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निजी कंपनियां बिछाएंगी रेल पटरियां

मोदी सरकार सड़कों के निर्माण के साथ ही रेलवे पटरियां बिछाने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित कर रही है. इस क्रम में उस ने 3 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा लागत की 3 रेल परियोजनाओं पर पहल शुरू कर दी है. रेलवे का लक्ष्य इन तीनों परियोजनाओं को समय से पहले पूरा करना है और इस काम में पैसे की तंगी से मुक्ति पाना है. इन 3 में से एक परियोजना के लिए निवेशक की तलाश का काम शुरू कर दिया गया है और शेष 2 परियोजनाओं के लिए निजी निवेशकों की पड़ताल का काम जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा. तीनों परियोजनाओं की लंबाई 350 किलोमीटर से ज्यादा है. बताया जा रहा है कि रेलवे की योजना निजी क्षेत्र को महत्त्व देने की है और वह लंबित पड़ी 380 परियोजनाओं को इसी आधार पर पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है.

रेलवे का कहना है कि इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए उसे 5 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है और इतनी ज्यादा राशि अपने बल पर जुटाना रेलवे के लिए संभव नहीं है. इन परियोजनाओं पर काम करने वाली निजी कंपनियों को काम पूरा होने के बाद रेलवे सालाना प्रीमियम अदा करेगा. इस से रेलवे को ढांचागत व्यवस्था के लिए पैसे नहीं लगाने पड़ेंगे और एक बनाबनाया ढांचा रेलवे के पास आ जाएगा. प्रीमियम की राशि की अदायगी में उसे कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि ढांचागत व्यवस्था की मजबूती का लाभ उसी की झोली में जाएगा. रेल मंत्री का यह प्लान सफल होता है तो निश्चित रूप से आने वाले समय में रेलवे को इस का बड़ा फायदा होगा.

सैक्स गुलाम रह चुकी लड़कियों का पुनरुद्धार कर पाएंगी रिचा?

रिचा चड्ढा ने बहुत ही कम समय में अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक पहचान बना ली है. उन की कई फिल्में कान फिल्म फैस्टिवल सहित कई इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल्स में सुर्खियां बटोर चुकी हैं. पर वे मुंहफट हैं. इस की वजह बताते हुए वे कहती हैं कि इंडस्ट्री में उन का कोई गौडफादर नहीं है. क्या आप अभी भी बौलीवुड में खुद को बाहरी मानती हैं? इस सवाल के जवाब में रिचा फरमाती हैं, ‘‘मुझे गैर फिल्मी परिवार के होने का कोई लाभ या नुकसान समझ में नहीं आया. मैं मेहनत कर रही हूं और व्यस्त हूं. मुझे अच्छा काम करने का मौका मिल रहा है. लोग मुझे बेहतरीन अदाकारा के रूप में पहचानते हैं. पर कड़वा सच यह है कि पूरे विश्व की किसी भी फिल्म इंडस्ट्री में वहां के कलाकार या तकनीशियन के लिए इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता. सिर्फ बौलीवुड में ही ‘बाहरी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है.’’

उन की फिल्म ‘मसान’ ने इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में जम कर वाहवाही बटोरी. पर इस तरह की फिल्में भारत में बौक्स औफिस पर कमाल क्यों नहीं कर पातीं? इस बाबत वे कहती हैं, ‘‘ऐसा न कहें, ‘मसान’ को तो भारत में भी बहुत अच्छी शोहरत मिली. ‘मसान’ ने बौक्स औफिस पर बहुत अच्छा पैसा कमाया. सारा मामला बजट का है. बजट के अनुसार फिल्म ने अच्छी कमाई की है. यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि ‘मसान’ जैसी फिल्में मेनस्ट्रीम फिल्मों की तरह बिजनैस करेंगी. 3 करोड़ रुपए की लागत वाली इस फिल्म ने 10 करोड़ रुपए कमा लिए, इस से अधिक और क्या चाहिए.’’

अच्छी कमाई के बावजूद उन्हें मेनस्ट्रीम कलाकारों की तरह स्टारडम क्यों नहीं मिला? इस पर उन का जवाब यों है, ‘‘‘मसान’ जैसी फिल्मों से स्टारडम नहीं मिलता. सिर्फ अच्छे कलाकार के रूप में पहचान बनती है. यह फिल्म पूरी दुनिया में चर्चित हुई. पूरी दुनिया में लोगों ने मेरे अभिनय की तारीफ की. ये यादगार फिल्में होती हैं. हर कलाकार के कैरियर में कुछ यादगार फिल्में होनी चाहिए. लोगों को ‘मसान’ हमेशा याद रहेगी.’’ कई कलाकार पूरी जिंदगी सिर्फ अच्छे कलाकार होने का टैग लगा कर जीते रहते हैं, उन्हें स्टारडम कभी नहीं मिल पाता? ऐसी स्थिति में क्या होता है? इस पर वे कहती हैं, ‘‘इस के लिए खुद कलाकार कम दोषी नहीं हैं. देखिए, मेरा अपना कोई स्टारडम नहीं है लेकिन जब मैं किसी अवार्ड समारोह में जाती हूं तो मैं किसी स्टार कलाकार से कम तैयार हो कर नहीं जाती. मैं खुद को ग्लैमरस अंदाज में ही पेश करती हूं. मैं देहाती किरदार निभाती हूं, इस के माने यह नहीं है कि मैं निजी जीवन में भी देहाती रहूं. ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ के समय मैं सलवारकमीज पहन कर घूमती थी, तब कोई मुझ से अंगरेजी में बात करने को तैयार नहीं होता था. सो, अब मैं ने स्ट्रैटजी बना ली है कि अब मैं अपनेआप को स्टार्स की तरह ही पेश करूंगी.’’

