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प्रवासी भारतीयों को सरकार का बड़ा तोहफा

सरकार ने प्रवासी भारतीयों को भी ई-एनपीएस की सुविधा दे दी है जिससे वे नव पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत ऑनलाइन खाता खोल सकेंगे. वित्त मंत्रालय ने बताया कि प्रवासी भारतीयों के लिए एनपीएस की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन उन्हें ऑनलाइन खाता खोलने की सुविधा नहीं दी गई थी. अब उन्हें यह सुविधा प्रदान कर दी गई है.

इसके लिए उनके पास आधार कार्ड या पैन कार्ड होना जरूरी है जिसके आधार पर वे खाता खोलेंगे. दुनिया के प्रवासियों में संख्या के आधार पर भारत दूसरे स्थान पर हैं. देश के दो करोड़ 90 लाख लोग 200 अलग-अलग देशों में रहते हैं. इनमें 25 फीसदी तो सिर्फ खाड़ी के देशों में ही है. मंत्रालय ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में प्रवासियों की भूमिका महत्वपूर्ण है.

खाड़ी के देशों तथा कुछ अन्य देशों में जाने वाले अधिकतर भारतीय रोजी की तलाश में वहां जाते हैं और कुछ समय काम करने के बाद स्वदेश लौट आते हैं. उनके बुढ़ापे के लिए एनपीएस दीर्घकालीन आय सुरक्षा उपलब्ध करा सकती है.

बढ़ती भाजपा, घटती कांग्रेस

हालिया संपन्न हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस हारी है पर इतनी बुरी तरह नहीं कि उस का घाट पर ले जा कर अंतिम संस्कार कर दिया जाए. यह पक्का है कि भारतीय जनता पार्टी ने धीरेधीरे देशभर में वर्चस्व का स्थान बना सा लिया है जो पहले कांग्रेस का था. भाजपा कहीं भी किसी भी स्थानीय पार्टी की खरीदफरोख्त कर के अपने पैर फैला सकती है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में कांगे्रस से जिन पार्टियों ने समझौते किए वे हार गईं, हालांकि बिहार में कांगे्रस के साथ का प्रयोग सफल रहा था. असल में कांगे्रस और भारतीय जनता पार्टी की सोच में खासा अंतर नहीं है. सफेद खादी की पोशाक, टोपी, झोला लिए कांगे्रसियों की पहचान वैसी ही रही है जैसी भगवा जैकेट, भगवा मफलर, तिलक भाजपाइयों की निशानी हैं. 1947 से कई दशकों तक कांगे्रस पर ऊंची जातियों के नेताओं का वर्चस्व रहा, वैसा अब भारतीय जनता पार्टी में है. फर्क इतना है कि भाजपा अब भी पिछड़ों और दलितों को दूर रखती है जबकि कांग्रेस ने उन्हें जरा बराबरी की जगह दी जिस की वजह महात्मा गांधी की हरिजन उद्धार नीति थी.

1947 के बाद गांधी गए तो कांग्रेस के पास हरिजनों के लिए कुछ करने को नहीं बचा. इतने साल कांग्रेस ने राज किया तो इसलिए कि ऊंची जातियों ने उस पर कब्जा कर रखा था पर जैसेजैसे जमीनों से मिलती आय के कारण पिछड़े इस में आने लगे तो कांग्रेस के ऊंची जातियों के नेता व कार्यकर्ता भाजपा में जा खड़े हुए. भाजपा उन की वजह से मजबूत हुई है पर कांग्रेस इसी कारण कमजोर हुई हो, यह जरूरी नहीं. दिक्कत यह है कि कांग्रेस का नेतृत्व आज भी ऊंची जातियों के कब्जे में है. उत्तराखंड में जो लड़ाई चली थी वह जाति की थी जिस में विजय बहुगुणा श्रेष्ठ ब्राह्मण होने के कारण सत्ता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान रहे थे. वहां कांग्रेस को बचाया तो दलितों की बहुजन समाज पार्टी ने.कांग्रेस को जरूरत है कि वह दलितों और पिछड़ों को जगह दे. उन का खैरखयाल रखने वाली कोई पार्टी नहीं बची. कांग्रेस की सोनिया गांधी और राहुल गांधी खुद को भले ऊंचे कश्मीरी पंडित खून से जोड़ लें पर एक तरह से वे जातिविहीन, धर्मविहीन नेता  हैं. वे इस का लाभ 2004 व 2009 में उठा चुके हैं और फिर उठा सकते हैं. दक्षिण में तमिल पार्टियां जयललिता और करुणानिधि के इर्दगिर्द सीमित हैं. ओडिशा की पिछड़ी जातियों को नवीन पटनायक के अलावा कोई नहीं दिखता. उत्तर प्रदेश में हर जाति ने अपनी पार्टी बना रखी है और भाजपा उन में आसानी से सेंध लगा सकती है. कांग्रेस के पास आज भी अवसर हैं पर कांगे्रसी नेता आज जमीन पर जा कर काम करने को तैयार नहीं. लाइसैंस, कोटा, परमिट राज के 70 वर्षों ने कांग्रेसियों को पैसे वाला बना डाला और वे ऐशोआराम के आदी हो गए हैं.

कांग्रेस को विश्वविद्यालयों में इन युवाओं में अपने समर्थक ढूंढ़ने होंगे जो सवर्णों के बच्चों के आगे अपने को दीनहीन समझते हैं. भाजपा का वहां मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट आगे आए, कांगे्रसी नहीं. कांग्रेस ने औरतों को भी छोड़ दिया है. औरतों की समस्याएं कम नहीं हैं. महिलाओं को आरक्षण दे कर या एकदो कानून बना कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती. सवाल यह है कि यह करेगा कौन? भाजपा ने बड़ी सफलता से राहुल गांधी की इमेज एक नौसिखिया की बना दी है. अब बचा कौन? इस का जवाब न मिला, तो अंतिम संस्कार पक्का है.

सपा के खिलाफ भाजपा का ‘कांग्रेसी दांव’

किसी झूठ को अगर बार बार कहा जाये तो वह सच दिखने लगता है. भाजपा ने इस दांव को कांग्रेस के खिलाफ लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल किया. इस दांव से वह कांग्रेस को पटखनी देने में सफल भी हो गई. अब यही दांव भाजपा समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार पर आजमा रही है. भाजपा के मजबूत प्रचार तंत्र का जवाब देने में समाजवादी पार्टी और अखिलेश सरकार दोनो ही नाकाम हो रही है क्योकि वह सत्ता के नशे में चूर है.

सपा सरकार अपनी कमियों को पहचान कर उसे दूर करने के बजाय कमी बताने वाले को विरोधी समझने का आत्मघाती कदम उठा रही है. जिससे सत्ता का लाभ लेने के लिये लोगो ने सपा सरकार की कमियों को बताने की जगह पर झूठी वाहवाही करनी शुरू कर दी है. सपा सरकार ऐसे अफसरों से घिरी है, जो सरकार को जमीनी सच से दूर रख रहे है.

मथुरा कांड इसकी बहुत बडी मिसाल है. लोकसभा चुनाव की हार के बाद अखिलेश सरकार ने अपने अच्छे कामों से जो इमेज सुधारी थी, मथुरा कांड ने उस पर पानी फेर दिया. चुनावी साल में एक भी गलती पूरी मेहनत पर कैसे पानी फेर देती है इसका अहसास मुजफ्फरनगर कांड के बाद सपा को हो जाना चाहिये था. ‘मथुरा कांड‘ के गरम लोहे पर हथौडा मारते हुये भाजपा ने ‘कैराना के पलायन’ पर सरकार को घेर लिया है. सपा सरकार को तथ्यों के साथ इस ‘कैराना के पलायन’ पर जवाब देना चाहिये. सपा की सरकार और पार्टी दोनो ही स्तर पर इस मसले मजबूत तरीके से नहीं लिया गया. सपा नेता कैराना के बचाव पर गुजरात की चर्चा करने लगे तो सरकार तथ्यों को तलाश नहीं कर पाई.

