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जिंदगी आसान बनायेंगे ये 8 Life Hacks

स्मार्टफोन और बाकी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं. फोन से ईमेल, कॉल्स, SMS के अलावा भी कई काम किए जा सकते हैं. हम आपको बता रहे हैं ऐसे 8 ट्रिक्स के बारे में जिनकी मदद से आपने स्मार्ट डिवाइसेस का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं. आपके काम आएंगे ये ट्रिक्स…

1. बैटरी से स्मार्टफोन का टच स्क्रीन ऑपरेट करें

अगर आपने हैंडग्लव्स पहना है स्मार्टफोन का टच ऑपरेट नहीं कर पाएंगे. ऐसे में फोन ऑपरेट करने के लिए आप AA बैटरी का इस्तेमाल कर सकते हैं. 

2. मॉर्निंग अलार्म

स्मार्टफोन अलार्म से आपकी नींद नहीं खुलती तो रात में सोने से पहले फोन को प्लास्टिक कप में रखें. सुबह अलार्म की आवाज पहले के मुकाबले तेज आवाज सुनकर आपकी नींद खुलेगी.

3. YouTube नेविगेशन

YouTube पर वीडियो देखते समय आप की-बोर्ड में J का इस्तेमाल करके 10 सेकंड का वीडियो रिवाइंड कर सकते हैं और L की से 10 सेकंड फॉर्वर्ड कर सकते हैं.

4. 1 ही बैटरी से ऐसे चलाएं रिमोट

रिमोट की बैटरी खत्म हो गई है और आपके पास सिर्फ एक नई बैटरी है ऐसे में आप दूसरी बैटरी की जगह इसी साइज का स्क्रू यूज कर सकते हैं. रिमोट को काम करने के लिए एक बैटरी काफी है.

5. स्मार्टफोन स्टैंड

पुराने कैसेट बॉक्स को अपने नए स्मार्टफोन का स्टैंड बनाया जा सकता है.

6. चार्जर कॉड को टूटने से बचाएं

स्मार्टफोन चार्जर कॉड अक्सर टूट कर खराब हो जाता है. इसे टूटने से बचाने के लिए पेन स्प्रिंग का इस्तेमाल करें.

7. स्मार्टफोन कैमरा फ्लैश

कैमरा फ्लैश को नाइट लाइट की तरह भी इस्तमाल किया जा सकता है. इसके लिए फोन के फ्लैश लाइट पर पानी ने भरा हुआ एक ट्रांसपेरेंट बॉटल रखें, चारों तरफ रौशनी फैल जाएगी.

8. स्मार्टफोन को फास्ट चार्जिंग के लिए

फोन की बैटरी खत्म है और आप जल्दबाजी में हैं तो फोन को Airplane मोड पर रख कर चार्ज करें. फोन जल्दी चार्ज होगा.

ऐसा भी होता है

मैं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की विद्यार्थी थी. बात 1988 की है. बोर्ड परीक्षाओं में परीक्षार्थियों की सघन तलाशी ली जाती थी. परीक्षा शुरू होते ही कालेज का इंटर्नल रनिंग बैच चैक करने आता था. बैच के मैंबर कहते थे, जिस के पास कोई भी सामग्री हो, फेंक दे. उन में एक लड़की काफी ड्रामेबाज थी. जैसे ही बैच के मैंबर बोलते कि जिस के पास जो हो, फेंक दे वरना पकड़े जाने पर परीक्षा रूम से बाहर कर दिया जाएगा तो वह लड़की अपने सारे सामान यहां तक कि पास में रखे रुपएपैसे, पैन बौक्स इत्यादि तेजी से फेंकती. जब लोग कहते यह क्या कर रही हो तो वह बोलती, ‘आप ही ने तो बोला है कि जिस के पास जो भी हो, फेंक दें. इस तरह कुछ देर हंसी का वातावरण बन गया और विद्यालय का चपरासी एकएक समान इकट्ठा कर के उसे वापस देता. बीचबीच में वह ऐसा करने की आदी हो गई थी. 

– उमावती अग्रहरि, प्रतापगढ़ (उ.प्र.)

*

शालू को अपनी दोस्त पूजा के यहां पहुंचने की जल्दी थी. वह अपनी बहन जया के साथ स्कूटी से कानपुर देहात की तरफ जा रही थी. स्कूटी की रफ्तार बहुत तेज नहीं थी परंतु अचानक उस के सामने साइकिल पर सवार एक लड़का आ गया. वह घबरा गई, उस की स्कूटी डगमगा गई और सड़क के किनारे लकड़ी की गठरी ले कर जाती हुई एक औरत से टकरातेटकराते बची. वह औरत अचानक स्कूटी को सामने देख कर झटके से मुड़ी, तो गिर गई. अब तक शालू अपनी स्कूटी संभाल चुकी थी. कुछ दूर आगे जा कर शालू ने अपनी स्कूटी रोकी और दोनों बहनें उस औरत को देखने लगीं. औरत को सहीसलामत देख कर शालू अपनी स्कूटी स्टार्ट करने जा रही थी, उस की बहन जया ने कहा, ‘‘दीदी, हमें उस औरत को उठाना चाहिए.’’ उस की बात सुन कर शालू बोली, ‘‘तू पिटेगी.’’

परंतु जया नहीं मानी. उस ने कहा, ‘‘दीदी, इंसानियत भी कोई चीज होती है.’’ यह कह कर वह उस औरत को उठाने चली गई. जया उस औरत को उठाने के लिए झुकी. औरत ने समझा, इसी लड़की ने मुझे गिराया है, सो उस ने गुस्से में उस के गाल पर जोरदार थप्पड़ मार कर कहा, ‘‘गदहिया की नातिन, ठटरी बन जा.’’ जया ठगी रह गई. उस की बात का अर्थ तो वह समझ नहीं पाई परंतु इंसानियत का जो जज्बा उस के मन में था, उसे वह गालों पर सहलाती हुई लौट आई.

– रेणुका श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

सस्‍ते सोलर पावर की राह में मुश्किलें

सरकार दावा करती रही है कि सोलर पावर की कीमत 5 रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच जाएगी, पिछले दिनों कीमत इस स्‍तर पर पहुंच भी गई थी, लेकिन देश के कॉरपोरेट हाउस इस राह में बाधा बन गए हैं. पिछले सप्‍ताह हुए सोलर प्रोजेक्‍ट के टेंडर में कंपनियों ने 6 रुपए से अधिक कोट किया है. अधिकतम रेट 7 रुपए 35 पैसे कोट किया गया. एक्‍सपर्ट्स का मानना है कि कॉरपोरेट हाउस ने देश के सोलर प्रोजेक्‍ट्स के प्रति तेजी से रुचि दिखाई है. वहीं, इंटरनेशनल कंपनियों ने अपनी रुचि सीमित कर दी है.

किन प्रोजेक्‍ट्स के लिए हुआ टेंडर

पिछले सप्‍ताह सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने कर्नाटक और छतीसगढ़ में 1050 मेगावाट के प्रोजेक्‍ट्स के टेंडर हुए हैं. ये प्रोजेक्‍ट्स वायबल्टिी गैप फंडिंग स्‍कीम के तहत लगाए जाने हैं. ये प्रोजेक्‍ट्स सोलर पार्क से बाहर लगाए जाएंगे. कर्नाटक में 350 मेगावाट, 200 मेगावाट, 100 मेगावाट, 160 मेगावाट और 30 मेगावाट के अलग अलग प्रोजेक्‍ट्स लगाए जाएंगे, जबकि छतीसगढ़ में 100 मेगावाट के एक प्रोजेक्‍ट के लिए टेंडर हुआ.

किन कंपनियों ने लिए टेंडर

इंडियन रिन्‍यूएबल मार्केट की कंसलटेंसी फर्म ब्रिज-टू-इंडिया की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ये टेंडर सभी इंडियन कंपनियों ने जीते हैं. इसमें सबसे अव्‍वल अदानी रही. अदानी ने कर्नाटक के 350 मेगावाट के सबसे बड़े प्रोजेक्‍ट के अलावा छतीसगढ़ के 100 मेगावाट के एकमात्र प्रोजेक्‍ट को जीत लिया. इसके अलावा एमरगोन ने 100 मेगावाट, एक्‍मे सोलर ने 160 मेगावाट, सोलर एराइज ने 30 मेगावाट के प्रोजेक्‍ट जीते.