फिल्म ‘सरबजीत’ में आप ने सरबजीत की पत्नी सुखप्रीत का रियल लाइफ किरदार निभाया, तो वहीं फिल्म ‘कैबरे’ में एक काल्पनिक किरदार निभाया. आप के लिए किस किरदार को निभाना आसान रहा? इस पर रिचा बताती हैं, ‘‘मैं जिस किरदार के साथ जुड़ जाती हूं उसे निभाना मेरे लिए आसान हो जाता है. सरबजीत की पत्नी सुखप्रीत के साथ मैं इमोशनली जुड़ गई थी. इसलिए इस किरदार को निभाना मेरे लिए बहुत आसान रहा. हां, रीयल लाइफ किरदारों के साथ न्याय करना बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है. रीयल लाइफ किरदारों को निभाते समय कलाकार के लिए बंदिश होती है कि वह उस दायरे से बाहर जा कर काम नहीं कर सकता. ‘सरबजीत’ में सरबजीत और उस की बहन दलजीत से लोग इतना ज्यादा परिचित हैं कि इन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों के लिए बंदिश रही हैं. पर मेरे लिए बंदिश नहीं रही क्योंकि मैं ने जिस सुखप्रीत के किरदार को निभाया है उस से लोग परिचित नहीं हैं. सुखप्रीत एक मासूम महिला का किरदार है. पहली बार मैं ने एक मासूम महिला का किरदार निभाया है.’’

मीरा नायर की इंटरनैशनल फिल्म के बाद रिचा अब फ्रैंच निर्देशक की इंटरनैशनल फिल्म ‘लव सोनिया’ कर रही हैं. इस पर रिचा बताती हैं कि ‘लव सोनिया’ इंडोअमेरिकन फिल्म है, जिस का निर्माण ‘लाइफ औफ पाई’ जैसी फिल्म के निर्माता डेविड ओमार्क कर रहे हैं. फिल्म के निर्देशक तबरेज नूरानी ने उन्हें ट्विटर पर संदेश दिया. हमारी बातचीत हुई. फिल्म की कहानी ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर है. उन्हें कहानी व किरदार पसंद आए तो उन्होंने हामी भर दी. हम इस की शूटिंग कुछ दिन मुंबई में कर रहे हैं. उस के बाद हौंगकौंग, फिर लास एंजिल्स में करेंगे.

फिल्मों के अलावा रिचा को लेखन में भी दिलचस्पी हैं. लेखन के साथ सोशल सर्विस में भी काफी सक्रिय रहने वाली रिचा बताती हैं, ‘‘लिखना तो चलता रहता है. इन दिनों मैं एक समाजसेवा के कार्य में व्यस्त हूं. वास्तव में ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित फिल्म ‘लव सोनिया’ की कहानी पढ़ कर मैं बहुत प्रभावित हुई, तो उसी पर मैं कुछ काम कर रही हूं. कुछ लड़कियों को फिर से उन के पैरों पर खड़ा करने के लिए कुछ काम करने जा रही हूं. मैं ने एक जगह किराए पर ली है, जहां इन्हें रखा हुआ है. इन के खर्च के लिए चंदा इकट्ठा करने वाली हूं. हाल ही में एक लेख भी लिखा था, जिस में इस बात का जिक्र था कि फिल्मों में औरतों को ले कर गलत बातें क्यों कही जाती हैं. फिल्म इंडस्ट्री के लोग भले कोशिश करें कि मेरा दिमाग बंद हो जाए, पर मैं अपना दिमाग बंद नहीं होने दूंगी. मैं कुछ न कुछ रचनात्मक काम करती रहूंगी. कुछ न कुछ लिखती रहूंगी.’’

ह्यूमन ट्रैफिकिंग में पकड़ी गई लड़कियों के जीवन उद्धार के कार्यक्रम पर विस्तार से रोशनी डालते हुए वे कहती हैं, ‘‘आज की तारीख में भारत में गुलामी नहीं रही. मगर सैक्स गुलामी यानी ‘सैक्स स्लेवरी’ बढ़ गई है. हमें पता भी नहीं कि यह किस हद तक है. एक अकेला इंसान इसे रोक नहीं सकता. दुखद स्थिति यह है कि इस अवैध कृत्य में राजनेता व सरकार भी जुड़ी हुई हैं. इस से भी बड़ा आश्चर्य यह है कि यह सारा खेल नाबालिग लड़के व लड़कियों से शुरू होता है. हाल ही में एक एनजीओ ने कुछ ऐसी ही पीडि़तों को छुड़ाया. इस में 2 लड़के 10 साल से कम उम्र के और 3 लड़कियां 12-13 साल की हैं. जब हम ने इन से बातचीत की तो पता चला कि कुछ लोग दूरदराज के गांव में जा कर नाबालिग लड़केलड़कियों के मांबाप को बहलाफुसला कर, उन के बच्चों को शहर में अच्छी शिक्षा दिलाने का वादा कर के या गांव के मजबूर मातापिता को धन का लालच दे कर कहते हैं कि वे अपने बच्चों को बेच दें. फिर इन नाबालिगों को ला कर अलगअलग स्तर पर बेचा जाता है. जैसेजैसे इन की उम्र बढ़ती है, वैसेवैसे इन की कीमत बढ़ती है.

‘‘मैं कुछ लोगों से मिली हूं. उन की कहानियां सुन कर मेरा दिल दहल गया. मेरी समझ में नहीं आता कि लोग इतना घिनौना काम कैसे करने लगे हैं, वह भी छोटे बच्चों के साथ. एक बच्ची ने बताया कि वह अपनी मां के साथ जा रही थी, रेलवे स्टेशन पर पानी पीने के लिए उतरी और किसी ने उसे उठा लिया. फिर उस का गैंगरेप हुआ. हर दिन उस को टौर्चर किया गया. 2 साल तक उसे पिंजरे में बंद कर के रखा गया. फिर सैक्स गुलामी में डाल दिया गया. उस के हाथपांव में सिगरेट से घाव किए गए हैं. कुछ लड़कियां तो मुझे ऐसी मिलीं जिन्हें नशे की आदत हो गई है. ‘‘एक एनजीओ ने उन लड़केलड़कियों को सैक्स रैकेट से निकाला है. वे पढ़ीलिखी नहीं हैं. उन में कोई कौशल नहीं है. आराम नगर में कुछ बंगले हैं, जिन में से एक बंगला हम किराए पर ले कर उन्हें वहां रख रहे हैं. हमारी कोशिश है कि पहले हम उन के 2 साल के किराए व खाने का पैसा इकट्ठा करें. मैं ने अपनी एक दोस्त से बात की है, जो कि बौलीवुड डांसर हैं, वह उन्हें डांस सिखाएगी.

