंचा. लगातार घंटों कम्प्यूटर स्क्रीन पर देखते रहने से आपको कम्प्यूटर विजन सिंड्रोम हो सकता है. इसमें आंखों में थकान, इचिंग, रेडनेस और धुंधला दिखाई देने की समस्या हो सकती है.

क्या करें-

आप चाहें किसी भी गैजेट का इस्तेमाल कर रहे हों, चाहें स्मार्टफोन या कम्प्यूटर या टैबलेट, अपने गैजेट की डिस्प्ले सेटिंग्स बदलिए. अगर कम्प्यूटर में ब्राइटनेस, शार्पनेस, या कलर बढ़े हुए हैं तो उसे कम कीजिए. ज्यादा ब्राइट या शार्प स्क्रीन यूजर्स की आंखों पर ज्यादा प्रेशर पड़ता है.

इसके अलावा, अगर गैजेट का फॉन्ट साइज बहुत छोटा है तो यूजर्स को लंबे डॉक्युमेंट्स पढ़ने में परेशानी होगी. इसलिए अपने गैजेट की डिस्प्ले सेटिंग्स को ऐसा सेट कीजिए जिससे आंखों को नुकसान कम हो. अगर आपकी स्क्रीन HD है तो 45% कलर और ब्राइटनेस से भी अच्छी डिस्प्ले क्वालिटी आएगी और आंखों को नुकसान कम होगा.

2.इन्सोम्निया-

गैजेट्स का इस्तेमाल ज्यादा करने में जो सबसे अहम बीमारी हो सकती है वो है इन्सोम्निया. अगर आप जरूरत से ज्यादा गैजेट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं तो ये आपके लिए इन्सोम्निया की पहली कड़ी साबित हो सकता है.

क्या करें-

20-20-20 रूल ध्यान में रखें- अगर आप नियमित तौर पर स्मार्टफोन, टैबलेट या कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो ध्यान रखें इस रूल का. हर 20 मिनट में आपसे 20 फिट दूर रखी किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखें ये labnol.org की एक ट्रिक है जो आखों की एक्सरसाइज का काम करती है. इससे यूजर्स की आंखों को आराम मिलता है और उनकी एक्सरसाइज भी होती है.

अगर आपको काम में समय का ध्यान नहीं रहेगा तो विंडोज से लिए ब्रेकटेक ( BreakTaker) या एप्पल मैक के लिए टाइम आउट (Time Out) प्रोग्राम का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये प्रोग्राम्स यूजर्स के ब्रेक लेने के लिए ही बनाए गए हैं.

3.टेक्स्टर्स नेक (Texter’s Neck)

टेक्स्टर्स नेक सिंड्रोम उन लोगों को होता है जो स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैबलेट्स का इस्तेमाल करते समय गरदन नीचे की ओर झुका कर रखते हैं. अगर ये सिंड्रोम बढ़ गया है तो गरदन की मसल्स इसी पोजीशन को अडैप्ट कर लेंगी और गला सीधा करने में परेशानी होगी.

क्या करें-

किसी भी गैजेट का इस्तेमाल करने से पहले ये ध्यान रखें की उसकी पोजीशन क्या है. अगर आप कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो मॉनिटर कम से कम 20-30 इंच की दूरी पर रखें. अगर स्मार्टफोन या लैपटॉप का इस्तेमाल कर रहे हैं तो गरदन झुकाने की जगह उसकी पोजीशन ऐसी रखें जिससे आपकी गरदन पर स्ट्रेस ना पड़े. टेक्स्टिंग थोड़ी कम कर दें. गरदन पर स्ट्रेस सबसे ज्यादा टेक्स्टिंग के कारण पड़ता है.

4.टोस्टेड स्किन सिंड्रोम-

आजकल लैपटॉप पर ज्यादा काम करना आम बात हो गई है. अगर आप जरूरत से ज्यादा लैपटॉप को अपनी गोद में रखते हैं तो ये स्किन डिसऑर्डर हो सकता है. लैपटॉप से हमेशा गर्म हवा निकलती है. ज्यादा इस्तेमाल से स्किन सूख जाती है. अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है तो उसका कलर बदल जाएगा और खुजली भी हो सकती है.