किस प्राइस पर जीते टेंडर

ब्रिज टू इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक के प्रोजेक्‍ट्स के लिए कंपनियों ने 6 रुपए 80 पैसे प्रति यूनिट से लेकर 7 रुपए प्रति यूनिट तक कोट किया, जबकि छतीसगढ़ के लिए 5 रुपए 90 पैसे प्रति यूनिट का रेट कोट करके अदानी ने टेंडर जीता.

तो क्‍या सस्‍ती सोलर पावर का दौर खत्‍म

देश में सोलर सेक्‍टर के नॉलेज सर्विस प्रोवाइडर के रूप में जानी जाने वाली फर्म ब्रिज टू इंडिया का कहना है कि इंटरनेशनल डेवलपर्स ने एनटीपीसी के प्रोजेक्‍ट्स में ज्‍यादा रुचि दिखाई है, जबकि इंडियन डेवलपर्स राज्‍य सरकारों और एसईसीआई के प्रोजेक्‍ट्स के टेंडर में बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं. ऐसे में, एनटीपीसी 3000 मेगावाट के अपने टारगेट के नजदीक पहुंच गई है, जबकि राज्‍यों और एसईसीआई के प्रोजेक्‍ट्स अभी और आने हैं. ऐसे में इंटरनेशनल डेवलपर्स चुप रहते हैं तो इंडियन बढ़-चढ़ कर भाग लेंगी, जिनके लिए 5 रुपए प्रति यूनिट के आसपास रेट कोट करना व्‍यवहारिक नहीं है.

कैसे हुई थी कीमतें कम

पिछले साल दिसंबर में राजस्‍थान में 70 मेगावाट क्षमता के एक सोलर प्‍लांट के लिए 4.34 रुपए प्रति यूनिट का रेट कोट किया गया था, जबकि इसी प्रोजेक्‍ट के दूसरे प्‍लांटों के लिए 4.35 रुपए और 4.36 रुपए कोट किया गया. इससे पहले नवंबर में आंध्रप्रदेश के एक प्रोजेक्‍ट के लिए 4.63 रुपए का रेट कोट किया गया था. हालांकि इन प्रोजेक्‍ट्स को हासिल करने वाली एक को छोड़कर शेष सभी कंपनियां विदेशी थी. हालांकि इन प्रोजेक्‍ट्स को हासिल करने वाली एक को छोड़कर शेष सभी कंपनियां विदेशी थी. तब सरकार ने दावा किया था कि सोलर पावर की कीमतें 5 रुपए प्रति यूनिट के आसपास फिक्‍स हो जाएंगी.

 

नील चिह्न

तुम्हारा साया

तुम्हें खोजते हुए मुझे पाता था

माथे की सूर्यकिरण

बरौनियों से झांकती हुई

मेरे गालों पर पड़ती थी

तुम्हारा प्रेम मेरे लिए

तुम्हारी प्यास

मेरे होंठों पर थी

तुम्हारी खामोशी में अर्थ खोजता

मासूमियत से उधेड़बुन में लिपटा

मेरा मन था

ओह

यह क्षणभंगुर स्वप्न

मेरी देह पर पड़ा

कुछ और नहीं, नील चिह्न है.

                              – हेमलता यादव

 

चैंपियंस ट्रॉफी हॉकी: पेनल्टी शूटआउट में हारा भारत

चैंपियंस ट्रॉफी हॉकी के फाइनल में वर्ल्ड चैंपियन ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 3-1 से हरा दिया. भारत को सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा. लेकिन वह चैंपियन की तरह खेली. तय वक्त तक न तो 13 बार की चैंपियन ऑस्ट्रेलिया और न ही भारत कोई गोल कर सका. फैसला पेनल्टी शूटआउट में हुआ. हालांकि, भारत ने ऑस्ट्रेलिया के डेनियल बील को दोबारा पेनल्टी शॉट देने का विरोध किया. करीब एक घंटे चले विवाद के बाद इंडोर में ऑस्ट्रेलिया को विनर डिक्लेयर किया गया.

14वीं बार चैंपियन बना ऑस्ट्रेलिया…

चैंपियंस ट्रॉफी के अंतिम लीग मैच में भी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय टीम 4-2 से हार गई थी. ऑस्ट्रेलिया चैंपियंस ट्रॉफी का 14वीं बार चैंपियन बना.

पेनल्टी शूटआउट में भारत की ओर से एसवी सुनील, सुरेंद्र कुमार और एस. उथप्पा गोल करने में कामयाब नहीं हो सके. सिर्फ हरमनप्रीत सिंह ही शूटआउट में भारत की ओर से गोल करने में कामयाब रहे.

ऑस्ट्रेलिया की ओर से डेनियल बील, सिमोन ऑर्चर्ड और अरान जलोव्स्की ने गोल किए. ट्रेंट मिटन ऑस्ट्रेलिया की तरफ से शूटआउट में गोल करने में चूके.

भारतीय टीम इससे पहले इस टूर्नामेंट में एक बार ब्रॉन्ज मेडल (1982) ही जीत सका था.

पेनल्टी शूटआउट में हुआ ड्रामा

पेनल्टी शूटआउट में काफी ड्रामा हुआ. बील को दोबारा से शॉट लेने को कहा गया. पहली बार में बील गोल दागने में कामयाब नहीं रहे थे. दूसरी बार पेनल्टी मिलने पर बील ने गोल दाग दिया.

वीडियो अंपायर ने उन्हें दोबारा शॉट लेने के लिए कहा. भारतीय कोच रोलेंट ओल्तमांस ने इस पर काफी आपत्ति जताई.

मैच खत्म होने के बाद भारतीय टीम ने भी बील को दोबारा शॉट दिए जाने पर विरोध जताया. इसके चलते फाइनल स्कोर जारी करने में भी देरी हुई.

ट्रॉफी को भी ग्राउंड से ले जाया गया. कई फैन भी ग्राउंड से चले गए. ज्यूरी ने भारत के आरोपों को खारिज कर दिया और बील को दोबारा शॉट दिए जाने को सही ठहराया.

करीब एक घंटे चलते विवाद के बाद प्रेजेंटेशन सेरेमनी इंडोर में हुई.

ऑस्ट्रेलिया को मिले थे 10 पेनल्टी कॉर्नर

ऑस्ट्रेलिया को 10 पेनल्टी कॉर्नर और एक पेनल्टी स्ट्रोक भी मिला लेकिन वह किसी में भी गोल करने में कामयाब नहीं रहा. इसका श्रेय भारतीय गोलकीपर और कप्तान पीआर श्रीजेश को जाता है. भारतीय टीम भी पेनल्टी कॉर्नर पर कोई भी गोल नहीं कर सकी.

इन खिलाड़ियों को मिले कार्ड

ऑस्ट्रेलिया : डेनियल बील, मैथ्यू स्वान, फ्लिन ओगिलव (ग्रीन कार्ड), ट्रेंट मिटन, मैट डॉसन (यलो कार्ड)

भारत: प्रदीप मोर (ग्रीन कार्ड), चंदना थिमैया (यलो कार्ड)

जर्मनी को मिला ब्रॉन्ज

तीसरे स्थान के लिए खेले गए मैच में जर्मनी ने ब्रिटेन को 1-0 से हराकर ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया. जर्मनी के लिए मैच का एकमात्र गोल मार्को मिल्तकाउ ने 40वें मिनट में किया.

विश्व की पांचवे नंबर की टीम बेल्जियम ने दो गोल से पिछड़ने के बाद जबर्दस्त वापसी करते हुए नौवें नंबर की कोरियाई टीम को 4-3 से हराकर पांचवां स्थान हासिल किया.