एक लड़की असम की है. लोगों ने उस के साथ गलत किया. फिर वह किसी तरह बच कर अपने गांव पहुंची, तो उस के मातापिता ने कहा कि उस ने उन का नाम खराब कर दिया. बेचारी जब हमें मिली तो बहुत बुरी हालत में थी. हम ने उसे सहारा दिया. अब वह हेयरस्टाइलिस्ट बन गई है. इस मकसद के लिए मैं एक छोटी सी फिल्म भी फिल्माने वाली हूं. मैं यह बात प्रचारित नहीं करना चाहती. मैं ने अपनी तरफ से जो चंदा होना चाहिए, उस का 10वां हिस्सा डाल दिया. यदि हमें चंदा नहीं मिला तो भी मैं उसे अपनी तरफ से पूरा करने की कोशिश करूंगी.’’ हर कोई वीमेन एंपावरमैंट की बातें कर रहा है. बौलीवुड में महिलाओं की स्थिति क्या है? इस सवाल पर रिचा का नजरिया कुछ ऐसा है, ‘‘सच में कहा जाए तो बौलीवुड में महिलाएं ही काम कर रही हैं. बड़ोंबड़ों को महिलाएं ही संभाल रही हैं फिर चाहे वह यशराज फिल्म्स हो, रेशमा शेट्टी हों, गौरी श्ंिदे हों या फरहा खान या एकता कपूर हों. कुछ दिन में लोग कहेंगे कि बौलीवुड में महिलाओं की स्थिति पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है.

‘‘वास्तव में किसी भी क्षेत्र में महिलाओं को उन का हक मिलता नहीं है. पर बौलीवुड में धीरेधीरे मिलने लगा है. कम से कम बौलीवुड में परदे के पीछे तो महिलाएं हावी हैं. एकता कपूर ने अपना खुद का एंपायर खड़ा कर रखा है. बौलीवुड में तमाम महिलाएं काफी सशक्त हैं. वे मेहनत से काम कर रही हैं. मुझे लगता है कि आने वाले समय में बौलीवुड में महिलाएं ही हावी दिखेंगी.’’

अगर बौलीवुड में महिलाएं तरक्की कर रही हैं तो बौलीवुड में हीरो और हीरोइन की पारिश्रमिक राशि में बहुत बड़ा अंतर क्यों है? इस पर उन का मानना है, ‘‘भारत में यह कोई मुद्दा नहीं है. कम से कम भारत में पारिश्रमिक राशि को लिंगभेद के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए. हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि 4-5 हीरो चल रहे हैं, तो स्वाभाविक तौर पर वे अधिक पैसों की मांग करेंगे. ये पुरुष कलाकार, निर्माता और बौक्स औफिस पर उसी अनुपात में पैसा भी कमा कर देते हैं. अभी बौलीवुड में ऐसी स्थिति नहीं आई है कि कोई हीरोइन अपने बल पर किसी फिल्म को हिट करा सके. जिस दिन मैं दावा करने लगूंगी कि मेरी फिल्म को 10 करोड़ रुपए की ओपनिंग मिलेगी, उस दिन लोग मुझे भी मुंहमांगी कीमत देंगे. जब मैं इस मुकाम पर पहुंच जाऊंगी तो मैं खुद भी किसी फिल्म को 10 लाख रुपए में नहीं करूंगी. यहां पारिश्रमिक राशि इस आधार पर तय होती है कि कौन कितना कमा कर दे रहा है? हां, रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के कैरियर एकसाथ शुरू हुए. ऐसे में इन दोनों की पारिश्रमिक राशि एकजैसी होनी चाहिए यानी कि एक दरजे के कलाकार की पारिश्रमिक राशि एकजैसी होनी चाहिए. अब यदि मैं कहूं कि मुझे उतनी ही पारिश्रमिक राशि मिलनी चाहिए, जितनी शाहरूख खान को मिल रही है, तो लोग मुझे फिल्म इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता जरूर दिखा देंगे.

बतौर अभिनेत्री, रिचा औफबीट फिल्मों से मिली कामयाबी को मुख्यधारा के सिनेमा में भुनाने के लिए हर तरह के सिनेमा में सक्रिय होना चाहती हैं लेकिन कमर्शियल सिनेमा में अभी भी उन की गिनती सोलो हीरोइन के तौर पर नहीं होती. जाहिर है कि उन के सफर की राह अभी कई संघर्षों से गुजरेगी. 

आखिर स्मृति ईरानी को गुस्सा क्यूं आता है…?

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री परम पूज्यनीया प्रातः स्मरणीय श्रीमति स्मृति ईरानी को डियर कहने की जुर्रत करने वाले डॉक्टर अशोक चौधरी बिहार के शिक्षा मंत्री हैं, जिन्हें तय है तमीज आती होती तो स्मृति ईरानी को देवी, आदरणीया या माता सरीखे सम्मानजनक सम्बोधन से ट्वीट करते, नमस्कार प्रणाम  या चरण स्पर्श जैसे पौराणिक शब्द इस्तेमाल करते. डियर सम्बोधन आधुनिक युग की देन है जिससे ईसाइयत की बू आती है, सो मेडम भड़क उठीं कि आप महिलाओं को डियर कब से कहने लगे.