क्या करें-

लैपटॉप का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो कूलिंग पैड जरूर ले लें. कूलिंग पैड लैपटॉप से निकलने वाली गर्मी को ठंडा करता है. 200 रु. से लेकर 1500 तक लैपटॉप कूलिंग पैड और कूलिंग टेबल उपलब्ध हैं. अगर कूलिंग पैड नहीं है तो भी तकिए का इस्तेमाल करें. लैपटॉप को टेबल में रखकर यूज करें.

5.सुनने में प्रॉबलम-

इयरफोन का इस्तेमाल आप बहुत ज्यादा करते हैं तो सुनने में दिक्कत हो सकती है. ये आदत परमानेंटली आपके सुनने की क्षमता खराब कर सकते हैं.

क्या करें-

हमेशा म्यूजिक सुनने या कान में हेडफोन लगाए रखने की आदत को ना रखें और वॉल्यूम पर कंट्रोल रखें.

6.रेडिएशन इफेक्ट-

मोबाइल फोन से ऐसा रेडिएशन नहीं आता की आपको कैंसर हो जाए, लेकिन फिर भी ये हेल्थ से जुड़े कई मामलों में असर डालता है. ये मेंटल स्ट्रेस से लेकर इन्सोम्निया तक कई बीमारियों का कारण बन सकता है.

क्या करें-

कभी फोन साथ में लेकर ना सोएं. फोन को ज्यादा देर तक कान के पास ना रखें. अगर लंबी बात करनी है तो हेडफोन का इस्तेमाल करें. अगर फोन में सिग्नल कम हों तो उसे इस्तेमाल ना करें.

7.स्ट्रेस (RSI)-

RSI या रिपिटेटिव स्ट्रेस इंजरी ज्यादातर उन लोगों को होती है जो कम्प्यूटर्स पर हर दिन घंटों काम करते हैं. इसी के साथ, जो लोग ज्यादा टेक्स्टिंग करते हैं वो भी इस बीमारी का शिकार हो सकते हैं. इस इंजरी में हाथों में निशान पड़ जाते हैं. ये अक्सर टाइपिंग के समय होता है. जब पंजों के नीचे निशान दिखने लगते हैं.

क्या करें-

इसके लिए एक सॉफ्टवेयर Workpace आपकी मदद कर सकता है. जैसे ही ये सॉफ्टवेयर इंस्टॉल होता है ये बैकग्राउंड में काम करने लगता है. ये आपको बताता रहेगा की कितने समय में ब्रेक लेना है और कितनी बार अपना हाथ उठाना है. इसके अलावा, टाइपिंग करते समय सही पॉश्चर का होना भी बहुत जरूरी है.

सुशील को हाईकोर्ट से झटका, जा सकते हैं सुप्रीम कोर्ट

रियो ओलंपिक में भागीदारी को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे पहलवान सुशील कुमार को दिल्ली हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है. दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद साफ हो गया कि पहलवान सुशील कुमार और नरसिंह यादव के बीच रियो ओलंपिक में भारत के तरफ से कौन जाएगा.

कोर्ट ने कहा कि वह फेडरेशन के फैसले में दखल नहीं देगा. कोर्ट का फैसला सुनने के बाद सुशील कुमार के वकील ने कोर्ट को कहा कि उन्हें अपनी याचिका वापस लेने दी जाए लेकिन कोर्ट ने कहा कि अब आर्डर साइन हो चुका है लिहाजा याचिका अब वापस नहीं की जा सकती.

दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा, 'सुशील महान खिलाड़ी हैं, लेकिन रेसलिंग फेडरेशन के इस तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता कि नरसिंह यादव बेहतर फॉर्म में हैं और उन्हें ओलंपिक में भेजने का फैसला सही है.'

सुशील कुमार ने लगाया था आरोप

सुशील कुमार ने याचिका दी थी कि रियो ओलंपिक के लिए चुने गए नरसिंह यादव के साथ ओलंपिक में जाने से पहले दोनों का मुकाबला कराया जाए. सुशील का आरोप था कि रेसलिंग फेडरेशन ने भेदभाव से नरसिंह यादव को सेलेक्ट किया है.