ऐसा रहा भारत का सफर

10 जून- जर्मनी- 3-3 से ड्रॉ

11 जून- ब्रिटेन को 2-1 से हराया

13 जून-बेल्जियम से 1-2 से हारा

14 जून- कोरिया को 2-1 से हराया

16 जून- ऑस्ट्रेलिया से 2-4 से हारा

17 जून (फाइनल)- ऑस्ट्रेलिया ने हराया

ऑस्ट्रेलिया 14वीं बार चैंपियन

ऑस्ट्रेलिया :14 (1983,1984, 1985, 1989, 1990, 1993, 1999, 2005, 2008, 2009, 2010, 2011, 2012, 2016)

जर्मनी: 10 (1986,1987, 1988, 1991 , 1992, 1995 , 1997, 2001, 2007, 2014)

नीदरलैंड्स: 8 (1981,1982, 1996, 1998, 2000, 2002, 2003, 2006)

पाकिस्तान: 3 (1978,1980,1994)

स्पेन:1 बार (2004)

मन से मन का मिलन कम तो नहीं

दुलहन के रूप में सजीसंवरी लड़की को गोद में उठाए एक युवक पटना कलैक्ट्रेट में आया तो सभी की आंखें उस ओर उठ गईं. युवक लड़की को उठाए सधे कदमों से धीरेधीरे जिलाधीश के दफ्तर की ओर बढ़ रहा था. कुछ लोग हैरत से, तो कुछ हंसीमजाक के लहजे में खुसुरफुसुर कर रहे थे. उन्हें नजदीक से देखने पर लोगों को कुछकुछ असलियत का पता लगने लगा. दुलहन बनी लड़की के दोनों पांव खराब थे. वह चल नहीं सकती थी, इसलिए युवक उसे गोद में उठा कर चल रहा था. लड़की के चेहरे पर थोड़ी हया का भाव था पर लड़का सिर उठाए गर्व का भाव लिए कदम दर कदम बढ़ता रहा.

लोगों को यह पता नहीं चल पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है? किसी ने कहा कि अगर दुलहन के पैर खराब हैं तो उसे गोद में उठा कर कलैक्ट्रेट आने की क्या जरूरत है? दूसरे ने कहा कि उसे व्हीलचेयर पर बिठा कर भी लाया जा सकता था? युवक सारी बातों को अनसुना कर अपनी दुलहन को उठाए जिलाधीश के दफ्तर के अंदर चला जाता है. कुछ लोग कुतूहल के साथ उस के पीछेपीछे दफ्तर के भीतर चले जाते हैं.

जिलाधीश संजय अग्रवाल अपने कमरे से बाहर निकल कर उन का स्वागत करते हैं. उन्हें कुरसी पर बिठाने के बाद जिलाधीश ने खुद ही युवक और युवती की कहानी लोगों को बताई तो सारे भौचक खड़े रह गए. कुछ की आंखों में तो आंसू की बूंदें छलछला पड़ीं. जिलाधीश ने युवक नीरज को सम्मानित किया क्योंकि उस ने विकलांग लड़की रूबी से विवाह कर समाज के सामने मिसाल पेश की थी. विकलांग लड़की से विवाह करने पर नीरज कुमार को पटना के जिलाधीश संजय अग्रवाल ने प्रेरणा सम्मान दे कर हौसला बढ़ाया. 50 हजार रुपए का चैक नीरज और रूबी के नाम से दिया गया. विकलांग लड़की का नाम रूबी है और उस से विवाह करने वाले लड़के का नाम नीरज कुमार है. नीरज और रूबी के विवाह में नीरज की मां की अहम भूमिका है. ऐसा देखनेसुनने को नहीं मिलता कि कोई महिला अपने तंदुरुस्त बेटे की शादी किसी विकलांग लड़की से कराए. पटना की एक महिला ने अपने पढ़ेलिखे और नौकरी कर रहे बेटे का विवाह एक विकलांग लड़की से कराने की पहल की. इतना ही नहीं, उस का बेटा भी राजीखुशी इस विवाह के लिए तैयार हो गया.

पटना की रहने वाली गायत्री देवी के 6 बेटे हैं. दोनों परिवारों के बीच पिछले कई सालों से जानपहचान थी और एकदूसरे के यहां आनाजाना भी था. विकलांग लड़की रूबी की मां अकसर नीरज की मां गायत्री के सामने अपना दुखड़ा कहती थी, उस की विकलांग बेटी से कौन विवाह करेगा? उस की बेटी जिंदगीभर कुंआरी बैठी रह जाएगी? कौन लड़का उसे अपना जीवनसाथी बनाने के लिए तैयार होगा? रूबी की मां यह भी कहती थी कि रूबी की शादी किसी विकलांग लड़के से ही हो सकेगी. किसी अधेड़ के बारे में पता चलने पर वह अपनी बेटी के विवाह का प्रस्ताव ले कर उस के यहां पहुंचती थी, पर हर जगह से उसे निराशा ही मिलती थी. गायत्री देवी बताती है कि रूबी की मां की बातों को वह चुपचाप सुनती रहती और उसे भरोसा देती थी कि चिंता नहीं करो, रूबी की शादी अच्छे लड़के से होगी. रूबी की मां का दर्द देख कर उस की आंखों से आंसू निकल आते थे. एक दिन उस के मन में आया कि क्या रूबी से उस के बेटे नीरज का विवाह हो सकता है. वह अपने बेटे से पूछना चाहती थी पर वह डरती थी कि कहीं बेटा इनकार न कर दे? कहीं बेटा यह न कहे कि उस की मां ने ही उस के गले में जिंदगीभर के लिए एक विकलांग लड़की डाल दी. बेटा कहीं नाराज न हो जाए कि वह शरीर से भलाचंगा है, फिर वह क्यों किसी विकलांग लड़की से विवाह करे?

पिछले महीने गायत्री ने हिम्मत कर के अपने बेटे नीरज से बात की और उसे रूबी से विवाह करने को कहा. नीरज कहते हैं, ‘‘मेरी मां ने जब रूबी से विवाह करने के बारे में बात की तो पहले तो मैं खामोश रह गया. मां ने सोचा कि मुझे उन की बात पसंद नहीं आई और वे चुपचाप कमरे से बाहर निकल गईं. कुछ देर के बाद मैं उन के कमरे में गया और उन से विवाह के बारे में सोचनेविचारने के लिए थोड़ा समय लिया. कुछ दिनों के बाद मैं ने मां को बता दिया कि मैं रूबी से विवाह करने को तैयार हूं और विवाह हो गया.’’ रूबी से शादी करने के बाद नीरज के चेहरे पर पछतावा या हताशा का कोई भाव नहीं है.

वे कहते हैं, ‘‘रूबी से विवाह करने से बेहतर काम कोई हो ही नहीं सकता था. मैं खुश हूं कि मेरी वजह से किसी की जिंदगी खुशियों से भर गई है.’’ नीरज की बीवी रूबी को भी अपने पति पर गर्व है. वह भर्राई आवाज में कहती है, ‘‘मैं ने कभी सोचा नहीं था कि मुझे इतनी बड़ी खुशी मिलेगी, नीरज जैसा पति और मां जैसी सास मिलेगी. नीरज के इस कदम से दुनिया के कुछ और लड़कों को विकलांग लड़की से विवाह करने की प्रेरणा मिल सकेगी.’’ नीरज की मां गायत्री देवी की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं है. वह कहती है कि वह रूबी को बहू नहीं, बल्कि बेटी बना कर अपने घर ले आई है. उसे कभी भी यह एहसास नहीं होने दूंगी कि वह मेरी कोख से नहीं जन्मी है. कभी भी उसे लाचार होने का एहसास नहीं होने दूंगी. वह तन से भले ही विकलांग है पर उस की सोच और इरादे काफी मजबूत हैं. 

सीक्रेट कोड से पता करें फोन के राज

एंड्रायड ऑपरेटिंग सिस्टम दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है. एंड्रायड बनाने वाले यानी एंड्रायड डेवलपर्स कई तरह के बैकडोर भी बनाते हैं. जिससे सीधा सिस्टम में इंटर कर सेटिंग्स चेंज की जा सके. हालंकि डेवलपर्स इन्हें ब्लॉक कर देते हैं जिससे कोई यूजर सिस्टम में जाकर कुछ चेंज न कर सके.