इस भड़कने के दो फायदे हुये पहला तो यह कि मुद्दे की बात ही गायब हो गई कि मेडम आपके केलेण्डर में 2015 कब खत्म होगा. देश मे नया शिक्षा सत्र चालू हो चुका है, लेकिन नई शिक्षा नीति का अता पता नहीं है. दूसरा फायदा यह हुआ कि अब कोई यह सवाल पूछने की हिमाकत नहीं करेगा, फिर भले ही 2016 पूरा गुजर जाए. स्मृति का सम्मान और स्वाभिमान करोड़ों नौनिहालों के भविष्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है और जो शिक्षा मंत्री उनके इस अहंकार को तुष्ट नहीं कर सकता, निश्चित ही वह अनार्य या असभ्य होकर प्रताड़ना का पात्र है.

इधर लोग हैरान हैं कि इस प्रचलित सम्बोधन में हर्ज क्या है. अगर सवा अरब की आबादी बाले इस देश में डियर शब्द को लेकर सर्वे या जनमत संग्रह करवाया जाये तो एक ही इसे आपत्तिजनक करार देगा और वे स्मृति ईरानी होंगी, जो नहीं जानती या जानते हुये भी अंजान बनी रहेंगी कि रोजाना करोड़ों लोग बगैर किसी पूर्वाग्रह के डियर शब्द का प्रयोग करते हैं. सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के औपचारिक कागजी और मौखिक वार्तालाप में डियर सम्बोधन ही इस्तेमाल होता है, लेकिन यह भगवा मानसिकता और पौराणिक संस्कृति से मेल नहीं खाता, इसलिए जरूर  स्मृति का न भड़कना हैरानी की बात होती.

शायद वे चाहती थीं कि अगर अँग्रेजी में ही सम्बोधन देना था तो उन्हे हर हाइनेस या यूअर लेडीशिप जैसे लफ्जों से नवाजा जाना चाहिए था, जो ब्रिटिश हुकूमत में गौरी मेमों और राजघराने की महिलाओं को सम्मान देने प्रयोग किए जाते थे. अशोक चौधरी को समझा दिया गया है कि स्मृति कोई मामूली महिला नहीं हैं वे लोकतन्त्र की आभिजात्य महिला हैं जिनहे यूं ही अहम महकमे की ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है. इसलिए छोटे मोटे लोगों को अपनी हैसियत और औकात में रहना चाहिए.   

विज्ञापनों की सरकार

जिस तरह से मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के 2 वर्ष पूरे होने पर समाचारपत्रों, जिन में अंगरेजी के तो सभी शामिल हैं लेकिन भारतीय भाषाओं के छिटपुट हैं, में विज्ञापन प्रकाशित किए हैं, उस से साफ है कि नरेंद्र मोदी का कहना है कि उन की सफलता महसूस न करो, उसे सिर्फ अखबारों और टीवीस्क्रीनों पर देखो. सही बात है. सदियों से हम हिंदू धर्म का गुणगान उस की जमीनी हकीकत से नहीं, उस के ग्रंथों, वेदों, पुराणों, स्मृतियों, उपनिषदों, महाकाव्यों आदि से ही तो करते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार के 2 वर्ष मनमोहन सिंह-सोनिया सरकार के 15 वर्षों से कुछ अलग हैं, ऐसा महसूस नहीं होता. भ्रष्टाचार के बड़े मामले तो सामने नहीं आए पर नरेंद्र मोदी के सामने ही विजय माल्या 9,000 करोड़ ले कर भाग गया और उन्हीं की पार्टी की एक केंद्रीय मंत्री और एक मुख्यमंत्री दूसरे भगोडे़ ललित मोदी की सहायता कर उसे शराफत का प्रमाणपत्र देते दिखे. नरेंद्र मोदी की सरकार ने उन अमिताभ बच्चन को सिरआंखों पर लिया है जो कभी राजीवसोनिया के निजी मित्र थे और जिन का नाम पनामा पेपर्स में संदिग्ध व्यक्तियों की सूची में शामिल है. भ्रष्टाचार के मामलों के खुलासे विनोद राय, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने किए थे और चूंकि अब उन्हें पद्म पुरस्कार मिला है और मौजूदा सरकार ने उन्हें बैंक बोर्ड ब्यूरो का अध्यक्ष भी नियुक्त किया है. ऐसे में उन के दिए गए आंकड़े, जो अब तक साबित नहीं हुए हैं, सही हैं या नहीं, अब संदेह के दायरे में हैं.

भ्रष्टाचार के अलावा किसी और क्षेत्र में कुछ ऐसा हुआ हो, जिस से भाजपा के कट्टर भक्तों के अलावा कोई आतिशबाजी छोड़े, ऐसा नजर नहीं आता. डौलर का मूल्य बढ़ गया जबकि कच्चा तेल सस्ता हो गया. पैट्रोलडीजल महंगे हुए. व्यापारउद्योगों में कोई विशेष प्रगति नहीं है. समाज सुधार के कानून नहीं बने. देश में डर का माहौल बन गया है. कोई भी किसी को भी गोहत्या का आरोपी या देशद्रोही कह कर पकड़वा सकता है. सरकार ने जिस कालेधन को वापस लाने की बात की थी, वह अंशभर भी पूरी नहीं हुई है. विदेशों में भारतीय मूल के अंधविश्वासी हिंदुओं के बल पर विदेशों में पहचान बनी है पर कोई खास विदेशी सहायता मिली हो या नरेंद्र मोदी के बीसियों विदेशी दौरों का लाभ भारत को हुआ है, दिखता नहीं, सिवा विज्ञापनों में.

2 वर्ष एक सरकार को अपना कामकाज दिखाने के लिए काफी होते हैं पर भारत ऐसा धीमा रेंगता देश है कि यहां 2 साल में अढ़ाई कोस तो वैसे भी कोई नहीं चल सकता. नरेंद्र मोदी ने अपने प्रयासों में चाहे कोई कमी न छोड़ी हो पर उन्हें जो अपनी पार्टी के साथी मिले हैं या विरासत में जो नौकरशाही मिली है, उसे तो वे बदल नहीं सकते. जो फैसले नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने 1991 में आते ही लिए थे, उस तरह से याद रखने वाले फैसले नहीं हुए हैं. जो दिख रहा है वह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन कर जारी करने वाले विज्ञापनों में दिख रहा है. उसी पर बधाई दी जा सकती है कि अब ऐसी सरकार है जो आलोचना की परवा किए बिना चल रही है और अपनी पीठ खुद थपथपा कर महानता का गुणगान कर रही है.