सुशील ने भारतीय खिलाड़ियों के साथ नहीं की थी प्रैक्टिस

पिछले 2 हफ्ते के दौरान चली सुनवाई में इस ट्रायल के दावेदार के तौर पर सुशील और नरसिंह ने कोर्ट में भी मजबूती का अपना पक्ष रखा. सुनवाई के दौरान कोर्ट रेसलिंग फेडरेशन के वाइस प्रेसिडेंट राज सिंह के हलफनामे में दी गलत जानकारी से नाराज दिखे, तो यह बात भी सामने आई कि भारत सरकार के खर्चे पर जॉर्जिया गए सुशील ने भारतीय खिलाड़ियों के साथ प्रैक्टिस नहीं की. वे वहां जॉर्जिया के खिलाड़ियों के साथ प्रैक्टिस कर रहे थे जो नियमों के खिलाफ है.

हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी

हाई कोर्ट इस बात से भी नाराज दिखा कि रेसलिंग फेडरेशन और खिलाड़ियों की राजनीति को कोर्ट में घसीटा जा रहा है. जबकि इस वक्त उन्हें अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए था. सुशील के वकील ने कोर्ट को कहा कि इंटरनेशनल रेसलिंग में सुशील के कामयाब होने के चांस ज्यादा हैं. वो अकेला भारतीय रेसलर है जिसने गोल्ड मेडल भारत के लिए जीता है. नरसिंह के पास वो अनुभव नहीं है जो सुशील के पास है, इसलिए अगर रियो ओलंपिक में सुशील को भेजा जाता है, तो भारत के जीतने के चांस बढ़ जाएंगे.

सुशील के वकील ने फेडरेशन को घेरा

वकील ने यह भी कहा कि रेसलिंग फेडरेशन के नियमों के हिसाब से भी 1 महीने पहले ट्रायल जरुरी है. ट्रायल 13 महीने पहले कराया गया है, जिसकी कोई वैधता नहीं है. सुशील कुमार को ओलंपिक से दूर कैसे रखा जा सकता है, अगर उसने किसी प्राइवेट चैंपियनशिप में भाग लेने से मना कर दिया है तो ये ओलंपिक में जगह बनाने की शर्त नहीं हो सकती.

फेडरेशन ने नरसिंह को बताया बेहतर

रेसलिंग फेडरेशन ने कहा कि 2015 से सुशील कुमार ने किसी ट्रायल में भाग ही नहीं लिया. सुशील कुमार की तैयारी नरसिंह यादव से बेहतर नहीं है. नरसिंह यादव सितंबर 2015 से तैयारी कर रहा है.

जा सकते हैं सुप्रीम कोर्ट

सुशील कुमार रियो ओलंपिक में भाग लेने की अंतिम मुहिम के तहत फिर से भारतीय कुश्ती महासंघ से बात करेंगे. इसके बाद ही वे निर्णय करेंगे कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए या नहीं. सुशील के करीबी सूत्र ने कहा कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश करेंगे.

हम दोबारा भारतीय कुश्ती महासंघ से बातचीत करेंगे और उनसे चयन ट्रायल कराने का आग्रह करेंगे. लेकिन अगर यह कारगर नहीं होता तो हम सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं क्योंकि सुशील 74 किग्रा वर्ग में सर्वश्रेष्ठ दांव है. उन्हें यह दिखाने का मौका दिया जाना चाहिए कि वे सिर्फ ओलंपिक जाने के लिए ही सक्षम नहीं हैं बल्कि वहां स्वर्ण पदक से कम नहीं जीतेंगे.

एलपीजी का भुगतान अब एसएमएस द्वारा संभव

तेल कंपनियां एलपीजी सिलिंडरों के पेमेंट कलेक्शन के लिए नई पहल करने जा रही है. अब इसे डिजिटाइज किया जा रहा है. घरेलू उपयोग के लिए प्रयुक्त एलपीजी सिलिंडरों के डिस्ट्रीब्यूशन से कैश भुगतान को हटा रही है. मौजूदा बुकिंग फैसिलिटी के साथ पुणे में यह नया तरीका शुरू हो गया है जहां कंज्यूमर्स टेक्सट मैसेजेस के साथ पेमेंट लिंक भेज रहे हैं.

इस नये प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रॉनिक कार्ड्स को भी जारी किया गया है जो उपयोग किए गए सब्सिडाइज्ड सिलिंडरों की संख्या पर नजर रखेगा.