स्मार्टफोन में इन बैकडोर को सीक्रेट कोड कहा जाता है. यह नंबर और सिंबल्स से बने कुछ कोड होते हैं जो कि यूजर द्वारा कुछ सेटिंग्स में फेर बदल करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. इन्हें आप शॉर्टकट के तौर पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं. तो चलिए नजर डालते हैं इनमें में कुछ कोड्स पर.

*#*#7780#*#*

इस कोड को एंड्रायड यूजर अपने फोन में फैक्ट्री रिस्टोर सेटिंग के लिए, सभी एप्लीकेशन और डाटा क्लियर करने के लिए, गूगल अकाउंट सेटिंग्स रिमूव करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

*2767*3855#

यह कोड फोन में फर्मवेयर फिर से इंस्टॉल कर सकता है. इससे फोन की फैक्ट्री फॉर्मेट की जा सकती है, साथ ही फोन में मौजूद सभी फाइल्स भी रिमूव की जा सकती है, इंटरनल स्टोरेज को मिलाकर.

*#*#4636#*#*

इससे एंड्रायड यूजर्स को फोन की बेसिक जानकारी मिल सकती है, साथ ही बैटरी की इनफार्मेशन भी मिलती है.

*#*#34971539#*#*

यह सीक्रेट कोड फोन के कैमरा के बारे में जानकारी देता है.

*#0228#

एंड्रायड के इस सीक्रेट कोड से आप फोन की बैटरी का स्टेटस जान सकते हैं.

*#*#273283*255*663282*#*#*

फोन की सारी मीडिया फाइलों को बैकप लेने के लिए यूजर इस कोड को डॉयल करें.

इंटरनैट: पैसा बचाओ, वक्त गंवाओ

हाल ही में ई-कौमर्स वैबसाइट पेटीएम ने फ्री इंटरनैट सुविधा उपलब्ध कराने के दावे किए हैं. जाहिर है आजकल इंटरनैट को फ्री में लेने के लिए कौन नहीं उत्सुक होगा. अगर आप भी फ्री में इंटरनैट सुविधा चाहते हैं तो जरा अपनी खुशी के घोड़ों को लगाम दीजिए और पेटीएम के फ्री के फंडे को समझिए. डिजिटल मीडिया या औनलाइन प्लेटफौर्म पर फ्री में कुछ नहीं मिलता. पेटीएम की सेवा केवल 15 मिनट के लिए, वह भी पेटीएम अकाउंट एक्सेस करने वालों को मिलेग जाहिर है फ्री में इंटरनैट के मिलने का मुगालता पाले बैठे यूजर्स को धक्का लगा होगा. दरअसल, पेटीएम ने यह सर्विस अभी दिल्ली के एक मैट्रो स्टेशन से शुरू की है, जिसे धीरेधीरे अन्य स्टेशनों में चालू कर इस को विस्तार देगा. इस सर्विस से जुड़ी कंडीशन अप्लाई भी जरा समझिए. फ्री के लालच में न जाने कितने यूजर्स पहले तो अपना कीमती इंटरनैट लगा कर पेटीएम अकाउंट के लिए एप्लीकेशंस डाउनलोड करेंगे. फिर साइट पर कुछ खरीदफरोख्त या मनी ट्रांजैक्शन या कर कंपनी को मुनाफा पहुंचाएंगे. जाहिर है 15 मिनट में इस से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता. यही है फ्री कौमर्स.

दुनिया  में कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता. हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है. कई बार कीमत प्रत्यक्ष तौर पर चुकाई जाती है तो कई बार अन्य वैकल्पिक जरियों से, जैसा कि आजकल कई उपभोक्ता और विज्ञापन कंपनियां औनलाइन प्लेटफौर्म पर बड़ी चालकी से मुफ्त सुविधाओं के नाम पर अप्रत्यक्ष तौर पर मनमाने दाम वसूल रही हैं. चालाकी से इसलिए क्योंकि उन का दावा है कि वे बिलकुल मुफ्त सुविधा दे रही हैं जबकि कंडीशन अप्लाई की तर्ज पर वे न सिर्फ आप की जेब ढीली करती हैं बल्कि आप का कीमती वक्त भी बरबाद करती हैं. कुछ मामलों में अगर गलती से आप ने थोड़े से पैसे बचा भी लिए तो भी ढेर सारे वक्त की बरबादी तय है.

साइबर बाजार की शातिर चालें

आज के तकनीकी दौर में इंटरनैट की दुनिया तेज रफ्तार से बढ़ती जा रही है. इस विशाल दुनिया में अब लगभग हर कोई किसी न किसी तरीके से इंटरनैट का इस्तेमाल करता है. चाहे ईमेल, वीडियो अपलोड, चैटिंग के लिए या फिर फेसबुक और यूट्यूब के लिए. इसी इंटरनैट पर आजकल सबकुछ मुफ्त में देने का ढोल पीटा जा रहा है. मोबाइल एप्लीकेशन, न्यूज साइट्स, फ्री पीडीएफ बुक्स, औडियो बुक्स, फ्री वीडियो और फिल्में डाउनलोड, औनलाइन फ्री गेम्स, न्यूज और मैसेज आदि.

पहली नजर में तो ये सुविधाएं वाकई मुफ्त की स्कीम लगती हैं लेकिन कभी आप ने सोचा है कि इस मुफ्त के खेल के पीछे विज्ञापन कंपनियां और साइबर बाजार की शातिर चालें क्या हैं. आइए जरा समझने की कोशिश करते हैं. दरअसल, उपरोक्त सभी सुविधाओं में फ्री का कुछ भी नहीं है. मसलन, सभी तरह की सुविधाओं के लिए आप को अपने मोबाइल का इंटरनैट पैक रिचार्ज करवाना पड़ता है या फिर कंप्यूटर में इंटरनैट प्लान व कनैक्शन लेना पड़ता है. सब जानते हैं कि मात्र 300 एमबी डाटा के लिए टैलीकौम कंपनियां 100 से 300 रुपए तक वसूलती हैं. जबकि 300 एमबी डाटा 4-6 वीडियो या एक फिल्म देखने के लिए भी नाकाफी डाटा है. इस तरह यूट्यूब समेत अन्य वैबसाइट्स के वीडियो महीने भर देखने के लिए न सिर्फ हजारों रुपए का रिचार्ज जरूरी है बल्कि अच्छाखासा समय भी देना अनिवार्य है. पिछले साल केरल के सिनेमाघरों में एक नए प्रयोग के तहत दावा किया गया था कि फिल्म ‘टैस्ट पैपर’ को बिना टिकट के यानी फ्री में दिखाया जाएगा. पहली नजर में यह सौदा सब को जोरदार लगेगा. फ्री में सिनेमाघरों में पिक्चर कौन नहीं देखना चाहेगा. लेकिन इस स्कीम के पीछे पेंच छिपा था. दरअसल, इस तथाकथित मुफ्त की फिल्म के लिए दर्शकों को उन कंपनियों की विज्ञापन फिल्में जबरन देखनी पड़ीं जो इस फिल्म की प्रायोजक थीं. यानी प्रायोजक कंपनियां टिकट की कीमत दर्शकों को विज्ञापन दिखा कर रही थीं. जो इन दिनों सिनेमाघर जा कर फिल्में देखते हैं, भलीभांति जानते हैं कि फिल्म की शुरुआत में विज्ञापनों की झड़ी लगा कर किस कदर उन्हें बोर किया जाता है. हद तो यह है कि इंटरवल के दौरान भी फ्री की फिल्म की आड़ में विज्ञापन दिखाए जाते हैं. यानी टीवी की तरह यहां भी विज्ञापन का जाल बिछा कर मुफ्त का सिनेमा दिखाने की चाल है. इस तरह आप फ्री की फिल्म 2-3 घंटे की जगह 4 घंटे में खत्म कर पाते हैं. इतना ही नहीं, इन बोझिल विज्ञापनों को किसी तरह झेल भी गए लेकिन अगर फिल्म बंडल निकली तो पूरा भेजा फ्राई होने की गारंटी है. इस तरह विज्ञापनों के चक्कर में कीमती वक्त तो बरबाद हुआ ही, ऊपर से फ्री के चलते पूरी की पूरी फिल्म भी झेलनी पड़ी. हुआ न घाटे का सौदा. इन की तरकीब है कि मुफ्त का माल बता कर हजारों की भीड़ एकजगह जमा की जाए और बदले में कंपनी की मार्केटिंग व प्रोडक्ट की पब्लिसिटी की जाए.