प्रदेश सरकार अगर कैराना से पलायन की मुख्य वजहो को सामने रखती तो जनता सच को समझ सकती. कैराना का मामला भी काफी हद तक कानून व्यवस्था से जुडा मसला है. सपा की सरकार को लग रहा है कि वह धार्मिक यात्राओं को हरी झंडी दिखा कर अपने को हिन्दुत्व की दौड में शामिल कर लेगी. सपा यह भूल जाती कि जनता ‘कार्बन कापी‘ को खारिज कर देती है. लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा और जनता को कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के लिये वोट देने के लिये कहा. सत्ता में आने के बाद भाजपा इन दोनो मुददो पर कुछ नया नहीं कर पाई.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त’ की जगह ‘सपा मुक्त प्रदेश’ का नारा दिया है. भाजपा सपा के खिलाफ पूरी तरह से आक्रामक होकर उसे हिन्दू विरोधी और खराब शासन करने वाली पार्टी साबित करने में जुट गई. मजबूत प्रचार तंत्र के चलते भाजपा सपा पर भारी पड रही है. सत्ता में रहने और सरकारी प्रचार तंत्र होने के बाद भी सपा इसका मुकाबला नहीं कर पा रही क्योकि वह नौकरशाही के गलत फैसलों का शिकार हो रही है. सपा के बडे नेता कांग्रेसी नेताओं की ही तरह जनता से दूर अपनी दुनिया में व्यस्त है.

भाजपा ‘जमीन पर अवैध कब्जा‘ और ‘कानून व्यवस्था‘ जैसे मुद्दों को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन देकर सपा सरकार को कठघरे में खडा करने में लगी है. यह सही है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे कोई कदम नहीं उठायेगी पर इस तरह के मुद्दे को हवा देकर सपा सरकार को मानसिक रूप से दबाव में रखेगी, जिससे वह चुनाव के पहले ही बेदम हो जाये.             

पुराने चेहरों की गुलामी से कब आजाद होगी कांग्रेस

किसी भी योद्धा के लिये लड़ाई तब बहुत मुश्किल हो जाती है, जब उसे अपने ही फैसले से लड़ना होता है. कांग्रेस की हालत भी कुछ ऐसी ही हो रही है. कांग्रेस में एक राय बनी की पार्टी को युवा और मेहनती नेताओं और कार्यकर्ताओं को आगे लाना है. जब देश के सबसे बडे प्रदेश की चुनावी जंग में उतराने की बारी आई, तो कांग्रेस ने गुलाम नबी आजाद जैसे पुराने नेताओं को प्रदेश प्रभारी बना दिया. गुलाम नबी आजाद के बाद मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को उतारने की अंदरखाने कांग्रेस में चर्चा चल रही है. कांग्रेस को अगर उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में खड़े होना है, तो उसे पुराने चेहरों के मोह से आजाद होना पड़ेगा. दरअसल कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने पुराने वोट बैंक मुसलिम, ब्राहमण और दलित गठजोड को खोजना चाह रही है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमजोर हालत को देखते हुये यह नामुमकिन लग रहा है कि केवल जातीय चेहरो को देखकर लोग जुड़ सकेंगे. उत्तर प्रदेश में अलग अलग जातियों के दल बन चुके है. सत्ता में रहते हुये वह कांग्रेस से कहीं अधिक मजबूत और प्रभावी भी है. उनके नेता आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत मजबूत और दंबग हालत में हैं. 1990 से पहले की राजनीति और आज के दौर की राजनीति में बहुत बडा बदलाव हो चुका है. आज की राजनीति में मनीपावर का प्रयोग और असर बढ गया है. पुराने कांग्रेसी नेताओं में कोई उत्साह नजर नहीं आता. वह केवल कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में अपना दखल बनाये रखने के लिये कैमरों के आगे चमकते दिखते हैं.

गुलाम नबी आजाद और शीला दीक्षित ऐसे नेता हैं जो अपने अपने राज्यों में अपना चमक खो चुके हैं. ऐसे में उत्तर प्रदेश में इनसे उम्मीद करना पूरी तरह से बेमानी है. अगर यह नेता इतने ही प्रभावी होते, तो अपने प्रदेश की सत्ता से बेदखल क्यो होते ? कांग्रेस को भाजपा से सीखना चाहिये लोकसभा चुनावों में किस तरह से भाजपा ने अपने ऊचें ऊंचे कद के बड़े नेताओं को लाभ विरोध के बाद भी किनारे किया और नई टीम के साथ चुनाव को जीता. कांग्रेस को अपने पुराने नेताओं के मुकाबले युवा ब्रिगेड को सामने लाना होगा. उत्तर प्रदेश के राजनीति समीकरणों को देखे तो जातीयता पर धर्म हावी हो चुका है. दलित और पिछडी जातियों के नेता और जनता का बडा वर्ग धर्म के झांसे में बुरी तरह से फंसा हुआ है.

भाजपा ने अपने मजबूत प्रचारतंत्र के बल पर हिन्दुत्व को चुनावी मुद्दा बनाने में सफलता हासिल की है. लोकसभा चुनाव में हिदुत्व के ही मुद्दे पर बडी संख्या में पिछडों और उससे कुछ कम संख्या में दलितों ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया. जिसकी वजह से भाजपा प्रदेश में 73 सीटों पर जीत हासिल की. 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा अपने उसे मुद्दे को हवा देने में लगी है.

इलाहाबाद में भाजपा की बैठक में इलाहाबाद की जगह ‘प्रयाग‘ का नाम बारबार इसी लिये प्रयोग किया गया. ‘कैराना’ में हिन्दुओं के पलायन को लेकर उठी बहस ऐसा ही मुद्दा है. भाजपा राम का नाम लिये बिना चुनाव को धार्मिक दिशा देने में जुटी है. ऐसे में कांग्रेस को नये जोश से मैदान में आना चाहिये. पुराने चेहरों का कांग्रेस में उत्साह कुछ समय का होता है. विश्वास न हो तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री और प्रभारी रहे मधुसूदन मिस्त्री की हालत देख लीजिये, उनका नाम पोस्टर तक में नहीं दिख रहा.

                      

उड़ता पंजाबः ड्रग्स की समस्या पर बीमार फिल्म

फिल्म की कहानी कई ट्रैक पर चलती है. पर शाहिद कपूर का टॉमी सिंह का किरदार कहानी में जैसे आगे बढ़ता है, वैसे ही वह जोकर नजर आता है. जो कहीं से भी प्रभावित नहीं करता. यह डार्क फिल्म धीरे धीरे ड्रग्स पर बनी एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनकर रह जाती है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है मशहूर पॉप गायक टॉमी सिंह (शाहिद कपूर) से, जो कि अपने गानों में युवा पीढ़ी को ड्रग्स लेने यानी कि नशाखोरी के लिए प्रेरित करता है. उसके गानों को सुनकर हर युवा ‘गबरू’ बनना चाहता है, अब ‘गबरू’ कौन है, यह तो खुद टॉमी सिंह भी नही जानते. उधर सड़क पर वाहनों की चेकिंग करने वाला पुलिस दल हर माह दस हजार रूपए के एवज में ड्रग्स के ट्रकों को बिना किसी जांच  के आने जाने देता है. पता चलता है कि यह दस हजार रूपए पहलवान नामक एमएलए देता है. पर अचानक मंत्री का फोन पाकर यही पुलिस बल, जिसमें इंस्पेक्टर सरताज (दिलजीत दोसांज) है, पॉप स्टार टॉमी सिंह को उसके घर से पकड़ कर जेल में ठूंस देता है.