स्मार्टफोन यूजर्स की बढ़ती संख्या को देखते हुए मोबाइल पेमेंट ऑप्शन को टारगेट किया गया है. जन-धन योजना के तहत अधिकतर परिवारों को डेबिट कार्ड जारी किए गए हैं. अब कस्टमर को नेटबैंकिंग एक्सेस करने की जरूरत भी नहीं.

ऐसे करेंगे भुगतान

हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने मोबाइल पेमेंट ऑप्शन उपलब्ध कराने के लिए पेमेंट गेटवे ‘साइट्रस’ व सॉफ्टवेयर कंपनी ‘पुष्पम’ से टाइअप किया है. नये प्रोजेक्ट के तहत एलपीजी भरवाने के साथ अब लिंक समेत टेक्सट मैसेज मिलेगा. इस लिंक के पेमेंट गेटवे तक पहुंचना होगा जहां सभी विवरण पहले से मौजूद होंगे और मोबाइल फोन पर आए वन टाइम पासवर्ड के जरिए डेबिट कार्ड डिटेल्स में जाकर आराम से भुगतान किया जा सकेगा.

साइट्रस पे के एमडी, अमरीश राउ के अनुसार, ‘यह पेमेंट सॉल्यूशन ‘डिजिटल इंडिया’ प्रोग्राम के तहत लाया गया है. ग्राहक क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या नेट बैंकिंग का उपयोग कर सकते हैं.’

मुझे मत मारो, जीना चाहती हूं मैं

पिछले दिनों दिल्ली के डाबड़ी इलाके में एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया. एक पति ने महज इस वजह से अपनी गर्भवती पत्नी के साथ मारपीट की और उस की हत्या का प्रयास किया क्योंकि उसे और उस की मां को शक था कि होने वाला बच्चा लड़की है, लड़का नहीं. पुलिस को दिए गए महिला के बयान के मुताबिक वर्ष 2014 में इस महिला ने लव मैरिज की थी. इस बीच उसे एक बेटी हुई और वह दोबारा गर्भवती हो गई.

पति को शक था कि गर्भ में फिर से लड़की है. इसलिए वह गर्भपात कराना चाहता था. पर महिला ने इंकार कर दिया. इस पर पति उसे घसीट कर जबरन ले जाने का प्रयास करने लगा. महिला ने उस का विरोध किया तो पति ने जान से मारने की धमकी देते हुए उस का गला दबाया और फिर उस के बालों को पकड़ कर उस का सिर जोर से दीवार पर दे मारा. घायल महिला ने किसी तरह 100 नंबर पर कौल कर के पुलिस को वारदात की जानकारी दी. आरोपी पति पर धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही शुरू की गई है.

हाल फिलहाल एंड टीवी पर एक धारावाहिक आ रहा है, ‘वारिस’, जिस में एक मां अपनी बच्ची की जान बचाने के लिए सब से झूठ बोलती है कि उसे बेटी नहीं बेटा हुआ है. वह बेटे के रूप में ही बेटी का पालन पोषण करती है, उसे जमाने से लड़ना सिखाती  है और उसे वारिस के तौर पर तैयार करती है. यह  महज एक कहानी नहीं, कहीं न कहीं हमारी जिंदगी से जुड़ी हुई हकीकत है.

आज भी जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रही लड़कियों को अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु दूसरों का मुंह देखना पड़ता है. कितनी विसंगतियां हैं, हमारे समाज में.  बुढ़ापे में मांबाप का खयाल रखने के लिए जीजान एक करने वाली बेटियों  को जन्म लेते ही नमक चटा कर मारने का प्रयास किया जाता है. स्त्री कोख में पल बढ़ कर दुनिया में कदम रखने वाला पुरुष, उसी स्त्री के वजूद को कोख में ही छिन्नभिन्न कर डालने का दुस्साहस करता है. देवी की तरह पूजने का ढोंग करने वाला समाज लड़कियों को ही जलती लपटों के हवाले करने में संकोच नहीं करता.

कभी हत्या, कभी बलात्कार, कभी दहेज हत्या, कभीकभी घरेलू हिंसा का शिकार बनती ये लड़कियां आखिर कब तक अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष करती रहेंगी?