अनियंत्रित सोशल साइट्स

इसी तर्ज पर इंटरनैट भी चल रहा है. यूट्यूब को ही ले लीजिए. आजकल लोग टीवी प्रोग्राम मोबाइल या लैपटौप के जरिए या यूट्यूब पर देखते हैं या फिर टीवी चैनल्स की एंड्रौइड एप्लीकेशंस डाउनलोड कर उस में स्ट्रीम करते हैं. दोनों ही माध्यमों में इंटरनैट की मोटी खपत होती है. गंगनम स्टाइल कोलावेरी डी की सफलता के पीछे यूट्यूब के लाखों हिट्स थे. सो, कमाई की मंशा से यूट्यूब भी वीडियो दिखाने के बदले विज्ञापनोंभरी डोज देने पर उतारू है. कोई भी वीडियो प्ले करो, बफरिंग के दौरान 2 से 5 मिनट का विज्ञापन आ जाता है. इन्हें स्किप करना भी मुश्किल है. वैसे तो ये वीडियो मुफ्त में देखने के लिए अपलोड किए गए हैं लेकिन विज्ञापन कंपनियां इन्हें भी कमाई का जरिया बना चुकी हैं. वीडियो के दौरान अब बफरिंग में जो पैसा खर्च हुआ, सो हुआ, ऊपर से विज्ञापन भी समय बरबाद करते हैं. कई बार 1 से 2 मिनट के वीडियो के लिए 3 मिनट की फिल्म का ट्रेलर देखना पड़ जाता है. मुश्किल यही है कि आप के हाथ में कोई रिमोट नहीं है. इसी तरह इंटरनैट पर लाखों वैबसाइट्स अपने कंटैंट को विज्ञापनों की चादर उढ़ा कर आप का पैसा और समय चुराने में मसरूफ हैं. इस के एवज में यूट्यूब उन कंपनियों से कमाई का खासा शेयर वसूलता है.

न्यूज वैबसाइट्स का और भी बुरा हाल है. आज हर कोई ईपेपर और औनलाइन समाचार पढ़ने व देखने का आदी हो गया है. इसी बात का फायदा इंटरनैट बाजार उठा रहा है. किसी भी न्यूज साइट को ले लीजिए, एक पेज की खबर के लिए पहले कई विज्ञापनों की झड़ी से गुजरना पड़ता है. फिर कतराकतरा कर आप को खबर पढ़ाई जाती है. इस तरह 10 लाइन की एक खबर को स्लाइडिंग और क्लिक करकर के 10 मिनट में पढ़ना सिरदर्दी भरा अनुभव होता है. उस पर इंटरनैट की स्पीड का भी रोना. अगर स्पीड स्लो है या 3जी की जगह 2जी की स्पीड मिल रही है तो फिर करते रहिए क्लिक पर क्लिक. और इंतजार कीजिए एकएक स्लाइड के खुलने का. सभी बड़े अखबारों के औनलाइन पोर्टल्स का यही हाल है.

मुफ्त का जाल

अगर एंड्रौयड फोन के यूजर्स इस मुगालते में हैं कि उन्हें तो सारी एप्लीकेशंस फ्री में डाउनलोड करने की आजादी है तो जरा एक बार फिर से सोचिए. ये एप्लीकेशंस और तथाकथित मुफ्त सुविधाएं आप का पैसा और वक्त कैसे खा रही हैं. इसे ऐसे समझिए, एक आदमी महीने में औसतन 20-50 एसएमएस करता है. इस के लिए उसे अमूमन 1 रुपए खर्चने पड़ते हैं. अगर उस ने एसएमएस कार्ड डलवाया है तो मुश्किल से 20 से 25 रुपए में 500 एसएमएस फ्री मिलते हैं लेकिन जब वाट्सऐप, फेसबुक या वीचैट को डाउनलोड कर एसएमएस करते हैं तो पहले 200 रुपए का इंटरनैट पैक डलवाओ, फिर उसे वसूलने के लिए रातदिन बेवजह के मैसेज कर समय बरबाद करो. अखबार, पत्रिका या कहें प्रिंट मीडिया के साथ कम से कम यह सहूलियत तो है कि विज्ञापनों को नजरअंदाज करते हुए खबरें पढ़ कर समय बचा सकते हैं और सिर्फ काम के पन्ने उलट कर पलक झपकते पूरा अखबार पढ़ सकते हैं लेकिन इंटरनैट और विजुअल या कहें इलैक्ट्रौनिक मीडिया में ऐसा कोई नियंत्रण नहीं है. आप मूर्ख और मूकदर्शक की तरह जो वह दिखाए, उसे देखने पर मजबूर होते हैं.

दरअसल, जबरन विज्ञापन दिखाने का यह सिलसिला इलैक्ट्रौनिक मीडिया के आने के बाद से ही शुरू हुआ है. टीवी कार्यक्रम व न्यूज चैनल देखने के शौकीन इस बात को जानते हैं कि आधे या 1 घंटे के न्यूज बुलेटिन या सीरियल देखने के एवज में कितना वक्त जबरन के विज्ञापनों के हवाले करना पड़ता है. पहले के एकमात्र टीवी दूरदर्शन में 30 मिनट के कार्यक्रम के दौरान 25 से 26 मिनट प्रोग्राम और मात्र 4 से 5 मिनट ही विज्ञापन देखने पड़ते थे. और अब 15 मिनट की खबर और 15 मिनट का विज्ञापन चलता है. कई बार तो प्रोग्राम के बीच में भी ऐड की क्लिपिंग, फ्लैश या स्ट्रिप्स ?डिस्टर्ब करती रहती हैं.

इलैक्ट्रौनिक मीडिया के बाद इंटरनैट के बाजार ने टीवी की तकनीकी चालाकी को आत्मसात कर लोगों को पहले इंटरनैट का एडिक्शन दिया. जब लोग इंटरनैट के प्लेटफौर्म पर पढ़ाईलिखाई, फिल्में देखना, चैटिंग, वीडियोबाजी, औनलाइन शौपिंग और टीवी देखने की लत के शिकार हो गए तो फ्री का खेल शुरू हुआ. इंटरनैट और अन्य कम्युनिकेशन माध्यमों की दुनिया में मुफ्त के नाम पर खेला जा रहा मार्केटिंग का यह तमाशा आप का कितना वक्त और धन बरबाद कर रहा है, जरा हिसाब लगा कर तो देखिए.        

डोनेशन और राजनीति के शिकार मैडिकल छात्र

डोनेशन के नाम पर मोटी रकम वसूल कर और मैडिकल सीटों की खरीदफरोख्त से डाक्टर बनाए जा रहे हों तो देश के स्वास्थ्य का क्या होगा? ऐसी हालत में स्वाभाविक है कि इंसानी जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया जाता रहेगा. कुछ मेहनती छात्र अपने बलबूते पर एमबीबीएस और एमडी, एमएस पीजी की पढ़ाई के लिए सीटें प्राप्त तो कर लेते हैं लेकिन वे सरकारी अस्पतालों में बिना उचित व्यवस्था, बिना उचित साधनों के सही रूप से प्रशिक्षित नहीं किए जा पाते. ऐसे डाक्टरों की संख्या भी अस्पतालों की जरूरतों के मद्देनजर बहुत कम होती है. इस कारण उन पर वर्कलोड अधिक होता है, जिस का सीधा असर उन के कार्य पर पड़ता है. फलस्वरूप, वे अपनी शतप्रतिशत कार्यक्षमता नहीं दे पाते.