‘अमला’ का हमला, तोड़ा ‘विराट’ रिकॉर्ड

इमरान ताहिर और हाशिम अमला के रिकार्ड प्रदर्शन के दम पर दक्षिण अफ्रीका ने त्रिकोणीय एक दिवसीय क्रिकेट श्रृंखला के छठे मैच में वेस्टइंडीज को 139 रन से हरा दिया. दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए चार विकेट पर 343 रन बनाये. जवाब में कैरेबियाई टीम 38 ओवर में 204 रन पर आउट हो गई. ताहिर ने नौ ओवर में 45 रन देकर सात विकेट लिये जो वनडे क्रिकेट के इतिहास में किसी दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाज का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.

वहीं अमला ने भी वेस्‍टइंडीज के खिलाफ खेले गये मुकाबले में विश्व रिकॉर्ड बना लिया है और टीम इंडिया के टेस्‍ट टीम के कप्‍तान विराट कोहली और विवि रिचर्ड्स को पछाड़ दिया है. अमला ने वेस्‍टइं‍डीज के खिलाफ अपनी टीम के लिए सबसे अधिक 110 रनों की शतकीय पारी खेली.

अमला ने अपनी पारी में 99 गेंद का सामना किया, जिसमें उन्‍होंने 13 चौके लगाये. अमला ने कैरियर का 23वां शतक जमाया और दक्षिण अफ्रीका की ओर से सबसे अधिक शतक लगाने वाले दुसरे खिलाड़ी बन गये. साथ ही वो दुनिया के सातवें खिलाड़ी भी बन गये हैं. दक्षिण अफ्रीका की ओर से सबसे अधिक शतक बनाने का रिकॉर्ड एबी डिविलियर्स के (24 शतक) नाम है.

अमला ने अपना 23वां शतक पूरा कर भारत के विराट कोहली को पीछे छोड़ दिया है. अमला ने 132 पारियों में 23वां शतक जमाया है, वहीं विराट कोहली को अपना 23वां शतक बनाने में 157 पारियों का सहारा लेना पड़ा था.

अमला ने वेस्‍टइंडीज के खिलाफ 14 पारियों में 1000 रन पूरा कर लिया है और विवि रिचर्ड्स के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है. रिचर्ड्स ने इंग्‍लैंड के खिलाफ 15 पारियों में 1000 रन बनाये थे. इसके अलावा अमला ने वेस्‍टइंडीज की धरती में अपना तीसरा शतक भी पूरा कर लिया और ऑस्‍ट्रेलिया के पूर्व महान बल्‍लेबाज मैथ्‍यू हेडन की बराबरी कर ली. हेडन ने 16 पारियों में तीन शतक बनाया और अमला ने तीन शतक केवल 9 पारियों में ही बना डाला.

स्वच्छ शौचालयवान भव:

इन दिनों शौचालय का चिंतन चहुंओर चलायमान है. मदारी से ले कर मंत्री तक हर कोई अपनेअपने ढंग से शौचालय पर बोल रहा है. दूरदर्शी दुलहनों ने तो अपनी बरातें तक इसलिए धड़ाधड़ लौटा दीं कि उन की होने वाली ससुराल में शौचालय की व्यवस्था नहीं थी. शौचालय की सोच के कारण अब समाज में किस प्रकार के दृश्य देखने को मिलेंगे, आइए होते हैं रूबरू-

वैवाहिक विज्ञापन कुछ यों होंगे कि

‘5 फुट 10 इंच, 25 वर्ष, 7 लाख रुपए वार्षिक आय एवं शानदार शौचालय वाले वर हेतु वधू चाहिए’. तो कन्याओं के पिता भी क्यों चूकेंगे. वे विज्ञापन यों देंगे कि, ‘सुंदर, सुशील एवं गृहकार्य में दक्ष कन्या हेतु अच्छी आय और स्वच्छ शौचालय वाला वर चाहिए. अत्याधुनिक शौचालय वाले वर को प्राथमिकता दी जाएगी.’ लड़के वाले लड़की वालों से कहते मिलेंगे कि, ‘भई, हम आप से एक बात कहना तो भूल ही गए.’ जब लड़की वाले घबरा कर उन की तरफ देखेंगे तो वे हंसते हुए कहेंगे, ‘न न न, हमें दहेज में कुछ भी नहीं चाहिए. बरातियों के लिए शौचालय की व्यवस्था शानदार होनी चाहिए.’ दूल्हेराजा कहीं भी अपनी राजहठ लड़की वालों को इसलिए नहीं दिखाएंगे कि उन्हें दहेज में चमचमाती कार चाहिए, स्वागत में सोने की चेन, कीमती स्मार्टफोन या मुंहमांगी नकद राशि चाहिए बल्कि वे इसलिए नाराज हो जाएंगे कि उन के दोस्तों की सेवा में शानदार शौचालय उपलब्ध नहीं कराए गए.

यदि समझदार कन्याएं गलती से ऐसे घरों में ब्याह दी जाएंगी जहां शौचालय से पीढ़ी दर पीढ़ी दुश्मनी चली आ रही हो तो वे मुंहदिखाई में बुद्धिमत्ता दिखाते हुए शौचालय ऐज ए गिफ्ट मांग लेंगी. किंतु जिद्दी किस्म की नववधुएं शौचालयविहीन घरों में धोखे से ब्याही जाने पर अपनी पहली ही सुबह ससुराल की इज्जत की वाट लगा देंगी. और अपने साथ हुई इस धोखाधड़ी के लिए अपने सासससुर के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवा देंगी. समय के हिसाब से बेटी की विदाई के वक्त बजने वाले फिल्मी गीतों में भी परिवर्तन हो जाएंगे और इस प्रकार के गीत लिखे जाने लगेंगे कि, ‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझ को सुखी संसार मिले. मायके की कभी न याद आए, ससुराल में, शौचालय चार मिलें.’