2011 के जनसंख्या आंकड़े के मुताबिक 1000 बच्चों में लड़कियों का अनुपात 943 है.मात्र १०-१५ हजार रुपये या उससे भी कम खर्च कर एक जीवन को कोख में ही ख़त्म कर  दिया जाता है.

इस संदर्भ में सोशल वर्कर अनुजा कपूर कहती हैं, आखिर एक लड़की को अपना वजूद बनाए रखने के लिए इतनी चुनौतियों का सामना क्यों करना पड़ता है? हम लड़कियों को कोख में मार डालते हैं. मगर कभी लड़कों का गला क्यों नहीं दबाते? हमारे कानून ऐसे हैं जो महिलाओं को कहीं न कहीं कमजोर बनाते हैं, तभी उन के साथ हो रहे अन्यायों की कोई रोकथाम नहीं हो पाती. कानून ही नहीं स्वयं औरत ही औरत के विरुद्ध हो जाती है.
पारस हौस्पीटल, गुड़गांव की डा. नूपुर गुप्ता कहती हैं कि भू्रण हत्या  डिलीवरी से कहीं ज्यादा रिस्की होता है. मां के जीवन को भी खतरा हो सकता है. कई दफा इस तरह गर्भपात कराने के बाद दूसरी प्रेग्नेंसी में दिक्कतें आती हैं. 20 सप्ताह के बाद यों भी गर्भपात कराना जिंदगी को खतरे में डालने के समान है.

'अस्तित्व मुझ से मेरी पहचान 'एनजीओ की फाउंडर प्रेसीडेंट अनामिका यदुवंशी कहती हैं कि अशिक्षा, असुरक्षा एवं गरीबी समाज में लड़की को बोझ समझने का मुख्य कारण हैं. हमारे देश में तकनीकी उन्नति ने भू्रण जांच को बहुत आसान बना दिया है. जरूरी है कि लोगों की सोच बदली जाए. उन्हें समझाया जाए कि बच्चा स्वस्थ होना जरूरी है वो लड़का है या लड़की इस से उस की अहमियत में फर्क नहीं पड़ता.

इस संदर्भ में कुछ समय पूर्व एक बहुत ही दिलचस्प वाकया सुनने को मिला. हरियाणा की 2 बहनों ने अपनी शादी की रस्मों में 2 फेरे जुड़वाए और अपने से वचन लिया कि वे कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ काम करेंगे और पर्यावरण का ध्यान रखेंगे. जींद जिले की इन 2 बहनों दामिनी और चंचल की इस अनूठी शादी का खयाल उन के पिता, जगदीप सिंह के दिमाग में आया था और ऐसा उन्होंने जिले में लड़कियों के लिहाज से बेहद दयनीय लिंगानुपात की वजह से सोचा.

ऐसी घटनाएं समाज में कोई आधारभूत परिवर्तन ले आएं यह संभव नहीं. मगर इस तरह के प्रतीकात्मक पहल इस दिशा में समाज को कुछ सोचने पर जरूर विवश करते हैं. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री, मेनका गांधी ने अपना निजी विचार रखा था कि लिंग जांच को अनिवार्य कर देना चाहिए. ताकि जिन महिलाओं के गर्भ में लड़की है, उन का ध्यान रखा जा सके. इस जांच को रजिस्टर किया जाए ताकि पता लग सके कि इन लड़कियों को जन्म दिया गया या नहीं. इस तरह कन्या भू्रण हत्या पर लगाम कसी जा सकती है.

क्या कहता है कानून

भारतीय कानून में प्री कंसेप्शन एंड प्री नेटल डायगनास्टिक टेकनीक एक्ट 2002 के अनुसार गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच करना, शब्दों या इशारों से गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग के बारे में बताना या पता करना, गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच कराने का विज्ञापन देना, गर्भवती महिला को उस के गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग के बारे में जानने के लिए उकसाना, किसी व्यक्ति द्वारा रजिस्ट्रेशन करवाए बिना प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीएनडीटी) अर्थात अल्ट्रासाउंड इत्यादि मशीनों का इस्तेमाल करना, गर्भवती महिला को उस के परिजनों या अन्य के द्वारा लिंग जांचने के लिए प्रेरित करना एक कानूनन अपराध है. इस से पहले हमारे देश में प्री नेटल डायगनोस्टिक एक्ट 1994 था, लेकिन इस कानून में प्री कंसेप्शन डायगनोसिस का प्रावधान न होने की वजह से  नया कानून लाया गया.