भारत की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था चरमरा गई है, परंतु देश की सरकार द्वारा इस दिशा में पारदर्शी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. एक रोगी इलाज करवाने जाए तो कहां जाए. प्राइवेट अस्पताल में जाइए तो ऐसे डाक्टर हैं जिन्होंने रुतबे और पैसे के लिए मोटा डोनेशन दे कर मैडिकल सीट खरीदी थी, ऐसे छात्र अब डाक्टर बन भारी फीस वसूलने के बाद भी क्या सही इलाज कर सकेंगे? इस में संदेह ही है. दूसरी ओर सरकारी अस्पताल हैं जहां की व्यवस्था, कम साधनसुविधा, कम वेतन व डाक्टरों की कम संख्या के चलते थकेहारे, खीझे हुए डाक्टर हैं जिन से सटीक इलाज की कितनी अपेक्षा रखी जानी चाहिए. आईआईटी या सिविल सेवा संगठनों में सीटें दिलवाने के लिए एजेंटों के विज्ञापन नहीं दिखते जबकि एमबीबीएस, एमडी, एसएस पीजी की कन्फर्म सीटों के लिए पूरे भारत में एजेंटों के विज्ञापनों की भरमार रहती है.

डोनेशन की महामारी

टीओआई की एक विज्ञप्ति के अनुसार प्राइवेट कालेज मैनेजमैंट का इन एजेंटों के साथ मिल कर प्रतिवर्ष एमबीबीएस की 30 हजार और एमडी/एमएस पीजी की 9,600 सीटों के लिए करीब 12 करोड़ रुपयों का आदानप्रदान होता है. भारत में 422 मैडिकल कालेज हैं, जिन में 224 प्राइवेट हैं. यानी 53 फीसदी सीटें उन के पास हैं. इन में बहुत से ऐसे कालेज हैं जिन में छात्रों के लिए उचित सुविधासाधन नहीं, सीखनेसमझने के लिए मरीज भी नहीं. इतना ही नहीं, कई मैडिकल कालेजों ने झूठी फैकल्टीज भी दिखा रखी हैं. एमबीबीएस की एक सीट बेंगलुरु में 1 करोड़ रुपए की तो उत्तर प्रदेश में 25 से 35 लाख रुपए तक की है. पिछले वर्षों में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात में इन की कीमत 75 लाख रुपयों तक पहुंच गई. डर्मेटोलौजी और रेडियोलौजी पीजी सीटों के तो कहने ही क्या, कीमत 1.5 से 3 करोड़ रुपए तक है.

प्रवेश परीक्षा परिणाम घोषित होने से पूर्व ही सीटें बुक की जाती हैं. मोटी रकम इकट्ठा करने के साथ अभिभावकों को बुकिंग के लिए काफी जद्दोजेहद करनी पड़ती है. पहले आओ पहले पाओ का खेल है. पहले आने पर कुछ छूट मिलती है जबकि परिणाम आने के बाद रकम दोगुनी हो जाती है. गुजरात में 2,780 यूजी सीट हैं जिन में 1,080 सीटें 6 सरकारी कालेजों के पास हैं और 1,700 सीटें 12 प्राइवेट कालेजों में हैं. एक डीम्ड यूनिवर्सिटी है जिस में एजुकेशन कमेटी का अपना मैनेजमैंट कोटा व एनआरआई कोटा है. इस का एनआरआई छात्रों को कम बल्कि रिश्तेदारों व प्रभावी लोगों को अधिक फायदा मिलता है. सभी संस्थान प्रवेश परीक्षा इस दावे पर आयोजित करते हैं कि छात्रों का चयन मैरिट के आधार पर होता है. हालांकि कई राज्यों में इस बात का खुलासा हो चुका है कि पैसे वाले और कम अंक प्राप्त अथवा परीक्षा में न बैठने वाले छात्रों को भी सीटें मिल जाती हैं. प्रति वर्ष घोटाले सामने आ जाते हैं. मैनेजमैंट और एनआरआई कोटा 30 फीसदी कहा जाता है पर वास्तविकता इस से कहीं ज्यादा है.

उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में प्राइवेट मैडिकल कालेजों में 15 फीसदी एनआरआई तो 44 फीसदी मैनेजमैंट कोटा, मिला कर कुल 60 फीसदी बिकने वाली सीटें हो जाती हैं जो ऐडमिशन रैकेट द्वारा फर्जी स्कोरर से भर दी गई थीं, जिन्हें खाली कराने के लिए बाद में पैसे देने पड़े.

सीटों की खरीदफरोख्त

कर्नाटक में भी कुछ ऐसा हुआ. वहां प्राइवेट कालेजों को भारी संख्या में सीटें दे दी गई थीं. परिणाम घोषित होने से पूर्व पीजी रेडियोलौजी की 3 करोड़ रुपए और डर्मेटोलौजी की सीटें 1.5 से 2 करोड़ रुपए में बिक गईं उन्हीं एजेंटों और बिचौलियों के माध्यम से. आंध्र प्रदेश के एमसीआई सदस्य डा. रमेश रेड्डी  के अनुसार, अगर सरकार इस मुद्दे पर गंभीर थी तो फीस चाहे 3 करोड़ रुपए रख देती पर छात्रों को मैरिट के आधार पर ही लिया जाता. उस में सारा एकत्रित धन काला नहीं, सफेद और टैक्स देने योग्य होता. महाराष्ट्र में 43 फीसदी मैनेजमैंट कोटा, 17 फीसदी एनआरआई मिला कर 60 फीसदी बिकने वाली सीटें हैं. यहां पीजी सीटों की संख्या 23,600 है जिस में से 9,400 प्राइवेट सैक्टर को दे दी गईं हैं. आकलन के अनुसार,लगभग 9,300 करोड़ रुपए यानी 1.5 बिलियन डौलर कालाधन सीटों की खरीदफरोख्त से आता है जो भारतीयों द्वारा स्विस अकाउंट में जमा किया जाता है.

मजे की बात तो यह है कि यहां ये सारा पैसा कैश में लिया जाता है बिना किसी रसीद के. इतना सब कुछ होने के बावजूद सरकार न तो इन का भांडा फोड़ती है, न रोक लगाती है और न ही मैडिकल एजुकेशन सिस्टम को सही करने की दिशा में ठोस कदम ही उठा रही है. ऐसे में एनईईटी को रद्द करने का अपना फैसला वापस ले कर कोर्ट ने सिस्टम में बेहतरी की उम्मीद जगाई है. जिस से पूरे भारत के मैडिकल कालेजों के लिए एक ही कौमन एंट्रैंस टैस्ट होगा और मैरिट से छात्रों का चुनाव भी संभव हो सकेगा.  अभी एनईईटी फिर से लागू हो गया है. एक मई को पूरे भारत में एक ही कौमन एंट्रैंस टैस्ट लिया गया. स्वास्थ्य सेवा संस्थाओं में भ्रष्टाचार रोकने के लिए हमें यहां डोनेशन और सीटों की खरीदफरोख्त का जम कर विरोध करना चाहिए या यों कहें, एकजुट हो एकमत से नकार देना चाहिए. इस से नुकसान हम सब का ही है. आज अगर हम अपने बच्चों को डोनेशन या खरीदफरोख्त का फायदा उठाते हुए सीट दिला कर भले ही खुश हो लें परंतु कल को हम अपने इलाज के लिए ऐसे ही डाक्टर तैयार कर रहे हैं जो हमें उचित और सटीक उपचार नहीं दे सकते. सोचने का विषय है कि परीक्षा में अपनी बुद्धि क्षमता से अच्छे प्रतिशत लाने वाला मेधावी छात्र ही अच्छा डाक्टर बन सही इलाज करेगा अथवा डोनेशन या खरीद से बना न्यूनतम प्रतिशत पाने वाला छात्र डाक्टर.