उधर कर्नल के खेतों में एक बिहारी लड़की (आलिया भट्ट) काम करती है. जब वह खेतों में काम कर रही होती है, तभी एक ड्रग्स डीलर दूसरे ड्रग्स के कारोबारी को तीन किलो हीरोईन का पैकेट देने आता है, तो वह गलती से इस बिहारी लड़की के हाथ लग जाता है. जब सरताज अपने घर पहुंचता है, तो पता चलता है कि उसका छोटा भाई बल्ली कालेज पढ़ने नहीं जाता. सरताज खुद बल्ली को कालेज के दरवाजे छोड़ते हुए नाश्ते के लिए पैसा देता है. बल्ली उसी पैसे से ड्रग्स खरीदकर अपने दोस्तों के पास पहुंचकर ड्रग्स लेना शुरू करता है. वहीं पर एक बिहारी लड़की आती है, जो कि ड्रग्स बेचना चाहती है. तो बल्ली उसे एक बड़े व्यापारी का मोबाइल नंबर दे देता है. पर खुद बल्ली जरूरत से ज्यादा ड्रग्स लेने के कारण अस्पताल पहुंच जाता है. जहां डॉक्टर प्रीती साहनी (करीना कपूर) उसका इलाज करती है.

जब पुलिस की वर्दी में सरताज अपनु भाई बल्ली का हाल चाल लेने पहुंचता है, तब डॉक्टर उसे खरी खोटी सुनाती है. डॉक्टर प्रीती साहनी का मानना है कि जब उसका भाई ड्रग्स की वजह से मौत से लड़ रहा है, तब उसे फिक्र हो रही है. पर पूरे पंजाब में लोग ड्रग्स की वजह से मौत की तरफ जा रहें हैं, उसे बचाने कि फिक्र उसे क्यों नही है. यहां पर पहली बार सरताज का अपना अंदर का जमीर जागता है. वह पुलिस स्टेशन पहुंचता हैं, जहां टॉमी सिंह चिल्ला रहा है कि उसकी बात मंत्री ब्रार से करायी जाए. सरताज गुस्से में उसे पीटता है और फिर उसे उस कोठरी में बंद कर देता है, जहां तमाम बच्चे व बूढे़ बंद हैं. वह बच्चे और बूढ़े उससे गाना सुनना चाहते हैं.

वहीं पर एक टीनएजर बालक टॉमी सिंह से कहता है कि उसने उसके गाने सुन सुनकर ड्रग्स लेना शुरू किया. एक दिन उसने अपनी मां से पैसे मांगे, मां ने पैसे नहीं दिए, तो मां की हत्या कर दी और अब जेल में है. यह सुनकर टॉमी सिंह ड्रग्स न लेने और ड्रग्स लेने की बात करने वाला गाना न गाने का निर्णय लेता है.

हीरोइन बेचने के लिए निकली बिहारी लड़की उन्ही ड्रग्स डीलर के हाथों पड़ जाती है, जो अपने हीरोइन के पैकेट की तलाश कर रहे थे. यह गिरोह इस लड़की को अपने अड्डे पर बंदी बनाकर रखने के साथ ही सभी उसके साथ सेक्स संबंध स्थापित करते हैं. उसे हर दिन ड्रग्स का इंजेक्शन लगाते हैं. यहां तक कि पुलिस अफसर भी इस बिहारी लड़की के संग सेक्स संबंध बनाने आते रहते हैं.

जबकि सरताज और प्रीती साहनी ड्रग्स कहां बनता है, कैसे बनता है, इसका व्यापार किस तरह जाली कागजों से किया जाता है, इसकी जांच पड़ताल जासूसों की तरह करना शुरू करते हैं. तो पता चलता है कि आने वाले चुनाव में मंत्री ब्रार अपनी चुनावी सभाओं में लोगों को अपने चुनाव प्रचार के कागज के अंदर ड्रग्स की बोटलें लपेट कर बांटने वाले हैं. धीरे धीरे मंत्री, एमएलए और पुलिस के खिलाफ सारे सबूत प्रीती साहनी व सरताज जुटा लेते हैं.

इसी बीच बिहारी लड़की भागने में सफल हो जाती है. दूसरी तरफ टॉमी लंबे समय बाद फिर जिन्न की तरह उभरता है और ड्रग्स लेकर संगीत का कार्यक्रम देने जाता है. जहां वह पहली बार लोगों से ड्रग्स न लेने की अपील करता है, पर वहां मौजूद भीड़ उसका भाषण नही गाना सुनना चाहती है. मजबूरन वहां से नशे में चूर टॉमी सिंह को भागना पड़ता है. फिर टॉमी सिंह तथा बिहारी लड़की मिलते हैं. टॉमी सिंह का पीछा कर रहे चार नवजवानों को बिहारी लड़की पिटायी कर भगा देती है. पर पता चलता है कि यह लड़की बिहार राज्य स्तर की हाकी खिलाड़ी रह चुकी है. तभी ड्रग्स गिरोह के वही सदस्य पुनः बिहारी लड़की को पकड़ कर ले जाते हैं. जब टॉमी सिंह के सिर से ड्रग्स का असर कम होता है, तब वह बिहारी लड़की को ढूढ़ने निकलता है.

सरताज के स्कूटर पर डॉक्टर प्रीती साहनी को आते जाते देख बल्ली को गुस्सा आता है. सरताज व डॉक्टर प्रीती साहनी अपने जमा किए गए सबूत इलेक्शन कमीशन के पास पहुंचाते, उससे पहले ही नाटकीय घटनाक्रम में बल्ली के हाथों डॉक्टर प्रीती साहनी मारी जाती है. पुलिस अफसर बल्ली को बचाने की बात कर ड्रग्स के मुख्य कारोबारी के अड्डे पर भेज देता है. सरताज को फोन करके बुलाता है. पुलिस अफसर अब डॉक्टर प्रीती साहनी की मौत को नया रंग देने के लिए कुछ चीजे उठाकर थैले में भरना शुरू करता है, तभी उसके हाथ कुछ फोटो व सारे सबूत लग जाते हैं. उनमें अपना भी नाम देखकर वह चौंकता है. जब वहां सरताज पहुंचता है, तो वह सरताज को मारना चाहता है. पर खुद मारा जाता है.

इधर टॉमी सिंह वहां पहुंच जाता है, जहां बल्ली भी है और वह बिहारी लड़की भी. यह लोग मिलकर ड्रग्स गिरोह के मौजूद सभी लोगो को मौत के घाट उतार देते हैं. फिर टॉमी उस बिहारी लड़की व अपने ग्रुप के लोगों के साथ गोवा पहुंच जाता है.