कानून का उल्लंघन करने पर सजा

प्री कंसेप्शन एंड प्री नेटल डायगनोस्टिक टेकनीक एक्ट 2002 के अनुसार पहली बार कानून का उल्लंघन करने पर अपराधी को 3 साल की कैद व 50 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है. दूसरी बार पकड़े जाने पर 5 साल की कैद व 1 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है. वहीं लिंग की जांच करने का दोषी पाए जाने पर क्लीनिक का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा.

कुनाल मदान, अधिवक्ता, के एम ए ला फर्म का कहना है कि कन्या भू्रण हत्या भी कत्ल के समान ही एक गंभीर अपराध है इसलिए इस जघन्य अपराध के लिए तीन साल की सजा अपर्याप्त है. मेरा मानना है कि मौजूदा कानून को और अधिक सख्त बनाया जाना चाहिए. अभी हाल ही में अलाहबाद हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए एक महिला को जिस ने लड़के की चाहत में अपनी 3 साल की लड़की के कत्ल को अंजाम दिया, को उम्र कैद की सजा सुना कर पूरे समाज को एक बड़ा सबक दिया है. इसलिए जरूरी है कि कानून को और अधिक सख्त बनाया जाए तभी भू्रण हत्या को नियंत्रित किया जा सकेगा.

जरूरी है कि लोगों की मानसिकता बदली जाए, महिलाओं को शिक्षित किया जाए, समाज को जागरुक बनाया जाए, ताकि लड़कियों को उन के हिस्से का आसमान मिल सके और किसी भी अजन्मी बच्ची का हृदय यह चीत्कार न करे कि

‘मेरा भी था यह अरमान

बढ़ाऊं घरवालों का मान

मगर कोख में ही ले ली गई

अपनों द्वारा मेरी जान……

जूनियर हॉकी विश्व कप की मेजबानी करेगा लखनऊ

आगामी दिसंबर महीना लखनऊ के लिए बड़ा गौरवांतित रहेगा. नवाबों का शहर लखनऊ जूनियर पुरुष हॉकी विश्व कप 2016 की मेजबानी करेगा.

हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात के दौरान टूर्नामेंट की मेजबानी की पेशकश की जिसे स्वीकार कर लिया गया है. अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा ने सीएम अखिलेश यादव से मुलाकात कर उनको हॉकी सौंपा है.

यह जानकारी यूपी गर्वनमेंट ने ट्वीट करके दी है. आगामी 8 दिसम्‍बर से 18 दिसम्‍बर तक लखनऊ में जूनियर हॉकी विश्‍व कप खेला जाएगा. इस मौके पर खेल निदेशक आरपी सिंह भी मौजूद रहे.

पहली बार लखनऊ में किसी अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा. प्रवक्ता ने बताया कि बत्रा ने अखिलेश से उनके सरकारी आवास पर मुलाकात की.

इस दौरान बत्रा ने लखनऊ में खेल अवस्थापना व अन्य सुविधाओं के मद्देनजर यहां पर जूनियर पुरुष हॉकी विश्व कप 2016 के आयोजन की पेशकश की. मुख्यमंत्री ने इसे तुरंत स्वीकार करते हुए टूर्नामेंट की मेजबानी का फैसला ले लिया. बत्रा ने इस अवसर पर बताया कि जूनियर हॉकी विश्व कप जूनियर वर्ग की विश्व की सबसे प्रतिष्ठित हॉकी प्रतियोगिता है.

इस टूर्नामेंट में दुनिया की सबसे अच्छी 16 जूनियर पुरुष हॉकी टीमें हिस्सा लेंगी. प्रतियोगिता में भाग लेने वाली टीमें भारत, अर्जेंटीना, आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाडा, मिस्र, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान, कोरिया, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका और स्पेन हैं. प्रतियोगिता का भारत सहित दुनिया के 100 से भी ज्यादा देशों में सीधा प्रसारण किया जाएगा.