डोनेशन की महामारी फैलाने वाले, उन के हिमायती यह भूल जाते हैं कि उन्हें भी इस की चपेट में एक दिन आना पड़ेगा. उन्हें अपना अथवा अपने प्रियजनों का इलाज कम ज्ञान और कम बुद्धिक्षमता वाले डाक्टर के हाथों से कराना पड़ेगा. बहुमूल्य जीवन और स्वास्थ्य उन के अधकचरे ज्ञान के हवाले होगा. डोनेशन या खरीदफरोख्त द्वारा अपने बच्चे को डाक्टर बनाने और पैसा पीटने की होड़ में लगने वाले मांबाप आखिरकार पूरे देश के साथ अपने बच्चों की जिंदगियों से भी खेल रहे हैं.

मोदी सरकार का हुर्रियत पर यूटर्न क्यों…?

नरेंद्र मोदी की सरकार यूटर्न की सरकार बनती जा रही है. उस का सब से नया यूटर्न हुर्रियत पर है. 2 साल पहले हुर्रियत नेताओं के  पाकिस्तानी अधिकारियों से मिलने पर एतराज करते हुए मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत रद्द कर दी थी. लेकिन अब सरकार ने पलटी मारते हुए कहा है कि जम्मूकश्मीर हुर्रियत कौन्फ्रैंस के नेता किसी भी विदेशी प्रतिनिधि से मिलनेजुलने के लिए आजाद हैं. अगर ऐसा है तो 2014 और 2015 में उन से मिलने के पाकिस्तानी अधिकारियों के कार्यक्रम को मुद्दा बना कर भारत सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत क्यों रद्द की थी? इसी पृष्ठभूमि के कारण संसद में विदेश राज्यमंत्री जनरल विजय कुमार सिंह के दिए एक लिखित जवाब पर सवाल उठे हैं. सिंह ने कहा, ‘‘चूंकि पूरा जम्मूकश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और तथाकथित कश्मीरी नेता भारत के नागरिक हैं, इसलिए उन के किसी देश के नुमाइंदे से मिलने पर कोई रोक नहीं है.’’ सवाल पाकिस्तान के संदर्भ में ही पूछा गया था.

अगस्त 2014 में दोनों देशों के विदेश सचिवों की बातचीत तय थी. उस से पहले पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात का कार्यक्रम बनाया. इस से नाराज भारत सरकार ने वार्त्ता ही रद्द कर दी. पिछले साल पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज भारत आने वाले थे. भारतीय एनएसए अजित डोभाल से बातचीत से पहले उन्होंने हुर्रियत नेताओं से मिलना तय किया. फिर भारत ने बातचीत रद्द की. लेकिन उस के बाद से काफी गौमूत्र बहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच पेरिस में छोटी मुलाकात हुई. उस के बाद पिछले दिसंबर में नवाज शरीफ के जन्मदिन पर बधाई देने के लिए मोदी उन के घर गए.

मगर उस के कुछ ही दिन बाद पठानकोट हमला हो गया. तब से बातचीत ठहरी हुई थी. मगर पिछले दिनों नई दिल्ली में एक बहुपक्षीय सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के विदेश सचिव मिले. क्या जनरल वी के सिंह का ताजा बयान दोनों देशों में समग्रवार्त्ता का रास्ता साफ करने के लिए दिया गया है? क्या द्विपक्षीय वार्त्ता से पहले हुर्रियत नेताओं से पाकिस्तानी अधिकारियों को मिलने की इजाजत दी जाएगी? ऐसा हुआ, तो इसे एनडीए सरकार का एक बड़ा यूटर्न माना जाएगा. सिर्फ आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान से बात करने के रुख से वह पहले ही हट चुकी है. अब एजेंडे पर कश्मीर सहित सारे विवादित मुद्दे हैं. इस तरह हुर्रियत के मुद्दे पर मोदी सरकार को झुकना ही पड़ा. आखिर भारत-पाक बातचीत में इतना महत्त्वपूर्ण बन जाने वाली हुर्रियत क्या बला है? ‘कश्मीर कभी भारत का हिस्सा रहा ही नहीं’, ‘हमें मुकम्मल आजादी चाहिए’, ‘जम्मूकश्मीर पाकिस्तान का भाग है’, ‘जम्मूकश्मीर का भारत में हुआ विलय धोखा है’, ‘हमें स्वशासन दो’, ‘हमें स्वायत्तता चाहिए’, ‘सुरक्षा परिषद के आत्मनिर्णय वाले प्रस्ताव पर अमल हो’, ‘कश्मीर मसले पर वार्त्ता में पाकिस्तान को भी शामिल करो’, ‘बंदूक के जोर पर ल

कर रहेंगे निजामे मुस्तफा.’ इस सारी अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक नारेबाजी के साथ कश्मीर में अकसर धरना, प्रदर्शन, रैली, बंद और हिंसा होती रहती हैं. ये काम करते हैं कश्मीर घाटी में सक्रिय अलगाववादी संगठन, आतंकी गुट, कट्टरपंथी मजहबी जमातें, कश्मीर के क्षेत्रीय राजनीतिक दल जो हुर्रियत के नाम से पहचाने जाते हैं. इन के पीछे संगीनों वाले जिहादी आतंकियों की ताकत  होती है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि पाकिस्तान द्वारा निर्मित हुर्रियत खूंखार आतंकवादी संगठनों का अहिंसक चेहरा है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हंगामा इन्हीं नारों को ले कर भगवापंथी कर रहे हैं पर श्रीनगर की सरकार हाथ से निकल न जाए, वे अपना हिंदूवादी दोगलापन अपनाते रहते हैं और दोनों तरफ की बातें करते रहते हैं. दरअसल, औल पार्टी हुर्रियत कौन्फ्रैंस जम्मूकश्मीर के 23 अलगाववादी संगठनों का गठबंधन है जो कश्मीर के भारत से अलगाव की वकालत करता है. इस की स्थापना 9 मार्च, 1993 को की गई थी. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हुर्रियत कौन्फ्रैंस जम्मूकश्मीर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है. इसे बनाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंसक गतिविधियों को मान्यता नहीं दी जाती, इसलिए हुर्रियत कौन्फ्रैंस के जरिए कश्मीर समस्या के अंतर्राष्ट्रीय और राजनीतिक समाधान के रास्ते ढूंढें़ जाएं. यह काम करने के हुर्रियत कौन्फ्रैंस  के अपने तरीके हैं. वह मुख्यरूप से  जम्मूकश्मीर में आतंकवादी संगठनों से संघर्ष कर रही भारतीय सेना की भूमिका पर सवाल उठाने के अलावा मानव अधिकारों की बात करती है. हुर्रियत कौन्फ्रैंस भारतीय सेना की कार्यवाही को सरकारी आतंकवाद का नाम देती है और कश्मीर पर भारत के शासन के खिलाफ हड़ताल व प्रदर्शन करती है. हुर्रियत कौन्फ्रैंस 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता और 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों का बहिष्कार भी करती आई है. हुर्रियत कौन्फ्रैंस ने अभी तक एक भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है मगर वह खुद को कश्मीरी जनता का असली प्रतिनिधि बताती है. नवंबर 2000 में भारत सरकार के एकतरफा युद्धविराम और शांतिप्रक्रिया शुरू करने के एलान के बाद हुर्रियत कौन्फ्रैंस ने पाकिस्तान को भी बातचीत में शामिल करने की मांग की. लेकिन भारत सरकार ने इसे ठुकरा दिया. कश्मीर के अलगाव के मुद्दे पर भी हुर्रियत के नेताओं में कुछ नेता कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की मांग करते हैं, वहीं कुछ संगठन कश्मीर की स्वतंत्रता की बात करते हैं.