फिल्म में टॉमी सिंह के किरदार में शाहिद कपूर फिल्म के शुरूआत के कुछ सीन में नजर आते हैं, उसके बाद वह कहां गायब हो जाते हैं, पता नहीं चलता. कहानी अलग ढर्रे पर चली जाती है. इंटरवल के बाद हताश टॉमी सिंह के दर्शन होते हैं. पूरी फिल्म में लंबे बाल व अजीबोगरीब शक्ल सूरत के साथ शाहिद कपूर किसी जोकर से कम नजर नहीं आते. उनके चेहरे पर कही कोई भाव नजर नहीं आता. जेल में जब एक बालक उन्हे अहसास करा देता है कि वह अपने गानों में युवा पीढ़़ी को ड्रग्स लेने की बात करके गलत काम कर रहे थे, तब भी उनका चेहरा सपाट नजर आता है. उनके चेहरे पर पछतावे का कोई चिन्ह नजर नहीं आता. अभिनय के दृष्टिकोण से उनकी परफार्मेंस बहुत ही घटिया है. शाहिद कपूर को याद रखना चाहिए कि बेवजह कहीं भी गालियां बकना या अपने गाने में सिर्फ गालियां बकना ही अभिनय नही है.

जहां तक आलिया भट्ट का सवाल है, तो यह बात समझ में नहीं आती कि आलिया भट्ट फिल्म की पटकथा पढ़कर इस फिल्म से जुड़ने के लिए क्यो बेताब हुई थीं. आलिया भट्ट के किरदार को लेकर फिल्म के लेखक व निर्देशक पूरी तरह से कंन्फ्यूज नजर आते हैं. फिल्म के लेखक निर्देशक अभिषेक चौबे ने जानबूझकर गलती की है या वास्तव में इन्हें खेल वगैरह के बारे में कुछ समझ नही है. फिल्म में बिहारी लड़की बताती है कि वह बिहार में राज्य स्तर की हाकी खिलाड़ी रही है और राष्ट्रीय स्तर पर वह हाकी खेलना चाहती थी, पर पिता कि मौत के कारण उसे पंजाब के खेतों में काम करना पड़ जाता है.

(बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को समझना चाहिए कि उनके सुशासन में राज्य स्तर की महिला हाकी खिलाड़ी के साथ क्या होता है.) पर राज्य स्तर की खिलाड़ी कुछ तो पढ़ी लिखी व समझदार होती है. पर यहां फिल्म में हीरोइन या कोकीन यानी कि ड्रग्स का पैकेट पाने के बाद जिस ढंग से प्रतिक्रिया देती है, उससे लगता है कि वह एक अनपढ़ गंवार है. इतना ही नहीं जब पहली बार ड्रग्स गिरोह के सदस्य अपने अड्डे पर उसके साथ गलत काम करना चाहते हैं, तब उन नशेड़ियों का वह विरोध नहीं कर पाती. मगर पर लंबे समय तक हर दिन ड्रग्स का इंजेक्शन लेते लेते पूरी तरह से नशेड़ी बन चुकी वही बिहारन जिस तेज गति से भागती है, जिस तरह से चार गुंडों को अपनी हाकी से पीट कर भगा देती है, यह बात गले नहीं उतरती.

यूं भी आलिया भट्ट के किरदार के पास करने के लिए कुछ खास था नहीं, पर जो कुछ था, वहां भी वह सही ढंग से परफार्म नहीं कर पायी. सिर्फ चंद संवाद दूसरे राज्य की भाषा में बोल देना या एक लड़की होते हुए भी गंदी गालियां बकना ही किरदार के साथ न्याय करना नहीं होता. सिर्फ मेकअप के सहारे अभिनय नहीं किया जाता.

पंजाबी फिल्मों के स्टार कलाकार दिलजीत दोसांज ने इस फिल्म से हिंदी फिल्मों में कदम रखा है. पुलिस इंस्पेक्टर सरताज के किरदार में उन्होंने ठीक ठाक काम किया है. पर वह इससे भी अधिक बेहतर परफार्मेस दे सकते थे. जहां तक करीना कपूर का सवाल है, तो उन्होने अपने हिसाब से ठीक ही काम किया है.

फिल्मकार ने इस फिल्म में जिस तरह से पंजाब को ड्रग्स में डूबा दिखाया है, वह बहुत ही अजीब सा लगता है. फिल्म खत्म होने के बाद एक दर्शक की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है. उसने कहा -‘‘हमारा पंजाब इतना गंदा तो नहीं है.’’

बेसिर पैर की कहानी व बेवजह की अति गंदी गालियों वाली फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ में ड्रग्स की समस्या को जिस तरह से पेश किया गया है, उसे देखते हुए लगता है कि हम किसी समाचार चैनल पर खबर देख रहे हैं. इस डार्क फिल्म में कहीं भी भावनाएं या संवेदनाएं उभर कर नहीं आती. जिसके चलते यह फिल्म किसी भी स्तर पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ती. ड्रग्स के कारोबार से पुलिस, सरकार व सिस्टम के जुडे़ होने की खबरें काफी पुरानी है. इसी खबर को भी प्रभावशाली तरीके से फिल्म पेश नहीं कर पाती. फिल्म का क्लायमेक्स अति हिंसक व हास्यास्पद है.

फिल्म की कहानी एक डार्क कहानी है, जो कि पंजाब में नशाखोरी के चलते बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी को बचाने के मकसद के साथ बनायी गयी है, पर फिल्म में यह संदेश पूरी तरह से उभरकर नही आता. फिल्म तो ड्रग्स के कारोबार पर बनी डाक्यूमेंट्री ही नजर आती है. फिल्म में जेल के अंदर टीनएजर बालकों व टॉमी सिंह के बीच हुई बातचीत के बाद यह बात उभरती है कि अब टॉमी सिंह ड्रग्स का प्रचार नहीं करेगा. यह एक सकारात्मक सीन है. पर इस सीन को भी और प्रभावशाली बनाया जा सकता था. ड्रग्स जैसी समस्या व मादक पदार्थों की तस्करी को लेकर  इससे कई गुना ज्यादा बेहतर फिल्म बनायी जा सकती थी.

जिन्हें सिनेमायी परदे पर पंजाब का काला पक्ष या पूरे पंजाब को काले स्याह रंग में डूबा हुआ  देखना है, वही फिल्म देखने जाएंगे. मनोरंजन की चाह रखने वालों के लिए यह फिल्म नही है. इसके अलावा पूरी फिल्म पंजाबी भाषा में हैं. इसके चलते भी दर्शक अपने आप कम हो जाते हैं. वैसे फिल्मकार ने पंजाबी संवादों व पंजाबी गाने के अंग्रेजी सब टाइटल की पट्टी जरुर चलायी है. पर फिल्म के बाक्स आफिस पर कमाल करने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती.

‘‘फैंटम फिल्मस’’ और ‘‘बालाजी मोशन पिक्चर्स’’ के बैनर तले बनी फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ की निर्माता एकता कपूर, अनुराग कश्यप, विकास बहल, मधु मेंटेना, लेखक व निर्देशक अभिषेक चौबे, संवाद लेखक सुदीप शर्मा, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन राजीव रवि व  कलाकार हैं- शाहिद कपूर, करीना कपूर, आलिया भट्ट, दिलजीत दोसांज.