प्राइवेट स्कूल वाले बच्चों के अभिभावकों को यों आकर्षित करेंगे कि, ‘हमारा स्कूल प्रतिवर्ष सब से ज्यादा टौपर्स देता है क्योंकि हमारे यहां अच्छी पढ़ाई के साधनों के साथ हाइजीनिक टौयलैट्स हैं. जब स्टूडैंट टैंशनफ्री और स्वस्थ रहेंगे तभी तो एकाग्र हो कर पढ़ाई करेंगे और टौपर्स बनेंगे.’ बिल्डर्स यों कहते मिलेंगे कि, ‘हम मकान नहीं, घर बनाते हैं. मकान तब तक घर नहीं कहलाएंगे जब तक उन में स्वच्छ और सुविधाजनक शौचालय नहीं होंगे. स्वच्छ और सुविधाजनक शौचालय नहीं होंगे तो आदमी ठीक से फ्रैश नहीं हो पाएगा. फ्रैश नहीं हो पाएगा तो टैंशन बढे़गी और टैंशन बढ़ेगी तो घर में अशांति होगी. अशांति होगी तो फिर घर, घर कहां रह जाएगा? वह तो जंग का मैदान हो जाएगा. इसलिए आइए, घर की शांति के लिए हमारे फेमस ऐंड फ्रैश अपार्टमैंट में, आज ही हाइजीनिक टौयलैटयुक्त फ्लैट बुक कराइए.’

योगगुरु योगासन कराते हुए कहेंगे कि, ‘घर को शौचालययुक्त बनाओ. खुले में शौच जाओगे तो बीमार पड़ जाओगे. बीमार की सोच भी बीमार ही होगी. इसलिए अच्छे शौचालय बनाओगे तो अच्छी सोच बनेगी. अच्छी सोच से ही अच्छे देश का निर्माण होता है. तो आज ही शपथ ले लो कि घर के साथ हो शौचालय.’ बड़ेबुजुर्ग प्रसन्न हो कर ऐसी दुआएं देंगे कि, ‘शौचालयवान भव: या सदा स्वच्छ शौचालयवान रहो.’ तो क्रोधित हो कर वे श्राप भी देते मिलेंगे कि, ‘जा तुझे सार्वजनिक शौचालय में निबटान करना पड़े.’ दहेजलोभी दूल्हे तब भी कहां मानेंगे. वे अपने घर में वधूपक्ष से लाखों रुपए के इंपोर्टेड टौयलैट बनवाने की मांग करेंगे. हो सकता है तब पासा पलट जाए और जागरूक दुलहनें उन्हें इंपोर्टेड के स्थान पर जेल के जनरल शौचालय की सैर करवा दें. भविष्यवक्ता भी वक्त की नब्ज को पहचानते हुए व्यक्ति के राजयोग के बारे में कुछ यों बताएंगे कि ‘तुम्हारे भाग्य में तो राजधानी का शौचालय सुख लिखा है.’

क्या ‘मुबारका’ को पार लगाएंगे अनीस बजमी…?

कुछ समय पहले फिल्म ‘‘शौकीन’’ फेम निर्माता मुराद खेतानी ने फिल्म लेखक व निर्देशक मिलाप झवेरी के निर्देशन में  कॉमेडी फिल्म ‘‘मुबारका’’ बनाने की बात कही थी. सूत्रों के अनुसार उस वक्त इस फिल्म में अभिषेक बच्चन भी थे. लेकिन ‘‘क्या सुपर कूल हैं हम’’ तथा ‘‘मस्तीजादे’’ को बाक्स आफिस पर मिली असफलता के बाद मुराद खेतानी ने इस फिल्म के निर्देशन से मिलाप झवेरी की छुट्टी कर दी.

उधर सूत्रों के अनुसार फिल्म ‘‘वेलकम बैक’’ के बाद से घर पर खाली बैठे अनीस बज़मी को फिल्म की जरुरत थी. वह पिछले छह वर्षों से फिल्म ‘‘नो एंट्री’’ की सिक्वल फिल्म ‘‘नो एंट्री में नो एंट्री’’ की पटकथा लेकर सलमान खान की तारीख मिलने का इंतजार कर रहे हैं. पर सलमान खान तारीख नहीं दे पा रहे हैं. कुछ सूत्र दावा कर रहे हैं कि सलमान खान को इस फिल्म की पटकथा कम पसंद है, जबकि अनीस बज़मी इस फिल्म की पटकथा का तीन बार पुनः लेखन कर चुके हैं. पर उन्हे बतौर निर्देशक या बतौर लेखक भी कोई फिल्म नहीं मिल रही थी.

तभी उन्हे फिल्म ‘मुबारका’ के बारे में पता चला, तो अनीस बज़मी ने मुराद खेतानी से मुलाकात कर उनकी शर्तों पर फिल्म करने के लिए हामी भर दी. सूत्रों के अनुसार अनीस बज़मी आमतौर पर एक फिल्म के निर्देशन के लिए आठ से नौ करोड़ रूपए लेते हैं. मगर उन्होने फिल्म ‘‘मुबारका’’ के निर्देशन की जिम्मेदारी महज चार करोड़ रूपए में ही करने की बात स्वीकार कर ली. फिल्म ‘‘मुबारका’’ से अनीस बज़मी के जुड़ते ही इस फिल्म से अभिषेक बच्चन आउट हो गए. यह एक अलग बात है कि अभिषेक बच्चन का दावा है कि उन्होने फिल्म ‘‘मुबारका’’ का नाम ही नहीं सुना.