कश्मीरी अलगाववाद का पिछले 20-25 साल का इतिहास गवाह है कि पाकिस्तानियों ने वहां के जनअसंतोष को हाईजैक कर लिया है. पाकिस्तान को इस स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए कई चोटी के नेता, दर्जनों मझोले दरजे के नेता और हजारों नागरिक मरवाने पड़े. आज वहां अलगाववादी शब्द का अर्थ ‘पाकिस्तान समर्थक’ बन चुका है. उस के सभी नेता चाहे वे सैयद अली शाह गिलानी के उग्रपंथी गुट से जुड़े हों, मीरवाइज मौलवी उमर फारुक के गुट से, जम्मू व कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी जेकेएलएफ चीफ यासीन मलिक के धड़े से या फिर सैयद सलाहुद्दीन और हाफिज सईद जैसे आतंकवादी, कमोबेश सभी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के प्रभाव में हैं और आरोप हैं कि उन से हवाला के मिलते पैसों पर पलते हैं. दिलचस्प बात यह है कि 50 के करीब कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के निर्देश पर सरकारी सुरक्षा मुहैया करवा रखी है. वे भारतीय सरकार की सुरक्षा के बीच रहते हुए भी भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार करते हैं और उन्हें कोई नुकसान इसलिए नहीं पहुंच सकता क्योंकि वे भारतीय सुरक्षाबलों की सुरक्षा में हैं. सरकार जानती है कि उन्हें किसी ने मार डाला तो पूरी घाटी भड़क उठेगी. अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा, जिन में मीरवाइज मौलवी उमर फारुक, सैयद अली शाह गिलानी, मौलवी अब्बास अंसारी, शब्बीर अहमद शाह, जावेद मीर, अब्दुल गनी बट, सज्जाद लोन, बिलाल लोन तथा यासीन मलिक जैसे नेता भी शामिल हैं, पर प्रतिवर्ष 50 करोड़ रुपया खर्च हो रहा है. गैरसरकारी अनुमान इस से दोगुना है.

अजीब यह है कि जिन सुरक्षाकर्मियों की बदौलत आज ये अलगाववादी नेता जीवित हैं वे उन्हीं पर आएदिन मानवाधिकारों के हनन के झूठे आरोप लगाते रहते हैं. कट्टरवादी औल पार्टी हुर्रियत कौन्फ्रैंस के अपने घोषणापत्र में साफ शब्दों में लिखा है कि उस का लक्ष्य ‘इसलामी मूल्यों पर आधारित समाज रचना करना’ तथा ‘मुसलिम बहुल राज्य’ की स्थापना करना व ‘शरीयत का शासन’ स्थापित करना है. कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले हुर्रियत नेता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की आजादी की बात कभी नहीं करते. पश्चिमोत्तर कश्मीर का वह इलाका तो सीधे इसलामाबाद के शासन में है. पाकिस्तान का आजाद कश्मीर कितना आजाद है, इस का पता हमें स्पष्ट रूप से पाक अधिकृत कश्मीर के उस संविधान से मिल सकता है जो 1974 में बना था. उस में साफ लिखा हुआ है कि ‘पाक अधिकृत कश्मीर का संविधान ऐसे किसी भी राजनीतिक गतिविधि का निषेध करता है जो इस सिद्धांत के विरुद्ध है कि जम्मूकश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है.’ पिछले लगभग एक दशक से, खासतौर पर 26/11 के मुंबई हमलों के बाद से कश्मीरी अलगाववादी खुद को अप्रासंगिक महसूस कर रहे थे. यूपीए सरकार ने अनेक कारणों से पाकिस्तान के साथ वार्त्ता प्रक्रिया की उपेक्षा की थी और इस का असर कश्मीर में नजर आ रहा था. इतिहास गवाह है कि अलगाववादियों को केवल तभी महत्त्व दिया जाता है जब भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत का दौर जारी हो.

भारत द्वारा वार्त्ता रद्द करने का निर्णय अप्रत्याशित था. प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी पाकिस्तान समेत सभी दक्षिण एशियाई देशों से रिश्ते सुधारने का जोरदार नाटक कर रहे हैं. अपने स्वतंत्रता दिवस उद्बोधन में भी उन्होंने पाकिस्तान या कश्मीर का कोई उल्लेख नहीं किया. लेह में भी उन्होंने पाकिस्तान के ‘छद्म युद्ध’ पर तभी टिप्पणी की जब पाकिस्तान की ओर से नियंत्रणरेखा, अंतर्राष्ट्रीय सीमा तथा संघर्ष विराम के उल्लंघन की बारबार कोशिश की जा रही थी. लेकिन मोदी ने जो कहा वह तो 1980 के दशक से ही कांग्रेस सरकारों का रुख रहा है. पाकिस्तान से वार्त्ता रद्द करने के मोदी के निर्णय से हुर्रियत के नेताओं को जो महत्त्व मिला, उस से यकीनन ही वे खुश हुए होंगे. लेकिन यदि भारत सरकार को लगता था कि अलगाववादियों और पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाकात नाजायज है तो वह हुर्रियत नेताओं को नई दिल्ली जाने से ही रोक सकती थी.

गिलानी, जो कि अप्रैल से ही हैदरपुरा स्थित अपने घर और कार्यालय में नजरबंद हैं, को नई दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने की अनुमति दी गई. मीरवाइज और यासीन मलिक भी उन के साथ थे. विरोध प्रदर्शनों के बीच वे पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलने पहुंचे. फिर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे यहां कश्मीरियों के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे हैं.

अलगाववादियों के हौसले पस्त

जम्मूकश्मीर विधानसभा चुनाव के समय अलगाववादियों ने हमेशा की तरह चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान जारी किया था. लेकिन जैसेजैसे चुनावप्रचार ने जोर पकड़ा और भाजपा अपने आक्रामक चुनावप्रचार के कारण एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभर कर सामने आई वैसे ही कुछ अलगाववादी धड़ों ने अपनी प्राथमिकता बदल दी. इतना ही नहीं, इन्हें शह देने वाला पड़ोसी मुल्क भी घाटी में बदले माहौल से हैरत में है. इन धड़ों के कुछ नेताओं को पाकिस्तान की तरफ से हमेशा से ही उकसाया जाता रहा है. जम्मूकश्मीर के विधानसभा चुनाव पर हर बार पाकिस्तान की पैनी नजर रहती है. बहरहाल, अलगाववादी किसी भी सूरत में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को राज्य में नहीं आने देना चाहते थे. यही वजह है जिस से घाटी में अलगाववादियों के सब से बड़े संगठन हुर्रियत कौन्फ्रैंस ने चुनाव बहिष्कार करने के साथ राज्य के एक बड़े समुदाय को वोट न देने के लिए षड्यंत्रपूर्ण तरीके से अभियान चलाया.

वास्तव में इस बार के विधानसभा चुनाव में लोगों की अभूतपूर्व भागीदारी और मुख्यधारा की राजनीति में विस्तार के चलते राज्य में भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई थी, जिस के चलते अलगाववादियों के हौसले पस्त हो गए. वर्षों से राज्य के राजनीतिक धरातल पर हाशिए पर रहे अलगाववादी इस बात से परेशान नजर आ रहे हैं कि पलपल बदलते परिदृश्य में कहीं वे दर्शक मात्र न बन कर रह जाएं. कुल मिला कर लब्बोलुआब यह दिख रहा है कि हुर्रियत को राज्य में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए जिस का अलगाववादी लंबे समय से बहिष्कार करते रहे हैं. औल पार्टी हुर्रियत कौन्फ्रैंस में शामिल ज्यादातर सभी बड़े घटक दलों का किसी न किसी आतंकवादी या जिहादी संगठन से रिश्ता है. भारतीय सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान के सैनिक मुख्यालय रावलपिंडी में बैठे सैनिक अफसर हुर्रियत कौन्फ्रैंस का संचालन करते हैं. पाकिस्तान में सत्ता के समीकरण बदलते हैं, तो कश्मीरी संगठनों का ढांचा बदल जाता है. वास्तव में इस देश को तथा दुनिया को कश्मीर आंदोलन के मूल चरित्र को समझने की जरूरत है. यह वास्तव में इसलामी विस्तारवाद की लड़ाई है. यह 1947 में भारत के विभाजन की लड़ाई का अवशिष्टांश है. यह न कश्मीरियत की लड़ाई है, न कश्मीर की आजादी की, यह इसलामी सम्राज्यवाद की लड़ाई है. 

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