विधानसभा चुनाव नतीजे: कहां गई भाजपा की लोकप्रियता

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को जिस जीत की उम्मीद थी वह उसे मिली नहीं.  वह इस बात से खुश है कि उस ने पहली बार असम में बहुमत से सरकार बना ली.  केरल में एक सीट जीत ली. भाजपा के रणनीतिकारों का कहना है कि दक्षिण भारत में पार्टी की सफलता बताती है कि लोगों का केंद्र सरकार पर भरोसा बढ़ा है. राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मिलने वाले वोट प्रतिशत को देखें तो पता चलता है कि भाजपा को लोकसभा के मुकाबले विधानसभा चुनावों में कम वोट मिले हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में असम में भाजपा को 7 सीटें मिलीं और उस का वोट प्रतिशत 36.86 था. विधानसभा चुनाव में भाजपा ने असम में सरकार तो बनाई पर उस का वोट प्रतिशत घट कर 29.5 रह गया. बंगाल में भाजपा का वोट प्रतिशत 17.2 से घट कर 10.2 रह गया.  केरल में जरूर भाजपा का मत प्रतिशत मामूली सा बढ़ा हुआ नजर आया. जहां 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे 10.33 प्रतिशत वोट मिले थे, विधानसभा चुनाव में 10.6 प्रतिशत हो गया. तमिलनाडु में भाजपा को लोकसभा चुनावों में 5.56 प्रतिशत वोट मिले थे जो विधानसभा में घट कर 2.8 प्रतिशत रह गया.   

भाजपा के लोग इस तर्क को स्वीकार नहीं करते. उन का मानना है कि लोकसभा चुनावों में मतदाता अलग मुददों पर वोट देता है और विधानसभा चुनावों में अलग मुददों पर वोट पड़ते हैं. भाजपा के पास इस बात का जवाब नहीं है कि जब लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मुद्दे अलग हैं तो जीत का श्रेय केंद्र सरकार को कैसे दिया जा सकता है. भाजपा के लिए परेशानी वाली बात यह है कि केंद्र में सरकार बनाने के बाद ‘मोदी मैजिक’ काम नहीं कर रहा है. भाजपा को केवल उन राज्यों में ही सफलता मिल रही है जहां उस का कांग्रेस के साथ मुकाबला होता है. भाजपा के मुकाबले में जिस प्रदेश में दूसरे दल हैं वहां पर भाजपा को जीत हासिल नहीं हो रही है. असम चुनाव में मिली जीत को वह केंद्र सरकार की सफलता से जोड़ती जरूर है पर उस के पास इस बात का जबाव नही है कि केंद्र्र की यह चमक तमिलनाडु, बंगाल, पुद्दुचेरी और केरल में क्यों दिखाई नहीं दी.

असम में भाजपा को जीत कांग्रेस के नकारेपन के कारण मिली है. असम में पिछले 15 सालों से लगातार कांग्रेस की सरकार बनती आ रही थी. कांग्रेस ने अपनी जीत के लिए स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रख कर चुनाव लड़ा. असम की जनता की समस्याओं को ले कर वहां की कांग्रेस सरकार ने कोई काम नहीं किया. कांग्रेस को लग रहा था कि जनता के सामने कोई विकल्प न होने के कारण वह कांग्रेस को ही वोट देगी. कांग्रेस के नेताओं की यही सोच पार्टी की हार का कारण बनी. लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस यही सोच रही थी कि भाजपा नेता नरेंद्र मोदी को देश का मतदाता स्वीकार नहीं करेगा. मजबूरी में कांग्रेस को वोट दे देगा, कांग्रेस को यह भूल जाना चाहिए.  आज मतदाता के पास विकल्प हैं, ऐसे में बिना काम के वोट नहीं मिलेगा. 

सच को छिपाने की जुगत

असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, पुद्दुचेरी और केरल के विधानसभा चुनावों में से भारतीय जनता पार्टी को केवल असम में जीत हासिल हुई. खेल की बोली में बात करें तो खेल का परिणाम 5-1 से भाजपा के पक्ष में रहा. जीत की खुशी का शोर भाजपा इस तरह से मचा रही है जैसे उस ने सभी मैच जीत लिए हों. जीत के शोर में भाजपा ने यह जताने की कोशिश की कि उस के 2 साल के कार्यकाल से पूरा देश खुश है. केंद्र में मोदी सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है. भाजपा जीत के शोर में दिखाई देने वाले सच को भूल जाना चाहती है. यह कहा जा रहा है कि असम में जिस टीम और मुद्दों ने जीत दिलाई, उस को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी जाए.

5 राज्यों के इन विधानसभा चुनावों और 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन को देखा जाए तो जीत के शोर में न दिखाई देने वाला सच सामने आ जाएगा. चुनाव परिणामों को थोड़ा आंकड़ों की नजर से देखें तो तमिलनाडु में भाजपा को 234 सीटों में 0 सीट, पुद्दुचेरी में 30 में से 0, केरल में 140 सीटों में

से 1, पश्चिम बंगाल में 294 में से 3 और असम में 126 में से 88 सीटें ही मिली हैं. महज एक राज्य में मिली जीत को पूरे देश का जनादेश बता कर केंद्र सरकार के

2 साल के कामकाज को सर्वश्रेष्ठ बताया जा रहा है.

सीटों के अलावा 5 राज्यों के चुनाव परिणामों को पार्टी को मिलने वाले वोट प्रतिशत से देखें तो भी साफ  दिखाई देगा कि 2014 के मुकाबले इन चुनावों में भाजपा की लोकप्रियता घटी है. जीत के शोर में भाजपा इन आंकड़ों को न खुद देखना चाहती है और न दूसरों को दिखाना चाहती है. इस सच को दरकिनार कर पूरी तरह से इस तरह बात को पुख्ता करने की कोशिश हो रही है कि पूरा देश केंद्र सरकार की नीतियों से खुश है.

पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए भाजपा केवल कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रही है. वहां वह यह समझना नहीं चाहती कि भाजपा कांग्रेस को हरा रही है पर दूसरों से हार रही है. जिस तरह की सोच पर भाजपा चल रही है, कभी यही सोच कांग्रेस की होती थी. कांग्रेस ने समय रहते अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं किया. जिस से प्रदेशों में धीरेघीरे उस का जनाधार सिमटता गया. कोई भी पार्टी अपने अखिल भारतीय स्वरूप में तब तक रहेगी जब तक वह प्रदेशों में मजबूत हालात में रहेगी. क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर सत्ता का गणित कुछ दिनों तक चल सकता है. भाजपा यह समझने का प्रयास नहीं कर रही कि 2014 के मुकाबले उस की लोकप्रियता घट रही है. उस का यही भुलावा उसे भारी पड़ेगा. समय रहते अपनी कमियों का निदान जरूरी है. इस के लिए जरूरी है कि अलोचनाओं को भी वह सकारात्मक रूप से ले. आलोचना को विरोध मान कर दरकिनार करना घातक साबित होता है.       

नाम नहीं, काम को वोट

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों में सब से बड़ा संकेत यह आया कि जनता नाम को नहीं, काम को देखती है. जो लोग यह मान कर चलते हैं कि चुनावों में सत्ता विरोधी हवा चलती है, वह गलत है. अगर नेता का काम अच्छा होगा तो उस को वोट जरूर मिलेगा. ऐसे दलों को सबक है जो सोचते हैं कि 5 साल मिली सत्ता की मलाई खा लो. आगे चुनाव का क्या पता? अगर सही तरह से सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचे, सरकार बिना किसी भेदभाव के काम करे तो जनता उस को फिर वोट देगी. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता की वापसी से यह बात साबित हुई है. 

यह सच है कि असम में केंद्र में सरकार चला रही भाजपा को सरकार बनाने में सफलता हासिल हुई है. यह उस के लिए इतिहास की बात हो सकती है. असम में भाजपा ने हिंदुत्व का जो कार्ड खेला उस की कोई काट कांग्रेस के पास नहीं थी. कांग्रेस को लग रहा था कि उसे असम में काम करने का लाभ मिलेगा.  भाजपा नरेंद्र्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को इस जीत का पूरा श्रेय दे रही है. नरेंद्र्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी मतदाताओं को इतनी पसंद आई तो असम के बाहर वह सरकार बनाने में सफल क्यों नहीं रही? पहले मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव लड़ने का काम दिल्ली में भाजपा देख चुकी है. ऐसे में असम चुनाव की पहली जीत को भाजपा की खूबियों की वजह से नहीं, कांग्रेस की खामियों की वजह से देखा जाना चाहिए. 