मगर अनीस बज़मी के नजदीकी सूत्रों के अनुसार चाचा भतीजा की आपसी कामेडी के इर्द गिर्द घूमने वाली फिल्म ‘‘मुबारका’’ में अनीस बज़मी ने निजी जिंदगी की किसी चाचा भतीजा की जोड़ी को पिरोने के लिए दिमाग लगाकर अनिल कपूर से संपर्क किया. अनिल कपूर व अनीस बज़मी का पुराना साथ है. अनीस बज़मी के निर्देशन में अनिल कपूर पहले ‘‘नो एंट्री’, ’वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ जैसी फिल्में कर चुके हैं. फिर अनिल कपूर के ही घर पर बैठकर अनीस बज़मी ने फिल्म ‘‘मुबारका’’ में अनिल कपूर के संग उनके भतीजे अर्जुन कपूर को भी जोड़ने की बात की.

सूत्र बता रहे हैं कि अर्जुन कपूर का भी करियर फिल्म ‘तेवर’ के बाद से ही गड़बड़ चला आ रहा है. अर्जुन कपूर को फिल्म ‘‘की एंड का’’ से काफी उम्मीदें थी, मगर अफसोस इस फिल्म ने भी बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा. फिलहाल अर्जुन कपूर के पास ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ के अलावा कोई फिल्म नहीं है. तो वह भी इस फिल्म की श्टिंग पूरी होने से पहले ही अपनी झोली में एक फिल्म डाल लेना चाहते हैं.

सूत्रों के अनुसार अनीस बज़मी ने फिल्म का बजट कम होने और खुद आधी फीस लेकर काम करने का हवाला देते हुए महज सात करोड़ रूपए में अनिल कपूर व अर्जुन कपूर को साइन कर लिया. यानी कि सात करोड़ रूपए में ही चाचा भतीजा दोनों ‘‘मुबारका’’ में अभिनय करेंगे. इसी के साथ यह पहला मौका होगा, जब निजी जिंदगी की चाचा भतीजा की यह जोड़ी किसी फिल्म में एक साथ नजर आएगी. अब यह फिल्म अक्टूबर माह में एक ही शिड्यूल में लंदन व मुंबई में फिल्मायी जाएगी. अभी तो अर्जुन कपूर अपनी फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’तथा अनिल कपूर अपने सीरियल ‘‘24’’ के भाग दों में व्यस्त हैं.

कहानीः

सूत्रों के अनुसार एक विदेशी फिल्म की कहानी पर आधारित हास्य फिल्म ‘‘मुबारका’’ की कहानी चाचा भतीजा के इर्द गिर्द घूमती है. फिल्म में अर्जुन कपूर अविवाहित युवक हैं. दो खूबसूरत लड़कियां उनसे विवाह करना चाहती हैं. जबकि अनिल कपूर उनके लवगुरू बनकर दो खूबसूरत लड़कियों में से किसी एक को चुनने में मदद करते हैं. इस पारिवारिक हास्य फिल्म में हास्य, रोमांस व ड्रामा का समावेश होगा.

ये पति

मैं पहली बार गर्भवती हुई तो अपने बच्चे की जान के साथसाथ अपनी जान का डर भी बहुत सताता रहता था. चाय पीते समय अकसर मैं पति से यह पूछा करती, ‘‘डिलीवरी के समय अगर मुझे कुछ हो गया तो?’’ खुशमिजाज पति मुझे समझाते, ‘‘व्यर्थ की चिंता मत करो. और खुश रहो, ऐसा कुछ भी नहीं होगा.’’ पर मेरे दिल और दिमाग में यह बात अंदर तक घुस गई थी. एक दिन फिर मैं ने उन से यह प्रश्न पूछ लिया, ‘‘डिलीवरी के समय अगर मुझे कुछ हो गया तो?’’ पर इस बार पति ने बड़ी बेफिक्री से जवाब दिया, ‘‘इस में सोचने वाली कौन सी बात है, मैं तुरंत दूसरी शादी कर लूंगा, एक लड़की भी देख रखी है.’’ सौतन आने की बात सुनते ही पता नहीं कैसे मेरे मन का डर काफूर हो गया और मुझ में हिम्मत आ गई. नियत समय पर मैं ने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया, जो आज इंजीनियर बन चुका है.

– निभा सिन्हा, विशाखापत्तनम (आं.प्र.)

*

हम लोगों के एक परिचित के लड़के का विवाह हुआ. हाल ही में वे नवदंपती बाजार में घूमते मिले. अब तक लड़की गर्भावस्था में आ गई थी तथा लड़के का भी थोड़ा वजन बढ़ गया था. मेरे पति समय पर चुटकी लेने से नहीं चूकते, उन लोगों को देख कर बोले, ‘‘आजकल जमाना कितना बदल गया है. अब लड़की की गर्भावस्था में लड़कों का भी पेट बढ़ने लगा है. शायद इसीलिए बहुत जगह मैटरनिटी लीव के साथ पैटरनिटी लीव का भी प्रावधान कर दिया गया है.’’ इन की बात सुन कर मेरे साथसाथ नवदंपती भी हंसे बिना न रह सके.

– अरुणा रस्तोगी, मोतियाखान (न.दि.)

*

हमारा रोटी बेलने का चकला टूट गया था और काफी समय से स्लैब पर ही रोटी बेल कर काम चलाया जा रहा था. अब हमें इस की आदत सी हो गई थी, इस कारण चकले की आवश्यकता महसूस नहीं होती थी. हमारे कुछ रिश्तेदार आए हुए थे. उन के साथ हम बाजार में शौपिंग पर गए थे. एक दुकान पर चकला देख कर पति ने कहा कि चकला तो हमें भी लेना है. मैं ने कहा कि चकले की आवश्यकता नहीं है. स्लैब पर भी रोटी बढि़या बेली जाती है. मेरे हाजिरजवाब पति ने कहा कि तुम्हें तो स्लैब पर रोटी बेलने में कोई परेशानी नहीं आती परंतु मुझ से तो स्लैब पर रोटी अच्छी तरह नहीं बेली जाती. उन की इस बात को सुन कर रिश्तेदारों सहित दुकानदार भी बिना हंसे नहीं रह सका.

आशा शर्मा, बूंदी (राज.)