अपनी आंखें दान करेंगी काजल अग्रवाल

काजल अग्रवाल अपनी अगली फिल्म ‘दो लफ्जो की कहानी’ में ‘ब्लाइंड गर्ल’ की भूमिका निभाकर इतनी प्रभावित हुई हैं कि उन्होंने अपनी आंखे दान करने का संकल्प ले लिया है. वह कहती हैं कि अपनी भूमिका को लेकर मैंने ‘विजुअली इम्पेयर्ड’ छात्रों के बीच काफी समय बिताया है, उनके हाव-भाव को करीब से देखा है. मैं बहुत इमोशनल हो गई हूं कि कैसे वे बिना आँखों के भी आत्मनिर्भर हैं.

इस काम में रणदीप हुड्डा ने भी साथ दिया है, उनका कहना है कि इस फिल्म के ज़रिये मैंने जाना है कि उनकी दुनिया कैसी है. मैं भी अपनी आंखें डोनेट करना चाहता हूँ. ये एक छोटा सा प्रयास मेरी तरफ से उनके लिए रहेगा.

                       

रितिका के लिए बिकनी पहनना शान की बात

मशहूर ग्लैमरस मॉडल रितिका गुलाटी अब फाएज अनवार और प्रेम प्रकाश गुप्ता निर्मित फिल्म ‘‘लव के फंडे’’ से अभिनय जगत में कदम रखी रही हैं. इस फिल्म में रितिका गुलाटी बिकनी पहनने के साथ साथ लव मेकिंग सीन और इंटीमेसी के सीन में भी नजर आने वाली हैं. बिकनी पहनने को लेकर लोग उन पर कई तरह के सवाल उठा रहे हैं. लोगों की राय में रितिका गुलाटी को करियर की पहली ही फिल्म में इस तरह के सीन नहीं देने चाहिए थे.

इसी संदर्भ में ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए मूलतः दिल्ली निवासी मॉडल व अभिनेत्री रितिका गुलाटी ने कहा-‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि दूसरों को हमारे पहनावे पर इतना हो हल्ला करने की जरुरत क्यों महसूस होती है. हर इंसान को अपनी पसंद की पोशाक पहनने की आजादी है. मैं इंटरनेशनल मॉडल हूं. अब तक सैकडों अवसरों पर मैं बिकनी पहन चुकी हूं. मैं तो किंगफिशर के कलेंडर के लिए बिकनी मॉडल रह चुकी हूं. मैंने 2012 में ‘मिस दिल्ली’ का खिताब जीता था. तब से मॉडलिंग करती आ रही हूं. बिकनी पहनने को लेकर मैं बहुत कम्फर्टेबल हूं. इसलिए मुझे इस फिल्म के लिए बिकनी सीन देने में कोई समस्या नजर नहीं आयी.

यह मेरा काम है. कलाकार के तौर पर हमें अपने प्रोफेशन के प्रति ईमानदार होना ही चाहिए. वैसे मेरी निजी जिंदगी अलग है. मेरी समझ में नहीं आता कि जब भी कोई नई अदाकारा बिकनी पहनती है, तो लोग नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं. पर जब बड़ी व मशहूर अभिनेत्रियां परदे पर बिकनी पहने हुए नजर आती हैं, तो लोग उनकी तारीफ करते हुए नहीं थकते. वैसे यदि आप सफल हैं, तो आप जो कुछ करते हैं, वह फैशन कहलाता है. पर यदि आप असफल हैं, तो लोग आपके अंदर सौ बुराइयॉं ढूढ़ लेते हैं. यह दोहरा मापदंड तो गलत है. जब मैने पहली बार मॉडलिंग करते हुए बिकनी पहनी थी, तो मेरे घर के लोगों को अटपटा सा लगा था. पर धीरे धीरे उनकी समझ में आ गया कि यह मेरे काम का एक हिस्सा है. वैसे फिल्म ‘लव के फंडे’ की कहानी व मेरे किरदार की मांग के अनुरूप ही मैने बिकनी पहनी है या लव मेकिंग सीन किए हैं.’’

अपनी पहली फिल्म ‘‘लव के फंडे’’ की चर्चा करते हुए रितिका गुलाटी ने कहा- ‘‘यह एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है. जिसमें मैंने एक योगा टीचर का किरदार निभाया है. पूरी फिल्म कश्मीर में फिल्मायी गयी है.’’

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