असम के अलावा भाजपा का प्रदर्शन किसी और प्रदेश में अच्छा नहीं रहा है. यह बात सही है कि आलोचनाओं के घेरे में चल रही भाजपा के लिए असम की जीत नया राग अलापने का जरिया बन गई है. अगर भाजपा को अपनी जीत के फार्मूले पर इतना ही यकीन है तो क्यों नहीं उत्तर प्रदेश में वह मुख्यमंत्री के नाम को सामने ला कर चुनाव की तैयारी शुरू करती. असल में भाजपा इस सच को जानती है कि वह अपनी रणनीति से नहीं, कांग्रेस के खराब प्रदर्शन से जीती है. जिनजिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें रही हैं वहां भाजपा को सीधी लड़ाई का लाभ मिला है. जहां भाजपा का मुकाबला काम करने वाले मुख्यमंत्री से रहा है, वहां वह चुनाव हार गई है. दिल्ली से ले कर बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु इस के उदाहरण हैं.

कांग्रेस मुक्त बनाम भगवायुक्त 

भारतीय जनता पार्टी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना भले ही पूरा हो रहा हो पर भगवायुक्त भारत का सपना पूरा होने की राह में तमाम कांटे हैं. कांग्रेस मुक्त भारत देश की जरूरत है. पर भगवायुक्त भारत देश के लिए उस से बड़ा खतरा है. देश का मतदाता यह समझ रहा है. यही कारण है कि भाजपा के इतने प्रभाव के बाद भी देश की राजनीति में उस की हिस्सेदारी क्षेत्रीय दलों से कम ही है.

पूरे देश में विधायकों की संख्या को देखें तो यह बात साफ  हो जाती है. देश में गैरभाजपाई और गैरकांग्रेसी विधायकों की संख्या 2,137 है जो भाजपा के विधायकों की संख्या 1,050 और कांग्रेसी विधायकों की संख्या 869 से बहुत ज्यादा है. कांग्रेस के डूबने का कारण उस की नीतियां और नेता हैं जो देश की जनता से जुड़ना पसंद नहीं करते. भाजपा में भी ऐसे नेताओं का बड़ा वर्ग है. ऐसे में जहांजहां भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है, वोटर एकदूसरे में उलझ कर रह जाता है. जहां विकल्प के रूप में अच्छी पार्टी, अच्छा नेता मौजूद होता है वहां पर वह दोनों ही दलों को नकार रहा है.

असम में सरकार बनाने के बाद भाजपा के कांग्रेस मुक्त अभियान की चर्चा जोरों पर है. भाजपा नेताओं ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस मुक्त भारत पर फोकस कर लिया है. भाजपा को यह देखना चाहिए कि देश की जनता कांग्रेस मुक्त भारत चाहती है. इस के बाद भगवा युक्त भारत उस की कल्पना में नहीं है. अगर देश के मतदाता को भगवा युक्त भारत चाहिए होता तो गैरभाजपाई विधायकों की संख्या इतनी अधिक नहीं होती. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ  लगातार गिर रहा है. कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की खुशी में भाजपा इस बात को समझ नहीं रही है. भाजपा को समझना चाहिए कि देश कांग्रेस मुक्त तो हो जाएगा पर यह भगवा युक्त नहीं होगा. भाजपा के विधायकों की संख्या गैरभाजपाई और गैरकांग्रेसी विधायकों से बहुत कम है.

कांग्रेस के कमजोर होने का जो लाभ भाजपा को मिलना चाहिए था वह नहीं मिल रहा है. भाजपा इस बात को समझ रही है पर वह इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. भाजपा इस बात से खुश नजर आ रही है कि कांग्रेस कमजोर हो रही है. भाजपा के सामने असल संकट क्षेत्रीय दलों का है. भाजपा में जिस तरह से कांग्रेस विरोध को अपनी सफलता से जोड़ कर देखा जा रहा है वह गलत नजरिया है.

देश के लोगों ने भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले बेहतर माना है. इस के बाद भी गैरभाजपाई और गैरकांग्रेसी राजनीति पर भरोसा ज्यादा है. भाजपा को इस बात को ध्यान में रखते हुए अपने विकास के एजेंडे को आगे करना चाहिए. जनता को राहत देने वाली योजनाओं को न बना कर, भाजपा की सरकार वही गलती कर रही है जो कांग्रेस ने की थी. देश के लोगों को पहले विकास चाहिए, बाकी काम बाद में होने चाहिए. इस के जरिए ही देश पर अपनी पकड़ बनाई जा सकती है.

मोदी विरोध की जो गलती कांग्रेस ने दोहराई अब वही गलती प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी कर रहे है. नरेंद्र्र मोदी जब गुजरात में मुख्यमंत्री थे उस समय कांग्रेस ने उन को निशाने पर ले लिया. कांग्रेस भाजपा के कट्टरवाद और गुजरात दंगों को ले कर बेहद मुखर हो गई. कांग्रेस को लगा कि नरेंद्र मोदी की आलोचना के सहारे वह भाजपा को हाशिए पर लाने में सफल हो जाएगी. इस अभियान में कांग्रेस ने भाजपा के नेताओं में केवल नरेंद्र मोदी को ही निशाने पर लिया. 2002 के गुजरात दंगों के बाद कांग्रेस की केंद्र में 10 साल सरकार रही. इस बीच, कांग्रेस केवल नरेंद्र मोदी के विरोध को ही प्रमुखता से उठाती रही. केंद्र सरकार के रूप में कांग्रेस के मोदी विरोध की राजनीति ने ही नरेंद्र्र मोदी को गुजरात से निकाल कर देश के बाहर मजबूत हालत में खड़ा कर दिया. 2014 के लोकसभा चुनावों के समय कांग्रेस को उम्मीद थी कि भाजपा में नेतृत्व के मसले पर नरेंद्र मोदी का विरोध होगा जिस का लाभ कांग्रेस को मिलेगा.

विरोध की राजनीति

जिस तरह से कांग्रेस ने मोदी का विरोध किया था, उस के जवाब में मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत अभियान शुरू किया. केंद्र में सरकार बनाने के बाद नरेंद्र मोदी कांग्रेस विरोध की राजनीति में इतना डूब गए कि बाकी मुद्दे वे भूलते जा रहे हैं. असल में जिस तरह से कांग्रेस विरोध में मोदी देश के प्रधानमंत्री बने, उसी तरह से मोदी के विरोध से कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो सकती है. दरअसल, भारतीय मतदाता बहुत ही संवेदनशील है. वह हमेशा उस को पसंद करता है जो दूसरों के द्वारा परेशान किया जाता है. भारत में ‘सहानुभूति वोट’ मिलने के तमाम उदाहरण मिलते है. मोदी ही नहीं, उन के समर्थक भी कांग्रेस और कांग्रेस नेता राहुल गांधी व सोनिया गांधी के किसी विरोध को छोड़ना नहीं चाहते हैं. कांग्रेस विरोध को अगर ऐसे ही हवा मिलती रही तो कांग्रेस कमजोर होने के बजाय मजबूत होगी.