भोजपुरी फिल्म बनाते ही फंसी प्रियंका चोपड़ा

शायद प्रियंका चोपड़ा अब उस दिन को कोस रही होंगी, जिस दिन उन्होने अपनी फिल्म प्रोडक्शन  कंपनी ‘‘पर्पल पेबल पिक्चर्स’’ के तहत भोजपुरी फिल्म ‘‘बम बम बोल रहा काशी’’ के निर्माण का निर्णय लिया था. आम्रपाली दुबे और दिनेशलाल यादव उर्फ निरहुआ के अभिनय से सजी प्रियंका चोपड़ा की यह फिल्म 10 जून को बिहार व उत्तर प्रदेश के  कुछ हिस्सों में रिलीज हो चुकी है.

फिल्म के रिलीज के दिन से भोजपुरी समाज, भोजपुरी भाषा और संस्कृति को तहत नहस करने के आरोप प्रियंका चोपड़ा पर लगातार लग रहे हैं. मगर बुधवार का दिन तो प्रियंका चोपड़ा के लिए नई मुसीबत लेकर आ गया. अब वह कानूनी विवादों में फंस गयी हैं.

वास्तव में बुधवार, 15 जून  को प्रियंका चोपड़ा के खिलाफ गीतकार नीरज सिंह ने अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे दी. जिसके चलते अब प्रियंका चोपड़ा कानूनी विवाद में फंस गयी हैं. जिसका असर उनके करियर पर पड़ना लाजमी है.

2002 में ‘‘बम बम बोल रहा काशी’’ नामक धार्मिक संगीत अलबम बाजार में ला चुके बनारस के गीतकार नीरज सिंह ने 15 जून को प्रियंका चोपड़ा सहित फिल्म ‘‘बम बम बोल रहा काशी’’ से जुड़े सात लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित कई दूसरी धाराओं में अदालत में याचिका दायर की है. नीरज ने बनारस के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष प्रियंका चोपड़ा पर अपने अलबम के टाइटल की चोरी का आरोप लगाया. जिस पर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने सुनवाई करने के लिए 4 जुलाई की तारीख तय की है.

नीरज सिंह ने प्रियंका चोपड़ा के अलावा फिल्म की निर्माता मधु चोपड़ा, अभिनेत्री आम्रपाली दुबे, अभिनेता दिनेशलाल यादव उर्फ निरहुआ व निर्देशक संतोष मिश्रा के खिलाफ 419, 420, 467, 468, 471 धाराओं के साथ ही कॅापीराइट एक्ट के तहत भी मुकदमा दज कराया है. इस मसले पर हमने प्रियंका चोपड़ा का पक्ष जानने का प्रयास किया, पर उनसे बात नहीं हो पायी.

जीवन की मुसकान

मेरी मां घर में खाना पकाते समय जल गई थी. उन्हें अस्पताल में एक महीना रहना पड़ा. मां 50 प्रतिशत तक जल चुकी थीं. घर में हम 2 बहनें हैं, मैं बड़ी हूं. पापा को कुछ साल पहले दिल का दौरा पड़ा था और तब से वे आंशिक रूप से अपाहिज हैं. डाक्टरों ने रात में अस्पताल में मां के साथ ठहरने को कहा था. घर में कोई लड़का न था. मेरी बहन और मैं ही मिल कर मां का इलाज और घर संभाल रहे थे. हम में से किसी के लिए भी रात में अस्पताल में अकेले ठहरना संभव न था. हम ने अपने रिश्तेदारों से मदद की काफी अपील की पर किसी ने हमारा साथ न दिया. ऐसे में मेरी बहन का एक दोस्त बढ़ कर आगे आया और उस ने हमारे बुरे समय में हमारा साथ दिया. वह सारी रात मां के वार्ड के बाहर इंतजार करता और सुबह होने पर जब उसे अंदर जाने का मौका मिलता तो मां से फोन पर हमारी बात कराता.

महिला कक्ष होने के कारण कई बार उसे बाहर ही रहना पड़ता. वह रोज घर आ कर मां के लिए खाना ले जाता और अपने हाथों से खिलाता. वह लड़का शाकाहारी था पर डाक्टर ने मां को अधिकाधिक प्रोटीन का सेवन करने को कहा था, इसलिए वह उन्हें अपने हाथों से मछली  भी खिलाता था. हम ने जब पूछा, ‘‘क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता मांसाहारी भोजन छूने में, तुम तो शाकाहारी हो.’’ तो उस ने जवाब में कहा, ‘‘मेरी मां ने कहा है कि कोई बात नहीं बेटा, बीमार आदमी की सेवा करना सब से बड़ा काम है.’’ मेरी आंखों में आंसू भर आए. मेरी मां आज स्वस्थ हैं. वे उसे अपना बेटा मानती हैं.

– मधुलीना घोष, कोलकाता (प.बं.)

मेरे भतीजे की शादी के मौके पर मेरी ननद भी अपने परिवार सहित आई थी. सुबह दिल्ली से उज्जैन आ कर वे स्नान आदि में व्यस्त हो गईं. शाम को महिला संगीत के कार्यक्रम में उन्हें सूट पहनना था. सूटकेस में रखने के कारण सूट जगहजगह से मुड़ गया था. सो, उन्होंने वह सूट हमारे प्रैस वाले को दे दिया. कुछ देर बाद वह प्रैस वाला हांफता हुआ आया और एक पोटली मुझे थमाते हुए बोला, ‘‘मैडम, यह गहनों की पोटली उस सूट में से निकली है. पहले आप इसे रख लो, सूट मैं अभी प्रैस कर के लाता हूं.’’ मैं यह देख कर दंग रह गई क्योंकि वे सारे गहने मेरी ननद के थे जो वे विवाह में पहनने के लिए सलवार में लगी जेब में रखकर लाई थीं. उन की कीमत लगभग 3 लाख रुपए थी. प्रैस वाले की ईमानदारी ने हम सब को चकित कर दिया. हम ने उसे इनाम के तौर पर कुछ पैसे देने चाहे पर उस ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया.

– प्रतिमा अग्निहोत्री, उज्जैन (म.प्र.)

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