अगस्ता वेस्टलैंड डील के मामले में केंद्र सरकार को कांग्रेस के खिलाफ  पुख्ता सुबूत एकत्र करना चाहिए. जिस तरह से बोफोर्स मसले में हुआ. उस से सीख ले कर मोदी सरकार को कदम उठाना चाहिए. कई बार बडे़ नामों को आरोपी बनाने की जल्दबाजी में लड़ाई कमजोर हो जाती है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मानते हैं कि कांग्रेस और राहुल गांधी को निशाना बनाने से पार्टी को लाभ होगा.  भाजपा सांसद किरीट सोमैया और राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी जिस तरह से कांग्रेस और गांधी परिवार को निशाने पर लेते हैं उस से कांग्रेस को अपने बचाव का रास्ता मिल जाएगा.

मोदी सरकार को लगता है कि वह जनता से किए गए वादों को पूरा नहीं कर पा रही है, ऐसे में अगर वह कांग्रेस विरोध की राजनीति को ले कर काम करेगी तो एक वर्ग तो खुश हो ही सकता है. यह हो सकता है कि कांग्रेस के विरोधी इस से

खुश रहें पर जनता में कांग्रेस का विरोध ‘सहानुभूति वोट’ में बदल सकता है. मोदी सरकार का 2 साल का समय पूरा हो चुका है. इस कार्यकाल में देश में मोदी की चमक फीकी पड़ी है. भाजपा का बेस वोटर भी खुश नहीं है. भाजपा ने देश की जनता से लोकसभा चुनावों में जो वादे किए थे वह उन को पूरा नहीं कर रही है. ऐसे में उस की लोकप्रियता घट रही है. सिर्फ कांग्रेस विरोध से मोदी की नैया पार नहीं लगेगी.

भाजपा को लग रहा है कि देश से कांग्रेस खत्म हो जाएगी तो भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर किसी दल से चुनौती नहीं मिलेगी. यह भाजपा की गलत सोच है.  देश के मतदाताओं के पास हमेशा विकल्प होते है. ऐसे में जो काम करेगा, उस को ही वोट मिलेगा

नासूर पर मरहमपट्टी

मतदाता के फैसले का हम सम्मान करते हैं, हार की समीक्षा की जाएगी, ये ऐसे शब्द हैं जिन्हें कांग्रेस हर हार के बाद दोहराती है. इस के बाद दूसरी पंक्ति के नेता अपने हिस्से के संवाद दोहराते हैं कि दरअसल, कांग्रेस में बड़ी सर्जरी की जरूरत तो है पर शीर्ष में नहीं, बल्कि निचले स्तर पर है. बचेखुचे आधा दर्जन दिग्गजों में से एक कमलनाथ ने भी यही कह कर एक तरह से आलाकमान यानी सोनिया और राहुल गांधी को क्लीन चिट दे दी है. इस से समझने वाले समझ गए हैं कि 5 राज्यों की दुर्दशा पर अब पूर्णविराम लग गया है. वैसे भी चुनावी झांकी उठ गई है और मूर्ति विसर्जन भी हो चुका है. सियासी कुरुक्षेत्र में अब धूल उड़ रही है.

कमलनाथ के कहने का मतलब बेहद साफ है कि चिंता की कोई बात नहीं, कुछ दिनों बाद चमत्कार होगा और कांग्रेस पहले की तरह राज करेगी. जो हो रहा है वह सब मिथ्या और भ्रम है, इसलिए जो कांग्रेसी बचे हैं उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं. कांग्रेस ऐसी आकाशवाणियां जमीन से करने की आदी हो चुकी है, जिस का सार इतना भर होता है कि सोनिया और राहुल के बाबत कोई मुंह न खोलें, क्योंकि उस से कोई फायदा नहीं होने वाला. वे तो शाश्वत हैं, फिर सर्जरी कहां होनी है और कौन करेगा, यह न तो अब कोई पूछने वाला है और न कोई बताने वाला है.

दूसरी पंक्ति के होनहार व आरामतलब नेता असल में एक तीर से दो निशाने साधते हैं. पहला सोनिया और राहुल को यह भरोसा दिलाना कि आप चिंता मत करो, नीचे वालों को हम संभाल लेंगे. अब यह इनेगिने लोग ही जानते हैं कि नीचे अब कुछ नहीं बचा है. इन नेताओं को चिंता खुद को बनाए रखने की है क्योंकि कांगे्रस छोड़ ये कहीं जा नहीं सकते और न कांग्रेस को डुबोने वाले इन होनहार नेताओं को कोई भाव देने वाला है. इन से बेहतर तो रीता बहुगुणा जोशी हैं जो अफवाहों में ही सही, भाजपा खेमे में जाने की संभावनाओं से इनकार नहीं करतीं और इन सब खुशामदियों से लाख गुना बेहतर और दूरदर्शी ममता बनर्जी थीं, जिन्होंने अलग पार्टी बना कर खुद का अस्तित्व बनाए रखा.                            

– भारत

जीत के बाद पैसों की बरसात

इंडियन प्रीमियर लीग 2016 में सनराइजर्स हैदराबाद और रौयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के बीच खेले गए फाइनल मुकाबले में सनराइजर्स हैदराबाद की टीम ने खिताब जीत लिया. सनराइजर्स ने खेल के हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया. सनराइजर्स ने पहले बल्लेबाजी कर 208 रनों का मजबूत स्कोर खड़ा किया. लक्ष्य का पीछा करने जब रौयल चैलेंजर्स के धुआंधार बल्लेबाज विराट कोहली और क्रिस गेल मैदान में उतरे तो क्रिस गेल के तूफान के आगे लगा कि अब इसे रोक पाना मुश्किल है. वे महज 38 गेंदों में 76 रन की आतिशी पारी खेल कर आउट हो गए. सनराइजर्स के गेंदबाजों की तारीफ करनी होगी. गेंदबाजों ने उस के बाद सधी हुई गेंदबाजी कर एक के बाद एक बल्लेबाजों को पवेलियन लौटा दिया.

अब बारी आई अवार्ड सेरेमनी की जिस में विजेता टीम सनराइजर्स को 15 करोड़ रुपए मिले और रनरअप टीम रौयल चैलेंजर्स को 10 करोड़ रुपए दिए गए. गुजरात लायंस को 7.5 करोड़, कोलकाता नाइट राइडर्स को

7.5 करोड़ रुपए दिए गए. रौयल चैलेंजर्स के कप्तान विराट कोहली को 20 लाख रुपए इनाम के रूप में दिए गए. सीरीज में सब से ज्यादा रन बनाने के लिए उन्हें औरेंज कैप और सब से ज्यादा  38 छक्के लगाने के लिए यह राशि दी गई. पर्पल कैप भुवनेश्वर कुमार को मिली जिन्होंने 23 विकेट लिए. उन को 10 लाख रुपए दिए गए. फाइनल मैच में मैन औफ द मैच बेन कटिंग को दिया गया जिन्हें 5 लाख रुपए दिए गए. सब से ज्यादा कैच लेने वाले एबी डिविलियर्स को बेस्ट फील्डर के खिताब से नवाजा गया, उन्होंने इस आईपीएल में 19 कैच पकड़े. उन्हें 10 लाख रुपए की प्राइजमनी मिली.

दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाड़ी क्रिस मौरिस ने सब से तेज गति से 17 बौल पर 50 रन बनाए जिस के लिए उन्हें 10 लाख रुपए की प्राइजमनी मिली. सुपर कैच पकड़ने के लिए सुरेश रैना को 10 लाख रुपए की प्राइजमनी मिली. ग्लेन औफ द सीजन के लिए डेविड वार्नर को

10 लाख रुपए दिए गए. ऐसे कई नएनए नामों से अवार्ड दिए गए जिन में इनामी राशि लाखों से कम नहीं थी. जितना पैसा इस खेल में दिया जाता है या लगाया जाता है शायद ही किसी और खेल में लगाया जाता हो. यदि दूसरे खेलों में भी इतना पैसा लगाया जाता और अन्य दूसरी सुविधाएं दी जातीं तो शायद बाकी खेलों के भी दिन फिर जाते.

रियो में जीका का डर

ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में अगस्त महीने में शुरू होने वाले ओलिंपिक खेलों की लगभग पूरी तैयारियां हो चुकी हैं और अब महज कुछ ही दिन शेष रह गए हैं. लेकिन अब सब से बड़ी चिंता जीका वायरस को ले कर है. 150 अंतर्राष्ट्रीय डाक्टरों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने डब्लूएचओ को पत्र लिखा है कि हमारी बड़ी चिंता वैश्विक स्वास्थ्य को ले कर है. जीका वायरस ने स्वास्थ्य को ऐसा नुकसान पहुंचाया है कि जिसे विज्ञान ने पहले कभी नहीं देखा है. इसलिए उन्होंने रियो आलिंपिक को कहीं और करवाने की मांग की है. कुछ वर्ष पहले स्वाइन फ्लू और इबोला से परेशान थे, अब जीका कई देशों के लिए खतरा बन चुका है. कई देशों में डर इतना है कि वे अपने नागरिकों को बच्चे पैदा न करने की सलाह दे रहे हैं. अभी तक इस वायरस से लड़ने के लिए कोई भी वैक्सीन नहीं है.

जीका वायरस दरअसल एक मच्छर के संक्रमण से फैलने वाला रोग है. इस में यदि कोई महिला जीका वायरस से ग्रसित बच्चे को जन्म देती है तो एक तरह से बच्चा लकवाग्रस्त हो सकता है. इस वायरस से ग्रसित बच्चे छोटे सिर के साथ पैदा होते हैं. ब्राजील में गत वर्ष तकरीबन 4,000 बच्चे इस की चपेट में आ चुके हैं. यह शिशुओं के दिमाग पर अटैक करता है. चिकित्सा विशेषज्ञों की सब से बड़ी चिंता यही है क्योंकि ब्राजील के जीका संकट से सब से ज्यादा प्रभावित शहर रियो है. और दुनियाभर के देशों से खेलों को देखने के लिए तकरीबन 5 लाख विदेशी पर्यटक यहां आएंगे, कहीं ऐसा न हो कि वे इस वायरस की चपेट में आ जाएं.

हालांकि डब्लूएचओ ने इस मांग को नकार दिया और कहा है कि इस से डरने की जरूरत नहीं. स्वास्थ्य को ले कर जो नियम बनाए गए हैं उन्हें केवल फौलो करें. गर्भवती महिलाएं जीका के संक्रमण वाली जगहों में न जाएं. चाहे देश हो या विदेश, प्रशासनिक लेवल पर सब एकजैसे हैं. जीका वायरस कोई नया नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को यह सोचना चाहिए कि इस चिंता से कैसे पार पाया जाए. अब जब सबकुछ हो चुका है तब चिंता जाहिर की जा रही है जैसा कि देश में आईपीएल के दौरान सूखे की स्थिति को ले कर हुआ और कुछ मैच महाराष्ट्र से बाहर कराए गए. चिंता वहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की है. चिंता तो इस बात की होनी चाहिए कि रियो के स्थानीय निवासियों को पहले इस से कैसे बचाया जाए. उन पर क्या बीतती होगी जो वहां रह रहे हैं. रियो के आयोजनकर्ताओं को जीका वायरस को ले कर पहले ही कदम उठाना चाहिए था ताकि स्थानीय लोगों के साथसाथ वहां आने वाले पर्यटक भी सुरक्षित रहते.

मोर्गन की रेटिंग के बाद शेयर बाजार चमका

वर्ष 2007 के बाद रुपए में 9 दिनों की सब से लंबी गिरावट और शेयर बाजार सूचकांक में उदासी का माहौल तब अचानक उत्साह में परिवर्तित हो गया जब अमेरिकी निवेशक बैंक मोर्गन स्टेनली ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छा मानसून रहते, अच्छे सेवाकर की व्यवस्था तथा रिजर्व बैंक की ब्याज दरों में कटौती के नतीजे में मजबूती का रुख करेगी. उस के बाद बाजार ने 25 मई को तेजी पकड़ी और सूचकांक 1मार्च के बाद पहली बार एक दिन में सर्वाधिक ऊंची छलांग लगा गया. रुपया भी लगातार 9 दिनों की गिरावट से 42 पैसे की मजबूती के साथ बंद हुआ. इस से पहले 20 मई को रुपया 15 जनवरी के बाद सब से बड़ी गिरावट पर बंद हुआ था. रुपए की कमजोरी में गिरावट के साथ ही सूचकांक लगभग गिरावट के रुख पर ही चलता रहा.

मोर्गन के अनुमान बाजार के लिए जो सुखद और उत्साहजनक आंकड़े ले कर आया है उस से बाजार में लगातार मजबूती रहने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है. सरकारी एजेंसियां शेयर बाजार के इस रुख को मोदी सरकार के 2 साल के कार्यकाल की उपलब्धियों के रूप में पेश करने में जुटी हैं.

देर से सही दुरुस्त आ रहे हैं सरकारी बैंक

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 2 साल पहले सेबी ने अपने निदेशक मंडल में महिला निदेशकों की नियुक्ति करने को कहा था. बैंकों ने इस आदेश को हलके से लिया. लेकिन जब सेबी ने अक्तूबर 2014 तक इस आदेश के पालन का समय दिया तो बैंक वहां भी फिसड्डी साबित हुए. सेबी ने इस पर सख्ती दिखाई तो बैंकों ने मार्च 2015 तक का समय मांगा. लेकिन ज्यादातर बैंकों ने इस अवधि में भी आदेश का पालन नहीं किया. सेबी इस के बाद शांत नजर आया. शायद उसे दलील दी गई कि उस ने बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई में सभी पंजीकृत 5,451 कंपनियों से भी महिला निदेशक नियुक्त करने को कहा था, लेकिन इस वर्ष मार्च तक 1,375 कंपनियां ही इस आदेश का पालन करने में असफल रही हैं. बैंकों को सार्वजनिक तौर पर भले ही सेबी ने कुछ नहीं कहा है लेकिन ऐसा लगता है कि बैंकों पर उस का जबरदस्त दबाव था. इसीलिए पिछले 6 महीनों के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक औफ बड़ौदा, यूको बैंक, इंडियन बैंक, इलाहाबाद बैंक, बैंक औफ महाराष्ट्र, ओरिएंटल बैंक, सिंडिकेट बैंक तथा बैंक औफ इंडिया ने महिला निदेशकों की नियुक्ति की है. इस तरह से अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के 11 बैंकों ने महिला निदेशक नियुक्त कर दिए हैं. सार्वजनिक क्षेत्र के सब से बड़े स्टेट बैंक औफ इंडिया की अध्यक्ष अरुणधति भट्टाचार्य बैंक के निदेशक मंडल के साथ ही इसी बैंक के 3 सहायक बैंकों की निदेशक मंडल की सदस्य भी हैं. सरकारी बैंकों ने देर में सही लेकिन अच्छा कदम उठाया है और यह देर से सही, लेकिन दुरुस्त कदम है.

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